হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5239)


5239 - أخبرني علي بن المؤمَّل، حدثنا أبي، حدثنا عمرو بن محمد العُثماني، حدثنا عمرو بن خالد، حدثني محمد بن يوسف بن ثابت، عن سهل بن سعد، قال: قال أبو بكر الصِّديق لأبي عُبيدة لما وجَّهَه إلى الشام: إني أُحب أن تَعلَمَ كرامتَك علَيَّ ومنزلتَك مِنّي، والذي نفسي بيدِه ما على الأرضِ رجلٌ من المهاجرين ولا غيرِهم أعدِلُه بك، ولا هذا - يعني عُمرَ - وله من المنزلةِ عندي إلَّا دون ما لك [1].




সাহল ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে যখন শামের (সিরিয়ার) দিকে প্রেরণ করেন, তখন তিনি তাকে বললেন: আমি চাই তুমি যেন তোমার কাছে আমার সম্মান এবং আমার নিকট তোমার মর্যাদার বিষয়টি জানতে পারো। যাঁর হাতে আমার জীবন, তাঁর কসম! পৃথিবীতে মুহাজিরদের মধ্যে বা অন্য কারো মধ্যে এমন কোনো ব্যক্তি নেই, যাকে আমি তোমার সমতুল্য মনে করি, এমনকি এই ব্যক্তিটিও না—(অর্থাৎ উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কেও না)—যদিও আমার কাছে তার মর্যাদা আছে, তবুও তা তোমার মর্যাদার চেয়ে কম।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لجهالة محمد بن يوسف بن ثابت وعمرو بن خالد: وهو ابن عاصم بن عمرو بن عثمان، كما وقع مُسمًّى عند الخبر المتقدم برقم (5229)، وقال الذهبي في "تلخيصه": سنده مظلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5240)


5240 - أخبرنا أحمد بن محمد بن سَلَمة العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارِمي، حدثنا أبو سلمة موسى بن إسماعيل، حدثنا عبد الله بن المبارك، أخبرنا إسحاق بن يحيى بن طلحة، حدثني عيسى بن طلحة، عن عائشة، قالت: حدثَني أبو بكر، قال: كنتُ في أولِ مَن فاءَ يومَ أُحُدٍ وبين يَدَي رسولِ الله صلى الله عليه وسلم رجلٌ يُقاتِل عنه، وأُراه قال: ويَحميهِ [1]، قال: فقلت: كُن طَلحةَ حين فاتَني ما فاتَني، قال: وبيني وبين المَشرق رجلٌ لا أعرفُه، أنا أقربُ إلى رسولِ الله صلى الله عليه وسلم منه، وهو يَخطِفُ السَّعِيَ خَطْفًا لا أَخطِفُه، فدَفَعْنا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم جميعًا، فإذا أبو عبيدة بن الجرّاح، فقال لنا رسول الله صلى الله عليه وسلم: "عليكم بصاحبِكم" يريد طلحةَ وقد نُزِفَ، فلم نَنظُر إليه، فأقبلْنا على رسول الله صلى الله عليه وسلم فأرادني [2] أبو عبيدة وطلب إليَّ، فلم يَزَلْ حتى تركتُه، وكان على حَلْقَتِه قد نَشِبَت، وكَرِه أن يُزَعْزِعَها بيدِه فيشتكيَ [3] النبيُّ صلى الله عليه وسلم، فأزَمَّ عليه بثَنيّتِه، ونَهَضَ ونَزَعها، وابتَدَرَتْ ثَنيَّتُه، فطلب إليّ ولم يَدَعْني حتى تركتُه، فأكَارَ [4] على الأخرى، فصنع مثلَ ذلك، ونَزَعَها وابتَدَرَت، فكان أبو عبيدة أهْتَمَ الثَّنَايا [5].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উহুদের দিনে যারা (রাসূলের নিকট) প্রথম প্রত্যাবর্তন করেছিল, আমি তাদের মধ্যে ছিলাম। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সামনে একজন লোক তাঁর পক্ষে যুদ্ধ করছিল, আর আমি তাকে বললাম: ইনি তো তালহা, যখন আমার হাতছাড়া হয়ে গেল (তাঁর মতো জিহাদের সুযোগ)।

তিনি (আবূ বকর) বলেন: আমার ও পূর্ব দিকের মাঝে একজন লোক ছিল যাকে আমি চিনতে পারছিলাম না। আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের তার চেয়েও নিকটবর্তী ছিলাম, কিন্তু সে এমন দ্রুত বেগে দৌড়াচ্ছিল যে আমি পারছিলাম না। আমরা সকলে একসাথে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে পৌঁছলাম, আর দেখলাম তিনি হলেন আবূ উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ।

তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের বললেন: “তোমরা তোমাদের সঙ্গীর প্রতি মনোযোগী হও।” তিনি তালহাকে উদ্দেশ্য করেছিলেন, যিনি অতিরিক্ত রক্তপাতের কারণে দুর্বল হয়ে পড়েছিলেন।

সুতরাং আমরা তাঁর (তালহার) দিকে মনোযোগ না দিয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের দিকে মনোনিবেশ করলাম। আবূ উবাইদাহ আমাকে (রাসূলের নিকট থেকে সরে যেতে) বললেন ও অনুরোধ করলেন, আর তিনি থামলেন না যতক্ষণ না আমি তাঁকে সুযোগ দিলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর (হেলমেটের) একটি রিং গেঁথে গিয়েছিল। তিনি (আবূ উবাইদাহ) হাত দিয়ে তা জোরে নাড়াতে অপছন্দ করলেন, পাছে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কষ্ট পান। তাই তিনি তাঁর সামনের দাঁত দিয়ে সেটিকে কামড়ে ধরলেন, দাঁড়িয়ে সেটি উপড়ে ফেললেন, আর তাঁর সামনের দাঁতটি খসে গেল।

এরপর তিনি আমাকে আবার অনুরোধ করলেন এবং আমাকে ছাড়লেন না যতক্ষণ না আমি তাকে সুযোগ দিলাম। তারপর তিনি অন্য রিংটির দিকে এগিয়ে গেলেন এবং একই কাজ করলেন, সেটিও উপড়ে ফেললেন, আর সেই দাঁতটিও খসে গেল। ফলে আবূ উবাইদাহ সামনের দাঁত হারানো ব্যক্তি হয়ে গেলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) و (ص) و (ب) إلى: ويَحملُه، وما أثبتناه من "الجهاد" لابن المبارك وغيره من مصادر تخريج الخبر.



[2] تحرَّف في (ز) و (ص) إلى: مارادني، بالميم بدل الفاء، وفي (ب) إلى: ما أرادني. ومعنى فأرادني: راوَدَوني على الأمر وحَمَلَني عليه، من قولهم: أراد فلانًا على الأمر: إذا حمله عليه.



5240 [3] - في نسخنا الخطية: فيشتد، والمثبت من "الجهاد" لابن المبارك، وهو أوجهُ. روى عن الواقدي كُتُبه، كما تقدَّم بيانه برقم (4060)، وقد تابعهم ابن سعد في "طبقاته" 3/ 379، لكنه فصَّل، فجعل قصة إسلام أبي عبيدة وأصحابِه من رواية يزيد بن رومان المرسلة، وقصة هجرة أبي عبيدة عن شيوخ الواقدي مُصدِّرًا إياها بعبارة: قالوا، وقصة شهود أبي عبيدة بدرًا وأحدًا وثبوته يوم أحد من قول الواقدي.وقد أسند الواقديُّ في "مغازيه" 11/ 246 - 247 قصة انتزاع أبي عبيدة حلقتي المغفر من وجنتي رسول الله صلى الله عليه وسلم بثنيّتيه، عن إسحاق بن يحيى بن طلحة بإسناده الذي تقدَّم عند المصنف قبله، ثم قال الواقدي: ويقال: إنَّ الذي نزع الحلقتين من وجه رسول الله صلى الله عليه وسلم هو عقبة بن وهب بن كَلَدة، ويقال: أبو اليَسَر. قال: وأثبتُ ذلك عندنا عقبة بن وهب بن كَلَدة.لكن نقل ابن سعد في "طبقاته" 3/ 505 عن الواقدي قوله: قال عبد الرحمن بن أبي الزناد: نرى أنهما - يعني عقب بن وهب وأبا عُبيدة - جميعًا عالجاهما، فأخرجاهما - يعني الحلقتين - من وجنتي رسول الله صلى الله عليه وسلم! فالله تعالى أعلم.وقد ذكر ابن إسحاق أبا عبيدة بن الجراح فيمن هاجر الهجرتين إلى الحبشة الأولى والثانية كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 329 - 369. قال ابن سعد في "طبقاته" 3/ 379: لم يذكره موسى بن عقبة وأبو مَعشَر. يعني في مهاجرة الحبشة.



5240 [4] - في (ص): فأدار، والمثبت من (ز) و (ب) بمعنى: أقبل، ومنه: أكار على فلان يضربه: إذا أقبل. روى عن الواقدي كُتُبه، كما تقدَّم بيانه برقم (4060)، وقد تابعهم ابن سعد في "طبقاته" 3/ 379، لكنه فصَّل، فجعل قصة إسلام أبي عبيدة وأصحابِه من رواية يزيد بن رومان المرسلة، وقصة هجرة أبي عبيدة عن شيوخ الواقدي مُصدِّرًا إياها بعبارة: قالوا، وقصة شهود أبي عبيدة بدرًا وأحدًا وثبوته يوم أحد من قول الواقدي.وقد أسند الواقديُّ في "مغازيه" 11/ 246 - 247 قصة انتزاع أبي عبيدة حلقتي المغفر من وجنتي رسول الله صلى الله عليه وسلم بثنيّتيه، عن إسحاق بن يحيى بن طلحة بإسناده الذي تقدَّم عند المصنف قبله، ثم قال الواقدي: ويقال: إنَّ الذي نزع الحلقتين من وجه رسول الله صلى الله عليه وسلم هو عقبة بن وهب بن كَلَدة، ويقال: أبو اليَسَر. قال: وأثبتُ ذلك عندنا عقبة بن وهب بن كَلَدة.لكن نقل ابن سعد في "طبقاته" 3/ 505 عن الواقدي قوله: قال عبد الرحمن بن أبي الزناد: نرى أنهما - يعني عقب بن وهب وأبا عُبيدة - جميعًا عالجاهما، فأخرجاهما - يعني الحلقتين - من وجنتي رسول الله صلى الله عليه وسلم! فالله تعالى أعلم.وقد ذكر ابن إسحاق أبا عبيدة بن الجراح فيمن هاجر الهجرتين إلى الحبشة الأولى والثانية كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 329 - 369. قال ابن سعد في "طبقاته" 3/ 379: لم يذكره موسى بن عقبة وأبو مَعشَر. يعني في مهاجرة الحبشة.



5240 [5] - إسناده ضعيف جدًّا كما تقدم بيانه برقم (4361).وهو في "الجهاد" لابن المبارك (91)، ومن طريق ابن المبارك أخرجه الطيالسي (6)، وأبو نعيم في "الحلية" 8/ 174، وفي "معرفة الصحابة" (561)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 263، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 447.على أنَّ ذكر إصابة رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم أحد ثابت كما تقدَّم بيانه في الموضع المحال إليه. روى عن الواقدي كُتُبه، كما تقدَّم بيانه برقم (4060)، وقد تابعهم ابن سعد في "طبقاته" 3/ 379، لكنه فصَّل، فجعل قصة إسلام أبي عبيدة وأصحابِه من رواية يزيد بن رومان المرسلة، وقصة هجرة أبي عبيدة عن شيوخ الواقدي مُصدِّرًا إياها بعبارة: قالوا، وقصة شهود أبي عبيدة بدرًا وأحدًا وثبوته يوم أحد من قول الواقدي.وقد أسند الواقديُّ في "مغازيه" 11/ 246 - 247 قصة انتزاع أبي عبيدة حلقتي المغفر من وجنتي رسول الله صلى الله عليه وسلم بثنيّتيه، عن إسحاق بن يحيى بن طلحة بإسناده الذي تقدَّم عند المصنف قبله، ثم قال الواقدي: ويقال: إنَّ الذي نزع الحلقتين من وجه رسول الله صلى الله عليه وسلم هو عقبة بن وهب بن كَلَدة، ويقال: أبو اليَسَر. قال: وأثبتُ ذلك عندنا عقبة بن وهب بن كَلَدة.لكن نقل ابن سعد في "طبقاته" 3/ 505 عن الواقدي قوله: قال عبد الرحمن بن أبي الزناد: نرى أنهما - يعني عقب بن وهب وأبا عُبيدة - جميعًا عالجاهما، فأخرجاهما - يعني الحلقتين - من وجنتي رسول الله صلى الله عليه وسلم! فالله تعالى أعلم.وقد ذكر ابن إسحاق أبا عبيدة بن الجراح فيمن هاجر الهجرتين إلى الحبشة الأولى والثانية كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 329 - 369. قال ابن سعد في "طبقاته" 3/ 379: لم يذكره موسى بن عقبة وأبو مَعشَر. يعني في مهاجرة الحبشة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5241)


5241 - فحدَّثنا بشَرْح هذا الحديثِ أبو عبد الله الأصبَهاني، حدثنا الحَسن، حدثنا الحُسين، حدثنا محمد بن عمر، حدثنا محمد بن صالح، عن يزيدَ بن رُومانَ، قال: أسلمَ أبو عُبيدة بنُ الجرّاح مع عثمانَ بن مَظْعُون وعبدِ الرحمن بن عَوف وأصحابِهم قبلَ دخول رسولِ الله صلى الله عليه وسلم دار الأرقَم، وهاجَر أبو عُبيدة إلى أرضِ الحَبَشة الهِجرةَ الثانيةَ، وشهد أبو عُبيدة بدرًا وأُحُدًا، وثَبَت يوم أُحدٍ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم حين انهزمَ الناسُ، وهو الذي نَزَع عن أبي بكر الصِّدّيق [1] بثنيَّتِه حَلْقَتَي مِغفَرِ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم اللتَين كانتا دخَلَتا في وَجنَتَيه يوم أُحد، وذلك أنَّه صلى الله عليه وسلم رُمي يومئذٍ في وجهه حتى دخلت في وَجْنتَيهِ حَلْقتانِ من المِغْفَر، فسقَطَتْ ثَنيّتا أبي عُبيدة بنَزْعه ذلك، فكان أبو عُبيدة أَثْرمَ [2].




ইয়াযিদ ইবনু রুমান থেকে বর্ণিত, আবূ উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), উসমান ইবনু মাযঊন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), আবদুর রহমান ইবনু আউফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং তাদের সঙ্গীরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দারুল আরকামে প্রবেশের আগেই ইসলাম গ্রহণ করেছিলেন। আবূ উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দ্বিতীয়বার আবিসিনিয়ায় (হাবশা) হিজরত করেছিলেন। আবূ উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বদর ও উহুদের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন। উহুদের দিন যখন লোকেরা ছত্রভঙ্গ হয়ে গিয়েছিল, তখনও তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে অবিচল ছিলেন। উহুদের দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর শিরোস্ত্রাণের যে দুটি কড়া তাঁর গালে ঢুকে গিয়েছিল, তা আবূ বাকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছ থেকে (দায়িত্ব নিয়ে) তিনি নিজের সামনের দাঁত দিয়ে টেনে বের করেছিলেন। আর এর কারণ হলো, সেদিন তাঁকে (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুখে আঘাত করা হয়েছিল, ফলে শিরোস্ত্রাণের দুটি কড়া তাঁর গালে বিদ্ধ হয়েছিল। আবূ উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর টেনে বের করার কারণে তাঁর সামনের দুটি দাঁত পড়ে গিয়েছিল। ফলে আবূ উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁতবিহীন হয়ে পড়েন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] سقط من المطبوع عبارة: عن أبي بكر الصديق، والمعنى: نَزَعَ أبو عُبيدة متحمِّلًا عن أبي بكر الصديق العَنَاء بثنيته حلقتي المغفر من وجنتيه صلى الله عليه وسلم. روى عن الواقدي كُتُبه، كما تقدَّم بيانه برقم (4060)، وقد تابعهم ابن سعد في "طبقاته" 3/ 379، لكنه فصَّل، فجعل قصة إسلام أبي عبيدة وأصحابِه من رواية يزيد بن رومان المرسلة، وقصة هجرة أبي عبيدة عن شيوخ الواقدي مُصدِّرًا إياها بعبارة: قالوا، وقصة شهود أبي عبيدة بدرًا وأحدًا وثبوته يوم أحد من قول الواقدي.وقد أسند الواقديُّ في "مغازيه" 11/ 246 - 247 قصة انتزاع أبي عبيدة حلقتي المغفر من وجنتي رسول الله صلى الله عليه وسلم بثنيّتيه، عن إسحاق بن يحيى بن طلحة بإسناده الذي تقدَّم عند المصنف قبله، ثم قال الواقدي: ويقال: إنَّ الذي نزع الحلقتين من وجه رسول الله صلى الله عليه وسلم هو عقبة بن وهب بن كَلَدة، ويقال: أبو اليَسَر. قال: وأثبتُ ذلك عندنا عقبة بن وهب بن كَلَدة.لكن نقل ابن سعد في "طبقاته" 3/ 505 عن الواقدي قوله: قال عبد الرحمن بن أبي الزناد: نرى أنهما - يعني عقب بن وهب وأبا عُبيدة - جميعًا عالجاهما، فأخرجاهما - يعني الحلقتين - من وجنتي رسول الله صلى الله عليه وسلم! فالله تعالى أعلم.وقد ذكر ابن إسحاق أبا عبيدة بن الجراح فيمن هاجر الهجرتين إلى الحبشة الأولى والثانية كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 329 - 369. قال ابن سعد في "طبقاته" 3/ 379: لم يذكره موسى بن عقبة وأبو مَعشَر. يعني في مهاجرة الحبشة.



[2] مَن فوق محمد بن عمر - وهو الواقدي - ثقات، لكن الخبر مرسل، ومَن دونه هم بعض مَن روى عن الواقدي كُتُبه، كما تقدَّم بيانه برقم (4060)، وقد تابعهم ابن سعد في "طبقاته" 3/ 379، لكنه فصَّل، فجعل قصة إسلام أبي عبيدة وأصحابِه من رواية يزيد بن رومان المرسلة، وقصة هجرة أبي عبيدة عن شيوخ الواقدي مُصدِّرًا إياها بعبارة: قالوا، وقصة شهود أبي عبيدة بدرًا وأحدًا وثبوته يوم أحد من قول الواقدي.وقد أسند الواقديُّ في "مغازيه" 11/ 246 - 247 قصة انتزاع أبي عبيدة حلقتي المغفر من وجنتي رسول الله صلى الله عليه وسلم بثنيّتيه، عن إسحاق بن يحيى بن طلحة بإسناده الذي تقدَّم عند المصنف قبله، ثم قال الواقدي: ويقال: إنَّ الذي نزع الحلقتين من وجه رسول الله صلى الله عليه وسلم هو عقبة بن وهب بن كَلَدة، ويقال: أبو اليَسَر. قال: وأثبتُ ذلك عندنا عقبة بن وهب بن كَلَدة.لكن نقل ابن سعد في "طبقاته" 3/ 505 عن الواقدي قوله: قال عبد الرحمن بن أبي الزناد: نرى أنهما - يعني عقب بن وهب وأبا عُبيدة - جميعًا عالجاهما، فأخرجاهما - يعني الحلقتين - من وجنتي رسول الله صلى الله عليه وسلم! فالله تعالى أعلم.وقد ذكر ابن إسحاق أبا عبيدة بن الجراح فيمن هاجر الهجرتين إلى الحبشة الأولى والثانية كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 329 - 369. قال ابن سعد في "طبقاته" 3/ 379: لم يذكره موسى بن عقبة وأبو مَعشَر. يعني في مهاجرة الحبشة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5242)


5242 - حدثني أبو زُرعة الرازيّ، حدثنا عمرو بن إدريس الغَيْفي [1] بمصر، حدثنا إسحاق بن إبراهيم بن نُصير، حدثنا أبو يحيى الوَقّار، سمعتُ عبد الله بن وهب يقول: كان نقشُ خاتم أبي عبيدة بن الجرّاح: الوفاءُ عزيز [2].




আবূ উবাইদা ইবনুল জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবদুল্লাহ ইবনু ওয়াহব বলেছেন: তাঁর আংটির নকশা ছিল: "আল-ওয়াফাউ আযীয" (বিশ্বস্ততা বা প্রতিশ্রুতি পালন অত্যন্ত মূল্যবান/দুষ্প্রাপ্য)।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: الضبعي، وإنما هو الغَيْفي، بغين معجمة مفتوحة وياء ساكنة بعدها فاء، نسبة إلى غَيْفة. انظر "الأنساب" للسمعاني. كلاهما أرسله: أنَّ نقش خاتم أبي عبيدة: الحمدُ لله. ورجاله ثقات. وهذا أصح، ولفظ الخمس لا معنى له، والله أعلم.



[2] أبو يحيى الوَقَّار - واسمه زكريا بن يحيى المصري - متروك مُتَّهم - وقد روي في نقش خاتم أبو عُبيدة بن الجرَّاح ما هو أصح من هذا من طرق مرسلة.من ذلك ما أخرجه عبد الرزاق (1361)، وابن سعد 3/ 381، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 11/ 71 - 72، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (589) من طريق قتادة بن دعامة مرسلًا: أن نقش خاتم أبي عُبيدة بن الجَرَّاح: الخُمُس الله. ورجاله ثقات.وأخرجه ابن أبي شيبة في "مصنفه" 8/ 269 عن معتمر بن سليمان بن طَرْخان التيمي، عن أبيه مرسلًا مثل رواية قتادة: الخُمُس لله. ورجاله ثقات.وأخرجه ابن أبي شيبة 8/ 270 من طريق مجاهد بن جبر و 8/ 270 من طريق إبراهيم النخعي، كلاهما أرسله: أنَّ نقش خاتم أبي عبيدة: الحمدُ لله. ورجاله ثقات. وهذا أصح، ولفظ الخمس لا معنى له، والله أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5243)


5243 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عفّان العامري، حدثنا يحيى بن آدم، حدثنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن صِلةَ بن زُفَر، عن عبد الله بن مسعود، قال: جاء العاقِبُ والسَّيّد صاحبا نَجْرانَ إلى النبي صلى الله عليه وسلم، يُريدان أن يُلاعِناهُ، فقال أحدُهما لصاحبِه: لا تَفعلْ، فو اللهِ لئن كان نبيًّا فلَعَنَنا لا نُفلِحُ [1] نحنُ ولا عَقِبُنا مِن بعدِنا، فقالا: بل نُعطِيك ما سألتَ، وابعثْ معنا رجلًا أمينًا حقَّ أمينٍ، قال: فاستشرفَ لها أصحابُ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "قُم يا أبا عُبيدةَ بن الجرَّاح"، فلما قَفَّى، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "هذا أَمينُ هذه الأُمّة" [2]. قد اتفق الشيخان على إخراج هذا الحديث مختصرًا في "الصحيحين" من حَديث الثَّوري وشعبة عن أبي إسحاقَ عن صِلَة بن زُفَر عن حذيفة، وقد خالفَهما إسرائيلُ فقال: عن صِلَة عن عبد الله، وساق الحديثَ أتمَّ [3] ممّا عند الثَّوري وشعبة، فأخرجتُه لأنه على شرطهما صحيحٌ.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নাজরানের দুই নেতা আল-আকিব ও আস-সাইয়িদ নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করলেন। তারা তাঁর সাথে 'মুলাআনা' (পারস্পরিক অভিশাপ) করতে চেয়েছিলেন। তাদের একজন তার সঙ্গীকে বলল: তুমি এমন করো না। আল্লাহর কসম! যদি ইনি নবী হন, আর তিনি যদি আমাদেরকে অভিশাপ দেন, তবে আমরা এবং আমাদের পরবর্তী প্রজন্ম কখনোই সফল হব না। অতঃপর তারা উভয়ে বলল: বরং আপনি যা চেয়েছেন আমরা তাই আপনাকে দেবো। আর আমাদের সাথে একজন প্রকৃত বিশ্বস্ত ব্যক্তিকে পাঠান। বর্ণনাকারী বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ সেই দায়িত্বের জন্য আকাঙ্ক্ষা পোষণ করলেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আবু উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ! তুমি ওঠো।" যখন তিনি ফিরে যাচ্ছিলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এই ব্যক্তিই হলো এই উম্মতের বিশ্বস্ত (আমীন)।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (ب): نصلُح، مصحَّحًا عليه في (ز)، ومكانها في (ص) بياض، والمثبت من "تلخيص المستدرك" للذهبي، وفاقًا لسائر مصادر تخريج الحديث. أبي إسحاق، عن صلة بن زُفر، عن حذيفة. فذكرا حذيفة بدل ابن مسعود.وأخرجه مختصرًا بالمرفوع آخره ابن ماجه (136) عن علي بن محمد، عن يحيى بن آدم، عن إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن صلة بن زُفر، عن عبد الله بن مسعود.



[2] إسناده صحيح، وقد اختُلف فيه على إسرائيل - وهو ابن يونس بن أبي إسحاق عمرو بن عبد الله السَّبيعي - في تعيين صحابي الحديث، فبعضهم يذكر فيه عبد الله بن مسعود، وبعضهم يذكر فيه حذيفةَ بن اليمان، كما اختلف فيه كذلك على أبي إسحاق - وهو السَّبيعي جدّ إسرائيل - ومثل هذا الاختلاف لا يضر بصحة الحديث، فمهما دار الحديثُ كان على صحابيٍّ. ولا يبعد أن يسمعه صلةُ من كليهما، والله تعالى أعلم.وأخرجه أحمد 7/ (3930) عن أسود بن عامر وخلف بن الوليد، والنسائي (8140) من طريق القاسم بن يزيد الجَرْمي، ثلاثتهم عن إسرائيل، به.وأخرجه البخاري (4380) عن عباس بن الحسين، عن يحيى بن آدم، عن إسرائيل، عن جده أبي إسحاق، عن صلة بن زُفر، عن حذيفة. كذا رواه عباس بن الحسين عن يحيى بن آدم خلافًا لرواية الحسن بن علي العامري عن يحيى بن آدم، إذ سمى الصحابي حذيفة، وقد تابع يحيى بن آدم على ذكر حذيفة بن اليمان عبدُ الله بنُ رجاء عند عمر بن شَبّة في "تاريخ المدينة" 2/ 584.وأخرجه دون قصة الملاعنة أحمد 38/ (23272) و (23407)، ومسلم (2420)، وابن ماجه (135)، والترمذي (3796)، والنسائي (8141) من طريق سفيان الثوري، وأحمد (23377) و (23397)، والبخاري (3745) و (4381) و (7254)، ومسلم (2420)، وابن ماجه (135)، والنسائي (8142) و (8143)، وابن حبان (6999) من طريق شعبة بن الحجاج، كلاهما عن أبي إسحاق، عن صلة بن زُفر، عن حذيفة. فذكرا حذيفة بدل ابن مسعود.وأخرجه مختصرًا بالمرفوع آخره ابن ماجه (136) عن علي بن محمد، عن يحيى بن آدم، عن إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن صلة بن زُفر، عن عبد الله بن مسعود.



5243 [3] - هو عند البخاري بذكر حذيفة بن اليمان بدل ابن مسعود وسياقُه تامٌّ كذلك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5244)


5244 - أخبرنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا سليمان بن حَرْب، حدثنا حمّاد بن سَلَمة، عن ثابت، عن أنس: أنَّ أهل اليمن قَدِموا على رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالوا: ابعَثْ معنا رجلًا يُعلّمُنا القرآنَ، فأخذ بيدِ أبي عُبيدةَ فأرسله [1] معهم، وقال: "هذا أمينُ هذه الأُمّة" [2].صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه بذِكْر القُرآنِ.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত... ইয়ামানের লোকেরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলো, অতঃপর তারা বলল: আমাদের সাথে একজন লোক পাঠান, যিনি আমাদেরকে কুরআন শিক্ষা দেবেন। তখন তিনি আবূ উবাইদার হাত ধরলেন এবং তাকে তাদের সাথে পাঠালেন, এবং বললেন: “এই ব্যক্তি হলো এই উম্মতের আমীন (বিশ্বস্ত)।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (ص) و (ب): فأرسل، والمثبت من "تلخيص المستدرك" للذهبي وهو أَوجهُ.



[2] إسناده صحيح. ثابت: هو ابنُ أسلم البُناني.وأخرجه أحمد 19/ (2261) و (12481) و 20/ (12789) و (13217) و 21/ (14048)، ومسلم (2419) من طرق عن حماد بن سلمة، به. ولفظ أحمد في الموضع الرابع: يعلمنا كتاب ربنا والسنة، ولفظ أحمد في الموضع الخامس ومسلم: يعلمنا السنة والإسلام، وأُطلق في سائر المواضع فقيل: يُعلّمنا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5245)


5245 - أخبرنا أبو عمرو بن إسماعيل، حدثنا محمد بن إسحاق، حدثنا زياد بن أيوب، حدثنا محمد بن فُضيل، حدثنا إسماعيل بن سُمَيع، عن مُسلم البَطين، عن أبي البَختَري، قال: قال أبو بكر الصِّدّيق لأبي عُبيدةَ: هلُمَّ [1] أُبايِعْك، فإني سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إنك أَمِينُ هذه الأُمّة"، فقال أبو عُبيدة: كيف أُصلِّي بين يَدَي رجلٍ أمَرَه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن يَؤمَّنا حتى [2] قُبِضَ [3]. صحيحٌ الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আবূ উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: তুমি এদিকে এসো, আমি তোমার হাতে বাইয়াত গ্রহণ করি। কারণ আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: “নিশ্চয় তুমি এই উম্মতের আমীন (বা বিশ্বস্ত)।” তখন আবূ উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি এমন এক ব্যক্তির সামনে কীভাবে সালাত আদায় করাতে পারি, যাকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর ইন্তিকাল (মৃত্যু) পর্যন্ত আমাদের ইমামতি করতে নির্দেশ দিয়েছিলেন?




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في النسخ الخطية: هل، والمثبت من "إتحاف المهرة" للحافظ ابن حجر (6706)، وهو أوجَهُ، وهَلُمَّ معناها: تَعالَ.



[2] في (ز) و (ب): حين، والمثبت من (ص) و"تلخيص المستدرك" للذهبي، وهو الجادّة. بسند صحيح إليه عند ابن سعد في "طبقاته" 3/ 166، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 1/ 579، وابن عساكر 30/ 273، وابنِ الجوزي في "المنتظم" 4/ 66.وأخرج ابن سعد 3/ 166، وابن أبي شيبة في "مصنفه" 14/ 570، والبلاذُري 1/ 579 عن محمد بن سيرين مرسلًا كذلك قال: لما توفي النبي صلى الله عليه وسلم أتوا أبا عُبيدة، فقال: أتأتوني وفيكم ثالث ثلاثة؟! يعني أبا بكر. قال ابن عون: قلت: لمحمد: ما ثالث ثلاثة؟ قال: ألم تر إلى تلك الآية: {إِذْ هُمَا فِي الْغَارِ إِذْ يَقُولُ لِصَاحِبِهِ لَا تَحْزَنْ إِنَّ اللَّهَ مَعَنَا}. وإسناده إلى ابن سيرين ثقات.وقد جاء في حديث عائشة في ذكر وفاة رسولِ الله صلى الله عليه وسلم وبيعة أبي بكر الصِّدّيق يوم السَّقيفة: أنَّ أبا بكر قال للناس: بايِعُوا عمرَ أو أبا عبيدة بن الجراح … أخرجه البخاري (3668).



5245 [3] - خبر صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات لكنه مرسل كما أشار إليه الذهبي في "تلخيصه"، لأنَّ أبا البَخْتَري - واسمه سعيد بن فيروز - لم يدرك أبا بكر ولا أبا عُبيدة، وربما ذُكر في هذا الخبر عمر بن الخطاب، بدلًا من أبي بكر الصديق، وقال ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 463: المحفوظُ أبو بكر. قلنا: على كلٍّ فمثل هذا الاختلاف لا يَضرُّ، فيبقى الشأنُ في إرساله، لكن ينجبر إرسالُه بوروده من وجه آخر مرسلٍ فباجتماعهما يصح الخبر إن شاء الله تعالى، وعلى أنَّ مرفوعه صحيح مشهور. محمد بن إسحاق: هو ابن خزيمة.وأخرجه أبو طاهر المخلِّص في "المخلصيات" (2806)، ومن طريقه ابن عساكر 25/ 463 عن يحيى بن محمد بن صاعد، عن زياد بن أيوب، بهذا الإسناد. لكنه ذكر عمر بن الخطاب بدل أبي بكر الصديق. قال ابن عساكر: كذا قال عمر، والمحفوظ أبو بكر. ثم احتجَّ ابن عساكر لذلك برواية أبي بكر بن عياش عن إسماعيل بن سُميع التي ذكر فيها أبا بكر الصديق، وسيأتي تخريجها، وما عند المصنف هنا كذلك حجةٌ لصحة قوله.على أنَّ أحمد قد أخرجه 1/ (233) عن محمد بن فضيل، به، فذكر عمر بن الخطاب بدل أبي بكر.وأخرجه أبو طاهر المخلِّص (2360)، ومن طريقه ابن عساكر 25/ 463 من طريق أبي بكر بن عياش، عن إسماعيل بن سُميع، عن مسلم البَطين - لم يجاوزه - قال: بعث أبو بكر إلى أبي عُبيدة … فذكره، فذكر أبا بكر الصديق، لكنه أسقط من الإسناد ذكر أبي البختري.وأخرجه أبو بكر المروزي في "مسند أبي بكر الصديق" (128)، وأبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (29)، وابن شاهين في "شرح مذاهب أهل السنة" (168)، وأبو نعيم في "أخبار أصبهان" 2/ 267، وفي "فضائل الخلفاء الراشدين" (120) و (186)، وابنُ عساكر 25/ 463 من طريق مروان بن معاوية، عن إسماعيل بن سُميع، عن علي بن أبي كثير: أنَّ أبا بكر قال لأبي عُبيدة … فذكره، فذكر أبا بكر الصديق، وعلي بن أبي كثير هذا تابعي ثقة، ومن دونه ثقات، فهو مرسلٌ صحيح الإسناد، وكأنَّ إسماعيل بن سُميع سمع هذا الخبر من مسلم البَطين يرويه عن أبي البَخْتري، وسمعه كذلك من علي بن أبي كثير، فله فيه إسنادان مرسلان.وقد رُوي مثل هذا الخبر عن عمر بن الخطاب أيضًا، لكن من مرسل إبراهيم بن يزيد التَّيمي بسند صحيح إليه عند ابن سعد في "طبقاته" 3/ 166، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 1/ 579، وابن عساكر 30/ 273، وابنِ الجوزي في "المنتظم" 4/ 66.وأخرج ابن سعد 3/ 166، وابن أبي شيبة في "مصنفه" 14/ 570، والبلاذُري 1/ 579 عن محمد بن سيرين مرسلًا كذلك قال: لما توفي النبي صلى الله عليه وسلم أتوا أبا عُبيدة، فقال: أتأتوني وفيكم ثالث ثلاثة؟! يعني أبا بكر. قال ابن عون: قلت: لمحمد: ما ثالث ثلاثة؟ قال: ألم تر إلى تلك الآية: {إِذْ هُمَا فِي الْغَارِ إِذْ يَقُولُ لِصَاحِبِهِ لَا تَحْزَنْ إِنَّ اللَّهَ مَعَنَا}. وإسناده إلى ابن سيرين ثقات.وقد جاء في حديث عائشة في ذكر وفاة رسولِ الله صلى الله عليه وسلم وبيعة أبي بكر الصِّدّيق يوم السَّقيفة: أنَّ أبا بكر قال للناس: بايِعُوا عمرَ أو أبا عبيدة بن الجراح … أخرجه البخاري (3668).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5246)


5246 - أخبرني محمد بن يعقوب المُقرئ، حدثنا محمد بن إسحاق بن إبراهيم، حدثنا قُتيبة بن سعيد، حدثنا كَثير بن هشام، حدثنا جعفر بن بُرْقَان، حدثنا ثابت بن الحجَّاج، قال: بلغَني أنَّ عُمر بن الخطاب قال: لو أدركتُ أبا عُبيدة بن الجَرّاح، لاستَخلفْتُه وما شاورتُه، فإن سُئِلتُ عنه قلتُ: استَخلفْتُ أمينَ الله وأمينَ رسوله الله صلى الله عليه وسلم [1].




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: "যদি আমি আবূ উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ-কে জীবিত পেতাম, তবে আমি তাকেই আমার স্থলাভিষিক্ত (খলীফা) করতাম এবং এ ব্যাপারে কারো সাথে পরামর্শ করতাম না। আর যদি আমাকে তাঁর (নিয়োগ) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হতো, তবে আমি বলতাম: আমি আল্লাহ্‌র আমীন (বিশ্বস্ত) এবং আল্লাহ্‌র রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমীনকে স্থলাভিষিক্ত করেছি।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم، لكنه مرسلٌ لأنَّ ثابت بن الحجاج لم يدرك عمر بن الخطاب، وقد رُوي هذا عن عمر من وجوهٍ عدة بعضها موصولٌ يصح الخبر بها بلا ريب.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته" 3/ 382، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 461، وأخرجه كذلك أحمد في "فضائل الصحابة" (1285) كلاهما عن كثير بن هشام، بهذا الإسناد.وأخرجه موصولًا عمر بن شبّة في "تاريخ المدينة" 3/ 886، وأبو بكر الإسماعيلي كما في "مسند الفاروق" لابن كثير (982)، والهيثم بن كليب الشاشي في "مسنده" (617) - ومن طريقه ابن عساكر 16/ 240 - 241، وابنُ العديم في "بغية الطلب في تاريخ حلب" 7/ 3123 - وأبو الحسن محمد بن محمد بن مخلد البزاز في "حديثه عن شيوخه" ضمن مجموع فيه عشرة أجزاء حديثية بتحقيق نبيل جرار (50) من طريق ضمرة بن ربيعة، عن يحيى بن أبي عمرو السَّيباني - بالسين المهملة - عن أبي العَجْفاء هرِم بن نسيب السُّلمي، قال: قيل لعمر: يا أمير المؤمنين لو عَهِدتَ؟ قال: لو أدركت أبا عبيدة بن الجراح لولّيتُه، فإن قدمتُ على ربّي فقال لي: من ولّيتَ على أمة محمد؟ قلت: سمعتُ عبدك وخليلك صلى الله عليه وسلم يقول -: "لكل أمة أمين، وأمين هذه الأمة أبو عبيدة بن الجرّاح". وحسَّن إسنادَه ابن كثير.وأخرجه أحمد 1/ (108)، ومن طريق ابن عساكر 25/ 460 - 461 من طريق شُريح بن عبيد وراشد بن سعد وغيرهما مرسلًا، قالوا: لما بلغ عمرُ بنُ الخطاب سَرْغَ حُدِّث أنَّ بالشام وباءً شديدًا، قال: بلغني أن شدة الوباء في الشام، فقلت: إن أدركني أجلي وأبو عبيدة بن الجرَّاح حيٌّ استخلفته، فإن سألني الله … فذكره. ورجاله ثقات، غير أنه مرسل.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 3/ 382، وأحمد في "فضائل الصحابة" (1287)، وعمر بن شبة في "تاريخ المدينة" 3/ 886، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 11/ 72، وابن عساكر 58/ 404 من طريق شهر بن حوشب، عن عمر بن الخطاب مرسلًا.وأخرجه مختصرًا دون المرفوع ابن سعد 3/ 343، وابن أبي شيبة 12/ 136، والبلاذُري في 11/ 70، والطبري في "تاريخه" 4/ 227، وأبو بكر الخلال في "السنة" (344) عن إبراهيم بن يزيد النخعي مرسلًا، قال: قال عمر: مَن أستخلِفُ؟ لو كان أبو عبيدةُ بن الجرّاح.وأخرجه مختصرًا بالمرفوع الآجرّي في "الشريعة" (1793)، والطبراني في "الأوسط" (866)، وأبو نُعيم في "فضائل الخلفاء الراشدين" (122)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 12/ 391 من طريق الجراح بن المنهال، عن حبيب بن نجيح، عن عبد الرحمن بن غَنْم، عن عبد الله بن أرقم، عن عمر بن الخطاب. وإسناده ضعيف لضعف الجراح وجهالة حبيب.وأخرجه كذلك البخاري في "تاريخه الكبير" 6/ 445 تعليقًا عن شيخه أحمد بن صالح المصري، عن ابن وهب، عن يونس بن يزيد عن ابن شهاب الزهري، عن عمر بن الخطاب مرسلًا. ورجاله ثقات لولا أنه مرسل.وانظر ما تقدَّم برقم (5237).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5247)


5247 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن إسحاق، أخبرنا زياد بن الخليل، حدثنا سهل بن بَكّار، حدثنا عبد العزيز بن أبي حازم، عن سُهيل، عن أبيه، عن أبي هُريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "نِعمَ الرجلُ أبو بكر، نِعمَ الرجلُ عمرُ، نِعمَ الرجلُ أبو عُبيدة بن الجرَّاح، نِعمَ الرجلُ أُسَيدُ بن حُضَير، نِعمَ الرجلُ ثابتُ بنُ قَيس، نِعمَ الرجلُ مُعاذُ بن جَبَل، نِعمَ الرجلُ معاذُ بن عَمرو بن الجَمُوح" [1]. صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আবূ বকর কতই না উত্তম পুরুষ, উমার কতই না উত্তম পুরুষ, আবূ উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ কতই না উত্তম পুরুষ, উসাইদ ইবনু হুদাইর কতই না উত্তম পুরুষ, সাবিত ইবনু কাইস কতই না উত্তম পুরুষ, মুআয ইবনু জাবাল কতই না উত্তম পুরুষ এবং মুআয ইবনু আমর ইবনুল জামূহ কতই না উত্তম পুরুষ।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قويّ من أجل زياد بن الخليل - وهو التُّستَري - وقد توبع كما تقدَّم برقم (5102). سُهيل: هو ابن أبي صالح ذكوان السمَّان.وسيأتي ذكر أُسيد بن حُضير مفردًا برقم (5345) من طريق عبد العزيز بن محمد الدراوردي عن سهيل بن أبي صالح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5248)


5248 - حدثنا بَكر بن محمد الصَّيرفي، حدثنا أبو قِلَابة، حدثنا أبو رَبيعة فَهْد بن عوف، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن ثابت، عن أنس: أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم آخَى بين أبي طَلْحة وبين أبي عُبيدة [1].صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه. ‌‌ذكرُ مناقب أحد الفُقهاء السِّتة من الصحابة معاذ بن جَبَل رضي الله عنه -




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবু তালহা এবং আবু উবাইদাহর মধ্যে ভ্রাতৃত্ব বন্ধন স্থাপন করেছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وأبو ربيعة فهد بن عوف - وإن كانوا قد تركوه كما قال الذهبي في "تلخيصه" - لم ينفرد به، فقد حمله عن حماد بن سلمة غير واحدٍ من الثقات. ثابت: هو ابن أسلم البُناني، وأبو قِلَابة: هو عبد الملك بن محمد الرّقَاشي.وأخرجه أحمد 20/ (12545)، ومسلم (2528) من طريق عبد الصمد بن عبد الوارث، عن حماد بن سلمة، به. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وسيأتي برقم (5606) من طريق محمد بن غالب عن فهد بن عوف. أخا سهل بن محمد بن الجد بن قيس بن صخرة لأمِّه. وكذلك جاء في سائر الروايات عن محمد بن إسحاق، وكذلك جاء في رواية رضوان بن أحمد الصيدلاني عن أحمد بن عبد الجبار عند ابن عساكر 58/ 395، فما جاء عند المصنف هنا غريبٌ.وزاد سائر أصحاب ابن إسحاق في نسب معاذ بن جبل أُدَيًّا قبل سعد، وهو قول ابن الكلبي وشَبَاب وموسى بن عُقبة فيما قاله ابن عساكر 58/ 393، فهو المعروف في نَسبِه. واختُلف في غَنْم، فذكر ابن هشام في "السيرة النبوية" 1/ 463 عن زياد البكائي عن ابن إسحاق بدلًا من غَنْم عَمْرًا. وربما ذكر عديًا بدله، والمعروف في هذا النسب عَمْرو، وأسقط سائرُ أصحاب ابن إسحاق اسمَ هذا الرجل من هذا النسب، والصحيح ذكرُه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5249)


5249 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق، في تَسمية من شهد العَقَبة: مُعاذ بن جَبَل بن عَمرو بن أَوس بن عائذ بن عَدي بن كعب بن غَنْم بن سعد بن عليّ بن أسَد بن سارِدةَ بن تَزِيد [1] بن جُشَم، وكان في بني سَلِمَة، شهدَ بدرًا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم والمَشاهِدَ كلَّها، ومات بعَمَوَاس عام الطاعُون بالشام في خِلافة عُمر بن الخطاب رضي الله عنه، وإنما ادَّعتُه بنو سَلِمة لأنه كان آخَى رجلًا منهم [2].




ইবনু ইসহাক থেকে বর্ণিত, আকাবায় উপস্থিত ব্যক্তিদের নাম উল্লেখ প্রসঙ্গে: মু'আয ইবনু জাবাল ইবনু আমর ইবনু আওস ইবনু আ'ইয ইবনু আদিয়্য ইবনু কা'ব ইবনু গানম ইবনু সা'দ ইবনু আলী ইবনু আসাদ ইবনু সারিদাহ ইবনু ইয়াযীদ ইবনু জুশাম। তিনি বানু সালিমাহ গোত্রের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বদরের যুদ্ধে এবং তাঁর সকল (গুরুত্বপূর্ণ) যুদ্ধসমূহে অংশগ্রহণ করেছেন। আর তিনি উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতকালে সিরিয়ার আমওয়াস নামক স্থানে প্লেগের বছরে মৃত্যুবরণ করেন। বানু সালিমাহ গোত্র তাঁকে নিজেদের অন্তর্ভুক্ত বলে দাবি করতো, কারণ তিনি তাদের মধ্য থেকে একজনের সাথে ভ্রাতৃত্ব স্থাপন করেছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] بالتاء المثناة، كما ضبطه الدارقطني في "المؤتلف والمختلف" 1/ 180 وغيره. أخا سهل بن محمد بن الجد بن قيس بن صخرة لأمِّه. وكذلك جاء في سائر الروايات عن محمد بن إسحاق، وكذلك جاء في رواية رضوان بن أحمد الصيدلاني عن أحمد بن عبد الجبار عند ابن عساكر 58/ 395، فما جاء عند المصنف هنا غريبٌ.وزاد سائر أصحاب ابن إسحاق في نسب معاذ بن جبل أُدَيًّا قبل سعد، وهو قول ابن الكلبي وشَبَاب وموسى بن عُقبة فيما قاله ابن عساكر 58/ 393، فهو المعروف في نَسبِه. واختُلف في غَنْم، فذكر ابن هشام في "السيرة النبوية" 1/ 463 عن زياد البكائي عن ابن إسحاق بدلًا من غَنْم عَمْرًا. وربما ذكر عديًا بدله، والمعروف في هذا النسب عَمْرو، وأسقط سائرُ أصحاب ابن إسحاق اسمَ هذا الرجل من هذا النسب، والصحيح ذكرُه.



[2] وهو في "السيرة النبوية" لابن هشام 1/ 463 - 464 غير أنه قال: ادَّعته بنو سلمة لأنه كان أخا سهل بن محمد بن الجد بن قيس بن صخرة لأمِّه. وكذلك جاء في سائر الروايات عن محمد بن إسحاق، وكذلك جاء في رواية رضوان بن أحمد الصيدلاني عن أحمد بن عبد الجبار عند ابن عساكر 58/ 395، فما جاء عند المصنف هنا غريبٌ.وزاد سائر أصحاب ابن إسحاق في نسب معاذ بن جبل أُدَيًّا قبل سعد، وهو قول ابن الكلبي وشَبَاب وموسى بن عُقبة فيما قاله ابن عساكر 58/ 393، فهو المعروف في نَسبِه. واختُلف في غَنْم، فذكر ابن هشام في "السيرة النبوية" 1/ 463 عن زياد البكائي عن ابن إسحاق بدلًا من غَنْم عَمْرًا. وربما ذكر عديًا بدله، والمعروف في هذا النسب عَمْرو، وأسقط سائرُ أصحاب ابن إسحاق اسمَ هذا الرجل من هذا النسب، والصحيح ذكرُه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5250)


5250 - سمعت أبا العباس، سمعت العباس، سمعت يحيى بن مَعِين يقول: كُنْية معاذ بن جَبَل أبو عبد الرحمن [1].




ইয়াহইয়া ইবনে মাঈন থেকে বর্ণিত, মুয়ায ইবনে জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কুনিয়াত (উপনাম) হলো আবূ আবদুর রহমান।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "التاريخ" لابن معين برواية العباس - وهو ابن محمد الدُّوْري - برقم (112). على أن يحيى بن سعيد الأنصاري قد وافق مالكًا على سنّ معاذ يوم مات كما سيأتي برقم (5255)، وكأنَّ مالكًا أخذه عن يحيى.وقوله: برَتْوة، معناها: الخُطوة، أو برَمْية.وأصل مقالة مالك بن أنس هذه ما رواه عمر بن شبة في "تاريخ المدينة" 3/ 886 وغيرُه كما تقدم تخريجه عند الحديث (5246) من طريق أبي العَجْفاء عن عمر بن الخطاب، قال: … ولو أدركت معاذ بن جبل ثم ولّيتُه، ثم قدمتُ على ربِّي فقال لي: من ولَّيتَ على أمة محمد؟ قلتُ: إني سمعت عبدك وخليلك صلى الله عليه وسلم يقول: "يأتي بين يدي العلماء يوم القيامة برَتْوة". وإسناده صحيح، ورُوي نحوه من عدة طرق مرسلة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5251)


5251 - أخبرني عبد الله بن جعفر [1] الفارسي، حدثنا يعقوب بن سفيان، حدثنا ابن بُكَير، سمعتُ مالك بن أنس يقول: إنَّ مُعاذ بن جَبَل هَلَك وهو ابن ثمانٍ وعشرين سنةً، وهو أمامَ العُلماء برَتْوةٍ [2].




মালিক ইবনে আনাস থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয়ই মুআয ইবনে জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আটাশ বছর বয়সে ইন্তেকাল করেন, অথচ তিনি আলেমদের (জ্ঞানীদের) চেয়ে এক ধাপ অগ্রগামী ছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وقع في نسخنا الخطية: عبد الله بن يعقوب الفارسي، وهو خطأ صوّبناه من سائر روايات المصنف عن هذا الشيخ، وهو عبد الله بن جعفر بن درستويه الفارسي، راويةُ كتاب "المعرفة والتاريخ" ليعقوب بن سفيان. على أن يحيى بن سعيد الأنصاري قد وافق مالكًا على سنّ معاذ يوم مات كما سيأتي برقم (5255)، وكأنَّ مالكًا أخذه عن يحيى.وقوله: برَتْوة، معناها: الخُطوة، أو برَمْية.وأصل مقالة مالك بن أنس هذه ما رواه عمر بن شبة في "تاريخ المدينة" 3/ 886 وغيرُه كما تقدم تخريجه عند الحديث (5246) من طريق أبي العَجْفاء عن عمر بن الخطاب، قال: … ولو أدركت معاذ بن جبل ثم ولّيتُه، ثم قدمتُ على ربِّي فقال لي: من ولَّيتَ على أمة محمد؟ قلتُ: إني سمعت عبدك وخليلك صلى الله عليه وسلم يقول: "يأتي بين يدي العلماء يوم القيامة برَتْوة". وإسناده صحيح، ورُوي نحوه من عدة طرق مرسلة.



[2] وهو كذلك عند ابن عساكر 58/ 457 - 458 من طريق أبي الحسين محمد بن الحسين بن الفضل القطان، عن عبد الله بن جعفر الفارسي، به.وسيأتي برقم (5256) من طريق يعقوب بن إبراهيم عن يحيى بن بكير.وأخرجه كذلك الطبراني في "الكبير" 20/ (40) عن أبي الزنباع روح بن الفرج، عن يحيى بن بُكَير، به. غير أنه قال في آخره: وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "معاذ بن جبل أمام العلماء برتوة يوم القيامة".قال الذهبي في "تلخيص المستدرك" متعقبًا رواية المصنف: هذا غلطٌ فإنه شهد بدرًا وعاش بعدها ستة عشر سنة، والصواب ما قال موسى بن عقبة: معاذ بن جبل بن عمرو أحد بني سلمة بن الخزرج، مات في طاعون عمواس وهو ابن ثمان وثلاثين سنة. قلنا: سيأتي قول موسى برقم (5253). على أن يحيى بن سعيد الأنصاري قد وافق مالكًا على سنّ معاذ يوم مات كما سيأتي برقم (5255)، وكأنَّ مالكًا أخذه عن يحيى.وقوله: برَتْوة، معناها: الخُطوة، أو برَمْية.وأصل مقالة مالك بن أنس هذه ما رواه عمر بن شبة في "تاريخ المدينة" 3/ 886 وغيرُه كما تقدم تخريجه عند الحديث (5246) من طريق أبي العَجْفاء عن عمر بن الخطاب، قال: … ولو أدركت معاذ بن جبل ثم ولّيتُه، ثم قدمتُ على ربِّي فقال لي: من ولَّيتَ على أمة محمد؟ قلتُ: إني سمعت عبدك وخليلك صلى الله عليه وسلم يقول: "يأتي بين يدي العلماء يوم القيامة برَتْوة". وإسناده صحيح، ورُوي نحوه من عدة طرق مرسلة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5252)


5252 - أخبرنا أبو جعفر البغدادي، حدثنا أبو عُلَاثة، حدثنا أبي، حدثنا ابن لَهيعة، عن أبي الأسود، عن عُروة، قال: معاذُ بن جَبَل بن عَمرو بن عائذ بن عَدِي بن كعب بن غَنْم بن أُدَيّ بن سعد بن عليّ [1] بن أسَد بن سارِدةَ بن تَزِيد بن جُشَم، شهد بدرًا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم [2].




উরুয়া বলেন: মু'আয ইবনু জাবাল ইবনু আমর ইবনু আ'ইয ইবনু আদী ইবনু কা'ব ইবনু গানম ইবনু উদাঈ ইবনু সা'দ ইবনু আলী ইবনু আসাদ ইবনু সারিদাহ ইবনু তাযীদ ইবনু জুশাম রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: عدي، بالدال، والصواب ما أثبتناه وفاقًا لما قاله أهل النسب والسيرة. سَلِمة من صُلبه، إنما هو من ولد أُدَيّ أخي سَلِمة، ثم ادّعته بنو سَلِمة كما تقدِّم في قول ابن إسحاق برقم (5249). وإنما أخذه موسى بن عقبة من الزهري كما في "معجم الصحابة" للبغوي 5/ 265 حيث ذكر نسب معاذ بن جبل، فقال: من بني سَوَاد بن غَنْم بن كعب بن سَلِمة، وهو خلاف قول غيره من أهل النسب وأرباب المغازي والسير.وممّن وافق موسى بن عقبة على قوله هنا في سن معاذ بن جبل وسنة وفاته والموضع الذي توفي فيه محمدُ بنُ عمر الواقدي حيث أسند ذلك بسندين له كما في "طبقات ابن سعد" 3/ 545. وهو قول خليفة بن خياط وابن أبي خيثمة وغيرهما كما في "تاريخ دمشق" 58/ 386 - 392.



[2] وأخرجه الطبراني في "الكبير" 20/ (35) - وعنه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5941) - عن أبي عُلَاثة محمد بن عمرو بن خالد الحرّاني، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 58/ 395 من طريق يعقوب بن سفيان، عن عمرو بن خالد الحرَّاني وحسان بن عبد الله وعثمان بن صالح، عن ابن لَهِيعة - وهو عبد الله - به.أبو الأسود: هو محمد بن عبد الرحمن بن نوفل المعروف بيتيم عروة، سمّي بذلك لأنَّ أباه أوصى به إلى عروة بن الزبير، فسمي لذلك يتيم عُروة. سَلِمة من صُلبه، إنما هو من ولد أُدَيّ أخي سَلِمة، ثم ادّعته بنو سَلِمة كما تقدِّم في قول ابن إسحاق برقم (5249). وإنما أخذه موسى بن عقبة من الزهري كما في "معجم الصحابة" للبغوي 5/ 265 حيث ذكر نسب معاذ بن جبل، فقال: من بني سَوَاد بن غَنْم بن كعب بن سَلِمة، وهو خلاف قول غيره من أهل النسب وأرباب المغازي والسير.وممّن وافق موسى بن عقبة على قوله هنا في سن معاذ بن جبل وسنة وفاته والموضع الذي توفي فيه محمدُ بنُ عمر الواقدي حيث أسند ذلك بسندين له كما في "طبقات ابن سعد" 3/ 545. وهو قول خليفة بن خياط وابن أبي خيثمة وغيرهما كما في "تاريخ دمشق" 58/ 386 - 392.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5253)


5253 - أخبرني إسماعيل بن محمد بن الفضل، حدثنا جَدّي، حدثنا إبراهيم الحِزامي، حدثني محمد بن فُليح، عن موسى بن عُقبة، قال: معاذُ بن جَبَل بن عمرو أحد بني سَلِمَة بن الخَزْرج، يُكنى أبا عبد الرحمن، مات سنة ثمانَ عشرةَ في طاعُون عَمَواسٍ، وهو ابن ثَمانٍ وثلاثين سنة [1].




মূসা ইবনু উকবা থেকে বর্ণিত, মু'আয ইবনু জাবাল ইবনু 'আমর ছিলেন বানূ সালামাহ গোত্রের অন্তর্ভুক্ত, যা খাযরাজ গোত্রের একটি শাখা। তাঁর কুনিয়াত (উপনাম) ছিল আবূ 'আবদুর রহমান। আঠারো হিজরী সনে 'আমওয়াসের মহামারি চলাকালীন তিনি ইনতিকাল করেন। সে সময় তাঁর বয়স ছিল আটত্রিশ বছর।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] هذا هو الصحيح في وفاة معاذ بن جبل كما قال الذهبي في "تلخيصه" عند الأثر المتقدم برقم (5251)، غير أن إطلاق القول بأنه من بني سَلِمة بن الخزرج خطأ، لأنه ليس من ولد سَلِمة من صُلبه، إنما هو من ولد أُدَيّ أخي سَلِمة، ثم ادّعته بنو سَلِمة كما تقدِّم في قول ابن إسحاق برقم (5249). وإنما أخذه موسى بن عقبة من الزهري كما في "معجم الصحابة" للبغوي 5/ 265 حيث ذكر نسب معاذ بن جبل، فقال: من بني سَوَاد بن غَنْم بن كعب بن سَلِمة، وهو خلاف قول غيره من أهل النسب وأرباب المغازي والسير.وممّن وافق موسى بن عقبة على قوله هنا في سن معاذ بن جبل وسنة وفاته والموضع الذي توفي فيه محمدُ بنُ عمر الواقدي حيث أسند ذلك بسندين له كما في "طبقات ابن سعد" 3/ 545. وهو قول خليفة بن خياط وابن أبي خيثمة وغيرهما كما في "تاريخ دمشق" 58/ 386 - 392.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5254)


5254 - فحدّثنا محمد بن الحسن، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا حجّاج بن مِنْهال، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن علي بن زيد، عن سعيد بن المُسيّب، قال: رُفع عيسى ابن مريم وهو ابن ثلاثٍ وثلاثين سنة، ومات معاذُ بن جَبَل وهو ابن ثلاثٍ وثلاثين سنة [1].




সাঈদ ইবনুল মুসাইয়্যাব থেকে বর্ণিত, ঈসা ইবনে মারইয়ামকে উঠিয়ে নেওয়া হয়েছিল (আকাশে), যখন তাঁর বয়স ছিল তেত্রিশ বছর, এবং মু'আয ইবনে জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মৃত্যুবরণ করেন যখন তাঁর বয়স ছিল তেত্রিশ বছর।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف علي بن زيد: وهو ابن جُدعان.وأخرجه ابن سعد 3/ 546 و 9/ 393، وأحمد في "العلل" برواية ابنه عبد الله (1100)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1826)، ومحمد بن خلف وكيعٌ في "أخبار القضاة" 1/ 100، وأبو بكر الدِّينوري في "المجالسة" (2833)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5945)، وابن عساكر 47/ 484 و 58/ 458 من طرق عن حماد بن سلمة، به.وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" 5/ 278، والطبراني 20/ (42)، وأبو نعيم في "المعرفة" (5944)، وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 652، وابن عساكر 58/ 458 و 458 - 459 من طريق هُشَيم بن بشير، عن علي بن زيد، به. غير أنه قال: ابن ثلاث أو أربع وثلاثين سنة. "معرفة الصحابة" (5946)، وابن عساكر 58/ 457 من طرق عن سعيد بن أبي مريم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني 20/ (39)، ومن طريقه ابن عساكر 58/ 457 من طريق عبد الله بن لَهِيعة، عن عُمارة بن غَزيّة، به.وأخرجه البخاري في "التاريخ الأوسط" 1/ 405، ومن طريقه ابن عساكر 58/ 388 و 457 منطريق سليمان بن بلال، عن يحيى بن سعيد الأنصاري.وسيأتي عن يحيى بن سعيد الأنصاري لاحقًا قولٌ آخر في سن معاذ يوم قُبض، وما هنا عنه أصحُّ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5255)


5255 - وأخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب، حدثنا السَّرِيّ بن خُزَيمة، حدثنا سعيد بن أبي مريم، أخبرنا يحيى بن أيوب، عن عُمارة بن غَزِيّة، أنه أخبره عن يحيى بن سعيد الأنصاري، قال: تُوفي معاذُ بن جَبَل وهو ابن ثَمانٍ وعشرين سنة، والذي يَرفَعُ [1] في سِنِّه أنه ابن ثِنتَين وثلاثين [2].




ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ আল-আনসারী থেকে বর্ণিত, মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আটাশ বছর বয়সে ইন্তেকাল করেন। আর যিনি তাঁর বয়স বাড়িয়ে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেছেন যে তাঁর বয়স ছিল বত্রিশ বছর।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] أي: الذي يزيد في سنِّه يقول: مات ابن ثنتين وثلاثين. "معرفة الصحابة" (5946)، وابن عساكر 58/ 457 من طرق عن سعيد بن أبي مريم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني 20/ (39)، ومن طريقه ابن عساكر 58/ 457 من طريق عبد الله بن لَهِيعة، عن عُمارة بن غَزيّة، به.وأخرجه البخاري في "التاريخ الأوسط" 1/ 405، ومن طريقه ابن عساكر 58/ 388 و 457 منطريق سليمان بن بلال، عن يحيى بن سعيد الأنصاري.وسيأتي عن يحيى بن سعيد الأنصاري لاحقًا قولٌ آخر في سن معاذ يوم قُبض، وما هنا عنه أصحُّ.



[2] وأخرجه ابن حبان في "الثقات" 3/ 369، والطبراني في "الكبير" 20/ (38)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5946)، وابن عساكر 58/ 457 من طرق عن سعيد بن أبي مريم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني 20/ (39)، ومن طريقه ابن عساكر 58/ 457 من طريق عبد الله بن لَهِيعة، عن عُمارة بن غَزيّة، به.وأخرجه البخاري في "التاريخ الأوسط" 1/ 405، ومن طريقه ابن عساكر 58/ 388 و 457 منطريق سليمان بن بلال، عن يحيى بن سعيد الأنصاري.وسيأتي عن يحيى بن سعيد الأنصاري لاحقًا قولٌ آخر في سن معاذ يوم قُبض، وما هنا عنه أصحُّ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5256)


5256 - أخبرني أبو الحسين بن يعقوب الحافظ، حدثنا محمد بن إسحاق، حدثنا يعقوب بن إبراهيم، حدثني يحيى بن بُكَير، سمعتُ مالك بن أنس يقول: إنَّ معاذَ بنَ جبل هَلَك وهو ابن ثمانٍ وعشرين، وهو أمام العُلماءِ رَتْوةً [1].




মালিক ইবনু আনাস থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয়ই মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মৃত্যুবরণ করেন যখন তাঁর বয়স ছিল আটাশ বছর, আর তিনি ছিলেন (অন্যান্য) আলিমদের তুলনায় এক ধাপ এগিয়ে থাকা নেতা।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تقدم برقم (5251) من طريق أخرى عن ابن بُكَير. وقوله: برّاق الثنايا، وصف ثناياه بالحسن والصفاء، وأنها تلمع إذا تبسّم كالبرق، وأراد صفة وجهه بالبشر والطلاقة.وقوله: أسندوه إليه، معناه: رفعُوه إليه وأوكلوه به ثقةً منهم به.وصدَرُوا عن رأيه: فعلوا ما يأمرهم به ونفَّذوا ما يُشير به عليهم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5257)


5257 - أخبرني محمد بن المُؤمَّل، حدثنا الفضل بن محمد، حدثنا أحمد بن حنبل، حدثنا إبراهيم، عن يحيى بن سعيد، قال: قُبض معاذُ بن جبل وهو ابن ثلاث أو أربع وثلاثين سنة [1].هذا القولُ من يحيى بن سعيد أقربُ إلى الصحة من الذي تَقدَّم!




ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মুআয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন ইন্তেকাল করেন, তখন তাঁর বয়স ছিল তেত্রিশ অথবা চৌত্রিশ বছর। ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদের এই বক্তব্যটি পূর্ববর্তী বক্তব্যের তুলনায় বিশুদ্ধতার অধিক নিকটবর্তী!




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تقدَّم عن يحيى بن سعيد الأنصاري قريبًا: أن معاذًا يومَ توفي كان ابن ثمان وعشرين، وهو الصحيح المشهور عنه. أما إبراهيم الراوي عن يحيى هنا فلم نتبيّنه. وقوله: برّاق الثنايا، وصف ثناياه بالحسن والصفاء، وأنها تلمع إذا تبسّم كالبرق، وأراد صفة وجهه بالبشر والطلاقة.وقوله: أسندوه إليه، معناه: رفعُوه إليه وأوكلوه به ثقةً منهم به.وصدَرُوا عن رأيه: فعلوا ما يأمرهم به ونفَّذوا ما يُشير به عليهم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5258)


5258 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، أخبرني مالك بن أنس، عن أبي حازم بن دينار، عن أبي إدريس الخَوْلاني، قال: دخلتُ مسجدَ دمشقَ، فإذا أنا برجُل بَرّاقِ الثَّنايا، طويلِ الصَّمت، وإذا الناسُ معه إذا اختلفُوا في شيءٍ أسنَدُوه إليه، وصَدَرُوا عن رأيِه، فسألتُ عنه، فقيل: معاذُ بنُ جَبَل [1].




আবু ইদরীস আল-খাওলানী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি দামেস্কের মসজিদে প্রবেশ করলাম। তখন আমি একজন ব্যক্তিকে দেখতে পেলাম, যার সামনের দাঁতগুলো উজ্জ্বল (সাদা) এবং যিনি দীর্ঘ সময় নীরব থাকেন। আর লোকেরা যখন তাঁর সাথে কোনো বিষয়ে মতবিরোধ করত, তারা সেটি তাঁর কাছে সোপর্দ করত এবং তাঁর মতামতের ভিত্তিতে সিদ্ধান্ত নিত। আমি তাঁর সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তখন বলা হলো: ইনি মুআয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكن اختُلف في سماع أبي إدريس الخولاني - وهو عائد الله بن عبد الله - من معاذ بن جبل كما سيأتي بيانه عند الرواية (7502) حيث روى المصنف الحديث هناك تامًّا وأورد طُرقه. وقوله: برّاق الثنايا، وصف ثناياه بالحسن والصفاء، وأنها تلمع إذا تبسّم كالبرق، وأراد صفة وجهه بالبشر والطلاقة.وقوله: أسندوه إليه، معناه: رفعُوه إليه وأوكلوه به ثقةً منهم به.وصدَرُوا عن رأيه: فعلوا ما يأمرهم به ونفَّذوا ما يُشير به عليهم.