হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5259)


5259 - أخبرنا أبو إسحاق إبراهيم بن محمد بن يحيى، حدثنا الثَّقَفي، حدثنا علي بن سعيد بغدادي [1]، حدثنا ضَمْرة، عن يعقوب بن عطاء، عن أبيه، قال: قبرُ معاذ بن جَبَل بقَصْر خالد [2].




আতা থেকে বর্ণিত, মুআয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কবর কাসর খালিদে অবস্থিত।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ص): بعردي، وهو تحريف.



[2] وأخرجه ابن سعد 7/ 389، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 11/ 462 عن علي بن المتوكّل، وابن عساكر 25/ 491 من طريق محمد بن أبي أسامة، كلاهما عن ضَمْرة بن ربيعة، عن عثمان بن عطاء، عن أبيه، وقالا: قُصير خالد، مصغرًا، بدل قصر خالد، وهو المعروف في اسم البُقعة أنه بالتصغير كما سيأتي، وقد سمّيا شيخ ضمرة عثمان بن عطاء بدل يعقوب بن عطاء، وهذا هو الصحيح، فإنَّ المعروف أن ضمرة بن ربيعة يروي عن عثمان بن عطاء بن أبي مسلم الخُراساني، ولا يروي عن يعقوب بن عطاء بن أبي رباح، وضمرة وعثمان بن عطاء نزلا فلسطين.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1825)، وأبو زرعة الدمشقي في "تاريخه" ص 218 - 219 - ومن طريقه ابن عساكر 58/ 457 - من طريق عبد الرحمن بن إبراهيم الملقب بدُحَيم، عن ضمرة بن ربيعة من قوله لم يجاوزه، قال: توفي معاذ بن جبل بقُصير خالد من أرض الأردن.وقُصير خالد هذا سُمِّي هنا في رواية عطاء بن أبي مسلم الخراساني هكذا قصير خالد، وسمّاه ياقوت الحموي في "معجم البلدان" وغيرُه: قُصير مُعين الدين، وبعضهم يقول: القُصير المُعيني، منسوبًا، وكأنه تغيّر اسمُه بعد ذلك من قصير خالد إلى قصير معين الدين، والله أعلم. ويؤيده قول أبي الفداء الملك المؤيد صاحب حماة في كتابه "المختصر في أخبار البشر" 3/ 22، حيث قال في أحداث سنة أربع وأربعين وخمس مئة: وفيها توفي مُعين الدين أُنُر صاحب دمشق، وإليه ينسب قصير مُعين الدين الذي في الغور. قلنا: يعني غورَ الأردن، وهذه المنطقة المذكورة تسمى الآن بالشُّونة الشَّمالية.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5260)


5260 - حدثني علي بن حَمْشَاذَ، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن الزُّهْري، عن ابن كعب بن مالك، قال: كان معاذُ بن جَبَل شابًا جميلًا سَمْحًا من خير شَبابِ قَومِه، لا يُسأل شيئًا إلَّا أعطاهُ، حتى ادَّانَ دَينًا أغلَقَ مالَه [1].




মু'আয ইবনে জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ছিলেন তাঁর গোত্রের শ্রেষ্ঠ যুবকদের মধ্যে একজন সুদর্শন, উদার যুবক। তাঁকে কোনো কিছু চাওয়া হলে তিনি তা না দিয়ে পারতেন না, এমনকি তিনি এমনভাবে ঋণী হয়ে পড়লেন যে সেই ঋণ তাঁর সমুদয় সম্পদ গ্রাস করে ফেলল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد فيه مقال كما تقدَّم بيانه برقم (2379).وأخرجه الطبراني في "الكبير" 20/ (44)، وعنه أبو نُعيم في "الحلية" 1/ 23 عن عبد الله بن أحمد بن حنبل، بهذا الإسناد. ويُحمل ما جاء في حديث ابن كعب بن مالك المتقدم مختصرًا برقم (2379) و (5260) حيث جاء في بعض طرقه: أنه صلى الله عليه وسلم أرسل معاذ بن جبل إلى اليمن بعد أن حَجَر على ماله بعد فتح مكة، وأنه لم يَزَل بها حتى تُوفي، ومثلُه ما جاء في بعض روايات حديث جابر بن عبد الله الآتي برقم (5276) أنَّ ذلك كان بعد فتح مكة بمدةٍ حتى انتهى صلى الله عليه وسلم من حُنين، فيحمل على أنَّ إرساله لمعاذ كان بعد الفتح وبعد حنين، بل جاء في روايةٍ لابن كعب بن مالك: أنَّ بعثة معاذ لليمن كانت بعد حجة الوداع، فهذا يؤيد صحة الجمع، وأنه لا تعارض، والله تعالى أعلم. وانظر "دلائل النبوة" للبيهقي 5/ 406 - 408.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5261)


5261 - أخبرني أحمد بن محمد العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا عبد الله بن صالح، حدثني الليث، عن الحارث بن يعقوب، عن قيس بن رافع، عن عبد الرحمن بن جُبير بن نُفير، عن عبد الله بن عمرو: أنه مرَّ بمعاذ بن جَبَل وهو قائم على بابِه يُشير بيدِه، كأنه يُحدَّث نفسَه، فقال له عبد الله: ما شأنُك يا أبا عبد الرحمن، كأنك تُحدِّث نفسَك؟ [1]




আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যখন মু'আয তাঁর দরজার সামনে দাঁড়িয়ে হাত দিয়ে ইশারা করছিলেন, যেন তিনি নিজের সাথে কথা বলছেন। তখন আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: "হে আবু আবদুর রহমান! আপনার কী হলো? মনে হচ্ছে আপনি নিজের সাথে কথা বলছেন?"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل قيس بن رافع. وقد تقدَّم عند المصنف برقم (861) و (2481). ويُحمل ما جاء في حديث ابن كعب بن مالك المتقدم مختصرًا برقم (2379) و (5260) حيث جاء في بعض طرقه: أنه صلى الله عليه وسلم أرسل معاذ بن جبل إلى اليمن بعد أن حَجَر على ماله بعد فتح مكة، وأنه لم يَزَل بها حتى تُوفي، ومثلُه ما جاء في بعض روايات حديث جابر بن عبد الله الآتي برقم (5276) أنَّ ذلك كان بعد فتح مكة بمدةٍ حتى انتهى صلى الله عليه وسلم من حُنين، فيحمل على أنَّ إرساله لمعاذ كان بعد الفتح وبعد حنين، بل جاء في روايةٍ لابن كعب بن مالك: أنَّ بعثة معاذ لليمن كانت بعد حجة الوداع، فهذا يؤيد صحة الجمع، وأنه لا تعارض، والله تعالى أعلم. وانظر "دلائل النبوة" للبيهقي 5/ 406 - 408.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5262)


5262 - أخبرنا أبو جعفر البغدادي، حدثنا أبو عُلَاثة، حدثنا أبي، حدثنا ابن لَهِيعة، عن أبي الأسود، عن عُرْوة، قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يستخلفُ معاذَ بن جبل على أهل مكة حين خرج إلى حُنين، وأمَره رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن يَعلِّم الناسَ القرآنَ، وأن يُفَقَّهوا في الدِّين، ثم صَدَرَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عامَه إلى المدينة، وخَلَّف معاذَ بنَ جَبَل على أهل مَكّة [1].




উরওয়া থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন হুনাইন যুদ্ধের উদ্দেশ্যে বের হন, তখন তিনি মু’আয ইবনু জাবালকে মক্কাবাসীর উপর দায়িত্বশীল নিযুক্ত করেন। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে আদেশ দেন যে, তিনি যেন লোকজনকে কুরআন শিক্ষা দেন এবং তাদেরকে দ্বীন সম্পর্কে গভীর জ্ঞান দান করেন। অতঃপর সেই বছর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদীনার উদ্দেশ্যে রওনা হন এবং মু’আয ইবনু জাবালকে মক্কাবাসীর উপর রেখে যান।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم كما تقدَّم بيانه برقم (4378)، لكنه مُرسَل، غير أنه وإن كان كذلك رُوي من غير وجهٍ مرسل، فالخبر صحيح إن شاء الله.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 5/ 201 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.ويشهد له مُرسَلُ موسى بن عُقبة عند البيهقي في "الدلائل" 5/ 201. ورجاله ثقات.ومرسل محمد بن إسحاق كما في "السيرة النبوية" لابن هشام 2/ 500. ورجاله لا بأس بهم.ورُوي أيضًا من مرسل مجاهد عند ابن سعد 2/ 300، وإسناده إليه ضعيف، غير أنه يصلح للاعتبار. ويُحمل ما جاء في حديث ابن كعب بن مالك المتقدم مختصرًا برقم (2379) و (5260) حيث جاء في بعض طرقه: أنه صلى الله عليه وسلم أرسل معاذ بن جبل إلى اليمن بعد أن حَجَر على ماله بعد فتح مكة، وأنه لم يَزَل بها حتى تُوفي، ومثلُه ما جاء في بعض روايات حديث جابر بن عبد الله الآتي برقم (5276) أنَّ ذلك كان بعد فتح مكة بمدةٍ حتى انتهى صلى الله عليه وسلم من حُنين، فيحمل على أنَّ إرساله لمعاذ كان بعد الفتح وبعد حنين، بل جاء في روايةٍ لابن كعب بن مالك: أنَّ بعثة معاذ لليمن كانت بعد حجة الوداع، فهذا يؤيد صحة الجمع، وأنه لا تعارض، والله تعالى أعلم. وانظر "دلائل النبوة" للبيهقي 5/ 406 - 408.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5263)


5263 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا علي بن عبد العزيز، حدثنا شاذُّ بن الفَيّاض، حدثنا أبو قَحْذَمٍ النَّضْر بن مَعبَد، عن أبي قِلَابة، عن ابن عمر، قال: مَرّ عمرُ بمعاذِ بن جَبَل وهو يَبكي، فقال: ما يُبكِيكَ؟ فقال: حديثٌ سمعتُه من رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنَّ أدنَى الرِّياء شِركٌ، وأحبَّ العَبيد إلى الله تبارك وتعالى الأتقياءُ الأخفِياءُ، الذين إذا غابُوا لم يُفتَقَدوا، وإذا شَهِدوا لم يُعرَفوا، أولئك أئمةُ الهُدى ومَصابيحُ العِلم" [1].صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মু‘আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যখন তিনি কাঁদছিলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন, কিসে তোমাকে কাঁদাচ্ছে? মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে আমি একটি হাদীস শুনেছি: "নিশ্চয়ই সামান্যতম লোক-দেখানো কাজও শির্ক। আর আল্লাহ্ তাবারাকা ওয়া তা‘আলার কাছে সর্বাধিক প্রিয় বান্দা হলো তারাই, যারা মুত্তাকী এবং লোকচক্ষুর অন্তরালে থাকে (অপরিচিত)। যারা অনুপস্থিত থাকলে কেউ তাদের খোঁজ করে না এবং উপস্থিত থাকলেও কেউ তাদের চেনে না। এরাই হলো হিদায়াতের ইমাম এবং জ্ঞানের প্রদীপ।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث حسن إن شاء الله، وهذا إسناد ضعيف بمرةٍ كما تقدَّم بيانه برقم (4).وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (4950)، وفي "الكبير" 20/ (53)، وابن عدي في "الكامل" 7/ 24، وأبو نُعيم في "حلية الأولياء" 1/ 15، وفي "معرفة الصحابة" (5959)، والقضاعي في "مسند الشهاب" (1298)، والبيهقي في "الزهد" (195) من طرق عن شادّ بن الفيّاض، بهذا الإسناد.وانظر ما سيأتي برقم (8131).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5264)


5264 - أخبرنا أبو نُعيم محمد بن عبد الرحمن بن نَصْر الغِفاري بمَرُو، حدثنا عَبْدان بن محمد بن عيسى الحافظ، حدثنا قُتيبة بن سعيد، حدثنا الليث، عن مُعاوية بن صالح، عن رَبيعة بن يزيد، عن أبي إدريس الخَوْلاني، عن يزيد بن عَمِيرة، قال: لما حَضَرَ معاذَ بنَ جَبَل الموتُ قيل له: أَوصِنا يا أبا عبد الرحمن، قال: أجلسوني، فإنَّ العلمَ والإيمانَ مكانَهما، مَن ابتَغاهُما وَجَدَهُما - يقول ذلك ثلاثَ مَرّات - فالتمِسُوا العلمَ عند أربعةٍ: عند عُويمِر أبي الدَّرْداء، وعند سلمان الفارسي، وعند عبد الله بن مسعود، وعند عبد الله بن سَلَام الذي كان يهوديًا فأسلم، فإني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إنه عاشرُ عَشَرةٍ في الجنة" [1].




ইয়াযীদ ইবনু উমায়রাহ থেকে বর্ণিত, যখন মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মৃত্যু উপস্থিত হলো, তখন তাঁকে বলা হলো: হে আবূ আবদুর রহমান! আপনি আমাদেরকে উপদেশ দিন। তিনি (মু'আয) বললেন: আমাকে বসাও। নিশ্চয়ই জ্ঞান ও ঈমান তাদের স্থানেই আছে। যে ব্যক্তি এ দু'টি অন্বেষণ করবে, সে তা খুঁজে পাবে।—তিনি এই কথা তিনবার বললেন। অতএব তোমরা চারজনের নিকট জ্ঞান অন্বেষণ করো: উয়াইমির আবূদ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে, সালমান আল-ফারসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে, আবদুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এবং আবদুল্লাহ ইবনু সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে, যিনি ছিলেন একজন ইয়াহুদী, অতঃপর ইসলাম গ্রহণ করেছেন। কারণ আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই তিনি (আবদুল্লাহ ইবনু সালাম) জান্নাতে দশজনের মধ্যে দশম ব্যক্তি হবেন।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. الليث: هو ابن سعد، وأبو إدريس الخَولاني: هو عائذ الله بن عبد الله.وأخرجه أحمد 36/ (22104)، والترمذي (3804)، والنسائي (8196) عن قتيبة بن سعيد، بهذا الإسناد.وقد تقدَّم عند المصنف برقم (338) من طريقين آخرين عن معاوية بن صالح.وسيأتي برقم (5867) من طريق يحيى بن عبد الله بن بُكَير عن الليث بن سعد. كما قال ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 58/ 441، لكن روى هذا الخبر خالد بن مِهران الحذّاء، عن أبي نَصْر حميد بن هلال، عن عبد الله بن الصامت الغِفاري، عن معاذ بن جبل، وعبد الله بن الصامت يبعد إدراكه لمعاذ بن جبل أيضًا، فيبقى الخبر على الإرسال، والله تعالى أعلم. أيوب: هو السَّختياني، وابن عُلَيَّة: هو إسماعيل بن إبراهيم بن مقسم الأسدي، أمُّه عُلَيَّة.وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" 5/ 270 عن إسماعيل بن إبراهيم - وهو ابن عُليَّة - به. وأخرجه ابن سعد 3/ 542، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 58/ 440 من طريق وهيب بن خالد، عن أيوب السختياني، به.وأخرجه ابن عساكر 58/ 440 من طريق ابن أبي عدي، عن خالد الحذاء، عن حميد بن هلال، به.وأخرجه عبد الرزاق (1700)، وابن سعد 3/ 542، والطبراني في "الكبير" 20/ (341)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (10663)، وابن عساكر 58/ 441 من طريق سفيان الثوري، عن خالد الحذاء، عن أبي نصر حميد بن هلال، عن عبد الله بن الصامت، عن معاذ بن جبل. وتحرَّفت كنية حميد بن هلال في رواية عبد الرزاق إلى: أبي نضرة، مع الاكتفاء بها وعدم ذكر اسم حميد، فأوهم ذلك أنه المنذر بن مالك بن قِطْعة العبدي، الذي يُكنى بأبي نضرة، وإنما الصحيح أبو نَصْر كما في سائر الروايات، بل سُمِّي في بعضها مع ذكر الكُنية، ثم إنَّ المحفوظ في هذا الخبر أنه لحميد بن هلال، لم يَروه غيره.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5265)


5265 - حدثنا الحُسين بن علي، حدثنا محمد بن المسيَّب، حدثنا يوسف بن سعيد المِصِّيصي، حدثني عُبيد بن تَميم، حدثنا الأوزاعي، عن عُبادة بن نُسَيّ، عن ابن غَنْم، سمعتُ أبا عُبيدة وعُبادة بن الصامت، ونحن عند أبي عُبيدة، يقولان: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "معاذُ بنُ جَبَل أعلمُ الأوّلِين والآخِرين بعد النَّبيِّين والمُرسَلين، وإِنَّ الله يُباهي به الملائكةَ" [1].




আবু উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও উবাদাহ ইবন সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা বলেন, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “নবী ও রাসূলগণ ছাড়া মু'আয ইবন জাবাল হলেন পূর্বাপর সকলের মধ্যে সর্বাধিক জ্ঞানী। আর নিশ্চয় আল্লাহ তাঁকে নিয়ে ফেরেশতাদের কাছে গর্ব করেন (বা প্রশংসা করেন)।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] قال الذهبي في "تلخيص المستدرك": أحسبه موضوعًا، ولا أعرف عُبيدًا هذا.وقد نقل هذا القول عن الذهبي جماعةٌ وأقرُّوه عليه، منهم برهانُ الدين الحلبي في "الكشف الحثيث عمَّن رُمي بوضع الحديث" (478)، والحافظُ ابن حجر في "لسان الميزان" 5/ 352.وقد رُوي مثلُه عن عمر بن الخطاب مرفوعًا أيضًا عند عمر بن شبة في "تاريخ المدينة" 3/ 879 - 881، وإسناده تالفٌ بمرةٍ، فلا يُفرح بمثله.والصحيح في ذلك ما سيأتي عند المصنف برقم (5894) عن أنس بن مالك، رفعه: "أعلمهم بالحلال والحرام معاذ". كما قال ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 58/ 441، لكن روى هذا الخبر خالد بن مِهران الحذّاء، عن أبي نَصْر حميد بن هلال، عن عبد الله بن الصامت الغِفاري، عن معاذ بن جبل، وعبد الله بن الصامت يبعد إدراكه لمعاذ بن جبل أيضًا، فيبقى الخبر على الإرسال، والله تعالى أعلم. أيوب: هو السَّختياني، وابن عُلَيَّة: هو إسماعيل بن إبراهيم بن مقسم الأسدي، أمُّه عُلَيَّة.وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" 5/ 270 عن إسماعيل بن إبراهيم - وهو ابن عُليَّة - به. وأخرجه ابن سعد 3/ 542، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 58/ 440 من طريق وهيب بن خالد، عن أيوب السختياني، به.وأخرجه ابن عساكر 58/ 440 من طريق ابن أبي عدي، عن خالد الحذاء، عن حميد بن هلال، به.وأخرجه عبد الرزاق (1700)، وابن سعد 3/ 542، والطبراني في "الكبير" 20/ (341)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (10663)، وابن عساكر 58/ 441 من طريق سفيان الثوري، عن خالد الحذاء، عن أبي نصر حميد بن هلال، عن عبد الله بن الصامت، عن معاذ بن جبل. وتحرَّفت كنية حميد بن هلال في رواية عبد الرزاق إلى: أبي نضرة، مع الاكتفاء بها وعدم ذكر اسم حميد، فأوهم ذلك أنه المنذر بن مالك بن قِطْعة العبدي، الذي يُكنى بأبي نضرة، وإنما الصحيح أبو نَصْر كما في سائر الروايات، بل سُمِّي في بعضها مع ذكر الكُنية، ثم إنَّ المحفوظ في هذا الخبر أنه لحميد بن هلال، لم يَروه غيره.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5266)


5266 - أخبرنا إبراهيم بن محمد بن يحيى، حدثنا المُؤمَّل بن الحَسن، حدثنا الحسن بن محمد الزَّعْفراني، حدثنا ابن عُلَيّة، عن أيوب، عن حُميد بن هلال: أنَّ معاذُ بن جَبَل تَفَلَ عن يمينه، ثم قال: ما فعلتُ هذا منذ أسلمتُ وصَحِبتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم [1].




মু'আয ইব্‌ন জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (ভুলবশত) তাঁর ডান দিকে থুতু ফেলার পর বললেন: আমি ইসলাম গ্রহণের পর এবং নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহচর্য লাভ করার পর থেকে আর কখনও এরূপ করিনি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات لكنه مرسلٌ، لأنَّ حُميد بن هلال - وهو أبو نصر العَدَوي - لم يدرك معاذ بن جبل كما قال ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 58/ 441، لكن روى هذا الخبر خالد بن مِهران الحذّاء، عن أبي نَصْر حميد بن هلال، عن عبد الله بن الصامت الغِفاري، عن معاذ بن جبل، وعبد الله بن الصامت يبعد إدراكه لمعاذ بن جبل أيضًا، فيبقى الخبر على الإرسال، والله تعالى أعلم. أيوب: هو السَّختياني، وابن عُلَيَّة: هو إسماعيل بن إبراهيم بن مقسم الأسدي، أمُّه عُلَيَّة.وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" 5/ 270 عن إسماعيل بن إبراهيم - وهو ابن عُليَّة - به. وأخرجه ابن سعد 3/ 542، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 58/ 440 من طريق وهيب بن خالد، عن أيوب السختياني، به.وأخرجه ابن عساكر 58/ 440 من طريق ابن أبي عدي، عن خالد الحذاء، عن حميد بن هلال، به.وأخرجه عبد الرزاق (1700)، وابن سعد 3/ 542، والطبراني في "الكبير" 20/ (341)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (10663)، وابن عساكر 58/ 441 من طريق سفيان الثوري، عن خالد الحذاء، عن أبي نصر حميد بن هلال، عن عبد الله بن الصامت، عن معاذ بن جبل. وتحرَّفت كنية حميد بن هلال في رواية عبد الرزاق إلى: أبي نضرة، مع الاكتفاء بها وعدم ذكر اسم حميد، فأوهم ذلك أنه المنذر بن مالك بن قِطْعة العبدي، الذي يُكنى بأبي نضرة، وإنما الصحيح أبو نَصْر كما في سائر الروايات، بل سُمِّي في بعضها مع ذكر الكُنية، ثم إنَّ المحفوظ في هذا الخبر أنه لحميد بن هلال، لم يَروه غيره.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5267)


5267 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْر بن نَصْر، أخبرنا ابن وهب، أخبرني عثمان بن عطاء، عن أبيه: أنَّ مُعاذَ بن جَبَل قامَ في الجيش الذي كان عليه حينَ وقع الوَباءُ، فقال: يا أيها الناس، هذه رحمةُ ربِّكم، ودعوةُ نَبيِّكم، ووفاةُ [1] الصالحين قبلكم، ثم قال معاذ وهو يَخطُب: اللهمَّ أدخِلْ على آل مُعَاذٍ نَصيبَهم الأوفَى من هذه الرَّحمة، فبَيْنا هو كذلك إذ أُتي، فقيل: طُعِن ابنُك عبدُ الرحمن، فلما أن رأى أباه معاذًا قال: يقول عبد الرحمن: يا أبَهْ {الْحَقُّ مِنْ رَبِّكَ فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الْمُمْتَرِينَ}، قال: يقول معاذٌ: {سَتَجِدُنِي إِن شَاءَ اللَّهُ مِنَ الصَّابِرِينَ}، فماتَ من الجُمعةِ إلى الجُمعةِ آلُ معاذٍ كلُّهم، ثم كان هو آخرَهم [2]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .




মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি যে সৈন্যদলের প্রধান ছিলেন, সেখানে যখন মহামারী (প্লেগ) দেখা দিল, তখন তিনি দাঁড়িয়ে বললেন: "হে লোক সকল! এটা তোমাদের রবের রহমত, তোমাদের নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু'আ এবং তোমাদের পূর্বের নেককারদের মৃত্যু।" এরপর মু'আয খুতবা দিতে দিতে বললেন: "হে আল্লাহ! মু'আযের পরিবারকে এই রহমত থেকে তাদের পূর্ণ অংশ প্রদান করুন।" তিনি যখন এই কথা বলছিলেন, তখন তাঁর কাছে এসে বলা হলো: "আপনার পুত্র আবদুর রহমান প্লেগে আক্রান্ত।" যখন আবদুর রহমান তাঁর পিতা মু'আযকে দেখলেন, তিনি বললেন: আবদুর রহমান (বলছেন): "হে আমার পিতা! এই সত্য আপনার রবের পক্ষ থেকে, সুতরাং আপনি সন্দেহকারীদের অন্তর্ভুক্ত হবেন না।" মু'আয বললেন: "ইনশাআল্লাহ, আপনি আমাকে ধৈর্যশীলদের অন্তর্ভুক্ত পাবেন।" এরপর সেই জুমু'আ থেকে পরবর্তী জুমু'আর মধ্যে মু'আযের পরিবারের সবাই মারা গেলেন, অতঃপর তিনি (মু'আয) তাদের মধ্যে সর্বশেষ ইন্তেকাল করেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (ب): وتحبب، وضبب فوقها في (ز)، والمثبت من (ص) و (م). الخُراساني، وأبوه عطاءٌ لم يدرك معاذ بن جبل، لكن رُوي هذا الخبر من وجوه عديدة.ابن وهب: وهو عبد الله بن وهب بن مسلم المصري.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (9612) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقرن بأبي عبد الله الحاكم أبا زكريا بن أبي إسحاق المُزكِّي.وأخرجه أحمد (36/ (22085) من طريق أبي المنيب الأحدب، عن معاذ بن جبل. وجوَّد إسناده المنذري في "الترغيب والترهيب" 2/ 221.وأخرجه أحمد 1/ (1697) وغيره من طريق شهر بن حوشب، عن رابه زوج أم شهر بن حوشب، وكان شهد طاعون عَمَواس، عن معاذ بن جبل. وإسناده فيه ضعف من أجل شهر.وأخرجه ابن أبي شيبة في "مصنفه" 11/ 15 - 16، وفي "الإيمان" (76)، وعبد بن حميد في "المنتخب من مسنده" (129 - طبعة مصطفى العدوي)، والبزار (2671)، والطبري في "تهذيب الآثار" في الجزء المفرد الذي فيه مسانيد بعض العشرة (123)، والطبراني في "الكبير" 20/ (230) و (231)، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 240، وابنُ عساكر في "تاريخ دمشق" 11/ 459 و 460 من طريق شهر بن حوشب، عن الحارث بن عَميرة، عن معاذ بن جبل. وزاد فيه البزار وأبو نعيم بين شهر والحارث رجلًا هو عبد الرحمن بن غَنْم، قال الدارقطني في "العلل" (994): وهو أشبه بالصواب.وأخرجه أحمد 36/ (22136) من طريق أبي قِلابة عبد الله بن يزيد الجَرْمي: أنَّ الطاعون وقع بالشام … فقال معاذ … هكذا رواه أبو قِلابة مرسلًا، ورجاله ثقات، لكنه لم يذكر قصة عبد الرحمن بن معاذ بن جبل.وأخرجه عبد الرزاق (20164) من طريق معمر، عن قتادة، قال: وقع طاعون بالشام … فقال معاذ بن جبل … كذلك رواه مرسلًا، ورجاله ثقات، لكنه لم يذكر في روايته وصف الطاعون بأنه رحمة ربكم ودعوة نبيكم ووفاة الصالحين قبلكم.وأخرجه عبد الرزاق مختصرًا بهذا الحرف برقم (20167) من طريق معمر، قال: وبلغني أنَّ معاذ بن جبل قال حين وقع الطاعون بالشام .. فذكر هذا الحرف في وصف الطاعون دون دعاء معاذ ودون قصة عبد الرحمن بن معاذ وهذا معضل.وأخرجه أحمد في "الزهد" (1021) من طريق طارق بن عبد الرحمن البجلي، قال: وقع الطاعون بالشام .. فقام معاذ خطيبًا. فذكر الحرف المشار إليه في وصف الطاعون مقتصرًا عليه دون دعاء معاذ ودون قصة ولده عبد الرحمن لما طعن. وهو مرسل صحيح الإسناد.وأخرجه بتمامه البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 385، ومن طريقه ابن عساكر 22/ 476 من طريق سليمان بن موسى الأشدق يذكر أنَّ الطاعون وقع بالناس يوم جسر عموسة … فذكره. ورجاله لا بأس بهم، لكنه مرسلٌ.وانظر ما سيأتي برقم (5288).



[2] خبر حسن، وهذا إسناد ضعيف جدًّا من أجل عثمان بن عطاء: وهو ابن أبي مسلم الخُراساني، وأبوه عطاءٌ لم يدرك معاذ بن جبل، لكن رُوي هذا الخبر من وجوه عديدة.ابن وهب: وهو عبد الله بن وهب بن مسلم المصري.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (9612) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقرن بأبي عبد الله الحاكم أبا زكريا بن أبي إسحاق المُزكِّي.وأخرجه أحمد (36/ (22085) من طريق أبي المنيب الأحدب، عن معاذ بن جبل. وجوَّد إسناده المنذري في "الترغيب والترهيب" 2/ 221.وأخرجه أحمد 1/ (1697) وغيره من طريق شهر بن حوشب، عن رابه زوج أم شهر بن حوشب، وكان شهد طاعون عَمَواس، عن معاذ بن جبل. وإسناده فيه ضعف من أجل شهر.وأخرجه ابن أبي شيبة في "مصنفه" 11/ 15 - 16، وفي "الإيمان" (76)، وعبد بن حميد في "المنتخب من مسنده" (129 - طبعة مصطفى العدوي)، والبزار (2671)، والطبري في "تهذيب الآثار" في الجزء المفرد الذي فيه مسانيد بعض العشرة (123)، والطبراني في "الكبير" 20/ (230) و (231)، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 240، وابنُ عساكر في "تاريخ دمشق" 11/ 459 و 460 من طريق شهر بن حوشب، عن الحارث بن عَميرة، عن معاذ بن جبل. وزاد فيه البزار وأبو نعيم بين شهر والحارث رجلًا هو عبد الرحمن بن غَنْم، قال الدارقطني في "العلل" (994): وهو أشبه بالصواب.وأخرجه أحمد 36/ (22136) من طريق أبي قِلابة عبد الله بن يزيد الجَرْمي: أنَّ الطاعون وقع بالشام … فقال معاذ … هكذا رواه أبو قِلابة مرسلًا، ورجاله ثقات، لكنه لم يذكر قصة عبد الرحمن بن معاذ بن جبل.وأخرجه عبد الرزاق (20164) من طريق معمر، عن قتادة، قال: وقع طاعون بالشام … فقال معاذ بن جبل … كذلك رواه مرسلًا، ورجاله ثقات، لكنه لم يذكر في روايته وصف الطاعون بأنه رحمة ربكم ودعوة نبيكم ووفاة الصالحين قبلكم.وأخرجه عبد الرزاق مختصرًا بهذا الحرف برقم (20167) من طريق معمر، قال: وبلغني أنَّ معاذ بن جبل قال حين وقع الطاعون بالشام .. فذكر هذا الحرف في وصف الطاعون دون دعاء معاذ ودون قصة عبد الرحمن بن معاذ وهذا معضل.وأخرجه أحمد في "الزهد" (1021) من طريق طارق بن عبد الرحمن البجلي، قال: وقع الطاعون بالشام .. فقام معاذ خطيبًا. فذكر الحرف المشار إليه في وصف الطاعون مقتصرًا عليه دون دعاء معاذ ودون قصة ولده عبد الرحمن لما طعن. وهو مرسل صحيح الإسناد.وأخرجه بتمامه البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 385، ومن طريقه ابن عساكر 22/ 476 من طريق سليمان بن موسى الأشدق يذكر أنَّ الطاعون وقع بالناس يوم جسر عموسة … فذكره. ورجاله لا بأس بهم، لكنه مرسلٌ.وانظر ما سيأتي برقم (5288).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5268)


5268 - حدثني أبو بكر بن بالَوَيهِ، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حَنْبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرحمن بن مَهدي، حدثنا موسى بن عُلَيّ بن رَباح اللَّخْمي، عن أبيه: أَنَّ عمر بن الخطاب خَطَبَ الناسَ، فقال: مَن أراد أن يَسألَ عن القُرآن فليأت أُبَيَّ بن كعب، ومن أراد أن يَسألَ عن الحلال والحرام فليأت مُعاذَ بنَ جَبَلٍ، ومن أراد أن يَسأَلَ عن المال فليأتِني، فإنَّ الله تعالى جعلني خازنًا [1].




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি জনগণের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিলেন এবং বললেন: যে ব্যক্তি কুরআন সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতে চায়, সে যেন উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে আসে। আর যে ব্যক্তি হালাল ও হারাম সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতে চায়, সে যেন মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে আসে। আর যে ব্যক্তি সম্পদ (অর্থ-সম্পদ) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতে চায়, সে যেন আমার কাছে আসে, কারণ আল্লাহ তা'আলা আমাকে এর তত্ত্বাবধায়ক বানিয়েছেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكنه مرسل، فإِنَّ عُلَيّ بن رباح اللَّخْمي لا يُدرك السماع من عمر بن الخطاب، وقد روى عُلَيُّ بن رباح بعض خُطبة عمر بن الخطاب بالجابية عن ناشرة بن سُمَي اليزني الذي حَضَرها وسمعها من عمر، لكن ليس في رواية ناشرة هذا أمرُ عمرَ الناسَ أن يسألوا عن القرآن أبيًا، وعن الحلال والحرام معاذًا، وذكر في روايته قول عمر بأنَّ الله جعله خازنًا للمال، فهذا الحرف من الخبر صحيح متصل.وأخرجه أبو عبيد القاسم بن سلّام في "الأموال" (548)، وسعيد بن منصور (2319)، وابن سعد 2/ 301، وابن أبي شيبة 12/ 316، وحميد بن زنجويه في "الأموال" (796)، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 1/ 463، وابن المنذر في "الأوسط" (6362)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5953)، والبيهقي 6/ 210، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 7/ 310 و 58/ 421 و 422 من طرق عن موسى بن عُلَيّ به. واقتصر بعضُهم على ذكر معاذ بن جبل دون سائر الخبر، وكلهم قال: من أراد أن يسأل عن الفقه فليأت معاذ بن جبل، بدل: عن الحلال والحرام، وزاد بعضهم في الخبر: ومن أراد أن يسأل عن الفرائض فليأت زيد بن ثابت، وسيأتي هذا الحرف ضمن الرواية الآتية عند المصنف برقم (5272) من طريق أبي عاصم الضحاك بن مَخْلد عن موسى بن علي.وأخرج قصة خطبة عمر في الجابية مطولةً أحمد 25/ (15905) من طريق الحارث بن يزيد الحضرمي، عن عُلَيّ بن رباح، عن ناشرة بن سُمَيٍّ اليَزَني، عن عمر بن الخطاب، وفيه مقالة عمر التي في آخر الخبر هنا أنَّ الله جعله خازنًا للمال، دون قول عمر في فضل الصحابة المذكورين في الخبر، وإسناده صحيح وجوَّده ابن كثير في "مسند الفاروق" (643). وقد صحَّ عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال: "أرحم أمتي بأمتي أبو بكر، وأشدُّهم في أمر الله عمر، وأصدقهم حياء عثمان، وأقرؤهم لكتاب الله أبيّ بن كعب وأفرضُهم زيد بن ثابت، وأعلمهم بالحلال والحرام معاذ، ألا إنَّ لكل أمة أمينًا، وإنَّ أمين هذه الأمة أبو عبيدة بن الجراح" وسيأتي عند المصنف برقم (5894) من حديث أنس.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5269)


5269 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى الشهيد، حدثنا مُسدَّد، حدثنا إسماعيل ابن عُلَيّة، عن منصور بن عبد الرحمن، عن الشعبي، حدثني فَرْوة بن نَوفَل الأشجَعي، قال: قال ابن مسعود: إنَّ معاذًا كان أُمَّةً قانتًا لله حنيفًا، فقلتُ في نفسي: غَلِط أبو عبد الرحمن، إنما قال الله عز وجل: {إِنَّ إِبْرَاهِيمَ كَانَ أُمَّةً قَانِتًا لِلَّهِ} الآية [النحل: 120]، قال: أتدري ما الأُمَّة، وما القانتُ؟ فقلت: الله أعلمُ، قال: الأُمَّةُ الذي يُعلِّمُ الخَيرَ، والقانتُ المُطِيعُ الله ولرسوله صلى الله عليه وسلم، وكذلك كان معاذُ بنُ جَبَل، كان مُعلِّمَ الخيرِ، وكان مُطيعًا الله ولرسوله صلى الله عليه وسلم [1].هكذا رواه شعبةُ عن فِراسٍ عن الشَّعبي عن مَسرُوق عن عبد الله، وأسندَه في آخره:




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয়ই মু'আয (ইবনে জাবাল) আল্লাহর অনুগত, একনিষ্ঠ এবং (একাই) একটি উম্মাহ্ (সম্প্রদায়ের মতো) ছিলেন। আমি (ফরওয়াহ ইবনে নাওফাল) মনে মনে বললাম, আবু আব্দুর রহমান (ইবনে মাসউদ) ভুল করেছেন। আল্লাহ তাআলা তো বলেছেন: {নিশ্চয়ই ইবরাহীম ছিলেন একাই একটি উম্মাহ্, আল্লাহর প্রতি অনুগত...} [সূরা নাহল: ১২০]। তিনি (ইবনে মাসউদ) বললেন, তুমি কি জানো 'উম্মাহ্' কী এবং 'ক্বানিত' (অনুগত) কী? আমি বললাম, আল্লাহই ভালো জানেন। তিনি বললেন, 'উম্মাহ্' হলো সেই ব্যক্তি যে কল্যাণের শিক্ষা দেয়। আর 'ক্বানিত' হলো আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অনুগত। মু'আয ইবনে জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও তেমনই ছিলেন; তিনি কল্যাণের শিক্ষাদানকারী ছিলেন এবং আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অনুগত ছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن المحفوظ - كما قال ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 58/ 417 - أنه من رواية الشعبي عن مسروق بن الأجدع عن ابن مسعود، كما سيأتي عند المصنف في الطريق التالية، وكما تقدَّم برقم (3407)، وأنَّ مسروقًا حكى في روايته مراجعةَ فروة بن نوفل لابن مسعود وردَّ ابن مسعود عليه، فليس فروة مَن حدَّث الشعبيَّ بالخبر، كذلك رواه فراس بن يحيى وزكريا بن أبي زائدة ومجالد بن سعيد عن الشعبي، فقالوا: عن مسروق عن ابن مسعود.والوهم فيه هنا من منصور بن عبد الرحمن - وهو الغُداني الأشَلُّ - فإنه قد خالف في أحاديث كما قال الإمام أحمد. وعلى أي حالٍ فللخبر طريق أخرى صحيحة أيضًا.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 2/ 348، والطبري في "تفسيره" 14/ 191، والطبراني في "الكبير" (9947)، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 229، والواحدي في "التفسير الوسيط" 3/ 90، وابن عساكر 58/ 418 من طريقين عن منصور بن عبد الرحمن الغُداني، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5270)


5270 - أخبرَنَاه أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شُعبة، سمعت فراسًا يُحدِّث عن الشَّعْبي، عن مسروق، عن عبد الله، قال: إنَّ معاذًا كان أمةً قانتًا، قال: فقال رجلٌ من أشْجَعَ يُقال له: فَرْوةُ بن نَوفَل: نسيَ، إنما ذاك إبراهيمُ عليه السلام، فقال عبدُ الله: مَن نَسِي؟ إنا كنا نُشبِّهُه بإبراهيمَ، وسُئل عبدُ الله عن الأمّةِ، فقال: مُعلِّمُ الخَيرِ، والقانتُ: المُطِيعُ الله ولرسوله صلى الله عليه وسلم [1].صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: নিশ্চয় মু'আয (ইবনু জাবাল) ছিলেন একজন 'উম্মাহ' এবং 'ক্বনিত' (আল্লাহ্‌র অনুগত)। বর্ণনাকারী বলেন: তখন আশজা' গোত্রের ফারওয়াহ ইবনু নাওফাল নামে এক ব্যক্তি বলল: তিনি ভুলে গেছেন, ওটা তো কেবল ইবরাহীম (আলাইহিস সালাম) সম্পর্কে বলা হয়েছে। আব্দুল্লাহ (ইবনু মাসঊদ) বললেন: কে ভুল করেছে? আমরা তো মু'আযকে ইবরাহীম (আঃ)-এর সাথেই তুলনা করতাম। আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে 'উম্মাহ' সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বললেন: তিনি হলেন যিনি কল্যাণের শিক্ষক। আর 'ক্বনিত' (বা অনুগত) হলেন, যিনি আল্লাহ এবং তাঁর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অনুগত।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. فراس: هو ابن يحيى الهَمْداني المُكتِب، ومَسْروق: هو ابن الأجْدَع.وأخرجه مُسدَّد في "مسنده" كما في "المطالب العالية" لابن حجر (3647)، وابن سعد 2/ 301، والطبري في "تفسيره" 14/ 191، والطبراني (9944) وأبو الحُسين بن المطهَّر في "حديث شعبة بن الحجاج" (159)، وابنُ عساكر 58/ 420 من طرق عن شعبة، بهذا الإسناد.وقد تقدَّم عند المصنف برقم (3407) من طريق سفيان الثوري عن فراس. أبي وائل - واسمه شقيق بن سَلَمة - مرسلًا، لكن أبا وائل هذا تابعي كبير مُخَضْرم أدرك النبي صلى الله عليه وسلم ولم يَرَهُ، فمرسلُه مرسَلُ تابعيٌّ كبير يقبل أهلُ العلم مثلَه كحال مراسيل ابن المسيّب، على أنَّ الخبر قد روي من وجهين آخرين فيهما مقالٌ، لكنهما يصلحان للاعتبار، فالخبر صحيح إن شاء الله.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 5/ 406 - 407، ومن طريقه ابن عساكر 58/ 433 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته" 3/ 541 من طريق شيبان بن عبد الرحمن النَّحوي، وابن أبي شيبة 6/ 546، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 232 من طريق أبي معاوية الضرير، وحميد بن زنجويه في "الأموال" (982) من طريق محاضر بن المُورِّع، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 232 من طريق وكيع بن الجراح، وابن عساكر 58/ 432 من طريق عبد الله بن داود الخُريبي، كلهم عن الأعمش، عن أبي وائل شقيق بن سَلَمة، به لم يذكر ابنَ مسعود.وأخرجه عبد الرزاق (6954) عن سفيان الثوري، عن الأعمش، عن شقيق أبي وائل، عن مسروق، فذكر الخبر، فجعله من رواية شقيق عن مسروق! ومسروق تابعي كبير مخضرم كذلك، ولعله يكون حضر القصة، فقد صلَّى مسروق وراء أبي بكر الصديق لكن انفرد الثوري بذكره، فالله تعالى أعلم.ويشهد له مرسلُ ابن كعب بن مالك عند عبد الرزاق (15177)، ومن طريقه يحيى بن معين في الجزء الثاني من "حديثه" برواية أبي بكر المروزي، (75)، وابن راهويه في "مسنده" كما في "المطالب العالية" لابن حجر (1461)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 5/ 405 في خبر مطولٍ من لدن قصة استدانة معاذ بن جبل حتى أغلق ماله، إلى بعث النبي صلى الله عليه وسلم له إلى اليمن ليَجبره، ثم رجوعه من اليمن في عهد الصديق، وذكر فيه قصة معاذ مع عمر وأبي بكر هذه التي هنا، وقد تقدَّم بعض ذلك الخبر المطول لكن دون قصة معاذ مع عمر وأبي بكر هذه برقم (2379)، وذكرنا هناك الاختلاف في إسناده وصلًا وإرسالًا، وأنَّ الصحيح أنه مرسلٌ، لكنه مرسل صحيح الإسناد.كما يشهد لهذه القصة حديث جابر بن عبد الله الآتي عند المصنف برقم (5276)، بإسناد لا بأس به في الشواهد والمتابعات.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5271)


5271 - فحدَّثني أبو القاسم الحسن بن محمد السَّكُوني بالكوفة، حدثنا عُبيد بن غَنّام بن حَفْص بن غياث النَّخَعي، حدثني أبي، عن أبيه، عن الأعمش، عن أبي وائل، عن عبد الله قال: لما قُبضَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم واستَخْلَفوا أبا بكرٍ وكان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بَعَثَ معاذًا إلى اليمن، فاستَعملَ أبو بكر عُمرَ على المَوسِم، فلقيَ مُعاذًا بمكة ومعه رَقِيقٌ، فقال: ما هؤلاء؟! فقال: هؤلاء أُهدوا لي، وهؤلاء لأبي بكر، فقال له عُمر: إني أرى لك أن تأتيَ بهم أبا بكرٍ، قال: فلقيَه مِن الغَدِ، فقال: يا ابنَ الخَطَّابِ، لقد رأيتُني البارحةَ وأنا أنْزُو إلى النارِ، وأنتَ آخِذُ بحُجْزَتي، وما أُراني إِلَّا مُطِيعَك، قال: فأَتى بهم أبا بكر، فقال: هؤلاء أُهدوا لي وهؤلاء لك، قال: فإنا قد سَلَّمنا لك هديتَّك، فخرج معاذٌ إلى الصلاة، فإذا هم يُصلُّون خَلْفَه، فقال معاذ: لمن تُصلُّون؟ قالوا: لله عز وجل، فقال: فأنتُم له، فأعْتَقَهم [1]. صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه.




আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তিকাল করলেন এবং লোকেরা আবূ বকরকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খলীফা নিযুক্ত করল, আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মু'আযকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইয়েমেনে পাঠিয়েছিলেন, তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উমারকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হজের মওসুমের (দায়িত্বশীল) নিযুক্ত করলেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মক্কায় মু'আযের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে সাক্ষাৎ করলেন, তখন মু'আযের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে কিছু ক্রীতদাস ছিল। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জিজ্ঞেস করলেন: এরা কারা? মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এদেরকে আমাকে হাদিয়া দেওয়া হয়েছে, আর এদেরকে আবূ বকরকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাদিয়া দেওয়া হয়েছে। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: আমি মনে করি তোমার উচিত এদেরকে আবূ বকরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে নিয়ে যাওয়া।

মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: পরদিন আমি উমারের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে সাক্ষাৎ করলাম। আমি বললাম: হে ইবনুল খাত্তাব! গতরাতে আমি স্বপ্নে দেখলাম, আমি জাহান্নামের দিকে লাফিয়ে পড়ছি, আর আপনি আমার কোমর ধরে টেনে ধরেছেন। আমি মনে করি না যে আমি আপনার আনুগত্য না করে থাকতে পারব।

অতঃপর তিনি তাদের নিয়ে আবূ বকরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে গেলেন এবং বললেন: এদেরকে আমাকে হাদিয়া দেওয়া হয়েছে আর এদেরকে আপনাকে। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমরা তোমার হাদিয়া তোমার জন্যই রেখে দিলাম। অতঃপর মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সালাতের জন্য বের হলেন। (সালাত শেষে ফিরে এসে) তিনি দেখলেন যে তারা (সেই ক্রীতদাসরা) তার পেছনে সালাত আদায় করছে। মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জিজ্ঞেস করলেন: তোমরা কার জন্য সালাত আদায় করছ? তারা বলল: আল্লাহ আযযা ওয়াজাল্ল এর জন্য। মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তাহলে তোমরা তাঁরই জন্য (মুক্ত)। অতঃপর তিনি তাদের মুক্ত করে দিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات غير غنام بن حفص بن غياث، فإنه لا يكاد يُعرف، فهو مجهول، وقد انفرد هنا بذكر عبد الله - وهو ابن مسعود - وخالفه جماعة من الحفاظ من أصحاب الأعمش - وهو سليمان بن مهران - حيث رووا هذا الخبر عنه بإسقاط ابن مسعود، فالخبر من رواية أبي وائل - واسمه شقيق بن سَلَمة - مرسلًا، لكن أبا وائل هذا تابعي كبير مُخَضْرم أدرك النبي صلى الله عليه وسلم ولم يَرَهُ، فمرسلُه مرسَلُ تابعيٌّ كبير يقبل أهلُ العلم مثلَه كحال مراسيل ابن المسيّب، على أنَّ الخبر قد روي من وجهين آخرين فيهما مقالٌ، لكنهما يصلحان للاعتبار، فالخبر صحيح إن شاء الله.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 5/ 406 - 407، ومن طريقه ابن عساكر 58/ 433 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته" 3/ 541 من طريق شيبان بن عبد الرحمن النَّحوي، وابن أبي شيبة 6/ 546، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 232 من طريق أبي معاوية الضرير، وحميد بن زنجويه في "الأموال" (982) من طريق محاضر بن المُورِّع، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 232 من طريق وكيع بن الجراح، وابن عساكر 58/ 432 من طريق عبد الله بن داود الخُريبي، كلهم عن الأعمش، عن أبي وائل شقيق بن سَلَمة، به لم يذكر ابنَ مسعود.وأخرجه عبد الرزاق (6954) عن سفيان الثوري، عن الأعمش، عن شقيق أبي وائل، عن مسروق، فذكر الخبر، فجعله من رواية شقيق عن مسروق! ومسروق تابعي كبير مخضرم كذلك، ولعله يكون حضر القصة، فقد صلَّى مسروق وراء أبي بكر الصديق لكن انفرد الثوري بذكره، فالله تعالى أعلم.ويشهد له مرسلُ ابن كعب بن مالك عند عبد الرزاق (15177)، ومن طريقه يحيى بن معين في الجزء الثاني من "حديثه" برواية أبي بكر المروزي، (75)، وابن راهويه في "مسنده" كما في "المطالب العالية" لابن حجر (1461)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 5/ 405 في خبر مطولٍ من لدن قصة استدانة معاذ بن جبل حتى أغلق ماله، إلى بعث النبي صلى الله عليه وسلم له إلى اليمن ليَجبره، ثم رجوعه من اليمن في عهد الصديق، وذكر فيه قصة معاذ مع عمر وأبي بكر هذه التي هنا، وقد تقدَّم بعض ذلك الخبر المطول لكن دون قصة معاذ مع عمر وأبي بكر هذه برقم (2379)، وذكرنا هناك الاختلاف في إسناده وصلًا وإرسالًا، وأنَّ الصحيح أنه مرسلٌ، لكنه مرسل صحيح الإسناد.كما يشهد لهذه القصة حديث جابر بن عبد الله الآتي عند المصنف برقم (5276)، بإسناد لا بأس به في الشواهد والمتابعات.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5272)


5272 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ، حدثنا الحسن بن سهل المُجوِّز، حدثنا أبو عاصم، حدثنا موسى بن عُلَيّ بن رَباح اللَّخْمي، عن أبيه: أنَّ عُمر بن الخطاب خَطَب الناسَ، فقال: من أراد أن يسألَ عن القرآنِ فليأتِ أبيَّ بنَ كعب، ومن أراد أن يَسألَ عن الحلال والحرام فليأتِ معاذ بنَ جَبَل، ومن أراد أن يَسألَ عن الفَرائض فليأتِ زيدَ بن ثابتٍ، ومن أراد أن يَسألَ عن المالِ فليأتِني، فإني له خَازنٌ [1].صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি লোকদের উদ্দেশ্যে খুতবা দিলেন এবং বললেন: যে ব্যক্তি কুরআন সম্পর্কে প্রশ্ন করতে চায়, সে যেন উবাই ইবনু কা'বের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট আসে। আর যে হালাল ও হারাম সম্পর্কে প্রশ্ন করতে চায়, সে যেন মু'আয ইবনু জাবালের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট আসে। আর যে ফারাইয (উত্তরাধিকার আইন) সম্পর্কে প্রশ্ন করতে চায়, সে যেন যায়িদ ইবনু সাবিতের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট আসে। আর যে সম্পদ সম্পর্কে প্রশ্ন করতে চায়, সে যেন আমার নিকট আসে, কারণ আমিই হলাম এর খাযিন (কোষাধ্যক্ষ/রক্ষক)।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات غير أنه مرسلٌ كما تقدم بيانه برقم (5268). أبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5273)


5273 - حدثنا أبو بكر أحمد بن إسحاق الإمام، أخبرنا الحسن بن علي بن زياد، حدثنا إبراهيم بن موسى، حدثنا هشام بن يوسف، عن مَعمَر، عن الزُّهْري، عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك، عن أبيه، قال: كان معاذُ بنُ جَبَل شابًا حليمًا سَمْحًا من أفضل شبابِ قومِه، ولم يكن يُمسِكُ شيئًا، فلم يَزَل يَدّانُ حتى أغرقَ مالَه كلَّه في الدَّين، فأتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فكَلَّم غُرماءَه، فلو تَركُوا أحدًا من أجل أحدٍ، لَتَركُوا معاذًا من أجلِ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فباعَ لهم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم مالَه، حتى قامَ معاذٌ بغيرِ شيء [1].صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




কা'ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মু'আয ইবনে জাবাল ছিলেন একজন ধৈর্যশীল, উদারমনা এবং স্বীয় গোত্রের অন্যতম শ্রেষ্ঠ যুবক। তিনি কোনো সম্পদ ধরে রাখতে পারতেন না। ফলে তিনি ক্রমাগত ঋণ করতে থাকেন, এমনকি ঋণের কারণে তাঁর সমস্ত সম্পদ ডুবে গেল। অতঃপর তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার পাওনাদারদের সাথে কথা বললেন। যদি কেউ কারো খাতিরে (ঋণ) মওকুফ করত, তবে তারা অবশ্যই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খাতিরে মু'আযের ঋণ মওকুফ করে দিত। (কিন্তু তারা তা করেনি), তাই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের জন্য মু'আযের সম্পদ বিক্রি করে দিলেন। শেষ পর্যন্ত মু'আয নিঃস্ব হয়ে গেলেন (তাঁর আর কিছুই অবশিষ্ট রইল না)।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات لكن الصحيح أنه مرسل كما تقدم بيانه برقم (2379).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5274)


5274 - حدثنا أبو علي الحُسين بن علي الحافظ، أخبرنا الحسين بن عبد الله بن يزيد القَطّان بالرَّقّة، حدثنا عمرو بن بكر السَّكْسَكي، حدثنا مُجاشِع بن عَمرو الأسَدي، حدثنا الليث بن سعد، عن عاصم بن عمر بن قَتَادة، عن محمود بن لَبيد، عن معاذ بن جبل: أنه مات له ابنٌ، فكتبَ إليه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يُعزِّيه عليه: "بسم الله الرحمن الرحيم، من محمد رسول الله إلى مُعاذ بن جَبَل سَلامٌ عليك، فإني أحمَدُ إليك الله الذي لا إله إلَّا هو، أما بَعدُ، فأعظَمَ الله لك الأجرَ، وألهَمَك الصبرَ، ورَزَقَنا وإياك الشُّكرَ، فإن أنفُسَنا وأموالَنا وأهلينا وأولادَنا من مَواهب الله عز وجل الهَنيّة، وعَوارِيِّه المُستودَعَة، مَتَّعك به في غِبْطَةٍ وسُرور، وقَبَضَه منك بأجرٍ كبير، الصلاةُ والرحمةُ والهُدى إن احتَسبتَه فاصبِرْ، ولا يُحبِطُ جَزَعُك أجرَك فتَندمَ، واعلم أنَّ الجَزَعَ لا يَرُدُّ شيئًا، ولا يَدفَعُ حُزنًا، وما هو نازِلٌ فكأَنْ قَدْ، والسلامُ" [1]. غريبٌ حسنٌ إِلَّا أَنَّ مُجاشِع بن عمرو ليس من شَرْط هذا الكتاب.




মু'আয ইবনে জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর একটি ছেলে মারা গেলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে সমবেদনা জানিয়ে পত্র লিখলেন: "বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম (পরম করুণাময়, দয়ালু আল্লাহর নামে), আল্লাহর রাসূল মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে মু'আয ইবনে জাবাল-এর প্রতি। আপনার উপর শান্তি বর্ষিত হোক। আমি আপনার কাছে সেই আল্লাহর প্রশংসা করছি, যিনি ব্যতীত অন্য কোনো উপাস্য নেই। অতঃপর— আল্লাহ আপনার প্রতিদান বৃদ্ধি করুন, আপনাকে ধৈর্য ধারণের অনুপ্রেরণা দিন এবং আমাদের ও আপনাকে কৃতজ্ঞতা (শুকর) করার তৌফিক দিন। নিশ্চয়ই আমাদের জীবন, সম্পদ, পরিবার এবং সন্তান-সন্ততি—এগুলো পরাক্রমশালী আল্লাহর পক্ষ থেকে প্রদত্ত আনন্দের দান এবং তাঁর নিকট আমানত হিসেবে রাখা অস্থায়ী সম্পদ। তিনি আপনাকে এটি দিয়ে আনন্দ ও সুখে উপকৃত করেছেন এবং এখন বড় প্রতিদানের বিনিময়ে তা আপনার কাছ থেকে নিয়ে গেছেন। সালাত, রহমত ও হেদায়েত (পথনির্দেশ) রয়েছে, যদি আপনি (আল্লাহর সিদ্ধান্ত) মেনে নিয়ে ধৈর্য ধারণ করেন। আপনার অস্থিরতা যেন আপনার প্রতিদান নষ্ট না করে দেয়, যার ফলে আপনাকে অনুতপ্ত হতে হয়। আর জেনে রাখুন, অস্থিরতা কোনো কিছু ফিরিয়ে আনে না, শোক দূর করে না। যা কিছু ঘটবে, তা যেন এখনই ঘটে গেছে (অর্থাৎ তা অবশ্যম্ভাবী)। আর শান্তি বর্ষিত হোক।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر موضوع، قال الذهبي في "تلخيصه": ذا من وضع مجاشع. قلنا: مجاشع بن عمرو هذا كذَّبه ابن معين، وقال ابن حبان: يضع الحديث على الثقات ويروي الموضوعات عن أقوام ثقات، وقال أبو حاتم والدارقطني: متروك، وقال البخاري والعقيلي وأبو أحمد الحاكم منكر الحديث.وقد رُوي مثلُ هذا الخبر بأسانيد أخرى كلها تالفة فيها متهمون بالكذب. وقال أبو نُعيم الأصبهاني في "الحلية" 1/ 242: كل هذه الروايات ضعيفة لا تثبت فإنَّ وفاة ابن معاذ كانت بعد وفاة رسول الله صلى الله عليه وسلم بسنين، وإنما كتب إليه بعض الصحابة، فوهم الراوي فنسبها إلى النبي صلى الله عليه وسلم، وكان معاذ أجلّ وأعلم من أن يجزع ويغلبه الجزع عن الاستسلام …وأخرجه ابن الأعرابي في "معجمه" (946)، والطبراني في "الكبير" 20/ (324)، وفي "الأوسط" (83)، وفي "الدعاء" (1216)، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 242، والشَّجَري في "أماليه" 2/ 299، وابن عساكر 58/ 449، وابن حجر في "نتائج الأفكار" 4/ 366 من طريق أحمد بن يحيى بن خالد الرّقي، عن عمرو بن بكر بن بكار القعنبي البصري، عن مجاشع بن عمرو، بهذا الإسناد. ووقع في "الدعاء": عمرو بن بكر السكسكي، وهو خطأ تصويبه من كتابي الطبراني الآخرين، ومن سائر المصادر الأخرى.وأخرجه أبو نُعيم في "الحلية" 1/ 242، وابن عساكر 58/ 448، وابن الجوزي في "الموضوعات" (1790)، وابن حجر في "نتائج الأفكار" 4/ 367 من طريق محمد بن سعيد المصلوب، عن عبادة بن نُسيّ، عن عبد الرحمن بن غَنْم، عن معاذ بن جبل. ومحمد بن سعيد المصلوب، سُمِّي بذلك لأنه قُتل على الزندقة وصُلب، وصرح جماعة من الأئمة بتكذيبه، كما قال الحافظ ابن حجر.وأخرجه محمد بن داود بن علي الظاهري في "الزهرة" ص 546، وأبو الليث السمرقندي في "تنبيه الغافلين" (340) من طريق أبي داود سليمان بن عمرو النَّخَعي، عن مهاجر بن أبي الحسن الشامي، عن عبد الرحمن بن غَنْم، عن معاذ بن جبل. وأبو داود النخعي هذا كذاب يضع الحديث.والحديث في "نسخة نُبَيط بن شَريط" (372) بإسناد رابع عن أبي الحسن أحمد بن القاسم بن الريان اللكِّي، عن أحمد بن إسحاق بن إبراهيم بن نُبَيط بن شَريط، عن أبيه، عن جده، عن نُبَيط بن شَريط، عن معاذ بن جبل. قال الذهبي في "الميزان" في أحمد بن إسحاق: لا يحل الاحتجاج به، فإنه كذَّاب، حدَّث عن أبيه عن جده بنسخة فيها بلايا.وأخرجه الخطيب البغدادي في "تاريخ بغداد" 2/ 438 من طريق إسحاق بن نُجيح الملطي، عن عطاء، عن ابن عباس، قال: كتب النبي صلى الله عليه وسلم إلى معاذ … وإسحاق بن نجيح هذا كذاب.وأخرجه محمد بن خلف المعروف بوكيع في "الغُرر من الأخبار" كما في "اللآلئ المصنوعة" للسيوطي 2/ 355 عن أبي إسماعيل بن إبراهيم بن حسن بن علي بن أبي طالب، عن عمه، عن إسحاق بن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جده مرسلًا. وهذا إسناد مظلم، فيه من لم نتبيّنه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5275)


5275 - أخبرنا الحسين بن الحسن بن أيوب، حدثنا أبو يحيى بن أبي مَسَرّة، حدثنا عبد الله بن يزيد المُقرئ، حدثنا حَيْوةُ بن شُرَيح، سمعتُ عُقبةَ بن مُسلِم يقول: حدثني أبو عبد الرحمن الحُبُلي، عن الصُّنابِحِيّ، عن معاذ بن جَبَل قال: أخذَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بيدي يومًا ثم قال: "يا مُعاذُ، والله أني لأُحِبُّك" فقلتُ له: بأبي وأمي يا رسول الله، وأنا والله أُحِبُّك، فقال: "أُوصيك يا معاذُ، لا تَدَعَنَّ فِي دُبُرِ كلِّ صلاةٍ أن تقولَ: اللهمَّ أعِنِّي على ذِكْرِك وشُكْرِك وحُسنِ عِبادتِك".وأوصَى بذلك مُعاذٌ الصُّنَابِحيَّ، وأوصى الصُّنَابحيُّ أبا عبد الرحمن الحُبُلي، وأوصَى أبو عبد الرحمن عُقبةَ بن مُسلم [1].صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার হাত ধরলেন, অতঃপর বললেন: "হে মু'আয! আল্লাহর কসম, আমি তোমাকে অবশ্যই ভালোবাসি।" আমি তাঁকে বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার পিতা-মাতা আপনার উপর কুরবান হোক, আল্লাহর কসম, আমিও আপনাকে ভালোবাসি। তখন তিনি বললেন: "হে মু'আয! আমি তোমাকে উপদেশ দিচ্ছি যে, তুমি যেন কখনোই প্রত্যেক সালাতের (নামাযের) শেষে এই দু‘আটি বলতে ভুলে না যাও: 'আল্লা-হুম্মা আ‘ইন্নী ‘আলা যিকরিকা ওয়া শুকরিকা ওয়া হুসনি ‘ইবাদাতিক।' (অর্থাৎ: হে আল্লাহ! আপনি আমাকে আপনার যিকির, আপনার শুকরিয়া এবং উত্তমরূপে আপনার ইবাদাত করার জন্য সাহায্য করুন)।" মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই উপদেশ সুন্নাবিহীকে দেন, সুন্নাবিহী আবু আব্দুর রহমান আল-হুবালীকে উপদেশ দেন এবং আবু আব্দুর রহমান উকবাহ ইবনু মুসলিমকে উপদেশ দেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. وهو مكرر الحديث المتقدم برقم (1023).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5276)


5276 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن أحمد الأصبَهاني، حدثنا الحَسن بن الجَهْم، حدثنا الحُسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عُمر، حدثني عيسى بن النعمان، عن مُعاذ بن رِفاعة، عن جابر بن عبد الله قال: كان معاذُ بن جَبَل من أحسنِ الناس وجهًا، وأحسنِهم خُلقًا، وأسمحِهم كَفًّا، فادّانَ دَينًا كثيرًا، فلزمه غُرَمَاؤُه، حتى تَغَيَّب عنهم أيامًا في بيتِه حتى استأدَى [1] رسولَ الله صلى الله عليه وسلم غرماؤُه، فأرسلَ رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى معاذٍ يدعُوه، فجاء ومعَه غُرماؤه، فقالوا: يا رسول الله، خذ لنا حَقَّنا منه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "رَحِمَ اللهُ مَن تَصدَّق عليه" فتصدَّق عليه ناسٌ وأبى آخرون، وقالوا: يا رسول الله، خذ لنا بحقِّنا منه، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "اصبر لهم يا مُعَاذُ" قال: فخَلَعه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم من ماله فدفعه إلى غُرمائه، فاقتَسَمُوه بينهم، فأصابهم خمسةُ أسباع حقوقِهم، قالوا: يا رسول الله، بِعْه لنا، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "خَلُّوا عنه، فليس لكم عليه سَبيلٌ"، فانصرفَ مُعاذٌ إلى بني سَلِمَة، فقال له قائل: يا أبا عبد الرحمن، لو سألتَ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فقد أصبحت اليوم مُعدِمًا، فقال: ما كنتُ لِأسألَه، قال: فمَكَثَ أيامًا، ثم دَعاهُ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فبعثَه إلى اليَمَن، وقال: "لعلَّ اللَّهَ أَن يَجْبُرَكَ ويُؤدَّيَ عنك دَيْنَك". قال: فخرج معاذٌ إلى اليمن، فلم يَزَلْ بها حتى تُوفِّي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فوافَى السنةَ التي حَجَّ فيها عمرُ بنُ الخطاب مكةَ فاستعملَه أبو بكر على الحَجِّ، فالتقَيا يومَ التَّرْوية بها، فاعتَنَقا وعَزّى كلُّ واحدٍ منهما صاحبَه برسولِ الله صلى الله عليه وسلم، ثم أخْلَدا إلى الأرض يَتحدَّثانِ، فرأى عمرُ عند مُعاذ غِلْمانًا، فقال: ما هؤلاء؟ ثم ذكر الأحرفَ التي ذكرتُها فيما تقدّم [2]. ‌‌ذكرُ مناقب الفَضْل بن عبَّاس بن عبد المُطلّب رضي الله عنهما




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন লোকেদের মধ্যে সবচেয়ে সুন্দর চেহারার, সবচেয়ে উত্তম চরিত্রের এবং সবচেয়ে দানশীল হাতের অধিকারী। তিনি প্রচুর ঋণগ্রস্ত হয়ে পড়েন। তার পাওনাদাররা তাকে তাগাদা দিতে লাগলো, এমনকি তিনি তাদের ভয়ে কিছুদিন নিজ ঘরে আত্মগোপন করে রইলেন। অবশেষে পাওনাদাররা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে তাদের হক আদায়ের দাবি নিয়ে এল।

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মু'আযকে ডেকে আনার জন্য লোক পাঠালেন। মু'আয এলেন এবং তার সাথে পাওনাদাররাও এল। তারা বলল, ইয়া রাসূলাল্লাহ! তার কাছ থেকে আমাদের হক আদায় করে দিন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ তাকে রহম করুন, যে তাকে সদকা করে (ঋণ মাফ করে)।" তখন কিছু লোক তাকে সদকা (মাফ) করে দিল, কিন্তু অন্যরা অস্বীকার করল। তারা বলল, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাদের হক তাকে পরিশোধ করিয়ে দিন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে মু'আয! তুমি তাদের প্রতি ধৈর্য ধারণ করো।"

বর্ণনাকারী বলেন, এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার (মু'আযের) সম্পদ নিয়ে নিলেন এবং তা তার পাওনাদারদের হাতে তুলে দিলেন। তারা তা নিজেদের মধ্যে ভাগ করে নিল এবং তাদের প্রাপ্য হকের পাঁচ-সপ্তমাংশ পেল। তারা বলল, ইয়া রাসূলাল্লাহ! (বাকিটুকু উসূলের জন্য) তাকে বিক্রি করে দিন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাকে ছেড়ে দাও, তার ওপর তোমাদের আর কোনো দাবি নেই।"

এরপর মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বনু সালিমা গোত্রের দিকে চলে গেলেন। তাকে একজন বলল: হে আবূ আব্দুর রহমান! আপনি যদি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কিছু চাইতেন! কেননা আজ আপনি নিঃস্ব হয়ে গেছেন। মু'আয বললেন: আমি কখনও তার কাছে চাইব না।

বর্ণনাকারী বলেন, এরপর তিনি কয়েক দিন থাকলেন। তারপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে ডাকলেন এবং তাঁকে ইয়েমেনে পাঠালেন আর বললেন: "হতে পারে আল্লাহ তোমার অবস্থা শুধরে দেবেন এবং তোমার ঋণ পরিশোধ করিয়ে দেবেন।" বর্ণনাকারী বলেন, মু'আয ইয়েমেনের দিকে বের হলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওফাত পর্যন্ত সেখানেই ছিলেন। যে বছর উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মক্কায় হজ করেন এবং আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে হজের আমির নিযুক্ত করেন, সে বছর ইয়েমেন থেকে ফিরে মু'আয তার সঙ্গে ইয়াওমুত তারবিয়ায় (হজের প্রথম দিন) মিলিত হলেন। তারা উভয়ে একে অপরকে আলিঙ্গন করলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওফাতের জন্য একজন অন্যজনকে সান্ত্বনা দিলেন। এরপর তারা জমিনের দিকে ঝুঁকে বসে কথা বলতে লাগলেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মু'আযের কাছে কিছু যুবককে (বা সেবক/গোলামকে) দেখতে পেলেন এবং জিজ্ঞাসা করলেন: এরা কারা? (এরপর বাকি ঘটনা যা পূর্বে বর্ণনা করা হয়েছে, তা উল্লেখ করা হলো)।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] معنى أستأدى: طَلَبَ الأداء، أي: طَلَبَ غرماءُ معاذٍ من رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يحمل معاذًا على الأداء.



[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد لا بأس به في المتابعات والشواهد، فإنَّ محمد بن عمر - وهو الواقدي - يُكتب حديثه - يعني في المتابعات والشواهد - كما انتهى إليه الذهبي في "السير" 9/ 469، ومَن دُون الواقدي لا بأس بهم وهم بعضُ رواة كتب الواقدي كما تقدم بيانه برقم (4060)، ومن فوقه لا بأس بهم، وقد تقدَّم شاهده برقم (5271).وأخرجه البيهقي 6/ 50 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته الكبرى" 3/ 543، ومن طريقه ابن عساكر في 58/ 430 - 431 عن محمد بن عمر الواقدي، به.وأخرجه مختصرًا ابن ماجه (2357) من طريق عبد الله بن مسلم بن هرمز، عن سلمة المكي، عن جابر بن عبد الله: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم خَلَعَ معاذ بن جبل من غرمائه، ثم استعمله على اليمن، فقال معاذ: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم استخلصني بمالي، ثم استعملني. وعبد الله بن مسلم بن هرمز هذا ضعيف، لكن قال أبو حاتم: يُكتب حديثُه؛ يعني يُعتبر به في المتابعات والشواهد، وروى له البخاري في "الأدب المفرد".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5277)


5277 - أخبرني أحمد بن يعقوب الثَّقَفي، حدثنا موسى بن زكريا التُّستَري، حدثنا خَليفة بن خَيّاط، قال: والفَضل بن عَباس بن عبد المُطّلب بن هاشم، يُكنى أبا محمد، غَزَا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم مكةَ وحُنينًا، وثَبَتَ معه حين ولَّى الناسُ مُنهزِمين، وشَهِدَ معه حَجّةَ الوداع، وكان فيمن غَسَّل رسولَ الله صلى الله عليه وسلم ووَلِيَ دَفْنه، ثم خرج إلى الشام مُجاهدًا [فمات] [1] بناحية الأُردنِّ في طاعون عَمَواس سنة ثمانَ عشرةَ من الهجرة، وذلك في خِلافة عمر بن الخطاب [2].




খলীফা ইবনে খাইয়াত থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ফাদল ইবনে আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব ইবনে হাশিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কুনিয়াত ছিল আবু মুহাম্মাদ। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মক্কা বিজয় ও হুনায়নের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন এবং যখন লোকেরা পরাজিত হয়ে পালিয়ে যাচ্ছিল, তখনও তিনি তাঁর (নবীর) সাথে সুদৃঢ় ছিলেন। আর তিনি তাঁর সাথে বিদায় হজ্বে উপস্থিত ছিলেন। তিনি তাঁদের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন, যাঁরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে গোসল করিয়েছিলেন এবং তাঁর দাফন কার্য সম্পন্ন করেছিলেন। এরপর তিনি মুজাহিদ হিসেবে সিরিয়ার (শাম) উদ্দেশ্যে বের হন এবং হিজরতের আঠারোতম বছরে, যা ছিল উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খেলাফতকালে, আমওয়াস (Amwas)-এর মহামারীতে জর্ডানের কাছাকাছি অঞ্চলে ইন্তিকাল করেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] لفظة "فمات" سقطت من نسخنا الخطية، وأثبتناها من ابن سعد في "طبقاته" 4/ 51 و 9/ 403. ابن معين هذا مبني على أنَّ اليرموك كانت سنة ثلاث عشرة في آخر أيام الصديق وأول أيام عمر، وهو قول سيف بن عمر كما في "تاريخ دمشق" لابن عساكر 2/ 142 - 143، لكن قول الجمهور على خلافه. وانظر بسط الخلاف في السنة التي كانت فيها معركة اليرموك في "تاريخ دمشق" لابن عساكر 2/ 141 - 143، وفي البداية والنهاية لابن كثير 9/ 552 - 545، والأكثرون قالوا: إنها كانت سنة خمس عشرة، وقال ابن عساكر: هذه الأقوال هي المحفوظة.



[2] كذا أسند المصنف هذا التعريف بالفضل بن عباس لخليفة بن خيّاط، مع أنَّ قول خليفة بن خياط في "طبقاته" ص 297 - وهو برواية موسى بن زكريا التُّستَري - يخالف ما هنا، فإنه قال فيه: الفضل بن عباس بن عبد المطلب بن هاشم بن عبد مناف يُكنَى أبا عبد الله، ويقال: يُكنَى أبا محمد، واستُشهد بالشام يوم أجنادين في جمادى الآخرة سنة ثلاث عشرة، ويقال: استُشهد يوم مرج الصَّفَّر في جمادى الأولى سنة ثلاث عشرة، هكذا قال في "طبقاته"، وبَناهُ على ما قاله في "تاريخه" ص 120 من قول أبي الحسن المدائني وابن الكلبي أن استشهاد الفضل بن عباس كان سنة ثلاث عشرة يوم أجنادين.لكن هذا النص الذي ذكره المصنف هنا إنما هو نص قول ابن سعد في الطبقات "الكبرى" 7/ 399 ورواه عنه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 48/ 328.وقال ابن كثير في "البداية والنهاية" 10/ 79 شهد فتح الشام، استُشهد بطاعون عمواس في قول محمد بن سعد والزبير بن بكار وأبي حاتم وابن البرقي، وهو الصحيح. ابن معين هذا مبني على أنَّ اليرموك كانت سنة ثلاث عشرة في آخر أيام الصديق وأول أيام عمر، وهو قول سيف بن عمر كما في "تاريخ دمشق" لابن عساكر 2/ 142 - 143، لكن قول الجمهور على خلافه. وانظر بسط الخلاف في السنة التي كانت فيها معركة اليرموك في "تاريخ دمشق" لابن عساكر 2/ 141 - 143، وفي البداية والنهاية لابن كثير 9/ 552 - 545، والأكثرون قالوا: إنها كانت سنة خمس عشرة، وقال ابن عساكر: هذه الأقوال هي المحفوظة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5278)


5278 - سمعت أبا العباس محمد بن يعقوب، سمعت العباس يقول: سمعت يحيى بن مَعِين يقول: قُتِل الفَضْل بن عباس يومَ اليرموك في عهد أبي بكر الصِّديق [1].




ইয়াহইয়া ইবনে মা'ঈন থেকে বর্ণিত, ফাদল ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ বকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতের সময়ে ইয়ারমুকের যুদ্ধে শহীদ হয়েছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] العباس: هو ابن محمد الدُّوري، وهو في "التاريخ" بروايته عن ابن معين (121). وقولُ ابن معين هذا مبني على أنَّ اليرموك كانت سنة ثلاث عشرة في آخر أيام الصديق وأول أيام عمر، وهو قول سيف بن عمر كما في "تاريخ دمشق" لابن عساكر 2/ 142 - 143، لكن قول الجمهور على خلافه. وانظر بسط الخلاف في السنة التي كانت فيها معركة اليرموك في "تاريخ دمشق" لابن عساكر 2/ 141 - 143، وفي البداية والنهاية لابن كثير 9/ 552 - 545، والأكثرون قالوا: إنها كانت سنة خمس عشرة، وقال ابن عساكر: هذه الأقوال هي المحفوظة.