আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
5279 - أخبرني أبو الحسين بن يعقوب الحافظ، أخبرنا الثَّقفي، حدثنا عُبيد الله بن سعْد الزُّهري، حدثنا عمِّي يعقوب بن إبراهيم، عن أبيه، عن [ابن] [1] إسحاق، قال: الفضلُ بن عَبّاس بن عبد المُطّلب كنيتُه أبو محمد، وأمُّه أم الفَضْل، واسمها لُبَابة بنت الحارث، قُتِل في خلافة أبي بكر مع خالد بن الوليد [2].قد حدَّث العباسُ بن عبد المطلب وعبدُ الله بن عباس عن الفَضْل بن عباس.أما حديث أبيه العباس عنه:
ইবনু ইসহাক থেকে বর্ণিত, আল-ফাদল ইবনু আব্বাস ইবনু আবদুল মুত্তালিবের কুনিয়াত (উপনাম) ছিল আবূ মুহাম্মাদ। আর তাঁর মাতা ছিলেন উম্মুল ফাদল, যাঁর নাম ছিল লুবাবা বিনতে হারিস। তিনি আবূ বাকরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খিলাফতকালে খালিদ ইবনু ওয়ালিদের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে (যিলাফতকালে জিহাদে) নিহত হন। আব্বাস ইবনু আবদুল মুত্তালিব ও আবদুল্লাহ ইবনু আব্বাস আল-ফাদল ইবনু আব্বাস থেকে হাদীস বর্ণনা করেছেন। আর তাঁর পিতা আব্বাসের তাঁর থেকে (বর্ণিত) হাদীস প্রসঙ্গে:
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] لفظة "ابن" سقطت من النسخ الخطية، وإثباتها هو الصواب، لأنَّ المذكور هو محمد بن إسحاق بن يسار، والراوي عنه إبراهيم - وهو ابن سعد الزهري - هو أحد رواة السيرة النبوية عنه.
[2] الثقفي: هو أبو العباس محمد بن إسحاق السَّرّاج، وأخرجه ابن عساكر 48/ 333 من طريق محمد بن جعفر الزَّرَّاد المَنْبِجي، عن عُبيد الله بن سعد، به.
5280 - فأخبرَناهُ أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدثنا أبو إسماعيل محمد بن إسماعيل، حدثنا أيوب بن سليمان بن بلال، حدثني أبو بكر، عن سُليمان بن بلال، قال: وقال يحيى بن سعيد: أخبرني أبو الزُّبير، أنَّ أبا مَعْبَد مولى عبد الله بن عباس أخبره، أنه سمِع عبدَ الله بن عباس يحدِّث عن العباس بن عبد المطلب، أنه قال: لما كان يومُ عَرَفة والفضلُ رَدِيفُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، والناسُ كثيرٌ حولَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فلما كَثُر الناسُ، قلت: سيُحدِّثني الفضلُ عما صَنَعَ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال الفضلُ: دَفَعَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وَدَفَعَ الناسُ معه، فجعل رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يُمسِك بزمَامِ بَعِيرِه، وجعل يُنادي الناسَ: "عليكم السَّكينةَ"، فلما بلغ المُزدَلِفة نزل فصلَّى المغربَ والعِشاءَ الآخرة جميعًا، حتى إذا طَلَع الفجرُ صلَّى الصبحَ، ثم وَقَف بالمزدَلِفة عند المَشْعَر الحَرام، ثم دَفَعَ ودَفَع الناسُ معه يُمسك برأس بعيره، وجعل يقولُ: "أيها الناسُ، عليكم السَّكينةَ"، حتى إذا بلغ مُحسِّرًا أَوضَعَ شيئًا، وجعل يقول: "عليكم بحَصى الخَذْف" [1]. صحيحٌ على شرط الشيخين، فقد روى غيرُ أبي الزُّبير عن أبي مَعْبَد، ولم يُخرجاه.وأما حديثُ أخيه عبد الله بن عباس فإنه مُخرَّج في "الصحيحين" من حديث عطاء وأبي مَعْبَد عن ابن عباس، بلفظَتين: "عليكم السَّكينةَ"، وكان يَرمي الجَمْرة [2]، وهذا لم يُخرجاه.
আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আরাফার দিন ছিল এবং ফাদল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে সওয়ারীতে ছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চারপাশে বহু লোক ছিল। যখন লোকজন অনেক বেশি হয়ে গেল, আমি বললাম: ফাদল আমাকে জানাবেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কী করেছেন। অতঃপর ফাদল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যাত্রা শুরু করলেন এবং লোকজনও তাঁর সাথে যাত্রা শুরু করল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর উটের লাগাম ধরে রাখছিলেন এবং লোকজনকে ডেকে বলছিলেন: "তোমরা ধীরস্থিরতা অবলম্বন করো।" যখন তিনি মুযদালিফায় পৌঁছলেন, তিনি নেমে মাগরিব ও এশার শেষ সালাত একত্রে আদায় করলেন। এমনকি যখন ফজর উদিত হলো, তিনি ফজরের সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি মুযদালিফায় মাশআরুল হারাম-এর কাছে অবস্থান করলেন। এরপর তিনি যাত্রা শুরু করলেন এবং লোকজনও তাঁর সাথে যাত্রা শুরু করল, তিনি তাঁর উটের মাথা ধরে রাখছিলেন এবং বলতে লাগলেন: "হে লোক সকল! তোমরা ধীরস্থিরতা অবলম্বন করো।" এমনকি যখন তিনি মুহাসসির উপত্যকায় পৌঁছলেন, তখন তিনি কিছুটা দ্রুত চললেন এবং বলতে লাগলেন: "তোমরা ক্বাযফ-এর (ছোট) কংকরগুলো গ্রহণ করো।" [১]
(ইমাম হাকেম বলেন:) এটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্ত অনুযায়ী সহীহ। আবু যুবাইর ব্যতীত অন্য রাবী আবু মা'বাদ থেকে বর্ণনা করেছেন, কিন্তু তারা (শাইখাইন) এটি সংকলন করেননি।
আর তার ভাই আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি সহীহাইন গ্রন্থে আতা ও আবু মা'বাদ সূত্রে ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে দুটি শব্দে সংকলিত হয়েছে: "তোমরা ধীরস্থিরতা অবলম্বন করো" এবং তিনি জামরাহ-তে কংকর নিক্ষেপ করছিলেন [২]। তবে এই (প্রথমোক্ত) হাদীসটি তারা (শাইখাইন) সংকলন করেননি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. أبو إسماعيل محمد بن إسماعيل: هو ابن يوسف الترمذي، وأبو بكر: هو عبد الحميد بن أبي أويس، ويحيى بن سعيد: هو الأنصاري، وأبو الزبير: هو محمد بن مسلم بن تدرسُ المكي.لكن ما وقع هنا من إرداف النبي صلى الله عليه وسلم للفضل يوم عرفة، فغريبٌ، لأنَّ المستفيض كما قال البخاري في "تاريخه الأوسط" 3/ 201 عن ابن عباس أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أردف أسامة من عرفة إلى جَمْع، وكذلك قال أسامة: أردفني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فقلتُ: الصلاةَ، فقال: "الصلاةُ أمامك" ثم أردف الفضل من جمع إلى منى، ثم أسنده البخاري عن ابن عباس: أنَّ أسامة كان رَدِفَ النبي صلى الله عليه وسلم من عرفة إلى المزدلفة، ثم أردف الفضلَ من المزدلفة إلى منى. قلنا: إلّا أن يكون الفضل ردف النبيَّ صلى الله عليه وسلم أولًا أثناء النهار لدى رؤية أبيه العباس له وهو كذلك، ثم انصرف العباس، وبعدها نزل الفضل عن ناقة رسول الله صلى الله عليه وسلم وردِفَه أسامة لدى نفيره إلى مزدلفة عند حلول المساء، وكان الفضل ملازمًا لهما وهما راكبان، فاطَّلع الفضل على تفاصيل فعله صلى الله عليه وسلم، والله أعلم.وأخرجه البيهقي 5/ 126 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو طاهر السِّلَفي في "المشيخة البغدادية" (50) من طريق أحمد بن محمد بن شيبة البزار، عن رجاء بن مُرجّا النيسابوري، عن أيوب بن سليمان، به مختصرًا بذكر الجمع بين الصلاتين في المزدلفة.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (371)، والبزار (2163)، والطبراني في "الكبير" 18/ (690) من طرق عن إسماعيل بن أبي أويس، عن أخيه أبي بكر، به. وقال أبو موسى المديني: هذا حديث صحيح. قلنا: سقط في رواية البزار ذكر العباس بن عبد المطلب بين عبد الله بن العباس وأخيه الفضل، وهو وهمٌ في رواية إسماعيل بن أبي أويس، على أنَّ عبد الله بن عباس قد سمع من أخيه هذا الخبر، لكنه بهذا السياق من رواية العباس عن ابنه الفضل.أما حديث عبد الله بن عباس عن أخيه، فقد أخرجه أحمد 3/ (1794) و (1821)، ومسلم (1282)، والنسائي (4050) من طريق ابن جُريج، وأحمد (1796)، ومسلم (1282)، والنسائي (4042)، وابن حبان (3872) من طريق الليث بن سعد، وابن حبان (3855) من طريق عمروبن الحارث، ثلاثتهم عن أبي الزبير، عن أبي مَعْبَد، عن عبد الله بن عباس، عن أخيه الفضل بن عباس. ليس فيه ذكر العباس بن عبد المطُلَّب. وبعضهم يزيد فيه على بعض.وانظر ما تقدَّم برقم (1715) و (1729).
[2] حديث عطاء - وهو ابن أبي رباح - عن عبد الله بن عباس عن أخيه الفضل عند البخاري برقم (1685) ومسلم برقم (1281) (267)، لكن بالتلبية حتى رمى الجمرة فقط، وأما الأمر بالسكينة فهي عند مسلم وحده دون البخاري من حديث أبي معبد عن عبد الله بن عباس عن أخيه كما سبق في تخريج الحديث. النبي صلى الله عليه وسلم أردف أسامة من عرفة إلى جمع، وكذلك قال أسامة: أردفني النبي صلى الله عليه وسلم، فقلتُ: الصلاة فقال: "الصلاة أمامك"، ثم أردف الفضل من جمع إلى منى … ثم ذكره عن ابن عباس.وأخرجه البخاري في "صحيحه" (1671) من طريق عمرو بن أبي عمرو مولى المطَّلب، عن سعيد بن جبير، حدثني ابن عباس: أنه دفع مع النبي صلى الله عليه وسلم يوم عرفة، فسمع النبيُّ صلى الله عليه وسلم وراءه زجرًا شديدًا، وضربًا وصوتًا للإبل، فأشار بسوطه إليهم، وقال: "أيها الناس، عليكم بالسكينة، فإنَّ البر ليس بالإيضاع". هكذا ليس فيه أنَّ ابن عباس كان رديفَ النبي صلى الله عليه وسلم، وليس فيه أيضًا أنه سمع النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقوله، وقد ذكر الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 5/ 511 عند شرح الحديث (1666): أنَّ مسلمًا روى من طريق عطاء عن ابن عباس عن أسامة في أثناء حديث، قال: فما زال يسير على هينته حتى أتى جمعًا. قال الحافظ: وهذا يُشعر بأنَّ ابن عباس إنما أخذه عن أسامة. قلنا: ويدل عليه أيضًا رواية مقسم عند ابن عباس عن أسامة المتقدمة برقم (1727)، وعلى ذلك تدل أيضًا رواية قيس بن سعد عن عطاء بن أبي رباح عن ابن عباس عن أسامة عند أحمد 36/ (21756) وغيره.وأخرجه النسائي (4001) من طريق أبي غطفان بن طريف أنه سمع ابن عباس يقول: لما دَفَعَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم شَنَق ناقتَه حتى إن رأسها ليمسُّ واسطة الرحل، وهو يقول للناس: "السكينة السكينة" عشية عرفة. كذلك ليس فيه ذكر الارتداف.
5281 - حدثنا أبو الطيِّب الشَّعِيري محمد بن عبد الله، حدثنا مَحمِش بن عِصام، حدثنا حفص بن عبد الله، حدثني إبراهيم بن طَهْمان عن الحسن بن عُمارة، عن الحَكَم بن عُتَيبة، عن طاووس، عن ابن عباس. وعَديّ بن ثابت، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عباس: أنه كان رَدِيفَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم ليلةَ جَمْعٍ، فلما أفاضَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم قال: "أيُّها الناسُ، عليكم بالسَّكينة، فإنَّ البِرَّ ليس بإيضاعِ الخيلِ والإبلِ" [1]. ذكرُ مناقب شُرَحْبيل بن حَسَنةَ رضي الله عنه -
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মুযদালিফার রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে আরোহী ছিলেন। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখান থেকে রওনা হলেন, তখন তিনি বললেন: "হে লোকসকল! তোমরা শান্ত ও ধীরস্থির থাকো। কেননা পুণ্য ঘোড়া ও উটকে দ্রুত হাঁকিয়ে নিয়ে যাওয়ার মধ্যে নিহিত নয়।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح دون قوله: أنه كان رديف رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلة جَمْع، يعني المزدلفة، وهذا إسناد ضعيف جدًّا من أجل الحسن بن عُمارة، وقد وهم في إسناده ومتنه هنا، فأما وهمه في الإسناد فذكْرُه طاووسًا وإنما يرويه الحكم بن عُتيبة عن مقسم عن ابن عباس كما تقدَّم تخريجه برقم (1727)، وأما وهمه في متنه ففي قوله: عن ابن عباس أنه كان رديف رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلة جمع، لأنَّ المعروف أنَّ الذي كان رديف النبي صلى الله عليه وسلم ليلة جمع إنما هو أسامة بن زيد، يعني من عرفة إلى المزدلفة، قال البخاري في "تاريخه الأوسط" 3/ 201: المستفيض عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم أردف أسامة من عرفة إلى جمع، وكذلك قال أسامة: أردفني النبي صلى الله عليه وسلم، فقلتُ: الصلاة فقال: "الصلاة أمامك"، ثم أردف الفضل من جمع إلى منى … ثم ذكره عن ابن عباس.وأخرجه البخاري في "صحيحه" (1671) من طريق عمرو بن أبي عمرو مولى المطَّلب، عن سعيد بن جبير، حدثني ابن عباس: أنه دفع مع النبي صلى الله عليه وسلم يوم عرفة، فسمع النبيُّ صلى الله عليه وسلم وراءه زجرًا شديدًا، وضربًا وصوتًا للإبل، فأشار بسوطه إليهم، وقال: "أيها الناس، عليكم بالسكينة، فإنَّ البر ليس بالإيضاع". هكذا ليس فيه أنَّ ابن عباس كان رديفَ النبي صلى الله عليه وسلم، وليس فيه أيضًا أنه سمع النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقوله، وقد ذكر الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 5/ 511 عند شرح الحديث (1666): أنَّ مسلمًا روى من طريق عطاء عن ابن عباس عن أسامة في أثناء حديث، قال: فما زال يسير على هينته حتى أتى جمعًا. قال الحافظ: وهذا يُشعر بأنَّ ابن عباس إنما أخذه عن أسامة. قلنا: ويدل عليه أيضًا رواية مقسم عند ابن عباس عن أسامة المتقدمة برقم (1727)، وعلى ذلك تدل أيضًا رواية قيس بن سعد عن عطاء بن أبي رباح عن ابن عباس عن أسامة عند أحمد 36/ (21756) وغيره.وأخرجه النسائي (4001) من طريق أبي غطفان بن طريف أنه سمع ابن عباس يقول: لما دَفَعَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم شَنَق ناقتَه حتى إن رأسها ليمسُّ واسطة الرحل، وهو يقول للناس: "السكينة السكينة" عشية عرفة. كذلك ليس فيه ذكر الارتداف.
5282 - حدثني أبو بكر بن بالَوَيهِ، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حدثنا مصعب بن عبد الله الزُّبيري، قال: شُرحبيل بن حَسَنة، قيل: أمُّه كانت تحت سفيان بن مَعْمَر بن حَبيب بن وَهْب بن حُذَافة بن جُمَح، وهاجرت مع سفيان، وأما شُرحبيلَ: فهو ابن [1] عبد الله بن عمرو بن المُطَاع [2] من اليمن، وسفيان هذا هو جَمِيل بن مَعْمَر، وكان يُقال لجميل: ذو القَلْبين، من عقلِه، حتى قال الله: {مَا جَعَلَ اللهُ لِرَجُلٍ مَّن قَلْبَيْنِ فِي جَوْفِهِ} [الأحزاب: 4]، وشهِدَ مع رسولِ الله صلى الله عليه وسلم حُنينًا، ومات شُرحبيل بن حَسَنةَ يومَ اليرموك في خلافة عمر سنة ثمانَ عشرةَ [3].
মুস'আব ইবন আব্দুল্লাহ আয-যুবাইরি থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: শুরুহবীল ইবন হাসানা। বলা হয়: তাঁর মাতা সুফিয়ান ইবন মা‘মার ইবন হাবীব ইবন ওয়াহব ইবন হুذاফা ইবন জুমাহ-এর অধীনে ছিলেন এবং তিনি সুফিয়ানের সাথে হিজরত করেছিলেন। আর শুরুহবীল হলেন ইয়ামেনের আব্দুল্লাহ ইবন আমর ইবন আল-মুতা‘-এর পুত্র। এই সুফিয়ানই হলেন জামিল ইবন মা‘মার। জামিলকে তাঁর বুদ্ধিমত্তার কারণে 'যু আল-কালবাইন' (দুই হৃদয়ের অধিকারী) বলা হতো, যতক্ষণ না আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "আল্লাহ কোনো মানুষের অভ্যন্তরে দুটি হৃদয় স্থাপন করেননি।" [সূরা আল-আহযাব: ৪] তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে হুনাইনের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেন। আর শুরুহবীল ইবন হাসানা ইয়ারমুকের দিন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতকালে আঠারো হিজরী সনে ইন্তিকাল করেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: أبو، والتصويب من "نسب قريش" لمصعب الزبيري ص 395، حيث جاء فيه: وأما أبو شرحبيل فهو عبد الله بن عمرو بن المطاع. وكذلك سماه الزبير بن بكار ابن أخي مصعب الزبيري كما في "تاريخ دمشق" 22/ 467، حيث قال: شرحبيل بن عبد الله بن عمرو بن المطاع، فاتفق هو وعمُّه مصعب في تسمية شرحبيل، على أنَّ كنية شرحبيل في رواية الأكثرين أبو عبد الله. حزم في كتبه، وهو خلاف قول سائر من ترجم لشرحبيل، حيث قالوا هو شرحبيل بن عبد الله بن المطاع بن عمرو، بتقديم المطاع على عمرو، فالله أعلم.
[2] كذلك سماه مصعب بن عبد الله الزبيري، ووافقه ابن أخيه الزبير بن بكار، وتبعهم ابن حزم في كتبه، وهو خلاف قول سائر من ترجم لشرحبيل، حيث قالوا هو شرحبيل بن عبد الله بن المطاع بن عمرو، بتقديم المطاع على عمرو، فالله أعلم.
5282 [3] - وهو في "نسب قريش" لمصعب بن عبد الله الزبيري، لكن دون ذكر وفاة شرحبيل. وقال مصعب فيه، وكانت تحته (أي تحت سفيان بن معمر الجمحي) حَسَنة التي ينسب إليها شرحبيل، وكان سفيانُ تبنّى شُرحبيلَ وتبنَّتُه حَسَنةُ، وليس بابن لواحد منهما. كذا قال مصعب الزبيري هناك، وهو خلاف قوله هنا حديث أطلق أنها أمُّه وفاقًا لقول سائر من ترجم له، والله أعلم.وقد وقع في ذكر وفاة شرحبيل هنا خطأ شنيع، وهو قوله: مات يوم اليرموك سنة ثمان عشرة، وما قال أحدٌ بأنَّ اليرموك كانت سنة ثمان عشرة، ومعلوم أنَّ شرحبيل إنما مات في طاعون عمواس سنة ثمان عشرة، فلعلَّ قوله هنا: يوم اليرموك سبق قلم، والله أعلم، ومنشؤه أنَّ شُرحبيل بن حَسَنة كان أحد أمراء جيش المسلمين يوم اليرموك، فسبق القلم إلى ذكر اليرموك في وفاة شرحبيل، وإنما أراد طاعون عمواس، فهو الذي كان سنة ثمان عشرة، ولشرحبيل فيه خطبة مرويّة ستأتي برقم (5288). مع شرحبيل بن حسنة، وتقدَّم موصولًا برقم (2776) عن أم حبيبة نفسِها، ومقتضاه أنَّ شُرحبيل كان من مهاجري الحبشة.
5283 - أخبرنا أبو عبد الله الأصبهاني، حدثنا الحَسن، حدثنا الحُسين، حدثنا محمد بن عُمَر، قال: وشُرحبيل بن حَسَنة وحسنةُ أمُّه، وهي عَدَوْلِيَّة، وأبو شُرحبيل: عبد الله بن المُطاع بن عمرو، من كِنْدة حليفٌ لبني زُهرة، يكنى أبا عبد الله، وهو من مُهاجري الحبشة الهجرةَ الثانية [1].
৫২৮৩ - আবু আব্দুল্লাহ আল-আসবিহানী আমাদের অবহিত করেছেন, তিনি আল-হাসান থেকে, তিনি আল-হুসাইন থেকে, তিনি মুহাম্মাদ ইবনে উমার থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আর শুরাহবীল ইবনু হাসানা। হাসানা তার মা। তিনি ছিলেন আদাওলিয়্যা গোত্রের। আর শুরাহবীল-এর বাবা হলেন আব্দুল্লাহ ইবনুল মুতাআ ইবনু আমর। তিনি কিনদাহ গোত্রের লোক এবং বানী যুহরাহ-এর মিত্র ছিলেন। তার কুনিয়াত ছিল আবু আব্দুল্লাহ। তিনি দ্বিতীয় হিজরতে হাবশার (আবিসিনিয়া) মুহাজিরদের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] الحسن: هو ابن الجَهْم، والحُسين: هو ابن الفَرج، ومحمد بن عمر: هو الواقدي.وقد ذكر ابن سعد في "طبقاته" 4/ 119 مثلَ قول الواقدي دون نسبته إليه غير أنه تحرَّف فيه لفظة: عَدَوليّة، إلى: عدوية.وقوله: عَدَوْلِيّة: نسبة إلى عَدَوْلَى من ناحية البحرين، كما قال مصعب الزبيري في "نسب قريش" ص 395.وسيأتي برقم (5286) من مرسل عُروة بن الزبير: أنَّ النجاشي بعث أم حبيبة إلى النبي صلى الله عليه وسلم مع شرحبيل بن حسنة، وتقدَّم موصولًا برقم (2776) عن أم حبيبة نفسِها، ومقتضاه أنَّ شُرحبيل كان من مهاجري الحبشة.
5284 - أخبرني الحُسين بن علي التَّمِيمي، حدثنا أحمد بن محمد بن الحسين، حدثنا عمرو بن زُرَارة، حدثنا زياد بن عبد الله البَكّائي، عن محمد بن إسحاق، في تسمية مَن هاجر إلى الحبشة: شُرحبيل بن حَسَنة، هاجرت أمُّه حَسَنةُ إلى أرض الحبشة مع زوجها سفيان بن مَعْمَر بن حبيب بن وَهْب بن حُذافة بن جُمَح [1].
মুহাম্মদ বিন ইসহাক থেকে বর্ণিত, যারা হাবশায় হিজরত করেছিলেন তাদের নাম উল্লেখ করার সময় তিনি বলেন: শুরাহবিল ইবন হাসনাহ। তাঁর মাতা হাসনাহ তাঁর স্বামী সুফিয়ান ইবন মা'মার ইবন হাবীব ইবন ওয়াহব ইবন হুذاফা ইবন জুমাহ-এর সাথে হাবশার ভূমিতে হিজরত করেছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "السيرة النبوية" لابن هشام 1/ 327 بروايته عن زياد البكائي. كما قدمنا بيانه برقم (2776)، وأنَّ وصله صحيح. عروة: هو ابن الزبير بن العوام.وأخرجه ابن الجارود (714)، وأبو بكر بن زياد النيسابوري في "زياداته على مختصر المزني" (443) عن محمد بن يحيى الذُّهلي، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (5061) عن فهد بن سليمان، ويحيى بن عثمان، ثلاثتهم عن نُعيم بن حماد به. موصولًا بذكر أم حبيبة.وتقدَّم عند المصنف برقم (2776) من طريق مُعلّى بن منصور عن ابن المبارك موصولًا كذلك.
5285 - أخبرني أحمد بن يعقوب، حدثنا موسى بن زكريا، حدثنا خليفة بن خَيّاط، قال: شُرحبيل بن عبد الله بن المُطاع بن عَمرو [1] بن عبد العُزَّى [2]، وأمُّه حَسَنةُ، وولاؤها لمَعمَر [3] بن حَبيب، وتوفي شُرحبيل بن حَسَنة في طاعون عَمَواس سنة ثمانَ عشرةَ، وهو ابن سبع وستين سنةً [4].
খলীফা ইবনে খাইয়্যাত থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: শুরাহবিল ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনুল মুতা ইবনে আমর ইবনে আব্দুল উযযা, আর তাঁর মাতা হাসানা, এবং তাঁর (হাসানার) আনুগত্য ছিল মা'মার ইবনে হাবীবের প্রতি। শুরাহবিল ইবনে হাসানা আঠারো হিজরী সনে আমওয়াস প্লেগের মহামারীতে ইন্তেকাল করেন, তখন তাঁর বয়স ছিল সাতষট্টি বছর।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: عمر. والتصويب من "الطبقات" لخليفة ص 295 و 298. كما قدمنا بيانه برقم (2776)، وأنَّ وصله صحيح. عروة: هو ابن الزبير بن العوام.وأخرجه ابن الجارود (714)، وأبو بكر بن زياد النيسابوري في "زياداته على مختصر المزني" (443) عن محمد بن يحيى الذُّهلي، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (5061) عن فهد بن سليمان، ويحيى بن عثمان، ثلاثتهم عن نُعيم بن حماد به. موصولًا بذكر أم حبيبة.وتقدَّم عند المصنف برقم (2776) من طريق مُعلّى بن منصور عن ابن المبارك موصولًا كذلك.
[2] تحرَّف في النسخ إلى: عبد العزيز، وضبب عليها في (ز)، والتصويب من "الطبقات". كما قدمنا بيانه برقم (2776)، وأنَّ وصله صحيح. عروة: هو ابن الزبير بن العوام.وأخرجه ابن الجارود (714)، وأبو بكر بن زياد النيسابوري في "زياداته على مختصر المزني" (443) عن محمد بن يحيى الذُّهلي، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (5061) عن فهد بن سليمان، ويحيى بن عثمان، ثلاثتهم عن نُعيم بن حماد به. موصولًا بذكر أم حبيبة.وتقدَّم عند المصنف برقم (2776) من طريق مُعلّى بن منصور عن ابن المبارك موصولًا كذلك.
5285 [3] - تحرَّف في (ص) إلى: لعمر، وفي (ز) و (م) و (ب) إلى: لعثمان. والتصويب من "الطبقات". كما قدمنا بيانه برقم (2776)، وأنَّ وصله صحيح. عروة: هو ابن الزبير بن العوام.وأخرجه ابن الجارود (714)، وأبو بكر بن زياد النيسابوري في "زياداته على مختصر المزني" (443) عن محمد بن يحيى الذُّهلي، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (5061) عن فهد بن سليمان، ويحيى بن عثمان، ثلاثتهم عن نُعيم بن حماد به. موصولًا بذكر أم حبيبة.وتقدَّم عند المصنف برقم (2776) من طريق مُعلّى بن منصور عن ابن المبارك موصولًا كذلك.
5285 [4] - وهو في "الطبقات" لخليفة بن خياط ص 298، دون ذكر وفاة شرحبيل وسنّه يوم مات.لكن أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 22/ 466 من طريق أبي حفص الأهوازي - وهو عمر بن أحمد بن إسحاق - عن خليفة بن خياط، فذكره، وذكر وفاة شرحبيل لكن دون سنِّه يوم مات. وما قيل في سنَّه أنه كان ابنَ سبع وستين، فهو قول ابن سعد أيضًا كما في "طبقاته الكبرى" 4/ 119، وقول ابن حبان في "ثقاته" 3/ 187، وأسنده أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (3711) عن إبراهيم بن المنذر، و (3709) عن يحيى بن بُكَير. كما قدمنا بيانه برقم (2776)، وأنَّ وصله صحيح. عروة: هو ابن الزبير بن العوام.وأخرجه ابن الجارود (714)، وأبو بكر بن زياد النيسابوري في "زياداته على مختصر المزني" (443) عن محمد بن يحيى الذُّهلي، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (5061) عن فهد بن سليمان، ويحيى بن عثمان، ثلاثتهم عن نُعيم بن حماد به. موصولًا بذكر أم حبيبة.وتقدَّم عند المصنف برقم (2776) من طريق مُعلّى بن منصور عن ابن المبارك موصولًا كذلك.
5286 - أخبرنا محمد بن القاسم بن عبد الرحمن العَتَكي، حدثنا الفضل بن محمد الشَّعْراني، حدثنا نُعيم بن حماد، حدثنا ابن المُبارك، عن معمر، عن الزُّهْرِي، عن عُرْوة: أنَّ النجاشي بعث أمَّ حَبيبة إلى النبيِّ صلى الله عليه وسلم مع شُرحْبيلَ بن حَسَنةَ [1].
উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নাজ্জাশী (বাদশাহ) শুরাহবীল ইবনু হাসনাহর সাথে তাঁকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রেরণ করেছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم، لكنه اختُلف في إرساله ووصله بذكر أم حبيبة كما قدمنا بيانه برقم (2776)، وأنَّ وصله صحيح. عروة: هو ابن الزبير بن العوام.وأخرجه ابن الجارود (714)، وأبو بكر بن زياد النيسابوري في "زياداته على مختصر المزني" (443) عن محمد بن يحيى الذُّهلي، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (5061) عن فهد بن سليمان، ويحيى بن عثمان، ثلاثتهم عن نُعيم بن حماد به. موصولًا بذكر أم حبيبة.وتقدَّم عند المصنف برقم (2776) من طريق مُعلّى بن منصور عن ابن المبارك موصولًا كذلك.
5287 - أخبرنا أبو عبد الله الأصبَهاني، حدثنا الحَسن بن الجَهْم، حدثنا الحُسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عُمر، قال: كان شرحبيل بن حَسَنة من أصحابِ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، وغزا معه غَزَواتٍ، وهو أحدُ الأمراءِ الذين عَقَدَ لهم أبو بكر الصِّدِّيق على الشام [1].
মুহাম্মাদ বিন উমার থেকে বর্ণিত, শুরাহবিল ইবনু হাসানা ছিলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের অন্তর্ভুক্ত এবং তিনি তাঁর (রাসূলের) সাথে অনেকগুলো যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন। তিনি সেইসব আমীরদের (নেতাদের) একজন যাদেরকে আবূ বকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শামের (সিরিয়ার) জন্য পতাকা বেঁধে দিয়েছিলেন (নিয়োগ করেছিলেন)।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "الطبقات الكبرى" لابن سعد 4/ 119 عن محمد بن عمر الواقدي. الترغيب والترهيب (2169) لكن بذكر خطبة معاذ بن جبل عن الطاعون وقوله مثل ما قاله شرحبيل هنا.
5288 - أخبرني حامد بن محمد الهَرَوي، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا مُسلم بن إبراهيم، حدثنا هَمّام، حدثنا قَتَادة ومَطَر الوَرّاق، عن شهر بن حَوشَب، عن عبد الرحمن بن غَنْم، قال: وقع الطاعون بالشام، فخَطَبَنا عمرو بن العاص، فقال: إنَّ هذا الطاعونَ رِجْسٌ فَفِرُّوا منه في الأودية والشَّعاب، فبلغ ذلك شُرحبيلَ بنَ حَسَنة، فقال: كَذَب عمرٌو؛ صحبتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم وعمرٌو أضلُّ من جَمَلِ أهلِه، ولكنه رحمةُ ربِّكم، ودعوةُ نَبيِّكم صلى الله عليه وسلم، ووفاةُ الصالحين قَبلَكم [1]. ذكرُ مناقب أبي جَنْدل بن سُهيل بن عَمرو رضي الله عنه -
আব্দুর রহমান ইবনে গানম থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: শামে (সিরিয়ায়) যখন প্লেগ (মহামারি) দেখা দিল, তখন আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের উদ্দেশ্যে খুতবা দিলেন। তিনি বললেন, এই মহামারি একটি অপবিত্রতা (রিজস)। অতএব, তোমরা এর থেকে উপত্যকা ও পাহাড়ি পথে পালিয়ে যাও। এই সংবাদ শুরাহবিল ইবনে হাসানা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পৌঁছালে তিনি বললেন, আমর মিথ্যা বলেছে। আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহচর্য লাভ করেছি, আর আমর তার পরিবারের উটের চেয়েও বেশি পথভ্রষ্ট। বরং এটি তোমাদের রবের রহমত, তোমাদের নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু'আ এবং তোমাদের পূর্বেকার নেককারদের মৃত্যু।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل شهر بن حوشب، وقد روى هذا الخبر من وجهين آخرين قويين. همام: هو ابن يحيى العَوْذي، وقتادة: هو ابن دِعامة السَّدُوسي، ومَطَر الورّاق: هو ابن طَهْمان.وأخرجه أحمد 29/ (17753) عن عبد الصمد بن عبد الوارث، عن همام، عن قتادة وحده، به.وأخرجه أحمد 29/ (17754) و (17755)، وابن حبان (2951) من طريق شرحبيل بن شفعة، عن عمرو بن العاص، وإسناده قوي.وأخرجه أحمد 29 / (17756) من طريق أبي المنيب الأحدب، أنَّ عمرو بن العاص قال في الطاعون … وصحَّح إسنادَه ابن حجر في "فتح الباري" 17/ 525، وجوَّده من قبله المنذريُّ في الترغيب والترهيب (2169) لكن بذكر خطبة معاذ بن جبل عن الطاعون وقوله مثل ما قاله شرحبيل هنا.
5289 - أخبرني أحمد بن يعقوب، حدثنا موسى بن زكريا، حدثنا خَليفة بن خيّاط قال: أبو جَنْدل بن سُهيل بن عَمرو اسمه: عبد الله بن سُهيل بن عمرو بن عبد شَمْس بن نَصْر بن مالك بن حِسْل بن عامر بن لُؤي، وأم أبي جَنْدل: فاخِتة من بني نَوفَل بن عبد مَناف، شهد بدرًا وكان مع المشركين، فلما نزل ببدرٍ هربَ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، استُشهِد يومَ اليَمامَة [1].هكذا وجدتُ وفاته في تاريخ "شَبَابٍ" وأظنه واهمًا في وقت وفاته.
খালীফা ইবনু খাইয়্যাত থেকে বর্ণিত: আবূ জান্দাল ইবনু সুহাইল ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নাম হলো: আবদুল্লাহ ইবনু সুহাইল ইবনু আমর ইবনু আবদ শামস ইবনু নাসর ইবনু মালিক ইবনু হিসল ইবনু আমির ইবনু লুআই। আর আবূ জান্দালের মাতা ছিলেন ফাখিতা, যিনি বনূ নাওফাল ইবনু আবদ মানাফ গোত্রের। তিনি বদরে উপস্থিত ছিলেন, যখন তিনি মুশরিকদের সাথে ছিলেন। কিন্তু যখন তিনি বদরের সন্নিকটে অবতরণ করলেন, তখন তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে পালিয়ে এলেন। তিনি ইয়ামামার যুদ্ধে শাহাদাত বরণ করেন। [১] এভাবেই আমি তাঁর মৃত্যুর সময় ‘শাবাব’-এর তারীখে পেয়েছি। তবে আমি মনে করি, তাঁর মৃত্যুর সময় নিয়ে তিনি ভুল করেছেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] هو في "طبقات خليفة" ص 26 - 27. قال: أفلت أبو جندل، فذكره. وعاصم بن عمر تابعي، فالخبر مرسل، والراوي عنه لا يُعرف روى عنه غير الواقدي، وعلى أي حالٍ فالخبر صحيح مشهور عند أهل السير والمغازي، وهو عند البخاري (2731) من رواية الزهري، عن عروة بن الزبير، عن المسور بن مخرمة ومروان بن الحكم، لكن دون قصة موت أبي بصير، ورجوع تلك العصابة المقاتلة إلى المدينة مع أبي جندل.لكن أخرجه بتمامه الطبري في "تاريخه" 2/ 638 - 639 من رواية محمد بن إسحاق، والبيهقي في "دلائل النبوة" 4/ 172 - 175 من طريق موسى بن عقبة، كلاهما عن الزهري مرسلًا.وأخرجه البيهقي في "الدلائل" 4/ 175 - 176 من طريق أبي الأسود يتيم عروة بن الزبير، عن عروة مرسلًا.وأخرجه البيهقي أيضًا 4/ 172 - 175 من طريق أخرى عن موسى بن عقبة مرسلًا. وهو في "سننه الكبرى" كذلك من تلك الطريق نفسها 9/ 227، لكنه لم يسُقْه بتمامه.والعِيص، بكسر العين وسكون التحتانية: وادٍ لجُهينة بين المدينة والبحر، يصبُّ في إِضَم من اليسار من أطراف جبل الأجرد الغربية ومن الجبال المتصلة. انظر "معجم المعالم الجغرافية في السيرة النبوية" لعاتق البلادي ص 219.
5290 - فقد حدّثَناه أبو عبد الله الأصبهاني، حدثنا الحَسن، حدثنا الحُسين، حدثنا محمد بن عمر، قال: أبو جَنْدل بن سُهيل بن عَمرو أسلَمَ قديمًا بمكة، فحَبَسه أبوهُ سهيلُ بن عمرو، وأوثَقَه في الحديدِ ومَنَعَه الهجرةَ، فلما نزلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم الحُدَيبِيَة وأتاه سُهيل بن عمرو، فقَاضَاهُ على ما قَاضاه عليه أقبلَ أبو جَنْدل يَرسُفُ في قُيودِه إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فردَّه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إلى أبيه؛ لأنَّ الصُّلْح كان بينَهم، ثم أفْلَتَ بعد ذلك فلَحِق بأبي بَصِير، وهو بالعِيْص، وقد تجَمَّع إليه جماعةٌ من المسلمين، وكانوا كلما مَرّت بهم عِيرٌ لقريش اعترَضُوها، فقَتَلُوا مَن قَدَرُوا عليه منهم، وأخَذُوا ما قَدَرُوا عليه من مَتاعِهم، فلم يَزَلْ أبو جَنْدل مع أبي بَصِير، حتى مات أبو بَصير، فقَدِمَ أبو جَنْدل ومن كان معه من المسلمين المدينة على عهدِ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلم يَزَلْ يَعْزُو معه ويجاهد بعدَه في سبيل الله، حتى مات بالشام في طاعون عَمَواسَ سنة ثمانَ عشرةَ، في خلافة عُمر بن الخطاب [1]. ذكرُ مناقب الحارث بن هشام المَخزُومي رضي الله عنه -
মুহাম্মদ ইবনে উমর থেকে বর্ণিত, আবু জান্দাল ইবনে সুহাইল ইবনে আমর মক্কায় পূর্বেই ইসলাম গ্রহণ করেছিলেন, কিন্তু তার পিতা সুহাইল ইবনে আমর তাকে বন্দী করে রেখেছিলেন, তাকে শিকল দিয়ে বেঁধে রেখেছিলেন এবং হিজরত করা থেকে বিরত রেখেছিলেন। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হুদায়বিয়ায় অবতরণ করলেন এবং তার কাছে সুহাইল ইবনে আমর এলেন, তখন তিনি তাদের মধ্যে যে সন্ধি করেছিলেন তার ওপর সুহাইলকে সম্মত করালেন। (এমন সময়) আবু জান্দাল শিকল পরা অবস্থায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে আসতে লাগলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে তার পিতার কাছে ফিরিয়ে দিলেন; কারণ তাদের মধ্যে (এই মর্মে) সন্ধি হয়েছিল। এরপর তিনি সেখান থেকে পালিয়ে গেলেন এবং আবু ব়াসীরের সাথে গিয়ে যোগ দিলেন, যিনি ‘ঈস’ নামক স্থানে ছিলেন। সেখানে মুসলিমদের একটি দল তার কাছে একত্রিত হয়েছিল। যখনই কুরাইশদের কোনো কাফেলা তাদের পাশ দিয়ে যেত, তারা সেটিকে আটক করত, তাদের মধ্যে যাদেরকে পারতেন হত্যা করতেন এবং তাদের যে সম্পদ পেতেন তা ছিনিয়ে নিতেন। আবু জান্দাল আবু ব়াসীরের সাথে ছিলেন, যতক্ষণ না আবু ব়াসীর মারা যান। এরপর আবু জান্দাল এবং তার সাথে থাকা মুসলিমগণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে মদীনায় আগমন করলেন। এরপর থেকে তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে যুদ্ধাভিযানে অংশ নিতেন এবং তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পরেও আল্লাহর পথে জিহাদ করেন, অবশেষে তিনি আঠারো (১৮) হিজরিতে উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতকালে আমওয়াসের প্লেগে আক্রান্ত হয়ে শামে (সিরিয়ায়) ইন্তিকাল করেন। আল-হারিথ ইবনে হিশাম আল-মাখযূমী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মর্যাদাসমূহ আলোচনা প্রসঙ্গে—
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] قد روى مثلَ هذا الخبرِ ابن سعد في "طبقاته" 5/ 94 عن محمد بن عمر الواقدي، لكن أسنده الواقدي، فقال: أخبرنا عمر بن عقبة بن أبي عائشة الليثي، عن عاصم بن عمر بن قتادة، قال: أفلت أبو جندل، فذكره. وعاصم بن عمر تابعي، فالخبر مرسل، والراوي عنه لا يُعرف روى عنه غير الواقدي، وعلى أي حالٍ فالخبر صحيح مشهور عند أهل السير والمغازي، وهو عند البخاري (2731) من رواية الزهري، عن عروة بن الزبير، عن المسور بن مخرمة ومروان بن الحكم، لكن دون قصة موت أبي بصير، ورجوع تلك العصابة المقاتلة إلى المدينة مع أبي جندل.لكن أخرجه بتمامه الطبري في "تاريخه" 2/ 638 - 639 من رواية محمد بن إسحاق، والبيهقي في "دلائل النبوة" 4/ 172 - 175 من طريق موسى بن عقبة، كلاهما عن الزهري مرسلًا.وأخرجه البيهقي في "الدلائل" 4/ 175 - 176 من طريق أبي الأسود يتيم عروة بن الزبير، عن عروة مرسلًا.وأخرجه البيهقي أيضًا 4/ 172 - 175 من طريق أخرى عن موسى بن عقبة مرسلًا. وهو في "سننه الكبرى" كذلك من تلك الطريق نفسها 9/ 227، لكنه لم يسُقْه بتمامه.والعِيص، بكسر العين وسكون التحتانية: وادٍ لجُهينة بين المدينة والبحر، يصبُّ في إِضَم من اليسار من أطراف جبل الأجرد الغربية ومن الجبال المتصلة. انظر "معجم المعالم الجغرافية في السيرة النبوية" لعاتق البلادي ص 219.
5291 - Null
5291 - حدثنا أبو عبد الله الأصبَهاني، حدثنا الحسن بن الجَهْم، حدثنا الحُسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر، قال: الحارث بن هشام بن المُغيرة بن عبد الله بن عُمر بن مَخزوم.
৫২৯১ - আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আবু আবদুল্লাহ আল-আসবাহানি, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আল-হাসান ইবনু আল-জাহম, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আল-হুসাইন ইবনু আল-ফারাজ, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু উমর, তিনি বলেন: আল-হারিস ইবনু হিশাম ইবনু আল-মুগীরাহ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু উমর ইবনু মাখযূম।
5292 - فحدثني [1] سَلِيط بن مُسلم، عن عبد الله بن عِكرمة، قال: لما كان يومُ الفَتحِ دخَل الحارثُ بن هشام وعبدُ الله بن أبي رَبيعة على أم هانئ بنت أبي طالب، فاستَجَارا بها، فقالا: نحن في جِوارِكِ، فأجارتْهما، فدخل عليهما عليُّ بن أبي طالب، فنظر إليهما، فشَهَرَ عليهما السيفَ، فتفَلَّتَ عليهما، واعتَنقَتْه، وقالت: تصنعُ بي هذا من بين الناس لَتبدَأنّ بي قَبلَهما، فقال: تُجِيرين المشركين؟! فخرج، قالت أم هانئ: فأتيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فقلتُ: يا رسول الله، ما لقيتُ من ابن أُمِّي عليَّ، ما كِدتُ أُفلِتُ منه؛ أجَرْتُ حَمَوينِ لي من المشركين، فتفلَّتَ عليهما ليقتُلَهما، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما كان ذلك له، قد أَجَرْنا مَن أجرتِ، وأَمَّنا مَن أُمَّنْتِ" فرجعتْ إليهما فأخبرتْهُما، فانصرفا إلى منازِلهما، فقيل لرسول الله صلى الله عليه وسلم: الحارثُ بنُ هشام وعبد الله بنُ أبي رَبيعة جالسان في نادِيهِما مُفتَضِلَين [2] في المُلاء المزَعْفَر، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا سبيلَ إليهما، قد أمَّناهما". قال الحارث بن هشام: وجعلتُ استَحْيي أن يَراني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وأُنكِرُ رؤيتَه إيّاي في كل مَوطِن مع المشركين، ثم أذكر بِرَّه ورحمته، فألقاهُ وهو داخلٌ المسجدَ فتلَقَّاني بالبِشْر، ووقف حتى جئتُه، فسلَّمتُ عليه وشَهِدتُ شهادةَ الحقِّ، فقال: "الحمدُ لله الذي هداك، ما كان مِثلُك يَجهَلُ الإسلامَ". قال الحارث: فوالله ما رأيتُ مثلَ الإسلامِ جُهِلَ [3].5292/ 1 - قال ابن عمر: وحدثني الضّحّاك بن عثمان، أخبرني عبد الله بن عُبيد بن عُمير، سمعت عبد الرحمن بن الحارث بن هشام يحدِّث عن أبيه، قال: رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم في حَجَّته وهو واقفٌ على راحلتِه، وهو يقول: "والله إنك لخَيرُ الأرض، وأحبُّ الأرض إلى الله، ولولا أني أُخرِجتُ منكِ ما خَرَجتُ"، قال: فقلتُ: يَا لَيتَنا لم نَفعَلْ، فارجِع إليها، فإنها مُنْيتُك ومَولدُك، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إني سألتُ ربّي عز وجل، فقلتُ: اللهمّ إنك أخرجْتَني من أحبِّ أرضِك إليَّ، فأنزِلْني أحبَّ أرضِك إليكَ، فأنزَلَني المدينةَ" [4].5292/ 2 - قال ابن عُمر: ولم يزل الحارث مقيمًا بمكة بعد أن أسلم، حتى تُوفِّي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فلما جاء كتابُ أبي بكر الصديق يَستنفِرُ المسلمين إلى غَزْوِ الروم قَدِم الحارثُ بن هشام وعِكْرمةُ بن أبي جهل وسهيلُ بن عمرو على أبي بكر المدينة، فأتاهم في مَنازلِهم فرحَّب بهم، وسلَّم عليهم، وسُرَّ بمَكانِهم، ثم خَرجُوا مع المسلمين غُزاةً إلى الشام، فشهد الحارثُ بن هشام فِحْلَ وأجْنادِينَ، ومات بالشام في طاعون عَمَواس سنة ثمانَ عشرةَ، فَخَلَفَ عمرُ بنُ الخطاب على امرأتِه فاطمة بنت الوليد بن المغيرة، وهي أم عبد الله بن الحارث، وكان عبد الرحمن يقول: ما رأيتُ ربيبًا خيرًا من عمر بن الخطاب، وكان عبد الرحمن بن الحارث بن هشام من أشرافِ قُريش [5].
উম্মে হানি বিনতে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
যখন মক্কা বিজয়ের দিন এলো, হারিস ইবনে হিশাম এবং আব্দুল্লাহ ইবনে আবি রাবিয়া উম্মে হানি বিনতে আবি তালিবের কাছে প্রবেশ করে আশ্রয় চাইলেন। তারা বললেন, ‘আমরা আপনার আশ্রয়ে আছি।’ তিনি তাদের আশ্রয় দিলেন। অতঃপর আলী ইবনে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের কাছে প্রবেশ করলেন এবং তাদের দেখতে পেলেন। তিনি তাদের দিকে তরবারি তাক করলেন এবং তাদের আক্রমণ করতে উদ্যত হলেন। (উম্মে হানি) তাকে জড়িয়ে ধরলেন এবং বললেন: আপনি সকলের মধ্যে শুধু আমার সাথেই এমন করছেন! আপনি বরং তাদের আগে আমার সাথে শুরু করবেন! তিনি (আলী) বললেন: তুমি মুশরিকদের আশ্রয় দিচ্ছো?! এরপর তিনি চলে গেলেন।
উম্মে হানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম এবং বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমার মায়ের ছেলে আলী আমার সাথে কী করল! আমি তার কাছ থেকে বাঁচতে পারছিলাম না; আমি আমার মুশরিক শ্বশুরপক্ষের দু’জনকে আশ্রয় দিয়েছিলাম, আর সে তাদের হত্যা করার জন্য তাদের আক্রমণ করতে উদ্যত হয়েছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “এটা তার জন্য ঠিক হয়নি। তুমি যাদেরকে আশ্রয় দিয়েছো, আমরাও তাদেরকে আশ্রয় দিলাম। তুমি যাদেরকে নিরাপত্তা দিয়েছো, আমরাও তাদেরকে নিরাপত্তা দিলাম।” এরপর তিনি (উম্মে হানি) তাদের দুজনের কাছে ফিরে গিয়ে তাদের খবর দিলেন। ফলে তারা দু’জন নিজ নিজ বাড়িতে ফিরে গেলেন।
এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলা হলো: হারিস ইবনে হিশাম এবং আব্দুল্লাহ ইবনে আবি রাবিয়া তাদের মজলিসে জাফরানি চাদরে সজ্জিত হয়ে বসে আছেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তাদের প্রতি কোনো পথ (আক্রমণ) নেই। আমরা তাদের নিরাপত্তা দিয়েছি।”
হারিস ইবনে হিশাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি লজ্জাবোধ করতে লাগলাম এই ভেবে যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে দেখবেন, এবং আমি মুশরিকদের সাথে জড়িত থাকার কারণে প্রতিটি পরিস্থিতিতে তাঁর আমাকে দেখতে পাওয়া অপছন্দ করতাম। এরপর আমি তাঁর সদাচার ও দয়ার কথা স্মরণ করলাম। আমি তাঁর সাথে দেখা করলাম যখন তিনি মাসজিদে প্রবেশ করছিলেন। তিনি হাসিমুখে আমার সাথে সাক্ষাৎ করলেন এবং আমি তাঁর কাছে আসা পর্যন্ত দাঁড়ালেন। আমি তাঁকে সালাম দিলাম এবং সত্যের সাক্ষ্য (কালিমা) প্রদান করলাম। তিনি বললেন: “আলহামদুলিল্লাহ (সকল প্রশংসা আল্লাহর), যিনি তোমাকে হেদায়েত করেছেন। তোমার মতো লোকের ইসলাম সম্পর্কে অজ্ঞ থাকা উচিত হয়নি।” হারিস বলেন: আল্লাহর শপথ, আমি ইসলামের মতো এমন কিছু দেখিনি যা (মানুষের দ্বারা) এভাবে অগ্রাহ্য (অজ্ঞাত) হয়েছে।
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এবং আমাকে যাহ্হাক ইবনে উসমান বর্ণনা করেছেন... আমি আব্দুর রহমান ইবনে হারিস ইবনে হিশামকে তাঁর পিতা (হারিস ইবনে হিশাম) থেকে বর্ণনা করতে শুনেছি। তিনি (হারিস) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর হজ্জে দেখলাম, যখন তিনি তাঁর উটের ওপর দাঁড়িয়েছিলেন এবং বলছিলেন: “আল্লাহর শপথ, তুমিই উত্তম ভূমি, আর আল্লাহর নিকট সবচেয়ে প্রিয় ভূমি। যদি আমাকে তোমার থেকে বের করে দেওয়া না হতো, তাহলে আমি বের হতাম না।” তিনি (হারিস) বলেন: আমি বললাম: হায়! যদি আমরা এমন না করতাম! আপনি আপনার আকাঙ্ক্ষিত ও জন্মস্থান মক্কায় ফিরে যান। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আমি আমার মহান রবের কাছে প্রার্থনা করেছিলাম এবং বলেছিলাম: হে আল্লাহ! আপনি আমাকে আপনার নিকট প্রিয়তম ভূমি থেকে বের করে দিয়েছেন, তাই আমাকে আপনার নিকট সবচেয়ে প্রিয় ভূমিতে স্থান দিন। ফলে তিনি আমাকে মদীনায় স্থান দিলেন।”
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: হারিস ইসলাম গ্রহণের পর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওফাত পর্যন্ত মক্কায় অবস্থান করতে থাকলেন। যখন আবু বকর সিদ্দিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পক্ষ থেকে রোম আক্রমণের জন্য মুসলিমদের আহ্বান জানিয়ে চিঠি এল, তখন হারিস ইবনে হিশাম, ইকরিমা ইবনে আবি জাহল এবং সুহাইল ইবনে আমর আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে মদীনায় আসলেন। তিনি (আবু বকর) তাদের আবাসস্থলে গিয়ে তাদের অভ্যর্থনা জানালেন, তাদের সালাম দিলেন এবং তাদের উপস্থিতিতে আনন্দিত হলেন। এরপর তারা মুসলিমদের সাথে শাম (সিরিয়া) অভিমুখে যুদ্ধে বের হলেন। হারিস ইবনে হিশাম ফাহল এবং আজনাদাইনের যুদ্ধে অংশ নিয়েছিলেন এবং আঠারো হিজরিতে আমওয়াসের মহামারীতে তিনি শামে মৃত্যুবরণ করেন। এরপর উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর স্ত্রী ফাতিমা বিনতে ওয়ালিদ ইবনে মুগীরার সাথে বিবাহবন্ধনে আবদ্ধ হন, যিনি ছিলেন আব্দুল্লাহ ইবনুল হারিসের মাতা। আব্দুর রহমান বলতেন: আমি উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চেয়ে উত্তম কোনো সৎপিতা দেখিনি। আর আব্দুর রহমান ইবনে হারিস ইবনে হিশাম ছিলেন কুরাইশের অন্যতম অভিজাত ব্যক্তি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] قائل ذلك هو محمد بن عمر الواقدي.
[2] المثبت من (م)، واضطربت بقية النسخ في رسمه. يقال: تفضَّل: إذا خالف اللابس بين أطراف ثوبيه على عاتقِه، أو لبس ثوبًا واحدًا. وتَفعَّل وافتعل يتناوبان مثل استمع تسمَّع، وادَّهن وتدهَّن.
5292 [3] - وهو في "الطبقات الكبرى" 6/ 83 - ومن طريقه أخرجه ابن عساكر 11/ 495 - 496 - عن محمد بن عمر الواقدي، به. وسَلِيط بن مُسلم لم يرو عنه غير الواقدي والقعنبي، ونسبه الواقدي إلى عامر بن لؤي، وشيخه عبد الله بن عكرمة - وهو ابن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام - من أتباع التابعين، فالخبر معضل، لكن للواقدي في قصة الجوار إسناد آخر متصل ذكره في "مغازيه" 2/ 830، ومن طريقه أخرجه الأزرقي في "أخبار مكة" 2/ 161 - 162، وتابعه عليه جماعةٌ عند أحمد 44/ (26892)، و 45 / (27380)، والنسائي (8631)، لكنه لم يقع في رواياتهم قصةُ إسلام الحارث بن هشام.وأصلُ قصّة إجارة أم هانئ في "الصحيحين" "صحيح البخاري" (357)، و "صحيح مسلم" (719) (82)، لكن بذكر إجارة رجلٍ واحدٍ غيرهما. وانظر كلام ابن حجر في "فتح الباري" 2/ 227.
5292 [4] - رجال إسناده من فوق الواقدي لا بأس بهم، لكن انفرد الواقدي بروايته بهذا الإسناد، ولم يتابعه عليه أحدٌ، بل جاء في روايته هذه بما يُنكر، وهو المرفوعُ في آخر الحديث الذي يعارِضُ المرفوعَ الذي في أوله، فصريحُ المرفوع في أوله أنَّ مكة هي أحب البقاع إلى الله، وصريح المرفوع في آخره أنَّ المدينة هي أحبُّ البقاع إلى الله، وكفى بهذا دليلًا على ضعف هذه الرواية، وقد روي هذا الحرفُ الأخير المرفوع مفردًا من حديث أبي هريرة كما تقدَّم عند المصنف برقم (4307)، لكن إسناده واهٍ بمرّة، بل حكم عليه الذهبي وغيره بالوضع. وكونُ مكةَ هي أحبَّ الأرض إلى الله صحيحٌ ثابتٌ كما تقدَّم بيانه عند الحديث (4307).وأخرج رواية الواقدي هذه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 6/ 84 عن محمد بن عمر الواقدي، بهذا الإسناد. ومن طريق ابن سعدٍ أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 11/ 492.
5292 [5] - وهو في "الطبقات الكبرى" لابن سعد 6/ 84 - 85 عن محمد بن عمر الواقدي.
5293 - أخبرني الحسن بن حَلِيم الدهقان بمَرُو، حدثنا محمد بن عمرو الفَزَاري، أخبرنا عَبْدان بن عُثمان، أخبرنا عبد الله بن المبارك، أخبرنا الأسود بن شَيبان، عن أبي نَوفَل بن أبي عَقْربٍ، قال: خرج الحارثُ بن هشام من مكة، فجَزعَ أهلُ مكة جزعًا شديدًا، ولم يَبْقَ أحدٌ إِلَّا خرج يُشيِّعه، حتى إذا كان بأعلى صُوَى [1] البطحاء، أو حيثُ شاء الله من ذلك، وقف ووقف الناسُ حولَه يبكون، فلما رأى جزعَ الناسِ، قال: يا أيُّها الناسُ، ما خرجتُ رغبةً بنفسي عن أنفُسِكم، ولا اختيارَ بلدٍ على بلدِكم، ولكن هذا الأمرَ قد كان خرج فيه رجالٌ من قريش، والله ما كانوا من ذوي أنسابِها، ولكن من بُيوتاتِها [2]، فأصبحتُ واللهِ لو أنَّ جِبالَ مكةَ ذهبًا فأَنفقْنا [3] في سبيل الله، ما أدرَكْنا من أيامِهم، وايْمُ اللهِ لئن بايَنُونا في الدنيا، لَنلْتمِسُ أن تُشارِكَهم في الأَجْر، فاتقى الله امرؤٌ خَرَج غازيًا [4] إلى الشام، فأُصيبَ شهيدًا [5].
হারিস ইবনে হিশাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মক্কা থেকে বের হলেন। এতে মক্কাবাসীরা কঠিনভাবে অস্থির হয়ে পড়ল, আর এমন কেউ বাকি রইল না যে তাঁকে বিদায় জানাতে বের হয়নি। অবশেষে যখন তিনি বাতহার সর্বোচ্চ পাথরের কাছে পৌঁছলেন—অথবা আল্লাহ্র ইচ্ছায় অন্য যেখানেই তিনি পৌঁছালেন—তিনি থেমে গেলেন এবং তাঁর চারপাশে লোকজনেরা কাঁদতে কাঁদতে দাঁড়িয়ে গেল। যখন তিনি লোকজনের অস্থিরতা দেখলেন, তখন বললেন: হে লোক সকল! আমি তোমাদের থেকে নিজেদেরকে বিচ্ছিন্ন করার আকাঙ্ক্ষায় বের হইনি, আর তোমাদের শহরের উপর অন্য কোনো শহরকে প্রাধান্য দিয়েও নয়। বরং এই (জিহাদের) কাজে কুরাইশের এমন লোকেরা অংশ নিয়েছিলেন, আল্লাহ্র কসম! তাঁরা উচ্চ বংশের ছিলেন না, তবে তাঁরা ছিলেন সম্ভ্রান্ত ঘরের লোক। আল্লাহ্র শপথ! আমার অবস্থা এমন হয়েছে যে, যদি মক্কার সকল পর্বত সোনা হয়ে যায় আর আমরা তা আল্লাহর পথে খরচ করে ফেলি, তবুও তাঁদের (জিহাদের) দিনগুলোর (ফজিলত) আমরা অর্জন করতে পারব না। আল্লাহ্র শপথ! তাঁরা দুনিয়াতে আমাদের থেকে আলাদা হয়ে (আগে চলে) গেলেও, আমরা অবশ্যই তাঁদের পুণ্যের অংশীদার হওয়ার চেষ্টা করব। সুতরাং যে ব্যক্তি আল্লাহকে ভয় করে গাযী (যোদ্ধা) হিসেবে শামের উদ্দেশ্যে বের হয় এবং শহীদ হয়ে যায়, সে যেন আল্লাহকে ভয় করে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] الصُّوى: جمع صُوَّة، وهو ما غَلُظ وارتفع من الأرض، ولم يبلغ أن يكون جبلًا.
[2] رسمت العبارة في (ز) و (ص): ولكن من ـمر باها، وكذلك في (م) لكن جاء فيها: مر ـمر باها، ولم نتبين وجهها، والغالب أنها تحرَّفت عما أثبتناه من "الجهاد" لابن المبارك (101)، ومن طريقه رواه غيره كذلك، لكن جاء عندهم: ولا من بيوتاتها، بالنفي، والمثبت من نسخنا الخطية معناه حسنٌ، كأنه يقول: ليسوا من ذوي أنسابها، لكنهم من أحلافهم ومواليهم ممّن يُساكنهم مكة، والله تعالى أعلم.
5293 [3] - في (ص) و (م): فأُنفقت، والمثبت من (ز) و (ب).
5293 [4] - في (ز): غاديًا، بالدال المهملة بدل الزاي.
5293 [5] - رجاله ثقات، لكنه مرسلٌ، فإنَّ أبا نوفل بن أبي عقرب لم يدرك الحارث بن هشام.وهو عند ابن المبارك في "الجهاد" (101)، ومن طريقه أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 11/ 499.
5294 - حدثنا أبو عمر محمد بن عبد الواحد الزاهد صاحب ثَعلَب، حدثنا الحسن بن عُلَيل [1] العَنَزي، حدثنا مصعب بن عبد الله الزُّبيري، عن أبيه، قال: كان الحارثُ بنُ هشامٍ ممَّن شهد بدرًا مع المشركين، فانهزم فيمن انْهزَم، فعيَّره حسانُ بن ثابت، فقال: إن كنتِ كاذبةَ الذي حدَّثْتِني … فنَجَوتِ مَنْجَى الحارثِ بن هشامِتَرَكَ الأحِبّةَ أن يُقاتلَ دُونَهمْ … ونَجَا برأسِ طِمِرَّةٍ ولِجَامِفقال الحارث بن هشام يَعتذِر من فِرارِه يومَئِذٍ:اللهُ يَعلَمُ ما تركتُ قتالَهمْ … حتى رَمَوْا فَرَسي بأشقرَ مُزبِدِفعلمتُ أني إنْ أُقاتِلْ واحدًا … أُقتَل، ولا يَنْكَأْ عَدُوِّيَ مَشْهَديفصَدَرتُ عنهم والأحِبَّةُ بينَهُمْ … طَمَعًا لهم بعِقابِ يومٍ مُفسدِثم غزا أُحُدًا مع المشركين، ولم يزَلْ مُتمسّكًا بالشَّرك حتى أسلمَ يوم فتح مكة [2].قد روت عائشةُ عن الحارث:
আবদুল্লাহ ইবন মুসআব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: হারিস ইবনু হিশাম মুশরিকদের সাথে বদর যুদ্ধে অংশ নিয়েছিলেন। যারা পরাজিত হয়ে পালিয়ে গিয়েছিল, তিনি তাদের মধ্যে ছিলেন। তখন হাসসান ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে তিরস্কার করে বলেন:
"তুমি যদি আমাকে যা বলেছ, তাতে মিথ্যাবাদী হও, তবে হারিস ইবনু হিশামের মতো পালিয়ে বাঁচবে।
সে প্রিয়জনদেরকে ছেড়ে এসেছিল, তাদের পক্ষে যুদ্ধ না করে... এবং ঘোড়ার মাথা ও লাগাম নিয়ে পালিয়ে রক্ষা পেয়েছিল।"
তখন হারিস ইবনু হিশাম সেদিন তার পালিয়ে যাওয়ার কৈফিয়ত দিয়ে বললেন:
"আল্লাহ জানেন, আমি তাদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করা ছাড়িনি, যতক্ষণ না তারা আমার ফর্সা, ফেনা-ওঠা ঘোড়ার দিকে তীর নিক্ষেপ করে।
ফলে আমি বুঝতে পারলাম যে আমি যদি একা লড়াই করি, তবে আমি নিহত হব, কিন্তু আমার সেই উপস্থিতি শত্রুদের কোনো ক্ষতি করতে পারবে না।
তাই আমি তাদের থেকে সরে এলাম, অথচ আমার প্রিয়জনেরা তাদের মাঝেই ছিল। (আমি সরে এলাম) এই আশায় যে তাদের জন্য শীঘ্রই এক ধ্বংসাত্মক দিনের শাস্তি অপেক্ষা করছে।"
এরপর তিনি উহুদে মুশরিকদের সাথে যুদ্ধ করেন। মক্কা বিজয়ের দিন ইসলাম গ্রহণ করা পর্যন্ত তিনি শিরকের ওপর অটল ছিলেন।
নিশ্চয় আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর থেকে হাদীস বর্ণনা করেছেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في المطبوع: عليّ وقال ابن نقطة في "إكمال الإكمال": اسمه عليُّ ولقبه عُليل. وسقط اسم والد الحسن من (ص) و (م)، ففي (ص) قال: الحسن العَنَزي، وفي (م): الحسن بن العَنَزي.
[2] وهو في "نسب قريش" لمصعب بن عبد الله الزُّبيري ص 301 - 302 من قوله هو لم يذكر أباه عبد الله الزبيري: وهو ابن مصعب بن ثابت بن عبد الله بن الزبير أمير المدينة واليمن في عهد الرشيد.والطِّمِرَّة: قال ابن سِيدَه في "المخصص" 2/ 101: فرسٌ طِمِرٌ وطُمْرُورٌ وطِمْرِيرَ: جَوادٌ، والأنثى طِمِرَّة. والجواد يعني السريع كما في "مجمل اللغة" لابن فارس 1/ 202.والأشقر: هو الدم، والمُزْبِد: الرَّغوة. والمعنى: أنه ما انهزم حتى جُرح فرسُه فَعَلَاه دمُه، أو جُرح هو فعَلَا فرسَه دمُه.ويَنْكأ: معناه المبالغة في الأذى والضرر، وهو لغةٌ في نَكَى يَنْكي. والمعنى: لا يضرُّ حُضوري أعدائي. وأخرجه أحمد 42/ (25252) و (25303 و 43 / (26198)، والبخاري (2) و (3215)، ومسلم (2333)، والترمذي (3634)، والنسائي (1008) و (11063)، وابن حبان (38) من طرق عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة: أنَّ الحارث بن هشام سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم .. الحديث.قوله: "فيَفْصِم" قال القاضي عياض في "المشارق" 2/ 160: يروي بفتح الياء وبضمها على ما لم يُسمَّ فاعلُه، ومعناه: ينفصل عني ويُقلع.
5295 - حدثنا أبو زكريا العَنْبَري، حدثنا محمد بن إبراهيم العَبْدي، حدثنا أحمد بن حنبل، حدثنا عامر بن صالح الزُّبَيري، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة، عن الحارث بن هشام: أنه سألَ النبيَّ صلى الله عليه وسلم: كيف يَنزِلُ عليكَ الوَحْيُ؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: في مثل "صَلْصَلَة الجَرَس، فيَفْصِمُ عني وقد وَعَيتُ ما قال، وهو أشدُّه عليَّ، وأحيانًا يأتيني المَلَكُ، فيتَمَثَلُ لي فيكلِّمُني فأَعِي ما يقول" [1]. لا أعلم أحدًا قال في هذا الحديث: عن عائشة عن الحارث، غيرَ عامر بن صالح، وقد رواه أصحابُ هشامٍ عن أبيه عن عائشة: أنَّ الحارث بن هشام سأل … ذكرُ مناقب ثَعْلبة بن صُعَيرٍ العَدَويّ رضي الله عنه -
হারিথ ইবনে হিশাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলেন: আপনার উপর কীভাবে ওহী নাযিল হয়? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: (কখনো কখনো তা) ঘণ্টার ধ্বনির মতো আসে। এরপর তা আমার থেকে বিচ্ছিন্ন হয়ে যায় এবং তিনি যা বলেন আমি তা মুখস্থ করে নিই। এই ধরনটিই আমার কাছে সবচেয়ে কঠিন। আর কখনো কখনো ফিরিশতা আমার কাছে মানুষের রূপ ধরে আসেন এবং আমার সাথে কথা বলেন, আর তিনি যা বলেন আমি তা মুখস্থ করে নিই।
[এরপর মুহাদ্দিসীনদের অতিরিক্ত অংশটুকু অনুবাদ করা হলো]: আমির ইবনে সালিহ ছাড়া আর কেউ এই হাদীসে ‘আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে হারিথ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন বলে আমার জানা নেই। হিশামের সাথীরা তাঁর পিতা (উরওয়াহ)-এর সূত্রে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, হারিথ ইবনে হিশাম জিজ্ঞাসা করেছিলেন...। [এরপর উল্লেখ করা হয়েছে]: সা'লাবাহ ইবনে সু'আইর আল-আদাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মর্যাদার আলোচনা।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف جدًّا من أجل عامر بن صالح الزبيري، وخالفه غيره من الرواة فجعلوه من مسند عائشة، وهو المحفوظ. وهو في "مسند أحمد" 42/ (25253). وأخرجه أحمد 42/ (25252) و (25303 و 43 / (26198)، والبخاري (2) و (3215)، ومسلم (2333)، والترمذي (3634)، والنسائي (1008) و (11063)، وابن حبان (38) من طرق عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة: أنَّ الحارث بن هشام سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم .. الحديث.قوله: "فيَفْصِم" قال القاضي عياض في "المشارق" 2/ 160: يروي بفتح الياء وبضمها على ما لم يُسمَّ فاعلُه، ومعناه: ينفصل عني ويُقلع.
5296 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا السَّرِيّ بن خُزيمة، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا همّامٌ، عن بكر بن وائل بن داود، أنَّ [1] الزُّهريَّ حدثهم عن عَبد الله بن ثَعْلبة بن صُعَيرٍ العَدَويّ، عن أبيه أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قام خَطيبًا، وأمر بصَدَقة الفِطْر صاعًا من تَمْر، أو صاعًا من شعير، عن كلِّ واحدٍ - أو عن كلِّ رأسٍ - عن الصغير والكبير، والحُرّ والعَبْد [2].
সা'লাবাহ ইবনু সুআইর আল-আদাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খুতবা দেওয়ার জন্য দাঁড়ালেন এবং সাদাকাতুল ফিতর আদায়ের নির্দেশ দিলেন—এক ‘সা’ খেজুর অথবা এক ‘সা’ যব—প্রত্যেক ব্যক্তির পক্ষ থেকে (অথবা তিনি বললেন, প্রত্যেক মাথার পক্ষ থেকে)—ছোট, বড়, স্বাধীন ও ক্রীতদাস সকলের জন্য।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] سقط من (ز) و (ب) حرف "أن" فأوهم ذلك أنَّ نسبة الزهري لبكرٍ، إنما بكر تيمي لا زهري، والحديثُ لابن شهاب الزهري. يعني بعده، صلى الله عليه وسلم حيث جعل الصحابة مُدَّين من القمح تَعدِل صاعًا من التمر والشعير، والصاع أربعة أمداد.وأخرجه أحمد 39/ (23664) عن عفان بن مسلم، وأبو داود (1619) عن مُسدَّد وسليمان بن داود العَتَكي، ثلاثتهم عن حماد بن زيد، عن النعمان بن راشد عن الزهري؛ قال عفان: عن ابن ثعلبة بن أبي صُعير عن أبيه، وقال مُسدّد: عن ثعلبة بن عبد الله بن أبي صُعير عن أبيه، وقال سليمان بن داود: عن عبد الله بن ثعلب - أو ثعلبة بن عبد الله - بن أبي صُعير عن أبيه، وزاد النعمان بن راشد في نص الحديث كذلك: "صاع من بُرٍّ أو قمح عن كل اثنين" وزاد أيضًا: "ذكر أو أنثى"، وزاد كذلك: "أما غنيُّكم فيزكّيه الله، وأما فقيركم فيردُّ الله عليه أكثر مما أعطى". وزاد عفَّان وسليمان قبلها: "غنيّ أو فقير".وأخرجه أحمد 39/ (23663)، وأبو داود (1621) من طريق ابن جُريج، قال: وقال ابن شهاب: قال عبد الله بن ثعلبة: خطب رسول الله صلى الله عليه وسلم الناس قبل الفطر بيومين، بمعنى حديث عبد الله يزيد المُقرئ عن همام عند أبي داود بزيادة قوله: "صاعًا من بُرٍّ أو قمح بين اثنين".وسيأتي بعده من طريق بحر بن كنيز، عن الزهري، عن عبد الله بن ثعلبة، عن أبيه.وهذه الزيادات المُشار إليها لم تَرِدْ في حديثي ابن عمر وأبي سعيد الخدري في "الصحيحين" إلّا زيادة: ذكر أو أنثى، فجاء في حديث ابن عمر.وأما حديثُ ابن عمر فأخرجه البخاري (1503) و (1504)، ومسلم (984)، بمثل رواية المصنف هنا وزيادة: ذكر أو أنثى. وانظر ما تقدَّم برقم (1505) و (1506) و (1511).وأما حديث أبي سعيد الخدري فأخرجه البخاري (1505) و (1506) و (1508) و (1510)، ومسلم (985)، ولفظ مسلم في بعض رواياته، وهو أتمُّها: كنا نخرج إذ كان فينا رسول الله صلى الله عليه وسلم زكاة الفطر، عن كل صغير وكبير، حرٍّ أو مملوك، صاعًا من طعام، أو صاعًا من أقط، أو صاعًا من شعير، أو صاعًا من تمر، أو صاعًا من زبيب، فلم نَزَل نخرجه حتى قدم علينا معاوية بن أبي سفيان حاجًا أو معتمرًا، فكلَّم الناس على المنبر، فكان فيما كلَّم به الناس أن قال: إني أرى مدَّين من سمراء الشام تعدل صاعًا من تمر. فأخذ الناس بذلك … وفي رواية عند مسلم: حتى كان معاويةُ، فرأى مُدَّين من بر تعدل صاعًا من تمر. والبُرُّ والسَّمراء هما القمح نفسُه وهو الحنطة أيضًا، وانظر ما تقدَّم برقم (1495). فزاد أبو سعيد في حديثه الأقط والزبيب والطعام.
[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكنه اختُلف فيه على الزهري في إسناده ومتنه كما هو مُوضَّح في "مسند أحمد" 39/ (23664)، و "سنن أبي داود" (1619)، غير أنَّ له شاهدًا من حديثي ابن عمر وأبي سعيد الخدري في "الصحيحين". همام: هو ابن يحيى العَوْذي.وأخرجه أبو داود (1620) عن محمد بن يحيى النيسابوري - وهو الذُّهْلي الحافظ - عن موسى بن إسماعيل، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود أيضًا (1620) من طريق عبد الله بن يزيد المقرئ، عن همام بن يحيى، عن بكر بن وائل، عن الزهري، عن ثعلبة بن عبد الله، أو عبد الله بن ثعلبة، عن النبي صلى الله عليه وسلم. هكذا رواه لم يذكر أباه، وزاد في نص الحديث: "أو صاع بُرٍّ أو قمح بين اثنين" وهي بمعنى ما زاده بحر بن كنيز عن الزهري في الرواية التالية، وهي زيادة مُنكرة كما يوضحه حديث ابن عمر وحديث أبي سعيد اللذان يدلان على أنَّ القمح أو البُرَّ إنما اتُّفق على إخراجه بعد فتح الشام، يعني بعده، صلى الله عليه وسلم حيث جعل الصحابة مُدَّين من القمح تَعدِل صاعًا من التمر والشعير، والصاع أربعة أمداد.وأخرجه أحمد 39/ (23664) عن عفان بن مسلم، وأبو داود (1619) عن مُسدَّد وسليمان بن داود العَتَكي، ثلاثتهم عن حماد بن زيد، عن النعمان بن راشد عن الزهري؛ قال عفان: عن ابن ثعلبة بن أبي صُعير عن أبيه، وقال مُسدّد: عن ثعلبة بن عبد الله بن أبي صُعير عن أبيه، وقال سليمان بن داود: عن عبد الله بن ثعلب - أو ثعلبة بن عبد الله - بن أبي صُعير عن أبيه، وزاد النعمان بن راشد في نص الحديث كذلك: "صاع من بُرٍّ أو قمح عن كل اثنين" وزاد أيضًا: "ذكر أو أنثى"، وزاد كذلك: "أما غنيُّكم فيزكّيه الله، وأما فقيركم فيردُّ الله عليه أكثر مما أعطى". وزاد عفَّان وسليمان قبلها: "غنيّ أو فقير".وأخرجه أحمد 39/ (23663)، وأبو داود (1621) من طريق ابن جُريج، قال: وقال ابن شهاب: قال عبد الله بن ثعلبة: خطب رسول الله صلى الله عليه وسلم الناس قبل الفطر بيومين، بمعنى حديث عبد الله يزيد المُقرئ عن همام عند أبي داود بزيادة قوله: "صاعًا من بُرٍّ أو قمح بين اثنين".وسيأتي بعده من طريق بحر بن كنيز، عن الزهري، عن عبد الله بن ثعلبة، عن أبيه.وهذه الزيادات المُشار إليها لم تَرِدْ في حديثي ابن عمر وأبي سعيد الخدري في "الصحيحين" إلّا زيادة: ذكر أو أنثى، فجاء في حديث ابن عمر.وأما حديثُ ابن عمر فأخرجه البخاري (1503) و (1504)، ومسلم (984)، بمثل رواية المصنف هنا وزيادة: ذكر أو أنثى. وانظر ما تقدَّم برقم (1505) و (1506) و (1511).وأما حديث أبي سعيد الخدري فأخرجه البخاري (1505) و (1506) و (1508) و (1510)، ومسلم (985)، ولفظ مسلم في بعض رواياته، وهو أتمُّها: كنا نخرج إذ كان فينا رسول الله صلى الله عليه وسلم زكاة الفطر، عن كل صغير وكبير، حرٍّ أو مملوك، صاعًا من طعام، أو صاعًا من أقط، أو صاعًا من شعير، أو صاعًا من تمر، أو صاعًا من زبيب، فلم نَزَل نخرجه حتى قدم علينا معاوية بن أبي سفيان حاجًا أو معتمرًا، فكلَّم الناس على المنبر، فكان فيما كلَّم به الناس أن قال: إني أرى مدَّين من سمراء الشام تعدل صاعًا من تمر. فأخذ الناس بذلك … وفي رواية عند مسلم: حتى كان معاويةُ، فرأى مُدَّين من بر تعدل صاعًا من تمر. والبُرُّ والسَّمراء هما القمح نفسُه وهو الحنطة أيضًا، وانظر ما تقدَّم برقم (1495). فزاد أبو سعيد في حديثه الأقط والزبيب والطعام.
5297 - حدثناه أبو الطَّيب محمد بن عبد الله الشَّعِيري [1]، حدثنا محمد بن أشْرَس، حدثنا إبراهيم بن سليمان الزيّات، حدثنا بَحْر بن كَنِيز، حدثنا الزُّهْري، عن عبد الله بن ثَعْلبة، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم: أنه فَرَضَ صدقة الفِطْر عن الصغير والكبير، صاعًا من تمر أو مُدَّين من قمح [2].هذا حديثٌ رواه أكثرُ أصحاب الزُّهْري عنه عن عبد الله بن ثَعْلبة عن النبي صلى الله عليه وسلم لم يَذكُروا أباهُ. ذكرُ مناقب عبد الله بن ثَعْلبة رضي الله عنه -
থা'লাবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ছোট এবং বড় সকলের উপর সাদাকাতুল ফিতর ফরয করেছেন— এক সা’ পরিমাণ খেজুর অথবা দুই মুদ্দ পরিমাণ গম।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: السعيدي، والتصويب من سائر المواضع التي روى فيها المصنَّف هذا الشيخ، واسمه محمد بن محمد بن عبد الله بن المبارك، والشَّعيري نسبة إلى الشعير.
[2] صحيح لغيره دون قوله: أو مُدَّين من قَمْح، كما بيَّناه عند الرواية السابقة، ومحمد بن أشرس وبحر بن كَنِيز - وهو السَّقّاء - ضعيفا الحديثِ، لكنهما قد توبعا، غير أنَّ الحديث مُعلٌّ سندًا ومتنًا كما سبق.
5298 - Null
5298 - حدثني أبو بكر بن بالَوَيهِ، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حدثنا مصعب بن عبد الله، قال: وعبدُ الله بن ثَعْلبة بن صُعَير بن أبي صُعَير العدوي، ولد قبل الهجرة بأربع سنين، حُمِل إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فَمَسَح وجهَه وبَرَّك عليه عامَ الفتح، وتوفي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وهو ابن أربع عشرة، وتوفي عبدُ الله بن ثَعْلبة - وكنيته أبو محمد - سنةَ تسعٍ وثمانين، وهو ابن ثلاثٍ وتسعين سنة.
৫২৯৮ - আমাকে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ বকর ইবনু বালায়ওয়াইহ, তাঁকে হাদীস বর্ণনা করেছেন ইব্রাহীম ইবনু ইসহাক আল-হারবী, তাঁকে হাদীস বর্ণনা করেছেন মুসআব ইবনু আব্দুল্লাহ। তিনি বলেন: আর (তিনি হলেন) আব্দুল্লাহ ইবনু সা'লাবাহ ইবনু সু'আইর ইবনু আবী সু'আইর আল-আদাবী। তিনি হিজরতের চার বছর পূর্বে জন্মগ্রহণ করেন। মক্কা বিজয়ের বছর তাঁকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বহন করে আনা হয়েছিল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর মুখমণ্ডল মাসাহ করেন এবং তাঁর জন্য বরকতের দু'আ করেন। আর যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করেন, তখন তাঁর বয়স ছিল চৌদ্দ বছর। আব্দুল্লাহ ইবনু সা'লাবাহ—যার কুনিয়াত (উপনাম) ছিল আবূ মুহাম্মাদ—ঊননব্বই (৮৯) হিজরী সনে ইন্তেকাল করেন, তখন তাঁর বয়স হয়েছিল তিরাশি (৯৩) বছর।