আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
5339 - أخبرنا الشيخ أبو بكر أحمد بن إسحاق، حدثنا إسماعيل بن قُتيبة، حدثنا محمد بن عبد الله بن نُمير، قال: مات أبو يحيى أُسَيد بن حُضَير سنة عشرين، وكان قد شهد العَقَبة، ثم كان نَقيبًا، صلَّى عليه عمرُ بن الخطاب بالمدينة، ودُفن بالبقيع، وله كنيتان أبو يحيى وأبو حُصَين [1]، وأبوه حُضَيرُ الكتائبِ [2]، ولم يُعقِبْ أُسَيدٌ [3].
মুহাম্মাদ ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে নুমাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবু ইয়াহইয়া উসাইদ ইবনে হুযাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বিশ (২০) হিজরি সালে ইন্তেকাল করেন। তিনি আকাবায় উপস্থিত ছিলেন, অতঃপর তিনি একজন নাকীব (নেতা/প্রতিনিধি) ছিলেন। তাঁর জানাযার সালাত মদীনাতে উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পড়িয়েছিলেন এবং তাঁকে বাকী কবরস্থানে দাফন করা হয়। তাঁর দুটি কুনিয়াত (উপনাম) ছিল: আবু ইয়াহইয়া এবং আবু হুসাইন [১]। আর তাঁর পিতা ছিলেন হুযাইর আল-কাতাইব [২]। এবং উসাইদের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কোনো বংশধর ছিল না [৩]।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وقع في المطبوع: أبو حضير، وهو قول رُوي في كنية أُسيد بن حُضير، لكن ما وقع في نسخنا الخطية هو ما ذكره ابن الحذاء وأبو القاسم البغوي والطبري فيما نقله عنهم الحافظ مغلطاي في "إكمال تهذيب الكمال" 2/ 226، وذكره كذلك ابن منده في "فتح الباب في الكنى والألقاب" (2304)، والذهبي في "المقتنى" (1615)، لكن قال الذهبي: أبو حضير أشبه. يُعقب فلم يبق لأُسيد بعده عَقِبٌ، والله أعلم.
[2] وقع في (ز) و (ب): الكاتب، والمثبت من (ص) و (م) هو الموافق لما في كتب السيرة والتراجم والتاريخ التي ذكرت حُضيرًا أبا أسيد، "كالمغازي" للواقدي 1/ 303، و "طبقات ابن سعد" 3/ 558. يُعقب فلم يبق لأُسيد بعده عَقِبٌ، والله أعلم.
5339 [3] - يعكِّر على قوله: لم يُعقب، ما ثبت في "مسند أحمد" 18/ (11766)، و "صحيح مسلم" (796) عن أبي سعيد الخدري من ذكر أُسَيدٍ ابنه يحيى في خبرٍ ذكره. فلعلَّ يحيى هذا مات ولم يُعقب فلم يبق لأُسيد بعده عَقِبٌ، والله أعلم.
5340 - حدثنا أبو عبد الله الأصبَهاني، حدثنا الحسن بن الجَهْم، حدثنا الحسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر: وأُسَيد بن الحُضَير بن سِماك، يُكنى أبا يحيى، ويقال: أبو الحُصَين، ويقال: أبا بَحْر، وكان أُسَيد شريفًا في قومه في الجاهلية والإسلام، يُعدُّ من عُقلائهم وذَوي آرائهم، وكان من الكَمَلَة [1]، وكان أبوه الحُضَيرُ الكتائبِ كذلك مِن قبله، وكان رئيسَ الأوس يوم بُعَاث، وقُتل حُضَير يومئذ.وأُسيد بن حُضَير أحدُ السبعين من الأنصار الذين بايَعُوا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم ليلةَ العَقَبة في رواية جميعِهم، وأحدُ النُّقباء الاثني عشرَ، وآخَى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بين أُسَيد بن حُضَير وزيد بن حارثة، ولم يَشهَد أُسَيدٌ بدرًا، تَخلَّف هو وغيرُه من أكابر الصحابة من النُّقَباء وغيرهم عن بدر، لأنهم لم يظنُّوا أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم يَلقَى حَرْبًا ولا قتالًا، وشَهِدَ أُسَيدٌ أحدًا، وجُرح يومئذٍ سبع جراحاتٍ، وثَبَتَ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم حين انكَشَف الناسُ، وشَهِدَ الخندقَ والمشاهدَ كلَّها مع رسول الله صلى الله عليه وسلم [2].
মুহাম্মাদ ইবনে উমার থেকে বর্ণিত: উসাইদ ইবনুল হুযাইর ইবনু সিমাক। তাঁর কুনিয়াত (ডাকনাম) হলো আবূ ইয়াহইয়া। তাঁকে আবূ হুসায়ন অথবা আবূ বাহরও বলা হতো। উসাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জাহিলিয়াত (অজ্ঞতার যুগ) এবং ইসলাম উভয় যুগেই তাঁর গোত্রের মধ্যে অত্যন্ত সম্মানিত ব্যক্তি ছিলেন। তিনি ছিলেন তাঁদের মধ্যকার জ্ঞানী ও বিচক্ষণ ব্যক্তিত্বদের মধ্যে গণ্য। তিনি ছিলেন পরিপূর্ণ গুণাবলিসম্পন্ন ব্যক্তিদের একজন। তাঁর পিতা হুযাইরুল কাতাইব (যুদ্ধের উপাধি) তাঁর পূর্বেও অনুরূপ সম্মানিত ছিলেন। তিনি ছিলেন বু'আস যুদ্ধের সময় আওস গোত্রের প্রধান। হুযাইর সেদিন নিহত হয়েছিলেন। আর উসাইদ ইবনু হুযাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই সত্তুরজন আনসারের মধ্যে একজন, যাঁরা সকলের বর্ণনা অনুযায়ী আকাবার রাত্রিতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাতে বাইয়াত (শপথ) করেছিলেন এবং তিনি বারো জন দলনেতার (নুকাবা) অন্যতম ছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উসাইদ ইবনু হুযাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং যায়দ ইবনু হারিসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মধ্যে ভ্রাতৃত্ব বন্ধন (মুআখাত) স্থাপন করেছিলেন। উসাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বদর যুদ্ধে অংশ নেননি। তিনি এবং অন্যান্য শ্রেষ্ঠ সাহাবী—যেমন দলনেতা ও অন্যান্যগণ—বদর থেকে অনুপস্থিত ছিলেন, কারণ তাঁরা ধারণা করেননি যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোনো যুদ্ধ বা লড়াইয়ের সম্মুখীন হবেন। উসাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উহুদ যুদ্ধে অংশ নেন এবং সেদিন তিনি সাতটি আঘাতপ্রাপ্ত হন। যখন লোকেরা ছত্রভঙ্গ হয়ে গিয়েছিল, তখনও তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে স্থির ছিলেন। তিনি খন্দক যুদ্ধ এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সংঘটিত অন্যান্য সকল যুদ্ধেও অংশগ্রহণ করেছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في المطبوع: الكتبة، بدل الكملة، وهو تحريف، وإن كان حُضير ممّن يعلم الكتابة، وقال ابن سعد في "الطبقات" 3/ 558: كان أُسَيد يكتب العربية في الجاهلية، وكانت الكتابة في العرب قليلًا، وكان يُحسِن العَومَ والرمي، وكان يُسمَّى مَن كانت هذه الخِصال فيه في الجاهلية الكامل، وكانت قد اجتمعت في أُسَيد.
[2] انظر الطبقات الكبرى لابن سعد 3/ 559.وقد وافق الواقديَّ على عدم شهود أُسَيد بدرًا محمدُ بنُ إسحاق كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 454 - 455. لكن ذكر ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 45 أنَّ غير محمد بن إسحاق يقول: إنه شهد بدرًا. قلنا: جزم ابن السَّكن فيما نقله عنه الحافظ ابن حجر في "الإصابة" 1/ 83 بشهوده بدرًا، وأثبت ذلك أيضًا خليفةُ بنُ خياط عند ابن عساكر 9/ 78، وجماعةٌ آخرون رواه عنهم الواقدي عند ابن عساكر 9/ 95 - 96، وأثبته الدارقطني كذلك في "المؤتلف والمختلف" 2/ 554، وغيرهم، فالله تعالى أعلم، وأنكر ابن عساكر 9/ 77 شهوده بدرًا بخبرٍ ذكره لا يُعتمَد على مثله.
5341 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الربيع بن سليمان، حدثنا أسدُ بن موسى، حدثنا الليث، عن ابن شِهاب، عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك، عن أُسَيد بن حُضَير أنه كان يقرأ على ظَهْر بيتِه، وهو حَسنُ الصوتِ، قال: فبَيْنا أنا أقرأُ إذ غَشِيني شيءٌ كالسحاب، والمرأةُ في البيتِ والفرسُ في الدارِ، فتخوَّفتُ أن تُسقِطَ المرأةُ، فانصرفتُ، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "اقرَأْ، فإنما هو مَلَكٌ استمعَ القرآنَ" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يخرجاه، لأنَّ سفيان بن عُيينة أرسلَه عن الزُّهْري [2].
উসাইদ ইবনু হুদাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর বাড়ির ছাদে কুরআন তিলাওয়াত করছিলেন, আর তিনি ছিলেন সুমিষ্ট কণ্ঠের অধিকারী। তিনি বললেন: আমি যখন তিলাওয়াত করছিলাম, হঠাৎ মেঘের মতো একটি জিনিস আমাকে আবৃত করে ফেলল। আমার স্ত্রী ঘরে ছিল এবং ঘোড়াটি উঠোনে ছিল। আমি ভয় পেলাম যে আমার স্ত্রী হয়তো (ভয়ে) গর্ভপাত করে ফেলবে, তাই আমি তিলাওয়াত বন্ধ করে সরে গেলাম। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তিলাওয়াত করো, কারণ সে তো ছিল একজন ফিরিশতা, যে কুরআন শুনতে এসেছিল।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح. وهو مكرر ما سلف برقم (2056).
[2] تقدَّمت روايته هذه عند المصنف برقم (2057).
5342 - حدثني محمد بن صالح ومحمد بن المؤمَّل ومحمد بن القاسم، قالوا: حدثنا الفضل بن محمد الشَّعْراني، حدثنا سعيد بن أبي مريم، أخبرنا يحيى بن أيوب وابن لَهِيعة، قالا: حدثنا عُمارة بن غَزِيّة، عن محمد بن عبد الله بن عمرو بن عثمان، عن أمِّه فاطمة بنت حُسين بن علي، عن عائشة، أنها قالت: كان أُسَيد بن حُضَير من أفاضل الناس، فكان يقول: لو أني أكونُ كما أكونُ مَحَلَّ حالٍ من أحوالٍ ثلاث، لكنتُ من أهل الجنة، وما شككتُ في ذلك: حين أقرأُ القرآنَ وحين أسمعهُ، وإذا سمعتُ خطبةَ رسول الله صلى الله عليه وسلم، وإذا شهدتُ جِنازةً؛ فما شهدتُ جِنازةً قطُّ فحدَّثتُ نفسي سوى ما هو مفعولٌ بها، وما هي صائرةٌ إليه [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উসাইদ ইবনু হুদাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন শ্রেষ্ঠতম মানুষদের একজন। তিনি বলতেন: তিনটি অবস্থার মধ্যে যদি আমি কেবল একটি অবস্থায় স্থির থাকতে পারতাম, তবে আমি জান্নাতবাসীদের অন্তর্ভুক্ত হতাম, আর এতে আমার কোনো সন্দেহ থাকত না: যখন আমি কুরআন তিলাওয়াত করি অথবা তা শুনি; যখন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খুতবা শুনি; এবং যখন আমি কোনো জানাযায় উপস্থিত হই। কারণ, আমি কখনোই কোনো জানাযায় উপস্থিত হইনি, যেখানে আমার মন সেটির সাথে কী করা হবে এবং সেটির চূড়ান্ত গন্তব্যস্থল কোথায়, তা ছাড়া অন্য কিছু নিয়ে চিন্তা করেছে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده فيه لِينٌ من أجل محمد بن عبد الله بن عمرو بن عثمان - وهو ابن عفان - فهو إلى الضعف أقرب. يحيى بن أيوب هو الغافقي المصري، وابن لَهِيعة: هو عبد الله.وأخرجه أحمد 31/ (19093) من طريق عبد الله بن المبارك، عن يحيى بن أيوب وحده، بهذا الإسناد.وقد روي نحوه لكن من قول سعد بن معاذ عند ابن أبي شيبة 13/ 377، والطبراني في "الكبير" (5321) و (5322)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (2894) وغيرهم بسند رجاله لا بأس بهم، لكنه مرسلٌ.
5343 - حدثني علي بن حَمْشاذَ العدل، حدثنا هشام بن علي وإسحاق بن الحسن، قالا حدثنا عفّان بن مسلم، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن ثابت، عن أنس، قال: كان أُسَيدُ بن حُضَير وعَبّادُ بن بِشر عند النبي صلى الله عليه وسلم في ليلةٍ ظلماءَ حِنْدِس، فلما انصرفا أضاءت عصا أحدِهما، فمَشَيا في ضَوئها، فلمّا افتَرقا أضاءت عصا الآخَر [1].صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আনাস) বলেন: উসাইদ ইবনু হুদ্বাইর এবং আব্বাদ ইবনু বিশর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এক গভীর অন্ধকার রাতে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলেন। যখন তাঁরা উভয়ে প্রস্থান করলেন, তখন তাঁদের একজনের লাঠি আলো দিতে শুরু করল। ফলে তাঁরা তার আলোয় চলতে লাগলেন। অতঃপর যখন তাঁরা (পরস্পর থেকে) পৃথক হয়ে গেলেন, তখন অন্যজনের লাঠিও আলো দিতে শুরু করল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. ثابت: هو ابن أسلم البُناني.وأخرجه أحمد 21/ (13870) عن عفان بن مسلم، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 20/ (12980)، والنسائي (8188) من طريق بهز بن أسد، وابن حبان (2032) من طريق هدبة بن خالد، كلاهما عن حماد بن سلمة، به. وعلَّقه البخاري في "صحيحه" بإثر (3805) عن حماد بن سلمة.وأخرجه أحمد 19/ (12404)، وابن حبان (2030) من طريق معمر بن راشد، عن ثابت، عن أنس: أنَّ أُسَيد بن حُضَير ورجلًا آخر من الأنصار … فذكره، وعلَّقه البخاري بإثر (3805) كذلك عن معمر.وأخرجه البخاري (465) و (3639) و (3805) من طريق قتادة بن دعامة السدوسي، عن أنس بن مالك: أنَّ رجلين من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم خرجا من عند النبي صلى الله عليه وسلم … فذكره ولم يُسمِّ الرجلين.
5344 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المَحبُوبي بمَرُو، حدثنا عمار بن عبد الجبار، حدثنا وَرْقاءُ، عن حُصَين.وأخبرني عبد الله بن محمد الصَّيدلاني، حدثنا محمد بن أيوب، أخبرنا يحيى بن المُغيرة السَّعْدي، حدثنا جَرير عن حُصَين، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى عن أبيه، قال: كان أُسَيد بن حُضَير رجلًا ضاحكًا مليحًا، فبينما هو عند رسول الله صلى الله عليه وسلم يُحدِّث القومَ ويُضحِكُهم فطعَنَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في خاصِرَتِه، فقال: أوْجَعْتَني، قال: "اقتص" قال: يا رسول الله، إنَّ عليك قميصًا، ولم يكن عليَّ قَميصٌ، قال: فرفع رسولُ الله صلى الله عليه وسلم قميصَه، فاحتَضَنه، ثم جعل يُقبِّل كَشْحَيهِ، فقال: بأبي أنت وأمي يا رسول الله، أردتُ هذا [1]. هذا لفظُ حديثِ جَرير عن حُصين، فإنَّ حديث ورقاء مختصرٌ.صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
উসাইদ ইবন হুযাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ছিলেন একজন হাস্যোজ্জ্বল, সুন্দর ও রসিক ব্যক্তি। একদা তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসে মজলিসের লোকজনকে কথা বলে হাসাচ্ছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কোমরের পার্শ্বদেশে খোঁচা দিলেন (বা আঘাত করলেন)। তিনি বললেন: আপনি আমাকে ব্যথা দিয়েছেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তুমি প্রতিশোধ নাও।” তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনার শরীরে জামা আছে, কিন্তু যখন আপনি খোঁচা দেন, তখন আমার শরীরে জামা ছিল না। বর্ণনাকারী বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর জামা উপরে তুলে ধরলেন। তিনি (উসাইদ) তখন তাঁকে জড়িয়ে ধরলেন এবং তাঁর দু’পাশের চামড়ার ওপর চুম্বন করতে শুরু করলেন। এরপর তিনি বললেন: আমার পিতা-মাতা আপনার জন্য উৎসর্গ হোন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি এটাই চেয়েছিলাম।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكنه اختُلف فيه على حُصَين - وهو ابن عبد الرحمن السُّلَمي - في وصله وإرساله، فقد رواه عنه جريرٌ - وهو ابن عبد الحميد الضبّي - وورقاءُ - وهو ابن عمر اليشكري - كما وقع هنا عند المصنف موصولًا، وخالفهما خالدُ بنُ عبد الله الواسطي وسليمانُ بنُ كثير العبدي وأبو جعفر الرازي، فرووه عنه عن عبد الرحمن بن أبي ليلى عن أُسَيد بن حُضَير. هكذا لم يذكروا فيه أبا ليلى والد عبد الرحمن، وعبد الرحمن لم يلحق أُسَيدَ بن حُضَير فيسمعَ منه، كما قال الذهبي في "سير أعلام النبلاء" 1/ 341 في ترجمة أُسَيد، وكذلك قال ابن عبد الهادي في "تنقيح التحقيق" (346): ابن أبي ليلى لم يسمع من أُسَيد بن حُضير.وقد قوَّى الذهبيُّ إسنادَ الرواية الموصولة في "تهذيب سنن البيهقي" 6/ 137.وأخرجه البيهقي 8/ 49 عن أبي عبد الله الحاكم، عن عبد الله بن محمد الصيدلاني، بإسناده.وأخرجه أبو داود (5224) من طريق خالد بن عبد الله الواسطي، عن حُصين بن عبد الرحمن، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن أُسيد بن حُضَير، رجلٍ من الأنصار … فذكره. ولم يذكر أبا ليلى.وتابع خالدًا الواسطيَّ عليه أبو جعفر الرازي عند الطبراني في "الكبير" (557)، وسليمانُ بنُ كثير العبدي عند ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 9/ 89.وقد روي في إقادته صلى الله عليه وسلم من نفسِه الكريمةِ أحاديثُ أخرى، ومن ذلك:ما أخرجه أحمد 1/ (286)، وأبو داود (4537)، والنسائي (6953)، عن عمر بن الخطاب رضي الله عنه قال: رأيت رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يُقِصُّ من نفسِه. وإسناده حسن.ومنه ما سيأتي عند المصنف برقم (8142) في قصة أعرابيٍّ خدشَه رسول الله صلى الله عليه وسلم خدشةً لم يتعمّدها.وإسناده ضعيف.ومن ذلك ما رواه ابن إسحاق، كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 626، في قصة سَوَاد بن غَزيّة أن النبي صلى الله عليه وسلم طعنه في بطنه وهو يعدّل الصفوف يوم بدر، فقال: يا رسول الله، أَوجَعْتَني، وقد بعثَك اللهُ بالحقِّ والعدل، قال: فأقِدْني فكشف رسول الله صلى الله عليه وسلم عن بطنه، وقال: "استقِدْ"، فاعتنقَه فقبَّل بطنَه، فقال: "ما حملك على هذا يا سواد؟ " قال: يا رسول الله، حضر ما ترى فأردتُ أن يكون آخر العهد بك أن يمسَّ جلدي جلدَك، فدعا له رسول الله صلى الله عليه وسلم بخيرٍ. ورجاله ثقات. وروى ابن سعد 3/ 478 في ترجمة سواد بن غزية نحو هذه القصة بسياق مغاير، وليس فيها أن ذلك كان يوم بدر، وفيها تسمية صاحب القصة سواد بن عمرو، وكأن ابنَ سعد عدَّ سواد بن غزية هو سوادَ بنَ عمرو نفسه، لكون عمرو في أجداده، وأنه ربما نُسب إلى جده.والكشح: الخَضْر.
5345 - حدثني أبو إسحاق إبراهيم بن محمد بن يحيى، حدثنا محمد بن إسحاق الثَّقَفي، حدثنا قُتيبة، حدثنا عبد العزيز بن محمد الدَّرَاوَردي، عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "نِعمَ الرجلُ أُسَيدُ بنُ حُضَير" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخُرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "উসাইদ ইবনু হুদ্বাইর কতই না উত্তম লোক!"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل عبد العزيز بن محمد الدَّراوردي، وقد توبع فيما تقدَّم عند المصنف برقم (5247)، حيث رواه عبد العزيز بن أبي حازم عن سُهيل.وأخرجه أحمد 15 / (9431)، والترمذي (3795) عن قُتيبة - وهو ابن سعيد - بهذا الإسناد. وهو محمد بن الحُصين بن عبد الرحمن بن عمرو بن سعد بن معاذ - اختُصر من نسبه هنا اسم عمرو - فقد روى عنه اثنان وذكره ابن حبان في "الثقات"، وروايته هنا عن أهل بيته عن قصة في قومه بني عبد الأشهل، لأنَّ سعد بن معاذ وأُسيدًا كلاهما من بني عبد الأشهل، وعلى أنَّ صلاة أُسَيد بن حُضَير في قومه قاعدًا وصلاة قومه خلفه قعودًا مرويةٌ من وجوه، لكن ليس فيها ذكر المرفوع الذي هنا، غير أنَّ هذا المرفوع ليس بمستنكر، فقد رُوي ما يشهد له في غير هذه القصة عن عدة من الصحابة.وأخرجه أبو داود (607) من طريق محمد بن صالح بن قيس الأزرق - ونسبه زيد بن حُباب مرةً تمّارًا - عن حُصين من ولد سعد بن معاذ - وهو حصين بن عبد الرحمن بن عمرو والد ابن الحُصين - عن أُسَيد بن حُضَير. هكذا رواه منقطعًا، ومحمد بن صالح الأزرق هذا ضعيف، فرواية محمد بن الحصين عن أبيه أَولى منها. وقال أبو داود بإثره: هذا الحديث ليس بمتصل.وأخرجه البخاري في "تاريخه الكبير" 7/ 208 من طريق علي بن مُسهر، وابن المنذر في "الأوسط" (2036) من طريق حماد بن سلمة، والدارقطني (1480) من طريق محمد بن إسحاق، ثلاثتهم عن هشام بن عروة، عن كثير بن السائب، عن محمود بن لَبيد، قال: كان أسيد بن حُضَير قد اشتكى عِرْقَ النَّسا، وكان لنا إمامًا، وكان يخرج إلينا فيشير إلينا بيده أن اجلسوا فنجلس، فيصلي بنا جالسًا ونحن جلوس، هكذا ذكره موقوفًا، وهذا لفظ ابن إسحاق، وهو أتم الألفاظ ولفظ الآخرين مختصرٌ. وإسناده حسنٌ. وزاد البخاري في روايته ذكر عروة في إسناده.مع أنَّ ابن أبي حاتم ذكر في "العلل" (464) أنَّ أصحاب هشام بن عروة يروونه عن هشام عن كثير بن السائب، ليس فيه عروة، وكذلك هي رواية حماد بن سلمة المذكورة، ورواية ابن إسحاق.وخالفهم سفيانُ بنُ عُيينة عند عبد الرزاق (4085) وابن سعد 3/ 560، فرواه عن هشام بن عروة، عن أبيه: أنَّ أُسيد بن حُضير اشتكي … فذكر نحوه.وأخرجه موقوفًا كذلك ابن سعد 3/ 560، وابن المنذر في "الأوسط" (2035)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" 14/ 313 - 314، وابن عبد البر في "التمهيد" 6/ 139، وابن عساكر 9/ 93 من طريق بُشَير بن يسار: أنَّ أُسَيد بن حُضَير كان يؤم قومه فاشتكى فصلَّى بهم قاعدًا، فصلُّوا وراءه قعودًا. هذا لفظ ابن سعد ولفظ الباقين بنحوه. وهو عند ابن أبي شيبة أيضًا 2/ 326 لكن بذكر عبد الله بن هُبيرة الحضرمي بدل بُشَير بن يسار. ورجاله ثقات، غير أنَّ بُشَيرًا وابن هُبيرة بيرة لم يُدركا أُسَيد بن حُضَير، ومع ذلك صحَّح إسنادَه الحافظان ابن رجب في "شرح البخاري" 6/ 154، وابنُ حجر في "فتح الباري" 3/ 206!وللمرفوع وحدَه في أمر المأمومين بالصلاة قعودًا وراء الإمام القاعد شاهدٌ من حديث عائشة عند البخاري (688)، ومسلم (412).ومن حديث أنس بن مالك عند البخاري (689)، ومسلم (411).ومن حديث أبي هريرة عند البخاري (722)، ومسلم (414).ومن حديث جابر بن عبد الله عند مسلم (413).وقد تُشكل هذه الأحاديث مع حديث عائشة في صلاة الصحابة وراء النبي صلى الله عليه وسلم وهو في مرض موته صلى الله عليه وسلم وهم قيام وهو قاعد، وهو عند البخاري (664) و (683)، ومسلم (418)، وأحسنُ ما يُجمع به بين هذه الأحاديث وحديث عائشة في مرض موته صلى الله عليه وسلم أن يقال: إنَّ إقراره صلى الله عليه وسلم لأصحابه قيامًا وهو قاعدٌ دليل على الإباحة، وأنَّ ما جاء في الأحاديث الأخرى يُحمل على النَّدْب. وممَّن ذهب هذا المذهب في الجمع بين الأمرين ابن حزم في "المحلّى" 3/ 65 - 66، وابنُ حجر في "فتح الباري" 3/ 208 - 209. وهو أحد وجوه الجمع التي حكاها ابن رجب في "فتح الباري" 6/ 15 - 160، وابن كثير في البداية والنهاية 8/ 60.
5346 - أخبرني الشيخ أبو بكر بن إسحاق فيما قرأتُه عليه من أصل كتابه، قال: أخبرنا الحسن بن علي بن زياد، حدثنا أحمد بن الحُسين [1] اللَّهَبي، حدثنا محمد بن طلحة التَّيْمي، عن محمد بن الحُصَين بن عبد الرحمن بن سعد بن معاذ، عن أبيه، عن جدِّه، عن أُسَيد بن حُضَير: أنه كان تأوَّةَ، وكان يؤمُّنا، فيُصلّي بنا قاعدًا، فعادَه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فقالوا يا رسول الله، إنَّ أُسَيدًا إمامُنا، وإنه مريض، وإنه صلَّى بنا قاعدًا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "فصَلُّوا وراءه قعودًا، فإِنَّ الإمامَ لِيُؤْتَمَّ به، فإذا صلَّى قاعدًا فصَلُّوا خَلْفَه قُعودًا" [2]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . صحيح الإسناد ولم يُخرجاه.
উসাইদ ইবনু হুযাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ছিলেন অত্যন্ত বিনয়ী (বা আল্লাহকে স্মরণকারী), আর তিনি আমাদের ইমামতি করতেন এবং বসে সালাত আদায় করতেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে দেখতে গেলেন। তখন লোকেরা বলল, হে আল্লাহর রাসূল! উসাইদ আমাদের ইমাম, আর তিনি অসুস্থ, আর তিনি আমাদের নিয়ে বসে সালাত আদায় করেছেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সুতরাং তোমরাও তার পেছনে বসে সালাত আদায় করো। কেননা ইমামের অনুসরণ করা হয়। অতএব যখন তিনি বসে সালাত আদায় করবেন, তখন তোমরাও তাঁর পেছনে বসে সালাত আদায় করবে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: الحُصين بالصاد المهملة، وإنما هو بالسين المهملة، وقد جاء في "إتحاف المهرة" للحافظ ابن حجر (269) على الصواب. وانظر ترجمته في "معاني الأخيار في شرح أسامي رجال معاني الآثار" 1/ 28 ترجمة (40). وهو محمد بن الحُصين بن عبد الرحمن بن عمرو بن سعد بن معاذ - اختُصر من نسبه هنا اسم عمرو - فقد روى عنه اثنان وذكره ابن حبان في "الثقات"، وروايته هنا عن أهل بيته عن قصة في قومه بني عبد الأشهل، لأنَّ سعد بن معاذ وأُسيدًا كلاهما من بني عبد الأشهل، وعلى أنَّ صلاة أُسَيد بن حُضَير في قومه قاعدًا وصلاة قومه خلفه قعودًا مرويةٌ من وجوه، لكن ليس فيها ذكر المرفوع الذي هنا، غير أنَّ هذا المرفوع ليس بمستنكر، فقد رُوي ما يشهد له في غير هذه القصة عن عدة من الصحابة.وأخرجه أبو داود (607) من طريق محمد بن صالح بن قيس الأزرق - ونسبه زيد بن حُباب مرةً تمّارًا - عن حُصين من ولد سعد بن معاذ - وهو حصين بن عبد الرحمن بن عمرو والد ابن الحُصين - عن أُسَيد بن حُضَير. هكذا رواه منقطعًا، ومحمد بن صالح الأزرق هذا ضعيف، فرواية محمد بن الحصين عن أبيه أَولى منها. وقال أبو داود بإثره: هذا الحديث ليس بمتصل.وأخرجه البخاري في "تاريخه الكبير" 7/ 208 من طريق علي بن مُسهر، وابن المنذر في "الأوسط" (2036) من طريق حماد بن سلمة، والدارقطني (1480) من طريق محمد بن إسحاق، ثلاثتهم عن هشام بن عروة، عن كثير بن السائب، عن محمود بن لَبيد، قال: كان أسيد بن حُضَير قد اشتكى عِرْقَ النَّسا، وكان لنا إمامًا، وكان يخرج إلينا فيشير إلينا بيده أن اجلسوا فنجلس، فيصلي بنا جالسًا ونحن جلوس، هكذا ذكره موقوفًا، وهذا لفظ ابن إسحاق، وهو أتم الألفاظ ولفظ الآخرين مختصرٌ. وإسناده حسنٌ. وزاد البخاري في روايته ذكر عروة في إسناده.مع أنَّ ابن أبي حاتم ذكر في "العلل" (464) أنَّ أصحاب هشام بن عروة يروونه عن هشام عن كثير بن السائب، ليس فيه عروة، وكذلك هي رواية حماد بن سلمة المذكورة، ورواية ابن إسحاق.وخالفهم سفيانُ بنُ عُيينة عند عبد الرزاق (4085) وابن سعد 3/ 560، فرواه عن هشام بن عروة، عن أبيه: أنَّ أُسيد بن حُضير اشتكي … فذكر نحوه.وأخرجه موقوفًا كذلك ابن سعد 3/ 560، وابن المنذر في "الأوسط" (2035)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" 14/ 313 - 314، وابن عبد البر في "التمهيد" 6/ 139، وابن عساكر 9/ 93 من طريق بُشَير بن يسار: أنَّ أُسَيد بن حُضَير كان يؤم قومه فاشتكى فصلَّى بهم قاعدًا، فصلُّوا وراءه قعودًا. هذا لفظ ابن سعد ولفظ الباقين بنحوه. وهو عند ابن أبي شيبة أيضًا 2/ 326 لكن بذكر عبد الله بن هُبيرة الحضرمي بدل بُشَير بن يسار. ورجاله ثقات، غير أنَّ بُشَيرًا وابن هُبيرة بيرة لم يُدركا أُسَيد بن حُضَير، ومع ذلك صحَّح إسنادَه الحافظان ابن رجب في "شرح البخاري" 6/ 154، وابنُ حجر في "فتح الباري" 3/ 206!وللمرفوع وحدَه في أمر المأمومين بالصلاة قعودًا وراء الإمام القاعد شاهدٌ من حديث عائشة عند البخاري (688)، ومسلم (412).ومن حديث أنس بن مالك عند البخاري (689)، ومسلم (411).ومن حديث أبي هريرة عند البخاري (722)، ومسلم (414).ومن حديث جابر بن عبد الله عند مسلم (413).وقد تُشكل هذه الأحاديث مع حديث عائشة في صلاة الصحابة وراء النبي صلى الله عليه وسلم وهو في مرض موته صلى الله عليه وسلم وهم قيام وهو قاعد، وهو عند البخاري (664) و (683)، ومسلم (418)، وأحسنُ ما يُجمع به بين هذه الأحاديث وحديث عائشة في مرض موته صلى الله عليه وسلم أن يقال: إنَّ إقراره صلى الله عليه وسلم لأصحابه قيامًا وهو قاعدٌ دليل على الإباحة، وأنَّ ما جاء في الأحاديث الأخرى يُحمل على النَّدْب. وممَّن ذهب هذا المذهب في الجمع بين الأمرين ابن حزم في "المحلّى" 3/ 65 - 66، وابنُ حجر في "فتح الباري" 3/ 208 - 209. وهو أحد وجوه الجمع التي حكاها ابن رجب في "فتح الباري" 6/ 15 - 160، وابن كثير في البداية والنهاية 8/ 60.
[2] صحيح من فعل أُسَيد بن حُضَير، وهذا إسناد محتمل للتحسين من أجل محمد بن الحُصين، وهو محمد بن الحُصين بن عبد الرحمن بن عمرو بن سعد بن معاذ - اختُصر من نسبه هنا اسم عمرو - فقد روى عنه اثنان وذكره ابن حبان في "الثقات"، وروايته هنا عن أهل بيته عن قصة في قومه بني عبد الأشهل، لأنَّ سعد بن معاذ وأُسيدًا كلاهما من بني عبد الأشهل، وعلى أنَّ صلاة أُسَيد بن حُضَير في قومه قاعدًا وصلاة قومه خلفه قعودًا مرويةٌ من وجوه، لكن ليس فيها ذكر المرفوع الذي هنا، غير أنَّ هذا المرفوع ليس بمستنكر، فقد رُوي ما يشهد له في غير هذه القصة عن عدة من الصحابة.وأخرجه أبو داود (607) من طريق محمد بن صالح بن قيس الأزرق - ونسبه زيد بن حُباب مرةً تمّارًا - عن حُصين من ولد سعد بن معاذ - وهو حصين بن عبد الرحمن بن عمرو والد ابن الحُصين - عن أُسَيد بن حُضَير. هكذا رواه منقطعًا، ومحمد بن صالح الأزرق هذا ضعيف، فرواية محمد بن الحصين عن أبيه أَولى منها. وقال أبو داود بإثره: هذا الحديث ليس بمتصل.وأخرجه البخاري في "تاريخه الكبير" 7/ 208 من طريق علي بن مُسهر، وابن المنذر في "الأوسط" (2036) من طريق حماد بن سلمة، والدارقطني (1480) من طريق محمد بن إسحاق، ثلاثتهم عن هشام بن عروة، عن كثير بن السائب، عن محمود بن لَبيد، قال: كان أسيد بن حُضَير قد اشتكى عِرْقَ النَّسا، وكان لنا إمامًا، وكان يخرج إلينا فيشير إلينا بيده أن اجلسوا فنجلس، فيصلي بنا جالسًا ونحن جلوس، هكذا ذكره موقوفًا، وهذا لفظ ابن إسحاق، وهو أتم الألفاظ ولفظ الآخرين مختصرٌ. وإسناده حسنٌ. وزاد البخاري في روايته ذكر عروة في إسناده.مع أنَّ ابن أبي حاتم ذكر في "العلل" (464) أنَّ أصحاب هشام بن عروة يروونه عن هشام عن كثير بن السائب، ليس فيه عروة، وكذلك هي رواية حماد بن سلمة المذكورة، ورواية ابن إسحاق.وخالفهم سفيانُ بنُ عُيينة عند عبد الرزاق (4085) وابن سعد 3/ 560، فرواه عن هشام بن عروة، عن أبيه: أنَّ أُسيد بن حُضير اشتكي … فذكر نحوه.وأخرجه موقوفًا كذلك ابن سعد 3/ 560، وابن المنذر في "الأوسط" (2035)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" 14/ 313 - 314، وابن عبد البر في "التمهيد" 6/ 139، وابن عساكر 9/ 93 من طريق بُشَير بن يسار: أنَّ أُسَيد بن حُضَير كان يؤم قومه فاشتكى فصلَّى بهم قاعدًا، فصلُّوا وراءه قعودًا. هذا لفظ ابن سعد ولفظ الباقين بنحوه. وهو عند ابن أبي شيبة أيضًا 2/ 326 لكن بذكر عبد الله بن هُبيرة الحضرمي بدل بُشَير بن يسار. ورجاله ثقات، غير أنَّ بُشَيرًا وابن هُبيرة بيرة لم يُدركا أُسَيد بن حُضَير، ومع ذلك صحَّح إسنادَه الحافظان ابن رجب في "شرح البخاري" 6/ 154، وابنُ حجر في "فتح الباري" 3/ 206!وللمرفوع وحدَه في أمر المأمومين بالصلاة قعودًا وراء الإمام القاعد شاهدٌ من حديث عائشة عند البخاري (688)، ومسلم (412).ومن حديث أنس بن مالك عند البخاري (689)، ومسلم (411).ومن حديث أبي هريرة عند البخاري (722)، ومسلم (414).ومن حديث جابر بن عبد الله عند مسلم (413).وقد تُشكل هذه الأحاديث مع حديث عائشة في صلاة الصحابة وراء النبي صلى الله عليه وسلم وهو في مرض موته صلى الله عليه وسلم وهم قيام وهو قاعد، وهو عند البخاري (664) و (683)، ومسلم (418)، وأحسنُ ما يُجمع به بين هذه الأحاديث وحديث عائشة في مرض موته صلى الله عليه وسلم أن يقال: إنَّ إقراره صلى الله عليه وسلم لأصحابه قيامًا وهو قاعدٌ دليل على الإباحة، وأنَّ ما جاء في الأحاديث الأخرى يُحمل على النَّدْب. وممَّن ذهب هذا المذهب في الجمع بين الأمرين ابن حزم في "المحلّى" 3/ 65 - 66، وابنُ حجر في "فتح الباري" 3/ 208 - 209. وهو أحد وجوه الجمع التي حكاها ابن رجب في "فتح الباري" 6/ 15 - 160، وابن كثير في البداية والنهاية 8/ 60.
5347 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحَبُوبي بمَرُو، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا محمد بن عمرو بن عَلقَمة، عن أبيه، عن جدَّه، عن عائشة قالت: قَدِمْنا من سفر فتُلقِّينا بذي الحُلَيفة، وكان غلمانُ الأنصارِ يَتَلقَّون بهم إذا قَدِمُوا، فَلَقُوا أُسَيدَ بن حُضَير، فنَعَوا إليه امرأتهَ، فتقنَّع يبكي، قالت: فقلتُ له: سبحانَ الله، أنتَ من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولكل السابقةُ، ما لَكَ تبكي على امرأة؟! فكَشَفَ عن رأسه، ثم قال: صدقتِ لَعَمْرُ اللَّهِ، وَاللَّهِ ليَحِقُّ أَن لا أَبكيَ على أحدٍ بعد سعدِ بن مُعاذٍ، وقد قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ما قال، قلتُ له: وما قال؟ قال: "لقد اهتزَّ العرشُ لوفاةِ سعدِ بن معاذٍ". قالت عائشةُ: وأُسَيدُ بن حُضَير يَسيرُ بيني وبين رسولِ الله صلى الله عليه وسلم [1].صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه. ذكرُ عِياض بن غَنْم الأشعَري [2] رضي الله عنه -
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা এক সফর থেকে ফিরে এলাম এবং যুল-হুলাইফায় আমাদের অভ্যর্থনা জানানো হলো। আনসারদের ছেলেরা যখন তারা (সাহাবীগণ) ফিরে আসতেন, তখন তাদের অভ্যর্থনা জানাতে যেত। তারা উসাইদ ইবনু হুদাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে দেখা করে এবং তাঁর স্ত্রীর মৃত্যুর খবর দেয়। তখন তিনি কাঁদতে কাঁদতে মাথা ঢেকে ফেললেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি তাঁকে বললাম: সুবহানাল্লাহ! আপনি রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবী এবং আপনার (ইসলামে) অগ্রণী ভূমিকা রয়েছে। আপনি একজন নারীর জন্য কাঁদছেন কেন?! তখন তিনি তাঁর মাথা থেকে কাপড় সরিয়ে ফেললেন এবং বললেন: আল্লাহর কসম, তুমি সত্যই বলেছ। আল্লাহর শপথ, সা'দ ইবনু মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পর কারো জন্য আমার না কাঁদা উচিত ছিল। অথচ রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর (সা'দ) সম্পর্কে যা বলার তা বলেছিলেন। আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: তিনি কী বলেছিলেন? তিনি বললেন: "সা'দ ইবনু মু'আযের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মৃত্যুতে আরশ কেঁপে উঠেছিল।" আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আর উসাইদ ইবনু হুদাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার ও রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাঝখানে হেঁটে যাচ্ছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده فيه لِينٌ كما تقدم بيانه برقم (4991).
[2] نسبة عياض بن غَنْم هذا أشعريًا غلطٌ، وصاحبُ الترجمة إنما هو فِهريٌّ قرشيٌّ كما سيأتي لا أشعريٌّ يمنيّ، فذاك رجلٌ آخر، قال الحافظ ابن حجر في "الإصابة" 4/ 758 وذكر الحديثَ الآتي برقم (5351) ونسبةَ عياضٍ فيه أشعريًا: أظن الأشعريَّ وهمٌ، والله أعلم، فإنَّ الذي وليَ الإمرة حيث كان هشام بالشام هو الفِهري لا الأشعري، لكن للأشعري حديث آخر؛ فذكره.
5348 - حدثني أبو بكر بن بالَوَيهِ، حدثنا إبراهيم الحَرْبي، حدثنا مصعب بن عبد الله، قال: عِياضُ بن غَنْم بن زُهير، كان من أشرافِ قُريش، وذكره ابن قيس الرُّقيّات، فقال:وعِياضٌ مِنَا عِياضُ بن غَنْمٍ … عِصمةُ الدِّين حين حُبَّ الوَفاءُ [1]هو أول من أجاز الدَّرْبَ إلى الروم.
মুসআব ইবনু আব্দুল্লাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: ইয়ায বিন গানম বিন যুহায়র কুরাইশের অন্যতম অভিজাত ব্যক্তি ছিলেন। ইবনু কায়স আর-রুকাইয়াত তাঁকে উল্লেখ করে বলেছেন:
ইয়ায বিন গানম আমাদেরই একজন...
দ্বীনের রক্ষাকর্তা, যখন বিশ্বস্ততা প্রয়োজন হয়।
তিনিই সর্বপ্রথম ব্যক্তি যিনি (আন্) রূমের দিকে যাওয়ার গিরিপথ অতিক্রম করেছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في المطبوع:عياض وما عياضُ بن غَنْم … كان من خير ما أجَنّ النِّسَاءُوما في نسخنا الخطية هو الموافق لما في "نسب قريش" لمصعب بن عبد الله الزبيري ص 443، غير أنه جاء فيه: عصمة الجار.وما في المطبوع هو ما جاء في "ديوان الرُّقَيّات" ص 94، و "الروض الأُنف" للشهيلي 5/ 173، و "الجوهرة في نسب النبي وأصحابه العشرة" لمحمد بن أبي بكر البُرِّي 1/ 137.
5349 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا أبو بكر محمد بن النضر بن سَلَمة الجارُودي، حدثنا إبراهيم بن سعيد الجَوهَري، قال: حدثني محمد بن عمر الواقِديّ، عن شُيوخه، أنهم قالوا عِياض بن غَنْم بن زُهير بن أبي شَدّاد بن ربيعة بن هِلال بن أُهَيب بن ضَبّة بن الحارث بن فِهْر، أسلم قبل الحُدَيبِيَة، وشهدَ الحُدَيبِيةَ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، وكانت عندَه أم الحَكَم بنت أبي سفيان بن حَرْب، فلما حَضَرَت أبا عُبيدةَ بن الجرّاح الوفاةُ استخلف عِياضًا على ما كان يليه، وكان عياضٌ رجلًا صالحًا، فلما نُعيَ إلى عمرَ أبو عُبيدةَ أكثر الاستِرجاعَ والترحُّم عليه، وقال: لا يَسُدُّ مَسدَّك أحدٌ، وسأل مَن استَخلَف على عَمَله، فقالوا: عِياض بن غَنْم، فأقرَّه وكتَبَ إليه: إني قد وَلَّيْتك ما كان أبو عُبيدة بن الجَرّاح يَلِيه، فاعمل بالذي يَحِقُّ الله عليك فمات عِياضٌ يومَ ماتَ وما له مالٌ ولا عليه دَينٌ لأحدٍ، وتوفي بالشام سنة عِشرين وهو ابن سِتّين سنة [1].
মুহাম্মদ ইবনে সালিহ ইবনে হানি (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমাদের কাছে আবু বকর মুহাম্মদ ইবনুন নাদর ইবনে সালামাহ আল-জারুদী বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, আমাদের কাছে ইবরাহীম ইবনে সাঈদ আল-জাওহারী বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, আমার কাছে মুহাম্মদ ইবনে উমর আল-ওয়াকেদী তাঁর শিক্ষকগণ থেকে বর্ণনা করেন, তারা (শিক্ষকগণ) ইয়াদ ইবনে গানম ইবনে যুহায়র ইবনে আবি শাদ্দাদ ইবনে রাবিয়াহ ইবনে হিলাল ইবনে উহাইব ইবনে দাব্বাহ ইবনে আল-হারিছ ইবনে ফিহর সম্পর্কে বলেন, তিনি হুদায়বিয়ার পূর্বে ইসলাম গ্রহণ করেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হুদায়বিয়ার সন্ধিতে উপস্থিত ছিলেন। উম্মুল হাকাম বিনতে আবি সুফিয়ান ইবনে হারব তাঁর স্ত্রী ছিলেন। যখন আবু উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মৃত্যু ঘনিয়ে আসে, তখন তিনি ইয়াদকে তাঁর দায়িত্বাধীন কাজের স্থলাভিষিক্ত করেন। আর ইয়াদ ছিলেন একজন নেককার লোক। যখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে আবু উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মৃত্যুর খবর পৌঁছাল, তখন তিনি (ইন্নালিল্লাহ) পাঠ করলেন ও তার জন্য বেশি বেশি রহমতের দু'আ করলেন এবং বললেন: ‘তোমার স্থান পূরণ করার মতো কেউ নেই।’ তিনি জিজ্ঞাসা করলেন, 'তিনি (আবু উবাইদাহ) তাঁর কাজের জন্য কাকে স্থলাভিষিক্ত করে গেছেন?' লোকেরা বলল, 'ইয়াদ ইবনে গানমকে।' তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বহাল রাখলেন এবং তার কাছে লিখলেন: 'আবু উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যা পরিচালনা করতেন, আমি তোমাকে সে দায়িত্বভার অর্পণ করলাম। অতএব, তোমার উপর আল্লাহর যা হক, সে অনুযায়ী কাজ করো।' ইয়াদ যেদিন মারা যান, সেদিন তার কোনো সম্পদ ছিল না এবং কারো কাছে তার কোনো ঋণও ছিল না। হিজরি বিশ সনে ষাট বছর বয়সে তিনি সিরিয়ায় ইন্তেকাল করেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "طبقات ابن سعد" 5/ 95 و 9/ 402.
5350 - أخبرني أحمد بن يعقوب، حدثنا موسى بن زكريا، حدثنا خَليفة بن خَيّاط، قال: مات عِياض بن غَنْم سنةَ عشرين [1].
খলীফা ইবনে খাইয়্যাত থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, ইয়ায ইবনে গানম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বিশ হিজরীতে (২০ হিজরী) ইন্তেকাল করেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "الطبقات" لخليفة بن خياط ص 28، وعنه ابن عساكر في 27/ 285.
5351 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن محمد بن عبد الله البغدادي - فيما انتَقى [1] عليه أبو علي الحافظ - حدثنا عمرو بن إسحاق بن إبراهيم بن العلاء بن زِبْريق [2] الحِمصي، حدثنا أبي، حدثنا عمرو بن الحارث، عن عبد الله بن سالم، عن الزُّبيدي، حدثنا الفُضَيل بن فَضَالة، يَردُّهُ إلى [ابن] [3] عائذ، يردُّه [ابن] عائذ إلى جُبير بن نُفَير: أنَّ عِياضَ بن غَنْم الأشْعَريَّ [4] وَقَعَ على صاحب دارا حين فُتِحت، فأتاهُ هشامُ بن حَكيم فأغْلَظَ له القولَ، ومَكَثَ هشام لياليَ، فأتاه هشامٌ معتذرًا، فقال له هشامٌ: ألم تعلمْ أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قال: "إنَّ أشدَّ الناسِ عذابًا يومَ القيامة أشدُّ الناس عذابًا للناس في الدنيا"؟ فقال له عياضٌ: يا هشامُ، إنا قد سمعنا الذي قد سمعتَ، ورأَينا الذي قد رأيتَ، وصَحِبنا مَن صحبتَ.ألم تسمع يا هشامُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقولُ: "مَن كانت عنده نَصيحةٌ لذي سُلطانٍ، فلا يُكلِّمْه بها علانيةً، وليأخُذْ بيده وليَخْلُ به، فإن قَبِلَها قَبِلَها، وإلا كان قد أدّى الذي عليه والذي له"، وإنك يا هشامُ لأنتَ المُجتَرئُ أن تَجترئ على سُلطانِ الله، فهلّا خَشِيتَ أن يَقتُلك سلطانُ الله، فتكونَ قَتيلَ سُلطانِ الله [5]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইয়াদ ইবনু গানম আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন দারা নগরী বিজিত হলো, তখন তিনি (ইয়াদ) সেখানকার শাসকের (বা অধিপতির) উপর কঠোরতা আরোপ করলেন। তখন তাঁর কাছে হিশাম ইবনু হাকীম আসলেন এবং তাঁকে কঠোর কথা বললেন। এরপর হিশাম কয়েক রাত সেখানে থাকলেন। অতঃপর হিশাম ক্ষমা প্রার্থনা করতে করতে তাঁর কাছে আসলেন। হিশাম তাঁকে বললেন, আপনি কি জানেন না যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “নিশ্চয় কিয়ামতের দিন সবচেয়ে কঠিন শাস্তি হবে সেই ব্যক্তির, যে দুনিয়াতে মানুষের উপর সবচেয়ে বেশি কঠোরতা আরোপ করে?”
তখন ইয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন, হে হিশাম! তুমি যা শুনেছ, আমরাও তা শুনেছি; তুমি যা দেখেছ, আমরাও তা দেখেছি এবং তুমি যার সাহচর্য লাভ করেছ, আমরাও তার সাহচর্য লাভ করেছি। হে হিশাম! তুমি কি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলতে শোননি: “যার কাছে কোনো শাসকের জন্য উপদেশ থাকে, সে যেন তা প্রকাশ্যে তাকে না বলে। বরং সে যেন তার হাত ধরে তাকে একান্তে নিয়ে যায়। যদি সে উপদেশ গ্রহণ করে, তবে তো ভালো; নতুবা সে তার দায়িত্ব পালন করেছে এবং তার যা প্রাপ্য ছিল, তা সে পেয়েছে।” আর হে হিশাম! তুমিই সেই ব্যক্তি যে আল্লাহর কর্তৃত্বের উপর সীমালঙ্ঘন করতে সাহস করেছ। তুমি কি ভয় করোনি যে আল্লাহর শাসক তোমাকে হত্যা করতে পারে, ফলে তুমি আল্লাহর শাসকের হাতে নিহত হবে?
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: اتفقا.
[2] تحرَّف في (ز) و (ب) إلى: زريق.
5351 [3] - سقط لفظ "ابن" من نسخنا الخطية، وأثبتناه من "إتحاف المهرة" للحافظ ابن حجر (16238).
5351 [4] - انظر التعليق على أول الترجمة.
5351 [5] - إسناده محتمل للتحسين، عمرو بن الحارث - وهو ابن الضحاك الحمصي - وإسحاق بن إبراهيم بن العلاء بن زِبْريق، حسنا الحديث كما قدمنا بيانه برقم (907)، وعمرو بن إسحاق بن إبراهيم لم نقف له على ترجمة، لكن روى عنه ثلاثة كما وقع في الأسانيد منهم الطبراني، وقد أكثر الرواية عنه في كتبه، فمثله يحتمل التحسين في المتابعات والشواهد، وفضيل بن فضالة - وهو الهوزني الشامي - روى عنه غير واحد ولم يؤثر توثيقه عن غير ابن حبان - ابن عائذ: هو عبد الرحمن بن عائذ الثُّمالي.وأخرجه البيهقي في "سننه الكبرى" 8/ 164 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 17/ (1007)، وفي "مسند الشاميين" (1874) - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 47/ 266 - 267 - عن عمرو بن إسحاق بن إبراهيم، به.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 17/ (1007)، والبيهقي 8/ 164 من طرق عن إسحاق بن إبراهيم بن العلاء بن زِبريق، به. وعلّقه البخاري في "تاريخه الكبير" 7/ 18 - 19 عن إسحاق مختصرًا بحديث عياض في النصيحة.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (876)، وفي "السنة" (1098) عن محمد بن عوف الطائي، عن عبد الحميد بن إبراهيم الحضرمي الحمصي، عن عبد الله بن سالم، به. وعبد الحميد بن إبراهيم هذا ضعيف ليس بشيء.وأخرجه ابن أبي عاصم في "السنة" (1097)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 47/ 266 من طريق محمد بن إسماعيل بن عياش، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5425) من طريق عبد الوهاب بن الضحاك، كلاهما عن إسماعيل بن عياش، عن ضمضم بن زُرعة، عن شريح بن عُبيد، عن جُبير بن نفير. وعبد الوهاب بن الضحاك متروك متهم بالكذب، ومحمد بن إسماعيل بن عياش قال عنه أبو داود: لم يكن بذاك.وأخرجه أحمد 24/ (15333) من طريق صفوان بن عمرو، عن شُريح بن عُبيد الحضرمي مرسلًا قال: جلد عياض بن غنم صاحب دارا … فذكره. ولا بأس برجاله إلَّا أنَّ علّته الإرسال، فشريح لم يدرك عياضًا ولا هشامًا، وهو كثير الإرسال.وأخرجه الشطر الأول منه أحمد 24/ (15335) و 25 / (5846)، ومسلم (2613)، وأبو داود (3045)، والنسائي (8718)، ابن حبان (5612) من طريقين عن عروة بن الزبير، عن هشام ابن حكيم بن حزام: أنه وجد عياض بن غَنْم وهو على حمص يشمِّس ناسًا من النَّبط في أداء الجزية، فقال له هشام: ما هذا يا عياض؟! إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إنَّ الله يعذب الذين يعذبون الناس في الدنيا". هذا لفظ أحمد في الموضع الأول وابن حبان، والباقون لفظُهم بنحوه، لكنهم لم يصرِّحوا في روايتهم باسم عياض بن غَنْم.ودارا: بلدة بين نَصِيبين وماردين، وتحرَّفت في بعض المصادر إلى داريا.
5352 - حدثنا الحسن بن محمد بن إسحاق الأزهري، حدثنا الحسين بن إسحاق التُّسْتَري، حدثنا داهُر بن نُوحٍ، حدثنا عمرو بن الوليد، قال: سمعت معاوية بن يحيى الصَّدَفي يقول: حدثنا يحيى بن جابر، عن جُبير بن نُفَير، عن عِياض بن غَنْم، قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم ذاتَ يومٍ: "يا عِياضُ، لا تَزَوَّجَنَّ عجوزًا ولا عاقرًا، فإني مُكاثِرٌ بكم" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه. ذكرُ البَرَاء بن مالك الأنصاري أخِ أنس بن مالك رضي الله عنهما
ইয়াদ ইবনু গানম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন, “হে ইয়াদ! তুমি অবশ্যই কোনো বৃদ্ধা মহিলা বা বন্ধ্যা মহিলাকে বিবাহ করবে না। কেননা আমি তোমাদের (সংখ্যা) দ্বারা অন্যদের উপর সংখ্যাধিক্য অর্জন করতে চাই।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل معاوية بن يحيى الصَّدَفي، فإنه متفق على ضعفه، وبه أعلّه الذهبي في "تلخيصه"، ولم يُصب الحافظ ابن حجر رحمه الله في "إتحاف المهرة" (16239) حيث قال: عمرو بن الوليد هو الأغضف متروك؛ فإنَّ عمرو بن الوليد الأغضف قال عنه ابن معين: ووثَّقه أبو داود، وذكره ابن حبان وابن شاهين في "الثقات"، وانظر ترجمته في كتاب "التذييل على كتب الجرح والتعديل" لطارق آل ناجي 1/ 221 - 222، وانفرد الذهبي رحمه الله في "الميزان" بقوله: ليِّن الحديث.ويحيى بن جابر - وهو الطائي - لم يسمع من جُبير بن نفير، فروايته عنه مرسلة.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 17/ (1008) عن الحُسين بن إسحاق التُّستَري، بهذا الإسناد.وأخرجه الخطيب في "تاريخ بغداد" 5/ 73 من طريق أحمد بن أصرم المُغفَّلي المزني، عن عُبيد الله بن عمر القَواريري، عن عمرو بن الوليد الأغضف، به.وأخرجه إبراهيم الحربي في "غريب الحديث" 3/ 996، وأخرجه ابن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 277 عن محمد بن الفضل السقطي، وابن عدي في "الكامل" 5/ 145 عن عمران بن موسى السَّخْتياني، وأبو إسحاق الثعلبي في "تفسيره" 7/ 92 من طريق أحمد بن محمد بن عبد العزيز بن الجعد، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5427) من طريق أحمد بن يحيى الحُلواني، كلهم (الحربي والسقطي وعمران السختياني وابن الجعد والحلواني) عن عُبيد الله بن عمر القواريري، عن عمرو بن الوليد الأغضف، عن معاوية بن يحيى الصَّدَفي، عن يزيد بن جابر، عن جُبير بن نُفَير، عن عياض بن غَنْم. فذكر يزيد بن جابر بدل يحيى بن جابر.وقد صحَّ عنه صلى الله عليه وسلم أنه قال: "تزوَّجوا الوَدُودَ الوَلُود، فإني مكاثر بكم الأنبياء يوم القيامة" أخرجه أحمد 20 / (12613) و 21/ (13569)، وابن حبان (4028) من حديث أنس بن مالك، وإسناده قوي.ومثلُه لكن بلفظ: "مكاثر بكم الأُمم" أخرجه أبو داود (2050)، والنسائي (5323)، وابن حبان (4056) و (4057) من حديث معقل بن يسار، وإسناده قوي كذلك.
5353 - حدثنا أبو عبد الله الأصبهاني، حدثنا الحَسن بن الجَهْم، حدثنا الحُسين بن الفرَج، حدثنا محمد بن عمر، قال: البراء بن مالك بن النَّضْرِ بن ضَمْضَم بن زيد بن حَرَام بن جُندُب بن عامر بن غَنْم بن عَدِي بن النَّجّار، وأمه أم سُليم بنت مِلْحان، وهو أخو أنس بن مالك لأبيه وأمّه، شهد أحُدًا والخندق والمَشاهِد كلَّها مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، وكان شُجاعًا له في الحرب مَكَانة [1].5353 م - ذُكر عن ابن سِيرِين أنه قال: كتب عمرُ بن الخطاب: أن لا تَستعمِلوا البراءَ بنَ مالك على جيشٍ من جُيوش المسلمين، إنه مَهلَكةٌ من المَهالك، يُقدِمُ بهم [2].
মুহাম্মাদ ইবনে উমার থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বারা ইবনে মালিক হলেন আন-নযর ইবনু যমযম ইবনু যায়দ ইবনু হারাম ইবনু জুন্দুব ইবনু আমির ইবনু গানম ইবনু আদি ইবনু আন-নাজ্জার। তাঁর মাতা হলেন উম্মে সুলাইম বিনতে মিলহান। তিনি আনাস ইবনে মালিকের আপন ভাই। তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে উহুদ, খন্দক এবং অন্যান্য সকল যুদ্ধেই অংশগ্রহণ করেছেন। তিনি ছিলেন সাহসী এবং যুদ্ধে তাঁর বিশেষ অবস্থান ছিল।
ইবনে সীরীন থেকে বর্ণিত হয়েছে, তিনি বলেছেন: উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লিখেছিলেন: "তোমরা বারা ইবনে মালিককে মুসলমানদের কোনো বাহিনীর ওপর সেনাপতি হিসেবে নিযুক্ত করো না। কেননা সে [তার অতি সাহসিকতার কারণে] ধ্বংসের কারণসমূহের মধ্যে একটি; সে [অত্যধিক দ্রুততার সাথে] তাদেরকে সম্মুখে চালিত করে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "الطبقات" لابن سعد 4/ 329 و 9/ 16.
[2] القائل: "ذُكر" هو محمد بن عمر الواقدي، وقد أَسنَد هذا القولَ عن ابن سيرين - وهو محمد - ابن سعدٍ في "طبقاته" 4/ 330 و 9/ 16 عن عمرو بن عاصم الكلابي، عن محمد بن عمرو، عن محمد بن سيرين. ومحمد بن عمرو هذا هو ابن عُبيد الواقِفي أبو سهل، وهو ضعيف، وابن سيرين لم يدرك عمر بن الخطاب.
5354 - أخبرنا أحمد بن عثمان بن يحيى المُقرئ ببغداد، حدثنا أبو قِلابةَ، حدثنا أزْهَرُ بن سعد، حدثنا عبد الله بن عَوْن، عن ثُمامة بن أنس، عن أنس بن مالك: أنه دخل على أخيه البَراء، وهو مُستَلْقٍ واضعًا إحدى رجليه على الأخرى يَتغنّى، فنهاه، فقال: أترهَبُ أن أموتَ على فِراشي، وقد تَفرّدتُ بقتل مئةٍ من الكفار، سوى مَن شَرِكَني فيه الناسُ [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর ভাই বারা (ইবনে মালিক)-এর কাছে গেলেন, যখন তিনি চিৎ হয়ে শুয়ে ছিলেন এবং এক পায়ের উপর অন্য পা তুলে গুনগুন করে গান গাইছিলেন। তখন আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বারণ করলেন। [বারা] বললেন, "আপনি কি ভয় করেন যে আমি আমার বিছানায় (স্বাভাবিক) মৃত্যুবরণ করব? অথচ আমি একাই একশ জন কাফিরকে হত্যা করেছি, যাদের হত্যায় অন্যেরা আমার সাথে শরিক ছিল তাদের বাদ দিয়ে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل أبي قِلابة - وهو عبد الملك بن محمد الرَّقَاشي - وقد رُوي عن أنس من وجوه.وأخرجه معمر بن راشد في "جامعه" (19742)، وأحمد بن منيع في "مسنده" كما في "المطالب العالية" لابن حجر (4086)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (151) و (152)، والطبراني في "الكبير" (691) و (692) و (1178) و (1179)، وابن منده في "معرفة الصحابة" ص 285 - 286، وأبو نعيم الأصبهاني في "حلية الأولياء" 1/ 350، وفي "الإمامة والرد على الرافضة" (38)، وفي "معرفة الصحابة" (1149) و (1150) من طريق محمد بن سيرين، وابنُ سعد 4/ 331، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (1151) من طريق ثابت بن أسلم البُناني، وابن أبي شيبة في "مصنفه" 5/ 312 و 8/ 698 من طريق مصعب بن سليم، ثلاثتهم عن أنس بن مالك.وصحَّح ابن حجر في "الإصابة" 1/ 280 إسناد محمد بن سيرين. قلنا: والطريقان الآخران صحيحان أيضًا. وعبد الرحمن بن مَغْراء صدوق وعنده غرائب ومناكير، وقد خولف في هذا الإسناد فرواه الله عَبْدة بن سُليمان الثقة الحافظ عن محمد بن إسحاق عن عبد بن المثنى بن عبد الله بن أنس بن مالك، عن عمه ثُمامة بن عبد الله بن أنس عن جده أنس بن مالك وعبد الله بن المثنّى هذا ليس بذاك، وعنده أخطاء ومناكير أيضًا، والمعروف في رواية هذا الحديث عن أنس بن مالك غير هذا السياق كما سيأتي.وأخرج رواية محمد بن إسحاق هذه: أبو نُعيم في "حلية الأولياء" 1/ 350، والبيهقي في "شعب الإيمان" (4762) من طريق عَبْدة بن سُليمان، عن محمد بن إسحاق، عن عبد الله بن المثنى، عن ثمامة بن عبد الله بن أنس، عن جده أنس.وأخرج أحمد 21 / (13670) وغيره من طريق حماد بن سلمة، عن ثابت بن أسلم البُناني، عن أنس بن مالك: أنَّ البراء بن مالك كان يحدُو بالرجال، وأنجشة يحدُو بالنساء، وكان حَسَنَ الصوت، فحَدَا فأعنَقَتِ الإبِلُ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا أنجشة رويدًا سَوْقَكَ القَواريرَ"، وإسناده صحيح، فهذا هو المحفوظ في حديث أنس، أنَّ الذي أمره رسول الله صلى الله عليه وسلم بأن يرفق بالقوارير - أي النساء - إنما هو أنجشة، وإنما أمره بذلك لأنَّ الإبل كانت تحمل هوادج النساء، فلما طَربت الإبلُ بصوت أنجشة أعنَقَتْ، أي: أسرعت وعَجِلت بالسير فخشي صلى الله عليه وسلم على النساء حينئذ أن يسقُطن من على ظُهورها بسبب ذلك، وظهر بهذه الرواية علةُ أمره صلى الله عليه وسلم بالرفق بالقوارير، لا كما فهمه محمد بن إسحاق من أنه صلى الله عليه وسلم خشي أن يسمع النساء صوتَه.وهذه الرواية المحفوظة هي في "الصحيحين" أيضًا وغيرهما، لكن لم يقع فيهما ذكر البراء بن مالك.
5355 - أخبرني أبو نُعيم [1] محمد بن عيسى العَطّار بمَرُو، حدثنا عَبْدان بن محمد الحافظ، حدثنا إسحاق بن منصور، حدثنا عبد الرحمن بن مَغْراءَ، حدثنا محمد بن إسحاق، عن عبد الله بن أنس، قال: سمعتُ أنسَ بن مالك يقول: كان البراءُ بن مالك رجلًا حسنَ الصوتِ، فكان يَرجُز لرسولِ الله صلى الله عليه وسلم في بعض أسفارِه، فبينما هو يَرجُزُ إذ قاربَ النساءَ، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إياكَ والقَوارِيرَ" قال: فأمسَكَ. قال محمدٌ: كَرِه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن تَسمعَ النّساءُ صوتَه [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বারা’ ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন সুমধুর কণ্ঠের অধিকারী একজন লোক। তিনি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কোনো কোনো সফরে তাঁর জন্য ‘রাজায’ (এক প্রকার ছন্দোবদ্ধ কবিতা) আবৃত্তি করতেন। একবার যখন তিনি আবৃত্তি করছিলেন, তখন নারীদের কাছাকাছি পৌঁছে গেলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: “সাবধান! কাঁচপাত্র (নারীদের) থেকে সতর্ক হও!” বর্ণনাকারী বলেন, তখন তিনি (আবৃত্তি করা) থেকে বিরত হলেন। মুহাম্মাদ (ইবন ইসহাক) বলেন, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অপছন্দ করতেন যে, নারীরা তার কণ্ঠস্বর শুনুক।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (ب): أبو معين، وضبَّب عليها في (ز)، والمثبت من (ص) و (م) ومن "إتحاف المهرة" لابن حجر (1387)، وقد تقدَّم ذكر هذا الشيخ برقم (5105) بكنية أخرى، وهي أبو بكر. وعبد الرحمن بن مَغْراء صدوق وعنده غرائب ومناكير، وقد خولف في هذا الإسناد فرواه الله عَبْدة بن سُليمان الثقة الحافظ عن محمد بن إسحاق عن عبد بن المثنى بن عبد الله بن أنس بن مالك، عن عمه ثُمامة بن عبد الله بن أنس عن جده أنس بن مالك وعبد الله بن المثنّى هذا ليس بذاك، وعنده أخطاء ومناكير أيضًا، والمعروف في رواية هذا الحديث عن أنس بن مالك غير هذا السياق كما سيأتي.وأخرج رواية محمد بن إسحاق هذه: أبو نُعيم في "حلية الأولياء" 1/ 350، والبيهقي في "شعب الإيمان" (4762) من طريق عَبْدة بن سُليمان، عن محمد بن إسحاق، عن عبد الله بن المثنى، عن ثمامة بن عبد الله بن أنس، عن جده أنس.وأخرج أحمد 21 / (13670) وغيره من طريق حماد بن سلمة، عن ثابت بن أسلم البُناني، عن أنس بن مالك: أنَّ البراء بن مالك كان يحدُو بالرجال، وأنجشة يحدُو بالنساء، وكان حَسَنَ الصوت، فحَدَا فأعنَقَتِ الإبِلُ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا أنجشة رويدًا سَوْقَكَ القَواريرَ"، وإسناده صحيح، فهذا هو المحفوظ في حديث أنس، أنَّ الذي أمره رسول الله صلى الله عليه وسلم بأن يرفق بالقوارير - أي النساء - إنما هو أنجشة، وإنما أمره بذلك لأنَّ الإبل كانت تحمل هوادج النساء، فلما طَربت الإبلُ بصوت أنجشة أعنَقَتْ، أي: أسرعت وعَجِلت بالسير فخشي صلى الله عليه وسلم على النساء حينئذ أن يسقُطن من على ظُهورها بسبب ذلك، وظهر بهذه الرواية علةُ أمره صلى الله عليه وسلم بالرفق بالقوارير، لا كما فهمه محمد بن إسحاق من أنه صلى الله عليه وسلم خشي أن يسمع النساء صوتَه.وهذه الرواية المحفوظة هي في "الصحيحين" أيضًا وغيرهما، لكن لم يقع فيهما ذكر البراء بن مالك.
[2] إسناده ضعيف، محمد بن إسحاق مدّلس وقد عنعنه عند جميع من خرَّج هذا الخبر، وعبد الرحمن بن مَغْراء صدوق وعنده غرائب ومناكير، وقد خولف في هذا الإسناد فرواه الله عَبْدة بن سُليمان الثقة الحافظ عن محمد بن إسحاق عن عبد بن المثنى بن عبد الله بن أنس بن مالك، عن عمه ثُمامة بن عبد الله بن أنس عن جده أنس بن مالك وعبد الله بن المثنّى هذا ليس بذاك، وعنده أخطاء ومناكير أيضًا، والمعروف في رواية هذا الحديث عن أنس بن مالك غير هذا السياق كما سيأتي.وأخرج رواية محمد بن إسحاق هذه: أبو نُعيم في "حلية الأولياء" 1/ 350، والبيهقي في "شعب الإيمان" (4762) من طريق عَبْدة بن سُليمان، عن محمد بن إسحاق، عن عبد الله بن المثنى، عن ثمامة بن عبد الله بن أنس، عن جده أنس.وأخرج أحمد 21 / (13670) وغيره من طريق حماد بن سلمة، عن ثابت بن أسلم البُناني، عن أنس بن مالك: أنَّ البراء بن مالك كان يحدُو بالرجال، وأنجشة يحدُو بالنساء، وكان حَسَنَ الصوت، فحَدَا فأعنَقَتِ الإبِلُ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا أنجشة رويدًا سَوْقَكَ القَواريرَ"، وإسناده صحيح، فهذا هو المحفوظ في حديث أنس، أنَّ الذي أمره رسول الله صلى الله عليه وسلم بأن يرفق بالقوارير - أي النساء - إنما هو أنجشة، وإنما أمره بذلك لأنَّ الإبل كانت تحمل هوادج النساء، فلما طَربت الإبلُ بصوت أنجشة أعنَقَتْ، أي: أسرعت وعَجِلت بالسير فخشي صلى الله عليه وسلم على النساء حينئذ أن يسقُطن من على ظُهورها بسبب ذلك، وظهر بهذه الرواية علةُ أمره صلى الله عليه وسلم بالرفق بالقوارير، لا كما فهمه محمد بن إسحاق من أنه صلى الله عليه وسلم خشي أن يسمع النساء صوتَه.وهذه الرواية المحفوظة هي في "الصحيحين" أيضًا وغيرهما، لكن لم يقع فيهما ذكر البراء بن مالك.
5356 - أخبرني عبد الله بن محمد بن زياد العَدْل، حدثنا محمد بن إسحاق، قال: حدثني محمد بن عُزَيز الأَيلي إملاءً عليَّ، قال: حدثني سَلَامة بن رَوْح، عن عُقَيل بن خالد، عن ابن شِهاب، عن أنس بن مالك، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "كم من ضعيفٍ مُتضَعَّفٍ ذي طِمْرَين، لو أقسمَ على الله لأبَرَّ قَسَمَه، منهم البراءُ بن مالك".وإنَّ البراء لقي زَحْفًا من المشركين، وقد أَوجَعَ المشركون في المسلمين، فقالوا: يا بَراءُ، إِنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إنك لو أقسمتَ على الله لأبَرَّك"، فأقسِمْ على ربِّك، فقال: أقسمتُ عليك يا ربِّ لَمَا مَنَحْتَنا أكتافَهم، ثم التَقَوا على قَنْطرة السُّوس، فأوجَعُوا في المسلمين، فقالوا له: يا بَراءُ، أقسِمْ على رَبِّك، فقال: أقسمتُ عليك يا ربِّ لَمَا مَنَحْتَنا أكتافَهم، وألحَقْتَني بنبيّي صلى الله عليه وسلم، فمُنِحُوا أكتافَهم، وقُتل البراءُ شهيدًا [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কত দুর্বল, দুর্বল হিসেবে বিবেচিত, জীর্ণ দু'টি বস্ত্র পরিহিত মানুষ আছে, যারা আল্লাহর নামে কসম করলে আল্লাহ অবশ্যই তাদের কসম পূর্ণ করেন। তাদের মধ্যে বারা ইবনু মালিকও একজন।
একবার বারা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মুশরিকদের এক বাহিনীর মুখোমুখি হন। মুশরিকরা তখন মুসলিমদের চরম ক্ষতি সাধন করছিল। তখন মুসলিমরা বলল, হে বারা! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তো বলেছেন, 'তুমি আল্লাহর নামে কসম করলে তিনি তা পূর্ণ করবেন।' সুতরাং আপনার রবের নামে কসম করুন। তিনি বললেন, হে আমার রব! আমি তোমার নামে কসম করছি, তুমি অবশ্যই আমাদের তাদের (মুশরিকদের) উপর বিজয় দান করবে।
এরপর তারা সুস সেতুর নিকট পুনরায় মুখোমুখি হয়। মুশরিকরা এবারও মুসলিমদের চরম ক্ষতিসাধন করল। মুসলিমরা তাকে বলল, হে বারা! আপনার রবের নামে কসম করুন। তিনি বললেন, হে আমার রব! আমি তোমার নামে কসম করছি, তুমি অবশ্যই আমাদের তাদের উপর বিজয় দান করবে এবং আমাকে আমার নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মিলিত করবে। এরপর তাদের উপর বিজয় অর্জিত হলো এবং বারা শহীদ হিসেবে নিহত হলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن إن شاء الله من أجل محمد بن عُزيز الأيلي وسلامة بن رَوح الأيلي.وأخرجه البزار (6339)، وابن المنذر في "الأوسط" (8884)، والطحاوي في "مشكل الآثار" (676)، وأبو بكر الآجُرّي في "الغرباء" (28)، وابن عدي في "الكامل" 3/ 314، واللالكائي في "كرامات الأولياء" (106)، وأبو نُعيم في "حلية الأولياء" 1/ 6 - 7، والبيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 368، وفي "شعب الإيمان" (10001)، وفي "الاعتقاد" ص 315 - 316، وابن الجوزي في "المنتظم" 4/ 239 من طرق عن محمد بن عُزيز، بهذا الإسناد. واقتصر بعضهم على ذكر المرفوع، وبعض من اقتصر على المرفوع لا يذكر فيه قوله: "منهم البراء بن مالك".وأخرجه مختصرًا بالمرفوع منه أيضًا الترمذي (3854) وغيره من طريق ثابت البُناني وعلي بن زيد بن جُدعان، عن أنس بن مالك. وقال الترمذي: حديث حسن غريب. قلنا: إسناده جيد من جهة ثابت البناني.وقد روي المرفوعُ منه عن أنس بن مالك من غير هذه الأوجه لم يُذكَر فيه البراء بن مالك. انظر أحمد 19/ (12476) و 20 / (12704)، والبخاري، (2703)، ومسلمًا (1675)، وأبا داود (4595)، وابن ماجه (2649)، والنسائي (6931).قوله: "ذي طِمرين" بكسر الطاء وسكون الميم بعدها راء: الثوبُ الخَلَق.وقوله: "متضعَّف" قال النووي في "شرح مسلم" 17/ 186 - 187: ضبطوه بفتح العين وكسرها، والمشهور الفتح، ومعناه: يستضعِفُه الناسُ ويحتقرونه ويتجبّرون عليه لضعف حاله في الدنيا، وأما رواية الكسر فمعناها: متواضع متذلِّل خامل واضع من نفسه.والسُّوس: بلدة من كور الأهواز من بلاد خُوْزِستان، تم فتحها على يد أبي موسى الأشعري.
5357 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ العدل، حدثنا موسى بن هارون، حدثنا أزهَرُ بن جَميل، حدثنا عمر بن حفص، عن ثابت، عن أنس بن مالك، قال: لما كان يومُ العَقَبة بفارسَ، وقد زُوِيَ الناسُ قام البراءُ بنُ مالك، فرَكِب فرسَه، وهي توَجْى [1]، ثم قال لأصحابه: بئسَ ما عَوّدتُم أقرانَكم عليكم، فحَمَل على العدوِّ، فَفَتَح اللهُ على المسلمين، واستُشهد البراءُ يومئذٍ [2].قال أبو عِمران موسى بن هارون: إنَّ البراء استُشهِد يوم تُستَر، وهي من فارس، وإنما استُشهد البراء بن مالك سنة إحدى وعشرين من الهجرة. ذكرُ النُّعمان بن مُقَرِّن، وهو النُّعمان بن عمرو بن مُقرِّن رضي الله عنه -
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন পারস্যে আকাবার যুদ্ধ সংঘটিত হলো এবং মানুষজন (ভয়ে) পিছু হটতে শুরু করল, তখন বারা’ ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উঠে দাঁড়ালেন এবং তাঁর ঘোড়ায় আরোহণ করলেন—ঘোড়াটি ছিল ক্ষীণকায়। এরপর তিনি তাঁর সাথীদেরকে বললেন, "তোমাদের প্রতিদ্বন্দ্বীদের বিরুদ্ধে তোমরা যে অভ্যাস তৈরি করেছ, তা খুবই মন্দ (তোমাদের পিছু হটা উচিত নয়)।" অতঃপর তিনি শত্রুর উপর আক্রমণ করলেন। ফলে আল্লাহ মুসলিমদের জন্য বিজয় দান করলেন এবং সেই দিনই বারা’ শাহাদাত বরণ করলেন। আবু ইমরান মূসা ইবনু হারূন বলেন: বারা’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তুস্তার-এর দিনে শহীদ হন, যা পারস্যের অন্তর্ভুক্ত। বারা’ ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হিজরতের একুশতম বছরে শহীদ হন। নু’মান ইবনু মুকাররিন-এর আলোচনা, আর তিনি হলেন নু’মান ইবনু আমর ইবনু মুকাররিন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিবরণ।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رُسمت هذه اللفظة في (ص) و (م) و (ب) وهامش: (ز) برحا، وأعجمت في "تلخيص الذهبي": ترجا، وفي المطبوع: تزجى، والمثبت من (ز) هو الموافق لما في "الطبقات الكبرى" لابن سعد 4/ 332 و 9/ 17، والمعنى: أنَّ فرسه كانت تشتكي باطن حافرها، أو أنها قد رقَّ حافِرُها من كثرة المشي. وقد يصحُّ ما جاء في سائر نسخنا الخطية بأن يُضبط: تُزجا، بمثناةٍ ثم زاي ثم جيم، فتكون بمعنى: تُدفَع برفق، والله أعلم. التراجم التي ورد فيها نسب بني مُقرِّن. ولا يُعرف في أسماء العرب من اسمه هجين، بالنون.
[2] إسناده ضعيف جدًّا من أجل عمر بن حفص - وهو أبو حفص العَبْدي - فهو متروك الحديث، وما قبله أصحُّ منه. ثابت: هو ابن أسلم البُناني.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته الكبرى" 4/ 332 و 9/ 17 عن عمر بن حفص، به.وقد صحَّ عن ثابت عن أنس بن مالك مثلُ هذه القصة والقولِ المنسوب للبراء بن مالك هنا لكن لثابت بن قيس بن شمّاس يوم اليمامة، وليس بفارس كما تقدَّم برقم (5106)، وإسناده صحيح. فكأنَّ هذا هو أصل القصة، ثم اختلط الأمر على حفص بن عمر العَبْدي، فدخل له حديث في حديثٍ. التراجم التي ورد فيها نسب بني مُقرِّن. ولا يُعرف في أسماء العرب من اسمه هجين، بالنون.
5358 - أخبرني أبو محمد أحمد بن عبد الله المُزَني، حدثنا أبو خَليفة القاضي، حدثنا محمد بن سلّام الجُمَحي، عن أبي عُبيدة مَعْمَر بن المُثنَّى، قال: النُّعمان بن عمرو بن مُقرِّن بن عامر [1] بن بكر بن هُجَير [2] بن نَصْر المُزني.
আবু উবাইদাহ মা'মার ইবনুল মুছান্না থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নূ'মান ইবনু আমর ইবনু মুক্বাররিন ইবনু আমির ইবনু বকর ইবনু হুজাইর ইবনু নাসর আল-মুযানী।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذلك سُمِّي هذا الرجل في نسب النعمان بن مقرِّن، وكذلك سُمِّي في "جمهرة أنساب العرب" لابن حزم ص 202، بينما جاء في سائر كتب التراجم والأنساب تسميته عائذًا، كما سيُسمِّيه الواقديُّ لاحقًا. التراجم التي ورد فيها نسب بني مُقرِّن. ولا يُعرف في أسماء العرب من اسمه هجين، بالنون.
[2] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: هجين، بالنون، والتصويب من مصادر الأنساب وكتب التراجم التي ورد فيها نسب بني مُقرِّن. ولا يُعرف في أسماء العرب من اسمه هجين، بالنون.