হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5459)


5459 - أخبرني عبد الرحمن بن الحسن القاضي، حدَّثنا إبراهيم بن الحسين، حدَّثنا آدم بن أبي إياس، حدَّثنا شُعبة، حدثني أبو العُميس، عن مُسلم البَطِين، عن عمرو بن ميمون، قال: كان عبدُ الله تأتي عليه السَّنَةُ لا يُحدِّث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، فحدَّث ذاتَ يومٍ عن رسول الله صلى الله عليه وسلم بحديثٍ فعَلَتْه كآبةٌ، وجعل العَرَقُ يَتحادَر على جبهته، ويقول: نحوُ هذا أو قريبٌ من هذا [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এমন অবস্থা ছিল যে, তাঁর উপর দিয়ে এক বছর কেটে যেত, কিন্তু তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে কোনো হাদীস বর্ণনা করতেন না। অতঃপর একদিন যখন তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে একটি হাদীস বর্ণনা করলেন, তখন তাঁকে বিষণ্ণতা আচ্ছন্ন করল এবং তাঁর কপাল বেয়ে ঘাম ঝরতে লাগল। আর তিনি বলছিলেন: "এইরূপ, অথবা ইহার কাছাকাছি।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وعبد الرحمن بن الحسن القاضي متابع، وقد رواه بعضهم فزاد في إسناده رجلين بين مسلم البَطِين وعمرو بن ميمون - وهو الأودي - وهذان الرجلان هما إبراهيم بن يزيد بن شَريك التَّيمي وأبوه، فيرويه إبراهيم التيمي عن أبيه عن عمرو بن ميمون كما تقدَّم عند المصنف برقم (383)، وقد ذكر الدارقطني في "علله" (3159) هذا الاختلاف وصحَّح الروايتين جميعًا، مشيرًا إلى روايةٍ صرَّح فيها مُسلم البطين بسماعه من عمرو بن ميمون - وهي عند البخاري في "تاريخه الكبير" 7/ 268. فقال الدارقطني: يشبه أن يكون مسلم سمعه منه بعد أن سمعه من إبراهيم التيمي عن أبيه عن عمرو.وأخرجه البزار (1863)، وابن الأعرابي في "معجمه" (605)، والطبراني في "الأوسط" (1450)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 33/ 162 من طريق شعبة، عن أبي العُميس، به.وقد رواه عن أبي العُميس كذلك شريك النخعي فيما سلف عند المصنف برقم (382) لكن قال فيه شريكٌ: عن أبي العميس، عن مسلم البطين، عن أبي عمرو الشيباني، عن ابن مسعودٍ.فذكر أبا عمرو الشيباني بدل عمرو بن ميمون الأودي، ووهَّمه الدارقطني.وأخرجه الطيالسي (324)، وابن سعد 3/ 144، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 2/ 547 - 548، والشاشي (667)، والطبراني في "الكبير" (8612)، وابن عساكر 33/ 162 و 163 من طريق عبد الرحمن بن عبد الله المسعودي أخي أبي العُميس، والطبراني (8616)، والدارقطني في "العلل" (3159)، وابن عساكر 33/ 163 من طريق عمار الدُّهْني، والبخاري في "تاريخه الكبير" 4/ 216، والبزار (1862)، والطبراني (8615) من طريق سنة بن مسلم البَطين، ثلاثتهم عن مسلم البَطِين، عن عمرو بن ميمون، به.ورواه عن مسلم البَطين كذلك إبراهيم بن مهاجر عند أحمد 6/ (3670)، والطبراني (8616)، وأبي نُعيم في "الحلية" 7/ 109، والخطيب في "موضح أوهام الجمع والتفريق" 1/ 297، وابن عساكر 33/ 164، لكن قال فيه إبراهيم بن مهاجر: عن مسلم البطين، عن أبي عبد الرحمن السُّلمي، عن ابن مسعودٍ. ووهَّمه الدارقطني.وقد سلف نحوه عند المصنف برقم (381) عن مسروقٍ عن ابن مسعودٍ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5460)


5460 - أخبرنا أبو إسحاق إبراهيم بن محمد بن يحيى، حدَّثنا محمد بن إسحاق الثقفي، حدَّثنا أبو كُريب، حدَّثنا إبراهيم بن يوسف بن أبي إسحاق، عن أبيه، عن أبي إسحاق السَّبيعي، عن الأسود، أنه سمع أبا موسى يقول: قدمتُ أنا وأخي من اليمن، فمَكَثْنا حِينًا ما نُرَى إلَّا أنَّ عبد الله بن مسعود رجلٌ من أهل بيتِ رسول الله صلى الله عليه وسلم، مما نرى من دخوله ودخولِ أمِّه [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!




আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ও আমার ভাই ইয়েমেন থেকে আগমন করলাম। আমরা কিছুকাল অবস্থান করলাম। আমরা শুধু এটাই মনে করতাম যে আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আহলে বাইতের (পরিবারের) একজন লোক, কারণ আমরা তাঁর এবং তাঁর মায়ের (রাসূলের বাড়িতে) অবাধ প্রবেশ দেখতে পেতাম।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسنٌ من أجل إبراهيم بن يوسف - وهو ابن إسحاق بن أبي إسحاق عمرو بن عبد الله السَّبيعي - وقد توبع. أبو كُريب: هو محمد بن العلاء بن كُريب، والأسود: هو ابن يزيد النَّخَعي.وأخرجه البخاري (3763)، والترمذي (3806) عن أبي كريب، بهذا الإسناد.وأخرجه مسلم (2460) من طريق إسحاق بن منصور، عن إبراهيم بن يوسف، به. فاستدراك الحاكم له عليهما ذهولٌ منه.وأخرجه البخاري (4384)، ومسلم (2460)، والنسائي (8329) من طريق زكريا بن أبي زائدة، وأحمد 32/ (19588)، والنسائي (8206) من طريق سفيان الثوري، كلاهما عن أبي إسحاق السَّبيعي، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5461)


5461 - حدَّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدَّثنا أحمد بن عبد الجبار، حدَّثنا أبو معاوية، عن الأعمش، عن شَقِيق، قال: سمعتُ حذيفة يقول: إِنَّ أشبه الناس هَدْيًا وسَمْتًا ودَلًّا بمحمدٍ صلى الله عليه وسلم عبدُ الله بنُ مسعود، من حينِ يَخرجُ إلى حينِ يرجعُ، ما أدري ما في بيتهِ، ولقد عَلِمَ المحفوظون من أصحابِ محمد صلى الله عليه وسلم أَنَّ ابنَ أمّ عَبْدٍ من أقربهم وسيلةً عند الله يومَ القيامة [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নিঃসন্দেহে আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ হলেন আচার-আচরণ, বেশভূষা ও চালচলনে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে লোকদের মধ্যে সর্বাধিক সাদৃশ্যপূর্ণ—যখন থেকে তিনি বের হন এবং যখন ফিরে আসেন (সর্বদাই)। আমি তার ঘরের ভেতরের অবস্থা সম্পর্কে জানি না। মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাত সংরক্ষণকারী সাহাবীগণ নিশ্চিতভাবেই জানতেন যে, ইবনু উম্মি আবদ (আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ) কিয়ামতের দিন আল্লাহর নিকট নৈকট্য প্রাপ্তিতে তাদের মধ্যে সবচেয়ে অগ্রগামী হবেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسنٌ من أجل أحمد بن عبد الجبار - وهو العُطاردي - وقد توبع.أبو معاوية: هو محمد بن خازم الضرير، والأعمش: هو سليمان بن مِهْران، وشقيق: هو ابن سَلَمة أبو وائل.وأخرجه أحمد 38/ (23341) عن محمد بن عبيد الطنافسي، و (23342) من طريق زائدة بن قدامة، والبخاري (6097) من طريق أبي أسامة حماد بن أسامة، ثلاثتهم عن الأعمش، به.فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه أحمد (23351) من طريق أبي عمرو الشيباني، عن حذيفة بن اليمان. وسنده صحيح.وأخرجه أحمد (23308) و (23350) و (23408) و (23413)، والبخاري (3762)، والترمذي (3807)، والنسائي (8208)، وابن حبان (7063) من طريق أبي إسحاق السَّبيعي، عن عبد الرحمن بن يزيد النخعي، عن حُذيفة بن اليمان.وقد صرَّح أبو إسحاق السَّبيعي بسماعه لهذا الخبر من عبد الرحمن بن يزيد، دون آخره فقد نصَّ في رواية شعبة عنه عند أحمد (23350) أنه لم يسمع منه روايته عن حذيفة قوله: ولقد علم المحفوظون. غير أنَّ بعضهم أدرج هذه القطعة إدراجًا في خبر أبي إسحاق عن عبد الرحمن بن يزيد. وإنما يرويها أبو إسحاق عن الأعمش، عن أبي وائل شقيق بن سَلَمة، عن حذيفة كما أخرجه أحمد في "فضائل الصحابة" (1545)، وغيره.وقد تقدمت هذه القطعة مفردةً برقم (3255) من طريق محاضِر بن المورِّع عن الأعمش.وقد روي تشبيه عبد الله بن مسعود بالنبي صلى الله عليه وسلم في هَدْيه ودَلِّه عن علقمة بن قيس كما سيأتي عند المصنف برقم (5482).قال ابن الأثير في "النهاية" في مادة (دلل): الدَّلُّ والهدي والسَّمْت عبارة عن الحالة التي يكون عليها الإنسان من السكينة والوقار، وحسن السيرة والطريقة واستقامة المنظر والهيئة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5462)


5462 - أخبرني الحسن بن حَلِيم المَروَزي، أخبرنا أبو المُوجِّه، أخبرنا عَبْدان، أخبرنا عبد الله، أنا مِسعَر، قال: حدثني مَعْن بن عبد الرحمن، عن عون بن عبد الله بن عُتبة، عن أبيه، قال: كان عبد الله إذا هدَأَتِ العيونُ سمعتَ له دَوِيًّا كدَوِيِّ النحل، حتى يُصبح [1].




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন চোখগুলো শান্ত হয়ে যেত (অর্থাৎ রাতে মানুষ ঘুমিয়ে পড়ত), তখন তাঁর (তিলাওয়াতের) নিকট থেকে মৌমাছির গুঞ্জনের মতো একটি গুঞ্জন শোনা যেত, যা সকাল হওয়া পর্যন্ত চলত।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكن المحفوظ أنه من رواية عون بن عبد الله بن عُتبة - وهو ابن مسعود - عن أخيه عُبيد الله بن عبد الله بن عُتبة مرسلًا كما رواه وكيع بن الجراح في "الزهد" (155)، ومن طريقه أخرجه أحمد في "الزهد" (848)، وابن عساكر 33/ 166.وكذلك رواه عَبْدة بن سليمان عند ابن أبي شيبة 2/ 272، كلاهما (وكيع وعبدة) عن مسعر بن كدام.أبو الموجِّه: هو محمد بن عمرو بن الموجِّه الفَزَاري، وعَبْدان لقب عبد الله بن عثمان بن جَبَلة المروزي، وعبد الله: هو ابن المبارك، ومَعْن بن عبد الرحمن: هو ابن عبد الله بن مسعود. عنه غير جامع بن شداد - تابعي ذكره ابن حبان، وروى عن عبد الله بن مسعود غير خبرٍ. وقد روي مثل خبره عن شقيق أبي وائل أيضًا. أبو داود الطيالسي: هو سليمان بن داود بن الجارود.وأخرجه ابن سعد 3/ 145، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 11/ 222 من طرق عن شعبة، به.ويشهد له ما رواه أبو وائل شقيق بن سَلَمة قال: كان عبد الله يذكرنا كل يوم خميس، فقال له رجلٌ: يا أبا عبد الرحمن، إنا نحب حديثك ونشتهيه، ولَودِدْنا أنك حدثتنا كل يوم … . أخرجه أحمد 7/ (4439)، ومسلم (2821)، وهو كذلك عند البخاري (70) لكن دون قوله: إنا نحب حديثك ونشتهيه.ولتذكير ابن مسعود أصحابَه كلَّ خميس انظر خبر عمرو بن ميمون الأودي المتقدم برقم (383).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5463)


5463 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدَّثنا أحمد بن يونس الضَّبّي، حدَّثنا أبو داود الطَّيالسي، حدَّثنا شُعبة، أخبرنا جامع بن شدَّاد قال: سمعتُ عبد الله بن مِرْداسٍ قال: كان عبد الله يَخطُبنا كلَّ خميسٍ على رجليه، فيتكلم بكلماتٍ ونحن نَشتهي أن يزيدَ [1].




আব্দুল্লাহ ইবনু মিরদাস থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আব্দুল্লাহ প্রতি বৃহস্পতিবার দাঁড়িয়ে আমাদের খুতবা (ভাষণ) দিতেন। তিনি অল্প কিছু কথা বলতেন, কিন্তু আমরা চাইতাম যে তিনি আরও বেশি কথা বলুন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد محتمل للتحسين من أجل عبد الله بن مرداس فهو - وإن لم يرو عنه غير جامع بن شداد - تابعي ذكره ابن حبان، وروى عن عبد الله بن مسعود غير خبرٍ. وقد روي مثل خبره عن شقيق أبي وائل أيضًا. أبو داود الطيالسي: هو سليمان بن داود بن الجارود.وأخرجه ابن سعد 3/ 145، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 11/ 222 من طرق عن شعبة، به.ويشهد له ما رواه أبو وائل شقيق بن سَلَمة قال: كان عبد الله يذكرنا كل يوم خميس، فقال له رجلٌ: يا أبا عبد الرحمن، إنا نحب حديثك ونشتهيه، ولَودِدْنا أنك حدثتنا كل يوم … . أخرجه أحمد 7/ (4439)، ومسلم (2821)، وهو كذلك عند البخاري (70) لكن دون قوله: إنا نحب حديثك ونشتهيه.ولتذكير ابن مسعود أصحابَه كلَّ خميس انظر خبر عمرو بن ميمون الأودي المتقدم برقم (383).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5464)


5464 - وأخبرنا أبو عبد الله الصفَّار، حدَّثنا أحمد بن يونس الضَّبّي، حدَّثنا أبو داود، حدَّثنا شعبة، عن سلمة بن كُهيل، عن حَبّة العُرَني، قال: قرأتُ في كتاب عمر إلى أهل الكوفة: أما بعدُ، فأنتم رأسُ العربِ وجُمْجُمتُها، وأنتم سَهْمي الذي أَرمي به، إن جاء شيءٌ من هاهنا وهاهنا، وقد بعثتُ إليكم عبدَ الله واخترتُه لكم، وآثرتُكم به على نَفْسي [1].




হাব্বাহ আল-‘উরানী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি কূফাবাসীর নিকট উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর একটি পত্রে পড়লাম: অতঃপর, তোমরা হলে আরবের মাথা এবং তার মগজ (কেন্দ্র/প্রধান অংশ)। আর তোমরা হলে আমার সেই তীর, যা দিয়ে আমি আঘাত করি, যদি এদিক বা ওদিক থেকে কোনো (বিপদ) আসে। আর আমি তোমাদের নিকট আব্দুল্লাহকে (ইবনু মাসউদকে) প্রেরণ করেছি এবং তোমাদের জন্য তাকে মনোনীত করেছি, এবং আমার নিজের চেয়েও তোমাদেরকে তার ক্ষেত্রে প্রাধান্য দিয়েছি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات غير حَبّة العُرَني، فضعيف. أبو داود: هو سليمان بن داود الطيالسي.وأخرجه ابن سعد 8/ 130، وابن أبي شيبة 12/ 186، وابن أبي خيثمة في السفر الثالث من "تاريخه" (3518)، ومحمد بن خلف المعروف بوكيع في "أخبار القضاة" 2/ 188 من طرق عن شعبة، به.وسيأتي عند المصنف برقم (5767) من طريق أبي إسحاق السَّبيعي عن حارثة بن مُضرِّب قال: كتب إلينا عمر بن الخطاب: إني قد بعثت إليكم عمار بن ياسر أميرًا، وابنَ مسعود معلِّمًا ووزيرًا، وهما من النُّجَباء من أصحاب محمد صلى الله عليه وسلم من أهل بدرٍ … وقد آثرتكم بعبد الله على نفسي. وإسناده صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5465)


5465 - حدثني أبو بكر أحمد بن بالَوَيهِ، حدَّثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، قال: حدثني أبي، حدَّثنا عبد الرحمن، عن سفيان، عن أبي إسحاق، عن حَبّة العُرَني: أَنَّ ناسًا أتَوا عليًّا، فأثنَوا على عبد الله بن مسعود، فقال: أقولُ فيه مثلَ ما قالُوا وأفضل: قرأ القُرآنَ، وأحلَّ حلالَه وحَرم حرامَه، فقيهٌ في الدِّين، عالمٌ بالسُّنة [1].




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই কিছু লোক তাঁর (আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) কাছে এসে আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর প্রশংসা করল। অতঃপর তিনি বললেন: তোমরা যা বললে আমিও তাঁর সম্পর্কে সেই একই কথা বলব, বরং আরও উত্তম কথা বলব: তিনি কুরআন পাঠ করেছেন, এর হালালকে হালাল এবং হারামকে হারাম বলে ঘোষণা করেছেন (বা মেনেছেন)। তিনি দ্বীনের গভীর জ্ঞানী (ফকীহ) এবং সুন্নাহ সম্পর্কে বিজ্ঞ (আলিম)।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف حَبّة العُرَني، وقد روي نحو هذا عن علي من وجوهٍ أخرى، منها ما سيأتي بالرقم (5478) و (5731). عبد الرحمن: هو ابن مهدي، وسفيان: هو الثوري، وأبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السَّبيعي.وأخرجه ابن سعد 3/ 144، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 33/ 150 عن قبيصة بن عُقبة، عن سفيان الثوري، به.وأخرجه بنحوه ابن سعد 3/ 144، وابن أبي شيبة 12/ 117، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 11/ 221، وابن عساكر 33/ 150 من طريق الأعمش، عن حبة بن جوين العُرني.وأخرجه ضمن خبر طويل في أسئلةٍ وُجِّهت لعليٍّ رضي الله عنه عن رأيه في جمع من الصحابة وأسئلة أخرى: أحمد بن منيع في "مسنده" كما في "المطالب العالية" لابن حجر (3990)، والطبراني في "الكبير" (6042)، وابن عساكر 21/ 421 - 422، والضياء المقدسي في "المختارة" (494) من طريق ابن جريج قال: حدَّثنا أبو حرب بن أبي الأسود عن أبيه، وقال ابن جريج: وعن رجل عن زاذان أبي عمر، كلاهما عن عليّ. وإسناده عن أبي الأسود صحيح. وأخرجه مسلم (2461) من طريق أبي إسحاق السبيعي، عن أبي الأحوص بنحوه مختصرًا.وأخرجه بنحوه كذلك مسلم (2461) من طريق أبي عُبيدة عبد الملك بن معن المسعودي، عن الأعمش، عن زيد بن وهب، قال: كنا جلوسًا عند حذيفة وأبي موسى في المسجد … ولم يسُق مسلم لفظه. وقال: وحديث قطبة أتمُّ وأكثر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5466)


5466 - حدثني أبو بكر بن بالَوَيهِ، حدَّثنا محمد بن أحمد بن النضر، حدَّثنا معاوية بن عمرو، حدَّثنا زائدة، عن الأعمش، عن مالك بن الحارث [عن أبي الأحوص] [1] عن أبي مسعود عُقبة بن عَمرو، قال: ما أُرى رجلًا أعلمَ بما أنزلَ اللهُ على محمد صلى الله عليه وسلم مِن عبد الله بن مسعود، فقال أبو موسى: إن تَقُل ذلك، فإنه كان يسمعُ حين لا نسمعُ، ويدخُلُ حين لا ندخُلُ [2].




আবূ মাসঊদ উকবাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওপর আল্লাহ যা নাযিল করেছেন, সে বিষয়ে আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চেয়ে অধিক জ্ঞানী আর কাউকে আমি দেখি না। তখন আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনি যদি এই কথা বলেন (তবে তা সত্য), কারণ আমরা যখন শুনতে পেতাম না, তিনি তখন শুনতে পেতেন এবং আমরা যখন (নবীর গৃহে) প্রবেশ করতে পারতাম না, তিনি তখন প্রবেশ করতেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] سقط ذكر أبي الأحوص من إسناد الخبر في النسخ الخطية، وهو ثابت عند الطبراني في "الكبير" (8495) في روايته عن محمد بن أحمد بن النضر شيخ شيخ المصنف هنا، وثبت لجميع من روى هذا الخبر عن الأعمش. وأبو الأحوص: هو عوف بن مالك الجُشَمي. وأخرجه مسلم (2461) من طريق أبي إسحاق السبيعي، عن أبي الأحوص بنحوه مختصرًا.وأخرجه بنحوه كذلك مسلم (2461) من طريق أبي عُبيدة عبد الملك بن معن المسعودي، عن الأعمش، عن زيد بن وهب، قال: كنا جلوسًا عند حذيفة وأبي موسى في المسجد … ولم يسُق مسلم لفظه. وقال: وحديث قطبة أتمُّ وأكثر.



[2] إسناده صحيح. زائدة: هو ابن قدامة، والأعمش: هو سليمان بن مِهْران، ومالك بن الحارث: هو السُّلَمي الكوفي.وأخرجه بنحوه مسلم (2461)، والنسائي (8203) من طريق قُطبة بن عبد العزيز، ومسلم (2461) من طريق شيبان بن عبد الرحمن، كلاهما عن الأعمش، عن مالك بن الحارث، عن أبي الأحوص، قال: كنا في دار أبي موسى مع نفر من أصحاب عبد الله … وذكر الخبر بنحوه. وأخرجه مسلم (2461) من طريق أبي إسحاق السبيعي، عن أبي الأحوص بنحوه مختصرًا.وأخرجه بنحوه كذلك مسلم (2461) من طريق أبي عُبيدة عبد الملك بن معن المسعودي، عن الأعمش، عن زيد بن وهب، قال: كنا جلوسًا عند حذيفة وأبي موسى في المسجد … ولم يسُق مسلم لفظه. وقال: وحديث قطبة أتمُّ وأكثر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5467)


5467 - حدَّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدَّثنا بحر بن نصر، حدَّثنا عبد الله بن وهب، قال: أخبرني سفيان الثَّوري، عن الأعمش، عن إبراهيم التَّيمي، عن أبيه، قال: قال عبد الله بن مسعود: لو تعلمون ذُنوبي ما وَطِئَ عَقِبي رجلان، ولَحَثَيْتُم على رأسي الترابَ، ولَوَدِدتُ أنَّ الله غفر لي ذنبًا من ذنوبي وإني دُعِيتُ عبدَ الله بنَ رَوْثةٍ [1].




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: তোমরা যদি আমার গুনাহসমূহ জানতে, তবে দু'জন লোকও আমার পিছু নিত না (আমার পদচিহ্ন অনুসরণ করত না), আর তোমরা আমার মাথায় মাটি ছুঁড়ে মারতে। আর আমি চাইতাম যে, আল্লাহ যেন আমার গুনাহগুলোর মধ্য থেকে একটি গুনাহ হলেও ক্ষমা করে দেন এবং আমাকে যেন আব্দুল্লাহ ইবনে রওসাহ নামে ডাকা হতো।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. الأعمش: هو سليمان بن مِهْران، وإبراهيم التيمي: هو ابن يزيد بن شريك.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (821)، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 33/ 168 من طريق أبي عامر العَقَدي، عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الله بن وهب في "جامعه" (28 - طبعة أبي الخير) عن عبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان الثوري، عن الأعمش، عن إبراهيم التيمي، عن أسلم قال: قال عبد الله بن مسعود … فذكره، فذكر أسلم بدل أبيه، ويغلب على ظننا أن لفظة "أسلم" تحريف عن "أبيه" فالمعروف في رواية الثوري ذكر والد إبراهيم التيمي يزيد بن شريك كما في رواية المصنِّف والبيهقي.وأخرجه البيهقي (822) من طريق محاضر بن المُورِّع، عن الأعمش، عن إبراهيم التيمي، عن أبيه، عن ابن مسعودٍ.وأخرجه ابن أبي شيبة 13/ 288، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 2/ 548، و 549، وأبو داود في "الزهد" (149)، والبيهقي (819)، وابن عساكر 33/ 168 و 169 من طريق أبي معاوية محمد بن خازم الضرير، وابن أبي شيبة 13/ 88 وعن وكيع بن الجرّاح، وأبو داود (140) من طريق جرير بن عبد الحميد، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 133، وابن عساكر 33/ 167 - 168 من طريق شعبة بن الحجاج، كلهم عن الأعمش، عن إبراهيم التيمي، عن الحارث بن سويد، عن ابن مسعود بنحوه. والحارث من كبار أصحاب ابن مسعود.وأخرجه ابن أبي شيبة 13/ 289 من طريق قيس بن أبي حازم، وابن وهب في "جامعه" (28)، وأحمد في "الزهد" (859)، والحُسين بن الحَسن المروزي في زياداته على "الزهد" لابن المبارك (490)، ويعقوب بن سفيان 2/ 548 - 549، وابن أبي الدنيا في "المتمنين" (19)، وأبو القاسم البغوي في "الجعديات" (1729)، وأبو نعيم في "الحلية" 8/ 314، والبيهقي في "الشعب" (6769)، وابن عساكر 33/ 169 من طريق أبي وائل شقيق بن سَلَمة، وأحمد في "الزهد" (858)، ويعقوب بن سفيان 2/ 549، والبيهقي (820)، وابن عساكر 33/ 169 من طريق حميد بن هلال، ثلاثتهم عن ابن مسعودٍ بنحوه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5468)


5468 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ، حدَّثنا السَّرِيّ بن خُزيمة وأحمد بن نَصْر، قالا: حدَّثنا أبو غَسّان مالك بن إسماعيل، حدَّثنا إسرائيل، عن المُغيرة، عن إبراهيمَ، عن علقمةَ، قال: قدمتُ الشام فصليتُ ركعتين، ثم قلتُ: اللهم يَسِّر لي جليسًا صالحًا، فلقيتُ قومًا فجلستُ، فإذا بواحدٍ جاء حتى جلس إلى جَنْبي، فقلتُ: مَن ذا؟ قال أبو الدَّرْداء، فقلت: إني دعوتُ الله أن يُيسِّرَ لي جليسًا صالحًا، فيسَّرَ لي، فقال: ممَّن أنتَ؟ قلت: من أهل الكوفة، قال: أو ليس عندكم ابن أم عبدٍ صاحبُ النعلين والوِسادةِ والمِطْهَرة، وفيكم الذي أجارهُ الله من الشيطانِ على لسان نبيِّه صلى الله عليه وسلم، وفيكم صاحبُ سرِّ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم الذي لا يَعلمُه غيرُه [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!والأسانيد التي قبلَه كلُّها صحيحةٌ ولم يُخرجاها، وإنما تركتُ الكلام عليها لأنها غير مُسنَدَةٍ وهذا مُسنَدٌ.




আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [আলকামা (রাহ.)] বলেন: আমি সিরিয়ায় (শাম) এলাম এবং দু’রাকআত সালাত আদায় করলাম। এরপর বললাম: হে আল্লাহ! আমার জন্য একজন সৎ সঙ্গীর ব্যবস্থা করে দিন। আমি একদল লোকের সাথে দেখা করে বসলাম। হঠাৎ একজন লোক এসে আমার পাশে বসলেন। আমি জিজ্ঞেস করলাম: ইনি কে? বলা হলো: ইনি আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আমি বললাম: আমি আল্লাহর কাছে একজন সৎ সঙ্গী চাওয়া মাত্রই তিনি তা সহজ করে দিলেন। তিনি (আবু দারদা) জিজ্ঞেস করলেন: আপনি কোন্ এলাকার লোক? আমি বললাম: আমি কুফাবাসী। তিনি বললেন: তোমাদের কাছে কি ইবনু উম্মে আব্দ (আব্দুল্লাহ ইবনু মাসউদ) নেই, যিনি (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর) জুতা, বালিশ এবং পবিত্রতার পাত্রের দায়িত্বশীল ছিলেন? আর তোমাদের মাঝে কি সেই ব্যক্তি নেই, যাকে আল্লাহ তাঁর নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জবানের মাধ্যমে শয়তান থেকে রক্ষা করেছেন? আর তোমাদের মাঝে কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সেই গোপন কথার ধারক নেই, যা অন্য কেউ জানে না?




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. أحمد بن نصر: هو أحمد بن محمد بن نصر النيسابُوري اللبَّاد، وإسرائيل: هو ابن يونس بن أبي إسحاق السَّبيعي، والمغيرة: هو ابن مِقسَم الضبي، وإبراهيم: هو ابن يزيد النَّخَعي، وعلقمة: هو ابن قيس النَّخَعي.وأخرجه البخاري (3742) عن أبي غسان مالك بن إسماعيل، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 45/ (27544) عن أسود بن عامر، عن إسرائيل، به.وأخرجه أحمد (27538) و (27539)، والبخاري (3743)، والنسائي (8241)، وابن حبان (6331) من طريق شعبة بن الحجاج، وابن حبان (7127) من طريق جرير بن عبد الحميد، كلاهما عن المغيرة بن مقسَم به. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وقد سمَّى شعبةُ في روايته الذين وصفهم أبو الدرداء بما وصفهم به، فقال: صاحب الوساد ابن مسعود، وصاحب السر حذيفة، والذي أُجير من الشيطان عمار. وفي بعض طرقه عن شعبة في وصف ابن مسعود: صاحب الوساد والسِّواك.وسيأتي نظير هذا الخبر من حديث أبي هريرة كما سيأتي برقم (5783)، وزاد فيه أبو هريرة ذِكرَ سعدِ بن أبي وقاص وسلمانَ الفارسي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5469)


5469 - حدَّثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا علي بن عبد العزيز ومحمد بن غالب قالا: حدَّثنا أبو حُذيفة.وحدثنا دَعْلَج بن أحمد السِّجْزي ببغداد، حدَّثنا عبد العزيز بن معاوية البصري، حدَّثنا أبو حُذيفة، حدَّثنا سفيان الثَّوري، عن منصور، عن هِلال بن يَسَافٍ، عن عبد الله بن ظالم، عن سعيد بن زيد، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "عشرةٌ في الجنة"، فذكر أبا بكر وعمرَ وعثمانَ وعليًّا وطلحةَ والزبيرَ وعبد الرحمن بنَ عوف وسعد بنَ أبي وقاص وسعيدَ بنَ زيد وعبدَ الله بنَ مسعود [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث تفرَّد بذكر ابن مسعود فيه أبو حُذيفة، وقد احتجَّ البخاريُّ بأبي حذيفة، إلا أنهما لم يحتجا بعبد الله بن ظالم.




সাঈদ ইবন যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “দশজন জান্নাতে যাবে।” অতঃপর তিনি আবু বকর, উমার, উসমান, আলি, তালহা, যুবাইর, আব্দুর রহমান ইবন আওফ, সাদ ইবন আবী ওয়াক্কাস, সাঈদ ইবন যায়দ এবং আব্দুল্লাহ ইবন মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নাম উল্লেখ করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، لكن بذكر أبي عُبيدة بن الجراح بدل عبد الله بن مسعود، وذكرُ ابن مسعود مما تفرَّد به أبو حذيفة - وهو موسى بن مسعود النَّهدي - كما ذكر المصنِّف بإثره، ولم يذكره غيره من أصحاب سفيان الثوري، ولا ذكره حصين بن عبد الرحمن عن هلال في روايته الآتية برقم (6011).وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم لكنه اختُلف فيه على هلال بن يساف اختلافًا كثيرًا كما بيَّنه الدارقطني في "العلل" (663)، وجَزَم هو ومِن قبله النسائيُّ في "السنن الكبرى" بإثر الحديث (8135) أنَّ هلال بن يسافٍ لم يسمعه من عبد الله بن ظالم، وأنَّ بينهما رجلًا. وهذا الرجل مبهم مجهول لا يُدرى من هو، لكن روي هذا الحديث عن سعيد بن زيد من غير هذا الوجه بأسانيد أحسنُها ما سيأتي عند المصنف برقم (5971)، ليس في شيء منها ذكر عبد الله بن مسعود.وأخرجه أبو داود (4648)، والنسائي (8151) من طريق عبد الله بن إدريس، والنسائي (8136) من طريق عُبيد بن سعيد الأموي، و (8149) من طريق القاسم بن يزيد الجَرْمي، ثلاثتهم عن سفيان الثوري، عن منصور - وهو ابن المعتمر - عن هلال بن يسافٍ، عن فلان بن حيَّان، عن عبد الله بن ظالم، عن سعيد بن يزيد. فزادوا رجلًا بين هلال وابن ظالم، وتابعهم عُبيد الله بن عبد الرحمن الأشجعي في روايته عن سفيان الثوري كما نبَّه عليه أبو داود بإثر الحديث. ولم يذكر أحدٌ منهم ابن مسعود. وأخرجه كذلك أحمد 3/ (1630) عن وكيع، عن سفيان الثوري، عن حصين ومنصور، عن هلال بن يساف، عن سعيد بن زيد. وقال وكيع مرة: قال منصور: عن سعيد بن زيد، وقال مرةً: حُصين عن ابن ظالم عن سعيد بن زيد. وقال وكيع في رواية أحمد عنه في "فضائل الصحابة" (82) و (253): لم يحدّثه منصور عن هلال عن سعيد.وقد رواه قبيصةُ بن عقبة عن سفيان عن منصور عن هلال عن سعيد بن زيد، بإسقاط ابن ظالم وابن حيان من إسناده، كما أخرجه الدارقطني في "العلل" (663).وسيأتي برقم (6011) من طريق حصين بن عبد الرحمن عن هلال بن يساف عن عبد الله بن ظالم عن سعيد بن زيد مطولًا، بذكر التسعة المذكورين هنا ولم يذكر ابن مسعود. وانظر تخريجه هناك.وسيأتي برقم (5971) بنحو اللفظ الذي هنا من طريق حميد بن عبد الرحمن بن عوف عن سعيد بن زيد، بذكر أبي عبيدة بن الجراح وعاشرهم بدل ابن مسعود.وأخرجه بنحوه أحمد (1629)، وابن ماجه (133)، والنسائي (8137) و (8162) من طريق رياح بن الحارث النَّخَعي، وأحمد (1631) و (1637)، وأبو داود (4649)، والترمذي بإثر (3757)، والنسائي (8100) و (8147) و (8153)، وابن حبان (6993) من طريق عبد الرحمن بن الأخنس، كلاهما عن سعيد بن زيد، بذكر التسعة المذكورين هنا، ولم يذكرا فيه ابن مسعود ولا أبا عبيدة بن الجراح.وله طريق أخرى عن سعيد بن زيد عند الطبراني في "الكبير" (356)، وفي "الأوسط" (2009)، وأبي نعيم في "دلائل النبوة" (337)، وفي "معرفة الصحابة" (555) من طريق أبي الطُّفيل عامر بن واثلة، عن سعيد بن زيد، بذكر التسعة، ليس فيهم ابن مسعود ولا أبو عبيدة.فلم يذكر أبا عبيدة بن الجراح عاشرَهم في حديث سعيد بن زيد في الطرق السالفة عنه إلّا حميدُ بنُ عبد الرحمن في روايته الآتية برقم (5971)، وقد ذكر في بعض طرق ابن الأخنس عن سعيد بن زيد، ولا يصح.وورد ذكر أبي عبيدة بن الجراح في طرق أخرى عن سعيد بن زيد، لكنها ضعاف كلها، ومن ذلك ما أخرجه ابن سعد 3/ 356، وعنه البلاذُري في "أنساب الأشراف" 10/ 471، من طريق محمد بن السائب الكلبي، عن سعيد بن زيد. والكلبي متروك، ثم إنه لم يُدرك سعيد بن زيد.ومن ذلك ما أخرجه الدارقطني في "الغرائب والأفراد" كما في "أطرافه" لابن طاهر (5202)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (56)، وابن عساكر و "تاريخ دمشق" 25/ 467 - 468 من طريق محمد بن خلاد القطان الوزان، عن عباد بن صهيب، عن سعيد بن أبي عروبة، عن قَتادةَ، عن: سعيد بن المسيب، عن سعيد بن زيد. وعباد بن صهيب متروك الحديث، والراوي عنه مجهولٌ لا يُدرى من هو.لكن يشهد لذكر أبي عبيدة في العشرة حديث ابن عمر عند الطبراني في "الكبير" (13823)، وفي "الأوسط" (2201)، وفي "الصغير" (62)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 5/ 156، وابن عساكر 21/ 79 - 80 و 25/ 468، والضياء المقدسي في "المختارة" 13/ (253)، وإسناده صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5470)


5470 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن سلمان الفقيه ببغداد، قال: قُرئ على عبد الملك بن محمد الرَّقَاشي، وأنا أسمعُ، حدَّثنا أبو عَتاب سهْل بن حماد، حدَّثنا شعبة، عن معاوية بن قُرَّة، عن أبيه، قال: كان ابن مسعود على شجرةٍ يَجتَني لهم منها، فهبَّتِ الريحُ وكَشَفَت عن ساقيه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "والذي نفسي بيده، لَهُما أثقَلُ في الميزان من أُحُد" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




কুররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একটি গাছের উপরে আরোহণ করে তাদের জন্য কিছু সংগ্রহ করছিলেন। তখন বাতাস বইল এবং তাঁর পায়ের গোছা অনাবৃত হয়ে গেল। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "যার হাতে আমার জীবন, তাঁর শপথ! মিজানে (দাড়িপাল্লায়) এই দুটি উহুদ পর্বতের চেয়েও অধিক ভারী হবে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم غير أنَّ أبا عتاب سهلَ بن حماد انفرد بوصله بذكر قرة. وهو ابن إياس المزني - وخالفه بهز بن أسد وأبو داود الطيالسي - وهما أوثق من أبي عَتَّاب وأجلُّ - فلم يجاوزا فيه معاوية بن قرة، لكن للحديث شواهد يصح بها.وأخرجه العباس الدُّوري في "تاريخه" (226)، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ 2/ 546، والبزار (3305)، وأبو بكر الروياني في "مسنده" (948)، والطبري في مسند علي من "تهذيب الآثار" (262)، وأبو القاسم البغوي في "الجعديات" (1092)، والطبراني في "الكبير" 19/ (59)، وابن جُميع الصيداوي في "معجمه" ص 134، والخطيب البغدادي في "تاريخ بغداد" 1/ 483، وابنُ عساكر 33/ 111 - 112 و 112، والذهبي في "سير أعلام النبلاء" 1/ 479 - 480، وفي "تذكرة الحفاظ" 2/ 579 - 580 من طرق عن أبي عتاب سهل بن حماد، بهذا الإسناد. وقال أبو القاسم البغوي: لا أعلم أحدًا أسند هذا الحديث عن شعبة غير أبي عتاب.وأخرجه أبو داود الطيالسي (1174)، وأخرجه كذلك أبو القاسم البغوي في "الجعديات" (1093)، ومن طريقه ابن عساكر 33/ 112 من طريق بَهْز بن أسد، كلاهما (الطيالسي وبهز بن أسد) عن شعبة، عن معاوية بن قرة، مرسلًا لم يذكرا فيه أباه. ويشهد له حديث ابن مسعود نفسه عند أحمد 7/ (3991)، وابن حبان (7069) وغيرهما بسندٍ حسنٍ.وحديث علي بن أبي طالب عند أحمد 2/ (920) بسندٍ حسنٍ كذلك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5471)


5471 - حدَّثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا أحمد بن سَلَمة، حدَّثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا جَرير، عن عبد الله بن يزيد الصُّهْباني، عن كُمَيل بن زياد، عن علي، قال: كنتُ مع النبيِّ صلى الله عليه وسلم، ومعه أبو بكر ومَن شاء الله من أصحابه، فمررنا بعبد الله بن مسعود وهو يصلي، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "مَن هذا"؟ فقيل: عبد الله بن مسعود فقال: "إنَّ عبد الله يقرأُ القرآنَ غَضًا كما أُنزِل". فأثنى عبدُ الله على ربِّه، وحَمِده، فأحسنَ في حَمْدِه على ربِّه، ثم سأله فأَجمَل المسألة، وسألَه كأحسنِ مَسألةٍ سألَها عبدٌ ربَّه، ثم قال: اللهم إني أسألُك إيمانًا لا يَرتدُّ، ونعيمًا لا يَنفَدُ، ومرافقة محمد صلى الله عليه وسلم في أعلى عِلَيِّين في جنانك جنانِ الخُلْد. قال: وكان صلى الله عليه وسلم يقول: "سَلْ تُغطّ، سَلْ تُعْطَ" مرتين، فانطلقتُ لأُبشِّره، فوجدتُ أبا بكر قد سبَقَني، وكان سباقًا بالخير [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে ছিলাম এবং তাঁর সাথে আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং আল্লাহ্‌র ইচ্ছানুযায়ী তাঁর অন্যান্য সাহাবীরাও ছিলেন। আমরা আবদুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলাম, যখন তিনি সালাত আদায় করছিলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ইনি কে?" বলা হলো: ইনি আবদুল্লাহ ইবনে মাসউদ। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয় আবদুল্লাহ কুরআনকে সতেজ (নবীন) অবস্থায় পাঠ করছে, যেমন তা নাযিল করা হয়েছিল।" অতঃপর আবদুল্লাহ তাঁর রবের প্রশংসা করলেন এবং উত্তমরূপে তাঁর রবের প্রশংসা করলেন। এরপর তিনি আল্লাহ্‌র কাছে চাইলেন এবং উত্তমরূপে চাইলেন। তিনি এমন উত্তম প্রার্থনা করলেন যা কোনো বান্দা তার রবের কাছে করতে পারে। অতঃপর তিনি (দোয়ায়) বললেন: "হে আল্লাহ! আমি তোমার কাছে এমন ঈমান চাই যা কখনো বিচ্যুত হয় না, এমন নিয়ামত চাই যা কখনো শেষ হয় না, এবং তোমার চিরস্থায়ী জান্নাতের মধ্যে সর্বোচ্চ 'ইল্লিয়্যীনের মধ্যে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহচর্য চাই।" তিনি (আলী) বললেন: তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু'বার বললেন: "চাও, তোমাকে দেওয়া হবে; চাও, তোমাকে দেওয়া হবে।" অতঃপর আমি তাকে সুসংবাদ দেওয়ার জন্য দ্রুত গেলাম, কিন্তু দেখলাম, আবু বকর আমার আগেই সেখানে পৌঁছে গেছেন। আর তিনি (আবু বকর) ভালো কাজে অগ্রগামী ছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح لكن عن عمر بن الخطاب، وهذا إسناد صحيح إن ثبت سماع عبد الله بن يزيد الصُّهباني من كُميل بن زياد، فإنَّ كميل بن زياد من كبار التابعين، ومات قبل عدد من الصحابة في الكوفة، وعبد الله بن يزيد الراوي عنه من أصحاب إبراهيم بن يزيد النخعي، وإبراهيم النخعي هو من يروي عن كبار التابعين، ففي القلب من سماع عبد الله بن يزيد الصُّهباني من كُميل شيءٌ، ولعله لأجل ذلك اقتصر البخاري في "تاريخه الكبير" 5/ 225 في ترجمة عبد الله بن يزيد الصُّهباني على ذكر إبراهيم النخعي ويزيد بن أحمر في شيوخه، ولم يذكر كُميل بنَ زياد، لأنه لو صحَّ سماع عبد الله من كُميل لكان صحَّ له سماع من الصحابة الذي ماتوا بعد كميل في الكوفة، ولا يصحُّ ذلك، والله أعلم.ثم إنه اختُلف في تسمية الصحابي صاحب الخبر عن جرير - وهو ابن عبد الحميد - فذكر إسحاق بن إبراهيم - وهو ابن راهويه - عليَّ بنَ أبي طالب، وخالفه يوسفُ بنُ موسى القطان عند القاضي الحسين بن إسماعيل المحاملي في "أماليه" برواية ابن مهدي الفارسي - ومن طريقه أخرجه ابن عساكر 33/ 96، فذكر عمر بن الخطاب، وهذا هو المحفوظ أنَّ الخبر لعمر بن الخطاب، فقد رُوي عن عمر من طريق آخر تقدَّم عند المصنف برقم (2929).وروي نحوه عن عبد الله بن مسعُود نفسه عند أحمد 7/ (4340)، وابن حبان (7067)، بذكر عمر بن الخطاب وأبي بكر في الخبر بدل علي بن أبي طالب وأبي بكر، وإسناده حسنٌ.ولقول النبي صلى الله عليه وسلم بأن ابن مسعود يقرأ القرآن غَضًّا كما أُنزل، شاهدٌ من حديث عمار بن ياسر تقدَّم عند المصنف برقم (2931)، وإسناده حسن.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5472)


5472 - حدَّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدَّثنا أبو جعفر محمد بن علي الوَرّاق حَمْدان، حدَّثنا يحيى بن يَعلَى المُحاربي، حدَّثنا زائدة، عن منصور، عن زيد بن وهب، عن عبد الله، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "رَضِيتُ لأُمَّتِي مَا رَضِيَ لها ابن أمِّ عبدٍ" [1].هذا إسناد صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وله عِلَّةٌ من حديث سفيان الثوريِّ وإسرائيل بن يونس عن منصور.أما حديث سفيانَ الثوريِّ:




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার উম্মতের জন্য আমি তাতেই সন্তুষ্ট, যাতে ইবনে উম্মে আবদ (আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ) তাদের জন্য সন্তুষ্ট হয়েছে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح، وما ذكره المصنف بإثره بعد تصحيحه لإسناده من أنَّ له علةً وهي أنَّ سفيان الثوري وإسرائيل بن يونس السَّبيعي قد روياه عن منصور - وهو ابن المعتمر - عن القاسم بن عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود مرسلًا، فليس بعلةٍ، فمنصور واسع الرواية، فلا يبعدُ أن يكون له في هذا الخبر شيخان، ويؤيده أنَّ زائدة بن قُدامة ثقة حافظ، وقد رواه عن منصور بن المعتمر على الوجهين كليهما، فدل على أنه حفظهما، وبذلك يَعضُد المرسل الموصول، ولا يُعِلُّه.وأخرجه البيهقي في "المدخل إلى السنن الكبرى" (96)، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 33/ 120 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن عساكر 33/ 120 من طريق إسحاق بن إبراهيم بن جبلة الترمذي، عن يحيى بن يعلى، به.وستأتي تخريج رواية زائدة بن قُدامة عن منصور عن القاسم بن عبد الرحمن عند الطريق التالية.وسيأتي في حديث عمرو بن حُريث عند المصنف برقم (5480) سببُ هذا الحديث.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5473)


5473 - فأخبرناهُ محمد بن موسى بن عِمران الفقيه، حدَّثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدَّثنا أبو كُريب، حدَّثنا وَكيع، عن سفيان [1].وأما حديث إسرائيل:




৫৪৭৩ - অতঃপর তিনি আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু মূসা ইবনু ইমরান আল-ফাক্বীহ, তিনি আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন ইবরাহীম ইবনু আবী তালিব, তিনি আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন আবূ কুরাইব, তিনি আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন ওয়াকীয়', তিনি বর্ণনা করেছেন সুফিয়ান [১] থেকে। আর ইসরাঈলের হাদীস হলো:




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكنه مُرسل، ولا يُعِلُّ هذا المُرسَلُ الرواية الموصولة التي قبله كما بينّاه هناك. أبو كُريب: هو محمد بن العلاء بن كُريب.وأخرجه ابن أبي شيبة 12/ 114، وأحمد في "فضائل الصحابة" (1536) عن وكيع، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (8458)، وعنه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (4483) من طريق معاوية بن عمرو الأزدي، عن زائدة بن قُدامة، عن منصور، به.وسيأتي بعده من طريق إسرائيل بن يونس السبيعي عن منصُور.وأخرجه ابن أبي عمر العَدَني في "مسنده" كما في "المطالب العالية" (4066)، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 2/ 549 - 550، وابن عساكر 33/ 121 من طريق سفيان بن عُيينة، عن أبي العميس عُتبة بن عبد الله بن عتبة المسعودي، عن القاسم بن عبد الرحمن مرسلًا كذلك.وخالفهم عمرو بن أبي قيس الرازي عند البزار (1986)، والطبراني في "الأوسط" (6879)، فرواه عن منصور بن المعتمر، عن القاسم بن عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود، عن أبيه، عن عبد الله بن مسعود، فوصله وانفرد بذلك، والذين أرسلُوه أوثق منه وأجلُّ، فالمرسل أثبت كما قال الدارقطني في "العلل" (820).على أنه صحَّ موصولًا عن عبد الله بن مسعود من وجه آخر في الطريق السابقة. عليّ هو الحارث بن عبد الله الأعور، كما قال ابنُ عساكر في "تاريخ دمشق" 33/ 105، وقد انفرد القاسم بن مَعْنٍ بذكر عاصم بن ضَمْرة، وانفرد به عن القاسم المعافى بنُ سليمان الحرّاني، وخالف القاسم بن معنٍ فيه سفيان الثوريُّ وإسرائيلُ وزهيرُ بنُ معاوية، فرووه عن أبي إسحاق - وهو عمرو بن عبد الله السَّبيعي - عن الحارث الأعور عن عليٍّ. والحارث الأعور فالجمهور على تضعيفه، إذًا فليست العلةُ في ضعفُ الحديث ضعفُ عاصم بن ضمرة كما حكم به الذهبي في "تلخيصه"، إنما العلة أنَّ الحديث من رواية الحارث بن عبد الله الأعور عن عليٍّ.وأخرجه النسائي (8210) عن عمرو بن يحيى بن الحارث، عن المعافى بن سليمان، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 2 / (566) من طريق إسرائيل، وأحمد (846) و (852)، والترمذي (3808) من طريق زهير بن معاوية، وابن ماجه (137)، والترمذي (3809) من طريق سفيان الثوري، ثلاثتهم عن أبي إسحاق السبيعي، عن الحارث الأعور، عن علي بن أبي طالب. وقال الترمذي: حديث غريب إنما نعرفه من حديث الحارث عن علي. بلفظ: "لو كنت مؤمِّرًا أحدًا … ".وذكر الدارقطني في "العلل" (432) أنه قيل: عن أبي إسحاق، عن حارثة بن مضرِّب، عن عليّ. وأنه رواه مالك بن مِغول عن أبي إسحاق مرسلًا عن النبي صلى الله عليه وسلم فيضاف إلى ضعف الحارث الاضطراب في إسناده.



5474 - Null









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5474)


5474 - فأخبرناه أبو عبد الله الصَّفّار، حدَّثنا أحمد بن مِهْران، حدَّثنا عُبيد الله بن موسى، أخبرنا إسرائيلُ، جميعًا عن منصور، عن القاسم بن عبد الرحمن أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "رَضِيتُ لأُمّتي ما رَضِيَ لها ابن أمِّ عبدٍ".




কাসিম ইবনে আব্দুর রহমান থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্‌র রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার উম্মতের জন্য ইবনে উম্মে আবদ যা পছন্দ করেছে, আমিও তাদের জন্য তাই পছন্দ করলাম।"









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5475)


5475 - أخبرنا عبد الرحمن بن الحَسن القاضي، حدَّثنا إبراهيم بن الحُسين، حدَّثنا المُعافَى بن سليمان الحَرّاني، حدَّثنا القاسم بن مَعن، عن منصور، عن أبي إسحاق، عن عاصم بن ضَمْرة، عن علي، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لو كنتُ مُستخلِفًا أحدًا من غير مَشُورة، لاستخلفتُ عليهم ابنَ أمِّ عَبْدٍ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি আমি পরামর্শ (মাশওয়ারা) ছাড়াই কাউকে খলিফা নিযুক্ত করতাম, তবে আমি তাদের উপর ইবনু উম্মে আবদকে নিযুক্ত করতাম।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] ضعيف، وهذا الإسناد وإن كان رجاله لا بأس بهم، إلا أنَّ المحفوظ فيه هنا أنَّ راويه عن عليّ هو الحارث بن عبد الله الأعور، كما قال ابنُ عساكر في "تاريخ دمشق" 33/ 105، وقد انفرد القاسم بن مَعْنٍ بذكر عاصم بن ضَمْرة، وانفرد به عن القاسم المعافى بنُ سليمان الحرّاني، وخالف القاسم بن معنٍ فيه سفيان الثوريُّ وإسرائيلُ وزهيرُ بنُ معاوية، فرووه عن أبي إسحاق - وهو عمرو بن عبد الله السَّبيعي - عن الحارث الأعور عن عليٍّ. والحارث الأعور فالجمهور على تضعيفه، إذًا فليست العلةُ في ضعفُ الحديث ضعفُ عاصم بن ضمرة كما حكم به الذهبي في "تلخيصه"، إنما العلة أنَّ الحديث من رواية الحارث بن عبد الله الأعور عن عليٍّ.وأخرجه النسائي (8210) عن عمرو بن يحيى بن الحارث، عن المعافى بن سليمان، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 2 / (566) من طريق إسرائيل، وأحمد (846) و (852)، والترمذي (3808) من طريق زهير بن معاوية، وابن ماجه (137)، والترمذي (3809) من طريق سفيان الثوري، ثلاثتهم عن أبي إسحاق السبيعي، عن الحارث الأعور، عن علي بن أبي طالب. وقال الترمذي: حديث غريب إنما نعرفه من حديث الحارث عن علي. بلفظ: "لو كنت مؤمِّرًا أحدًا … ".وذكر الدارقطني في "العلل" (432) أنه قيل: عن أبي إسحاق، عن حارثة بن مضرِّب، عن عليّ. وأنه رواه مالك بن مِغول عن أبي إسحاق مرسلًا عن النبي صلى الله عليه وسلم فيضاف إلى ضعف الحارث الاضطراب في إسناده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5476)


5476 - أخبرنا أبو الحسن علي بن محمد القرشي، بالكوفة، حدَّثنا الحسن بن علي بن عفّان العامري، حدَّثنا مُصعب بن المِقدام، حدَّثنا سفيان، عن الأعمش، عن إبراهيم، عن عَلقمة، عن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن أحبَّ أن يقرأ القرآنَ غَضًّا كما أُنزِل، فلْيَقرأه على قراءةِ ابن أمِّ عبدٍ" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.




উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোরআনকে সজীব (তাজা) অবস্থায়, যেমনভাবে তা নাযিল হয়েছে, সেভাবে পড়তে পছন্দ করে, সে যেন তা ইবনু উম্মে আবদের কিরাত (পদ্ধতি) অনুসারে পড়ে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وقد تقدَّم برقم (2930) من طريق القاسم بن بشر عن مصعب بن المقدام.وتقدَّم كذلك ضمن حديث مطوَّل برقم (2929) من طريق أبي معاوية عن الأعمش.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5477)


5477 - أخبرني عبد الله بن محمد بن موسى العَدل، حدَّثنا إسماعيل بن قُتيبة، حدَّثنا محمد بن عبد الله بن نُمير، قال: حدثني أبي، عن الأعمش، عن زيد بن وهب، قال: كنتُ جالسًا عند عمر إذ جاء رجلٌ نَحيفٌ، فجعل يَنظُر إليه ويَتهلَّلُ وجهه، ثم قال: كُنَيفٌ مُلِئَ عِلْمًا، كُنَيفٌ مُلِىَ علمًا! يعني عبد الله بن مسعودٍ [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




যায়িদ ইবনে ওয়াহব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে বসা ছিলাম, তখন এক শীর্ণদেহী ব্যক্তি এলেন। তিনি (উমর) তার দিকে তাকাতে লাগলেন এবং তাঁর চেহারা আনন্দে উজ্জ্বল হয়ে উঠল। এরপর তিনি বললেন: একটি ছোট পাত্র, যা জ্ঞানে পরিপূর্ণ! একটি ছোট পাত্র, যা জ্ঞানে পরিপূর্ণ! অর্থাৎ তিনি আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বুঝিয়েছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. الأعمش: هو سليمان بن مهران.وأخرجه البيهقي في "المدخل إلى السنن الكبرى" (100)، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 33/ 145 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته" 2/ 297 و 3/ 144، ومن طريقه ابن عساكر 33/ 145 و 145 - 146 عن عبد الله بن نمير، به.وأخرجه ابن سعد 2/ 297، وابن أبي شيبة 12/ 115، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 11/ 221، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 129، والجُوزقاني في "الأباطيل والمناكير والصحاح والمشاهير" (205)، وابن عساكر 33/ 145 - 146 من طريق أبي معاوية الضرير، وأحمد في "فضائل الصحابة" (1550)، وابن عساكر 145/ 33 من طريق وكيع بن الجراح، والطبراني في "الكبير" (8477)، وأبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (4493)، وابن عساكر 33/ 145 من طريق زائدة بن قدامة، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 2/ 542 - 543، ومن طريقه ابن عساكر 33/ 144 من طريق سفيان الثوري، أربعتهم عن الأعمش، به.والكُنيف: تصغير تعظيم للكِتف، وهو وعاء الراعي، فشبّه عمرُ ابنَ مسعود بوعاء الراعي، لأنَّ فيه كل ما يُريد، فكذلك ابن مسعود جمع كل ما يحتاج الناس إليه من العلم. "الحلية" 1/ 129، والبيهقي في "المُدخل في السنن الكبرى" (103)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 21/ 412 و 420 و 32/ 61 و 61 - 62 و 33/ 142 من طرق عن الأعمش، به. وفي بعض طرقه عن الأعمش أنَّ أبا البختري قال: أتينا عليًّا فسألناه، وظاهره يدل على إدراك أبي البختري لعلي بن أبي طالب، ولكن ذلك غير ثابت، ولو ثبت لما خفي على شعبة بن الحجاج وعلى من بعده كالبخاري وأبي حاتم الرازي، حيث جزموا بعدم إدراكه له.وانظر ما سيأتي برقم (5731).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5478)


5478 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا أبو معاوية، عن الأعمش، عن عمرو بن مُرّة، عن أبي البَخْتَري، عن علي؛ قال: قيل له: أخبرنا عن أصحاب محمد صلى الله عليه وسلم، قال: عن أيِّهم؟ قال: أخبرنا عن عبد الله بن مسعود، قال: عَلِمَ الكتاب والسُّنَّة، ثم انتهى وكفى به؛ وذكر باقي الحديث [1]. صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে জিজ্ঞাসা করা হলো: আমাদেরকে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ সম্পর্কে বলুন। তিনি (আলী) বললেন: তাঁদের মধ্যে কার সম্পর্কে? বলা হলো: আমাদেরকে আব্দুল্লাহ ইবনু মাসউদ সম্পর্কে বলুন। তিনি (আলী) বললেন: তিনি কিতাব (কুরআন) ও সুন্নাহ শিখেছেন, এরপর তিনি চূড়ান্ত লক্ষ্যে পৌঁছেছেন এবং এটাই তাঁর জন্য যথেষ্ট। (এবং অবশিষ্ট হাদীস বর্ণনা করলেন।)




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم، لكن أبا البَخْتَري - واسمه سعيد بن فيروز - لم يُدرك عليًا، لكن روي نحوه عن عليٍّ من وجوه منها ما تقدَّم برقم (5465). أبو معاوية: هو محمد بن خازم الضرير، والأعمش: هو سليمان بن مهران.وأخرجه ابن سعد 2/ 298، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 2/ 540، وأبو نُعيم في "الحلية" 1/ 129، والبيهقي في "المُدخل في السنن الكبرى" (103)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 21/ 412 و 420 و 32/ 61 و 61 - 62 و 33/ 142 من طرق عن الأعمش، به. وفي بعض طرقه عن الأعمش أنَّ أبا البختري قال: أتينا عليًّا فسألناه، وظاهره يدل على إدراك أبي البختري لعلي بن أبي طالب، ولكن ذلك غير ثابت، ولو ثبت لما خفي على شعبة بن الحجاج وعلى من بعده كالبخاري وأبي حاتم الرازي، حيث جزموا بعدم إدراكه له.وانظر ما سيأتي برقم (5731).