হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5479)


5479 - أخبرني أبو علي الحافظ، أخبرنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا محمد بن بشّار، حدثنا مُؤمَّل بن إسماعيل، حدثنا سفيان، عن المِقدام بن شُريح، عن أبيه، عن سعد بن أبي وقّاص، في هذه الآية: {وَلَا تَطْرُدِ الَّذِينَ يَدْعُونَ رَبَّهُمْ بِالْغَدَاةِ وَالْعَشِيِّ يُرِيدُونَ وَجْهَهُ} [الأنعام: 52]، قال: نزلت في خَمس من قُريش، أنا وابنُ مسعود فيهم، فقالت قُريش للنبي صلى الله عليه وسلم: لو طردت هؤلاء عنك جالسناك، تُذني هؤلاء دُونَنا؟ فنزلت: {وَلَا تَطْرُدِ الَّذِينَ يَدْعُونَ رَبَّهُمْ بِالْغَدَاةِ وَالْعَشِيِّ} إلى قوله: {بِالشَّاكِرِينَ} [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه!




সাদ ইবনে আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্‌র বাণী: {আর তাদেরকে তাড়িয়ে দিও না, যারা সকাল-সন্ধ্যায় তাদের রবকে ডাকে, তাঁর সন্তুষ্টি কামনায়।} [সূরা আন'আম: ৫২] প্রসঙ্গে তিনি বলেন, এই আয়াতটি কুরাইশের পাঁচজনের ব্যাপারে নাযিল হয়েছিল, যাদের মধ্যে আমি এবং ইবনে মাসউদও ছিলাম। তখন কুরাইশরা নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলেছিল: "আপনি যদি এদের আপনার কাছ থেকে তাড়িয়ে দেন, তাহলে আমরা আপনার সাথে বসবো। আপনি কি এদেরকে আমাদের চেয়ে বেশি কাছে টেনে নেন?" তখন এই আয়াত নাযিল হলো: {আর তাদেরকে তাড়িয়ে দিও না, যারা সকাল-সন্ধ্যায় তাদের রবকে ডাকে} থেকে শুরু করে {কৃতজ্ঞদের (পুরস্কার) দেওয়ার জন্য} পর্যন্ত।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل مؤمل بن إسماعيل، فقد توبع. سفيان هو ابن سعيد الثوري، وشُريح: هو ابن هانئ.وأخرجه مسلم (2413)، والنسائي (8207) و (11098) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، والنسائي (8163) من طريق يحيى بن سعيد القطان، كلاهما عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه مسلم (2413)، والنسائي (8180) و (8209)، وابن حبان (6573) من طريق إسرائيل، وابن ماجه (4128) من طريق قيس بن الربيع، كلاهما عن المقدام بن شُريح، به. وسماهم قيس بن الربيع، فقال: فيَّ وفي ابن مسعود وصهيب وعمار والمقداد وبلال وأما إسرائيل فقال: كنت أنا وابن مسعود ورجل من هُذيل وبلال ورجلان لست أسميهما.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5480)


5480 - أخبرنا أبو الفضل الحسن بن يعقوب بن يوسف العَدل، حدثنا محمد بن عبد الوهاب العبدي، أخبرنا جعفر بن عون، أخبرنا المسعودي، عن جعفر بن عمرو ابن حُرَيث، عن أبيه، قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم لعبد الله بن مسعود: "اقرأ" قال: أقرأُ وعليك أُنزِلَ؟! قال: "إني أُحِبُّ أن أسمعه من غيري" قال: فافتتح سورة النساء، حتى بلَغَ: {فَكَيْفَ إِذَا جِئْنَا مِنْ كُلِّ أُمَّةٍ بِشَهِيدٍ وَجِئْنَا بِكَ عَلَى هَؤُلَاءِ شَهِيدًا} [النساء: 41]، فاستَعْبَر رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، وكَفَّ عبدُ الله.فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "تَكلَّمْ" فَحَمِدَ الله في أول كلامِه، وأثنَى على الله، وصلَّى على النبي صلى الله عليه وسلم، وشَهِد شهادةَ الحَقِّ، وقال: رضينا بالله ربًّا، وبالإسلام دِينًا، ورضيتُ لكم ما رضي الله ورسولُه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "رضِيتُ لكم ما رضي لكم ابن أمِّ عَبْدٍ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আমর ইবনে হুরাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তিলাওয়াত করো।" তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ) বললেন: আমি তিলাওয়াত করব অথচ তা আপনার উপরেই নাযিল হয়েছে?! তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি পছন্দ করি যে তা আমি অন্য কারো নিকট থেকে শুনি।" তিনি বলেন: এরপর তিনি সূরা আন-নিসা শুরু করলেন। যখন তিনি এই আয়াতে পৌঁছলেন: "তখন কী অবস্থা হবে, যখন আমি প্রত্যেক উম্মত থেকে একজন সাক্ষী উপস্থিত করব এবং আপনাকে তাদের সকলের উপর সাক্ষীরূপে উপস্থিত করব?" (সূরা আন-নিসা: ৪১), তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চোখ অশ্রুসিক্ত হলো এবং আব্দুল্লাহ (তিলাওয়াত) বন্ধ করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "কথা বলো।" তিনি তার কথার শুরুতে আল্লাহর প্রশংসা করলেন, তাঁর গুণকীর্তন করলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর দরূদ পাঠ করলেন, হকের সাক্ষ্য দিলেন এবং বললেন: আমরা আল্লাহকে রব হিসেবে, ইসলামকে দীন হিসেবে পেয়ে সন্তুষ্ট। আর আমি তোমাদের জন্য তাতেই সন্তুষ্ট, যাতে আল্লাহ এবং তাঁর রাসূল সন্তুষ্ট। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ইবনে উম্মে আবদ (আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ) তোমাদের জন্য যা নিয়ে সন্তুষ্ট হয়েছে, আমিও তাতে সন্তুষ্ট।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح، المسعُودي - وهو عبد الرحمن بن عبد الله بن عُتبة - وإن كان تغيّر حفظُه، فسماعُ جعفر بن عون منه قديمٌ.وأخرجه البيهقي في "المدخل إلى السنن الكبرى" (99)، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 33/ 120 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرج مسلم (800) (248) من طريق معن بن عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود، عن جعفر بن عمرو بن حريث، عن أبيه، عن ابن مسعود قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم: "شهيدًا عليهم ما دمتُ فيهم، أو ما كنتُ فيهم".ويشهدُ للشطر الأول منه ما أخرجه أحمد (6/ 3606) و 7 / (4118)، والبخاري (4583) و (5049) و (5055)، ومسلم (800) (247)، وأبو داود (3668)، والترمذي (3025)، والنسائي (8021) و (8024) و (8025)، و (11039)، وابن حبان (735) من طريق عبيدة السَّلْماني، عن ابن مسعود نفسه.ولقوله صلى الله عليه وسلم في آخر الحديث هنا: "رضيتُ لكم ما رضي لكم ابن أمّ عبدٍ" شاهدٌ من حديث ابن مسعود نفسه تقدَّم عند المصنف برقم (5456)، وإسناده صحيح كذلك.وآخر من مرسل القاسم بن عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود تقدَّم برقم (5473) و (5474).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5481)


5481 - أخبرني أبو الحسن محمد بن عبد الله العُمَري، حدثنا محمد بن إسحاق، حدثنا أبو عَمّار، حدثنا الفضل بن موسى، عن الأعمش، قال: كان شَقيقٌ يَذكُر صحابة النبيِّ صلى الله عليه وسلم، فلم يذكر ابن مسعودٍ، فقلت له: لا أراك تذكرُ ابن مسعود؟! قال: ذاك رجلٌ لا أُفضِّلُ عليه أحدًا [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه.




আ'মাশ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, শাকীক (রাহিমাহুল্লাহ) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীদের আলোচনা করতেন, কিন্তু তিনি ইবনু মাসঊদকে উল্লেখ করতেন না। তখন আমি তাঁকে বললাম, 'আমি আপনাকে ইবনু মাসঊদের কথা উল্লেখ করতে দেখি না কেন?' তিনি বললেন, 'তিনি এমন একজন ব্যক্তি, যার উপর আমি অন্য কাউকে শ্রেষ্ঠত্ব দিতে পারি না।'




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. شقيق: هو ابن سَلَمة أبو وائل، والأعمش: هو سليمان بن مِهران، وأبو عمار: هو الحسين بن حُريث، ومحمد بن إسحاق: هو ابن خُزيمة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5482)


5482 - حدثنا ميمون بن إسحاق الهاشمي مولاهم، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا أبو معاوية، عن الأعمش، عن إبراهيم، عن علقمة، قال: كان عبدُ الله يُشبَّه بالنبيِّ صلى الله عليه وسلم، في هَدْيِه ودَلِّه وسَمْتِه، قال إبراهيم: وكان علقمة يُشبَّه بعبدِ [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে চালচলন, বেশভূষা ও আচরণের দিক থেকে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সাদৃশ্যপূর্ণ মনে করা হতো। ইবরাহীম বলেছেন, আর আলকামা ছিলেন আবদুল্লাহর [সাথে] সাদৃশ্যপূর্ণ।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أحمد بن عبد الجبار - وهو ابن عمر العُطاردي - وقد توبع. أبو معاوية: هو محمد بن خازم الضرير، وإبراهيم: هو ابن يزيد النَّخَعي. وعلقمة: هو ابن قيس النَّخَعي، وعبد الله: هو ابن مسعود.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته" 3/ 142 و 8/ 207، وابن أبي شيبة 12/ 117، وأحمد بن حنبل في "العلل" برواية ابنه عبد الله (3643)، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 2/ 545، وابن أبي خيثمة في السفر الثالث من "تاريخه" (3918)، والبَلاذُري في "أنساب الأشراف" 11/ 278، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (241) و (243)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" بإثر (1235)، وابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 6/ 405، والخطيب البغدادي في "تاريخ بغداد" 10/ 80 و 14/ 240، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 22/ 198 - 199 و 33/ 127 و 41/ 164 من طُرق عن أبي معاوية الضرير، بهذا الإسناد.وقد تقدَّم من قول حذيفة بن اليمان برقم (5461) تشبيهُ عبد الله بن مسعود بالنبي صلى الله عليه وسلم فِي هَديه وسَمْته ودَلِّه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5483)


5483 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن علي الصَّنْعاني بمكة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم بن عبّاد، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن إسحاق بن راشد، عن عمرو بن وابصةَ الأسدي، عن أبيه قال: إني بالكوفة في داري، إذ سمعتُ على باب الدار: السلام عليكم، أَلِجُ؟ فقلت: وعليك السلام، فلِج، فلما دخل فإذا هو عبدُ الله ابن مسعود، فقلت: يا أبا عبد الرحمن، أيةُ ساعة زيارةٍ هذه، وذلك في نَحْر الظَّهِيرة، قال: طالَ عليَّ النهارُ، فتذكرتُ من أتحدَّثُ إليه، قال: فجعل يُحدِّثني عن رسول الله صلى الله عليه وسلم وأحدِّثُه، ثم أنشأ يحدِّثني فقال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "تكونُ فتنةٌ، النائمُ فيها خيرٌ من المُضطَجِع، والمُضطَجِعُ فيها خيرٌ من القاعد، والقاعِدَ فيها خيرٌ من القائم، والقائمُ فيها خيرٌ من الماشي، والماشي خيرٌ من الراكب، والراكبُ خيرٌ من المُجْرِي، قَتلاها كلُّها في النار" قلتُ: يا رسول الله، ومتى ذلك؟ قال: "ذلك أيامَ الهَرْج" قلت: ومتى أيامُ الهَرْج؟ قال: "حين لا يَأْمَنُ الرجلُ جَلِيسَه" قلت فيمَ تأمُرُني إن أدركتُ ذلك الزمان؟ قال: "اكفُفْ نفْسَك ويدَك، وادخُلْ دارَك" قلت: يا رسول الله، أرأيت إن دُخِلَ عليَّ داري؟ قال: "فادخُل بيتك" قلت: أرأيتَ إِن دُخِلَ عليَّ بيتي؟ قال: "فادخُل مسجدَك، فاصنع هكذا وقبض بيمينه على الكُوع - وقل: ربي الله، حتى تموتَ على ذلك" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ‌‌ذكرُ مناقب العباس بن عبد المطلب بن هاشم عمِّ رسول الله صلى الله عليه وسلم وعلى آله أجمعين




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: (আমার সাক্ষাৎকারী ওয়াবিসা আল-আসাদী বলেন,) আমি কূফায় আমার ঘরে অবস্থান করছিলাম, এমন সময় দরজায় আওয়াজ শুনলাম: আসসালামু আলাইকুম, আমি কি ভেতরে আসব? আমি বললাম: ওয়া আলাইকুমুস সালাম, ভেতরে এসো। যখন তিনি প্রবেশ করলেন, দেখলাম তিনি হলেন আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আমি বললাম, হে আবূ আব্দুর রহমান! এ কেমন সময় দেখা করার? এটা ছিল দ্বিপ্রহরের সময়। তিনি বললেন: আমার কাছে দিনটি দীর্ঘ মনে হচ্ছিল, তাই ভাবলাম কার সাথে একটু আলাপ করি। তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের হাদীস বলতে শুরু করলেন এবং আমিও তাঁকে হাদীস বলতে শুরু করলাম। এরপর তিনি আমাকে হাদীস বলা শুরু করে বললেন:

আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: “একটি ফিতনা (বিপর্যয়) দেখা দেবে। তাতে ঘুমন্ত ব্যক্তি শুয়ে থাকা ব্যক্তি অপেক্ষা উত্তম হবে, আর শুয়ে থাকা ব্যক্তি বসে থাকা ব্যক্তি অপেক্ষা উত্তম হবে, আর বসে থাকা ব্যক্তি দাঁড়িয়ে থাকা ব্যক্তি অপেক্ষা উত্তম হবে, আর দাঁড়িয়ে থাকা ব্যক্তি হেঁটে যাওয়া ব্যক্তি অপেক্ষা উত্তম হবে, আর হেঁটে যাওয়া ব্যক্তি আরোহী ব্যক্তি অপেক্ষা উত্তম হবে, আর আরোহী ব্যক্তি দ্রুত ছুটে যাওয়া ব্যক্তি অপেক্ষা উত্তম হবে। সেই ফিতনায় যারা নিহত হবে, তারা সবাই জাহান্নামী হবে।”

আমি (ইবনে মাসঊদ) বললাম: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! এটা কখন হবে?

তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “এটা হবে হারজের (মহাহত্যাকাণ্ড ও বিশৃঙ্খলার) দিন।”

আমি বললাম: হারজের দিন কখন?

তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “যখন একজন মানুষ তার পাশে বসা সঙ্গীকেও বিশ্বাস করতে পারবে না।”

আমি বললাম: সেই সময় উপস্থিত হলে আপনি আমাকে কী করতে নির্দেশ দেন?

তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তুমি তোমার নফস (আত্মা) এবং তোমার হাতকে সংযত রাখবে এবং তোমার ঘরে প্রবেশ করবে।”

আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি বলুন, যদি আমার ঘরেও প্রবেশ করা হয়?

তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তাহলে তুমি তোমার (ভেতরের) কামরায় প্রবেশ করবে।”

আমি বললাম: আপনি বলুন, যদি আমার কামরাতেও প্রবেশ করা হয়?

তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তাহলে তুমি তোমার মসজিদে (নামাযের স্থানে) প্রবেশ করবে এবং এমনটি করবে— এই বলে তিনি ডান হাত দ্বারা কনুই আঁকড়ে ধরলেন— আর বলবে: আমার রব আল্লাহ। এই অবস্থার ওপরই তুমি মৃত্যুবরণ করবে।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسنٌ من أجل عمرو بن وابصة - وهو ابن مَعْبَد - فقد روى عنه جمع وذكره ابن حبان، وقد جاء في طريق لا يُعتمد عليها زيادة راوٍ اسمه سالم - هكذا مهملًا - بين إسحاق بن راشد وعمرو بن وابصة.وهو في "جامع معمر بن راشد" (20727). وسيتكرر برقم (8519).وأخرجه أحمد 7/ (4286) عن عبد الرزاق، عن معمر عن رجلٍ، عن عمرو بن وابصة، به.كذا أبهم ذكر الراوي عن عمرو بن وابصة، وجزم الحافظ ابن حجر في "تعجيل المنفعة" (1582) أنه إسحاق بن راشد الجزري.ويؤيده ما أخرجه أحمد (4287) من طريق عبد الله بن المبارك، عن معمر، عن إسحاق بن راشد، عن عمرو بن وابصة عن أبيه.وما وقع في "مسند ابن المبارك" المطبوع (262)، وهو من رواية الحسن بن سفيان عن حبّان بن موسى بن المبارك عن معمر، عن سالم، عن إسحاق بن راشد، عن عمرو بن وابصة، عن أبيه، فغيرُ سديدٍ، والظاهر أنه من إلحاق بعض النُّساخ أو من تولَّى مقابلة الكتاب قديمًا، فقد روى هذا الخبر عبدُ الغني المقدسي في "تحريم القتل وتعظيمه" (81) من طريق الحسن بن سفيان، عن حبّان بن موسى، عن ابن المبارك - وهي نفسُها رواية "مسند ابن المبارك" - عن معمر، عن إسحاق بن راشد به، فلم يذكر في الإسناد سالمًا بين معمر وإسحاق، وقد رواه عن ابن المبارك غير واحدٍ من الأئمة لم يذكر أحدٌ منهم واسطةً بين معمر وإسحاق بن راشد، فوافق ابن المبارك بذلك عبد الرزاق في روايته عن معمر، وأشار الدارقطني في "علله" (882) إلى توافقهما في رواية هذا الخبر عن معمر.وقد تابع معمرًا على روايته عن إسحاق بن راشد: سليمانُ بنُ صُهيب العطار الرقي عند أبي علي محمد بن سعيد القُشيري في "تاريخ الرّقة" (286)، ومن طريقه أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 62/ 336، فرواه عن إسحاق بن راشد، عن عمرو بن وابصة، عن أبيه، وسليمان بن صهيب فيه جهالة.وخالفهما القاسم بن غزوان عند أبي داود (4258) فرواه عن إسحاق بن راشد، عن سالم، عن عمرو بن وابصة، عن أبيه، فزاد في إسناده سالمًا بين إسحاق وعمرو بن وابصة، ولكن القاسم بن غزوان هذا من بابة سليمان بن صهيب، فيه جهالةٌ أيضًا، فصَفِي لنا طريق معمر بن راشد الثقة الحافظ.وقد روى هذا الخبر عن عمرو بن وابصة رجلان آخران الأول هو جعفر بن بُرقان عند الطبراني في "الكبير" (4164)، ومحمد بن سعيد القُشيري في "تاريخ الرقة" (22)، والثاني هو عبد الحميد بن عبد الرحمن بن زيد بن الخطاب عند القشيري في "تاريخ الرقة" (23)، وكلا الطريقين فيهما مقالٌ، غير أنهما يصلحان في المتابعات والشواهد.وانظر تمام تخريجه في "المسند" و"سنن أبي داود".ويشهد للمرفوع في أوله حديثُ أبي هريرة عند أحمد 13/ (7796)، والبخاري (3601)، ومسلم (2886)، بلفظ: "ستكون فتن القاعد فيها خير من القائم، والقائم خير من الماشي، والماشي خير من الساعي"، وفي رواية لمسلم: "النائم فيها خيرٌ من اليقظان، واليقظان فيها خير من القائم، والقائم فيها خيرٌ من الساعي".وحديث أبي بكرة عند أحمد 34/ (20412)، ومسلم (2887)، ولفظه عند أحمد: "إنها ستكون فتنة، المضطجع فيها خير من الجالس، والجالس فيها خير من القائم، والقائم فيها خير من الماشي، والماشي خير من الساعي". وسيأتي عند المصنف برقم (8565).وحديث أبي موسى الأشعري عند أحمد 32/ (19662)، وغيره، كلفظ حديث أبي هريرة، وسيأتي عند المصنف برقم (8564).وحديث سعد بن أبي وقاص عند أحمد 3/ (1446)، والترمذي (2194)، بمثل حديث أبي هريرة، وسيأتي عند المصنف برقم (8566) بمثل لفظ وابصة بن معبد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5484)


5484 - حدثنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنْبَري، حدثنا أبو عبد الله محمد بن إبراهيم العَبْدي، حدثنا يوسف بن عَدِيّ، حدثنا جَرِير، عن مُغيرة، عن أبي رَزِينٍ، قال: قيل للعباس بن عبد المُطلب: أيُّما أكبرُ، أنتَ أم النبيُّ صلى الله عليه وسلم؟ فقال: هو أكبرُ مني، وأنا وُلِدتُ قبله [1].




আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে জিজ্ঞেস করা হয়েছিল: আপনাদের দুজনের মধ্যে কে বয়সে বড়—আপনি, নাকি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)? জবাবে তিনি বললেন: মর্যাদায় তিনি আমার চেয়ে বড়, আর আমি তাঁর আগে জন্মগ্রহণ করেছি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. جرير: هو ابن عبد الحميد، ومغيرة: هو ابن مِقْسَم، وأبو رزين: هو مسعود بن مالك الأسدي.وأخرجه ابن أبي شيبة 13/ 61، والبخاري في "التاريخ الأوسط" 1/ 510، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 1/ 504، والبَلاذُري في "أنساب الأشراف" 4/ 7، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (350)، وعبد الله بن أحمد في "فضائل الصحابة" (1831)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (1837)، وأبو بكر الدِّينوري في "المجالسة" (3391)، وابن عساكر 26/ 280 و 281 و 282 من طرق عن جرير بن عبد الحميد، به. "معرفة الصحابة" (5326)، وأبو الحسن المدائني كما رواه عنه ابن أبي خيثمة في السِّفر الثاني من "تاريخه" (2726)، ومن طريقه ابن عساكر 26/ 380. ووافقه كذلك خليفة بن خياط في طبقاته ص 4.وخالفهم جمهور العلماء كما في "تاريخ دمشق" 26/ 282 و 379 - 380.يَمصَعُ، أي: يُحرِّك. والعَرْصة - بالصاد المهملة أو بالضاد المعجمة - الثوب أو الجلد الذي يكون فيه الصبي إذا أُرضع ويربَّى فيه. انظر "شرح غريب السير" للخشني ص 220.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5485)


5485 - فأخبرني عبد الله محمد بن إسحاق الخُزاعي بمكة، حدثنا جَدّي، حدثنا الزُّبير بن بَكّار، قال: كان العباس أسنَّ من رسول الله صلى الله عليه وسلم بثلاث سنين: إلى أُتِيَ، إلى أمي، فقيل لها: وَلَدَت آمنهُ غلامًا، فخرجَتْ بي حين أصبَحَتْ آخِذةً بيدي حتى دَخَلْنا عليها، فكأني أنظُرُ إليه يَمصَعُ رِجلَيه في عَرْصَتِه، وجعل النساءُ تجذبُني [1] ويَقُلنَ: قَبِّل أخاكَ.قال: ومات العباسُ سنة أربع وثلاثين وهو ابن ثمان وثمانين سنة [2].




যুবাইর ইবনে বাক্কার থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের চেয়ে তিন বছরের বড় ছিলেন। [একবার] আমার মায়ের কাছে এসে এই খবর দেওয়া হলো যে, আমিনা এক পুত্র সন্তান প্রসব করেছেন। যখন সকাল হলো, তিনি (আমার মা) আমাকে হাত ধরে নিয়ে বের হলেন এবং আমরা তাঁর (আমিনার) কাছে প্রবেশ করলাম। তখন যেন আমি তাঁকে দেখতে পাচ্ছিলাম যে, তিনি তাঁর কোলের উপর পা আছড়াচ্ছিলেন। নারীরা তখন আমাকে টেনে নিয়ে গিয়ে বলতে লাগল: তোমার ভাইকে চুমু দাও। তিনি আরো বলেন: আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চৌত্রিশ হিজরি সনে ইন্তেকাল করেন, যখন তাঁর বয়স হয়েছিল আটাশি বছর।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] أُهملت هذه الكلمة في (ص) و (م) وتصحفت في (ز) و (ب) إلى: تحدثني، وفي المطبوع إلى: يحدثني، والمثبت هو الموافق لما في المصادر التي أوردت الخبر، حيث جاء فيها: يَجبِذنني. والجبذ والجذب لغتان. "معرفة الصحابة" (5326)، وأبو الحسن المدائني كما رواه عنه ابن أبي خيثمة في السِّفر الثاني من "تاريخه" (2726)، ومن طريقه ابن عساكر 26/ 380. ووافقه كذلك خليفة بن خياط في طبقاته ص 4.وخالفهم جمهور العلماء كما في "تاريخ دمشق" 26/ 282 و 379 - 380.يَمصَعُ، أي: يُحرِّك. والعَرْصة - بالصاد المهملة أو بالضاد المعجمة - الثوب أو الجلد الذي يكون فيه الصبي إذا أُرضع ويربَّى فيه. انظر "شرح غريب السير" للخشني ص 220.



[2] وهو عند ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 26/ 282 - 283 من طريق أحمد بن سليمان الطُّوسي، عن الزُّبير بن بكار. لكن لم يذكر سنة وفاة العباس ولا سنَّه يوم توفي.ووافق الزبير بن بكار على ذكر وفاة العباس سنة أربع وثلاثين ابن إسحاق كما رواه عنه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5326)، وأبو الحسن المدائني كما رواه عنه ابن أبي خيثمة في السِّفر الثاني من "تاريخه" (2726)، ومن طريقه ابن عساكر 26/ 380. ووافقه كذلك خليفة بن خياط في طبقاته ص 4.وخالفهم جمهور العلماء كما في "تاريخ دمشق" 26/ 282 و 379 - 380.يَمصَعُ، أي: يُحرِّك. والعَرْصة - بالصاد المهملة أو بالضاد المعجمة - الثوب أو الجلد الذي يكون فيه الصبي إذا أُرضع ويربَّى فيه. انظر "شرح غريب السير" للخشني ص 220.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5486)


5486 - حدثنا أبو عبد الله الأصبهاني، حدثنا محمد بن عبد الله بن رُسته، حدثنا سليمان بن داود، حدثنا محمد بن عُمر، عن شيوخه: أنَّ العباس بن عبد المطلب بن هاشم بن عبد مناف عمَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم، أمه نُتَيلة بنت خَبّاب [1] بن كُليب بن مالك بن عمرو بن عامر بن زيد مَنَاةَ بن عامر الخَزرجية، وكان العباس يُكنى أبا الفضل، وكان الفضلُ أكبر ولده، وكان أكبر من رسول الله صلى الله عليه وسلم بثلاث سنين، وشهد العباسُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فتح مكة وحُنينًا والطائفَ وتَبُوك، ومَكَثَ معه يوم حُنين في أهل بيته حين انكشف الناس عنه [2].




আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব ইবনে হাশিম ইবনে আবদে মানাফ ছিলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চাচা। তাঁর মাতার নাম ছিল নুতাইলা বিনতে খাব্বাব ইবনে কুলাইব ইবনে মালিক ইবনে আমর ইবনে আমের ইবনে যায়েদ মানাত ইবনে আমের আল-খাযরাজিয়্যাহ। আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কুনিয়াত ছিল আবুল ফাদল। ফাদল ছিলেন তাঁর জ্যেষ্ঠ পুত্র। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেয়ে তিন বছরের বড় ছিলেন। আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মক্কা বিজয়, হুনাইন, তায়িফ ও তাবুক যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেন। হুনাইনের দিনে যখন লোকেরা তাঁর (নবীজির) কাছ থেকে সরে গিয়েছিল, তখন তিনি তাঁর পরিবারের সদস্যদের সাথে নবীজির পাশে অবিচল ছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذلك أُعجم هذا الاسم في (ز) و (ب): خباب، بالخاء المعجمة بعدها باء ثاني الحروف، وأُهمل في (ص) و (م)، وما ضُبط به الاسم في (ز) يوافق ما في بعض مصادر الترجمة، لكن الذي عليه أكثر عُلماء النَّسَب والتراجم ضبطُ هذا الاسم بالجيم ثم النون: جناب، كما في "المؤتلف والمختلف" للدارقطني 1/ 266، و"الإكمال لابن ماكولا 2/ 137، و"تبصير المنتبه" للحافظ ابن حجر 2/ 524، وضبطه الحافظ في "فتح الباري" 12/ 93، بالحروف، ونَبَّه أبو أحمد العسكري في "تصحيفات المحدثين" 2/ 435 إلى أن ما عداه تصحيف.



[2] وانظر "الطبقات" لابن سعد 4/ 5 و 15، وفيه تمام نسب أم العباس، فقال: بن زيد مناة بن عامر - وهو الضحيان - بن سعد بن الخزرج بن تيم الله بن النمر بن قاسط بن هِنب بن أَفْصَى بن دُعمي بن جَدِيلة بن أسد بن ربيعة بن نزار بن مَعَدّ بن عدنان. وبه يظهر أن نسبة الخررجية هنا نسبة للخزرج بن تيم الله من النمر بن قاسط، وليس للخزرج الأنصاريين الذين هم بطن من الأزد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5487)


5487 - قال ابن عُمر: حدثنا خالد بن القاسم البَيَاضي، أخبرني شُعبة مولى ابن عباس، قال: كان العباسُ مُعتدِلَ القَنَاة، وكان يُخبِرُنا عن عبد المُطَّلب أنه مات وهو أعدَلُ قناةً منه، وتوفي العباسُ يوم الجمعة لأربع عشرة خَلَت من رجب سنة اثنين وثلاثين في خلافة عثمان بن عفان، وهو ابن ثَمانٍ وثمانين سنةً، ودفن بالبَقِيع في مقبرة بني هاشم [1].




ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন: খালিদ ইবনুল কাসিম আল-বায়াদী আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, শু‘বাহ (ইবন আব্বাস-এর মুক্তদাস) আমাকে অবহিত করে বলেন: আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দেহের গঠন ছিল সুষম (মু‘তাদিল আল-কানা)। তিনি আমাদের আব্দুল মুত্তালিব সম্পর্কে বলতেন যে, যখন তিনি মারা যান, তখন তাঁর শারীরিক গড়ন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চেয়েও অধিক সুষম ছিল। আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উসমান ইবন আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খেলাফতকালে বত্রিশ (৩২) হিজরির রজব মাসের চৌদ্দ তারিখ শুক্রবার মৃত্যুবরণ করেন। সে সময় তাঁর বয়স হয়েছিল আটাশি (৮৮) বছর। তাঁকে বনু হাশিমের কবরস্থানে বাকী‘তে দাফন করা হয়।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو كذلك في "الطبقات الكبرى" لابن سعد 4/ 27 لكنه وصله بذكر ابن عباس أنه هو الذي حدَّث شعبة مولاهُ بالخبر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5488)


5488 - أخبرنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا إسماعيل بن قُتيبة، حدثنا محمد بن عبد الله بن نُمير، قال: أم العباس بن عبد المطلب نُتَيلة بنت جَنَاب [1] بن كُلَيب بن مالك بن عمرو بن عامر بن النَّمِر بن قاسطٍ، ولد العباس قبل الفِيل بثلاث سنين.




মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু নুমাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: আব্দুল মুত্তালিবের পুত্র আল-আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মা হলেন নুতাইলা বিনত জানাব ইবনু কুলাইব ইবনু মালিক ইবনু আমর ইবনু আমির ইবনু নামির ইবনু কাসিত। আল-আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হস্তী বাহিনীর (আমুল ফীল) ঘটনার তিন বছর আগে জন্মগ্রহণ করেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] أُهمل إعجام هذا الاسم في (ز) و (ص) و (م)،، وتصحف في (ب) إلى: حباب، بمهملة ثم موحدة. وانظر التعليق عليه عند الحديث المتقدم برقم (5486).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5489)


5489 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ، حدثنا عبد الله أحمد بن حنبل، حدثنا أحمد بن إبراهيم الدَّورقي، حدثني أبو نُعيم الفَضل بن دُكين، حدثنا زُهير، عن ليث، عن مُجاهد، عن علي بن عبد الله بن عباس، قال: أعتَقَ العباسُ عند موتِه سبعين مملوكًا [1]. ‌‌ذكرُ إسلام العبّاس رضي الله عنه، واختلاف الروايات في وقتِ إسلامه




আলি ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর মৃত্যুর সময় সত্তরজন গোলাম আযাদ করেছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف ليث - وهو ابن أبي سُليم - فقد ساء حفظُه، وعلي بن عبد الله بن عباس لم يُدرك جده العباس، فالخبر مرسلٌ كذلك.وهو عند عبد الله بن أحمد في "فضائل الصحابة" (1825)، وزاد فردّ منهم اثنين، فكنا نرى إنما ردَّهم أنهم كانوا أولاد الزنى.وأخرجه ابن سعد 4/ 27، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 26/ 376 عن أبي نُعيم الفضل بن دُكين بهذا الإسناد دون الزيادة المشار إليها.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (353) من طريق سعيد بن مسلمة، عن ليث، عن مجاهد. فجعله من قول مجاهد لم يجاوزه!









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5490)


5490 - حدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيِه من أصل كتابه، حدثنا أبو عمران موسى بن هارون الحافظ، حدثنا إسحاق بن راهَوَيهِ.وحدثني محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا أبو سعيد محمد بن شاذانَ وإبراهيم بن أبي طالب ومحمد بن نُعَيم، قالوا: حدثنا إسحاق بن إبراهيم، قال: أخبرنا وهب بن جرير، قال: حدثني أبي، قال: سمعت محمد بن إسحاق يقول: حدثني حُسين بن عبد الله، عن عِكرمة عن ابن عباس، عن أبي رافع مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: كنتُ غلامًا للعباس بن عبد المُطلب، وكنتُ قد أسلمتُ وأسلمت أمُّ الفضل وأسلمَ العبّاس، وكان يَكتُم إسلامه مَخافة قومِه، وكان أبو لَهَبٍ قد تَخلَّف عن بدرٍ، وبعثَ مكانه العاص بن هشام، وكان له عليه دين، فقال له: اكفِني هذا الغزو وأتركُ لك ما عليك، ففعل، فلما جاء الخبرُ وكَبَتَ اللهُ أبا لَهَب، وكنتُ رجلًا ضعيفًا أَنحِتُ هذه الأقداح في حُجْرةٍ، فوالله إني جالسٌ في الحُجْرة أنحِتُ أقداحي وعندي أمُّ الفضل إذ الفاسقُ أبو لَهَب يجُرُّ رجليه - أراه قال عند طُنُب الحُجْرة، وكان ظَهْرُه إلى ظهري، فقال الناس: هذا أبو سفيان بن الحارث، فقال أبو لهب: هلُمَّ إلي يا ابن أخي، فجاء أبو سفيان حتى جلس عندَه، فجاء الناسُ فقامُوا عليهما، فقال: يا ابن أخي، كيف كان أمرُ الناس؟ فقال: لا شيء، والله ما هو إلّا أن لَقِينَاهُم، فَمَنَحْنَاهُم أكتافنا يقتُلوننا كيف شاؤوا ويأسِروننا كيف شاؤوا، وايمُ اللهِ ما لُمتُ الناسَ، قال: ولِمَ، قال: رأيتُ رجالًا بيضًا على خَيلِ بُلْقٍ، لا والله ما تُلِيقُ شيئًا، ولا يقومُ لها شيءٌ، قال: فرفعتُ طَرَفَ [1] الحُجَرة، فقلتُ: تلك والله الملائكةُ، فرفع أبو لَهَبٍ يده فلَطَمَ وجهي، وثاوَرْتُه فاحْتَمَلَني فضرب بي الأرض حتى بَرَك عَلَيَّ [2]، فقامت أم الفضل فاحتَجَرَت [3] وأخذَتْ عمودًا من عَمَدِ الحُجْرة، فضربته به، فعَلِقَت [4] في رأسه شَجّةٌ مُنكَرةٌ، وقالت يا عدوّ الله، استضعفته أَن رأيت سيِّدَه غائبًا عنه، فقام ذليلًا، فوالله ما عاش إلَّا سبع ليالٍ، حتى ضربه الله بالعدسة فقَتَلَتْه، فلقد تركه ابناه لَيلتَين أو ثلاثةً ما يدفنانه حتى أنْتَنَ، فقال رجلٌ من قريش لابنيه: ألا تستحِيَان، إنَّ أباكُما قد أنْتَنَ في بيته، فقالا: إنا نخشى هذه القُرْحة، وكانت قريشٌ تتقي العدسة كما تتقي الطاعونَ، فقال رجلٌ: انطلقا فأنا معكما، قال: فوالله ما غَسلوه إلَّا قذفًا بالماء عليه من بعيد، ثم احتمَلوه فقَذَفُوه في أعلى مكةَ إلى جدارٍ، وقَذَفُوا عليه الحجارة" [5].




আবূ রাফি' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ছিলাম আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিবের গোলাম। আমি ইসলাম গ্রহণ করেছিলাম এবং উম্মুল ফাদলও ইসলাম গ্রহণ করেছিলেন। আব্বাসও ইসলাম গ্রহণ করেছিলেন, তবে তিনি তাঁর গোত্রের ভয়ে ইসলাম গোপন রাখতেন। আবূ লাহাব বদরের যুদ্ধে অনুপস্থিত ছিল। সে তার পরিবর্তে আস ইবনে হিশামকে পাঠিয়েছিল। আসের কাছে আবূ লাহাবের কিছু পাওনা ছিল। আবূ লাহাব তাকে বলল: "এই যুদ্ধে আমার পক্ষ থেকে তুমি যাও, তাহলে তোমার উপর আমার যে ঋণ আছে তা আমি ছেড়ে দেব।" সে (আস) তা-ই করল।

যখন (বদরের) খবর এলো এবং আল্লাহ তাআলা আবূ লাহাবকে লাঞ্ছিত করলেন, তখন আমি ছিলাম দুর্বল লোক। আমি একটি কামরার ভেতরে এই পানপাত্রগুলো তৈরি করছিলাম। আল্লাহর কসম, আমি কামরার ভেতরে বসে আমার পাত্রগুলো তৈরি করছিলাম এবং আমার কাছে উম্মুল ফাদলও ছিলেন। এমন সময় সেই ফাসিক (পাপী) আবূ লাহাব পা টেনে টেনে এলো—আমার মনে হয় সে কামরার খুঁটির কাছে এসেছিল—আর তার পিঠ ছিল আমার পিঠের দিকে। তখন লোকেরা বলল: ইনি আবূ সুফিয়ান ইবনুল হারিস। আবূ লাহাব বলল: "হে ভাতিজা, আমার কাছে এসো।" আবূ সুফিয়ান এসে তার কাছে বসলেন। তখন লোকেরা এলো এবং তাদের দু'জনের আশেপাশে দাঁড়াল। আবূ লাহাব বলল: "হে ভাতিজা, লোকদের অবস্থা কেমন ছিল?"

সে বলল: কিছুই না! আল্লাহর কসম, আমরা কেবল তাদের মুখোমুখি হয়েছিলাম আর আমাদের পিঠ তাদের দিকে ফিরিয়ে দিয়েছিলাম। তারা যেভাবে খুশি আমাদের হত্যা করছিল এবং যেভাবে খুশি আমাদের বন্দী করছিল। আল্লাহর কসম! আমি লোকদের (পলায়নকারীদের) দোষ দেব না। আবূ লাহাব বলল: কেন? সে বলল: আমি সাদা পোশাক পরা কিছু লোককে ধুসর বর্ণের ঘোড়ার উপর দেখলাম। আল্লাহর কসম, তাদের সামনে কোনো কিছুই টিকছিল না এবং কোনো কিছুই তাদের মোকাবিলা করতে পারছিল না।

বর্ণনাকারী বলেন: তখন আমি কামরার এক কোণ থেকে উঁকি দিয়ে বললাম: আল্লাহর কসম, তারাই হলো ফেরেশতা! একথা শুনে আবূ লাহাব তার হাত তুলে আমার মুখে সজোরে চড় মারল। আমি তার সাথে লড়াই শুরু করলাম, তখন সে আমাকে তুলে ধরে জমিনে আছড়ে ফেলে দিল এবং আমার বুকের ওপর বসে পড়ল। তখন উম্মুল ফাদল উঠে দাঁড়ালেন এবং একটি খুঁটি দিয়ে আবূ লাহাবকে আড়াল করলেন। তিনি কামরার খুঁটিগুলোর মধ্য থেকে একটি খুঁটি নিয়ে তাকে আঘাত করলেন। ফলে তার মাথায় মারাত্মক জখম (ক্ষত) হলো। তিনি বললেন: হে আল্লাহর দুশমন! এর মনিব অনুপস্থিত দেখে কি তুমি তাকে দুর্বল পেয়েছ?

এরপর সে অপমানিত অবস্থায় উঠে চলে গেল। আল্লাহর কসম! সে মাত্র সাত রাত বেঁচে ছিল। অতঃপর আল্লাহ তাকে 'আদাসাহ' (প্লেগের মতো এক ধরনের মারাত্মক ফোঁড়া) দ্বারা আক্রান্ত করলেন এবং তাতেই সে মারা গেল। তার দুই ছেলে দুই বা তিন রাত তাকে দাফন না করে ফেলে রাখল, ফলে তার লাশে দুর্গন্ধ হয়ে গেল। কুরাইশের এক ব্যক্তি তার দুই ছেলেকে বলল: তোমরা কি লজ্জা পাও না? তোমাদের বাবা ঘরে পচে যাচ্ছে। তারা বলল: আমরা এই ফোঁড়ার (আদাসাহ্) ভয়ে ভীত। কুরাইশরা এই 'আদাসাহ্'কে প্লেগের মতোই ভয় পেত। তখন এক ব্যক্তি বলল: তোমরা যাও, আমি তোমাদের সাথে আছি। বর্ণনাকারী বলেন: আল্লাহর কসম! তারা দূর থেকে তার উপর পানি ছিটিয়ে দেওয়া ছাড়া তাকে গোসল দেয়নি। এরপর তারা তাকে বহন করে নিয়ে মক্কার উঁচু স্থানে এক দেয়ালের কাছে ফেলে দিল এবং তার উপর পাথর নিক্ষেপ করল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] هكذا في (ز) و (ب)، وفي المطبوع: طُنب، وهما بمعنًى، وسقطت اللفظة في (ص) و (م).



[2] في (ز) و (ص) و (ب) نزل إليَّ، والمثبت من (م) وهو الجادة. وفي المطبوع: برك على صدري.



5490 [3] - بالراء المهملة، ومعناها: شدَّت ثيابها على نفسها، كما تدل عليه رواية ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3195)، حيث قال: فقامت أم الفضل فاحتجرَت مِلْحفتها.وأصل الاحتجار: الإحاطة على الشيء، وكذلك الاحتجاز بالزاي، فكلاهما بمعنًى، والله أعلم. إبراهيم بن سعد، وابن سعد 4/ 9 و 67 - 68، ومن طريقه ابن الجوزي في "المنتظم" 5/ 37 من طريق هارون بن أبي عيسى الشامي، وأحمد في "مسنده" 39/ (23864) عن يزيد بن هارون، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 1/ 511، وأبو نعيم في "الطب النبوي" (492)، وفي "دلائل النبوة" (406) من طريق محمد بن سَلَمة الحَرّاني، ويعقوب بن سفيان 1/ 512، وابن أبي خيثمة في السِّفر الثاني من "تاريخه" (172) و (545) من طريق عبد الله بن إدريس، وأبو نعيم في "الطب النبوي" بإثر (492) من طريق سعيد بن بزيع الحَرّاني. والطبري في "تاريخه" 2/ 614 من طريق سلمة بن الفضل الأبرش، سبعتهم عن محمد بن إسحاق، عن حسين بن عبد الله، عن عكرمة، قال أبو رافع … الخبر، ليس عند أحدٍ منهم ذكرٌ لابن عباس.ومثلُه ما سيأتي برقم (5494) من طريق زياد بن عبد الله البكائي عن ابن إسحاق.وكذلك أخرجه البزار (3866) من طريق يونس بن القاسم اليمامي، عن الحسين بن عبد الله، عن عكرمة، قال: قال أبو رافع، فذكره.قوله: تُلِيق: أي: تُبقي.الطُّنُب: حبل الخِباء والسُّرادق ونحوهما.وقوله: منحناهم أكتافنا، أي: جعلْنا نَفِرُّ أمام المسلمين، فهو كناية عن الهزيمة والفرار.والبُلْق: جمع أبْلَق، وهو ما كان في لونه سواد وبياض.والعمد: بفتح العين والميم، وبضمتين: جمع عَمُود.والعَدَسة: بَثْرة كانت تخرج على الناس في الجاهلية تُعدِي شبيهة الطاعون، وقلَّما يُسلم منها.



5490 [4] - هكذا جاء في نسخنا الخطية، وفي "سيرة ابن هشام" 1/ 647: فَلَعَتْ، وفي بعض المصادر التي أوردت الخبر: فَلَقَتْ، وهما بمعنى: شَقَّت، ومعنى عَلِقَتْ: ثبتت حتى أثَّرَت فيه، من العَلَق: وهو خَرْقُ من شيء عَلِقَ به كأن يمرَّ بشجرة أو شوكة فتعلق بثوبه فتخرقه. فالمعنى قريب من فلقت وفلعت. إبراهيم بن سعد، وابن سعد 4/ 9 و 67 - 68، ومن طريقه ابن الجوزي في "المنتظم" 5/ 37 من طريق هارون بن أبي عيسى الشامي، وأحمد في "مسنده" 39/ (23864) عن يزيد بن هارون، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 1/ 511، وأبو نعيم في "الطب النبوي" (492)، وفي "دلائل النبوة" (406) من طريق محمد بن سَلَمة الحَرّاني، ويعقوب بن سفيان 1/ 512، وابن أبي خيثمة في السِّفر الثاني من "تاريخه" (172) و (545) من طريق عبد الله بن إدريس، وأبو نعيم في "الطب النبوي" بإثر (492) من طريق سعيد بن بزيع الحَرّاني. والطبري في "تاريخه" 2/ 614 من طريق سلمة بن الفضل الأبرش، سبعتهم عن محمد بن إسحاق، عن حسين بن عبد الله، عن عكرمة، قال أبو رافع … الخبر، ليس عند أحدٍ منهم ذكرٌ لابن عباس.ومثلُه ما سيأتي برقم (5494) من طريق زياد بن عبد الله البكائي عن ابن إسحاق.وكذلك أخرجه البزار (3866) من طريق يونس بن القاسم اليمامي، عن الحسين بن عبد الله، عن عكرمة، قال: قال أبو رافع، فذكره.قوله: تُلِيق: أي: تُبقي.الطُّنُب: حبل الخِباء والسُّرادق ونحوهما.وقوله: منحناهم أكتافنا، أي: جعلْنا نَفِرُّ أمام المسلمين، فهو كناية عن الهزيمة والفرار.والبُلْق: جمع أبْلَق، وهو ما كان في لونه سواد وبياض.والعمد: بفتح العين والميم، وبضمتين: جمع عَمُود.والعَدَسة: بَثْرة كانت تخرج على الناس في الجاهلية تُعدِي شبيهة الطاعون، وقلَّما يُسلم منها.



5490 [5] - إسناده ضعيف لضعف حسين بن عبد الله - وهو ابن عُبيد الله بن عباس الهاشمي - وقد انفرد جرير - وهو ابن حازم - ويونس بن بُكير كما سيأتي برقم (5493) بذكر ابن عباس في إسناده، وخالفهما سائر أصحاب محمد بن إسحاق فلم يذكروا ابنَ عباس، كما سيأتي عند المصنف برقم (5494) من طريق زياد بن عبد الله البكائي عن ابن إسحاق وقال الدارقطني في "علله" (1171): وهو المحفوظ.قلنا: وعكرمة لم يُدرك أبا رافع، فالخبر منقطع أيضًا. إسحاق بن إبراهيم: هو ابن راهويه.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (912) عن موسى بن هارون، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (346) و (3195)، ومن طريقه أبو القاسم الأصبهاني في "سير السلف الصالحين" ص 585 عن أحمد بن عبدة، عن وهب بن جرير، به.وأخرجه مطولًا ومختصرًا ابن سعد 4/ 9 و 67 - 68، وابن أبي خيثمة في السفر الثاني من "تاريخه الكبير" (546)، وأبو نعيم في "دلائل النبوة" (406)، وفي "معرفة الصحابة" (6780) من طريق إبراهيم بن سعد، وابن سعد 4/ 9 و 67 - 68، ومن طريقه ابن الجوزي في "المنتظم" 5/ 37 من طريق هارون بن أبي عيسى الشامي، وأحمد في "مسنده" 39/ (23864) عن يزيد بن هارون، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 1/ 511، وأبو نعيم في "الطب النبوي" (492)، وفي "دلائل النبوة" (406) من طريق محمد بن سَلَمة الحَرّاني، ويعقوب بن سفيان 1/ 512، وابن أبي خيثمة في السِّفر الثاني من "تاريخه" (172) و (545) من طريق عبد الله بن إدريس، وأبو نعيم في "الطب النبوي" بإثر (492) من طريق سعيد بن بزيع الحَرّاني. والطبري في "تاريخه" 2/ 614 من طريق سلمة بن الفضل الأبرش، سبعتهم عن محمد بن إسحاق، عن حسين بن عبد الله، عن عكرمة، قال أبو رافع … الخبر، ليس عند أحدٍ منهم ذكرٌ لابن عباس.ومثلُه ما سيأتي برقم (5494) من طريق زياد بن عبد الله البكائي عن ابن إسحاق.وكذلك أخرجه البزار (3866) من طريق يونس بن القاسم اليمامي، عن الحسين بن عبد الله، عن عكرمة، قال: قال أبو رافع، فذكره.قوله: تُلِيق: أي: تُبقي.الطُّنُب: حبل الخِباء والسُّرادق ونحوهما.وقوله: منحناهم أكتافنا، أي: جعلْنا نَفِرُّ أمام المسلمين، فهو كناية عن الهزيمة والفرار.والبُلْق: جمع أبْلَق، وهو ما كان في لونه سواد وبياض.والعمد: بفتح العين والميم، وبضمتين: جمع عَمُود.والعَدَسة: بَثْرة كانت تخرج على الناس في الجاهلية تُعدِي شبيهة الطاعون، وقلَّما يُسلم منها.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5491)


5491 - أخبرنا أبو جعفر البغدادي، حدثنا أبو عُلَاثة، قال: حدثني أبي، حدثنا ابن لهيعة، عن أبي الأسود، عن عُروة بن الزُّبير، قال: كان العباس بن عبد المطلب قد أسلَم وأقام على سِقايتِه، ولم يُهاجر [1].




উরওয়াহ ইবনুয যুবাইর থেকে বর্ণিত, আব্বাস ইবনু আবদুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইসলাম গ্রহণ করেছিলেন এবং তাঁর সিকায়াতের (হাজীদের পানি পান করানোর দায়িত্ব) ওপর বহাল ছিলেন, কিন্তু তিনি হিজরত করেননি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم كما تقدَّم بيانه برقم (4378)، لكنه مرسل. أبو عُلَاثة: هو محمد بن عمرو بن خالد الحَرَّاني، وابن لهيعة هو عبد الله، وأبو الأسود: هو محمد بن عبد الرحمن المعروف بيتيم عروة.وأخرجه البيهقي في "سننه الكبرى" 9/ 15 عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5492)


5492 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أُبو أسامة عبد الله بن أسامة الحَلَبي (ح) وأخبرناه أبو عمرو عثمان بن أحمد بن السَّمّاك ببغداد، حدثنا عيسى بن عبد الله الطيالسي (ح)وحدثني أبو بكر بن أبي دارِم الحافظ بالكوفة، حدثنا موسى بن هارون؛ قالوا: حدثنا محمد بن عمران بن محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى، حدثنا معاوية بن عمّار الدُّهني، عن أبيه، عن أبي الزُّبير عن جابر، قال: حَمَلني خالي جَدُّ بن قيس وما أقدِرُ أن أرمي بحَجَر في السبعين راكبًا من الأنصار الذين وَفَدُوا على النبيِّ صلى الله عليه وسلم، فخَرَج إلينا رسول الله صلى الله عليه وسلم ومعه عمُّه العباسُ، فقال: "يا عمِّ، خُذْ لي على أخوالك" فقالوا: يا محمد، سَلْ لِربِّك ولنفسك ما شئتَ، فقال: "أما الذي أسألُكم لنفسي فتَمْنَعُوني مما تمنعُون منه أموالكُم وأنفسكُم" قالوا: فما لنا إذا فعلنا ذلك؟ قال: "الجنة" [1]. هذه الروايات كلُّها بلفظٍ واحدٍ، وفي حديث موسى بن هارون: حدثنا محمد بن عمران، ولم نسمعه إِلَّا منه.هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، وليس للعباسيّة رضي الله عنهم في تَقدُّم إسلام العباس أصحُّ من هذا الحديث [2].




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, আমার মামা জাদ্দ ইবনু কাইস আমাকে বহন করে নিয়ে যান। তখন সত্তরজন আনসার আরোহীর মধ্যে আমি এমন অবস্থায় ছিলাম যে আমি একটি পাথরও নিক্ষেপ করার ক্ষমতা রাখতাম না— যাঁরা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করেছিলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর চাচা আব্বাসকে সাথে নিয়ে আমাদের কাছে বেরিয়ে এলেন। তিনি (রাসূলুল্লাহ) বললেন, "চাচাজান, আমার পক্ষ থেকে আপনার খালাতো ভাইদের (আনসারদের) কাছে অঙ্গীকার নিন।" তারা বললেন, হে মুহাম্মাদ! আপনি আপনার রবের জন্য এবং আপনার নিজের জন্য যা ইচ্ছা চান। তিনি বললেন, "আমি তোমাদের কাছে নিজের জন্য যা চাইছি তা হলো: তোমরা আমাকে সেভাবে রক্ষা করবে যেভাবে তোমরা তোমাদের সম্পদ ও নিজেদেরকে রক্ষা করো।" তারা বললেন, আমরা যদি তা করি, তবে আমাদের জন্য কী রয়েছে? তিনি বললেন, "জান্নাত।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قويٌّ كما قال الحافظ ابن حجر في "الإصابة" 1/ 468، وذلك من أجل معاوية بن عمار الدهني، فهو صدوق لا بأس به.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (1757)، وفي "الأوسط" (7968)، وفي "الصغير" (1076)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (1719)، وأبو عثمان سعيد بن محمد البّحيري في الرابع من "فوائده" (70)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 11/ 219 من طرق عن محمد بن عمران، بهذا الإسناد.وأخرج البخاري (3890) من طريق سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن جابر، قال: شهد بي خالاي العقبة. قال ابن عيينة: أحدُهما البراء بن معرور.قال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 11/ 422: وقع في رواية الإسماعيلي (يعني في "مستخرجه" على البخاري): قال سفيان: خالاه البراء بن معرور وأخوه. ولم يُسمِّه. ثم قال الحافظ: عنى به الجدّ بن قيس، وأطلق عليه أخًا وهو ابن عم لأنهما في منزلة واحدة في النسب، لكن لم يذكر أحد من أهل السير الجدَّ بن قيس في أصحاب العقبة، فكأنَّه لم يكن أسلم، فعلى هذا فالخال الآخر لجابر إما ثعلبة وإما عمرو.وأخرج الطبراني في "الكبير" (1714)، ومن طريقه ابن عساكر 11/ 219 من طريق جابر الجُعفي، عن الشعبي، عن جابر قال: كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلة العقبة، وأخرجني خالي وأنا لا أستطيع أن أرمي بحجر. وقد تقدَّم ذكر قصة هذه البيعة، وهي بيعة العقبة الثانية بأطول ممّا هنا برقم (4297) من طريق عبد الله بن عثمان بن خُثيم عن أبي الزبير عن جابر.



[2] ليس في هذا الخبر أنَّ العباس كان يومئذٍ مسلمًا، بل جاء في خبر ابن إسحاق في ذكر بيعة العقبة الثانية من حديث كعب بن مالك - وهو عند أحمد 25/ (15798) وغيره أنَّ العباس كان يومئذٍ على دين قومه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5493)


5493 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو عُمر أحمد بن الجبار بن عُمر العُطارِدِيّ، حدثنا يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق، حدثني الحُسين ابن عُبد الله بن عُبيد الله بن عباس، عن عِكرمة، عن ابن عباس، حدثني أبو رافع كنا آل العباس قد دخَلْنا الإسلام، وكنا نَستَخْفي إسلامنا، وكنت غلامًا للعباس أنحِتُ الأقداحَ، فلما سارتْ قُريش إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم بدرٍ جَعَلْنا نتوقَّع الأخبار، فقدِم علينا الحَيْسُمان [1] الخُزاعيُّ بالخبر، فوَجَدْنا في أنفُسِنا قوةً، وسَرَّنا ما جاءنا من الخَبَر من ظُهُور رسول الله صلى الله عليه وسلم، فوالله إني لَجالسٌ في صُفَة زَمْزَمَ أَنحِتُ الأقداحَ، وعندي أمُّ الفَضْل جالسةٌ، وقد سَرَّنا ما جاءنا من الخبر من ظُهُور رسولِ الله، وبَلَغَنا عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، إذ أقبلَ الخَبيثُ أبو لَهَب يجُرُّ رجليه قد أكْبَتَه الله وأخزاهُ لما جاءه من الخبر، حتى جلس على طُنُب الحُجرة، وقال الناسُ: هذا أبو سفيان بن الحارث قد قَدِمَ واجتمع عليه الناسُ، فقال له أبو لَهَب: هلُمَّ إليَّ يا ابن أخي، فجاء حتى جلس بين يديه، فقال: أخبرني عن الناس، قال: نعم، والله ما هو إلّا إن لَقِينا القومَ فَمَنَحْناهم أكتافنا يَضعُون السلاح منا حيث شاؤوا، والله مع ذلك ما لُمتُ الناسَ لقينا رجالًا بيضًا على خَيل بُلْقٍ، والله ما تُبقى شيئًا، قال فرفعتُ طُنُبَ الحُجْرة، فقلت: تلك والله الملائكةُ، قال: فرفع أبو لَهَبٍ يده فضرب وجهي ضربةً مُنكَرةٌ، وثاوَرْته، وكنتُ رجلًا ضعيفًا، فاحتمَلَني فضرب بي الأرضَ، وبَرَك على صدري وضَرَبني، وتقومُ أمُّ الفضل إلى عَمُودٍ من عَمَد الحُجرة [2]، فأخذته وهي تقولُ: استضعَفْتَه أن غابَ عنه سيِّدهُ؟! وتضرِبُه بالعمود على رأسه فتَفْلِقُه [3] شَجّةً مُنكرةٌ، وقام يَجُرٌ رِجليه ذليلًا، ورماه الله بالعَدَسة، فوالله ما مَكَث إلَّا سبعًا حتى مات، فلقد تركه ابناهُ في بيته ثلاثًا ما يَدفِنانه حتى أَنْتَنَ، وكانت قريشٌ تتقي هذه العدسة كما تتّقي الطاعون، حتى قال لهما رجلٌ من قريش: وَيحَكُما ألا تستحيانِ، إِنَّ أباكُما قد أَنْتَن في بيته لا تَدفِنانه، فقالا: إننا نخشى عدوى هذه القُرْحة، فقال: انطلقا فأنا أُعينُكُما عليه، فوالله ما غَسْلُوه إلَّا قَذفًا بالماء عليه من بعيد ما يَدْنُون منه، ثم احْتَمَلُوه إلى أعلى مكة، فأسنَدُوه إلى جدارٍ، ثم رَصَفُوا عليه الحجارة [4].




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু রাফি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: আমরা আব্বাস পরিবারের সকলেই ইসলাম গ্রহণ করেছিলাম, আর আমরা আমাদের ইসলামকে গোপন রাখতাম। আমি আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর একজন বালক খাদেম ছিলাম এবং আমি কাঠের পাত্র তৈরি করতাম। যখন কুরাইশরা বদরের দিন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে যাত্রা করল, তখন আমরা খবরের জন্য অপেক্ষা করতে লাগলাম। এরপর খায়সুমান আল-খুযাঈ আমাদের কাছে খবর নিয়ে আসল। সেই খবরে আমরা নিজেদের মধ্যে শক্তি অনুভব করলাম এবং আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বিজয়ের খবর শুনে আমরা আনন্দিত হলাম।

আল্লাহর কসম! আমি যমযমের চত্বরে বসে কাঠের পাত্র তৈরি করছিলাম। আমার কাছে উম্মুল ফাযল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বসেছিলেন। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বিজয়ের যে খবর আমাদের কাছে এসেছিল, তাতে আমরা সকলেই আনন্দিত ছিলাম এবং রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সম্পর্কে আমাদের কাছে খবর পৌঁছাচ্ছিল। এমন সময় সেই দুষ্ট আবু লাহাব তার পা টেনে টেনে আসছিল, তাকে আল্লাহ লজ্জিত ও অপদস্থ করেছিলেন, কারণ তার কাছেও সেই খবর পৌঁছেছিল। সে এসে তাঁবুর কিনারায় বসল। লোকেরা বলল: এই তো আবূ সুফিয়ান ইবনুল হারিস এসে পড়েছেন, আর তার চারপাশে লোকেরা ভিড় জমাল।

তখন আবু লাহাব তাকে বলল: এদিকে এসো, হে আমার ভাতিজা! সে এসে তার সামনে বসল। আবু লাহাব বলল: লোকদের কী অবস্থা, আমাকে বলো। সে (আবূ সুফিয়ান) বলল: হ্যাঁ, আল্লাহর কসম! বিষয়টা এমন নয় যে আমরা তাদের সাথে সাক্ষাতের পর পিঠ ফিরিয়ে দিয়েছি যে তারা যেখানে খুশি সেখানে আমাদের ওপর অস্ত্র চালাবে। আল্লাহর কসম! তা সত্ত্বেও আমি লোকেদের দোষারোপ করি না, কারণ আমরা এমন কিছু লোকের সম্মুখীন হয়েছিলাম যারা শুভ্র বর্ণের এবং তারা ধূসর ঘোড়ার পিঠে ছিল। আল্লাহর কসম! তারা কিছুই বাকি রাখেনি।

(আবু রাফি’) বলেন: তখন আমি তাঁবুর কিনারার পর্দা তুলে বললাম: আল্লাহর কসম! তারা তো ছিলেন ফেরেশতা। (আবূ রাফি’ বলেন) তখন আবু লাহাব তার হাত তুলে আমার মুখে মারাত্মকভাবে আঘাত করল। আমি তার সাথে শক্তি প্রয়োগে পালটা আক্রমণ করতে চেয়েছিলাম, কিন্তু আমি ছিলাম একজন দুর্বল মানুষ। সে আমাকে তুলে ধরে মাটিতে আছড়ে ফেলল এবং আমার বুকের ওপর চেপে বসে আমাকে মারতে লাগল।

তখন উম্মুল ফাযল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কক্ষের খুঁটিগুলোর একটির দিকে উঠে গেলেন এবং সেটি হাতে নিয়ে বললেন: তার মালিক অনুপস্থিত জেনে কি তুমি তাকে দুর্বল মনে করছ?! এই বলে তিনি খুঁটিটি দিয়ে তার মাথায় এমন মারাত্মকভাবে আঘাত করলেন যে তা ফেটে গেল।

অতঃপর সে অপদস্থ হয়ে পা টেনে টেনে উঠে গেল। এরপর আল্লাহ তাকে 'আদাসাহ' (এক প্রকার ফোঁড়া বা প্লেগ) রোগে নিক্ষেপ করলেন। আল্লাহর কসম! সাত দিনের বেশি সে জীবিত ছিল না, তারপর সে মারা গেল। তার দুই পুত্র তাকে তিন দিন ঘরে ফেলে রাখল, দাফন করল না, ফলে তার দেহ দুর্গন্ধময় হয়ে উঠল। কুরাইশরা এই 'আদাসাহ' রোগটিকে প্লেগকে ভয় করার মতো ভয় করত।

অবশেষে কুরাইশের এক ব্যক্তি তাদের বলল: তোমাদের জন্য আফসোস! তোমাদের কি লজ্জা নেই? তোমাদের পিতা ঘরেই দুর্গন্ধ ছড়াচ্ছে, অথচ তোমরা তাকে দাফন করছ না! তারা বলল: আমরা এই ফোঁড়া (ঘা) থেকে সংক্রমণ হওয়ার ভয় করছি। লোকটি বলল: চলো, আমি তোমাদেরকে সাহায্য করব। আল্লাহর কসম! তারা দূর থেকে তার ওপর শুধু পানি ছিটিয়েছিল, তার কাছেও যায়নি। এরপর তারা তাকে মক্কার উঁচু স্থানে বহন করে নিয়ে গেল এবং একটি দেয়ালের সাথে হেলান দিয়ে রাখল। অতঃপর তার ওপর পাথর চাপা দিয়ে দিল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرّف في (ز) و (ب) إلى: الضمان، وجاء مكانها في (ص) و (م) بياض، والصواب ما أثبتناه كما في رواية البيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 145 عن أبي عبد الله الحاكم، بسنده هذا. وكذلك جاء في "معرفة الصحابة" لابن مَنْدَه 2/ 855 عن أحمد بن محمد بن زياد ومحمد بن يعقوب عن أحمد بن عبد الجبار العُطاردي.



[2] في (ز) و (ب) الخيمة، والمثبت من (ص) و (م) هو الموافق لرواية البيهقي في "الدلائل" عن الحاكم، وهو كذلك في سائر الروايات عن ابن إسحاق، كما في الرواية المتقدمة برقم (5490).



5493 [3] - في (ز) و (ب) وتدخله، وفي (ص) و (م) فتدخله، والمثبت من "دلائل النبوة".



5493 [4] - إسناده ضعيف كما تقدَّم بيانه برقم (5490) حيث تقدم الخبر هناك من طريق جرير بن حازم عن محمد بن إسحاق.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 145 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن مَنْدَه في "معرفة الصحابة" 2/ 855 عن محمد بن يعقوب، به.وأخرجه ابن منده أيضًا، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 4/ 253 عن أحمد بن محمد بن زياد، عن أحمد بن عبد الجبار، به.وقوله: رَصَفُوا عليه الحجارة، أي: جعلُوا عليه الحجارة بعضها فوق بعضٍ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5494)


5494 - وأخبرني أبو أحمد التَّمِيمي، حدثنا أبو العباس أحمد بن محمد بن الحُسين، حدثنا عمرو بن زُرارة، قال: أخبرنا زياد بن عبد الله، عن محمد بن إسحاق، حدثني حُسين بن عبد الله، عن عِكرمة، قال: قال أبو رافع: كنت غلامًا للعباس بن عبد المُطّلب، وكان الإسلامُ دَخَلَنا أهل البيت، فأسلم العباسُ، وأسلمت أمُّ الفَضل، وأسلمتُ، وكان العباسُ يَهابُ قومَه ويَكْرَه خِلافَهم، وكان يَكتُم إسلامه [1].ولم يَزِدْ أبو أحمد في هذا الإسناد على هذا المتن، وأتى به مُرسَلًا، هذا الذي انتهى إلينا من الأخبار التي تدل على تقدُّم إسلامِ العباس بن عبد المُطّلب قبل بَدْرٍ، فاسمع الآنَ الأخبار التي تُضَادُّها:




আবু রাফে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ছিলাম আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিবের গোলাম। আমাদের পরিবারে (আহলুল বাইতে) ইসলাম প্রবেশ করেছিল। ফলে আব্বাস ইসলাম গ্রহণ করেন, উম্মুল ফাদল ইসলাম গ্রহণ করেন এবং আমিও ইসলাম গ্রহণ করি। কিন্তু আব্বাস তাঁর সম্প্রদায়কে ভয় পেতেন এবং তাদের বিরোধিতা করা অপছন্দ করতেন। তাই তিনি তাঁর ইসলাম গোপন রাখতেন।

[এরপর আবু আহমাদ এই সনদটিতে এই মতন থেকে আর কিছু যোগ করেননি এবং তিনি এটিকে মুরসাল হিসেবে বর্ণনা করেছেন। এগুলো সেই সমস্ত সংবাদ যা আমাদের নিকট পৌঁছেছে, যা দ্বারা ইঙ্গিত পাওয়া যায় যে আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিবের ইসলাম গ্রহণের সময়কাল বদরের যুদ্ধেরও আগের। এখন আপনি সেই সমস্ত সংবাদ শুনুন যা এর বিপরীত।]




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف كسابقه.وأخرجه ابن هشام في "السيرة النبوية" 1/ 646 عن زياد بن عبد الله - وهو البكائي - بهذا الإسناد.بأطول ممّا هنا بنحو الرواية المتقدمة قبله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5495)


5495 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا الحُسين بن محمد بن زياد القَبّاني والحسن بن علي بن زياد السُّرِّي وصالح بن محمد الرازي، قالوا: حدثنا إبراهيم بن المُنذِر الحِزامي، حدثنا محمد بن فُلَيح، عن موسى بن عُقبة، قال: وقال ابن شِهابٍ: حدَّثه أنس بن مالك: أنَّ رجالًا من الأنصار استأذَنُوا رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقالوا: ائذَن لنا فنَترُكَ لابنِ أُختِنا العباس فِداءه، فقال: "واللهِ لا تَذَرُون درهما" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه!




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আনসারদের কতিপয় লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট অনুমতি চাইলেন। তারা বললেন, আমাদেরকে অনুমতি দিন যাতে আমরা আমাদের বোনের ছেলে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মুক্তিপণ ছেড়ে দেই। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আল্লাহর কসম, তোমরা এক দিরহামও ছাড়বে না।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل محمد بن فُليح - وهو ابن سليمان - فهو صدوق لا بأس به، وقد توبع. ابن شهاب: هو محمد بن مسلم بن عُبيد الله الزهري.وأخرجه البخاري (4017) عن إبراهيم بن المنذر، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه البخاري (2537) و (3048)، وابن حبان (4794) من طريق إسماعيل بن إبراهيم بن عُقبة، عن عمه موسى بن عُقبة به.وقولهم: لابن أختنا، لأنَّ جدة العباس كانت امرأة من بني النجار، تزوَّجها هاشم بن عبد مناف، فولدت له عبد المطلب، قاله الخطابي في "أعلام الحديث" 2/ 1269.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5496)


5496 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجَبّار، حدثنا يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق، حدثني يحيى بن عَبّاد بن عبد الله بن الزُّبَير، عن أبيه، عن عائشة، قالت: لما بَعَث أهلُ مكةَ في فِداء أسْراهم بَعَثَتُ زينبُ بنتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم في فِداء أبي العاص، وبعثت فيه بقِلادةٍ كانت خديجةُ أدخلَتْها بها على أبي العاص حين بَنَى عليها، فلما رآها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم رَقَّ لها رِقّةً شديدةً، وقال: "إن رأيتُم أن تُطلِقُوا لها أَسِيرَها، وتَرُدُّوا عليها الذي لها فافْعَلُوا" قالوا: نعم يا رسول الله، ورَدُّوا عليها [1] الذي لها.قال: وقال العباسُ: يا رسول الله، إني كنت مُسلمًا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الله أعلمُ بإسلامك، فإن يَكُنْ كما تقولُ فاللهُ يَجزِيكَ، فافْدِ نَفْسَك وابنَي أخَوَيك نوفلَ بنَ الحارث بن عبد المُطّلب وعَقِيلَ بنَ أبي طالب بن عبد المُطّلب وحَلِيفَك عُتبةَ بنَ عمرو بن جَحْدَم - أخو بني الحارث بن فِهْر - " فقال: ما ذاك عندي يا رسول الله، قال: "فأينَ المالُ الذي دفَنْتَ أنتَ وأمُّ الفضل فقلتَ لها: إن أُصِبتُ فهذا المالُ لِبَنيَّ: الفضلِ وعبدِ الله وقُثَمَ؟ " فقال: والله يا رسولَ الله إني أَشهَدُ أنك رسولُه، إنَّ هذا لَشَيءٌ ما عَلِمَه أحدٌ غَيري وغيرُ أمِّ الفضل، فاحسِبْ لي يا رسولَ الله ما أصبْتُم مني عِشْرِينَ أُوقيَّةً من مالٍ كان معي، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أَفْعَلُ" ففَدَى العباسُ نفسَه وابنَي أخَوَيه وحَلِيفَه، وأنزلَ اللهُ عز وجل: {يَاأَيُّهَا النَّبِيُّ قُلْ لِمَنْ فِي أَيْدِيكُمْ مِنَ الْأَسْرَى [2] إِنْ يَعْلَمِ اللَّهُ فِي قُلُوبِكُمْ خَيْرًا يُؤْتِكُمْ خَيْرًا مِمَّا أُخِذَ مِنْكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَحِيمٌ} [الأنفال: 70] فأعطاني مكانَ العِشرين الأُوقيّةِ في الإسلام عشرينَ عَبْدًا، كلُّهم في يدِه مالٌ يَضرِبُ به، مع ما أرجُو من مغفرةِ الله عز وجل [3]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আয়িশা) বলেন: যখন মক্কার লোকেরা তাদের যুদ্ধবন্দীদের মুক্তির জন্য মুক্তিপণ পাঠাল, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর স্বামী আবুল আসের মুক্তির জন্য মুক্তিপণ পাঠালেন। তিনি এমন একটি হার পাঠালেন, যা খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে (যায়নাবকে) আবুল আসের সাথে বাসর রাতে দিয়েছিলেন যখন তিনি তাঁর (যায়নাবের) সাথে বিবাহ বন্ধনে আবদ্ধ হয়েছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সেটি (হারটি) দেখলেন, তখন তাঁর অন্তরে গভীর মমতা জাগল। তিনি বললেন: "তোমরা যদি মনে করো যে, তার (যায়নাবের) বন্দীকে মুক্ত করে দেবে এবং তার জিনিস তাকে ফিরিয়ে দেবে, তবে তা করো।" সাহাবীগণ বললেন: "হ্যাঁ, ইয়া রাসূলাল্লাহ!" অতঃপর তারা হারটি তাঁকে ফিরিয়ে দিলেন।

বর্ণনাকারী বলেন: আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি তো মুসলিম ছিলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ তোমার ইসলাম সম্পর্কে ভালো জানেন। যদি তুমি যা বলছো তা সত্য হয়, তবে আল্লাহ তোমাকে পুরস্কৃত করবেন। এখন তুমি নিজের পক্ষ থেকে এবং তোমার দুই ভাতিজা—নওফাল ইবনু হারিস ইবনু আবদুল মুত্তালিব ও আক্বীল ইবনু আবী তালিব ইবনু আবদুল মুত্তালিবের পক্ষ থেকে এবং তোমার মিত্র উতবা ইবনু আমর ইবনু জাহদাম – বনু হারিস ইবনু ফিহরের ভাইয়ের পক্ষ থেকে মুক্তিপণ দাও।" আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার কাছে (মুক্তির জন্য) এত সম্পদ নেই। তিনি (নবী) বললেন: "তাহলে সেই সম্পদ কোথায়, যা তুমি ও উম্মুল ফাদল লুকিয়ে রেখেছিলে এবং তাকে বলেছিলে: ‘যদি আমি আঘাতপ্রাপ্ত (মারা) যাই, তবে এই সম্পদ আমার পুত্রদের—ফাদল, আবদুল্লাহ ও কুসামের জন্য?'" আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আপনি আল্লাহর রাসূল। এই বিষয়টি আমি এবং উম্মুল ফাদল ছাড়া আর কেউ জানত না। ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার সঙ্গে যে সম্পদ ছিল, তার থেকে আপনারা যা পেয়েছেন, তা থেকে বিশ উকিয়া (Ounce) আমার জন্য হিসাব করুন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তাই করব।" অতঃপর আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিজের, তাঁর দুই ভাতিজার এবং তাঁর মিত্রের মুক্তিপণ দিলেন।

আর আল্লাহ তাআলা এই আয়াত নাযিল করলেন: "{হে নবী! তোমার হাতে যে সকল যুদ্ধবন্দী রয়েছে তাদেরকে বলো, আল্লাহ যদি তোমাদের হৃদয়ে কোনো কল্যাণ দেখতে পান, তাহলে তোমাদের কাছ থেকে যা নেওয়া হয়েছে তার চেয়েও উত্তম জিনিস তোমাদেরকে দেবেন এবং তোমাদেরকে ক্ষমা করে দেবেন। আর আল্লাহ ক্ষমাশীল, পরম দয়ালু।}" (সূরা আনফাল: ৭০)।

(আব্বাস বলেন) ইসলামের পরে আল্লাহ আমাকে বিশ উকিয়ার (মুক্তিপণের) পরিবর্তে বিশজন দাস দিলেন, যাদের প্রত্যেকের হাতে এমন সম্পদ ছিল যা দিয়ে তারা ব্যবসা করত, উপরন্তু আমি আল্লাহ তাআলার পক্ষ থেকে ক্ষমা পাওয়ারও আশা রাখি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (ب): عليه، والمثبت من (ص) و (م) هو الجادة.



[2] كذلك قرأها أبو عمرو بن العلاء وأبو جعفر يزيد بن القعقاع بضم الهمزة وفتح السين بعدها ألف، وقرأها الباقون بفتح الهمزة وإسكان السين من غير ألف بعدها. انظر "النشر" لابن الجَزَري 2/ 277.



5496 [3] - إسناده حسن بذكر قصة زينب وأبي العاص من أجل ابن إسحاق - وهو محمد بن إسحاق بن يسار المُطَّلبي مولاهم - وقد صرح بسماعه فانتفت شبهة تدليسه، وأما قصة العباس بن عبد المُطَّلب فوهم المصنِّف رحمه الله في كتابه هذا إذ أدرجها بعد قصة زينب وأبي العباس بإسناد ابن إسحاق إلى عائشة، كما نبَّه عليه البيهقي في "سننه الكبرى" 6/ 322.وقد تقدَّمت قصة زينب وأبي العاص عند المصنف مفردةً عن قصة العباس برقم (4352) و (5109) وستأتي كذلك مفردة برقم (7012) بإسناد المصنف الذي هنا إلى عائشة.وأما قصة العباس لما أسر يوم بدر، فرواها ابن إسحاق بأسانيد عدة متصلة أحدها حسنٌ، وسائرها فيها مقالٌ، غير أنها وإن كانت كذلك يحصل بمجموعها للخبر قوةٌ، فيرتقي إلى درجة الصحيح إن شاء الله، على أنَّ بعض حروف قصة العباس المذكورة هنا مرويٌّ بإسناد صحيح كما سيأتي بيانه.وأخرجه البيهقي في "سننه الكبرى" 6/ 322 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 6/ 322، وفي "دلائل النبوة" 3/ 142 - 143 عن أبي عبد الله الحاكم في روايته لكتاب "مغازي ابن إسحاق" - كما قال البيهقي - عن أبي العباس محمد بن يعقوب، عن أحمد بن عبد الجبار، عن يونس بن بُكَير، قال: ثم رجع ابن إسحاق إلى الإسناد الأول، فذكر بعثة قريش إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم في فداء أسراهم، ففدى كلُّ قومٍ أسيرهم بما رضُوا، ثم ذكر قصة العباس هذه، وإنما أراد يونس بالإسناد الأول روايته عن ابن إسحاق، قال: حدثني يزيد بن رُومان عن عروة بن الزبير، قال: وحدثني الزهري ومحمد بن يحيى بن حَبّان وعاصم بن عمر بن قتادة وعبد الله بن أبي بكر وغيرهم من علمائنا، فبعضهم حدَّث بما لم يحدِّث به بعضٌ، وقد اجتمع حديثهم فيما ذكرتُ لك من يوم بدر، فذكر القصة، ثم جعل يُدخِل فيما بينها بغير هذا الإسناد، ثم يرجع إليه، والله أعلم.كذا قال البيهقيُّ، وخالفه ما جاء عند ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 26/ 288 حيث أخرج قصة العباس مفردةً من طريق رضوان بن أحمد الصيدلاني، عن أحمد بن عبد الجبار، عن يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق، قال: ثم رجع إلى الإسناد الأول، (قال ابن عساكر أو مَن دونه ممن روى ابن عساكر من طريقه مغازي ابن إسحاق برواية يونس بن بُكَير): يعني حديث الحسين بن عبد الله بن عُبيد الله بن عباس، عن عكرمة عن ابن عباس. فجعل هذا الإسناد المذكور هو إسناد قصة العباس، وليس الأسانيد التي ابتدأ بها ابن إسحاق قصة غزوة بدرٍ كما جزم به البيهقيُّ، وهذا هو الذي اعتمده الذهبي في "سير أعلام النبلاء" 3/ 82، حيث ذكر قصة العباس بهذا الإسناد الذي ذكره ابن عساكر. وهو الصواب إن شاء الله، والحسين ضعيف الحديث.ويؤيده أنَّ أحمد أخرج قصة العباس في "مسنده" 5/ (3310)، ومن طريقه ابن عساكر 26/ 288 عن يزيد بن هارون، عن محمد بن إسحاق، حدثني من سمع عكرمة، عن ابن عباسِ. وكأنَّ ابن إسحاق هنا أو مَن دونه طوى ذكر الحسين بن عَبد الله بن عُبيد الله لضعفه فدلَّسه.وأخرج قصة العباس مفردةً كذلك أبو نُعيم في "دلائل النبوة" (409) من طريق محمد بن سَلَمة الحَرَّاني، عن محمد بن إسحاق، قال: حدثني بعض أصحابنا، عن مِقْسَم، عن ابن عباس. وإسناده ضعيف لإبهام الراوي.وأخرجها كذلك الطبري في "تفسيره" 10/ 49، وفي "تاريخه" 2/ 465 - 466، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 1/ 507 من طريق سلمة بن الفضل الأبرش، عن محمد بن إسحاق، عن محمد بن السائب الكلبي، عن أبي صالح باذام - ويقال باذان - مولى أم هانئ، عن ابن عباس.والكلبي متروك، وأبو صالح ضعيف. وتابع ابنَ إسحاق على روايته بهذا الإسناد محمدُ بنُ كثير العبدي عند ابن سعد 4/ 13 لكنه جعله عن أبي صالح عن العباس نفسه!وأخرجها ابن سعد 4/ 12 من طريق هارون بن أبي عيسى، وابن سعد أيضًا، وابن أبي خيثمة في السفر الثاني من "تاريخه" (560) من طريق إبراهيم بن سعد، ويعقوب في "المعرفة" 1/ 506، والطحاوي في "شرح المشكل" (3220) من طريق عبد الله بن إدريس، ثلاثتهم عن محمد بن إسحاق مرسلًا.وأخرجها كذلك الطبري في "تفسيره" 10/ 49، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 5/ 1737، والبيهقي في "الدلائل" 3/ 143، وابن عساكر 26/ 293 من طريق عبد الله بن صالح، عن معاوية بن صالح، عن علي بن أبي طلحة عن ابن عباس. لكنه ذكر في هذه الرواية أنَّ الذي أُخذ من العباس يوم بدر أربعون أوقية، وأنَّ الله أبدله بها أربعين عبدًا. وعلي بن أبي طلحة، وإن لم يُدرك ابن عباس، فروايته عنه مقبولة عند كثير من العلماء، لأنها صحيفة معروفة في التفسير، وقال بعضهم: إنَّ علي بن أبي طلحة تلقى التفسير عن مجاهد وعكرمة، وكلاهما ثقة، فيتصل الإسناد.وأخرج آخره في سبب نزول الآية إسحاق بن راهويه في قسم مسند ابن عباس (898)، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 1/ 507، والطبري في "تفسيره" 10/ 49، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 5/ 1737، وأبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (287)، والطبراني في "الكبير" (11398)، وابن عساكر 26/ 293 من طريق محمد بن إسحاق، عن عبد الله بن أبي نجيح، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس، وبعضهم يقول: عن مجاهد عن ابن عباس، وأيًّا كان فكلاهما ثقة، والإسناد حسن. وانظر ما سيأتي برقم (5510).بقي أنَّ ما ذُكر هنا في رواية المصنف في "المستدرك"، ورواها عنه البيهقي في "سننه الكبرى" 6/ 322 من إجابته صلى الله عليه وسلم لطلب العباس أن يحتسب له ما غَنِمَه منه المسلمون من فدية الأسر، مما انفرد به الحاكم في روايته في "المستدرك"، فهو شاذٌ، ويخالفه روايةُ البيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 143 عن الحاكم في روايته "المغازي ابن إسحاق"، وهي من رواية الحاكم أيضًا عن محمد بن يعقوب الأصم، عن أحمد بن عبد الجبار العطاردي، عن يونس بن بُكَير، حيث جاء في روايته أن النبي صلى الله عليه وسلم أبى أن يُجيب عمَّه العباس إلى طلبه ذاك، بل قال له: "لا، ذاك شيءٌ أعطاناهُ الله منك".وكذلك جاء في رواية ابن عساكر 26/ 288 من طريق رضوان بن أحمد الصيدلاني، عن أحمد بن عبد الجبار العُطاردي، عن يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق.وكذلك جاء في سائر الروايات التي تقدم ذكرها عن ابن إسحاق، وعن غيره في قصة العباس هذه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5497)


5497 - أخبرني عبد الله بن الحُسين القاضي بمَرْو، حدثنا الحارث بن أبي أسامة، حدثنا عبد الله بن عمرو بن أبي أُميَّة، حدثنا ابن أبي الزِّناد، عن محمد بن عُقبة، عن كُريب عن ابن عباس، قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يُجِلُّ العباسَ إجلالَ الولدِ والدَه، خاصّةٌ خَصَّ الله العباسَ بها من بين الناس [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবদুল্লাহ ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সেইভাবে সম্মান করতেন, যেভাবে সন্তান তার পিতাকে সম্মান করে। এটি এমন এক বিশেষত্ব, যা আল্লাহ সকল মানুষের মধ্য থেকে বিশেষভাবে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দান করেছেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسنٌ لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف عبد الله بن عَمرو بن أبي أُميَّة، فقد قال الدارقطني في "سننه" عند الحديث (1092): ليس بقوي. ثم إنَّ المحفوظ في هذا الخبر أنه مرسلٌ ليس فيه ذكر ابن عباس، كذلك رواه غير واحدٍ عن ابن أبي الزِّناد - واسمه عبد الرحمن - وأغلب الظن أنَّ ذكر ابن عباس فيه هنا وهمٌ من ابن أبي أمية، والله أعلم.وأخرجه اللالكائي في "شرح أصول الاعتقاد" (2728)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 26/ 335 من طريق داود بن عمرو الضبّي، عن عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن محمد بن عُقبة، عن أبي رشدين، عن كريب مولى ابن عباس: إن كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ليُجِلُّ العباس … مرسلًا.وأخرجه ابن عساكر 26/ 334 - 335 من طريق بكار بن محمد بن جارست، عن ابن أبي الزناد، عن محمد بن عقبة، عن كريب مرسلًا.وكذلك أخرجه عبد الله بن أحمد في "فضائل الصحابة" (1799)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (1838)، واللالكائي في "أصول الاعتقاد"، (2728)، وابن عساكر 26/ 335 من طريق داود بن عمرو الضبّي كذلك، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 4/ 16 من طريق الواقدي، كلاهما عن ابن أبي الزِّناد، عن موسى بن عقبة، عن كريب أبي رِشدين، مرسلًا. فذكرا في هذه الرواية موسى بن عقبة بدل أخيه محمد بن عقبة، وكلاهما ثقة.ويشهد له ما أخرجه البلاذُري 4/ 16 - 17، وأبو يعلى (4936)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (1852)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (193)، وابن الأعرابي في "معجمه" (1721)، وأبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (266)، والطبراني في "الأوسط" (6940)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 10/ 293، وابن عساكر 26/ 329 و 330، والذهبي في "سير أعلام النبلاء" 12/ 376 من طرق عن عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة.ولفظه عند بعضهم: ما رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يُجِلُّ أحدًا ما يُجِلُّ العباس، أو يُكرِم العباسَ. وعند بعضهم: لقد رأيت من تعظيم رسول الله صلى الله عليه وسلم عمه العباس أمرًا عجبًا أو عجيبًا. وقال الذهبي في "السير" 2/ 92: إسناده صالح.ويشهد له كذلك حديث عمر بن الخطاب الآتي عند المصنف برقم (5527).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5498)


5498 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفَّار، حدثنا أحمد بن مِهْران الأصبَهاني، حدثنا عُبيد الله بن موسى، أخبرنا إسرائيلُ، عن عبد الأعلى، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "العباسُ منِّي وأنا منه" [1].صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আব্বাস আমার থেকে আর আমি তার থেকে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف عبد الأعلى: وهو ابن عامر الثعلبي.وأخرجه الترمذي (3759) عن القاسم بن زكريا الكوفي، والنسائي (6951) و (8117) عن أحمد بن سليمان الرُّهاوي، كلاهما عن عُبيد الله بن موسى، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن صحيح غريب، لا نعرفه إلّا من حديث إسرائيل!وسيأتي عند المصنّف برقم (5508) من طريق سعيد بن مسعود عن عُبيد الله بن موسى بأطول ممّا هنا.وأخرجه أحمد 4 / (2734) عن حُجين بن المُثنَّى، عن إسرائيل، به.