আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
5499 - أخبرني أبو قُتيبة سَلْم بن الفضل الأَدَمَي بمكة، حدثنا موسى بن هارون، حدثنا عبد القُدُّوس بن محمد بن عبد الكبير بن شُعيب بن الحَبْحَاب، حدثنا الحسن بن عَنبَسة الوَرَّاق، حدثنا علي بن هاشم بن البَرِيد، حدثني محمد بن عُبيد الله بن أبي رافع، عن أبيه، عن جده أبي رافع، قال: قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "لكَ مِن الله حتى تَرضَى" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবূ রাফে’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আপনার জন্য আল্লাহর পক্ষ থেকে রয়েছে যতক্ষণ না আপনি সন্তুষ্ট হন।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف من أجل محمد بن عُبيد الله بن أبي رافع، فهو واهٍ كما قال الذهبي في "تلخيصه"، والحسنُ بن عَنْبَسة الورّاقُ ذكر الذهبيُّ في "الميزان" أنَّ ابنَ قانع ضعَّفه، وهذا الأخير متابع فبقي الشأن في ابن أبي رافع.وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (1843)، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 26/ 340 من طريق عبد العزيز بن الخطاب، عن علي بن هاشم بن البريد، به. قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم للعباس: "ولك يا عمّ من الله حتى تَرضَى". فظهر بذلك أنَّ الخطاب في رواية المصنف للعباس وليس لأبي رافع.وفي الباب عن سعيد بن المسيب مرسلًا عند ابن عدي في "الكامل" 6/ 341، وابن عساكر 26/ 341، لكن في إسناده موسى بن عُمير القرشي، وهو متروك.
5500 - أخبرني أبو النَّضر محمد بن محمد بن يوسف، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا عَبد الله بن صالح، حدثني الليث بن سعد، عن إسحاق بن عبد الله بن أبي فَرْوة، عن أبَان بن صالح، عن علي بن عبد الله بن عباس، عن أبيه، عن عباس بن عبد المُطّلب، قال: كنتُ يومًا في المسجد فأقبل أبو جَهْل فقال: إِنَّ اللَّهِ عَلَيَّ إِن رأيتُ محمدًا ساجدًا أن أطأَ على رَقَبَتِه، فخرجتُ على رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى دخلتُ عليه، فأخبرتُه بقول أبي جَهْل، فخرج غَضْبانَ [1] حتى جاء المسجِد، فعَجَلَ أَن يَدخُلَ من الباب فاقتحَمَ الحائطَ، فقلت: هذا يومُ شَرٍّ فاتَّزَرْتُ ثم اتَّبَعْتُه، فدخلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وهو يقرأ: {اقْرَأْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِي خَلَقَ (1) خَلَقَ الْإِنْسَانَ مِنْ عَلَقٍ}، فلما بلغَ شأنَ أبي جَهْل: {كَلَّا إِنَّ الْإِنْسَانَ لَيَطْغَى (6) أَنْ رَآهُ اسْتَغْنَى}، قال إنسانٌ لأبي جهل: يا أبا الحَكَم، هذا محمد، فقال أبو جهل: ألا تَرَونَ ما أَرى، والله لقد سُدَّ أُفُقُ السماءِ عَليَّ، فلما بلغ رسول الله صلى الله عليه وسلم آخرَ السورةِ سَجَدَ [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি একদিন মসজিদে ছিলাম। তখন আবু জাহল এসে বলল: যদি আমি মুহাম্মাদকে সিজদারত অবস্থায় দেখি, তবে আল্লাহর কসম, আমি অবশ্যই তার ঘাড় মাড়িয়ে দেব। তখন আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গেলাম এবং ভেতরে প্রবেশ করে আবু জাহলের কথা তাঁকে জানালাম। তখন তিনি রাগান্বিত অবস্থায় বের হলেন এবং মসজিদে এলেন। তিনি দরজা দিয়ে প্রবেশ করতে তাড়াহুড়ো না করে প্রাচীর টপকে ভেতরে প্রবেশ করলেন। আমি বললাম, এটি (আজ) একটি অমঙ্গলের দিন। অতঃপর আমি লুঙ্গি পরে তাঁর অনুসরণ করলাম। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রবেশ করলেন, আর তখন তিনি পড়ছিলেন: {পড়ুন আপনার রবের নামে, যিনি সৃষ্টি করেছেন। সৃষ্টি করেছেন মানুষকে ‘আলাক (রক্তপিণ্ড) থেকে।} অতঃপর যখন তিনি আবু জাহলের প্রসঙ্গে পৌঁছালেন: {কক্ষনো নয়, মানুষ অবশ্যই সীমালঙ্ঘন করে। কেননা সে নিজেকে অভাবমুক্ত দেখে।} একজন লোক আবু জাহলকে বলল, হে আবুল হাকাম! ইনি তো মুহাম্মাদ। তখন আবু জাহল বলল, তোমরা কি দেখছ না আমি কী দেখছি? আল্লাহর শপথ! আমার সামনে আকাশের দিগন্ত রুদ্ধ করে দেওয়া হয়েছে। অতঃপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সূরার শেষ অংশে পৌঁছালেন, তখন তিনি সিজদা করলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في النسخ الخطية: غضبانًا، مصروفًا، وهي لغة بني أسد، لأنهم يؤنثونه بالتاء يقولون: غضبانة، فيصرفون ما كان مؤنثه على وزن فعلانة، وسائر العرب يؤنثونه لوزن فَعْلى، فيقولون: غَضْبي، فيمنعون من الصرف ما كان مؤنثه على وزن فعلى، فهو اللغة العالية، وانظر "شرح الكافية الشافية" لابن مالك 3/ 1441، و"شرح التصريح على التوضيح" لخالد الأزهري 2/ 322 - 323.
[2] إسناده ضعيف جدًّا، قال الذهبي في "تلخيصه": فيه عبد الله بن صالح ليس بعُمدة، وإسحاق بن عبد الله بن أبي فروة، وهو متروك. قلنا: عبد الله بن صالح متابع، فيبقى الشأن في إسحاق الفروي، وله طرق أخرى عن ابن عباس لكن ليس فيها ذكر العباس، ولا السجود في آخر قراءة سورة العلق. وصحَّ أيضًا نحو هذه القصة من حديث أبي هريرة وليس فيه ذكر العباس ولا السجود كذلك.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 191 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار (1324) عن عمر بن الخطّاب السِّجِستاني، والطبراني في "الأوسط" (8691) عن مُطّلب بن شعيب، كلاهما عن عبد الله بن صالح، به.وأخرجه عبد الله بن وهب في قسم علوم القرآن من "تفسيره" 3/ (212)، ومن طريقه أخرجه المستغفري في "فضائل القرآن" (1369)، وابن سيِّد الناس في "عيون الأثر" 1/ 121 عن الليث بن سعد، به.وأخرجه مختصرًا أحمد 5/ (2225) و (2226) و (3483)، والبخاري (4958)، والترمذي (3348)، والنسائي (10995) و (11621) من طريق عبد الكريم الجزري، عن عكرمة، عن ابن عباس، قال: قال أبو جهل: لئن رأيت محمدًا يصلي عند الكعبة لأطأنَّ على عنقه، فبلغ ذلك النبي صلى الله عليه وسلم فقال: "لو فَعَلَه لأخذته الملائكة عيانًا".وتقدَّم نحوه عند المصنف برقم (3851) من طريق داود بن أبي هند عن عكرمة عن ابن عباس.وله طريق ثالثة عن ابن عباس عند الطبري في "تفسيره" 30/ 257، والطبراني في "الكبير" 12/ (12693)، وفي "الأوسط" (8398) من طريق يونس بن أبي إسحاق السَّبيعي، قال الطبري والطبراني في "الكبير": عن الوليد بن العيزار عن ابن عباس، وقال الطبراني في "الأوسط": عن العيزار بن حُريث، عن ابن عباس. والعيزار له رواية وسماع من ابن عباس، وأما ابنه الوليد فيروي عن ابن عباس بواسطة، فإذا صحَّ ذكر العَيزار بن حُريث فإسناده حسنٌ.وله طريق رابعة عن ابن عباس عند ابن إسحاق في "السيرة النبوية" كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 295، ومن طريقه أخرجه أبو نعيم في "دلائل النبوة" (156)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 190 قال: حدثني بعض أهل العلم، عن سعيد بن جبير وعكرمة، عن ابن عباس. وهذا إسناد حسن لولا إبهام شيخ ابن إسحاق.ويشهد له حديث أبي هريرة عند أحمد 14 / (8831)، ومسلم (2797)، والنسائي (11619) و (11948)، وابن حبان (6571).
5501 - حدثنا الشيخ الإمام أبو بكر بن إسحاق وأبو بكر محمد بن أحمد بن بالوَيهِ في آخَرِين، قالوا: حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني يحيى بن مَعِين، حدثنا عُبيد بن أبي قُرَّة، حدثنا الليث بن سعد، عن أبي قَبِيل، عن أبي مَيسرة مولى العباس، قال: سمعتُ العباس يقول: كنتُ عند النبيِّ صلى الله عليه وسلم ذاتَ ليلةٍ، فقال لي: "انظُرْ هل تَرى في السماءِ من شيءٍ؟ "، قلتُ: نعم، قال: "ما تَرى؟ " قلت: الثُّريّا، فقال: "أما إنه يَملِكُ هذه الأمَّةَ بِعَدَدِها من صُلْبِك" [1]. هذا حديث تَفَرَّد به عُبيد بن أبي قُرَّة عن الليث، وإمامنا أبو زكريا رحمه الله [2] لو لم يَرْضَه لما حدَّث عنه بمِثل هذا الحديث.
আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এক রাতে নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম। তিনি আমাকে বললেন, "আকাশে তুমি কিছু দেখতে পাচ্ছ কি?" আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন, "কী দেখছ?" আমি বললাম: সুরাইয়া (কৃত্তিকা) নক্ষত্রপুঞ্জ। তিনি তখন বললেন, "নিশ্চয়ই, এর সংখ্যা পরিমাণ (বা এই নক্ষত্রের সংখ্যা অনুযায়ী) তোমার বংশধররা এই উম্মতের রাজত্ব করবে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] منكرٌ وإسناده ضعيف لجهالة أبي ميسرة مولى العباس، فلا يُعرف إلا بهذا الحديث، ولم يرو عنه غير أبي قَبيل - وهو حُيَيّ بن هانئ المَعافري - وعُبيد بن أبي قرة قال البخاري في ترجمته في "تاريخه الكبير" 6/ 2: لا يتابع في حديث في قصة العباس، وقال العقيلي في "الضعفاء الكبير" 2/ 610: حديثه غير محفوظ ولا يُعرف إلّا به، وقال ابن عدي 5/ 350: أُنكرَ عليه حديث العباس، وقال الذهبي في "تلخيص المستدرك": لم يَصحَّ هذا، وقال في "تاريخ الإسلام" 5/ 120: هو منكر، وقال في "الميزان" 3/ 22: هذا باطل، وقال في "المغني في الضعفاء" (3973): خبر ساقط.وقد أشار أبو حاتم الرازي فيما نقله عنه ابنه في "العلل" (2716) إلى تفرد عُبيد بن أبي قرة به عن الليث بن سعد، فقال: لم يرو هذا الحديث غير عبيد، وعُبيد صدوق، ولم يكن عند أبي صالح هذا الحديثُ.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 518 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ضياء الدين المقدسي في "المختارة" 8/ (476) من طريق سليمان بن أحمد الطبراني، عن عبد الله بن أحمد بن حنبل به. وأخرجه ابن أبي خيثمة في "تاريخه" كما في "جامع الآثار" لابن ناصر الدين 4/ 466، ومن طريقه ابن الأبّار القُضاعي في "معجم أصحاب أبي علي الصَّدفي" ص 138 عن يحيى بن معين، به.وأخرجه أحمد 3/ (1786) عن عُبيد بن أبي قُرة، به.
[2] يعني به يحيى بن معين.
5502 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا إبراهيم بن حمزة الزُّبيري، حدثنا إسماعيل بن قيس بن سعد بن زيد بن ثابت، عن أبي حازم، عن سهل بن سعد، قال: خَرجَ رسول الله صلى الله عليه وسلم في زمان القَيْظِ فَنَزَل منزلًا، فقام رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يَعْتسِلُ، فقام العباسُ بن عبد المطلب فستره بكِساءٍ من صُوف، قال سهل: فنظرتُ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم من جانب الكساء، وهو رافعٌ رأسه إلى السماء، وهو يقول: "اللهمَّ استُر العباسَ وولدَه من النار" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
সাহল ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম গ্রীষ্মকালে (গ্রীষ্মের প্রচণ্ড গরমে) বের হলেন এবং এক স্থানে অবতরণ করলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম গোসল করতে উঠলেন। তখন আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উঠে একটি পশমী চাদর দিয়ে তাঁকে আড়াল করলেন। সাহল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি সেই চাদরের পাশ দিয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর দিকে তাকালাম। তিনি তাঁর মাথা আকাশের দিকে তুলে বলছিলেন: "হে আল্লাহ! আপনি আব্বাস ও তাঁর সন্তানদেরকে জাহান্নামের আগুন থেকে রক্ষা করুন।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف بمرَّة من أجل إسماعيل بن قيس بن سعد بن زيد بن ثابت، فهو ضعيف منكر الحديث، وقد تابعه رجلٌ مثله، فلا اعتداد بمتابعته.وأخرجه البلاذُري في "أنساب الأشراف" 4/ 11، وابن عدي في "الكامل" 1/ 301، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 26/ 306 و 307 من طرق عن إبراهيم بن حمزة، بهذا الإسناد.وأخرجه يعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 1/ 504، وعبد الله بن أحمد في "فضائل الصحابة" (1810) و (1811)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (1840) و (1841)، والروياني في "مسنده" 2/ 214 - 215، والطبراني في "الكبير" (5829)، والآجُرّي في "الشريعة" (1733)، واللالكائي في "أصول الاعتقاد" (2725)، وأبو نعيم في "الطب النبوي" (150)، وابن عساكر 26/ 307 - 310 من طرق عن إسماعيل بن قيس، به.وأخرجه ابن عساكر 26/ 306 من طريق محمد بن عبد الرحمن بن عبد الله بن أبي مليكة، عن أبي حازم به. ومحمد بن عبد الرحمن هذا حسَّن الرأي فيه أحمد وأبو زرعة، لكن ضعَّفه الأكثرون، بل قال عنه البخاريُّ: منكر الحديث.والقَيظ: زمان شدة الحرّ.
5503 - أخبرني [1] مُكرَم بن أحمد القاضي ببغداد، حدثنا أحمد بن الوليد الفّحّام، حدثنا إسماعيل بن أبي أُويس، حدثني محمد بن طلحة، حدثني إسحاق بن إبراهيم بن عبد الله بن حارثة بن النعمان، عن أبيه [عن] [2] عبد الله بن حارثة، قال: لما قَدِمَ صفوانُ بن أُميّة بن خَلَف [3] الجُمحيّ قال له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "يا أبا وَهب، على مَن نَزَلْتَ؟ " قال: على العباس، قال: "نزلت على أشدِّ قُريش لقُريشٍ حُبًّا" [4].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে হারিসাহ থেকে বর্ণিত, যখন সাফওয়ান ইবনে উমাইয়া ইবনে খালাফ আল-জুমাহী আগমন করলেন, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে বললেন: "হে আবু ওয়াহব, আপনি কার নিকট অবস্থান নিলেন?" সে বলল: আব্বাসের নিকট। তিনি বললেন: "তুমি কুরাইশদের প্রতি কুরাইশদের মধ্যে সবচেয়ে বেশি ভালোবাসাপূর্ণ ব্যক্তির নিকট অবস্থান নিয়েছ।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] من هذا الحديث حتى الحديث (5507) سقط من (ص) و (م).
[2] سقط حرف "عن" من (ز) فأوهم أنَّ إسحاق بن إبراهيم بن عبد الله بن حارثة بن النعمان يروى هذا الخبر عن جده، إنما يروي إسحاق هذا الخبر عن أبيه إبراهيم عن جده عبد الله بن حارثة، كما في سائر مصادر تخريج الخبر.
5503 [3] - جاء في (ز): صفوان بن خلف بن أمية، وهو مقلوب لأنَّ المذكور صفوان بن أمية بن خلف، وكان أبوه أميَّة بن خلف من سادة قريش وقتل يوم بدر مشركًا بعد أن أسره عبد الرحمن بن عوف.وجاء على الصواب في "تلخيص المستدرك" للذهبي.
5503 [4] - إسناده ضعيف لجهالة إسحاق بن إبراهيم بن عبد الله بن حارثة وجهالة أبيه كذلك، ومحمد بن طلحة - وهو ابن عبد الرحمن بن طلحة بن عبد الله التيمي - ليس بذاك.وأخرجه ابن سعد 4/ 21، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 1/ 263 و 502، وابن أبي خيثمة في السفر الثاني من "تاريخه"، وفي السفر الثالث (466)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (1616)، وابن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 118، والطبراني في "الكبير" (7324) (14913)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (4087)، وابن عساكر 26/ 338 - 339 من طرق عن إسماعيل بن أبي أويس، بهذا الإسناد.وأخرجه عمر بن شبَّة في "تاريخ المدينة" 2/ 483، والبَلاذُري في "أنساب الأشراف" 4/ 25، والدولابي في "الكنى" (496)، وابن قانع 2/ 118، والطبراني (14913)، وابن عساكر 26/ 338 - 339 من طريق إبراهيم بن المنذر الحِزامي، وأبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (4087) من طريق محمد بن إسحاق البَلخي، كلاهما عن محمد بن طلحة التيمي، به.
5504 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو البَخْتَري عبد الله بن محمد ابن شاكر، حدثنا زكريا بن يحيى الخَزّاز، حدثنا عمُّ أبي زَحْرُ بن حِصن، عن جده حُميد بن مُنهب، قال: سمعت جَدّي خُرَيم بن أوس بن حارثة بن لأم يقول: هاجرتُ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم مُنصَرَفَه من تَبُوك، فأسلمتُ، فسمعتُ العباسَ بن عبد المطلب يقول: يا رسول الله، إني أريد أن أمتَدِحَك، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "قُلْ، لا يَفْضُضِ اللَّهُ فَاكَ"، قال: فقال العباس:من قَبلِها طِيبتَ في الظِّلالِ وفي … مستودع حين يُخصَفُ الوَرَقُثم هبطت البلاد لا بَشَرٌ … أنت ولا مُضغةٌ ولا عَلَقُبَل نُطْفةٌ تَركَبُ السَّفِينَ وقد … أَلْجَمَ نَسْرًا وأهلَه الغَرَقُتُنقَلُ مِن صالبٍ إلى رَحِمٍ … إذا مَضَى عالمٌ بدا طَبَقُحتّى احتوى بيتُك المُهَيمِنُ مِن … خِنْدِفَ عَلْياءَ تحتَها النُّطُقُوأنت لما وُلِدتَ أشرقَتِ ال … أرضُ وضاءَتْ بِنُورِكَ الأُفُقُفنحنُ في ذلك الضياءِ وفي الن … نُورِ وَسُبْلِ الرَّشادِ نَحْتَرِقُ [1] هذا حديث تَفرَّد به رواتُه الأعرابُ عن آبائهم، وأمثالُهم من الرواة لا يُضعَّفُون.
খুরাইম ইবন আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে হিজরত করি যখন তিনি তাবুক থেকে প্রত্যাবর্তন করছিলেন। অতঃপর আমি ইসলাম গ্রহণ করি। আমি আব্বাস ইবন আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনলাম, তিনি বলছেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি আপনাকে প্রশংসা করে কিছু বলতে চাই।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "বলো, আল্লাহ যেন তোমার মুখমণ্ডলকে রক্ষা করেন।"
বর্ণনাকারী বলেন, তখন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন:
এর (পৃথিবীতে আসার) পূর্বেই আপনি পবিত্র ছিলেন ছায়াময় স্থানসমূহে
এবং সেই আমানতের মধ্যে, যখন (জান্নাতের) পাতা আচ্ছাদিত হয়েছিল।
অতঃপর আপনি পৃথিবীতে অবতরণ করলেন—
আপনি তখন মানব ছিলেন না, না ছিলেন মাংসপিণ্ড, না ছিলেন জমাট রক্ত।
বরং (আপনি ছিলেন) এক ফোঁটা বীর্য যা নৌকায় আরোহণ করেছিল (নূহ আ.-এর কিশতি),
যখন প্লাবন নসরকে ও তার অনুসারীদেরকে গ্রাস করেছিল।
আপনি স্থানান্তরিত হচ্ছিলেন এক পিঠ থেকে আরেক গর্ভে;
যখন এক জগৎ চলে যেত, তখন আরেক স্তর শুরু হতো।
অবশেষে আপনার সম্মানিত বংশ
খন্দিফের সর্বোচ্চ শিখরে অধিষ্ঠিত হলো, যার নিচে আভিজাত্যের স্তবক ছিল।
আর যখন আপনি ভূমিষ্ঠ হলেন, জমিন আলোকিত হয়ে গেল,
আর আপনার নূরে দিগন্ত উদ্ভাসিত হলো।
আর আমরা সেই দীপ্তি, সেই আলো এবং সঠিক পথের মধ্যে উজ্জ্বল হচ্ছি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده محتمل للتحسين إن شاء الله، كما مضي بيانه برقم (5382).وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 5/ 268 - 269 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وهو في "جزء أبي السُّكين زكريا بن يحيى" كما في "البداية والنهاية" لابن كثير 3/ 368، ومن طريقه أخرجه ابن قتيبة في "غريب الحديث" 1/ 359، وأبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (285)، والطبراني في "الكبير" (4167)، وابن مَنْدَه في "معرفة الصحابة" ص 520 - 521، وأبو نعيم في معرفة الصحابة (2520)، والخطيب في "الأسماء المبهمة" ص 449، وابن عساكر 3/ 409 - 410، وابن الجوزي في "المنتظم" 3/ 371، وابن الأثير في "أسد الغابة" 1/ 606، وشرف الدين الدمياطي في الأول من "معجم شيوخه" (23).قوله: طبتَ في الظلال، أي: ظلال الجنة تحت أشجارها حين كان في صلب آدم.ومستودَع: يُحتمل أن يكون الرحم، ويُحتمل موضع آدم وحواء الذي أُودِعا فيه من الجنة وهما يخصفان الوَرَق.وقوله: ثم هبطت البلاد، أي: بهبوط أبيك وأنت حينئذٍ في صُلبه. لا بَشَرٌ، أي: لم تكن في الخلق يومئذٍ بشرًا.ولا مضغة: وهي القطعة من اللحم بقدر ما يُمضَغ.ولا عَلَق: وهو الدم الجامد الغليظ، بل كنت نطفةً وهو الماء الذي يكون منه الولد في صُلب نوح لم ينتقل بعدُ في هذه المراتب التي ينتقل فيها الجنين، ثم تركب سفينة بركوب نُوح فيها.وقوله: السَّفين، جاء أنه لغة في السفينة، والمشهور أنه جمع سفائن.وقوله: وقد ألجمَ نسرًا وأهلَه الغَرَقُ، أي: نجوت مع أبيك نوح من الغرق وغَرِق نَسْرٌ صنمُ قوم نوح، وإلجام الغَرَق كناية عن وصول الماء إلى أفواههم التي هي موضع اللجام.وقوله: تُنقل من صالب إلى رحم، الصالب: الصُّلب، وهو كل شيء من الظهر فيه فقار.والعالم: القرنُ من الناس: الجماعة من الناس، لأنهم يطبقون الأرض ثم ينقرضون ويأتي طبق آخر.وقوله: احتوي، أي: استوى وغَلَب.وبيتُك، أي: شرفُك ومجدُك.وأما خِنْدِف فهي ست قبائل أشرفها قريش، وهي امرأة اليأس بن مضر، واسمها ليلى، نُسِبوا إليها.والنُّطُق: في الأصل جمع نطاق، وهو ما تشدّ به المرأة وسطها فوق الثياب، والمعنى: أنك أعلى قومك نسبًا وهم دونك كالنطاق لك. أو أنه أراد العفاف، من لبس المرأة النطاق، أي: تحتها العفاف والحسبُ. أو أنه يعني بالنُّطُق المتكلمين جمع ناطق، أي: إن كل خطيب في العرب دون خطباء قومك.انظر "المعاني الكبير" لابن قتيبة 1/ 557 - 558، و"جامع الآثار" لابن ناصر الدين الدمشقي 2/ 307 - 317.
5505 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، قال: أخبرنا ابن وهب، أخبرني يونس، عن الزُّهْري، حدثني كَثِير بن العباس بن عبد المُطّلب قال: قال العباسُ: شهدتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم يومَ حُنين، فلَزِمتُ أنا وأبو سفيان بن الحارث بن عبد المُطّلب رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلم نُفارقه، ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم على بغلةٍ له بيضاءَ أهداها له فَرُوةُ بن نُفَاثَة [1] الجُذَامِي، فلما التَقَى المسلمون والكفارُ وَلَّى المسلمون مُديرين، فطَفِقَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يَركُضُ بَعْلتَه قِبَلَ الكفار، قال العباس: وأنا آخذٌ بِلِجَام بغلةِ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم أكُفُّها إرادة أن لا تُسرع، وأبو سفيان آخِذٌ بركاب رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أَيْ عباسُ، نادِ أصحابَ السَّمُرةِ"، قال: فواللهِ لَكَأنّما عَطْفتُهم حين ما سَمِعُوا صوتي عطفة البقَرِ على أولادها، فقالوا: يا لَبَّيْكَاهُ يا لَبَّيْكَاهُ.قال: فاقتَتَلُوا هم والكفارُ، والدعوةُ في الأنصار يقولون: يا معشرَ الأنصار، ثم قُصرت الدَّعوةُ على بني الحارث بن الخَزرج، فقالوا: يا بني الحارث بن الخزرج، يا بني الحارث بن الخزرج، فنظر رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وهو على بَغْلَتِه كالمُتطاول عليها إلى قتالهم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:: هذا حينَ حَمِيَ الوَطِيسُ"، قال: ثم أخَذَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حَصَيَاتٍ فرمى بهنَّ في وجوه الكُفّار، ثم قال: "انهَزَمُوا وربِّ محمّدٍ"، فذهبتُ أنظُرُ، فإذا القتالُ على هَيْئَتِه فيما أَرَى، فما هو إلَّا أن رَمَاهم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بحَصَياتِه، فما زِلتُ أَرى حَدَّهم كَلِيلًا، وأمرهم مُدبرًا [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه.
আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে হুনাইন যুদ্ধে উপস্থিত ছিলাম। আমি এবং আবু সুফিয়ান ইবনু হারিস ইবনু আবদুল মুত্তালিব রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে লেগে রইলাম এবং আমরা তাঁকে ছেড়ে যাইনি। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তখন তাঁর একটি সাদা খচ্চরের ওপর ছিলেন, যা ফারওয়াহ ইবনু নুফাসাহ আল-জুযামী তাঁকে উপহার দিয়েছিলেন। যখন মুসলিম ও কাফেরদের মধ্যে মোকাবিলা শুরু হলো, তখন মুসলমানরা পিছু হটে গেল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কাফেরদের দিকে তাঁর খচ্চরটিকে হাঁকাতে শুরু করলেন। আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের খচ্চরের লাগাম ধরেছিলাম, যাতে এটি দ্রুত না চলে। আর আবু সুফিয়ান রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের রেকাব ধরেছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “হে আব্বাস! সামুরা গাছের সাথীদেরকে ডাকো।” আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহর কসম! যখনই তারা আমার কণ্ঠস্বর শুনল, তখন তারা এমনভাবে ফিরে এলো, যেমন গাভী তার বাচ্চার দিকে ফেরে। তারা বলল: আমরা হাজির! আমরা হাজির! এরপর তারা এবং কাফেররা যুদ্ধ শুরু করে দিল। আহবানটি প্রথমে আনসারদের মধ্যে ছিল, তারা বলছিল: হে আনসার সম্প্রদায়! এরপর আহবানটি বানু হারিস ইবনু খাযরাজ গোত্রের জন্য সীমিত করা হলো। তারা বলছিল: হে বানু হারিস ইবনু খাযরাজ! হে বানু হারিস ইবনু খাযরাজ! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর খচ্চরের পিঠে দাঁড়িয়ে বা একটু উঁচু হয়ে তাদের যুদ্ধ দেখছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “এখনই যুদ্ধ তীব্র হয়ে উঠেছে (হামীয়াল ওয়াতীস)।” আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কিছু নুড়ি পাথর নিলেন এবং কাফেরদের মুখের দিকে নিক্ষেপ করলেন। তারপর বললেন: “মুহাম্মাদের রবের শপথ! তারা পরাজিত হয়েছে।” আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি তাকাতে গেলাম, দেখলাম যে আমার দৃষ্টিতে যুদ্ধ তখনও আগের মতোই আছে। কিন্তু রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখনই নুড়ি পাথর নিক্ষেপ করলেন, এরপর থেকে আমি সর্বদা দেখতে পেলাম যে তাদের ধার কমে আসছে এবং তাদের ক্ষমতা পিছিয়ে যাচ্ছে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] المثبت من "تلخيص المستدرك"، وفي (ز): نفاقة، وهو تصحيف ولعلها كانت في الأصل نعامة، ثم أُعجمت بعد ذلك، وفي المطبوع: نعامة، وأشار النووي إلى أنَّ الروايتين في اسمه قد رُويتا في "صحيح مسلم"، ثم قال: والصحيح المعروف الأول؛ يعني نفاثة، بنون مضمومة ثم فاء مخففة ثم ألف ثم ثاء مثلثة.
[2] إسناده صحيح. ابن وهب: هو عبد الله، ويونس: هو ابن يزيد الأيلي.وأخرجه مسلم (1775) عن أبي الطاهر أبي الطاهر أحمد بن عمرو السَّرْح، والنسائي (8599) عن يونس بن عبد الأعلى، كلاهما عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وقد تقدم مختصرًا برقم (5192) من طريق سفيان بن عيينة عن الزهري.وعَطْفتُهم، أي: رَجْعتُهم.والوَطِيس: مثل التَّنُّور يُختَبز فيه، وقولهم: حمي الوطيس، كناية عن الوطيس، كناية عن شدة الحرب.وحدَّهم كليلًا: أي: قوّتهم ضعيفة.
5506 - حدثنا أبو بكر أحمد بن كامل القاضي، حدثنا محمد بن سعد العوفي، حدثنا يعقوب بن محمد الزُّهري، حدثنا محمد بن طلحة التَّيْمي، حدثنا أبو سُهيل [1] ابن مالك، عن سعيد بن المسيّب، عن سعد بن أبي وقّاص قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يُجهِّز أو كان يَعرِضُ جيشًا بِنَقِيع [2] الخَيل، فاطّلع العباسُ بنُ عبد المُطلب، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "هذا العباسُ عمُّ نبيِّكم، أجوَدُ قُريشٍ كَفًّا، وأحْناهُ عليها" [3].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
সা'দ বিন আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নাকী' আল-খাইল নামক স্থানে একটি বাহিনীকে প্রস্তুত করছিলেন অথবা প্রদর্শন করছিলেন। এমন সময় আব্বাস ইবনু আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেখানে উঁকি দিলেন (বা উপস্থিত হলেন)। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: 'ইনি তোমাদের নবীর চাচা আব্বাস, ইনি কুরাইশদের মধ্যে হাতের (দানের) দিক থেকে সবচেয়ে দানশীল এবং তাদের প্রতি সবচেয়ে বেশি দয়ালু ও স্নেহশীল।'
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) و (ب) إلى: أبو سهل مكبّرًا، إنما هو أبو سهيل مصغّرًا، وهو نافع بن مالك الأصبحي.
[2] قال الخطابي في "معالم السنن" 1/ 245: قد يُصحِّف أصحاب الحديث فيروونه البقيع، بالباء، والبقيع بالمدينة موضع القبور.قلنا: وأما النقيع بالنون، فهو موضع حماه رسولُ الله والخلفاءُ بعده لأنعام الصدقة، وهو صدر وادي العقيق، على عشرين فرسخًا من المدينة، وقدره ميل في ثمانية أميال، وأصل النقيع: كل موضع يُستنقع فيه الماءُ، وهو غير نقيع الخضِمات على الصحيح.
5506 [3] - حديث حسن، يعقوب بن محمد بن الزُّهري - وإن كان فيه لينٌ - متابع في الطريق التالية عند المصنف، ومحمد بن طلحة التيمي - وهو ابن عبد الرحمن بن طلحة - حسنُ الحديث.وأخرجه أحمد 3/ (1610)، والنسائي (8118) من طريق علي بن المديني، وابن حبان (7052) من طريق إبراهيم بن حمزة الزبيري، كلاهما عن محمد بن طلحة، بهذا الإسناد.
5507 - وقد حدَّثَناه الشيخ أبو بكر بن إسحاق وأبو بكر بن داود الزاهد، قالا: أخبرنا علي بن الحسين [1] بن الجُنيد، حدثنا أحمد بن صالح المصري، حدثنا محمد بن طلحة التَّيْمي، حدثنا أبو سُهيل [2] بن مالك، عن سعيد بن المسيّب، عن سعد بن أبي وقاص، قال: خرج النبيُّ صلى الله عليه وسلم يجهِّز جيشًا، فنظر العباس، فقال: "هذا العباسُ عمُّ النبيِّ أَجوَدُ قُريش كفًّا، وأوصلُها لها" [3].
সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি সেনাবাহিনী প্রস্তুত করার জন্য বের হলেন। তখন তিনি আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখলেন এবং বললেন: "ইনি হলেন আব্বাস, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চাচা। কুরাইশদের মধ্যে তিনি হাতের দিক দিয়ে সবচেয়ে বেশি দানশীল এবং আত্মীয়তার সম্পর্ক বজায় রাখার ক্ষেত্রেও তিনি তাদের মধ্যে সবচেয়ে বেশি সম্পর্ক স্থাপনকারী।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرّف في (ز) إلى: الحسن، والصواب ما أثبتنا.
[2] تحرّف في (ز) و (ب) إلى: أبو سهل مكبرًا، وإنما هو أبو سُهيل مصغرًا.
5507 [3] - إسناده حسن من أجل محمد بن طلحة وهو ابن عبد الرحمن بن طلحة. وانظر ما قبله.
5508 - أخبرني أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي بمَرْو، قال: حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا عُبيد الله بن موسى، أخبرنا إسرائيل، عن عبد الأعلى، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عباس: أنَّ رجلًا ذكر أبًا للعباس، فنال منه، فلَطَمَه العباسُ، فاجتمعُوا، فقالوا: والله ليلطِمَنّ العباس كما لَطَمَه، فبلغ ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم، فخَطَب فقال: "مَن أكرم الناس على الله؟ " قالوا: أنتَ يا رسول الله، قال: "فإنَّ العباس منّي وأنا منه، لا تسُبُّوا أمواتنا، فتؤذُوا به الأحياء" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কোনো পূর্বপুরুষের নাম উল্লেখ করে তাকে অপমান করল। তখন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে চড় মারলেন। অতঃপর লোকেরা একত্রিত হলো এবং বলল: আল্লাহর কসম, আব্বাস তাকে যেমন চড় মেরেছে, সেও আব্বাসকে অবশ্যই চড় মারবে। বিষয়টি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছলে তিনি খুতবা দিলেন এবং বললেন: "আল্লাহর কাছে সর্বাধিক সম্মানিত ব্যক্তি কে?" তারা বলল: "আপনি, হে আল্লাহর রাসূল!" তিনি বললেন: "তবে আব্বাস আমার থেকে, আর আমি তার থেকে। তোমরা আমাদের মৃতদেরকে গালি দিও না, কারণ এর মাধ্যমে জীবিতদের কষ্ট দেওয়া হয়।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف عبد الأعلى - وهو ابن عامر الثعلبي - غير أنَّ النهي عن سبّ الأموات له شواهد، فهو صحيح لغيره إسرائيل: هو ابن يونس السَّبيعي.وأخرجه النسائي (6951) عن أحمد بن سليمان الرهاوي، عن عبيد الله بن موسى، بهذا الإسناد.وزاد: فجاء القوم، فقالوا: يا رسول الله، نعوذ بالله من غضبك، استغفر لنا.وقد تقدَّم مختصرًا برقم (5498) من طريق أحمد بن مهران الأصبهاني عن عبيد الله بن موسى.وأخرجه بطوله أحمد 4 / (2734) عن حُجين بن المثنى، عن إسرائيل، به. وزاد مثل زيادة أحمد الرهاوي دون قوله: استغفر لنا.ولقوله صلى الله عليه وسلم: لا تسبُّوا أمواتنا فتؤذوا به الأحياء" شاهدٌ من حديث المغيرة بن شعبة عند أحمد 30/ (18209)، والترمذي، (1982)، وابن حبان (3022) بلفظ: "لا تسبُّوا الأموات فتؤذوا الأحياء". وإسناده صحيح.وشواهد أخرى من أحاديث زيد بن أرقم وعائشة وسعيد بن زيد كما تقدَّم برقم (1435) و (1436).
5509 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ حدثنا الحسين بن الفضل البَجَلي، حدثنا عفان بن مسلم، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن ثابت، عن عُقبة بن عبد الغافر، قال: دخل عبدُ الله بن العباس على معاوية بن أبي سفيان، وقد تحلَّقَت عندَه بُطُونُ قُريش، فسأله معاويةُ عن آبائهم إلى أن قال: فما تقولُ في أبيك العباس بن عبد المُطّلب؟ فقال: رَحِم الله أبا الفضل، كان والله عمَّ نَبي الله، وقُرَّةَ عَينِ رسولِ الله، سيد الأعمام والأخدان، جَدَّ الأجداد، وآباؤه الأجوادُ، وأجدادُه الأنجادُ، له عِلمٌ بالأمور، قد زانَه حِلْمٌ، وقد عَلَاهُ فَهُمٌ، كان يَكسِبُ حِيالَهُ كلَّ مُهذَبٍ [1] [صِنديد]، ويجتنب برأيه [2] كلَّ مُخالفٍ رِعْدِيد تَلاشَتِ الأخدانُ عند ذِكْرِ فَضِيلتِه، وتَباعَدَت الأنسابُ عند ذكر عَشيرته، صاحب البيتِ والسِّقاية والنَّسبِ والقرابة، ولِمَ لا يكون كذلك، وكيف لا يكون كذلك ومُدبِّرُ سِياستِه أكرمُ مَن دَبَّ [3]، وأفهَمُ مَن مَشَى من قريشٍ وركب [4].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجه.
আব্দুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মু‘আবিয়াহ ইবনু আবী সুফিয়ানের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট প্রবেশ করলেন, তখন তাঁর চারপাশে কুরাইশের বিভিন্ন গোত্র বৃত্তাকারে বসেছিল। অতঃপর মু‘আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদেরকে তাদের পূর্বপুরুষদের সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন। একপর্যায়ে তিনি (ইবনু আব্বাসকে) বললেন: আপনি আপনার পিতা আব্বাস ইবনু আব্দুল মুত্তালিব সম্পর্কে কী বলবেন?
তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনু আব্বাস) বললেন: আল্লাহ আবুল ফযলের (আব্বাস) উপর রহম করুন। আল্লাহর কসম, তিনি ছিলেন আল্লাহর নবীর চাচা এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চক্ষু শীতলকারী (প্রিয়পাত্র)। তিনি ছিলেন সকল চাচার এবং বন্ধুদের নেতা; পূর্বপুরুষদের মধ্যে পিতামহদেরও (নেতা); তাঁর পিতারা ছিলেন দয়ালু, এবং তাঁর দাদারা ছিলেন মহান সাহসী। তিনি সকল বিষয়ে জ্ঞানী ছিলেন, ধৈর্য তাঁকে সজ্জিত করেছিল এবং প্রজ্ঞা তাঁর উপর প্রভাব বিস্তার করেছিল। তিনি তাঁর প্রতিবেশী হিসেবে প্রত্যেক উন্নত চরিত্রসম্পন্ন ও শক্তিশালী মানুষকে আকর্ষণ করতেন, আর তাঁর নিজস্ব সিদ্ধান্তের কারণে প্রত্যেক বিরোধী দুর্বল লোককে পরিহার করতেন। তাঁর শ্রেষ্ঠত্বের আলোচনায় বন্ধুরা ম্লান হয়ে যেত, আর তাঁর গোত্রের উল্লেখ হলে অন্যান্য বংশ দূরে সরে যেত। তিনি কাবাঘরের দায়িত্বশীল, হাজীদের পানি পান করানোর দায়িত্বশীল, এবং বংশ ও আত্মীয়তার দিক থেকে সুমহান। আর কেনই বা তিনি এমন হবেন না? এবং কেমন করেই বা তিনি এমন হবেন না, যখন তাঁর রাজনীতির পরিচালক ছিলেন এমন ব্যক্তি, যিনি পদচারণকারী সকলের মধ্যে সবচেয়ে সম্মানিত এবং কুরাইশদের মধ্যে হেঁটে চলা বা আরোহী সকল মানুষের চেয়ে অধিক জ্ঞানী?
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في النسخ الخطية: مهنَّد، وأغلب الظن أنها تحرَّفت عن مُهذَّب، فقد أورد هذا الخبَر أبو القاسم الخُتَّلي في "الدِّيباج" ص 71 بهذا اللفظ، ومنه استدركنا لفظ "صنديد".
[2] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: ويكسب لرأيه.
5509 [3] - تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: دَبَّر، والمثبت على الصواب من الكتاب المذكور، وهو المناسب في السَّجع مع قوله بعد ذلك: وركب.
5509 [4] - إسناده صحيح. ثابت: هو ابن أسلم البُناني.وأخرجه أبو القاسم الخُتَّلي في "الدّيباج" كما في "جامع الآثار" لابن ناصر الدين الدمشقي 2/ 122، وأبو بكر أحمد بن محمد بن الفضل الأهوازي في "المنور من وفود القبائل" كما في "جامع الآثار" كذلك 2/ 122 من طريق هشام بن عروة، عن أبيه، عن أبي ريحانة العامري، قال: أقبل ابن عباس إلى معاوية بن أبي سفيان، الحديث. وكتاب "الديباج" مطبوع والخبر فيه برقم (142) لكن لم يظهر من إسناده في أصله الخطي المعتمد سوى ذكر أبي ريحانة، وساقه بطوله.وأبو ريحانة هذا من أصحاب معاوية، انظر ترجمته في "تاريخ دمشق" لابن عساكر 41/ 259، وفي الإسناد إلى هشام جهالة.
5510 - أخبرنا أبو أحمد بكر بن محمد بن حمدان الصَّيرفي بمَرُو، حدثنا موسى بن سهل بن كثير، حدثنا هاشم بن القاسم، حدثنا سليمان بن المُغيرة، عن حُمَيد بن هلال، عن أبي موسى الأشعري: أنَّ العلاء بن الحَضْرمي بَعَثَ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم من البحرين بثمانين ألفًا، فما أتى رسول الله صلى الله عليه وسلم مالٌ أكثر منه لا قبلها ولا بعدها، فأَمر بها، فنُثرَت على حَصِير، ونُودي بالصلاة، فجاء رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يَميلُ على المال قائمًا، فجاء الناسُ وجعل يُعطيهم، وما كان يومئذٍ عددٌ ولا وزنٌ، ما كان إِلَّا قَبضًا، فجاء العباسُ فقال: يا رسول الله، إني أعطَيتُ فِدائي وفداء عَقِيل يوم بدر، ولم يكن لعَقِيل مالٌ، أعطني من هذا المال، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "خُذْ" فَحَثَى فِي خَمِيصةٍ كانت عليه، ثم ذهب ينصرفُ فلم يَستطِع، فرفع رأسه إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله، ارفع عليَّ، فتبسَّم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وهو يقول [1]: أما أحدُ ما وَعَدَ الله فقد أنجز، ولا أدري الأخرى، {قُلْ لِمَنْ فِي أَيْدِيكُمْ مِنَ الْأَسْرَى إِنْ يَعْلَمِ اللَّهُ فِي قُلُوبِكُمْ خَيْرًا يُؤْتِكُمْ خَيْرًا مِمَّا أُخِذَ مِنْكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْ}، هذا خيرٌ مما أُخِذ مني، ولا أدري ما يُصنع في المغفرة [2].
আবূ মূসা আল-আশ'আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আলা ইবনুল হাদরামী বাহরাইন থেকে রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আশি হাজার (দীনার/দিরহাম) প্রেরণ করেন। এর আগে বা পরে এর চেয়ে বেশি সম্পদ রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসেনি। তিনি এর (সম্পদের) নির্দেশ দিলেন। তা চাটাইয়ের উপর ছড়িয়ে দেওয়া হলো এবং সালাতের জন্য আহ্বান করা হলো। অতঃপর রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এসে সম্পদের উপর দাঁড়িয়ে গেলেন। তখন লোকেরা এল এবং তিনি তাদের দান করতে শুরু করলেন। সেদিন (দেওয়ার সময়) গণনা বা ওজন করা হয়নি; শুধু মুষ্টি ভরে দেওয়া হচ্ছিল। তখন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন এবং বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! বদরের দিন আমি আমার মুক্তিপণ এবং আকীলের মুক্তিপণ দিয়েছিলাম, অথচ আকীলের কোনো সম্পদ ছিল না। আপনি আমাকে এই সম্পদ থেকে দিন। রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিন।" আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর গায়ের চাদরে মুষ্টি ভরে তা নিলেন। অতঃপর তিনি ফিরতে চাইলেন, কিন্তু পারলেন না। তখন তিনি রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে মাথা তুলে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমার উপর উঠিয়ে দিন। রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুচকি হাসলেন এবং বললেন: "আল্লাহ যা ওয়াদা করেছেন তার একটি তো পূর্ণ হয়েছে। কিন্তু অন্যটির বিষয়ে আমি জানি না। (আল্লাহ বলেন) ‘যারা তোমাদের হাতে বন্দী আছে, তাদের বলে দাও, আল্লাহ যদি তোমাদের অন্তরে কল্যাণ দেখতে পান, তাহলে তোমাদের কাছ থেকে যা নেওয়া হয়েছে, তার চেয়েও উত্তম বস্তু তিনি তোমাদের দান করবেন এবং তোমাদের ক্ষমা করে দেবেন।’ (সূরা আনফাল: ৭০)" (আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন): যা আমার কাছ থেকে নেওয়া হয়েছিল, এটি তার চেয়েও উত্তম। আর ক্ষমার ব্যাপারে কী করা হবে, তা আমি জানি না।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] القائل هو العباس كما توضحه رواية غير المصنف. على الصواب عند الحديث (277)، وبذلك سُمِّي في عدة أحاديث عند الدارقطني في "سننه" (4803)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 8/ 67، وفي "دلائل النبوة" 6/ 129، وفي "شعب الإيمان" (1955).
[2] حديث حسن، وهذا إسناد ضعيف لضعف موسى بن سهل بن كثير، وقد تابعه في الطريق التالية الحَسَن بن الحارث الأهوازي، وهو مجهول انفرد بالرواية عنه عبدان ولم يوثقه أحدٌ، وجعلا هذا الخبر من رواية حميد بن هلال عن أبي موسى الأشعري غير أنَّ الحَسَن بن الحارث زاد بينهما أبا بردة بن أبي موسى الأشعري، وخالفهما الثقة الحافظ محمد بن سعد صاحب "الطبقات" 4/ 14 حيث روى هذا الخبر عن هاشم بن القاسم، عن سليمان بن المغيرة، عن حميد بن هلال: أنَّ العلاء بن الحضرمي بعث … هكذا جعله من مرسل حميد بن هلال، وبيَّن أن آخره وهو قوله: أما أحد، إلى آخره، من قول العباس بن عبد المطلب، وكذلك رواه جماعة من الثقات عن سليمان بن المغيرة عن حميد بن هلال مرسلًا، منهم مرسلًا، منهم أبو أسامة حماد أبو أسامة حماد بن أسامة عند ابن أبي شيبة 14/ 85، وعمرُو بن عاصم الكلابي عند يعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 1/ 503، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 26/ 294، وشيبانُ بن فَرُّوخ عند البلاذُري في "فتوح البلدان" ص 88، فهذا هو المحفوظ في رواية حميد بن هلال أنها مرسلة، وآخره من قول العباس.ويشهد له دون الاستشهاد بالآية حديث أنس بن مالك الذي علَّقه البخاري في "صحيحه" (421) و (3165) بصيغة الجزم.ولقول العباس في آخر هذا الحديث واستشهاده بالآية شواهد تقدم ذكرها عند الحديث (5496). على الصواب عند الحديث (277)، وبذلك سُمِّي في عدة أحاديث عند الدارقطني في "سننه" (4803)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 8/ 67، وفي "دلائل النبوة" 6/ 129، وفي "شعب الإيمان" (1955).
5511 - أخبرنيه أبو علي الحسين بن علي الحافظ، أخبرنا عَبْدانُ الأَهْوازي، حدثنا الحَسَن [1] بن الحارث الأهوازي، حدثنا هاشم بن القاسم، حدثنا سليمان بن المُغيرة، عن حُميد بن هلال، عن أبي بُردة، عن أبي موسى: أنَّ العلاء بن الحَضرميّ بعثَ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم بمالٍ من البَحرَين، فذكر الحديث بنحوه [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আলা ইবনুল হাদরামি বাহরাইন থেকে কিছু সম্পদ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রেরণ করেন। অতঃপর তিনি এর অনুরূপ হাদীস বর্ণনা করলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: الحُسين، مُصغَّرًا، وإنما هو الحسن مكبَّرًا كما تقدَّمت تسميته على الصواب عند الحديث (277)، وبذلك سُمِّي في عدة أحاديث عند الدارقطني في "سننه" (4803)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 8/ 67، وفي "دلائل النبوة" 6/ 129، وفي "شعب الإيمان" (1955).
[2] حديث حسن، وهذا إسناد ضعيف كما تقدَّم بيانه عند الطريق السابقة. وأخرجه ابن عساكر 26/ 344 - 345 من طريق عبد الله بن الحسين بن جابر المصّيصي، عن موسى بن داود، عن عمر بن بشر، عن أبي جعفر، مرسلًا. فأسقط من إسناده الحكم بن المنذر، وعبد الله بن الحسين المذكور قال عنه ابن حبان: كان يقلب الأخبار ويسرقها. قلنا: المحفوظ ذكر الحكم بن المنذر.وأخرجه ابن رُشيد الفِهْري في "ملء العيبة" ص 294 من طريق جابر بن يزيد الجُعفي، عن أبي جعفر، مرسلًا. وجابر ضعيف الحديث.ويشهد له حديث جابر بن عبد الله عند الحكيم الترمذي في "نوادر الأصول" (1389)، وأبي نُعيم في "تاريخ أصبهان" 2/ 86 - 87، وفي "فضائل الخلفاء" (148)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (4610)، وابن عساكر 26/ 345، وفي إسناده أيوب بن سيّار الزهري، وهو ضعيف.ويشهد له كذلك حديث ابن عباس عند الحكيم الترمذي (1390)، وفي إسناده ليث بن أبي سُليم، وهو سيئ الحفظ.
5512 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا الحسين بن الفضل، قال: حدَّثناه موسى بن داود الضَّبِّي، حدثنا الحَكَم بن المنذر، عن عمر [1] بن بِشر الخَثعَمي، عن أبي جعفر محمد بن علي بن الحسين، عن أبيه، قال: أقبل العباسُ بن عبد المطّلب إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، وعليه حُلّةٌ وله ضفيرتان، وهو أبيضُ، فلما رآهُ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم تبسَّم، فقال العباس: يا رسول الله، ما أضحكَكَ، أَضحَكَ اللهُ سِنَّكَ؟ فقال: "أعجَبَني جَمالُ عَمِّ النبيّ"، فقال العباسُ: ما الجمالُ في الرِّجال؟ قال: "اللِّسانُ" [2].
আল-আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের নিকট আসলেন। তাঁর পরনে ছিল সুন্দর জোব্বা, তাঁর ছিল দুটি বিনুনি (চুলের), এবং তিনি ছিলেন গৌরবর্ণের। যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁকে দেখলেন, তখন মুচকি হাসলেন। তখন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ, কিসে আপনাকে হাসালো? আল্লাহ আপনার দাঁতকে (আপনাকে) সদা হাস্যোজ্জ্বল রাখুন? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নবীর চাচার সৌন্দর্য আমাকে মুগ্ধ করেছে।" তখন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জিজ্ঞেস করলেন: পুরুষের সৌন্দর্য কীসে? তিনি বললেন: "জিহ্বা (বা বাচনভঙ্গি)।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: محمد، والتصويب من سائر مصادر تخريج الخبر. وأخرجه ابن عساكر 26/ 344 - 345 من طريق عبد الله بن الحسين بن جابر المصّيصي، عن موسى بن داود، عن عمر بن بشر، عن أبي جعفر، مرسلًا. فأسقط من إسناده الحكم بن المنذر، وعبد الله بن الحسين المذكور قال عنه ابن حبان: كان يقلب الأخبار ويسرقها. قلنا: المحفوظ ذكر الحكم بن المنذر.وأخرجه ابن رُشيد الفِهْري في "ملء العيبة" ص 294 من طريق جابر بن يزيد الجُعفي، عن أبي جعفر، مرسلًا. وجابر ضعيف الحديث.ويشهد له حديث جابر بن عبد الله عند الحكيم الترمذي في "نوادر الأصول" (1389)، وأبي نُعيم في "تاريخ أصبهان" 2/ 86 - 87، وفي "فضائل الخلفاء" (148)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (4610)، وابن عساكر 26/ 345، وفي إسناده أيوب بن سيّار الزهري، وهو ضعيف.ويشهد له كذلك حديث ابن عباس عند الحكيم الترمذي (1390)، وفي إسناده ليث بن أبي سُليم، وهو سيئ الحفظ.
[2] محتمل للتحسين بشواهده إن شاء الله، وهذا إسناد ضعيف لجهالة الحكم بن المنذر وعمر بن بشر الخثعمي، وقد تابعهما جابر الجُعفي، ولكنه ضعيف، ثم إنَّ الخبر مرسل أيضًا، وجميع من خرَّجه عدا المصنف جعلوه من مرسل أبي جعفر محمد بن علي بن الحسين - وهو ابن علي بن أبي طالب - لم يجاوزوه، على أنه وإن ثبت ذكر أبيه في الخبر يكون مرسلًا أيضًا. وعلى أيّ حالٍ فللخبر شواهد باجتماعها مع هذا المرسل يمكن أن يتحسَّن، والله تعالى أعلم.وأخرجه أحمد بن حنبل في "فضائل الصحابة" (1755)، ومن طريقه أبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (265)، وابن عساكر 26/ 345، وأخرجه البلاذُري في "أنساب الأشراف" 4/ 20 عن أبي حسّان الزيادي، كلاهما (أحمد والزيادي) عن موسى بن داود الضَّبِّي، عن الحكم بن المنذر، عن عمر بن بشر الخثعمي، عن أبي جعفر مرسلًا. لكن جاء في "أنساب الأشراف" تسمية شيخ الحكم بن المنذر: عمر النخعي، وربما يكون النخعي تحريف عن الخثعمي، والله أعلم. وأخرجه ابن عساكر 26/ 344 - 345 من طريق عبد الله بن الحسين بن جابر المصّيصي، عن موسى بن داود، عن عمر بن بشر، عن أبي جعفر، مرسلًا. فأسقط من إسناده الحكم بن المنذر، وعبد الله بن الحسين المذكور قال عنه ابن حبان: كان يقلب الأخبار ويسرقها. قلنا: المحفوظ ذكر الحكم بن المنذر.وأخرجه ابن رُشيد الفِهْري في "ملء العيبة" ص 294 من طريق جابر بن يزيد الجُعفي، عن أبي جعفر، مرسلًا. وجابر ضعيف الحديث.ويشهد له حديث جابر بن عبد الله عند الحكيم الترمذي في "نوادر الأصول" (1389)، وأبي نُعيم في "تاريخ أصبهان" 2/ 86 - 87، وفي "فضائل الخلفاء" (148)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (4610)، وابن عساكر 26/ 345، وفي إسناده أيوب بن سيّار الزهري، وهو ضعيف.ويشهد له كذلك حديث ابن عباس عند الحكيم الترمذي (1390)، وفي إسناده ليث بن أبي سُليم، وهو سيئ الحفظ.
5513 - أخبرنا أبو سعيد أحمد بن يعقوب الثَّقَفي، حدثنا موسى بن هارون، حدثنا شعيب بن عمرو، حدثنا سفيان بن عُيينة، عن محمد بن المنكدِر، عن جابر، قال: كان العباسُ بالمدينة، فطَلَبَتِ الأنصار ثوبًا يُلبسونه، فلم يجدُوا قميصًا يَصلُح عليه إلَّا قميص عبد الله بن أُبي، فكَسَوه إياهُ، قال جابرٌ: وكان العباسُ أسِيرَ رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم بدرٍ، وإنما أُخرج كَرْهًا، فحُمل إلى المدينة، فكساهُ عبدُ الله بن أُبي قَمِيصَه، فلذلك كفَّنَه رسول الله صلى الله عليه وسلم في قَمِيصِه، مكافأةً لما فَعَل بالعباس [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه!
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মদীনায় ছিলেন। আনসারগণ তাঁকে পরানোর জন্য একটি কাপড় খুঁজছিলেন। কিন্তু তারা আব্দুল্লাহ ইবনে উবাইয়ের জামা ছাড়া তাঁর জন্য উপযুক্ত কোনো কামিজ খুঁজে পেলেন না। তখন তারা তাঁকে সেই জামাটি পরিয়ে দেন। জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বদরের যুদ্ধের দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাতে বন্দী হয়েছিলেন এবং তিনি (যুদ্ধক্ষেত্রে) অনিচ্ছাসত্ত্বেও বের হয়েছিলেন। অতঃপর তাঁকে মদীনায় নিয়ে আসা হয়। আব্দুল্লাহ ইবনে উবাই তাঁকে নিজের কামিজ পরিয়ে দিয়েছিল। এই কারণে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আব্দুল্লাহ ইবনে উবাইকে সেই অনুগ্রহের প্রতিদানস্বরূপ তার জামা দিয়েই কাফন পরিয়েছিলেন, যা সে আব্বাসকে করেছিল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح لكن بذكر عمرو بن دينار بدل محمد بن المنكدر. شعيب بن عمرو - وهو الضُّبعي الدمشقي - وإن روى عنه جمع منهم أبو عوانة في "صحيحه"، قد شذَّ بذكر ابن المنكدر، وأدرج قول ابن عيينة في آخره في ذكر المكافأة، فجعله من جملة كلام جابر.وأخرجه البخاري (3008) عن عبد الله بن محمد الجُعفي المُسنَدي، والنسائي (2040) عن عبد الله بن محمد بن عبد الرحمن الزهري المِسوري، كلاهما عن سفيان بن عيينة، عن عمرو ابن دينار، عن جابر. لكن اقتصر المسوري على القطعة الأولى من الحديث إلى قوله: فكسوه إياه. وبيَّن المسندي في روايته أن ذكر المكافأة في آخر الخبر من قول ابن عيينة وليس من قول جابر.وسيأتي بعده مختصرًا بنحو رواية المسوري من طريق ابن أبي عمر عن ابن عيينة. وأخرج أحمد 23 / (15075)، والبخاري (1270) و (1350) و (5795)، ومسلم (2773)، والنسائي (2039) و (2157)، وابن حبان (3174) من طُرق عن سفيان بن عيينة، ومسلم (2773) من طريق ابن جُريج، والنسائي (2158) من طريق الحسين بن واقد، ثلاثتهم عن عمرو بن دينار، عن جابر بن عبد الله، قال: أتى النبي صلى الله عليه وسلم قبر عبد الله بن أُبي، فأخرجه من قبره، فوضعه على ركبتيه، ونفث عليه من ريقه، وألبسه قميصه. زاد البخاري في الرواية (1350): وكان كسا عباسًا قميصًا، قال سفيان: وقال أبو هارون: وكان على رسول الله صلى الله عليه وسلم قميصان، فقال له ابن عبد الله يا رسول الله، ألبس أبي قميصك الذي يلي جلدك. قال سفيان: فيرون أن النبي صلى الله عليه وسلم ألبس عبد الله قميصه مكافأة لما صَنَع.قلنا: وهذا هو أحد الوجهين اللذين ذكرهما أبو سعيد الأعرابي في توجيه تكفين النبي صلى الله عليه وسلم لابن أُبي بقميصه كما حكاه عنه الخطابي في "معالم السنن" 1/ 298، قال: أراد أن يكافئه على ذلك لئلا يكون لمنافق عنده يدٌ لم يجازه عليها. وذكر الوجه الثاني، وهو أن يكون أراد به تألُّف ابنه وإكرامه، فقد كان مسلمًا بريئًا من النفاق.
5514 - فحدَّثني علي بن عيسى، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا ابن أبي عُمر، حدثنا سُفيان، عن عمرو بن دينار، عن جابر بن عبد الله، قال: لما أُسر العباسُ لم يُوجَد له قميصٌ يُقدَر عليه إلَّا قَميصُ ابن أُبيٍّ [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!
জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বন্দী করা হলো, তখন তাঁর জন্য এমন কোনো জামা পাওয়া যায়নি যা তাঁর গায়ে লাগত, ইবনু উবাইয়ের জামা ছাড়া।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. ابن أبي عمر: هو محمد بن يحيى بن أبي عمر العَدَني، وسفيان: هو ابن عيينة. وانظر ما قبله.
5515 - وحدثنا أبو بكر بن أبي دارم الحافظ بالكوفة، حدثنا أبو إسحاق محمد بن هارون بن عيسى الهاشمي، حدثنا موسى بن عبد الله بن موسى الهاشمي، حدثنا يعقوب بن جعفر بن سليمان، قال: سمعت أبي يقول: دخلتُ على أبي جعفر المنصور، فرأيتُ له جُمَّةً، فجعلتُ أنظُر إلى حُسنها، فقال: كان لأبي محمد بن عليّ جُمْةٌ، وحدثني أنَّ أباهُ عليَّ بن عبد الله كانت له جُمّةٌ، وحدَّثني أنَّ أباهُ عبد الله بنَ العباس كانت له جُمّةٌ، وحدَّثني ابن عباس أن النبيّ صلى الله عليه وسلم كانت له جُمْةٌ إلى أنصافِ أذُنيه، قال ابن عباس: وكانت للعباس بن عبد المُطّلب جُمّةٌ، وكانت لعبد المطّلب جُمّةٌ، وكان لهاشم بن عبد منافٍ جُمّةٌ، فقلتُ لأبي: إني لأعجَبُ من حُسنِها، فقال: ذلك نُورُ الخلافة، قال: حدَّثني أبي، عن أبيه، عن جده، قال: إنَّ الله إذ أراد أن يَخلُق خَلْقًا للخلافة مَسحَ يده على ناصيته، فلا تقعُ عليه عَينٌ إلَّا أحبَّه [1].رواة هذا الحديث عن آخرهم هاشميّون معروفون بشَرَف الأصل.
জা'ফর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার পিতাকে বলতে শুনেছি, আমি আবু জা’ফর আল-মানসূরের (খলিফা) কাছে গেলাম এবং তার মাথায় 'জুম্মাহ' (ঘাড় পর্যন্ত লম্বা চুল) দেখতে পেলাম। আমি এর সৌন্দর্যের দিকে তাকাতে লাগলাম।
তখন তিনি (আল-মানসূর) বললেন: আমার পিতা মুহাম্মাদ বিন আলীরও 'জুম্মাহ' ছিল। তিনি আমাকে আরও বর্ণনা করেন যে, তার পিতা আলী বিন আবদুল্লাহেরও 'জুম্মাহ' ছিল। তিনি আমাকে বর্ণনা করেন যে, তার পিতা আবদুল্লাহ ইবনু আব্বাসেরও 'জুম্মাহ' ছিল।
আর ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে বর্ণনা করেছেন যে, নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর 'জুম্মাহ' তাঁর কান পর্যন্ত অর্ধেকে পৌঁছাতো।
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আরও বলেন: আব্বাস বিন আব্দুল মুত্তালিবেরও 'জুম্মাহ' ছিল, আব্দুল মুত্তালিবেরও 'জুম্মাহ' ছিল, এবং হাশিম বিন আব্দুল মানাফেরও 'জুম্মাহ' ছিল।
আমি (জা'ফর) আমার পিতাকে বললাম: আমি এর (আল-মানসূরের জুম্মাহ) সৌন্দর্যে মুগ্ধ। তিনি (জা'ফরের পিতা) বললেন: এটি হলো খিলাফতের নূর (আলো)।
তিনি (জা'ফরের পিতা) আরও বললেন: আমার পিতা, তাঁর পিতা এবং তাঁর দাদা আমার কাছে বর্ণনা করেছেন যে, আল্লাহ যখন কোনো সৃষ্টিকে খিলাফতের জন্য সৃষ্টি করার ইচ্ছা করেন, তখন তিনি তার কপালের অগ্রভাগে (নাসিয়াতে) হাত বুলিয়ে দেন। ফলে এমন কোনো চোখই তার উপর পড়ে না, যা তাকে ভালোবাসে না।
[টীকা: এই হাদীসের শেষ পর্যন্ত সকল বর্ণনাকারীই হাশেমী বংশোদ্ভূত এবং তারা বংশীয় মর্যাদার জন্য সুপরিচিত।]
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده تالفٌ، فابن أبي دارم قال عنه المصنف نفسُه: رافضي غير ثقة، لكنه متابع، وشيخه أبو إسحاق محمد بن هارون بن عيسى الهاشمي هو المعروف بابن بُرَيه، قال عنه الدارقطني: لا شيء، وقال الخطيب: في حديثه مناكير كثيرة، وقال عنه مرة: ذاهب الحديث يُتَّهم بالوضع، وجزم به ابن عساكر، فقال: يضع الحديث. قلنا: وهو المتَّهم به، وقد رُوي مثل هذا الخبر من طريق أخرى لا يُعتمد عليها البتة، وليس فيه قوله: ذلك نور الخلافة، إلى آخره.وأخرجه ابن الجوزي في "المسلسلات" الحديث الثالث والأربعون، من طريق أحمد بن يعقوب بن أحمد بن المهرجان العدل، عن محمد بن هارون بن عيسى، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن عساكر كما في "تاريخ الخلفاء" للسيوطي ص 259، وأبو طاهر السِّلَفي في "المشيخة البغدادية" (19)، ومحمد بن محمد المرتضى الزَّبيدي في "أماليه" (2) من طريق أحمد بن الحسن المقرئ المعروف بدبُيس، عن محمد بن يحيى الكسائي وأحمد بن زهير وإسحاق بن إبراهيم بن إسحاق، عن علي بن الجهم، عن المتوكل عن المعتصم، عن المأمون، عن الرشيد، عن المهدي، عن المنصور، عن أبيه، عن جده، عن ابن عباس بنحوه في ذكر الجُمَّة فقط، ودُبيسٌ المقرئ المذكورُ في هذا الإسناد قال عنه الدارقطني: ليس بثقة، وقال عنه الخطيب: منكر الحديث.ووصفه صلى الله عليه وسلم بأنه كان ذا جُمَّة - أي: أنَّ شعره كان يضرب منكبيه - صحيح ثابت من حديث أنس بن مالك عند البخاري (5903)، ومسلم (2338): أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان يضربُ شعرُه منكبيه.وفي لفظٍ عند البخاري (5905): بين أذنيه وعاتقه، وفي لفظٍ عند مسلم: إلى أنصاف أُذُنيه.وصحَّ عن البراء بن عازب أيضًا عند مسلم (2337)، قال: ما رأيتُ من ذي لِمَّةٍ أحسن في حُلّة حمراء من رسول الله صلى الله عليه وسلم، شعره يضرب منكبيه. وهو عند البخاري (3551) لكن بلفظ: له شعر يبلغ شحمة أذنيه.وهذا الخلاف محمول على أنَّ معظم شعره صلى الله عليه وسلم كان عند شحمة أُذُنه، وما استرسل منه متّصل إلى المنكِب. نقله الحافظُ ابن حجر في "الفتح" 10/ 417 عن الداوودي وابن التِّين.
5516 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن محمد بن عبد الله البغدادي، حدثنا أبو القاسم عبيد الله [1] بن محمد بن سليمان بن إبراهيم الإسكندراني بمصر، حدثنا أبو يحيى الضرير زيد بن الحسن المِصري [2]، حدثنا عبد الرحمن بن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن جده، عن عمر بن الخطَّاب أنه قال للعباس بن عبد المطَّلِب: إني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "نَزِيدُ [3] في المسجد"، ودارُك قريبةٌ من المسجد، فأعطناها نَزِدْها في المسجد، وأقطعُ لك أوسعَ منها، قال: لا أفعلُ، قال: إذًا أغلِبَك عليها، قال: ليس ذاكَ لكَ، فاجعل بيني وبينك مَن يقضي بالحق، قال: ومَن هو؟ قال: حذيفةُ بنُ اليمان، قال: فجاؤوا إلى حذيفة فقَصُّوا عليه، فقال حذيفةُ: عندي في هذا خَبَرٌ، قال: وما ذاك؟ قال: إنَّ داودَ النبيَّ صلَواتُ الله عليه أراد أن يَزِيد في بيت المَقدِس، وقد كان بيتٌ قريبٌ من المسجد ليتيمٍ، فطَلَب إليه فأبى، فأراد داودُ أن يأخُذَها منه، فأوحى الله عز وجل إليه: إن أنْزَه البُيوتِ عن الظُّلم لَبَيتي، قال: فتركه، فقال له العباسُ: فبقي شيء؟ قال: لا.قال: فدخل المسجد، فإذا مِيزابٌ للعباس شارعٌ في مسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم يَسيلُ ماءُ المطر منه في مسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال عمرُ بيده فقلَعَ المِيزابُ، فقال: هذا الميزابُ لا يَسيلُ في مسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال له العباسُ: والذي بعث محمدًا بالحقِّ، إنه هو الذي وَضَعَ هذا المِيزابَ في هذا المكان، ونزعته أنتَ يا عمرُ، فقال عمر: ضَعْ رِجليك على عُنقي لترُدَّه إلى ما كان، ففعل ذلك العباسُ، ثم قال العباسُ: قد أعطيتُك الدارَ تَزيدُها في مسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم، فزادَها عمرُ في المسجد، ثم قَطَعَ للعباس دارًا أوسع منها بالزَّوراء [4]. هذا حديثٌ كتبناهُ عن أبي جعفر، وأبي عليٍّ الحافظ عليه [5]، ولم نكتُبه إلَّا بهذا الإسناد، والشيخان رضي الله عنهما لم يحتجّا بعبد الرحمن بن زيد بن أسلم.وقد وجدتُ له شاهدًا من حديث أهل الشام:
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আব্বাস ইবন আবদুল মুত্তালিবকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "আমরা মসজিদে (জায়গা) বৃদ্ধি করব।" আপনার বাড়িটি মসজিদের নিকটেই। আপনি আমাদের তা দিন, আমরা এটিকে মসজিদে বৃদ্ধি করে দেব এবং আমি আপনাকে এর চেয়েও প্রশস্ত একটি জায়গা দান করব।
তিনি (আব্বাস) বললেন: আমি তা করব না।
তিনি (উমর) বললেন: তাহলে আমি জোর করে এটি নিয়ে নেব।
তিনি (আব্বাস) বললেন: আপনার জন্য তা বৈধ নয়। আপনি আমার ও আপনার মাঝে এমন কাউকে নিযুক্ত করুন যিনি ন্যায়বিচার করবেন।
তিনি (উমর) বললেন: সে কে?
তিনি (আব্বাস) বললেন: হুযাইফা ইবনুল ইয়ামান।
তারা তখন হুযাইফার নিকট গেলেন এবং তাকে ঘটনাটি খুলে বললেন। হুযাইফা বললেন: এ ব্যাপারে আমার কাছে একটি খবর (জ্ঞান) আছে। তিনি (উমর) বললেন: তা কী? তিনি (হুযাইফা) বললেন: আল্লাহর নবী দাউদ (আঃ) বাইতুল মাকদিসে (মসজিদে) বৃদ্ধি করতে চাইলেন। তখন মসজিদের নিকটেই এক ইয়াতীমের একটি ঘর ছিল। তিনি (দাউদ আঃ) ইয়াতীমকে তা দিতে বললেন, কিন্তু সে অস্বীকার করল। তখন দাউদ (আঃ) তার কাছ থেকে ঘরটি জোর করে নিতে চাইলেন। আল্লাহ তাআলা তার নিকট ওয়াহী পাঠালেন: "নিশ্চয়ই ঘরসমূহের মধ্যে আমার ঘর (মসজিদ) যুলম থেকে সর্বাধিক পবিত্র।" অতঃপর তিনি (দাউদ আঃ) তা ছেড়ে দিলেন।
আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে (উমরকে) বললেন: আর কিছু বাকি রইল? তিনি (উমর) বললেন: না।
অতঃপর তিনি (উমর) মসজিদে প্রবেশ করলেন। তখন আব্বাসের একটি পরনালী রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর মসজিদের দিকে উন্মুক্ত ছিল, যার বৃষ্টির পানি মসজিদের মধ্যে পড়ত। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন হাত দিয়ে তা উপড়ে ফেললেন। তিনি বললেন: এই পরনালী রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর মসজিদে পানি ফেলবে না।
আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: সেই সত্তার কসম, যিনি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সত্যসহ প্রেরণ করেছেন, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজেই এই পরনালীটি এই স্থানে স্থাপন করেছিলেন, আর আপনি তা উপড়ে ফেললেন, হে উমর!
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এটিকে আগের অবস্থায় ফিরিয়ে আনার জন্য আপনার পা আমার কাঁধের উপর রাখুন। আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাই করলেন। এরপর আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি আপনাকে আমার ঘরটি দিয়ে দিলাম, যাতে আপনি তা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর মসজিদে বৃদ্ধি করে দিতে পারেন।
অতঃপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই ঘরটি মসজিদে বৃদ্ধি করে দিলেন এবং আব্বাসকে ‘যাওরা’ নামক স্থানে এর চেয়েও প্রশস্ত একটি ঘর দান করলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: عبد الله، مكبَّرًا، وهو خطأ صوَّبناه من "فتح الباب في الكنى والألقاب" لابن مَنْدَه الترجمة (62)، و"الأنساب" للسمعاني في نسبة (المدوَّري)، و"المغني في "الضعفاء" للذهبي (3949)، وكذلك سمِّي على الصواب في رواية ابن عساكر لهذا الخبر في "تاريخ دمشق" 26/ 369.
[2] وقع في نسخنا الخطية: البصري، بالباء بدل الميم، نسبة إلى البصرة، وأغلب الظن أنها تحريف عن المصري، فقد ترجم لزيد بن الحسن هذا جماعةٌ مبيّنين أنه كان بمصر، منهم أبو سعيد بن يونس المصري والدارقطني كما نقله الحافظُ ابن حجر في "لسان الميزان" 3/ 551.
5516 [3] - وقع في نسخنا الخطية: نزد، هكذا بحذف الياء قبل الدال! والجادة ما أثبتنا من "تاريخ دمشق" لابن عساكر 26/ 369 حيث روى هذا الخبر بهذا الإسناد. ومن سائر مصادر التخريج التي خرَّجت هذا الحرف من قول عمر بن الخطاب مقتصرين عليه كما سيأتي.
5516 [4] - صحيح لغيره إن شاء الله لكن بذكر أُبيّ بن كعب بدل حذيفة بن اليمان، وهذا إسناد ضعيف لضعف أبي القاسم عُبيد الله بن محمد الإسكندراني وشيخه أبي يحيى زيد بن الحسن المصري، وعبد الرحمن بن زيد بن أسلم فيه لينٌ، وخالفه معمر بن راشد الثقة الحافظ فروى هذا الخبر عن زيد بن أسلم مرسلًا ليس فيه ذكر أبيه أسلم مولى عمر بن الخطاب وذكر أن الحكم بين العباس وعمر كان أبيّ بن كعب.وأخرجه ابن عساكر في تاريخ دمشق 26/ 369 - 370 من طريق أبي القاسم عبيد الله بن محمد الإسكندراني بهذا الإسناد.وأخرجه إسحاق بن راهويه كما في "إتحاف الخيرة" للبوصيري (2/ 946) عن عبد الرزاق، عن معمر بن راشد، عن زيد بن أسلم، مرسلًا، وبذكر أبي بن كعب حكمًا بين العباس وعمر بدلًا من حذيفة، ودون قصة الميزاب وإقطاع عمر للعباس دارًا أوسع.ويشهد لقصة عمر والعباس في الدار والميزاب مرسلُ سعيد بن المسيب الذي سيذكره المصنّف بعده.ويشهد لقصة الدار دون الميزاب حديث ابن عباس عند ابن سعد 4/ 20، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 1/ 512، وعبد الله بن أحمد في "فضائل الصحابة" (1807)، والبيهقي في "سننه الكبرى" 6/ 168، وابن عساكر 26/ 367. وإسناده ضعيف، فيه علي بن زيد بن جُدعان، وهو ضعيف الحديث.ويشهد لقصة الدار كذلك مرسل سالم أبي النضر عند ابن سعد 4/ 19، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 4/ 22، وابن عساكر 26/ 370، وهذا مع إرساله فيه رجل ضعيف.ويشهد لقصة الميزاب وحدها حديثُ عُبيد الله بن عباس عند أحمد 3/ (1790) وغيره، ورجاله لا بأس بهم، لكن فيه انقطاع، غير أنه يصلح مثلُه في الشواهد.ويشهد لهذه القصة أيضًا مرسل أبي هارون موسى بن أبي عيسى المدني عند عبد الرزاق (15264)، وأبي داود في "المراسيل" (406)، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 4/ 19. ورجاله ثقات.ويشهد لها كذلك مرسل أبي حَصِين عثمان بن عاصم عند البلاذُري في "أنساب الأشراف" 4/ 19.ورجاله لا بأس بهم.والزَّوراء: موضع بالمدينة غربي المسجد النبوي عند سوق المدينة في صدر الإسلام.
5516 [5] - أي: بانتقاء أبي علي الحافظ على أبي جعفر البغدادي، فإنّ لأبي علي الحافظ أحاديث انتقاها من مرويات أبي جعفر البغدادي نَظِير الحديث المتقدم برقم (5351).
5517 - حدَّثَناه أبو أحمد الحسين بن علي التَّمِيمي، رحمه الله، أخبرنا محمد بن المُسيَّب، حدثنا أبو عُمير عيسى بن محمد بن النَّحّاس، حدثنا الوليد بن مسلم، حدثنا شُعيبٌ الخُراساني [1]، عن عطاء الخُراساني، عن سعيد بن المُسيّب: أَنَّ عُمر بن الخطَّاب لما أراد أن يَزِيد في مسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم وَقَعَتْ زيادته [2] على دارِ العباس ابن عبد المُطلب، فذكر الحديث بنحوٍ منه [3].
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মসজিদে সম্প্রসারণ করতে চাইলেন, তখন তাঁর সম্প্রসারণ আব্বাস ইবনু আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বাড়ির উপর পড়লো। এরপর তিনি এর কাছাকাছি ধরনের বাকি ঘটনা বর্ণনা করলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذلك نُسب هذا الرجل في رواية الحاكم خُراسانيًا، كما في "أصول المستدرك"، وكما رواه البيهقي في "سننه الكبرى" 6/ 67 عن أبي عبد الله الحاكم بسنده هذا! وهو وهمٌ يغلب على الظن أنه من جهة الحاكم نفسه، وربما يكون من أحد الرواة بينه وبين الوليد بن مسلم، فقد روى هذا الخبر محمد بن عمرو بن الجَرّاح الغَزّي عن الوليد بن مسلم، فقال: عن شعيب بن رُزَيق، هكذا غير منسوب، وهذا هو الصحيح، فهذا الرجل شامي مقدسي لا شأن له بخُراسان، ومنشأ الوهم هذا - فيما يبدو - هو انتقال النظر إلى نسبة شيخ شعيب في هذا الإسناد؛ وهو عطاء بن أبي مسلم الخُراساني، فكُرِّر سهوًا، والله أعلم.
[2] جاء في (ز) و (ب): وقف ساقيه، وفي (ص) و (م): وقعت ساقيه، هكذا غير معجمة، سوى نقطة وضعت في (ص) على ما قبل آخره فأصبحت كأنها نون، والمثبت على الصواب من رواية البيهقي في "الكبرى" 6/ 67 حيث روى هذا الخبر عن أبي عبد الله الحاكم، بإسناده هذا، فما عدا ذلك فهو تحريف.
5517 [3] - صحيح لغيره كسابقه، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم، لكنه مرسل، غير أنه وإن كان كذلك فهو من مراسيل سعيد بن المسيب الذي تُعدُّ مراسيله من أقوى المراسيل حتى عدَّها بعضهم في حكم المسند المتصل لجلالة سعيدٍ. محمد بن المسيّب: هو ابن إسحاق النيسابوري الأرغباني، وشعيب: هو ابن رُزيق - بتقديم الراء - الشامي المقدسي، وعطاء الخراساني: هو ابن أبي مسلم.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 6/ 76 عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد. وقال في آخره بعد قوله: وقعت زيادته على دار العباس بن عبد المطلب: فذكر قصة وذكر فيها قصة الميزاب.وأخرجه البيهقي 6/ 168، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 26/ 368 من طريق محمد بن عمرو بن الجراح الغَزِّي، عن الوليد بن مسلم، عن شعيب بن رُزيق وغيره، عن عطاء الخراساني، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن وسعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، قال: لما أراد عمر بن الخطاب أن يزيد في مسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم … فذكر قصة دار العباس دون قصة الميزاب، وجعل الحديث مسندًا متصلًا بذكر أبي هريرة، ولو كان ذلك محفوظًا لكان الإسناد حسنًا، لكن رُوي هذا الحديث بسند رجاله ثقات عن سعيد بن المسيب ليس فيه ذكر أبي هريرة، وهو المحفوظ، والله تعالى أعلم.وأخرجه دون قصة الميزاب كذلك أحمد بن حنبل في "فضائل الصحابة" (1753)، وأخرجه علي بن حرب الطائي في الجزء الثاني من "حديثه عن ابن عيينة" (11)، ومن طريقه الخطيب البغدادي في "المتفق والمفترق" (273)، وابن عساكر 26/ 367، وأخرجه ابن حزم في "المحلى" 7/ 236 من طريق عبد الله بن الزبير الحميدي، ثلاثتهم (أحمد بن حنبل وعلي بن حرب والحميدي) عن سفيان بن عيينة، عن بشر بن عاصم الثقفي، عن سعيد بن المسيب، مرسلًا، إلّا الحميدي، فقال في روايته: عن سعيد بن المسيب، عن أبي بن كعب، قال: إنَّ عمر بن الخطاب والعباس بن عبد المطلب تحاكما. ورجاله ثقات، وسماع سعيد بن المسيب من أبي بن كعب محتمل، لأنَّ سعيدًا ولد لسنتين مضتا من خلافة عمر، وأبيّ بن كعب مات في خلافة عثمان على الصحيح، فلو ثبت ذكر أبي بن كعب لكان الإسناد صحيحًا، لكن قول الجماعة الذين أرسلُوه أولى بالقبول، ولعلَّ الحُميدي لما قال: عن أبي بن كعب، أراد عن قصة أبي بن كعب في تحكيم عمر والعباس إياه في خصومتهما، والله تعالى أعلم. وأخرجه أبو سعيد المُفضَّل محمد الجَنَدي في "فضائل المدينة" (50) عن ابن أبي عمر العَدَني وسعيد بن منصور، عن سفيان بن عيينة، عن بشر بن عاصم، مرسلًا ليس فيه ذكر سعيد بن المسيب.
5518 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عفّان العامري، حدثنا قبيصة بن عُقبة، حدثنا سفيان، عن موسى بن أبي عائشة، عن عبد الله بن أبي رَزِين، عن أبي رزين، عن عليٍّ، قال: قلتُ للعباس: سَل النبيَّ صلى الله عليه وسلم أن يستعملك على الصدقة، فسأله، فقال: "ما كنتُ لأستَعمِلَك على غُسَالِةِ ذُنُوبِ الناسِ" [1].
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললাম: আপনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করুন, তিনি যেন আপনাকে সাদকা (যাকাত) সংগ্রহের কাজে নিযুক্ত করেন। তিনি (আব্বাস) তাঁকে জিজ্ঞাসা করলেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তোমাকে মানুষের গুনাহের অপবিত্রতা ধোয়ার (সাদকা সংগ্রহের) দায়িত্বে নিযুক্ত করব না।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لجهالة عبد الله بن أبي رزين، وفي متنه نكارة، لأنه يخالف ما ثبت في "صحيح مسلم" (1072) من حديث عبد المطلب بن ربيعة بن الحارث، قال: اجتمع ربيعة بن الحارث والعباس بن عبد المطلب، فقالا: والله لو بعثنا هذين الغلامين - قالا لي وللفضل بن عباس - إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فكلماه فأمّرهما على هذه الصدقات، فأدّيا ما يؤدي الناسُ، وأصابا مما يُصيبُ الناسُ، قال: فبينا هما في ذلك جاء علي بن أبي طالب، فوقف عليهما فذكرا له ذلك، فقال علي بن أبي طالب: لا تفعلا فوالله ما هو بفاعل .... وفيه: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال لهما: "إنَّ الصدقة لا تنبغي لآل محمد، إنما هي أوساخُ الناس". وعليه فما ذهب إليه بعضُ أهل العلم من تصحيح حديث أبي رزين عن علي فيه نظرٌ، فقد صحَّحه الطبريُّ في "تهذيب الآثار" في مسند علي ص 235، وابنُ خزيمة (2390)، وحسَّنه ابن حجر في "المطالب العالية" (910)، وفي "مختصر زوائد البزار" (799)، والبوصيري في "إتحاف الخيرة" (2079)!سفيان: هو الثوري، وأبو رزين: هو مسعود بن مالك الأسدي.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 4/ 24، وأبو بكر بن أبي شيبة وإسحاق بن راهويه في "مسنديهما" كما في "المطالب العالية" (910)، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 1/ 514، والبزار (895)، والطبري في "تهذيب الآثار" مسند علي ص 235، وابن خزيمة (2390)، والطحاوي في "أحكام القرآن" (799)، وفي "مشكل الآثار" (4389)، وفي "معاني الآثار" 2/ 11 من طُرق عن قبيصة بن عُقبة، بهذا الإسناد. غير أنَّ يعقوب بن سفيان وابن خزيمة لم يذكرا في الإسناد أبا رزين، إنما جعلاه من رواية ابنه عن عليٍّ مباشرة، والمحفوظ ذكر أبيه.