হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5659)


5659 - أخبرنا أحمد بن كامل القاضي، حَدَّثَنَا أحمد بن محمد بن عيسى القاضي، حَدَّثَنَا زكريا بن عدي، حَدَّثَنَا علي بن مُسهِر، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن مروان، قال: أصابَ عُثمانَ رُعَافٌ سنةَ الرُّعَافِ، حتَّى أَوصى وتَخلَّف عن الحجِّ، فدخل علينا رجلٌ من قُرِيش، فقال: استَخْلِفْ، فقال: وقالوه؟ قال: نعم، قال: ومَن هو؟ فسَكَت، ثم دخلَ عليه آخَرُ، فقال: استَخلِفْ، فذكر نحوًا ممّا ذكَر الأولُ، فقال عثمانُ: الزَّبيرَ؟ قال: نعم، فقال عثمانُ: أما والذي نفسِي بيده إن كان لأخْيَرَهم ما علِمتُ وأحبَّهُم إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!




মারওয়ান থেকে বর্ণিত, উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রু'আফের (তীব্র নাক দিয়ে রক্ত পড়ার) বছর এত মারাত্মক রক্তক্ষরণে আক্রান্ত হলেন যে, তিনি ওসিয়ত করে ফেললেন এবং হজ্জে যেতে পারলেন না। তখন কুরাইশ গোত্রের একজন লোক আমাদের নিকট প্রবেশ করে বললেন: আপনি (কাউকে) স্থলাভিষিক্ত (খলীফা) নিযুক্ত করুন। উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তারা কি এই কথা বলেছে? লোকটি বললেন: হ্যাঁ। তিনি (উসমান) জিজ্ঞেস করলেন: সে কে? লোকটি নীরব রইলেন। অতঃপর আরেকজন লোক তাঁর নিকট প্রবেশ করে বললেন: আপনি (কাউকে) স্থলাভিষিক্ত নিযুক্ত করুন। সেও প্রথম জনের মতো কথা উল্লেখ করল। তখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যুবাইরকে? লোকটি বলল: হ্যাঁ। তখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমার জীবন যাঁর হাতে, তাঁর শপথ! আমার জানা মতে, তিনি (যুবাইর ইবনু আওয়াম) তাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ ছিলেন এবং তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট তাদের মধ্যে সবচেয়ে প্রিয় ছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. عروة: هو ابن الزبير بن العوّام، ومروان هو ابن الحكم بن أبي العاص.وأخرجه أحمد 1/ (455) عن زكريا بن عدي، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري (3717) عن خالد بن مخلد، عن علي بن مُسهر، به. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه مختصرًا البخاري (3718) من طريق أبي أسامة حماد بن أسامة، عن هشام بن عروة، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5660)


5660 - أخبرنا الحسن بن يعقوب العدل، حَدَّثَنَا محمد بن عبد الوهاب العَبْدي، أخبرنا جعفر بن عَوْن، أخبرنا إسماعيل بن أبي خالد، عن البَهِيّ، عن عُروة، قال: قالت لى عائشةُ: يا بُنيّ، إنَّ أباكَ من {الَّذِينَ اسْتَجَابُوا لِلَّهِ وَالرَّسُولِ مِنْ بَعْدِ مَا أَصَابَهُمُ الْقَرْحُ} [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه!




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উরওয়াহ বলেন, তিনি আমাকে বললেন: "হে আমার বৎস, নিশ্চয় তোমার পিতা তাদের অন্তর্ভুক্ত {যারা আঘাতপ্রাপ্ত হওয়ার পরেও আল্লাহ্ ও রাসূলের ডাকে সাড়া দিয়েছিল।}"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. البهيُّ: هو عبد الله، وعروة: هو ابن الزبير بن العوّام.وأخرجه مسلم (2418) (52) من طريق وكيع بن الجراح عن إسماعيل بن أبي خالد، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وقد تقدَّم برقم (3204) من طريق هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة أنها قالت لعبد الله بن الزبير: يا ابن أختي، أما والله، إنَّ أباك وجدك - تعني أبا بكر والزبير - لمن الذين قال الله عز وجل … الآية. فجعل هشام خطاب عائشة في هذه الرواية لعبد الله بن الزبير، وليس لعروة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5661)


5661 - حَدَّثَنَا محمد بن صالح بن هانئ، حَدَّثَنَا أبو بكر محمد بن النَّضْر الجارُودي، حَدَّثَنَا عبد الله بن سعيد الكِنْدي، حَدَّثَنَا أبو عبد الرحمن النَّضْر بن منصور العَنَزي، حدثني علقمة عُلَاثة اليَشكُري، قال: سمعت عليًّا يقول: سمعتُ إلى أُذني من في رسولِ الله صلى الله عليه وسلم وهو يقول: "طلحةُ والزبيرُ جارايَ في الجنة" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুখ থেকে নিজের কানে শুনেছি, তিনি বলছিলেন: “তালহা এবং যুবায়ের জান্নাতে আমার প্রতিবেশী হবে।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف النضر بن منصور العنزي وضعفِ شيخه الذي سُمِّي في رواية المصنّف علقمة بن عُلَاثة، وهو وهمٌ، وإنما هو عقبة بن علقمة كما جاء مسمًّى في جزء "حديث أبي سعيد الأشج" - وهو عبد الله بن سعيد الكِنْدي نفسه - (7)، وكذلك سماه كل من خرَّج هذا الخبر من طريقه، وعقبة بن علقمة هذا ضعيف.وأخرجه الترمذي (3741) عن أبي سعيد الأشجّ عبد الله بن سعيد الكِنْدي، بهذا الإسناد. وقال: غريب لا نعرفه إلّا من هذا الوجه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5662)


5662 - أخبرنا أبو الحسن علي بن محمد بن عُقبة الشَّيباني بالكوفة، حَدَّثَنَا إبراهيم بن إسحاق بن أبي العَنْبَس القاضي، حَدَّثَنَا علي بن حَكِيم، حَدَّثَنَا شَريك بن عبد الله، عن الأسود بن قيس، عن نُبَيح العَنَزي، عن أبي سعيد الخدري، أنه قال: لا تَسُبُّوا حَوَاريَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فإن كفّارتَهم القتلُ [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তোমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাওয়ারীগণকে গালি দিও না, কারণ তাদের (গালি দেওয়ার) কাফফারা হলো হত্যা।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده فيه لِينٌ من أجل شريك بن عبد الله - وهو النخعي، وبقية رجاله ثقات. نُبيح العَنَزي: هو ابن عبد الله، وعلي بن حَكيم: هو الأَوْدي.وأخرجه ابن أبي عاصم في "السنة" (999) عن زَحْمويه - وهو زكريا بن يحيى الواسطي - والدارقطني في "العلل" (2187) من طريق أبي النضر هاشم بن القاسم، كلاهما عن شريك بن عبد الله النخعي، به.وقد خالف هؤلاء الثقات من أصحاب شريك النخعي أبو أحمد الزبيري عند الدارقطني في "العلل" (2187) فرواه عن شريك النخعي، عن الأسود بن قيس، عن أبيه، عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا تسبُّوا أصحابي، فإن بحسبهم القتل" كذا خالف الجماعة في إسناد الحديث ورفعه.وصوّب الدارقطني رواية من رواه موقوفًا من قول أبي سعيد الخدري.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5663)


5663 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب حَدَّثَنَا محمد بن سِنان القَزَّاز، حَدَّثَنَا إسحاق بن إدريس، حَدَّثَنَا محمد بن خازم، حَدَّثَنَا هشام بن عُروة، عن أبيه، عن عبد الله بن الزُّبير، عن أبيه، قال: أرسلَني رسول الله صلى الله عليه وسلم في غَداةٍ بارِدةٍ، فأتيتُه وهو مع بعضِ نسائه في لِحافِه، فأدخلَني في اللَّحافِ، فصِرْنا ثلاثةً [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে এক ঠান্ডা সকালে পাঠালেন। আমি তাঁর কাছে এলাম। তখন তিনি তাঁর কোনো এক স্ত্রীর সাথে তাঁর চাদরের (লিহাফ) নিচে ছিলেন। অতঃপর তিনি আমাকেও চাদরের ভেতর নিয়ে নিলেন। ফলে আমরা তিনজন হয়ে গেলাম।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده تالفٌ من أجل إسحاق بن إدريس - وهو الأُسواري البصري - فهو متروك الحديث، واتهمه ابن معين بالكذب، وقال ابن حبان: يسرق الحديث، وقال أبو زرعة الرازي كما في "العلل" لا بن أبي حاتم (2628): لا أعلم هذا الحديث رواه غير إسحاق بن إدريس، وإسحاق واهٍ في هذا الحديث. ونقل ابن عدي في "الكامل" 1/ 333 عن عباد بن يزيد البحراني قوله: هذا حديث شنيع، أول من حدَّث به فلانٌ الخياط فوثب عليه يحيى بن معين. قال ابن طاهر المقدسي في "ذخيرة الحفاظ" (2350): يعني أنَّ إسحاق هذا سرقه من الخياط.وأخرجه ابن أبي عاصم في "السنة" (1394)، والبزار (968)، وابن عدي 1/ 333، وأبو الشيخ الأصبهاني في "أخلاق النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم " (480)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 18/ 392 - 393 من طرق عن إسحاق بن إدريس الأسواري، بهذا الإسناد.وقد روى هذا الخبرَ حمادُ بنُ سلمة عند إسحاق بن راهويه في "مسنده" (1977) عن هشام بن عروة، عن أبيه مرسلًا: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم مبعث ليلة الأحزاب الزبير ورجلًا آخر، في ليلةٍ قَرَّةٍ، فنظرا ثم جاءا ورسول الله صلى الله عليه وسلم في مِرْطٍ لأم سلمة، فأدخلهما في المرط، ولزق رسول الله صلى الله عليه وسلم بأم سلمة. كذلك رواه مرسلًا، لم يذكر فيه عبدَ الله بنَ الزبير ولا أباهُ الزبير.وقد ظهر بهذه الرواية المرسلة أن هذا كان ليلة الأحزاب، وإذا ثبت ذلك فقد جاء من طرق عن حذيفة بن اليمان: أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بعثه وحده ليلة الأحزاب ليأتيه بخبرهم، فجاءهم حذيفة وعرف خبرهم، ثم عاد إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فرأى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يصلِّي في مرطٍ لبعض نسائه مرحَّل، قال: فلما رآني أدخلني إلى رحله، وطرح عليَّ طرف المرط، ثم ركع وسجد وإنه لفيه، فلما سلم أخبرته الخبر. هكذا جاء عند أحمد 38/ (358)، وفي رواية مسلم (1788) قال: فألبسني رسول الله صلى الله عليه وسلم من فضل عباءة كانت عليه يصلي فيها، فلم أزل نائمًا حتَّى أصبحتُ.فكأنَّ حذيفة هو الرجل الآخَر الذي ورد ذكره في مرسل عروة بن الزبير، لكن ليس فيه هنا أنَّ أحدًا من نسائه كانت في المرط، إنما كان المرط لبعض نسائه، وفرقٌ بين الأمرين، وحديث حذيفة أثبت وأَولى بالقبول من مرسل عروة، والله أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5664)


5664 - حدثني علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حَدَّثَنَا العباس بن الفضل الأَسفاطي، أخبرنا أبو نُعيم ضِرار بن صُرَدٍ، حَدَّثَنَا عبد العزيز بن محمد الدَّرَاوَرْدي، حَدَّثَنَا محمد ابن عبد الله بن مُسلِم الزُّهْري، عن عمِّه، عن عُرْوة بن الزُّبَير، عن عبد الله بن الزُّبَير، عن الزُّبَير بن العوام، قال: استَعْدَى عليَّ رجلٌ من الأنصار رسولَ الله صلى الله عليه وسلم في شِرَاج الحَرّة، فقال: "يا زُبيرُ، اسقِ ثم أرسِلِ الماءَ إلى جارِكَ"، فقال الأنصاريُّ: يا رسول الله، وأن كان ابنَ عمَّتِك، فتلَوّن وَجْهُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، وقال: "يا زُبيرُ، اسقِ ثم احبِسِ الماءَ حتَّى يَبلُغَ الجَدْرَ، ثم أرسِلْ إلى جارك"، فاستوعَبَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم للزُّبير الفُتْيا [1]. فقال الزُّبير: إني لأحسَبُ هذه الآيةَ نزلَت في خُصومَتي: {فَلَا وَرَبِّكَ لَا يُؤْمِنُونَ حَتَّى يُحَكِّمُوكَ فِيمَا شَجَرَ بَيْنَهُمْ} الآية [النساء: 65] [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه. فإني لا أعلَمُ أحدًا أقام هذا الإسنادَ عن الزُّهْري يَذكُر عبد الله بنَ الزُّبَير، غيرَ ابن أخيه [3]، وهو عنه ضَيِّق. ‌‌ذكرُ مَقتَل الزُّبَيرِ بن العَوّام




যুবাইর ইবনুল আওয়াম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: হাররাহ এলাকার পানি সেচের নালা সংক্রান্ত বিষয়ে জনৈক আনসারী ব্যক্তি আমার বিরুদ্ধে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে অভিযোগ নিয়ে এলো। তখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে যুবাইর, তুমি (তোমার জমিতে) পানি দাও, এরপর তোমার প্রতিবেশীর জন্য পানি ছেড়ে দাও।" তখন আনসারী লোকটি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! যদিও সে আপনার ফুফাতো ভাই হয়? এতে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের চেহারা পরিবর্তিত হয়ে গেল (অর্থাৎ তিনি রাগান্বিত হলেন)। এরপর তিনি বললেন: "হে যুবাইর, তুমি পানি সেচ করো এবং বেষ্টনী (বা আইল) পর্যন্ত পানি পৌঁছানো অবধি আটকে রাখো, তারপর তোমার প্রতিবেশীর জন্য ছেড়ে দাও।" এভাবে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যুবাইরের জন্য (প্রথম) ফায়সালাটিই বহাল রাখলেন। যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি মনে করি, এই বিরোধের ফলেই আমার ব্যাপারে এই আয়াতটি নাযিল হয়েছিল: "অতএব আপনার রবের কসম! তারা ততক্ষণ পর্যন্ত মুমিন হতে পারবে না, যতক্ষণ না তারা তাদের নিজেদের মধ্যে সৃষ্ট ঝগড়া-বিবাদের বিচারভার আপনার ওপর অর্পণ না করে..." [সূরা নিসা: ৬৫]।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذا في نسخنا الخطية: الفتيا، ووقع في رواية غير المصنّف: حقَّه. وشِراج الحَرَّة: الحرة: الأرضُ ذات الحجارة السُّود، والشِّراج: جمع شَرْجة، وهي مَسيل الماء من الحَزْن إلى السَّهْل.والجَدْر: الحائط، وقيل: الجَدْر أصلُ الجدار، قال الخطابي: هكذا الرواية: الجدر، قال: والمُتقنون من أهل الرواية يقولون: حتَّى يبلغ الجذر، يعني بالذال المعجمة، وهو مبلغ تمام الشرب، ومنه: جذر الحساب.



[2] حديث صحيح لكن من مسند عبد الله بن الزبير، وليس من مسند أبيه الزبير، وهذا إسناد ضعيف لضعف ضرار بن صُرَدٍ، لكنه متابع.وأخرجه النسائي (5924) من طريق عبد الله بن وهب، عن يونس بن يزيد والليث بن سعد، عن ابن شهاب الزهري، بهذا الإسناد. قال أبو حاتم كما في "العلل" لابنه (1185): أخطأ ابن وهب في هذا الحديث، الليث لا يقول: عن الزبير، ونحوه قول البخاري فيما نقله عنه الترمذي في "العلل الكبير" (374).قلنا: مصداق قولهما ما أخرجه أحمد 26/ (16116) عن أبي النضر هاشم بن القاسم، والبخاري (2359) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم (2357)، والترمذي (1363) و (3027)، والنسائي (5925) و (5936) و (11045) عن قتيبة بن سعيد، ومسلم (2357)، وابن ماجه (15) و (2480) عن محمد بن رُمْح، وأبو داود (3637)، وابن حبان (24) من طريق أبي الوليد هشام بن عبد الملك الطيالسي، خمستهم عن الليث بن سعد، عن ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، عن عبد الله بن الزبير: أنَّ رجلًا خاصم الزبير، الحديث. فجعلوه من مسند عبد الله بن الزبير.وأخرجه أحمد 3/ (1419)، والبخاري (2708) من طريق شعيب بن أبي حمزة، والبخاري (2361) و (4585) من طريق معمر بن راشد، و (2362) من طريق ابن جُريج، ثلاثتهم عن ابن شهاب الزهري، عن عروة بن الزبير؛ قال شعيب في روايته: أنَّ الزبير كان يحدِّثُ أنه خاصم رجلًا، وأرسله الآخران عن عروة، فلم يذكُرا الزبير، ولم يذكر أحدٌ منهم عبدَ الله بنَ الزبير في إسناده. وشِراج الحَرَّة: الحرة: الأرضُ ذات الحجارة السُّود، والشِّراج: جمع شَرْجة، وهي مَسيل الماء من الحَزْن إلى السَّهْل.والجَدْر: الحائط، وقيل: الجَدْر أصلُ الجدار، قال الخطابي: هكذا الرواية: الجدر، قال: والمُتقنون من أهل الرواية يقولون: حتَّى يبلغ الجذر، يعني بالذال المعجمة، وهو مبلغ تمام الشرب، ومنه: جذر الحساب.



5664 [3] - في قول المصنّف هذا نظر، فقد وافق ابنَ أخي الزهري على ذكر عبد الله بن الزبير في إسناده الليث بنُ سعد ويونسُ بنُ يزيد في روايتهما عن الزهري كما تقدم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5665)


5665 - أخبرني عبد الله بن محمد بن زياد العدل، حَدَّثَنَا محمد بن إسحاق، حَدَّثَنَا أبو الأشعث أحمد بن المِقدام، حَدَّثَنَا عَثّام بن علي، حَدَّثَنَا هشام بن عُرْوة، عن أبيه، قال: لما كان يومُ الجَمَل دعا الزُّبَيرُ ابنَه عبد الله، فأوصى إليه، فقال: يا بنيّ، إنَّ هذا يومٌ لَيُقتَلَنَّ فيه ظالمٌ ومظلومٌ، واللهِ لئن قُتِلتُ لأُقتَلنَّ مظلُومًا، والله ما فَعلتُ ولا فَعلتُ، انظُرْ يا بُنيّ دَيني، فإني لا أدَعُ شيئًا أهمُّ إليَّ منه، وهو ألفُ ألفٍ ومئتا ألفٍ [1].




যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন জুমালের যুদ্ধ দিবস এলো, তখন তিনি (যুবাইর) তাঁর পুত্র আব্দুল্লাহকে ডাকলেন এবং তাঁকে ওসিয়ত করলেন। তিনি বললেন: "হে আমার পুত্র, এটি এমন একটি দিন, যাতে অবশ্যই অত্যাচারী ও অত্যাচারিত উভয়ই নিহত হবে। আল্লাহর শপথ! যদি আমি নিহত হই, তবে অবশ্যই আমি মজলুম (নির্দোষ) অবস্থায় নিহত হবো। আল্লাহর শপথ! আমি এমন করিনি এবং এমনও করিনি (অর্থাৎ কোনো অন্যায় করিনি)। হে আমার পুত্র, আমার ঋণের বিষয়টি ভালোভাবে দেখো, কারণ এর চেয়ে গুরুত্বপূর্ণ আর কিছুই আমি ছেড়ে যাচ্ছি না। আর তা হলো এক মিলিয়ন দুই শত হাজার (১,২০০,০০০)।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح، وهذا وإن كانت صورتُه الإرسال لأنَّ عروة كان إذ ذاك يصغُر عن حضور واقعة الجمل، قد حدَّث به عروةَ أخوه عبد الله بن الزبير كما وقع في رواية البخاري (3129) حيث أخرجه من طريق أبي أسامة حماد بن أسامة، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عبد الله بن الزبير، قال: لما وقف الزبير يوم الجمل دعاني، فقمت إلى جنبه، فقال … وذكره.على أنه جاء وصلُه عن عثّام أيضًا، وذلك عند يعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 2/ 415 عن أبي بشر بكر بن خلف، عن عثّام بن علي، عن هشام، عن أبيه، عن عبد الله بن الزبير.إلَّا أنَّ أبا أسامة قد خالف عثّامًا في مقدار دين الزبير، فقال أبو أسامة: قال عبد الله بن الزبير: فحسبتُ ما عليه من الدَّين، فوجدته ألفي ألف ومئتي ألف، وجعل حساب الدَّين من صنيع عبد الله بن الزبير، لا أنَّ الزبير هو من أخبر ابنه عبد الله بمقداره، وأبو أسامة أثبت وأجلُّ من عثَّام بن عليّ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5666)


5666 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، قال أخبرني يونُس، عن ابن شِهاب، قال: ولّى الزُّبيرُ يومَ الجَمَل مُنهَزِمًا، فأدركَه ابن جُرمُوزٍ رجلٌ من بني تَمِيم، فقَتَلَه [1].




ইবনু শিহাব থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: উটের যুদ্ধের দিন যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পরাজিত অবস্থায় পিছু হটেছিলেন। তখন বানু তামীমের একজন লোক, ইবনু জুরমুজ তাকে পেয়ে গেলো এবং তাকে হত্যা করলো।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات. ابن وهب: هو عبد الله، ويونس: هو ابن يزيد الأيلي.وأخرجه أبو العرب القيرواني في "المحن" ص 110 من طريق أصبغ بن الفرج، عن ابن وهب، به.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 18/ 433 من طريق عبد الله بن أبي زياد الرُّصافي، عن ابن شهاب الزهري.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5667)


5667 - أخبرني إسماعيل بن محمد بن الفضل الشَّعْراني، حَدَّثَنَا جدّي، حَدَّثَنَا إسحاق بن محمد الفَرْوي، حَدَّثَنَا عبد العزيز بن عِمران، قال: أخبرنا سعيد بن عبد العزيز السُّلَمي، عن أبيه، قال: لما انصرفَ الزُّبَير يوم الجَمَل جعل يقول:ولقد عَلِمتُ لوَ انَّ عِلْميَ نافِعِي … أَنَّ الحياةَ من المَماتِ قَرِيبُثم لم يَنْشَبْ أن قتلَه ابن جُرمُوزٍ [1].




যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তিনি জংগে জামাল (উট যুদ্ধের) দিন ফিরে যাচ্ছিলেন, তিনি বলতে লাগলেন:
আমি অবশ্যই জানি, যদি আমার জ্ঞান আমার জন্য উপকারী হতো, তবে (জানতাম) জীবন মৃত্যুর অতি নিকটবর্তী।
এরপর অল্প সময়ের মধ্যেই ইবনু জুরমুয তাকে হত্যা করে ফেলল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، عبد العزيز بن عمران - وهو ابن عبد العزيز الزهري - متروك الحديث، وسعيد بن عبد العزيز السّلمي وأبوه لا يُعرفان.وأخرجه ابن أبي الدنيا في "المُحتضرين" (255)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (422)، وابن عساكر 18/ 414 و 415 من طريق أبي غسان محمد بن يحيى بن علي الكناني، عن عبد العزيز بن عمران، به.وذكره البلاذري في "أنساب الأشراف" 3/ 54 عن أبي الحسن علي محمد المدائني، عن عامر بن أبي محمد وسعيد بن عبد الرحمن السُّلمي، عن أبيه. كذا سمّاه سعيد بن عبد الرحمن!ولم يَنْشَب، معناه: لم يَلبَث.



5668 - Null









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5668)


5668 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حَدَّثَنَا أحمد بن مِهْران بن خالد، قال: سمعت الفضْل بن دُكين يقول: قُتل طلحةُ والزُّبير بن العَوذام في رجب سنة ست وثلاثين.




ফযল ইবনু দুকাইন থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও যুবাইর ইবনুল আওযামকে ছত্রিশ হিজরি সনের রজব মাসে হত্যা করা হয়েছিল।









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5669)


5669 - أخبرنا أبو عبد الله الأصبَهاني، حَدَّثَنَا الحسَن بن الجَهْم، حَدَّثَنَا الحُسين ابن الفَرَج، حَدَّثَنَا محمد بن عمر، عن شُيوخه، قالوا: خرج الزُّبير يوم الجَمَل، وذلك يوم الخميس لعشرٍ خَلَون من جُمادى الآخِرة من هذه السنة، بعد الوَقْعة على فَرَس يقال له: ذو الخِمار، منطلقًا نحو المدينة، فقُتل بوادي السِّباع، ودُفِن هناك، وذُكِر عن عُروة بن الزُّبَير أنه قال: قُتل أبي يومَ الجَمَل، وقد زاد على الستين أربعَ سنينَ [1].5669 م - قال ابن عُمر: وسمعتُ مُصعبَ بن ثابت بن عبد الله بن الزُّبَير يقول: شهد الزُّبَير بن العوَّام بدرًا، وهو ابن سبع وعشرين سنة، وقُتِلَ وهو ابن أربع وستين سنةً [2].




উরওয়াহ ইবনুয যুবাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: আমার পিতা জামাল যুদ্ধের দিন শহীদ হন। তখন তাঁর বয়স ষাটের বেশি চার বছর (অর্থাৎ চৌষট্টি বছর) হয়েছিল। (এছাড়াও বর্ণনাকারীরা) বলেন: জুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই বছরের জুমাদাল আখিরাহর দশ দিন গত হওয়ার পর বৃহস্পতিবার দিন জামাল যুদ্ধের পর যু'ল-খিমার নামক একটি ঘোড়ায় আরোহণ করে মদীনার দিকে যাচ্ছিলেন। অতঃপর তিনি ওয়াদিউস-সিবা নামক স্থানে নিহত হন এবং সেখানেই তাঁকে দাফন করা হয়। ইবনু উমার বলেন: আমি মুসআব ইবনু সাবিত ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবাইরকে বলতে শুনেছি: যুবাইর ইবনুল আওয়াম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাতাশ বছর বয়সে বদর যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেন এবং চৌষট্টি বছর বয়সে নিহত হন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وانظر "طبقات ابن سعد" 3/ 103 - 104.وقول عروة الذي في آخره أسنده ابن سعد 3/ 105 عن محمد بن عمر الواقدي، عن عُبيد الله بن عروة بن الزبير، عن أخيه عَبد الله بن عروة، عن عروة.



[2] وهو عند ابن سعد في "طبقاته" 3/ 105.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5670)


5670 - حَدَّثَنَا الشيخ أبو بكر بن إسحاق وأبو بكر بن بالَوَيهِ، قالا: أخبرنا أبو مُسلم إبراهيم بن عبد الله، حَدَّثَنَا عبد الملك بن قُريب الأَصمَعي، قال: سمعتُ عبدَ الله بن عَون يقول: هؤلاء الخِيارُ قُتِلوا قَتْلًا، ثم بكى، فقال: أقبلَ الزُّبَيرُ على قاتلِه وقد ظَفِرَ به، فقال: أذكِّرُك الله، فكَفَّ عنه الزُّبَيرُ، حتَّى فعل ذلك مِرارًا، فلما غَدَرَ بالزبير وضربَه، قال الزُّبَيرُ: قاتَلَكَ اللهُ، تُذكِّرُ بالله ثم تَنْساهُ [1].




আব্দুল্লাহ ইবনে আওন থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এই উত্তম ব্যক্তিগণকে নৃশংসভাবে হত্যা করা হয়েছে। অতঃপর তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনে আওন) কাঁদলেন এবং বললেন:

যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর হত্যাকারীর মুখোমুখি হলেন, যিনি তাঁকে কাবু করে ফেলেছিলেন। যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তোমাকে আল্লাহর কথা স্মরণ করিয়ে দিচ্ছি। অতঃপর যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে আঘাত করা থেকে বিরত থাকলেন। এমনকি তিনি বহুবার এমনটি করলেন। কিন্তু যখন সে (হত্যাকারী) যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে বিশ্বাসঘাতকতা করে তাঁকে আঘাত করলো, তখন যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহ তোমাকে শাস্তি দিন! তুমি আল্লাহর কথা স্মরণ করিয়ে দাও, অতঃপর নিজেই তা ভুলে যাও!




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وأخرجه الطبراني في "معجمه الكبير" (241) عن أبي مسلم الكشي - وهو إبراهيم بن عبد الله - به.وذكره ابن سعد في "الطبقات" 3/ 103 - 104 مُصدِّرًا ذلك بقوله: قالوا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5671)


5671 - أخبرنا عبد الباقي بن قانِع ببغداد، حَدَّثَنَا محمد بن موسى بن حماد البَرْبَري، حَدَّثَنَا أبو السُّكَين زكريا بن يحيى الطائي، حَدَّثَنَا عمُّ أَبي [1] زَحْرُ بن حِصْن، قال: حدثني جدّي حُمَيد بن مُنهِبٍ، قال: حجَجْتُ في السنة التي قُتل فيها عثمانُ، فصادفْتُ طلحةَ والزبيرَ وعائشةَ بمكةَ، فلما سارُوا إلى البصرة سِرتُ معهم، وسار عليُّ بن أبي طالب إليهم حتَّى التَقَوا، وذلك يومُ الجَمَل، فاقتتلوا قتالًا شديدًا، وأَخذ بخِطَام الجَمَل يومئذ سبعون رجلًا، وذكر الحديثَ بطوله. وقال في آخره: وولّى الزُّبَيرُ مُنهزِمًا، فأدركَه ابن جُرمُوزٍ، وهو رجلٌ من بني تَميمٍ، فقتَلَه.




হুমায়দ ইবনে মুনহিব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি সেই বছর হজ্জ করেছিলাম যেই বছর উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে হত্যা করা হয়েছিল। তখন আমি মক্কায় তালহা, যুবাইর ও আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দেখা পেলাম। যখন তাঁরা বসরা অভিমুখে যাত্রা করলেন, আমি তাঁদের সাথে রওনা হলাম, আর আলী ইবনে আবী তালিবও তাঁদের দিকে অগ্রসর হলেন, অবশেষে তাঁরা পরস্পরের সম্মুখীন হলেন। আর এটাই ছিল উটের যুদ্ধ (ইয়াওমুল জামাল)। এরপর তাঁরা তীব্র লড়াই করলেন। সেদিন উটের লাগাম ধরেছিল সত্তর জন লোক। এবং বর্ণনাকারী দীর্ঘ হাদিসটি বর্ণনা করলেন। তিনি এর শেষে বলেন: যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পরাজিত হয়ে পালিয়ে গেলেন। এরপর বনি তামিম গোত্রের একজন লোক ইবনে জুরমূয তাঁকে ধরে ফেলল এবং তাকে হত্যা করল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: عمر بن والتصويب من الموضعين المتقدمين برقم (5382) و (5504) حيث روى المصنفُ بهذا الإسناد خبرين آخرين، وهي نسخةٌ معروفةٌ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5672)


5672 - أخبرنا عبد الرحمن بن حَمْدان الجَلّاب بهَمَذان، حَدَّثَنَا عثمان بن خُرَّزاذَ الأَنطاكي، حَدَّثَنَا رَبيعة بن الحارث، حدثني محمد بن سليمان العابدُ، حَدَّثَنَا إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس بن أبي حازم، قال: قال عليّ للزُّبير: أما تَذكُر يومَ كنتُ أنا وأنتَ في سَقِيفةِ قوم من الأنصار، فقال لك رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أَتُحِبُّه؟ " فقلتَ: وما يَمنَعُني؟ قال: "أمَا إنك ستَخْرُجُ عليه وتُقاتِلُه وأنتَ ظالمٌ"؟ قال: فرَجَعَ الزُّبيرُ [1].




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: আপনার কি সেই দিনের কথা মনে আছে, যখন আমি আর আপনি আনসারদের একটি গোত্রের সাকীফাতে (ছায়াযুক্ত স্থানে) ছিলাম, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনাকে জিজ্ঞেস করেছিলেন: "তুমি কি তাকে (আলীকে) ভালোবাসো?" আপনি বলেছিলেন: "আমাকে কিসে বাধা দেবে?" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সাবধান! নিশ্চয় তুমি তার বিরুদ্ধে বের হবে এবং তার সাথে যুদ্ধ করবে, যখন তুমি হবে অত্যাচারী।" (বর্ণনাকারী) বলেন, তখন যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফিরে গেলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] قوي لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة محمد بن سليمان العابد، وقد خالفه في إسناده يعلى بن عبيد الطَّنافسي الثقة، عند ابن أبي شيبة 15/ 283، وإسحاق بن راهويه في "مسنده" كما في "المطالب العالية" لابن حجر (4454)، والعقيلي في "الضعفاء" (1000)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 18/ 409 و 411 - 412، فرواه عن إسماعيل بن أبي خالد، عن عبد السلام رجل من حيّه، قال: خلا عليٌّ بالزبير يوم الجمل. فذكر نحوه مختصرًا. قال البخاري فيما نقله عنه العقيلي: لا يتبيَّن سماعُه منهما، وجَزَم الدارقطني في "العلل" (454) و (541) بأنه مرسلٌ. قلنا: وعبد السلام هذا مجهول، وسمّاه الدارقطني: عبد السلام بن عبد الله بن جابر الأحمسي.وعلى كلٍّ فللخبر طرقٌ عديدة يتقوَّى بها، ومن ذلك خبر أبي حرب بن أبي الأسود وخبر أبي جَرْوة المازني الآتيان عند المصنّف.وخبر نذير الضبّي عند البلاذري في "أنساب الأشراف" 3/ 49 - 50 و 9/ 430، وابن عساكر 18/ 408 - 409 و 412، وإسناده حسن في المتابعات والشواهد.وخبرُ عبد الرحمن بن أبي ليلى عند أبي العرب القيرواني في "المحن" ص 103 - 104، وابن عساكر 18/ 412 و 413 و 421، وإسناده حسن في المتابعات والشواهد.ومن ذلك أيضًا مرسلُ الزهري عند البلاذُري 3/ 51 - 52، والطبري في "تاريخه" 4/ 508 - 509، ورجاله ثقات. ومرسل قتادة عند معمر في "جامعه" (20430)، والطبري في "تاريخه" 4/ 501 - 502، والبيهقي في "الدلائل" 6/ 414، ورجاله ثقات.ومرسل الحكم بن عتيبة عند إسحاق بن راهويه وأحمد بن منيع في "مسنديهما" كما في "المطالب العالية" للحافظ ابن حجر (4403/ 1 و 2)، ورجاله ثقات أيضًا.ورواية الأسود بن قيس عن رجل رأى الزبير عند ابن أبي شيبة 15/ 283، والدولابي في "الكنى" (67)، وابن عساكر 18/ 406.وعليه فما قاله الذهبي في "تلخيصه" بأنَّ في هذا الحديث نظرًا، فغير مُسلَّم له.وقد جاء بسند صحيح عن ابن عباس عند ابن سعد 3/ 102، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 9/ 430 - 431: أنَّ ابن عباس أتى الزبير، فقال: أين صفيّة بنت عبد المطلب حيث تقاتل بسيفك علي بن أبي طالب بن عبد المطّلب؟! قال: فرجع الزبير، فلقيه ابن جُرموز فقتله، فأتى ابن عباس عليًا، فقال: إلى أين قاتلُ ابن صفيّة؟ قال عليّ: إلى النار. كذلك جاء في رواية ابن عباس أنه هو من قال للزبير ما جعله ينصرف عن أصحاب الجمل، ولا يمتنع أن يكون كلٌّ من عليٍّ وابن عباس قد ذكّره بما ذكَّره به، فانصرف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5673)


5673 - أخبرني أبو الحسين محمد بن أحمد بن تَميم القَنْطَري ببغداد، حَدَّثَنَا أبو قِلابة عبد الملك بن محمد الرَّقَاشي، حَدَّثَنَا أبو عاصم، حَدَّثَنَا عبد الله بن محمد بن عبد الملك الرَّقَاشي، عن جَدّه عبد الملك، عن أبي حَرْب بن أبي الأسود الدِّيليّ، قال: شهدتُ الزُّبَيرَ خرج يريدُ عليًّا فقال له عليٌّ: أَنشُدُك الله، هل سمعتَ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "تُقاتِلُه وأنت له ظَالمٌ"؟ فقال: لم أذكُر، ثم مضى الزُّبَير مُنصَرِفًا [1].هذا حديث صحيح عن أبي حَرْب بن أبي الأسود، فقد روى عنه يزيدُ بن صُهَيب الفَقيرُ وفَضْلُ بن فَضَالة في إسنادٍ واحدٍ:




আবু হারব ইবনু আবিল আসওয়াদ আদ-দীলী থেকে বর্ণিত,

আমি (আবু হারব) দেখেছি যে, যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আলীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উদ্দেশ্যে বের হলেন। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: আমি তোমাকে আল্লাহর শপথ দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, তুমি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শোননি: "তুমি তার (আলীর) বিরুদ্ধে এমন অবস্থায় যুদ্ধ করবে যখন তুমি তার প্রতি যুলুমকারী হবে"? তিনি (যুবাইর) বললেন: আমার মনে পড়ছে না। এরপর যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফিরে গেলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] قوي لغيره كسابقه، وهذا إسناد وهم فيه أبو قِلابة عبد الملك بن محمد الرَّقَاشي، فقد خالفه يعقوب بن إبراهيم الدورقي الثقة الحافظ عند أبي يعلى (666)، فرواه عن أبي عاصم - وهو الضحّاك بن مَخْلَد النبيل - عن عبد الله بن محمد بن عبد الملك الرقاشي، عن جده عبد الملك بن مسلم الرقاشي، عن أبي جرو المازني، قال: شهدت عليًا والزبير. وكذلك رواه جعفر بن سليمان الضُّبعي عن عبد الله بن محمد الرقاشي كما سيأتي عند المصنّف برقم (5675) و (5676).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5674)


5674 - حَدَّثَنَا بذلك أبو عَمرو محمد بن جعفر بن محمد بن مَطَر العَدْل المأمُونُ من أصلِ كتابه، حَدَّثَنَا عبدُ الله بن محمد بن سَوّار الهاشِمي، حَدَّثَنَا مِنْجابُ بن الحارث، حَدَّثَنَا عبد الله بن الأجْلَح، حدثني أبي، عن يزيدَ الفَقيرِ.قال منجابٌ: وسمعتُ فَضْل بن فَضَالة يُحدِّث به جميعًا عن أبي حَرْب بن أبي الأسود الدِّيْلي، قال: شهدتُ عليًّا والزبير، لما رَجَعَ الزُّبَيرُ على دابّته يشُقّ الصُّفُوف، فعَرَضَ له ابنُه عبدُ الله، فقال: ما لك؟ فقال: ذَكَر لي عليٌّ حديثًا سمعتُه من رسولِ الله صلى الله عليه وسلم يقولُ: "لَتُقاتِلنَّه وأنتَ ظالمٌ له"، فلا أُقاتِلُه، قال: وللقتالِ جئتَ، إنما جئتَ لتُصلحَ بين الناس، ويُصلحَ اللهُ هذا الأمرَ بك، قال: قد حلفتُ أن لا أقاتِلَ، قال: فأعتِقْ غلامَك جَرْجِسَ، وقف حتَّى تُصلِح بين الناس، قال: فأعتَقَ غُلامَه جَرْجِس، ووقف، فلما اختلف أمرُ الناسِ ذهب على فَرسِه [1].وقد رُويَ إقرارُ الزُّبَيرِ لعليٍّ رضي الله عنهما بذلك من غير هذه الوجوهِ والرواياتِ:




আবূ হারব ইবনু আবীল আসওয়াদ আদ-দীয়লী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখলাম। যখন যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর আরোহী পশুতে চড়ে কাতার ভেদ করে ফিরে যাচ্ছিলেন, তখন তাঁর ছেলে আব্দুল্লাহ তাঁর সামনে এসে জিজ্ঞেস করলেন: আপনার কী হলো? তিনি (যুবাইর) বললেন: আলী আমাকে একটি হাদীস স্মরণ করিয়ে দিয়েছেন যা আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে শুনেছিলাম। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেন: "তুমি অবশ্যই তার (আলী'র) বিরুদ্ধে লড়াই করবে যখন তুমি তার প্রতি অবিচারকারী হবে।" তাই আমি তার বিরুদ্ধে লড়াই করব না। (আব্দুল্লাহ) বললেন: আপনি কি লড়াই করার জন্যই এসেছিলেন? আপনি তো কেবল মানুষের মধ্যে সমঝোতা করার জন্য এসেছেন, আর আল্লাহ আপনার মাধ্যমে এই বিষয়ের মীমাংসা করে দেবেন। তিনি (যুবাইর) বললেন: আমি কসম করেছি যে, আমি লড়াই করব না। (আব্দুল্লাহ) বললেন: তাহলে আপনার গোলাম জারজিসকে মুক্ত করে দিন এবং মানুষের মধ্যে মীমাংসা না হওয়া পর্যন্ত অপেক্ষা করুন। তিনি (যুবাইর) তাঁর গোলাম জারজিসকে মুক্ত করে দিলেন এবং অপেক্ষা করতে থাকলেন। যখন লোকজনের মধ্যে বিষয়টি ভিন্ন রূপ নিলো, তখন তিনি তাঁর ঘোড়ায় চড়ে চলে গেলেন।

যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কর্তৃক আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এ বিষয়টির স্বীকৃতি অন্যান্য সূত্র ও বর্ণনাতেও বর্ণিত হয়েছে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] هذان إسنادان لا بأس برجالهما غير فضل بن فضالة في الإسناد الثاني، فلم يظهر لنا من هو، وفي الرواة عن أبي حرب بن أبي الأسود الدِّيْلي المُفضَّل بن فضالة بن أبي أمية القرشي مولاهم، فلعلَّه يكون هو، ويكون تحرَّف اسمه في هذا الإسناد، والله أعلم.وقد وقع في إسناد هذا الخبر اختلاف عن أبي عمرو بن مطر العدل شيخ المصنّف، فقد أخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 414 - 415 ومن طريقه ابن عساكر 18/ 409 - 410 عن أبي بكر أحمد بن الحسن القاضي، عن أبي عمرو بن مطر، عن أبي العباس عبد الله بن محمد بن سوّار الهاشمي الكوفي، عن منجاب بن الحارث، عن عبد الله بن الأجلح، عن أبيه، عن يزيد الفقير، عن أبيه. قال: وسمعت الفضل بن فضالة يحدِّث أبي عن أبي حرب بن أبي الأسود الدِّيلي عن أبيه - دخل حديث أحدهما في حديث صاحبه - قال: لما دنا عليّ وأصحابه من طلحة والزبير ودنتِ الصفوفُ … وذكر الخبر. فزاد شيخ البيهقي أبو بكر أحمد بن الحسن القاضي في الإسناد الأول ذكر والد يزيد الفقير، وزاد في الإسناد الثاني ذكر أبي الأسود الدِّيْلي والد أبي حرب، وزيادة ذكر أبي الأسود هو الأقرب، فقد شارك أبو الأسود يوم الجمل مع عليٍّ، فهو الذي شهد عليًّا والزبير لا ابنه أبو حرب.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5675)


5675 - أخبرني أبو الوليد الإمام وأبو بكر بن عبد الله، قالا: حدثنا الحسن بن سفيان، حدثنا قَطَن بن نُسَير، حدثنا جعفر بن سُليمان، حدثنا عبد الله بن محمد الرَّقَاشي، حدثني جدي، عن أبي جَرْوة [1] المازِني، قال: سمعت عليًّا والزُّبيرّ، وعليٌّ يقول له: نَشَدتُك باللهِ يا زبيرُ، أما سمعتَ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: إنك تُقاتِلُني وأنت لي ظالِمٌ؟ قال: بلى، ولكن نَسيتُ [2].




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলছিলেন: হে যুবাইর! আমি তোমাকে আল্লাহর কসম দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, তুমি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শোনোনি যে, 'নিশ্চয়ই তুমি আমার সাথে যুদ্ধ করবে, অথচ তুমি হবে আমার প্রতি অন্যায়কারী (জালিম)?' তিনি (যুবাইর) বললেন: হ্যাঁ, কিন্তু আমি ভুলে গিয়েছিলাম।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذا سُمّي هذا الرجلُ عند المصنِّف، وكذلك سُمِّي في "تاريخ البخاري" الكبير" 9/ 21، ولكنه سُمِّي في سائر مصادر تخريج الخبر أبا جرو، بغير التاء المربوطة في آخره، وهو الذي صوَّبه أبو زرعة وأبو حاتم فيما نقله عنهما ابن أبي حاتم في "بيان خطأ محمد بن إسماعيل البخاري في تاريخه" بإثر "التاريخ الكبير" 9/ 152، وصوَّبه كذلك ابن عساكر 18/ 408، وكذلك جاء في "الكنى" لأبي أحمد الحاكم 3/ 200.



[2] قوي لغيره كما سبق، وهذا إسناد ضعيف من أجل عبد الله بن محمد الرَّقاشي - وهو ابن عبد الملك بن مسلم - فقد قال عنه البخاري: فيه نظر، وقال أبو حاتم: في حديثه نظر، وجده عبد الملك بن مسلم مجهول لم يرو عنه غير ابن ابنهِ عبد الله بن محمد.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 415 عن أبي عبد الله الحاكم، عن الإمام أبي الوليد وحده، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري في "تاريخه الكبير" 9/ 21 تعليقًا، ويعقوب بن سفيان في "مشيخته" (30) عن محمد بن عبد الله بن محمد بن عبد الملك بن مسلم الرقاشي، وأبو يعلى (666) من طريق أبي عاصم الضحّاك بن مخلد، كلاهما عن عبد الله بن محمد الرقاشي، به.وانظر ما بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5676)


5676 - حدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق الإمام، أخبرنا بِشْر بن موسى، حدثنا خالد بن يزيد القَرْني [1]، حدثنا جعفر بن سُليمان، عن عبد الله بن محمد الرَّقَاشي، عن جدّه عبد الملك بن مُسلم [2]، عن أبي جَرْوة المازِني، قال: سمعت عليًّا وهو يُناشِد الزُّبيرَ قال: أَنشُدُك الله يا زبيرُ، أما سمعتَ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: إنك تُقاتِلُني وأنت لي ظالمٌ؟ قال: بلى، ولكني نَسيتُ [3].




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি যুবাইরকে আল্লাহর কসম দিয়ে অনুনয় করে বলেছিলেন: হে যুবাইর! আমি তোমাকে আল্লাহর কসম দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, তুমি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শোনোনি: ‘নিশ্চয় তুমি আমার বিরুদ্ধে লড়াই করবে, এমতাবস্থায় যে তুমি আমার প্রতি যালিম (অত্যাচারী) হবে’? তিনি (যুবাইর) বললেন: হ্যাঁ, কিন্তু আমি ভুলে গিয়েছিলাম।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] القَرْني بالقاف والراء الساكنة نسبة إلى قرية بين قُطْرُبُل والمَزْرَفة غربي بغداد. انظر "تاريخ بغداد" للخطيب 9/ 243 وقال في اسم هذا الرجل: خالد بن أبي يزيد. وقيل: خالد بن يزيد، والصواب: ابن أبي يزيد، واسمه بَهْبُذان.



[2] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: مسلمة.



5676 [3] - قوي لغيره، وهذا إسناد ضعيف كسابقه.وأخرجه العقيلي في "الضعفاء" (964) عن بشر بن موسى، بهذا الإسناد.وأخرجه العقيلي أيضًا (843) عن محمد بن إسماعيل بن سالم الصائغ، عن خالد بن أبي يزيد القَرْني، به. 18/ 421 من طريق محمد بن سعيد بن الأصبهاني، ثلاثتهم عن شريك النخعي، عن عياش بن عمرو العامري، عن مسلم بن نذير، به.وأخرجه الدارقطني في "العلل" (470) من طريق أخرى عن الحُسين بن الحسن الأشقر، عن شريك، عن عياش بن عمرو، عن الأسود بن هلال، قال: جاء ابن جرموز يستأذن على عليٍّ فحَجَبه، فقال: يُحجَب قاتل ابن صفيّة، فقال: ائذن له وبشِّره بالنار … ثم ذكر الحديث. كذا رواه الدارقطني من طريق الحسين الأشقر، بذكر الأسود بن هلال بدل مسلم بن نذير، وليس ببعيد أن يكون عياش العامري سمعه من كلا الرجلين إذ كانا حاضرين في مجلس عليٍّ ذاك، وإلّا فرواية الحُسين الأشقر التي وافق فيها صاحبيه طَلْقًا وابن الأصبهاني هي الصحيحة، والله أعلم.وأخرجه أبو العرب القيرواني في "المحن" ص 99، والخطيب في "الأسماء المبهمة" ص 211 من طريق أم موسى - وهي سُرِّيّة علي بن أبي طالب - قالت: رأيتُ عُمير بن جرموز استأذن على عليٍّ … فذكر نحوه. وقد وقع في مطبوع "المحن" تحريفات تصحح من الكتاب الآخر. وإسناد هذا الوجه حسنٌ إن شاء الله.وانظر ما بعده.وأخرج منه قول علي بن أبي طالب مفردًا دون الحديث المرفوع ابن سعد في "طبقاته" 3/ 102، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 5/ 430 - 431 من طريق عكرمة عن ابن عباس، وإسناده صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5677)


5677 - حدثنا أبو محمد أحمد بن عبد الله المُزَني، حدثنا مُطَيَّن، حدثنا عمر بن محمد الأَسَدي، حدثني أبي، حدثنا شَريك، عن العباس بن ذَرِيح [1]، عن مُسلم بن نُذَير [2]، قال: كنا عند عليٍّ فجاء ابن جُرمُوزٍ يَستأذِنُ عليه، فقال عليٌّ: أتقتُلُ ابنَ صفيّةَ تَفخُّرًا؟ ائذَنُوا له وبَشِّرُوه بالنارِ، سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "لكل نبيٍّ حَوَاريٌّ، وإنَّ الزُّبيرَ حَوَاريَّ وابنُ عَمَّتي" [3].




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুসলিম ইবনু নুযাইর বলেন, আমরা আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ছিলাম। এমন সময় ইবনু জুরমূয তাঁর কাছে (প্রবেশের) অনুমতি চাইতে এলো। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তুমি কি সাফিয়্যার পুত্রকে অহংকারবশত হত্যা করেছ? তাকে অনুমতি দাও এবং তাকে জাহান্নামের সুসংবাদ দাও। আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: “প্রত্যেক নবীর একজন হাওয়ারী (বিশেষ শিষ্য/সাহায্যকারী) আছে। আর নিশ্চয়ই যুবাইর হলো আমার হাওয়ারী এবং আমার ফুফাতো ভাই।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ص) و (م) إلى: درع. 18/ 421 من طريق محمد بن سعيد بن الأصبهاني، ثلاثتهم عن شريك النخعي، عن عياش بن عمرو العامري، عن مسلم بن نذير، به.وأخرجه الدارقطني في "العلل" (470) من طريق أخرى عن الحُسين بن الحسن الأشقر، عن شريك، عن عياش بن عمرو، عن الأسود بن هلال، قال: جاء ابن جرموز يستأذن على عليٍّ فحَجَبه، فقال: يُحجَب قاتل ابن صفيّة، فقال: ائذن له وبشِّره بالنار … ثم ذكر الحديث. كذا رواه الدارقطني من طريق الحسين الأشقر، بذكر الأسود بن هلال بدل مسلم بن نذير، وليس ببعيد أن يكون عياش العامري سمعه من كلا الرجلين إذ كانا حاضرين في مجلس عليٍّ ذاك، وإلّا فرواية الحُسين الأشقر التي وافق فيها صاحبيه طَلْقًا وابن الأصبهاني هي الصحيحة، والله أعلم.وأخرجه أبو العرب القيرواني في "المحن" ص 99، والخطيب في "الأسماء المبهمة" ص 211 من طريق أم موسى - وهي سُرِّيّة علي بن أبي طالب - قالت: رأيتُ عُمير بن جرموز استأذن على عليٍّ … فذكر نحوه. وقد وقع في مطبوع "المحن" تحريفات تصحح من الكتاب الآخر. وإسناد هذا الوجه حسنٌ إن شاء الله.وانظر ما بعده.وأخرج منه قول علي بن أبي طالب مفردًا دون الحديث المرفوع ابن سعد في "طبقاته" 3/ 102، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 5/ 430 - 431 من طريق عكرمة عن ابن عباس، وإسناده صحيح.



[2] في (ص): يزيد. وقد قيل ذلك في اسمه. 18/ 421 من طريق محمد بن سعيد بن الأصبهاني، ثلاثتهم عن شريك النخعي، عن عياش بن عمرو العامري، عن مسلم بن نذير، به.وأخرجه الدارقطني في "العلل" (470) من طريق أخرى عن الحُسين بن الحسن الأشقر، عن شريك، عن عياش بن عمرو، عن الأسود بن هلال، قال: جاء ابن جرموز يستأذن على عليٍّ فحَجَبه، فقال: يُحجَب قاتل ابن صفيّة، فقال: ائذن له وبشِّره بالنار … ثم ذكر الحديث. كذا رواه الدارقطني من طريق الحسين الأشقر، بذكر الأسود بن هلال بدل مسلم بن نذير، وليس ببعيد أن يكون عياش العامري سمعه من كلا الرجلين إذ كانا حاضرين في مجلس عليٍّ ذاك، وإلّا فرواية الحُسين الأشقر التي وافق فيها صاحبيه طَلْقًا وابن الأصبهاني هي الصحيحة، والله أعلم.وأخرجه أبو العرب القيرواني في "المحن" ص 99، والخطيب في "الأسماء المبهمة" ص 211 من طريق أم موسى - وهي سُرِّيّة علي بن أبي طالب - قالت: رأيتُ عُمير بن جرموز استأذن على عليٍّ … فذكر نحوه. وقد وقع في مطبوع "المحن" تحريفات تصحح من الكتاب الآخر. وإسناد هذا الوجه حسنٌ إن شاء الله.وانظر ما بعده.وأخرج منه قول علي بن أبي طالب مفردًا دون الحديث المرفوع ابن سعد في "طبقاته" 3/ 102، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 5/ 430 - 431 من طريق عكرمة عن ابن عباس، وإسناده صحيح.



5677 [3] - خبر صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل محمد الأسدي - وهو محمد بن الحسن بن الزُّبير، فهو ضعيف يعتبر به، وقد توبع، غير أن محمد بن الحسن وهم هنا في تعيين شيخ شريك - وهو ابن عبد الله النخعي - فذكر أنه العباس بن ذَريح، وإنما هو عياش بن عمرو العامري وهو الصحيح، وعياش هذا ثقة. وعلى أي حال، فقد روي هذا الحديث من وجهين آخرين عن عليٍّ، أحدهما الآتي عند المصنف بعده، فالحديث صحيح بلا ريب. وقد انفرد محمد بن الحسن الأسدي هذا بقوله في المرفوع هنا: "وابن عمتي"، وهذه الزيادة في المرفوع ذكرها أيضًا هشام بن عروة في روايته لهذا الحديث عن أبيه عن جده الزبير فيما ذكره به سُفيان بن عُيينة كما في "مسند الحميدي" (1266)، و"سنن البيهقي الكبرى" 9/ 148، وقد تقدَّم تخريج حديثه برقم (5657).وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (5263)، وفي "الصغير" (794)، وعنه أبو نعيم في "فضائل الخلفاء" (108) عن محمد بن الليث الجوهري، عن عُمر بن محمد بن الحسن الأسدي، بهذا الإسناد.وأخرجه الدارقطني في "العلل" (470)، وابن عساكر 18/ 374 من طريق طلق بن غنّام، والخطيب في "تلخيص المتشابه في الرسم" 1/ 527 من طريق الحُسين بن الحَسن الأشقر، وابن عساكر 18/ 421 من طريق محمد بن سعيد بن الأصبهاني، ثلاثتهم عن شريك النخعي، عن عياش بن عمرو العامري، عن مسلم بن نذير، به.وأخرجه الدارقطني في "العلل" (470) من طريق أخرى عن الحُسين بن الحسن الأشقر، عن شريك، عن عياش بن عمرو، عن الأسود بن هلال، قال: جاء ابن جرموز يستأذن على عليٍّ فحَجَبه، فقال: يُحجَب قاتل ابن صفيّة، فقال: ائذن له وبشِّره بالنار … ثم ذكر الحديث. كذا رواه الدارقطني من طريق الحسين الأشقر، بذكر الأسود بن هلال بدل مسلم بن نذير، وليس ببعيد أن يكون عياش العامري سمعه من كلا الرجلين إذ كانا حاضرين في مجلس عليٍّ ذاك، وإلّا فرواية الحُسين الأشقر التي وافق فيها صاحبيه طَلْقًا وابن الأصبهاني هي الصحيحة، والله أعلم.وأخرجه أبو العرب القيرواني في "المحن" ص 99، والخطيب في "الأسماء المبهمة" ص 211 من طريق أم موسى - وهي سُرِّيّة علي بن أبي طالب - قالت: رأيتُ عُمير بن جرموز استأذن على عليٍّ … فذكر نحوه. وقد وقع في مطبوع "المحن" تحريفات تصحح من الكتاب الآخر. وإسناد هذا الوجه حسنٌ إن شاء الله.وانظر ما بعده.وأخرج منه قول علي بن أبي طالب مفردًا دون الحديث المرفوع ابن سعد في "طبقاته" 3/ 102، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 5/ 430 - 431 من طريق عكرمة عن ابن عباس، وإسناده صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5678)


5678 - فحدثنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا علي بن عبد العزيز، حدثنا حجَّاج بن مِنْهال، حدثنا حماد بن سلَمة، عن عاصم، عن زرِّ بن حُبيش، قال: قيل لعليّ بن أبي طالب: إنَّ قاتِلَ الزُّبَيرِ بالبابِ، فقال عليٌّ: ليَهنِكَ قاتلَ ابن صفيَّة النارُ، سمعتُ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "لكل نبيٍّ حَوَاريٌّ، وإنَّ حَوَارِيَّ الزُّبيرُ" [1].




আলী ইবনু আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে (যুবাইরের হত্যাকারীর বিষয়ে) বলা হলো যে, যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হত্যাকারী দরজায় এসে উপস্থিত হয়েছে। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'ইবনু সাফিয়্যাহর (যুবাইরের) হত্যাকারীর জন্য জাহান্নামের সুসংবাদ!' আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "প্রত্যেক নবীরই একজন হাওয়ারী (বিশেষ শিষ্য/সাহায্যকারী) ছিল, আর নিশ্চয়ই আমার হাওয়ারী হলো যুবাইর।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسنٌ من أجل عاصم - وهو ابن أبي النَّجُود - فهو صدوق حسنُ الحديث، وانظر ما قبله.وأخرجه أحمد 2/ (799) عن عفان بن مسلم، و (813) عن يونس بن محمد المؤدِّب، كلاهما عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (680) من طريق شيبان بن عبد الرحمن النَّحْوي، وأحمد (681)، والترمذي (3744) من طريق زائدة بن قدامة، كلاهما عن عاصم بن أبي النَّجُود، به.