হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5679)


5679 - حدثنا أبو بكر بن أبي دارِم الحافظ بالكوفة، حدثنا أبو جعفر الحَضْرمي، حدثنا حمزة بن عَوْن المَسعُودي، حدثنا محمد بن القاسم الأسَدي، حدثنا سفيانُ الثَّوْري وشَريكٌ، عن عاصم بن أبي النَّجُود، عن زرِّ بن حُبيش، قال: كنت جالسًا عند عليٍّ، فأُتي برأس الزُّبير ومعه قاتلُه، فقال عليٌّ: بشِّرْ قاتلَ ابن صفيّةَ بالنار، سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "لكلُّ نبيٍّ حَوارِيّ، وإنَّ حَوَارِيَّ الزُّبَير" [1].هذه الأحاديثُ صحيحةٌ عن أمير المؤمنين عليٍّ، وإن لم يُخرجاها بهذه الأسانيدِ.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি (তাবিয়ী যের বিন হুবাইশ) আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে বসেছিলাম, তখন যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাথা আনা হলো এবং তার সাথে তার হত্যাকারীও ছিল। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সফিয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ছেলের হত্যাকারীকে জাহান্নামের সুসংবাদ দাও। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি, তিনি বলেছেন: “প্রত্যেক নবীর একজন করে হাওয়ারী (বিশেষ সাথী বা সাহায্যকারী) থাকে। নিশ্চয়ই যুবাইর হলো আমার হাওয়ারী।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل محمد بن القاسم الأسدي، فهو متروك واتهمه أحمد، لكنه قد تُوبع عليه عن سفيان الثوري وحده - دون قصة الرأس - عند أحمد في "فضائل الصحابة" (1273)، وهذا الحديث لم يُروَ وعن شريك إلّا من طريق الأسدي.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (243) عن أبي جعفر محمد بن عبد الله الحضرمي، بهذا الإسناد. ورُوي مثلُه عن أبي جعفر محمد بن علي الباقر عند أبي العرب القَيرواني في المِحَن" ص 103، وابن عساكر 42/ 574 و 574 - 575.وقَوْل أبي الأسود يتيم عروة الذي تقدَّم تخريجه عند الخبر رقم (5646) يدل على أنَّ الزبير وعليًّا كانا بسنٍّ واحدٍ.وقوله: عِذارُ عامٍ واحد، معناه: خُتِنُوا في سنة واحد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5680)


5680 - أخبرنا إسماعيل بن محمد بن إسماعيل الفَقِيه بالرَّيّ، حدثنا أبو حاتم الرازي، حدثنا إبراهيم بن المُنذِر الحِزامي، حدثنا محمد بن طلحة التَّيْمي، حدثنا إسحاق بن يحيى بن طلحة، عن عمِّه موسى بن طلحة، قال: كان عليُّ بن أبي طالب والزُّبيرُ وطلحةُ بن عُبيد الله وسعدُ بن أبي وقّاص كان يُقال: عِذَارُ عامٍ واحدٍ، قال إبراهيمُ: لأنهم وُلِدوا في عامٍ واحدٍ [1].




মূসা ইবনু তালহা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: আলী ইবনু আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), তালহা ইবনু উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং সা‘দ ইবনু আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)—তাদেরকে ‘এক বছরের ‘ইযার’ (সমসাময়িক বা সমবয়সী) বলা হতো। ইবরাহীম (রাবী) বলেছেন: কারণ তারা একই বছরে জন্মগ্রহণ করেছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف إسحاق بن يحيى بن طلحة: وهو ابن عبيد الله التيمي.وأخرجه أبو العباس السّرّاج كما في "الاستيعاب" لابن عبد البر ص 261 عن أبي حاتم الرازي، بهذا الإسناد.وأخرجه يعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 1/ 483، وابن أبي خيثمة في السفر الثاني من "تاريخه الكبير"، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (202) و (212)، والطبراني في "الكبير" (247)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (503)، وابن عساكر 18/ 343 و 20/ 296 و 42/ 19 من طرق عن إبراهيم بن المنذر، به.وأخرجه الحربي في "غريب الحديث" 1/ 266، وابن عساكر 20/ 296 من طريق الأصمعي، عن إسحاق بن يحيى بنحوه. وسيتكرر عند المصنف برقم (6227). ورُوي مثلُه عن أبي جعفر محمد بن علي الباقر عند أبي العرب القَيرواني في المِحَن" ص 103، وابن عساكر 42/ 574 و 574 - 575.وقَوْل أبي الأسود يتيم عروة الذي تقدَّم تخريجه عند الخبر رقم (5646) يدل على أنَّ الزبير وعليًّا كانا بسنٍّ واحدٍ.وقوله: عِذارُ عامٍ واحد، معناه: خُتِنُوا في سنة واحد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5681)


5681 - أخبرني أبو طاهر محمد بن أحمد الجُوَيني، حدثنا أبو بكر بن رَجاء بن السَّنْدي، حدثنا أبو بكر بن أبي شَيْبة، حدثنا أبو أُسامة، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه [1]، قال: ورثَتْ عاتكةُ بنتُ زيد بن عمرو بن نُفَيلٍ الزُّبَيرَ، وكانت زوجتَه، فبلغَ حِصّتُها من الميراث ثمانين ألفَ دِرهَمٍ، وقالت تَرثيه:غَدَرَ ابن جُرمُوزٍ بفَارسِ بُهْمةٍ … يومَ اللِّقاء وكانَ غيرَ مُعَرِّدِيا عَمرُو لو نَبَّهتَه لَوجَدْتَه … لا طائشًا رَعِشَ البَنَانِ ولا اليَدِثَكِليْكَ أَمُّكَ إن ظَفِرتَ بفارِسٍ … فيما مضى مما يَرُوحُ ويَغْتَديكم غَمْرةٍ قد خاضَها لم يَثْنِهِ … عنها طِرادُكَ يا ابنَ فَقْع الفَدْفَدِواللهِ رَبِّك إن قَتَلتَ لَمُسلِمًا … حَلَّت عليكَ عُقُوبةُ المتعمِّدِ [2]




উরওয়াহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আতিকাহ বিনত যায়িদ ইবনু আমর ইবনু নুফাইল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী ছিলেন, তিনি তাঁর ওয়ারিশ হন। মীরাস থেকে তাঁর প্রাপ্ত অংশ ছিল আশি হাজার দিরহাম। আর তিনি যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শোকে নিম্নলিখিত কবিতা আবৃত্তি করেন:

ইবনু জারমুয এক বীর অশ্বারোহীর সঙ্গে বিশ্বাসঘাতকতা করেছে যুদ্ধের দিন, আর সে তো পলায়নকারী ছিল না।
হে আমর, তুমি যদি তাকে জাগাতে, তাহলে দেখতে সে না ছিল অস্থির, আর না তার আঙুল বা হাত কাঁপছিল।
তোমার মায়ের জন্য সর্বনাশ, যদি তুমি বিগত দিনে সকালে বা সন্ধ্যায় আগত কোনো অশ্বারোহীকে জয় করতে পারতে!
কত কঠিন পরিস্থিতিতে সে নেমেছে, তোমার তাড়াহুড়ো তাকে সেখান থেকে সরাতে পারেনি, হে মরুভূমির বালির পুত্র!
তোমার রবের কসম, যদি তুমি কোনো মুসলিমকে হত্যা করে থাকো, তবে জেনে রাখো, ইচ্ছাকৃত হত্যাকারীর শাস্তি তোমার ওপর বর্তাবে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] سقط عروة من (ص) و (م)، وأشار في هامش (ز) إلى سقوطه في الأصل، وهو ثابت في (ز) و (ب) و"تلخيص المستدرك" للذهبي. البُهْمة: الرجل الشجاع الذي لا يُدرَى من أي يُؤتَى له من شدّة بأسه.وقولها: وكان غير مُعرِّد، أي: لا يَعدُو فَزَعًا.وقولها: رعش البنان واليد: مرتجف البنان واليد جُبْنًا وضعفًا.وفَقْع الفَدْفَد: الفَقْع هو نوع أبيض من رديء الكَمأة، والفَدْفَد: الأرض المستوية. وفَقْع الفدفد مثَلٌ للذليل.والغَمْرة: الشِّدّة.



[2] إسناده فيه لِين من أجل جهالة شيخ المصنف، فإننا لم نقف له على ترجمة، ومن فوقه ثقات.أبو أسامة: هو حماد بن أسامة.وهذا ظاهره يخالف رواية البخاري (3129) من طريق أبي أسامة، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عبد الله بن الزبير في حديث طويل، وفي آخره: وكان للزبير أربعُ نسوة، ورُفع الثلث، فأصاب كلَّ امرأة ألفُ ألف ومئتا ألف.لكن جاء في بعض الروايات كما في "الاستيعاب" لابن عبد البر في ترجمة عاتكة ص 924، وفي "النسب" للزبير بن بكار كما في "فتح الباري" للحافظ ابن حجر 9/ 426: أنَّ الثمانين ألف درهم أخذتها عاتكة مُصالحةً، أي: بعد استحقاقها ألف ألف ومئتي ألف، وكان ذلك برضاها، كما نبَّه عليه الحافظُ ابن حجر. البُهْمة: الرجل الشجاع الذي لا يُدرَى من أي يُؤتَى له من شدّة بأسه.وقولها: وكان غير مُعرِّد، أي: لا يَعدُو فَزَعًا.وقولها: رعش البنان واليد: مرتجف البنان واليد جُبْنًا وضعفًا.وفَقْع الفَدْفَد: الفَقْع هو نوع أبيض من رديء الكَمأة، والفَدْفَد: الأرض المستوية. وفَقْع الفدفد مثَلٌ للذليل.والغَمْرة: الشِّدّة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5682)


5682 - أخبرني أبو بكر محمد بن عبد الله الشافعي ببغداد، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حدثنا محمد بن عِمران بن أبي ليلى، حدثنا سعيد بن عُبيد الله بن الوليد الوَصَّافي [1]، عن أبيه، قال: لما قَتل عَمرُو بن جُرمُوزٍ الزُّبَيرَ بنَ العوام أنشَدتِ امرأتُه عاتكةُ بنت زيد بن عَمرو بن نُفيل - وكانت من المُهاجِرات - تقول:غَدَرَ ابن جُرمُوزٍ بفارسِ بُهْمةٍ … يومَ اللِّقاء وكان غيرَ مُعرِّدِيا عَمرُو لو نَبَّهتَه لَوَجَدْتَهُ … لا طائشًا رَعِشَ البَنَانِ ولا اليَدِثَكِلتْكَ أمُّك هل ظَفِرتَ بمِثْلِهِ … فيمن مَضى ممَّن يَرُوحُ ويَغتَدِيكم غَمْرةٍ قد خاضَها لم يَثْنِهِ … عنها طِرَادُك يا ابنَ فَقْعِ الفَدْفَدِ ‌‌ذكرُ مناقب طلحةَ بن عُبيدِ الله التَّيْمي رضي الله عنه -




উবায়দুল্লাহ ইবনুল ওয়ালীদ আল-ওয়াসসাফী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন আমর ইবনে জুরমূয, যুবাইর ইবনুল আওয়াম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে হত্যা করল, তখন তাঁর স্ত্রী আতিকা বিনতে যায়িদ ইবনে আমর ইবনে নুফাইল – যিনি মুহাজিরদের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন – এ কবিতা আবৃত্তি করে বললেন:

ইবনে জুরমূয বিশ্বাসঘাতকতা করেছে এক মহাবীর অশ্বারোহীর সাথে...
যুদ্ধের দিনে, আর সে তো এমন ছিল না যে পিঠ ফিরিয়ে পালায়।
হে আমর! তুমি তাকে সতর্ক করলে দেখতে পেতে, সে নির্বোধও নয়,
আর তার হাত বা আঙুলও ভয়ে কাঁপছে না।
তোমার মা তোমাকে হারাক! গত হয়ে যাওয়া বা আসা-যাওয়া করা মানুষের মধ্যে
তুমি কি তার মতো কাউকে পরাজিত করতে পেরেছ?
সে কত বিপদ-সংকট অতিক্রম করেছে,
তোমার তাড়া তাকে দমাতে পারেনি, হে নিম্নবংশীয়ের পুত্র!




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: الرصافي، بالراء، وإنما هو الوَصَّافي كما في مصادر ترجمته وترجمة أبيه، وهي نسبة إلى وصّاف بن عامر العجلي كما قال البخاري في "تاريخه الكبير" 5/ 402، وقاله المصنف أيضًا في كتابه "المدخل إلى الصحيح" (100). وهو وأبوه ضعيفان. هو عبد الله، وأبو الأسود: هو محمد بن عبد الرحمن بن نوفل.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 6/ 292 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (189) عن محمد بن عمرو بن خالد، به.وأخرجه البيهقي 9/ 57 من طريق يعقوب بن سفيان، عن عمرو بن خالد الحراني وحسان بن عبد الله، عن ابن لَهِيعة، به.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخه" 25/ 67 من طريق الوليد بن مسلم، عن عبد الله بن لَهِيعة به.وقد روي من مرسل الزهري أيضًا كما سيأتي عند المصنف برقم (5685)، ورواه كذلك ابن إسحاق عند أبي القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (1339)، وابن عساكر 25/ 67، فيقوى الخبر باجتماع هذه المراسيل الثلاثة إن شاء الله.وذكر ذلك الواقديُّ أيضًا عن شيوخه كما في "طبقات ابن سعد" 3/ 198 و 356.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5683)


5683 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن محمد بن عبد الله البغدادي، حدثنا أبو عُلَاثة محمد بن عمرو بن خالد الحَرّاني، حدثنا أبي، حدثنا ابن لَهِيعة، حدثنا أبو الأسود، عن عُروة بن الزُّبَير، قال: طلحةُ بن عُبيد الله بن عُثمان بن عَمرو بن كَعْب بن سعْد بن تَيْم بن مُرَّة، وكان بالشام، فكَلَّم رسولَ الله صلى الله عليه وسلم في سَهْمِه، فَضَرَب له بسَهْمِه، فقال: وأجْرِي يا رسولَ الله؟ قال: "وأجرُك من يومِ بَدْرٍ" [1].




তালহা ইবনে উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [তালহা ইবনে উবাইদুল্লাহ ইবনে উসমান ইবনে আমর ইবনে কা'ব ইবনে সা'দ ইবনে তাইম ইবনে মুররা (তাঁর পূর্ণ বংশধারা)] তিনি শামে (সিরিয়ায়) ছিলেন। অতঃপর তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তাঁর (গনীমতের) অংশের বিষয়ে কথা বললেন। তখন তিনি (নবী) তাঁকে তাঁর অংশ দিলেন। অতঃপর তিনি (তালহা) বললেন: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমার কি (এর জন্য) পুরস্কারও রয়েছে? তিনি (নবী) বললেন: "তোমার পুরস্কার (তোমার সওয়াব) বদরের দিন থেকে (ধরা হবে)।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث حسن، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم كما تقدم بيانه برقم (4378). ابن لَهِيعة: هو عبد الله، وأبو الأسود: هو محمد بن عبد الرحمن بن نوفل.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 6/ 292 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (189) عن محمد بن عمرو بن خالد، به.وأخرجه البيهقي 9/ 57 من طريق يعقوب بن سفيان، عن عمرو بن خالد الحراني وحسان بن عبد الله، عن ابن لَهِيعة، به.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخه" 25/ 67 من طريق الوليد بن مسلم، عن عبد الله بن لَهِيعة به.وقد روي من مرسل الزهري أيضًا كما سيأتي عند المصنف برقم (5685)، ورواه كذلك ابن إسحاق عند أبي القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (1339)، وابن عساكر 25/ 67، فيقوى الخبر باجتماع هذه المراسيل الثلاثة إن شاء الله.وذكر ذلك الواقديُّ أيضًا عن شيوخه كما في "طبقات ابن سعد" 3/ 198 و 356.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5684)


5684 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا محمد بن محمد بن رَجَاء بن السِّنْدي، حدثنا عبد الله بن شَبِيب المَدَني [1]، حدثنا إبراهيم بن يحيى الشَّجَري، حدثنا أبي، عن خازم بن الحُسين، عن عبد الله بن أبي بكر، عن [الزُّهْري] [2] عن عبيد الله بن عبد الله بن عُتبة، عن ابن عباس، قال: أسلمَتْ أمُّ أبي بكر الصِّديق، وأمُّ عثمان، وأمُّ طلحة، وأمُّ عمّار بن ياسر، وأمُّ عبد الرحمن بن عوف، وأمُّ الزُّبير، وأسلمَ سعدٌ وأمُّه في الحياةِ [3].




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাতা, উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাতা, তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাতা, আম্মার ইবনু ইয়াসিরের মাতা, আবদুর রহমান ইবনু আউফের মাতা এবং যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাতা ইসলাম গ্রহণ করেন। আর সা‘দ (ইবনু আবী ওয়াক্কাস) ও তাঁর মাতা (নবীজীর) জীবদ্দশায় ইসলাম গ্রহণ করেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تصحّف في (م) و (ب) إلى: المزني. وأخرجه الطبراني (91) و (188) عن محمد بن أحمد بن محمد بن أبي بكر المقدِّمي، وأبو نعيم في "المعرفة" (222) و (363) من طريق أحمد بن عمرو بن أبي عاصم، كلاهما عن عبد الله بن شبيب، به. فذكر إسلام أم عثمان في الموضع الأول، وإسلام أم طلحة في الموضع الثاني.وقد أورد الحافظ ابن حجر في "الإصابة" الأمهات المذكورات، فذكر 8/ 200 أم أبي بكر واسمها أم الخير بنت صخر التيمية، وذكر 7/ 481 أم عثمان واسمها أروى بنت كريز العبشمية، وذكر 7/ 736 أم طلحة وهي الصعبة بنت الحضرمي أخت العلاء، وذكر 7/ 712 أم عمار بن ياسر وهي سمية بنت خُبّاط، وذكر 7/ 729 أم عبد الرحمن بن عوف وهي الشفاء بنت عوف الزُّهرية، وذكر 7/ 743 أم الزبير بن العوام وهي صفية بنت عبد المطلب عمَّة النبي صلى الله عليه وسلم، وقال في "فتح الباري" 11/ 288 عن أم سعد بن أبي وقاص وهي حَمْنة بنت سفيان بن أمية ابنة عم أبي سفيان: لم أرَ في شيء من الأخبار أنها أسلمت.



[2] سقط اسم الزهري من إسناد الحديث في سائر نسخنا الخطية، وهو ثابت لجميع من خَرَّج هذا الحديث. وأخرجه الطبراني (91) و (188) عن محمد بن أحمد بن محمد بن أبي بكر المقدِّمي، وأبو نعيم في "المعرفة" (222) و (363) من طريق أحمد بن عمرو بن أبي عاصم، كلاهما عن عبد الله بن شبيب، به. فذكر إسلام أم عثمان في الموضع الأول، وإسلام أم طلحة في الموضع الثاني.وقد أورد الحافظ ابن حجر في "الإصابة" الأمهات المذكورات، فذكر 8/ 200 أم أبي بكر واسمها أم الخير بنت صخر التيمية، وذكر 7/ 481 أم عثمان واسمها أروى بنت كريز العبشمية، وذكر 7/ 736 أم طلحة وهي الصعبة بنت الحضرمي أخت العلاء، وذكر 7/ 712 أم عمار بن ياسر وهي سمية بنت خُبّاط، وذكر 7/ 729 أم عبد الرحمن بن عوف وهي الشفاء بنت عوف الزُّهرية، وذكر 7/ 743 أم الزبير بن العوام وهي صفية بنت عبد المطلب عمَّة النبي صلى الله عليه وسلم، وقال في "فتح الباري" 11/ 288 عن أم سعد بن أبي وقاص وهي حَمْنة بنت سفيان بن أمية ابنة عم أبي سفيان: لم أرَ في شيء من الأخبار أنها أسلمت.



5684 [3] - إسناده ضعيف لضعف مَن بين ابن السِّنْدي وعبد الله بن أبي بكر: وهو ابن محمد بن عمرو بن حَزْم.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (3)، ومن طريقه أبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (7915)، وعبد الخالق بن أسد الحنفي في "معجمه" (303)، وابن عساكر في "تاريخه" 25/ 66 عن محمد بن أحمد بن محمد بن أبي بكر المُقدِّمي، عن عبد الله بن شَبيب المدني، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (23) و (119) عن عبد الله بن شبيب، به. فذكر إسلام أم أبي بكر في الموضع الأول، وإسلام أم عثمان في الموضع الثاني. وأخرجه الطبراني (91) و (188) عن محمد بن أحمد بن محمد بن أبي بكر المقدِّمي، وأبو نعيم في "المعرفة" (222) و (363) من طريق أحمد بن عمرو بن أبي عاصم، كلاهما عن عبد الله بن شبيب، به. فذكر إسلام أم عثمان في الموضع الأول، وإسلام أم طلحة في الموضع الثاني.وقد أورد الحافظ ابن حجر في "الإصابة" الأمهات المذكورات، فذكر 8/ 200 أم أبي بكر واسمها أم الخير بنت صخر التيمية، وذكر 7/ 481 أم عثمان واسمها أروى بنت كريز العبشمية، وذكر 7/ 736 أم طلحة وهي الصعبة بنت الحضرمي أخت العلاء، وذكر 7/ 712 أم عمار بن ياسر وهي سمية بنت خُبّاط، وذكر 7/ 729 أم عبد الرحمن بن عوف وهي الشفاء بنت عوف الزُّهرية، وذكر 7/ 743 أم الزبير بن العوام وهي صفية بنت عبد المطلب عمَّة النبي صلى الله عليه وسلم، وقال في "فتح الباري" 11/ 288 عن أم سعد بن أبي وقاص وهي حَمْنة بنت سفيان بن أمية ابنة عم أبي سفيان: لم أرَ في شيء من الأخبار أنها أسلمت.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5685)


5685 - أخبرنا إسماعيل بن محمد بن الفضل، حدثنا جدّي، حدثنا إبراهيم بن المُنذِر، حدثنا محمد بن فُليح، عن موسى بن عُقبة، عن ابن شِهاب، قال: قَدِمَ طلحةُ بن عُبيد الله بن عثمان بن عمرو بن كعب بن سعد بن تَيْم [1] بن مُرّة من الشام بعدما رجع النبيُّ صلى الله عليه وسلم من بدرٍ، فكَلَّم النبيَّ صلى الله عليه وسلم: في سَهْمِه، فقال له النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "لك سَهمُك" قال: وأَجري يا رسولَ الله؟ قال: "ولكَ أجرُك" [2].




তালহা ইবনু উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদর থেকে ফিরে আসার পর তালহা ইবনু উবাইদুল্লাহ ইবনু উসমান ইবনু আমর ইবনু কা'ব ইবনু সা'দ ইবনু তাইম ইবনু মুররাহ শাম (সিরিয়া) থেকে এলেন। তিনি নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তাঁর (যুদ্ধলব্ধ সম্পদের) অংশ নিয়ে কথা বললেন। নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "তোমার অংশ তোমার জন্য রইল।" তিনি (তালহা) বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার সওয়াব কি পাব? তিনি (নাবী) বললেন: "তোমার সওয়াবও তোমার জন্য রইল।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) و (ب) إلى: تميم.



[2] حديث حسن، وهذا إسناد رجاله ليس بهم بأس، لكنه مرسلٌ، وانظر ما سلف برقم (5683).وأخرجه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (359) من طريق زكريا بن الخليل التُّسْتَري، عن إبراهيم بن المنذر، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (345) عن يعقوب بن حميد بن كاسب، وابن عساكر 25/ 67 من طريق هارون بن موسى الفَرْويّ، كلاهما عن محمد بن فُليح، به.وأخرجه البيهقي 6/ 292، وابن عساكر 25/ 67 من طريق إسماعيل بن إبراهيم بن عُقبة عن عمَّه موسى بن عقبة، فذكره لم يذكر فيه ابنَ شهابٍ الزهري.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5686)


5686 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن أحمد بن بُطّة، حدثنا الحسن بن جَهْم، حدثنا الحُسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عُمر، عن الضحاك بن عثمان، حدَّثه مَخْرمةُ بن سُليمان الوالِبيّ، عن إبراهيم بن محمد بن طلحة، قال: قال طلحة بن عُبيد الله: حضرتُ سوقَ بُصْرى، فإذا راهبٌ في صَومعَتِه يقول: سَلُوا أهلَ هذا المَوسِم: أفيهم أحدٌ من أهلِ الحَرَم؟ قال طلحةُ: قلتُ: نعم، أنا، فقال: هل ظهَرَ أحمدُ بعدُ؟ قال قلتُ: ومن أحمدُ؟ قال: ابن عبد الله بن عبد المطّلب، هذا شَهرُه الذي يَخرُج فيه، وهو آخِرُ الأنبياء، مَخرَجُه من الحَرَم ومُهاجَرُه إلى نَخْل وحَرّةٍ وسِباخٍ، فإياكَ أَن تُسبَقَ إليه، قال طلحةُ: فوَقَع في قَلْبي ما قال، فخرجتُ سريعًا حتى قَدِمتُ مكةَ، فقلت: هل كان من حَدَثٍ؟ قالوا: نعم، محمد بن عبد الله الأمينُ تَنبّأ وقد تَبِعَه ابن أَبِي قُحَافَة، قال: فخرجتُ حتى دخلتُ على أبي بكر، فقلتُ: اتّبعتَ هذا الرجلَ؟ قال: نعم، فانطَلِقْ إليه فادخُل عليه فاتَّبِعْه، فإنه يَدعُو إلى الحقِّ، فأخبَرَه طلحةُ بما قال الراهبُ، فخرج أبو بكر بطلحةَ، فدخَلَ به على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأسلَمَ، طلحةُ، وأخبرَ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم بما قال الراهبُ، فسُرَّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فلما أسلمَ أبو بكر وطلحةُ أخذَهما نوفلُ بن خُوَيلد بن العَدَوية فشدَّهُما في حَبْلٍ واحدٍ، ولم يَمنَعْهما بنو تَيْم، وكان نوفلُ بن خُوَيلد يُدعَى أسَدَ قُريش، فلذلك سُمِّي أبو بكر وطلحة القَرِينَين.ولم يشهد طلحةُ بن عُبيد الله بدرًا، وذلك أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم كان وجَّهَه وسعيدَ بن زيد يتحَسّسان خَبرَ العِيرِ، فانصرَفا وقد فَرَغَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم مِن قتالِ مَن لَقيَه من المُشركين، فلَقِيَاه بتُرْبان [1] فيما بين مَلَلٍ [2] وسَيَالةَ على المَحبَّة مُنصرِفًا من بدر، ولكنه شهد أُحدًا وغيرَ ذلك من المشاهِد مع رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، وكان ممَّن ثَبَتَ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم يومَ أُحُد حين وَلّى الناسُ وبايَعَه على الموتِ، ورَمَى مالكُ بنُ زُهَير رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يومَئذٍ فاتَّقى طلحةُ بيدِه وجْهَ رسول الله صلى الله عليه وسلم فأصابَ خِنْصَرَه فَشَلَّتْ، فقال: حَسِّ حَسِّ، حين أصابتْه الرَّمْية، فذُكِر أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قال: "لو قال: باسمِ الله، لدَخَل الجنةَ والناسُ يَنظُرون"، وضُرِبَ طلحةُ يومَئِذٍ في رأسِه المُصلَّبةَ [3]، ضَرَبه رجلٌ من المشركين ضربَتين: ضربةً وهو مُقبِل، وضربةً وهو مُعرِض عنه، وكان ضِرارُ بن الخَطّاب الفِهْريُّ يقول: أنا واللهِ ضربتُه يومئذٍ [4].5686/ 1 - فقال ابن عُمر: وكان طلحةُ يُكنى أبا محمد، وأمُّه الصعبةُ ابنةُ عبد الله الحَضْرمي، وقُتل طلحةُ يومَ الجَمَل، قَتَله مَروانُ بن الحَكَم، وكان له ابنٌ يقال له: محمدٌ، وهو الذي يُدعَى السَّجَّادَ، وبه كان طلحةُ يُكنى، قُتِل مع أبيه طلحةَ يومَ الجَمَل، وكان طلحةُ قديمَ الإسلام [5]. 5686/ 2 - قال ابن عمر: فحدَّثني إسحاقُ بن يحيى، عن جَدّته سُعْدَى بنت عَوف المُرِّيَّة أمِّ يحيى بن طلحة، قالت: قُتل طلحةُ بنُ عُبيد الله وفي يدِ خازِنِه ألفُ ألفِ دِرهم ومئتا ألفِ دِرهم، وقُوِّمت أصولُه وعَقَارُه بثلاثين ألفَ ألفِ دِرهم [6]، وكان فيما ذُكر جَوَادًا بالمالِ واللِّبْسِ والطعامِ، وقُتِل يومَ قُتِل وهو ابن اثنتَين وسِتِّين سنةً [-4].5686/ 3 - قال ابن عمر: وحدَّثنا أسدُ بن إبراهيم بن محمد بن طلحة، عن محمد بن زيد بن المُهاجِر، قال: كان طلحةُ يومَ قُتل ابنَ أربعٍ وستين سنةً [-4].




তালহা ইবনু উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি বুসরার বাজারে উপস্থিত ছিলাম। হঠাৎ দেখলাম একজন সন্ন্যাসী (রাহিব) তাঁর মঠের ভেতরে বলছেন: এই মৌসুমের লোকদের জিজ্ঞাসা করো, তাদের মধ্যে হারামের (মক্কার) কোনো লোক আছে কি? তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি বললাম, হ্যাঁ, আমি আছি। তখন সন্ন্যাসী জিজ্ঞাসা করলেন: আহমাদ কি ইতোমধ্যে আত্মপ্রকাশ করেছেন? আমি বললাম: আহমাদ কে? তিনি বললেন: আব্দুল্লাহ ইবনু আব্দুল মুত্তালিবের পুত্র। এটিই সেই মাস যখন তিনি আত্মপ্রকাশ করবেন। তিনি হবেন শেষ নবী। তাঁর আবির্ভাবস্থল হারাম (মক্কা) এবং হিজরতের স্থান হলো খেজুর গাছ, কালো পাথরযুক্ত ভূমি (হাররা) এবং লবণাক্ত ভূমিবিশিষ্ট স্থান। খবরদার! তুমি যেন তাঁর কাছে পৌঁছাতে অন্যদের চেয়ে পিছিয়ে না পড়ো।

তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সন্ন্যাসীর কথা আমার অন্তরে প্রভাব ফেলল। আমি দ্রুত মক্কা অভিমুখে রওনা হলাম। মক্কায় পৌঁছে আমি জিজ্ঞাসা করলাম: কোনো নতুন ঘটনা ঘটেছে কি? তারা বলল: হ্যাঁ, আমীন (বিশ্বস্ত) মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ নবী বলে দাবি করেছেন এবং আবূ কুহাফার পুত্র (আবূ বকর) তাঁর অনুসরণ করেছেন।

তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এরপর আমি আবূ বকরের নিকট গেলাম এবং বললাম: আপনি কি এই ব্যক্তির অনুসরণ করেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ। তুমি তাঁর কাছে চলো, তাঁর কাছে যাও এবং তাঁর অনুসরণ করো। কারণ তিনি সত্যের দিকে আহ্বান করেন। এরপর তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সন্ন্যাসীর বলা কথাগুলো আবূ বকরকে জানালেন। তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নিয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট গেলেন। তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইসলাম গ্রহণ করলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সন্ন্যাসীর কথাগুলো জানালেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাতে অত্যন্ত আনন্দিত হলেন।

যখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইসলাম গ্রহণ করলেন, তখন নাওফাল ইবনু খুওয়াইলিদ ইবনুল আদাওয়িয়্যাহ তাদেরকে ধরে একটি রশি দিয়ে একসাথে বেঁধে ফেলল। বনু তাইম গোত্র তাদেরকে বাধা দিল না। নাওফাল ইবনু খুওয়াইলিদকে 'আসাদুল কুরাইশ' (কুরাইশের সিংহ) বলা হতো। এই কারণে আবূ বকর ও তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে 'আল-ক্বারীনাইন' (দুই জোড়া) নামে ডাকা হতো।

তালহা ইবনু উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেননি। কারণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে ও সাঈদ ইবনু যায়িদকে (কুরাইশদের) কাফেলার খবর জানতে পাঠিয়েছিলেন। তারা ফিরে এসে দেখলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুশরিকদের সাথে যুদ্ধ সমাপ্ত করেছেন। বদ্‌র থেকে প্রত্যাবর্তনের সময় মালল ও সিয়ালার মধ্যবর্তী স্থানে তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সাক্ষাৎ করলেন। তবে তিনি উহুদসহ অন্যান্য যুদ্ধে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে অংশগ্রহণ করেছেন। উহুদের দিন যখন লোকেরা পিছু হটে যাচ্ছিল, তখন তিনি তাদের মধ্যে ছিলেন যারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে দৃঢ় ছিলেন এবং মৃত্যুর উপর বাইয়াত (শপথ) করেছিলেন।

সেদিন মালিক ইবনু যুহাইর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে লক্ষ্য করে তীর নিক্ষেপ করেছিল। তখন তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিজের হাত দিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারাকে রক্ষা করলেন, ফলে তীর তাঁর কনিষ্ঠ আঙুলে আঘাত করল এবং তা পঙ্গু হয়ে গেল। যখন তাঁর আঘাত লাগল, তখন তিনি ব্যথায় "হাস্সি! হাস্সি!" বলে চিৎকার করে উঠলেন। উল্লেখ করা হয়েছে যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন বললেন: "যদি সে (আঘাত লাগার সময়) 'বিসমিল্লাহ' বলত, তবে সে জান্নাতে প্রবেশ করত, আর লোকেরা তা দেখত।" সেদিন তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তাঁর মাথায় কঠিন আঘাত করা হয়েছিল। একজন মুশরিক তাঁকে দু’বার আঘাত করেছিল: একবার যখন তিনি সামনে ছিলেন, আরেকবার যখন তিনি তাঁর দিক থেকে মুখ ফিরিয়ে নিচ্ছিলেন। (বর্ণিত আছে) যে, যিরার ইবনুল খাত্তাব আল-ফিহরি বলতেন: আল্লাহর কসম, আমিই সেদিন তাঁকে আঘাত করেছিলাম।

ইবনু উমার বললেন: তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কুনিয়াত (উপনাম) ছিল আবূ মুহাম্মাদ। তাঁর মাতা ছিলেন আস-সা'বা বিনতু আব্দুল্লাহ আল-হাযরামিয়্যাহ। তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জুমালের (উষ্ট্রের) যুদ্ধের দিন শহীদ হন। তাঁকে মারওয়ান ইবনুল হাকাম হত্যা করেন। তাঁর এক পুত্র ছিল, যার নাম ছিল মুহাম্মাদ, তাঁকে আস-সাজ্জাদ (অধিক সিজদাকারী) বলা হতো এবং এই নামেই তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কুনিয়াত ছিল। মুহাম্মাদ তাঁর পিতা তালহার সাথেই জুমালের যুদ্ধে নিহত হন। তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রাচীন ইসলাম গ্রহণকারীদের একজন ছিলেন।

ইবনু উমার বললেন: ইসহাক ইবনু ইয়াহইয়া তাঁর দাদী সা'দা বিনতু আউফ আল-মুরিয়্যাহ (ইয়াহইয়া ইবনু তালহার মাতা) থেকে বর্ণনা করেন, তিনি বলেছেন: তালহা ইবনু উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন নিহত হন, তখন তাঁর কোষাধ্যক্ষের হাতে দশ লক্ষ দুই লক্ষ (অর্থাৎ বারো লক্ষ) দিরহাম ছিল। আর তাঁর স্থাবর ও মূল সম্পত্তি ত্রিশ মিলিয়ন দিরহাম (তিন কোটি দিরহাম) মূল্যমান করা হয়েছিল। বলা হয়েছে যে, তিনি অর্থ, পোশাক ও খাদ্যের ক্ষেত্রে অত্যন্ত দানশীল ছিলেন। তিনি যখন শহীদ হন, তখন তাঁর বয়স ছিল বাষট্টি বছর।

ইবনু উমার বললেন: আসাদ ইবনু ইবরাহীম ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু তালহা, মুহাম্মাদ ইবনু যায়িদ ইবনুল মুহাজির থেকে বর্ণনা করে বলেছেন: তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন শহীদ হন, তখন তাঁর বয়স ছিল চৌষট্টি বছর।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ص) و (م) إلى: بترمان، وتُرْبان: وادٍ من روافد وادي مَلَل، يأخُذ من ثنايا مفرحات على (24) كيلًا ثم يدفع جنوبًا غربيًا حتى يصبّ في فرش مَلَل، يأخذه الطريق من المدينة إلى مكة من رأسِه إلى مَصبِّه. انظر "معجم المعالم الجغرافية في السيرة النبوية" لعاتق بن غيث ص 61 - 62. الذي مرَّ في تربان. انظر "معجم المعالم الجغرافية" ص 164.



[2] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: طلل، غير أنَّ الطاء أُعجمت في (ب)، والتصويب من "مغازي الواقدي" 1/ 20، ومن "طبقات ابن سعد" 3/ 198، ومن كتب البلدان مثل "معجم البلدان" 5/ 194. ومَلَل: وادٍ ينقضّ من جبال قُدْس، فيمر على نحو من أربعين كيلًا جنوب المدينة. انظر "معجم المعالم الجغرافية" للبلادي ص 209.وسَيَالة: محطة لرسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم اتخذها الحاجُّ محطّة، غُيِّر اسمُها فسميت بئار الصفا، لأنَّ آبارها منحوتة في صخر، وقد أُطلق عليها بئر مرزوق، تبعد (47) كيلًا عن المدينة على الطريق الذي مرَّ في تربان. انظر "معجم المعالم الجغرافية" ص 164.



5686 [3] - أي: صارت الضربتان في رأسِه تُشكِّلان صَلِيبًا.



5686 [4] - إسناده ضعيف، تفرد به محمد بن عمر الواقدي متكلَّم فيه، وقد تفرَّد به، ولا يحتج بما يتفرد به، ثم إنه مرسل، إبراهيم بن محمد بن طلحة لم يدرك جدّه.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 165 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. مختصرًا بالقصة الأولى إلى قوله: ولذلك سمّي أبو بكر وطلحة القرينين.وهو عند ابن سعد في "طبقاته" 3/ 196 عن محمد بن عمر الواقدي، به بالقصة الأولى كذلك.وأخرجه البيهقي 2/ 166 - 167 من طريق عبيد الله بن إسحاق الطلحي، عن محمد بن عمر الواقدي، به بالقدر المذكور أيضًا.أما إصابة يد طلحة يوم أُحد فثابتٌ من حديث قيس بن أبي حازم، قال: رأيت طلحة يدَه شَلّاءَ وقى بها رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يوم أُحُدٍ. أخرجه أحمد 3/ (1385)، والبخاري (3724).



5686 [5] - وذكر مثلَه ابن سعد في "طبقاته" 3/ 196، وكان ابن سعد صاحِبَ الواقديِّ وكاتبه.وقد جاء قتلُ مروانَ بن الحكم لطلحة بن عبيد الله يومَ الجمل عن غير واحد كما سيأتي لاحقًا عند المصنف.



5686 [6] - من قوله: وقُوِّمت، إلى هنا ثبت في (ز) و (ب)، وهو ثابت في "طبقات ابن سعد" 3/ 203، ولم يرد في (ص) و (م)، وأشير إليه في (ز) بإشارة الحذف: لا - إلى. الحِزامي، كما في سائر مصادر التخريج.



5686 [-4] - إسناده ضعيفٌ جدًّا من أجل ابن عمر - وهو الواقدي - فليس هو بعمدة فيما يتفرد به، وشيخُه إسحاق بن يحيى - وهو ابن طلحة بن عُبيد الله - ضعيفٌ جدًّا.وهو في "طبقات ابن سعد" 3/ 203، عن محمد بن عمر الواقدي، به غير أنه جاء في روايته: وفي يد خازنه ألفا ألف درهم ومئتا ألف درهم، ولم يذكر فيه: وكان فيما ذُكر جوادًا … إلى آخره. وقد اختُلف في سنِّ طلحة يومَ توفي، فهذا الذي وقع هنا أسنده الواقدي كما في "طبقات ابن سعد" 3/ 205 عن إسحاق بن يحيى بن طلحة بن عبيد الله عن عيسى بن طلحة.وقيل: سنُّه يوم مات ستون سنة، وقيل: كان ابن أربع وستين كما أسنده الواقدي أيضًا بعده، وهذا أصح ما قيل في ذلك، وهو يوافق ما تقدَّم برقم (5680) أنَّ طلحة كان والزبير بن العَوَّام في سنٍّ واحدٍ، وكلاهما قُتِل يوم الجمل، وسنُّ الزبير يوم مات كان أربعًا وستين سنة كما تقدَّم. الحِزامي، كما في سائر مصادر التخريج.



5686 [-4] - وأخرجه ابن سعد في "طبقاته" 3/ 205، وأخرجه الطبراني في "الكبير" (199)، وابن عساكر 25/ 120 من طريق إبراهيم بن المنذر، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (378) من طريق أبي أيوب المنقري - وهو سليمان بن داود الشاذكوني - ثلاثتهم (ابن سعد وابن المنذر والشاذكوني) عن محمد بن عمر الواقدي، عن محمد بن إسماعيل بن إبراهيم بن محمد بن طلحة، عن محمد بن زيد بن المهاجر … هكذا سموا شيخ الواقدي محمد بن إسماعيل إبراهيم، فهذا هو الصحيح، وما وقع عند المصنف في روايته من تسميته أسدًا وهمٌ. الحِزامي، كما في سائر مصادر التخريج.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5687)


5687 - أخبرنا الشيخ أبو بكر أحمد بن إسحاق، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا الزُّبير بن بَكّار، حدثني إبراهيم بن المُنذر [1]، عن عبد العزيز بن عِمران، حدثني إسحاق بن يحيى بن طلحة، عن عمِّه موسى بن طلحة، قال: كان طلحةُ بن عُبيد الله أبيضَ يَضرِبُ إلى الحُمْرة، مَربُوعًا هو إلى القِصَر أقربُ، رَحْبَ الصَّدرِ، عَرِيضَ المَنكِبَين، إذا الْتَفَتَ الْتَفَتَ جميعًا، ضَخْمَ القَدَمين، حَسَنَ الوَجْهِ، دَقِيقَ العِرْنِينِ، إذا مشى أسرَعَ، وكان لا يُغيِّر شَعْرَه [2].




তালহা ইবনে উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ছিলেন ফর্সা, যার মাঝে লালচে আভা ছিল। তিনি ছিলেন মধ্যম আকৃতির, তবে বেঁটের দিকেই বেশি ঝুঁকে থাকা। তিনি ছিলেন প্রশস্ত বক্ষ এবং চওড়া কাঁধের অধিকারী। যখন তিনি ফিরতেন, তখন তিনি সম্পূর্ণ শরীর ঘুরিয়ে ফিরতেন। তার পদযুগল ছিল স্থূল, মুখমণ্ডল ছিল সুন্দর, আর নাকের ডগা ছিল সূক্ষ্ম। যখন তিনি চলতেন, দ্রুত চলতেন। আর তিনি তার চুল পরিবর্তন করতেন না (অর্থাৎ, সাদা হওয়া চুল কালো করতেন না)।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: الجنيد، وإنما الصحيح المنذر، فهو إبراهيم بن المنذر الحِزامي، كما في سائر مصادر التخريج.



[2] إسناده ضعيف، عبد العزيز بن عمران -وهو ابن عبد العزيز الزهري- وإسحاق بن يحيى بن طلحة ضعيفان.وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (1341)، والطبراني في "الكبير" (191)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (366)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 63 من طريق علي بن عبد العزيز، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5688)


5688 - أخبرني محمد بن يعقوب الحافظ، أخبرنا محمد بن إسحاق الثَّقَفي، حدثنا عباد بن الوليد الغُبَري [1]، حدثنا حَبّان، حدثنا شريك بن الخَطّاب [2]، حدثني عُتْبة بن صَعْصَعةَ بن الأحْنَف، عن عِكْراشٍ، قال: كنا نُقاتل عليًّا مع طلحةَ ومعنا مَروانُ، قال: فانهزَمْنا، قال: فقال مَروانُ: لا أُدرِكُ بثَأْري بعد هذا اليوم من طلحةَ، قال: فرَمَاهُ بسهمٍ فقَتَله [3].




ইকরাশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা ত্বলহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিরুদ্ধে যুদ্ধ করছিলাম এবং মারওয়ান আমাদের সাথে ছিল। তিনি বলেন, অতঃপর আমরা পরাজিত হলাম। তিনি বলেন, তখন মারওয়ান বলল: আজকের দিনের পর আমি ত্বলহা থেকে আর আমার প্রতিশোধ নিতে পারব না। তিনি বলেন, অতঃপর সে (মারওয়ান) তাঁকে (ত্বলহাকে) একটি তীর নিক্ষেপ করে হত্যা করল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تصحف في (ز) و (ب) إلى: العنزي، وأهملت في (ص) و (م)، والتصويب من "المؤتلف والمختلف" للدارقطني 3/ 1729، ومن "الأنساب" للسمعاني نسبة (الغبري).



[2] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: الحباب، والتصويب من "تاريخ البخاري الكبير" 7/ 89 - 90 حيث ذكر هذا الخبر من طريقين عن شريك بن الخطاب، وكذلك سُمي في مصادر ترجمته.



5688 [3] - إسناده محتمل للتحسين من أجل عتبة بن صعصعة، فهو -وإن لم يرو عنه غير شريك بن الخَطَّاب- ذكره ابن حبان في ثقات التابعين 5/ 250.وأخرجه البخاري تعليقًا في "تاريخه الكبير" 7/ 89 - 90 عن شيخين من شيوخه، عن شريك بن الخطاب، به.وانظر ما بعده وما تقدم برقم (5686 م).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5689)


5689 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا العباس بن محمد الدُّوْري، حدثنا أشْهَل بن حاتم، عن ابن عَون، قال: قال نافعٌ: طلحةُ بن عُبيد الله قتلَه مروانُ بن الحَكَم [1].




নাফে' থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: তালহা ইবনু উবাইদিল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে মারওয়ান ইবনুল হাকাম হত্যা করেছে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم، لكنه مرسل، لأنَّ نافعًا لم يدرك أيام الجمل. ابن عون: هو عبد الله بن عون بن أَرْطبان.وأخرجه ابن سعد 3/ 204، والبَلاذُري في "أنساب الأشراف" 10/ 126 من طريق رَوح بن عُبادة، عن ابن عون، به.وأخرجه ابن سعد 7/ 24 من طريق جويرية بن أسماء، عن نافع. ابن طلحة بن عُبيد الله التيمي - فهو واهي الحديث، وأنكر حديثَه هذا أبو زرعة الرازي كما في "العلل" لابن أبي حاتم (1539).وأخرجه أبو زرعة الرازي كما في "الضعفاء" في أجوبته على أسئلة البَرْذعي 2/ 700، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 3/ 165، والدولابي في "الكنى" (70)، والطبري في الجزء المفرد من "تهذيب الآثار" (667)، وابن حبان في "المجروحين" 2/ 60، وأبو نعيم في "الطب النبوي" (357) و (790)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 56 - 57، وأبو محمد عبد الله بن علي الطامذي في "فوائده" (8) من طريق عبيد الله بن محمد بن حفص العيشي، بهذا الإسناد. وقال الطبري: هذا خبر عندنا صحيحٌ سندُه!وأخرجه البزار (949)، والطبري (666) عن سليمان بن عبد الرحمن بن حماد، عن أبيه، به. وأخرجه يعقوب بن شيبة كما في "تحفة الأشراف" للمزي 4/ 215، والدولابي في "الكنى" (69)، والطبري في "التهذيب" (668)، والطبراني في "المعجم الكبير" (219)، وأبو نعيم في "الطب النبوي" (356) و (792)، والخطيب البغدادي في "المتفق والمفترق" (234)، وابن الجوزي في "العلل المتناهية" (1085)، وضياء الدين المقدسي في "المختارة" 3/ (839) من طريق سليمان بن أيوب بن سليمان بن عيسى بن موسى بن طلحة بن عُبيد الله، عن أبيه، عن جده، عن موسى بن طلحة، عن طلحة بن عُبيد الله، بلفظ: "دُونَكها أبا محمد، فإنها تشُدُّ القلبَ، وتُطيِّب النفسَ، وتَذهَبُ بلَطْخِ الصَّدْر". وفي رواية: "بِطَخَاوة الصدر"، وفي أخرى: "بِطَخاء الصدر". ووقع في مطبوع "العلل المتناهية" سقط في إسناد الحديث.وهذا إسناد ضعيف، فأحاديث سليمان بن أيوب الطلحي عن أبيه عن جده عن موسى بن طلحة عن أبيه، نسخةٌ وفي بعض رواتها جهالة وفيها بعض المناكير، ومع ذلك قال يعقوب بن شيبة كما في "التحفة" للمزي (5004): أحاديثها عندي صحاح!وروى الخَلّال في "علله" كما في "لسان الميزان" للحافظ ابن حجر 5/ 98 عن مُهنّأ بن يحيى، عن أبي يوسف يعقوب بن القاسم بن محمد بن يحيى بن زكريا بن طلحة، عن عبد الله بن كثير أبي سعيد، عن عبد الملك بن يحيى بن عبّاد، عن عبد الله بن الزبير: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان في يده سفرجلة، فجاء طلحة فقال: "دونكها يا أبا محمد، فإنها تُجمُّ الفؤاد". وقد ذكر ابن الجوزي في "العلل المتناهية" هذه الطريق (1086)، ولم يتكلم عليها بشيءٍ، وهذا إسناد ضعيف لجهالة عبد الله بن كثير وانقطاعه بين عبد الملك بن يحيى بن عبّاد بن عبد الله بن الزبير وجدِّ أبيه عبد الله بن الزبير، فإنه لم يدركه، وعبد الملك هذا إنما يروي عن عروة بن الزبير، وذكره البخاري وابن أبي حاتم ولم يأثرا فيه جرحًا أو تعديلًا، وذكره ابن حبان في "ثقاته". وأخرجه ابن ماجه (3369) عن إسماعيل بن محمد الطلحي، عن نقيب بن حاجب، عن أبي سعيد، عن عبد الملك الزبيري، عن طلحة. كذلك في رواية ابن ماجه، ومَرَدُّ هذا الإسناد إلى الإسناد الذي قبله من حديث عبد الله بن الزبير، فإسماعيل الطلحي ليس بذاك القوي وله أوهام، وأبو سعيد: هو عبد الله بن كثير، وهو مجهول، ونقيب بن حاجب مجهول أيضًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5690)


5690 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدل، حدثنا محمد بن غالب، حدثنا يحيى بن سليمان الجُعْفي، حدثنا وكيع، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس بن أبي حازم، قال: رأيتُ مروانُ بن الحَكَم حين رَمَى طلحةَ بنَ عُبيد الله يومئذٍ، فوَقَع في رُكبَتِه فما زالَ يَسِيحُ إلى أن مات [1].




কায়েস ইবনু আবী হাযিম থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মারওয়ান ইবনুল হাকামকে দেখেছি, যখন সে সেদিন তালহা ইবনু উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তীর নিক্ষেপ করেছিল। তীরটি তাঁর হাঁটুতে আঘাত হানে, এরপর তিনি মৃত্যুবরণ করা পর্যন্ত রক্তক্ষরণ হতে থাকে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسنٌ من أجل يحيى بن سليمان الجعفي، وقد توبع، فالخبر صحيح.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (201)، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 112 عن أحمد بن يحيى بن خالد بن حَيّان، عن يحيى بن سليمان الجُعفي، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي شيبة 11/ 101 و 15/ 275، وعنه البَلاذُري 3/ 43 و 10/ 126، وأخرجه أبو بكر الخلال في "السنة" (839)، وابن عساكر 25/ 112 من طرق عن وكيع، به.وأخرجه ابن سعد 3/ 204، وابن أبي شيبة 3/ 389 و 15/ 289، والبلاذري 3/ 43 - 44 و 10/ 128، وابن عساكر 25/ 124 من طريق أبي أسامة حماد بن أسامة، وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 361 من طريق علي بن مُسهِر، كلاهما عن إسماعيل بن أبي خالد، به. ابن طلحة بن عُبيد الله التيمي - فهو واهي الحديث، وأنكر حديثَه هذا أبو زرعة الرازي كما في "العلل" لابن أبي حاتم (1539).وأخرجه أبو زرعة الرازي كما في "الضعفاء" في أجوبته على أسئلة البَرْذعي 2/ 700، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 3/ 165، والدولابي في "الكنى" (70)، والطبري في الجزء المفرد من "تهذيب الآثار" (667)، وابن حبان في "المجروحين" 2/ 60، وأبو نعيم في "الطب النبوي" (357) و (790)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 56 - 57، وأبو محمد عبد الله بن علي الطامذي في "فوائده" (8) من طريق عبيد الله بن محمد بن حفص العيشي، بهذا الإسناد. وقال الطبري: هذا خبر عندنا صحيحٌ سندُه!وأخرجه البزار (949)، والطبري (666) عن سليمان بن عبد الرحمن بن حماد، عن أبيه، به. وأخرجه يعقوب بن شيبة كما في "تحفة الأشراف" للمزي 4/ 215، والدولابي في "الكنى" (69)، والطبري في "التهذيب" (668)، والطبراني في "المعجم الكبير" (219)، وأبو نعيم في "الطب النبوي" (356) و (792)، والخطيب البغدادي في "المتفق والمفترق" (234)، وابن الجوزي في "العلل المتناهية" (1085)، وضياء الدين المقدسي في "المختارة" 3/ (839) من طريق سليمان بن أيوب بن سليمان بن عيسى بن موسى بن طلحة بن عُبيد الله، عن أبيه، عن جده، عن موسى بن طلحة، عن طلحة بن عُبيد الله، بلفظ: "دُونَكها أبا محمد، فإنها تشُدُّ القلبَ، وتُطيِّب النفسَ، وتَذهَبُ بلَطْخِ الصَّدْر". وفي رواية: "بِطَخَاوة الصدر"، وفي أخرى: "بِطَخاء الصدر". ووقع في مطبوع "العلل المتناهية" سقط في إسناد الحديث.وهذا إسناد ضعيف، فأحاديث سليمان بن أيوب الطلحي عن أبيه عن جده عن موسى بن طلحة عن أبيه، نسخةٌ وفي بعض رواتها جهالة وفيها بعض المناكير، ومع ذلك قال يعقوب بن شيبة كما في "التحفة" للمزي (5004): أحاديثها عندي صحاح!وروى الخَلّال في "علله" كما في "لسان الميزان" للحافظ ابن حجر 5/ 98 عن مُهنّأ بن يحيى، عن أبي يوسف يعقوب بن القاسم بن محمد بن يحيى بن زكريا بن طلحة، عن عبد الله بن كثير أبي سعيد، عن عبد الملك بن يحيى بن عبّاد، عن عبد الله بن الزبير: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان في يده سفرجلة، فجاء طلحة فقال: "دونكها يا أبا محمد، فإنها تُجمُّ الفؤاد". وقد ذكر ابن الجوزي في "العلل المتناهية" هذه الطريق (1086)، ولم يتكلم عليها بشيءٍ، وهذا إسناد ضعيف لجهالة عبد الله بن كثير وانقطاعه بين عبد الملك بن يحيى بن عبّاد بن عبد الله بن الزبير وجدِّ أبيه عبد الله بن الزبير، فإنه لم يدركه، وعبد الملك هذا إنما يروي عن عروة بن الزبير، وذكره البخاري وابن أبي حاتم ولم يأثرا فيه جرحًا أو تعديلًا، وذكره ابن حبان في "ثقاته". وأخرجه ابن ماجه (3369) عن إسماعيل بن محمد الطلحي، عن نقيب بن حاجب، عن أبي سعيد، عن عبد الملك الزبيري، عن طلحة. كذلك في رواية ابن ماجه، ومَرَدُّ هذا الإسناد إلى الإسناد الذي قبله من حديث عبد الله بن الزبير، فإسماعيل الطلحي ليس بذاك القوي وله أوهام، وأبو سعيد: هو عبد الله بن كثير، وهو مجهول، ونقيب بن حاجب مجهول أيضًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5691)


5691 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو أُميّة الطَّرَسُوسِي، حدثنا عُبيد الله بن محمد العَيْشي، حدثنا عبد الرحمن بن حماد الطَّلْحي، حدثنا طلحة بن يحيى، عن أبيه، عن طلحة بن عُبيد الله، قال: دخلتُ على رسولِ الله صلى الله عليه وسلم وفي يدِه سَفَرجلةٌ، فرماها إليَّ - أو قال: ألقاها إليَّ - وقال: "دُونَكَها أبا محمدٍ، فإنها تُجِمُّ الفُؤادَ" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




তালহা ইবনে উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলাম। তখন তাঁর হাতে একটি বিহি (সাফরজল) ফল ছিল। তিনি সেটি আমার দিকে ছুঁড়ে মারলেন—অথবা বললেন: আমার দিকে নিক্ষেপ করলেন—এবং বললেন: "হে আবু মুহাম্মদ, এটি তুমি নাও, কারণ এটি হৃদপিণ্ডকে সতেজ করে (বা মনকে উৎফুল্ল করে)।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل عبد الرحمن بن حماد الطَّلْحي - وهو ابن عمران بن موسى ابن طلحة بن عُبيد الله التيمي - فهو واهي الحديث، وأنكر حديثَه هذا أبو زرعة الرازي كما في "العلل" لابن أبي حاتم (1539).وأخرجه أبو زرعة الرازي كما في "الضعفاء" في أجوبته على أسئلة البَرْذعي 2/ 700، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 3/ 165، والدولابي في "الكنى" (70)، والطبري في الجزء المفرد من "تهذيب الآثار" (667)، وابن حبان في "المجروحين" 2/ 60، وأبو نعيم في "الطب النبوي" (357) و (790)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 56 - 57، وأبو محمد عبد الله بن علي الطامذي في "فوائده" (8) من طريق عبيد الله بن محمد بن حفص العيشي، بهذا الإسناد. وقال الطبري: هذا خبر عندنا صحيحٌ سندُه!وأخرجه البزار (949)، والطبري (666) عن سليمان بن عبد الرحمن بن حماد، عن أبيه، به. وأخرجه يعقوب بن شيبة كما في "تحفة الأشراف" للمزي 4/ 215، والدولابي في "الكنى" (69)، والطبري في "التهذيب" (668)، والطبراني في "المعجم الكبير" (219)، وأبو نعيم في "الطب النبوي" (356) و (792)، والخطيب البغدادي في "المتفق والمفترق" (234)، وابن الجوزي في "العلل المتناهية" (1085)، وضياء الدين المقدسي في "المختارة" 3/ (839) من طريق سليمان بن أيوب بن سليمان بن عيسى بن موسى بن طلحة بن عُبيد الله، عن أبيه، عن جده، عن موسى بن طلحة، عن طلحة بن عُبيد الله، بلفظ: "دُونَكها أبا محمد، فإنها تشُدُّ القلبَ، وتُطيِّب النفسَ، وتَذهَبُ بلَطْخِ الصَّدْر". وفي رواية: "بِطَخَاوة الصدر"، وفي أخرى: "بِطَخاء الصدر". ووقع في مطبوع "العلل المتناهية" سقط في إسناد الحديث.وهذا إسناد ضعيف، فأحاديث سليمان بن أيوب الطلحي عن أبيه عن جده عن موسى بن طلحة عن أبيه، نسخةٌ وفي بعض رواتها جهالة وفيها بعض المناكير، ومع ذلك قال يعقوب بن شيبة كما في "التحفة" للمزي (5004): أحاديثها عندي صحاح!وروى الخَلّال في "علله" كما في "لسان الميزان" للحافظ ابن حجر 5/ 98 عن مُهنّأ بن يحيى، عن أبي يوسف يعقوب بن القاسم بن محمد بن يحيى بن زكريا بن طلحة، عن عبد الله بن كثير أبي سعيد، عن عبد الملك بن يحيى بن عبّاد، عن عبد الله بن الزبير: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان في يده سفرجلة، فجاء طلحة فقال: "دونكها يا أبا محمد، فإنها تُجمُّ الفؤاد". وقد ذكر ابن الجوزي في "العلل المتناهية" هذه الطريق (1086)، ولم يتكلم عليها بشيءٍ، وهذا إسناد ضعيف لجهالة عبد الله بن كثير وانقطاعه بين عبد الملك بن يحيى بن عبّاد بن عبد الله بن الزبير وجدِّ أبيه عبد الله بن الزبير، فإنه لم يدركه، وعبد الملك هذا إنما يروي عن عروة بن الزبير، وذكره البخاري وابن أبي حاتم ولم يأثرا فيه جرحًا أو تعديلًا، وذكره ابن حبان في "ثقاته". وأخرجه ابن ماجه (3369) عن إسماعيل بن محمد الطلحي، عن نقيب بن حاجب، عن أبي سعيد، عن عبد الملك الزبيري، عن طلحة. كذلك في رواية ابن ماجه، ومَرَدُّ هذا الإسناد إلى الإسناد الذي قبله من حديث عبد الله بن الزبير، فإسماعيل الطلحي ليس بذاك القوي وله أوهام، وأبو سعيد: هو عبد الله بن كثير، وهو مجهول، ونقيب بن حاجب مجهول أيضًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5692)


5692 - حدثني محمد بن مُظفَّر الحافظ - وأنا سألتُه - حدثني الحسين بن يحيى بن عياش القَطّان، حدثنا الحُسين بن بَحْر [1] البَيْرُوذي، حدثنا غالب بن حَلْبَس الكَلْبي أبو الهيثم، حدثنا جُوَيرِية بن أسماء، عن يحيى بن سعيد، حدثنا عَمِّي، قال: لما كان يومُ الجَمَل نادى عليّ في الناس: لا تَرمُوا أحدًا بسهمٍ، ولا تَطعُنوا برُمح، ولا تَضرِبوا بسيف، ولا تَطلُبوا القومَ، فإنَّ هذا مَقامٌ مَن أُفلِجَ فيه فَلَجَ [2] يومَ القيامة، قال: فتواقفنا، ثم إنَّ القومَ قالوا بأجْمعَ: يا ثاراتِ عثمانَ، قال: وابنُ الحَنفيّة أمامَنا برَتْوةٍ [3] معه اللواءُ، قال: فناداهُ عليٌّ، قال: فأقبَلَ علينا بعُرْضِ وجهِه، فقال: يا أميرَ المؤمنين، يقولون يا ثاراتِ عثمانَ، فمَدَّ عليٌّ يدَيه وقال: اللهمَّ أكِبَّ قَتَلةَ عثمانَ اليومَ لوجوههم، ثم إنَّ الزُّبيرَ قال الأَساورةٍ [4] كانوا معه: ارمُوهم برَشْقٍ، وكأنه أرادَ أن يَنْشَبَ القِتالُ، فلما نَظَرَ أصحابُه إلى الانتِشابِ لم يَنتَظِروا وحَمَلُوا فهَزَمَهم اللهُ، ورمى مَروانُ بن الحَكَم طلحةَ بن عُبيد الله بسهمٍ فشَكَّ ساقَه بجَنْب فرسِه، فقَبَضَ [5] به الفرسُ حتى لَحِقه فذَبَحَه، فالتفتَ مَروانُ إلى أبانَ بن عثمانَ وهو معه، فقال: لقد كفَيتُك أحدَ قَتَلةِ أبيك [6].




মুহাম্মদ ইবনু মুজাফ্ফার আল-হাফিজ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন জামাল-এর যুদ্ধ শুরু হলো, তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লোকদের মাঝে ঘোষণা দিলেন: তোমরা কাউকে তীর ছুঁড়বে না, বর্শা দ্বারা আঘাত করবে না, তলোয়ার দ্বারা প্রহার করবে না এবং শত্রুদের ধাওয়াও করবে না। কারণ এটি এমন একটি স্থান যেখানে যে পরাজিত হবে, সে কিয়ামতের দিন বিজয়ী হবে। বর্ণনাকারী বলেন: ফলে আমরা থেমে গেলাম। এরপর সকল লোক ঐক্যবদ্ধভাবে বলতে লাগল: ইয়া ছারাতি উসমান (ওসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর রক্তের প্রতিশোধ)! তিনি বলেন: ইবনু হানাফিয়্যা (আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পুত্র মুহাম্মদ) আমাদের সামনে এক রুতওয়া (সামান্য দূরত্ব) পরিমাণ এগিয়ে ছিলেন এবং তার হাতে ছিল ঝাণ্ডা। বর্ণনাকারী বলেন: তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে ডাকলেন। তিনি (ইবনু হানাফিয়্যা) তাঁর মুখ ঘুরিয়ে আমাদের দিকে তাকালেন এবং বললেন: হে আমীরুল মু'মিনীন! তারা বলছে, ইয়া ছারাতি উসমান! তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর দু’হাত প্রসারিত করলেন এবং বললেন: হে আল্লাহ! আজ উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হত্যাকারীদেরকে মুখ থুবড়ে ফেলে দাও। এরপর যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর সাথে থাকা আসাওয়িরাদের (একদল সেনাকে) বললেন: তাদের দিকে এক ঝাঁক তীর নিক্ষেপ করো। মনে হচ্ছিল যেন তিনি যুদ্ধ শুরু করতে চাইছিলেন। যখন তাঁর সাথীরা তীর নিক্ষেপ শুরু হতে দেখল, তখন তারা আর অপেক্ষা করল না এবং আক্রমণ করল। অতঃপর আল্লাহ তাদের পরাজিত করলেন। আর মারওয়ান ইবনু হাকাম, তালহা ইবনু উবাইদুল্লাহকে লক্ষ্য করে একটি তীর ছুঁড়লেন। তীরটি তাঁর পা বিদ্ধ করে ঘোড়ার পাশে গেঁথে গেল। ফলে ঘোড়াটি তাঁকে ধরে ফেলে (বা টেনে নিয়ে যায়) যতক্ষণ না (অন্য কেউ) তাঁর কাছে পৌঁছায় এবং তাঁকে হত্যা করে। তখন মারওয়ান, আবান ইবনু উসমানের দিকে ফিরলেন—যিনি তাঁর সাথেই ছিলেন—এবং বললেন: তোমার পিতার হত্যাকারীদের একজনের প্রতিশোধ আমি নিয়ে দিয়েছি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) و (ب) إلى: يحيى، وجاء بهامش (ز) أنه في نسخةٍ: بحر، وهو الصواب كما جاء في (ص) و (م)، وهو الحسين بن بحر بن يزيد البَيْرُوذي، له ترجمة في "تاريخ بغداد" 8/ 542.وتحرَّفت هذه النسبة في (ز) و (ب) إلى: البزوري، وفي (ص) و (م) إلى: المروزي. وبَيروذ من نواحي الأهواز.



[2] فَلَجَ بمعنى: غَلَبَ وظَفِر، والمراد: هذا مقامٌ من أظفَره اللهُ وغَلَّبَه فيه غَلَب وظَفِر يوم القيامة.



5692 [3] - تصحف في (ز) إلى: بربوة، بموحدتين، وإنما الثانية تاءٌ مثنّاة فوقانية، ومعنى الرَّتْوة: الخُطوة أو الرَّمْية، كناية عن قرب مكانه. وانظر "تاريخ الإسلام" 2/ 274.



5692 [4] - في (ز) و (م) و (ب): للأساورة. والأساورة: جمع أُسْوارٍ، وهو الرامي الحاذق.



5692 [5] - هكذا في (ز) و (ب)، ومعناه: أسرع، وفي (ص) و (م): فقبص، بالمهملة، وهو ضربٌ من العَدْو فيه نَزْو.



5692 [6] - إسناده محتمل للتحسين إن شاء الله من أجل إبهام عمِّ يحيى بن سعيد الأنصاري، وغالب بن حَلْبَس صدوق، وقد تُوبع.وأخرجه هلالٌ الحفَّار في "حديث أبي عبد الله المتُّوثي القطان عن شيوخه" (178) عن أبي عبد الله الحسين بن يحيى بن عياش المتُّوثي القطان، بهذا الإسناد.وأخرجه مطولًا ومختصرًا خليفة بن خيّاط في "تاريخه" ص 181 و 185، وعمر بن شبة في "تاريخ المدينة" 4/ 1172، والبيهقي في "السنن الكبرى" 8/ 180، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 18/ 416 و 25/ 113 من طريق وهب بن جرير، عن جويرية بن أسماء، به. وأبهم خليفةُ اسم شيخه وهب بن جرير.وقد ثبت من وجوه عن علي بن أبي طالب أنه نهى أصحابَه يوم الجمل أن يُقتل مُدبِرُهم وأن يُذفَّف على جريحهم، وأنَّ من دَخَل داره فهو آمن ومن طرح السّلاح فهو آمِن. ومن ذلك ما أخرجه سعيد بن منصور (2947)، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 3/ 56 و 57، والبيهقي 8/ 181 من طريق مروان بن الحكم وابن أبي شيبة 5/ 86 من طريق زيد بن وهب، وابن سعد 7/ 94، وابن أبي شيبة 15/ 267 من طريق محمد بن الحنفية، وابن أبي شيبة 15/ 263 و 267 من طريق عبد خير.وقتلُ مروان بن الحكم لطلحة بن عُبيد الله روي من وجوه تقدَّمت قريبًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5693)


5693 - أخبرني أبو الوليد وأبو بكر بن قُرَيش، حدثنا الحسن بن سُفيان، حدثنا أحمد [1] بن عَبْدة، حدثنا الحُسين بن الحَسن [2]، حدثنا رِفاعة بن إياس الضَّبِّي، عن أبيه، عن جده، قال: كنّا مع عليٍّ يومَ الجَمَل، فبعث إلى طلحةَ بن عُبيد الله: أنِ الْقَني، فأتاهُ طلحةُ، فقال: نَشَدتُك الله هل سمعتَ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن كنتُ مولاهُ فعَليٌّ مَولاهُ، اللهمَّ والِ من والاهُ وعادِ مَن عاداهُ"؟ قال: نعم، قال: فلم تُقاتِلُني؟ قال: لم أذكُرْ، قال: فانصَرفَ طلحةُ [3].




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (বর্ণনাকারী) বলেন: উটের যুদ্ধের দিন আমরা আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে ছিলাম। তিনি তখন তালহা ইবনু উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লোক পাঠালেন (এই বলে): আমার সাথে দেখা করো। অতঃপর তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে আসলেন। তখন (আলী) বললেন: আমি তোমাকে আল্লাহর শপথ দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, তুমি কি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছ: "আমি যার মাওলা, আলীও তার মাওলা। হে আল্লাহ! তুমি তার সাথে মিত্রতা করো, যে তার সাথে মিত্রতা করে এবং তুমি তার সাথে শত্রুতা করো, যে তার সাথে শত্রুতা করে?" তিনি (তালহা) বললেন: হ্যাঁ। (আলী) বললেন: তাহলে তুমি আমার বিরুদ্ধে যুদ্ধ করছ কেন? তিনি (তালহা) বললেন: আমার মনে ছিল না। অতঃপর তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফিরে গেলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) و (ب) إلى: محمد. وإنما هو أحمد بن عَبْدة بن موسى الضَّبِّي.



[2] انقلب هذا الاسم في أصول "المستدرك" إلى: الحَسن بن الحُسين، ممّا دعا الذهبي في "تلخيصه" إلى القول بأنه العُرَني، وإنما هو الحُسين بن الحسن الأشقر الفَزاري، كما رواه غيرُ واحد عن أحمد بن عَبْدة الضَّبِّي.



5693 [3] - إسناده ضعيف لضعف الحُسين بن الحَسن: وهو الأشقر الفَزاري.وأخرجه ابن أبي عاصم في "السنة" (1358)، والبزار (958)، والنسائي في "مسند علي" كما في "تهذيب الكمال" للمزي 3/ 441، وجزء "طرق حديث من كنت مولاه فعليٌّ مولاه" للذهبي (49)، كلهم عن أحمد بن عَبْدة الضَّبِّي، وكذلك أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 108 من طريق قاسم بن زكريا عن أحمد بن عَبْدة الضَّبِّي، بهذا الإسناد.على أنَّ المرفوع من هذا الخبر قد صحَّ من غير هذا الوجه، انظر حديث زيد بن أرقم المتقدم برقم (4627).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5694)


5694 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا إبراهيم بن سليمان البُرُلُّسِي، حدثنا يحيى بن مَعِين، حدثنا هشام بن يوسف، عن عبد الله بن مصعب، أخبرني موسى بن عُقبة، قال: سمعتُ علقمة بن وَقّاص قال: لما خرج طلحةُ والزبيرُ وعائشةُ لِطَلب دمِ عُثمان، عَرَضُوا مَن معهم بذاتِ عِرْق، فاستَصْغَروا عُرُوةَ بن الزُّبَير وأبا بكر بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام، فردُّوهُما.قال: ورأيتُه [1] وأحبُّ المجالس إليه أخْلاها، وهو ضاربٌ بلِحيتِه على زَوْرِه، فقلت له: يا أبا مُحمّد، إني أراكَ وأحبُّ المجالسِ إليك أخلاها، وأنتَ ضارِبٌ بلِحيتِك على زَوْرِك، إن كنت تَكرهُ هذا اليومَ فدَعْه، فليس يُكرِهُك عليه أحدٌ؟ قال: يا علقمةَ بنَ وقّاص، لا تَلُمْني، كنا يدًا واحدةً على مَن سِوانا، فأصبَحُوا اليومَ جَبَلين يَزحَفُ أحدُنا إلى صاحبِه، ولكنه كان مِنّي في أمرٍ عُثمانَ ما لا أَرى كَفَّارتَه إلَّا أن يُسفَكَ دمي في طلبِ دمِه، قلت: فمحمدُ بن طلحة لِمَ تُخرِجُه ولك ولدٌ صِغارٌ؟! دَعْهُ، فإن كان أمرًا خَلَفَك في تَرِكَتِك، قال: هو أعلمُ، أكرَهُ أن أَرَى أحدًا له في هذا الأمر نيّةٌ فأَرُدَّه، فكلّمتُ محمدَ بنَ طلحة في التّخلُّف، فقال: أكرَهُ أن أسألَ الرِّجال عن أَبي [2].




আলকামা ইবনু ওয়াক্কাস থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন তালহা, যুবাইর এবং আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর রক্তের প্রতিশোধ নেওয়ার জন্য বের হলেন, তখন তারা 'জাতু ইরক'-এ তাদের সাথে থাকা লোকজনকে যাচাই করলেন। তারা উরওয়াহ ইবনু যুবাইর এবং আবু বাকর ইবনু আব্দুর রহমান ইবনু হারিস ইবনু হিশামকে অল্প বয়স্ক মনে করে ফিরিয়ে দিলেন। [আলকামা] বলেন: আমি তাকে (তালহাকে) এমন অবস্থায় দেখলাম যে, তার কাছে সবচেয়ে প্রিয় স্থান ছিল নির্জন স্থান, আর তিনি নিজের দাড়ি বুকের ওপর এলিয়ে রেখেছিলেন। আমি তাকে বললাম: হে আবু মুহাম্মাদ! আমি আপনাকে দেখছি যে আপনার কাছে নির্জন স্থানই সবচেয়ে প্রিয়, আর আপনি আপনার দাড়ি বুকের ওপর এলিয়ে রেখেছেন। যদি আপনি এই দিনটিকে (এই যুদ্ধ বা ঘটনাকে) অপছন্দ করেন, তবে তা ছেড়ে দিন। কেউ তো আপনাকে এর জন্য বাধ্য করছে না। তিনি বললেন: হে আলকামা ইবনু ওয়াক্কাস! আমাকে দোষ দিও না। আমরা অন্যদের বিরুদ্ধে ছিলাম একতাবদ্ধ হাত। কিন্তু আজ তারা (মুসলিমরা) এমন দুটি পাহাড়ে পরিণত হয়েছে যে, এক পক্ষ অন্য পক্ষের দিকে এগিয়ে যাচ্ছে। কিন্তু উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিষয়ে আমার যে ভূমিকা ছিল, তার কাফফারা (প্রায়শ্চিত্ত) আমি কেবল তার রক্তের (বদলা) চাওয়ার পথে আমার রক্তপাত হওয়ার মাঝেই দেখি। আমি বললাম: তাহলে মুহাম্মাদ ইবনু তালহাকে কেন বের করে আনছেন? আপনার তো ছোট ছোট সন্তান আছে! তাকে ছেড়ে দিন। যদি এটি (আপনার মৃত্যু) ঘটে, তবে সে আপনার উত্তরাধিকারী হিসেবে থাকবে। তিনি বললেন: সে-ই ভালো জানে। আমি এটা অপছন্দ করি যে কেউ এই বিষয়ে (যুদ্ধের উদ্দেশ্যে) নিয়ত করবে আর আমি তাকে ফিরিয়ে দেব। এরপর আমি মুহাম্মাদ ইবনু তালহার সাথে ফিরে যাওয়ার বিষয়ে কথা বললাম। তিনি বললেন: আমি এটা অপছন্দ করি যে আমাকে মানুষের কাছে আমার পিতার খোঁজ করতে হবে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] الضمير يعود على طلحة بن عبيد الله.



[2] إسناده حسن، وجوَّده الذهبي في "تلخيصه"، وقد سلف برقم (4657). ابن أبي بكر الصدِّيق، فأقام عليها، قلنا: ولا يُعرف أنَّ عبد الرحمن بن أبي بكر الصديق فارقها إلى أن مات وعبد الرحمن مات بعد طلحة بن عُبيد الله بزمنٍ.وأخرج ابن أبي عاصم في "السنة" (1403)، والطبراني في "الكبير" (216)، وابن عدي في "الكامل" 3/ 284، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 92، والضياء في "مختارته 3/ (832) و (849) من طُرق عن سليمان بن أيوب، عن أبيه، عن جده، عن موسى بن طلحة، عن طلحة، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا رآني قال: "أنت سِلْفي في الدنيا وسِلْفي في الآخرة"، وهذا إسناد ضعيف، وتقدم الكلام على هذه السلسلة عند الحديث (5691).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5695)


5695 - حدثنا أبو حفص أحمد بن أحْيَد الفقيه ببُخاري، حدثنا صالح بن محمد بن حَبيب الحافظ، حدثنا أبو صالح الحَرّاني، حدثنا سليمان بن أَيّوب بن سليمان بن عيسى بن موسى [1] بن طَلْحة، عن أبيه، عن جده، قال: كان طَلْحةُ سِلْفَ النبيِّ في أربعٍ: كانت عند النبيِّ صلى الله عليه وسلم عائشةُ بنتُ أبي بكر، وكانت أختُها أمُّ كُلثوم بنت أبي بكر عند طلحةَ، فولَدَت له زكريا ويوسفَ وعائشةَ، وكانت عند النبيِّ صلى الله عليه وسلم زينبُ بنتُ جَحْش، وكانت حَمْنةُ بنت جَحْشٍ تحت طلحة بن عُبيد الله، فولَدَت له محمدًا، وقُتل يومَ الجمل مع أبيه، وكانت أمُّ حَبيبةَ بنت أبي سفيان تحتَ النبيِّ صلى الله عليه وسلم، وكانت أختُها الرِّفاعةُ بنتُ أبي سفيان تحتَ طلحةَ بن عُبيد الله، وكانت أمُّ سلمة بنت أبي أُميّة تحت رسول الله صلى الله عليه وسلم، وكانت أختُها قَرِيبةُ بنتُ أبي أُمية تحت طلحةَ بن عُبيد الله، فولدت له مريمَ بنت طلحة [2].




তাঁর দাদা থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চারটি ক্ষেত্রে নবীজি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ভগ্নিপতি (সিল্ফ) ছিলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলেন আয়িশা বিনত আবী বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আর তাঁর (আয়িশার) বোন উম্মু কুলসুম বিনত আবী বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিবাহে। তিনি তালহার জন্য যাকারিয়া, ইউসুফ ও আয়িশাকে জন্ম দেন। আর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলেন যায়নাব বিনত জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আর তাঁর বোন হামনাহ বিনত জাহশ ছিলেন তালহা ইবনু উবাইদিল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিবাহে। তিনি তাঁর জন্য মুহাম্মাদকে জন্ম দেন, যিনি জামালের (যুদ্ধের) দিন তাঁর পিতার সাথে নিহত হন। আর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলেন উম্মু হাবীবা বিনত আবী সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আর তাঁর বোন রিফাআ বিনত আবী সুফিয়ান ছিলেন তালহা ইবনু উবাইদিল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিবাহে। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলেন উম্মু সালামাহ বিনত আবী উমাইয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আর তাঁর বোন ক্বারীবাহ বিনত আবী উমাইয়্যা ছিলেন তালহা ইবনু উবাইদিল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিবাহে। তিনি তাঁর জন্য মারইয়াম বিনত তালহাকে জন্ম দেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية هنا إلى: محمد، والتصويب من إسناد المصنف المتقدم برقم (4357)، ومن إسناديه الآتيين برقم (5704) و (5714) حيث روى ثلاثة أخبارٍ بهذه السلسلة الطَّلْحية التي تعود في نسبها إلى موسى بن طلحة بن عُبيد الله، لا إلى أخيه محمد بن طلحة السَّجَّاد. ابن أبي بكر الصدِّيق، فأقام عليها، قلنا: ولا يُعرف أنَّ عبد الرحمن بن أبي بكر الصديق فارقها إلى أن مات وعبد الرحمن مات بعد طلحة بن عُبيد الله بزمنٍ.وأخرج ابن أبي عاصم في "السنة" (1403)، والطبراني في "الكبير" (216)، وابن عدي في "الكامل" 3/ 284، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 92، والضياء في "مختارته 3/ (832) و (849) من طُرق عن سليمان بن أيوب، عن أبيه، عن جده، عن موسى بن طلحة، عن طلحة، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا رآني قال: "أنت سِلْفي في الدنيا وسِلْفي في الآخرة"، وهذا إسناد ضعيف، وتقدم الكلام على هذه السلسلة عند الحديث (5691).



[2] ضعيف منكر، وانظر الكلام على السلسلة الطلحية هذه عند الحديث المتقدم برقم (5691).ومن النكارة في هذا الخبر ذكرُ الرفاعة بنت أبي سفيان - والصواب في اسمها الفارعة - في زوجات طلحة بن عبيد الله، فلم يذكرها ابن سعد في "طبقاته" 3/ 196، ولا محمدُ بنُ حبيب البغدادي في "المحبَّر" ص 100، ولا ابن حزم في "جمهرة أنساب العرب" ص 138 - مع سعة اطلاعهم - في زوجات طلحة، لكن ذكر ابن سعد الفرعة بنت عليٍّ، وقال: هي سَبِيَّة من بني تَغلِب.وذِكرُ قَريبةَ بنت أبي سفيان زوجةً لطلحة فيه نظر كذلك وإن ذكرها ابن حبيب فيمن تزوجهن طلحة، وذلك أنَّ ابن حبيب ذكر في "المحبَّر" ص 449: أنَّ قريبة تزوجها عمر بن الخطاب ثم فرّق بينهما الإسلام، ثم أسلمت فتزوجها معاوية بن أبي سفيان، ثم طلّقها فتزوجها عبد الرحمن ابن أبي بكر الصدِّيق، فأقام عليها، قلنا: ولا يُعرف أنَّ عبد الرحمن بن أبي بكر الصديق فارقها إلى أن مات وعبد الرحمن مات بعد طلحة بن عُبيد الله بزمنٍ.وأخرج ابن أبي عاصم في "السنة" (1403)، والطبراني في "الكبير" (216)، وابن عدي في "الكامل" 3/ 284، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 92، والضياء في "مختارته 3/ (832) و (849) من طُرق عن سليمان بن أيوب، عن أبيه، عن جده، عن موسى بن طلحة، عن طلحة، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا رآني قال: "أنت سِلْفي في الدنيا وسِلْفي في الآخرة"، وهذا إسناد ضعيف، وتقدم الكلام على هذه السلسلة عند الحديث (5691).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5696)


5696 - حدثنا أبو محمد أحمد بن عبد الله المُزَني، حدثنا محمد بن عبد الله الحَضْرَمي، حدثنا الحسن بن حمّاد الوَرّاق، حدثنا المُحاربي، عن ليثٍ، عن طَلْحة بن مُصَرِّف، قال: أجلَسَ عليٌّ طلحةَ يومَ الجَمَل، فمَسَحَ الترابَ عن رأسِه، ثم الْتَفَتَ إلى الحَسنِ بن عليٍّ، فقال: وَدِدتُ أني مِتُّ قبل هذا بثلاثين سنةً [1].




তালহা ইবনে মুসাররিফ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উট যুদ্ধে (ইয়ামুল জামাল) আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তালহাকে বসালেন। এরপর তিনি তার (তালহার) মাথা থেকে মাটি ঝেড়ে দিলেন। তারপর তিনি (আলী) হাসান ইবনে আলীর দিকে তাকালেন এবং বললেন: আমার আকাঙ্ক্ষা ছিল, এই ঘটনার ত্রিশ বছর আগেই যেন আমি মারা যেতাম।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف ليث: وهو ابن أبي سُليم. المُحاربيّ: هو عبد الرحمن بن محمد بن زياد.وأخرجه ابن أبي شيبة 15/ 269، وابن أبي الدنيا في "المُتمنِّين" (98)، والطبراني في "الكبير" (202)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 115 من طريق عبد الله بن إدريس، عن ليث بن أبي سليم، به. لكنه قال في رواية الطبراني وابن عساكر: سنة، بدل الثلاثين سنة.وأخرج نحوه ابن عساكر 25/ 114 - 115 من طريق مجالد بن سعيد، عن الشعبي مرسلًا دون ذكر قول علي لابنه الحسن.وقد تقدَّم برقم (4607) نظير هذه القصة في قول عليٍّ لابنه الحسن لكن لدى رؤيتهما محمد بن طلحة بن عُبيد الله الذي كان يُعرف بالسّجَّاد، وكان قُتِلَ مع أبيه يوم الجمل. وأخرجه ابن الأعرابي في "معجمه" (905)، ومن طريقه الخطّابي في "العُزلة" ص 14، وابن عساكر 42/ 258 من طريق يحيى بن المُنذر الحُجْري، عن المُبارك بن فَضالة، به.قوله: تَنْدُر، أي: تَسقُط.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5697)


5697 - أخبرني أبو عون محمد بن أحمد بن ماهان الجَزّار على الصَّفا، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا مُبَارك بن فَضَالة، عن الحسن، عن أبي بَكْرة: أن عليًّا قال يومَ الجمَل لما رأى القَتْلى والرؤوسَ تَنْدُر: يا حسنُ، أيُّ خَيرٍ يُرجَى: بعد هذا؟ قال: نَهيتُك عن هذا قبلَ أن تَدخُل [1].




আবূ বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জংগে জামাল (উট-এর যুদ্ধ)-এর দিন যখন নিহতদের দেখলেন এবং মাথাগুলো (দেহ থেকে) বিচ্ছিন্ন হয়ে পড়ছিল, তখন বললেন, "হে হাসান! এরপরে আর কিসের কল্যাণ আশা করা যায়?" [হাসান] বললেন, "আপনি এই (সংঘাতে) প্রবেশ করার আগেই আমি আপনাকে এটি থেকে নিষেধ করেছিলাম।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس غير أن مُبارك فضالة بن فضالة مدلِّس، وقد عنعن، وانظر ما تقدم برقم (4607). والحسن: هو ابن أبي الحسن البصري. وأخرجه ابن الأعرابي في "معجمه" (905)، ومن طريقه الخطّابي في "العُزلة" ص 14، وابن عساكر 42/ 258 من طريق يحيى بن المُنذر الحُجْري، عن المُبارك بن فَضالة، به.قوله: تَنْدُر، أي: تَسقُط.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5698)


5698 - سمعت عليَّ بنَ عيسى الحِيْري يقول: سمعتُ محمد بن عمرو الحَرَشِي يقول: سمعت يحيى بن يحيى يقول: سمعت سفيانَ بن عُيَينة يقول: سألتُ عَمرَو بن دِينار، قلتُ: يا أبا محمد، بايَعَ طلحةُ والزبيرُ عليًّا؟ قال: أخبَرني حسنُ بن مُحمّد - ولم أرَ أحدًا قطُّ أعلمَ منه -: أنهما صَعِدا إليه فبايَعاهُ وهو في عِلَّيّةٍ، ثم نَزَلا [1].




হাসান ইবনে মুহাম্মাদ থেকে বর্ণিত, তিনি (বর্ণনাকারী) জানিয়েছেন—এবং আমি তার চেয়ে অধিক জ্ঞানী কাউকে দেখিনি—যে, তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট আরোহণ করলেন। তিনি যখন একটি উচ্চ কক্ষে ('ইল্লিয়্যাহ) অবস্থান করছিলেন, তখন তাঁরা তাঁর নিকট বাই'আত করলেন। অতঃপর তাঁরা (সেখান থেকে) নেমে গেলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكن الحسن بن محمد - وهو ابن علي بن أبي طالب - لم يُدرك جده عليًّا، فالخبر مرسل، لكن خبر بيعة طلحةَ والزُّبير لعليٍّ بالخلافة ثابتٌ من وجوهٍ عديدة. يحيى بن يحيى: هو النَّيسابُوري.وأخرجه سعيد بن منصور (2970) عن سفيان بن عيينة، به.وأخرج ابن أبي شيبة 15/ 287 من طريق زيد بن وهب قال .... وقال علي لطلحة والزبير: ألم تُبايعاني؟ فقالا: نطلب دم عثمان، فقال عليّ: ليس عندي دمُ عثمان … وإسناده صحيح.وأخرج ابن أبي شيبة 15/ 274، وعمر بن شَبَّة في "تاريخ المدينة" 4/ 1257 من طريق طارق بن شهاب، عن عليّ بن أبي طالب، قال: إنَّ طلحة والزبير بايعا طائعين غير مُكرَهَين. وإسناده حسن.وأخرج عمر بن شبّة في "أخبار البصرة" كما في "فتح الباري" 23/ 106 من طريق الأشْتَر النَّخَعي، قال: رأيت طلحة والزبير بايَعا عليًّا طائعَين غير مُكرَهَين وإسناده صحيح.وانظر تمام شواهده في "فتح الباري" لابن حجر 23/ 106 - 108.والعِلِّيّة: الغُرفة.