হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5699)


5699 - أخبرني الحسن بن محمد بن إسحاق الأزهري، حدثنا محمد بن زكريا الغَلَابي، حدثنا العباس بن بَكَّار، حدثنا سُهيل بن أبي سُهيل التَّمِيمي، عن أبيه، قال: مَرَّ عليُّ بن أبي طالب بطلحةَ بن عُبيد الله وهو مَقتُول، فوقف عليه وقال: هذا واللهِ كما قال الشاعرُ: فتًى كان يُدنِيهِ الغِنى مِن صَديقِهِ … إذا ما هو استَغْنى ويُبعِدُه الفقرُكأنَّ الثُريَّا عُلِّقَت في جَبينِهِ … وفي خَدِّه الشِّعْرى، وفي الآخَرِ البَدْرُ [1]




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তালহা ইবনু উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যখন তিনি নিহত অবস্থায় ছিলেন। তিনি তাঁর কাছে দাঁড়ালেন এবং বললেন: আল্লাহর কসম, এ তো কবির কথার মতোই! (কবির উক্তি): "সে এমন এক যুবক ছিল, প্রাচুর্য যখন তাকে সম্পদশালী করত, তখন তা তাকে বন্ধুর কাছে টেনে নিত... আর দারিদ্র্য তাকে দূরে সরিয়ে দিত। যেন সুরাইয়া (কৃত্তিকা) তারা তার কপালে ঝুলছিল... আর তার এক গালে (ঝুলছিল) শি'রা (লুব্ধক) তারা, আর অন্য গালে পূর্ণ চাঁদ।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده تالفٌ بمرّة من أجل محمد بن زكريا الغَلَابي وشيخه العباس بن بكار، فهما متروكان واتُّهما بالوضع، ولا يُدرى من هو سُهيل ولا أبوه.وأخرج نحوه الطبري في "تهذيب الآثار" في قسم مسند عمر 2/ 669 عن محمد بن حميد الرازي، عن يحيى بن واضح، عن مُطهَّر، عن رجل من أهل مصر، قال: مرَّ عليٌّ … ومُطهَّر هذا لا يُدرَى مَن هو، وشيخُه مبهم، ومحمد بن حميد الرازي ضعيف بمرَّة. في مكرره السالف برقم (4358)، وهو الموافق لرواية البيهقي في "السنن الكبرى" 9/ 46، وفي "دلائل النبوة" 3/ 238 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد نفسِه.وانظر ما بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5700)


5700 - أخبرنا علي بن المُؤمَّل بن الحسن بن عيسى، حدثنا محمد بن يونس، حدثنا جَنْدَل بن والِقٍ، حدثنا محمد بن عُمر المازني، عن أبي عامر الأنصاري، عن ثَوْر بن مَجْزَأة، قال: مررتُ بطلحةَ بن عُبيد الله يوم الجَمَل وهو صريعٌ في آخر رَمَق، فوقفتُ عليه فرفع رأسَه، فقال: إني لأرى وجةَ رجلٍ كأنه القَمَر، ممَّن أنتَ؟ فقلت: من أصحاب أمير المؤمنين عليٍّ، فقال: ابسُطْ يدَك أُبايعْك، فبسطْتُ يدي وبايَعَني، ففاضَت نفسُه، فأتيتُ عليًّا فأخبرتُه بقولِ طَلْحةَ، فقال: اللهُ أكبرُ اللهُ أكبرُ، صَدَق رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: أبى اللهُ أن يَدخُل طلحةُ الجنةَ، إلَّا وبَيعتَي في عُنُقِه [1].




সাওর ইবনু মাজযা'আহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি জঙ্গে জামালের (উট যুদ্ধ) দিন তালহা ইবনু উবাইদুল্লাহর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পাশ দিয়ে যাচ্ছিলাম। তিনি তখন শেষ নিঃশ্বাস ত্যাগ করছেন এবং মাটিতে লুটিয়ে আছেন। আমি তাঁর কাছে দাঁড়ালাম। তিনি মাথা তুলে বললেন: আমি এমন একজন মানুষের মুখ দেখছি যা চাঁদের মতো উজ্জ্বল। আপনি কার লোক? আমি বললাম: আমি আমীরুল মু'মিনীন আলীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অনুসারীদের একজন। তিনি বললেন: আপনার হাত বাড়ান, আমি আপনার হাতে বায়‘আত করব। আমি আমার হাত বাড়ালাম এবং তিনি আমার হাতে বায়‘আত করলেন। এরপরই তাঁর আত্মা দেহত্যাগ করল (তিনি ইন্তিকাল করলেন)। এরপর আমি আলীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে এসে তালহার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কথা তাঁকে জানালাম। তিনি বললেন: আল্লাহু আকবার! আল্লাহু আকবার! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সত্যই বলেছিলেন: আল্লাহ চান না যে তালহা জান্নাতে প্রবেশ করুক, যতক্ষণ না আমার বায়‘আত তার স্কন্ধে (বা দায়িত্বে) থাকে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا كما قال الحافظ ابن حجر في "إتحاف المهرة" (14072)، محمد بن يونس - وهو القرشي الكُديمي - متروك الحديث، ومحمد بن عمر المازني وأبو عامر الأنصاري وثور بن مجزأة ثلاثتهم مجاهيل. في مكرره السالف برقم (4358)، وهو الموافق لرواية البيهقي في "السنن الكبرى" 9/ 46، وفي "دلائل النبوة" 3/ 238 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد نفسِه.وانظر ما بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5701)


5701 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكَير، عن محمد بن إسحاق، عن يحيى بن عَبّاد بن عبد الله بن الزُّبير، عن أبيه، عن جدِّه عبد الله بن الزُّبير بن العَوّام قال: كان على النبيِّ صلى الله عليه وسلم يومَ أحُدٍ دِرْعان [1]، فنهَضَ إلى الصخْرة، فلم يَستطِعْ فقَعَد طلحةُ تحتَه حتى استوى على الصخرة، قال الزُّبير: فسمعتُ النبيّ صلى الله عليه وسلم يقول: "أَوجَبَ طَلْحَةُ" [2].




আবদুল্লাহ ইবন যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উহুদ যুদ্ধের দিন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিধানে দুটি বর্ম ছিল। তিনি একটি পাথরের দিকে উঠতে চাইলেন, কিন্তু সক্ষম হলেন না। তখন তালহা তাঁর নিচে (পিঠ পেতে) বসলেন, ফলে তিনি পাথরের ওপর উঠে সোজা হয়ে দাঁড়ালেন। (বর্ণনাকারী ইবন যুবাইর) বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “তালহা (জান্নাত) নিশ্চিত করে নিয়েছে।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (ص) و (م): درعين، والجادَّة ما أثبتناه من سائر مصادر تخريج الخبر. في مكرره السالف برقم (4358)، وهو الموافق لرواية البيهقي في "السنن الكبرى" 9/ 46، وفي "دلائل النبوة" 3/ 238 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد نفسِه.وانظر ما بعده.



[2] إسناده حسنٌ من أجل محمد بن إسحاق - وهو ابن يسار المطّلبي مولاهم - وقد صرح بسماعه في مكرره السالف برقم (4358)، وهو الموافق لرواية البيهقي في "السنن الكبرى" 9/ 46، وفي "دلائل النبوة" 3/ 238 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد نفسِه.وانظر ما بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5702)


5702 - أخبرني الحسن بن حَليم المَرْوزي، أخبرنا أبو المُوجِّه، أخبرنا عَبْدانُ، أخبرنا عبد الله، أخبرني محمد بن إسحاق، عن يحيى بن عَبّاد بن عبد الله بن الزُّبير، عن أبيه، عن جدِّه عبد الله بن الزُّبير، عن الزُّبير قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "أُوجَبَ طَلْحةُ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “তালহার জন্য (জান্নাত) ওয়াজিব হয়ে গেল।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن كسابقه. أبو المُوجِّه: هو محمد بن عمرو الفَزَاري المروزي، وعَبْدان: هو عبد الله بن عثمان بن جَبَلة المروزي، وعبد الله: هو ابن المبارك المروزي. بدُحيم، عن محمد بن طلحة التيمي، عن موسى بن محمد بن إبراهيم بن الحارث التيمي، عن أبيه، عن أبي سلمة، عن سلمة بن الأكوع. غير أنه قال: ابتاع طلحة بئرًا بناحية الجبل، بدل قوله: حفر بئرًا يوم ذي قرد، كذا جعله محمد بن طلحة من رواية موسى بن محمد التيمي عن أبيه عن أبي سلمة عن ابن الأكوع، وخالف في متنه، ولا يُحتمل محمد بن طلحة أن يقال بأنه حفظ الإسنادين، فالأقرب أنه وهم بذكر أحد الإسنادين، وموسى بن محمد بن إبراهيم التيمي منكر الحديث عند الأئمة.وأخرج الزبير بن بكار كما في "الإصابة" لابن حجر 3/ 530، ومن طريقه ابن عساكر 25/ 93 عن إبراهيم بن حمزة، عن إبراهيم بن نِسطاس، عن محمد بن إبراهيم بن الحارث التيمي مرسلًا قال: مرَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة ذي قرد على ماء يقال له: بيسان، فسأل عنه، فقيل: اسمُه يا رسول الله بيسان، وهو مالح، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا بل هو نعمان، وهو طيّب"، فغيّر رسول الله صلى الله عليه وسلم الاسم وغيَّر الله الماء، فاشتراه طلحة بن عبيد الله، ثم تصدق به، وجاء إلى النبي صلى الله عليه وسلم فأخبره، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما أنت يا طلحة إلّا فياض" فلذلك سمّى طلحةَ الفيّاضَ. وإبراهيم بن نِسطاس قال عنه البخاري: منكر الحديث.لكن سيأتي بعده بسند محتمل للتحسين أن النبي صلى الله عليه وسلم وصفه في غزوة العُشيرة بالفيّاض.ورُوي عن خارجة بن زيد بن ثابت مرسلًا عند البلاذُري: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم لقّبه بالفياض لما وَفَدَت عليه وفود من سَرَوات اليمن، فأعطاهم طلحة بن عبيد الله مالًا وكساهم وأحسن ضيافتهم، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أنت الفيّاض" فسمّي الفيَّاض. وإسناده حسنٌ مرسلًا.وكأنَّ هذا الوصفَ كان مشهورًا به طلحةُ بنُ عُبيد الله رضي الله عنه، وكان معروفًا عند أهل بيته، كما يظهر من كلام سفيان بن عُيينة الآتي تخريجه برقم (5715).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5703)


5703 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا محمد بن رَجَاء، حدثنا إبراهيم بن المُنذِر الحِزَامي، حدثنا محمد بن طلحة، عن إسحاق بن يحيى بن طلحة، عن عمِّه موسى بن طلحة: أنَّ طلحةَ نَحَر جَزُورًا، وحفَر بئرًا يومَ ذي قَرَدٍ، فأطعَمَهُم وسقَاهُم، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "يا طلحةُ الفَيّاضُ"، فسُمِّي طلحةَ الفَيّاضَ [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




তালহা ইবন উবাইদিল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই তিনি যি-কারাদ (Yawm Dhi Qarad)-এর দিনে একটি উট (বা উটনী) যবেহ করেছিলেন এবং একটি কূপ খনন করেছিলেন। অতঃপর তিনি তাদেরকে খাওয়ালেন এবং পান করালেন। অতঃপর নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হে তালহা, তুমি তো ফাইয়্যাদ (অত্যন্ত দানশীল)।" এরপর থেকে তালহা ফাইয়্যাদ নামে পরিচিত হলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل إسحاق بن يحيى بن طلحة، فهو متروك الحديث، والراوي عنه محمد بن طلحة: وهو ابن عبد الرحمن بن طلحة بن عبد الله بن عثمان بن عبيد الله، وجدّه عثمان هذا هو أخو طلحة بن عبيد الله، ومحلُّه الصدق لكنه ربما أخطأ، وقد اختُلف عليه في إسناد هذا الخبر كما سيأتي بيانه. محمد بن رجاء: هو محمد بن محمد بن رجاء بن السِّنْدي.وأخرجه ابن أبي عاصم في "السنة" (1404)، والطبراني في "الكبير" (198)، والخطابي في "غريب الحديث" 2/ 218، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (374) من طرق عن إبراهيم بن المنذر الحِزامي بهذا الإسناد.وأخرجه البلاذُري في "أنساب الأشراف" 10/ 118 - 119 عن أبي الحسن المدائني، عن محمد بن طلحة، به.وأخرجه الطبراني (6224)، وابن عدي في "الكامل" 6/ 343، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (373)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 93 من طريق عبد الرحمن بن إبراهيم المعروف بدُحيم، عن محمد بن طلحة التيمي، عن موسى بن محمد بن إبراهيم بن الحارث التيمي، عن أبيه، عن أبي سلمة، عن سلمة بن الأكوع. غير أنه قال: ابتاع طلحة بئرًا بناحية الجبل، بدل قوله: حفر بئرًا يوم ذي قرد، كذا جعله محمد بن طلحة من رواية موسى بن محمد التيمي عن أبيه عن أبي سلمة عن ابن الأكوع، وخالف في متنه، ولا يُحتمل محمد بن طلحة أن يقال بأنه حفظ الإسنادين، فالأقرب أنه وهم بذكر أحد الإسنادين، وموسى بن محمد بن إبراهيم التيمي منكر الحديث عند الأئمة.وأخرج الزبير بن بكار كما في "الإصابة" لابن حجر 3/ 530، ومن طريقه ابن عساكر 25/ 93 عن إبراهيم بن حمزة، عن إبراهيم بن نِسطاس، عن محمد بن إبراهيم بن الحارث التيمي مرسلًا قال: مرَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة ذي قرد على ماء يقال له: بيسان، فسأل عنه، فقيل: اسمُه يا رسول الله بيسان، وهو مالح، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا بل هو نعمان، وهو طيّب"، فغيّر رسول الله صلى الله عليه وسلم الاسم وغيَّر الله الماء، فاشتراه طلحة بن عبيد الله، ثم تصدق به، وجاء إلى النبي صلى الله عليه وسلم فأخبره، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما أنت يا طلحة إلّا فياض" فلذلك سمّى طلحةَ الفيّاضَ. وإبراهيم بن نِسطاس قال عنه البخاري: منكر الحديث.لكن سيأتي بعده بسند محتمل للتحسين أن النبي صلى الله عليه وسلم وصفه في غزوة العُشيرة بالفيّاض.ورُوي عن خارجة بن زيد بن ثابت مرسلًا عند البلاذُري: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم لقّبه بالفياض لما وَفَدَت عليه وفود من سَرَوات اليمن، فأعطاهم طلحة بن عبيد الله مالًا وكساهم وأحسن ضيافتهم، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أنت الفيّاض" فسمّي الفيَّاض. وإسناده حسنٌ مرسلًا.وكأنَّ هذا الوصفَ كان مشهورًا به طلحةُ بنُ عُبيد الله رضي الله عنه، وكان معروفًا عند أهل بيته، كما يظهر من كلام سفيان بن عُيينة الآتي تخريجه برقم (5715).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5704)


5704 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا سُليمان بن أيوبَ بن سليمان بن عيسى بن مُوسى بن طلحة بن عبيد الله، حدثني أبي، عن جدِّي، عن [1] موسى بن طلحة، عن أبيه طلحة [2] بن عبيد الله قال: سمّاني رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم أُحُد طلحةَ الخَيرِ، وفي غزوة العُشَيرة الفَيّاضَ، ويومَ حُنينٍ طلحةَ الجُودِ [3]. ‌‌ذكرُ [4] مناقب محمد بن طلحة بن عُبيد الله السَّجاد رضي الله عنهماكان محمدُ بن طَلْحة من الزُّهّاد المُجتهدِين في العِبادة، وكان أصحابُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يَتبرّكون به وبدُعائه، وهو أول مِن لُقِّب بالسَّجَّاد.




তালহা ইবন উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উহুদের দিন আমার নাম রেখেছিলেন তালহাতুল খাইর (কল্যাণময় তালহা), উশাইরার যুদ্ধে (আমার নাম রেখেছিলেন) আল-ফাইয়ায (অজস্র দানকারী), এবং হুনায়নের দিন (আমার নাম রেখেছিলেন) তালহাতুল জূদ (দানশীল তালহা)।

মুহাম্মদ ইবন তালহা ইবন উবাইদুল্লাহ আস-সাজ্জাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর গুণাবলী আলোচনা: মুহাম্মদ ইবন তালহা ছিলেন দুনিয়াবিমুখ ইবাদতকারীগণের অন্যতম, যারা ইবাদতে কঠোর পরিশ্রম করতেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ তাঁর দ্বারা এবং তাঁর দোয়ার মাধ্যমে বরকত লাভ করতেন। তিনিই প্রথম ব্যক্তি যাকে ‘আস-সাজ্জাদ’ (সর্বাধিক সিজদাকারী) উপাধি দেওয়া হয়েছিল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حرف "عن" سقط من نسخنا الخطية، وأثبتناه على الصواب من إسنادَي المصنف في الروايتين: الرواية السالفة برقم (4357)، والرواية الآتية برقم (5714) حيث روى المصنف بهذه السلسلة الطَّلْحية خبرين آخرين، وهي نسخة معروفة. وهذه السلسلة الطلحية معروفة.



[2] وقع في نسخنا الخطية: عن أبيه عن طلحة، بزيادة لفظة "عن" الثانية وهي زيادة مُقحمة، وهذه السلسلة الطلحية معروفة.



5704 [3] - إسناده ضعيف، وقد سلف الكلام على سلسلة الإسناد هذه قريبًا عند الحديث رقم (5691).وأخرجه ابن أبي عاصم في "السنة" (1403)، والطبراني في "الكبير" (197) و (218)، وأبو نعيم في "فضائل الخلفاء الراشدين" (106)، وفي "معرفة الصحابة" (372)، وابن عساكر 25/ 92، وابن الأثير في "أُسد الغابة" 2/ 468، والضياء المقدسي في "المختارة" 3/ (832) من طرق عن سليمان بن أيوب، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن سعد 7/ 57، وابن أبي شيبة في "مسنده" كما في "المطالب العالية" (2799)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (669) و (3206)، والطبراني في "الكبير" 25/ (459)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (634) و (8101) من طرق عن يزيد بن هارون، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن قانع في "معجم الصحابة" 3/ 18 من طريق يحيى بن بشر الحريري، وأبو نُعيم (638) من طريق علي بن الجعد، كلاهما عن أبي شيبة، عن محمد بن عبد الرحمن مولى آل طلحة، عن إبراهيم بن محمد بن طلحة، عن ظئر أبيه محمد بن طلحة. كذا ذكر إبراهيم بن محمد بن طلحة بدل عيسى بن طلحة.وأخرج أحمد في "مسنده" 29 / (17896) بسند صحيح إلى عبد الرحمن بن أبي ليلى في قصةٍ أنَّ محمد بن طلحة قال لعمر بن الخطاب: واللهِ إنْ سماني محمدًا إلّا محمد صلى الله عليه وسلم، فقال عمر: لا سبيل لي إلى شيء سماهُ محمدٌ صلى الله عليه وسلم. وقد جاء عند البخاري في "تاريخه الكبير" 1/ 16، وفي "تاريخه الأوسط" 1/ 578 ما يُشير إلى أنَّ الذي حدَّث به عبدَ الرحمن بنَ أبي ليلى هو محمد بن طلحة نفسُه.لكن اختُلف في كنيته، فقيل: كانت كنيته أبا سليمان، وأنَّ النبي كناه بها، وقال لأبيه طلحة: "لا أجمع له بين اسمي وكنيتي" كما جاء في روايةٍ لإبراهيم بن محمد بن طلحة عند ابن سعد 7/ 57، وأبي أحمد الحاكم في "الكنى" 5/ 99 وغيرهما، وهي أصح من رواية أبي شيبة إبراهيم بن عثمان.



5704 [4] - هكذا تخلّلت مناقبَ طلحة مناقبُ ابنه محمد، وسيعود المصنف لإكمال مناقب طلحة برقم (5710). وأخرجه ابن سعد 7/ 57، وابن أبي شيبة في "مسنده" كما في "المطالب العالية" (2799)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (669) و (3206)، والطبراني في "الكبير" 25/ (459)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (634) و (8101) من طرق عن يزيد بن هارون، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن قانع في "معجم الصحابة" 3/ 18 من طريق يحيى بن بشر الحريري، وأبو نُعيم (638) من طريق علي بن الجعد، كلاهما عن أبي شيبة، عن محمد بن عبد الرحمن مولى آل طلحة، عن إبراهيم بن محمد بن طلحة، عن ظئر أبيه محمد بن طلحة. كذا ذكر إبراهيم بن محمد بن طلحة بدل عيسى بن طلحة.وأخرج أحمد في "مسنده" 29 / (17896) بسند صحيح إلى عبد الرحمن بن أبي ليلى في قصةٍ أنَّ محمد بن طلحة قال لعمر بن الخطاب: واللهِ إنْ سماني محمدًا إلّا محمد صلى الله عليه وسلم، فقال عمر: لا سبيل لي إلى شيء سماهُ محمدٌ صلى الله عليه وسلم. وقد جاء عند البخاري في "تاريخه الكبير" 1/ 16، وفي "تاريخه الأوسط" 1/ 578 ما يُشير إلى أنَّ الذي حدَّث به عبدَ الرحمن بنَ أبي ليلى هو محمد بن طلحة نفسُه.لكن اختُلف في كنيته، فقيل: كانت كنيته أبا سليمان، وأنَّ النبي كناه بها، وقال لأبيه طلحة: "لا أجمع له بين اسمي وكنيتي" كما جاء في روايةٍ لإبراهيم بن محمد بن طلحة عند ابن سعد 7/ 57، وأبي أحمد الحاكم في "الكنى" 5/ 99 وغيرهما، وهي أصح من رواية أبي شيبة إبراهيم بن عثمان.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5705)


5705 - حدثنا بصِحّة ذلك أبو عبد الله الأصبَهاني كما قدّمتُ ذِكرَه [1].




৫৭০৫ - সেই বিশুদ্ধতা সম্পর্কে আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আবূ আবদুল্লাহ আল-আসবাহানী, যেমনটি আমি পূর্বে তাঁর উল্লেখ করেছি [১]।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] يعني بسنده المعروف إلى محمد بن عمر الواقدي صاحب "المغازي" المشهورة. وفي "الطبقات الكبرى" لابن سعد 7/ 58 عن شيخه محمد بن عمر الواقدي، قال: كان محمد بن طلحة يُسمَّى السَّجّادَ لعبادته وفضله في نفسِه. هذا ما ذكره عنه لم يزد عليه ممّا هو في هذه الرواية. وأخرجه ابن سعد 7/ 57، وابن أبي شيبة في "مسنده" كما في "المطالب العالية" (2799)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (669) و (3206)، والطبراني في "الكبير" 25/ (459)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (634) و (8101) من طرق عن يزيد بن هارون، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن قانع في "معجم الصحابة" 3/ 18 من طريق يحيى بن بشر الحريري، وأبو نُعيم (638) من طريق علي بن الجعد، كلاهما عن أبي شيبة، عن محمد بن عبد الرحمن مولى آل طلحة، عن إبراهيم بن محمد بن طلحة، عن ظئر أبيه محمد بن طلحة. كذا ذكر إبراهيم بن محمد بن طلحة بدل عيسى بن طلحة.وأخرج أحمد في "مسنده" 29 / (17896) بسند صحيح إلى عبد الرحمن بن أبي ليلى في قصةٍ أنَّ محمد بن طلحة قال لعمر بن الخطاب: واللهِ إنْ سماني محمدًا إلّا محمد صلى الله عليه وسلم، فقال عمر: لا سبيل لي إلى شيء سماهُ محمدٌ صلى الله عليه وسلم. وقد جاء عند البخاري في "تاريخه الكبير" 1/ 16، وفي "تاريخه الأوسط" 1/ 578 ما يُشير إلى أنَّ الذي حدَّث به عبدَ الرحمن بنَ أبي ليلى هو محمد بن طلحة نفسُه.لكن اختُلف في كنيته، فقيل: كانت كنيته أبا سليمان، وأنَّ النبي كناه بها، وقال لأبيه طلحة: "لا أجمع له بين اسمي وكنيتي" كما جاء في روايةٍ لإبراهيم بن محمد بن طلحة عند ابن سعد 7/ 57، وأبي أحمد الحاكم في "الكنى" 5/ 99 وغيرهما، وهي أصح من رواية أبي شيبة إبراهيم بن عثمان.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5706)


5706 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المَحبُوبي بمَرْو، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا أبو شَيْبة إبراهيم بن عُثمان، عن محمد بن عبد الرحمن مولى آل طَلْحة، عن عيسى بن طلحة، حدثتْني ظِئرٌ لمحمّد بن طَلْحة قالت: لما وُلِد محمّدُ بنُ طلحةَ أتينا به النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فقال: "ما سَمَّيتُموه؟ " فقلنا: محمّدًا، فقال: "هذا سَمِيِّي، وكنيتُه أبو القاسم" [1].




মুহাম্মাদ ইবনু তালহার এক ধাত্রী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (ধাত্রী) বলেন, যখন মুহাম্মাদ ইবনু তালহা জন্মগ্রহণ করেন, তখন আমরা তাকে নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন, “তোমরা তার কী নাম রেখেছ?” আমরা বললাম, ‘মুহাম্মাদ’। তখন তিনি বললেন, “এ আমার সমনামীয়, আর তার উপনাম (কুনিয়াত) হবে আবুল কাসিম।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل أبي شيبة إبراهيم بن عثمان - وهو العبسي مولاهم - فهو واهٍ كما قال الذهبي في "تلخيصه". وأخرجه ابن سعد 7/ 57، وابن أبي شيبة في "مسنده" كما في "المطالب العالية" (2799)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (669) و (3206)، والطبراني في "الكبير" 25/ (459)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (634) و (8101) من طرق عن يزيد بن هارون، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن قانع في "معجم الصحابة" 3/ 18 من طريق يحيى بن بشر الحريري، وأبو نُعيم (638) من طريق علي بن الجعد، كلاهما عن أبي شيبة، عن محمد بن عبد الرحمن مولى آل طلحة، عن إبراهيم بن محمد بن طلحة، عن ظئر أبيه محمد بن طلحة. كذا ذكر إبراهيم بن محمد بن طلحة بدل عيسى بن طلحة.وأخرج أحمد في "مسنده" 29 / (17896) بسند صحيح إلى عبد الرحمن بن أبي ليلى في قصةٍ أنَّ محمد بن طلحة قال لعمر بن الخطاب: واللهِ إنْ سماني محمدًا إلّا محمد صلى الله عليه وسلم، فقال عمر: لا سبيل لي إلى شيء سماهُ محمدٌ صلى الله عليه وسلم. وقد جاء عند البخاري في "تاريخه الكبير" 1/ 16، وفي "تاريخه الأوسط" 1/ 578 ما يُشير إلى أنَّ الذي حدَّث به عبدَ الرحمن بنَ أبي ليلى هو محمد بن طلحة نفسُه.لكن اختُلف في كنيته، فقيل: كانت كنيته أبا سليمان، وأنَّ النبي كناه بها، وقال لأبيه طلحة: "لا أجمع له بين اسمي وكنيتي" كما جاء في روايةٍ لإبراهيم بن محمد بن طلحة عند ابن سعد 7/ 57، وأبي أحمد الحاكم في "الكنى" 5/ 99 وغيرهما، وهي أصح من رواية أبي شيبة إبراهيم بن عثمان.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5707)


5707 - حدثني أبو بكر بن بالَوَيهِ، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، قال: سمعتُ مُصعبًا الزُّبيري يقول: محمد بن طلحة بن عُبيد الله أمُّه حَمْنةُ بنت جَحْش [1].




মুস'আব আয-যুবাইরী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: মুহাম্মাদ ইবনু তালহা ইবনু উবাইদুল্লাহ-এর মাতা হলেন হামনাহ বিনত জাহ্শ।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "نسب قريش" لمصعب الزُّبيري ص 281.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5708)


5708 - أخبرني الحسن بن يعقوب العَدْل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا بَشّار بن موسى، حدثنا الحاطِبي، عن أبيه، عن جَدِّه محمد بن حاطِب، قال: لما فَرَغْنا من قتالِ الجَمَل قام عليٌّ والحَسَنُ [1] بن عليٍّ وعمّار بن ياسر وصَعصَعة بن صُوحان والأشْتَر ومحمد بن أبي بكر يَطُوفون في القتلى، فأبصَرَ الحسن بن عليٍّ قتيلًا مكبوبًا على وجهِه، فأكَبَّه على قَفاهُ، فقال: إنّا لله وإنّا إليه راجِعُونَ، فَرْخُ قُريشٍ واللهِ!! فقال له أبوه: ما هو يا بُنيّ؟ قال: محمدُ بنُ طلحة، فقال: إنّا الله وإنّا إليه راجِعُون، إن كان ما علِمتُه لشابًّا صالحًا، ثم قعد كَئيبًا حَزينًا [2].




মুহাম্মাদ ইবনু হাতিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: যখন আমরা উটের যুদ্ধ থেকে অবসর হলাম, তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), আম্মার ইবনু ইয়াসির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), সা'সা'আ ইবনু সুওহান, আল-আশতার ও মুহাম্মাদ ইবনু আবী বকর নিহতদের মাঝে ঘুরতে লাগলেন। তখন হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দেখলেন একজন নিহত ব্যক্তি উপুড় হয়ে পড়ে আছে। তিনি তাকে চিত করে দিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: ইন্না লিল্লা-হি ওয়া ইন্না ইলাইহি র-জিঊন (নিশ্চয় আমরা আল্লাহর জন্য এবং নিশ্চয় আমরা তাঁর দিকেই প্রত্যাবর্তনকারী)। আল্লাহর কসম! এ তো কুরাইশের বাচ্চা! তাঁর পিতা (আলী রাঃ) তাকে বললেন: হে আমার বৎস, এ কে? তিনি (হাসান) বললেন: মুহাম্মাদ ইবনু তালহা। তিনি (আলী রাঃ) বললেন: ইন্না লিল্লা-হি ওয়া ইন্না ইলাইহি র-জিঊন। আমি যা জানি, সে একজন নেককার যুবক ছিল। অতঃপর তিনি বিষণ্ণ ও দুঃখিত হয়ে বসে পড়লেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: الحسين، والتصويب من هذه الرواية نفسها، حيث سيأتي ذكره الحسن بعد سطر على الصواب في أصولنا، وفاقًا للرواية السالفة للخبر برقم (4607).



[2] خبر صحيح، وهذا إسناد ضعيف كما تقدَّم بيانه عند رواية الخبر السالفة برقم (4607).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5709)


5709 - حدثنا أبو عبد الله الأصبَهاني، حدثنا الحسن بن الجَهْم، حدثنا الحُسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عُمر، حدثني محمد بن الضّحّاك بن عثمان الحِزَامي، عن أبيه: كان هَوَى محمد بن طَلْحة مع عليّ بن أبي طالب، ونَهى عليٌّ عن قَتْله، وقال: مَن رأى صاحبَ البُرنُس الأسودِ فلا يَقتُلْه؛ يعني محمدًا، فقال محمدٌ لعائشةَ يومئذٍ: يا أُمّاه، ما تأمُرِيني؟ قالت: أرى أن تكون كخَيرِ ابنَي آدمَ؛ أَن تَكُفَّ يدَك، فكفَّ يدَه، فقتَلَه رجلٌ من بني أسَد بن خُزيمة يقال له: طلحة بن مُدْلِج من بني مُنقِذ بن طَريف، ويقال: قتلَه شَدّاد بن معاوية العَبْسي [1]، ويقال: بل قتله عِصام بن مُقشَعِرّ النَّصْري [2]، وعليه كَثْرةُ الحديثِ، وهو الذي يقولُ في قَتْلِه:وأشعَثَ قَوّامٍ بآياتِ رَبِّهِ … قليلِ الأذَى فيما يَرى الناسُ مُسلِمِدَلَفتُ له بالرُّمْحِ من تحتِ بَزِّهِ … فَخَرَّ صَرِيعًا لليَدَينِ وللفَمِشَكَكْتُ إليه بالسِّنَانِ قَميصَهُ … فأردَيتُه من ظَهرِ طِرْفٍ مُسَوَّمِ أقمتُ له في دَفْعةِ الخيل صُلْبَهُ … بمِثلِ قُدامَى [3] النَّسْرِ حَرّانَ كَيْزَمِيُذكَّرني (حاميمَ) لما طَعَنتُهُ … فهلّا تَلا (حاميمَ) قبلَ التَّقدُّمِعلى غَيرِ شيءٍ غيرَ أنْ ليسَ تابِعًا … عليًّا ومَن لا يَنْبَعِ الحقَّ يَظلِمِقال: فقال عليٌّ لما رآه صَريعًا: صَرَعَه هذا المَصرَعَ بِرُّ أبيه [4].




দাহ্হাক ইবনু উসমান থেকে বর্ণিত, মুহাম্মদ ইবনু তালহার ঝোঁক আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে ছিল। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে হত্যা করতে নিষেধ করলেন এবং বললেন: যে ব্যক্তি কালো বুরনুস পরিহিত ব্যক্তিকে দেখবে, সে যেন তাকে হত্যা না করে—অর্থাৎ মুহাম্মদকে।

সেদিন মুহাম্মদ (ইবনু তালহা) আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: হে আমার মাতা, আপনি আমাকে কী আদেশ করেন? তিনি বললেন: আমার অভিমত হলো, তুমি যেন আদম (আঃ)-এর দুই পুত্রের মধ্যে উত্তম জনের মতো হও—অর্থাৎ তুমি তোমার হাত গুটিয়ে নাও। অতঃপর তিনি তার হাত গুটিয়ে নিলেন। কিন্তু বনু আসাদ ইবনু খুযাইমার এক ব্যক্তি, যাকে তালহা ইবনু মুদলিজ বলা হতো (বনু মুনকিয ইবনু তারীফের গোত্রের), তিনি তাঁকে হত্যা করে ফেললেন। অন্য বর্ণনায় বলা হয়েছে: তাঁকে শাদ্দাদ ইবনু মু'আবিয়া আল-আবসী হত্যা করেছিল। আবার বলা হয়েছে: বরং তাঁকে ইসাম ইবনু মুকাশ'ইর আন-নাসরী হত্যা করেছিল, যার সম্পর্কেই সবচেয়ে বেশি বর্ণনা প্রচলিত।

আর সে ব্যক্তিই (ইসাম) তার (মুহাম্মদের) হত্যা সম্পর্কে বলেছিল:

"আমি তাকে বর্মের নিচ দিয়ে বর্শা দ্বারা আঘাত করলাম—সেই ধূলিমলিন কেশধারী, যে তার রবের আয়াতসমূহ নিয়ে দাঁড়িয়ে থাকত... মানুষের চোখে সে ছিল অল্প ক্ষতিকর, শান্তিপ্রিয়।
ফলে সে হাত ও মুখ গুঁজে ধরাশায়ী হলো। আমি আমার ঘোড়ার পিঠ থেকে বর্শার ফলা দিয়ে তার জামা ভেদ করে দিলাম এবং তাকে ভূপাতিত করলাম।
ঘোড়সওয়ারদের আক্রমণের মুখে আমি তার মেরুদণ্ডকে সোজা করে দিলাম, ঈগলের নখের মতো একটি তীক্ষ্ণ ফলা দিয়ে।
আমি যখন তাকে আঘাত করলাম, তখন সে আমাকে ‘হা-মীম’ (কুরআনের সূরা) স্মরণ করিয়ে দিচ্ছিল—কিন্তু অগ্রাহ্য করার আগে সে কেন ‘হা-মীম’ তিলাওয়াত করল না?
কোনো কারণ ছাড়াই—একমাত্র এই কারণ ব্যতীত যে সে আলীর অনুগামী ছিল না। আর যে সত্যকে অনুসরণ করে না, সে জুলুম করে।"

বর্ণনাকারী বলেন: আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন তাঁকে ভূপাতিত অবস্থায় দেখলেন, তখন বললেন: তার পিতা (তালহা)-র পুণ্যই তাকে এই পতন ঘটিয়েছে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تصحَّف في (ز) و (ب) إلى: العيشي، وفي (ص) و (م) إلى: القيسي، والصواب ما أثبتناه وفاقًا لسائر المصادر التي أوردت هذا الخبر.



[2] في (ز) و (ب): البصري، بالباء الموحدة، نسبة إلى البصرة. وأهملت هذه النسبة في (ص) و (م)، وجاء في المصادر المعتمدة التي ذكرت هذا الخبر في مقتل محمد بن طلحة نسبةُ عصام هذا بالنَّصري، بالنون بدل الباء الموحدة، ومنها "طبقات ابن سعد" 7/ 59، و"الأنساب" للبلاذُري 3/ 40، و"الاستيعاب" لابن عبد البر ص 648، و"أسد الغابة" لعز الدين بن الأثير 4/ 323، فيغلب على ظننا أنه الصواب، إذ لم يشتهر في تلك الطبقة النسبةُ إلى البلاد بعدُ. والنَّصْري نسبة إلى نصر بن معاوية بن بكر بن هوازن.



5709 [3] - تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: قدام، والتصويب من "الاستيعاب"، و"تاريخ دمشق" 23/ 4، و"مختصره" لابن منظور 10/ 292. وقُدامى النَّسْر: أربع أو عشر ريشات في مُقدَّم الجناح.



5709 [4] - رجاله لا بأس بهم غير أنه مرسلٌ، فلم يدرك الضحاك بن عثمان أيام الجمل، ومحمد بن عمر - وهو الواقدي - متابع، لكن روي خبر محمد بن طلحة هذا يوم الجمل من غير وجه.وقد ذكر ابن سعد في "طبقاته" 7/ 58 هذا الخبر عن محمد بن عمر الواقدي مصدّرًا إياه بقوله: قالوا.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 23/ 3 - 4 من طريق الزبير بن بكار، عن محمد بن الضحاك، عن أبيه. غير أنه سمى الرجل الأسدي الذي قيل إنه قتل محمد بن طلحة: كعب بن مدلج.وأخرج منه نهي علي بن أبي طالب عن قتل محمد بن طلحة: يعقوب بن سفيان في "المعرفة" 2/ 670 عن عمار الدُّهني مرسلًا. ورجاله ثقات.وأخرج منه قصة محمد بن طلحة مع عائشة: البخاري في "تاريخه الأوسط" 1/ 577، وأبو القاسم البغوي فيما نقله ابن حجر في "الإصابة" 6/ 18 من طريق أبي جميلة الطَّهَوي، وكان صاحب راية عليٍّ. وإسناده صحيح.وأخرج هذه القصة أيضًا ابن أبي شيبة 15/ 282 عن مجاهد مرسلًا.وهذا الشِّعر الذي قاله قاتل محمد بن طلحة ورد ذكره في "نسب قريش" لمصعب الزبيري ص 281، وفي "المعارف" لابن قتيبة ص 231، و"تاريخ دمشق" لابن عساكر 23/ 5، غير أنه لم يروه بهذا التمام غير الضحاك بن عثمان الحِزامي.قوله: بَزِّه، أي: ثوبه.وقوله: فخرّ صريعًا لِلْيَدين ولِلْفَم، أي: علي اليدين والفم.والطِّرْف، بكسر الطاء: الكريم من الخيل العتيق.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5710)


5710 - أخبرنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن غالب، حدثنا سعيد بن سليمان الواسِطيّ، حدثنا إسحاق بن يحيى بن طلحة، حدثني عمِّي عيسى بن طلحة، عن عائشة أم المؤمنين، قالت: قال أبو بكر الصِّدّيق: كنتُ أولَ مَن فاءَ إلى رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، ومعه طلحةُ بنُ عُبيد الله، وإذا طلحةُ قد غَلبَه البَرْدُ ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم أمثلُ بَلَلًا منه، فقال لنا رسول الله صلى الله عليه وسلم: "عليكُم بصاحبِكُم" فتركناهُ وأقبلْنا عليه، وإذا مِغْفَرُه قد عَلِقَ بوَجْنتَيه، وبينَه وبين المَشرقِ رجلٌ أنا أقربُ إلى رسولِ الله صلى الله عليه وسلم منه، فإذا هو أبو عُبيدة بن الجَرّاح، فذهبتُ لأَنزعَ المِغفَرَ، فقال أبو عُبيدة: أنشُدُكَ الله يا أبا بكر إلّا تَركْتَني؟ فتركتُه فجَذَبَها فانتُزِعَت ثَنِيَّةُ أبي عُبيدة، قال: فذهبتُ لأنزِعَ الحَلْقةَ الأخرى، فقال لي أبو عُبيدة مثلَ ذلك، فانتزَعَ الحَلْقَةَ الأخرى، فانتُزع ثَنِيَّةُ أبي عُبيدة الأخرى، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أمَا إنَّ صَاحِبَكُم قد استَوجَبَ" أو "أوجَبَ طلحةُ" [1].صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আয়িশা উম্মুল মু'মিনীন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবূ বাকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: আমিই প্রথম ব্যক্তি যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের দিকে ফিরে যাই, আর তাঁর সাথে ছিলেন তালহা ইবনু উবাইদুল্লাহ। এমতাবস্থায় তালহা দুর্বল হয়ে পড়েছিলেন (আঘাতে জর্জরিত), আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার চেয়ে ভালো অবস্থায় ছিলেন (বা কম আহত)। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের বললেন: "তোমরা তোমাদের সাথীর দায়িত্ব নাও।" ফলে আমরা তাঁকে (তালহাকে) ছেড়ে দিলাম এবং তাঁর (নবীজীর) দিকে এগিয়ে গেলাম। তখন দেখা গেল যে তাঁর শিরস্ত্রাণের দুটি অংশ (বা আংটা) তাঁর গণ্ডদেশে (গালে) আটকে আছে। আর তাঁর (নবীজীর) এবং পূর্ব দিকের মধ্যে একজন লোক দাঁড়িয়ে ছিল, যার চেয়ে আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের বেশি কাছে ছিলাম। তিনি ছিলেন আবূ উবাইদাহ ইবনু জাররাহ। আমি সেই শিরস্ত্রাণের আংটা সরাতে গেলাম। তখন আবূ উবাইদাহ বললেন: হে আবূ বাকর! আমি আল্লাহ্‌র দোহাই দিয়ে আপনাকে বলছি, আপনি আমাকে ছেড়ে দিন। ফলে আমি তাঁকে ছেড়ে দিলাম। তিনি সেটি ধরে টান দিলেন, এতে আবূ উবাইদাহর একটি সামনের দাঁত উপড়ে গেল। আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এরপর আমি অপর আংটাটি সরাতে গেলাম। তখন আবূ উবাইদাহ আমাকে আগের মতোই বললেন। ফলে তিনি অপর আংটাটিও টান দিয়ে উপড়ে নিলেন, এতে আবূ উবাইদাহর অপর সামনের দাঁতটিও উপড়ে গেল। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "শোনো, তোমাদের সাথী নিশ্চয়ই মর্যাদা লাভ করেছে," অথবা (বর্ণনাকারী সন্দেহ করে বলেছেন) "তালহা ওয়াজিব করে নিয়েছে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل إسحاق بن يحيى بن طلحة، فهو متروك كما نبَّه عليه الذهبي في "تلخيصه". وقد تقدَّم برقم (4361) من طريق أخرى عنه. لأمها أسماء، خطأ بيقين، صوابه ما جاء في الرواية المتقدمة أنها أم كلثوم بنت أبي بكر الصديق. وقد صحَّ المرفوع في تسمية النبي صلى الله عليه وسلم لأبي بكر عتيقًا وقوله لطلحة بأنه ممَّن قضى نحبه، مُفردَين عن هذه القصة كما تقدَّم تخريجه هناك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5711)


5711 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الرَّبيعُ بن سليمان، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني إسحاق بن يحيى، عن عيسى بن طلحة بن عُبيد الله، قال: دخلتُ على أمِّ المؤمنين وعائشةَ بنتِ طلحة، وهي تقولُ لأمِّها أسماءَ: أنا خيرٌ منكِ، وأبي خيرٌ من أبيكِ، قال: فجَعَلَت أمُّها تَشتِمُها وتقولُ: أنتِ خيرٌ منّي؟! فقالت أم المؤمنين عائشةُ: ألا أقضِي بينكما؟ قالت: بلى، قالت: فإنَّ أبا بكر دخل على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "يا أبا بكرٍ، أنتَ عَتِيقُ اللهِ من النار" قالت: فمن يومِئذٍ سُمّي عَتِيقًا، ولم يكن سُمِّي قبلَ ذلك عَتِيقًا، قالت: ثم دخل طلحةُ بن عُبيد الله، فقال: "أنت يا طَلْحَةُ ممَّن قَضَى نَحْبَه" [1]. صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ‘ঈসা ইবনু তালহা ইবনু উবাইদুল্লাহ বলেন: আমি উম্মুল মু'মিনীন (আয়িশা রাঃ) এবং আয়িশা বিনত তালহার নিকট প্রবেশ করলাম। তখন আয়িশা বিনত তালহা তার মা আসমাকে বলছিলেন: আমি তোমার চেয়ে উত্তম এবং আমার পিতা তোমার পিতার চেয়ে উত্তম। ‘ঈসা বলেন, তখন তার মা তাকে ভর্ৎসনা করে বললেন: তুমি আমার চেয়ে উত্তম?! উম্মুল মু'মিনীন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন বললেন: আমি কি তোমাদের দুজনের মাঝে ফায়সালা করে দেবো না? তিনি (আয়িশা বিনত তালহা) বললেন: হ্যাঁ। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলে তিনি বললেন: "হে আবূ বকর! তুমি আল্লাহর পক্ষ থেকে জাহান্নাম থেকে মুক্ত।" আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সেদিন থেকেই তাঁর নাম 'আত্বীক' রাখা হয়, এর আগে তাঁকে 'আত্বীক' নামে ডাকা হতো না। তিনি আরো বললেন: অতঃপর তালহা ইবনু উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রবেশ করলে তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে তালহা! তুমি তাদের অন্তর্ভুক্ত, যারা তাদের অঙ্গীকার পূর্ণ করেছে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده بهذا السياق ضعيف جدًّا كما تقدَّم بيانه برقم (3599)، وقوله في هذه الرواية: لأمها أسماء، خطأ بيقين، صوابه ما جاء في الرواية المتقدمة أنها أم كلثوم بنت أبي بكر الصديق. وقد صحَّ المرفوع في تسمية النبي صلى الله عليه وسلم لأبي بكر عتيقًا وقوله لطلحة بأنه ممَّن قضى نحبه، مُفردَين عن هذه القصة كما تقدَّم تخريجه هناك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5712)


5712 - حدثنا بكر بن محمد الصَّيرَفي بمَرْو، حدثنا عبد الصمد بن الفضل، حدثنا مَكِّي بن إبراهيم، حدثنا الصَّلْتُ بن دينار، عن أبي نَضْرةَ، عن جابر بن عبد الله، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن أرادَ أن يَنظُرَ إلى شهيدٍ يمشي على وجهِ الأرضِ، فليَنظُرْ إلى طلحةَ بن عُبيد الله" [1].تَفرَّد به الصّلتُ بن دِينار، وليس من شرطِ هذا الكتاب.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি পৃথিবীতে হেঁটে বেড়ানো একজন শহীদকে দেখতে চায়, সে যেন তালহা ইবনে উবাইদুল্লাহর দিকে তাকায়।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل الصَّلْت بن دينار، فهو واهٍ كما قال الذهبي في "تلخيصه".أبو نضرة: هو المُنذر بن مالك بن قِطْعة العَبْدي.وأخرجه ابن ماجه (125)، والترمذي (3739) من طريقين عن الصَّلْت بن دينار، به. وقال الترمذي: غريب لا نعرفه إلّا من حديث الصَّلْت.وللحديث طريق أخرى عند ابن أبي عاصم في "السُّنَّة" (1403)، والطبراني في "الكبير" (215)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 86، والضياء المقدسي في "المختارة" 3/ (850) عن سليمان بن أيوب بن عيسى بن موسى بن طلحة بن عبيد الله، عن أبيه، عن جده، عن موسى بن طلحة، عن طلحة. وهذا إسناد ضعيف تقدم الكلام عليه عند الحديث رقم (5691).وروى نحوه أيضًا الخطيب في "تاريخ بغداد" 6/ 44، ومن طريقه ابن عساكر 25/ 87 - 88 من طريق القعقاع بن زكريا، عن عبد الله بن إدريس، عن طلحة بن يحيى، عن عيسى بن طلحة، عن أبي هريرة. وإسناده ضعيف لجهالة القعقاع بن زكريا، فإننا لم نقف له على ترجمة. عن أبي عبد الله الحاكم، بسنده هذا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5713)


5713 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا إبراهيم بن عبد الله السَّعْدي، أخبرنا محمد بن عُبيد الطَّنَافِسيّ، حدثنا أبو مالك الأشْجَعي، عن أبي حَبِيبة مولى طَلْحة، قال: دخلتُ على عليٍّ مع عِمران [1] بن طَلْحة بعدَما فَرَغَ من أصحابِ الجَمَل، قال: فرحَّب به وأدْناهُ، قال: إني لأرجُو أن يَجعلَني الله وأباكَ من الذين قال الله عز وجل: {وَنَزَعْنَا مَا فِي صُدُورِهِمْ مِنْ غِلٍّ إِخْوَانًا عَلَى سُرُرٍ مُتَقَابِلِينَ} [الحجر: 47]، فقال: يا ابن أخي، كيف فُلانةُ، كيف فُلانةُ؟ قال: وسألَه عن أُمّهات أولادِ أبيه، قال: ثم قال: لم نَقْبِضُ أرْضِيَّكُم هذه السِّنينَ [2] إلَّا مخافةَ أن يَنتَهِبَها الناسُ، يا فلانُ، انطَلِقُ معه إلى ابن قَرَظَة [3] مُرْهُ فليُعْطِه غَلَّتَه هذه السِّنين، ويَدفَعْ إليه أرضَه، فقال رجلانِ جالسانِ ناحيةً، أحدُهما الحارِثُ الأعوَرُ: اللهُ أعدَلُ من ذلك أن نَقتُلَهم ويكونوا إخوانَنا في الجنة؟ قال: قُوما أبعدَ أرضِ الله وأسحَقَها، فمَن هو إذا لم أكُن أنا وطلحةُ؟ يا ابنَ أخي، إذا كانت لك حاجةٌ فأْتِنا [4]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবু হাবীবাহ মাওলা তালহা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি জঙ্গে জামালের (উট বাহিনীর যুদ্ধ) যুদ্ধ শেষ হওয়ার পর ইমরান ইবনে তালহার সাথে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলাম। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে সাদর অভ্যর্থনা জানালেন এবং কাছে টেনে নিলেন। তিনি (আলী) বললেন: আমি অবশ্যই আশা করি যে আল্লাহ তাআলা আমাকে ও তোমার পিতাকে তাদের অন্তর্ভুক্ত করবেন, যাদের সম্পর্কে আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল বলেছেন: "আর আমি তাদের অন্তর থেকে বিদ্বেষ দূর করে দেব; তারা পরস্পর ভাই ভাই হয়ে সিংহাসনে মুখোমুখী হয়ে বসবে।" [আল-হিজর: ৪৭] অতঃপর তিনি (আলী) বললেন: হে ভাতিজা! অমুক কেমন আছে? অমুক কেমন আছে? তিনি (বর্ণনাকারী) বললেন: তিনি তাঁর (ইমরানের) পিতার সন্তানদের মায়েদের খোঁজ নিলেন। তিনি (আলী) আরও বললেন: আমরা এই বছরগুলোতে তোমাদের জমিগুলো কেবল এই ভয়ে বাজেয়াপ্ত করিনি যে লোকেরা হয়তো তা লুঠ করে নেবে। হে অমুক! তার সাথে ইবনু কারাযার কাছে যাও। তাকে নির্দেশ দাও যেন এই বছরগুলোর উৎপন্ন ফসল তাকে দিয়ে দেয় এবং তার জমিটি তাকে ফিরিয়ে দেয়। তখন একপাশে বসে থাকা দুইজন লোক—যাদের একজন ছিলেন হারিস আল-আওয়ার—বললেন: আল্লাহ এর চেয়েও বেশি ন্যায়পরায়ণ যে আমরা তাদেরকে (যুদ্ধের ময়দানে) হত্যা করব আর তারা জান্নাতে আমাদের ভাই হবে? (আলী) বললেন: তোমরা দাঁড়াও! আল্লাহর সবচেয়ে দূরবর্তী ও ধ্বংসপ্রাপ্ত জমিতে যাও। আমি এবং তালহা যদি না হই, তবে আর কে হবে? হে ভাতিজা! যখনই তোমার কোনো প্রয়োজন হবে, আমাদের কাছে এসো।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ص) و (م) و (ب) إلى: عمر، وفي (ز) إلى: عمرا: والمثبت على الصواب في رواية البيهقي في "سننه الكبرى" 8/ 173 - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 116 - عن أبي عبد الله الحاكم، بسنده هذا.



[2] في نسخنا الخطية في الموضعين: السنة، بالإفراد، والمثبت من رواية البيهقي في "سننه الكبرى" 8/ 173 عن أبي عبد الله الحاكم، وفاقًا لرواية سائر من خرَّج هذا الخبر. وأخرجه كذلك الطبري 14/ 37، والعقيلي في "الضعفاء" 1/ 412، وابن حبان في "الثقات" 5/ 218، والمصنِّف في "معرفة علوم الحديث" ص 137، وابن عساكر 25/ 119 من طريقين عن معاوية بن إسحاق بن طلحة، عن عمران بن طلحة، بقصته مع عليٍّ، وذكر الحارث الأعور، ولم يذكر قصة أرض طلحة. وإسناده حسنٌ.وقد تقدَّم الخبر بتمامه مع قصة أرض طلحة وماله برقم (3388) بإسناد جيّد.



5713 [3] - تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: بني قريظة، والمثبت من رواية البيهقي عن أبي عبد الله الحاكم، حيث روى هذا الخبر من طريقين إحداهما طريق شيخه الحاكم وساق لفظه، ونبّه إلى المغايرة بين الطريقين في هذا الحرف آخرَ الخبر، وأنَّ لفظ الطريق الأخرى: إلى بني قَرَظَة، فتأكد ضبط ما في لفظه عن الحاكم، وأنَّ ما وقع في نسخنا الخطية تحريفٌ. وأخرجه كذلك الطبري 14/ 37، والعقيلي في "الضعفاء" 1/ 412، وابن حبان في "الثقات" 5/ 218، والمصنِّف في "معرفة علوم الحديث" ص 137، وابن عساكر 25/ 119 من طريقين عن معاوية بن إسحاق بن طلحة، عن عمران بن طلحة، بقصته مع عليٍّ، وذكر الحارث الأعور، ولم يذكر قصة أرض طلحة. وإسناده حسنٌ.وقد تقدَّم الخبر بتمامه مع قصة أرض طلحة وماله برقم (3388) بإسناد جيّد.



5713 [4] - إسناده حسن من أجل أبي حَبيبة مولى طلحة، فهو - وإن لم يرو عنه غير رجلين - تابعيٌّ كبيرٌ، وخبره هذ مَرويٌّ من وجوهٍ. أبو مالك الأشجعي: هو سعيد بن طارق.وأخرجه البيهقي 8/ 173، ومن طريقه ابن عساكر 25/ 116 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد 3/ 205، وأحمد في "فضائل الصحابة" (1298)، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 10/ 129، والطبري في "تفسيره" 14/ 37، والحسين بن إسماعيل المَحاملي في "أماليه" برواية ابن يحيى البيّع (175)، والبيهقي 8/ 173، وابن عساكر 25/ 116 و 117 من طريق أبي معاوية الضرير، والطبري 14/ 37 من طريق عبد الواحد بن زياد، كلاهما عن أبي مالك الأشجعي به. وبعضهم لا يذكر قصة أرض طلحة.وأخرجه ابن سعد 3/ 205، وأحمد في "الفضائل" (1295)، وابن عساكر 25/ 119 من طريق طلحة بن يحيى، عن أبي حبيبة، به. دون قصة أرض طلحة، وذكر ابنَ الكواء بدل الحارث الأعور. وأخرجه كذلك الطبري 14/ 37، والعقيلي في "الضعفاء" 1/ 412، وابن حبان في "الثقات" 5/ 218، والمصنِّف في "معرفة علوم الحديث" ص 137، وابن عساكر 25/ 119 من طريقين عن معاوية بن إسحاق بن طلحة، عن عمران بن طلحة، بقصته مع عليٍّ، وذكر الحارث الأعور، ولم يذكر قصة أرض طلحة. وإسناده حسنٌ.وقد تقدَّم الخبر بتمامه مع قصة أرض طلحة وماله برقم (3388) بإسناد جيّد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5714)


5714 - أخبرني عُبيد الله بن محمد بن أحمد البَلْخِيّ ببغداد من أصل كتابه، حدثنا أبو إسماعيل محمد بن إسماعيل التِّرمِذي، حدثنا سليمان بن أيوب بن سليمان بن عيسى بن موسى بن طلحة بن عُبيد الله القرشي، حدثني أبي، عن جدِّي، عن موسى بن طلحة، عن طَلْحة بن عبيد الله، قال: خَطَبَ عُمر بن الخَطّاب أمَّ أبانَ بنتَ عُتبةَ بن ربيعة بن عبد شَمْس، فأبَتْه، فقيل لها: ولِمَ؟ قالت: إن دخَل دخَل بيأسٍ، وإن خرَج خرَج بيأسٍ، قد أذهَلَه أمرُ آخرَتِه عن أمرِ دُنياهُ، كأنه يَنظُر إلى ربِّه بعَينَيه، ثم خَطَبَ الزُّبيرُ بن العوّام، فأبَتْه، فقيل لها: ولِمَ؟ قالت: ليس لِزَوجَتِه منه إلّا شارةٌ في قَرامِلِها، ثم خَطَبها عليٌّ، فأبَتْ، قيل لها: ولِمَ؟ قالت: ليس لزوجته منه إلَّا قَضاءُ حاجَتِه، ويقول: كَيتَ وكَيْتَ، وكانَ وكانَ، ثم خطبها طَلْحةُ، فقالت: زَوْجِي حقًّا، قالوا: وكيف ذاكِ؟ قالت: إني عارفةٌ بخَلائِقِه، إن دَخَلَ دخل ضحّاكًا، وإن خرَج خرَج بسّامًا، إن سألتُ أعطَى، وإن سكَتُّ ابتدأَ، وإن عَمِلتُ شَكَر، وإن أذنبتُ غَفَر، فلما أن ابتَنَى بها، قال عليٌّ: يا أبا محمد، إن أذِنْتَ لي أن أُكلِّمَ أمَّ أبان؟ قال: كلَّمْها، قال: فأخذَ بسَجْفِ الحَجَلة، ثم قال: السلامُ عليكم يا عَزيزةَ نفسِها، قالت: وعليكَ السلامُ، قال: خَطَبكِ أميرُ المؤمنين وسيِّدُ المسلمين فأبَيتِيهِ، قالت: كان ذلك، قال: وخَطبَكِ الرُّبيرُ ابن عمّةِ رسول الله صلى الله عليه وسلم وأحدُ حَوَارِيِّه فأبَيتِ، قالت: وقد كان ذلك، قال: وخطبتُك أنا وقَرابَتي من رسول الله صلى الله عليه وسلم، قالت: قد كان ذلك، قال: أما واللهِ لقد تَزَوَّجتِ أحسَنَنا وجهًا، وأنالَنا [1] كفًّا، يُعطي هكذا وهكذا [2].




তালহা ইবনে উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উম্মু আবান বিনতে উতবাহ ইবনে রাবি’আহ ইবনে আব্দ শামসকে বিবাহের প্রস্তাব দিলেন, কিন্তু তিনি তা প্রত্যাখ্যান করলেন। তাকে জিজ্ঞাসা করা হলো: কেন? তিনি বললেন: তিনি যদি প্রবেশ করেন (ঘরে), তবে হতাশার সাথে প্রবেশ করেন এবং যদি বের হন, তবে হতাশার সাথে বের হন। তাঁর আখেরাতের চিন্তা তাঁকে দুনিয়ার বিষয়াবলি থেকে উদাসীন করে রেখেছে। যেন তিনি তাঁর প্রভুর দিকে তাঁর নিজ চোখে তাকিয়ে আছেন।

অতঃপর যুবাইর ইবনুল আওয়াম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে প্রস্তাব দিলেন, কিন্তু তিনি তা প্রত্যাখ্যান করলেন। তাঁকে জিজ্ঞাসা করা হলো: কেন? তিনি বললেন: তাঁর স্ত্রীর জন্য তাঁর কাছ থেকে শুধু তাঁর (স্ত্রীর) চুলের বেণীতে একটি চিহ্ন (অর্থাৎ, সামান্যতম যত্ন বা মনোযোগ) ছাড়া আর কিছুই মেলে না।

এরপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে প্রস্তাব দিলেন, কিন্তু তিনি তা প্রত্যাখ্যান করলেন। তাঁকে জিজ্ঞাসা করা হলো: কেন? তিনি বললেন: তাঁর স্ত্রীর জন্য তাঁর কাছ থেকে শুধু নিজের প্রয়োজন পূরণ করাই বরাদ্দ, আর তিনি শুধু ‘এইটা ওটা’, ‘হয়েছিল ও হয়েছিল’ (অপ্রয়োজনীয় আলাপ) বলতে থাকেন।

এরপর তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে প্রস্তাব দিলেন। তখন তিনি বললেন: তিনিই আমার প্রকৃত স্বামী। লোকেরা জিজ্ঞাসা করল: তা কেমন করে? তিনি বললেন: আমি তাঁর স্বভাব সম্পর্কে অবগত। তিনি যদি প্রবেশ করেন, তবে হাসিমুখে প্রবেশ করেন, আর যদি বের হন, তবে মৃদু হাসিমুখে বের হন। যদি আমি কিছু চাই, তিনি তা দেন। যদি আমি নীরব থাকি, তিনি নিজ থেকে কথা শুরু করেন। যদি আমি কোনো কাজ করি, তিনি কৃতজ্ঞতা প্রকাশ করেন। আর যদি আমি ভুল করি, তিনি ক্ষমা করেন।

এরপর যখন তিনি (তালহা) তাঁকে বিবাহ করলেন, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আবূ মুহাম্মাদ! আপনি যদি আমাকে উম্মু আবানের সাথে কথা বলার অনুমতি দেন? তিনি (তালহা) বললেন: তাঁর সাথে কথা বলুন।

বর্ণনাকারী বলেন: আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পর্দাঘেরা বাসরঘরের (হাজলাহ্) প্রান্ত ধরলেন এবং বললেন: আসসালামু আলাইকুম, হে আত্মমর্যাদাসম্পন্না নারী! তিনি (উম্মু আবান) উত্তর দিলেন: ওয়া আলাইকুমুস সালাম।

আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমীরুল মু'মিনীন এবং মুসলমানদের নেতা আপনাকে বিবাহের প্রস্তাব দিয়েছিলেন, কিন্তু আপনি তা প্রত্যাখ্যান করেছেন। তিনি বললেন: হ্যাঁ, তা হয়েছিল। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আর রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ফুফাতো ভাই এবং তাঁর অন্যতম হাওয়ারী (সাহায্যকারী) যুবাইরও আপনাকে প্রস্তাব দিয়েছিলেন, কিন্তু আপনি তা প্রত্যাখ্যান করেছেন। তিনি বললেন: হ্যাঁ, তা হয়েছিল। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি এবং রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আমার আত্মীয়তার সম্পর্কের কারণে (সম্মানের সাথে) আপনাকে প্রস্তাব দিয়েছিলাম। তিনি বললেন: হ্যাঁ, তা হয়েছিল।

আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর শপথ! নিশ্চয়ই আপনি আমাদের মধ্যে যার চেহারা সবচেয়ে সুন্দর এবং যার হাত সবচেয়ে দাতা, তাকেই বিবাহ করেছেন। তিনি এভাবে (উদারভাবে) দান করেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ص) و (م): وأبَلَّنا، وفي "إتحاف المهرة" (14764): وأندانا، وفي المطبوع: وأبذلنا، وكلها بمعنى: أكثرنا عَطاءً.



[2] إسناده ضعيف، وقد تقدم الكلام على هذه السلسلة عند الحديث (5691).وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 97 و 70/ 198 من طريق أبي بكر البيهقي، عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5715)


5715 - حدثني علي بن عيسى بن إبراهيم الحِيْري [1]، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا ابن أبي عُمر، حدثنا سفيان، عن طَلْحة بن يحيى، حدثتني جدتي سُعْدى بنت عَوف المُرِّية، قالت: دخَلَ عليَّ طلحةُ، فوجدتُه مَغمُومًا، فقلت: ما لي أراك كالِحَ الوجْهِ؟ أَرابَك من أمْرِنا شيءٌ؟ قال: لا والله، ما رابَني من أمرِك شيءٌ، ولَنِعمَ الصاحبةُ أنتِ، ولكنّ مالًا اجتمع عندي، قالت: فابعثْ إلى أهلِ بيتك وقَومِك، فاقسِمْ فيهم، قالت: ففَعَل، فسألتُ الخازِنَ: كم قَسَم؟ فقال: أربعَ مئةِ ألفٍ، وكان غَلَّتَه كلَّ يومِ ألفٌ وافٍ. قال: وكان يُسمّى طلحةَ الفَيّاضَ [2].




সু‘দা বিনতে আওফ আল-মুররিয়্যাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার কাছে এলেন। আমি তাকে বিষণ্ণ অবস্থায় পেলাম। আমি বললাম: কী ব্যাপার, আপনার মুখমণ্ডল এমন ক্লিষ্ট দেখাচ্ছে কেন? আমাদের কোনো বিষয় কি আপনাকে অস্বস্তিতে ফেলেছে? তিনি বললেন: আল্লাহর কসম, তোমার কোনো বিষয়ই আমাকে অস্বস্তিতে ফেলেনি। তুমি তো উত্তম সঙ্গিনী। তবে আমার কাছে কিছু সম্পদ জমা হয়ে গেছে (তাই আমি চিন্তিত)। তিনি বললেন: তাহলে আপনি আপনার পরিবার-পরিজন এবং আপনার সম্প্রদায়ের কাছে লোক পাঠান এবং তাদের মাঝে তা বণ্টন করে দিন। তিনি (সু‘দা) বলেন: তিনি (তালহা) তাই করলেন। অতঃপর আমি কোষাধ্যক্ষকে জিজ্ঞাসা করলাম: তিনি কত বণ্টন করেছেন? সে বলল: চার লক্ষ। আর প্রতিদিন তাঁর আয় ছিল পরিপূর্ণ এক হাজার। (রাবী) বলেন: আর তালহাকে ‘তালহা আল-ফায়্যাদ’ (মহাদাতা) নামে ডাকা হতো।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (م) و (ب) إلى: الحربي.



[2] إسناده حسن من أجل طلحة بن يحيى - وهو ابن طلحة بن عُبيد الله - فهو صدوق حسنُ الحديث. سفيان: هو ابن عُينية، وابن أبي عمر: هو محمد بن يحيى بن أبي عمر العَدني.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته الكبرى" 3/ 201، والبَلاذُري في "أنساب الأشراف" 10/ 117، وابن أبي الدنيا في "إصلاح المال" (96)، وعبد الله بن أحمد بن حنبل في زياداته على "الزهد" لأبيه (782)، والخطابي في "غريب الحديث" 2/ 218، وأبو نعيم في "حلية الأولياء" 1/ 88، وفي "معرفة الصحابة" (376)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 100 و 101 من طرق عن سفيان بن عُيينة، به. ولم يذكر الجملة الأخيرة من هذا الخبر في وصف طلحة بالفياض غير الخطابي وأبي نعيم.وأخرج يعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 1/ 457 عن أبي بكر الحُميدي، والطبراني في "الكبير" (194) من طريق أسد بن موسى، كلاهما عن سفيان بن عيينة؛ قال الحُميدي في روايته: قال سفيان: كان يُسمَّى - يعني طلحة - الفيّاض، وقال أسدٌ في روايته: قال سفيان: كان أهله يقولون: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم سماه الفيّاض. فكأنَّ هذا الحرف من الخبر من قول سفيان بن عيينة، والله أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5716)


5716 - أخبرني أبو إسحاق إبراهيم بن محمد بن يحيى، أخبرنا محمد بن إسحاق الثَّقَفي، حدثنا عُمر بن محمد الأسَدِي، حدثنا أبي، حدثنا صالح بن موسى الطَّلْحي، عن سُهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة، قال: لما وَضَعتِ الحربُ أوزارَها افتخَر رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وطلحةُ ساكِتٌ، وسِماكُ بن خَرَشة أبو دُجَانةَ ساكِتٌ لا يَنطِقُ، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "لقد رأيتُني يومَ أُحُدٍ وما في الأرض قُربي مَخلوقٌ غيرَ جبريلَ عن يَميني، وطلحةَ عن يَساري"، فقيل في ذلك شعرًا:وطلحةُ يومَ الشِّعْبِ آسَى مُحمّدًا … لَدَى ساعةٍ ضاقَت عليهم وشَدَّتِوَقَاهُ بكَفَّيهِ الرَّماحَ فَقُطِّعَتْ … أصابعُه تحتَ الرِّماحِ فشَلَّتِوكان إمامَ الناسِ بعدَ مُحمّدٍ … أقرَّ رَحَى الإسلام حتى استَقَرّتِ [1]




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন যুদ্ধ তার অস্ত্রভার নামিয়ে রাখল (শেষ হলো), তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গর্ব করলেন। কিন্তু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চুপ ছিলেন এবং সিমাক ইবনে খারাশাহ আবু দুজানা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চুপ ছিলেন, কোনো কথা বলছিলেন না। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আমি উহুদের দিন নিজেকে এমন অবস্থায় দেখেছিলাম যে, যমীনে আমার আশেপাশে কোনো সৃষ্টি ছিল না, জিবরীল ছাড়া, যিনি ছিলেন আমার ডান দিকে, আর তালহা, যিনি ছিলেন আমার বাম দিকে।" এ সম্পর্কে কবিতা বলা হয়েছে:

এবং গিরিপথের দিন তালহা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সান্ত্বনা দিয়েছিলেন, এমন এক কঠিন মুহূর্তে যখন তাদের উপর ঘোর বিপদ নেমে এসেছিল এবং পরিস্থিতি কঠিন হয়ে গিয়েছিল।
তিনি তাঁর উভয় হাতের দ্বারা তাঁকে (নবীকে) বর্শার আঘাত থেকে রক্ষা করলেন, ফলে বর্শার নিচে তাঁর আঙ্গুলগুলো কেটে গেল এবং দুর্বল হয়ে গেল (পঙ্গু হয়ে গেল)।
আর তিনি ছিলেন মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরে মানুষের ইমাম, তিনি ইসলামের চাকা স্থির করলেন যতক্ষণ না তা সুপ্রতিষ্ঠিত হলো।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل صالح بن موسى الطَّلْحي - وهو ابن عبد الله بن إسحاق بن طلحة بن عُبيد الله - فهو متروك الحديث. وقد رُوي المرفوعُ من وجه آخر لكنه ضعيفٌ. عمر بن محمد الأسدي: هو ابن الحسن بن الزبير الأسدي، وسُهيل: هو ابن أبي صالح ذكوان السَّمّان.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (5816) من طريق القعقاع بن زكريا الطلحي، عن عبد الله بن إدريس، عن طلحة بن يحيى، عن عيسى بن طلحة، عن أبي هريرة، قال: تذاكرنا يوم أحد والنبي صلى الله عليه وسلم قائم يصلي، فلما فرغ وانصرف من صلاته التفت إلينا، فقال … فذكر المرفوع دون الشعر ودون ذكر أبي دُجانة. والقعقاع بن زكريا هذا مجهول، وقد انفرد به من هذا الوجه.وقد تقدَّم هذا الشِّعر ضمن رواية أخرى برقم (4357) من طريق سليمان بن أيوب، عن أبيه، عن جده، عن موسى بن طلحة، عن طلحة بن عُبيد الله: أنَّ حسان بن ثابت قالها في طلحة بعد يوم أُحُد. وإسناده ضعيف أيضًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5717)


5717 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الربيع بن سليمان، حدثنا أسَدُ بن موسى، حدثنا سفيان بن عُيينة، قال: قال حَسّان بن ثابت في طلحةَ، وما حاشَى أحدًا:أقام إذْ أُسلِمَ النّبيُّ وإذْ … وَلَّى جَميعُ العِبادِ وانكَشَفُوايَدفَعُ عن مُهجَةِ النّبيِّ وقدْ … دَنَا إليهِ العَدُوُّ وارتَدَفُوا مُضَمَّخٌ بالدِّماءِ مُهْجَتُهُ … خَشْيةَ إن قِيلَ: ثَأرَهُم، عَطَفُوا [1]




হাস্সান ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সম্পর্কে বলেন, এবং তিনি অন্য কাউকে এমন সম্মান দেননি:

তিনি (তালহা) তখনো দৃঢ় ছিলেন, যখন নবীকে (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একা ছেড়ে দেওয়া হয়েছিল, আর তখন সকল মানুষ মুখ ফিরিয়ে নিয়েছিল এবং ছত্রভঙ্গ হয়ে গিয়েছিল।
তিনি নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রাণের উৎসকে রক্ষা করছিলেন, যখন শত্রু তাঁর কাছাকাছি চলে এসেছিল এবং একের পর এক আঘাত হানছিল।
রক্তে তাঁর জীবন (শরীর) রঞ্জিত ছিল, এই ভয়ে যে, যদি বলা হয়—‘এই হলো তাদের প্রতিশোধ,’ তবে শত্রুরা যেন মুখ ফিরিয়ে না নেয় (অর্থাৎ তিনি নিজেই যেন নবীর পরিবর্তে শত্রুদের আক্রমণের লক্ষ্যবস্তু হন)।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وأخرج ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 105 - 106 من طريق سليمان بن أيوب الطلحي، عن أبيه، عن جده، عن موسى بن طلحة، عن أبيه طلحة، فذكر ما قيل في طلحة يوم أحد من الشعر، ومنه ما قاله حسان بن ثابت فيه، لكن بسياق قريب من هذا الذي هنا. وإسناده ضعيف كما سبق. وأخرج ابن أبي شيبة 5/ 339، وأحمد في "فضائل الصحابة" (1296)، وابن أبي الدنيا في "مكارم الأخلاق" (164) من طريق وكيع بن الجراح، عن موسى بن عبد الله بن إسحاق بن طلحة، قال: سمعت موسى بن طلحة يقول: جُرح طلحة مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بضعًا وعشرين جراحةً.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5718)


5718 - حدثنا بصحّةِ ما قالهُ حسّان بن ثابت عُبيد الله بن أحمد البَلْخيُّ، ببغداد، حدثنا أبو إسماعيل السُّلَمي، حدثنا سليمان بن أيوب بن عيسى بن موسى بن طلحة، حدثني أبي، عن جدِّي [عن موسى بن طلحة] [1] عن أخته أم إسحاق بنت طلحة، قالت: لقد سمعتُ أبي وهو يقول: لقد عُقِرتُ يومَ أُحُدٍ جميعَ جَسَدي حتى في ذَكَري [2]. ‌‌ذكرُ مناقب قُدَامة بن مَظْعُون بن حَبيب بن وَهْب الجُمَحِيّ رضي الله عنه -




উম্মু ইসহাক বিনতে তালহা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আমার পিতাকে বলতে শুনেছি: উহুদের দিন আমার সারা শরীর ক্ষতবিক্ষত হয়েছিল, এমনকি আমার পুরুষাঙ্গেও আঘাত লেগেছিল।

(এরপর রয়েছে কুদামা ইবনু মা'উন ইবনু হাবিব ইবনু ওয়াহাব আল-জুমাহী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মর্যাদা ও গুণাবলী আলোচনা।)




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] سقط اسم موسى بن طلحة من إسناد الخبر في نسخنا الخطية، ولا بد من ذكره، واستدركناه من سائر المواضع التي روى بها المصنِّف أخبارًا بهذا الإسناد نفسِه، فهذه سلسلةٌ طلحيةٌ معروفة يرويها كلَّها سليمانُ بنُ أيوب، عن أبيه، عن جده، عن موسى بن طلحة. وأخرج ابن أبي شيبة 5/ 339، وأحمد في "فضائل الصحابة" (1296)، وابن أبي الدنيا في "مكارم الأخلاق" (164) من طريق وكيع بن الجراح، عن موسى بن عبد الله بن إسحاق بن طلحة، قال: سمعت موسى بن طلحة يقول: جُرح طلحة مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بضعًا وعشرين جراحةً.



[2] إسناده ضعيف، وأحاديث سليمان بن أيوب هذه عن آبائه نسخة معروفة، وفي بعض رواتها جهالة وفيها بعض المناكير، ومع ذلك قال يعقوب بن شيبة كما في "تحفة الأشراف" للمزي (5004): أحاديثها عندي صحاح. أبو إسماعيل السُّلَمي: هو محمد بن إسماعيل الترمذي.وأخرجه ابن أبي الدنيا في "مكارم الأخلاق" (165) عن المفضل بن عبيد الله اليربوعي، وأبو موسى المديني في "اللطائف من علوم المعارف" (897) من طريق يحيى بن عبد الرحيم الأعمش، كلاهما عن سليمان بن أيوب، بهذا الإسناد. وقد أُقحم في إسناد أبي موسى المديني صيغة التحديث بين اسم يحيى بن عبد الرحيم وبين لقبه، فأوهم أنه يروي هذا الخبر عن الأعمش، وإنما لقبه هو الأعمش.وأخرجه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (370)، ومن طريقه أبو موسى المديني (896)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 80 من طريق أبي صالح الحَرّاني، عن سليمان بن أيوب، عن أبيه، عن جده، عن أخته أم إسحاق بنت طلحة. فلم يذكر في إسناده موسى بن طلحة.وأخرجه ابن عساكر 25/ 80 من طريق أبي أسامة، عن موسى بن عَبد الله بن إسحاق بن طلحة بن عُبيد الله، عن موسى بن طلحة، قال: قال طلحة … فذكره. وأخرج ابن أبي شيبة 5/ 339، وأحمد في "فضائل الصحابة" (1296)، وابن أبي الدنيا في "مكارم الأخلاق" (164) من طريق وكيع بن الجراح، عن موسى بن عبد الله بن إسحاق بن طلحة، قال: سمعت موسى بن طلحة يقول: جُرح طلحة مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بضعًا وعشرين جراحةً.