আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
5799 - أخبرنا أبو جعفر البغدادي، حدثنا أبو عُلَاثة، حدثنا أبي، حدثنا ابن لَهِيعة، عن أبي الأسْود، عن عُروة قال: وخُزَيمة بن ثابت بن الفاكِه بن ثَعْلَبة بن ساعدة بن عامر بن خَطْمة بن جُشَم، وهو ذو الشَّهادتَين، يكنى أبا عُمارة، وهو صاحب رايةِ خَطْمةَ يومَ الفتح.
উরওয়াহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: খুযাইমাহ ইবনু সাবিত ইবনুল ফাকেহ ইবনু সা'লাবাহ ইবনু সা'ইদাহ ইবনু আমির ইবনু খত্বমাহ ইবনু জুশাম। তিনি 'যুশ-শাহাদাতাইন' (দুই সাক্ষ্যের অধিকারী)। তাঁর কুনিয়াত (ডাকনাম) হলো আবূ 'উমারাহ। আর তিনি মক্কা বিজয়ের দিন বনূ খত্বমাহ-এর পতাকা বহনকারী ছিলেন।
5800 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حدثنا مصعب بن عبد الله الزُّبيري، قال: خُزيمة بن ثابت بن الفاكِه بن ثَعْلبة بن ساعدة بن عامر بن عَنَانِ بن عامر بن خَطْمةَ، وهو ذو الشهادتَين، جعلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم شهادتَه بشهادةِ رجُلَين.وأخبرَ النبيَّ صلى الله عليه وسلم: أنه رأى في المنام كأنه سَجَدَ على جَبْهة النبي صلى الله عليه وسلم، فاضطَجَعَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم حتى سَجَدَ على جَبْهتِه.قُتِل مع عليٍّ بصِفِّين بعد قَتْل عمارِ بن ياسر [1].
খুযায়মা ইবনে সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [যিনি] খুযায়মা ইবনে সাবিত ইবনে ফাকেহ ইবনে সা’লাবা ইবনে সায়েদা ইবনে আমের ইবনে আনান ইবনে আমের ইবনে খাতমাহ নামে পরিচিত— তিনিই হলেন যূশ শাহাদাতাইন (দুই সাক্ষ্যের অধিকারী)। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাক্ষ্যকে দু’জন পুরুষের সাক্ষ্যের সমতুল্য গণ্য করেছিলেন। তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আরও জানিয়েছিলেন যে, তিনি স্বপ্নে দেখেছেন যেন তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কপালে সিজদা করছেন। তাই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শুয়ে পড়লেন, যেন তিনি তাঁর (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর) কপালে সিজদা করতে পারেন। আম্মার ইবনে ইয়াসির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শহীদ হওয়ার পর সিফফিনের যুদ্ধে তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পক্ষে শহীদ হন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] أما قصة جعل النبيِّ صلى الله عليه وسلم شهادة خزيمة بشهادة رجلين، فصحيحة ثابتة كما تقدَّم برقم (2217) و (2218). وأما قصة رؤياه فأخرجها أحمد 36/ (21863) و (21864) و (21882) و (21885)، وغيره، وفي إسنادها اضطراب كما هو مبيَّن في التعليق على "المسند".
5801 - Null
5801 - حدثنا أحمد بن يعقوب الثقفي، حدثنا موسى بن زكريا التُّستَري، حدثنا خَليفة بن خَيّاط، حدثنا يونس بن بُكَير، عن محمد بن إسحاق، قال: شَهِد خُزيمةُ بن ثابت ذو الشَّهادتَين مع عليّ بن أبي طالب صِفِّين وقُتل يومئذٍ سنة سَبعٍ وثلاثين من الهِجْرة، وكان لخُزيمة أخَوان، يقال لأحدهما: وَحْوَح، والآخر: عبدُ الله.
মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক থেকে বর্ণিত, খুযাইমাহ ইবনু সাবিত, যিনি ‘যুশ-শাহাদাতাইন’ (দুই সাক্ষীর অধিকারী) নামে পরিচিত, তিনি আলী ইবনু আবী তালিবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে সিফফীনের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন এবং তিনি ঐ দিন হিজরতের সাঁইত্রিশতম সনে শহীদ হয়েছিলেন। আর খুযাইমাহর দুইজন ভাই ছিলেন, যাঁদের একজনকে ওয়াহওয়াহ এবং অপরজনকে আব্দুল্লাহ বলা হতো।
5802 - حدثني محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا محمد بن إسحاق الثَّقَفي، حدثنا محمد بن بَكّار، حدثنا أبو مَعْشَر المَدَني [1]، عن، عن محمد بن عُمارة بن خُزيمة بن ثابت، قال: كان جَدِّي كافًّا سِلاحَه [2] يوم الجَمَل ويوم صِفِّين حتى قُتِل عَمّارُ، فلما قُتِل عمارٌ، قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "تَقتُل عمارًا الفِئةُ الباغِيةُ". قال: فسَلَّ سيفَه فقاتَل حتى قُتِل [3]. ذكرُ مناقب صُهَيب بن سِنانٍ مولى النبيّ صلى الله عليه وسلم
খুযায়মা ইবনে ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (খুযায়মা) উটের যুদ্ধ (জামাল) এবং সিফফীনের যুদ্ধের দিন নিজের অস্ত্র বিরত রেখেছিলেন, যতক্ষণ না আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শহীদ হন। যখন আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শহীদ হলেন, তখন তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “আম্মারকে বিদ্রোহী দলটি হত্যা করবে।” তিনি (খুযায়মা) বলেন: এরপর তিনি তাঁর তলোয়ার কোষমুক্ত করলেন এবং যুদ্ধ করতে থাকলেন, অবশেষে তিনিও শহীদ হলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرّف في (ز) و (ب) إلى: المُزني.
[2] في النسخ الخطية: بسلاحه، بزيادة الباء، أوله والمثبت من "تلخيص المستدرك" للذهبي.
5802 [3] - صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف أبي معشر المدني - واسمه نَجِيح - ولإرساله أيضًا، فإنَّ محمد بن عُمارة بن خزيمة لم يدرك جَدَّه ولا أيام صِفِّين.وأخرجه أحمد 36 / (21873) عن يونس بن محمد وخلف بن الوليد، عن أبي معشر به.ولشهود خزيمة بن ثابت صِفِّين مع عليٍّ شاهدٌ من رواية عبد الرحمن بن أبي ليلى عند الخطيب في "موضح أوهام الجمع والتفريق" 1/ 277 بسند حَسَنٍ.وآخر من مرسل الحكم بن عُتيبة عند أحمد في "العلل" برواية ابنه عبد الله (462) و (958).وثالثٌ من مُرسَل الزهري عند عبد الرزاق (15568)، والبخاري في "التاريخ الأوسط" 1/ 546.وقال الخطيب في "موضح الأوهام" 1/ 276: أجمع علماء أهل السيرة على أنَّ خزيمة بن ثابت ذا الشهادتين شهد مع عليٍّ صفين.وللمرفوع منه شواهد أيضًا، انظر ما سلف برقم (2684).
5803 - حدثنا أبو عبد الله الأصبَهاني، حدثنا الحَسن بن الجَهم، حدثنا الحُسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر، قال: صُهَيب بن سِنانِ بن مالك بن عبد عَمرو بن عُقيل بن عامر، وكان أبوه سِنانُ بن مالك عامِلًا لكِسْرى على الأُبُلّة، وكانت مَنازلُهم بأرضِ المَوصِل في قريةٍ على شَطِّ الفُرات ممّا يلي الجَزيرةَ والمَوصِلَ، فأغارت الرومُ على تلك الناحية، فسُبِيَ صهيبٌ وهو غلام صغير، فقال عمُّه:أَنشُدُ باللهِ الغُلامَ النَّمَريّ … دَجَّ به الرُّومُ وأهلي بالثَّنِيّ [1]قال: والثَّنِيُّ [2] اسمُ القرية التي كان بها أهلُه، فنشأ صهيبٌ بالروم، فابتاعه منهم كَلْبٌ، ثم قَدِمَت به مكةَ، فاشتراهُ عبدُ الله بن جُدْعان التَّيْمي، فأعتقه، فأقام معه بمكة حتى هَلَكَ عبدُ الله بن جُدعان وبُعِثَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم [3].5803/ 1 - قال ابن عُمر: فحدثني عبد الله بن أبي عُبيدة، عن أبيه، قال: قال عمار بن ياسر: لقيتُ صُهيب بن سِنانٍ على باب دارِ الأرقم ورسول الله صلى الله عليه وسلم فيها، فقلتُ له: ما تريدُ؟ فقال لي: ما تريدُ أنتَ؟ فقلتُ: أردتُ أن أدخُلَ على محمدٍ فأَسمعَ كلامَه، قال: وأنا أُريد ذلك، فدخلْنا عليه، فعَرَض علينا الإسلام فأسلَمْنا، ثم مَكَثْنا يومَنا على ذلك حتى أمسَينا، ثم خَرَجنا ونحن مُستَخْفُون [4].5803/ 2 - قال ابن عُمر: وحدثني عاصم بن سُوَيد من بني عَمرو بن عوف، عن محمد بن عُمارة بن خُزيمة بن ثابت، قال: قَدِمَ آخِرُ الناس في الهجرة إلى المدينة، عليٌّ وصُهيبُ بن سِنان، وذلك للنصف من ربيع الأول، ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم بقُباءٍ لم يَرِمْ بعدُ. وشهد صهيبٌ بدرًا واحدًا والخندقَ والمشاهدَ كلَّها مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في قول جَميعِهم [5].5803/ 3 - قال ابن عُمر: وحدثني أبو حُذيفة رجلٌ من وَلَد صُهيب، عن أبيه، عن جده، قال: توفي صهيبٌ في شوّال سنة ثَمانٍ وثلاثين وهو ابن سبعين سنةً بالمدينة، ودُفن بالبقيع، وكان يُكنى أبا يحيى [6].
আম্মার ইবনে ইয়াসির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:
(সুহাইব ইবনে সিনানের জীবনী প্রসঙ্গে) মুহাম্মাদ ইবনে উমর বলেন: সুহাইব ইবনে সিনান ইবনে মালিক ইবনে আব্দুল আমর ইবনে উকাইল ইবনে আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তাঁর পিতা সিনান ইবনে মালিক কিসরার পক্ষ থেকে উবুল্লাহর গভর্নর ছিলেন। তাদের আবাসস্থল ছিল মওসিলের ভূমিতে, ফুরাত নদীর তীরে অবস্থিত একটি গ্রামে, যা জাযিরা এবং মওসিলের নিকটবর্তী। রোমানরা সেই এলাকায় আক্রমণ করলে সুহাইব ছোট বালক থাকা অবস্থায় বন্দী হন।
তাঁর চাচা বললেন: আমি আল্লাহর নামে শপথ করে বলছি, নুমারি বালককে [ফিরিয়ে দাও], যাকে রোমানরা নিয়ে গেছে, অথচ আমার পরিবার ছিল সানি-তে।
মুহাম্মাদ ইবনে উমর বলেন: সানি হলো সেই গ্রামের নাম যেখানে তার পরিবার বাস করত। সুহাইব রোমে বড় হন। এরপর কালব গোত্রের একজন তাকে তাদের কাছ থেকে কিনে নেয়। পরে তাকে নিয়ে মক্কায় আসা হয়। সেখানে আব্দুল্লাহ ইবনে জুদআন আত-তাইমি তাকে কিনে মুক্ত করে দেন। তিনি আব্দুল্লাহ ইবনে জুদআনের মৃত্যুর আগ পর্যন্ত তাঁর সাথে মক্কায় অবস্থান করেন। এরপর নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম প্রেরিত (নবুয়ত লাভ) হলেন।
আম্মার ইবনে ইয়াসির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘরের দরজায় সুহাইব ইবনে সিনান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে দেখা করলাম, আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন সেই ঘরের ভেতরে ছিলেন। আমি তাকে জিজ্ঞেস করলাম: আপনি কী চান? তিনি আমাকে বললেন: আপনি কী চান? আমি বললাম: আমি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে প্রবেশ করতে এবং তাঁর কথা শুনতে চেয়েছি। তিনি বললেন: আমিও তাই চাই। অতঃপর আমরা উভয়ে তাঁর কাছে প্রবেশ করলাম। তিনি আমাদের কাছে ইসলামের দাওয়াত দিলেন এবং আমরা ইসলাম গ্রহণ করলাম। এরপর আমরা সেদিন সূর্যাস্ত পর্যন্ত সেখানেই থাকলাম। অতঃপর আমরা গোপনে সেখান থেকে বের হয়ে এলাম।
ইবনে উমর বলেন: আমর ইবনে আওফ গোত্রের আসিম ইবনে সুয়াইদ আমার কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি মুহাম্মাদ ইবনে উমারা ইবনে খুযাইমাহ ইবনে সাবিত থেকে বর্ণনা করেন, তিনি বলেন: হিজরতের পর মদীনায় আসা সর্বশেষ ব্যক্তিদের মধ্যে ছিলেন আলী এবং সুহাইব ইবনে সিনান। এটা ছিল রবিউল আউয়াল মাসের মাঝামাঝি সময়ে, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখনও কুবায় অবস্থান করছিলেন এবং সেখান থেকে কোথাও যাননি।
সকলে একমত যে, সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বদর, উহুদ, খন্দক এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সকল সামরিক অভিযানে অংশগ্রহণ করেছিলেন।
ইবনে উমর বলেন: সুহাইবের বংশধরদের মধ্যে থেকে এক ব্যক্তি, যার নাম আবু হুযাইফা, তিনি তার পিতা থেকে এবং তিনি তার দাদা থেকে আমার কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আঠাশতম হিজরির শাওয়াল মাসে সত্তর বছর বয়সে মদীনায় ইন্তিকাল করেন এবং তাকে বাকী'তে দাফন করা হয়। তার কুনিয়াত ছিল আবু ইয়াহইয়া।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تصحفت في النسخ الخطية في الموضعين إلى: النبي، بنون ثم موحدة، بدل الثاء المثلثة ثم النون.
[2] تصحفت في النسخ الخطية في الموضعين إلى: النبي، بنون ثم موحدة، بدل الثاء المثلثة ثم النون.
5803 [3] - ومثلُه قولُ ابن سعد في "طبقاته" 3/ 206، وابن سعد كاتب محمد بن عمر الواقدي.
5803 [4] - وهو في "الطبقات الكبرى" لابن سعد 3/ 208 عن محمد بن عُمر الواقدي، به.
5803 [5] - وهو في "طبقات ابن سعد" 3/ 211 عن محمد بن عُمر الواقدي، به.قوله: لم يَرِم، أي: لم يَبْرح. ويشهد له مرسل أبي عثمان النَّهدي عند ابن سعد 3/ 208، وأحمد في "فضائل الصحابة" (1509)، وابن حبان (7082)، وغيرهم بسند رجاله ثقات.قوله: نَثَل كِنانته، أي: استخرج السِّهام من الجَعْبة.
5803 [6] - وهو في "طبقات ابن سعد" 3/ 211 عن محمد بن عُمر الواقدي، به. ويشهد له مرسل أبي عثمان النَّهدي عند ابن سعد 3/ 208، وأحمد في "فضائل الصحابة" (1509)، وابن حبان (7082)، وغيرهم بسند رجاله ثقات.قوله: نَثَل كِنانته، أي: استخرج السِّهام من الجَعْبة.
5804 - Null
5804 - أخبرنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا إسماعيل بن قُتيبة، أخبرنا محمد بن عبد الله بن نُمير، قال: صُهيبٌ يُكنى أبا يحيى، وهو صهيبُ بن سِنانٍ النَّمَري، من النَّمِر بن قاسِطٍ، وكان أصابَه سَبيٌ فوَقَع بأرضِ الرُّوم، فقيل: صُهيب الرُّوميّ، بلغ سبعينَ سنةً، وكان يَخضِب بالحِنّاء، مات بالمدينة في شوال سنة ثمانٍ وثلاثين، ودُفِن بالبَقيع.
মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু নুমাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কুনিয়াত ছিল আবু ইয়াহইয়া। তিনি হলেন সুহাইব ইবনু সিনান আন-নামারী, যিনি নামির ইবনু কাসিত গোত্রের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন। তাঁকে বন্দী করা হয়েছিল এবং তিনি রোমের অঞ্চলে চলে গিয়েছিলেন, তাই তাঁকে সুহাইব আর-রুমী বলা হতো। তিনি সত্তর বছর বয়সে পৌঁছেছিলেন। তিনি মেহেদী ব্যবহার করে চুল রাঙাতেন। তিনি আটত্রিশ (৩৮) হিজরী সনের শাওয়াল মাসে মদীনায় মৃত্যুবরণ করেন এবং বাকী‘তে দাফন হন।
5805 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الزاهد، حدثنا إسماعيلُ بن إسحاقَ القاضي، حدثنا سليمانُ بن حَرْب، حدثنا حماد بن زيد، عن أيوب، عن عِكرمةَ قال: [لمّا] خرجَ صُهيبٌ مهاجرًا، تَبِعَه أهلُ مكةَ، فنَثَل كِنانتَه فأخرجَ منها أربعينَ سهمًا، فقال: لا تَصِلُون إليَّ حتى أضَعَ في كلِّ رجلٍ منكم سهمًا، ثم أَصِيرَ بعدُ إلى السَّيف، فتَعلَمُون أني رجلٌ، وقد خَلَّفتُ بمكةَ قَينتَين [1] فهَنْئًا لكم [2]. 5805 م - قال: وحدثنا حمّاد بن سَلَمة بن عن ثابت، عن أنس، نحوه، ونزلتْ على النبيِّ صلى الله عليه وسلم: {وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يَشْرِي نَفْسَهُ ابْتِغَاءَ مَرْضَاتِ اللَّهِ} الآية [البقرة: 207]، فلما رآهُ النبيُّ صلى الله عليه وسلم قال: "أبا يحيى، ربحَ البيعُ"، قال: وتَلَا عليه الآيةَ [3]. صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হিজরত করার উদ্দেশ্যে বের হলেন, তখন মক্কার লোকেরা তাঁর পিছু নিল। তিনি তাঁর তূণ (তীরের থলে) উপুড় করে দিলেন এবং তা থেকে চল্লিশটি তীর বের করলেন। অতঃপর তিনি বললেন: তোমরা আমার কাছে পৌঁছাতে পারবে না যতক্ষণ না আমি তোমাদের প্রত্যেকের শরীরে একটি করে তীর বিদ্ধ করি। এরপর আমি তরবারি হাতে নেব। তখন তোমরা জানতে পারবে যে আমি কেমন সাহসী পুরুষ। আর আমি মক্কায় আমার দুটি দাসী/সম্পদ রেখে এসেছি, সেগুলো তোমাদের জন্য রইল। এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর এই আয়াতটি নাযিল হয়: {মানুষের মধ্যে এমনও আছে যে আল্লাহর সন্তুষ্টি লাভের জন্য নিজের জীবন বিক্রি করে দেয়} — আয়াতটি (সূরা আল-বাকারা: ২০৭)। যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে (সুহাইবকে) দেখলেন, তখন বললেন: “হে আবূ ইয়াহইয়া! তোমার ব্যবসা লাভজনক হয়েছে।” তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সামনে আয়াতটি তেলাওয়াত করলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] لم تظهر الكلمة في (ز) و (ب)، ومكانها في (ص) بياض، وسقطت من (م)، وأثبتناها من "تلخيص المستدرك" للذهبي. والقَيْنَة: الأَمَةُ البيضاءُ؛ مُغنّية كانت أو غير مُغنِّية، وقيل: تختص بالمغنّية. ويشهد له مرسل أبي عثمان النَّهدي عند ابن سعد 3/ 208، وأحمد في "فضائل الصحابة" (1509)، وابن حبان (7082)، وغيرهم بسند رجاله ثقات.قوله: نَثَل كِنانته، أي: استخرج السِّهام من الجَعْبة.
[2] رجاله ثقات، لكنه مرسل، فعكرمة تابعي، لكن الخبر مشهور مرويٌّ من وجوه غير أنَّ ذكر القَينَتين لم يَرِدْ إلّا في هذه الرواية، وجاء في غيرها ذكر المال مطلقًا.وانظر ما سيأتي برقم (5812). ويشهد له مرسل أبي عثمان النَّهدي عند ابن سعد 3/ 208، وأحمد في "فضائل الصحابة" (1509)، وابن حبان (7082)، وغيرهم بسند رجاله ثقات.قوله: نَثَل كِنانته، أي: استخرج السِّهام من الجَعْبة.
5805 [3] - رجاله ثقات، لكن المحفوظ فيه أنه من رواية حماد بن سلمة عن علي بن زيد بن جُدعان - وهو ضعيف باتفاق - عن سعيد بن المسيب مرسلًا، كذلك رواه ابن سعد عن سليمان بن حربٍ عن حماد بن سلمة، وكذلك رواه غير واحدٍ من الثقات الحُفّاظ من أصحاب حماد سلمة، عنه كما سيأتي بيانه ثابت: هو ابن أسلَمَ البُناني.وأخرجه ابن سعد 3/ 209، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 24/ 228، وابن الجوزي في "المنتظم" 5/ 156 عن سليمان بن حرب، عن حماد بن سلمة، عن علي بن زيد بن جُدعان، عن سعيد بن المسيب مرسلًا. وقد وقع في مطبوعات "طبقات ابن سعد": حماد بن زيد، وهو خطأ يُصوَّب من روايتي ابن عساكر وابن الجوزي.وأخرجه ابن سعد 3/ 209، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 1/ 182، والحارث بن أبي أسامة كما في "بغية الباحث" (679)، وأبو نُعيم في "حلية الأولياء" 1/ 151، وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 341، وابن عساكر 24/ 228، وابن الجوزي في "المنتظم" 5/ 156 من طريق عفان بن مسلم، وابن سعد 3/ 209، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 2/ 368، وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 341، وابن عساكر 24/ 228 و 225 - 229 من طريق أبي سلمة موسى بن إسماعيل، وابن عساكر 24/ 229 من طريق حجاج بن المنهال، ثلاثتهم عن حماد بن سلمة، عن علي بن زيد، عن سعيد بن المسيب مرسلًا. وقد وقع حمادٌ في مطبوعات "طبقات ابن سعد" مقيَّدًا بابن زيد، وهو خطأ يصوّب من روايتي ابن عساكر وابن الجوزي حيث رويا هذا الخبر من طريق ابن سعد فقُيِّد حماد عندهما بابن سلمة، وهذا هو المحفوظ؛ أنَّ الخبر لحماد بن سلمة.وسيأتي برقم (5811) من طريق أخرى عن سعيد بن المسيب عن صهيب موصولًا، وإسناده فيه لين.
5806 - أخبرني أبو الحسن محمد بن عبد الله العُمَري، حدثنا محمد بن إسحاق الإمام، حدثنا سعيد بن يحيى بن سعيد الأُمَوي، حدثني أبي، حدثنا محمد بن عمرو، حدثنا يحيى بن عبد الرحمن بن حاطِب، عن أبيه، قال قال عمرُ بن الخطاب لصُهيب: ما وَجَدتُ عليك في الإسلام إلَّا ثلاثةً: اكتَنَيتَ أبا يحيى، وقال الله عز وجل: {لَمْ نَجْعَلْ لَهُ مِنْ قَبْلُ سَمِيًّا} [مريم:7]، قال: إيْهٍ، قال: وإنك لا تُمسِك شيئًا إلَّا أنفقتَه قال: إيْهٍ، قال: وإنك تُدعَى إلى النَّمِر بن قاسِط، وأنت من المُهاجِرين ممَّن أنعَمَ الله عليه.فقال صهيبٌ: أمَّا ما [1] تَكنَّيتُ أبا يحيى، فإنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كَنّاني أبا يحيى، وأما ما تقُول أني لا أُمسك شيئًا إلَّا أنفقتُه، فإنَّ الله تعالى يقول: {وَمَا أَنْفَقْتُمْ مِنْ شَيْءٍ فَهُوَ يُخْلِفُهُ وَهُوَ خَيْرُ الرَّازِقِينَ} [سبأ: 39]، وأما ما تقولُ أني أُدعَى إلى النَّمِر بن قاسِط، فإنَّ العربَ تَسْبي بعضُها بعضًا، فَسَبَانِي طائفةٌ من العَرب بعد أن عَرفتُ أهلي ومَولِدي، فباعُوني بسَوادِ الكوفة، فأخذتُ لِسانَهم، ولو كنتُ من رَوْثةٍ ما انتسبتُ إلَّا إليها، قال: صدقتَ [2].
সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: ইসলামের মধ্যে আমি তোমার ব্যাপারে তিনটি জিনিস ছাড়া অন্য কোনো ত্রুটি পাইনি:
(এক) তুমি আবূ ইয়াহইয়া কুনিয়াত (উপনাম) ধারণ করেছ, অথচ আল্লাহ তা‘আলা বলেছেন: "আমরা তার পূর্বে কারো জন্য এই নাম রাখিনি" [সূরা মারইয়াম: ৭]।
তিনি (সুহাইব) বললেন: তারপর?
উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: (দুই) আর তুমি কোনো কিছুই জমা রাখো না, বরং সব খরচ করে ফেলো।
তিনি বললেন: তারপর?
উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: (তিন) আর তুমি নিজেকে আন-নামির ইবনু কাসিত-এর বংশের দিকে আহ্বান করো (সম্পর্কিত করো), অথচ তুমি সেই সকল মুহাজিরদের একজন, যাদের উপর আল্লাহ অনুগ্রহ করেছেন।
তখন সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি আবূ ইয়াহইয়া কুনিয়াত কেন গ্রহণ করলাম, এর কারণ হলো, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজেই আমাকে আবূ ইয়াহইয়া উপনামে ডেকেছেন। আর তুমি যা বলছো যে আমি কোনো কিছুই জমা রাখি না বরং সব খরচ করে ফেলি—এর কারণ হলো, আল্লাহ তা‘আলা বলেন: "তোমরা যা কিছু ব্যয় করো, তিনি তার বিনিময় দেন। আর তিনিই শ্রেষ্ঠ রিযকদাতা।" [সূরা সাবা: ৩৯]। আর তুমি যা বলছো যে আমি আন-নামির ইবনু কাসিত-এর বংশের দিকে নিজেকে সম্পর্কিত করি—এর কারণ হলো, আরবরা একে অপরকে বন্দী করত (দাস বানাত), তাই একদল আরব আমার পরিবার ও জন্মস্থান জানার পর আমাকে বন্দী করেছিল। এরপর তারা আমাকে কুফার আশপাশের অঞ্চলে বিক্রি করে দেয়। তখন আমি তাদের (আরবি) ভাষা শিখে নিই। যদি আমি গোবর থেকেও উৎপন্ন হতাম, তবুও আমি সেই গোবরের দিকেই নিজেকে সম্পর্কিত করতাম।
তিনি (উমার) বললেন: তুমি সত্য বলেছো।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حرف "ما" سقط من (ز) و (م) و (ب). أسامة حماد بن أسامة، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 153 وفي "معرفة الصحابة" (3804) من طريق محمد بن بشر، وابنُ عساكر 24/ 240 من طريق عبد الوهاب بن عبد المجيد الثقفي، ثلاثتهم عن محمد بن عمرو بن علقمة، عن يحيى بن عبد الرحمن بن حاطب مرسلًا.وأخرجه بنحوه الطبراني في "الكبير" (7297)، وابن السُّنّي في "عمل اليوم والليلة" (408)، وابن حزم في "المحلى" 8/ 297، وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 340، وابن عساكر 24/ 241 - 242، والضياء المقدسي في "الأحاديث المختارة" 8/ (77) و (78) من طريق عبد الله بن مصعب بن ثابت الزبيري، عن ربيعة بن عثمان بن ربيعة المدني، عن زيد بن أسلم، عن أبيه، قال: خرجت مع عمر بن الخطاب حتى دخل على صهيب حائطًا بالعالية … فذكر نحوه، غير أنه قال في النفقة: أما تبذيري في مالي فما أُنفِقه إلّا في حقّه. وقال في السّبْي: إنَّ الروم سَبَتني وأنا صغير، فذكر الروم بدل العرب.وأخرجه البزار (2086)، والطبراني في "الأوسط" (5347) من طريق عمرو بن عاصم الكلابي، عن حماد بن سلمة، عن زيد بن أسلم، عن أبيه: أنَّ عمر بن الخطاب قال لصهيب؛ فذكره دون ذكر الإسراف في النفقة، وقال في شأن الادعاء إلى النمر بن قاسط: استُرضعت بالأُبُلّة، فذكر الاسترضاعَ بدل السَّبْي! ورواية الطبراني مختصرة بذكر التكني بأبي يحيى.وسيأتي عند المصنّف برقم (7932) من طريق عبد الله بن محمد بن عَقيل، عن حمزة بن صُهيب عن أبيه، أنَّ عمر بن الخطاب قال له … فذكر السِّباء مثل رواية ربيعة بن عثمان أنَّ الذين سَبَوه هم الروم، وقال في شأن الإسراف في النفقة: أنَّ عمر قال له: فيك سرف في الطعام، فقال له صهيب: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إنَّ خيركم من أطعم الطعام" زاد بعض مخرجي الحديث: "وردّ السلام". وهذا الحرف تفرَّد به ابن عقيل، وهو ليِّن.
[2] رجاله لا بأس بهم، لكنه اختُلف فيه على محمد بن عمرو - وهو ابن علقمة الليثي - فبعضهم يرويه عنه عن يحيى بن عبد الرحمن بن حاطب عن أبيه، كما في هذه الرواية التي عند المصنف، وبعضهم يرويه عنه فلا يذكر فيه عبد الرحمن بن حاطب، ويحيى لم يدرك عمر بن الخطاب. وقد روي نحو هذا الخبر من وجوه.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (285)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (1284)، ومن طريقه ابن عساكر 24/ 240 عن سعيد بن يحيى الأموي، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 340 من طريق الفضل بن موسى، عن محمد بن عمرو به.وأخرجه مطولًا ومختصرًا البغوي (1284) ومن طريقه ابن عساكر 24/ 240 من طريق أبي أسامة حماد بن أسامة، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 153 وفي "معرفة الصحابة" (3804) من طريق محمد بن بشر، وابنُ عساكر 24/ 240 من طريق عبد الوهاب بن عبد المجيد الثقفي، ثلاثتهم عن محمد بن عمرو بن علقمة، عن يحيى بن عبد الرحمن بن حاطب مرسلًا.وأخرجه بنحوه الطبراني في "الكبير" (7297)، وابن السُّنّي في "عمل اليوم والليلة" (408)، وابن حزم في "المحلى" 8/ 297، وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 340، وابن عساكر 24/ 241 - 242، والضياء المقدسي في "الأحاديث المختارة" 8/ (77) و (78) من طريق عبد الله بن مصعب بن ثابت الزبيري، عن ربيعة بن عثمان بن ربيعة المدني، عن زيد بن أسلم، عن أبيه، قال: خرجت مع عمر بن الخطاب حتى دخل على صهيب حائطًا بالعالية … فذكر نحوه، غير أنه قال في النفقة: أما تبذيري في مالي فما أُنفِقه إلّا في حقّه. وقال في السّبْي: إنَّ الروم سَبَتني وأنا صغير، فذكر الروم بدل العرب.وأخرجه البزار (2086)، والطبراني في "الأوسط" (5347) من طريق عمرو بن عاصم الكلابي، عن حماد بن سلمة، عن زيد بن أسلم، عن أبيه: أنَّ عمر بن الخطاب قال لصهيب؛ فذكره دون ذكر الإسراف في النفقة، وقال في شأن الادعاء إلى النمر بن قاسط: استُرضعت بالأُبُلّة، فذكر الاسترضاعَ بدل السَّبْي! ورواية الطبراني مختصرة بذكر التكني بأبي يحيى.وسيأتي عند المصنّف برقم (7932) من طريق عبد الله بن محمد بن عَقيل، عن حمزة بن صُهيب عن أبيه، أنَّ عمر بن الخطاب قال له … فذكر السِّباء مثل رواية ربيعة بن عثمان أنَّ الذين سَبَوه هم الروم، وقال في شأن الإسراف في النفقة: أنَّ عمر قال له: فيك سرف في الطعام، فقال له صهيب: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إنَّ خيركم من أطعم الطعام" زاد بعض مخرجي الحديث: "وردّ السلام". وهذا الحرف تفرَّد به ابن عقيل، وهو ليِّن.
5807 - حدثنا علي بن حَمْشاذ، حدثنا بِشْر بن موسى، حدثنا الحُمَيدي، حدثنا علي بن عبد الحميد بن زياد بن صَيفِيّ [عن أبيه] [1] عن جدِّه، عن صُهيب بن سِنان، قال: ما جعلتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم بيني وبين العدُوّ، وما كنتُ إِلَّا عن يَمينِه أو أَمامَه أو عن شِماله [2]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
সুহাইব বিন সিনান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি কখনও রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আমার এবং শত্রুর মাঝখানে রাখিনি। আমি তাঁর ডানদিকে, অথবা সামনে, অথবা বাম দিকেই থাকতাম।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] ما بين معقوفين سقط من النسخ الخطية، ولا بدّ من إثباته، وِفاقًا لسائر مصادر تخريج الخبر، ومنها "حلية الأولياء" لأبي نعيم 1/ 151 حيث خرَّج هذا الحديث عن محمد بن أحمد بن الحسن عن بشر بن موسى، بهذا الإسناد. وأبيه، وزياد بن صيفي وأبوه محتملان للتحسين.وأخرجه أبو نُعيم الأصبهاني في "حلية الأولياء" 1/ 151، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 24/ 232 عن محمد بن أحمد بن الحسن بن الصَّوّاف، عن بَشْر بن موسى، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبرى" (7309)، وعنه أبو نعيم في "الحلية" 1/ 151 من طريق محمد بن الحسن بن زَبَالة المخزومي، عن علي بن عبد الحميد بن زياد بن صَيْفي، به. وابن زبالة متروك الحديث.وأخرجه ابن أبي خيثمة في السَّفْر الثاني من "تاريخه" (2907)، وابن أبي عاصم في "الجهاد" (256)، وابن عساكر 24/ 232 من طريق إبراهيم بن المنذر الحِزامي، والعُقيلي في "الضعفاء" (1663) من طريق سعيد بن سليمان الواسطي، كلاهما عن يوسف بن محمد بن يزيد بن صَيْفي، عن أبيه، عن أبيه، عن جده، عن صهيب. ويوسف بن محمد روى عنه جمع، وقال عنه أبو حاتم: لا بأس به، وذكره ابن حبان في "الثقات"، لكن قال عنه البخاريُّ: فيه نظر، فمثلُه يُحتمل حديثُه إن شاء الله خاصة في المتابعات، وأبوه لم يرو عنه غير ابنه يوسف، وذكره ابن حبان في "ثقاته".
[2] محتمل للتحسين إن شاء الله بطريقيه، وهذا إسناد ضعيف لجهالة حال علي بن عبد الحميد وأبيه، وزياد بن صيفي وأبوه محتملان للتحسين.وأخرجه أبو نُعيم الأصبهاني في "حلية الأولياء" 1/ 151، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 24/ 232 عن محمد بن أحمد بن الحسن بن الصَّوّاف، عن بَشْر بن موسى، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبرى" (7309)، وعنه أبو نعيم في "الحلية" 1/ 151 من طريق محمد بن الحسن بن زَبَالة المخزومي، عن علي بن عبد الحميد بن زياد بن صَيْفي، به. وابن زبالة متروك الحديث.وأخرجه ابن أبي خيثمة في السَّفْر الثاني من "تاريخه" (2907)، وابن أبي عاصم في "الجهاد" (256)، وابن عساكر 24/ 232 من طريق إبراهيم بن المنذر الحِزامي، والعُقيلي في "الضعفاء" (1663) من طريق سعيد بن سليمان الواسطي، كلاهما عن يوسف بن محمد بن يزيد بن صَيْفي، عن أبيه، عن أبيه، عن جده، عن صهيب. ويوسف بن محمد روى عنه جمع، وقال عنه أبو حاتم: لا بأس به، وذكره ابن حبان في "الثقات"، لكن قال عنه البخاريُّ: فيه نظر، فمثلُه يُحتمل حديثُه إن شاء الله خاصة في المتابعات، وأبوه لم يرو عنه غير ابنه يوسف، وذكره ابن حبان في "ثقاته".
5808 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا محمد بن شاذان الجَوهَري، حدثنا سعيد بن سليمان الواسِطي، حدثنا عبد الله بن المبارك، أخبرني عبد الحميد بن صَيفِيّ من وَلَد صُهيبٍ، عن أبيه، عن جدّه، عن صُهيب، قال: قَدِمتُ على رسول الله صلى الله عليه وسلم بالهجرة، وهو يأكل تمرًا، فأقبلتُ آكُلُ من التمر وبِعَيْني رَمَدٌ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أتأكُلُ التمرَ وبك رَمَدٌ؟ " فقلت: إنما آكُلُ على شِقِّي الصحيحِ الذي ليس به رَمَدٌ، قال: فَضَحِكَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি হিজরতের সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছলাম। তখন তিনি খেজুর খাচ্ছিলেন। আমিও খেজুর খেতে শুরু করলাম, অথচ আমার চোখে ছিল প্রদাহ। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমার চোখে প্রদাহ থাকা সত্ত্বেও কি তুমি খেজুর খাচ্ছ?" আমি বললাম: আমি তো আমার সুস্থ দিকটি দিয়ে খাচ্ছি, যাতে কোনো প্রদাহ নেই। বর্ণনাকারী বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাসলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث محتمل للتحسين بطُرقه، وهذا إسناد فيه لِينٌ كما تقدَّم بيانه فيما قبله، ومع ذلك صحَّحه لذاته البوصيريُّ في "مصباح الزجاجة في زوائد ابن ماجَهْ" (1201)، وجوَّده الزَّيلعيُّ في "تخريج أحاديث الكشاف" 3/ 14!وقد رُوي هذا الخبر من وجوه أخرى عن صهيب فباجتماع هذه الوجوه يتقوى الخبر.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (7304)، وأبو نعيم في "الطب النبوي" (275) و (704)، وضياء الدين المقدسي في "المختارة" 8/ (63) و (64)، والمزي في "تهذيب الكمال" 16/ 443 من طريق عمرو بن عون الواسطي، وأبو القاسم الصفار في "الأربعين في شعب الدين" بانتخاب الضياء المقدسي (35) من طريق يحيى بن آدم، وابن عساكر 24/ 231 من طريق محمد بن إسحاق الصَّغَاني، عن أبي النضر هاشم بن القاسم، ثلاثتهم (عمرو بن عون ويحيى بن آدم وأبو النضر) عن عبد الله بن المبارك، بهذا الإسناد.وسيأتي كذلك عند المصنف برقم (8468) من طريق عَبْدان الأهوازي عن ابن المبارك.وخالفهم في إسناده آخرون في روايتهم عن ابن المبارك:فقد أخرجه أحمد في "مسنده" 27/ (16591) و 38/ (23180) عن أبي النضر هاشم بن القاسم، عن ابن المبارك، عن عبد الحميد بن صيفي، عن أبيه، عن جده: أن صهيبًا قدم … فذكره هكذا بصورة المرسل! ولا شكَّ أنَّ رواية محمد بن إسحاق الصَّغّاني عن أبي النضر التي وافق فيها رواية سعيد بن سليمان الواسطي وعَبْدان الأهوازي ويحيى بن آدم وعمرو بن عون الواسطي أرجحُ من الرواية التي عند أحمد.وأخرجه ابن ماجه (3443) من طريق موسى بن إسماعيل، والبيهقي 9/ 344 من طريق سهل بن عثمان، كلاهما عن ابن المبارك، عن عبد الحميد بن صَيفيّ، عن أبيه، عن جده صُهيب. فأسقطا من الإسناد جَدّ عبد الحميد الأدنى، وهو صَيفيّ، لأنه عبد الحميد بن زياد بن صَيفيّ، كما سماه سهل بن عثمان في روايته.والصحيح ذكر صَيفيّ في إسناده كما في رواية جماعة أصحاب ابن المبارك الذين تقدَّم ذكرهم، وكذلك سماه علي بن عبد الحميد بن زياد بن صَيفيّ في روايته لهذا الخبر عن أبيه عند أبي نُعيم في "الطب النبوي" (276). فاتفق ابن المبارك في رواية أكثر أصحابه عنه وعليّ بن عبد الحميد بن زياد بن صَيفيّ على ذكر جد عبد الحميد الأدنى، وهو صيفي بن صهيب، والله تعالى أعلم.وأخرجه البزار (2095) من طريق يعقوب بن محمد الزهري، عن عاصم بن سويد، عن داود بن إسماعيل بن مُجمَّع، عن عبد الحميد بن زياد بن صُهيب، عن أبيه، عن صهيب كذا وقع في هذه الرواية بإسقاط ذكر جد عبد الحميد الأدنى أيضًا!وأخرجه ابن سعد في "طبقاته الكبرى" 3/ 209، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 24/ 230، عن محمد بن عمر الواقدي، وابن عساكر 24/ 230 - 231 من طريق إسحاق بن جعفر بن محمد بن علي بن الحُسين، كلاهما عن عبد الله بن جعفر المَخْرمي، عن عبد الحكيم بن صهيب، عن عمر بن الحكم بن ثوبان؛ قال الواقدي قدم صهيب، وقال إسحاق: عن صهيب، قال قدمتُ … فذكراه. فأرسله الواقدي ووصله إسحاق، وإسحاق لا بأس به، وهو أحسن حالًا من الواقدي، فالإسناد محتمل للتحسين في المتابعات على جهالة حال عبد الحكيم بن صهيب.وأخرجه ابن عساكر 24/ 231 - 232 من طريق يوسف بن محمد الصُّهيبي، عن أبيه، قال: قدم صهيب … فذكره مُعضلًا. ويوسف المذكور: هو ابن محمد بن يزيد بن صيفيّ بن صهيب بن سنان الذي تقدَّم ذكره عند الخبر السابق.
5809 - حدثني أبو عمرو محمد بن جعفر بن محمد بن مَطَر العَدْل الزاهد - وأنا سألتُه - حدثنا أبو خُبيب العباس بن أحمد بن محمد بن عيسى القاضي، حدثنا أبو بكر عَبد الله بن عُبيد الله الطَّلْحي، حدثنا عَبد الله بن محمد بن إسحاق بن موسى بن طلحة بن عُبيد الله، حدثني أبو حُذيفة الحُصين بن حُذيفة بن صَيْفِيّ بن صُهيب، عن أبيه، عن جده [عن] [1] صُهيب، قال: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول في المُهاجرين الأَوّلين: "هُم السابِقُون الشافِعُون المُدِلُّون على ربِّهم تبارك وتعالى، والذي نفسي بيده، إنهم لَيأتُون يوم القيامة وعلى عواتقهم السِّلاحُ، فَيَقرَعُون بابَ الجنة، فتقول لهم الخَزَنةُ: مَن أنتُم؟ فيقولون: نحن المُهاجرون، فتقول لهم الخَزَنةُ: هل حُوسِبتُم؟ فيَجْثُون على رُكَبِهم، ويَنثُرون ما في جِعابِهم، ويَرفعُون أيديَهم إلى السماء، فيقولون: أيْ ربِّ، وبماذا نُحاسَب؟ فقد خَرجْنا وتَركْنا الأهلَ والمالَ والولدَ! فيُمثِّل اللهُ لهم أجنحةً من ذهَب مُخوَّصةً بالزَّبَرْجَد والياقوت، فيَطِيرون حتى يَدخُلوا الجنةَ، فذلك قوله: {وَقَالُوا الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَذْهَبَ عَنَّا الْحَزَنَ} الآية إلى {لُغُوبٍ} [فاطر: 34 - 35] ". قال حُذيفة: قال صَيفِيّ: قال صُهيب: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "فلَهُم بمَنازِلهم في الجنة أعرَفُ منهم بمنَازلِهم في الدُّنيا" [2].غريب الإسناد والمتن، ذكرتُه في مناقب صُهيب لأنه من المُهاجرين الأوَّلين، والراوي للحديث أعقابُه، والحديثُ لأصحابه، ولم نكتبه في الدنيا إلَّا عن شيخِنا الزاهدِ أبي عَمرو رحمه الله.
সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে প্রথম যুগের মুহাজিরগণ সম্পর্কে বলতে শুনেছি: “তাঁরা (জান্নাতের দিকে) অগ্রগামী, সুপারিশকারী এবং তাঁরা তাঁদের রব আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলার নিকট বিশেষ অধিকার (মর্যাদা) রাখেন। যাঁর হাতে আমার জীবন, তাঁর কসম! কিয়ামতের দিন তাঁরা অস্ত্র কাঁধে নিয়ে আগমন করবেন এবং জান্নাতের দরজায় করাঘাত করবেন। তখন জান্নাতের রক্ষকগণ তাঁদেরকে জিজ্ঞেস করবে: ‘আপনারা কারা?’ তাঁরা বলবেন: ‘আমরা মুহাজিরগণ।’ তখন রক্ষকগণ তাঁদেরকে বলবে: ‘আপনাদের কি হিসাব নেওয়া হয়েছে?’ তখন তাঁরা হাঁটু গেড়ে বসে পড়বেন, তাঁদের থলের ভিতরের জিনিসপত্র ছড়িয়ে দেবেন এবং আকাশের দিকে হাত উঠিয়ে বলবেন: ‘হে আমাদের রব! কিসের জন্য আমাদের হিসাব নেওয়া হবে? আমরা তো (আপনার পথে) বের হয়েছি এবং পরিবার-পরিজন, ধন-সম্পদ ও সন্তান-সন্ততি সব ছেড়ে এসেছি!’ তখন আল্লাহ তাঁদের জন্য স্বর্ণের পাখা তৈরি করবেন, যা পান্না (জাবারজাদ) ও ইয়াকুত (চুনি) দ্বারা সজ্জিত থাকবে। এরপর তাঁরা উড়ে গিয়ে জান্নাতে প্রবেশ করবেন। আর এটাই হলো আল্লাহর বাণী: {وَقَالُوا الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَذْهَبَ عَنَّا الْحَزَنَ} (এবং তাঁরা বলবেন, সমস্ত প্রশংসা আল্লাহরই, যিনি আমাদের থেকে দুঃখ দূর করেছেন) আয়াত থেকে {لُغُوبٍ} (ক্লান্তি) পর্যন্ত।” (সূরা ফাতির: ৩৪-৩৫)।
হুযাইফা বলেন, সাইফি বলেছেন, সুহাইব বলেছেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “জান্নাতে তাঁদের স্থানসমূহের বিষয়ে তাঁরা দুনিয়াতে তাঁদের স্থানসমূহ জানার চেয়েও বেশি অবগত থাকবেন।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حرف "عن" سقط نسخنا الخطية، ولا بد من إثباته كما يدل عليه آخر الحديث، حيث بيَّن فيه أبو حذيفة الحُصين بن حُذيفة رجالَ إسناده مُسمَّين بأسمائهم، فقال: قال حذيفة - يعني أباه - قال: صيفي، قال صهيب. فاقتضى ذلك أن حذيفة بن صَيفيّ بن صهيب روى الخبر عن أبيه صيفيِّ عن جَدِّه صُهيب، وليس عن جده مباشرة. وانظر ما تقدَّم برقم (5803/ 3).
[2] إسناده ضعيف بمرَّة، عَبدُ الله بن محمد بن إسحاق بن موسى بن طلحة بن عُبيد الله، كذا سُمِّي في هذه الرواية التي عند الحاكم! وهو وهمٌ ممّن دون أبي بكر عَبد الله بن عبيد الله الطَّلْحي، وإنما هو عُبيد الله بن إسحاق بن محمد بن عمران بن موسى بن طلحة بن عُبيد الله، فهو والد عَبد الله بن عُبيد الله الطَّلْحي، وقد سُمّي على الصواب في رواية أبي نُعيم الأصبهاني لهذا الخبر في "حلية الأولياء" 1/ 156 من طريق جعفر بن أبي الحسن الخُوارِيّ (وتحرَّف في المطبوع إلى: الخوارزمي) عن عَبد الله بن عُبيد الله الطَّلحي بهذا الإسناد، ونصّ فيه أنه عن أبيه عبيد الله، وعبيدُ الله بن إسحاق هذا قال أبو حاتم كما في "الجرح والتعديل" 5/ 308: ليس بالقوي، وحذيفةُ بن صَيْفي مجهول لم يرو عنه غير ابنه الحُصين، وقال الذهبي في "تلخيصه": كذبٌ، وإسناده مُظلِم. (293) - ومن طريقه أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 24/ 219 - عن أبي بكر محمد بن حمدون بن خالد، عن أبي الزِّنباع رَوح بن الفَرَج، بهذا الإسناد، غير أنه سقط ذكر صيفي من مطبوع ابن عساكر، فيُستدرك من كتاب المَخلدي.وأخرجه البزار (2103) عن إبراهيم بن عبد الله بن الجنيد، والطبراني في "المعجم الكبير" (7303) ومن طريقه أخرجه الضياء المقدسي في "الأحاديث المختارة" 8/ (70) - عن يحيى بن أيوب العَلّاف المصري، كلاهما عن يوسف بن عدي، به. لكن لفظ رواية البزار: صحبتُ النبي صلى الله عليه وسلم قبل أن يدخل المدينة!وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 7/ 169 عن يعقوب بن حميد بن كاسب، عن يوسف بن محمد، به.
5810 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن محمد بن عبد الله البغدادي، حدثنا أبو الزِّنْباع رَوْح بن الفَرَج المِصري، حدثنا يوسف بن عَدِيّ، حدثنا بن محمد بن يزيد بن صيفيّ بن صُهيب، عن أبيه [عن أبيه] [1] عن جَدِّه، عن صهيب، قال: لقد صَحِبتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قبل أن يُوحى إليه [2]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে সেই সময়ও ছিলাম যখন তাঁর প্রতি ওহী নাযিল হয়নি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] سقط من النسخ الخطية واستدركناه من مصادر التخريج وهذه السلسلة قد روي بها خبر آخر كما تقدم تخريجه عند الحديث (5807). (293) - ومن طريقه أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 24/ 219 - عن أبي بكر محمد بن حمدون بن خالد، عن أبي الزِّنباع رَوح بن الفَرَج، بهذا الإسناد، غير أنه سقط ذكر صيفي من مطبوع ابن عساكر، فيُستدرك من كتاب المَخلدي.وأخرجه البزار (2103) عن إبراهيم بن عبد الله بن الجنيد، والطبراني في "المعجم الكبير" (7303) ومن طريقه أخرجه الضياء المقدسي في "الأحاديث المختارة" 8/ (70) - عن يحيى بن أيوب العَلّاف المصري، كلاهما عن يوسف بن عدي، به. لكن لفظ رواية البزار: صحبتُ النبي صلى الله عليه وسلم قبل أن يدخل المدينة!وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 7/ 169 عن يعقوب بن حميد بن كاسب، عن يوسف بن محمد، به.
[2] محتمل للتحسين إن شاء الله من أجل يوسف بن محمد بن يزيد بن صيفي بن صهيب، فقد تقدَّم الكلام عليه عند (5770)، وقال ابن عدي بعد أن ذكر هذا الخبر وغيره من رواية يوسف بن محمد 7/ 169: يوسف بن محمد يروي عن أبيه عن جده هذه الأحاديث، وهذه تُحتَمل.وأخرجه أبو محمد الحسن بن أحمد المَخْلَدي في "الفوائد المنتخبة" بانتخاب أبي عمرو البّحيري (293) - ومن طريقه أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 24/ 219 - عن أبي بكر محمد بن حمدون بن خالد، عن أبي الزِّنباع رَوح بن الفَرَج، بهذا الإسناد، غير أنه سقط ذكر صيفي من مطبوع ابن عساكر، فيُستدرك من كتاب المَخلدي.وأخرجه البزار (2103) عن إبراهيم بن عبد الله بن الجنيد، والطبراني في "المعجم الكبير" (7303) ومن طريقه أخرجه الضياء المقدسي في "الأحاديث المختارة" 8/ (70) - عن يحيى بن أيوب العَلّاف المصري، كلاهما عن يوسف بن عدي، به. لكن لفظ رواية البزار: صحبتُ النبي صلى الله عليه وسلم قبل أن يدخل المدينة!وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 7/ 169 عن يعقوب بن حميد بن كاسب، عن يوسف بن محمد، به.
5811 - أخبرنا أبو العباس إسماعيل بن عبد الله بن محمد بن ميكال، أخبرنا عَبْدانُ الأهوازي، حدثنا زيد بن الحَرِيش، حدثنا يعقوب بن محمد الزُّهْري، حدثنا حُصين بن حُذيفة بن صَيفيّ بن صُهيب، حدثني أبي وعُمومتي، عن سعيد بن المسيّب، عن صهيب، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أُرِيتُ دار هجرتِكم؛ سَبَخةً بين ظَهْرانَيْ حَرَّةٍ، فإمّا أن تكون هَجَرًا أو تكون يَثرِبَ".قال: وخرج رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إلى المدينة، وخرج معه أبو بكر، وكنتُ قد هَمَمتُ بالخروج معه، فصَدّني فِتيانٌ من قريش، فجعلتُ ليلتي تلك أقومُ ولا أقعُد، فقالوا: قد شغلهُ الله عنكم ببَطنِه، ولم أكن شاكيًا، فقاموا فلَحِقَني منهم ناسٌ بعدما سِرتُ بَريدًا ليردُّوني، فقلت لهم: هل لكم أن أُعطِيَكم أواقيَّ [1] من ذهب، وتُخَلُّون سَبيلي، وتَفُون [2] لي؟ فتَبِعتُهم إلى مكةَ، فقلتُ: احفِرُوا تحت أُسكُفَّةِ الباب، فإنَّ تحتها الأواقيَّ [3]، واذهَبُوا إلى فُلانةَ، فخُذُوا الحُلَّتين، وخرجتُ حتى قَدِمتُ على رسولِ الله صلى الله عليه وسلم[قُباءً] [4] قبل أن يَتحوَّل منها، فلما رآني قال: "يا أبا يحيى، رَبحَ البيعُ" ثلاثًا، فقلتُ: يا رسول الله، ما سبَقَني إليك أحدٌ، وما أخبركَ إِلَّا جبريلُ عليه السلام [5]. هذا حديث صحيح الإسناد لِولَد صُهيبٍ، ولم يُخرجاه.
সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (সুহাইব) বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমাকে তোমাদের হিজরতের স্থান দেখানো হয়েছে, যা দুটি হাররার (লাভার ভূমি) মাঝে লবনাক্ত ভূমি (সাবখা)। হয় তা হবে হাজার অথবা ইয়াছরিব।"
তিনি (সুহাইব) বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মদীনার উদ্দেশ্যে বের হলেন এবং তাঁর সাথে আবূ বকরও বের হলেন। আমিও তাঁদের সাথে বের হওয়ার ইচ্ছা করেছিলাম, কিন্তু কুরাইশের যুবকেরা আমাকে বাধা দিল। আমি সেই রাতটি দাঁড়িয়ে কাটিয়ে দিলাম, বসলাম না। তখন তারা বলল: আল্লাহ তাকে তোমাদের থেকে তার পেট (পীড়া) দিয়ে ব্যস্ত রেখেছেন। অথচ আমি কোনো অসুস্থ ছিলাম না। এরপর তারা চলে গেল। আমি এক বারিদ পথ চলে যাওয়ার পর তাদের মধ্যে কিছু লোক আমাকে ফিরিয়ে আনার জন্য আমার পিছু নিল। আমি তাদের বললাম: যদি আমি তোমাদেরকে কয়েক উকিয়া সোনা দেই, আর তোমরা আমার পথ ছেড়ে দাও এবং আমার সঙ্গে চুক্তি রক্ষা করো, তাতে কি তোমরা রাজি হবে? অতঃপর আমি তাদের অনুসরণ করে মক্কায় ফিরে গেলাম এবং বললাম: তোমরা দরজার চৌকাঠের নিচে খুঁড়ো, তার নিচে সেই উকিয়াগুলো (সোনা) আছে। আর অমুক মহিলার কাছে যাও এবং দুটি জোড়া কাপড় (হুল্লাতাইন) নিয়ে নাও। এরপর আমি মক্কা ত্যাগ করলাম এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে কুবায় পৌঁছে গেলাম, তিনি সেখান থেকে স্থানান্তরিত হওয়ার আগেই। তিনি যখন আমাকে দেখলেন, তখন বললেন: "হে আবূ ইয়াহইয়া! তোমার ব্যবসা লাভজনক হয়েছে," – এই কথাটি তিনি তিনবার বললেন। আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার আগে কেউ আপনার কাছে পৌঁছায়নি, আর আপনাকে জিবরীল (আঃ) ছাড়া অন্য কেউ খবর দেয়নি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] جاء في نسخنا الخطية: أواقًا، وهو جائز مستعملٌ عند بعض العرب لكن الوجه هو ما أثبتناه، كما مضى بيانه برقم (2240). وقد جاء في "تلخيص الذهبي" على الوجه.
[2] تحرَّف في (ز) و (ب) إلى: وتنفقون، وفي (ص) و (م) إلى: وسعون، هكذا غير معجمة، والمثبت على الصواب من "تلخيص الذهبي"، ومن "دلائل النبوة" للبيهقي حيث روى هذا الخبر 2/ 522 عن أبي عبد الله الحاكم، بسنده هذا.
5811 [3] - في (ز) و"تلخيص المستدرك" للذهبي: الأواق، وهو لغة لبعض العرب كما سبق، والمثبت من (ص) و (م) هو الوجه، وتحرَّف في (ب) إلى: الأوراق. والحرّة: أرضٌ ذاتُ حجارة سُوْد.وهَجَر: هي قاعدة البَحرين.وأُسكُفَّةُ الباب: عَتَبةُ الباب.والبَريدُ: أصله الدَّابةُ التي تحمل الرسائل، والرسولُ، والمسافة بين كل منزلين من منازل الطريق، وهي: أميالٌ اختُلف في عددها.
5811 [4] - سقط من النسخ واستدركناه من "دلائل النبوة" للبيهقي، ومن طريقه أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 24/ 227، وجاء في "تلخيص الذهبي" بعد قوله: يتحول منها ما نصه: يعني قُباء. والحرّة: أرضٌ ذاتُ حجارة سُوْد.وهَجَر: هي قاعدة البَحرين.وأُسكُفَّةُ الباب: عَتَبةُ الباب.والبَريدُ: أصله الدَّابةُ التي تحمل الرسائل، والرسولُ، والمسافة بين كل منزلين من منازل الطريق، وهي: أميالٌ اختُلف في عددها.
5811 [5] - إسناده فيه لِينٌ من أجل يعقوب بن محمد الزُّهري، ففي حديثه لينٌ، وأما زيد بن الحَريش وحُصين بن حذيفة فقد روى عن كلٍّ منهما جمعٌ، وذكرهما ابن حبان في "الثقات"، فلا بأس بهما، وحذيفة بن صَيْفيٍّ - وإن كان مجهولًا - متابع بذكر إخوانه، فيبقى الشأن في لين يعقوب بن محمد الذي انفرد بالخبر بهذه السياقة؛ وقد خولف في وصل الخبر بذكر صهيب، كما سيأتي بيانه، على أنَّ هذا الخبر قد ورد في الجملة لكن بغير هذه السياقة.عَبْدان الأهوازي: هو عبد الله بن أحمد بن موسى، وعَبْدان لقبُه.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 522، ومن طريقه ابن عساكر 24/ 227 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (7296)، وعنه أبو نُعيم في "حلية الأولياء" 1/ 152 عن أحمد بن محمد المُعيَّني الأصبهاني، عن زيد بن الحَريش، به.وأخرجه البزار في "مسنده" (2085) عن محمد بن معمر البَحْراني، عن يعقوب بن محمد، به.مختصرًا إلى قوله: هممتُ بالخروج معه، ولم يذكر في إسناده عمومة حصين بن حذيفة.وانظر ما تقدَّم برقم (5805).وانظر حديثي جرير السالف برقم (4304)، وعائشة السالف برقم (4308).وأما قصة صهيب مع بعض فتيان قريش لدى هجرته، فقد تقدم عند الرواية (5805 م) تخريجه من رواية علي بن زيد بن جُدعان، عن سعيد بن المسيب مرسلًا، وبسياقة مختصرة تختلف عن سياقة يعقوب بن محمد الزهري المطولة التي انفرد بها هنا، وعلي بن زيد وإن كان ضعيفًا، لكن سياقته للخبر لها شواهدُ، فهي أصح، والله تعالى أعلم.والسَّبَخَة: الأرض التي تعلُوها المُلُوحة، ولا تكاد تُنبت إلّا بعضَ الشجر. والحرّة: أرضٌ ذاتُ حجارة سُوْد.وهَجَر: هي قاعدة البَحرين.وأُسكُفَّةُ الباب: عَتَبةُ الباب.والبَريدُ: أصله الدَّابةُ التي تحمل الرسائل، والرسولُ، والمسافة بين كل منزلين من منازل الطريق، وهي: أميالٌ اختُلف في عددها.
5812 - أخبرني أبو عبد الله محمد بن علي الصَّنْعاني بمكة، حدثنا عليُّ بن المُبارك الصَّنْعاني، حدثنا زيد بن المبارك، حدثنا محمد بن ثَوْر، عن ابن جُرَيج، في قولِ الله عز وجل: {وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يَشْرِي نَفْسَهُ ابْتِغَاءَ مَرْضَاتِ اللَّهِ} [البقرة: 207]، نزلت في صهيب بن سِنان وأبي ذرٍّ، وإنَّ الذي أدرَكَ صهيبًا بطريق المدينة قنفُذُ بن عُمَير [1] بن جُدْعان. قال ابن جُريج: وزَعَمَ عِكْرمةُ مولى ابن عباس: أَنَّ صُهيبًا افتَدَى من مكةَ أهله بماله ثم خرج مهاجرًا، فأدرَكُوه بالطريق، فأخرج لهم ما بقي من مالِه [2].
ইবনু জুরাইজ থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্ আযযা ওয়া জাল্লা-এর বাণী: {আর মানুষের মধ্যে এমনও আছে, যে আল্লাহর সন্তুষ্টি লাভের জন্য নিজকে বিক্রি করে দেয় (উৎর্গ করে দেয়)} [সূরা বাকারা: ২০৭]-এর ব্যাখ্যায়, তা সুহাইব ইবনু সিনান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ব্যাপারে নাযিল হয়েছিল। আর সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে মদীনার পথে কুনফুয ইবনু উমায়ের ইবনু জুদ‘আন ধরেছিল। ইবনু জুরাইজ বলেন, ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাওলা ইকরিমা বলেছেন যে, সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মক্কা থেকে তার সম্পদ দিয়ে তার পরিবারকে মুক্ত করেছিলেন এবং এরপর হিজরতের উদ্দেশ্যে বেরিয়েছিলেন। পথে লোকেরা তাকে ধরে ফেললে তিনি তার অবশিষ্ট সম্পদও তাদের হাতে তুলে দেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) و (م) إلى: عميرة، وفي (ب) إلى عمرة، والمثبت على الصواب من (ص) وفاقًا لكتب التراجم والرجال.
[2] غريب بذكر أبي ذر الغفاري.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (7289)، ومن طريقه ابن عساكر 24/ 229 عن علي بن المبارك، به.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 2/ 321 من طريق حجاج، عن ابن جريج.وانظر قصة إسلام أبي ذر وهجرته فيما سلف برقم (5547).
5813 - حدثنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنْبري، حدثنا أبو عبد الله محمد بن إبراهيم العَبْدي، حدثنا عمرو بن الحُصين العُقَيلي، حدثنا فُضَيل بن سليمان النُّمَيري، حدثنا موسى بن عُقبة، عن عطاء بن أبي مروان، عن أبيه، عن عبد الرحمن بن مُغِيث، عن كعب الأحبار، حدثني صهيب بن سِنان، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يدعو: "اللهُمَّ إنك لستَ بإلهٍ استَحدَثْناهُ، ولا بربٍّ ابتدَعْناهُ، ولا كان لنا قَبلَك من إلهٍ نلجأُ إليه ونَذَرُكَ، ولا أعانك على خَلْقِنا أحدٌ فنُشْرِكَه فيك، تباركتَ وتعالَيتَ". قال كعبُ الأحبار: كان نبيُّ الله [داود] [1] يَدعُو به [2].صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
সুহাইব ইবনু সিনান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই বলে দুআ করতেন: "হে আল্লাহ! আপনি এমন কোনো ইলাহ (উপাস্য) নন, যাকে আমরা নতুনভাবে আবিষ্কার করেছি, আর না আপনি এমন কোনো রব, যাকে আমরা উদ্ভাবন করেছি। আপনার পূর্বে আমাদের জন্য এমন কোনো ইলাহ ছিল না, যার কাছে আমরা আশ্রয় নিতাম এবং আপনাকে ছেড়ে দিতাম। আর আমাদের সৃষ্টিতে কেউ আপনাকে সাহায্য করেনি যে, আমরা তাকে আপনার সাথে শরীক করব। আপনি বরকতময় ও সুউচ্চ।" কা'ব আল-আহবার বলেন, আল্লাহর নবী [দাউদ] (আঃ) এই দুআ করতেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] سقط اسم النبي داود ولا بد من ذكره وفاقًا لسائر مصادر تخريج الخبر.
[2] إسناده تالف بمرّة من أجل عمرو بن الحصين العُقيلي، فهو متروك الحديث، وقد تفرد بهذا الخبر كما قال أبو نُعيم في "حلية الأولياء" 6/ 47، وفضيل بن سليمان ليّن الحديث، وقد تابع عمرَو بنَ الحُصين عليه عمرُو بنُ مالك الراسِبيُّ وهو من بابته فلا اعتداد بمتابعته.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (7300) وفي "الدعاء" (1450)، وعنه أبو نُعيم الأصبهاني في "حلية الأولياء" 1/ 155 و 373 و 6/ 47 عن إبراهيم بن هاشم البغوي، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 17/ 108 من طريق محمد بن أيوب البجلي - وهو ابن الضُّريس - كلاهما عن عمرو بن الحُصين، بهذا الإسناد. غير أنَّ ابن الضريس سمى التابعي عبد الله بن مُعتِّب بدل عبد الرحمن بن مُغيث.وأخرجه أبو الشيخ في "العظمة" (114)، وعنه أبو نعيم في "الحلية" 1/ 155 من طريق عمرو بن مالك الراسبي، عن فُضيل بن سليمان، عن موسى بن عقبة، عن عطاء بن أبي مروان الأسلمي، عن أبيه، عن كعب عن صهيب. وعمرو بن مالك متروك أيضًا.وفي الباب عن عائشة عند يحيى بن سلام في "تفسيره" 1/ 170، والبيهقي في "الدعوات الكبير" (70) من طريقين عن عائشة: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان يقوله إذا فرغ من ركعتي الفجر. وهو واهٍ.
5814 - حدثني علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا بِشْر بن موسى، حدثنا الحُمَيدي، حدثنا علي بن عبد الحميد بن زياد بن صَيفي بن صهيب، حدثني أبي، عن أبيه، عن جده، عن صهيب، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "لا تُبغِضوا [1] صُهيبًا" [2].صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
সুহায়ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "তোমরা সুহায়বকে ঘৃণা করো না।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز): تغُضُّوا، والمعنى: تَنقُصوا.
[2] إسناده ضعيف لجهالة حال علي بن عبد الحميد وأبيه.وأخرجه أبو جعفر العقيلي في "الضعفاء" (979)، ومن طريقه ابن عساكر 24/ 234 عن بشر بن موسى، بهذا الإسناد.
5815 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن محمد البغدادي بنَيسابور، حدثنا أبو الزِّنباع، حدثنا يوسف بن عَديّ، حدثنا يوسف بن محمد بن يزيد بن صَيفي بن صُهيب، عن أبيه، عن جده عن صهيب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أحِبُّوا صهيبًا حُبَّ الوالدةِ لولدِها" [1].
সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "তোমরা সুহাইবকে এভাবে ভালোবাসো, যেভাবে মাতা তার সন্তানকে ভালোবাসে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ليِّن لتفرُّد يوسف بن محمد وأبيه، به، وأبوه تفرد بالرواية عنه ابن محمد، لكن ذكره ابن حبان في "ثقاته"، وقد وهَّى هذا الإسناد الذهبي في "تلخيصه". أبو الزِّنْباع: هو روح بن الفرج القطان المصري.وأخرجه أبو محمد الحسن بن أحمد المَخْلَدي في "الفوائد المنتخبة" بانتخاب أبي عمرو محمد بن أحمد البَحِيري (292) عن أبي بكر محمد بن حمدون، عن أبي الزنباع، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار (2102) عن إبراهيم بن عبد الله بن الجُنيد، وابن عدي في "الكامل" 7/ 169، ومن طريقه ابن عساكر 24/ 234 - 235 من طريق أبي زرعة الرازي، وابن عساكر 5/ 453 - 454 من طريق أبي علي أحمد بن محمد بن موسى النوفلي، ثلاثتهم عن يوسف بن عدي به.وقال ابن عدي بعد إيراده جملة أحاديث بهذا الإسناد: يوسف بن محمد يروي عن أبيه عن جده هذه الأحاديث، وهذه تُحتَمل. 24/ 236 من طريق عفان بن مسلم، كلاهما عن جرير بن حازم به.
5816 - حدثني علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا سليمان بن حَرْب، عن جرير بن حازم، [عن يعلى بن حَكيم] [1] عن سليمان بن أبي عبد الله، قال: كان صهيبٌ يقول لنا: هلُمُّوا نُحدِّثْكم عن مَغازِينا، فأما أن نقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلا [2]. قال الحاكم: بيانُ هذا الحديثِ:
সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আমাদেরকে বলতেন: তোমরা এসো, আমরা তোমাদেরকে আমাদের যুদ্ধাভিযানসমূহ (মাগাযী) সম্পর্কে বর্ণনা করব। কিন্তু আমরা যে বলব, 'রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন'—তা নয়।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] سقط اسم يعلى بن حكيم - وهو الثقفي المكي ثم البصري - من أصول "المستدرك" ولا بدَّ من إثباته، فقد ثبت ذكره في رواية سليمان بن حرب عند ابن سعد 3/ 210، وهو ثابت في رواية غيره أيضًا. 24/ 236 من طريق عفان بن مسلم، كلاهما عن جرير بن حازم به.
[2] إسناده حسنٌ إن شاء الله من أجل سليمان بن أبي عبد الله، فهو تابعي كبير، قال البخاري وابن حبان: أدرك المهاجرين، وزاد أبو حاتم الرازي: والأنصار. وذكره ابن حبان في "الثقات".وأخرجه ابن سعد في "طبقاته" 3/ 210، ومن طريقه البلاذُري في "أنساب الأشراف" 1/ 183، وابن عساكر 24/ 236 عن سليمان بن حرب، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن حبان في "الثقات" 4/ 314 من طريق وهب بن جرير بن حازم وابن عساكر 24/ 236 من طريق عفان بن مسلم، كلاهما عن جرير بن حازم به.
5817 - ما حدَّثَناهُ أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الخضر بن أبان الهاشمي، حدثنا سَيّار بن حاتم، حدثنا جعفر بن سُليمان، حدثنا عمرو بن دينار قُهْرَمانُ آل الزُّبَير، عن صيفي بن صُهيب قال: قلت لأبي صهيبٍ: ما لكَ لا تُحدّثُ عن رسول الله صلى الله عليه وسلم كما يُحدِّث أصحابُك؟ قال: أيْ بنيَّ، قد سمعتُ كما سَمِعُوا، ولكن يَمنعُني من الحديث أني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن كَذَبَ عَلَيَّ متعمّدًا، كُلِّف يوم القيامة أن يَعقِدَ طرفَي شَعِيرةٍ، ولن يَعقِدَها" [1].
আবু সুহায়ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সায়ফি ইবনু সুহায়ব বলেন, আমি আবু সুহায়বকে জিজ্ঞাসা করলাম: আপনার অন্যান্য সঙ্গীরা যেভাবে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে হাদীস বর্ণনা করেন, আপনি কেন সেভাবে বর্ণনা করেন না? তিনি বললেন: হে আমার পুত্র! আমিও তাদের মতো শুনেছি। কিন্তু আমাকে হাদীস বর্ণনা করা থেকে বিরত রাখে (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর) এই বাণী, যা আমি তাঁকে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি আমার উপর ইচ্ছাকৃতভাবে মিথ্যা আরোপ করে, কিয়ামতের দিন তাকে একটি যব-শস্যের দুই মাথা বাঁধতে বলা হবে, কিন্তু সে তা বাঁধতে সক্ষম হবে না।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف عمرو بن دينار قهرمان آل الزبير، كما قال الذهبي في "تلخيصه"، والخضر بن أبان الهاشمي ضعيف أيضًا لكنه متابع، فبقي الشأن في عمرو بن دينار، وقد وهم في لفظ الحديث كما سيأتي.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 24/ 237، وابن الجوزي في "الموضوعات" (81) من طريق أبي عُبيد الله حماد بن الحسن بن عنبسة الوراق، عن سيار بن حاتم، بهذا الإسناد.وأخرجه كذلك عبدُ الرزاق في "مصنفه" (10445)، والهيثم بن كُليب الشاشي في "مسنده" (986) و (987)، وعبد الباقي بن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 19، والطبراني في جزء "طرق حديث من كذب عليَّ متعمدًا" (134)، وابن عُدي في "الكامل" 1/ 4، وابنُ عساكر 24/ 236 - 237 وابن الجوزي (80) من طرق عن جعفر بن سليمان، به وكلهم أبهم في روايته اسمَ ولد صُهيب الذي حدَّث عَمرو بن دينار، فلم تقع تسميته إلّا في رواية سيار بن حاتم.وقد صحَّ أنَّ هذه العقوبة إنما تقع على من يتحلَّم بحُلْم لم يَرَهُ، كما في حديث ابن عباس عند البخاري (7042) بلفظ: "من تحلَّم بُحُلم لم يَرَهُ كُلِّف أن يعقد بين شعيرتين، ولن يفعل". كتاب الليث بن سعد وقد روي مثله عن عبد الله بن عمر بن الخطاب بسند صحيح.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (7287) عن مطّلب بن شعيب، عن عبد الله بن صالح، بهذا الإسناد.وأخرجه ضمن خبر طعن عمر بن الخطاب ووفاته مطولًا: الطبري في "تاريخه" 4/ 190 - 193، والآجُرّي في "الشريعة" (1399) من طريق عبد العزيز بن أبي ثابت الزُّهري، عن عبد الله بن جعفر المَخْرمي، عن أبيه، عن المسور بن مخرمة. وعبد العزيز متروك الحديث، وجعفر والد عبد الله لا يُعرف.وقد صحَّ أمرُ عمر بن الخطاب بعد أن طُعن بصلاة صهيب بالناس من حديث عبد الله بن عمر بن الخطاب عند عبد الرزاق (9776)، وعمر بن شبّة في "تاريخ المدينة" 3/ 924 من طريقين صحيحين عن ابن عمر.
5818 - أخبرنا أبو بكر محمد بن جعفر الأَدَميّ القارئ ببغداد، حدثنا محمد بن إسماعيل السُّلَمي، حدثنا عبد الله بن صالح، حدثني الليث، عن عُبيد الله بن عمر، عن ابن شِهاب، عن المِسوَر بن مَخْرَمة، قال: لمّا طُعِنَ عمرُ، أَمَرَ صُهيبًا مولى بني جُدْعان أن يُصلّيَ بالناس [1].
মিসওয়ার ইবনে মাখরামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ছুরিকাঘাত করা হলো, তখন তিনি বনু জুদ'আন-এর আযাদকৃত গোলাম সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নির্দেশ দিলেন যেন তিনি লোকদের নিয়ে সালাত আদায় করান।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل عبد الله بن صالح - وهو كتاب الليث بن سعد وقد روي مثله عن عبد الله بن عمر بن الخطاب بسند صحيح.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (7287) عن مطّلب بن شعيب، عن عبد الله بن صالح، بهذا الإسناد.وأخرجه ضمن خبر طعن عمر بن الخطاب ووفاته مطولًا: الطبري في "تاريخه" 4/ 190 - 193، والآجُرّي في "الشريعة" (1399) من طريق عبد العزيز بن أبي ثابت الزُّهري، عن عبد الله بن جعفر المَخْرمي، عن أبيه، عن المسور بن مخرمة. وعبد العزيز متروك الحديث، وجعفر والد عبد الله لا يُعرف.وقد صحَّ أمرُ عمر بن الخطاب بعد أن طُعن بصلاة صهيب بالناس من حديث عبد الله بن عمر بن الخطاب عند عبد الرزاق (9776)، وعمر بن شبّة في "تاريخ المدينة" 3/ 924 من طريقين صحيحين عن ابن عمر.