আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
5839 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن أحمد بن بُطّة الأصبهَاني، حدثنا الحسن بن الجَهْم، حدثنا الحسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عُمر، حدثنا موسى بن محمد بن إبراهيم التَّيمي، عن أبيه وعبد الله بن جعفر، عن ابن أبي عَون، وسعد بن إبراهيم ومحمد بن صالح، عن عاصم بن عمر، في مُؤاخاةِ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم بين المهاجرين والأنصار من بني هاشم: عليُّ بن أبي طالب وسَهْل بن حُنيف رضي الله عنهما [1].5839 م - قال ابن عُمر: وشَهِدَ سَهْل بن حنُيف بدرًا وأُحدًا، وثَبت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم أُحد حين انكشفَ الناسُ عنه، وبايعه على الموت، وجعل يَنضَحُ يومئذ بالنَّبْل عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "نَبِّلُوا سهلًا، فإنه سهلٌ".قال: وشهدَ أيضًا الخندقَ والمَشاهدَ كلَّها مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، وشهد مع علي بن أبي طالب صِفِّينَ [2].
আসিম ইবনে উমর থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কর্তৃক মুহাজির ও আনসারদের মধ্যে বনু হাশিমের পক্ষ থেকে যে ভ্রাতৃত্ব বন্ধন (মুআখাত) স্থাপন করা হয়েছিল, তাদের মধ্যে ছিলেন আলী ইবনে আবী তালিব ও সাহল ইবনে হুনাইফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।
ইবনে উমর (বর্ণনাকারী) বলেন: সাহল ইবনে হুনাইফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বদর ও উহুদ যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন। উহুদের দিন যখন লোকেরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে ছেড়ে চলে গিয়েছিল, তখনও তিনি তাঁর সাথে অবিচল ছিলেন এবং মৃত্যুর উপর বাইয়াত করেছিলেন। তিনি সেদিন তীর ছুঁড়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে রক্ষা করছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "সাহলকে তীর দাও, কারণ সে হচ্ছে 'সাহল' (সহজ/নমনীয়)।" তিনি (বর্ণনাকারী) আরও বলেন: তিনি (সাহল) খন্দক এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে সকল অভিযানেও অংশগ্রহণ করেছিলেন। আর তিনি আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে সিফফীনের যুদ্ধেও অংশ নিয়েছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وأخرجه ابن سعد في "طبقاته" 3/ 21 عن محمد بن عمر - وهو الواقدي - بالأسانيد الثلاثة.وقد ذكر ابن إسحاق ما يخالف هذا في شأن المؤاخاة، وأنَّ المؤاخاة كانت بين النبي صلى الله عليه وسلم وبين علي بن أبي طالب كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 505، وأنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أخذ بيد علي بن أبي طالب، فقال: هذا أخي.وفي حديث علي بن أبي طالب الذي تقدَّم برقم (4685) قال: والله إني لأخُوه ووليُّه وابن عمّه. وإسناده فيه لِينٌ.
[2] ذكر الواقدي في "مغازيه" 1/ 253 قصة سهل بن حنيف يوم أُحُد وقول النبي صلى الله عليه وسلم يومئذٍ "نبِّلو سهلًا … " مُصدِّرًا ذلك بقوله: قالوا وهذا يعني أنه رواه عن رجاله الذين تقدَّم ذكرهم في خبر المؤاخاة قبله.ووقع عند ابن سعد في "طبقاته" 3/ 437 جميع ما جاء هنا من قوله هو مصدِّرًا ذلك بقوله: قالوا: وآخي رسول الله صلى الله عليه وسلم بين سهل بن حنيف وعلي بن أبي طالب، شهد سهل بدرًا وأحدًا …
5840 - قال ابن عُمر: حدثني عبد الرحمن بن عبد العزيز، عن محمد بن أبي أُمامة بن سَهْل، عن أبيه، قال: مات سَهل بن حُنيف بالكوفة بعد انصرافهم من صِفّين سنةَ ثمانٍ وثلاثين، وصلَّى عليه أميرُ المؤمنين علي بن أبي طالب [1].
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাহল ইবনে হুনাইফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সিফফিনের যুদ্ধ থেকে তাঁদের ফিরে আসার পর আটত্রিশ (৩৮) হিজরিতে কুফায় ইন্তেকাল করেন। আর আমীরুল মুমিনীন আলী ইবনে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর জানাযার সালাত আদায় করেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وأخرجه ابن سعد في "طبقاته" 3/ 437 عن محمد بن عمر الواقدي، بهذا الإسناد.
5841 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن علي الصَّنْعاني بمكة حرسها اللهُ، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا ابن عُيينة، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن الشَّعبي، عن عبد الله بن مَعْقِل: أنَّ عليًّا صلَّى على سَهْل بن حنُيف، فكبّر عليه ستًّا، ثم الْتفَتَ إلينا فقال: إنه من أهل بدرٍ [1].
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি সাহল ইবনু হুনাইফের জানাযার সালাত আদায় করলেন এবং তার উপর ছয় তাকবীর দিলেন। অতঃপর তিনি আমাদের দিকে ফিরে বললেন: "নিশ্চয়ই সে বদর যুদ্ধে অংশগ্রহণকারীদের অন্তর্ভুক্ত।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. ولابن عُيينة - وهو سفيان - فيه ثلاثة أسانيد، أحدها هذا، كما سيأتي بيانه. الشَّعبي: هو عامر بن شَراحيل.وقد رواه عن سفيان بن عيينة بهذا الإسناد جماعةٌ، منهم عبد الرزاق كما في رواية المصنِّف وهو في "المصنَّف" (6403)، وأبو عُبيد الله المخزومي سعيد بن عبد الرحمن، عند أبي القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (987)، ومحمد بن الصبّاح عند أبي نعيم في "معرفة الصحابة" (3282).وقد تابع ابنَ عُيينة على هذا الإسناد جماعة الحفاظ منهم محمد بن يزيد الواسطي عند الشافعي في "الأم" 8/ 413، ويزيد بن هارون ويعلى بن عبيد عند ابن سعد في "الطبقات" 3/ 438، وأبو عوانة عند البخاري في "تاريخه الأوسط" 1/ 562، ووكيع عند ابن أبي شيبة 3/ 305، ويحيى القطان عند الطحاوي في "شرح معاني الآثار" 1/ 496.وأخرجه البخاري في "صحيحه" (4004) عن محمد بن عباد، عن ابن عيينة، قال: أنفَذَه لنا ابن الأصبهاني، سمعه من ابن مَعقل: أنَّ عليًّا كبّر على سهل بن حُنيف، فقال: إنه شهد بدرًا. هكذا لم يذكر البخاريُّ عدد التكبيرات هنا، مع أنه أخرج الخبر بهذا الإسناد نفسه في "تاريخه الأوسط" 1/ 559 وقال: كبّر ستًّا. وأخرجه البخاري أيضًا في "تاريخه الكبير" 4/ 97 من طريق شعبة بن الحجاج عن ابن الأصبهاني، فقال: كبّر عليه ستًّا. وانظر "فتح الباري" لابن حجر 12/ 84.ولابن عُيينة فيه إسناد ثالث عن يزيد بن أبي زياد عن عبد الله بن مَعقِل عند عبد الرزاق (6399)، والبخاري في "تاريخه الأوسط" 1/ 559، وغيرهما.قال أبو مسعود الدمشقي فيما نقله عنه المزي في "تحفة الأشراف" 7/ 415 - 416: هذا ممّا سمعه ابن عيينة أولًا من إسماعيل بن أبي خالد عن الشعبي عن عبد الله بن مَعقِل، ثم سمعه من ابن الأصبهاني عن ابن مَعقِل. من "الجرح والتعديل" لابن أبي حاتم 8/ 123، ومن تاريخ الإسلام للذهبي 1/ 52، و "سير أعلام النبلاء" قسم السيرة 1/ 332 حيث أورد هذا الخبر بعينه، ونسب الرجل حِمْيريًا.
5842 - حدثنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنْبري، حدثنا محمد بن إبراهيم العَبْدي، حدثنا يحيى بن عبد الله بن بُكَير، حدثني محمد بن يحيى بن زكريا الحِمْيَري [1]، حدثنا العلاء بن كَثير، حدثني أبو بكر بن عبد الرحمن بن المِسْور بن مَخْرمة، حدثني أبو أُمامة بن سَهْل، قال: قال لي أبي: يا بُنيّ، لقد رأيتُنا يومَ بدر، وإنَّ أحدَنا يُشِيرُ بسيفِه إلى رأسِ المُشرك، فيَقَعُ رأسه عن جَسدِه قبل أن يَصِلَ إليه [2].صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
সহল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন, আমার পিতা আমাকে বললেন: হে আমার বৎস, আমরা বদরের দিনের দৃশ্য দেখেছি, যখন আমাদের কেউ মুশরিকের মাথার দিকে তার তলোয়ার দিয়ে ইশারা করত, তখন তার তলোয়ার সেখানে পৌঁছানোর আগেই তার মাথা দেহ থেকে বিচ্ছিন্ন হয়ে পড়ে যেত।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى الحميدي، بالدال المهملة بدل الراء المهملة، والتصويب من "الجرح والتعديل" لابن أبي حاتم 8/ 123، ومن تاريخ الإسلام للذهبي 1/ 52، و "سير أعلام النبلاء" قسم السيرة 1/ 332 حيث أورد هذا الخبر بعينه، ونسب الرجل حِمْيريًا.
[2] إسناده ضعيف لجهالة حال أبي بكر بن عبد الرحمن بن المسور بن مخرمة، وقد تفرَّد به، فلا يُحتمل تفرُّده.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 56 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (5556) - وعنه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (3284) - والطبري في "تاريخه" 2/ 453 - 454 من طريقين عن يحيى بن عبد الله بن بُكَير، به.
5843 - حدثنا أبو علي الحافظ، أخبرنا إسحاق بن إبراهيم المصري، حدثنا أحمد بن صالح، حدثنا سفيان بن عُيينة، عن عمرو بن دينار، عن عِكرمةَ، عن ابن عباس، قال: دخَل عليٌّ بسَيفِه على فاطمةَ وهي تَغسِل الدمَ عن وجهِ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: خُذِيه، فلقد أحسنتُ به القِتالَ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إن كنتَ قد أحسنتَ القتالَ اليومَ، فلقد أحسنَ سهلُ بن حُنيف، وعاصمُ بن ثابت، والحارثُ بن الصِّمَّة، وأبو دُجانةَ" [1].هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.وفيه تأديبٌ لمن يَمُنُّ على مَن هو أفضلُ منه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর তলোয়ার নিয়ে ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলেন, যখন তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুখমণ্ডল থেকে রক্ত ধুয়ে দিচ্ছিলেন। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, এটা নাও (আমার তরবারি)। কারণ আমি এর দ্বারা উত্তমরূপে যুদ্ধ করেছি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, তুমি যদি আজ উত্তমরূপে যুদ্ধ করে থাকো, তবে সাহল ইবনু হুনাইফ, আসিম ইবনু সাবিত, আল-হারিছ ইবনুস সিম্মাহ এবং আবূ দুজানাও (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উত্তমরূপে যুদ্ধ করেছেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسنٌ لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات لكنه اختُلف في وصله وإرساله، كما تقدَّم بيانه برقم (4355). إسحاق بن إبراهيم المصري: هو ابن يونس المعروف بالمنجنيقي الورّاق.
5844 - حدثنا أبو علي الحسين بن علي الحافظ، أخبرنا إسحاق بن إبراهيم المصري، حدثنا أحمد بن صالح، حدثنا سفيان بن عُيينة، عن عمرو بن دينار، عن عِكْرمة، عن ابن عباس، قال: دخَل عليٌّ على فاطمةَ وهي تَغسِل الدمَ عن وجهِ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكَر الحديثَ كما أملَيتُه [1]سمعت أبا عليٍّ الحافظ يقول: لم نَكتبُه موصولًا إلَّا عن أبي يعقوبَ بإسناده، والمشهورُ من حديثِ ابن عُيينة، عن عمرو بن دينار، عن عِكْرمة مرسلًا، وإنما يُعرَف هذا المتنُ من حديث أبي مَعشَرٍ، عن أيوبَ بن أبي أُمامة بن سهل، عن أبيه، عن جدِّه:
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলেন, তখন তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারা থেকে রক্ত ধুয়ে দিচ্ছিলেন। এরপর তিনি হাদীসটি বর্ণনা করলেন যেমনটি আমি বর্ণনা করেছিলাম। [১] আমি আবু আলী আল-হাফিযকে বলতে শুনেছি: আমরা এটিকে আবূ ইয়া'কূবের সনদ ছাড়া মাওসূল (সংযুক্ত সনদযুক্ত) হিসেবে লিখিনি। আর ইবনু উয়াইনা থেকে, তিনি আমর ইবনু দীনার থেকে, তিনি ইকরিমাহ থেকে বর্ণিত হাদীসের মশহূর (সুপরিচিত) রূপটি হলো মুরসাল (বিচ্ছিন্ন সনদযুক্ত)। আর এই মাতন (মূল পাঠ) কেবল আবূ মা'শার বর্ণিত হাদীস থেকেই পরিচিত, যিনি বর্ণনা করেছেন আইয়ূব ইবনু আবী উমামা ইবনু সাহল থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর দাদা থেকে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسن لغيره، وهو مكرر سابقه، ولم يظهر لنا سببُ تكراره له، اللهم إلّا أن يكون أراد تقييد شيخه أبي عليٍّ بتسميته باسمه في هذه الطريق، لئلا يلتبس بشيخه الآخر أبي علي الحَسَن بن علي بن داود المصري، ولا سيما أنَّ الرواية هنا عن إسحاق بن إبراهيم المصري، والله أعلم. فوق لفظ الجلالة في (ز)، وتحرَّف في (م) إلى: أحمد بن عبد.
5845 - حدثنا أبو سعيد أحمد بن يعقوبَ الثَّقَفي، حدثنا عمر بن حفص السَّدُوسي، حدثنا عاصم بن علي، حدثنا أبو مَعْشَر، عن أيوب بن أبي أمامة بن سَهْل بن حُنيف، عن أبيه، عن سهل بن حُنيف، قال: جاء عليٌّ إلى فاطمةَ يومَ أحُدٍ، فقال: أمسِكي سيَفي هذا، فلقد أحسنتُ به الضَّربَ اليومَ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إن كنتَ أحسنتَ به القِتالَ، فقد أحسنَه عاصمُ بن ثابت، وسَهلُ بن حُنيف، والحارثُ بن الصِّمَّة" [1].
সাহল ইবনু হুনাইফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উহুদের যুদ্ধের দিন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট আসলেন এবং বললেন: এই নাও আমার তরবারিটি ধরে রাখো। আমি আজ এর দ্বারা উত্তমভাবে আঘাত হেনেছি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি তুমি এর দ্বারা উত্তমরূপে যুদ্ধ করে থাকো, তবে আসিম ইবনু সাবিত, সহল ইবনু হুনাইফ এবং হারিস ইবনুস সিম্মাহও উত্তমরূপে যুদ্ধ করেছে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف أبي مَعْشَر: وهو نَجيح بن عبد الرحمن السِّنْدي.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (5564) عن عمر بن حفص السدوسي، بهذا الإسناد. لكن سقط من المطبوع ذكر أبي أمامة بن سهل.وأخرجه أحمد بن منيع في "مسنده" كما في "المطالب العالية" لابن حجر (4270/ 1) عن حُسين بن محمد، وأبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب" (4270/ 2) عن محمد بن بكار، كلاهما عن أبي مَعْشَر، به. فوق لفظ الجلالة في (ز)، وتحرَّف في (م) إلى: أحمد بن عبد.
5846 - حدثنا أبو جعفر أحمد بن عُبيدٍ [1] الحافظُ بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحُسين، حدثنا أبو اليَمَان، أخبرني شعيبٌ، عن الزُّهْري، أخبرني أبو أُمامة بن سهْل بن حُنيف، وكان من كُبَراء الأنصار، وآباؤهم الذين شهدوا بدرًا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم [2].صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
৫৮৪৬ - আমাদের কাছে হাদিস বর্ণনা করেছেন হামাদান-এর হাফিয আবূ জা'ফর আহমাদ ইবনু উবাইদ, তিনি বলেছেন, আমাদের কাছে হাদিস বর্ণনা করেছেন ইবরাহীম ইবনুল হুসাইন, তিনি বলেছেন, আমাদের কাছে হাদিস বর্ণনা করেছেন আবুল ইয়ামান, তিনি বলেছেন, আমাকে খবর দিয়েছেন শুআইব, তিনি (শুআইব) বর্ণনা করেছেন যুহরী থেকে, তিনি বলেছেন, আমাকে খবর দিয়েছেন আবূ উমামাহ ইবনু সাহল ইবনু হুনাইফ, যিনি ছিলেন আনসারদের বিশিষ্ট ব্যক্তিবর্গের অন্যতম, এবং তাঁর পূর্বপুরুষগণ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাথে বদর যুদ্ধে উপস্থিত ছিলেন। এটি বুখারী ও মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ, তবে তারা উভয়ে এটি বর্ণনা করেননি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (ب): أحمد بن عبيد الله، بزيادة لفظ الجلالة، والصواب ما في (ص): أحمد بن عُبيد وهو ابن جعفر الأسدي، انظر "سير أعلام النبلاء" 15/ 380، وقد وضع إشارة تضبيب فوق لفظ الجلالة في (ز)، وتحرَّف في (م) إلى: أحمد بن عبد.
[2] إسناده صحيح. إبراهيم بن الحسين: هو ابن دِيزيل، وأبو اليمان: هو الحكم بن نافع، وشعيب: هو ابن أبي حمزة.وأخرجه أبو زرعة الدمشقي في "تاريخه" ص 567، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" 1/ 500، والطبراني في "مسند الشاميين" (3000)، وابن عساكر 8/ 333 و 334 و 53/ 153، وابن العديم في "بغية الطلب في تاريخ حلب" 4/ 1567 و 1571 من طرق عن أبي اليمان الحكم بن نافع، بهذا الإسناد.وقد تقدَّم عند المصنّف برقم (1347) من طريق يونس بن يزيد عن الزهري، ضمن حديث مطوَّل.
5847 - أخبرني أبو الحسن أحمد بن محمد بن سَلَمة العَنَزِي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا يحيى بن صالح الوُحَاظي، حدثنا الجَرّاح بن المِنهال، عن الزُّهري، عن أبي أُمامة بن سهل بن حُنيف: أنَّ عامرَ بن رَبيعة - رجلٌ من بني عَدِيّ بن كعب - رأى سهلَ بن حُنيف مع رسولِ الله صلى الله عليه وسلم يغتسل بالخَرّار، فقال: واللهِ ما رأيتُ كاليومِ قطُّ ولا جِلدَ مُخبّأة، فلُبِطَ سهلٌ وسَقَط، فقيل: يا رسول الله، هل لك في سهْل بن حُنيف؟ فدعا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عامرَ بنَ ربيعة، فتغيَّظ عليه، وقال: "لِمَ يقتُلُ أحدُكم أخاهُ - أو صاحبَه - ألا يدعو بالبَرَكة؟! اعْتَسِل له" فاغتَسل له عامرٌ، فراحَ سهلٌ وليس به بأسٌ.والغَسلُ أن يُؤتى بقَدَح فيه ماءُ؛ فيُدخِلُ يدَيه في القدح جميعًا، ويُهرِيقُ على وجهه من القَدَح، ثم يغسلُ فيه يدَه اليُمنى، ويَغسِل مِن فِيه في القَدَح، ويُدخِل يدَه فيَغسِل ظَهْرَه، ثم يأخُذ بيده اليَسار فيفعلُ مثلَ ذلك، ثم يَغسِل صدْرَه في القَدَح، ثم يَغسِل ركبتَه اليُمنى في القَدَح وأطرافَ أصابعِه، ويفعلُ ذلك بالرِّجل اليُسرى، ويُدخِلُ داخِلةَ [1] إزاره، ثم يُغطِّي القَدَح قبل أن يضعَه على الأرض، فيَحسُو منه ويتمضمض، ويُهرِيقُ على وجهِه، ثم يَصُبُّ على رأسِه [2]، ثم يُلقي القَدَحَ من وَرائِه [3]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . قد اتفق الشيخان رضي الله عنهما على إخراج هذا الحديثِ مختصرًا [4].
সাহল ইবনে হুনাইফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
'আমির ইবনে রাবী'আহ—যিনি বনু আদী ইবনে কা'ব গোত্রের একজন লোক ছিলেন—রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে সাহল ইবনে হুনাইফকে আল-খাররার নামক স্থানে গোসল করতে দেখলেন। তিনি (আমির) বললেন: আল্লাহর কসম! আজকের মতো এমন (সুন্দর শরীর) আমি আর কখনো দেখিনি, এমনকি কোনো পর্দানশীল কুমারীর গায়ের চামড়াও নয়। [এ কথা শোনার পর] সাহল সঙ্গে সঙ্গে মাটিতে লুটিয়ে পড়লেন এবং পড়ে গেলেন।
এরপর বলা হলো: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনার কি সাহল ইবনে হুনাইফের দিকে খেয়াল আছে (অর্থাৎ তার কী হয়েছে)? রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তখন 'আমির ইবনে রাবী'আহকে ডাকলেন এবং তার প্রতি রাগান্বিত হয়ে বললেন: "তোমাদের কেউ কেন তার ভাইকে—অথবা তার সাথীকে—হত্যা করতে চায়? তোমরা কেন তার জন্য বরকতের দোয়া করো না?! তুমি তার জন্য গোসল করো।" অতঃপর 'আমির তার জন্য গোসল করলেন। এরপর সাহল সুস্থ হয়ে গেলেন এবং তার আর কোনো কষ্ট রইল না।
আর এই গোসলের পদ্ধতি হলো: একটি পাত্রে পানি আনা হবে। অতঃপর [নজর প্রদানকারী ব্যক্তি] তার উভয় হাত একবারে পাত্রের পানিতে প্রবেশ করাবে এবং পাত্র থেকে পানি নিয়ে তার মুখে ঢেলে দেবে। এরপর সে পাত্রের পানিতে তার ডান হাত ধৌত করবে এবং তার মুখ থেকে পানি নিয়ে পাত্রের ভেতরেই ধৌত করবে, এবং পাত্রে হাত ঢুকিয়ে তার পিঠ ধৌত করবে। অতঃপর সে তার বাম হাত দিয়ে অনুরূপ করবে। তারপর সে পাত্রের ভেতরে তার বুক ধৌত করবে। অতঃপর সে পাত্রের ভেতরে তার ডান হাঁটু ও আঙ্গুলের মাথাগুলো ধৌত করবে। সে তার বাম পায়ের সাথেও অনুরূপ করবে। সে তার পরিধেয় লুঙ্গির ভেতরের অংশ (যেটা শরীরের সাথে লেগে থাকে) প্রবেশ করাবে। এরপর সে পাত্রটি মাটিতে রাখার আগে তা ঢেকে দেবে। অতঃপর [নজর প্রদানকারী ব্যক্তি] সেই পানি পান করবে এবং কুলি করবে। তা তার মুখে ঢেলে দেবে এবং তার মাথায় তা ঢেলে দেবে। অতঃপর সে পাত্রটি তার পিছন দিক দিয়ে ফেলে দেবে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (م): داخل، وهو تحريف، وداخلة الإزار: طرفه الداخل الذي يلي الجسد. وخالف سفيانَ بنَ عُيينة في روايته عن معمرِ بن راشد عبدُ الرزاق الصنعانيُّ كما في "جامع معمر بن راشد" الذي هو من رواية عبد الرزاق عنه (19766) - ومن طريق عبد الرزاق رواه غير واحدٍ - فقد رواه عبد الرزاق عن معمر مرسلًا ليس فيه ذكر سهل بن حنيف في إسناده.وقد رواه شبابة بن سوَّار عن ابن أبي ذئب عند ابن أبي شيبة 8/ 58 وغيره، عن الزهري، عن أبي أُمامة بن سهل، عن أبيه. فوصله أيضًا.لكن خالف شبابة فيه حجاجُ بنُ محمد كما سيأتي فأرسله.ورواه موصولًا كذلك جعفرُ بنُ بُرقان عند النسائي (9967) عن الزهري، عن أبي أمامة بن سهل بن حنيف، عن عامر بن ربيعة: أنه رأى سهل بن حنيف … فذكره موصولًا لكن بذكر عامر بن ربيعة بدل أبيه سهل بن حُنيف، وقد ضعَّف النسائيُّ هذه الرواية، فقال: جعفر بن بُرقان في الزهري ضعيف، وفي غيره لا بأس به.وممّن رواه موصولًا أيضًا إبراهيمُ بنُ إسماعيل بن مُجمِّع عند ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1910)، والطبراني في "الكبير" (5573)، فرواه عن الزهري موصولًا بذكر سهل بن حنيف، لكن إبراهيم بن إسماعيل بن مُجمِّع ضعيف الحديث، والإسناد إليه فيه ضعفٌ أيضًا.وقد رواه عن الزهري عن أبي أُمامة بن سهل بن حُنيف مرسلًا جماعةٌ منهم: مالكٌ في "الموطّأ" 2/ 939، وشعيب بن أبي حمزة عند الطبراني في "مسند الشاميين" (3002)، وغيرهم ممّن سنخرّج رواياتهم عند الطريق التالية. وكذلك رواه حجاج بن محمد المِصِّيصي، عن ابن أبي ذئب، عن الزهري عند أبي عُبيد القاسم بن سلّام في "غريب الحديث" 2/ 112.وكذلك رواه محمد بن أبي أمامة عن أبيه مرسلًا، وستأتي روايته عند المصنف برقم (5849).وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1909)، والطبراني في "الكبير" (5582) من طريق أبي معشر، عن عبد الله بن أبي حبيبة، عن أبي أمامة بن سهل، عن أبيه، فوصله أيضًا، لكن أبا معشر - وهو نجيح بن عبد الرحمن السِّندي - ضعيف.وقد بيَّن جماعة من حفاظ أصحاب الزهري الذين رووا عنه هذا الخبر أن صفة الغسل التي ذُكرت في آخر هذا الخبر إنما هي من قول الزهري يحكيها عمن أدركه من العلماء، ومن أصحاب الزهري أولئك: يونُس بن يزيد الأيلي عند أبي عوانة (9598 - طبعة الجامعة الإسلامية)، والطبراني في "الكبير" (5577)، ومنهم عُقيل بن خالد الأيلي عند الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (2898). ومنهم كذلك شعيب بن أبي حمزة في روايته المقدم تخريجها.ومنهم أيضًا ابن أبي ذئب عند أبي عُبيد في "غريب الحديث" 2/ 112، وابن أبي شيبة في "مصنفه" 8/ 58. وستأتي هذه القصة بنحو ممّا هنا دون صفة الغسل من العين من حديث عبد الله بن عامر بن ربيعة مرسلًا برقم (7690)، ومختصرًا بالمرفوع منه دون القصة من حديث عبد الله بن عامر بن ربيعة عن أبيه موصولًا، ومدار الطريقين على أميّة بن هند بن سعد بن سهل بن حُنيف، وهو مجهول الحال.والخَرّار: ماء لبني زهير وبني بدر ابني ضمرة، وقال الزبير بن بكار: هو وادي الحجاز، يصبُّ على الجُحفة، وقال السَّكوني: موضع غدير خُمٍّ يقال له: الخرّار، وكذلك قال عيسى بن دينار: إنه عين بخيبر. انظر "معجم ما استعجم" للبكري 2/ 492.والمخبّأة: الجارية التي في خدرها لم تتزوج بعدُ.ولُبط: أي: صُرِع وسقط إلى الأرض.
[2] أي: يصبُّ العائن على رأس مَن عانَه. وخالف سفيانَ بنَ عُيينة في روايته عن معمرِ بن راشد عبدُ الرزاق الصنعانيُّ كما في "جامع معمر بن راشد" الذي هو من رواية عبد الرزاق عنه (19766) - ومن طريق عبد الرزاق رواه غير واحدٍ - فقد رواه عبد الرزاق عن معمر مرسلًا ليس فيه ذكر سهل بن حنيف في إسناده.وقد رواه شبابة بن سوَّار عن ابن أبي ذئب عند ابن أبي شيبة 8/ 58 وغيره، عن الزهري، عن أبي أُمامة بن سهل، عن أبيه. فوصله أيضًا.لكن خالف شبابة فيه حجاجُ بنُ محمد كما سيأتي فأرسله.ورواه موصولًا كذلك جعفرُ بنُ بُرقان عند النسائي (9967) عن الزهري، عن أبي أمامة بن سهل بن حنيف، عن عامر بن ربيعة: أنه رأى سهل بن حنيف … فذكره موصولًا لكن بذكر عامر بن ربيعة بدل أبيه سهل بن حُنيف، وقد ضعَّف النسائيُّ هذه الرواية، فقال: جعفر بن بُرقان في الزهري ضعيف، وفي غيره لا بأس به.وممّن رواه موصولًا أيضًا إبراهيمُ بنُ إسماعيل بن مُجمِّع عند ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1910)، والطبراني في "الكبير" (5573)، فرواه عن الزهري موصولًا بذكر سهل بن حنيف، لكن إبراهيم بن إسماعيل بن مُجمِّع ضعيف الحديث، والإسناد إليه فيه ضعفٌ أيضًا.وقد رواه عن الزهري عن أبي أُمامة بن سهل بن حُنيف مرسلًا جماعةٌ منهم: مالكٌ في "الموطّأ" 2/ 939، وشعيب بن أبي حمزة عند الطبراني في "مسند الشاميين" (3002)، وغيرهم ممّن سنخرّج رواياتهم عند الطريق التالية. وكذلك رواه حجاج بن محمد المِصِّيصي، عن ابن أبي ذئب، عن الزهري عند أبي عُبيد القاسم بن سلّام في "غريب الحديث" 2/ 112.وكذلك رواه محمد بن أبي أمامة عن أبيه مرسلًا، وستأتي روايته عند المصنف برقم (5849).وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1909)، والطبراني في "الكبير" (5582) من طريق أبي معشر، عن عبد الله بن أبي حبيبة، عن أبي أمامة بن سهل، عن أبيه، فوصله أيضًا، لكن أبا معشر - وهو نجيح بن عبد الرحمن السِّندي - ضعيف.وقد بيَّن جماعة من حفاظ أصحاب الزهري الذين رووا عنه هذا الخبر أن صفة الغسل التي ذُكرت في آخر هذا الخبر إنما هي من قول الزهري يحكيها عمن أدركه من العلماء، ومن أصحاب الزهري أولئك: يونُس بن يزيد الأيلي عند أبي عوانة (9598 - طبعة الجامعة الإسلامية)، والطبراني في "الكبير" (5577)، ومنهم عُقيل بن خالد الأيلي عند الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (2898). ومنهم كذلك شعيب بن أبي حمزة في روايته المقدم تخريجها.ومنهم أيضًا ابن أبي ذئب عند أبي عُبيد في "غريب الحديث" 2/ 112، وابن أبي شيبة في "مصنفه" 8/ 58. وستأتي هذه القصة بنحو ممّا هنا دون صفة الغسل من العين من حديث عبد الله بن عامر بن ربيعة مرسلًا برقم (7690)، ومختصرًا بالمرفوع منه دون القصة من حديث عبد الله بن عامر بن ربيعة عن أبيه موصولًا، ومدار الطريقين على أميّة بن هند بن سعد بن سهل بن حُنيف، وهو مجهول الحال.والخَرّار: ماء لبني زهير وبني بدر ابني ضمرة، وقال الزبير بن بكار: هو وادي الحجاز، يصبُّ على الجُحفة، وقال السَّكوني: موضع غدير خُمٍّ يقال له: الخرّار، وكذلك قال عيسى بن دينار: إنه عين بخيبر. انظر "معجم ما استعجم" للبكري 2/ 492.والمخبّأة: الجارية التي في خدرها لم تتزوج بعدُ.ولُبط: أي: صُرِع وسقط إلى الأرض.
5847 [3] - إسناده ضعيف جدًّا؛ الجراح بن المنهال متروك الحديث واتهمه بعضهم، لكن روى هذا الخبر غيرُه من الحفاظ عن الزهري، لكنهم اختلفُوا في وصل هذا الخبر وإرساله، فقد وصله بعضُهم بذكر سهل بن حُنيف أنه هو الذي حدَّث ابنَه أبا أمامة بالقصة، لكن الأكثرين على إرساله كما سيأتي تخريج رواياتهم في الطريق المرسلة التالية، وعلى كلِّ حالٍ فأبو أمامة ولد في حياة النبي صلى الله عليه وسلم، فمراسيلُه كمراسيل كبار التابعين، وليس بعيدًا أن يكون الذي حدثه بالخبر أبوه صاحب القصة، والخبر صحيح، والله أعلم.وصفة الغسل من العين في هذا الخبر هي من قول الزهري كما بيّنه غير واحد من حفاظ أصحابه.وأخرجه ابن حبان (6106) عن عبد الصمد بن سعيد بن يعقوب الحمصي، عن سليمان بن عبد الحميد البَهْراني، عن يحيى بن صالح الوُحَاظي، عن إسحاق بن يحيى الكلبي، عن محمد بن مسلم بن شهاب الزهري، به. هكذا وقع في هذه الرواية تسمية شيخ يحيى بن صالح في الإسناد إسحاقَ بنَ يحيى الكلبي بدل الجرّاح بن المنهال! لكن الطريق إلى يحيى بن صالح عند المصنِّف أقوى من طريق ابن حبان إليه.وأخرجه ابن ماجه (3509) عن هشام بن عمار، والنسائي (9965) عن محمد بن عبد الله بن يزيد والحارث بن مسكين، ثلاثتهم عن سفيان بن عُيينة، عن الزهري، عن أبي أُمامة بن سهل، قال: مرّ عامر بن ربيعة بسهل بن حنيف … فذكره مرسلًا كذلك، وكذلك رواه عن الزهري مرسلًا يونس بن يزيد كما سيأتي بعده، في جماعة آخرين ذكرهم الدارقطني في "العلل" (2693).لكن أخرجه أحمد 25/ (15980) من طريق أبي أويس الأصبحي، والنسائي (9966) من طريق سفيان بن عيينة، عن معمر بن راشد كلاهما (أبو أويس ومعمر) عن الزهري، عن أبي أمامة بن سهل بن حُنيف، عن أبيه: أنَّ عامرًا … فذكره موصولًا بذكر سهل بن حنيف صاحب القصة أنه هو من حدَّث ابنه أبا أمامة بها. وخالف سفيانَ بنَ عُيينة في روايته عن معمرِ بن راشد عبدُ الرزاق الصنعانيُّ كما في "جامع معمر بن راشد" الذي هو من رواية عبد الرزاق عنه (19766) - ومن طريق عبد الرزاق رواه غير واحدٍ - فقد رواه عبد الرزاق عن معمر مرسلًا ليس فيه ذكر سهل بن حنيف في إسناده.وقد رواه شبابة بن سوَّار عن ابن أبي ذئب عند ابن أبي شيبة 8/ 58 وغيره، عن الزهري، عن أبي أُمامة بن سهل، عن أبيه. فوصله أيضًا.لكن خالف شبابة فيه حجاجُ بنُ محمد كما سيأتي فأرسله.ورواه موصولًا كذلك جعفرُ بنُ بُرقان عند النسائي (9967) عن الزهري، عن أبي أمامة بن سهل بن حنيف، عن عامر بن ربيعة: أنه رأى سهل بن حنيف … فذكره موصولًا لكن بذكر عامر بن ربيعة بدل أبيه سهل بن حُنيف، وقد ضعَّف النسائيُّ هذه الرواية، فقال: جعفر بن بُرقان في الزهري ضعيف، وفي غيره لا بأس به.وممّن رواه موصولًا أيضًا إبراهيمُ بنُ إسماعيل بن مُجمِّع عند ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1910)، والطبراني في "الكبير" (5573)، فرواه عن الزهري موصولًا بذكر سهل بن حنيف، لكن إبراهيم بن إسماعيل بن مُجمِّع ضعيف الحديث، والإسناد إليه فيه ضعفٌ أيضًا.وقد رواه عن الزهري عن أبي أُمامة بن سهل بن حُنيف مرسلًا جماعةٌ منهم: مالكٌ في "الموطّأ" 2/ 939، وشعيب بن أبي حمزة عند الطبراني في "مسند الشاميين" (3002)، وغيرهم ممّن سنخرّج رواياتهم عند الطريق التالية. وكذلك رواه حجاج بن محمد المِصِّيصي، عن ابن أبي ذئب، عن الزهري عند أبي عُبيد القاسم بن سلّام في "غريب الحديث" 2/ 112.وكذلك رواه محمد بن أبي أمامة عن أبيه مرسلًا، وستأتي روايته عند المصنف برقم (5849).وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1909)، والطبراني في "الكبير" (5582) من طريق أبي معشر، عن عبد الله بن أبي حبيبة، عن أبي أمامة بن سهل، عن أبيه، فوصله أيضًا، لكن أبا معشر - وهو نجيح بن عبد الرحمن السِّندي - ضعيف.وقد بيَّن جماعة من حفاظ أصحاب الزهري الذين رووا عنه هذا الخبر أن صفة الغسل التي ذُكرت في آخر هذا الخبر إنما هي من قول الزهري يحكيها عمن أدركه من العلماء، ومن أصحاب الزهري أولئك: يونُس بن يزيد الأيلي عند أبي عوانة (9598 - طبعة الجامعة الإسلامية)، والطبراني في "الكبير" (5577)، ومنهم عُقيل بن خالد الأيلي عند الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (2898). ومنهم كذلك شعيب بن أبي حمزة في روايته المقدم تخريجها.ومنهم أيضًا ابن أبي ذئب عند أبي عُبيد في "غريب الحديث" 2/ 112، وابن أبي شيبة في "مصنفه" 8/ 58. وستأتي هذه القصة بنحو ممّا هنا دون صفة الغسل من العين من حديث عبد الله بن عامر بن ربيعة مرسلًا برقم (7690)، ومختصرًا بالمرفوع منه دون القصة من حديث عبد الله بن عامر بن ربيعة عن أبيه موصولًا، ومدار الطريقين على أميّة بن هند بن سعد بن سهل بن حُنيف، وهو مجهول الحال.والخَرّار: ماء لبني زهير وبني بدر ابني ضمرة، وقال الزبير بن بكار: هو وادي الحجاز، يصبُّ على الجُحفة، وقال السَّكوني: موضع غدير خُمٍّ يقال له: الخرّار، وكذلك قال عيسى بن دينار: إنه عين بخيبر. انظر "معجم ما استعجم" للبكري 2/ 492.والمخبّأة: الجارية التي في خدرها لم تتزوج بعدُ.ولُبط: أي: صُرِع وسقط إلى الأرض.
5847 [4] - لم يخرجا حديث أبي أمامة بن سهل، إنما أخرجا حديث أبي هريرة مرفوعًا: "العَينُ حقٌّ". البخاريُّ برقم (5740)، ومسلم برقم (2187). والبيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 163، وأبو محمد البغوي في "شرح السنة" (3245)، وأخرجه ابن ماجه (3509)، والنسائي (9965)، والطحاوي (2894)، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" (1106)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (936)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 9/ 351، وفي "الآداب" (708) من طريق سفيان بن عيينة، والطحاوي (2898) من طريق عُقيل الأيلي، والطبراني في "الكبير" (5576) من طريق معاوية بن يحيى الصَّدَفي، وفي "مسند الشاميين" (3002) من طريق شعيب بن أبي حمزة، وأبو عبيد في "غريب الحديث" 2/ 112 من طريق ابن أبي ذئب، وأخرجه معمر بن راشد في "جامعه" (19766)، ومن طريقه الطبراني في "الكبير" (5574)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (10710)، كلهم (مالك وابن عيينة وعُقيل وشعيب ومعمر وابن أبي ذئب ومعاوية الصدفي) عن الزهري، عن أبي أمامة بن سهل مرسلًا.وقد وصله بعضهم كما تقدم في الطريق التي قبل هذه، والذين أرسلوه أجلُّ وأحفظ من غيرهم، والله تعالى أعلم، وعلى كلٍّ فمثل هذا المرسل حجّةٌ.
5848 - كما حدَّثَناهُ أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْر بن نَصْر، حدثنا عبد الله بنُ وهب، أخبرني يونُس، عن ابن شِهاب، قال: أخبرني أبو أُمامة بن سهل بن حُنيف: أنَّ عامرَ بنَ ربيعة مرّ على سهل بن حُنيف الأنصاري وهو يغتسل في الخَرّار، فقال: واللهِ ما رأيتُ كاليومِ قطُّ ولا جِلدَ مُخبّأةٍ، فلُبِطَ سهلٌ، فأُتي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فقيل له: يا رسول الله، هل لك في سهل بن حُنيف؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "هل تَتَّهمون به من أَحدٍ؟ " فقالوا: نعم، مرّ به عامرُ بن ربيعةَ، فتغيَّظَ عليه وقال: "ألا بَرَّكت؟! اعْتَسِلْ له"، فاغتسلَ له عامرٌ، فراحَ سهلٌ مع الرَّكْبِ [1]. قال الحاكم: فأما الجَرّاح بن المنهال فإنه أبو العَطُوف الجَزَري، وليس من شرط الصحيح، وإنما أخرجتُ هذا الحديثَ لشرح الغُسل كيف هُو، وهو غريبٌ جدًّا مسنَدًا عن رسول الله صلى الله عليه وسلم [2].وقد أتى عبدُ الله بن وهب على أثَر حديثه هذا بإسنادٍ آخر بزيادات فيه:
সাহল ইবনু হুনাইফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমির ইবনু রাবি’আহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন যখন তিনি আল-খাররার (নামক স্থানে) গোসল করছিলেন। তখন তিনি (আমির) বললেন: আল্লাহর শপথ! আজকের মতো এমন (সুন্দর) দৃশ্য আমি কখনো দেখিনি, এমনকি কোনো পর্দানশীল কুমারীর চামড়াও (এত সুন্দর হয় না)। ফলে সাহল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সঙ্গে সঙ্গে মাটিতে পড়ে গেলেন (বা অসুস্থ হয়ে গেলেন)। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসা হলো এবং তাঁকে বলা হলো: ইয়া রাসূলাল্লাহ! সাহল ইবনু হুনাইফের কী অবস্থা, আপনি কি জানেন? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তোমরা কি এজন্য কারো উপর সন্দেহ করছো?” তারা বললেন: হ্যাঁ, আমির ইবনু রাবি’আহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার পাশ দিয়ে অতিক্রম করেছিলেন (এবং মন্তব্য করেছিলেন)। তখন (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাগান্বিত হলেন এবং বললেন: “তুমি কেন বারাকাহর (আল্লাহর কাছে কল্যাণ কামনার) দু'আ করোনি?! তার জন্য তুমি গোসল করো।” তখন আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার জন্য গোসল করলেন (এবং সেই পানি দিয়ে সাহলকে গোসল করানো হলো)। ফলে সাহল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সুস্থ হয়ে কাফেলার সাথে চলতে লাগলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات لكنه مرسلٌ كسابقه، فإنَّ أبا أُمامة ولد في حياة النبي صلى الله عليه وسلم وهو الذي سمّاه ودعا له وبرَّك عليه، فيُعدُّ في كبار التابعين كما قال ابن عبد البر في ترجمته من "الاستيعاب". يونس: هو ابن يزيد الأَيلي.وهو في "الجامع" لعبد الله بن وهب (642 - تحقيق أبو الخير)، ومن طريقه أخرجه الطبراني في "الكبير" (5577)، والبيهقي في "الكبرى" 9/ 352.وأخرجه مالك في "الموطأ" 2/ 939، ومن طريقه ابن وهب في "الجامع" (642)، والنسائي (7572)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (2895)، والطبراني في "الكبير" (5575)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 163، وأبو محمد البغوي في "شرح السنة" (3245)، وأخرجه ابن ماجه (3509)، والنسائي (9965)، والطحاوي (2894)، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" (1106)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (936)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 9/ 351، وفي "الآداب" (708) من طريق سفيان بن عيينة، والطحاوي (2898) من طريق عُقيل الأيلي، والطبراني في "الكبير" (5576) من طريق معاوية بن يحيى الصَّدَفي، وفي "مسند الشاميين" (3002) من طريق شعيب بن أبي حمزة، وأبو عبيد في "غريب الحديث" 2/ 112 من طريق ابن أبي ذئب، وأخرجه معمر بن راشد في "جامعه" (19766)، ومن طريقه الطبراني في "الكبير" (5574)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (10710)، كلهم (مالك وابن عيينة وعُقيل وشعيب ومعمر وابن أبي ذئب ومعاوية الصدفي) عن الزهري، عن أبي أمامة بن سهل مرسلًا.وقد وصله بعضهم كما تقدم في الطريق التي قبل هذه، والذين أرسلوه أجلُّ وأحفظ من غيرهم، والله تعالى أعلم، وعلى كلٍّ فمثل هذا المرسل حجّةٌ.
[2] قد ذكرنا في الطريق السابقة أنَّ شرح الغُسل من قول الزهري، وإنما أدرجه الجراح بن المنهال في الخبر، وهو ضعيف جدًّا متروك.
5849 - حدَّثَناهُ أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْر بن نَصْر، حدثنا ابن وهب، أخبرني يوسف بن طَهْمانَ، عن محمد بن أبي أُمامة بن سهل بن حُنيف، أنه سمع أباه يقول: اغتسَل أبي سهلُ بن حُنيف فنزَع جُبّةً كانت عليه يومَ خيبر حين هَزم اللهُ العدوَّ، وعامر بن ربيعة يَنظُر - قال: وكان سهلٌ رجلًا أبيض حسنَ الخَلْق - فقال له عامر بن ربيعة: ما رأيتُ كاليومِ قطُّ - ونَظَر إليه فأعجبَه حُسنُه حين طَرَح جبته، فقال: - ولا جاريةً في سِتْرها بأحسنَ جسدًا من جَسَد سهل بن حُنيف، فوُعِكَ سهلٌ مكانَه، واشتَدّ وَعْكُه، فأُتي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فأخبروه أنَّ سهلًا وُعِك، وأنه غيرُ رائحٍ معك، فأتاه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فأخبره بالذي كان من شأن عامر، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "على ما يَقتُلُ أحدكم أخاهُ؟! ألا بَرَّكتَ، إنَّ العينَ حقٌّ، توضّأْ له" ثم قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إذا رأى أحدُكم شيئًا يُعجِبُه فليُبِّرك؛ فإنَّ العينَ حَقٌّ" [1].هذه الزياداتُ في الحديثَين جميعًا ممّا لم يُخرجاه.
সাহল ইবনে হুনাইফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমার পিতা সাহল ইবনে হুনাইফ গোসল করলেন। খাইবার যুদ্ধের দিন যখন আল্লাহ শত্রুকে পরাজিত করলেন, তখন তিনি তাঁর পরিধেয় জুব্বাটি খুললেন। আমের ইবনে রাবিআহ তা দেখছিলেন। (বর্ণনাকারী বলেন: সাহল ছিলেন ফর্সা এবং সুন্দর গঠনযুক্ত পুরুষ।) তখন আমের ইবনে রাবিআহ তাঁকে বললেন: আমি আজকের মতো আর কখনও দেখিনি – তিনি যখন তার জুব্বাটি নামালেন, আমের তার দিকে তাকালেন এবং তার সৌন্দর্য দেখে মুগ্ধ হলেন – তিনি বললেন: পর্দার আড়ালে থাকা কোনো কুমারীর শরীরও সাহল ইবনে হুনাইফের শরীরের চেয়ে উত্তম নয়। সঙ্গে সঙ্গে সাহল অসুস্থ হয়ে পড়লেন এবং তাঁর অসুস্থতা তীব্র হলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসা হলো এবং তাঁকে জানানো হলো যে, সাহল অসুস্থ হয়ে পড়েছেন এবং তিনি আপনার সঙ্গে যেতে পারবেন না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছে আসলেন। সাহল, আমেরের ব্যাপারটি তাঁকে জানালেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমাদের কেউ তার ভাইকে কেন হত্যা করতে চায়?! তুমি কেন তার জন্য বরকতের দু'আ করলে না? নিশ্চয়ই চোখ (বদ নজর) সত্য। তুমি তার জন্য ওযু করো।" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমাদের কেউ যখন এমন কিছু দেখে যা তাকে মুগ্ধ করে, তখন সে যেন বরকতের জন্য দু'আ করে; কারণ বদ নজর সত্য।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف يوسف بن طهمان، وبه أعلَّه الذهبي في "تلخيصه"، لكنه لم ينفرد به، فقد تابعه عليه مالكُ بن أنس، وعلى كلِّ فالخبر مرسَلٌ كسابقه.وهو في "الجامع" لابن وهب (641).وأخرجه مالك في "موطئه" 2/ 938، ومن طريقه ابن وهب في "جامعه" (641)، والطحاوي في "شرح المشكل" (2895 م)، وابن حبان (6105) عن محمد بن أبي أمامة، عن أبيه. وأخرجه أحمد 25/ (15984) عن روح بن عُبادة وعبد الرزاق، كلاهما عن ابن جُريج، بهذا الإسناد.ويشهد للنهي عن الحلف بالآباء حديث ابن عمر أو أبيه عمر عند البخاري (6646) و (6647)، ومسلم (1646).وحديثُ عبد الرحمن بن سمُرة عند مسلم (1648).وحديثُ أبي هريرة عند أبي داود (3248)، والنسائي (4692)، وابن حبان (4357)، وإسناده صحيح.ويشهد للنهي عن استقبال القبلة واستدبارها عند التخلي وكذا النهي عن التخلي وكذا النهي عن الاستنجاء بالعظم والبَعْر حديثُ سلمان الفارسي عند أحمد 39/ (23703)، ومسلم (262).وحديث أبي هريرة عند أحمد 12/ (7368)، ومسلم (265).وللنهي عن استقبال القبلة واستدبارها عند التخلّي شاهد من حديث عبد الله بن الحارث بن جَزْء الزُّبيدي عند أحمد 29 (17701)، وابن ماجه (317)، وابن حبان (1419).ومن حديث أبي أيوب الأنصاري عند أحمد 38/ (23514)، والبخاري (144)، ومسلم (264).وللنهي عن الاستنجاء بالعظم والبَعْر شاهدٌ من حديث عبد الله بن مسعود عند أحمد 7/ (4149)،ومسلم (450).ومن حديث أبي هريرة عند البخاري (155) و (3860).ومن حديث جابر بن عبد الله عند أحمد 22/ (14613)، ومسلم (263).وقد جاء في حديثي ابن مسعود وأبي هريرة تعليل النهي عن الاستنجاء بالعظم والروث بأنه طعام الجنّ.
5850 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا محمد بن أحمد بن أنَس [1] القرشي، حدثنا أبو عاصم، أخبرنا ابن جُريج، أخبرني عبد الكريم بن أبي المُخارِق، عن الوليد بن مالك [2]، رجل من عبد القَيس، عن محمد بن قيس مولى سهل بن حُنيف، عن سهل بن حُنيف، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم، حدّثه، قال: قال لي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "أنت رسُولي إلى مكةَ، فأَقْرِهم مني السلامَ، وقُل لهم: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم يأمرُكم بثلاثٍ: لا تَحلفِوا بآبائكم، وإذا خَلوتُم فلا تَستقبِلوا القِبلةَ ولا تستَدبِروها، ولا تَستَنْجُوا بعَظْم ولا ببَعْر" [3]. ذكرُ مناقب خَوّات بن جُبير الأنصاري رضي الله عنه -
সহল ইবনু হুনায়েফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে হাদীস বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "তুমি মক্কার প্রতি আমার দূত। সুতরাং তাদের কাছে আমার পক্ষ থেকে সালাম পৌঁছে দাও এবং তাদের বলো: নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমাদেরকে তিনটি বিষয়ে আদেশ করছেন: তোমরা তোমাদের পিতাদের নামে শপথ করবে না, যখন তোমরা নির্জনে যাবে (পেশাব-পায়খানার জন্য), তখন তোমরা কিবলাকে সামনেও করবে না এবং পেছনেও রাখবে না, এবং তোমরা হাড় অথবা গোবর দ্বারা ইস্তিঞ্জা (শৌচকার্য) করবে না।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية هنا إلى: أنيس، وهو خطأ صوّبناه من سائر المواضع التي روى فيها المصنفُ أخبارًا من طريق محمد بن أنس هذا. وأخرجه أحمد 25/ (15984) عن روح بن عُبادة وعبد الرزاق، كلاهما عن ابن جُريج، بهذا الإسناد.ويشهد للنهي عن الحلف بالآباء حديث ابن عمر أو أبيه عمر عند البخاري (6646) و (6647)، ومسلم (1646).وحديثُ عبد الرحمن بن سمُرة عند مسلم (1648).وحديثُ أبي هريرة عند أبي داود (3248)، والنسائي (4692)، وابن حبان (4357)، وإسناده صحيح.ويشهد للنهي عن استقبال القبلة واستدبارها عند التخلي وكذا النهي عن التخلي وكذا النهي عن الاستنجاء بالعظم والبَعْر حديثُ سلمان الفارسي عند أحمد 39/ (23703)، ومسلم (262).وحديث أبي هريرة عند أحمد 12/ (7368)، ومسلم (265).وللنهي عن استقبال القبلة واستدبارها عند التخلّي شاهد من حديث عبد الله بن الحارث بن جَزْء الزُّبيدي عند أحمد 29 (17701)، وابن ماجه (317)، وابن حبان (1419).ومن حديث أبي أيوب الأنصاري عند أحمد 38/ (23514)، والبخاري (144)، ومسلم (264).وللنهي عن الاستنجاء بالعظم والبَعْر شاهدٌ من حديث عبد الله بن مسعود عند أحمد 7/ (4149)،ومسلم (450).ومن حديث أبي هريرة عند البخاري (155) و (3860).ومن حديث جابر بن عبد الله عند أحمد 22/ (14613)، ومسلم (263).وقد جاء في حديثي ابن مسعود وأبي هريرة تعليل النهي عن الاستنجاء بالعظم والروث بأنه طعام الجنّ.
[2] في نسخنا الخطية و"تلخيص الذهبي": الوليد بن أبي مالك، بزيادة أداة الكُنية، وهي مُقحمة، والتصويب من مصادر تخريج الخبر ومن مصادر ترجمة هذا الراوي، وانظر "تعجيل المنفعة" لابن حجر 2/ 204. وأخرجه أحمد 25/ (15984) عن روح بن عُبادة وعبد الرزاق، كلاهما عن ابن جُريج، بهذا الإسناد.ويشهد للنهي عن الحلف بالآباء حديث ابن عمر أو أبيه عمر عند البخاري (6646) و (6647)، ومسلم (1646).وحديثُ عبد الرحمن بن سمُرة عند مسلم (1648).وحديثُ أبي هريرة عند أبي داود (3248)، والنسائي (4692)، وابن حبان (4357)، وإسناده صحيح.ويشهد للنهي عن استقبال القبلة واستدبارها عند التخلي وكذا النهي عن التخلي وكذا النهي عن الاستنجاء بالعظم والبَعْر حديثُ سلمان الفارسي عند أحمد 39/ (23703)، ومسلم (262).وحديث أبي هريرة عند أحمد 12/ (7368)، ومسلم (265).وللنهي عن استقبال القبلة واستدبارها عند التخلّي شاهد من حديث عبد الله بن الحارث بن جَزْء الزُّبيدي عند أحمد 29 (17701)، وابن ماجه (317)، وابن حبان (1419).ومن حديث أبي أيوب الأنصاري عند أحمد 38/ (23514)، والبخاري (144)، ومسلم (264).وللنهي عن الاستنجاء بالعظم والبَعْر شاهدٌ من حديث عبد الله بن مسعود عند أحمد 7/ (4149)،ومسلم (450).ومن حديث أبي هريرة عند البخاري (155) و (3860).ومن حديث جابر بن عبد الله عند أحمد 22/ (14613)، ومسلم (263).وقد جاء في حديثي ابن مسعود وأبي هريرة تعليل النهي عن الاستنجاء بالعظم والروث بأنه طعام الجنّ.
5850 [3] - إسناده ضعيف لضعف عبد الكريم بن أبي المُخارِق، وجهالة الوليد بن مالك العَبْدي.أبو عاصم: هو الضحّاك بن مخلد النبيل، وابن جُريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز بن جُريج المكي. وأخرجه أحمد 25/ (15984) عن روح بن عُبادة وعبد الرزاق، كلاهما عن ابن جُريج، بهذا الإسناد.ويشهد للنهي عن الحلف بالآباء حديث ابن عمر أو أبيه عمر عند البخاري (6646) و (6647)، ومسلم (1646).وحديثُ عبد الرحمن بن سمُرة عند مسلم (1648).وحديثُ أبي هريرة عند أبي داود (3248)، والنسائي (4692)، وابن حبان (4357)، وإسناده صحيح.ويشهد للنهي عن استقبال القبلة واستدبارها عند التخلي وكذا النهي عن التخلي وكذا النهي عن الاستنجاء بالعظم والبَعْر حديثُ سلمان الفارسي عند أحمد 39/ (23703)، ومسلم (262).وحديث أبي هريرة عند أحمد 12/ (7368)، ومسلم (265).وللنهي عن استقبال القبلة واستدبارها عند التخلّي شاهد من حديث عبد الله بن الحارث بن جَزْء الزُّبيدي عند أحمد 29 (17701)، وابن ماجه (317)، وابن حبان (1419).ومن حديث أبي أيوب الأنصاري عند أحمد 38/ (23514)، والبخاري (144)، ومسلم (264).وللنهي عن الاستنجاء بالعظم والبَعْر شاهدٌ من حديث عبد الله بن مسعود عند أحمد 7/ (4149)،ومسلم (450).ومن حديث أبي هريرة عند البخاري (155) و (3860).ومن حديث جابر بن عبد الله عند أحمد 22/ (14613)، ومسلم (263).وقد جاء في حديثي ابن مسعود وأبي هريرة تعليل النهي عن الاستنجاء بالعظم والروث بأنه طعام الجنّ.
5851 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن محمد بن عبد الله البغدادي، حدثنا أبو عُلَاثة محمد بن عمرو بن خالد، حدثنا أبي، حدثنا ابن لَهِيعة، عن أبي الأسود، عن عُروة قال: خَوّات بن جُبير بن النعمان، ضَرَبَ له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بسهمٍ مع أصحاب بدرٍ [1].
খাওয়াত ইবনু জুবাইর ইবনু নু'মান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের সঙ্গীদের সাথে তাঁর জন্যও একটি অংশ (সেহম) বরাদ্দ করেছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم كما تقدَّم بيانه برقم (4378) لكنه مرسل، غير أنَّ هذا الخبر معروف ذكره غير واحدٍ من أئمة المغازي والسير.وأخرجه البيهقي في "السنن" 6/ 292 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البيهقي أيضًا 9/ 57 من طريق يعقوب بن سفيان، عن عمرو بن خالد وحسان بن عبد الله، عن ابن لَهِيعة، به.وجاء عند ابن أبي شيبة في "مصنفه" 9/ 114 بسند صحيح عن عبد الرحمن بن أبي ليلى عن خَوَّات ابن جبير وكان بدريًّا …وروى موسى بن عقبة عند البيهقي 6/ 292 مثل ما روى عروة بن الزبير.
5852 - حدَّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق في ذكر البدريّين: وخَوَّات بن جُبير بن النعمان بن امرِئ القَيس - وهو البُرَك - بن ثَعلبة بن عمرو بن عَوف، ضربَ له رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم بدر سهمَه وأجْرَه [1].
ইবনে ইসহাক থেকে বর্ণিত, বদর যুদ্ধে অংশগ্রহণকারীদের আলোচনার মধ্যে: খাওয়াত ইবনে জুবাইর ইবনুন নু'মান ইবনে ইমরুউল কাইস—যিনি আল-বুরাক নামেও পরিচিত—ইবনে সা'লাবাহ ইবনে আমর ইবনে আউফ। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের দিন তাঁর জন্য তাঁর অংশ (গণিমতের) এবং তাঁর পুরস্কার নির্ধারণ করেছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "سيرة ابن هشام" 1/ 689، ومن طريقه أخرجه الطبراني في "الكبير" (4143)،وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (2504) عن زياد بن عبد الله البكائي، وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" 2/ 276 من طريق يحيى بن سعيد الأموي، وأبو نعيم في "المعرفة" (2505) من طريق إبراهيم بن سعد، ثلاثتهم عن محمد بن إسحاق. وقد ساقوا هذا الحديث ضمن قصة مطولة لخوّات اقتصر المصنِّفُ ومن قبله البخاريُّ على هذا الحرف منها في مناداته صلى الله عليه وسلم لخوات بكنيته.
5853 - حدثنا أبو جعفر محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا محمد بن محمد بن رجاء، حدثنا الجَرّاح بن مَخلَد، حدثنا وهب بن جَرير، حدثنا أبي، قال: سمعت زيدَ بن أسلم يُحدِّث عن خَوّات بن جُبير: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال له: "يا أبا عبد الله" [1].
খাওওয়াত ইবনু জুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে বললেন: “হে আবূ আবদুল্লাহ।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لانقطاعه، فإنَّ زيد بن أسلم لم يُدرك خوّات بن جبير.وأخرجه البخاري تعليقًا في "تاريخه الكبير" 3/ 316 - 317 عن يحيى بن موسى البَلْخي، والطبراني في "الكبير" (4146)، ومن طريقه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (2513)، وابن الأثير في "أسد الغابة" 1/ 625 - 626 من طريق الجراح بن مخلد، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (626) عن عبد الله بن الهيثم العبدي، ثلاثتهم عن وهب بن جرير، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني أيضًا (4146)، ومن طريقه أبو نعيم في "المعرفة" (2513)، وابن الأثير 1/ 625 - 626 من طريق داود بن منصور القاضي، عن جرير بن حازم به. وقد ساقوا هذا الحديث ضمن قصة مطولة لخوّات اقتصر المصنِّفُ ومن قبله البخاريُّ على هذا الحرف منها في مناداته صلى الله عليه وسلم لخوات بكنيته.
5854 - Null
5854 - أخبرني محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الثقفي، أخبرني أبو يونس، حدثنا إبراهيم بن المنذر، قال: خَوّات بن جُبير بن النعمان بن أُميّة بن البُرَك بن امرِئ القيس بن ثَعلبة بن عَمرو بن عَوف بن مالك، مات بالمدينة سنة أربعين، وهو ابن أربعٍ وسبعين سنة.
৫8৫4 - আমাকে খবর দিয়েছেন মুহাম্মাদ ইবনু ইয়াকুব, আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক আস-সাকাফী, আমাকে খবর দিয়েছেন আবূ ইউনুস, আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন ইবরাহীম ইবনুল মুনযির। তিনি বললেন: খাওওয়াত ইবনু জুবাইর ইবনু নু’মান ইবনু উমাইয়াহ ইবনুল বুরাক ইবনু ইমরুল কায়স ইবনু সা’লাবাহ ইবনু আমর ইবনু আওফ ইবনু মালিক, তিনি মদীনায় চল্লিশ (৪০) হিজরিতে মৃত্যুবরণ করেন। সে সময় তাঁর বয়স হয়েছিল চুয়াত্তর (৭৪) বছর।
5855 - أخبرني محمد بن القاسم بن عبد الرحمن العَتَكي، حدثنا الحُسين بن الفضل، حدثنا عبد العزيز بن يحيى، عن سفيان بن عُيينة، عن عمرو بن دينار، عن عِكْرمة، عن ابن عباس: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم بَعَثَ خَوات بن جُبير إلى بني قُريظة على فرسٍ له يقال له: الجَناح [1].صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খাওয়াত ইবনু জুবাইরকে বনু কুরাইযা গোত্রের নিকট তাঁর ‘আল-জানাহ’ (ডানা) নামক ঘোড়ার উপর সওয়ার করে পাঠিয়েছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم، لكن الصحيح أنه عن عكرمة مرسلٌ، ليس فيه ذكر ابن عباس، فإنَّ عبد العزيز بن يحيى - وهو ابن عبد العزيز الكِناني المكي - وإن كان صدوقًا، له أوهام، وقد خالفه الحفاظ من أصحاب ابن عُيينة، فرووه عنه عن عمرو بن دينار عن عكرمة مرسلًا، فهو المحفوظ، والله أعلم.وأخرجه ابن أبي شيبة 12/ 522 و 14/ 414، وأخرجه مُسدَّد في "مسنده" كما في "المطالب العالية" لابن حجر (4279) عن يحيى بن سعيد القطان، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (2510) من طريق عبد الجبار بن العلاء العطار، ثلاثتهم (ابن أبي شيبة ويحيى القطان وعبد الجبار) عن سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن عكرمة، مرسلًا. خليفة بن خيّاط "الطبقات" و "التاريخ"، متروك الحديث إذا أسند حديثًا، وقد أخطأ في إسناد هذا الحديث خطأً فاحشًا في موضعين منه، فقد أخرجه الطبرانيُّ في "الكبير" (4149)، وفي "الأوسط" (1616) عن أبي جعفر أحمد بن الحسين بن نصر البغدادي، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (2514) من طريق أبي العباس محمد بن إسحاق السّرّاج، كلاهما عن خليفة بن خياط شَبَاب العُصفُري، عن عبد الله بن إسحاق بن الفضل بن عبد الرحمن بن العباس بن ربيعة بن الحارث بن عبد المطّلب الهاشمي، عن أبيه، عن صالح بن خَوّات بن صالح بن خَوّات بن جبير، عن أبيه، عن جدّه، عن خوّات، فهذا هو المعروف في إسناد هذا الخبر. لكن لم يذكر السَّرّاج في روايته إسحاق بن الفضل الهاشمي، والد عبد الله، والصحيح ذكره.فقد أخرجه العقيلي في "الضعفاء" (723)، والدارقطني في "السنن" (4654) وأبو نعيم في "المعرفة" (2514) من طريق محمد بن يحيى القُطَعي، وأبو أحمد الحاكم في "الأسامي والكنى" 5/ 164 من طريق مكيّ بن مردك، كلاهما عن عبد الله بن إسحاق بن الفضل بن عبد الرحمن الهاشمي، عن أبيه، عن صالح بن خَوّات بن صالح بن خوّات بن جُبير، عن أبيه، عن جده، عن خوَّات.وعبد الله بن إسحاق الهاشمي هذا لا يتابع على حديثه فيما قاله العقيلي وأقره الذهبي في ديوان الضعفاء" (2118) وفي "الميزان"، وقصدهم أنه لا يتابع عليه بهذا الإسناد.والحديث صحيح من حديث جابر بن عبد الله عند أحمد 23/ (14703)، وأبي داود (3681)، وابن ماجه (3393)، والترمذي، (1865)، وابن حبان (5382)، وقال الترمذي: حديث حسن غريب.وحديث عبد الله بن عمر بن الخطاب عند أحمد 9/ (5648)، وابن ماجه (3392)، وهو حديث قويّ.وحديث عبد الله بن عمرو بن العاص عند أحمد 11/ (6558)، وابن ماجه (3394)، والنسائي (5097)، وإسناده حسن.وحديث أنس بن مالك عند أحمد 19/ (12099)، وإسناده صحيح.وحديث سعد بن أبي وقاص عند النسائي (5098)، وابن حبان (5370) وإسناده قوي.وحديث عائشة عند أحمد 40/ (24423)، وأبي داود (3687)، والترمذي (1866)، وابن حبان (5383)، وإسناده صحيح، ولفظه: "ما أسكر منه الفَرَقُ، فمِلءُ الكفِّ منه حرام".
5856 - حدثنا أبو سعيد أحمد بن يعقوب الثَّقفي، حدثنا موسى بن زكريا، حدثنا خَليفة بن خيّاط، حدثنا عبد الله بن إسحاق بن صالح بن خَوّات بن جُبير، قال: حدثني أبي، عن أبيه، عن جده خَوّات بن جبير، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "ما أسكَرَ كثيرُه فقليلُه حرامٌ" [1]. 5856 م - قال عبد الله بن إسحاق عن آبائه: إن خَوَاتَ بن جُبير مات سنةَ أربعين.
খাওয়াত ইবনু জুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে বস্তুর অধিক পরিমাণে নেশা সৃষ্টি করে, তার স্বল্প পরিমাণও হারাম।" আবদুল্লাহ ইবনু ইসহাক তাঁর পূর্বপুরুষদের সূত্রে বলেন, খাওয়াত ইবনু জুবাইর চল্লিশ হিজরিতে মৃত্যুবরণ করেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل موسى بن زكريا - وهو التُستَري - فهو وإن كان راويةً لكتابَي خليفة بن خيّاط "الطبقات" و "التاريخ"، متروك الحديث إذا أسند حديثًا، وقد أخطأ في إسناد هذا الحديث خطأً فاحشًا في موضعين منه، فقد أخرجه الطبرانيُّ في "الكبير" (4149)، وفي "الأوسط" (1616) عن أبي جعفر أحمد بن الحسين بن نصر البغدادي، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (2514) من طريق أبي العباس محمد بن إسحاق السّرّاج، كلاهما عن خليفة بن خياط شَبَاب العُصفُري، عن عبد الله بن إسحاق بن الفضل بن عبد الرحمن بن العباس بن ربيعة بن الحارث بن عبد المطّلب الهاشمي، عن أبيه، عن صالح بن خَوّات بن صالح بن خَوّات بن جبير، عن أبيه، عن جدّه، عن خوّات، فهذا هو المعروف في إسناد هذا الخبر. لكن لم يذكر السَّرّاج في روايته إسحاق بن الفضل الهاشمي، والد عبد الله، والصحيح ذكره.فقد أخرجه العقيلي في "الضعفاء" (723)، والدارقطني في "السنن" (4654) وأبو نعيم في "المعرفة" (2514) من طريق محمد بن يحيى القُطَعي، وأبو أحمد الحاكم في "الأسامي والكنى" 5/ 164 من طريق مكيّ بن مردك، كلاهما عن عبد الله بن إسحاق بن الفضل بن عبد الرحمن الهاشمي، عن أبيه، عن صالح بن خَوّات بن صالح بن خوّات بن جُبير، عن أبيه، عن جده، عن خوَّات.وعبد الله بن إسحاق الهاشمي هذا لا يتابع على حديثه فيما قاله العقيلي وأقره الذهبي في ديوان الضعفاء" (2118) وفي "الميزان"، وقصدهم أنه لا يتابع عليه بهذا الإسناد.والحديث صحيح من حديث جابر بن عبد الله عند أحمد 23/ (14703)، وأبي داود (3681)، وابن ماجه (3393)، والترمذي، (1865)، وابن حبان (5382)، وقال الترمذي: حديث حسن غريب.وحديث عبد الله بن عمر بن الخطاب عند أحمد 9/ (5648)، وابن ماجه (3392)، وهو حديث قويّ.وحديث عبد الله بن عمرو بن العاص عند أحمد 11/ (6558)، وابن ماجه (3394)، والنسائي (5097)، وإسناده حسن.وحديث أنس بن مالك عند أحمد 19/ (12099)، وإسناده صحيح.وحديث سعد بن أبي وقاص عند النسائي (5098)، وابن حبان (5370) وإسناده قوي.وحديث عائشة عند أحمد 40/ (24423)، وأبي داود (3687)، والترمذي (1866)، وابن حبان (5383)، وإسناده صحيح، ولفظه: "ما أسكر منه الفَرَقُ، فمِلءُ الكفِّ منه حرام".
5857 - حدثنا أبو عبد الله الأصبَهاني، حدثنا الحَسن بن الجَهْم، حدثنا الحُسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر، أخبرني عبد الملك بن أبي سُليمان، عن خَوّات بن صالح، عن أبيه.قال [1]: وأخبرنا أبو بكر بن عبد الله بن أبي سَبْرة، عن المسور بن رِفاعة، عن عبد الله بن مِكْنَف: أنَّ خَوّات بن جُبير ممّن خرج مع رسولِ الله صلى الله عليه وسلم إلى بدرٍ، فلما كان بالرَّوحاء أصابه نَصِيلُ حَجَر فكُسِر، فردَّه رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى المدينة، وضَرَب له بسَهْمِه وأجرِه، فكان كمن شَهِدها. قالوا: وشهد خَوّات أحُدًا والخندقَ والمشاهدَ كلَّها مع رسول الله صلى الله عليه وسلم [2].
খাওয়াত ইবন জুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাদের মধ্যে অন্তর্ভুক্ত ছিলেন যারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বদর অভিযানে বের হয়েছিলেন। যখন তিনি 'রওহা' নামক স্থানে পৌঁছালেন, তখন পাথরের আঘাতের ফলে তাঁর (শরীরের অংশ) ভেঙে গেলো। ফলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে মদীনায় ফিরিয়ে দিলেন এবং তাঁর জন্য তাঁর অংশ (গনীমতের) ও সওয়াব নির্ধারণ করলেন। সুতরাং তিনি তাদের মতো হলেন যারা সেটিতে (বদরে) উপস্থিত ছিলেন। রাবীগণ বলেন: খাওয়াত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উহুদ, খন্দক এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সংঘটিত সকল সামরিক অভিযানেই অংশগ্রহণ করেছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] القائل هو محمد بن عمر: وهو الواقدي.
[2] حسن لغيره، وهما مرسلان.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته" 3/ 442 عن محمد بن عمر الواقدي بإسناديه هذين.وهو في "مغازي الواقدي" 1/ 160 مختصر بقوله: وخَوّات بن جُبير بن النعمان كُسِر بالرَّوحاء، حدثني عبد الملك بن أبي سليمان عن خوّات بن صالح عن ذلك.ورُوي عن ابن شهاب الزهري نحو ما رواه الواقدي في قصة إصابة خوّات، وذلك فيما أخرجه الخطابي في "غريب الحديث" 1/ 399. ورجاله لا بأس بهم لكنه مرسلٌ كذلك.وروي نحوه أيضًا عن عبد الله بن محمد بن عُمارة عند أبي القاسم البغوي في "الصحابة" 2/ 275، وعبد الله بن محمد بن عمارة من الرواة عن أتباع التابعين.وأما أنه ضُرب له بسهمه وأجره يوم بدر فذكره أيضًا عروة بن الزبير وابن إسحاق كما تقدَّم عند المصنف.
5858 - قال ابن عُمر: وحدثني صالح بن خَوّات بن صالح، عن أهله، قالوا: مات خَوّات بن جُبير بالمدينة في سنة أربعين، وهو ابن أربع وسبعين سنةً، وكان رَبْعةً من الرِّجال [1].
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সালেহ ইবনে খাওওয়াত ইবনে সালেহ তাঁর পরিবারবর্গের সূত্রে আমার কাছে বর্ণনা করেছেন যে, তারা বলেছেন: খাওওয়াত ইবনে জুবাইর চল্লিশ হিজরিতে মদীনায় মৃত্যুবরণ করেন। সে সময় তাঁর বয়স হয়েছিল চুয়াত্তর (৭৪) বছর এবং তিনি ছিলেন মাঝারি গড়নের একজন পুরুষ।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وأخرجه ابن سعد 3/ 443 عن محمد بن عمر الواقدي، به.