হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5999)


5999 - أخبرني أحمد بن يعقوب الثقفي، حدثنا موسى بن زكريا التُّستَري، حدثنا خَليفة بن خيَّاط: قال المُغيرة بن شُعْبة، يُكنى أبا عبد الله، وليّ الكُوفةَ، ومات بها سنة خمسين [1].




মুগীরাহ ইবনে শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর কুনিয়াত (উপনাম) ছিল আবূ আব্দুল্লাহ, তিনি কূফার শাসনকর্তা ছিলেন এবং পঞ্চাশ হিজরীতে সেখানেই মৃত্যুবরণ করেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "طبقات خليفة بن خياط" ص 53، ومن طريقه ذكره ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 60/ 15.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6000)


6000 - أخبرنا الحسن بن محمد الأزْهَري، حدثنا محمد بن أحمد بن البَرَاء حدثنا علي بن المَديني، قال: المغيرة بن شُعبة بن أبي عامر بن مسعود بن مُعتِّب بن مالك بن عمرو بن سعد [1] بن عَوف [2] بن قيس بن مُنبَّه [3] بن بكر بن هَوَازنَ بن منصور بن عِكْرمة بن خَصَفةَ بن قيس.




৬০০০ - আমাদেরকে আল-হাসান ইবন মুহাম্মাদ আল-আযহারী সংবাদ দিয়েছেন, মুহাম্মাদ ইবন আহমাদ ইবন আল-বারা আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, আলী ইবন আল-মাদীনী আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আল-মুগীরাহ ইবন শু'বাহ ইবন আবী 'আমির ইবন মাসঊদ ইবন মু'আত্তিব ইবন মালিক ইবন 'আমর ইবন সা'দ ইবন 'আওফ ইবন কায়স ইবন মুনাব্বাহ ইবন বকর ইবন হাওয়াজিন ইবন মানসূর ইবন ইকরিমাহ ইবন খাসাফাহ ইবন কায়স।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ص) و (م): سعيد.



[2] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: عمرو، والتصويب من كتب التراجم والتاريخ والأنساب، و"الطبقات الكبرى" لابن سعد 5/ 173 و 8/ 64، و "الطبقات" لخليفة ص 104.



6000 [3] - تحرَّف في النسخ إلى شيبة، والتصويب من كتب التراجم والتاريخ والأنساب أيضًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6001)


6001 - أخبرني محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق، حدثني الحسن بن شُجاع، حدثنا أحمد بن أبي نافع، حدثنا القاسم بن يزيد الجَرْمي - وكان من أخْيَر أهل زمانه عن هشام بن سَعْد، عن زيد بن أسلَمَ، عن أبيه، عن المُغيرة بن شُعبة، قال: كَنّاني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بأبي عيسى [1].




মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে 'আবু ঈসা' কুনিয়াত (উপনাম) দিয়েছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث جيِّد، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل هشام بن سعد وأحمد بن أبي نافع. وهو الموصلي. وقد تُوبعا.وأخرجه أبو داود (4963) عن هارون بن زيد بن أبي الزرقاء، عن أبيه، عن هشام بن سعد، به.بأطول ممّا هنا.وسيأتي بنحوه مطوَّلًا برقم (6009) من طريق حماد بن سلمة عن زيد بن أسلم مرسلًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6002)


6002 - حدثنا أبو عبد الله الأصبَهاني، حدثنا الحسن بن الجَهْم، حدثنا الحُسين ابن الفَرَج، حدثنا محمد بن عُمر، قال: المغيرةُ بن شُعبة بن أبي عامر بن مسعود بن مُعتِّب بن مالك بن كعب بن عَمرو بن سَعْد بن عَوف بن ثَقِيف - واسمه قَسِيٌّ - بن مُنبِّه بن بكر بن هوازِنَ بن منصور بن عِكْرمة بن خَصَفة بن قَيْس بن عَيْلان بن مُضَرَ بن نِزارٍ، وكان يُكنى أبا عبد الله، وكان يُقال له: مغيرةُ الرأي، وكان داهيةً، لا يَشْتَجِرُ في صدره أمرانِ إلَّا وَجَدَ في أحدهما مخرجًا، قَدِمَ على رسولِ الله صلى الله عليه وسلم فأسلَمَ، وأقام معه حتى اعتَمَر عُمرةَ الحُدَيْبيَة في ذي القَعْدة سنةَ ستٍّ من الهجرة، قال المغيرة: فكانت أولَ سَفْرةٍ خرجتُ معه فيها، وكنتُ أكونُ مع أبي بكر الصِّدِّيق، وألْزَمُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم فيمن يَلزَمُه وشَهِدَ المُغيرةُ بعد ذلك المَشاهِدَ مع رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، وقَدِمَ وفدُ ثَقيفٍ فأنزلَهم عليه وأكرَمَهم، وبعثَه رسول الله صلى الله عليه وسلم وأبا سُفْيانَ بنَ حَرْب إلى الطائف، فهَدَمُوا [1] الرَّبَّة.




মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ ইবনু আবী 'আমির ইবনু মাস'ঊদ ইবনু মু'আত্তিব ইবনু মালিক ইবনু কা'ব ইবনু 'আমর ইবনু সা'দ ইবনু 'আওফ ইবনু সাকীফ—যার আসল নাম ছিল ক্বাসী— ইবনু মুনাব্বিহ ইবনু বাকর ইবনু হাওয়াযিন ইবনু মানসূর ইবনু ইকরিমাহ ইবনু খাসাফাহ ইবনু ক্বায়স ইবনু 'আইলান ইবনু মুদার ইবনু নিযার। তাঁর উপনাম ছিল আবূ আবদুল্লাহ এবং তাঁকে 'মুগীরাতুর রায়' বলা হতো। তিনি ছিলেন অত্যন্ত বিচক্ষণ; এমন দুটি বিষয় তাঁর হৃদয়ে দ্বন্দ্ব সৃষ্টি করতো না যার একটি থেকে তিনি বের হওয়ার পথ খুঁজে পেতেন না। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করে ইসলাম গ্রহণ করেন এবং হিজরতের ষষ্ঠ বর্ষের যুল-কা'দাহ মাসে হুদায়বিয়ার 'উমরাহ সম্পন্ন করা পর্যন্ত তাঁর সঙ্গে অবস্থান করেন। মুগীরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এটিই ছিল প্রথম সফর, যাতে আমি তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর) সঙ্গে বেরিয়েছিলাম। আমি আবূ বাকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সঙ্গে থাকতাম এবং যারা নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে অনুসরণ করতেন, আমি তাঁদের মধ্যে থেকে তাঁর অনুসরণ করতাম। এরপর মুগীরাহ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে যুদ্ধসমূহ ও গুরুত্বপূর্ণ ঘটনাগুলিতে উপস্থিত ছিলেন। যখন সাকীফ গোত্রের প্রতিনিধিদল আগমন করলো, তখন তিনি তাদের তাঁর নিকট অবস্থান করান এবং তাদের সম্মান করেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে এবং আবূ সুফইয়ান ইবনু হারবকে তায়েফে প্রেরণ করেন, ফলে তাঁরা 'আর-রাব্বাহ' (নামক মূর্তি/উপাসনালয়টি) ভেঙে ফেলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: فهزموا، والتصويب من "طبقات ابن سعد" 5/ 175، و "تاريخ دمشق" لابن عساكر 60/ 15.والرَّبَّة: هي اللّات، وهي صخرةٌ كانت تعبدها ثقيف بالطائف. وقد تحرَّفت في (ز) إلى: الدبير، وفي (ص) إلى الوية، وفي (م) إلى ألف به، والمثبت على الصواب من هامش (ز).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6003)


6003 - حدثنا أبو أحمد إسحاق بن محمد الهاشمي بالكُوفة، حدثنا الحُسين بن الحَكَم الحِبَري، حدثنا أبو نُعيم، حدثنا يونس بن الحارث الطائفي، حدثني أبو عَون الثَّقَفي، عن أبيه، عن المغيرة بن شعبة، قال: لما تُوفِّي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بَعثَني أبو بكر الصِّدِّيق إلى أهل النُّجَير، ثم شهدت اليمامةَ، ثم شهدتُ فُتوحَ الشام مع المسلمين، ثم شهدتُ اليرموكَ فأُصيبت عَيني يومَ اليَرمُوك، ثم شهدتُ القادسيّةَ وكنتُ رسولَ سعدٍ إلى رُستُمَ، ووَلِيتُ لِعمر بن الخطب فُتوحًا، وفَتحتُ هَمَذانَ، وشهدتُ نَهاوَنْدَ، وكنتُ على مَيسرةِ النُّعمان بن مُقَرِّن، وكان عمرُ قد كَتَب: إن هَلَك النعمانُ فالأميرُ حذيفةُ، وإن هَلَك فالأمير المُغيرةُ، وكنت أولَ مَن وَضَعَ ديوانَ البصرة، وجمعتُ الناسَ ليُعطَوا، ووَلِيتُ الكوفةَ لعمر بن الخطاب، وقتل عمرُ وأنا عليها، ثم وَلِيتُها لمعاوية [1].




মুগীরাহ ইবনে শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করলেন, তখন আবূ বকর আস-সিদ্দিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে নাজীরের অধিবাসীদের নিকট পাঠালেন। এরপর আমি ইয়ামামার যুদ্ধে অংশগ্রহণ করি, অতঃপর আমি মুসলিমদের সাথে সিরিয়া বিজয়ে অংশ নিই। এরপর আমি ইয়ারমুকের যুদ্ধে অংশ নিই এবং ইয়ারমুকের দিনেই আমার চোখ আঘাতপ্রাপ্ত হয়। এরপর আমি ক্বাদিসিয়্যার যুদ্ধে অংশ নিই এবং (সেখানে) আমি রুস্তমের নিকট সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পক্ষ থেকে দূত ছিলাম। আমি উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পক্ষ থেকে বেশ কিছু বিজয়ের নেতৃত্ব দিয়েছিলাম এবং হামাদান জয় করেছিলাম। আমি নাহাওয়ান্দের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করি এবং নু'মান ইবনে মুক্বরিনের বাম পার্শ্বের সেনাপতি ছিলাম। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লিখেছিলেন যে, যদি নু'মান নিহত হন, তবে আমীর হবেন হুযাইফা, আর যদি (হুযাইফাও) নিহত হন, তবে আমীর হবেন মুগীরাহ। আমিই সর্বপ্রথম ব্যক্তি যে বসরায় সামরিক দপ্তর (দীওয়ান) স্থাপন করেছিল এবং লোকদেরকে (বেতন) দেওয়ার জন্য সমবেত করেছিলাম। আমি উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পক্ষ থেকে কুফার দায়িত্বে ছিলাম এবং যখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিহত হন, তখনও আমিই সেখানকার শাসক ছিলাম। এরপর মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পক্ষ থেকেও আমি তার (কুফার) দায়িত্ব পালন করি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده فيه لِينٌ من أجل يونس بن الحارث الطائفي، لكن رَوَى هذا الخبرَ محمد بن عمر الواقدي عن جماعة من شيوخه عند ابن سعد في "طبقاته" 5/ 173 و 177، وكل رواياتهم مرسلةٌ، لكن باجتماع هذه الروايات يتقوَّى الخبر. أبو عون الثقفي: هو محمد بن عبيد الله بن سعيد، وأبو نُعيم: هو الفضل بن دُكين.وشهود المغيرة للقادسية وخبره مع رُستم سيأتي برقم (6013) بإسناد حسن. عاصم في "الآحاد والمثاني" (1547)، وأبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب" (4332)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" 5/ 401، وابن المنذر في "الأوسط" (3164)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (2839)، والطبراني في "الكبير" 20/ (993)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 60/ 29 من طريق مجالد بن سعيد، وابن عساكر 60/ 29 من طريق المغيرة بن مِقْسَم، ومن طريق عاصم الأحول، ثلاثتهم عن عامر الشعبي، عن المغيرة بن شعبة، قال: أنا آخر الناس عهدًا برسول الله صلى الله عليه وسلم، لما دُفن النبي صلى الله عليه وسلم وخَرَج عليٌّ من القبر ألقيتُ خاتمي، فقلتُ: يا أبا حسنٍ، خاتمي، قال: انزل فخُذ خاتمك، فنزلت فأخذتُ خاتمي ووضعتُ خاتمي على اللَّبِن، ثم خرجت. وفي أكثر طرقه عن مجالد بذكر الفأس بدل الخاتم، وهو وهمٌ، والصواب ما وافق فيه مجالدٌ صاحبيه المغيرة بن مِقْسَم وعاصم الأحول. ومجالدٌ ضعيف، والطريقان الآخران قويّان.ووروي نحوه من مرسل عروة بن الزبير عند ابن سعد 2/ 263، ورجاله ثقات.ومثلُه من مرسل عبيد الله بن عبد الله بن عتبة عند ابن سعد أيضًا 2/ 264 لكنه من رواية الواقدي.وقد ثبت دخول المغيرة إلى قبر النبي صلى الله عليه وسلم من رواية أبي عَسيب أو أبي عَسيم عند أحمد 34/ (20766)، قال: لمّا وُضع في لحده صلى الله عليه وسلم قال المغيرة: قد بقي من رجليه شيءٌ لم يُصلحوه، قالوا: فادخل فأصلِحْه، فدخل وأدخل يده فمسّ قدميه، فقال: أهيلوا عليَّ التراب، فأهَالُوا عليه التراب حتى بلغ أنصاف ساقيه، ثم خرج، فكان يقول: أنا أَحدَثُكم عهدًا برسول الله صلى الله عليه وسلم. وإسناده صحيح. وانظر حديث عليٍّ عند أحمد 2/ (787).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6004)


6004 - حدثنا أبو عبد الله الأصبَهاني، حدثنا الحَسن بن الجَهْم، حدثنا الحُسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عُمر، حدثني عبد الله بن محمد بن عمر بن علي، عن أبيه، عن جَدّه، قال: قال عليٌّ لمّا ألقى المُغيرةُ بن شُعبةَ خاتَمَه في قَبر النبيّ صلى الله عليه وسلم: لا يُتَحدَّثُ أنك نزلتَ في قبر النبيّ صلى الله عليه وسلم، ولا تُحدِّثُ أنت الناسَ أَنَّ خاتَمَك في قبره، فنَزَل عليٌّ وقد رأى مَوقِعَه، فتناولَه فدَفَعَه إليه [1]. 6004 م - قال ابن عُمر: وحدثنا محمد بن أبي موسى الثَّقفي، عن أبيه، قال: مات المغيرةُ بن شُعْبة بالكوفة في شعبان سنة خمسين وهو ابن سبعينَ سنةً، في خلافة معاوية [2].




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন মুগীরা ইবনু শু'বা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর আংটিটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কবরের ভেতরে ফেলে দিলেন, [আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন]: "এ যেন আলোচনা না হয় যে তুমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কবরে নেমেছ, এবং তুমিও যেন মানুষকে বলো না যে তোমার আংটি তাঁর কবরে রয়েছে।" অতঃপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিচে নামলেন, অথচ তিনি (মুগীরা) আংটির অবস্থান দেখেছিলেন। তিনি সেটি তুলে নিলেন এবং তাকে দিয়ে দিলেন। ইবনু উমার বলেন: আমাদেরকে মুহাম্মাদ ইবনু আবী মূসা আছ-ছাক্বাফী তাঁর পিতা থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: মুগীরা ইবনু শু’বা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পঞ্চাশ হিজরীতে সত্তর বছর বয়সে মু‘আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতের সময় শা‘বান মাসে কূফায় ইন্তিকাল করেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف، فقد انفرد به بهذا الإسناد محمدُ بنُ عمر - وهو الواقدي - وأخرجه ابن سعد في "طبقاته" 2/ 264 و 5/ 177 عنه، لكنه لم يذكر في إسناده جَدّ عبد الله بن محمد بن عمر بن علي، فصار الخبر منقطعًا. وكذلك ذكره الطبري في "ذيل المُذيَّل" كما في "منتخبه" المطبوع بذيل "تاريخ الطبري" 11/ 513 دون ذكر عمر بن علي بن أبي طالب.ورواه الواقدي أيضًا كما أخرجه عنه ابن سعد 2/ 264 عن عبد الرحمن بن عبد العزيز - وهو ابن عبد الله بن عثمان بن حُنيف - عن عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم مرسلًا.وهو مع إرساله من تفردات الواقدي وشيخه فيه مختلفٌ فيه، وهو إلى الضعف أقرب.وأخرج ابن سعد 2/ 263 عن سُريج بن النعمان، عن هشيم، عن أبي معشر، قال: حدثني بعضُ مشيختنا، قال: لما خرج عليٌّ من القبر ألقى المغيرة خاتمه في القبر، وقال لعليٍّ: خاتمي، فقال عليٌّ للحَسن بن علي: ادخل فناوله خاتمه، ففعل. وهذا مع إرساله فيه عنعنةُ هشيم وضعف شيخه أبي معشر: وهو نَجيح بن عبد الرحمن السِّنْدي.وقد رُوي خِلاف هذا: أنَّ المغيرة بن شعبة نزل في قبر النبي صلى الله عليه وسلم وتناول خاتمه، وأنَّ عليًا أذن له بذلك ولم يمنعه.فقد أخرج ابن سعد في "طبقاته" 2/ 263 و 5/ 176، وابن أبي شيبة وأحمد بن منيع في "مسنديهما" كما في "المطالب" (4332)، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 1/ 578، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1547)، وأبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب" (4332)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" 5/ 401، وابن المنذر في "الأوسط" (3164)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (2839)، والطبراني في "الكبير" 20/ (993)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 60/ 29 من طريق مجالد بن سعيد، وابن عساكر 60/ 29 من طريق المغيرة بن مِقْسَم، ومن طريق عاصم الأحول، ثلاثتهم عن عامر الشعبي، عن المغيرة بن شعبة، قال: أنا آخر الناس عهدًا برسول الله صلى الله عليه وسلم، لما دُفن النبي صلى الله عليه وسلم وخَرَج عليٌّ من القبر ألقيتُ خاتمي، فقلتُ: يا أبا حسنٍ، خاتمي، قال: انزل فخُذ خاتمك، فنزلت فأخذتُ خاتمي ووضعتُ خاتمي على اللَّبِن، ثم خرجت. وفي أكثر طرقه عن مجالد بذكر الفأس بدل الخاتم، وهو وهمٌ، والصواب ما وافق فيه مجالدٌ صاحبيه المغيرة بن مِقْسَم وعاصم الأحول. ومجالدٌ ضعيف، والطريقان الآخران قويّان.ووروي نحوه من مرسل عروة بن الزبير عند ابن سعد 2/ 263، ورجاله ثقات.ومثلُه من مرسل عبيد الله بن عبد الله بن عتبة عند ابن سعد أيضًا 2/ 264 لكنه من رواية الواقدي.وقد ثبت دخول المغيرة إلى قبر النبي صلى الله عليه وسلم من رواية أبي عَسيب أو أبي عَسيم عند أحمد 34/ (20766)، قال: لمّا وُضع في لحده صلى الله عليه وسلم قال المغيرة: قد بقي من رجليه شيءٌ لم يُصلحوه، قالوا: فادخل فأصلِحْه، فدخل وأدخل يده فمسّ قدميه، فقال: أهيلوا عليَّ التراب، فأهَالُوا عليه التراب حتى بلغ أنصاف ساقيه، ثم خرج، فكان يقول: أنا أَحدَثُكم عهدًا برسول الله صلى الله عليه وسلم. وإسناده صحيح. وانظر حديث عليٍّ عند أحمد 2/ (787).



[2] وهو في "الطبقات الكبرى" لابن سعد 5/ 179 و 8/ 143 عن محمد بن عمر الواقدي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6005)


6005 - حدثنا أبو بكر محمد بن داود بن سُليمان الزاهد، حدثنا عبد الله بن محمد بن قحْطَبة بن مرزوق الصِّلْحي بفَمِ الصِّلْح، حدثنا محمد بن نافع الكَرابِيسي البصري، حدثنا أبو عَتّاب سَهْل بن حمّاد، حدثنا أبو كعب صاحب الحَرير، عن عبد العزيز بن أبي بَكْرة، قال: كنا جلوسًا عند باب الصَّغير الذي في المسجد، يعني باب عَيْلان: أبو بَكْرة وأخوه نافع وشِبْل بن مَعْبَد، فجاء المغيرةُ بن شُعبة يمشي في ظِلال المسجد، والمسجدُ يومئذٍ من قَصَب، فانتهى إلى أبي بَكْرة فسلّم عليه، فقال له أبو بكرة: أيها الأمير، ما أخرجَك من دار الإمارة؟ قال: أتحدَّثُ إليكم، فقال له أبو بكرة: ليس لك ذاك، الأميرُ يجلسُ في داره، فيَبعَث إلى من يشاء، فيتحدّثُ معهم، قال: يا أبا بكرة، لا بأس بما أصنعُ، فدخل من باب الأصغر، حتى تقدَّم إلى باب أمّ جَميل امرأةٍ من قَيْس قال: وبين دَار أبي عبد الله [1] وبين دار المرأة طريقٌ، فدخل عليها، قال أبو بَكْرةَ: ليس لي على هذا صبرٌ، فبعث إلى غُلام له، فقال له: ارتَقِ غرفتي، فانظر من الكَوَّة، فانطلق فنظر، فلم يَلبَثْ أن رجع، فقال: وجدتُهما في لِحافٍ، فقال للقوم: قُوموا معي، فقاموا، فبدأ أبو بكرةَ، فنظر فاستَرجَعَ، ثم قال لأخِيه: انظُرْ، فنظَر، قال: ما رأيتَ؟ قال: الزِّنى مَحْضًا، ثم قال: يا شِبْلُ انظُرْ، فنظر، قال: ما رأيتَ؟ قال: رأيتُ الزِّنى مَحْضًا، قال: أُشْهِدُ الله عليكم؟ قالوا: نعم، قال: فانصرفَ إلى أهلِه، وكَتَب إلى عمر بن الخطاب بما رأى، فأتاهُ أمرٌ فَظِيعٌ، صاحبُ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلم يَلبَثْ أن بعث أبا موسى الأشعري أميرًا على البصرة، فأرسل أبو موسى إلى المُغيرة: أن أقِمْ ثلاثةَ أيام أنت فيها أميرُ نفسِك، فإذا كان يومُ الرابع، فارتحِلْ أنت وأبو بَكْرة وشُهودُه، فيا طُوبَى لك إن كان مَكذوبًا عليك، ووَيلٌ لك إن كان مَصدوقًا عليك.فارتَحَلَ القومُ أبو بَكْرة وشُهودُه والمُغيرةُ بن شُعبة، حتى قَدِموا المدينةَ على أمير المؤمنين فقال هاتِ ما عندَك يا أبا بَكْرة، قال: أشهَدُ أني رأيتُ الزنى مَحْضًا، ثم قَدَّموا أبا عبد الله أخاهُ، فَشَهِدَ: إني رأيت الزنى محضًا، ثم قَدَّموا شِبْلَ بنَ مَعِبَد البَجَلي، فسأله، قال: أشهدُ أني قد رأيتُ الزنى مَحْضًا، ثم قدَّموا زيادًا، فقال: ما رأيتَ؟ فقال: رأيتُهما في لِحافٍ، وسمعتُ نَفَسًا عاليًا، ولا أدري ما وراءَ ذلك، فكبَّر عمرُ، وفَرِحَ إذ نَجَا المُغيرةُ، وضربَ القومَ إلَّا زيادًا [2].قال: كان أميرُ المؤمنين عمر بن الخطاب ولَّى عُتبةَ بن غَزْوان البصرةَ، فَقَدِمَها سنةَ ستَّ عشرةَ، وكانت وفاتُه في سنة تسعَ عشرةَ، وكان عُتبة يكره ذلك، ويدعُو الله أن يُخلِّصه منها، فسَقَط عن راحِلَته في الطريق، فمات رحمه الله، ثم كان من أمرِ المُغيرةِ ما كان [3].




আবূ বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা মসজিদের ছোট দরজার কাছে—যা আইলানের দরজা নামে পরিচিত—সেখানে বসেছিলাম। আবূ বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), তার ভাই নাফি' এবং শিবল ইবনু মা'বাদ উপস্থিত ছিলেন। এমন সময় মুগীরাহ ইবনু শু'বা ছায়ার মধ্য দিয়ে হেঁটে আসলেন। তখন মসজিদ ছিল বাঁশের তৈরি। তিনি আবূ বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে তাঁকে সালাম দিলেন। আবূ বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: হে আমীর, কিসের কারণে আপনি আপনার রাজকীয় ভবন (ইমারত) থেকে বের হয়ে এসেছেন? তিনি বললেন: আমি আপনাদের সাথে কথা বলতে এসেছি। আবূ বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: এটা আপনার জন্য শোভা পায় না। আমীরের উচিত তার ঘরে বসে থাকা এবং যার সাথে তিনি কথা বলতে চান, তাকে ডেকে পাঠানো। মুগীরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আবূ বাকরা, আমি যা করছি তাতে কোনো সমস্যা নেই। এরপর তিনি ছোট দরজা দিয়ে প্রবেশ করলেন এবং ক্বায়েস গোত্রের এক মহিলা উম্মে জামিলের দরজার দিকে অগ্রসর হলেন।

বর্ণনাকারী বলেন: আবূ আব্দুল্লাহর বাড়ি এবং ওই মহিলার বাড়ির মাঝে একটি রাস্তা ছিল। মুগীরাহ তার কাছে প্রবেশ করলেন। আবূ বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এর উপর আমার ধৈর্য ধারণ করা সম্ভব নয়। তিনি তাঁর এক গোলামকে ডেকে বললেন: তুমি আমার কামরায় উঠে জানালার ফাঁক দিয়ে দেখো। সে গিয়ে দেখল এবং দ্রুত ফিরে এসে বলল: আমি তাদের দু’জনকে একই চাদরের নিচে পেয়েছি। আবূ বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উপস্থিত লোকজনকে বললেন: তোমরা আমার সাথে ওঠো। তারা সকলে উঠলেন। প্রথমে আবূ বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এগিয়ে গেলেন এবং দেখে (ইন্না লিল্লাহি ওয়া ইন্না ইলাইহি রাজিউন পড়ে) ইস্তেজা করলেন। এরপর তিনি তার ভাইকে বললেন: তুমি দেখো। সে দেখল। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: তুমি কী দেখলে? সে বলল: স্পষ্ট যিনা (ব্যভিচার)। এরপর তিনি শিবলকে বললেন: হে শিবল, তুমি দেখো। সে দেখল। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: তুমি কী দেখলে? সে বলল: আমি স্পষ্ট যিনা দেখেছি। তিনি বললেন: আমি তোমাদের উপর আল্লাহকে সাক্ষী রাখছি? তারা বলল: হ্যাঁ।

এরপর তিনি তার পরিবারের কাছে ফিরে গেলেন এবং যা দেখেছেন তা লিখে উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট পাঠালেন। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এক সাহাবীর (এমন কাজ) সম্পর্কে ভয়ঙ্কর খবর তাঁর কাছে পৌঁছল। তিনি দেরি না করে আবূ মূসা আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বসরাহর আমীর করে পাঠালেন। আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মুগীরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে বার্তা পাঠালেন: আপনি তিন দিন সেখানে থাকুন এবং আপনি নিজেই আপনার আমীর। চতুর্থ দিন হলে, আপনি, আবূ বাকরা এবং তার সাক্ষীরা মদীনার উদ্দেশ্যে রওয়ানা হবেন। যদি আপনার বিরুদ্ধে মিথ্যা বলা হয়ে থাকে, তাহলে আপনার জন্য সুসংবাদ; আর যদি আপনার বিরুদ্ধে সত্য প্রমাণিত হয়, তাহলে আপনার জন্য দুর্ভোগ।

এরপর আবূ বাকরা, তার সাক্ষীরা এবং মুগীরাহ ইবনু শু'বা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রওয়ানা হলেন এবং আমীরুল মু'মিনীন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট মদীনায় পৌঁছলেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আবূ বাকরা, আপনার যা বলার আছে তা বলুন। তিনি বললেন: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আমি স্পষ্ট যিনা হতে দেখেছি। এরপর তার ভাই আবূ আব্দুল্লাহকে পেশ করা হলো। সে সাক্ষ্য দিল: আমি স্পষ্ট যিনা দেখেছি। এরপর শিবল ইবনু মা'বাদ আল-বাজালীকে পেশ করা হলো। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে জিজ্ঞেস করলেন। সে বলল: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আমি স্পষ্ট যিনা দেখেছি। এরপর যিয়াদকে পেশ করা হলো। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনি কী দেখেছেন? সে বলল: আমি তাদের দু’জনকে এক চাদরের নিচে দেখেছি এবং আমি উচ্চ শব্দে শ্বাস-প্রশ্বাসের শব্দ শুনেছি, তবে এর বাইরে কী ঘটেছে তা আমি জানি না। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকবীর দিলেন এবং মুগীরাহ রেহাই পাওয়ায় আনন্দিত হলেন। তিনি যিয়াদ ব্যতীত সকলকে কশাঘাত করলেন।

বর্ণনাকারী বলেন: আমীরুল মু'মিনীন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উতবাহ ইবনু গাযওয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বসরাহর শাসক নিযুক্ত করেছিলেন। তিনি ষোলো হিজরীতে সেখানে পৌঁছান এবং উনিশ হিজরীতে তার মৃত্যু হয়। উতবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এটি (ক্ষমতা) অপছন্দ করতেন এবং আল্লাহর কাছে তা থেকে মুক্তি চাইতেন। এরপর তিনি পথিমধ্যে তার সওয়ারী থেকে পড়ে যান এবং ইনতিকাল করেন। আল্লাহ তাঁর উপর রহমত বর্ষণ করুন। এরপর মুগীরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘটনা যেমনটি ছিল, তেমনই ঘটল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] يعني نافع بن الحارث أخا أبي بكرة لأمّه الذي تقدَّم ذكره، فقد كان يكنى أبا عبد الله كما سيأتي عند ذكر شهادتهم على المغيرة في هذه الرواية.



[2] إسناده ضعيف لجهالة محمد بن نافع الكرابيسي، وفي طبقته محمد بن أحمد بن نافع العَبْدي البصري، ذكره المزي في "التهذيب" في الرواة عن أبي عَتّاب سهل بن حماد، فإن كان هو فالإسناد حسنٌ من أجله هو وأبي عتّاب، فإنما صدوقان، لكن لم نقف على نسبة محمد بن أحمد بن نافع هذا إلى الكرابيس التي هي نوع من الثياب، فالله تعالى أعلم. وعلى كل حالٍ فأصل الخبر صحيح، له طُرق يشدُّ بعضها بعضًا.وأخرجه مختصرًا البَلاذُري في "أنساب الأشراف" 10/ 388 - 389، والبيهقي في "السنن الكبرى" 8/ 235 من طريق هُشَيم بن بشير، عن عُيينة بن عبد الرحمن بن جَوْشَن، عن أبيه، عن أبي بكرة. ورجاله ثقات.لكن أخرج بعض حروف هذا الخبر ابن أبي شيبة 9/ 535 و 11/ 101، وأحمد في "العلل" برواية ابنه عبد الله (2820) عن إسماعيل بن عُلَيَّة، عن عُيينة بن عبد الرحمن، عن أبيه، غير أنه أرسله فلم يذكر أبا بكرة، فالله أعلم.وأخرج الخبر مختصرًا من طرق مرسلة: الشافعي في "الأم" 8/ 64، وابن سعد 5/ 179، وعبد الرزاق (13564 - 13566) و (15550)، وابن أبي شيبة 10/ 91 و 92، وابن المنذر في "الأوسط" (6731) و (6732) و (19231 - 9234)، والطبري في "تفسيره" 18/ 75، وفي "تاريخه" 4/ 69، والطحاوي في "مشكل الآثار" (12/ 359 - 362، وفي "معاني الآثار" 4/ 153، والطبراني في "الكبير" (7227)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (3778)، والبيهقي في "السنن" 8/ 23 و 10/ 148 و 152، وابن عساكر 60/ 32 - 33 و 62/ 215 - 216. وانظر "مسند الفاروق" لابن كثير (778 - 781)، و"فتح الباري" 8/ 309 - 310. 1/ 498 عن يعقوب بن سفيان وابن البرقي وسعيد بن عُفير، ونقل عن محمد بن المثنى وخليفة بن خياط أنه توفي سنة أربع عشرة، وعن أبي حسان الزيادي أنه توفي سنة خمس عشرة. ثم قال الخطيب: الأشبه بالصواب أنَّ عتبة مات سنة سبع عشرة، لأن المدائن فتحت سنة ست عشر، ثم مُصّرت البصرةُ بعد ذلك ونزلها المسلمون، وعتبة أول من اختطّها وسكنها.



6005 [3] - قوله هنا: وكانت وفاته سنة تسع عشرة، غريبٌ، فقد ذكر علماء التاريخ أنَّ عتبة توفي سنة سبع عشرة، نقله ابن زَبْر الرَّبَعي في "تاريخ العلماء ووفياتهم" 1/ 102 عن محمد بن عمر الواقدي ومحمد بن عبد الله بن نمير وعمرو بن علي الفلاس ونقله الخطيب البغدادي في "تاريخ بغداد" 1/ 498 عن يعقوب بن سفيان وابن البرقي وسعيد بن عُفير، ونقل عن محمد بن المثنى وخليفة بن خياط أنه توفي سنة أربع عشرة، وعن أبي حسان الزيادي أنه توفي سنة خمس عشرة. ثم قال الخطيب: الأشبه بالصواب أنَّ عتبة مات سنة سبع عشرة، لأن المدائن فتحت سنة ست عشر، ثم مُصّرت البصرةُ بعد ذلك ونزلها المسلمون، وعتبة أول من اختطّها وسكنها.



6006 - Null









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6006)


6006 - حدثنا أحمد بن يعقوب الثَّقفي، حدثنا محمد بن يحيى بن سليمان، حدثنا أحمد بن محمد بن بن أيوب، حدثنا إبراهيم بن سعد، عن محمد بن إسحاق، قال: فُتِحَت مصرُ سنةَ عشرين، وفيها كان فتحُ الفُرات عَنْوةً، وقيل: افتَتَحها المغيرةُ بن شُعبة، وكان استخلفه عُتْبةُ بن غَزْوانَ وتَوجَّه إلى عُمر، وأمَّر عمرُ المغيرةَ بن شُعبة على البصرة، وكتب إليه بعَهْده، فكان من أمْرِه وأمْرِ أم جَميل القَيسِيّة ما كان.




মুহাম্মদ ইবনে ইসহাক থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মিশর বিশ (২০) হিজরি সনে বিজয় হয়, এবং সে বছরই আল-ফুরাত (অঞ্চল) বলপূর্বক বিজয় হয়েছিল। এবং বলা হয়: মুগীরা ইবনে শু'বাহ তা (আল-ফুরাত) বিজয় করেন। আর উতবাহ ইবনে গাযওয়ান তাঁকে (মুগীরাকে) স্থলাভিষিক্ত করে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে চলে যান। অতঃপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মুগীরা ইবনে শু'বাহকে বসরা'র আমির নিযুক্ত করেন এবং তাঁর (দায়িত্বের) অঙ্গীকারপত্র লিখে দেন। অতঃপর তাঁর (মুগীরার) এবং কাইস গোত্রের উম্মে জামিলের ঘটনা সংঘটিত হয়, যা হওয়ার ছিল।









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6007)


6007 - فحدثني الزُّبير بن عبد الله [1] البغدادي، حدثنا محمد بن حمّاد، حدثنا محمد بن أبي السَّرِيّ، حدثنا هشام بن الكَلْبي، حدثني عبد الرحمن بن سعيد الكِنْدي، قال: شَهِدْنا جِنازةَ المُغيرة بن شعبة، فلما دُلَّي فِي حُفرتِه إِذا رَاكِبٌ وَقَفَ علينا، فقال: مَن هذا المَرمُوس؟ فقلنا: أميرُ الكوفة المغيرةُ بن شُعبة، فوالله ما نَهْنَه أن قال:أَرَسْمَ دِيارٍ للمغيرةِ [2] تَعرِفُ … عليه زَوَاني الجِنِّ وَالإِنسِ تَعزِفُ فإن كُنتَ قد لاقَيتَ هامانَ بعدَنا … وفِرعونَ فَاعلَمْ أَنَّ ذَا العَرْشِ يُنصِفُقال: فأقبَلَ عليه الثَّقفيُّون يشتُمُونه، فوالله ما أدري أيَّ طريق أخَذَ.وكانت ولايةُ المغيرة بن شُعبة الكوفةَ سبعَ سِنينَ [3].




আব্দুর রহমান ইবনে সাঈদ আল-কিন্দি থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা মুগীরাহ ইবনে শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জানাযায় উপস্থিত ছিলাম। যখন তাঁকে তাঁর কবরে নামানো হলো, তখন একজন আরোহী আমাদের কাছে এসে দাঁড়াল এবং জিজ্ঞাসা করল: এই দাফন করা ব্যক্তিটি কে? আমরা বললাম: ইনি হলেন কূফার আমীর মুগীরাহ ইবনে শু'বাহ। আল্লাহর শপথ, লোকটি বিন্দুমাত্র ইতস্তত না করে এই কথাগুলো বলল:

“মুগীরার সেই সব বসতির চিহ্ন কি তুমি চেনো,
যার ওপর জিন্ন ও মানুষের ব্যভিচারিণীরা বাদ্য বাজায়?
যদি তুমি আমাদের পরে হামান ও ফিরআউনের সাক্ষাৎ পাও,
তবে জেনে রাখো, আরশের মালিক অবশ্যই ইনসাফকারী।”

বর্ণনাকারী বলেন: তখন সা'কীফ গোত্রের লোকেরা তার দিকে এগিয়ে গেল এবং তাকে গালি দিতে শুরু করল। আল্লাহর শপথ, সে কোন পথে চলে গেল, তা আমি জানি না। মুগীরাহ ইবনে শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কূফার শাসনকাল ছিল সাত বছর।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] هكذا وقعت تسمية هذا الشيخ هنا: الزبير بن عبد الله، بتكبير اسم أبيه عبد الله، وكذلك جاء اسمه في إسناد خبر ذكره البيهقي في "شعب الإيمان" (10428) عن الحاكم، وخبر آخر ذكره الخطيب في "تاريخ بغداد" 8/ 362 عن رجل عن أبي عبد الله الحاكم أيضًا، وجاء كذلك مُسمًّى في خبر ذكره المزي في "تهذيب الكمال" 11/ 365، والذهبيّ في "سير أعلام النبلاء" 13/ 212 بتكبير اسم عبد الله، مع أنَّ الخطيب البغدادي لما ترجم لهذا الشيخ في "تاريخ بغداد" 9/ 495 سمَّى أباه عُبيد الله، مصغرًا، ونقل عن الحاكم أنه سماه بذلك، أي مصغرًا، وكذلك ترجم أبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 1/ 323، والذهبي في "تاريخ الإسلام" 8/ 322 لهذا الشيخ فسمّيا أباه عُبيد الله، مصغرًا، فالله تعالى أعلم.



[2] في (ز) و (ب): بالمغيرة.



6007 [3] - إسناده تالف هشام بن الكلبي - وهو هشام بن محمد بن السائب - رافضي متروك، وشيخه لا يُعرف.وأخرجه البَلاذُري في "أنساب الأشراف" 13/ 350 عن عباس بن هشام الكلبي، عن أبيه، به. وأخرجه بنحوه مختصرًا يعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 3/ 78 عن الحجاج بن منهال، بهذا الإسناد.وأخرجه بتمامه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (2217) من طريق روح بن أسلم، عن حماد بن سلمة به.والجَلَجُ، بجيمين: رؤوس الناس، واحدتها جَلَجة. والمعنى إنا بقينا في عدد لرؤوس كثيرة من المسلمين.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6008)


6008 - حدثنا أبو محمد المُزَني، حدثنا محمد بن عثمان بن أبي شَيْبة، أخبرني عبد الحميد، حدثنا شَريك، عن زياد بن عِلَاقةَ سمعتُ جَريرًا يقول في جِنازة المغيرة بن شُعبة: استَغفِروا لأميرِكم؛ فإنه كان يُحبّ العافِيَة [1].




জারীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মুগীরা ইবনু শু'বার জানাযার সময় বলছিলেন: তোমরা তোমাদের আমীরের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করো; কারণ তিনি 'আফিয়াত' (শান্তি, নিরাপত্তা ও কল্যাণ) পছন্দ করতেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل شريك - وهو ابن عبد الله النخعي وقد توبع، وعبد الحميد الراوي عنه أغلب الظن أنه ابن صالح بن عجلان البُرجُمي الكوفي، فقد أكثر عنه محمد بن عثمان بن أبي شيبة، وهو يروي عن طبقة شريك النخعي، والله تعالى أعلم.وأخرجه أحمد 31/ (19152)، والبخاري (58) من طريق أبي عوانة الوضاح بن عبد الله اليشكُري، وأحمد (19193) من طريق شعبة بن الحجاج، كلاهما عن زياد بن عِلاقة، عن جرير بن عبد الله البَجَلي. لكن لفظ أبي عوانة: كان يحب العفو. وأخرجه بنحوه مختصرًا يعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 3/ 78 عن الحجاج بن منهال، بهذا الإسناد.وأخرجه بتمامه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (2217) من طريق روح بن أسلم، عن حماد بن سلمة به.والجَلَجُ، بجيمين: رؤوس الناس، واحدتها جَلَجة. والمعنى إنا بقينا في عدد لرؤوس كثيرة من المسلمين.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6009)


6009 - حدثنا أحمد بن يعقوب، حدثنا أبو مُسلم حدثنا حَجّاج بن مِنْهال، حدثنا حمّاد بن سلمة، عن زيد بن أسلَمَ: أنَّ رجلًا جاء فنادى: يَستأذِنُ أبو عيسى على أمير المؤمنين عمر، فقال عمرُ: ومَن أبو عيسى؟ قال المغيرةُ بن شُعبة: أنا، فقال عمر: وهل لعيسى من أبٍ؟! أما في كُنَى العربِ ما تَكتَنُون بها؛ أبو عبد الله وأبو عبد الرحمن؟ فقال رجلٌ: أشهَدُ لقد سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم كنّى بها المُغيرةَ، فقال عمر: إِنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قد غُفِر له ما تَقدَّم من ذنبه وما تأخَّر، وإِنَّا فِي جَلَجٍ ما نَدْري ما يُفعَل بنا. فكنّاه بأبي عبد الله [1].




যায়েদ ইবনে আসলাম থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি এসে ডাকল: আমীরুল মুমিনীন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে আবূ ঈসা প্রবেশের অনুমতি চাচ্ছেন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আবূ ঈসা কে? মুগীরাহ ইবনু শু‘বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি। তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ঈসার কি কোনো পিতা আছে?! আরবের কুনিয়্যাগুলোর মধ্যে কি নেই, যা তোমরা ব্যবহার করতে পারো—যেমন আবূ ‘আবদুল্লাহ, আবূ ‘আবদুর রহমান? তখন এক ব্যক্তি বলল: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে মুগীরাহকে এই কুনিয়্যা দ্বারা ডাকতে শুনেছি। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের আগের ও পরের সকল গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়েছে। কিন্তু আমরা কঠিন বিপদে আছি, জানি না আমাদের সাথে কী করা হবে। অতঃপর তিনি তাঁর কুনিয়্যা পরিবর্তন করে আবূ ‘আবদুল্লাহ রাখলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث جيِّد، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكنه مرسلٌ. وسلف مختصرًا برقم (6001) موصولًا بذكر أسلم والد زيد فيه. أبو مسلم هو إبراهيم بن عبد الله الكَجِّي. وأخرجه بنحوه مختصرًا يعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 3/ 78 عن الحجاج بن منهال، بهذا الإسناد.وأخرجه بتمامه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (2217) من طريق روح بن أسلم، عن حماد بن سلمة به.والجَلَجُ، بجيمين: رؤوس الناس، واحدتها جَلَجة. والمعنى إنا بقينا في عدد لرؤوس كثيرة من المسلمين.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6010)


6010 - أخبرنا الحسن بن محمد الأزْهَري، حدثنا أبو بكر بن رَجَاء، حدثنا داود بن رُشَيد، حدثنا الهيثم بن عَديّ، عن مُجالِد بن سعيد وابن عَيَّاش وإسماعيل بن أبي خالد عن الشَّعْبي، قال: أقام المغيرةُ بنُ شُعْبة على الكوفة عشرَ سنين، ومات في سنة خمسين، فضَمّ الكوفةَ معاويةُ إلى زياد.وقد صحّت الرواياتُ أنَّ المُغيرةَ وَلِيَ الكُوفةَ سنةَ إحدى وأربعين، وهَلَكَ سنة خمسين [1].




আশ-শা'বি থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দশ বছর কুফার শাসক ছিলেন এবং তিনি পঞ্চাশ হিজরিতে ইন্তেকাল করেন। অতঃপর মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কুফাকে যিয়াদের (শাসনাধীনের) সাথে যুক্ত করেন। (তবে) সহীহ বর্ণনা মতে, মুগীরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একচল্লিশ হিজরিতে কুফার দায়িত্ব গ্রহণ করেন এবং পঞ্চাশ হিজরিতে ইন্তেকাল করেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] انظر "تاريخ الطبري" 5/ 253 و 255. منه طُرُقًا أخرى قوية تقدم تخريجها هناك. وقد نقص من هذه الرواية ذكر رجلين من العشرة، وهما سعيد بن زيد وأبو عبيدة عامر بن الجراح. أحمد بن يونس: هو أحمد بن عبد الله بن يونس اليَرْبُوعي، وحُصين: هو ابن عبد الرحمن السُّلمي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6011)


6011 - فحدثنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا موسى بن إسحاق الأنصاري القاضي، حدثنا أحمد بن يونس، حدثنا أبو بكر بن عيَّاش، عن حُصَين، عن هِلال بن يِسَافٍ، عن عبد الله بن ظالم، قال: كان المُغيرةُ بن شُعبة يَنالُ في خُطبتِه من عليٍّ، وأقام خُطباءَ يَنالُون منه، فبَيْنا هو يَخطُب ونالَ من عليٍّ، وإلى جَنْبي سعيدٌ بن زيد بن عمرو بن نُفَيل العَدَوي، قال: فضَرَبَني بيدِه، وقال: ألا تَرَى ما يقول هذا - أو قال: هؤلاء -؟! أشهَدُ على التِّسعةِ أنهم في الجنّة، ولو حَلَفتُ على العاشر لصَدقْتُ، كنا مع رسولِ الله صلى الله عليه وسلم بحِراءٍ: أنا وأبو بكر وعمرُ وعثمانُ وعليٌّ وطلحةُ والزبيرُ وسَعْدٌ وعبدُ الرحمن بن عَوف، فتَزَلْزَل الجَبَلُ، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "اثْبُتْ؛ فليس عليك إلَّا نَبيٌّ، أو صِدِّيقٌ، أو شَهيدٌ" [1].




সাঈদ ইবনু যাইদ ইবনু আমর ইবনু নুফাইল আল-আদাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবদুল্লাহ ইবনু যালিম বলেন, মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর খুতবায় আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সমালোচনা করতেন। তিনি আরো কিছু খতীবকে নিযুক্ত করেছিলেন যারা তাঁর (আলী রাঃ-এর) সমালোচনা করতো। একবার যখন তিনি খুতবা দিচ্ছিলেন এবং আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সমালোচনা করলেন, তখন আমার পাশে ছিলেন সাঈদ ইবনু যাইদ ইবনু আমর ইবনু নুফাইল আল-আদাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তিনি আমার হাতে আঘাত করে বললেন: 'তুমি কি দেখছো না এ কী বলছে – অথবা তিনি বললেন: এরা কী বলছে?!' আমি নয়জন সম্পর্কে সাক্ষ্য দিচ্ছি যে তারা জান্নাতী। যদি আমি দশম ব্যক্তি সম্পর্কেও কসম খাই, তবে আমি সত্য বলব। আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হেরা পর্বতে ছিলাম: আমি, আবূ বকর, উমার, উসমান, আলী, তালহা, যুবাইর, সা'দ এবং আব্দুর রহমান ইবনু আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তখন পর্বত কেঁপে উঠলো। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "শান্ত হও; তোমার উপরে একজন নবী, অথবা একজন সিদ্দীক, অথবা একজন শহীদ ব্যতীত আর কেউ নেই।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] المرفوع منه صحيح، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم، لكن جزم النسائي والدارقطني أنَّ هلال بن يِسَاف لم يسمعه من عبد الله بن ظالم، كما مضى بيانه برقم (5469)، إلّا أنَّ للمرفوع منه طُرُقًا أخرى قوية تقدم تخريجها هناك. وقد نقص من هذه الرواية ذكر رجلين من العشرة، وهما سعيد بن زيد وأبو عبيدة عامر بن الجراح. أحمد بن يونس: هو أحمد بن عبد الله بن يونس اليَرْبُوعي، وحُصين: هو ابن عبد الرحمن السُّلمي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6012)


6012 - حدثنا إبراهيم بن فِراس الفقيهُ بمكة، حدثنا بَكر بن سهل الدِّمْياطي، حدثنا عبد الله بن يوسف التِّنِّيسي، حدثنا الحَكَم بن هشام الثَّقَفي، حدثني عبد الملك بن عُمير، عن وَرّادٍ مولى المغيرة بن شعبة، عن المغيرة بن شُعبة، قال: سَرَينا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلةً، فضرب بيدِه على عُنُق راحلتي، ثم قال: "معك ماءٌ؟ " قلت: نعم، هذه سَطِيحةٌ من ماءٍ معي، قال: فنزل فقضى الحاجةَ، ثم أتاني، فقال: "أتريدُ الحاجَةَ؟ " قلت لا فغَسَل يديه ثلاثًا وتمضمض ثلاثًا واستنشق ثلاثًا، وغسَل وجهَه ثلاثًا، ثم أراد أن يُخرجَ ذِرَاعَيه، وكانت عليه جُبّةٌ من صُوفٍ ضَيِّقةٌ، فلم يَقدِرْ أن يُخرجَ ذِراعَيه منها، فأخرج يَدَيه من تحت الجُبّة ثم غسل ذِراعَيه ثلاثًا ثلاثًا، ثم مَسَحَ برأسِه، ومَسَح على الخُفّين، ثم سِرْنا فَلَحِقْنا القومَ، فصلّى بهم عبدُ الرحمن بن عوف، فأردتُ أن أُوذِنَه بمكانِ رسول الله صلى الله عليه وسلم فَمَنَعَني، فصلَّينا معه ركعةً، ثم قَضَينا الثانيةَ [1]. غريب صحيحُ الإسناد، ولم يُخرجاه بهذه السِّيَاقة.




মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা এক রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে পথ চলছিলাম। তখন তিনি তাঁর হাত দিয়ে আমার বাহনের গর্দানে আঘাত করলেন এবং বললেন, "তোমার কাছে কি পানি আছে?" আমি বললাম, হ্যাঁ, আমার সাথে একটি চামড়ার পাত্রে পানি আছে। তিনি অবতরণ করলেন এবং প্রাকৃতিক প্রয়োজন সারলেন। এরপর আমার কাছে এসে বললেন, "তোমার কি (পানির) প্রয়োজন আছে?" আমি বললাম, না। তখন তিনি তাঁর উভয় হাত তিনবার ধৌত করলেন, তিনবার কুলি করলেন এবং তিনবার নাকে পানি দিলেন। আর তাঁর চেহারা তিনবার ধৌত করলেন। অতঃপর তিনি তাঁর উভয় হাত বের করতে চাইলেন। তাঁর পরিধানে একটি সংকীর্ণ পশমের জুব্বা ছিল, ফলে তিনি তার ভেতর থেকে উভয় হাত বের করতে পারলেন না। তাই তিনি জুব্বার নিচ দিয়ে হাত বের করলেন, এরপর তাঁর উভয় হাত তিনবার তিনবার করে ধৌত করলেন। অতঃপর তিনি তাঁর মাথা মাসেহ করলেন এবং মোজার উপর মাসেহ করলেন। এরপর আমরা চলতে লাগলাম এবং অন্যদের সাথে মিলিত হলাম। (তখন দেখা গেল) আবদুর রহমান ইবনু আওফ তাদের নিয়ে সালাত আদায় করছিলেন। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অবস্থান সম্পর্কে তাঁকে (আবদুর রহমানকে) অবহিত করতে চেয়েছিলাম, কিন্তু তিনি আমাকে নিষেধ করলেন। সুতরাং আমরা তাঁর (আবদুর রহমানের) সাথে এক রাক'আত সালাত আদায় করলাম, এরপর আমরা দ্বিতীয় রাক'আতটি পূরণ করলাম।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف بكر بن سهل الدِّمْياطي، لكنه قد توبع.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 20/ (923) عن بكر بن سهل بهذا الإسناد. ومن طريق هشام بن عمار، عن الحكم بن هشام، به.وأخرجه بنحوه مطولًا ومختصرًا أحمد 30/ (18134) و (18164) و (18165) و (18182)، والنسائي (112)، وابن حبان (1342) من طريق عمرو بن وهب الثقفي، وأحمد (18172) و (18195)، وابن ماجه (1236)، والنسائي (82) و (109) و (110)، وابن حبان (1347) و (2225) من طريق حمزة بن المغيرة بن شعبة، وأحمد (18175) و (18194)، والبخاري (182) و (203) و (206) و (4421) و (5799)، ومسلم (274)، وأبو داود (149)، والنسائي (111) و (1661)، وابن حبان (2224) و (2225) من طريق عروة بن المغيرة بن شعبة، وأحمد (18190)، والبخاري (363) و (388) و (2918) و (5798)، ومسلم (274)، وابن ماجه (389)، والنسائي (9585) من طريق مسروق بن الأجدع، وأحمد (18170) من طريق قبيصة بن بُرْمة، وأحمد (18172)، والترمذي (20)، والنسائي (16) من طريق أبي سلمة بن عبد الرحمن، وأحمد (18229) من طريق أبي السائب مولى هشام بن زهرة، ومسلم (274) من طريق الأسود بن هلال، وأبو داود (152) من طريق زُرارة بن أوفى، كلهم عن المغيرة بن شعبة.وأخرج أبو داود (165)، وابن ماجه (550)، والترمذي (97) من طريق الوليد بن مسلم، عن ثور بن يزيد، عن رجاء بن حَيْوة، عن ورّاد كاتب المغيرة بن شعبة، عن المغيرة، قال: وضأت النبي صلى الله عليه وسلم في غزوة تبوك، مسح أعلى الخفين وأسفلهما. كذا انفرد بذكر مسح أعلى الخفين وأسفلهما. ونقل الترمذي عن البخاري وأبي زرعة أنهما قالا: هذا الحديث ليس بصحيح، لأنَّ ابن المبارك روى هذا عن ثور عن رجاء، قال: حُدِّثتُ عن كاتب المغيرة، مرسلًا عن النبي صلى الله عليه وسلم، ولم يذكر فيه المغيرة. وذكر أسفل الخفين منكر.وانظر ما تقدَّم برقم (615).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6013)


6013 - حدثنا أبو بكر بن بالَوَيهِ، حدثنا الحسن بن علي بن شَبِيب المَعْمَري، حدثنا عبد الله بن حماد بن نُمير، حدثنا حُصَين بن نُمير، حدثني حُصَين بن عبد الرحمن، عن أبي وائل، قال: شَهِدتُ القادسيّةَ، فانطلَق المُغيرةُ بن شعبة، فلما دَنا من سَرِير رُستُم وَثَبَ فجلس معه على سَرِيرِه، فنَخَروا، فقال لهم المغيرةُ بن شعبة: مَا الذي تَفَزَعُون من هذا؟ أنا الآن أقومُ فأرجعُ إلى ما كنتُ عليه، ويَرجِعُ صاحبُكم إلى ما كان عليه، قالوا: أخبِرنا ما جاء بكم؟ فقال المغيرة: كنا ضُلّالًا، فبعث الله فينا نبيًّا فهدانا إلى دِينِه، ورَزَقَنا، فكان فيما رَزَقَنا حَبّةٌ تكون في بلادكم هذه، فلما أكلْنا منها وأطعَمْنا أهلَنا، قالوا: لا صَبْرَ لنا حتى تُنزِلُونا هذه البلادَ، قالوا: إذًا نَقتُلَكم، قال: إن قَتَلتُمونا دخلْنا الجَنَّةَ، وإن قتلناكم دخلتُم النارَ [1].




মুগীরাহ ইবনে শু‘বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন: আমি কাদেসিয়ার যুদ্ধে উপস্থিত ছিলাম। অতঃপর মুগীরাহ ইবনে শু‘বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) গেলেন। যখন তিনি রুস্তুমের সিংহাসনের কাছে পৌঁছালেন, তখন লাফ দিয়ে উঠে তার সাথে সিংহাসনের উপরে বসে পড়লেন। পারস্যবাসীরা তখন রাগে শব্দ করল। মুগীরাহ ইবনে শু‘বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদেরকে বললেন: তোমরা এতে আতঙ্কিত হচ্ছো কেন? আমি এখনই উঠে আমার পূর্বের অবস্থানে ফিরে যাবো। আর তোমাদের সাথীও তার পূর্বের অবস্থানে ফিরে যাবে।

তারা (পারস্যবাসীরা) বলল: তোমরা কী কারণে এসেছো, তা আমাদের বলো। মুগীরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমরা ছিলাম পথভ্রষ্ট। অতঃপর আল্লাহ আমাদের মাঝে একজন নবী পাঠালেন, যিনি আমাদেরকে তাঁর দীনের দিকে পথ দেখালেন এবং আমাদেরকে রিযিক দান করলেন। তিনি আমাদেরকে যে রিযিক দান করেছেন, তার মধ্যে একটি শস্যদানা ছিল যা তোমাদের এই দেশে পাওয়া যায়। যখন আমরা তা খেলাম এবং আমাদের পরিবার-পরিজনকে খাওয়ালাম, তখন তারা বলল: তোমরা এই দেশে আমাদের বসবাস না করানো পর্যন্ত আমাদের আর ধৈর্য নেই।

তারা বলল: তাহলে আমরা তোমাদেরকে হত্যা করবো। তিনি বললেন: যদি তোমরা আমাদের হত্যা করো, তবে আমরা জান্নাতে প্রবেশ করবো। আর যদি আমরা তোমাদের হত্যা করি, তবে তোমরা জাহান্নামে প্রবেশ করবে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد ليِّن لجهالة حال عبد الله بن حماد بن نمير، وقد توبع أبو وائل: هو شقيق بن سلمة.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 20/ (970) عن الحسن بن علي المَعْمري، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي شيبة 12/ 562، والطبري في "تاريخه" 3/ 496 من طريق أبي عوانة الوضاح اليشكري، عن حُصين بن عبد الرحمن، به وإسناده صحيح.وأخرجه الطبري كذلك 3/ 525 من طريق عبيدة بن مُعتِّب الضبي، عن شقيق بن سلمة أبي وائل. وإسناده ضعيف.وأخرجه بنحوه دون قصة السرير البخاري (3159) من طريق جبير بن حَيّة بالقصة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6014)


6014 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ ويحيى بن محمد العَنْبريُّ، قالا: حدثنا محمد بن إبراهيم العَبْدي، حدثنا أُميّة بن بِسْطامَ، حدثنا يزيد بن زُرَيع، حدثنا حَجّاج الصَّوّاف، حدثني أبو إياسٍ معاويةُ [1] بن قُرّة، عن أبيه، قال: لما كان يومُ القادسيّة بُعِثَ بالمغيرة بن شعبة إلى صاحبِ فارسَ، فقال: ابعَثُوا معي عَشَرةً، فبعَثُوا، فَشَدّ عليه ثيابَه، ثم أخذ معه حَجَفَةً، ثم انطلَقَ حتى أتَوْه، فقال: ألقُوا لي تُرْسًا، فجلس عليه، فقال العِلْجُ: إنكم - مَعاشِرَ العرب - قد عَرفْتُ الذي حَمَلَكم على المَجيء إلينا، أنتم قومٌ لا تَجِدُون في بلادكم من الطعام ما تَشبَعون منه، فخُذُوا نُعطِيكُم من الطعام حاجَتَكم، فإنّا قومٌ مَجُوسٌ، وإنَّا نَكرَه قَتْلَكم، إنكم تُنجِّسون علينا أرضَنا، فقال المغيرةُ: والله ما ذاكَ جاء بنا، ولكنا كنا قومًا نَعبُد الحِجارةَ والأوثانَ، فإذا رأينا حَجَرًا أحسنَ من حَجَر القَيناهُ وأخذْنا غيرَه، ولا نَعرِفُ ربًّا، حتى بعثَ اللهُ إلينا رسولًا من أنفُسِنا، فدعانا إلى الإسلام فاتَّبَعْناه، ولم نَجِئْ للطعام، إنّا أُمِرنا بقتالِ عَدُوِّنا ممَّن تَرَك الإسلامَ، ولم نَجِئْ للطعام، ولكنا جئنا لنقتُلَ مُقاتِلتَكم، ونَسبِيَ ذَرَاريَّكم، وأما ما ذَكَرتَ من الطعام، فإنّا لَعَمْري ما نَجِدُ من الطعام ما نَشبَعُ منه، وربما لم نَجِدْ رِيًّا من الماء أحيانًا، فجئنا إلى أرضكم هذه فوجدنا فيها طعامًا كثيرًا وماءً كثيرًا، فوالله لا نَبرَحُها حتى تكون لنا أو لكم، فقال العِلْجُ بالفارسية: صَدَقَ، قال: وأنت تُفقأُ عَينُك غدًا، فَفُقِئَت عَينُه من الغدِ؛ أصابَتْه نُشّابةٌ [2].غريب صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه. ‌‌ذكرُ مناقب رُكَانةَ بن عبد يزيدَ رضي الله عنه -




মু'আবিয়া ইবন কুররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর পিতা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন কাদেসিয়ার যুদ্ধ সংঘটিত হলো, তখন মুগীরাহ ইবন শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পারস্যের নেতার কাছে পাঠানো হলো। মুগীরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমার সাথে দশজনকে পাঠান। তারা দশজনকে পাঠালেন। এরপর তিনি তার পোশাক শক্তভাবে পরিধান করলেন এবং সাথে একটি ঢাল নিলেন। তারপর তিনি যাত্রা করলেন যতক্ষণ না তারা (পারস্যের নেতার) কাছে পৌঁছালেন। মুগীরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমার জন্য একটি ঢাল ফেলে দাও। তিনি সেটির উপর বসলেন।

তখন সেই অসভ্য (পারস্যের) লোকটি বলল: হে আরবের দল, আমি জানি কী জিনিস তোমাদের আমাদের কাছে আসতে বাধ্য করেছে। তোমরা এমন এক জাতি যারা তোমাদের দেশে এমন পর্যাপ্ত খাবার পাও না যাতে তোমরা পরিতৃপ্ত হতে পারো। সুতরাং তোমরা নাও, আমরা তোমাদের চাহিদামতো খাবার দেবো। আমরা অগ্নিপূজক জাতি, আর আমরা তোমাদের হত্যা করা পছন্দ করি না, কারণ তোমরা আমাদের ভূমিকে অপবিত্র করো।

মুগীরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম, তা আমাদের এখানে আনেনি। বরং আমরা এমন এক জাতি ছিলাম যারা পাথর ও মূর্তির পূজা করতাম। যখন আমরা একটি পাথরের চেয়ে অন্যটিকে ভালো দেখতাম, তখন আমরা আগেরটিকে ফেলে দিতাম এবং অন্যটি গ্রহণ করতাম। আমরা কোনো রবকে চিনতাম না, যতক্ষণ না আল্লাহ আমাদের মধ্য থেকে একজন রাসূল প্রেরণ করলেন। তিনি আমাদের ইসলামের দিকে আহ্বান করলেন এবং আমরা তাঁকে অনুসরণ করলাম। আমরা খাদ্যের জন্য আসিনি। বরং আমাদের নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যেন আমরা সেই শত্রুদের সাথে যুদ্ধ করি যারা ইসলাম ত্যাগ করেছে। আমরা খাবারের জন্য আসিনি। বরং আমরা এসেছি তোমাদের যোদ্ধাদের হত্যা করতে এবং তোমাদের বংশধরদের (নারী ও শিশুদের) বন্দী করতে।

আর তুমি খাদ্যের যে কথা বললে, আমার জীবনের কসম! আমরা এমন খাবার পাই না যাতে তৃপ্ত হতে পারি, এবং কখনও কখনও আমরা পান করার মতো পর্যাপ্ত পানিও পাই না। তাই আমরা তোমাদের এই দেশে এসেছি, আর এখানে আমরা প্রচুর খাবার ও প্রচুর পানি পেয়েছি। আল্লাহর কসম! আমরা এই জায়গা ত্যাগ করব না যতক্ষণ না এটি হয় আমাদের হবে অথবা তোমাদের হবে।

তখন সেই অসভ্য লোকটি ফারসি ভাষায় বলল: সে সত্য বলেছে। এরপর সে বলল: আগামীকাল তোমার চোখ উপড়ে ফেলা হবে। পরের দিনই তাঁর চোখ উপড়ে ফেলা হলো; একটি তীর এসে তাঁর চোখে আঘাত করেছিল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] جاء في نسخنا الخطية: حدثني إياس بن معاوية، فأصبحت رواية الخبر لأبيه معاوية بن قرة، فصار الخبر مرسلًا، وإنما الخبر لقرة بن إياس المزني الصحابي متصلًا، والتصويب من "المعجم الكبير" للطبراني 20/ (861) حيث رواه عن جماعة عن أُميّة بن بِسْطام. وكذلك رواه خليفة بن خياط عن يزيد بن ذريع.



[2] إسناده صحيح. حجاج الصَّوّاف: هو ابن أبي عثمان.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 20/ (861) من طرق عن أمية بن بِسْطام، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته" 5/ 178، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (6227) من طريق خليفة بن خيّاط، عن يزيد بن زُريع، به.والحَجَفة: التُّرس.والنُّشّابة: السَّهم. وأخرجه أبو داود (4078)، والترمذي (1784) عن قتيبة بن سعيد، عن محمد بن ربيعة، عن أبي الحسن العسقلاني، عن أبي جعفر بن محمد بن ركانة، عن أبيه: أنَّ ركانة صارع النبي صلى الله عليه وسلم … قال ركانة: وسمعتُ النبي …وقد رُويت قصة مصارعة ركانة والنبي صلى الله عليه وسلم من مرسل سعيد بن جبير عند أبي داود في "المراسيل" (308) - ومن طريقه البيهقي 10/ 18 - بإسناد صحيح إلى سعيد بن جبير كما قال الحافظ ابن حجر في "التلخيص الحبير" 4/ 162 قال: إلّا أنَّ سعيدًا لم يدرك ركانة. وقال البيهقي 10/ 18 عن خبر سعيد بن جبير هذا مُرسلٌ جيّد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6015)


6015 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيه، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حدثنا مصعب بن عبد الله، قال: ماتَ رُكانةُ بن عبد يزيدَ بن هاشم بن المُطّلب بن عبد مَنافٍ بالمدينة في أولِ إمارةِ مُعاويةَ سنةَ أربعينَ [1].




মুসআব ইবনু আবদুল্লাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রুকানাহ ইবনু আবদ ইয়াযীদ ইবনু হাশিম ইবনু মুত্তালিব ইবনু আবদ মানাফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শাসনামলের শুরুতে, চল্লিশ হিজরিতে, মদীনায় ইন্তিকাল করেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] انظر "نسب قريش" لمصعب بن عبد الله الزبيري ص 95 و 96. وأخرجه أبو داود (4078)، والترمذي (1784) عن قتيبة بن سعيد، عن محمد بن ربيعة، عن أبي الحسن العسقلاني، عن أبي جعفر بن محمد بن ركانة، عن أبيه: أنَّ ركانة صارع النبي صلى الله عليه وسلم … قال ركانة: وسمعتُ النبي …وقد رُويت قصة مصارعة ركانة والنبي صلى الله عليه وسلم من مرسل سعيد بن جبير عند أبي داود في "المراسيل" (308) - ومن طريقه البيهقي 10/ 18 - بإسناد صحيح إلى سعيد بن جبير كما قال الحافظ ابن حجر في "التلخيص الحبير" 4/ 162 قال: إلّا أنَّ سعيدًا لم يدرك ركانة. وقال البيهقي 10/ 18 عن خبر سعيد بن جبير هذا مُرسلٌ جيّد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6016)


6016 - حدثنا الشيخ أبو الوليد الفقيهُ وأبو بكر بن قُريش، قالا: حدثنا الحَسن بن سفيان حدثنا محمد بن عمَّار، حدثنا محمد بن رَبيعة، حدثنا أبو الحَسَن العَسْقَلاني، حدثنا أبو جعفر محمد بن رُكَانةَ بن عبد يزيدَ، عن أبيه: أنه صارعَ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فصَرَعَه النبيُّ صلى الله عليه وسلم، وقال رُكانةُ: سمعتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول: "فَرْقُ ما بينَنا وبين المشركين العَمائمُ على القَلانِسِ" [1]. ‌‌ذكرُ مناقب عَمرو بن العاص رضي الله عنه -




রুকানাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কুস্তি লড়েছিলেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে ধরাশায়ী করেন। রুকানাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "আমাদের এবং মুশরিকদের মাঝে পার্থক্য হলো টুপির উপর পাগড়ি।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لجهالة أبي الحسن العَسقلاني فمن فوقه، قال البخاري في "تاريخه الكبير" 82:1 إسناده مجهول، لا يُعرف سماع بعضهم من بعض، وقال الترمذي في "جامعه" (1784): حديث غريب وإسناده ليس بالقائم، وقال ابن حبان في "الثقات" 5/ 360: لست بالمعتمِد على إسناده. قلنا: وقد اختُلف في إسناه، فمرةً يُروى عن أبي الحسن العسقلاني كما وقع في رواية المصنف، ومرةً يُروى عن أبي الحسن عن أبي جعفر محمد بن رُكانة عن أبيه: أنَّ ركانة صارع النبي صلى الله عليه وسلم … ومرةً يروى عن أبي الحسن عن أبي جعفر بن محمد بن ركانة عن أبيه: أن ركانة صارع النبي صلى الله عليه وسلم، فالله أعلم أي ذلك أصحّ. وانظر "الإصابة" لابن حجر 6/ 336. وأخرجه أبو داود (4078)، والترمذي (1784) عن قتيبة بن سعيد، عن محمد بن ربيعة، عن أبي الحسن العسقلاني، عن أبي جعفر بن محمد بن ركانة، عن أبيه: أنَّ ركانة صارع النبي صلى الله عليه وسلم … قال ركانة: وسمعتُ النبي …وقد رُويت قصة مصارعة ركانة والنبي صلى الله عليه وسلم من مرسل سعيد بن جبير عند أبي داود في "المراسيل" (308) - ومن طريقه البيهقي 10/ 18 - بإسناد صحيح إلى سعيد بن جبير كما قال الحافظ ابن حجر في "التلخيص الحبير" 4/ 162 قال: إلّا أنَّ سعيدًا لم يدرك ركانة. وقال البيهقي 10/ 18 عن خبر سعيد بن جبير هذا مُرسلٌ جيّد.



6017 - Null









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6017)


6017 - حدثنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا إسماعيلُ بن قُتيبة، حدثنا محمد بن عبد الله بن نُمير، قال: مات عمرو بن العاص سنةَ اثنتين وأربعين.




মুহাম্মদ ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে নুমাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ‘আমর ইবনুল ‘আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বিয়াল্লিশ (৪২) সনে মৃত্যুবরণ করেন।









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6018)


6018 - حدثنا أبو بكر بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حدثنا مصعب بن عبد الله الزُّبيري، قال: وأبو عبد الله عمرو بن العاص بن وائل بن هاشم بن سُعَيد [1] بن سَهْم بن عمرو بن هُصَيص بن كعب بن لُؤي بن غالب، وأمه النابِغةُ بنتُ خزَيمة بن الحارث بن كَلْثوم بن جَوشَن بن عمرو بن عبد الله بن خُزيمة بن عَنَزَة بن أَسد بن رَبيعة بن نِزارٍ، وكان قصيرًا يَخضِب بالسَّواد، وقد قيل: النابِغةُ بنت حَرْملةَ، سَبِيَّةٌ [2] من عَنَزَة، وأخوه من أمِّه عُروة بن أبي أُثَاثة [3] العَدَوي، وكان من مُهاجرة الحَبَشة، وأخوه هشام بن العاص قُتل يوم أجْنادِينَ شهيدًا.وقد قيل: إنَّ عمرو بن العاص تُوفي سنة إحدى وخَمسين، والله أعلم [4].




মুসআব ইবনু আব্দুল্লাহ আয-যুবাইরী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবু আব্দুল্লাহ আমর ইবনুল আস ইবনু ওয়াঈল ইবনু হাশিম ইবনু সাঈদ ইবনু সাহ্ম ইবনু আমর ইবনু হুসাইস ইবনু কা‘ব ইবনু লুআই ইবনু গালিব। আর তাঁর মা ছিলেন আন-নাবিগাহ বিন্ত খুযাইমাহ ইবনুল হারিস ইবনু কালসুম ইবনু জাওশান ইবনু আমর ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু খুযাইমাহ ইবনু আনazah ইবনু আসাদ ইবনু রাবী‘আহ ইবনু নিযার। তিনি ছিলেন বেঁটে এবং কালো খেযাব ব্যবহার করতেন। আবার বলা হয়েছে: আন-নাবিগাহ ছিলেন হারমালাহ-এর কন্যা এবং আনazah গোত্রের বন্দিনী। আর তাঁর মায়ের দিক থেকে তাঁর ভাই ছিলেন উরওয়াহ ইবনু আবী উসাসাহ আল-‘আদাবী, যিনি হাবশা (আবিসিনিয়া)-য় হিজরতকারীদের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন। আর তাঁর ভাই হিশাম ইবনুল আস আজনাদাইন-এর যুদ্ধে শহীদ হন। আরও বলা হয়েছে: আমর ইবনুল আস একান্ন (৫১) হিজরীতে ইনতিকাল করেন। আর আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] ضُبط هذا الاسم في (ز) هكذا بالتصغير بضمِّ أوله: سُعيد، وانظر الكلام على ضبطه عند الرواية المتقدمة برقم (5127). والليث فيما رواه عنهم ابن زَبْر الربعي في "تاريخ العلماء ووفياتهم" 1/ 141 - 142 حيثجزموا بوفاته سنة ثلاث وأربعين، وقولهم يخالف أيضًا قولَ ابن نمير المتقدم: أنه توفي سنة اثنتينوأربعين.



[2] جاء في نسخنا الخطية حرملة بن شيبة، وهو تحريف أوهم أنَّ جدَّ النابغة اسمه شيبة، وليس في نسبها من اسمه شيبة، والمثبت على الصواب من "نسب قريش" لمصعب الزبيري ص 409. والليث فيما رواه عنهم ابن زَبْر الربعي في "تاريخ العلماء ووفياتهم" 1/ 141 - 142 حيثجزموا بوفاته سنة ثلاث وأربعين، وقولهم يخالف أيضًا قولَ ابن نمير المتقدم: أنه توفي سنة اثنتينوأربعين.



6018 [3] - تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: بن أمامة، والتصويب من "نسب قريش" لمصعب الزبيري ص 409. والليث فيما رواه عنهم ابن زَبْر الربعي في "تاريخ العلماء ووفياتهم" 1/ 141 - 142 حيثجزموا بوفاته سنة ثلاث وأربعين، وقولهم يخالف أيضًا قولَ ابن نمير المتقدم: أنه توفي سنة اثنتينوأربعين.



6018 [4] - ما قيل هنا في سنة وفاة عمرو بن العاص يخالفه ما قاله الواقدي والهيثم بن عدي والمدائني والليث فيما رواه عنهم ابن زَبْر الربعي في "تاريخ العلماء ووفياتهم" 1/ 141 - 142 حيثجزموا بوفاته سنة ثلاث وأربعين، وقولهم يخالف أيضًا قولَ ابن نمير المتقدم: أنه توفي سنة اثنتينوأربعين.