হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (621)


621 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حَدَّثَنَا يحيى بن محمد بن يحيى.وأخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أبو المثنَّى؛ قالا: حَدَّثَنَا مسدَّد، حَدَّثَنَا يحيى، عن شُعبة، عن الحَكَم، عن عبد الحميد بن عبد الرحمن، عن مقِسَم، عن ابن عباس، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في الذي يأتي امرأتَه وهي حائض - قال: "يتصدَّقُ بدينارٍ، أو بنصفِ دينار" [1].هذا حديث صحيح، فقد احتجَّا جميعًا بمِقسَم بن نَجْدة [2]، فأما عبد الحميد بن عبد الرحمن فإنه أبو الحسن عبد الحميد بن عبد الرحمن الجَزَري [3]، ثقة مأمون.وشاهده ودليله:




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই ব্যক্তি সম্পর্কে বলেছেন, যে তার স্ত্রীর সাথে হায়েয অবস্থায় সহবাস করে— তিনি বলেন: "সে যেন এক দীনার বা অর্ধ দীনার সদকা করে।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] صحيح موقوفًا، رجاله ثقات، وقد روي مرفوعًا وموقوفًا، والموقوف أصحُّ كما هو مبيَّن في تعليقنا على "مسند أحمد" 3/ (2033) و "سنن ابن ماجه" (640). أبو المثنى: هو معاذ بن المثنى العنبري، ومسدَّد: هو ابن مسرهَد البصري، ويحيى: هو ابن سعيد القطان، والحكم: هو ابن عتيبة.وأخرجه أبو داود (264) عن مسدَّد، بهذا الإسناد. وانظر تتمة تخريجه فيه.وقال الترمذيّ (137) بعد أن أخرجه من طريق عبد الكريم - وهو ابن أبي المخارق - عن مقسم: حديث الكفارة في إتيان الحائض قد روي عن ابن عباس موقوفًا ومرفوعًا، وهو قول بعض أهل العلم، وبه يقول أحمد وإسحاق، وقال ابن المبارك: يستغفر ربَّه ولا كفارة عليه، وقد روي مثلُ قول ابن المبارك عن بعض التابعين، منهم سعيد بن جُبير وإبراهيم النَّخَعي، وهو قول عامَّة علماء الأمصار.



[2] ويقال: بُجْرة.



621 [3] - كذا قال المصنّف وكنى عبدَ الحميد هذا أبا الحسن الجزري، وقد قال الحافظ المحقِّق ابن حجر العسقلاني في "التقريب": أبو الحسن الجزري مجهول وأخطأ من سمَّاه عبد الحميد. قلنا: وعبد الحميد بن عبد الرحمن هذا: هو ابن زيد بن الخطاب القرشي العَدَوي، وهو مدني، وقيل: عداده في أهل الجزيرة، وكنيته أبو عمر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (622)


622 - ما حدَّثَناه علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حَدَّثَنَا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حَدَّثَنَا أبو ظَفَر عبد السلام بن مُطهَّر، حَدَّثَنَا جعفر بن سليمان، عن علي بن الحَكَم البُنَاني، عن أبي الحسن الجَزَري، عن مِقسَم، عن ابن عباس قال: إذا أصابها في الدم فدينارٌ، وإذا أصابها في انقطاع الدم فنصفُ دينار [1].قد أُرسِلَ هذا الحديث، وأُوقف أيضًا، ونحن على أصلنا الذي أصَّلْناه أَنَّ القول قولُ الذي يُسنِدُ ويَصِلُ إذا كان ثقةً.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যদি কেউ স্ত্রীর ঋতুস্রাব চলাকালীন সময়ে সহবাস করে, তবে (কাফফারা হিসেবে) এক দীনার দিতে হবে, আর যদি রক্ত বন্ধ হওয়ার পর (গোসল করার পূর্বে) সহবাস করে, তবে অর্ধ দীনার দিতে হবে। এই হাদীসটি মুরসাল (অনুপস্থিত রাবীযুক্ত) এবং মাওকুফ (সাহাবীর কথায় সীমাবদ্ধ) হিসেবেও বর্ণিত হয়েছে। আমরা আমাদের মূলনীতির উপর অটল যে, যখন বর্ণনাকারী নির্ভরযোগ্য হন, তখন যে ইসনাদকে যুক্ত (মারফূ’) ও পূর্ণ করেন, তার কথাই গ্রহণযোগ্য।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده ضعيف لجهالة أبي الحسن الجزري كما سبق.وأخرجه أبو داود (265) و (2169) عن عبد السلام بن مطهَّر، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (623)


623 - حدَّثني علي بن عيسى، حَدَّثَنَا مسدد بن قَطَن، عن عثمان بن أبي شَيْبة، حَدَّثَنَا جَرِير، عن الشَّيباني، عن عبد الرحمن بن الأسود، عن أبيه، عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يأمرُنا في فَوْر حَيضتِنا أن نَتَّزِرَ ثم يباشرُنا، وأيكم يملِكُ إرْبَه كما كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يملكُ إرْبَه؟ [1]هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذا اللفظ! إنما خرَّجا في هذا الباب حديثَ منصور، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يأمر إحدانا إذا كانت حائضًا أن تتَّزرَ ثم يُضاجِعُها [2].




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের ঋতুস্রাব শুরু হওয়ার পরপরই নির্দেশ দিতেন যেন আমরা ইযার (লুঙ্গি বা নিম্নাংশের পোশাক) পরিধান করি, অতঃপর তিনি আমাদের সাথে মেলামেশা করতেন। আর তোমাদের মধ্যে কে আছে যে তার কামস্পৃহাকে সেভাবে নিয়ন্ত্রণ করতে পারে, যেভাবে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কামস্পৃহাকে নিয়ন্ত্রণ করতেন?




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده صحيح. جرير: هو ابن عبد الحميد، والشيباني هو أبو إسحاق سليمان بن أبي سليمان، والأسود: هو ابن يزيد النَّخَعي.وأخرجه أبو داود (273) عن عثمان بن أبي شيبة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 40/ (24046) عن محمد بن فضيل، والبخاري (302)، ومسلم (293) (2)، وابن ماجه (635) من طريق علي بن مُسهِر، كلاهما عن أبي إسحاق الشيباني، به. فاستدراك الحاكم له على الشيخين ذهولٌ منه.قوله: "فور حيضتها" أي: أولها ومعظمها.والإرْب، بكسر الهمزة وسكون الراء: الحاجة، وقيل: العقل، وقيل: العُضْو، ويروى بفتح الهمزة والراء: وهي الحاجة.



[2] أخرجه البخاريّ برقم (300)، ومسلم (293) (1).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (624)


624 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا العباس بن محمد الدُّورِي، حَدَّثَنَا أبو عامر عبد الملك بن عمرو العَقَدي، حَدَّثَنَا زهير بن محمد، حَدَّثَنَا عبد الله بن محمد بن عَقِيل.وأخبرنا عبد الله بن الحسين القاضي، حَدَّثَنَا الحارث بن أبي أسامة، حَدَّثَنَا زكريا بن عَدِيّ، حَدَّثَنَا عُبيد الله بن عمرو الرَّقِّي، عن عبد الله بن محمد بن عَقيل، عن إبراهيم بن محمد بن طَلْحة، عن عمِّه عِمران بن طَلْحة، عن أمه حَمْنة بنت جَحْش قالت: كنت أُستحاضُ حيضةً كثيرة شديدة، فأتيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم أَستفتيهِ وأخبِرهُ، فوجدتُه في بيت أختي زينب بنت جحش، فقلت: يا رسول الله، إني امرأةٌ أُستَحاضُ حيضةً كثيرة شديدة، فما ترى فيها؟ قد مَنَعَتني الصلاةَ والصومَ، قال: "أَنعَتُ لك الكُرسُفَ، فإنه يُذهِب الدمَ" قالت: هو أكثر من ذلك، إنما أَثُجُّ ثَجًّا، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "سآمرُكِ بأمرَين، أيَّهما فعلتِ أجزأ عنكِ من الآخَر، وإن قَوِيتِ عليهما فأنتِ أعلمُ" قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنما هذه رَكْضَةٌ من رَكَضات الشيطان، فتحيَّضي ستةَ أيام، أو سبعةَ أيام في عِلْم الله عز وجل، ثم اغتسلي، حتَّى إذا رأيتِ أنك قد طَهُرتِ واستَنقَأتِ فصلِّي ثلاثًا وعشرين ليلةً أو أربعًا وعشرين ليلةً وأيامَها، وصومي، فإنَّ ذلك يجزِئُك، وكذلك فافعلي كلَّ شهر كما تحيَّضُ النساء وكما يَطهُرْن مِيقات حيضِهن وطُهرِهن، وإن قَوِيتِ على أن تؤخري الظهرَ وتعجِّلي العصرَ، فتغتسلين وتجمَعين بين الصلاتين، الظهرَ والعصرَ، وتؤخرين المغربَ وتعجِّلين العشاءَ، ثم تغتسلين وتجمعين بين الصلاتين، فافعلي وصومي إن قَدِرتِ على ذلك" قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "وهذا أعجَبُ الأمرَينِ إليَّ" [1].قد اتَّفق الشيخان على إخراج حديث المُستحاضة من حديث الزُّهْري وهشام بن عُرْوة عن عروة عن عائشة [2]: أنَّ فاطمة بنت أبي حُبَيش سألت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، وليس فيه هذه الألفاظ التي في حديث حَمْنة بنت جحش ورواية عبد الله بن محمد بن عَقِيل بن أبي طالب، وهو من أشرافِ قريش وأكثرهم روايةً، غيرَ أنهما لم يحتجَّا به.وشواهده حديثُ الشَّعْبي عن قَمِير امرأة مسروق عن عائشة، وحديثُ أبي عَقِيل يحيى بن المتوكَّل عن بُهَيَّة عن عائشة [3]، وذكرها في هذا الموضع يَطُول.




হামনাহ বিনত জাহ্শ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি ঘন ঘন ও তীব্রভাবে রক্তস্রাবে (ইস্তিহাযা) ভুগতাম। তাই আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে এ বিষয়ে ফতোয়া জানতে চাইলাম এবং তাঁকে বিষয়টি অবহিত করলাম। আমি তাঁকে আমার বোন যায়নাব বিনত জাহ্শের ঘরে পেলাম। আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমি এমন একজন মহিলা, যার ঘন ঘন ও তীব্র রক্তস্রাব হয়। আপনি এ বিষয়ে কী মনে করেন? এটি আমাকে সালাত ও সাওম (রোম) থেকে বিরত রাখছে।

তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আমি তোমাকে তুলো ব্যবহার করার পরামর্শ দিচ্ছি, কারণ এটি রক্ত বন্ধ করে দেবে। তিনি বললেন: রক্ত এর চেয়েও বেশি আসে; বরং তা ঝর্ণার মতো প্রবাহিত হয়। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আমি তোমাকে দুটি কাজের নির্দেশ দেব। তুমি এর মধ্যে যে কোনো একটি করলে অপরটি থেকে যথেষ্ট হবে। আর যদি তুমি উভয়টি করার শক্তি রাখো, তবে তুমিই ভালো জানো।

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: এটি শয়তানের প্রহারের মধ্যে একটি প্রহার মাত্র। অতএব, তুমি মহান আল্লাহ্‌র জ্ঞানে ছয় দিন বা সাত দিন ঋতুবর্তী (হায়েয) থাকো। অতঃপর গোসল করো। যখন তুমি দেখবে যে তুমি পবিত্র হয়ে গেছ এবং পরিষ্কার পরিচ্ছন্ন হয়েছ, তখন তুমি তেইশ রাত বা চব্বিশ রাত এবং এর দিনগুলোতে সালাত আদায় করো এবং সাওম রাখো। নিশ্চয়ই এটা তোমার জন্য যথেষ্ট হবে। আর প্রত্যেক মাসে তুমি ঠিক সেভাবে করো, যেভাবে অন্য মহিলারা ঋতুবর্তী হয় এবং তাদের ঋতুকাল ও পবিত্রতার সময় অনুযায়ী পবিত্র হয়।

আর যদি তুমি যোহরের সালাত বিলম্বে আদায় করতে এবং আসরের সালাত তাড়াতাড়ি আদায় করতে সক্ষম হও—অতঃপর গোসল করে দুই সালাত (যোহর ও আসর) একত্র করে নাও, এবং মাগরিবের সালাত বিলম্বে আদায় করতে ও ইশার সালাত তাড়াতাড়ি আদায় করতে সক্ষম হও—অতঃপর গোসল করে দুই সালাত (মাগরিব ও ইশা) একত্র করে নাও, তাহলে তুমি তা করো এবং তুমি সাওম পালন করো, যদি তুমি তা করতে সক্ষম হও। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: এই দুটি কাজের মধ্যে এটিই আমার কাছে বেশি প্রিয়।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده ضعيف، تفرَّد به عبد الله بن محمد بن عقيل، وهو ضعيف يعتبر به في المتابعات والشواهد، ولم يتابع عليه، ومثله لا يُقبل تفرُّده.وأخرجه أحمد 45/ (27474)، وأبو داود (287)، والترمذيّ (128) من طريق أبي عامر العقدي، بهذا الإسناد. وقال الترمذيّ: حديث حسن صحيح!وأخرجه أحمد (27144)، وابن ماجه (622) و (627) من طريقين عن عبد الله بن عقيل، به.والكُرسف: القُطن، والثَّجُ: السَّيَلان.وقوله: "ركضة من ركضات الشيطان" قال ابن الأثير في "النهاية": أصل الركض: الضرب بالرِّجل والإصابة بها، أراد الإضرار بها والأذى، والمعنى: أنَّ الشيطان قد وجد بذلك طريقًا إلى التلبيس عليها في أمر دينها وطُهرها وصلاتها حتَّى أنساها ذلك عادتها، وصار في التَّقديرُ كأنه ركضة من ركضاته.



[2] قوله: "عن عروة" سقط من المطبوع. وهو من هذا الطريق عند البخاريّ (228) و (306) و (320) و (331)، ومسلم (333).



624 [3] - انظر حديث قمير عن عائشة والتعليق عليه عند أبي داود برقم (300)، وكذا حديث بُهيَّة عنده برقم (284). وحديث الليث عند أحمد 41 / (24523)، ومسلم (334) (63)، وأبي داود (290)، والنسائي (205) عن عروة وحده.وأخرجه أحمد 42/ (25095)، والبخاري (327) من طريق ابن أبي ذئب، عن الزُّهْري، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (625)


625 - وقد حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا الرَّبيع بن سليمان، حَدَّثَنَا عبد الله بن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن ابن شِهاب، عن عُرْوة بن الزُّبير وعَمْرة، عن عائشة: أنَّ أمّ حَبِيبة بنت جَحْش كانت تحت عبد الرحمن بن عَوْف، وأنها استُحِيضت سبعَ سنين، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ هذا ليس بالحَيْضة، ولكنها عِرقٌ، فاغتسلي" [1].




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উম্মু হাবীবা বিনত জাহশ আবদুর রহমান ইবনে আউফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী ছিলেন। তিনি সাত বছর যাবত ইস্তিহাযায় (দীর্ঘ রক্তস্রাবে) আক্রান্ত ছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "নিশ্চয়ই এটা হায়েযের রক্ত নয়, বরং এটি একটি রগের রক্তক্ষরণ। অতএব, তুমি গোসল করে নাও।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده صحيح.وأخرجه مسلم (334) (64)، وأبو داود (285) و (288)، والنسائي (211)، وابن حبان (1352) من طرق عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد. وانظر ما بعده. وحديث الليث عند أحمد 41 / (24523)، ومسلم (334) (63)، وأبي داود (290)، والنسائي (205) عن عروة وحده.وأخرجه أحمد 42/ (25095)، والبخاري (327) من طريق ابن أبي ذئب، عن الزُّهْري، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (626)


626 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حَدَّثَنَا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدَّثني أبي، حَدَّثَنَا أبو المغيرة، عن الأوزاعيِّ، عن الزُّهْري، عن عُرْوة وعَمْرة، عن عائشة قالت: استُحيضت أمّ حَبِيبة وهي تحت عبد الرحمن بن عوف سبعَ سنين، فأمرها النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال: "إذا أقبَلَت الحيضةُ فدَعِي الصلاةَ، فإذا أدبَرَت فاغتسلي وصلِّي" [1]. حديث عمرو بن الحارث والأوزاعي صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، إنما خرَّج مسلم حديث سفيان بن عُيينة وإبراهيم بن سعد عن الزُّهْري بغير هذا اللفظ [2].وقد تابع محمدُ بنُ عمرو بن علقمة الأوزاعيَّ على روايته هذه عن الزُّهْري على هذه الألفاظ، وهو صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه:




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাত বছর যাবৎ ইস্তিহাদার (দীর্ঘস্থায়ী রক্তস্রাব) শিকার হন, যখন তিনি আব্দুর রহমান ইবনে আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিবাহে ছিলেন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে নির্দেশ দিলেন এবং বললেন: "যখন হায়িয (মাসিক) শুরু হবে, তখন সালাত (নামাজ) ছেড়ে দাও। আর যখন তা শেষ হয়ে যাবে, তখন গোসল করে নাও এবং সালাত আদায় করো।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده صحيح. أبو المغيرة: هو عبد القدوس بن الحجاج.وهو في "مسند أحمد" 41/ (24538) بأطول مما هنا، لكن وقع فيه: عروة عن عمرة! وانظر تتمة تخريجه فيه.وأخرجه ابن ماجه (626) عن محمد بن يحيى، عن أبي المغيرة، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائيّ (209) و (210)، وابن حبان (1353) من طرق عن الأوزاعي، به وقُرن بالأوزاعي عند النسائيِّ النعمانُ بن المنذر وحفص بن غيلان، وعند ابن حبانَ الليثُ بن سعد، وحديث الليث عند أحمد 41 / (24523)، ومسلم (334) (63)، وأبي داود (290)، والنسائي (205) عن عروة وحده.وأخرجه أحمد 42/ (25095)، والبخاري (327) من طريق ابن أبي ذئب، عن الزُّهْري، به.



[2] بل أخرجه مسلم أيضًا من طريق عمرو بن الحارث بإسناده ومتنه كما سبق.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (627)


627 - أخبرَناه أبو الفضل محمد بن إبراهيم المزكِّي، حَدَّثَنَا الحسين بن محمد بن زياد، حَدَّثَنَا محمد بن المثنَّى، حَدَّثَنَا ابن أبي عَدِي، حَدَّثَنَا محمد بن عمرو، حدَّثني ابن شِهاب، عن عُروة بن الزُّبير، عن فاطمة بنت أبي حُبيش: أنها كانت تُستَحاض، فقال لها النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: "إذا كان دَمُ الحَيْضة فإنه دمٌ أسودُ يُعرَف، فإذا كان ذلك فأَمسِكي عن الصلاة، وإذا كان الآخرُ فتوضَّئي وصلِّي، فإنما هو عِرقٌ" [1].




ফাতেমা বিনতে আবি হুবাইশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ইস্তিহাদা (অতিরিক্ত রক্তস্রাব) রোগে ভুগছিলেন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: যখন হায়িযের রক্ত হবে, তখন তা কালো রক্ত যা চেনা যায়। যখন তা হবে, তখন তুমি সালাত থেকে বিরত থাকবে। আর যখন অন্য প্রকার (রক্ত) হবে, তখন তুমি ওযু করবে এবং সালাত আদায় করবে। কেননা তা শিরা থেকে নির্গত (রক্ত) মাত্র।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده حسن من أجل محمد بن عمرو: وهو ابن علقمة الليثي. والمحفوظ أنه من حديث عروة عن خالته عائشة: أن فاطمة … هكذا في "الصحيحين" وغيرهما كما تقدم قريبًا بإثر (624).وأخرجه أبو داود (286) و (304)، والنسائي (215) عن محمد بن المثنى، بهذا الإسناد. وانظر ما سيأتي برقم (7062).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (628)


628 - وأخبرنا أبو سهل بن زياد القطّان ببغداد، حَدَّثَنَا يحيى بن جعفر، حَدَّثَنَا على [1] بن عاصم، حَدَّثَنَا سُهيل بن أبي صالح.وحدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حَدَّثَنَا محمد بن بِشْر بن مَطَر، حَدَّثَنَا وهب بن بَقيَّة، حَدَّثَنَا خالد بن عبد الله، عن سهيل بن أبي صالح، عن الزُّهْري، عن عُروة بن الزُّبير، عن أسماء بنت عُمَيس قالت: قلت لرسول الله صلى الله عليه وسلم: إِنَّ فاطمة بنت أبي حُبَيش استُحِيضت منذُ كذا وكذا فلم تصلِّ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "سبحانَ الله، هذا من الشيطان، لتَجلِسْ في مِركَنٍ، فإذا رأت الصُّفَارةَ فوق الماء فلتغتَسِلْ للظُّهر والعصر غُسلًا واحدًا، وتغتسلْ للمغرب والعشاء غُسلًا واحدًا، وتغتسلْ للفجر، وتتوضَّأْ فيما بين ذلك" [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه بهذه الألفاظ.




আসমা বিনত উমাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললাম: ফাতিমা বিনত আবী হুবাইশ এত এত দিন যাবত ইস্তিহাদার (রোগজনিত রক্তক্ষরণ) শিকার হচ্ছেন এবং সালাত আদায় করছেন না। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সুবহানাল্লাহ! এটা শয়তানের প্ররোচনা। সে যেন একটি পাত্রে (বা গোসলের স্থানে) বসে। যখন সে পানির উপরে হলদে ভাব দেখতে পায়, তখন সে যেন যুহর ও আসরের জন্য একবার গোসল করে, মাগরিব ও ইশার জন্য একবার গোসল করে এবং ফজরের জন্য (একবার) গোসল করে। আর এর মাঝে (অন্যান্য সালাতের জন্য) সে যেন ওযু করে নেয়।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: عديّ.



[2] إسناده لا بأس برجاله، وعلي بن عاصم - وإن كان فيه ضعف - متابع.وأخرجه أبو داود (296) عن وهب بن بقية، بهذا الإسناد. وانظر ما سيأتي برقم (7062).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (629)


629 - أخبرنا الحسن بن يعقوب العَدْل، حَدَّثَنَا يحيى بن أبي طالب، حَدَّثَنَا عبد الوهاب بن عطاء، حَدَّثَنَا هشام بن حسَّان.وأخبرنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا أبو المثنَّى، حَدَّثَنَا مُسدَّد، حَدَّثَنَا إسماعيل بن عُلَيَّة، عن أيوب؛ جميعًا عن محمد بن سِيرِين، عن أمُّ عطيَّة قالت: كنا لا نَعُدُّ الكُدْرةَ والصُّفْرَة شيئًا [1].




উম্মু আতিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা কুদরাহ (বাদামি বা ময়লাটে রঙ) এবং সুফরাহ (হলুদ রঙ)-কে কোনো কিছু হিসেবে গণ্য করতাম না।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده صحيح.وأخرجه البخاريّ (326)، وأبو داود (308)، والنسائي في "المجتبى" (368) من طرق عن إسماعيل ابن علية، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه ابن ماجه (647) من طريق معمر، عن أيوب، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (630)


630 - أخبرنا محمد بن محمد بن الحسن، حَدَّثَنَا علي بن عبد العزيز، حَدَّثَنَا حجَّاج بن مِنْهال، حَدَّثَنَا حمّاد بن سَلَمة، عن قَتَادة، عن أمّ الهُذَيل، عن أمّ عطيَّة - وكانت بايعت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قالت: كنا لا نَعُدُّ الكُدْرةَ والصُّفْرةَ بعد الطُّهْر شيئًا [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وأم الهُذَيل: هي حَفْصة بنت سِيرين، فإنَّ اسم ابنها الهُذَيل واسم زوجها عبد الرحمن، وقد أَسنَدَ الهذيلُ بن عبد الرحمن عن أمِّه.




উম্মে আতিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বাইয়াত গ্রহণ করেছিলেন। তিনি বলেন: আমরা পবিত্র হওয়ার পর বাদামী বা হলুদ স্রাবকে কোনো কিছুই মনে করতাম না।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده صحيح.وأخرجه أبو داود (307) عن موسى بن إسماعيل، عن حماد، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن ماجه (647 م) من طريق وهيب بن خالد، عن أيوب، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (631)


631 - أخبرنا الحسن بن حَلِيم المروَزي، أخبرنا أبو الموجِّه، أخبرنا عَبْدان، أخبرنا عبد الله بن المبارَك، عن يونس بن نافع، عن كَثِير بن زياد أبي سَهْل قال: حدثتني مُسَّةُ الأزديَّة قالت: حَجَجْتُ فدخلتُ على أمّ سلمة فقلت: يا أمّ المؤمنين، إنَّ سَمُرةَ بن جُندب يأمر النساءَ يَقضِينَ صلاةَ المَحِيض، فقالت: لا يَقضِينَ، كانت المرأة من نساء النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم تَقعُدُ في النِّفَاس أربعين ليلةً لا يأمُرها النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بقضاء صلاة النِّفاس [1].هذا حديث صحيح الإسناد ولم يُخرجاه، ولا أعرفُ في معناه غيرَ هذا.وشاهده:




উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুসসা আল-আযদিয়্যা বলেন: আমি হজ্জ করে উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম এবং বললাম, হে উম্মুল মুমিনীন! নিশ্চয়ই সামুরা ইবনু জুনদুব নারীদেরকে ঋতুস্রাবের (হায়িযের) সময়কার নামায কাযা করার আদেশ দেন। তিনি বললেন, তারা কাযা করবে না। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীদের মধ্যে কোনো নারী নিফাস অবস্থায় (সন্তান প্রসবের পর রক্তস্রাব) চল্লিশ রাত পর্যন্ত অবস্থান করতেন। অথচ নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে নিফাসের নামায কাযা করার আদেশ দিতেন না।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده محتمل للتحسين إن شاء الله من أجل مسَّة الأزدية. أبو الموجِّه: هو محمد بن عمرو الفزاري، وعبدان: هو عبد الله بن عثمان المروزي.وأخرجه أبو داود (312) من طريق محمد بن حاتم، عن ابن المبارك، بهذا الإسناد.وقوله فيه: "من نساء النَّبِيّ" الظاهر أنه وهمٌ من يونس بن نافع راويه عن أبي سهل، فقد نصُّوا على أنه يخطئ، وقد وصف ابن القطان في "الوهم والإيهام" 3/ 329 هذا المتن بأنه منكر وقال: إنَّ أزواج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ما منهن من كانت نُفَساء أيام كونها معه إلّا خديجة وزوجيَّتها كانت قبل الهجرة، فإذًا لا معنى لقولها: "قد كانت المرأة من نساء النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم تقعد في النفاس أربعين يومًا" إلّا أن تريد بنسائه غيرَ أزواجه من بنات وقريبات وسُرِّيَّته مارية. وأخرجه أحمد 44/ (26561) عن أبي النضر هاشم بن القاسم، عن زهير بن معاوية، به.وأخرجه ابن ماجه (648)، والترمذيّ (139) من طريق شجاع بن الوليد، عن ابن عبد الأعلى، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (632)


632 - ما حدَّثَناه أبو جعفر محمد بن صالح بن هانئ، حَدَّثَنَا يحيى بن محمد بن يحيى، حَدَّثَنَا أحمد بن يونس، حَدَّثَنَا زُهير، حَدَّثَنَا علي بن عبد الأعلى، عن أبي سَهْل، عن مُسَّة، عن أمّ سلمة قالت: كانت النُّفَساءُ على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم تَقعُدُ بعد نِفاسِها أربعين يومًا أو أربعين ليلةً، وكنا نَطْلي على وجوهنا الوَرْسَ؛ يعني من الكَلَف [1].




উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে সন্তান জন্মদানকারিণী মহিলা (নেফাস) তার নেফাসের পর চল্লিশ দিন বা চল্লিশ রাত অপেক্ষা করত। আর আমরা আমাদের চেহারায় আল-ওয়ারস ব্যবহার করতাম; অর্থাৎ মেছতা দূর করার জন্য।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده محتمل للتحسين كسابقه. زهير: هو ابن معاوية.وأخرجه أبو داود (311) عن أحمد بن يونس، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد 44/ (26561) عن أبي النضر هاشم بن القاسم، عن زهير بن معاوية، به.وأخرجه ابن ماجه (648)، والترمذيّ (139) من طريق شجاع بن الوليد، عن ابن عبد الأعلى، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (633)


633 - أخبرنا أبو الحسين محمد بن أحمد بن تميم القَنطَري ببغداد، حَدَّثَنَا أبو قِلابة الرَّقَاشي، حَدَّثَنَا أبو عاصم النَّبيل، حَدَّثَنَا عثمان بن سعد القرشي، حَدَّثَنَا ابن أبي مُلَيكة قال: جاءت خالتي فاطمةُ بنت أبي حُبَيش إلى عائشة فقالت: إني أخاف أن أقعَ في النار، إني أدَعُ الصلاةَ السنةَ والسنتين، لا أُصلي، فقالت: انتظري حتَّى يجيءَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم، فجاء فقالت عائشة: هذه فاطمةُ تقول كذا وكذا، فقال لها النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: "قولي لها فلتَدعِ الصلاةَ في كل شهر أيامَ قُرونها ثم لتَعْتَسِلْ في كل يوم غُسلًا واحدًا، ثم الطُّهورُ عند كل صلاة، ولتنظِّفْ ولتَحْتشِ، فإنما هو داءٌ عَرَضَ، أو رَكْضَةٌ من الشيطان، أو عِرقُ انقَطَع" [1].هذا حديث صحيح، ولم يُخرجاه بهذا اللفظ [2]، وعثمان بن سعد الكاتب بصري ثقةٌ عزيزٌ الحديث يُجمَع حديثه.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার খালা ফাতিমাহ বিনত আবি হুবাইশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট এসে বললেন, 'আমি ভয় করি যে আমি জাহান্নামে পতিত হব, কারণ আমি এক বা দুই বছর সালাত ছেড়ে দেই, আমি সালাত আদায় করি না।' আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসা পর্যন্ত অপেক্ষা করো।' যখন তিনি আসলেন, তখন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'এই হলো ফাতিমাহ, সে এমন এমন কথা বলছে।' তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে (ফাতিমাকে) বললেন: "তাকে বলো, সে যেন প্রতি মাসে তার নির্দিষ্ট দিনগুলোতে সালাত ছেড়ে দেয়। তারপর সে যেন প্রতিদিন একবার গোসল করে। এরপর প্রত্যেক সালাতের জন্য যেন পবিত্রতা (ওযু) অর্জন করে। এবং সে যেন নিজেকে পরিষ্কার করে ও (রক্ত বন্ধ করার জন্য) নেকড়া ব্যবহার করে। কারণ এটি একটি রোগ যা প্রকাশ পেয়েছে, অথবা শয়তানের একটি আঘাত, অথবা একটি কেটে যাওয়া শিরা।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده ضعيف، عثمان بن سعد الراجحُ من أقوال أهل الجرح والتعديل أنه ضعيف، وقد كان يحيى القطان يتكلّم فيه من قبل حفظه. وابن أبي مليكة - وهو عبد الله - إنما سمعه من خالته فاطمة بنت أبي حبيش كما وقع في رواية إسرائيل عن عثمان بن سعد عند أحمد 45/ (27631).وسيتكرر مختصرًا برقم (7083)، وفيه هناك: عثمان بن الأسود، بدلٌ: بن سعد، وهو غلط. وأبو بكر بن أبي دارم متكلَّم فيه لكنه توبع.وأخرجه البيهقي في "الخلافيات" (1055) عن الحاكم محمد بن عبد الله، بهذا الإسناد. وقال البيهقي: أبو بلال الأشعري لا يحتج به.وأخرجه الدارقطني (856) من طريق أبي شيبة، عن أبي بلال الأشعري، به.وأصحُّ ما جاء عن عثمان بن أبي العاص في ذلك ما رواه عبد الرزاق (1201) والدارمي (990) وابن الجارود في "المنتقى" (118) من طريق سفيان الثوري، عن يونس بن عبيد، عن الحسن البصري، عن عثمان بن أبي العاص: أنه كان لا يقرب النفساء أربعين يومًا. ورجاله ثقات.



[2] انظر حديث عروة عن عائشة في قصة فاطمة بنت أبي حبيش عند البخاريّ (228)، ومسلم (333)، ولتمام تخريجه انظر "مسند أحمد" 42/ (25622). وأبو بكر بن أبي دارم متكلَّم فيه لكنه توبع.وأخرجه البيهقي في "الخلافيات" (1055) عن الحاكم محمد بن عبد الله، بهذا الإسناد. وقال البيهقي: أبو بلال الأشعري لا يحتج به.وأخرجه الدارقطني (856) من طريق أبي شيبة، عن أبي بلال الأشعري، به.وأصحُّ ما جاء عن عثمان بن أبي العاص في ذلك ما رواه عبد الرزاق (1201) والدارمي (990) وابن الجارود في "المنتقى" (118) من طريق سفيان الثوري، عن يونس بن عبيد، عن الحسن البصري، عن عثمان بن أبي العاص: أنه كان لا يقرب النفساء أربعين يومًا. ورجاله ثقات.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (634)


634 - أخبرنا أبو بكر بن أبي دارم الحافظ، حَدَّثَنَا أحمد بن موسى التَّميمي، حَدَّثَنَا أبو بلال الأشعري، حَدَّثَنَا أبو شِهَاب، عن هشام بن حسَّان، عن الحسن، عن عثمان بن أبي العاص قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: وَقتَ للنساء في نفاسِهِنَّ أربعين يومًا [1]. هذه سُنَّة عزيزة، فإن سَلِمَ هذا الإسنادُ من أبي بلال، فإنه مُرسَل صحيح، فإِنَّ الحسن لم يسمع من عثمان بن أبي العاص.وله شاهد بإسنادٍ مثله:




উসমান ইবন আবিল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: তিনি মহিলাদের জন্য তাদের নিফাস (প্রসবোত্তর রক্তস্রাব)-এর সময়সীমা চল্লিশ দিন নির্ধারণ করেছেন [১]। এটি একটি দুর্লভ সুন্নাহ। যদি আবু বিলাল থেকে এই সনদটি নিরাপদ থাকে, তবে এটি মুরসাল সহীহ। কারণ আল-হাসান (বসরি) উসমান ইবন আবিল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর থেকে সরাসরি শোনেননি। এবং এর অনুরূপ সনদে একটি সমর্থনকারী বর্ণনাও রয়েছে:




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده ضعيف، أبو بلال الأشعري ضعَّفه الدارقطني، والمشهور عن الحسن عن عثمان بن أبي العاص موقوفًا عليه كما سيأتي، وكذا قال الحافظ ابن حجر في "التلخيص الحبير" 1/ 171، وأبو بكر بن أبي دارم متكلَّم فيه لكنه توبع.وأخرجه البيهقي في "الخلافيات" (1055) عن الحاكم محمد بن عبد الله، بهذا الإسناد. وقال البيهقي: أبو بلال الأشعري لا يحتج به.وأخرجه الدارقطني (856) من طريق أبي شيبة، عن أبي بلال الأشعري، به.وأصحُّ ما جاء عن عثمان بن أبي العاص في ذلك ما رواه عبد الرزاق (1201) والدارمي (990) وابن الجارود في "المنتقى" (118) من طريق سفيان الثوري، عن يونس بن عبيد، عن الحسن البصري، عن عثمان بن أبي العاص: أنه كان لا يقرب النفساء أربعين يومًا. ورجاله ثقات.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (635)


635 - أخبرَناه أبو بكر محمد بن عبد الله الحَفيد [1]، حَدَّثَنَا موسى بن زكريا التُّستَري: وحدثنا عمرو بن الحُصَين، حَدَّثَنَا محمد بن عبد الله بن عُلَاثة، عن عَبْدة بن أبي لُبَابة، عن عبد الله بن باباهُ، عن عبد الله بن عمرو قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "تَنتَظِرُ النُّفَساءُ أربعين ليلةً، فإن رأَتِ الطُّهرَ قبلَ ذلك فهي طاهرٌ، وإن جاوزَتِ الأربعينَ فهي بمنزلة المُستَحاضَةِ تغتسلُ وتصلِّي، فإنْ غَلَبَها الدمُ توضّأت لكلِّ صلاة" [2].عمرو بن الحصين ومحمد بن عُلَاثة ليسا من شرط الشيخين، وإنما ذكرتُ هذا الحديث شاهدًا متعجبًا.




আব্দুল্লাহ ইবন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: প্রসূতি (নিফাসগ্রস্তা) নারী চল্লিশ রাত অপেক্ষা করবে। যদি সে এর পূর্বে পবিত্রতা দেখতে পায়, তবে সে পবিত্র। আর যদি সে চল্লিশ দিন অতিক্রম করে, তবে সে ইসতিহাযাগ্রস্তা (রোগজনিত রক্তক্ষরণ) নারীর মর্যাদায় গণ্য হবে। সে গোসল করবে এবং সালাত আদায় করবে। আর যদি রক্তপাত তাকে কাবু করে ফেলে, তবে সে প্রত্যেক সালাতের জন্য উযু করবে।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] تحرّف في (ب) إلى: الجنيد.



[2] إسناده ضعيف جدًّا، عمرو بن الحصين وابن عُلاثة قال الدارقطني: ضعيفان متروكان.وأخرجه الدارقطني في "سننه" (858)، والطبراني في "الأوسط" (8311) من طريق موسى بن زكريا، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (636)


636 - أخبرنا أبو سهل أحمد بن محمد بن زياد النَّحْوي ببغداد، حَدَّثَنَا أبو إسماعيل محمد بن إسماعيل السُّلَمي، حَدَّثَنَا عبد السلام بن محمد الحمصي ولقبُه سُلَيم، حَدَّثَنَا بقيَّة بن الوليد، أخبرني الأسود بن ثعلبة، عن عُبَادة بن نُسَيّ، عن عبد الرحمن بن عثمان، عن معاذ بن جبل، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال: "إذا مضى للنُّفَساء سبعٌ ثم رأَت الطُّهرَ، فلتغتَسِل ولتُصلِّ" [1].وقد استَشهَد مسلمٌ ببقيَّة بن الوليد، وأما الأسود بن ثعلبة فإنه شامي معروف، والحديث غريب في الباب.




মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিফাসগ্রস্ত নারীর জন্য যখন সাত দিন অতিবাহিত হয় এবং সে পবিত্রতা দেখতে পায়, তখন সে যেন গোসল করে এবং সালাত আদায় করে।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده ضعيف لجهالة الأسود بن ثعلبة، وبقية بن الوليد ليس بذاك القوي، ثم إنَّ بين بقية ابن الوليد والأسود بن ثعلبة في هذا الإسناد راويًا اسمه علي بن علي، فإنَّ البيهقي لما أخرج هذا الحديث في "سننه" 1/ 342 عن المصنّف بهذا الإسناد، قال: هكذا أخبرَناه أبو عبد الله - يعني الحاكم - عن أبي إسماعيل، ثم ساقه من طريق علي بن عمر الحافظ - وهو - وهو الدارقطني - عن أبي سهل بن زياد بإسناده عن بقية بن الوليد قال: حَدَّثَنَا علي بن علي عن الأسود، وفي آخره: قال سُليم: فلقيت علي بن علي فحدثني عن الأسود عن عبادة بن نسي عن عبد الرحمن بن غنم عن معاذ بن جبل عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم. ثم قال: هذا أصح، وإسناده ليس بالقوي. قلنا: وهو - كما ساقه البيهقي - في "سنن الدارقطني" (861).وأخرجه تمام في "فوائده" (908) من طريق عمران بن بكار الحمصي، عن عبد السلام بن محمد الحمصي، بهذا الإسناد مثل رواية الدار قطني. وعلي بن علي لم نتبيَّنه. وأخرجه أبو داود (332) عن مسدَّد، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود أيضًا (332)، وابن حبان (1311) من طريقين عن خالد الطحان، به.وأخرج قوله: "الصعيد الطيب … إلخ" أحمد 35/ (21568)، والترمذيّ (124) من طريق سفيان الثوري، عن خالد الحذاء، به. وقال الترمذيّ: حديث حسن صحيح.وأخرجه أيضًا النسائيّ (307) من طريق سفيان الثوري، عن أيوب، عن أبي قلابة، به. ورواية أيوب مطوَّلة عند أحمد 35/ (21304)، وأبي داود (333)، إلّا أنَّ فيها عندهما: عن أبي قلابة عن رجل من بني عامر، ولم يسمِّه.وأخرجه مطولًا أيضًا ابن حبان (1312) من طريق يزيد بن زريع، عن خالد الحذاء، به. وانظر تتمة تخريجه في هذه المصادر.ويشهد له حديث أبي هريرة عند البزار (10068) والطبراني في "الأوسط" (1333)، وسنده قوي وصحَّحه ابن القطان في "الوهم والإيهام" 5/ 266.والرَّبَذة: بلدة تقع على مسافة 200 كم تقريبًا شرقي المدينة المنورة، وهي الآن خَرِبة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (637)


637 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن إسحاق الفقيه، أخبرنا أبو المثنَّى، حَدَّثَنَا مُسدَّد، حَدَّثَنَا خالد، عن خالد الحذَّاء، عن أبي قِلَابة، عن عمرو بن بُجْدان، عن أبي ذر قال: اجْتَمَعَت غُنَيمةٌ عند رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: يا أبا ذرٍّ، ابْدُ فيها"، فبَدَوت إلى الرَّبَذة، فكانت تصيبني الجنابةُ، فأمكُثُ الخمسةَ والستةَ، فأتيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: "أبو ذرٍّ! " فسكتُّ فقال: "تَكِلتك أمُّك أبا ذر، لأُمِّك الويلُ" فدعا بجارية فجاءت بعُسٍّ من ماء فستَرَتْني بثوبٍ، واستترتُ بالراحلة فاغتسلتُ، فكأني ألقيتُ عني جبلًا، فقال: "الصَّعيدُ الطَّيِّبُ وَضُوءُ المسلم ولو إلى عشر سنين، فإذا وجدتَ الماء فأَمِسَّه جِلدَك، فإنَّ ذلك خيرٌ" [1]. هذا حديث صحيح، ولم يُخرجاه، إذ لم نَجِدْ لعمرو بن بُجْدان راويًا غيرَ أبي قِلابة الجَرْمي، وهذا ممّا شَرَطتُ فيه، وبيَّنتُ [2] أنهما قد خرَّجا مثلَ هذا في مواضع من الكتابين.




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট কিছু ছাগলের পাল একত্রিত হয়েছিল। তিনি বললেন, "হে আবু যর, এগুলো নিয়ে যাও এবং তা (চারণভূমিতে) রক্ষণাবেক্ষণ কর।" অতঃপর আমি রাবাযা নামক স্থানে চলে গেলাম। সেখানে আমার জানাবাত (গোসলের প্রয়োজনীয়তা) হতো, ফলে আমি পাঁচ-ছয় দিন অতিবাহিত করতাম (গোসল না করে)। এরপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম। তিনি বললেন, "আবু যর!" আমি নীরব রইলাম। তখন তিনি বললেন, "তোমার মা তোমাকে হারাক, হে আবু যর! তোমার মায়ের জন্য দুর্ভোগ!" অতঃপর তিনি একজন দাসীকে ডাকলেন। সে এক বড় পাত্রে করে পানি নিয়ে আসল। তিনি আমাকে একটি কাপড় দিয়ে আবৃত করলেন এবং আমি আমার সওয়ারি বস্তুর আড়ালে নিজেকে আড়াল করে গোসল করলাম। (গোসল করার পর) আমার মনে হলো যেন আমি আমার উপর থেকে একটি পাহাড় ছুঁড়ে ফেলে দিলাম। অতঃপর তিনি বললেন, "পবিত্র মাটি মুসলিমের জন্য পবিত্রকারী, যদিও সে দশ বছর পর্যন্ত (পানি না পায়)। তবে যখনই তুমি পানি পাবে, তা তোমার চামড়ার উপর দিয়ে স্পর্শ করাবে (গোসল করবে)। কেননা এটাই উত্তম।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن إن شاء الله من أجل عمرو بن بُجْدان. أبو المثنى: هو معاذ بن المثنى العنبري، وخالد: هو ابن عبد الله الطحان الواسطي، وخالد الحذّاء: هو ابن مِهران، وأبو قلابة: هو عبد الله بن زيد الجَرْمي. وأخرجه أبو داود (332) عن مسدَّد، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود أيضًا (332)، وابن حبان (1311) من طريقين عن خالد الطحان، به.وأخرج قوله: "الصعيد الطيب … إلخ" أحمد 35/ (21568)، والترمذيّ (124) من طريق سفيان الثوري، عن خالد الحذاء، به. وقال الترمذيّ: حديث حسن صحيح.وأخرجه أيضًا النسائيّ (307) من طريق سفيان الثوري، عن أيوب، عن أبي قلابة، به. ورواية أيوب مطوَّلة عند أحمد 35/ (21304)، وأبي داود (333)، إلّا أنَّ فيها عندهما: عن أبي قلابة عن رجل من بني عامر، ولم يسمِّه.وأخرجه مطولًا أيضًا ابن حبان (1312) من طريق يزيد بن زريع، عن خالد الحذاء، به. وانظر تتمة تخريجه في هذه المصادر.ويشهد له حديث أبي هريرة عند البزار (10068) والطبراني في "الأوسط" (1333)، وسنده قوي وصحَّحه ابن القطان في "الوهم والإيهام" 5/ 266.والرَّبَذة: بلدة تقع على مسافة 200 كم تقريبًا شرقي المدينة المنورة، وهي الآن خَرِبة.



[2] في (ب): وثبت، وانظر كلامه بإثر الحديث (97).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (638)


638 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم أخبرنا ابن وهب، حدَّثني عمرو بن الحارث ورجلٌ آخر، عن يزيد بن أبي حبيب، عن عِمران بن أبي أنس، عن عبد الرحمن بن جُبَير، عن أبي قيس مولى عمرو بن العاص: أنَّ عمرو بن العاص كان على سَرِيَّة، وأنهم أصابهم بردٌ شديد لم يُرَ مثلُه، فخرج لصلاة الصبح فقال: والله لقد احتلمتُ البارحةَ، ولكني والله ما رأيتُ بردًا مثلَ هذا، هل مرَّ على وجوهكم مثلُه؟ قالوا: لا، فغسل مَغابِنَه وتوضَّأَ وضوءَه للصلاة ثم صلى بهم، فلما قَدِمَ على رسول الله صلى الله عليه وسلم، سألَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "كيف وجدتُم عَمْرًا وصحابتَه؟ " فأثَنْوا عليه خيرًا وقالوا: يا رسول الله، صلَّى بنا وهو جُنُبٌ، فأرسل رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى عمرو فسأله، فأخبره بذلك وبالذي لَقِيَ من البرد، فقال: يا رسول الله، إنَّ الله قال: {وَلَا تَقْتُلُوا أَنفُسَكُمْ} [النساء: 29] ولو اغتسلتُ مُتُّ، فضَحِكَ رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى عمرو [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، والذي عندي أنهما عَلَّلاه بحديث جرير بن حازم عن يحيى بن أيوب عن يزيد بن أبي حبيب الذي:




আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে (একবার) তিনি একটি সামরিক দলের (সারিয়া) নেতৃত্ব দিচ্ছিলেন। তারা এমন প্রচণ্ড শীতের সম্মুখীন হলো, যা আগে কখনো দেখা যায়নি। ফজরের সালাতের জন্য বেরিয়ে তিনি বললেন: আল্লাহর শপথ! আমি গত রাতে স্বপ্নদোষে আক্রান্ত হয়েছি। কিন্তু আল্লাহর কসম, আমি এমন শীত আর কখনো দেখিনি। এমন শীত কি তোমাদের মুখে পড়েছে (তোমরা কি এমন শীত আগে দেখেছ)? তারা বলল: না। তখন তিনি তাঁর শরীরের ভাঁজগুলো (যেমন বগল ও কুঁচকি) ধুলেন এবং সালাতের জন্য ওযু করলেন, এরপর তিনি তাদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন।

এরপর যখন তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: "তোমরা আমর ও তার সঙ্গীদের কেমন পেলে?" তারা তাঁর প্রশংসা করল এবং বলল: হে আল্লাহর রাসূল, তিনি জানাবাত (গোসল ফরজ) অবস্থায় আমাদের সালাত পড়িয়েছেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লোক পাঠালেন এবং তাকে জিজ্ঞেস করলেন। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ঘটনাটি এবং তীব্র শীতের কষ্টের কথা জানালেন এবং বললেন: হে আল্লাহর রাসূল, আল্লাহ তাআলা বলেছেন: "তোমরা নিজেদেরকে হত্যা করো না" [সূরা নিসা: ২৯]। আমি যদি গোসল করতাম, তবে মারা যেতাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে তাকিয়ে হাসলেন।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] حديث صحيح على خلاف في إسناده وبعض ألفاظ متنه، كما هو مبيَّن في "مسند أحمد" 29/ (17812)، وهذا إسناد رجاله ثقات عن آخرهم إلّا أنَّ صورته صورة المرسل، فإنَّ أبا قيس من التابعين ولم يشهد هذه القصة، لكن في الغالب أنه سمعه من مولاه عمرو بن العاص، والله تعالى أعلم.وأخرجه أبو داود (335)، وابن حبان (1315) من طريقين عن ابن وهب، بهذا الإسناد.وقرن أبو داود بابن وهبٍ ابنَ لهيعة، وحديث ابن لهيعة عند أحمد 29/ (17812) لكن من رواية عبد الرحمن بن جبير عن عمرو بن العاص بإسقاط أبي قيس، وفيها ذكر التيمم مكان الوضوء كما في رواية يحيى بن أيوب التالية.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (639)


639 - أخبرَناه أحمد بن سلمان الفقيه قال: قُرئَ على عبد الملك بن محمد وأنا أسمع قال: حَدَّثَنَا وهب بن جَرِير بن حازم، حَدَّثَنَا أبي قال: سمعتُ يحيى بن أيوب يحدِّث عن يزيد بن أبي حبيب، عن عِمران بن أبي أنس، عن عبد الرحمن بن جبير، عن عمرو بن العاص قال: احتلمتُ في ليلةٍ باردةٍ في غزوة ذات السَّلاسل فأشفَقتُ إن اغتسلتُ أن أهلِكَ، فتيمَّمتُ ثم صلَّيت بأصحابي الصبحَ، فذكروا ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم، فقال: يا عمرُو، صلَّيتَ بأصحابك وأنت جُنُب؟! " فأخبرتُه بالذي مَنَعني من الاغتسال، وقلت: إني سمعتُ الله يقول: {وَلَا تَقْتُلُوا أَنْفُسَكُمْ إِنَّ اللَّهَ كَانَ بِكُمْ رَحِيمًا}، فَضَحِكَ رسول الله صلى الله عليه وسلم ولم يقل شيئًا [1].حديث جرير بن حازم هذا لا يُعلِّل حديثَ عمرو بن الحارث الذي وَصَلَه بذِكْر أبي قيس، فإنَّ أهل مصر أعرفُ بحديثهم من أهل البصرة.




আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি যাতুস সালাসিল যুদ্ধের এক ঠাণ্ডা রাতে ইহতিলামে (স্বপ্নদোষে) আক্রান্ত হলাম। আমি ভয় পেলাম যে, যদি গোসল করি তবে আমি ধ্বংস হয়ে যাব। তাই আমি তায়াম্মুম করলাম এবং আমার সাথীদের নিয়ে ফজরের সালাত আদায় করলাম। তারা (সাথীরা) বিষয়টি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করলেন। তিনি বললেন: হে আমর! তুমি তোমার সাথীদের নিয়ে সালাত আদায় করলে অথচ তুমি জুনুব (নাপাক)?! আমি তাঁকে গোসল না করার কারণ জানালাম এবং বললাম: আমি আল্লাহকে বলতে শুনেছি: "তোমরা নিজদেরকে হত্যা করো না। নিশ্চয়ই আল্লাহ তোমাদের প্রতি পরম দয়ালু।" (সূরা নিসা, আয়াত ২৯)। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাসলেন এবং কিছু বললেন না।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] حديث صحيح، وانظر ما قبله.وأخرجه أبو داود (334) عن محمد بن المثنى، عن وهب بن جرير، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (640)


640 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا أبو عثمان سعيد بن عثمان التَّنُوخي، حَدَّثَنَا بِشْر بن بكر، حدَّثني الأوزاعي، حَدَّثَنَا عطاء بن أبي رَبَاح، أنه سمع عبدَ الله بن عباس يُخبِر: أنَّ رجلًا أصابه جرحٌ على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم أصابه احتلامٌ، فاغتسل فمات، فبَلَغَ ذلك النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم، فقال: "قَتَلوه قَتَلهم الله، ألم يكن شِفاءَ العِيِّ السؤالُ" [1].بِشْر بن بكر ثقة مأمون، وقد أقام إسنادَه، وهو صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে এক ব্যক্তির শরীরে আঘাত (জখম) ছিল। অতঃপর তার স্বপ্নদোষ হলো। সে (ঘা থাকা সত্ত্বেও) গোসল করলো এবং মারা গেল। বিষয়টি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছলে তিনি বললেন: "তারা তাকে হত্যা করেছে, আল্লাহ তাদের ধ্বংস করুন! অজ্ঞতার চিকিৎসা কি জিজ্ঞাসা করা ছিল না?"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] حديث حسن، وهذا إسناد ضعيف لانقطاعه، وذكر صيغة التحديث بين الأوزاعي وعطاء وهمٌ لعلَّه من بشر بن بكر فقد قال فيه مسلمة بن قاسم: روى عن الأوزاعي أشياء انفرد بها.وقد خالفه جمع من عطاء، الثقات فرووه عن الأوزاعي قال: بلغني عن عطاء، منهم الوليد بن مزيد كما سيأتي عند المصنّف لاحقًا، وأبو المغيرة عبد القدوس بن الحجاج عند أحمد 5/ (3056)، ومحمد بن شعيب بن شابور عند أبي داود (337).وأخرجه ابن ماجه (572) من طريق عبد الحميد بن أبي العشرين، عن الأوزاعي، عن عطاء، به. ولم يذكر بينهما سماعًا.وأحسن ما جاء في هذا عن عطاءٍ ما سلف عند المصنّف برقم (594).والعِيّ: الجهل. 1/ 227 حيث رواه عن أبي عبد الله الحاكم وآخرين معه عن أبي العباس محمد بن يعقوب بهذا الإسناد. وكما سيأتي في رواية هِقْل التالية عند المصنّف، وهو كذلك في رواية عبد الحميد بن أبي العشرين عند ابن ماجه (572)، وانظر تمام تخريجه فيه.