আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
641 - فحدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا العباس بن الوليد بن مَزْيد، أخبرنا أبي، قال: سمعتُ الأوزاعي يقول: بلغني عن عطاء بن أبي رباح، أنه سمع ابن عباس يُخبر: أنَّ رجلًا أصابه جرحٌ في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم ثم أصابه احتلام، فأُمر بالاغتسال، فاغتسل فمات، فبلغ ذلك رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "قَتَلُوه قَتَلَهم الله، ألم يكن شفاءَ العِيِّ السؤالُ" [1].فبَلَغَنا: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم سُئِلَ عن ذلك فقال: "لو غَسَلَ جسده وترك رأسَه حيث أصابه الجرحُ" [2]. وقد رواه الهِقْل بن زياد، وهو من أثبت أصحاب الأوزاعي، ولم يَذكُر سماعَ الأوزاعي من عطاء:
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে এক ব্যক্তিকে আঘাত লেগেছিল। এরপর তার স্বপ্নদোষ হলো। তখন তাকে গোসল করার নির্দেশ দেওয়া হলো। সে গোসল করল এবং মারা গেল। এই সংবাদ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে পৌঁছলে তিনি বললেন: "তারা তাকে হত্যা করেছে, আল্লাহ তাদের ধ্বংস করুন! অজ্ঞতার ঔষধ কি জিজ্ঞাসা করা ছিল না?" আমাদের কাছে এই মর্মে খবর পৌঁছেছে যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে এই বিষয়ে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বলেন: "যদি সে তার শরীর ধুয়ে নিত এবং তার মাথা, যেখানে আঘাত লেগেছিল, তা ছেড়ে দিত।" এই হাদীসটি হিক্বল ইবনু যিয়াদও বর্ণনা করেছেন এবং তিনি আওযাঈ-এর বিশ্বস্ততম শিষ্যদের একজন। তবে তিনি আওযাঈ-এর আতা থেকে শোনার কথা উল্লেখ করেননি।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] من قوله: "بشر بن بكر ثقة مأمون" إلى هنا سقط من (ب) والمطبوع. 1/ 227 حيث رواه عن أبي عبد الله الحاكم وآخرين معه عن أبي العباس محمد بن يعقوب بهذا الإسناد. وكما سيأتي في رواية هِقْل التالية عند المصنّف، وهو كذلك في رواية عبد الحميد بن أبي العشرين عند ابن ماجه (572)، وانظر تمام تخريجه فيه.
[2] حديث حسن كسابقه لكن دون البلاغ في آخره، فهو ضعيف لإرساله، فالقائل: "فبلغنا" هو عطاء بن أبي رباح كما وقع مصرَّحًا به في هذه الرواية نفسها عند البيهقي في "السنن الكبرى" 1/ 227 حيث رواه عن أبي عبد الله الحاكم وآخرين معه عن أبي العباس محمد بن يعقوب بهذا الإسناد. وكما سيأتي في رواية هِقْل التالية عند المصنّف، وهو كذلك في رواية عبد الحميد بن أبي العشرين عند ابن ماجه (572)، وانظر تمام تخريجه فيه.
642 - أخبرنا [أبو] عبد الله محمد [1] أحمد بن بن علي بن مَخلَد الجوهري ببغداد، حَدَّثَنَا إبراهيم بن الهيثم البَلَدي، حَدَّثَنَا عبد الله بن صالح، حَدَّثَنَا هِقْل بن زياد.وأخبرنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا الحسن بن سفيان، حَدَّثَنَا الحَكَم بن موسى، حَدَّثَنَا هِقْل قال: سمعتُ الأوزاعيَّ قال: قال عطاء عن ابن عباس: إنَّ رجلًا أصابته جِراحةٌ على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم فأصابته جَنابةٌ، فاستفتى فأُمِرَ بالغُسْل، فاغتسل فمات، فبلغ ذلك رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "قَتَلُوه قَتَلهم الله، ألم يكن شِفاءَ العِيِّ السؤالُ؟! ".قال عطاء: فبَلَغَني: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم سُئِلَ بعد ذلك فقال: "لو غَسَلَ جسدَه وتركَ حيث أصابه الجِراحُ أجزأَه" [2].
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে এক ব্যক্তির শরীরে জখম হয়েছিল। এরপর তার ওপর জানাবাত (গোসল ফরজ) হলো। সে ফতোয়া চাইলে তাকে গোসল করার নির্দেশ দেওয়া হয়। সে গোসল করল এবং মৃত্যুবরণ করল। এ সংবাদ রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছলে তিনি বললেন: "তারা তাকে হত্যা করেছে! আল্লাহ তাদের ধ্বংস করুন! অজ্ঞতার নিরাময় কি জিজ্ঞাসা করা নয়?"
আতা (রহ.) বলেন: আমার কাছে এই সংবাদ পৌঁছেছে যে, এরপর রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বলেন: "যদি সে তার শরীর ধৌত করত এবং আঘাতের স্থানগুলো বাদ দিত, তবেই তার জন্য যথেষ্ট হতো।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في النسخ الخطية: أخبرنا عبد الله بن محمد، وقد جاء على الصواب في هذا الكتاب في غير هذا الموضع، فهو أبو عبد الله واسمه محمد، وله ترجمة في "سير أعلام النبلاء" 16/ 60 - 61.
[2] هو كسابقه. وأخرجه أبو يعلى (2420 - 2421) عن أبي صالح عبد الله بن صالح، بهذا الإسناد.وأخرجه الدارقطني (730) و (731) من طريقين عن الحكم بن موسى، به.
643 - حَدَّثَنَا أبو القاسم عبد الرحمن بن حسن بن أحمد بن محمد بن عُبيد الأسَدي بهَمَذان، حَدَّثَنَا عُمير بن مِرْداس، حَدَّثَنَا عبد الله بن نافع، حَدَّثَنَا الليث بن سعد، عن بكر بن سَوَادة، عن عطاء بن يَسَار، عن أبي سعيد الخُدْري قال: خَرَجَ رجلانِ في سفرٍ فحضَرت الصلاةُ وليس معهما ماءٌ، فتيمَّما صعيدًا طيبًا، فصلَّيا، ثم وَجَدَا الماءَ في الوقت، فأعاد أحدُهما الصلاةَ والوضوءَ ولم يُعِدِ الآخرُ، ثم أتَيا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فذكرا ذلك له، فقال للذي لم يُعِدْ: "أصبتَ السُّنةَ وأجزَأَتْك صلاتُك" وقال للذي توضأَ وعادَ: "لك الأجرُ مرَّتين" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، فإنَّ عبد الله بن نافع ثقة، وقد وَصَلَ هذا الإسناد عن الليث وقد أرسله غيرُه:
আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত... তিনি বলেন: দুজন লোক সফরে বের হলো। এরপর সালাতের সময় হলো, কিন্তু তাদের সাথে কোনো পানি ছিল না। অতঃপর তারা পবিত্র মাটি দ্বারা তায়াম্মুম করল এবং সালাত আদায় করল। এরপর তারা সময় থাকা অবস্থাতেই পানি পেল। তখন তাদের মধ্যে একজন উযু ও সালাত পুনরায় আদায় করল, আর অন্যজন তা পুনরায় আদায় করল না। এরপর তারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট এসে তাঁকে বিষয়টি জানাল। অতঃপর যিনি পুনরায় সালাত আদায় করেননি, তাঁকে তিনি বললেন: "তুমি সুন্নাহ সঠিকভবে পালন করেছ এবং তোমার সালাত যথেষ্ট হয়েছে।" আর যিনি উযু করে পুনরায় সালাত আদায় করেছেন, তাঁকে বললেন: "তোমার জন্য রয়েছে দ্বিগুণ পুরস্কার।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] رجاله ثقات غير عبد الرحمن بن حسن فهو ضعيف لكنه متابع، وقد اختُلف في إسناده: فقد أخرجه أبو داود (338)، والنسائي في "المجتبى" (433) من طريقين عن عبد الله بن نافع، بهذا الإسناد.وخالف ابنَ نافع عبدُ الله بنُ المبارك عند النسائيّ (434)، ويحيى بن بكير فيما يلي عند المصنّف، فروياه عن الليث بن سعد، عن عَميرة بن أبي ناجية، عن بكر بن سوادة، عن عطاء بن يسار مرسلًا.هكذا أرسلاه وأدخلا بين الليث وبكر عميرةَ بن أبي ناجية، وهو قد وثقه النسائيّ وابن حبان، على أنَّ سماع الليث من بكر ممكن جدًّا، فقد تعاصرا في بلد واحد أكثر من عشرين عامًا.وتابع ابنَ نافع على وصله أبو الوليد الطيالسي عند ابن السكن في "صحيحه" - كما في "بيان الوهم والإيهام" لابن القطان 2/ 434 و "نصب الراية" للزيلعي 1/ 160 - فرواه عن الليث، عن عمرو بن الحارث وعميرة بن أبي ناجية، عن بكر بن سوادة، عن عطاء، عن أبي سعيد.ورواه مرسلًا ابن لهيعة عند أبي داود (339) عن بكر بن سوادة، عن أبي عبد الله مولى إسماعيل بن عبيد، عن عطاء بن يسار. وابن لهيعة سيئ الحفظ، وأبو عبد الله مجهول. وأخرجه الطبراني في "الكبير" (13366)، وابن عديّ في "الكامل" 5/ 188، والدارقطني في "السنن" (685) من طرق عن علي بن ظبيان، بهذا الإسناد قال الدارقطني: كذا رواه علي بن ظبيان مرفوعًا، ووقفه يحيى القطان وهشيم وغيرهما، وهو الصواب، وكذا صوَّب وقفه أيضًا في كتابه "العلل" 12/ 306 (2838).ثم ساقه الدارقطني في "سننه" برقم (686) موقوفًا من طريق يحيى وهشيم، عن عبيد الله بن عمر، و (687) من طريق مالك عن نافع عن ابن عمر. وهو في "موطأ مالك" 1/ 56.الله وأخرجه موقوفًا أيضًا البيهقي 207/ 12 من طريق هشيم، عن عبيد بن عمر ويونس - وهو ابن عبيد - عن نافع، عن ابن عمر. وانظر ما سيأتي برقم (647).
644 - Null
644 - أخبرَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أحمد بن إبراهيم بن مِلْحان، حَدَّثَنَا يحيى بن بُكَير، حَدَّثَنَا الليث، عن عَمِيرة بن أبي ناجية، عن بَكْر بن سَوَادة، عن عطاء بن يَسَار، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم نحوه. والله أعلم.
আতা ইবনে ইয়াসার থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে অনুরূপ (একটি বর্ণনা উল্লেখ করেন)। আর আল্লাহই সর্বজ্ঞ।
645 - حَدَّثَنَا علي بن عيسى الحِيرِي، حَدَّثَنَا محمد بن عمرو الحَرَشي، حَدَّثَنَا محمد بن يحيى، حَدَّثَنَا علي بن ظَبْيان، عن عُبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال: "التيمُّمُ ضربتانِ: ضربةٌ للوجه وضربةٌ لليدين إلى المِرفَقين" [1]. قد اتَّفق الشيخان على حديث الحَكَم عن ذَرٍّ عن سعيد بن عبد الرحمن بن أَبْزَى عن عن أبيه عن عمر في التيمُّم، ولم يُخرجاه بهذا اللفظ [2]، ولا أعلم أحدًا أسنده عن عُبيد الله غير علي بن ظَبْيان، وهو صدوق! وقد أَوقَفَه يحيى بن سعيد وهُشيم بن بَشِير وغيرهما، وقد أوقفه مالك بن أنس عن نافع في "الموطأ" بغير هذا اللفظ، غير أنَّ شَرْطي في سَنَد الصدوقِ الحديث إذا أَوقَفَه غيره [3].
ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তায়াম্মুম হলো দু'টি আঘাত (বা স্পর্শ): একটি আঘাত চেহারার জন্য এবং একটি আঘাত কনুই পর্যন্ত দু'হাতের জন্য।" [১] শায়খাইন (ইমাম বুখারী ও মুসলিম) [২] হাকাম, যার, সাঈদ ইবনে আব্দুর রহমান ইবনে আবযা, তার পিতা থেকে, তিনি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে তায়াম্মুম সংক্রান্ত হাদীসের উপর একমত পোষণ করেছেন, কিন্তু তারা এই শব্দে তা বর্ণনা করেননি। আলী ইবনে যাবইয়ান ব্যতীত উবাইদুল্লাহ থেকে অন্য কাউকে আমি জানি না যিনি এটিকে মারফূ’ (নবী পর্যন্ত সংযুক্ত) করেছেন, অথচ তিনি সত্যবাদী! ইয়াহইয়া ইবনে সাঈদ, হুশায়ম ইবনে বাশীর ও অন্যান্যরা এটিকে মাওকূফ (সাহাবীর নিজস্ব উক্তি হিসেবে) করেছেন। ইমাম মালেক ইবনে আনাস 'আল-মুয়াত্তা' গ্রন্থে নাফি' থেকে অন্য শব্দে এটিকে মাওকূফ করেছেন। তবে আমার শর্ত হলো, যখন অন্য কেউ মাওকূফ বর্ণনা করে, তখনও সত্যবাদী রাবী কর্তৃক বর্ণিত সনদকে (আমি গ্রহণ করি)। [৩]
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، علي بن ظبيان متفق على ضعفه، ووهّاه الذهبي في "تلخيصه"، والصواب فيه عن ابن عمر موقوف كما سيأتي. وأخرجه الطبراني في "الكبير" (13366)، وابن عديّ في "الكامل" 5/ 188، والدارقطني في "السنن" (685) من طرق عن علي بن ظبيان، بهذا الإسناد قال الدارقطني: كذا رواه علي بن ظبيان مرفوعًا، ووقفه يحيى القطان وهشيم وغيرهما، وهو الصواب، وكذا صوَّب وقفه أيضًا في كتابه "العلل" 12/ 306 (2838).ثم ساقه الدارقطني في "سننه" برقم (686) موقوفًا من طريق يحيى وهشيم، عن عبيد الله بن عمر، و (687) من طريق مالك عن نافع عن ابن عمر. وهو في "موطأ مالك" 1/ 56.الله وأخرجه موقوفًا أيضًا البيهقي 207/ 12 من طريق هشيم، عن عبيد بن عمر ويونس - وهو ابن عبيد - عن نافع، عن ابن عمر. وانظر ما سيأتي برقم (647).
[2] حديث الحكم عند البخاريّ (338) ومسلم (368) (112)، وهو من رواية عبد الرحمن بن أبزى عن عمار بن ياسر عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أنه قال: "إنما كان يكفيك هكذا" فضرب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بكفيه الأرض ونفخ فيهما ثم مسح بهما وجهه وكفَّيه.
645 [3] - كذا وقعت العبارة في النسخ الخطية، والظاهر أنها ناقصة، إذ لا بدَّ لها من تتمة لتُفهَم.
646 - حَدَّثَنَا أبو جعفر عبد الله بن إسماعيل بن إبراهيم [1] بن منصورٍ أميرِ المؤمنين في دار المنصور ببغداد، حَدَّثَنَا الهيثم بن خالد، حَدَّثَنَا أبو نُعيم، حَدَّثَنَا سليمان بن أَرقَمَ، عن الزُّهْري، عن سالم، عن أبيه قال: تيمَّمنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فضَرَبْنا بأيدينا على الصعيد الطيِّب، ثم نَفَضنا أيدينا فمَسَحْنا بها وجوهَنا، ثم ضربنا ضربةً أخرى الصعيدَ الطيِّبَ ثم نَفَضْنا أيديَنا فمسحنا بأيدينا من المِرفَقِ إلى الكفِّ على مَنابتِ الشَّعر من ظاهرٍ وباطن [2].هذا حديث مفسَّر، وإنما ذكرتُه شاهدًا لأنَّ سليمان بن أرقم ليس من شرط هذا الكتاب، وقد اشترطنا إخراجَ مثله في الشواهد.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তায়াম্মুম করেছিলাম। তখন আমরা আমাদের হাত উত্তম পবিত্র মাটির উপর মারলাম (আঘাত করলাম), অতঃপর আমাদের হাত ঝেড়ে ফেললাম এবং তা দ্বারা আমাদের মুখমণ্ডল মাসাহ করলাম। এরপর আমরা উত্তম পবিত্র মাটির উপর দ্বিতীয়বার আঘাত করলাম, এরপর আমরা আমাদের হাত ঝেড়ে ফেললাম এবং বাহ্যিক ও অভ্যন্তরীণ উভয় দিক থেকে চুলের গোড়া পর্যন্ত কনুই থেকে কবজি পর্যন্ত আমাদের হাত মাসাহ করলাম।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] وقع في النسخ الخطية: إبراهيم بن إسماعيل، والصواب أنه إسماعيل بن إبراهيم، كما جاء في غير موضع من هذا الكتاب، وانظر ترجمته في "تاريخ بغداد" 11/ 63، و "سير أعلام النبلاء" 15/ 551.
[2] إسناده ضعيف جدًّا، سليمان بن أرقم متروك الحديث. أبو نعيم: هو الفضل بن دكين.وأخرجه الدارقطني (688) عن محمد بن علي بن إسماعيل الأُبُلي، عن الهيثم بن خالد، بهذا الإسناد. وضعَّفه بسليمان بن أرقم، وكذا ضعفه البيهقي في "سننه" 1/ 207 به وقال: لا يُحتجُّ بحديثه.
647 - أخبرنا حمزة بن العباس العَقَبي ببغداد، حَدَّثَنَا محمد بن عيسى المدائني، حَدَّثَنَا شَبَابِةُ بن سَوَّار.وحدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حَدَّثَنَا إبراهيم بن إسحاق، حَدَّثَنَا هارون بن عبد الله، حَدَّثَنَا شَبَابة، حَدَّثَنَا سليمان بن أبي داود الحرَّاني، عن سالم ونافع، عن ابن عمر، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أنه قال في التيمم: "ضَربتين [1]: ضربةً للوجه، وضربةً لليدين إلى المِرفَقَينِ" [2].سليمان بن أبي داود أيضًا لم يُخرجاه، وإنما ذكرناه في الشواهد.وقد رُوِّينا معنى هذا الحديث عن جابر بن عبد الله عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بإسناد صحيح:
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাইয়াম্মুম সম্পর্কে বলেছেন: "দু’টি আঘাত (বা স্পর্শ): একটি আঘাত চেহারার জন্য, আর একটি আঘাত কনুই পর্যন্ত দু’হাতের জন্য।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] هكذا في النسخ الخطية، وهو صحيح عربيةً على أنه منصوب على المصدرية على تقدير فعل يضرب أو اضرب.
[2] إسناده ضعيف لضعف سليمان بن أبي داود، الحراني، وبه ضعَّفه الدارقطني والبيهقي وابن حجر في "التلخيص الحبير" 1/ 152.وأخرجه الدارقطني في "سننه" (690) من طريقين عن إبراهيم الحربي - وهو إبراهيم بن إسحاق - بهذا الإسناد.وأخرجه البزار (6088) من طريق قرة بن سليمان، عن سليمان بن أبي داود، به. وقال: والحفّاظ يوقفونه على قول ابن عمر. وانظر ما سلف برقم (645).
648 - حدَّثَناه علي بن حَمْشاذَ العَدْل وأبو بكر بن بالَوَيهِ قالا: حَدَّثَنَا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حَدَّثَنَا أبو نُعيم، حَدَّثَنَا عَزْرة بن ثابت، عن أبي الزُّبير، عن جابر قال: جاء رجل فقال: أصابتني جَنابةٌ وإني تمعَّكتُ في التراب، فقال: اضرِبْ [1]، فضرب بيديه الأرضَ فَمَسَحَ وجهَه، ثم ضرب بيديه فمَسَحَ بهما يديه إلى المِرفقَينِ.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন লোক এসে বলল: আমার উপর গোসল ফরয (জানাৰত) হয়েছে, আর আমি (পানির অভাবে) মাটিতে গড়াগড়ি দিয়েছি। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আঘাত করো। অতঃপর সে তার দু’হাত মাটিতে আঘাত করল এবং তার মুখমণ্ডল মাসেহ করল। এরপর সে তার দু’হাত দিয়ে আঘাত করল এবং তা দিয়ে তার দুই হাত কনুই পর্যন্ত মাসেহ করল।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] هكذا وقع في رواية إبراهيم الحربي عن أبي نعيم عند المصنّف وعنه البيهقي في "السنن" 1/ 207، وهي كذلك عند الدارقطني (692)، وهو تصحيف قديم صوابه: أصرتَ حمارًا، هكذا وقع في كتاب أبي نعيم نفسه، وهو كتاب "الصلاة" برقم (145)، ورواه من طريقه على الصواب الطحاوي في "شرح معاني الآثار" 1/ 114.وهذا الحديث موقوف على جابر بن عبد الله وصحَّح البيهقي إسناده.وأخرجه كذلك موقوفًا ابن أبي شيبة 1/ 159 عن وكيع، وابن المنذر في "الأوسط" (536) من طريق ابن المبارك، كلاهما عن عزرة بن ثابت، به. بهذا الإسناد. وقرن في "السنن" معه آخرين، وقال في رفعه: ليس بمحفوظ.وأخرجه الدارقطني في "سننه" (716) من طرق عن محمد بن سنان القزاز، به. وقال في "العلل" 12/ 305 (2737): وغيره يرويه عن عبيد الله عن نافع عن ابن عمر موقوفًا، وكذلك رواه أيوب السختياني ويحيى بن سعيد الأنصاري ومحمد بن إسحاق - صاحب المغازي - عن نافع عن ابن عمر من فعله موقوفًا.قلنا: أما رواية أيوب السختياني فقد أخرجها ابن أبي شيبة في "مصنفه" 1/ 158، وأما رواية يحيى بن سعيد فهي عند المصنّف في الحديث التالي، وأما رواية ابن إسحاق فلم نقف عليها.ورواه موقوفًا أيضًا محمد بن عجلان عن نافع، أخرجه عبد الرزاق (884)، والدارقطني في "العلل" 13/ 32، والبيهقي في "السنن" 1/ 224 و "معرفة السنن والآثار" (1641)، و "الخلافيات" (860)، وقال البيهقي: هو المحفوظ؛ أي: موقوفًا.ومِربَد النَّعَم: موضع على ميلين من المدينة، قاله ياقوت في "معجم البلدان" 5/ 98.
649 - وحدثنا علي بن حَمْشَاذ وأبو بكر بن بالَوَيهِ قالا: حَدَّثَنَا إبراهيم بن إسحاق، حَدَّثَنَا عثمان بن محمد الأَنماطي، حَدَّثَنَا حَرَميُّ بن عُمَارة، عن عَزْرة بن ثابت، عن أبي الزُّبير، عن جابر، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال: "التيمُّمُ ضربةٌ للوجه، وضربةٌ لليدينِ إلى المرفَقَينِ" [1].
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তায়াম্মুম হলো চেহারার জন্য একবার আঘাত (মাটি স্পর্শ করা), আর দুই হাত কনুই পর্যন্ত (মাসাহ করার জন্য) একবার আঘাত।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] رفعه شاذٌّ والصواب أنه موقوف، حرمي بن عمارة صدوق لكن كانت فيه غفلة وقد خالفه الثقات أبو نعيم وغيره كما سبق فوقفوه، وعثمان الأنماطي في حاله جهالة.وأخرجه البيهقي 1/ 207 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الدارقطني (691) من طرق عن إبراهيم بن إسحاق الحربي، به. بهذا الإسناد. وقرن في "السنن" معه آخرين، وقال في رفعه: ليس بمحفوظ.وأخرجه الدارقطني في "سننه" (716) من طرق عن محمد بن سنان القزاز، به. وقال في "العلل" 12/ 305 (2737): وغيره يرويه عن عبيد الله عن نافع عن ابن عمر موقوفًا، وكذلك رواه أيوب السختياني ويحيى بن سعيد الأنصاري ومحمد بن إسحاق - صاحب المغازي - عن نافع عن ابن عمر من فعله موقوفًا.قلنا: أما رواية أيوب السختياني فقد أخرجها ابن أبي شيبة في "مصنفه" 1/ 158، وأما رواية يحيى بن سعيد فهي عند المصنّف في الحديث التالي، وأما رواية ابن إسحاق فلم نقف عليها.ورواه موقوفًا أيضًا محمد بن عجلان عن نافع، أخرجه عبد الرزاق (884)، والدارقطني في "العلل" 13/ 32، والبيهقي في "السنن" 1/ 224 و "معرفة السنن والآثار" (1641)، و "الخلافيات" (860)، وقال البيهقي: هو المحفوظ؛ أي: موقوفًا.ومِربَد النَّعَم: موضع على ميلين من المدينة، قاله ياقوت في "معجم البلدان" 5/ 98.
650 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا محمد بن سِنان القَزاز، حَدَّثَنَا عمرو بن محمد بن أبي رَزِين، حَدَّثَنَا هشام بن حسَّان، عن عُبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر قال: رأيت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يتيمَّم بموضعٍ يقال له: مِربَدُ النَّعَم، وهو يرى بيوتَ المدينة [1]. هذا حديثٌ تفرَّد به عمرو بن محمد بن أبي رَزِين، وهو صَدُوق [2]، ولم يُخرجاه، وقد أوقفه يحيى بن سعيد الأنصاري وغيرُه عن نافع عن ابن عمر:
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে একটি স্থানে তায়াম্মুম করতে দেখেছি, যার নাম মারবাদুন না‘আম। সে সময় তিনি মদীনার ঘরবাড়ি দেখতে পাচ্ছিলেন।
এটি এমন একটি হাদীস, যা বর্ণনায় আমর ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু আবী রাযীন একক এবং তিনি 'ছাদূক' (সৎ ও সত্যবাদী) রাবী। ইমাম বুখারী ও মুসলিম এই হাদীসটি সংকলন করেননি। ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ আল-আনসারী ও অন্যান্য রাবীগণ এটিকে নাফি' থেকে ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পর্যন্ত 'মাওকূফ' (সাহাবীর কথা) হিসেবে বর্ণনা করেছেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف مرفوعًا، محمد بن سنان القزاز مختلف فيه، وعمرو بن محمد بن أبي رزين صدوق ربما أخطأ، وقد خولفا في رفع هذا الحديث، والصواب وقفه على ابن عمر كما سيأتي.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 1/ 224 و "الخلافيات" (859) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقرن في "السنن" معه آخرين، وقال في رفعه: ليس بمحفوظ.وأخرجه الدارقطني في "سننه" (716) من طرق عن محمد بن سنان القزاز، به. وقال في "العلل" 12/ 305 (2737): وغيره يرويه عن عبيد الله عن نافع عن ابن عمر موقوفًا، وكذلك رواه أيوب السختياني ويحيى بن سعيد الأنصاري ومحمد بن إسحاق - صاحب المغازي - عن نافع عن ابن عمر من فعله موقوفًا.قلنا: أما رواية أيوب السختياني فقد أخرجها ابن أبي شيبة في "مصنفه" 1/ 158، وأما رواية يحيى بن سعيد فهي عند المصنّف في الحديث التالي، وأما رواية ابن إسحاق فلم نقف عليها.ورواه موقوفًا أيضًا محمد بن عجلان عن نافع، أخرجه عبد الرزاق (884)، والدارقطني في "العلل" 13/ 32، والبيهقي في "السنن" 1/ 224 و "معرفة السنن والآثار" (1641)، و "الخلافيات" (860)، وقال البيهقي: هو المحفوظ؛ أي: موقوفًا.ومِربَد النَّعَم: موضع على ميلين من المدينة، قاله ياقوت في "معجم البلدان" 5/ 98.
[2] لكن قال ابن حبان في "ثقاته": ربما أخطأ وقال الحافظ ابن حجر في "تغليق التعليق" 2/ 185: ورفعه لهذا الحديث من جملة ما أخطأ فيه، والله أعلم. وأخرجه البيهقي 1/ 231 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الدارقطني (719) من طريق يزيد بن أبي حكيم، عن سفيان الثوري، به.
651 - أخبرَناه أبو إسحاق إبراهيم بن محمد بن حاتم الزاهد، حَدَّثَنَا محمد بن إسحاق الصَّنْعاني [1]، حَدَّثَنَا محمد بن جعشُم، عن سفيان الثَّوري، عن يحيى بن سعيد، عن نافع قال: تيمَّمَ ابن عمر على رأس مِيلٍ أو مِيلَينِ من المدينة فصلَّى العصر، فقَدِمَ والشمسُ مرتفعةٌ ولم يُعِدِ الصلاة [2].
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মদীনা থেকে এক বা দুই মাইল দূরে তায়াম্মুম করলেন এবং আসরের সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি ফিরে আসলেন যখন সূর্য তখনও উপরে ছিল, কিন্তু তিনি সালাতটি পুনরায় আদায় করেননি।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: الصغاني، والصواب أنَّ هذا الراوي صنعاني من صنعاء اليمن كما سيأتي تقييده عند المصنّف برقم (3655). وهو محمد بن إسحاق بن الصبّاح الصَّنعاني، وقد روى عنه أبو إسحاق الحيري عن محمد بن جعشم - وهو محمد بن شرحبيل بن جعشم - "جامعَ الثوري" فيما قاله أبو عبد الله الحاكم في "تاريخه" كما قال السمعاني في ترجمة الحيري من "الأنساب" 4/ 290. وأخرجه البيهقي 1/ 231 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الدارقطني (719) من طريق يزيد بن أبي حكيم، عن سفيان الثوري، به.
[2] خبر موقوف صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن إسحاق الصَّنعاني وشيخه محمد بن جعشم، وباقي رجال الإسناد ثقات. وأخرجه البيهقي 1/ 231 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الدارقطني (719) من طريق يزيد بن أبي حكيم، عن سفيان الثوري، به.
652 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا بَحْر بن نَصْر بن سابق الخَوْلاني، حَدَّثَنَا بِشْر بن بكر، حَدَّثَنَا موسى بن عُليّ بن رَبَاحٍ، عن أبيه، عن عُقْبة بن عامر الجُهَني قال: خرجتُ من الشام إلى المدينة يومَ الجمعة، فدخلتُ المدينة يومَ الجمعة، فدخلتُ على عمر بن الخطَّاب، فقال لي: متى أَولجْتَ خُفَّيكَ في رِجلَيك؟ قلت: يومَ الجمعة، قال: فهل نَزَعتهما؟ قلت: لا، فقال: أصبتَ السُّنةَ [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وله شاهدٌ آخر عن عُقْبة بن عامر:
উকবাহ ইবন আমির আল-জুহানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি সিরিয়া থেকে মদীনার উদ্দেশ্যে জুমু‘আর দিন রওয়ানা হলাম এবং জুমু‘আর দিন মদীনাতে প্রবেশ করলাম। অতঃপর আমি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট গেলাম। তিনি আমাকে বললেন, তুমি তোমার চামড়ার মোজা (খুফ্ফাইন) কখন পরিধান করেছ? আমি বললাম, জুমু‘আর দিন। তিনি বললেন, তুমি কি তা খুলে ফেলেছ? আমি বললাম, না। অতঃপর তিনি বললেন, তুমি সুন্নতের অনুসরণ করেছ।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح، وصحَّحه الدارقطني في "سننه" برقم (757)، وانظر ما بعده.
653 - حَدَّثَنَا أبو محمد الحسن بن محمد بن إسحاق الإسفراييني، حَدَّثَنَا الحسين بن إسحاق التُّستَري، حَدَّثَنَا يحيى بن عبد الله بن بُكَير، حَدَّثَنَا المفضَّل بن فَضَالة قال: سألتُ يزيد بن أبي حَبيب عن المسح على الخفَّين، فقال [1]: أخبرني عبد الله بن الحَكَم البَلَوي، عن عُلي بن رَبَاح، عن عُقبة بن عامر أنه أخبره: أنه وَفَدَ إلى عمر بن الخطَّاب عامًا، قال عقبة: وعليَّ خُفَّانِ من تلك الخِفَافِ الغِلَاظ، فقال لي عمر: متى عهدُك بلباسِهما؟ فقلت: لَبِستُهما يومَ الجمعة، وهذا يومُ الجمعة، فقال لي عمر: أصبتَ السُّنةَ [2]. وقد صحَّت الرواية عن عبد الله بن عمر أنه أَفتى به، ولم يُسنِده، وإليه ذهب مالك بن أنس الإمام.
উকবাহ ইবন আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এক বছর সফরে গিয়েছিলেন। উকবাহ বলেন, আমার পায়ে সেই ধরনের মোটা চামড়ার মোজা (খুফ্ফান) পরিহিত ছিল। তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে জিজ্ঞেস করলেন: "এগুলি পরিধান করার পর তোমার কতদিন কেটেছে?" আমি বললাম: "আমি এগুলি গত জুমার দিন পরেছিলাম, আর আজ জুমার দিন।" তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে বললেন: "তুমি সুন্নতের উপর ঠিক করেছ।" আর আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও খুফের উপর মাসাহ করার ব্যাপারে ফতোয়া দেওয়া প্রমাণিত আছে, তবে তিনি এটিকে (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর দিকে) সম্বন্ধযুক্ত করেননি। আর ইমাম মালিক ইবনে আনাস এই মত অবলম্বন করেছেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في (ز) و (ص): فقال المفضل، وهو خطأ، فإنَّ الذي روى هذا الحديث عن عبد الله بن الحكم البلوي هو يزيد بن أبي حبيب.
[2] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل عبد الله بن الحكم البلوي.وأخرجه ابن ماجه (558) من طريق حيوة بن شريح، عن يزيد بن أبي حبيب، بهذا الإسناد.وفي مَسْألَة التوقيت في المسح على الخفين انظر التعليق على حديث خزيمة بن ثابت في "مسند أحمد" 36/ (21851).
654 - أخبرني عبد الله بن الحسين القاضي بمَرْو، حَدَّثَنَا الحارث بن أبي أُسامة، حَدَّثَنَا رَوْح بن عُبادة، حَدَّثَنَا هشام بن حسّان، عن عُبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر: أنه كان لا يُوقِّت في المسح على الخفَّين وقتًا [1].وقد رُوِيَ هذا الحديث عن أنس بن مالك عن رسول الله صلى الله عليه وسلم بإسناد صحيح، رواتُه عن آخرهم ثقات [2] إلا أنه شاد بمَرَّة:
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মোজার উপর মাসেহ করার জন্য কোনো সময় নির্ধারণ করতেন না। এই হাদীসটি আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হতে সহীহ সানাদ-সহ বর্ণিত হয়েছে, যার সকল রাবী শেষ পর্যন্ত নির্ভরযোগ্য, তবে এটি খুব বেশি শায (অস্বাভাবিক/বিপরীত)।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه البيهقي في "السنن" 1/ 280 عن محمد بن عبد الله الحافظ - وهو الحاكم - بهذا الإسناد. وأخرجه الدارقطني (758) من طريق أبي الأزهر، عن روح بن عبادة، به. وتابع روحًا عنده عبدُ الله بن بكر السهمي عن هشام بن حسان.وأخرجه أيضًا بنحوه (759) و (760) من طريق عبد الله بن رجاء، عن عبيد الله بن عمر، به.
[2] هذه مجازفة من المصنّف رحمه الله، فإنَّ في الإسناد المقدام بن داود بن تَلِيد وهو لم يؤثر توثيقه عن أحدٍ، وضعَّفه النسائيّ والدارقطني وغيرهما، وقال ابن أبي حاتم وابن يونس: تكلموا فيه، وانظر ترجمته في "سير أعلام النبلاء" للذهبي 13/ 345 و "لسان الميزان" للحافظ ابن حجر.
655 - حدَّثَناه أبو جعفر محمد بن محمد بن عبد الله البغدادي، حَدَّثَنَا المقدام بن داود بن تَلِيد الرُّعَيني، حَدَّثَنَا عبد الغفار بن داود الحرَّاني، حَدَّثَنَا حمَّاد بن سَلَمة، عن عُبيد الله بن أبي بكر وثابت، عن أنس، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إذا توضَّأَ أحدُكم ولَبِسَ خُفَّيهِ، فليُصلِّ فيهما وليَمسَحْ عليها، ثم لا يخلَعُهما إن شاء إلّا من جَنَابة" [1].هذا إسناد صحيح على شرط مسلم وعبد الغفار بن داود ثقةٌ غيرَ أنه ليس عند أهل البصرة عن حمّاد.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন তোমাদের কেউ ওযু করে এবং তার মোজা পরিধান করে, তখন সে যেন সেগুলোর ওপর সালাত আদায় করে এবং সেগুলোর উপর মাসাহ করে। এরপর সে যদি চায়, তাহলে জানাবাত (বড় অপবিত্রতা) ছাড়া অন্য কোনো কারণে সে তা খুলবে না।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف لضعف المقدام بن داود.وأخرجه الدارقطني (781)، والبيهقي 1/ 279 من طريق المقدام، بهذا الإسناد.
656 - حَدَّثَنَا أبو الحسن محمد بن علي بن بكر العَدْل وأبو منصور محمد بن القاسم العَتَكي قالا: حَدَّثَنَا أحمد بن نصر، حَدَّثَنَا أبو نُعيم، حَدَّثَنَا سفيان.وأخبرنا أبو الحسن أحمد بن محمد بن سَلَمة العَنَزي، حَدَّثَنَا معاذ بن نَجْدة القرشي، حَدَّثَنَا قَبِيصة بن عُقْبة، حَدَّثَنَا سفيان.وأخبرنا أبو النَّضر الفقيه، حَدَّثَنَا عثمان بن سعيد الدارمي، حَدَّثَنَا محمد بن كَثير، حَدَّثَنَا سفيان، عن المِقْدام بن شُريح بن هانئ، عن أبيه، عن عائشة قالت: ما بالَ رسولُ الله قائمًا منذ أُنزِلَ عليه الفُرْقان [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وقد اتَّفقا على إخراج حديث الأعمش عن أبي وائل عن حُذيفة قال: أتَى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم سُبَاطةَ قوم فبال قائمًا [2].وقد رُوِيَ عن عُبيد الله بن عمر عن نافع عن ابن عمر قال: قال عمر: عمر: ما بلتُ قائمًا منذ أسلمتُ [3]. وعن إبراهيم، عن عَلْقمة، عن عبد الله قال: من الجفاءِ أن تبولَ وأنت قائم [4].وقد رُوِيَ عن أبي هريرة العُذْرُ عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في بوله قائمًا:
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আয়িশা) বলেন, যখন তাঁর উপর আল-ফুরকান (কুরআন) নাযিল হয়েছিল, তখন থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আর কখনো দাঁড়িয়ে পেশাব করেননি।
এই হাদীসটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুসারে সহীহ, কিন্তু তাঁরা উভয়ে এটি সংকলন করেননি। অবশ্য তারা (বুখারী ও মুসলিম) আমাশ থেকে, তিনি আবূ ওয়াইল থেকে, তিনি হুযায়ফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হাদীসটি সংকলনে একমত হয়েছেন। হুযায়ফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোনো এক সম্প্রদায়ের আবর্জনা ফেলার স্থানে এসে দাঁড়িয়ে পেশাব করলেন।
উবাইদুল্লাহ ইবনু উমর থেকে, তিনি নাফি’ থেকে, তিনি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি (ইবনু উমর) বলেন, উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: আমি ইসলাম গ্রহণের পর থেকে আর কখনো দাঁড়িয়ে পেশাব করিনি।
এবং ইবরাহীম থেকে, তিনি আলকামা থেকে, তিনি আবদুল্লাহ (ইবনু মাসউদ) (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি বলেন: দাঁড়িয়ে পেশাব করা অভদ্রতা বা রুক্ষতার লক্ষণ।
এবং আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দাঁড়িয়ে পেশাব করার বিষয়ে ওযরের (কারণ উল্লেখের) বর্ণনা এসেছে: [এখানে হাদীসের মূলপাঠ শেষ হয়নি]।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. أبو نعيم: هو الفضل بن دُكين، وسفيان: هو الثوري.وأخرجه أحمد 41/ (25045) و 42/ (25787) عن وكيع وعبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد. وسيأتي برقم (672) و (673).وأخرج ابن ماجه (307)، والترمذيّ (12)، والنسائي (25)، وابن حبان (1430) من طريق شريك - وهو ابن عبد الله بن أبي نَمِر - عن المقدام بن شريح، عن أبيه، عن عائشة بلفظ: من حدَّثكم أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بال قائمًا فلا تصدِّقوه، ما كان يبول إلّا قاعدًا.
[2] أخرجه البخاريّ برقم (224) ومسلم (273). والجمع بينه وبين حديث عائشة ما ذكره في فتح الباري 1/ 677 (بتحقيقنا): أنَّ قول عائشة هذا مستند إلى علمها، فيُحمل على ما وقع منه صلى الله عليه وسلم في البيوت، وأما في غير البيوت فلم تطَّلع هي عليه، وقد حفظه حذيفة وهو من كبار الصحابة، وقد بيّنا أنَّ ذلك كان بالمدينة، فتضمَّن الردَّ على ما نفته من أنَّ ذلك لم يقع بعد نزول القرآن.
656 [3] - أخرجه ابن أبي شيبة 1/ 124، والبزار (149)، وابن المنذر في "الأوسط" (284)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" 4/ 268 وإسناده صحيح.
656 [4] - خبر صحيح، لكن لم نقف عليه من هذا الطريق، وقد أخرجه ابن أبي شيبة 1/ 124 و 2/ 61، والطبراني في "الكبير" (9503) من طريق المسيب بن رافع عن عبد الله - وهو ابن مسعود -.وأخرجه البيهقي 2/ 285 من طريق ابن بريدة عن ابن مسعود.
657 - حدَّثَناه أبو عَمران موسى بن سعيد الحنظلي بهَمَذان، حَدَّثَنَا يحيى بن عبد الله بن ماهانَ الكَرَابيسي، حَدَّثَنَا حماد بن غسَّان الجُعْفي، حَدَّثَنَا مَعْن بن عيسى، حَدَّثَنَا مالك بن أنس، عن أبي الزِّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بالَ قائمًا من جُرحٍ كان بمَأْبِضِه [1].هذا حديث تفرَّد به حماد بن غسَّان، ورواتُه كلهم ثِقات!
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হাঁটুর পেছনের ভাঁজে (মাবযিদে) একটি আঘাতের কারণে দাঁড়িয়ে পেশাব করেছিলেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف تفرد به حماد بن غسان وحماد هذا قال الذهبي في "تلخيصه": ضعّفه الدارقطني. أبو الزناد: هو عبد الله بن ذكوان، والأعرج: هو عبد الرحمن بن هُرمُز.وأخرجه أبو نعيم الأصبهاني في "الطب النبوي" (498)، والبيهقي في "السنن" 1/ 101 من طريق يحيى بن عبد الله الهمذاني الكرابيسي، بهذا الإسناد.وقال البيهقي فيه: حديث لا يثبت مثله، وقال في "معرفة السنن والآثار" (842): غير قوي.والمأبِض: باطن الركبة.
658 - حَدَّثَنَا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا الحسن بن علي بن زياد، حَدَّثَنَا إبراهيم بن موسى، حَدَّثَنَا خالد بن عبد الله، عن عمرو بن يحيى، عن أبيه، عن عبد الله بن زيد قال: رأيت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مَضمَضَ واستَنشقَ من كفّ واحدٍ، فعل ذلك ثلاثًا [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذا اللفظ.
আব্দুল্লাহ ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখলাম যে, তিনি এক অঞ্জলি পানি দিয়েই কুলি করলেন এবং নাকে পানি দিলেন। তিনি এরূপ তিনবার করলেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل الحسن بن علي بن زياد، وقد توبع.وأخرجه الترمذيّ (28) عن يحيى بن موسى، عن إبراهيم بن موسى، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 26/ (16445) و (16472)، والبخاري (191)، ومسلم (235)، وأبو داود (119)، وابن ماجه (405) من طرق عن خالد بن عبد الله. وهو الطحان الواسطي - به. فاستدراك الحاكم له على الشيخين ذهول منه رحمه الله.
659 - Null
659 - وقد حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، عن الرَّبيع، عن الشافعي قال: إِنْ جَمَعَهما من كفٍّ واحدٍ فهو جائز، وإن فرَّقَهما فهو أحبُّ إلينا.
শাফিঈ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যদি সে দুটোকে এক অঞ্জলি দ্বারা একত্রিত করে, তবে তা জায়েয। আর যদি সে দুটোকে আলাদা করে, তবে তা আমাদের কাছে অধিক পছন্দনীয়।
660 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا أُسَيد بن عاصم، حَدَّثَنَا الحسين بن حفص، عن سفيان.وأخبرنا بكر بن محمد الصَّيرَفي، حَدَّثَنَا عبد الصمد بن الفضل، حَدَّثَنَا قَبِيصة، حَدَّثَنَا سفيان.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حَدَّثَنَا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدَّثني أبي، حَدَّثَنَا وَكِيع، حَدَّثَنَا سفيان، عن أبي هاشم، عن عاصم بن لَقِيط بن صَبِرةً، عن أبيه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إذا توضَّأتَ فخلِّلِ الأصابع" [1].هذا حديث قد احتجَّا بأكثر رُوَاته ثم لم يُخرجاه لتفرُّد عاصم بن لَقِيط بن عامر ابن صَبِرة عن أبيه بالرواية، وقد قدَّمنا القولَ فيه.وله شاهد:
লাকীত ইবনু সাবরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তুমি উযু করবে, তখন আঙ্গুলগুলো খিলাল করবে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. سفيان: هو الثوري، وأبو هاشم: هو إسماعيل بن كثير.والحديث في "مسند أحمد" 26/ (16381). وقد سلف برقم (529). وأخرجه أحمد 4/ (2604) عن سليمان بن داود الهاشمي، عن عبد الرحمن بن أبي الزناد، به.