আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
6459 - حدثنا أبو عبد الله الأصبهاني، حدثنا الحسن بن الجَهْم، حدثنا الحسين ابن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر قال: عوفُ بن مالكٍ الأشجعيُّ، وشهد عوفٌ خيبرَ مع المسلمين، وكانت معه رايةُ أشجَعَ يومَ فَتْح مكة، ثم تحوَّل عوفٌ إلى الشام في خلافة أبي بكر فنزل حمصَ، وبقيَ إلى أول خلافة عبد الملك بن مروان، ثم مات سنة ثلاث وسبعين، وكان يُكْنى أبا عَمْرو.
আওফ ইবনে মালিক আল-আশজা‘ঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আওফ মুসলমানদের সাথে খায়বারের যুদ্ধে উপস্থিত ছিলেন। মক্কা বিজয়ের দিন আশজা' গোত্রের পতাকা তাঁর হাতে ছিল। এরপর আওফ আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতের সময় শামে (সিরিয়া) চলে যান এবং হিমসে বসতি স্থাপন করেন। তিনি আব্দুল মালিক ইবনে মারওয়ানের খিলাফতের প্রথম দিক পর্যন্ত জীবিত ছিলেন। এরপর তিনি তিয়াত্তর (৭৩) সনে ইনতিকাল করেন। এবং তাঁর কুনিয়াত (ডাকনাম) ছিল আবু আমর।
6460 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن سلمان بن الحسن الفقيه ببغداد، حدثنا هلال ابن العلاء الرَّقّي، حدثنا أبي، حدثنا عُبيد الله بن عمرو، حدثني إسحاق بن راشد، عن الزُّهْري، عن عبد الحميد بن عبد الرحمن بن زيد بن الخطَّاب، عن عوف بن مالك الأشجعيّ قال: دخلتُ على رسولَ الله صلى الله عليه وسلم في غزوة تَبُوك في آخر السَّحَر وهو في فُسْطاطِه، فسلَّمتُ عليه وقلت: أَدخُلُ يا رسول الله؟ فقال: "ادخُلْ"، فقلت: كُلِّي؟ فقال: "كُلُّك"، ثم قال صلى الله عليه وسلم: "ستٌّ قبل الساعة: أَوَّلَهُنَّ موتُ نبيِّكم، قل: إحْدَى قلت: إحدى "والثانيةُ فتحُ بيتِ المقدِس، قل اثنَينْ" قلت: اثنين، ثم قال: "والثالثة مُوتَانٌ يأخذكم كقُعَاصِ الغَنَم، قل: ثلاثًا" قلت: ثلاثًا، قال: "والرابعةُ يَفِيضُ فيكم المالُ حتى إنَّ الرجلَ لَيُعطَى مئةَ دينار فيَظَلُّ يَتَسَخَّطُها، قل: أربعًا" قلت: أربعًا، "والخامسةُ فتنةٌ تكون فيكم، قَلَّما يبقى فيكم بيتُ وَبَرٍ ولا مَدَرٍ إِلَّا دَخلَتْه، قل: خمسًا" قلت: خمسًا، "والسادسة هُدْنةٌ تكون بينكم وبين بني الأصفرِ، فيَجتمِعون لكم حَمْلَ امرأةٍ، ثم يَغدِرون بكم فيُقبِلون في ثمانين رايةً، كلَّ رايةٍ اثنا عشرَ ألفاً" [1].
আওফ ইবনে মালিক আশজাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি তাবুক যুদ্ধের সময় শেষ রাতে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের তাঁবুতে প্রবেশ করলাম। আমি তাঁকে সালাম দিলাম এবং বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমি কি প্রবেশ করব? তিনি বললেন: "প্রবেশ করো।" আমি বললাম: আমি কি পুরোপুরি প্রবেশ করব? তিনি বললেন: "তোমার পুরো শরীরই (প্রবেশ করো)।" অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কিয়ামতের পূর্বে ছয়টি বিষয় ঘটবে। প্রথমটি হলো তোমাদের নবীর মৃত্যু।" (তিনি বললেন:) "বলো, এক।" আমি বললাম: এক। "আর দ্বিতীয়টি হলো বায়তুল মাকদিস বিজয়।" (তিনি বললেন:) "বলো, দুই।" আমি বললাম: দুই। অতঃপর তিনি বললেন: "আর তৃতীয়টি হলো এমন মহামারি যা তোমাদেরকে ভেড়ার পালের মৃত্যুর মতো আক্রমণ করবে।" (তিনি বললেন:) "বলো, তিন।" আমি বললাম: তিন। তিনি বললেন: "আর চতুর্থটি হলো তোমাদের মধ্যে ধন-সম্পদ এমনভাবে উপচে পড়বে যে, কোনো ব্যক্তিকে একশ দীনার দেওয়া হলেও সে তাতে অসন্তুষ্ট থাকবে।" (তিনি বললেন:) "বলো, চার।" আমি বললাম: চার। "আর পঞ্চমটি হলো তোমাদের মধ্যে একটি ফিতনা (বিপর্যয়) দেখা দেবে, কদাচিৎ তোমাদের মধ্যে এমন কোনো পশমের (তাঁবুর) বা মাটির (স্থায়ী) ঘর বাকি থাকবে যেখানে তা প্রবেশ করবে না।" (তিনি বললেন:) "বলো, পাঁচ।" আমি বললাম: পাঁচ। "আর ষষ্ঠটি হলো তোমাদের এবং বনু আসফার (রোমকদের) মধ্যে একটি সন্ধি স্থাপিত হবে। অতঃপর তারা (রোমকরা) তোমাদের বিরুদ্ধে (যুদ্ধ প্রস্তুতিতে) একটি নারীর গর্ভকালের সমান সময় ধরে একত্রিত হবে, এরপর তারা তোমাদের সাথে বিশ্বাসঘাতকতা করবে এবং আশিটি পতাকা নিয়ে তোমাদের দিকে অগ্রসর হবে, প্রতিটি পতাকার নিচে থাকবে বারো হাজার সৈন্য।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد فيه لين من أجل العلاء بن هلال والد هلال، وقد توبع.فقد أخرج أوله أحمد 39 / (23979) عن زكريا بن عدي، عن عبيد الله بن عمرو الرقي، بهذا الإسناد إلَّا أنه لم يذكر فيه الزهري. وانظر تمام تخريجه هناك.وأخرجه بطوله أحمد أيضًا (23971) من طريق هشام بن يوسف، و (23985) من طريق جبير ابن نفير، و (23996) من طريق محمد بن أبي محمد، ثلاثتهم عن عوف بن مالك.وسيأتي عند المصنف برقم (8500) من طريق أبي إدريس الخولاني، و (8508) من طريق الشعبي، كلاهما عن عوف بن مالك. وانظر ما سيأتي أيضًا برقم (8868) بسياقة أخرى من طريق إسحاق بن عبد الله عن عوف. غير نعيم، فإنما أخذه من نعيم، وأنه هو الذي تفرَّد به، والله تعالى أعلم.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 18/ (90)، وفي "مسند الشاميين" (1072)، ومن طريقه الخطيب في "الفقيه والمتفقه" (473)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 62/ 151 عن يحيى بن عثمان بن صالح، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار (2755)، وابن عدي في "الكامل" 7/ 17، وابن بطة في "الإبانة" 1/ 374 و 2/ 621 - 622، وابن عبد البر في "جامع بيان العلم وفضلة" (1673) و (1996) و (1997)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 15/ 421 - 422، والبيهقي في "المدخل إلى السنن الكبرى" (207)، والمصنف فيما سيأتي برقم (8530) من طرق عن نعيم بن حماد به. وانفرد ابن عبد البر فزاد في روايته في الموضعين الأخيرين بين نعيم وعيسى عبدَ الله بنَ المبارك! وقال البزار: هذا الحديث لا نعلم أحدًا حدَّث به إلَّا نعيم بن حماد، ولم يتابع عليه.قلنا: وقد روي من غير وجه عن عيسى بن يونس من طرق لا يخلو واحد منها من مقال واعتبر غير واحد من أهل العلم منهم البيهقي أنَّ مردَّ هذه الطرق إلى نعيم، وأنهم إنما حملوه عنه. وأخرج هذه الطرق عن عيسى بن يونس الخطيبُ البغداديُّ في "تاريخه" 15/ 422 - 424.وقد ذهب محدِّث الشام عبد الرحمن بن إبراهيم دُحيم - كما في "تاريخ أبي زرعة الدمشقي" 1/ 622 - أنَّ المحفوظ في حديث عوف بن مالك ما رواه صفوان بن عمرو السكسكي مثل حديث معاوية، وكأنه يشير إلى ما رواه صفوان عن راشد بن سعد عن عوف بن مالك عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم قال: "افترقت اليهود على إحدى وسبعين فرقة، فواحدة في الجنة، وسبعون في النار" إلى أن قال: "والذي نفسي بيده، لتفترقن أمتي على ثلاث وسبعين فرقة، فواحدة في الجنة وثنتان وسبعون في النار" قيل: يا رسول الله، من هم؟ قال: "الجماعة"، أخرجه ابن ماجه (3992). وقد روي نحوه عن معاوية بن أبي سفيان عند أحمد 28/ (16937) وأبي داود (4597).قال ابن عبد البر: أما ما روي عن السلف في ذم القياس، فهو عندنا قياس على غير أصل، أو قياسُ يُرَدُّ به أصل.
6461 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن محمد البغدادي بنَيسابور، حدثنا يحيى بن عثمان بن صالح السَّهْمي، حدثنا نُعيم بن حمَّاد، حدثنا عيسى بن يونس، عن حَرِيز ابن عثمان، عن عبد الرحمن بن جُبَير بن نُفَير، عن أبيه، عن عوف بن مالك، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "تفترِقُ أمَّتي على بِضْعٍ وسبعين فِرقةً، أعظمُها فتنةً على أمَّتي قومٌ يَقِيسون الأمورَ برأيهم، فيُحِلُّون الحرامَ، ويُحرِّمون الحلالَ" [1]. ذكرُ عبد الله بن الزُّبير بن العوَّام رضي الله عنهما
আওফ ইবন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমার উম্মত সত্তর-এর কিছু বেশি (৭৩) ফের্কায় বিভক্ত হয়ে যাবে। এদের মধ্যে আমার উম্মতের জন্য ফিতনার দিক থেকে সবচেয়ে মারাত্মক হবে সেই সম্প্রদায়, যারা তাদের নিজস্ব মতামত দিয়ে বিষয়সমূহ পরিমাপ করবে (কিয়াস করবে), ফলে তারা হারামকে হালাল করবে এবং হালালকে হারাম করবে।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حديث منكر، نعيم بن حماد صاحب مناكير، وقد عُدَّ هذا الحديث من منكراته، فقد ذكر أبو زرعة الدمشقي في "تاريخه" ص 622 أنه سأل دحيمًا عبد الرحمن بن إبراهيم محدِّث الشام عن حديث نعيم هذا فردَّه، وقال: هذا حديث صفوان بن عمرو حديث معاوية (أي: أنَّ حديث عوف هذا رواه صفوان بن عمرو كحديث معاوية في افتراق الأمة) وسيأتي التنبيه عليه لاحقًا، ثم ذكر أبو زرعة أنه سأل يحيى بن معين عن صحته فأنكره، فسأله: من أين يُؤتى؟ فقال: شُبِّه له. وقال ابن معين مرة أخرى كما في "تاريخ بغداد" 15/ 421: لا أصل له. وممن أنكره أيضًا ابن عدي وعبد الغني بن سعيد الحافظ والبيهقي وابن عبد البر، واعتبروا كلَّ من رواه عن عيسى بن يونس غير نعيم، فإنما أخذه من نعيم، وأنه هو الذي تفرَّد به، والله تعالى أعلم.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 18/ (90)، وفي "مسند الشاميين" (1072)، ومن طريقه الخطيب في "الفقيه والمتفقه" (473)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 62/ 151 عن يحيى بن عثمان بن صالح، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار (2755)، وابن عدي في "الكامل" 7/ 17، وابن بطة في "الإبانة" 1/ 374 و 2/ 621 - 622، وابن عبد البر في "جامع بيان العلم وفضلة" (1673) و (1996) و (1997)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 15/ 421 - 422، والبيهقي في "المدخل إلى السنن الكبرى" (207)، والمصنف فيما سيأتي برقم (8530) من طرق عن نعيم بن حماد به. وانفرد ابن عبد البر فزاد في روايته في الموضعين الأخيرين بين نعيم وعيسى عبدَ الله بنَ المبارك! وقال البزار: هذا الحديث لا نعلم أحدًا حدَّث به إلَّا نعيم بن حماد، ولم يتابع عليه.قلنا: وقد روي من غير وجه عن عيسى بن يونس من طرق لا يخلو واحد منها من مقال واعتبر غير واحد من أهل العلم منهم البيهقي أنَّ مردَّ هذه الطرق إلى نعيم، وأنهم إنما حملوه عنه. وأخرج هذه الطرق عن عيسى بن يونس الخطيبُ البغداديُّ في "تاريخه" 15/ 422 - 424.وقد ذهب محدِّث الشام عبد الرحمن بن إبراهيم دُحيم - كما في "تاريخ أبي زرعة الدمشقي" 1/ 622 - أنَّ المحفوظ في حديث عوف بن مالك ما رواه صفوان بن عمرو السكسكي مثل حديث معاوية، وكأنه يشير إلى ما رواه صفوان عن راشد بن سعد عن عوف بن مالك عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم قال: "افترقت اليهود على إحدى وسبعين فرقة، فواحدة في الجنة، وسبعون في النار" إلى أن قال: "والذي نفسي بيده، لتفترقن أمتي على ثلاث وسبعين فرقة، فواحدة في الجنة وثنتان وسبعون في النار" قيل: يا رسول الله، من هم؟ قال: "الجماعة"، أخرجه ابن ماجه (3992). وقد روي نحوه عن معاوية بن أبي سفيان عند أحمد 28/ (16937) وأبي داود (4597).قال ابن عبد البر: أما ما روي عن السلف في ذم القياس، فهو عندنا قياس على غير أصل، أو قياسُ يُرَدُّ به أصل.
6462 - Null
6462 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حدثني مُصعَب بن عبد الله الزُّبيري قال: أول مولود وُلِدَ بعد الهجرة عبدُ الله ابن الزُّبير بن العوَّام بن خُوَيلد بن أَسد بن عبد العُزَّى، وأمُّه أسماُء بنت أبي بكر الصدّيق، وأمُّها قَتْلة بنت عبد العزَّى بن عبدِ أسد بن نصر بن مالك بن حِسْل بن عامر ابن لؤيّ، وعبد الله يُكنى أبا بكر.
মুসআব ইবনু আবদুল্লাহ আয-যুবাইরী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: হিজরতের পর সর্বপ্রথম যে শিশু ভূমিষ্ঠ হন, তিনি হলেন আবদুল্লাহ ইবনুয যুবাইর ইবনুল আওয়াম ইবনু খুওয়ায়লিদ ইবনু আসাদ ইবনু আবদিল উযযা। তাঁর মা হলেন আসমা বিনতু আবী বকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আর তাঁর (আসমা রাঃ-এর) মা হলেন কিতলা বিনতু আবদিল উযযা ইবনু আবদি আসাদ ইবনু নাসর ইবনু মালিক ইবনু হিসল ইবনু আমির ইবনু লুআই। এবং আবদুল্লাহর কুনিয়াত (উপনাম) ছিল আবূ বকর।
6463 - حدثنا أحمد بن إسحاق الصَّيدلاني، حدثنا السَّرِي بن خُزَيمة، حدثنا سعيد بن سليمان، حدثنا عبَّاد بن العوَّام، عن عُمر بن عامر، عن أم كُلُثوم، عن عائشة: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم سمَّى عبد الله بن الزُّبير عبد الله [1].
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আব্দুল্লাহ ইবনে যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আব্দুল্লাহ নামে অভিহিত করেছিলেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل عمر بن عامر وهو السلمي أبو حفص البصري.وأخرجه بنحوه ابن سعد في "الطبقات" 6/ 475 من طريق سعيد بن أبي عروبة، عن عمر بن عامر، عن صاحب له، عن أم كلثوم، به.وقد روى هذا عن عائشة أيضًا: عروة بن الزُّبير عند ابن حبان (7117)، وابن أبي مليكة عند الترمذي (3826)، وعباد بن حمزة بن عبد الله بن الزُّبير عند أحمد 41 / (24619).ورواه عروة بن الزُّبير وفاطمة بنت المنذر بن الزُّبير عن أسماء بنت أبي بكر أم عبد الله عند مسلم (2146) (25). وانظر الحديث الآتي قريبًا برقم (6466). وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 5/ 1، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3) و (571)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 28/ 145 من طريق أبي نعيم، بهذا الإسناد.
6464 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن محمد البغدادي بنَيسابُور، حدثنا يحيى ابن أيوب العلَّاف بمِضْر، حدثنا سعيد بن أبي مريم، حدثنا يعقوب بن أبي عبَّاد المكي، حدثنا محمد بن مُسلِم الطائفي، عن عمرو بن دينار، عن ابن عبّاس قال: كان التاريخُ في السنة التي قدِمَ فيها النبيُّ صلى الله عليه وسلم المدينة، وفيها وُلِدَ عبدُ الله بن الزُّبير [1].
আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তারিখ (অর্থাৎ ইসলামী সাল গণনা) শুরু হয়েছিল সেই বছর, যে বছর নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদীনায় আগমন করেছিলেন, এবং সেই বছরেই আবদুল্লাহ ইবনে যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জন্মগ্রহণ করেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده حسن. وقد سلف برقم (4332). وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 5/ 1، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3) و (571)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 28/ 145 من طريق أبي نعيم، بهذا الإسناد.
6465 - أخبرنا أبو الحسين علي بن عبد الرحمن السَّبِيعي بالكوفة، حدثنا الحسين بن الحَكَم الحِبَري، حدثنا أبو نُعيم، حدثنا محمد بن شَريك، حدثني ابن أبي مُلَيكة، عن عبد الله بن الزُّبير قال: سُمِّيتُ باسم جدي أبي بكر، وكُنِّيتُ بكُنيته [1]. وكان لعبد الله كُنْيتان: أبو بكر وأبو خُبَيب.
আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার নাম রাখা হয়েছিল আমার নানা আবূ বাকরের নামে এবং আমার কুনিয়াতও (ডাকনাম) রাখা হয়েছিল তাঁর কুনিয়াত অনুসারে। আব্দুল্লাহর দুটি কুনিয়াত ছিল: আবূ বকর এবং আবূ খুবাইব।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده قوي. أبو نعيم: هو الفضل بن دُكَين، وابن أبي مليكة: هو عبد الله بن عبيد الله. وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 5/ 1، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3) و (571)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 28/ 145 من طريق أبي نعيم، بهذا الإسناد.
6466 - أخبرني إسماعيل بن محمد بن الفضل بن محمد الشَّعْراني، حدثنا جدي، حدثنا إبراهيم بن المنذر الحِزَامي، حدثني عبد الله بن محمد بن يحيى بن عُروة بن الزُّبير، حدثني هشام بن عُرْوة، عن أبيه قال: خَرَجَت أسماء بنت أبي بكر حين هاجَرَت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وهي حاملٌ بعبد الله بن الزُّبير، فنُفِسَتْه، فأَتَتْ به النبيَّ صلى الله عليه وسلم ليُحنِّكَه، فأخذه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فَوَضَعَه في حَجْرِه، وأُتِي بتمرة فمَصَّها ثم مَضَعَها، ثم وَضَعَها في فيهِ فحنَّكَه بها، فكان أوَّلَ شيءٍ دخل بطنَه رِيقُ رسول الله صلى الله عليه وسلم، قالت: ثم مَسَحَه رسول الله صلى الله عليه وسلم وسمَّاه عبدَ الله، ثم جاء بعدُ وهو ابنُ سبع سنين أو ابنُ ثمان سنين ليبايعَ النبي صلى الله عليه وسلم، وأَمَره الزُّبير بذلك، فتبسَّم النبيُّ صلى الله عليه وسلم حين رآه مُقبلًا وبايعَهَ.وكان أولَ من وُلِدَ في الإسلام بالمدينة مَقدَمَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، وكانت اليهود تقول: قد أخَّذْناهم [1]، لا يُولَدُ لهم بالمدينة ولدٌ ذكرٌ، فكبَّر أصحابُ رسول الله صلى الله عليه وسلم حسين وُلِدَ عبد الله. وقال عبدُ الله بن عمر بن الخطَّاب حين سمع تكبيرَ أهل الشام وقد قَتَلوا عبدَ الله بنَ الزُّبير: الذين كبَّروا على مولدِه، خيرٌ من الذين كبَّروا على قتلِه [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আসমা বিনতে আবী বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে হিজরত করে মদীনার পথে রওয়ানা হলেন, তখন তিনি আবদুল্লাহ ইবনে যুবায়রকে গর্ভে ধারণ করে ছিলেন। সেখানেই তিনি (আবদুল্লাহকে) প্রসব করলেন। এরপর তিনি শিশুটিকে নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলেন, যেন তিনি তাহনীক করিয়ে দেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে কোলে নিলেন এবং নিজের কোলে রাখলেন। একটি খেজুর আনা হলো। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেটি চুষলেন, তারপর চিবালেন (নরম করলেন), এরপর শিশুটির মুখে রাখলেন এবং তা দিয়ে তাহনীক করালেন। ফলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পবিত্র লালাই ছিল প্রথম জিনিস, যা শিশুটির পেটে প্রবেশ করেছিল। তিনি (আসমা) বলেন: এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে (স্নেহভরে) স্পর্শ করলেন এবং তার নাম রাখলেন আবদুল্লাহ।
এরপর সে যখন সাত বছর অথবা আট বছর বয়সের, তখন সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাতে বাইয়াত করার জন্য এলো। যুবায়র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে এ বিষয়ে নির্দেশ দিয়েছিলেন। যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে আসতে দেখলেন, তখন তিনি মুচকি হাসলেন এবং তাকে বাইয়াত করালেন।
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মদীনায় আগমনের পর ইসলামের মধ্যে সে-ই প্রথম ব্যক্তি, যে সেখানে জন্মগ্রহণ করেছিল। আর ইহুদিরা বলতো, 'আমরা তাদের উপর জাদু করেছি, মদীনায় তাদের কোনো পুত্র সন্তান জন্মগ্রহণ করবে না।' যখন আবদুল্লাহ জন্মগ্রহণ করলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ (খুশিতে) তাকবীর দিলেন।
আবদুল্লাহ ইবনে উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন শুনতে পেলেন যে, শামের লোকেরা আবদুল্লাহ ইবনে যুবায়রকে হত্যা করার পর তাকবীর দিচ্ছে, তখন তিনি বললেন: যারা তার জন্মকালে তাকবীর দিয়েছিল, তারা তার হত্যাকাণ্ডের সময় তাকবীর দানকারীদের চেয়ে উত্তম।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] بالتشديد، التأخيذ: وهو فعل السواحر الأُخْذةَ، وهي نوع من الرُّقية يستخدمها السحرةُ لمنع الرجال عن الجماع. وأخرجه ابن عساكر 28/ 154 من طريق عتيق بن يعقوب، عن عبد الله بن محمد به.وأخرجه بنحوه أحمد 44/ (26938)، والبخاري (3909) و (5469)، ومسلم (2146) (24) من طريق أبي أسامة حماد بن أسامة، ومسلم أيضًا (2145) (25) من طريق شعيب بن إسحاق وعلي بن مسهر، ثلاثتهم عن هشام بن عروة، به. لكن لم يذكر أحدٌ منهم قصة التكبير في آخره وقول ابن عمر عند مقتل ابن الزبير.وانظر ما سيأتي برقم (6552).
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف بمرَّة من أجل عبد الله بن محمد بن يحيى، فهو ضعيف جدًّا صاحب مناكير، وتركه أبو حاتم الرازي كما قال الذهبي في تلخيصه"، لكنه لم ينفرد بهذا الخبر، وباقي رجال الإسناد لا بأس بهم.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (14804) -وعنه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (4132) - وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 28/ 154 - 155 من طريقين عن إبراهيم بن المنذر الحزامي، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن عساكر 28/ 154 من طريق عتيق بن يعقوب، عن عبد الله بن محمد به.وأخرجه بنحوه أحمد 44/ (26938)، والبخاري (3909) و (5469)، ومسلم (2146) (24) من طريق أبي أسامة حماد بن أسامة، ومسلم أيضًا (2145) (25) من طريق شعيب بن إسحاق وعلي بن مسهر، ثلاثتهم عن هشام بن عروة، به. لكن لم يذكر أحدٌ منهم قصة التكبير في آخره وقول ابن عمر عند مقتل ابن الزبير.وانظر ما سيأتي برقم (6552).
6467 - حدثني علي بن عيسى، حدثنا الحسين بن محمد بن زياد، حدثنا محمد ابن ميمون المكِّي ومحمد بن الصَّبّاح قالا: حدثنا سفيان، عن ابن جُرَيج، عن ابن أبي مُلَيكة قال: ذُكِرَ ابن الزُّبيرَ عند ابن عبّاس فقال: كان عفيفًا في الإسلام، قارئًا للقرآن [1]، كان أبوه الزُّبيرَ، وأمُّه أسماءُ، وجدُّه أبو بكر، وعمَّتُه خديجة، وجدَّته صفيَّة، وخالتُه عائشة، واللهِ لأحاسبنَّ له نَفْسي محاسبةً لم أحاسِبْها لأبي بكر ولا لعمر، ولكنه عَمَدَ فآثر عليَّ الحُمَيداتِ والأُساماتِ والتُّويتات [2].قال أبو علي القبَّاني [3]: يريد بالحُمَيدات: حُمَيدَ بن زُهير بن الحارث بن أسد ابن عبد العُزَّى، وتُوَيتٌ ابنُ حَبيب بن أَسد بن العزَّى، وكان الزُّبيرُ ابنَ العوَّام بن خُوَيلد بن أسد بن عبد العزَّى.
আব্দুল্লাহ ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইবন আয-যুবায়ের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আলোচনা তাঁর কাছে করা হলে তিনি বললেন: তিনি ইসলামের মধ্যে ছিলেন পবিত্র (সংযমী), কুরআনের পাঠক। তাঁর পিতা হলেন যুবায়ের, তাঁর মাতা হলেন আসমা, তাঁর দাদা হলেন আবূ বাকর, তাঁর ফুফু হলেন খাদীজা, তাঁর দাদী হলেন সাফিয়্যাহ এবং তাঁর খালা হলেন আয়িশা। আল্লাহর কসম! আমি তাঁর জন্য আমার নফসকে এমনভাবে জবাবদিহিতার সম্মুখীন করব, যা আবূ বাকর বা উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্যেও করিনি। কিন্তু তিনি ইচ্ছা করেই আমার বিপরীতে হুমায়দাত (Humaydat), উসামাত (Usamat) এবং তুওয়াইতাত (Tuwaytat)-দের পছন্দ করেছেন। আবূ আলী আল-ক্বাব্বানী (রাহ) বলেন: 'হুমায়দাত' দ্বারা তিনি বুঝিয়েছেন হুমায়দ ইবন যুহায়র ইবনুল হারিস ইবন আসাদ ইবন আব্দুল উয্যাকে। আর তুওয়াইত হলেন তুওয়াইত ইবন হাবীব ইবন আসাদ ইবনুল উয্যা। আর যুবায়ের ইবনুল আওয়াম ছিলেন খুওয়ায়লিদ ইবন আসাদ ইবন আব্দুল উয্যার পুত্র।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في (ص) و (م) و (ب): قارئًا الله، وبين هاتين الكلمتين في (ص) و (م) بياض، وفي "تلخيص المستدرك" للذهبي: قانتًا لله. وأثبتنا لفظ "للقرآن" من مصادر التخريج.
[2] إسناده صحيح. سفيان: هو ابن عيينة.وأخرجه أبو نعيم في "حلية الأولياء" 1/ 334 - 335، و"معرفة الصحابة" (4137) من طريق محمد ابن إسحاق أبي العبّاس السراج، عن محمد بن الصباح ومحمد بن ميمون، بهذا الإسناد.وأخرجه مختصرًا البخاريّ (4664) عن عبد الله بن محمد، عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. وأخرجه مطولًا البخاري أيضًا (4665) من طريق حجاج بن محمد الأعور، عن ابن جريج، به. وأخرجه بنحوه (4666) من طريق عمر بن سعيد، عن ابن أبي مليكة.
6467 [3] - هو الحسين بن محمد بن زياد نفسه المذكور في الإسناد.
6468 - أخبرنا الشيخ أبو بكر، أخبرنا إسماعيل بن قُتَيبة، حدثنا محمد بن عبد الله بن نُمَير، حدثني أبي، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه قال: مَحا ابنُ الزُّبير نفسَه من الِّديوان حين قُتِلَ عثمانُ [1].
উরওয়াহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে শহীদ করা হলো, তখন ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিজের নাম দীওয়ান (বেতন রেজিস্টার) থেকে মুছে ফেলেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده صحيح.وأخرجه معمر في "جامعه" (20043) عن هشام بن عروة به. وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 6/ 484، والفاكهي في "أخبار مكة" (1665)، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 355، وفي "معرفة الصحابة" (4140)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (3613)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 28/ 177 و 177 - 178 من طرق عن روح بن عبادة بهذا الإسناد. (1) إسناده واهٍ، عمر بن قيس: هو المكي الملقب بسندل، مولى آل الزبير، وهو متروك واهٍ.أبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد.وأخرجه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (4143)، ومن طريقه ابن عساكر 28/ 215 عن أبي حامد بن جبلة، عن محمد بن إسحاق أبي العبّاس السراج، بهذا الإسناد.
6469 - حدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ حدثنا موسى بن هارون، حدثني سعيد بن يحيى بن سعيد الأَمَوي، حدثني أبي، عن الأعمش، عن شِمْر بن عطيَّة، عن هلال بن يَسَاف: حدثني البَرِيدُ الذي أَتى ابنَ الزُّبير برأس المختار، فلما رآه قال ابنُ الزُّبير: ما حدَّثني كعبٌ بحديث إلَّا وجدتُ مِصداقه، إلَّا أنه حدَّثني: أنَّ رجلًا من ثَقيفٍ سيَقتلُني. قال الأعمش وما يَدرِي أنَّ أبا محمدٍ - خَذَلَه الله - خُبِئَ له [1].
হিলাল ইবনে ইয়াসাফ থেকে বর্ণিত, সেই বার্তাবাহক আমাকে জানিয়েছেন, যিনি ইবন আয-যুবাইরের কাছে আল-মুখতারের মাথা নিয়ে এসেছিলেন। যখন তিনি (ইবন আয-যুবাইর) সেটি দেখলেন, তখন তিনি বললেন: "কা'ব আমাকে এমন কোনো কথা বলেননি, যার সত্যতা আমি পাইনি। তবে তিনি আমাকে বলেছিলেন: সাকীফ গোত্রের একজন লোক আমাকে হত্যা করবে।" আল-আ'মাশ বললেন, তিনি (ইবন আয-যুবাইর) জানতেন না যে তার জন্য আবু মুহাম্মাদকে—আল্লাহ তাকে লাঞ্ছিত করুন—লুকিয়ে রাখা হয়েছিল।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] رجاله ثقات غير البريد الذي حدَّث به، فإنه مجهول لم نتبينه. وكعب المذكور: هو كعب الأحبار.وأخرجه نعيم بن حماد في "الفتن" (336)، وابن سعد في "الطبقات" 6/ 485، وابن أبي شيبة 11/ 136 و 15/ 83، والطحاوي في "مشكل الآثار" 7/ 406 من طريق أبي أسامة حماد بن أسامة، عن الأعمش، بهذا الإسناد. ولم يذكر قول الأعمش في آخره سوى الطحاوي.وأخرج نحوه معمر في "جامعه" (20755)، ومن طريقه الطبراني في "الكبير" (14812) عن أيوب السختياني، عن محمد بن سيرين قال: قال ابنُ الزُّبير … وذكره، ثم قال ابن سِيرِين: ولا يشعر أنَّ أبا محمد قد خبئ له؛ يعني الحجاجَ. وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 6/ 484، والفاكهي في "أخبار مكة" (1665)، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 355، وفي "معرفة الصحابة" (4140)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (3613)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 28/ 177 و 177 - 178 من طرق عن روح بن عبادة بهذا الإسناد. (1) إسناده واهٍ، عمر بن قيس: هو المكي الملقب بسندل، مولى آل الزبير، وهو متروك واهٍ.أبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد.وأخرجه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (4143)، ومن طريقه ابن عساكر 28/ 215 عن أبي حامد بن جبلة، عن محمد بن إسحاق أبي العبّاس السراج، بهذا الإسناد.
6470 - أخبرني أبو الحسين بن يعقوب الحافظ، أخبرنا محمد بن إسحاق، حدثنا إسماعيل بن أبي الحارث، حدثنا رَوْح بن عُبادة، حدثنا حَبيب بن الشَّهيد، عن ابن أبي مُلَيكة قال: كان ابن الزُّبير يواصلُ سبعة أيام، فيُصبِحُ يومَ الثالث وهو أَليَثُنا. يعني به كأنه لَيثٌ [1].
ইবনু আবী মুলাইকা থেকে বর্ণিত, ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাত দিন ধরে একটানা রোযা (বিরামহীনভাবে) পালন করতেন। এরপরও তিনি তৃতীয় দিন সকালে এমন অবস্থায় উঠতেন যে, তিনি আমাদের মধ্যে সবচেয়ে শক্তিশালী ও সাহসী হতেন। অর্থাৎ, তিনি যেন ছিলেন সিংহের মতো।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده صحيح. وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 6/ 484، والفاكهي في "أخبار مكة" (1665)، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 355، وفي "معرفة الصحابة" (4140)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (3613)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 28/ 177 و 177 - 178 من طرق عن روح بن عبادة بهذا الإسناد. (1) إسناده واهٍ، عمر بن قيس: هو المكي الملقب بسندل، مولى آل الزبير، وهو متروك واهٍ.أبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد.وأخرجه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (4143)، ومن طريقه ابن عساكر 28/ 215 عن أبي حامد بن جبلة، عن محمد بن إسحاق أبي العبّاس السراج، بهذا الإسناد.
6471 - Null
6471 - وأخبرني أبو الحسين، حدثنا محمد بن إسحاق، حدثنا أحمد بن سعيد الدارمي، حدثنا أبو عاصم، عن عمر بن قيس قال: كان لابن الزُّبير مئةُ غلام، يتكلَّمُ كلُّ غلام منهم بلُغةٍ أخرى، فكان ابن الزُّبير يُكلِّم كلَّ واحد منهم بلُغَته، وكنتُ إذا نَظَرتُ إليه في أمر دُنْياه قلت: هذا رجل لم يُردِ الله طَرْفةَ عينٍ، وإذا نظرتُ إليه في أمر آخرتِه، قلت: هذا رجل لم يُرِدِ الدنيا طَرْفةَ عينٍ (1).
উমর ইবন কায়স থেকে বর্ণিত, ইবন আয-যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর একশো জন গোলাম ছিল। তাদের প্রত্যেকে ভিন্ন ভিন্ন ভাষায় কথা বলত। ইবন আয-যুবাইর তাদের প্রত্যেকের সাথে তাদের নিজস্ব ভাষায় কথা বলতেন। আমি যখন তাঁকে (ইবন আয-যুবাইরকে) তাঁর দুনিয়াবী কাজে দেখতাম, তখন বলতাম: এই ব্যক্তি মুহূর্তের জন্যও আল্লাহকে চাননি। আর যখন তাঁকে তাঁর আখিরাতের (পরকালের) কাজে দেখতাম, তখন বলতাম: এই ব্যক্তি মুহূর্তের জন্যও দুনিয়াকে চাননি।
6472 - أخبرني أبو العبّاس السَّيّاري، حدثنا محمد بن موسى بن حاتم، حدثنا علي بن الحسن بن شَقِيق، حدثنا نافع بن عمر، عن ابن أبي مُلَيكة قال: قال لي عمر بن عبد العزيز: إنَّ في قلبك من ابن الزُّبير، قال: قلت: ما رأيتُ مُناجيًا مثلَه، ولا مصلِّيًا مثله، ولا أخشنَ [1] في ذاتِ الله مثله، ولا أسخى نفسًا منه [2].
ইবনু আবী মুলাইকা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উমার ইবনু আব্দুল আযীয (রাহিমাহুল্লাহ) আমাকে বললেন, ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর প্রতি আপনার অন্তরে (বিশেষ) কিছু আছে (আপনি তাঁকে খুব ভালোবাসেন)। তিনি বলেন, আমি বললাম: আমি তাঁর মতো কাউকে একান্তে মুনাজাত করতে দেখিনি, আর তাঁর মতো কাউকে সালাত আদায় করতে দেখিনি, আর আল্লাহর বিষয়ে তাঁর মতো কঠোর (বা দৃঢ়) কাউকে দেখিনি, আর তাঁর চেয়ে উদার আত্মার অধিকারী কাউকে দেখিনি।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] كذا في (ص) و (ب)، وفي (م) و "تلخيص الذهبي": أخشى. هو مولّى لقريش، بصري نزل دمشق، وهو ثقة من أصحاب هشام بن عروة.
[2] إسناده صحيح.وأخرجه مختصرًا أبو نعيم في "الحلية" 1/ 335، و"معرفة الصحابة" (4139)، ومن طريقه ابن عساكر 28/ 171 من طريق أحمد بن سعيد الدارمي، عن علي بن الحسن بن شقيق، بهذا الإسناد. هو مولّى لقريش، بصري نزل دمشق، وهو ثقة من أصحاب هشام بن عروة.
6473 - حدثنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا الحسن بن علي بن بحر البَرِّي، حدثني أبي، حدثنا شعيب بن أبي إسحاق السَّبيعي [1]، حدثنا هشام بن عُرْوة، عن أبيه: أنَّ يزيد بن معاوية كتب إلى عبد الله بن الزُّبير: إني قد بعثتُ إليك بسلسلةٍ من فضَّة، وقيدٍ من ذهب، وجامعةٍ من فضة، وحَلَفْتُ لَتأتيَنِّي في ذلك، قال: فأَلقى الكتابَ وقال:ولا أَلِينُ لغيرِ الحقِّ أَنمَلةً … حتى يَلينَ لضِرسِ الماضغِ الحَجَرُ [2]
আব্দুল্লাহ ইবনুল যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইয়াযিদ ইবনু মু'আবিয়া আব্দুল্লাহ ইবনু যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লিখলেন: "আমি আপনার কাছে রূপার শেকল, সোনার বেড়ি এবং রূপার একটি জোয়াল (গলায় পরার জন্য) পাঠিয়েছি, এবং আমি কসম করেছি যে, আপনি অবশ্যই এ অবস্থায় আমার কাছে আসবেন।" (আব্দুল্লাহ ইবনু যুবাইর) চিঠিটি ফেলে দিলেন এবং বললেন:
"সত্য ব্যতীত অন্য কিছুর জন্য আমি এক চুলও নরম হব না,
যতক্ষণ পর্যন্ত চর্বণকারীর দাঁতের কাছে পাথর নরম না হয়।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في النسخ الخطية: سعيد بن أبي إسحاق السبيعي، تحرَّف شعيب إلى: سعيد، وفي بقية اسمه وهمٌ أو خطأ من النساخ، فالصواب في اسمه: شعيب بن إسحاق، وليس هو سبيعي، إنما هو مولّى لقريش، بصري نزل دمشق، وهو ثقة من أصحاب هشام بن عروة.
[2] إسناده صحيح.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (585) - ومن طريقه أبو نعيم في "الحلية" 1/ 331 - وابن عساكر 28/ 209 من طرق عن شعيب بن إسحاق بهذا الإسناد. وانظر ما بعده.
6474 - أخبرني أبو عبد الله محمد بن علي بن عبد الحميد الصَّنعاني بمكة حرسها الله تعالى، حدثنا علي بن المبارَك الصَّنعاني [حدثنا زيد بن المبارك] [1] حدثنا عبد الملك بن عبد الرحمن الذِّمَاري، حدثنا القاسم بن مَعْن، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه قال: لما مات معاويةُ تَثاقَلَ عبد الله بن الزُّبير عن طاعةِ يزيد بن معاوية، وأَظهَرَ شَتْمَه، فبلغ ذلك يزيد، فأقسَمَ لا يُؤتى به إلَّا مغلولًا، ولا أُرسِلُ إليه، فقيل لا بن الزُّبير: ألا نَصنعُ لك أغلالًا من فضة تَلْبَسُ عليها الثوب وتَبَرُّ قَسَمَه؟ فالصلحُ، أجملُ، فقال: لا أَبَرَّ الله قسمَه، ثم قال:ولا أَلِينُ لغير الحقِّ أَنمَلةً … حتى يَلينَ لضِرسِ الماضعِ الحَجَرُثم قال: والله لَضربةٌ بسيفٍ في عزٍّ، أحبُّ إليَّ من ضربةٍ بسوطٍ في ذُلّ.ثم دعا إلى نفسه وأظهَرَ الخلافَ ليزيد بن معاوية، فوجَّه إليه يزيدُ بن معاوية مسلمَ بن عُقْبة المُرِّي [2] في جيش أهل الشام، وأمَرَه بقتال أهل المدينة، فإذا فَرَغَ من ذلك سارَ إلى مكة. قال: فدخل مسلم بن عُقْبة المدينةَ، وهرب منه يومئذٍ بقايا أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، وعَبَثَ فيها وأسرَفَ في القتل، ثم خرج منها، فلما كان في بعض الطريق إلى مكة مات، واستَخلَفَ حُصَين بن نُمير الكِنْدي وقال له: يا بَرذَعَةَ الحمارِ، احذَرْ خدائعَ قُريش، ولا تُعامِلْهم إلَّا بالنِّقَاف [3]، ثم القِطَاف، فمضى حُصينٌ حتى وَرَدَ مكة، فقاتل بها ابنَ الزُّبير أيامًا [4].
উরওয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন মুআবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মৃত্যু হলো, তখন আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইয়াযীদ ইবনু মুআবিয়াহ-এর আনুগত্য করতে অনীহা দেখালেন এবং প্রকাশ্যে তার নিন্দা করতে শুরু করলেন। এই খবর ইয়াযীদের কাছে পৌঁছাল। সে কসম খেল যে, তাকে (ইবনুয যুবাইরকে) শৃঙ্খলিত করে আনা ছাড়া সে শান্তি পাবে না এবং তার কাছে কাউকে পাঠাবেও না।
তখন ইবনুয যুবাইরকে বলা হলো: আমরা কি আপনার জন্য রূপার শেকল তৈরি করে দেব না? যা আপনি কাপড়ের নিচে পরিধান করবেন এবং এভাবে তার (ইয়াযীদের) কসম রক্ষা হবে? কেননা সন্ধি করাই উত্তম।
তিনি (ইবনুয যুবাইর) বললেন: আল্লাহ যেন তার কসম পূরণ না করেন। অতঃপর তিনি বললেন:
"সত্য ছাড়া আর কারও কাছে আমি সামান্যও নমনীয় হব না,
যতক্ষণ না চর্বণকারীর দাঁতের জন্য পাথর নরম হয়ে যায়।"
অতঃপর তিনি বললেন: আল্লাহর কসম, সম্মানের সাথে তরবারির একটি আঘাত আমার কাছে অপমানের সাথে চাবুকের আঘাতের চেয়েও বেশি প্রিয়।
এরপর তিনি নিজের দিকে আহ্বান করলেন এবং ইয়াযীদ ইবনু মুআবিয়াহ-এর বিরোধিতা প্রকাশ করলেন। তখন ইয়াযীদ ইবনু মুআবিয়াহ সিরিয়াবাসীর এক সেনাবাহিনীসহ মুসলিম ইবনু উকবাহ আল-মুররিকে তার (ইবনুয যুবাইর-এর) দিকে প্রেরণ করল এবং তাকে মদীনার অধিবাসীদের সাথে যুদ্ধ করার নির্দেশ দিল। যখন সে তা থেকে ফারেগ হবে, তখন যেন মক্কার দিকে রওনা হয়।
তিনি (উরওয়াহ) বললেন: অতঃপর মুসলিম ইবনু উকবাহ মদীনায় প্রবেশ করল এবং সে সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অবশিষ্ট সাহাবীগণ তার থেকে পালিয়ে গেলেন। সে মদীনায় বিপর্যয় সৃষ্টি করল এবং নির্বিচারে হত্যাযজ্ঞ চালাল। এরপর সেখান থেকে বের হলো। মক্কার পথে কিছুদূর যাওয়ার পর সে (মুসলিম ইবনু উকবাহ) মারা গেল। সে হুসাইন ইবনু নুমাইর আল-কিন্দিকে তার স্থলাভিষিক্ত করল এবং তাকে বলল: হে গাধার পিঠের বস্তা! তুমি কুরাইশদের প্রতারণা থেকে সতর্ক থেকো। তাদের সাথে প্রথমে শুধু আঘাত (নিকাফ) এবং তারপর দ্রুত নির্মূল (কিতাফ) ছাড়া অন্য কোনো আচরণ করো না।
অতঃপর হুসাইন ইবনু নুমাইর মক্কার দিকে অগ্রসর হলো এবং সেখানে ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে বেশ কয়েক দিন যুদ্ধ করল।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] سقط من نسخنا الخطية واستدركناه من مصادر التخريج.
[2] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: المزني، وإنما هو المرِّي، فإنه من بني مُرَّة بن عوف بن سعد ابن ذبيان انظر "تاريخ دمشق" 58/ 102.
6474 [3] - النِّقاف: الضرب بالسيوف على الرؤوس.
6474 [4] - إسناده محتمل للتحسين من أجل عبد الملك بن عبد الرحمن الذماري ومن دونه من الصنعايين، لكن في بعض ألفاظه نكارة كحزِّ رأس ابن الزبير في آخره.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (14813)، ومن طريقه أبو نعيم في "الحلية" 1/ 331 - 332، و"معرفة الصحابة" (4144)، وابن عساكر 28/ 229 عن علي بن المبارك الصنعاني، عن زيد ابن المبارك، بهذا الإسناد.وأخرجه الفاكهي في "أخبار مكة" (1652) وما بعده من طريق مهدي بن أبي مهدي، عن عبد الملك الذماري، به.وستأتي تتمة الخبر بعد الذي يليه.
6475 - فحدثنا أبو عبد الله الأصبهاني، حدثنا الحسن بن الجَهْم، حدثنا الحسين ابن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر، حدثني مَسلَمةُ بن عبد الله بن عُرْوة بن الزُّبير قال: سمعتُ أَبي يقول: أَرسلَ ابنُ الزُّبير إلى الحُصَين بن نُمير يدعوه إلى البراز، فقال الحُصين: لا يَمنعُني من لقائك جُبْنٌ، ولستُ أدري لمن يكون الظَّفَرُ، فإن كان لك كنتُ قد ضيَّعتَ مَن ورائي، وإن كان لي كنتُ قد أخطأتُ التدبير، وإن ظَفِرتُ [1].6474 م - رَجَعْنا إلى باقي الحديث [2]: وضَرَبَ ابنُ الزُّبير فسطاطًا في المسجد، فكان فيه نساءٌ يَسقِينَ الجرحى ويُداوينَهم ويُطعِمنَ الجائع، ويَكمُنُ إليهنَّ المجروحُ، فقال حُصَين: ما يزالُ يخرج علينا من ذلك الفُسطاطِ أسدٌ كأنما يخرج من عَرينِه، فمن يَكِفنيهِ؟ فقال رجل من أهل الشام: أنا، فلما جَنَّ عليه الليلُ وَضَعَ شمعةً في طرف رمحه ثم ضرب فرسَه، ثم طَعَنَ الفسطاطَ فالتهَبَ نارًا، والكعبةُ يومئذٍ مُؤَزَّرة في الطَّنافس، وعلى أعلاها الحِبَرَةُ، فطارت الريحُ باللَّهَب على الكعبة حتى احترقت، واحترق فيها يومئذٍ قَرْنا الكبش الذي فُدِيَ به إسحاق.قال: فبلَغَ حُصينَ بن نُمير موتُ يزيد بن معاوية، فهرب حصينُ بنُ نُمير، فلما مات يزيدُ بن معاوية دعا مروانُ بن الحَكَم إلى نفسه، فأجابه أهلُ حِمْص وأهلُ الأردنِّ وفلسطينَ، فوَجَّه إليه ابنُ الزُّبير الضحاكَ بنَ قيس الفِهْريَّ في مئة ألف، فالتقَوْا بمَرْجِ راهطٍ، ومروانُ يومئذٍ في خمسة آلاف من بني أُميَّة ومَواليهِم وأتباعهم من أهل الشام، فقال مروانُ لمولًى له [يقال له] [3]: كره: احمِلْ على أيِّ الطَّرفين شئتَ، فقال: كيف نَحملُ على هؤلاء؟! لكَثرتِهم، فقال: هم بين مُكرهٍ ومُستأجَر، احمِلْ عليهم لا أمَّ لك، فيكفيك الطِّعانُ الناجعُ الجيِّد، وهم يَكفُونك بأنفسهم، إنما هؤلاء عَبيدُ الدينار والدِّرهم، فحَمَلَ عليهم فهَزَمَهم، وقُتِل الضحاكُ بن قيس وانصَدَعَ الجيشُ، ففي ذلك يقول زُفَرُ بنُ الحارث:لَعَمْري لقد أبقَتْ وَقِيعةُ راهطٍ … لمروانَ صَرْعى واقعاتٍ وسابَيَاأَمضي سلاحي لا أبالكِ إنني … لدى الحربِ لا يزداد إلَّا تمادِيَافقد يَنبُت المَرْعى على دِمَنِ الثَّرى … وتبقى حُزازاتُ النفوسِ كماوفيه يقول أيضًا:أفي الحقِّ أمَّا بَحدلٌ وابنُ بَحدلٍ … فيَحْيا وأمَّا ابنُ الزُّبير فيُقتَلُكَذَبتم وبيتِ الله لا تَقتلونَهُ … ولمَّا يَكُنْ يومٌ أَغَرُّ مُحجَّلُولمَّا يكنْ للمَشْرَفِيَّةِ فيكمُ … شُعاعٌ كنُورِ الشمسِ حين تَرجَّلُ قال: ثم مات مروانُ، فدعا عبدُ الملك إلى نفسه وقام، فأجابه أهلُ الشام، فخَطَبَ على المنبر وقال: مَن لابن الزُّبير؟ فقال الحجَّاج: أنا يا أميرَ المؤمنين، فأسكَتَه، ثم عاد فأسكَتَه، ثم عاد فقال: أنا له يا أميرَ المؤمنين، فإني رأيتُ في المنام كأني انتزعتُ جُبَّتَه فلَبِستُها. فعَقَدَ له ووَجَّهه في الجيش إلى مكة - حَرسها الله تعالى- حتى وَرَدَها على ابن الزُّبير فقاتله بها، فقال ابنُ الزبير لأهل مكة: احفَظُوا هذين الجبلين، فإنكم لن تَزالوا بخير أعزَّةً ما لم يَظهَروا عليهما، قال: فلم يَلبَثُوا أَن ظَهَرَ الحَجَّاجُ ومَن معه على أبي قُبيس، ونَصَبَ عليه المَنجَنيقَ، فكان يرمي به ابنَ الزبير ومن معه في المسجد، فلما كان الغَدَاةُ التي قُتِلَ فيها ابنُ الزُّبير، دَخَلَ ابنُ الزُّبير على أمِّه أسماءَ بنت أبي بكر، وهي يومئذٍ بنتُ مئة سنةٍ لم يَسقُطْ لها سنٌّ، ولم يَفسُدْ لها بصرٌ ولا سمعٌ، فقالت لابنها: يا عبد الله، ما فعلتَ في حربِك؟ قال: بَلَغُوا مكانَ كذا وكذا، قال: وضَحِكَ ابنُ الزبير وقال: إنَّ في الموت لراحةً، فقالت: يا بنيَّ، لعلَّك تتمنَّاه لي؟! ما أُحِبُّ أن أموتَ حتى آتيَ على أحدِ طَرَفَيك، إمَّا أن تَملِكَ [4] فتَقَرَّ بذلك عيني، وإمَّا أن تُقتَل فأَحتسِبَك، قال: ثم ودَّعها، فقالت له: يا بنيَّ، إياك أن تُعطِيَ خَصْلةً من دِينِك مخافةَ القتل. وخَرَج عنها فدَخَل المسجد، وقد جعل مِصراعَينِ على الحجر الأسود يتَّقي أن يصيبَه المَنجنيقُ.وأتى ابن الزُّبير آتٍ وهو جالسٌ عند زمزمَ فقال له: ألا نفتحُ لك الكعبةَ فتصعدَ فيها، فنظر إليه عبدُ الله ثم قال له: من كل شيءٍ تَحفَظُ أخاك إِلَّا من نفسه. يعني من أجَلِه- وهل للكعبة حُرْمةٌ ليست لهذا المكان؟! والله لو وَجَدُوكم مُعلَّقِين بأستار الكعبةِ لقَتَلوُكم، فقيل له: ألا تكلِّمُهم في الصُّلح؟ فقال: أوَحِينُ صُلحٍ هذا؟! والله لو وَجَدُوكم في جوفها لذَبَحُوكم جميعًا، ثم أنشأَ يقول:ولستُ بمبتاعِ الحياةِ لسُبَّةٍ … ولا مُرتَقٍ من خَشْية الموتِ سُلَّما أُنافسُ [سَهمًا] إِنَّه غيرُ نازحٍ … مُلَاقِي المَنَايَا أَيَّ صَرْفٍ تَيمَّماثم أقبل على آل الزبير يَعِظُهم: ليَكُنَّ أحدكم سيفه كما يَكُنُّ وجهَه، لا يُنكِّسْ سيفَه فيدفعَ عن نفسه بيده كأنه امرأةٌ، والله ما لَقِيتُ زَحْفًا قطُّ إلَّا في الرَّعيل الأول، ولا أَلمِتُ جُرحًا قطُّ إلَّا أن آلَمَ الدواء.قال: فبينما هم كذلك إذ دخل عليهم نفرٌ من [باب] بني جُمَحَ فيهم أسوَدُ، فقال: مَن هؤلاءِ؟ قيل: أهلُ حِمص، فحَمَل عليهم ومعه سبعون، فأولُ من لقيَه الأسودُ، فضربه بسيفه حتى أطَنَّ رِجلَه، فقال له الأسود: آهٍ يا ابنَ الزانية، فقال له ابنُ الزُّبير: اخسأْ يا ابن حامٍ، لَأسماءُ زانيةٌ؟! ثم أخرَجَهم من المسجد، فانصرف، فإذا بقومٍ قد دَخَلوا من باب بني سَهْم، فقال: من هؤلاء؟ فقيل: أهلُ الأُردنِّ، فحَمَلَ عليهم وهو يقول:لا عهدَ لي بغَارةٍ مثلِ السَّيلْ … لا يَنجِلي غُبارُها حتَّى اللَّيلْقال: فأخرجهم من المسجد، ثم رجع، فإذا بقوم قد دَخَلوا من باب بني مخزوم، فحَمَل عليهم وهو يقول:لو كان قِرْني واحدًا لكَفَيتُهُقال: وعلى ظَهْر المسجد من أعوانِه مَن يرمي عدوَّه بالآجُرِّ وغيره، فحَمَلَ عليهم، فأصابته آجُرَّةٌ في مَفرِقِه حتى فَلَقَت رأسَه، فوقف قائمًا وهو يقول:ولسنا على الأعقابِ تَدْمي كُلُومُنا … ولكِنْ على أقدامِنا تَقطُرُ الدِّمَاقال: ثم وقع فأكَبَّ عليه مَولَيانِ له وهما يقولان:العبدُ يَحْمي ربَّهُ ويَحتميقال: ثم سِيرَ إليه فحُزَّ رأسُه، رضي الله عنه.
মাসলামা ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে উরওয়াহ ইবনূয যুবাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার পিতাকে বলতে শুনেছি যে, ইবনূয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হুসাইন ইবনে নুমাইরের কাছে লোক পাঠিয়ে তাকে একক যুদ্ধের (বারায) জন্য আহ্বান জানালেন। তখন হুসাইন বলল: কাপুরুষতা আমাকে তোমার সাথে সাক্ষাৎ করা থেকে বিরত রাখছে না, কিন্তু আমি জানি না বিজয় কার হবে। যদি বিজয় তোমার হয়, তবে আমি আমার পেছনে যাদের রেখে এসেছি, তাদের প্রতি দায়িত্বে অবহেলা করব। আর যদি বিজয় আমার হয়, তবুও আমি ভুল পরিকল্পনা গ্রহণকারী হিসেবে বিবেচিত হব।
[৬৪২৪ মি] আমরা বাকি হাদীসের দিকে ফিরে এলাম: ইবনূয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মাসজিদুল হারামের মধ্যে একটি তাঁবু (ফুসতাত) স্থাপন করলেন। সেখানে নারীরা আহতদের পানি পান করাতেন, তাদের সেবা করতেন এবং ক্ষুধার্তদের খাবার দিতেন। আহত ব্যক্তিরা সেখানে আশ্রয় নিত। হুসাইন (ইবনে নুমাইর) বলল: ঐ তাঁবুটি থেকে একজন সিংহ ক্রমাগত আমাদের উপর বেরিয়ে আসছে, যেন সে তার গুহা থেকে বের হচ্ছে। কে আমার জন্য তাকে প্রতিরোধ করবে? তখন শামের (সিরিয়ার) এক ব্যক্তি বলল: আমি।
যখন তার উপর রাত ঘনিয়ে এলো, তখন সে তার বর্শার ডগায় একটি মোমবাতি লাগাল, তারপর তার ঘোড়াকে আঘাত করে দৌঁড়াল এবং তাঁবুটিতে আঘাত করল, ফলে তা জ্বলে উঠল। ঐ দিন কা‘বা ঘরের চারদিকে তখন মোটা কাপড়ের আস্তরণ দেওয়া ছিল এবং উপরে ছিল নকশা করা চাদর (হিবরাহ)। বাতাস সেই আগুনকে কাবা ঘরের দিকে উড়িয়ে নিয়ে গেল, ফলে কা‘বাও পুড়ে গেল। ঐ দিন ইসহাক (আঃ)-এর বিনিময়ে কুরবানি দেওয়া ভেড়ার সেই দুটি শিংও পুড়ে গিয়েছিল।
বর্ণনাকারী বলেন: হুসাইন ইবনে নুমাইরের কাছে ইয়াযীদ ইবনে মু‘আবিয়ার মৃত্যুর খবর পৌঁছাল, ফলে হুসাইন ইবনে নুমাইর পালিয়ে গেল। ইয়াযীদ ইবনে মু‘আবিয়া মারা যাওয়ার পর মারওয়ান ইবনুল হাকাম নিজেকে খিলাফতের জন্য আহ্বান জানালেন। হিমস, জর্ডান এবং ফিলিস্তিনের লোকেরা তাকে সাড়া দিল। ইবনূয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার বিরুদ্ধে এক লক্ষ সৈন্যের এক বিশাল বাহিনী নিয়ে দাহহাক ইবনে কায়স আল-ফিহরীকে পাঠালেন। মার্জে রাহিত নামক স্থানে তাদের সাক্ষাৎ হলো। ঐ সময় মারওয়ানের সাথে বনু উমাইয়া, তাদের মাওলাগণ এবং শামের অনুসারীসহ মাত্র পাঁচ হাজার লোক ছিল।
মারওয়ান তার এক মাওলাকে [যাকে কারাহ বলা হত] বললেন: তুমি তোমার পছন্দ মতো যেকোনো দিকে আক্রমণ করো। সে বলল: তাদের বিপুল সংখ্যক থাকার কারণে আমরা কীভাবে তাদের উপর আক্রমণ করব?! মারওয়ান বললেন: তারা তো দ্বিধাগ্রস্ত, হয় জোর করে আনা অথবা ভাড়া করা লোক। তাদের উপর আক্রমণ করো, তোমার মা যেন শোকগ্রস্ত না হয়! ফলপ্রসূ ও ভালো আক্রমণই তোমার জন্য যথেষ্ট হবে এবং তারা নিজেরাই নিজেদের জন্য যথেষ্ট হবে (অর্থাৎ ভেঙে পড়বে)। এরা তো দিনার ও দিরহামের গোলাম মাত্র।
সুতরাং, সে তাদের উপর আক্রমণ করল এবং তাদের পরাজিত করল। দাহহাক ইবনে কায়স নিহত হলেন এবং বাহিনী ছত্রভঙ্গ হয়ে গেল। এই বিষয়ে যুফার ইবনুল হারিস বলেন:
আমার জীবনের শপথ, রাহিতের ঘটনা মারওয়ানের জন্য...
নিহত ও বন্দীদের ফেলে রেখেছে।
আমি আমার অস্ত্র ধার দিই, আমি তোমাকে ভয় করি না, কারণ যুদ্ধের সময়...
আমি শুধু আমার দৃঢ়তাই বৃদ্ধি করি।
মাটির স্তূপের উপরে অবশ্যই তৃণ জন্মায়...
কিন্তু অন্তরের বিদ্বেষগুলো থেকেই যায়।
এ বিষয়ে তিনি আরো বলেন:
এটা কি সঠিক যে বাহদাল ও ইবনে বাহদাল বেঁচে থাকবে...
আর ইবনূয যুবাইরকে হত্যা করা হবে?
আল্লাহর ঘরের শপথ, তোমরা মিথ্যা বলছো, তোমরা তাকে হত্যা করতে পারবে না...
যতক্ষণ না এক উজ্জ্বল, শুভ্র দিন আসে।
আর তোমাদের মধ্যে মাশরাফিয়া (তলোয়ার) না ঝলসে ওঠে...
যেন সূর্য যখন অস্ত যায় তার আলোর মতো।
বর্ণনাকারী বললেন: এরপর মারওয়ান মারা গেলেন। আব্দুল মালিক নিজেকে খিলাফতের জন্য আহ্বান জানালেন এবং ক্ষমতা গ্রহণ করলেন। শামের লোকেরা তাকে সাড়া দিল। তিনি মিম্বরে দাঁড়িয়ে খুতবা দিলেন এবং বললেন: ইবনূয যুবাইরের জন্য কে আছ? তখন হাজ্জাজ বলল: আমি আছি, হে আমীরুল মু'মিনীন। তিনি তাকে নীরব থাকতে বললেন। সে আবার বলল, তিনি আবারও তাকে নীরব করলেন। সে তৃতীয়বার বলল: আমি তার জন্য আছি, হে আমীরুল মু'মিনীন। আমি স্বপ্নে দেখেছি যে আমি তার জুব্বা (পোশাক) খুলে নিয়েছি এবং তা পরিধান করেছি।
সুতরাং, তিনি তাকে চুক্তি দিলেন এবং মক্কা—আল্লাহ এটিকে রক্ষা করুন—এর উদ্দেশ্যে তাকে এক বাহিনীর সাথে পাঠালেন, যতক্ষণ না সে সেখানে ইবনূয যুবাইরের কাছে পৌঁছাল এবং তার সাথে যুদ্ধ শুরু করল।
ইবনূয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মক্কাবাসীদের বললেন: তোমরা এই দুটি পর্বতকে রক্ষা করো, কারণ যতক্ষণ না তারা এগুলোর উপর কর্তৃত্ব লাভ করে, ততক্ষণ তোমরা সম্মানিত ও কল্যাণের সাথে থাকবে।
শীঘ্রই হাজ্জাজ এবং তার সাথীরা আবু কুবাইস পাহাড়ের উপরে আবির্ভূত হলো। সে সেখানে ক্ষেপণাস্ত্র (মানজানিক) স্থাপন করল এবং তা দ্বারা মাসজিদে অবস্থানরত ইবনূয যুবাইর ও তার সাথীদের লক্ষ্য করে নিক্ষেপ করতে লাগল।
যে ভোরে ইবনূয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিহত হলেন, সেই ভোরে তিনি তাঁর মা আসমা বিনতে আবি বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলেন। তখন তাঁর বয়স একশো বছর ছিল, কিন্তু তাঁর কোনো দাঁত পড়েনি এবং তাঁর দৃষ্টি বা শ্রবণশক্তি নষ্ট হয়নি। তিনি তাঁর ছেলেকে বললেন: হে আব্দুল্লাহ, তোমার যুদ্ধে কী করলে? তিনি বললেন: তারা অমুক অমুক জায়গায় পৌঁছে গেছে। ইবনূয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাসলেন এবং বললেন: নিশ্চয়ই মৃত্যুতে স্বস্তি আছে।
তিনি বললেন: হে আমার পুত্র, সম্ভবত তুমি কি আমার জন্য মৃত্যু কামনা করছো?! আমি মরতে চাই না যতক্ষণ না আমি তোমার দুই অবস্থার মধ্যে একটি দেখি। হয় তুমি শাসক হবে, যাতে আমার চোখ শীতল হয়, অথবা তুমি নিহত হবে, আর আমি তোমার জন্য আল্লাহর কাছে সওয়াব কামনা করব। এরপর তিনি তাঁকে বিদায় জানালেন। তিনি তাঁকে বললেন: হে আমার পুত্র, হত্যার ভয়ে তোমার দ্বীনের কোনো অংশ ছাড়তে যেও না।
তিনি সেখান থেকে বেরিয়ে মসজিদে প্রবেশ করলেন। তিনি হাজরে আসওয়াদের উপর দুটি কাঠের কপাট স্থাপন করেছিলেন, যাতে মানজানিকের আঘাত থেকে তা রক্ষা পায়।
তিনি যখন যমযমের পাশে বসেছিলেন, তখন একজন লোক এসে তাঁকে বললেন: আমরা কি আপনার জন্য কা‘বা ঘর খুলে দেব, যাতে আপনি তার উপরে আরোহণ করতে পারেন? আব্দুল্লাহ তার দিকে তাকালেন, তারপর তাকে বললেন: মানুষ তার ভাইকে সবকিছু থেকে রক্ষা করে, কিন্তু তার নিজের ভাগ্য থেকে (অর্থাৎ মৃত্যু থেকে) রক্ষা করে না। এই স্থানের চেয়ে কা‘বার এমন কী মর্যাদা আছে? আল্লাহর কসম, তারা যদি তোমাদেরকে কা‘বার পর্দার সাথে ঝুলে থাকতেও দেখে, তবুও তারা তোমাদের হত্যা করবে।
তাকে জিজ্ঞেস করা হলো: আপনি কি তাদের সাথে সন্ধির বিষয়ে কথা বলবেন না? তিনি বললেন: এটা কি সন্ধির সময়?! আল্লাহর কসম, তারা যদি তোমাদের এর অভ্যন্তরেও খুঁজে পায়, তবে তোমাদের সবাইকে জবাই করবে। এরপর তিনি কবিতা আবৃত্তি শুরু করলেন:
অপমানের বিনিময়ে জীবন ক্রয়কারী আমি নই...
আর মৃত্যুর ভয়ে সিঁড়ি বেয়ে উপরে ওঠা ব্যক্তিও আমি নই।
আমি আমার ভাগ্যের জন্য প্রতিযোগিতা করি, তা সুদূর নয়...
মৃত্যুর সাথে সাক্ষাৎ করতেই হবে, যে দিকেই সে মোড় নিক।
এরপর তিনি যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পরিবারের দিকে মনোনিবেশ করে তাদের উপদেশ দিতে লাগলেন: তোমাদের প্রত্যেকের উচিত তার তলোয়ারকে সেভাবে আবৃত রাখা, যেভাবে সে তার মুখমণ্ডলকে আবৃত রাখে। সে যেন তার তলোয়ার নিচু না করে এবং নারীর মতো হাত দিয়ে নিজেকে রক্ষা না করে। আল্লাহর কসম, আমি কখনোই প্রথম সারিতে না থেকে কোনো যুদ্ধের সম্মুখীন হইনি, আর ওষুধের ব্যথা ছাড়া কোনো আঘাতের ব্যথায় কষ্ট পাইনি।
তারা যখন এই অবস্থায় ছিলেন, তখন বানু জুমাহ গোত্রের দরজা দিয়ে একদল লোক প্রবেশ করল, যাদের মধ্যে একজন কালো মানুষ ছিল। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: এরা কারা? বলা হলো: এরা হিমসবাসী। তিনি সত্তর জনের সাথে তাদের উপর আক্রমণ করলেন। প্রথম যার মুখোমুখি হলেন, সে ছিল সেই কালো লোকটি। তিনি তাকে তলোয়ার দিয়ে এমন আঘাত করলেন যে তার পা কেটে গেল। কালো লোকটি তাকে বলল: আঃ! হে ব্যভিচারিণীর পুত্র! ইবনূয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে জবাব দিলেন: দূর হ! হে হামের পুত্র! আসমা কি ব্যভিচারিণী?!
এরপর তিনি তাদেরকে মসজিদ থেকে বের করে দিলেন এবং ফিরে এলেন। এরপর তিনি দেখলেন যে বানু সাহম গোত্রের দরজা দিয়ে কিছু লোক প্রবেশ করেছে। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: এরা কারা? বলা হলো: এরা জর্ডানের লোক। তিনি তাদের উপর আক্রমণ করলেন এবং বলতে লাগলেন:
স্রোতের মতো এই আক্রমণের কথা আমার মনে নেই...
যার ধুলো রাত না হওয়া পর্যন্ত পরিষ্কার হবে না।
বর্ণনাকারী বলেন: তিনি তাদেরকে মসজিদ থেকে বের করে দিলেন, তারপর ফিরে এলেন। তখন তিনি দেখলেন যে বানু মাখযুম গোত্রের দরজা দিয়ে কিছু লোক প্রবেশ করেছে। তিনি তাদের উপর আক্রমণ করলেন এবং বলতে লাগলেন:
যদি আমার প্রতিপক্ষ একজনও হতো, তবে আমি তার জন্য যথেষ্ট হতাম।
বর্ণনাকারী বলেন: তার সহযোগীদের মধ্যে যারা মসজিদের ছাদে ছিল, তারা ইট এবং অন্যান্য বস্তু দ্বারা শত্রুদের লক্ষ্য করে নিক্ষেপ করছিল। তিনি তাদের উপর আক্রমণ করলেন, তখন একটি ইট এসে তার মাথার মাঝখানে এমনভাবে আঘাত করল যে তা তার মস্তক বিদীর্ণ করে দিল। তিনি সোজা দাঁড়িয়ে গেলেন এবং বলতে লাগলেন:
আমাদের ক্ষতস্থানগুলো আমাদের গোড়ালিতে রক্ত ঝরায় না...
বরং আমাদের পায়ের উপরে রক্ত ঝরে।
বর্ণনাকারী বলেন: এরপর তিনি পড়ে গেলেন। তাঁর দুইজন মাওলা তাঁর উপরে ঝুঁকে পড়ল এবং বলতে লাগল:
গোলাম তার রবকে রক্ষা করে এবং আশ্রয় নেয়।
বর্ণনাকারী বলেন: এরপর তাঁর দিকে এগিয়ে যাওয়া হলো এবং তাঁর মাথা কেটে ফেলা হলো। আল্লাহ তাঁর প্রতি সন্তুষ্ট হোন। (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في نسخنا الخطية: وإن طفت. وهي غير مفهومة، وكتب فوقها في النسخة المحمودية كما في طبعة الميمان: ظفرت، وهو أوجه، فأثبتناها.ومحمد بن عمر: هو الواقدي، وشيخه مسلمة ذكره ابن حبان في "الثقات" 7/ 489، ولا يعرف حاله، وأبوه ثقة معروف.
[2] يعني حديث القاسم بن معن السابق، عن هشام بن عروة عن أبيه.
6475 [3] - زيادة من مصادر التخريج.
6475 [4] - تحرَّف في النسخ الخطية إلى: تهلك.
6476 - أخبرنا الحسن بن يعقوب العَدْل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا عبد الوهاب بن عطاء، حدثنا زيادٌ الجَصَّاص، عن علي بن زيد، عن مجاهد قال: قال لي عبد الله بن عمر: انظُرْ إلى المكان الذي به ابنُ الزُّبير، فلا تمرَّ بي عليه، قال: فسَهَا الغلامُ، قال: فإذا ابنُ عمر يَنظُر إلى ابن الزُّبير مصلوبًا، فقال: يغفرُ الله لك ثلاثًا، أَمَا والله ما عَلِمتُك إلَّا كنتَ صوَّامًا قوَّامًا، وَصُولًا للرَّحِم، أما والله إني لَأرجو مع مَساوئ ما أصبتَ ألَّا يُعذِّبَك اللهُ بعدها أبدًا، ثم الْتَفتَ إليَّ فقال: سمعت أبا بكر الصِّدّيق يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن يَعْمَلْ سُوءًا يُجْزَ به في الدنيا" [1].
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (মুজাহিদকে) বললেন: ইবনে যুবাইরকে যেখানে রাখা হয়েছে, সেই স্থানটির দিকে লক্ষ্য করো এবং আমাকে যেন তার পাশ দিয়ে নিয়ে যেও না। (মুজাহিদ) বলেন, কিন্তু গোলাম (চালক) ভুলবশত (সে পথেই) চলে গেল। অতঃপর ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দেখলেন যে ইবনে যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে শূলে চড়ানো অবস্থায় রয়েছে। তিনি তিনবার বললেন: আল্লাহ তোমাকে ক্ষমা করুন। আল্লাহর কসম! আমার জানা মতে, তুমি সব সময় রোযা পালনকারী, রাত জেগে ইবাদতকারী এবং আত্মীয়তার বন্ধন রক্ষাকারী ছিলে। আল্লাহর কসম! তোমার কৃতকর্মের ত্রুটি-বিচ্যুতির সাথেও আমি আশা করি যে আল্লাহ এরপর তোমাকে আর কখনো আযাব দেবেন না। এরপর তিনি আমার দিকে ফিরে তাকালেন এবং বললেন: আমি আবূ বাকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলতে শুনেছেন: "যে ব্যক্তি মন্দ কাজ করে, তাকে দুনিয়াতে তার প্রতিফল দেওয়া হয়।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف لضعف زياد الجصاص - وهو ابن أبي زياد - وعلي بن زيد بن جُدعان.وأخرجه المروزي في "مسند أبي بكر" (22)، والعقيلي في "الضعفاء" (506)، وأبو يعلى في "مسنده" (18)، وابن الأعرابي في "معجمه" (1339)، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 334 من طرق عن عبد الوهاب بن عطاء الخفاف، بهذا الإسناد.وأخرج المرفوع منه فقط أحمد في "المسند" 1 / (23)، والبزار (21)، والطبري في "التفسير" 5/ 294 من طريق عبد الوهاب، به.وأصل الحديث المرفوع عن أبي بكر الصديق: أنه سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن قول الله تعالى: {مَنْ يَعْمَلْ سُوءًا يُجْزَ بِهِ}، فأجابه رسول الله صلى الله عليه وسلم أنَّ جزاءه كلُّ ما يصيبه من مرض وحَزَن ونَصَب، هكذا رواه مولى ابن سباع عن ابن عمر عن أبي بكر كما عند الترمذي (3039). وله طرق أخرى عن أبي بكر يصح بها إن شاء الله كما سلف بيانه عند المصنف برقم (4499).
6477 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ، حدثنا هشام بن علي، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا صاعد بن مُسلم اليَشكُري، قال: سمعت الشَّعْبي يقول: بَعَثَ عبدُ الملك بن مروان برأس عبد الله بن الزُّبير إلى ابن خازمٍ بخُراسانَ، فكفَّنه وصلَّى عليه. قال: فقال الشعبيُّ: أخطأَ، لا يُصلِّى على الرأس [1].
শা'বী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আব্দুল মালিক ইবনে মারওয়ান আব্দুল্লাহ ইবনে যুবাইর-এর মস্তক খুরাসানে ইবনে খা'যিমের নিকট প্রেরণ করেন। অতঃপর তিনি (ইবনে খা'যিম) তাকে কাফন দেন এবং তার উপর জানাজার সালাত আদায় করেন। শা'বী বললেন, তিনি ভুল করেছেন; মস্তকের উপর সালাত (জানাজা) আদায় করা হয় না।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف بمرّة من أجل صاعد بن مسلم، ووهّاه الذهبي في "تلخيصه" وفي "تاريخ الإسلام" 3/ 893، وانظر ترجمته في"الجرح والتعديل" 4/ 453.وابن خازم المذكور: هو عبد الله بن خازم بن أسماء السُّلمي أمير خراسان، وكان مواليًا لابن الزبير، وانظر ترجمته في "تاريخ الإسلام" 2/ 829.
6478 - قال: وحدثنا هشام، حدثنا موسي، حدثنا ابن عُليَّة، عن ابن أبي نَجِيح: أنَّ ابن الزُّبير لما قُتِل نُقِلَت خزائنُه إلى عبد الملك بن مروان ثلاثَ سنين [1].
ইবন আবী নাজীহ থেকে বর্ণিত, যখন ইবনুয-যুবাইরকে হত্যা করা হলো, তখন তিন বছর ধরে তাঁর ধন-ভান্ডার (কোষাগার) আবদ আল-মালিক ইবনু মারওয়ানের কাছে স্থানান্তরিত করা হয়েছিল।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] معضل لا يصح، فإنَّ ابن أبي نجيح -وهو عبد الله- لم يدرك زمن عبد الله ابن الزبير. هشام: هو ابن علي السِّيرافي، وموسى: هو ابن إسماعيل التبوذكي، وابن علية: هو إسماعيل بن إبراهيم.وأخرجه الفاكهي في"أخبار مكة" (1680) من طريق إبراهيم بن سعيد الجوهري، عن ابن علية، عن ابن أبي نجيح.