হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6659)


6659 - أخبرني الأستاذ أبو الوليد رضي الله عنه، أخبرنا الحسن بن سفيان، حدثنا محمود بن غَيْلان، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا ابن جُرَيج، عن صفوان بن سُلَيم، عن سعيد بن المسيّب، عن بَصْرة بن أبي بَصْرة الغفاري، قال: تزوَّجتُ امرأةٌ بِكْرًا فوجدتُها حُبْلَى، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "أمَّا الولدُ، فعَبْدٌ لك، فإذا وُلِدَ فاجلِدُوها مئةَ جَلْدَةٍ، ولها المَهْرُ بما استَحلَّ من فَرْجِها" [1]. ‌‌ذكرُ أبي رُهْم الغِفاري رضي الله عنه-




বসরাহ ইবনু আবি বসরাহ আল-গিফারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি একজন কুমারী মহিলাকে বিবাহ করলাম, অতঃপর আমি দেখলাম যে সে গর্ভবতী। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “আর সন্তানটি, সে তোমার জন্য গোলাম (দাস); যখন সে ভূমিষ্ঠ হবে, তখন তোমরা তাকে একশ' ঘা বেত্রাঘাত করো। আর তার জন্য দেনমোহর রয়েছে, যেহেতু তার লজ্জাস্থান হালাল করা হয়েছে।”




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف، وقد سلف بيانُ ضعفه والخلاف في اسم صحابيِّه برقم (2781).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6660)


6660 - أخبرني أحمد بن يعقوب الثَّقَفي، حدثنا موسى بن زكريا، حدثنا خليفة بن خيَّاط: قال أبو رُهْم اسمه كُلْثومُ بن حُصَين بن خالد بن مُعَيسِير [1] بن بَدْر بن أَحْمَسَ بن غِفار، ويقال: كُلْثوم بن حِصْن بن عُتْبة [2] بن خالد.استَخلَفَه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم على المدينة لما خَرَجَ لفَتْح مكَّة [3].




খলীফা ইবনে খায়্যাত থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবূ রুহম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), তাঁর নাম হলো কুলসূম ইবনে হুসাইন ইবনে খালিদ ইবনে মুআয়সির ইবনে বাদ্র ইবনে আহমাস ইবনে গিফার। আরও বলা হয়: কুলসূম ইবনে হিসন ইবনে উতবাহ ইবনে খালিদ। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের উদ্দেশ্যে বের হওয়ার সময় তাঁকে মদীনার ওপর স্থলাভিষিক্ত করে গিয়েছিলেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في (م) و (ب) إلى: معيس، وفي (ص) إلى: قيس. والمثبت من "طبقات خليفة" ص 32، وكذا هو في "تهذيب الكمال" 24/ 204، وفي "الاستيعاب" لابن عبد البر ص 805 و "الإصابة" لابن حجر 7/ 441: معيسر، بلا ياء ثانية.



[2] في النسخ الخطية: حصين بن عبيد، والغالب على الظن أنه تحريف، والمثبت من "طبقات خليفة" وكذا هو في "تهذيب الكمال" للمزي.



6660 [3] - واستخلفه أيضًا في عمرة القضاء وغزوة خيبر كما في تاريخ خليفة" ص 97.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6661)


6661 - أخبرنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أبو شُعيب الحرَّاني، حدثنا النُّفَيلي، حدثنا محمد بن سَلَمة، عن محمد بن إسحاق [1]، عن الزُّهْري، عن عُبيد الله ابن عبد الله بن عُتْبة بن مسعود، عن ابن عبّاس: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لما خَرَج لفَتْح مكة استَخلَف أبا رُهْمٍ كُلثومَ بن حُصَين الغِفاريَّ على المدينة [2].




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন মক্কা বিজয়ের জন্য বের হলেন, তখন তিনি আবূ রুহম কুলসুম ইবনে হুসাইন আল-গিফারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে মদীনার (দায়িত্বে) স্থলাভিষিক্ত করলেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] من قوله: "أخبرنا أبو شعيب" إلى هنا سقط من (م) ورمجه في (ص)، وأثبتناه من (ب).



[2] إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق. أبو شعيب الحراني: هو عبد الله بن الحسن، والنفيلي: هو أبو جعفر عبد الله بن محمد الحراني.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 19/ (414)، ومن طريقه الضياء المقدسي في "المختارة" 11 / (144) عن أبي شعيب الحراني، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 4/ (2392) عن يعقوب بن إبراهيم بن سعد الزهري، عن أبيه، عن محمد بن إسحاق، به. وصرح ابن إسحاق عنده بالسماع من ابن شِهاب الزهري.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6662)


6662 - أخبرني أبو عبد الله محمد بن علي الصَّنعاني بمكة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن الزُّهْري، حدثني ابنُ أخي أبي رُهم، أنه سمع أبا رُهُم كُلثومَ بن حُصين -من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم الذين بايعوا تحتَ الشَّجرة- قال: غزوتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم غزوةَ تَبُوكَ، فسِرتُ ذاتَ ليلةٍ معه ونحن بقُرْبِ رسول الله صلى الله عليه وسلم وأُلقِيَ عليه النُّعاسُ، وجعلتُ أَستيقِظُ وقد دَنَتْ راحِلَتي من راحلةِ رسول الله صلى الله عليه وسلم فَطَفِقتُ أَجْرُرُ [1] راحلتي عنه حتى غَلَبَتْني عَيْني في بعض الطريق ونحنُ في بعض الليل، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ أعَزَّ أهلي عليَّ أن يتخلَّفَ عنِّي المهاجرون من قُريشٍ والأنصارُ وأَسلَمُ وغِفارٌ" [2]. ‌‌ذكرُ حُذَيفة بن أَسِيد الغِفاري رضي الله عنه-




কুলসূম ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তাবুক যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলাম। এক রাতে আমি তাঁর সাথে পথ চলছিলাম। আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছাকাছি ছিলাম এবং তিনি তন্দ্রাচ্ছন্ন ছিলেন। আমি জেগে উঠলাম এবং দেখলাম আমার বাহন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বাহনের কাছে চলে এসেছে। ফলে আমি তার থেকে আমার বাহনকে টেনে সরাতে লাগলাম। এমনকি রাস্তার কিছু অংশে এবং রাতের কিছু সময়ে আমার চোখ আমাকে পরাভূত করে ফেলল (আমি ঘুমিয়ে পড়লাম)। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমার কাছে আমার পরিবার-পরিজনের মধ্যে সবচেয়ে প্রিয়, যারা আমার থেকে পেছনে থাকবে না, তারা হলো কুরাইশের মুহাজিরগণ, আনসারগণ এবং আসলাম ও গিফার গোত্র।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] كذا في النسخ الخطية، وفي "تلخيص الذهبي": أزجر. والصحيح في حديث حذيفة بن أَسِيد ما رواه الثقةُ فراتٌ القزّاز، عن أبي الطفيل، عن حذيفة ابن أَسِيد قال: اطَّلع النبي صلى الله عليه وسلم علينا ونحن نتذاكر، فقال: "ما تَذاكَرون؟ " قالوا: نذكر الساعة، قال: "إنها لن تقوم حتى ترون قبلَها عشرَ آيات: الدخان، والدجال، والدابّة، وطلوع الشمس من مغربها، ونزول عيسى ابن مريم، ويأجوج ومأجوج، وثلاثة خسوف: خسف بالمشرق، وخسف بالمغرب، وخسف بجزيرة العرب، وآخر ذلك نارٌ تخرج من اليمن تطرُد الناس إلى مَحشَرهم". أخرجه أحمد 26/ (16141)، ومسلم (2901)، وأبو داود (4311)، وابن ماجه (4055)، والترمذي (2183)، والنسائي (11316) و (11418)، وابن حبان (6791) و (6843).



[2] إسناده فيه ضعف لابهام ابن أخي أبي رهم وجهالته، فقد انفرد بالرواية عنه الزهري.وأخرجه أحمد 31 / (19072)، وابن حبان (7257) من طريق عبد الرزاق، بهذا الإسناد. والصحيح في حديث حذيفة بن أَسِيد ما رواه الثقةُ فراتٌ القزّاز، عن أبي الطفيل، عن حذيفة ابن أَسِيد قال: اطَّلع النبي صلى الله عليه وسلم علينا ونحن نتذاكر، فقال: "ما تَذاكَرون؟ " قالوا: نذكر الساعة، قال: "إنها لن تقوم حتى ترون قبلَها عشرَ آيات: الدخان، والدجال، والدابّة، وطلوع الشمس من مغربها، ونزول عيسى ابن مريم، ويأجوج ومأجوج، وثلاثة خسوف: خسف بالمشرق، وخسف بالمغرب، وخسف بجزيرة العرب، وآخر ذلك نارٌ تخرج من اليمن تطرُد الناس إلى مَحشَرهم". أخرجه أحمد 26/ (16141)، ومسلم (2901)، وأبو داود (4311)، وابن ماجه (4055)، والترمذي (2183)، والنسائي (11316) و (11418)، وابن حبان (6791) و (6843).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6663)


6663 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حدثنا مُصعَب بن عبد الله الزُّبَيري قال: حُذَيفةُ بن أَسِيد بن الأَعْوَص [1] ابن واقعةَ بن حَرَام بن غِفَار، وقيل: ابن أَسِيد بن خالد بن الأغوَص، يُكنَى أبا سَرِيحةَ، تحوَّل من المدينة إلى الكوفة وبها مات.




৬৬৬৩ - আমার নিকট বর্ণনা করেছেন আবূ বাকর মুহাম্মাদ ইবনু আহাম্মাদ ইবনু বালাওয়াইহি, তিনি বলেন, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন ইবরাহীম ইবনু ইসহাক আল-হারবী, তিনি বলেন, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন মুস’আব ইবনু আবদুল্লাহ আয-যুবাইরী। তিনি বললেন: হুযাইফাহ ইবনু উসাইদ ইবনু আল-আ’ওয়াস [১] ইবনু ওয়াকি’আ ইবনু হারাম ইবনু গিফার (আর বলা হয়: ইবনু উসাইদ ইবনু খালিদ ইবনু আল-আগওয়াস)-এর উপনাম ছিল আবূ সারীহা। তিনি মদীনা থেকে কূফায় স্থানান্তরিত হন এবং সেখানেই মৃত্যুবরণ করেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] هكذا في النسخ الخطية في الموضعين، والذي في مصادر ترجمته: الأَغوس، بالسين، ويقال أيضًا: الأَغوز، بالزاي. والصحيح في حديث حذيفة بن أَسِيد ما رواه الثقةُ فراتٌ القزّاز، عن أبي الطفيل، عن حذيفة ابن أَسِيد قال: اطَّلع النبي صلى الله عليه وسلم علينا ونحن نتذاكر، فقال: "ما تَذاكَرون؟ " قالوا: نذكر الساعة، قال: "إنها لن تقوم حتى ترون قبلَها عشرَ آيات: الدخان، والدجال، والدابّة، وطلوع الشمس من مغربها، ونزول عيسى ابن مريم، ويأجوج ومأجوج، وثلاثة خسوف: خسف بالمشرق، وخسف بالمغرب، وخسف بجزيرة العرب، وآخر ذلك نارٌ تخرج من اليمن تطرُد الناس إلى مَحشَرهم". أخرجه أحمد 26/ (16141)، ومسلم (2901)، وأبو داود (4311)، وابن ماجه (4055)، والترمذي (2183)، والنسائي (11316) و (11418)، وابن حبان (6791) و (6843).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6664)


6664 - أخبرني إسماعيل بن علي الخُطَبي، حدثنا محمد بن العبّاس المؤدِّب، حدثنا عُبيد بن إسحاق العطَّار، حدثنا محمد بن فُضيل، عن أَشعَث بن سَوَّار، عن عبد الملك بن مَيسَرة، عن أبي الطُّفَيل، عن حُذيفة بن أَسِيد الغِفاري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "تَجيءُ الريحُ التي يقبضُ الله فيها نفسَ كلِّ مؤمن، ثم طلوعُ الشمس من مَغرِبِها، وهي الآيةُ التي ذَكَرَها الله عز وجل في كتابِه" [1].




হুযাইফা ইবনু আসীদ আল-গিফারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এমন একটি বাতাস আসবে যার মাধ্যমে আল্লাহ প্রত্যেক মুমিনের রূহ (আত্মা) কব্জা করে নেবেন, অতঃপর সূর্য তার পশ্চিম দিক থেকে উদিত হবে, আর এটাই হলো সেই নিদর্শন যা আল্লাহ তাআলা তাঁর কিতাবে উল্লেখ করেছেন।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف جدًا، عبيد بن إسحاق العطار ضعيف منكر الحديث، وأشعث بن سوار ضعيف أيضًا.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (3037)، وفي "الدعاء" (2250) عن محمد بن العبّاس المؤدب، بهذا الإسناد. والصحيح في حديث حذيفة بن أَسِيد ما رواه الثقةُ فراتٌ القزّاز، عن أبي الطفيل، عن حذيفة ابن أَسِيد قال: اطَّلع النبي صلى الله عليه وسلم علينا ونحن نتذاكر، فقال: "ما تَذاكَرون؟ " قالوا: نذكر الساعة، قال: "إنها لن تقوم حتى ترون قبلَها عشرَ آيات: الدخان، والدجال، والدابّة، وطلوع الشمس من مغربها، ونزول عيسى ابن مريم، ويأجوج ومأجوج، وثلاثة خسوف: خسف بالمشرق، وخسف بالمغرب، وخسف بجزيرة العرب، وآخر ذلك نارٌ تخرج من اليمن تطرُد الناس إلى مَحشَرهم". أخرجه أحمد 26/ (16141)، ومسلم (2901)، وأبو داود (4311)، وابن ماجه (4055)، والترمذي (2183)، والنسائي (11316) و (11418)، وابن حبان (6791) و (6843).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6665)


6665 - أخبرني عَبْدانُ بن يزيد الدَّقِيقي بهَمَذان، حدثنا محمد بن المغيرة، حدثنا يحيى بن نَصْر بن حاجِبٍ، حدثنا عبد الله بن شُبرُمَة، عن الشَّعْبِي، عن حُذيفة ابن أَسِيد قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يُقرِّب كَبشَينِ أملَحَين، فيذبَحُ أحدَهما فيقول: "اللهمَّ هذا عن محمّدٍ وآل محمّدٍ"، ويُقرِّبُ الآخرَ فيقول: "اللهم هذا عن أُمَّتِي، مَن شَهِدَ لك بالتوحيدِ ولي بالبَلَاغ" [1]. ‌‌ذكرُ عتَّاب بن أَسِيد الأُمَوي [2] رضي الله عنه-




হুযাইফা ইবনু উসাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুটি সাদা-কালো মেশ (দুম্বা) কোরবানীর জন্য পেশ করতেন। তিনি সেগুলোর একটিকে যবেহ করতেন এবং বলতেন, “হে আল্লাহ! এটি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং মুহাম্মাদের পরিবারবর্গের পক্ষ থেকে।” আর অন্যটিকে যবেহ করার জন্য পেশ করে বলতেন, “হে আল্লাহ! এটি আমার উম্মতের সেই ব্যক্তির পক্ষ থেকে, যে তোমার একত্ববাদের সাক্ষ্য দিয়েছে এবং আমার রিসালাতের (বাণী পৌঁছানোর) সাক্ষ্য দিয়েছে।”

[আত্তাব ইবনু উসাইদ আল-উমাওয়ী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর আলোচনা]




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل يحيى بن نصر بن حاجب. وأخرجه الطبراني (3059) من طريق محمد بن عاصم الرازي، عن يحيى بن نصر، بهذا الإسناد.وجاء في الباب ما يشهد له عدة أحاديث، انظر حديث جابر السالف عند المصنف برقم (1734)، وبقية شواهده هناك.



[2] وقع في النسخ الخطية مكان "الأموي": الغفاري، وهو خطأٌ يقينًا، والتصويب من "تلخيص الذهبي" ومن نسبه الآتي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6666)


6666 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حدثنا مُصعَب بن عبد الله الزُّبيري [1] قال: عتَّابُ بن أَسِيد بن أبي العِيصِ ابن أُميَّة بن عبد شَمْس بن عبد مَنَاف، وأمُّ عتّاب بن أَسِيد وخالد بن أَسِيدٍ زينبُ بنت أبي عَمرو بن أُميّة بن عبد شَمس، استَعمَل رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عتّابًا [2] على مكة، ومات رسول الله صلى الله عليه وسلم وعتّابٌ عامله على مكة.وتُوفِّي عتّابُ بن أَسيدٍ بمكة في جُمادَى الآخرة سنةَ ثلاثَ عشرةَ.




মুসআব ইবনু আবদুল্লাহ আয-যুবাইরি থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আত্তাব ইবনু আসীদ ইবনু আবুল-ঈস ইবনু উমাইয়াহ ইবনু আবদ শামস ইবনু আবদ মানাফ। আর আত্তাব ইবনু আসীদ ও খালিদ ইবনু আসীদের মা ছিলেন যায়নাব বিনত আবী 'আমর ইবনু উমাইয়াহ ইবনু আবদ শামস। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আত্তাবকে মক্কার গভর্নর নিযুক্ত করেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ইনতিকাল করেন, তখনও আত্তাব মক্কার গভর্নর ছিলেন। আর আত্তাব ইবনু আসীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তেরো হিজরি সনে জুমাদাল আখিরাহ মাসে মক্কায় ইনতিকাল করেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في "نسب قريش" ص 187.



[2] في (ص): عتابًا عاملًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6667)


6667 - أخبرنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنبَري، حدثنا الحسن بن علي بن نَصْر، حدثنا الزُّبير بن بكّار القاضي، حدثنا حسين بن سعيد بن هاشم بن سعيد من بني قيس بن ثَعلَبة، حدثني يحيى بن سعيد بن سالم القَدَّاحُ، عن أبيه، عن ابن جُرَيج، عن عطاء، عن ابن عبّاس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلةَ قُرْبِه من مكة فِي غَزْوة الفَتْح: "إنَّ بمكة لأربعة نَفَرٍ من قريشٍ أَربَأُ بهم عن الشِّرك، وأَرغَبُ بهم في الإسلام" قيل: ومَن هم يا رسول الله؟ قال: "عتّابُ بن أَسِيدٍ وجُبَيرُ بن مُطْعِمٍ وحَكيمُ بن حِزامٍ وسُهَيل بن عَمْرو" [1].




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মক্কা বিজয়ের অভিযানে মক্কার নিকটবর্তী হওয়ার রাতে বললেন: "মক্কায় কুরাইশের এমন চারজন লোক রয়েছে যাদেরকে আমি শির্‌ক থেকে মুক্ত রাখতে চাই এবং ইসলামের প্রতি তাদেরকে আগ্রহী করতে চাই।" জিজ্ঞেস করা হলো: হে আল্লাহর রাসূল! তারা কারা? তিনি বললেন: "আত্তাব ইবনু আসীদ, জুবাইর ইবনু মুত‘ইম, হাকীম ইবনু হিযাম এবং সুহাইল ইবনু আমর।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف، حسين بن سعيد بن هاشم مجهول لم نقف له على ترجمة ويحيى بن سعيد القداح ليس بالقوي كما قال الدارقطني كما في ترجمته من "لسان الميزان" 8/ 443، وقال الذهبي في "الميزان": له مناكير.والخبر في "جمهرة نسب قريش" للزبير بن بكار ص 362 - 363، ومن طريقه أخرجه أيضًا ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 15/ 106. وفيه عن ابن جريج عن عطاء -وهو ابن أبي رباح- قال: لا أحسبه إلّا رفعه إلى ابن عبّاس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم … وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 7/ 54، ومن طريقه البيهقي في "السنن" 6/ 355 عن حرمي بن حفص، به.وأخرجه الطيالسي (1453)، وأبو عبيد في "الأموال" (669)، وابن سعد في "الطبقات" 6/ 35، وابن زنجويه في "الأموال" (999)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (561)، وأبو نعيم في "الحالية" 9/ 21، و "معرفة الصحابة" (5534) و (5882) من طرق عن خالد بن أبي عثمان، به.وذكر ابن أبي حاتم في "المراسيل" ص 142 أنَّ شبابة -وهو ابن سوّار- رواه عن خالد بن أبي عثمان عن سَليط وأيوب ابني عبد الله بن يسار عن عمرو بن أبي عقرب قال: والله ما أصبتُ … فجعله من حديث عمرو، وبذلك أثبت له صحبةً، ثم نقل عن أبيه أنه قال: هذا وهمٌ خطأٌ، وهمَ شبابةُ في ذلك، إنما هو عمرو بن أبي عقرب عن عتّابُ بن أَسيد.والمعقَّد: ضربٌ من بُرود هَجَر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6668)


6668 - أخبرني محمد بن الحسن الكارِزِيّ، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا حَرَميُّ بن حفص القَسْملي، حدثنا خالد بن أبي عثمان، عن أيوب بن عبد الله بن يَسَار، عن عمرو بن أبي عَقرَب قال: سمعتُ عتَّابَ بن أَسِيدٍ وهو مُسنِدٌ ظهرَه إلى بيتِ الله يقول: والله ما أَصبْتُ في عملي هذا الذي وَلَّاني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إِلَّا ثوبَينِ مُعقَّدَينِ، فكَسَوتُهما كَيْسانَ مولايَ [1].




আত্তাব ইবনু আসীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আল্লাহর ঘরের (কা'বার) দিকে পিঠ ঠেকিয়ে ভর করে বলেন: আল্লাহর কসম! এই দায়িত্বে—যা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে প্রদান করেছিলেন—আমি মাত্র দুটি জোড়াতালি দেওয়া কাপড় ছাড়া আর কিছুই লাভ করিনি, অতঃপর আমি তা আমার আযাদকৃত গোলাম কায়সানকে পরিয়ে দিয়েছিলাম।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده حسن من أجل أيوب بن عبد الله وشيخه عمرو بن أبي عقرب، وحسَّنه الحافظ ابن حجر في "الإصابة" 4/ 430.وأخرجه ابن الأعرابي في "معجمه" (2138)، والطبراني في "الكبير" 17/ (423) عن علي بن عبد العزيز أبي الحسن البغوي، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 7/ 54، ومن طريقه البيهقي في "السنن" 6/ 355 عن حرمي بن حفص، به.وأخرجه الطيالسي (1453)، وأبو عبيد في "الأموال" (669)، وابن سعد في "الطبقات" 6/ 35، وابن زنجويه في "الأموال" (999)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (561)، وأبو نعيم في "الحالية" 9/ 21، و "معرفة الصحابة" (5534) و (5882) من طرق عن خالد بن أبي عثمان، به.وذكر ابن أبي حاتم في "المراسيل" ص 142 أنَّ شبابة -وهو ابن سوّار- رواه عن خالد بن أبي عثمان عن سَليط وأيوب ابني عبد الله بن يسار عن عمرو بن أبي عقرب قال: والله ما أصبتُ … فجعله من حديث عمرو، وبذلك أثبت له صحبةً، ثم نقل عن أبيه أنه قال: هذا وهمٌ خطأٌ، وهمَ شبابةُ في ذلك، إنما هو عمرو بن أبي عقرب عن عتّابُ بن أَسيد.والمعقَّد: ضربٌ من بُرود هَجَر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6669)


6669 - حدثنا أبو العبّاس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عبد الحَكَم، حدثنا خالد بن نِزَار الأَيْلي، حدثنا محمد بن صالح التَّمَّار، عن ابن شِهاب، عن سعيد بن المسيّب، عن عتَّابُ بن أَسِيد: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قَالَ في زكاة الكُرُوم: "إنها تُخرَصُ كما يُخرَصُ النخلُ، ثم تُؤدَّى زكاتُه زَبيبًا كما تُؤدَّى زكاةُ النخلِ تمرًا" [1]. ‌‌ذكرُ شدّاد بن الهادِ رضي الله عنه-




'আত্তাব ইবনু আসীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আঙ্গুর ক্ষেতের যাকাত সম্পর্কে বলেছেন: "তা (আঙ্গুর) তেমনই অনুমান করে পরিমাপ করা হবে, যেমন খেজুর পরিমাপ করা হয়। অতঃপর এর যাকাত কিসমিস হিসেবে পরিশোধ করা হবে, যেমন খেজুরের যাকাত খেজুর হিসেবে পরিশোধ করা হয়।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] رجاله لا بأس بهم وهو منقطع بين سعيد بن المسيب وعتاب فإنه لم يسمع منه، لكن مراسيل سعيد بن المسيب من أقوى المراسيل كما هو مقرَّر عند أهل العلم. وصحَّحه ابن خزيمة برقم (2316).وأخرجه أبو داود (1604)، والترمذي (644 م)، وابن حبان (3279) من طريق عبد الله بن نافع، عن محمد بن صالح التمار، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود (1603)، والنسائي في "المجتبى" (1618) من طريق عبد الرحمن بن إسحاق، عن ابن شهاب الزهري، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6670)


6670 - أخبرني أحمد بن يعقوب الثَّقَفي، حدثنا موسى بن زكريا، حدثنا خَليفة ابن خيَّاط [1] قال: ومن حُلَفاءِ بني هاشمٍ من غير أهل بدرٍ: شَدَّادُ بن الهادِ - واسمُ الهادِ أسامةُ -بنِ عَمرو بن عبد الله بن جابر بن بشر بن عتوارة بن عامر بن مالك بن الليث ابن بَكْر بن عبدِ مَنَاةَ بن علي بن كنانة، وهو أبو [عبد الله بنِ] شدّاد بن الهاد، وشدّادٌ سِلْفُ رسول الله صلى الله عليه وسلم، كانت عنده سَلْمى بنت عُميس [2]، خَلَفَ عليها بعدَ حمزة ابن عبد المطلَّب.




খলীফা ইবন খাইয়াত থেকে বর্ণিত, আর বানু হাশিমের সেই মিত্রদের মধ্যে, যারা বদর যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেননি, তাদের একজন হলেন শাদ্দাদ ইবনুল হাদ। (হাদের নাম হলো উসামা)—ইবনু আমর ইবনু আবদুল্লাহ ইবনু জাবির ইবনু বিশর ইবনু আতওয়ারা ইবনু আমের ইবনু মালিক ইবনুল লাইস ইবনু বকর ইবনু আবদি মানাত ইবনু আলী ইবনু কিনানাহ। আর তিনি হলেন [আবদুল্লাহ ইবনু] শাদ্দাদ ইবনুল হাদের পিতা। আর শাদ্দাদ ছিলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর শ্যালক/বেয়াই (সিলফ)। তাঁর বিবাহে ছিলেন সালমা বিনত উমাইস। তিনি হামযা ইবনু আব্দুল মুত্তালিবের পরে তাঁকে (সালমাকে) বিবাহ করেছিলেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في "طبقاته" ص 8. وما بين المعقوفين منه.



[2] وهي أخت أسماء بنت عميس، وهما أُختا ميمونة بنت الحارث زوج النبي صلى الله عليه وسلم لأمِّها. قال عطاء: وزعموا أنه لم يصلِّ على أهل، أُحد، فتعقبَّه البيهقي بقوله: يحتمل أن يكون هذا الرجل بقي حيًا حتى انقطعت الحرب ثم مات فصلَّى عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم، والذين لم يصلَّ عليهم بأُحدٍ ماتوا قبل انقضاء الحرب، والله أعلم.وأخرج الحديث النسائي (2091)، والطحاوي في "معاني الآثار" 1/ 505 - 506 من طريق عبد الله ابن المبارك، عن ابن جريج، به. قال النسائي: ما نعلم أحدًا تابع ابنَ المبارك على هذا، والصواب: ابن أبي عمار عن ابن شداد بن الهاد، وابنُ المبارك أحد الأئمة، ولعلَّ الخطأ من غيره، والله أعلم.قلنا: كذا قال النسائي، مع أنَّ ابن المبارك قد تابعه عبدُ الرزاق عن ابن جريج، فروايته صحيحة لا خطأَ فيها، وقد صرَّح ابن أبي عمار في رواية أحمد بن يوسف السلمي عن عبد الرزاق عند البيهقي بإخبار شداد بن الهاد له بهذا الحديث والإسناد إليه صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6671)


6671 - أخبرني محمد بن علي الصَّنعاني بمكة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا عبد الرزاق، عن ابن جُرَيج قال: أخبرني عِكرمةُ بن خالد، عن [ابن] [1] أبي عمَّار، عن شدَّاد بن الهادِ: أَنَّ رجلًا من الأعراب آمَنَ برسول الله صلى الله عليه وسلم واتَّبَعَه، وقال: أُهاجرُ معك، فأَوصَى النبيُّ صلى الله عليه وسلم أصحابَه به، فلما كانت غزوةُ خيبرَ -أو حُنينٍ- غَنِمَ رَسولُ الله صلى الله عليه وسلم شيئًا فقَسَمَ وقَسَمَ له، فأعطى أصحابَه ما قَسَمَ له، وكان يَرعَى ظَهْرَهم، فلما جاء دَفَعُوه إليه، قال: ما هذا؟ قالوا: قَسْمٌ قَسَمَه لك النبيُّ، فأَخَذَه فجاءَه، فقال: يا محمدُ، ما هذا؟ قال: "قَسْمٌ قَسَمتُه لك" فقال: ما على هذا اتَّبعتُك، ولكنِّي اتَّبعتُك على أن أُرمَى هاهنا -وأشار إلى حَلْقه- بسَهُم فأموتَ وأدخُلَ الجنةَ، فقال: "إِنْ تَصدُقِ اللهَ يَصدُقْكَ"، فَلَبِثُوا قليلًا ثم نَهَضُوا [2] في قتال العدوِّ، فأُتِيَ به يُحمَلُ وقد أصابه سهمٌ حيث أشارَ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أَهُوَ هُوَ؟ " قالوا نعم، قال: "صَدَقَ الله فصَدَقَه"، فكفَّنه النبي صلى الله عليه وسلم ثم قدَّمَه فصَلَّى عليه، فكان ممّا ظَهَرَ من صلاته عليه: "اللهمَّ هذا عبدُك خرج مُهاجِرًا في سبيلك، فقُتِلَ شهيدًا، فأنا عليه شهيدٌ" [3]. ‌‌ذكرُ أسامة بن زيد بن حارثة حِبِّ رسول الله صلى الله عليه وسلم




শাদদাদ ইবনুল হাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক বেদুঈন ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের প্রতি ঈমান আনল এবং তাঁকে অনুসরণ করল। সে বলল: আমি আপনার সাথে হিজরত করব। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সাথীদেরকে তার প্রতি যত্নবান হওয়ার জন্য উপদেশ দিলেন। এরপর যখন খাইবার অথবা হুনাইনের যুদ্ধ হলো, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কিছু গণীমত লাভ করলেন এবং তা বণ্টন করলেন ও তার জন্যও অংশ রাখলেন। তিনি তাঁর সাথীদেরকে তার অংশটি দিলেন। সে (ঐ বেদুঈন) তাদের বাহনগুলোর দেখাশোনা করছিল। যখন সে ফিরে এলো, তারা তার হাতে তা তুলে দিল। সে জিজ্ঞেস করল: এটা কী? তারা বলল: এটা আপনার অংশ, যা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনার জন্য বণ্টন করেছেন। সে তা নিয়ে তাঁর কাছে এসে বলল: হে মুহাম্মাদ, এটা কী? তিনি বললেন: "এটা তোমার অংশ যা আমি তোমার জন্য বণ্টন করেছি।" সে বলল: আমি এর জন্য আপনাকে অনুসরণ করিনি। বরং আমি আপনাকে অনুসরণ করেছি, যাতে এখানে— এবং সে তার কণ্ঠনালীর দিকে ইশারা করল— একটি তীর দ্বারা আঘাতপ্রাপ্ত হই, ফলে আমি মারা যাব এবং জান্নাতে প্রবেশ করব। তিনি বললেন: "যদি তুমি আল্লাহর প্রতি সত্যবাদী হও, তবে আল্লাহও তোমার প্রতি সত্যবাদী হবেন।" এরপর তারা অল্প সময় অবস্থান করলেন, তারপর শত্রুদের বিরুদ্ধে যুদ্ধে ঝাঁপিয়ে পড়লেন। তখন তাকে বহন করে আনা হলো এবং যে স্থানে সে ইশারা করেছিল ঠিক সে স্থানেই একটি তীর তাকে বিদ্ধ করেছিল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম জিজ্ঞেস করলেন: "এ কি সেই ব্যক্তি?" তারা বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "সে আল্লাহর প্রতি সত্যবাদী ছিল, তাই আল্লাহও তার প্রতি সত্যবাদী হয়েছেন।" এরপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে কাফন দিলেন, তারপর সামনে এগিয়ে নিয়ে তার জানাযার সালাত আদায় করলেন। তাঁর সালাতে উচ্চারিত দোয়াগুলোর মধ্যে যা প্রকাশিত হয়েছিল তা হলো: "হে আল্লাহ, এ আপনার বান্দা, আপনার পথে হিজরতকারী হয়ে বের হয়েছিল। অতঃপর শহীদ হিসেবে নিহত হলো। আমি তার ব্যাপারে সাক্ষী। "




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] لفظ "ابن" سقط من نسخنا الخطية، واستدركناه من "مصنف عبد الرزاق" و "إتحاف المهرة" (6325). وهو عبد الرحمن بن عبد الله بن أبي عمار، الملقَّب بالقِسِّ لعبادته. قال عطاء: وزعموا أنه لم يصلِّ على أهل، أُحد، فتعقبَّه البيهقي بقوله: يحتمل أن يكون هذا الرجل بقي حيًا حتى انقطعت الحرب ثم مات فصلَّى عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم، والذين لم يصلَّ عليهم بأُحدٍ ماتوا قبل انقضاء الحرب، والله أعلم.وأخرج الحديث النسائي (2091)، والطحاوي في "معاني الآثار" 1/ 505 - 506 من طريق عبد الله ابن المبارك، عن ابن جريج، به. قال النسائي: ما نعلم أحدًا تابع ابنَ المبارك على هذا، والصواب: ابن أبي عمار عن ابن شداد بن الهاد، وابنُ المبارك أحد الأئمة، ولعلَّ الخطأ من غيره، والله أعلم.قلنا: كذا قال النسائي، مع أنَّ ابن المبارك قد تابعه عبدُ الرزاق عن ابن جريج، فروايته صحيحة لا خطأَ فيها، وقد صرَّح ابن أبي عمار في رواية أحمد بن يوسف السلمي عن عبد الرزاق عند البيهقي بإخبار شداد بن الهاد له بهذا الحديث والإسناد إليه صحيح.



[2] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: دحضوا. قال عطاء: وزعموا أنه لم يصلِّ على أهل، أُحد، فتعقبَّه البيهقي بقوله: يحتمل أن يكون هذا الرجل بقي حيًا حتى انقطعت الحرب ثم مات فصلَّى عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم، والذين لم يصلَّ عليهم بأُحدٍ ماتوا قبل انقضاء الحرب، والله أعلم.وأخرج الحديث النسائي (2091)، والطحاوي في "معاني الآثار" 1/ 505 - 506 من طريق عبد الله ابن المبارك، عن ابن جريج، به. قال النسائي: ما نعلم أحدًا تابع ابنَ المبارك على هذا، والصواب: ابن أبي عمار عن ابن شداد بن الهاد، وابنُ المبارك أحد الأئمة، ولعلَّ الخطأ من غيره، والله أعلم.قلنا: كذا قال النسائي، مع أنَّ ابن المبارك قد تابعه عبدُ الرزاق عن ابن جريج، فروايته صحيحة لا خطأَ فيها، وقد صرَّح ابن أبي عمار في رواية أحمد بن يوسف السلمي عن عبد الرزاق عند البيهقي بإخبار شداد بن الهاد له بهذا الحديث والإسناد إليه صحيح.



6671 [3] - إسناده صحيح.وهو في "مصنف عبد الرزاق" (6651) و (9597)، ومن طريقه أخرجه الطبراني في "الكبير" (7108) عن إسحاق بن إبراهيم الدبري عنه، والبيهقي في "السنن" 4/ 15، وفي "دلائل النبوة" 4/ 221 - 222 من طريق أحمد بن يوسف السلمي عنه. زاد السلمي في روايته عن عبد الرزاق: قال عطاء: وزعموا أنه لم يصلِّ على أهل، أُحد، فتعقبَّه البيهقي بقوله: يحتمل أن يكون هذا الرجل بقي حيًا حتى انقطعت الحرب ثم مات فصلَّى عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم، والذين لم يصلَّ عليهم بأُحدٍ ماتوا قبل انقضاء الحرب، والله أعلم.وأخرج الحديث النسائي (2091)، والطحاوي في "معاني الآثار" 1/ 505 - 506 من طريق عبد الله ابن المبارك، عن ابن جريج، به. قال النسائي: ما نعلم أحدًا تابع ابنَ المبارك على هذا، والصواب: ابن أبي عمار عن ابن شداد بن الهاد، وابنُ المبارك أحد الأئمة، ولعلَّ الخطأ من غيره، والله أعلم.قلنا: كذا قال النسائي، مع أنَّ ابن المبارك قد تابعه عبدُ الرزاق عن ابن جريج، فروايته صحيحة لا خطأَ فيها، وقد صرَّح ابن أبي عمار في رواية أحمد بن يوسف السلمي عن عبد الرزاق عند البيهقي بإخبار شداد بن الهاد له بهذا الحديث والإسناد إليه صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6672)


6672 - أخبرنا أبو جعفر البغدادي، حدثنا أبو عُلاثة، حدثنا أبي، حدثنا ابن لَهِيعة، حدثنا أبو الأسود، عن عُرْوة، قال: أسامة بن زيد بن حارثة بن شَراحيل بن كعب بن عبد العُزَّى بن يزيد بن امرئ القيس الكَلْبي [1]، أنعمَ الله عليه ورسولُه.




উরওয়াহ থেকে বর্ণিত, উসামা ইবনু যায়দ ইবনু হারিসাহ ইবনু শারাহীল ইবনু কা'ব ইবনু আব্দিল 'উযযা ইবনু ইয়াযীদ ইবনু ইমরুল কায়স আল-কালবী, যার প্রতি আল্লাহ এবং তাঁর রাসূল অনুগ্রহ করেছেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: العلمي.



6673 - Null









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6673)


6673 - وأخبرني بهذا النَّسب أحمد بن يعقوب، حدثنا موسى بن زكريا، حدثنا شَبَاب، وزاد فيه وأمُّه أم أيمن مولاةُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، مات بالمدينة في آخر خلافة معاوية وهو ابنُ ستين سنة، وكان يُكنَى أبا محمد.




শাবাব থেকে বর্ণিত, তিনি এর সাথে আরও যোগ করেছেন যে, তাঁর মাতা ছিলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আযাদকৃত দাসী উম্মু আইমান। তিনি মু‘আবিয়ার খিলাফতের শেষ দিকে মদীনায় ইন্তেকাল করেন, যখন তাঁর বয়স ছিল ষাট বছর। আর তাঁর কুনিয়াত ছিল আবু মুহাম্মাদ।









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6674)


6674 - أخبرنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا علي بن عبد العزيز، حدثنا مُعلَّى بن مَهدي المَوصلي، حدثنا أبو عَوانة، عن عمر بن أبي سَلَمة، عن أبيه قال: حدثني أسامة بن زيد قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "أحبُّ أهلي إليَّ مَن أنعمَ الله عليه وأنعمتُ عليه، أسامةُ" [1].




উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমার পরিবারের মধ্যে আমার কাছে সবচেয়ে প্রিয় হলো সে, যার উপর আল্লাহ অনুগ্রহ করেছেন এবং আমিও অনুগ্রহ করেছি, সে হলো উসামা।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف؛ عمر بن أبي سلمة ليّن الحديث، وقد تفرَّد به، وبه ضعَّفه الذهبي في "التلخيص". وسلف برقم (3604).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6675)


6675 - حدثني علي بن حَمْشاذ العَدْل، حدثنا محمد بن عيسى بن السَّكَن، حدثنا عفَّان وحجَّاج، قالا: حدثنا حماد بن سَلَمة، عن موسى بن عقبة، عن سالم، عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أسامة أحبُّ الناس إليَّ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "উসামা হলো আমার কাছে সবচেয়ে প্রিয় ব্যক্তি।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده صحيح. عفان: هو ابن مسلم الصفار، وحجاج: هو ابن المنهال.وأخرجه أحمد 9/ (5707) عن عبد الصمد بن عبد الوارث عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد. وزاد فيه: ما حاشا فاطمة ولا غيرها.وأخرجه ضمن قصة تأمير أسامة: أحمد 9/ (5630)، والنسائي (8130) من طريق زهير بن معاوية، وأحمد (5848) من طريق وهيب بن خالد، والبخاري (4468) من طريق الفضيل ابن سليمان، ثلاثتهم عن موسى بن عقبة، به. وزاد فيه أحمد في الرواية الثانية والنسائي: قال سالم: فما سمعت عبد الله بن عمر يحدث هذا الحديث قط إلَّا قال: ما حاشا فاطمة.وأخرجه مسلم (2426) (64) من طريق عمر بن حمزة، عن سالم بن عبد الله، به.وأخرجه النسائي (8129) من طريق محمد بن فليح، عن موسى بن عقبة، عن الزهري، عن سالم، به. فزاد فيه الزهريَّ بين موسى وسالم، ومحمد بن فليح له بعض الأوهام، فلا تقبل مخالفته.وأخرجه ضمن قصة الإمارة أيضًا: أحمد 8/ (4701) و 10 / (5888)، والبخاري (3730) و (4250) و (4469) و (6627) و (7187)، ومسلم (2426) (63)، والترمذي (3816)، والنسائي (8125)، وابن حبان (7044) و (7059) من طرق عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر. نفسُه في "السير" 2/ 227 وفي "الكاشف" نقلًا عن الواقدي ولم يذكر غيره. واعتمده ابن حبان في "ثقاته" 3/ 39. ويؤيده ما أخرجه ابن سعد في "الطبقات" 3/ 342 من طرق عن سفيان الثوري، عن قيس بن مسلم، عن طارق بن شِهاب قال: قالت أم أيمن يومَ أصيب عمر: اليوم وَهَى الإسلامُ. ورجاله ثقات، فهذا يدل على تأخر وفاتها عن خلافة الصديق، والله تعالى أعلم.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (370) عن أبي خليفة الفضل بن الحباب، عن مسلم بن إبراهيم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي الدنيا في "مكارم الأخلاق" (225) من طريق حجاج بن نصير، وابن الجوزي في "البر والصلة" (88) من طريق يحيى القطان كلاهما عن قرة بن خالد، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6676)


6676 - أخبرني محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا السَّرِي بن خُزيمة، حدثنا مسلم ابن إبراهيم، حدثنا قُرَّة بن خالد، حدثني محمد بن سِيرِين، قال: بَلَغَت النَّخلةُ على عهد عثمان بن عفّان ألفَ درهمٍ، فعَمَدَ أسامةُ بن زيد إلى نخلةٍ، فنَقَرها وأخرج جُمَّارها فأطعمها أمَّه، فقال له: ما حَمَلك على هذا وأنت ترى النَّخلةَ قد بلغت ألفًا؟! فقال: إِنَّ أمِّي سألَتْنِيه، ولا تسألُني شيئًا أقدِرُ عليه إلَّا أعطيتُها [1].




মুহাম্মাদ ইবনে সীরীন থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যুগে একটি খেজুর গাছের মূল্য এক হাজার দিরহামে পৌঁছে গিয়েছিল। তখন উসামা ইবনে যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একটি খেজুর গাছের কাছে গেলেন, সেটিকে কেটে তার শাঁস (জুম্মার) বের করে তাঁর মাকে খেতে দিলেন। তখন (অন্য কেউ) তাঁকে জিজ্ঞেস করল: একটি খেজুর গাছের মূল্য যেখানে এক হাজার দিরহামে পৌঁছেছে, এমন অবস্থায় আপনি কেন এমন করলেন? তিনি বললেন: আমার মা এটা আমার কাছে চেয়েছেন, আর আমি যা দিতে সক্ষম, তিনি এমন কোনো জিনিসই আমার কাছে চান না যা আমি তাঁকে দেইনি।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] رجاله ثقات، لكن محمد بن سِيرِين روايته عن عثمان مرسلة كما قال الذهبي في "التلخيص".وأعله الذهبي أيضًا بأنَّ أم أسامة -وهي بركة أم أيمن حاضنة النبي صلى الله عليه وسلم ومولاته- ماتت زمن أبي بكر الصديق، وهذا خلاف الراجح، فالراجح أنها ماتت في خلافة عثمان، وهو ما اعتمده الذهبي نفسُه في "السير" 2/ 227 وفي "الكاشف" نقلًا عن الواقدي ولم يذكر غيره. واعتمده ابن حبان في "ثقاته" 3/ 39. ويؤيده ما أخرجه ابن سعد في "الطبقات" 3/ 342 من طرق عن سفيان الثوري، عن قيس بن مسلم، عن طارق بن شِهاب قال: قالت أم أيمن يومَ أصيب عمر: اليوم وَهَى الإسلامُ. ورجاله ثقات، فهذا يدل على تأخر وفاتها عن خلافة الصديق، والله تعالى أعلم.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (370) عن أبي خليفة الفضل بن الحباب، عن مسلم بن إبراهيم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي الدنيا في "مكارم الأخلاق" (225) من طريق حجاج بن نصير، وابن الجوزي في "البر والصلة" (88) من طريق يحيى القطان كلاهما عن قرة بن خالد، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6677)


6677 - أخبرني أحمد بن يعقوب الثَّقفي، حدثنا أبو جعفر الحَضْرمي، حدثنا سعيد بن عمرو الأشعَثي، حدثنا أبو بكر بن شعيب بن الحَبْحاب، قال: سمعتُ أشياخَنا يقولون: كان في نَقْشِ خاتم أسامةَ بن زيد: حِبُّ رسول الله صلى الله عليه وسلم [1].




উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর আংটির নকশায় লেখা ছিল: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রিয় (হাবীব)।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] أخرجه الطبراني في "المعجم الكبير" (374) عن أبي جعفر محمد بن عبد الله الحضرمي، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6678)


6678 - حدثنا يحيى بن منصور القاضي، حدثنا أحمد بن سَلَمة، حدثنا إسحاق ابن إبراهيم، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن الزُّهْري قال: كان أسامة بن زيد يُخاطَب بالأمير حتى مات، يقولون: بعثَه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم [1].




যুহরী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উসামা ইবনু যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আমৃত্যু আমীর (নেতা/সেনাপতি) বলে সম্বোধন করা হতো। তারা বলত: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে প্রেরণ করেছিলেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] وهو في "مصنف عبد الرزاق" (9777) مطولًا، ومن طريقه أخرجه الطبراني في "الكبير" (371) مختصرًا.