আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
6679 - أخبرني عبد الله بن محمد الصَّيدلاني، حدثنا علي بن الحسين بن الجُنيد، حدثنا الحُسين بن يزيد الطَّحّان، حدثنا عائذ بن حَبيب، عن الحجَّاج بن أَرْطاة، عن الحَكَم، عن مِقسَم، عن ابن عبّاس، عن أسامة بن زيد قال: كنتُ رِدْفَ النبيِّ صلى الله عليه وسلم بعرفةَ [1].
উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি আরাফার ময়দানে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে সওয়ার ছিলাম।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ليِّن، حسين الطحان وحجاج بن أرطاة فيهما لِينٌ، لكن قد توبعا عند المصنف فيما سلف برقم (1727).
6680 - أخبرني أبو جعفر محمد بن عبد الله البغدادي، حدثنا محمد بن عمرو ابن خالد الحرَّاني، حدثني أبي، حدثنا ابن لَهِيعة، عن صالح بن أبي عَريب، عن خلَّاد بن السائب قال: دخلتُ على أسامةَ بن زيد فمَدَحني في وجهي، فقال: إنه حَمَلني أن أمدحَك في وجهك، أنِّي سمعتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول: "إذا مُدِحَ المُؤمِنُ في وجهِه، رَبَا الإيمانُ في قلبه" [1]. ذكرُ أبي رافع مولى رسول الله رضي الله عنه-
উসামা ইবনু যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (খালাদ ইবনুস সায়িব বলেন,) আমি তাঁর নিকট গেলাম। তিনি আমার সামনাসামনি আমার প্রশংসা করলেন। অতঃপর তিনি বললেন: তোমার মুখের সামনে তোমার প্রশংসা করার কারণ হলো এই যে, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যখন কোনো মুমিনকে তার মুখের সামনে প্রশংসা করা হয়, তখন তার অন্তরে ঈমান বৃদ্ধি পায়।”
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف؛ عبد الله بن لَهِيعة سيئ الحفظ، وشيخه صالح بن أبي عريب روى عنه جمع وذكره ابن حبان في "الثقات"، فلا يقبل تفردهما بمثل هذا الحديث. وضعَّفه العراقي في "تخريج الإحياء".وأخرجه الطبراني في "المعجم الكبير" (424) عن محمد بن عمرو بن خالد الحراني، بهذا الإسناد. مولى علي ذكره المزي في الرواة عن أبي رافع، ولم نقف له على ترجمة، والظاهر أنه وهم من الحماني كما سيأتي، وشطره الثاني صحَّ من حديث سهل بن سعد، وفيه أنَّ ذلك كان يوم أرسل النبيُّ صلى الله عليه وسلم عليًا إلى خيبر.وأخرجه الحكيم الترمذي في "نوادر الأصول" (601)، والطبراني في "الكبير" (994) من طرق عن يحيى الحماني، بهذا الإسناد.وخالف الحمانيَّ أبو غسان مالكُ بن إسماعيل، فرواه عن عبد السلام بن حرب، عن أبي خالد الدالاني، عن زيد بن أسلم عن يزيد بن زياد مولى عبد الله بن عيّاش، عن أبي رافع، عند الطبراني في "الكبير" (930)، ومن طريقه الخطيب في "المتفق والمفترق" (1781). ورجاله ثقات غير أبي خالد الدالاني، وهو حسن الحديث، لكن يزيد مولى ابن عيّاش إنما يروي عن التابعين، وروايته عن أبي رافع مرسلة، فأبو رافع قديم الوفاة، مات في حدود سنة 37 هـ.ويشهد لشطره الثاني ما رواه البخاري (2942)، ومسلم (2406) من حديث سهل بن سعد مرفوعًا: "لأن يُهدى بك رجلٌ واحد خير لك من حمر النَّعم".
6681 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي [1]، قال: كان أبو رافع مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم للعبّاس بن عبد المُطَّلب، فلمّا أسلم العباس وَهَبَه للنبيِّ صلى الله عليه وسلم، وكان اسمُه أسلمَ، ويقال: إبراهيم، وأسلمَ قبلَ بدر، ولكنَّه كان مقيمًا بمكةَ مع العبّاس، ومات بعدَ مَقتَل عثمان سنةَ خمسٍ وثلاثين.
ইবরাহীম ইবন ইসহাক হারবী থেকে বর্ণিত, তিনি (ইবরাহীম) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আযাদকৃত গোলাম (মাওলা) আবু রাফি‘ মূলত আব্বাস ইবন আব্দুল মুত্তালিবের ছিলেন। যখন আব্বাস ইসলাম গ্রহণ করলেন, তখন তিনি তাঁকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে হেবা (দান) করে দিলেন। তাঁর নাম ছিল আসলাম, আবার বলা হয় ইবরাহীম। তিনি বদরের যুদ্ধের আগেই ইসলাম গ্রহণ করেছিলেন, কিন্তু আব্বাসের সাথে মক্কায় অবস্থান করছিলেন। এবং তিনি পঁয়ত্রিশ (৩৫) হিজরীতে উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শহীদ হওয়ার পরে ইন্তেকাল করেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] كذا جاء هنا في النسخ الخطية، والجادة أنَّ إبراهيم الحربي يرويه عن مصعب بن عبد الله الزبيري، فقد تكرر ذكر هذه السلسلة عند المصنف كثيرًا. مولى علي ذكره المزي في الرواة عن أبي رافع، ولم نقف له على ترجمة، والظاهر أنه وهم من الحماني كما سيأتي، وشطره الثاني صحَّ من حديث سهل بن سعد، وفيه أنَّ ذلك كان يوم أرسل النبيُّ صلى الله عليه وسلم عليًا إلى خيبر.وأخرجه الحكيم الترمذي في "نوادر الأصول" (601)، والطبراني في "الكبير" (994) من طرق عن يحيى الحماني، بهذا الإسناد.وخالف الحمانيَّ أبو غسان مالكُ بن إسماعيل، فرواه عن عبد السلام بن حرب، عن أبي خالد الدالاني، عن زيد بن أسلم عن يزيد بن زياد مولى عبد الله بن عيّاش، عن أبي رافع، عند الطبراني في "الكبير" (930)، ومن طريقه الخطيب في "المتفق والمفترق" (1781). ورجاله ثقات غير أبي خالد الدالاني، وهو حسن الحديث، لكن يزيد مولى ابن عيّاش إنما يروي عن التابعين، وروايته عن أبي رافع مرسلة، فأبو رافع قديم الوفاة، مات في حدود سنة 37 هـ.ويشهد لشطره الثاني ما رواه البخاري (2942)، ومسلم (2406) من حديث سهل بن سعد مرفوعًا: "لأن يُهدى بك رجلٌ واحد خير لك من حمر النَّعم".
6682 - أخبرني أبو عبد الله محمد بن عبد الله المُزَني، حدثنا أحمد بن نَجْدة، حدثنا يحيى بن عبد الحميد، حدثنا قيس بن الرَّبيع، عن أبي خالد يزيدَ بن عبد الرحمن، عن عبد الرحمن بن عبد الله مولى عليٍّ، عن أبي رافع قال: بَعَث النبيُّ صلى الله عليه وسلم عليًّا إلى، اليمن، فعَقَدَ له لِواءً، فلمّا مضى قال: "يا أبا رافع، الحَقْه ولا تَدْعُه مِن [1] خلفِه، وليَقِفْ ولا يَلتفتْ حتى أَجيئَه" فأتاه فأوصاه بأشياءَ، فقال: "يا عليُّ، لَأن يهديَ الله على يديك رجلًا، خيرٌ لك ممّا طَلَعَت عليه الشمسُ" [2].
আবু রাফে' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আলীকে ইয়ামেনের দিকে পাঠালেন এবং তার জন্য একটি পতাকা বেঁধে দিলেন। যখন তিনি (আলী) রওনা হলেন, তখন তিনি (নবী) বললেন: "হে আবু রাফে', তুমি তার সাথে যোগ দাও এবং পেছন থেকে তাকে ডেকো না। সে যেন দাঁড়ায় এবং আমার আসা পর্যন্ত পেছনে না তাকায়।" অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার কাছে গেলেন এবং তাকে কিছু বিষয়ে উপদেশ দিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "হে আলী, আল্লাহ যদি তোমার হাতে কোনো একজন মানুষকেও সৎপথে পরিচালিত করেন, তবে তা তোমার জন্য সে সব কিছু থেকে উত্তম যার উপর সূর্য উদিত হয়।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في (ص): في، والمثبت من (م) و (ب). مولى علي ذكره المزي في الرواة عن أبي رافع، ولم نقف له على ترجمة، والظاهر أنه وهم من الحماني كما سيأتي، وشطره الثاني صحَّ من حديث سهل بن سعد، وفيه أنَّ ذلك كان يوم أرسل النبيُّ صلى الله عليه وسلم عليًا إلى خيبر.وأخرجه الحكيم الترمذي في "نوادر الأصول" (601)، والطبراني في "الكبير" (994) من طرق عن يحيى الحماني، بهذا الإسناد.وخالف الحمانيَّ أبو غسان مالكُ بن إسماعيل، فرواه عن عبد السلام بن حرب، عن أبي خالد الدالاني، عن زيد بن أسلم عن يزيد بن زياد مولى عبد الله بن عيّاش، عن أبي رافع، عند الطبراني في "الكبير" (930)، ومن طريقه الخطيب في "المتفق والمفترق" (1781). ورجاله ثقات غير أبي خالد الدالاني، وهو حسن الحديث، لكن يزيد مولى ابن عيّاش إنما يروي عن التابعين، وروايته عن أبي رافع مرسلة، فأبو رافع قديم الوفاة، مات في حدود سنة 37 هـ.ويشهد لشطره الثاني ما رواه البخاري (2942)، ومسلم (2406) من حديث سهل بن سعد مرفوعًا: "لأن يُهدى بك رجلٌ واحد خير لك من حمر النَّعم".
[2] إسناده ضعيف، يحيى بن عبد الحميد -وهو الحمّاني- ضعيف، وعبد الرحمن بن عبد الله مولى علي ذكره المزي في الرواة عن أبي رافع، ولم نقف له على ترجمة، والظاهر أنه وهم من الحماني كما سيأتي، وشطره الثاني صحَّ من حديث سهل بن سعد، وفيه أنَّ ذلك كان يوم أرسل النبيُّ صلى الله عليه وسلم عليًا إلى خيبر.وأخرجه الحكيم الترمذي في "نوادر الأصول" (601)، والطبراني في "الكبير" (994) من طرق عن يحيى الحماني، بهذا الإسناد.وخالف الحمانيَّ أبو غسان مالكُ بن إسماعيل، فرواه عن عبد السلام بن حرب، عن أبي خالد الدالاني، عن زيد بن أسلم عن يزيد بن زياد مولى عبد الله بن عيّاش، عن أبي رافع، عند الطبراني في "الكبير" (930)، ومن طريقه الخطيب في "المتفق والمفترق" (1781). ورجاله ثقات غير أبي خالد الدالاني، وهو حسن الحديث، لكن يزيد مولى ابن عيّاش إنما يروي عن التابعين، وروايته عن أبي رافع مرسلة، فأبو رافع قديم الوفاة، مات في حدود سنة 37 هـ.ويشهد لشطره الثاني ما رواه البخاري (2942)، ومسلم (2406) من حديث سهل بن سعد مرفوعًا: "لأن يُهدى بك رجلٌ واحد خير لك من حمر النَّعم".
6683 - حدثنا أبو العبّاس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، أنَّ بُكير بن عبد الله بن الأشجِّ حدثه، أنَّ الحسن بن علي بن أبي رافع حدثه، أنَّ أبا رافع أخبره: أنه أقبلَ بكتابٍ من قريش إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: فلما رأيتُ النبيَّ [1] أُلقي في قلبي الإسلامُ، فقلت: يا رسولَ الله، إني والله لا أَرجعُ إليهم أبدًا، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "إني لا أَخِيسُ بالعهد، ولا أحبسُ البُرُدَ، ولكن ارجِعْ إليهم، فإن كانَ في قلبِكَ الذي في قلبِكَ الآن فارجِعْ"، قال: فرجعتُ إليهم، ثم أقبلتُ على رسول الله صلى الله عليه وسلم فأسلمتُ [2]. ذكرُ سلمان الفارسي رضي الله عنه-
আবু রাফে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি কুরাইশদের পক্ষ থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে একটি পত্র নিয়ে এসেছিলেন। তিনি বলেন, যখন আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখলাম, তখন আমার অন্তরে ইসলামের প্রতি আকর্ষণ সৃষ্টি হলো। তখন আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আল্লাহর কসম, আমি কক্ষনো তাদের (কুরাইশদের) কাছে ফিরে যাব না। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি প্রতিশ্রুতি ভঙ্গ করি না এবং দূতদেরও আটক রাখি না। তবে তুমি তাদের কাছে ফিরে যাও। যদি তোমার অন্তরে এখন যা আছে, তা তখনও থাকে, তাহলে তুমি (ফিরে) এসো।" তিনি (আবু রাফে) বলেন, এরপর আমি তাদের কাছে ফিরে গেলাম, তারপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে ইসলাম গ্রহণ করলাম।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] المثبت من مصادر التخريج، وفي النسخ الخطية: الكتاب، وهو سبق قلم. ويخوس: إذا غدر ونقض العهد. و "البرد"، بضمتين، جمع بريد، بمعنى الرسول، أي: لا أحبس الرسل الواردين عليّ.
[2] إسناده صحيح.وأخرجه أحمد 39 / (23857)، وأبو داود (2758)، والنسائي (8621)، وابن حبان (4877) من طرق عن عبد الله بن وهب بهذا الإسناد. لكن زيد في رواية أحمد وحده بين الحسن وجده أبي رافع: علي والد الحسن، وهو لا تعرف له رواية في الكتب.قوله: "لا أَخيس العهد" قال السندي في "حاشية المسند": أي لا أنقضه، يقال: خاس يخيس ويخوس: إذا غدر ونقض العهد. و "البرد"، بضمتين، جمع بريد، بمعنى الرسول، أي: لا أحبس الرسل الواردين عليّ.
6684 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا إبراهيم بن إسحاق، حدثنا مصعب بن عبد الله، قال: وسلمانُ الفارسي يُكنى أبا عبد الله، وكان ولاؤُه لرسولِ الله صلى الله عليه وسلم.وقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "سلمانُ مِنَّا أهل البيت" [1].
মুস'আব ইবনু আবদুল্লাহ্ থেকে বর্ণিত, সালমান আল-ফারসীকে আবূ আবদুল্লাহ্ নামে ডাকা হতো। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সম্পৃক্ত ছিলেন। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সালমান আমাদের আহলে বাইতের (পরিবারের) অন্তর্ভুক্ত।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] سيأتي مسندًا لاحقًا. لم يرو عنه سوى ولده كثير، وهو مجهول الحال. ابن أبي فديك: هو إسماعيل بن مسلم المدني. وأخرجه الطبراني في "المعجم الكبير" (6040) عن مسعدة بن سعد العطار المكي، عن إبراهيم ابن المنذر الحزامي وحده، بهذا الإسناد.وأخرجه مطولًا ومختصرًا ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 4/ 76 و 9/ 320 - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 21/ 408 - وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (3347)، وفي "أخبار أصبهان" 1/ 54 - ومن طريقه ابن عساكر أيضًا -من طريق دحيم، كلاهما (ابن سعد ودحيم) عن إسماعيل بن أبي فديك به. وسقط دحيم من مطبوع "معرفة الصحابة".وأخرجه مطولًا ومختصرًا أيضًا الطبري في "تفسيره" 21/ 133 - 134، وأبو الشيخ في "طبقات المحدثين بأصبهان" (6)، والبيهقي في "الدلائل" 3/ 418 - 420 من طريق محمد بن خالد بن عثمة، عن كثير بن عبد الله، به.وفي الباب عن أنس بن مالك والحسين بن علي وزيد بن أبي أوفى، وأسانيدها لا يفرح بها.أما حديث أنس؛ فيرويه جعفر بن سليمان الضبعي عن النضر بن حميد الكندي، عن سعدالإسكاف، عن محمد بن علي، عن أنس عند البزار في "مسنده" (6534)، والنضر بن حميدوسعد الإسكاف متروكا الحديث.وأما حديث الحسين؛ فيرويه أيضًا جعفر بن سليمان، عن النضر بن حميد الكندي، عن سعد الإسكاف، عن أبي جعفر محمد بن علي، عن أبيه، عن جده، الحسين عند أبي يعلى في "مسنده" (6772)، وعنه أبو الشيخ (5). وإسناده إسناد سابقه.وأما حديث زيد بن أبي أوفى؛ فيرويه عبد المؤمن بن عباد العبدي، عن يزيد بن معن، عن عبد الله ابن شرحبيل، عن رجل من قريش، عنه، عند ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2707)، والطبراني في "الكبير" (5146)، وابن عدي في "الكامل" 3/ 206 - 207، وأبو نعيم في "المعرفة" (3020). ولم يذكر ابن عدي في إسناده: "رجل من قريش". هكذا وقع الإسناد عندهم. ووقع إسناده عند البخاري في "التاريخ الكبير" 3/ 386، وفي "الأوسط" 3/ 9: حدثنا حسان ابن حسان، حدثنا إبراهيم بن بشر أبو عمرو الأزدي، عن يحيى بن معن المدني، حدثني إبراهيم القرشي، عن سعد بن شرحبيل، عن زيد بن أبي أوفى. قال البخاري في "الأوسط": هذا إسناد مجهول لا يتابع عليه، ولا يعرف سماع بعضهم من بعض، ورواه بعضهم عن إسماعيل بن أبي خالد، عن عبد الله بن أبي أوفى، عن النبي صلى الله عليه وسلم، ولا أصل له. وقال أبو حاتم كما في "العلل" (2598): حديث منكر، وفي إسناده مجهولين. وقال الذهبي في "السير": زيد لا يعرف إلَّا في هذا الحديث الموضوع. وقال ابن حجر في "للسان" في ترجمة إبراهيم بن بشر الأزدي: عن يحيى بن معن، وعنه حسان بن حسان، لا ندري من هو وكذلك شيخه، قال أبو حاتم: هما مجهولان، انتهى. وكذلك سعد بن شرحبيل، قال الذهبي في "الميزان" في ترجمة يحيى بن معن المدني: عن سعد ابن شراحيل، مجهول، وكذلك شيخه. وعدَّ الذهبيُّ في "السير" 1/ 141 هذا الحديث موضوعًا.وقد روي هذا الخبر من كلام علي بن أبي طالب من وجوهٍ موقوفًا عليه، وإسناد كل واحد منها لا يخلو من مقال، وبمجموعها يمكن تحسينه؛ فأخرج ابن سعد 2/ 298 - 299، وابن أبي شيبة 12/ 148 من طريق أبي البختري، قال: قالوا لعلي: أخبرنا عن سلمان، قال: أدرك العلم الأول والعلم الآخر، بحر لا ينزح قعره، منا أهلَ البيت. ورجاله ثقات لكن أبا البختري -وهو سعيد ابن فيروز- لم يدرك عليًا كما قال علي بن المديني وأبو حاتم الرازي.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (6041) من طريق علي بن عابس، عن الأعمش، عن عمرو بن مرة. وعن إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس بن أبي حازم، قالا (عمرو بن مرة وقيس): سئل علي عن سلمان، فقال: أدرك العلم الأول والعلم الآخر، بحر لا ينزح، منا أهلَ البيت. وسنده ضعيف من أجل علي بن عابس، والطريق الأولى عمرو بن مرة روايته مرسلة عن علي.وأخرجه الطبراني ضمن الحديث (6042) -وعنه أبو نعيم في "الحلية" 1/ 187، وفي "المعرفة" (3349) - من طريق حبان بن علي العنزي، عن ابن جريج، عن أبي حرب بن أبي الأسود، عن أبيه.وعن رجل، عن زاذان الكندي، كلاهما (أبو الأسود وزاذان) عن علي. وسنده ضعيف من أجل حبان ابن علي، وفي الطريق الثانية أيضًا رجل مبهم. وانظر له "علل الدارقطني" (366).
6685 - Null
6685 - أخبرني أحمد بن يعقوب، حدثنا موسى بن زكريا، حدثنا شَبَاب قال: مات سلمانُ الفارسي سنةَ سبع وثلاثين.
শাবাব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: সালমান ফারসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাঁইত্রিশ সনে ইন্তেকাল করেন।
6686 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ العَدْل، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا إبراهيم بن المنذر الحِزامي وإسماعيل بن أبي أُويس، قالا: حدثنا ابن أبي فُدَيك، عن كَثير بن عبد الله المُزَني، عن أبيه، عن جدِّه: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم خَطَّ الخندقَ عامَ حرب الأحزاب حتى بَلَغ المذاحج [1]، فقطع لكلِّ عشرةٍ أربعينَ ذراعًا، فاحتجَّ المهاجرون: سلمانُ مِنَّا، وقالت الأنصارُ: سلمانُ مِنَّا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "سلمانُ مِنَّا أهل البيت" [2]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
আমর ইবনু আওফ আল-মুযানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আহযাবের যুদ্ধের বছর খন্দক খননের জন্য রেখা টানলেন, এমনকি তিনি মাযাহিজ পর্যন্ত পৌঁছলেন। অতঃপর তিনি প্রতি দশজনের জন্য চল্লিশ হাত করে নির্ধারণ করলেন। তখন মুহাজিরগণ যুক্তি তুলে বললেন: সালমান আমাদের দলভুক্ত। আর আনসারগণ বললেন: সালমান আমাদের দলভুক্ত। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সালমান আমাদের আহলে বাইতের (পরিবারের) অন্তর্ভুক্ত।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] هكذا وقع في النسخ الخطية، ويغلب على ظننا أنه محرَّف عن المذاد، فقد نقل ياقوت الحموي في "معجم البلدان" 5/ 88 عن ابن الأعرابي أنه قال: هو موضع بالمدينة حيث حفر الخندقَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم، قال كعب بن مالك:فليأتِ مأسدةً تسلُّ سيوفَها … بين المَزاد وبين جَزْع الخندقِوكذلك قال أبو عبيد البكري في "معجم ما استعجم" 4/ 1202. لم يرو عنه سوى ولده كثير، وهو مجهول الحال. ابن أبي فديك: هو إسماعيل بن مسلم المدني. وأخرجه الطبراني في "المعجم الكبير" (6040) عن مسعدة بن سعد العطار المكي، عن إبراهيم ابن المنذر الحزامي وحده، بهذا الإسناد.وأخرجه مطولًا ومختصرًا ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 4/ 76 و 9/ 320 - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 21/ 408 - وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (3347)، وفي "أخبار أصبهان" 1/ 54 - ومن طريقه ابن عساكر أيضًا -من طريق دحيم، كلاهما (ابن سعد ودحيم) عن إسماعيل بن أبي فديك به. وسقط دحيم من مطبوع "معرفة الصحابة".وأخرجه مطولًا ومختصرًا أيضًا الطبري في "تفسيره" 21/ 133 - 134، وأبو الشيخ في "طبقات المحدثين بأصبهان" (6)، والبيهقي في "الدلائل" 3/ 418 - 420 من طريق محمد بن خالد بن عثمة، عن كثير بن عبد الله، به.وفي الباب عن أنس بن مالك والحسين بن علي وزيد بن أبي أوفى، وأسانيدها لا يفرح بها.أما حديث أنس؛ فيرويه جعفر بن سليمان الضبعي عن النضر بن حميد الكندي، عن سعدالإسكاف، عن محمد بن علي، عن أنس عند البزار في "مسنده" (6534)، والنضر بن حميدوسعد الإسكاف متروكا الحديث.وأما حديث الحسين؛ فيرويه أيضًا جعفر بن سليمان، عن النضر بن حميد الكندي، عن سعد الإسكاف، عن أبي جعفر محمد بن علي، عن أبيه، عن جده، الحسين عند أبي يعلى في "مسنده" (6772)، وعنه أبو الشيخ (5). وإسناده إسناد سابقه.وأما حديث زيد بن أبي أوفى؛ فيرويه عبد المؤمن بن عباد العبدي، عن يزيد بن معن، عن عبد الله ابن شرحبيل، عن رجل من قريش، عنه، عند ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2707)، والطبراني في "الكبير" (5146)، وابن عدي في "الكامل" 3/ 206 - 207، وأبو نعيم في "المعرفة" (3020). ولم يذكر ابن عدي في إسناده: "رجل من قريش". هكذا وقع الإسناد عندهم. ووقع إسناده عند البخاري في "التاريخ الكبير" 3/ 386، وفي "الأوسط" 3/ 9: حدثنا حسان ابن حسان، حدثنا إبراهيم بن بشر أبو عمرو الأزدي، عن يحيى بن معن المدني، حدثني إبراهيم القرشي، عن سعد بن شرحبيل، عن زيد بن أبي أوفى. قال البخاري في "الأوسط": هذا إسناد مجهول لا يتابع عليه، ولا يعرف سماع بعضهم من بعض، ورواه بعضهم عن إسماعيل بن أبي خالد، عن عبد الله بن أبي أوفى، عن النبي صلى الله عليه وسلم، ولا أصل له. وقال أبو حاتم كما في "العلل" (2598): حديث منكر، وفي إسناده مجهولين. وقال الذهبي في "السير": زيد لا يعرف إلَّا في هذا الحديث الموضوع. وقال ابن حجر في "للسان" في ترجمة إبراهيم بن بشر الأزدي: عن يحيى بن معن، وعنه حسان بن حسان، لا ندري من هو وكذلك شيخه، قال أبو حاتم: هما مجهولان، انتهى. وكذلك سعد بن شرحبيل، قال الذهبي في "الميزان" في ترجمة يحيى بن معن المدني: عن سعد ابن شراحيل، مجهول، وكذلك شيخه. وعدَّ الذهبيُّ في "السير" 1/ 141 هذا الحديث موضوعًا.وقد روي هذا الخبر من كلام علي بن أبي طالب من وجوهٍ موقوفًا عليه، وإسناد كل واحد منها لا يخلو من مقال، وبمجموعها يمكن تحسينه؛ فأخرج ابن سعد 2/ 298 - 299، وابن أبي شيبة 12/ 148 من طريق أبي البختري، قال: قالوا لعلي: أخبرنا عن سلمان، قال: أدرك العلم الأول والعلم الآخر، بحر لا ينزح قعره، منا أهلَ البيت. ورجاله ثقات لكن أبا البختري -وهو سعيد ابن فيروز- لم يدرك عليًا كما قال علي بن المديني وأبو حاتم الرازي.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (6041) من طريق علي بن عابس، عن الأعمش، عن عمرو بن مرة. وعن إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس بن أبي حازم، قالا (عمرو بن مرة وقيس): سئل علي عن سلمان، فقال: أدرك العلم الأول والعلم الآخر، بحر لا ينزح، منا أهلَ البيت. وسنده ضعيف من أجل علي بن عابس، والطريق الأولى عمرو بن مرة روايته مرسلة عن علي.وأخرجه الطبراني ضمن الحديث (6042) -وعنه أبو نعيم في "الحلية" 1/ 187، وفي "المعرفة" (3349) - من طريق حبان بن علي العنزي، عن ابن جريج، عن أبي حرب بن أبي الأسود، عن أبيه.وعن رجل، عن زاذان الكندي، كلاهما (أبو الأسود وزاذان) عن علي. وسنده ضعيف من أجل حبان ابن علي، وفي الطريق الثانية أيضًا رجل مبهم. وانظر له "علل الدارقطني" (366).
[2] إسناده ضعيف جدًا، كثير بن عبد الله -وهو ابن عمرو بن عوف بن زيد المزني- متروك متهم، وقال ابن حبان: روى عن أبيه عن جده نسخةً موضوعةً لا يحلُّ ذكرها في الكتب، ولا الرواية عنه إلَّا على جهة التعجب. وبه ضعَّفه الذهبي في "التلخيص". وأبوه عبد الله بن عمرو لم يرو عنه سوى ولده كثير، وهو مجهول الحال. ابن أبي فديك: هو إسماعيل بن مسلم المدني. وأخرجه الطبراني في "المعجم الكبير" (6040) عن مسعدة بن سعد العطار المكي، عن إبراهيم ابن المنذر الحزامي وحده، بهذا الإسناد.وأخرجه مطولًا ومختصرًا ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 4/ 76 و 9/ 320 - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 21/ 408 - وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (3347)، وفي "أخبار أصبهان" 1/ 54 - ومن طريقه ابن عساكر أيضًا -من طريق دحيم، كلاهما (ابن سعد ودحيم) عن إسماعيل بن أبي فديك به. وسقط دحيم من مطبوع "معرفة الصحابة".وأخرجه مطولًا ومختصرًا أيضًا الطبري في "تفسيره" 21/ 133 - 134، وأبو الشيخ في "طبقات المحدثين بأصبهان" (6)، والبيهقي في "الدلائل" 3/ 418 - 420 من طريق محمد بن خالد بن عثمة، عن كثير بن عبد الله، به.وفي الباب عن أنس بن مالك والحسين بن علي وزيد بن أبي أوفى، وأسانيدها لا يفرح بها.أما حديث أنس؛ فيرويه جعفر بن سليمان الضبعي عن النضر بن حميد الكندي، عن سعدالإسكاف، عن محمد بن علي، عن أنس عند البزار في "مسنده" (6534)، والنضر بن حميدوسعد الإسكاف متروكا الحديث.وأما حديث الحسين؛ فيرويه أيضًا جعفر بن سليمان، عن النضر بن حميد الكندي، عن سعد الإسكاف، عن أبي جعفر محمد بن علي، عن أبيه، عن جده، الحسين عند أبي يعلى في "مسنده" (6772)، وعنه أبو الشيخ (5). وإسناده إسناد سابقه.وأما حديث زيد بن أبي أوفى؛ فيرويه عبد المؤمن بن عباد العبدي، عن يزيد بن معن، عن عبد الله ابن شرحبيل، عن رجل من قريش، عنه، عند ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2707)، والطبراني في "الكبير" (5146)، وابن عدي في "الكامل" 3/ 206 - 207، وأبو نعيم في "المعرفة" (3020). ولم يذكر ابن عدي في إسناده: "رجل من قريش". هكذا وقع الإسناد عندهم. ووقع إسناده عند البخاري في "التاريخ الكبير" 3/ 386، وفي "الأوسط" 3/ 9: حدثنا حسان ابن حسان، حدثنا إبراهيم بن بشر أبو عمرو الأزدي، عن يحيى بن معن المدني، حدثني إبراهيم القرشي، عن سعد بن شرحبيل، عن زيد بن أبي أوفى. قال البخاري في "الأوسط": هذا إسناد مجهول لا يتابع عليه، ولا يعرف سماع بعضهم من بعض، ورواه بعضهم عن إسماعيل بن أبي خالد، عن عبد الله بن أبي أوفى، عن النبي صلى الله عليه وسلم، ولا أصل له. وقال أبو حاتم كما في "العلل" (2598): حديث منكر، وفي إسناده مجهولين. وقال الذهبي في "السير": زيد لا يعرف إلَّا في هذا الحديث الموضوع. وقال ابن حجر في "للسان" في ترجمة إبراهيم بن بشر الأزدي: عن يحيى بن معن، وعنه حسان بن حسان، لا ندري من هو وكذلك شيخه، قال أبو حاتم: هما مجهولان، انتهى. وكذلك سعد بن شرحبيل، قال الذهبي في "الميزان" في ترجمة يحيى بن معن المدني: عن سعد ابن شراحيل، مجهول، وكذلك شيخه. وعدَّ الذهبيُّ في "السير" 1/ 141 هذا الحديث موضوعًا.وقد روي هذا الخبر من كلام علي بن أبي طالب من وجوهٍ موقوفًا عليه، وإسناد كل واحد منها لا يخلو من مقال، وبمجموعها يمكن تحسينه؛ فأخرج ابن سعد 2/ 298 - 299، وابن أبي شيبة 12/ 148 من طريق أبي البختري، قال: قالوا لعلي: أخبرنا عن سلمان، قال: أدرك العلم الأول والعلم الآخر، بحر لا ينزح قعره، منا أهلَ البيت. ورجاله ثقات لكن أبا البختري -وهو سعيد ابن فيروز- لم يدرك عليًا كما قال علي بن المديني وأبو حاتم الرازي.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (6041) من طريق علي بن عابس، عن الأعمش، عن عمرو بن مرة. وعن إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس بن أبي حازم، قالا (عمرو بن مرة وقيس): سئل علي عن سلمان، فقال: أدرك العلم الأول والعلم الآخر، بحر لا ينزح، منا أهلَ البيت. وسنده ضعيف من أجل علي بن عابس، والطريق الأولى عمرو بن مرة روايته مرسلة عن علي.وأخرجه الطبراني ضمن الحديث (6042) -وعنه أبو نعيم في "الحلية" 1/ 187، وفي "المعرفة" (3349) - من طريق حبان بن علي العنزي، عن ابن جريج، عن أبي حرب بن أبي الأسود، عن أبيه.وعن رجل، عن زاذان الكندي، كلاهما (أبو الأسود وزاذان) عن علي. وسنده ضعيف من أجل حبان ابن علي، وفي الطريق الثانية أيضًا رجل مبهم. وانظر له "علل الدارقطني" (366).
6687 - أخبرنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا علي بن عبد العزيز، حدثنا مُعَلَّى بن مهدي المَوْصلي، حدثنا عِمران بن خالد الخُزاعي، عن [1] البُناني، عن أنس ابن مالك قال: دخَلَ سلمانُ الفارسيُّ على عمر بن الخطاب وهو متكئٌ على وِسادة، فألقاها له، فقال سلمانُ: صَدَق الله ورسولُه، فقال عمر: حدِّثْنا يا أبا عبد الله.قال: دخلتُ على رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو متكئٌ على وِسادةٍ فألقاها إليَّ، ثم قال لي: "يا سلمانُ، ما مِن مسلم يَدخُل على أخيه المسلم فيُلقي له وسادة إكرامًا له، إلَّا غَفَر الله له" [2].
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সালমান ফারসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলেন, তখন তিনি একটি বালিশে হেলান দিয়ে বসেছিলেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেটি তাঁর (সালমানের) জন্য এগিয়ে দিলেন। তখন সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আল্লাহ ও তাঁর রাসূল সত্য বলেছেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, হে আবু আব্দুল্লাহ! আমাদেরকে হাদিসটি বলুন। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করেছিলাম, তখন তিনি একটি বালিশে হেলান দিয়ে বসেছিলেন। তিনি সেটি আমার দিকে এগিয়ে দিলেন এবং আমাকে বললেন, "হে সালমান! যে কোনো মুসলিম তার মুসলিম ভাইয়ের কাছে প্রবেশ করে এবং তাকে সম্মান জানানোর উদ্দেশ্যে তার জন্য বালিশ এগিয়ে দেয়, আল্লাহ অবশ্যই তাকে ক্ষমা করে দেন।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] لفظة "عن" سقطت من نسخنا الخطية، وأثبتناها من النسخة المحمودية كما في طبعة الميمان.والبناني: هو ثابت بن أسلم. "تعليقه على المجروحين": منكر الحديث، وضعفه أبو حاتم الرازي، وبه أعله الذهبي في "الميزان"، فقال: خبر ساقط.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (6068)، وفي "مكارم الأخلاق" (151) عن علي بن عبد العزيز، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (6068)، وفي "الأوسط" (1576)، وفي "الصغير" (761)، وفي "مكارم الأخلاق" (151)، وأبو الشيخ في "أخلاق النبي" (781)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (3350)، والخلعي في "الفوائد المنتقاة الحسان" (941) من طرق عن معلَّى بن مهدي، به. ووقع في "المعجم الصغير" وحده: أنَّ عمر دخل على سلمان، وهو خطأ. وقال الطبراني: لا يُروى هذا الحديث عن سلمان إلَّا بهذا الإسناد، تفرَّد به عمران بن خالد.وأخرجه مؤمَّل بن إهاب في "جزئه" (3)، والدولابي في "الكنى" (429)، وابن حبان في "المجروحين" 2/ 124 - 125، وقوام السنة في "الترغيب والترهيب" (191) من طرق عن عمران ابن خالد، به.وأخرج الطبراني في "الكبير" (6188) من طريق سويد بن عبد العزيز، عن أبي عبد الله يزيد بن عَبْد الله بن أَبِي يزيد النجراني، عن القاسم أبي عبد الرحمن قال: قال سلمان الفارسي: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إذا زار أحدكم أخاه فألقى له شيئًا يقيه من التراب، وقاه الله عذاب النار". وسويد ضعيف، والقاسم -وهو ابن عبد الرحمن الدمشقي- لم يدرك سلمان فيما قاله أبو حاتم الرازي.
[2] إسناده واهٍ، عمران بن خالد الخزاعي قال أحمد: متروك الحديث، وقال الدارقطني في "تعليقه على المجروحين": منكر الحديث، وضعفه أبو حاتم الرازي، وبه أعله الذهبي في "الميزان"، فقال: خبر ساقط.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (6068)، وفي "مكارم الأخلاق" (151) عن علي بن عبد العزيز، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (6068)، وفي "الأوسط" (1576)، وفي "الصغير" (761)، وفي "مكارم الأخلاق" (151)، وأبو الشيخ في "أخلاق النبي" (781)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (3350)، والخلعي في "الفوائد المنتقاة الحسان" (941) من طرق عن معلَّى بن مهدي، به. ووقع في "المعجم الصغير" وحده: أنَّ عمر دخل على سلمان، وهو خطأ. وقال الطبراني: لا يُروى هذا الحديث عن سلمان إلَّا بهذا الإسناد، تفرَّد به عمران بن خالد.وأخرجه مؤمَّل بن إهاب في "جزئه" (3)، والدولابي في "الكنى" (429)، وابن حبان في "المجروحين" 2/ 124 - 125، وقوام السنة في "الترغيب والترهيب" (191) من طرق عن عمران ابن خالد، به.وأخرج الطبراني في "الكبير" (6188) من طريق سويد بن عبد العزيز، عن أبي عبد الله يزيد بن عَبْد الله بن أَبِي يزيد النجراني، عن القاسم أبي عبد الرحمن قال: قال سلمان الفارسي: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إذا زار أحدكم أخاه فألقى له شيئًا يقيه من التراب، وقاه الله عذاب النار". وسويد ضعيف، والقاسم -وهو ابن عبد الرحمن الدمشقي- لم يدرك سلمان فيما قاله أبو حاتم الرازي.
6688 - حدثنا أبو الفضل الحسن بن يعقوب بن يوسف العَدْل من أصل كتابه، حدثنا أبو بكر يحيى بن أبي طالب ببغداد، حدثنا علي بن عاصم، حدثنا حاتم بن أبي صَغيرة، عن سِماك بن حَرْب، عن زيد بن صُوحَان: أنَّ رجلين من أهل الكوفة كانا صديقينِ لزيد بن صُوحان أتياه ليكلِّمَ لهما سلمانَ أن يُحدِّثَهما حديثَه كيف كان إسلامُه، فأقبلا معه حتى لَقُوا سلمانَ وهو بالمدائن أميرٌ عليها، وإذا هو على كرسيٍّ قاعد، وإذا خُوصٌ بين يديه وهو يَسُفُّه [1]، قالا: فسلَّمنا وقعدنا، فقال له زيدٌ: يا أبا عبد الله، إنَّ هذينِ لي صديقان، ولهما إخاءٌ، وقد أحبَّا أن يَسمعا حديثَك كيف كان بَدْءُ [2] إسلامِك؟ قال: فقال سلمان: كنتُ يتيمًا من رامَهُرْمُزَ، وكان ابنُ [3] دهقان رامَهُرمُز يختلِفُ إلى مُعلِّم يعلِّمُه، فلزمتُه لأكونَ في كَنَفه، وكان لي أخٌ أكبرُ مني، وكان مستغنيًا بنفسه، وكنتُ غلامًا قصيرًا، وكان إذا قام من مجلسه تفرَّق من يُحفِّظُهم، فإذا تفرَّقوا خرج فتقنَّع بثوبه، ثم صَعِدَ الجبلَ، وكان يفعلُ ذلك غيرَ مرَّة مُتنكرًا، قال: فقلتُ له: إنك تفعلُ كذا وكذا، فَلِمَ لا تذهبُ بي معك؟ قال: أنت غلامٌ، وأخاف أن يظهرَ منك شيءٌ، قال: قلتُ: لا تَخَفْ، قال: فإنَّ في هذا الجبل قومًا في بِرْطِيلٍ [4] لهم عبادةٌ ولهم صلاحٌ، يذكرون الله ويذكرون الآخرةَ، ويزعمون أنَّا عَبَدةُ النيران، وعبدَةُ الأوثان، وأنَّا على غير دينهم، قال: قلتُ: فاذهَبْ بي معك إليهم، قال: لا أقدِرُ على ذلك حتى أستأمِرَهم، وأنا أخافُ أَن يَظْهَرَ منك شيءٌ فيَعلمَ أبي فيقتلَ القومَ فيكون هلاكُهم على يدي، قال: قلتُ: لن يظهرَ مني ذلك، فاستأمِرْهم، فأتاهم، فقال: غلامٌ عندي يتيمٌ فأُحبُّ أن يأتيكم ويسمعَ كلامَكم، قالوا: إن كنتَ تثقُ به، قال: أرجو ألّا يجيءَ منه إلَّا ما أُحبُّ، قالوا: فجِئْ به، فقال لي: لقد استأذنتُ القومَ، في أن تجيءَ معي، فإذا كانت الساعةُ التي رأيتَني أخرج فيها فأتِني، ولا يعلَمْ بك أحدٌ، فإنَّ أبي إن عَلِم بهم قتلَهم.قال: فلمَّا كانت الساعةُ التي يخرُج، تبعتُه فصَعِدَ الجبل فانتهينا إليهم، فإذا هم في بِرْطِيلهم -قال علي: وأُراه قال: وهم ستةٌ أو سبعة- قال: وكأَن الروحَ قد خَرَج منهم من العبادة؛ يصومون النَّهار، ويقومون الليلَ، ويأكلون الشجَرَ ما وجدوا، فقعدنا إليهم، فأثنى [ابن] [5] الدهقان عليَّ خيرًا، فتكلَّموا، فحَمِدوا الله وأثنَوا عليه، وذكروا من مَضَى من الرُّسل والأنبياء حتى خَلَصُوا إلى ذكر عيسى ابن مريم عليه السلام، فقالوا: بعثَ الله عيسى عليه السلام رسولًا وسخَّر له ما كان يَفعلُ من إحياء الموتى، وخلق الطير، وإبراءِ الأكمهِ والأبرصِ والأعمى، فكَفَر به قومٌ وتَبِعُه قومٌ، وإنما كان عبدًا الله ورسولَه ابتَلَى به خلقَه.قال: وقالوا قبلَ ذلك: يا غُلامُ، إنَّ لك لربًّا، وإنَّ لك معادًا، وإنَّ بين يديك جنةً ونارًا إليها تصيرُ، وإنَّ هؤلاء القومَ الذين يعبدون النِّيران أهلُ كفر وضلالة، لا يرضى الله ما يصنعون، وليسوا على دينٍ.فلما حضرتِ الساعةُ التي ينصرفُ فيها الغلامُ انصرف وانصرفتُ معه، ثم غَدَونا إليهم، فقالوا مثلَ ذلك وأحسنَ، ولزمتُهم، فقالوا لي: يا سلمانُ، إنَّك غلامٌ وإنك لا تستطيعُ أن تصنعَ كما نصنعُ، فصلِّ ونَمْ، وكُلْ واشرَبْ.قال: فاطَّلع الملكُ على صنيع ابنه، فرَكِبَ في الخيل حتى أتاهم في بِرْطِيلهم، فقال: يا هؤلاء، قد جاورتموني فأحسنتُ جِوارَكم، ولم تَرَوا مني سُوءًا، فَعَمَدتُم إلى ابني فأفسدتُموه عليَّ، قد أجلتُكم ثلاثًا، فإن قدرت عليكم بعدَ ثلاث، أحرقتُ عليكم بِرْطِيلكم هذا، فالْحقُوا ببلادكم، فإنِّي أكرهُ أن يكون مني إليكم سوءٌ، قالوا: نعم، ما تعمَّدْنا مساءَتك ولا أردنا إلَّا الخيرَ، فكفَّ ابنه عن إتيانِهم، فقلت له: اتقِ الله؛ فإنَّك تعرِفُ أنَّ هذا الدينَ دينُ الله، وأنَّ أباك ونحن على غيرِ دينٍ، إنما هم عبَدةُ النِّيران لا يعبدون الله، فلا تَبعْ آخرتَك بدنيا غيرِك، قال: يا سلمانُ، هو كما تقول، وإنما أتخلَّف عن القوم بَقيًا عليهم، إن تبعتُ القومَ طلبني أبي في الجبل، وقد خرج في إتياني [6] إياهم حتى طردَهم، وقد أعرفُ أنَّ الحقَّ في أيديهم. فأتيتُهم في اليوم الذي أرادوا أن يرتحلوا فيه، فقالوا: يا سلمان، قد كنَّا نحذَرُ مكانَ ما رأيتَ، فاتقِ الله واعلَمْ أنَّ الدينَ ما أوصيناك به، وأنَّ هؤلاء عَبَدة النِّيران، لا يعرفون الله ولا يذكرونه، فلا يَخدعنَّك أحدٌ عن دينك، قلتُ: ما أنا بمفارقِكم، قالوا: أنتَ لا تقدر أن تكون معنا، نحن نصومُ النهارَ، ونقومُ الليلَ، ونأكلُ الشجَرَ وما أصَبْنا، وأنت لا تستطيعُ ذلك، قال: فقلتُ: لا أفارقُكم، قالوا: أنت أعلم، وقد أعلمناك حالَنا، فإذْ أَبَيتَ خُذْ مِقدارَ حِملٍ يكون معك شيءٌ تأكله، فإنَّك لا تستطيعُ ما نستطيعُ نحن، قال: ففعلتُ ولقيتُ أخي فعرضتُ عليه [فأَبى] ثم أتيتُهم، فأتيتُهم يمشون وأمشي معهم، فرزق الله السلامةَ حتى قَدِمنا المَوْصِلَ فأتينا بيعةً بالموصل، فلما دخلوا احتَفَوا بهم، وقالوا: أين كنتُم؟ قالوا: كُنَّا في بلادٍ لا يذكرون الله، بها عَبَدة النيران، فطردونا فقَدِمنا عليكم.فلما كان بعدُ قالوا: يا سلمانُ، إنَّ هاهنا قومًا في هذه الجبال هم أهلُ دينٍ، وإنَّا نريدُ لقاءَهم، فكن أنت هاهنا مع هؤلاء، فإنهم أهلُ دين، وسترى منهم ما تحبُّ. قلتُ: ما أنا بمفارِقكم. قال: وأَوصَوا بي أهل البِيعة، فقالوا: أَقِمْ معنا يا غلام، فإنه لا يُعجِزُك شيء. قلتُ لهم: ما أنا بمفارقِكم، قال: فخرجوا وأنا معهم، فأصبحوا بينَ جبالٍ، وإذا صخرةٌ وماء كثير في جِرار وخبزٌ كثير، فقعدنا عند الصخرة، فلما طلعت الشمس خرجوا من بين تلك الجبال، يخرج رجلٌ رجلٌ من مكانه، كأن الأرواح قد انتُزعت منهم، حتى كَثُروا فرحَّبوا بهم وحَفُّوا، وقالوا: أين كنتم؟ لم نَرَكُم، قالوا: كُنَّا في بلادٍ لا يذكرون الله فيها عَبَدة نِيران، وكُنَّا نعبدُ اللهَ فطردونا، فقالوا: ما هذا الغلام؟ فَطَفِقُوا يُثنون عليَّ، وقالوا: صَحِبَنا من تلك البلاد، فلم نَرَ منه إلَّا خيرًا.قال سلمان: فوالله إنهم لكذلك إذ اطَّلع عليهم رجلٌ من كهف جبلٍ، قال: فجاء حتى سلَّم وجلس فحَفُّوا به وعظَّموه أصحابي الذين كنتُ معهم وأَحدَقوا به، فقال: أين كنتم؟ فأخبروه، فقال: ما هذا الغلامُ معكم؟ فأثْنَوا عليَّ خيرًا وأخبروه باتباعي إياهم، ولم أرَ مثلَ إعظامهم إياه، فحَمِدَ الله وأثنى عليه، ثم ذَكَرَ من أرسلَ من رُسلِه وأنبيائه وما لَقُوا، وما صُنِعَ بهم، وذكر مولدَ عيسى ابن مريم عليه السلام، وأنَّه وُلِدَ بغير ذَكَرٍ فبعثه الله عز وجل رسولًا، وأَجْرى [7] على يديه إحياءَ الموتى، وأنه يَخلُقُ من الطِّين كهيئة الطير، فينفخُ فيه فيكون طيرًا بإذن الله، وأَنزلَ عليه الإنجيلَ وعلَّمه التوراةَ، وبعثه رسولًا إلى بنى إسرائيل، فكَفَرَ به قومٌ وآمَنَ به قومٌ، وذَكَر بعضَ ما لقي عيسى ابنُ مريم، وأنَّه كان عبدًا الله أنعمَ الله عليه فشكر ذلك له، ورضي الله عنه حتى قَبَضَه الله عز وجل، وهو يَعِظُهم ويقول: اتقوا الله والزَمُوا ما جاء به عيسى عليه السلام، ولا تُخالفوا فيُخالَفَ بكم.ثم قال: من أراد أن يأخذَ من هذا شيئًا، فليأخُذْ، فجعَلَ الرجلُ يقوم فيأخذ الجَرَّة من الماء والطعامَ والشيءَ، فقام أصحابي الذين جئتُ معهم فسلَّموا عليه وعظَّموه، وقال لهم: الزَمُوا هذا الدِّينَ وإياكم أن تَفرَّقوا، واستَوصُوا بهذا الغلام خيرًا، وقال لي: يا غلام، هذا دِينُ الله الذي تسمعُني أقولُه، وما سواه الكفرُ، قال: قلتُ: ما أنا بمفارقِك، قال: إنَّك لا تستطيعُ أن تكون معي، إني لا أخرجُ من كهفي هذا إلَّا كلَّ يوم أَحد، ولا تَقدِرُ على الكَينُونة معي، قال: وأقبل عليَّ أصحابُه، فقالوا: يا غلام، إنَّك لا تستطيعُ أن تكون معه، قلتُ: ما أنا بمفارقِكَ، قال له أصحابُه: يا فلان، إِنَّ هذا غلامٌ ويُخاف عليه، قال: فقال لي: أنت أعلم، قلتُ: فإني لا أُفَارِقُك، فبكى أصحابي الأولون الذين كنتُ معهم عند فِراقِهم إياي، فقال: يا غلام، خُذْ من هذا الطعام ما تَرَى أنه يكفيك إلى الأحدِ الآخر، وخُذْ من الماء ما تكتفي به، ففعلتُ، فما رأيتُه نائمًا ولا طاعمًا، إلا راكعًا وساجدًا إلى الأحد الآخر، فلما أصبحنا، قال لي: خُذْ جَرَّتَك هذه وانطلِقْ، فخرجتُ معه أتبعُه حتى انتهينا إلى الصخرة، وإذا هم قد خرجوا من تلك الجبال ينتظرون خروجه، فقعدوا وعادَ في حديثه نحوَ المرَّةِ الأولى، فقال: الزَمُوا هذا الدِّينَ ولا تَفرَّقوا، واتقوا الله [8]، واعلموا أنَّ عيسى ابنَ مريم عليه السلام كان عبدًا الله أنعمَ الله عليه، ثم ذَكَرني، فقالوا له: يا فلانُ، كيف وجدتَ هذا الغلامَ؟ فأثنى عليَّ وقال خيرًا، فحمِدُوا الله، وإذا خبزٌ كثير، وماءٌ كثير، فأخذُوا وجعَلَ الرجلُ يأخذ ما يكتفي به، وفعلتُ، فتفرَّقوا في تلك الجبال، ورَجَعَ إلى كهفِه ورجعتُ معه.فَلبِثْنا ما شاء الله يخرجُ في كلِّ يوم أَحد، ويخرجون معه ويَحُفُّون به ويُوصيهم بما كان يُوصيهم به، فخرج في أَحدٍ، فلما اجتمعوا حَمِدَ الله ووَعَظَهم وقال مثل ما كان يقولُ لهم، ثم قال لهم آخرَ ذلك: يا هؤلاء، إنه قد كَبِرَ سِنِّي، ورَقَّ عظمي، واقتربَ أجلي، وإنه لا عهدَ لي بهذا البيت منذ كذا وكذا، ولا بدَّ من إتيانه، فاستوصُوا بهذا الغلام خيرًا، فإني رأيتُه لا بأسَ به، قال: فجَزعَ القومُ، فما رأيتُ مثل جَزَعِهم، وقالوا يا فلانُ، أنت كبيرٌ وأنت وحدك، ولا نأمنُ أن يُصيبَك الشيءُ، نساعدك أحوج [9] ما كنَّا إليك، قال: فلا تُراجعوني، لا بدَّ من إتيانِه، ولكن استوصُوا بهذا الغلام خيرًا، وافعُلوا وافعُلوا، قال: فقلتُ: ما أنا بمفارقِك، قال: يا سلمان، قد رأيتَ حالي وما كنتُ عليه، وليس هذا كذلك، أنا أمشي أصومُ النَّهارَ وأقومُ الليل، ولا أستطيعُ أن أحملَ معي زادًا ولا غيرَه، وأنت لا تقدرُ على هذا، قلتُ: ما أنا بمفارِقك، قال: أنت أعلم، قال: فقالوا: يا فلان، فإنَّا نخافُ على هذا الغلام، قال: فهو أعلم، قد أعلمتُه الحالَ، وقد رأى ما كان قبلَ هذا، قلتُ: لا أفارِقُك، قال: فبَكَوا وودَّعوه، وقال لهم: اتقوا الله وكونُوا على ما أوصيتُكم به، فإن أعِشْ فعليَّ أرجع إليكم، وإن متُّ فإنَّ الله حيٌّ لا يموتُ، فسلَّم عليهم وخرجَ وخرجتُ معه، وقال لي: احمِلْ معك من هذا الخبز شيئًا تأكلُه. فخرج وخرجتُ معه، يمشي وأتبعَهُ، يذكرُ الله ولا يلتفتُ ولا يقفُ على شيء، حتى إذا أمسينا قال: يا سلمان، صلِّ أنت ونَمْ، وكُلْ واشْرَبْ، ثم قام هو يُصلِّي حتى انتهينا إلى بيت المَقدس، وكان لا يرفع طَرْفَه إلى السماء، حتى إذا انتهينا إلى باب المسجد، وإذا على الباب مُقعَد، فقال: يا عبد الله، قد تَرَى حالي فتصدَّق عليَّ بشيء، فلم يَلتفِتْ إليه ودخلَ المسجد ودخلتُ معه، فجعل يتبعُ أمكنةً من المسجد يصلِّى فيها، قال: يا سلمان، إنِّي لم أنَمْ منذ كذا وكذا، ولم أجِدْ طعمَ النوم، فإن أنت جعلتَ أن تُوقِظَني إذا بلغ الظِّلُّ مكانَ كذا وكذا نمتُ، فإني أُحبُّ أن أنام في هذا المسجد، وإلَّا لم أنَمْ، قال: قلتُ: فإني أفعلُ، [قال]: فإذا بلغ الظلُّ مكانَ كذا وكذا، فأيقظني إذا غَلَبَتْني عيني، فنام فقلتُ في نفسي: هذا لم يَنَمْ مذ كذا وكذا، وقد رأيتُ بعضَ ذلك، لأدعنَّه ينام حتى يَشتفِيَ من النوم، قال: وكان فيما يمشي وأنا معه يُقبلُ عليَّ فيَعظُني ويُخبرني أنَّ لي ربًّا وأنَّ بين يدي جنةً ونارًا وحسابًا، ويُعلِّمني ويذكِّرني نحو ما يُذكّر القومَ يومَ الأحد، حتى قال فيما يقول: يا سلمان، إنَّ الله عز وجل سوف يبعث رسولًا اسمُه أحمدُ، يخرج بتِهَامةَ -وكان رجلًا عجميًا لا يُحسِنُ أن يقول: محمد -علامتُه أنه يأكل الهديَّةَ ولا يأكلُ الصدقةَ، بين كتفيه خاتمٌ، وهذا زمانُه الذي يخرج فيه قد تقارَبَ، فأما أنا فإني شيخٌ كبير، ولا أحسبُني أُدرِكُه، فإن أدركتَه أنت فصدَّقْه واتَّبِعْه، قال: قلتُ: وإن أمرني بترك دينك وما أنت عليه، قال: فاترُكْه، فإنَّ الحقّ فيما يأمرُ به، ورضا الرحمن فيما قال.فلم يمضِ إِلَّا يسير حتى استيقظ فَزِعًا يذكرُ الله، فقال لي: يا سلمان، مَضَى الفَيءُ من هذا المكان ولم أذكِر الله، أين ما كنتَ جعلت على نفسك؟ قال: أخبرتَني أنَّك لم تنم منذ كذا وكذا، وقد رأيتُ بعض ذلك، فأحببت أن تشتفي من النوم، فَحَمِدَ الله وقام، فخرج وتبعتُه فمرَّ بالمُقعَد، فقال المُقعد: يا عبد الله، دخلتَ فسألتُك فلم تُعطني، وخرجتَ فسألتُك فلم تُعطني، فقام ينظرُ هل يرى أحدًا، فلم يَرَه، فدنا منه فقال له: ناولني يدك، فناوله، فقال: [قم] باسم الله، فقام كأنه أُنشِطَ من عِقالٍ صحيحًا لا عيبَ فيه، فخلَّى عن يده، فانطلق ذاهبًا، فكان لا يلوي على أحدٍ ولا يقومُ عليه، فقال لي المقعدُ: يا غلام، احمِلْ عليَّ ثيابي حتى أنطلقَ فأُبَشِّرَ أهلي، فحملتُ عليه ثيابهَ وانطلق لا يَلوي عليَّ، فخرجتُ في إثره أطلبُه، فكلما سألتُ عنه قالوا: أمامَك، حتى لقينَي ركبٌ من كَلْب، فسألتُهم، فلما سمعوا لغتي [10] أناخَ رجلٌ منهم على بعيره، فحملني خلفه، حتى أتَوا بلادَهم فباعوني، فاشترتني امرأةٌ من الأنصار، فجعلتني في حائطٍ لها.وقَدِمَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فأخبرتُ به، فأخذتُ شيئًا من تمر حائطي فجعلتُه على شيء، ثم أتيتُه فوجدتُ عنده ناسًا، وإذا أبو بكر أقربُ الناس إليه، فوضعتُه بين يديه، فقال: "ما هذا؟ " قلت [11]: صدقة، قال للقوم: "كُلُوا"، ولم يأكُلْ، ثم لبثتُ ما شاء الله، ثم أخذتُ مثلَ ذلك فجعلتُه على شيء، ثم أتيتُه فوجدتُ عنده ناسًا، وإذا أبو بكر أقربُ القوم منه، فوضعته بين يديه فقال لي: "ما هذا؟ " فقلت: هدية، قال: "باسم الله"، وأكل وأكل القومُ، قال: قلتُ في نفسي: هذه من آياته، كان صاحبي رجلًا أعجميًا لم يُحسِنْ أن يقول: تهامة، فقال: تهمة، وقال: أحمد، فدُرْتُ خلفَه ففَطِنَ بي، فأرخَى ثوبَه، فإذا الخاتَمُ في ناحية كَتِفِه الأيسر فتبيّنتُه، ثم دُرْتُ حتى جلستُ بينَ يديه، فقلتُ: أشهد أن لا إله إلَّا الله، وأنَّك رسولُ الله، قال: "مَن أنت؟ " قلتُ: مملوك. قال: فحدَّثتُه حديثي وحديثَ الرجل الذي كنتُ معه وما أمرني به، قال: "لمن أنت؟ " قلتُ: لامرأةٍ من الأنصار جعلتني في حائطٍ لها، قال: "يا أبا بكر" قال: لبَّيك، قال: "اشتَرِه"، فاشتراني أبو بكر فأعتقَني، فلَبِثْتُ ما شاءَ الله أن ألبَثَ [ثم أتيتُه] فسلَّمت عليه وقعدتُ بين يديه، فقلتُ: يا رسولَ الله، ما تقولُ في دين النصارى؟ قال: "لا خيرَ فيهم ولا في دينهم"، فدخلَني أمرٌ عظيم، فقلتُ في نفسي: هذا الذي كنتُ معه ورأيتُ ما رأيتُه، ثم رأيته أخذ بيد المُقعَد فأقامه الله على يديه لا خير في هؤلاء ولا في دينهم؟!فانصرفتُ وفي نفسي ما شاء الله، فأنزل الله عز وجل على النبيِّ صلى الله عليه وسلم {ذَلِكَ بِأَنَّ مِنْهُمْ قِسِّيسِينَ وَرُهْبَانًا وَأَنَّهُمْ لَا يَسْتَكْبِرُونَ} إلى آخر الآية [المائدة: 82]، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "عليَّ بسلمان"، فأتى الرسول وأنا خائفٌ، فجئتُ حتى قعدتُ بين يديه، فقرأ: "بسم الله الرحمن الرحيم {ذَلِكَ بِأَنَّ مِنْهُمْ قِسِّيسِينَ وَرُهْبَانًا وَأَنَّهُمْ لَا يَسْتَكْبِرُونَ} -إلى آخر الآية- يا سلمانُ، إنَّ أولئك الذين كنتَ معهم وصاحِبَك لم يكونوا نصارى، إنما كانوا مُسلِمين" فقلتُ: يا رسول الله، والذي بَعَثَك بالحقِّ، لَهُوَ الذي أمرني باتّباعك، فقلت له: وإن أمَرني بترك دينِك وما أنت عليه؟ قال: فاترُكْه، فإنَّ الحقَّ وما يحبُّ [اللهُ] فيما يأمرُك به [-4]. قال الحاكم رحمه الله تعالى: هذا حديث صحيحٌ عالٍ في ذكر إسلام سلمان الفارسي رضي الله عنه، ولم يُخرجاه.وقد رُوي عن أبي الطُّفيل عامر بن واثلة عن سلمان من وجه صحيح بغير هذه السياقة، فلم أجد من إخراجه بُدًّا لما في الروايتين من الخلاف في المتن والزيادة والنقصان:
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
কুফাবাসী দুই ব্যক্তি যায়দ ইবনু সুহান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বন্ধু ছিলেন। তারা তাঁর কাছে এলেন এই অনুরোধ নিয়ে যে, তিনি যেন সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে কথা বলেন, যাতে তিনি তাদের কাছে তাঁর ইসলাম গ্রহণের ঘটনা বর্ণনা করেন। তারা যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে চললেন এবং মাদায়েনে গিয়ে সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাক্ষাৎ পেলেন। তখন সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেখানকার আমীর ছিলেন। তিনি একটি চেয়ারে বসে ছিলেন এবং তাঁর সামনে কিছু খেজুরের পাতা ছিল, যা দিয়ে তিনি মাদুর বুনছিলেন [১]। তারা বলেন: আমরা তাঁকে সালাম দিলাম এবং বসলাম। তখন যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: হে আবূ আব্দুল্লাহ! এ দুজন আমার বন্ধু। এদের মধ্যে ভ্রাতৃত্বের সম্পর্ক রয়েছে। তারা আপনার ইসলাম গ্রহণের সূচনালগ্ন কেমন ছিল তা আপনার মুখ থেকে শুনতে আগ্রহী।
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি ছিলাম রামহুরমুয-এর একজন ইয়াতীম বালক। রামহুরমুয-এর এক স্থানীয় নেতার (দেহকানের) ছেলে একজন শিক্ষকের কাছে যাওয়া-আসা করত। আমি তার সংশ্রব অবলম্বন করলাম যাতে আমি তার ছায়ায় থাকতে পারি। আমার চেয়ে এক বড় ভাই ছিল, যে নিজের ব্যাপারে যথেষ্ট ছিল। আমি ছিলাম একজন ছোট বালক। সে যখন তার মজলিস থেকে উঠত, যাদের সে হিফাযত করত তারা বিচ্ছিন্ন হয়ে যেত। যখন তারা বিচ্ছিন্ন হয়ে যেত, তখন সে বের হয়ে যেত এবং তার কাপড় দিয়ে মাথা ঢেকে পাহাড়ে চড়ত। সে এভাবে বহুবার ছদ্মবেশে করত। আমি তাকে বললাম: আপনি তো এমনটা করেন, তবে আমাকে কেন আপনার সাথে নিয়ে যান না? সে বলল: তুমি বালক, আমি ভয় পাই যে তোমার কাছ থেকে কোনো কিছু প্রকাশ হয়ে পড়বে। আমি বললাম: আপনি ভয় করবেন না। সে বলল: এই পাহাড়ের একটি গুহার মধ্যে কিছু লোক আছে, যাদের ইবাদত রয়েছে এবং তারা সৎ লোক। তারা আল্লাহ এবং আখিরাতের স্মরণ করে। তারা মনে করে যে আমরা অগ্নি-উপাসক ও প্রতিমা-পূজক এবং আমরা তাদের ধর্মের উপর নেই। আমি বললাম: তাহলে আমাকে আপনার সাথে তাদের কাছে নিয়ে চলুন। সে বলল: আমি তাদের অনুমতি না নিয়ে তা করতে পারব না। আর আমি ভয় করি যে, তোমার কাছ থেকে কোনো কিছু প্রকাশ পেলে আমার বাবা জানতে পারবেন এবং ঐ লোকদেরকে হত্যা করবেন, ফলে তাদের ধ্বংস আমার হাতেই হবে। আমি বললাম: আমার থেকে এমন কিছু প্রকাশ হবে না। আপনি তাদের অনুমতি নিন।
অতঃপর সে তাদের কাছে গেল এবং বলল: আমার কাছে একটি ইয়াতীম বালক আছে। আমি চাই সে তোমাদের কাছে আসুক এবং তোমাদের কথা শুনুক। তারা বলল: যদি তুমি তাকে বিশ্বাস করো (তবে আসতে পারে)। সে বলল: আমি আশা করি, তার থেকে আমার পছন্দনীয় বিষয় ছাড়া কিছু আসবে না। তারা বলল: তাহলে তাকে নিয়ে এসো। সে আমাকে বলল: আমি লোকদের কাছে তোমার সাথে আসার অনুমতি নিয়েছি। যখন তুমি আমাকে বের হতে দেখবে, তুমি আমার কাছে আসবে। তবে কেউ যেন তোমার ব্যাপারে জানতে না পারে। কারণ আমার বাবা যদি তাদের সম্পর্কে জানতে পারেন, তবে তাদের হত্যা করবেন।
তিনি বলেন: যখন তার বের হওয়ার সময় হলো, আমি তাকে অনুসরণ করলাম। সে পাহাড়ে উঠল এবং আমরা তাদের কাছে পৌঁছলাম। তারা তখন তাদের গুহায় ছিল। (বর্ণনাকারী আলী বলেন: আমার মনে হয় তিনি বলেছেন: তারা ছয় বা সাতজন ছিল।) তিনি বলেন: ইবাদতের কারণে মনে হচ্ছিল যেন তাদের রূহ বের হয়ে গেছে। তারা দিনের বেলা সাওম পালন করত এবং রাতের বেলা সালাত আদায় করত। তারা যা পেত তাই খেত (গাছের পাতা বা ফল)। আমরা তাদের কাছে বসলাম। দেকহানের ছেলে আমার প্রশংসা করল। তারা কথা বলল, আল্লাহর প্রশংসা ও গুণগান করল এবং অতীত রাসূলগণ ও নবীগণের কথা বলল, যতক্ষণ না তারা ঈসা ইবনু মারইয়াম (আঃ)-এর উল্লেখ পর্যন্ত পৌঁছল। তারা বলল: আল্লাহ ঈসা (আঃ)-কে রাসূল করে পাঠালেন এবং তাঁর জন্য এমন সব বিষয় সহজ করে দিলেন, যেমন মৃতকে জীবিত করা, পাখি সৃষ্টি করা এবং জন্মগত অন্ধ, ধবল রোগী ও সাধারণ অন্ধকে নিরাময় করা। অতঃপর একদল লোক তাঁকে অস্বীকার করল এবং একদল লোক তাঁকে অনুসরণ করল। তিনি তো ছিলেন আল্লাহর বান্দা ও রাসূল, যাকে দিয়ে আল্লাহ তাঁর সৃষ্টিকে পরীক্ষা করেছিলেন।
তিনি বলেন: এর আগে তারা আমাকে বলল: হে বালক! তোমার একজন রব আছেন, তোমার একটি প্রত্যাবর্তনস্থল আছে। আর তোমার সামনে জান্নাত ও জাহান্নাম রয়েছে, যেখানে তোমাকে যেতে হবে। আর এই যে লোকেরা যারা আগুনের পূজা করে, তারা কাফির ও পথভ্রষ্ট। তারা যা করে, আল্লাহ তাতে সন্তুষ্ট নন, আর তারা কোনো ধর্মের উপর নেই।
অতঃপর যখন সেই ছেলেটির ফিরে যাওয়ার সময় হলো, সে ফিরে গেল এবং আমিও তার সাথে ফিরে এলাম। পরের দিন সকালে আমরা আবার তাদের কাছে গেলাম। তারা আগের মতোই এবং তার চেয়েও উত্তম কথা বলল। আমি তাদের সাথে লেগে রইলাম। তারা আমাকে বলল: হে সালমান! তুমি বালক এবং তুমি আমাদের মতো করতে পারবে না। তুমি সালাত আদায় করো এবং ঘুমাও, খাও এবং পান করো।
তিনি বলেন: অতঃপর তাদের প্রধান (রাজা/দেকান) তার ছেলের কাজ সম্পর্কে জানতে পারলেন। তিনি অশ্বারোহী দল নিয়ে তাদের গুহায় এলেন এবং বললেন: হে লোক সকল! তোমরা আমার প্রতিবেশী হয়েছিলে এবং আমি তোমাদের সাথে উত্তম প্রতিবেশীর আচরণ করেছি, আর তোমরা আমার থেকে কোনো মন্দ দেখোনি। অথচ তোমরা আমার ছেলেকে বিপথে নিয়ে গেলে! আমি তোমাদের তিন দিনের সময় দিলাম। যদি এর পরেও তোমাদেরকে এখানে পাই, তবে তোমাদের গুহা আগুনে পুড়িয়ে দেব। তোমরা তোমাদের দেশে ফিরে যাও। আমি তোমাদের প্রতি কোনো মন্দ আচরণ করা অপছন্দ করি। তারা বলল: জি হ্যাঁ, আমরা আপনাকে অসন্তুষ্ট করতে চাইনি এবং আমরা শুধু কল্যাণ চেয়েছি। অতঃপর তার ছেলে তাদের কাছে আসা থেকে বিরত হলো।
আমি তাকে বললাম: আল্লাহকে ভয় করো। তুমি জানো যে এই ধর্ম আল্লাহর ধর্ম এবং তোমার বাবা ও আমরা অন্য ধর্মের উপর আছি। তারা তো কেবল অগ্নি-পূজা করে, তারা আল্লাহর ইবাদত করে না। তুমি অন্যের দুনিয়ার জন্য তোমার আখিরাত বিক্রি করো না। সে বলল: হে সালমান! তুমি যা বলছ তা ঠিক। আমি শুধু তাদের প্রতি মায়া করে তাদের থেকে পিছিয়ে আছি। আমি যদি তাদের অনুসরণ করি, তবে আমার বাবা আমাকে পাহাড়ে খুঁজবেন। তিনি ইতিমধ্যেই আমার তাদের কাছে যাওয়ার কারণে বের হয়ে তাদের তাড়িয়ে দিয়েছেন। আমি তো জানি যে সত্য তাদের হাতেই।
যেদিন তারা চলে যেতে চাইল, আমি সেদিন তাদের কাছে গেলাম। তারা বলল: হে সালমান! আমরা যা দেখলাম, সেটার আশঙ্কা আমরা করছিলাম। তুমি আল্লাহকে ভয় করো এবং জেনে রাখো যে, এই ধর্মই হলো সেই ধর্ম যা আমরা তোমাকে উপদেশ দিয়েছি। আর এই অগ্নি-পূজকরা আল্লাহকে চেনে না এবং স্মরণ করে না। কেউ যেন তোমাকে তোমার দ্বীন থেকে ধোঁকা না দেয়। আমি বললাম: আমি তোমাদের থেকে আলাদা হব না। তারা বলল: তুমি আমাদের সাথে থাকতে পারবে না। আমরা দিনে সাওম পালন করি, রাতে সালাত আদায় করি, আর গাছের পাতা ও যা পাই তা খাই, তুমি তা পারবে না। তিনি বলেন: আমি বললাম: আমি তোমাদের থেকে আলাদা হব না। তারা বলল: তুমি ভালো জানো। আমরা আমাদের অবস্থা তোমাকে জানিয়ে দিয়েছি। যেহেতু তুমি মানতে চাচ্ছ না, তাই তোমার সাথে কিছু বহনযোগ্য খাবার নাও, যা তুমি খেতে পারো। কারণ আমরা যা করতে পারি, তুমি তা করতে পারবে না।
তিনি বলেন: আমি তাই করলাম এবং আমার ভাইয়ের সাথে দেখা করে তাকেও প্রস্তাব দিলাম, কিন্তু সে অস্বীকার করল। অতঃপর আমি তাদের কাছে গেলাম। তারা হেঁটে চলছিল, আমি তাদের সাথে হাঁটছিলাম। আল্লাহ নিরাপদে থাকার তাওফীক দিলেন, এমনকি আমরা মওসিল পৌঁছলাম। আমরা মওসিলের একটি গির্জায় গেলাম। তারা ভেতরে প্রবেশ করলে, সেখানকার লোকেরা তাদের সাদরে গ্রহণ করল এবং বলল: তোমরা কোথায় ছিলে? তারা বলল: আমরা এমন একটি দেশে ছিলাম, যেখানে আল্লাহর স্মরণ করা হয় না, সেখানে অগ্নি-পূজকরা ছিল। তারা আমাদের তাড়িয়ে দিয়েছে, তাই আমরা তোমাদের কাছে এসেছি।
এর কিছুদিন পর তারা বলল: হে সালমান! এই পর্বতমালায় কিছু লোক আছে, যারা ধর্মের লোক। আমরা তাদের সাথে সাক্ষাৎ করতে চাই। তুমি এই লোকদের সাথে থাকো, কারণ এরাও ধার্মিক লোক এবং তুমি তাদের থেকে যা পছন্দ করো তা দেখতে পাবে। আমি বললাম: আমি তোমাদের থেকে আলাদা হব না। তিনি বলেন: তারা গির্জার লোকদের কাছে আমার ব্যাপারে উপদেশ দিল এবং বলল: হে বালক, আমাদের সাথে থাকো, কারণ তোমার জন্য কোনো কিছু কঠিন হবে না। আমি তাদের বললাম: আমি তোমাদের থেকে আলাদা হব না।
তিনি বলেন: তারা বের হয়ে গেল এবং আমি তাদের সাথে গেলাম। তারা একটি পাহাড়ের মাঝে সকাল করল। সেখানে একটি পাথর ছিল এবং প্রচুর পাত্রে পানি ও অনেক রুটি ছিল। আমরা সেই পাথরের কাছে বসলাম। সূর্য উঠলে, তারা সেই পর্বতমালা থেকে একজন একজন করে বের হয়ে এলো, যেন ইবাদতের কারণে তাদের রূহ বের করে নেওয়া হয়েছে। যখন তারা অনেক হয়ে গেল, তখন তারা তাদের স্বাগত জানাল ও ঘিরে ধরল এবং বলল: তোমরা কোথায় ছিলে? আমরা তোমাদের দেখিনি। তারা বলল: আমরা এমন এক দেশে ছিলাম, যেখানে আল্লাহর স্মরণ করা হয় না। সেখানে অগ্নি-পূজকরা ছিল, আমরা আল্লাহর ইবাদত করতাম, তাই তারা আমাদের তাড়িয়ে দিয়েছে। তারা বলল: এই বালক কে?
তারা আমার প্রশংসা করতে শুরু করল এবং বলল: সে আমাদের সাথে সেই দেশ থেকে এসেছে, আমরা তার মধ্যে কল্যাণ ছাড়া কিছু দেখিনি। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহর শপথ! তারা যখন এই কথা বলছিল, তখন একজন লোক একটি গুহা থেকে বেরিয়ে এলো। সে এসে সালাম দিল ও বসল। আমার সঙ্গীরা তাকে ঘিরে ধরল, তাকে সম্মান করল এবং তার পাশে জমায়েত হলো। তিনি বললেন: তোমরা কোথায় ছিলে? তারা তাকে জানাল। তিনি বললেন: তোমাদের সাথে এই বালক কে? তারা আমার প্রশংসা করল এবং আমার তাদের অনুসরণ করার কথা জানাল। আমি তাদের তাকে সম্মান করার মতো কাউকে দেখিনি।
তিনি আল্লাহর প্রশংসা ও গুণগান করলেন, অতঃপর প্রেরিত রাসূলগণ ও নবীগণ এবং তাঁরা কীসের সম্মুখীন হয়েছিলেন ও তাঁদের সাথে কেমন আচরণ করা হয়েছিল, তা আলোচনা করলেন। তিনি ঈসা ইবনু মারইয়াম (আঃ)-এর জন্মের কথা উল্লেখ করলেন এবং বললেন: তিনি পুরুষ সঙ্গ ছাড়াই জন্মগ্রহণ করেছেন। আল্লাহ তা‘আলা তাঁকে রাসূল করে পাঠালেন এবং তাঁর হাতে মৃতকে জীবিত করার অলৌকিক ঘটনা সংঘটিত করলেন। তিনি মাটি দিয়ে পাখির মতো আকৃতি তৈরি করতেন এবং তাতে ফুঁক দিতেন, ফলে আল্লাহর অনুমতিতে তা পাখি হয়ে যেত। তিনি তাঁর উপর ইঞ্জিল নাযিল করলেন এবং তাঁকে তাওরাত শিক্ষা দিলেন। তিনি বনী ইসরাঈলের কাছে রাসূল হিসেবে প্রেরিত হলেন। একদল লোক তাঁকে অস্বীকার করল আর একদল লোক তাঁকে বিশ্বাস করল। তিনি ঈসা ইবনু মারইয়াম (আঃ)-এর সম্মুখীন হওয়া কিছু সমস্যার কথা উল্লেখ করলেন এবং বললেন: তিনি ছিলেন আল্লাহর বান্দা, যাকে আল্লাহ নিয়ামত দান করেছিলেন। তিনি তার জন্য শুকরিয়া আদায় করলেন এবং আল্লাহ তাঁর উপর সন্তুষ্ট ছিলেন, যতক্ষণ না আল্লাহ তা‘আলা তাঁকে তুলে নিলেন।
তিনি তাদের উপদেশ দিচ্ছিলেন এবং বলছিলেন: আল্লাহকে ভয় করো এবং ঈসা (আঃ) যা নিয়ে এসেছেন তা আঁকড়ে ধরো। তোমরা ভিন্নমত পোষণ করো না, অন্যথায় তোমাদেরও ভিন্নমত পোষণ করা হবে। এরপর তিনি বললেন: যে এর থেকে কিছু নিতে চায়, সে যেন নেয়। তখন একজন লোক উঠে পাত্র ভর্তি পানি ও খাদ্য নিল। আমার যে সঙ্গীদের সাথে আমি এসেছিলাম, তারা উঠে তাঁকে সালাম দিল ও সম্মান করল। তিনি তাদের বললেন: তোমরা এই দ্বীনকে আঁকড়ে ধরো এবং তোমরা যেন বিচ্ছিন্ন না হয়ে যাও। আর এই বালকটির প্রতি উত্তম ব্যবহারের উপদেশ দিলাম। তিনি আমাকে বললেন: হে বালক! এই হলো আল্লাহর দ্বীন যা তুমি আমাকে বলতে শুনলে। আর এ ছাড়া যা আছে তা কুফর।
আমি বললাম: আমি আপনাকে ছেড়ে যাব না। তিনি বললেন: তুমি আমার সাথে থাকতে পারবে না। আমি কেবল প্রতি রবিবার আমার এই গুহা থেকে বের হই। তুমি আমার সাথে থাকার ক্ষমতা রাখবে না। তিনি বলেন: তার সঙ্গীরা আমার দিকে মনোযোগ দিয়ে বলল: হে বালক! তুমি তার সাথে থাকতে পারবে না। আমি বললাম: আমি আপনাকে ছেড়ে যাব না। তার সঙ্গীরা তাঁকে বলল: হে অমুক! এই বালককে নিয়ে ভয় হয়। তিনি আমাকে বললেন: তুমি ভালো জানো। আমি বললাম: আমি আপনাকে ছেড়ে যাব না।
আমার প্রথম সঙ্গীরা আমাকে ছেড়ে যাওয়ার কারণে কেঁদেছিল। তিনি বললেন: হে বালক! এই খাবার থেকে যা তোমার মনে হয় পরবর্তী রবিবার পর্যন্ত যথেষ্ট হবে, তা নাও এবং পানিও যথেষ্ট পরিমাণ নাও। আমি তাই করলাম। আমি তাকে পরবর্তী রবিবার পর্যন্ত সালাতে রুকূ ও সিজদা করা ছাড়া ঘুমন্ত বা খাদ্য গ্রহণকারী হিসেবে দেখিনি। যখন সকাল হলো, তিনি আমাকে বললেন: তোমার এই পাত্রটি নাও এবং চলো। আমি তার সাথে বের হলাম এবং তাকে অনুসরণ করলাম, যতক্ষণ না আমরা পাথরের কাছে পৌঁছলাম। দেখা গেল যে তারা সেই পর্বতমালা থেকে বেরিয়ে এসেছে এবং তাঁর বের হওয়ার অপেক্ষা করছে। তারা বসল এবং তিনি প্রথম বারের মতো আবার কথা বললেন। তিনি বললেন: তোমরা এই দ্বীনকে আঁকড়ে ধরো এবং বিচ্ছিন্ন হয়ে যেও না। আল্লাহকে ভয় করো এবং জেনে রাখো যে, ঈসা ইবনু মারইয়াম (আঃ) ছিলেন আল্লাহর বান্দা, যাকে আল্লাহ নিয়ামত দান করেছিলেন।
অতঃপর তিনি আমাকে নিয়ে আলোচনা করলেন এবং তারা তাকে বলল: হে অমুক! এই বালককে আপনার কেমন মনে হলো? তিনি আমার প্রশংসা করলেন এবং ভালো কথা বললেন। অতঃপর তারা আল্লাহর প্রশংসা করল। সেখানে প্রচুর রুটি এবং প্রচুর পানি ছিল। তারা নিল এবং প্রত্যেকে নিজের জন্য যথেষ্ট পরিমাণে নিল। আমিও তাই করলাম। অতঃপর তারা সেই পর্বতমালায় ছড়িয়ে গেল এবং তিনি তার গুহায় ফিরে গেলেন, আর আমিও তার সাথে ফিরে গেলাম।
আমরা আল্লাহর ইচ্ছায় সেখানে অবস্থান করলাম। তিনি প্রতি রবিবার বের হতেন, আর তারাও তার সাথে বের হতো এবং তাকে ঘিরে ধরত। তিনি তাদের যা উপদেশ দিতেন, তা দিয়ে উপদেশ দিতেন। এক রবিবারে তিনি বের হলেন। যখন তারা একত্রিত হলো, তিনি আল্লাহর প্রশংসা করলেন, তাদের উপদেশ দিলেন এবং তাদের যা বলতেন তাই বললেন। অতঃপর তিনি শেষদিকে তাদের বললেন: হে লোক সকল! আমার বয়স হয়েছে, আমার হাড় দুর্বল হয়ে গেছে এবং আমার মৃত্যু নিকটবর্তী হয়েছে। আমি এত দিন ধরে এই ঘরের (বাইতুল মাকদিসের) কাছে আসিনি এবং সেখানে যাওয়া অনিবার্য। তোমরা এই বালকটির প্রতি উত্তম ব্যবহারের উপদেশ দাও। আমি তাকে ভালো দেখেছি। তিনি বলেন: লোকেরা উদ্বিগ্ন হয়ে পড়ল। আমি তাদের উদ্বেগের মতো উদ্বেগ দেখিনি। তারা বলল: হে অমুক! আপনি বয়স্ক এবং আপনি একা। আমরা নিরাপদ বোধ করি না যে আপনার কোনো কিছু হবে। আমরা আপনার পাশে থাকব, যখন আমাদের আপনাকে সবচেয়ে বেশি প্রয়োজন। তিনি বললেন: তোমরা আমাকে আরজি করো না। সেখানে যাওয়া অনিবার্য। তবে তোমরা এই বালকটির প্রতি উত্তম ব্যবহারের উপদেশ দাও এবং তোমরা অমুক অমুক কাজ করো।
তিনি বলেন: আমি বললাম: আমি আপনাকে ছাড়ব না। তিনি বললেন: হে সালমান! তুমি আমার অবস্থা দেখেছ এবং আমি কীসের উপর ছিলাম। এটি তেমন নয়। আমি হেঁটে যাই, দিনে সাওম পালন করি এবং রাতে সালাত আদায় করি। আমি আমার সাথে কোনো খাবার বা অন্য কিছু নিতে পারি না, আর তুমি এটা পারবে না। আমি বললাম: আমি আপনাকে ছাড়ব না। তিনি বললেন: তুমি ভালো জানো। তিনি বলেন: তখন তারা বলল: হে অমুক! আমরা এই বালককে নিয়ে ভয় পাচ্ছি। তিনি বললেন: সে ভালো জানে। আমি তাকে অবস্থা জানিয়েছি এবং সে এর আগে যা ছিল তা দেখেছে। আমি বললাম: আমি আপনাকে ছাড়ব না।
তিনি বলেন: তখন আমার প্রথম সঙ্গীরা আমাকে বিদায় জানাতে গিয়ে কেঁদেছিল। তিনি বললেন: হে বালক! এই খাবার থেকে যা তোমার মনে হয় পরবর্তী রবিবার পর্যন্ত যথেষ্ট হবে, তা নাও। আর পানিও যথেষ্ট পরিমাণে নাও। আমি তাই করলাম। তিনি বের হলেন এবং আমিও তার সাথে বের হলাম। তিনি হাঁটছিলেন এবং আমি তাকে অনুসরণ করছিলাম। তিনি আল্লাহর স্মরণ করছিলেন, কোনো দিকে ফিরছিলেন না বা কোনো কিছুতে থামছিলেন না, যতক্ষণ না আমরা বাইতুল মাকদিসে পৌঁছলাম। তিনি আকাশের দিকে চোখ তুলতেন না।
যখন আমরা মসজিদের দরজায় পৌঁছলাম, সেখানে একজন পঙ্গু লোক ছিল। সে বলল: হে আল্লাহর বান্দা! আপনি আমার অবস্থা দেখছেন, আমাকে কিছু সদকা দিন। তিনি তার দিকে মনোযোগ দিলেন না এবং মসজিদে প্রবেশ করলেন। আমিও তার সাথে প্রবেশ করলাম। তিনি মসজিদের কিছু নির্দিষ্ট স্থানে সালাত আদায় করতে লাগলেন। তিনি বললেন: হে সালমান! আমি এত দিন ধরে ঘুমাইনি এবং ঘুমের স্বাদ পাইনি। যদি তুমি এমন করো যে, ছায়া যখন অমুক স্থানে পৌঁছবে, তখন আমাকে জাগিয়ে দেবে, তবে আমি ঘুমাব। আমি এই মসজিদে ঘুমাতে পছন্দ করি। অন্যথায় আমি ঘুমাব না। আমি বললাম: আমি তাই করব। তিনি বললেন: যখন ছায়া অমুক স্থানে পৌঁছবে, তখন আমার চোখ যদি ঘুমিয়ে আসে, তবে আমাকে জাগিয়ে দিও।
তিনি ঘুমিয়ে পড়লেন। আমি মনে মনে বললাম: ইনি এত দিন ধরে ঘুমাননি এবং আমি এর কিছু অংশ দেখেছি। আমি তাকে ঘুমাতে দেব, যতক্ষণ না তার ঘুম পূর্ণ হয়। তিনি বলেন: তিনি যখন আমার সাথে হাঁটছিলেন, তখন আমার দিকে মনোযোগ দিয়ে উপদেশ দিতেন এবং বলতেন যে আমার একজন রব আছেন এবং সামনে জান্নাত, জাহান্নাম ও হিসাব রয়েছে। তিনি আমাকে শিক্ষা দিতেন এবং স্মরণ করিয়ে দিতেন, যেমনটি তিনি রবিবার দিন লোকদের স্মরণ করিয়ে দিতেন।
একসময় তিনি বললেন: হে সালমান! আল্লাহ তা‘আলা শীঘ্রই একজন রাসূল পাঠাবেন, যার নাম আহমাদ। তিনি তিহামা থেকে বের হবেন। (তিনি ছিলেন অনারব ব্যক্তি, তাই 'মুহাম্মাদ' উচ্চারণ করতে পারতেন না)। তাঁর চিহ্ন হলো: তিনি হাদিয়া (উপহার) গ্রহণ করবেন কিন্তু সাদাকা (দান) গ্রহণ করবেন না। তাঁর দুই কাঁধের মাঝে খুতুম (মুহর) থাকবে। এটিই তাঁর বের হওয়ার সময়, যা নিকটবর্তী হয়েছে। আর আমি তো একজন বৃদ্ধ লোক, আমার মনে হয় না আমি তাঁকে পাব। যদি তুমি তাঁকে পাও, তবে তাঁকে বিশ্বাস করো এবং তাঁর অনুসরণ করো। আমি বললাম: যদিও তিনি আমাকে আপনার ধর্ম ও আপনি যার উপর আছেন তা ত্যাগ করার আদেশ দেন? তিনি বললেন: তবে তা ত্যাগ করো। কারণ তিনি যা আদেশ করবেন, তা-ই সত্য এবং রাহমানের সন্তুষ্টি তারই মধ্যে।
অল্প সময়ও পার হলো না, তিনি আতঙ্কিত হয়ে জেগে উঠলেন এবং আল্লাহর স্মরণ করতে লাগলেন। তিনি আমাকে বললেন: হে সালমান! ছায়া এই স্থান থেকে চলে গেছে এবং আমি আল্লাহর স্মরণ করিনি। তুমি নিজেকে যা করতে বাধ্য করেছিলে, তা কোথায়? আমি বললাম: আপনি আমাকে বলেছিলেন যে আপনি এত দিন ধরে ঘুমাননি এবং আমি এর কিছু অংশ দেখেছি, তাই আমি চেয়েছিলাম যে আপনার ঘুম পূর্ণ হোক। অতঃপর তিনি আল্লাহর প্রশংসা করলেন এবং উঠে দাঁড়ালেন। তিনি বের হলেন এবং আমি তাকে অনুসরণ করলাম। তিনি সেই পঙ্গু লোকটির পাশ দিয়ে গেলেন। পঙ্গু লোকটি বলল: হে আল্লাহর বান্দা! আপনি প্রবেশ করেছিলেন, আমি চেয়েছিলাম, কিন্তু আপনি দেননি। আপনি বের হচ্ছেন, আমি চেয়েছিলাম, কিন্তু আপনি দেননি।
তিনি দাঁড়িয়ে দেখলেন যে আশেপাশে কাউকে দেখা যায় কিনা, কিন্তু দেখলেন না। অতঃপর তিনি তার কাছে গেলেন এবং বললেন: তোমার হাতটি আমাকে দাও। সে তার হাত দিল। তিনি বললেন: আল্লাহর নামে ওঠো। সে এমনভাবে উঠে দাঁড়াল, যেন সে রশি থেকে মুক্ত হয়েছে, সুস্থ অবস্থায়, তার মধ্যে কোনো ত্রুটি ছিল না। তিনি তার হাত ছেড়ে দিলেন। সে চলে যেতে লাগল। সে কারো দিকে ফিরল না বা কারো কাছে থামল না। তখন পঙ্গু লোকটি আমাকে বলল: হে বালক! আমার কাপড়গুলো আমাকে তুলে দাও, যাতে আমি গিয়ে আমার পরিবারকে সুসংবাদ দিতে পারি। আমি তার কাপড়গুলো তাকে তুলে দিলাম এবং সে চলে গেল, আমার দিকে আর ফিরেও তাকাল না। আমি তার পিছনে পিছনে তাকে খুঁজতে বের হলাম। যখনই আমি তার সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতাম, তারা বলত: সে তোমার সামনে চলে গেছে।
এমনকি আমি কালব গোত্রের একদল কাফেলার দেখা পেলাম। আমি তাদের কাছে জিজ্ঞাসা করলাম। যখন তারা আমার ভাষা শুনল, তখন তাদের মধ্যে একজন তার উটের উপর বসে পড়ল এবং আমাকে তার পিছনে বসিয়ে নিল, যতক্ষণ না তারা তাদের দেশে পৌঁছল। অতঃপর তারা আমাকে বিক্রি করে দিল। আনসারী এক মহিলা আমাকে কিনলেন এবং তার একটি বাগানে আমাকে রাখলেন।
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (মদিনায়) আগমন করলেন। আমি এ ব্যাপারে খবর পেলাম। আমি আমার বাগানের কিছু খেজুর নিলাম এবং একটি কিছুর উপর রাখলাম। অতঃপর আমি তাঁর কাছে এলাম এবং তাঁর কাছে কিছু লোককে দেখলাম। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন তাঁর সবচেয়ে নিকটবর্তী। আমি তা তাঁর সামনে রাখলাম। তিনি বললেন: “এটা কী?” আমি বললাম: সাদাকা (দান)। তিনি লোকদের বললেন: “তোমরা খাও,” কিন্তু তিনি খেলেন না।
অতঃপর আল্লাহর ইচ্ছায় আমি কিছুকাল অপেক্ষা করলাম। তারপর আমি অনুরূপ পরিমাণ খেজুর নিলাম এবং একটি কিছুর উপর রাখলাম। অতঃপর আমি তাঁর কাছে এলাম এবং তাঁর কাছে কিছু লোককে দেখলাম। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন তাদের মধ্যে তাঁর সবচেয়ে নিকটবর্তী। আমি তা তাঁর সামনে রাখলাম। তিনি আমাকে বললেন: “এটা কী?” আমি বললাম: হাদিয়া (উপহার)। তিনি বললেন: “বিসমিল্লাহ” এবং খেলেন, আর লোকেরাও খেল।
তিনি বলেন: আমি মনে মনে বললাম: এটি তাঁর একটি আলামত। আমার সেই সঙ্গীটি একজন অনারব লোক ছিল, সে 'তিহামা' বলতে পারত না, তাই 'তিহমা' বলেছিল। আর সে 'মুহাম্মাদ' না বলে 'আহমাদ' বলেছিল। আমি তাঁর পিছনে গেলাম। তিনি আমাকে বুঝতে পারলেন এবং তাঁর কাপড় নিচে নামিয়ে দিলেন। তাঁর বাম কাঁধের দিকেই ছিল মোহরটি। আমি তা ভালোভাবে দেখলাম। অতঃপর আমি ফিরে এসে তাঁর সামনে বসলাম এবং বললাম: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং আপনি আল্লাহর রাসূল।
তিনি বললেন: “তুমি কে?” আমি বললাম: একজন গোলাম (দাস)। তিনি বললেন: “তুমি কার?” আমি বললাম: আমি আনসারী এক মহিলার, যিনি আমাকে তাঁর একটি বাগানে রেখেছেন। তিনি বললেন: “হে আবূ বকর!” তিনি বললেন: লাব্বাইক। তিনি বললেন: “তাকে কিনে নাও।” আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে কিনলেন এবং আমাকে মুক্ত করে দিলেন।
অতঃপর আল্লাহর ইচ্ছায় আমি কিছুকাল অবস্থান করলাম। এরপর আমি তাঁর কাছে এলাম, তাঁকে সালাম দিলাম এবং তাঁর সামনে বসলাম। আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আপনি নাসারা (খ্রিস্টান) ধর্ম সম্পর্কে কী বলেন? তিনি বললেন: “তাদের মধ্যে এবং তাদের ধর্মে কোনো কল্যাণ নেই।” এতে আমার মনে বিরাট এক দ্বিধা সৃষ্টি হলো। আমি মনে মনে বললাম: ইনি সেই ব্যক্তি যার সাথে আমি ছিলাম এবং যা দেখেছি, তা দেখেছি। অতঃপর তিনি পঙ্গু লোকটির হাত ধরলেন এবং আল্লাহ তাঁর হাতে তাকে সুস্থ করলেন। অথচ তাদের মধ্যে এবং তাদের ধর্মে কোনো কল্যাণ নেই?!
আমি ফিরে গেলাম এবং আমার মনে আল্লাহর ইচ্ছায় যা থাকার তা রইল। অতঃপর আল্লাহ তা‘আলা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর নাযিল করলেন: {ذَلِكَ بِأَنَّ مِنْهُمْ قِسِّيسِينَ وَرُهْبَانًا وَأَنَّهُمْ لَا يَسْتَكْبِرُونَ} [সূরা মায়িদাহ: ৮২-এর শেষ পর্যন্ত] (এর কারণ হলো তাদের মধ্যে কিছু ধর্মযাজক ও সংসারবিরাগী লোক আছে, আর তারা অহংকার করে না)। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “সালমানকে আমার কাছে ডেকে আনো।”
অতঃপর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দূত এলো, আর আমি ভীত ছিলাম। আমি এসে তাঁর সামনে বসলাম। তিনি পাঠ করলেন: “বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম {ذَلِكَ بِأَنَّ مِنْهُمْ قِسِّيسِينَ وَرُهْبَانًا وَأَنَّهُمْ لَا يَسْتَكْبِرُونَ} – আয়াতের শেষ পর্যন্ত। হে সালমান! তুমি যাদের সাথে ছিলে এবং তোমার সঙ্গী, তারা নাসারা ছিল না, তারা ছিল মুসলিম।” আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! সেই সত্তার শপথ, যিনি আপনাকে সত্য দিয়ে পাঠিয়েছেন! তিনিই আমাকে আপনার অনুসরণ করার নির্দেশ দিয়েছিলেন। আমি তাঁকে বলেছিলাম: যদিও তিনি আমাকে আপনার ধর্ম ও আপনি যার উপর আছেন, তা ত্যাগ করার আদেশ দেন? তিনি বলেছিলেন: তবে তা ত্যাগ করো। কারণ সত্য এবং আল্লাহ যা পছন্দ করেন, তা-ই তিনি তোমাকে আদেশ করবেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في (م) و (ص) إلى: يشقه، وفي (ب): يسعد، والمثبت من نسختي (ن) و (ل 2) كما في طبعة الميمان. وقوله: يسفّه، بالسين المهملة والفاء، من سَفَّ، قال في "لسان العرب": سَفَفْتُ الخوص أسُفُّه، أسفه، بالضم سفًّا، وأسففتُه إسفافًا، أي: نسجته بعضه في بعض، وكلُّ شيء يُنسج بالأصابع فهو الإسفاف.
[2] في نسخنا الخطية: بدو، والمثبت من النسخة المحمودية كما في طبعة الميمان.
6688 [3] - تحرَّف في النسخ الخطية الى أبي والمثبت من "تلخيص الذهبي"، وهو الموافق لما في "دلائل النبوة" للبيهقي. والدهقان، بكسر الدال وضمها: رئيس القرية ومُقدَّم الثُّنَّاء وأصحاب الزراعة، وهو معرَّب، ونونه أصلية، لقولهم: تدهقن الرجلُ، وله دهقنة بموضع كذا. وقيل: النون زائدة، وهو من الدهق: الامتلاء. قاله ابن الأثير في "النهاية". ورامهرمز: مقاطعة في غرب إيران، وتقع في محافظة خوزستان، قريبة من الأهواز.
6688 [4] - البرطيل: كالصومعة، سَريانية معربة.
6688 [5] - من "الدلائل" للبيهقي.
6688 [6] - في "دلائل النبوة" للبيهقي: وقد جزع من إتياني، وهو أليق.
6688 [7] - في النسخ الخطية: وأحيا، والتصويب من "الدلائل".
6688 [8] - في النسخ الخطية ذكر الله، والمثبت من "الدلائل".
6688 [9] - كذا في النسخ الخطية، وفي "السير" للذهبي 1/ 529: ولسنا عندك، ما أحوج ما كنا إليك.
6688 [10] - سقط هذا اللفظ من (م) و (ص)، وفي (ب): الفتى، والمثبت هو الوجه، وهو من نسخة خطية متأخرة كما في طبعة الميمان.
6688 [11] - في النسخ الخطية: قالوا، والمثبت من "الدلائل".
6688 [-4] - إسناده ضعيف، علي بن عاصم -وهو ابن صهيب الواسطي- ضعيف، وسماك بن حرب لم يدرك زيد بن صوحان وبذلك أعله الذهبي في "السيرة النبوية" 1/ 93، فقال: منقطع، فإنه لم يدرك زيد بن صوحان وعلي بن عاصم ضعيف كثير الوهم. وكذا أعلّه في "التلخيص"، بينما قال في "سير النبلاء" 1/ 532: حديث جيد الإسناد حكم الحاكم بصحته!وقال الحافظ ابن كثير في "البداية والنهاية" 3/ 520: وفي هذا السياق غرابة كثيرة، وفيه بعضُ المخالفة لسياق محمد بن إسحاق، وطريقُ محمد بن إسحاق أقوى إسنادًا، وأحسن اقتصاصًا، وأقربُ إلى ما رواه البخاري في "صحيحه" (3946) من حديث معتمر بن سليمان بن طرخان التيمي عن أبيه عن أبي عثمان النَّهدي عن سلمان الفارسي: أنه تداوله بضعةَ عشرَ من ربٍّ إلى ربٍّ. أي: من معلِّم إلى معلِّم، ومربٍّ إلى مثله، والله أعلم. قلنا: رواية ابن إسحاق التي ذكرها ابنُ كثير أخرجها أحمد في "المسند" 39 / (23737) وسلفت عند المصنف برقم (2214) لكن لم يسق كامل لفظها، ورواية البخاري مختصرة بذكر ما أورده ابن كثير. وانظر ما سلف عند المصنف برقم (2898).وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 10/ 322، وفي "دلائل النبوة" 2/ 82 - 92 - ومن طريقه ابن عساكر 21/ 395 - 402 - عن أبي عبد الله الحاكم، عن أبي العبّاس محمد بن يعقوب، عن يحيى بن أبي طالب، بهذا الإسناد. ورواية "السنن" مختصرة بذكر أمره صلى الله عليه وسلم لأبي بكر بشراء سلمان. وقال عقبه فيه عن قصة شراء أبي بكر لسلمان: هذا يخالف الروايات قبله. يعني يخالف سائر الروايات التي تفيد بأنه أعتق نفسه بزرع النخلات.وأخرجه بنحوه الطبراني في "الكبير" (6110)، وفي "الأحاديث الطوال" (8)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 10/ 276 - 280 مطولًا من طريق مسلمة بن علقمة المازني، عن داود بن أبي هند، عن سماك بن حرب، عن سلامة العجلي، عن سلمان. قال الذهبي في "السيرة النبوية" 1/ 91: هذا حديث منكر غريب، والذي قبله أصحّ (يعني حديث ابن إسحاق)، وقد تفرد مسلمة بهذا، وهو ممَّن احتج به، مسلم ووثقه ابن معين، وأما أحمد بن حنبل فضعفه. وقال في "سير النبلاء": 1/ 537 غريب جدًّا، وسلامة لا يعرف.وأخرج نحوه ابن أبي شيبة 6/ 556 و 14/ 321 - 322، وأحمد 39 (23712)، وابن حبان (7124)، والبيهقي في "الدلائل" 6/ 98 - 100 وغيرهم من طريق أبي إسحاق السبيعي، عن أبي قرة الكندي، عن سلمان. وسيأتي مختصرًا جدًا بقصة الهدية عند المصنف برقم (7263)، وإسناده حسن.وأخرج بعضه الواحدي في "أسباب النزول" ص 25 - 26 من طريق أسباط بن نصر عن السدي عن أبي مالك، وعن أبي صالح عن ابن عبّاس، وعن مرة عن ابن مسعود، وعن ناس من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم.وسلف مختصرًا من حديث بريدة برقم (2213)، ومقطعًا من حديث سلمان بالأرقام (2214) و (2898) و (7263).وانظر ما بعده.
6689 - حدثنا علي بن حَمْشاذ العَدْل ومحمد بن أحمد بن بالوَيهِ الجَلَّاب، قالا: حدثنا أبو بكر محمد بن شاذان الجوهري، حدثنا سعيد بن سليمان الواسطي، حدثنا عبد الله بن عبد القُدُّوس، عن عُبيدٍ المُكتِب، حدثني أبو الطُّفيل، حدثني سلمان الفارسي قال: كنتُ رجلًا من أهل جَيٍّ، وكان أهل قريتي يعبدون الخيل البُلْقَ، فكنت أعرفُ أنهم ليسوا على شيء، فقيل لي: إنَّ الدِّين الذي تطلب إنما هو بالمغرب، فخرجت حتى أتيتُ المَوصل، فسألتُ عن أفضل من فيها، فدُلِلتُ على رجل في صومعةٍ، فأتيتُه، فقلت له: إني رجل من أهل جَيٍّ، وإني جئت أطلب العملَ، وأتعلَّم العلمَ، فضُمَّني إليك أخدُمْك وأصحَبْك وتُعلِّمُني شيئًا ممّا علَّمك الله، قال: نعم، فصحبتُه، فأجرَى عليَّ مثلَ ما كان يُجرَى عليه، وكان يُجرَى عليه الخَلُّ والزيتُ والحبوب، فلم أزل معه حتى نزل به الموتُ فجلستُ عند رأسِه أَبكيه، فقال: ما يُبكيك؟ فقلتُ: أبكي أني خرجتُ من بلادي أطلُبُ الخيرَ، فرزقني الله فصحبتُك، فعلَّمتني وأحسنتَ صُحبتي، فنزل بك الموتُ، فلا أدري أين أذهبُ، فقال: لي أخٌ بالجزيرة مكانَ كذا وكذا، وهو على الحق، فأتِه فأقرِتْه منِّي السلامَ، وأخبِرْه أني أوصيتُ إليه وأوصيتُك بصحبته.فلما أن قُبِضَ الرجلُ، خرجتُ حتى أتيتُ الرجلَ الذي وَصَفَه لي فأخبرتُه الخبرَ، وأقرأتُه السلامَ من صاحبه، وأخبرتُه أنه هلك، وأمرني بصُحبته، فضمَّني إليه وأجرى عليَّ كما كان يُجرَى عليَّ مع الآخر، فصحبتُه ما شاء الله، ثم نزل به الموتُ، فلما نزل به الموتُ جلستُ عند رأسه أبكي، فقال لي: ما يُبكيك؟ قلتُ: خرجتُ من بلادي أطلُبُ الخير، فرزقني الله صُحبةَ فلان فأحسنَ صُحبتي وعلَّمني وأوصاني عند موتِه بك، وقد نزلَ بك الموتُ، فلا أدري أين أتوجَّهُ، فقال: تأتي أخًا لي على دَرْبِ الرُّوم فهو على الحقِّ، فأتِه وأقرئه مني السلام، واصحبه فإنه على الحقِّ.فلما قُبِضَ الرجلُ، خرجتُ حتى أتيتُه فأخبرتُه بخبري وتوصية الآخر قبلَه، قال: فضمَّني إليه وأجرى عليَّ كما كان يُجرَى عليَّ، فلما نزل به الموتُ جلستُ أبكي عند رأسِه، فقال لي: ما يُبكيك؟ فقصصتُ قصتي، قلت له: إنَّ الله تعالى رزقَني صُحبتك فأحسنتَ صُحبتَي، وقد نزل بك الموتُ، ولا أدري أين أتوجَّه، فقال: لا أينَ، وما بقي أحدٌ أعلمه على دين عيسى ابن مريم عليه السلام في الأرض، ولكن هذا أوانُ يخرجُ فيه نبيٌّ أو قد خرج بتِهامةَ، وأنت على الطريق لا يمرُّ بك أحدٌ إِلَّا سألتَه عنه، فإذا بلغك أنه خرج، فإنه النبيُّ الذي بشَّر به عيسى صلوات الله عليهما، وآيةُ ذلك أنَّ بين كتفيه خاتَمَ النبوة، وأنه يأكلُ الهديةَ ولا يأكلُ الصدقة.قال: فكان لا يمرُّ بي أحدٌ [1] إلا سألتُه عنه، فمرَّ بي ناسٌ من أهل مكة، فسألتُهم، فقالوا: نعم، ظَهَر فينا رجلٌ يَزْعُمُ أنه نبيٌّ، فقلتُ لبعضهم: هل لكم أن أكونَ عبدًا لبعضكم على أن تحملوني عُقْبةً وتُطعموني من الكسر، فإذا بلغتُم بلادكم فإن شاء أن يبيعَ باع، وإن شاء أن يَستعبِدَ استعبَد، فقال رجلٌ منهم: أنا، فصرتُ عبدًا له حتى أَتى بي مكةَ، فجعلني في بستان له مع حُبْشانٍ كانوا فيه، فخرجتُ فسألتُ فلقيت امرأةً من أهل بلادي فسألتُها، فإذا أهلُ بيتها قد أسلموا، قالت لي: إنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم يَجلِسُ في الحِجر هو وأصحابُه إذا صاح عصفورٌ بمكة حتى إذا أضاء لهم الفجرُ تفرَّقوا، فانطلقتُ إلى البستان فكنتُ أختلِفُ، فقال لي الحُبْشان: ما لك، فقلتُ: أشتكي بَطْني، وإنما صنعتُ ذلك لئلا يَفقِدُوني إذا ذهبتُ إلى النبيِّ صلى الله عليه وسلم، فلما كانت الساعةُ التي أخبرَتْني المرأةُ أنَّه [2] يَجلِسُ فيها هو وأصحابُه، خرجتُ أمشي حتى رأيتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فإذا هو مُحتبي [3]، وإذا أصحابُه حولَه، فأتيتُه مِن ورائه فعَرَفَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم الذي أريدُ، فأرسلَ حَبْوتَه، فنظرتُ إلى خاتَم النُّبوة بين كتفيه، فقلتُ: الله أكبر، هذه واحدةٌ، ثم انصرفتُ، فلما أن كانت الليلةُ المُقبلة لَقَطْتُ تمرًا جيدًا، ثم انطلقتُ حتى أتيتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم فوضعتُه بين يديه، فقال: "ما هذا؟ " [4] فقلتُ: هديةٌ، فأكل، وقال للقوم: "كُلُوا"، قلتُ: أشهد أن لا إله إلَّا الله وأنَّك رسول الله، فسألني عن أمري فأخبرتُه، فقال: "اذْهَبْ فاشترِ نفسَك".فانطلقتُ إلى صاحبي، فقلتُ: بِعْني نفسي، فقال: نعم، على أن تُنبِتَ لي مئةَ نخلةٍ، فإذا نَبَتْنَ جئتَني بوزن نَوَاةٍ من ذهبٍ، فأتيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم فأخبرته، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "اشتَرِ نفسَك بالذي سألك، وأتني بدلوٍ من ماء البئر الذي كنتَ تسقي منها ذلك النخل" فدعا لي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فيها، ثم سقيتُها، فوالله لقد غَرَستُ مئةَ نخلة فما غادَرَت منها نخلةٌ إلَّا نبتَتْ، فأتيتُ رسولَ الله، فأخبرتُه أَنَّ النَّخل قد نَبَتْنَ، فأعطاني قطعةً من ذَهَبٍ، فانطلقتُ بها فوضعتها في كِفَّة الميزان، ووُضِعَ في الجانب الآخر نواةٌ، قال: فوالله ما استقلَّت القطعةُ الذهبُ من الأرض، قال: وجئتُ إلى رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فأخبرتُه فأعتقَني [5]. هذا حديث صحيح الإسناد، والمعاني قريبة من الإسناد الأول.
সালমান আল-ফারসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ছিলাম ‘জায়’ (পারস্যের ইস্পাহান এলাকার একটি জায়গা) শহরের অধিবাসী। আমার গ্রামের লোকেরা ঘোড়ার মতো সাদা-কালো (চিহ্নিত) প্রাণীদের পূজা করত। আমি জানতাম যে তাদের ধর্ম কোনো ভিত্তির ওপর প্রতিষ্ঠিত নয়, তখন আমাকে বলা হলো: তুমি যে দ্বীনটি খুঁজছো তা কেবল পশ্চিম দিকেই (সিরিয়া/শাম অঞ্চলে) পাওয়া যাবে।
এরপর আমি মওসিল (Mosul) পৌঁছা পর্যন্ত যাত্রা করলাম। সেখানে পৌঁছে আমি সেখানকার শ্রেষ্ঠ ব্যক্তির খোঁজ করলাম। আমাকে একটি উপাসনালয়ে থাকা এক ব্যক্তির কথা বলা হলো। আমি তার কাছে গেলাম এবং বললাম: আমি ‘জায়’ শহরের অধিবাসী। আমি আমল অন্বেষণ করতে এবং জ্ঞান অর্জন করতে এসেছি। আমাকে আপনার সাথে রাখুন। আমি আপনার সেবা করব, আপনার সাথী হয়ে থাকব এবং আল্লাহ আপনাকে যা শিক্ষা দিয়েছেন তার কিছু আমাকে শিক্ষা দেবেন। তিনি বললেন: হ্যাঁ, অবশ্যই। এরপর আমি তাঁর সাথী হলাম। তিনি আমার জন্যেও সেই একই খাবারের ব্যবস্থা করলেন যা তাঁর জন্য করা হতো – যেমন সিরকা, তেল এবং শস্যদানা।
আমি তাঁর সাথে দীর্ঘকাল ছিলাম, এরপর যখন তাঁর মৃত্যু উপস্থিত হলো, আমি তাঁর শিয়রে বসে কাঁদতে লাগলাম। তিনি বললেন: তুমি কেন কাঁদছো? আমি বললাম: আমি এই জন্য কাঁদছি যে, আমি ভালো কিছুর সন্ধানে আমার দেশ ছেড়ে এসেছিলাম। আল্লাহ আমাকে আপনার সঙ্গ দান করেছেন, আপনি আমাকে শিক্ষা দিয়েছেন এবং আমার সাথে ভালো ব্যবহার করেছেন। এখন আপনার মৃত্যু উপস্থিত, আমি জানি না কোথায় যাব।
তিনি বললেন: জাজিরাতে (মেসোপটেমিয়া অঞ্চলে) আমার একজন ভাই আছেন, অমুক অমুক স্থানে। তিনি সত্যের ওপর আছেন। তুমি তাঁর কাছে যেয়ো এবং তাঁকে আমার সালাম দিও। তাঁকে বলবে যে, আমি তাঁর প্রতি আমার ওসিয়ত করেছি এবং তোমার প্রতি তাঁকে সঙ্গ দেওয়ার ওসিয়ত করেছি। যখন সেই ব্যক্তি মারা গেলেন, আমি বের হলাম এবং তিনি যার বর্ণনা দিয়েছিলেন সেই ব্যক্তির কাছে গেলাম। আমি তাঁকে খবর জানালাম, তাঁর সাথীর পক্ষ থেকে সালাম দিলাম এবং বললাম যে তিনি মারা গেছেন এবং আমাকে তাঁর সঙ্গ নিতে বলেছেন। তিনি আমাকে তাঁর কাছে রাখলেন এবং প্রথম জনের সাথে আমার জন্য যেরূপ ব্যবস্থা ছিল, তাঁর সাথেও সেরূপ ব্যবস্থা করলেন।
আমি আল্লাহ্র ইচ্ছানুযায়ী তাঁর সাথে থাকলাম। এরপর যখন তাঁর মৃত্যু উপস্থিত হলো, আমি তাঁর শিয়রে বসে কাঁদতে লাগলাম। তিনি আমাকে বললেন: তুমি কেন কাঁদছো? আমি বললাম: আমি আমার দেশ থেকে কল্যাণের সন্ধানে বের হয়েছি। আল্লাহ আমাকে অমুক ব্যক্তির সঙ্গ দান করেছিলেন, তিনি আমার সাথে ভালো ব্যবহার করেছিলেন, শিক্ষা দিয়েছিলেন এবং মৃত্যুর সময় আপনার কাছে থাকার জন্য আমাকে ওসিয়ত করেছিলেন। আর এখন আপনার মৃত্যু উপস্থিত, আমি জানি না কোথায় যাব। তিনি বললেন: তুমি রোম সাম্রাজ্যের পথে আমার এক ভাইয়ের কাছে যাবে। তিনি সত্যের ওপর আছেন। তুমি তাঁর কাছে যেয়ো এবং তাঁকে আমার সালাম দিও, তাঁর সঙ্গ নিয়ো, কারণ তিনি সত্যের ওপর আছেন।
যখন সেই ব্যক্তি মারা গেলেন, আমি বের হলাম এবং তাঁর কাছে গেলাম। আমি তাঁকে আমার কথা এবং তার পূর্বের জনের ওসিয়তের কথা জানালাম। তিনি বললেন: তিনি আমাকে তাঁর কাছে রাখলেন এবং পূর্বের মতো আমার জন্যেও খাবারের ব্যবস্থা করলেন। যখন তাঁর মৃত্যু উপস্থিত হলো, আমি তাঁর শিয়রে বসে কাঁদতে লাগলাম। তিনি আমাকে বললেন: তুমি কেন কাঁদছো? আমি আমার ঘটনা বর্ণনা করলাম। আমি বললাম: আল্লাহ তাআলা আমাকে আপনার সঙ্গ দান করেছেন, আপনি আমার সাথে ভালো ব্যবহার করেছেন, আর এখন আপনার মৃত্যু উপস্থিত, আমি জানি না কোথায় যাব।
তিনি বললেন: (আমার জানার মতে) আর কোথাও না। আমার জানা মতে, পৃথিবীতে ঈসা ইবনু মারইয়াম (আলাইহিস সালাম)-এর ধর্মের ওপর এখন আর কেউ অবশিষ্ট নেই। তবে এই সেই সময় যখন একজন নবীর আবির্ভাব হবে অথবা তিনি তিহামা (মক্কা-মদীনা অঞ্চল)-তে আবির্ভূত হয়েছেন। তুমি তো পথেই আছো, তোমার পাশ দিয়ে যারাই যাবে তুমি তাকেই তাঁর সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করবে। যখন তুমি জানতে পারবে যে তিনি এসেছেন, তখন তিনিই সেই নবী যাঁর সুসংবাদ ঈসা (আলাইহিস সালাম) দিয়ে গেছেন। এর প্রমাণ হলো: তাঁর দুই কাঁধের মাঝখানে নবুওয়াতের মোহর থাকবে। আর তিনি হাদিয়া (উপহার) গ্রহণ করবেন কিন্তু সাদাকা (দান) গ্রহণ করবেন না।
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আমার পাশ দিয়ে যেই যেত আমি তাকেই তাঁর সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতাম। অবশেষে আমার পাশ দিয়ে মক্কার কিছু লোক অতিক্রম করল। আমি তাদের জিজ্ঞাসা করলাম। তারা বলল: হ্যাঁ, আমাদের মধ্যে একজন লোক আবির্ভূত হয়েছেন, যিনি নিজেকে নবী বলে দাবি করেন। আমি তাদের একজনকে বললাম: তোমরা যদি আমাকে পালাক্রমে তোমাদের পিঠে বহন করো এবং কিছু রুটির টুকরা খেতে দাও, তবে আমি তোমাদের কারো দাস হতে পারি। তোমরা যখন তোমাদের দেশে পৌঁছাবে, তখন যদি সে (আমার মালিক) চায় বিক্রি করতে পারে অথবা দাস হিসাবে রাখতে পারে। তাদের মধ্যে একজন বলল: আমি রাজি। এরপর আমি তার দাস হলাম, যতক্ষণ না সে আমাকে মক্কায় নিয়ে এলো।
সে আমাকে তার একটি বাগানে রাখল, যেখানে কিছু হাবশী লোক ছিল। আমি বেরিয়ে গিয়ে (খোঁজ) জিজ্ঞাসা করতে লাগলাম। আমি আমার দেশের একজন মহিলার দেখা পেলাম এবং তাকে জিজ্ঞাসা করলাম। জানা গেল, তার পরিবারের লোকেরা ইসলাম গ্রহণ করেছে। সে আমাকে বলল: মক্কায় যখন (ভোরের) পাখি ডেকে ওঠে, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাহাবীগণ (কাবা শরীফের) হাতীমে বসা থাকেন। যখন ফজর স্পষ্ট হয়ে আসে, তখন তাঁরা চলে যান।
এরপর আমি বাগানে চলে গেলাম এবং (নবীজীর খোঁজে) আসা-যাওয়া করতে লাগলাম। হাবশীরা আমাকে বলল: তোমার কী হয়েছে? আমি বললাম: আমার পেটে ব্যথা করছে। আমি এই কৌশল করলাম যাতে আমি যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে যাই তখন তারা আমার খোঁজ না করে। যখন সেই সময় হলো, যা মহিলা আমাকে বলেছিলেন যে তিনি এবং তাঁর সাহাবীগণ তখন বসেন, আমি হেঁটে বের হলাম এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখলাম। তিনি তখন হাঁটু উঠিয়ে দু'পা পেটের সাথে বেঁধে বসা ছিলেন (ইহতিবা অবস্থায়)। আর তাঁর সাহাবীগণ তাঁকে ঘিরে ছিলেন।
আমি তাঁর পেছন দিক থেকে তাঁর কাছে গেলাম। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বুঝতে পারলেন আমি কী চাইছি। তাই তিনি তাঁর (পোশাকের) বাঁধন খুলে দিলেন। আমি তাঁর দুই কাঁধের মাঝখানে নবুওয়াতের মোহর দেখতে পেলাম। আমি বললাম: আল্লাহু আকবার! এটি হলো একটি নিদর্শন। এরপর আমি ফিরে আসলাম।
যখন পরের রাত হলো, আমি কিছু ভালো খেজুর সংগ্রহ করলাম। এরপর আমি হেঁটে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গেলাম এবং তা তাঁর সামনে রাখলাম। তিনি বললেন: "এগুলো কী?" আমি বললাম: এটা হাদিয়া (উপহার)। তিনি তা খেলেন এবং তাঁর সঙ্গী-সাথীদের বললেন: "তোমরা খাও।" (কিন্তু তিনি নিজে খেলেন না)। আমি বললাম: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং আপনি আল্লাহর রাসূল। তিনি আমাকে আমার অবস্থা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন। আমি তাঁকে সব জানালাম। তিনি বললেন: "যাও, নিজেকে মুক্ত করে নাও (নিজেকে কিনে নাও)।"
আমি আমার মালিকের কাছে গেলাম এবং বললাম: আমার কাছে আমার নিজেকে বিক্রি করো। সে বলল: হ্যাঁ, তবে এই শর্তে যে, তুমি আমার জন্য একশোটি খেজুর গাছ রোপণ করবে। আর গাছগুলো যখন বড় হয়ে উঠবে, তখন তুমি এক খেজুরের বীজের ওজনের সমপরিমাণ সোনা আমার কাছে নিয়ে আসবে। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গেলাম এবং তাঁকে জানালাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে তোমার কাছে যা চেয়েছে তার বিনিময়ে তুমি নিজেকে কিনে নাও। আর যে কূপ থেকে তুমি ওই খেজুর গাছগুলোতে পানি দিতে, সেখান থেকে এক বালতি পানি আমার কাছে নিয়ে এসো।"
এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই পানিতে আমার জন্য দু'আ করলেন। তারপর আমি তা দিয়ে গাছগুলোতে পানি দিলাম। আল্লাহর কসম! আমি একশোটি খেজুরের চারা রোপণ করলাম, তার মধ্যে একটি চারাও বাকি থাকেনি, সবগুলোই জন্ম নিলো। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে তাঁকে জানালাম যে খেজুর গাছগুলো জন্ম নিয়েছে। তখন তিনি আমাকে একখণ্ড সোনা দিলেন। আমি তা নিয়ে গেলাম এবং দাঁড়িপাল্লার এক পাল্লায় রাখলাম আর অপর পাল্লায় একটি খেজুর বীজ রাখা হলো। তিনি বলেন: আল্লাহর কসম! সোনার টুকরাটি মাটি থেকে উপরে ওঠেনি (অর্থাৎ সোনার ওজন খেজুর বীজের চেয়ে অনেক বেশি ছিল)। তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলাম এবং তাঁকে জানালাম। তখন তিনি আমাকে মুক্ত করে দিলেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في (ص): كان لا أرى أحدًا، والمثبت من (ك) و (م).
[2] في (م) و (ب): التي.
6689 [3] - المثبت من (م) بإثبات الياء، وفي (ص) و (ب): يحتبي.
6689 [4] - زاد في المطبوع هنا: فقلت: صدقة، فقال للقوم: "كلوا" ولم يأكل، ثم لبثت ما شاء الله، ثم أخذت مثل ذلك ثم أتيته فوضعته بين يديه فقال: "ما هذا؟ ". وهذه الزيادة ليست في شيء من نسخنا الخطية، ولا هي في رواية الطبراني التي يرويها من طريق سعيد بن سليمان الواسطي.
6689 [5] - إسناده ضعيف من أجل عبد الله بن عبد القدوس، وبه أعله الذهبي في "التلخيص"، فقال: ابن عبد القدوس ساقط، وقال في "سير أعلام النبلاء": هذا حديث منكر، غير صحيح، وعبد الله ابن عبد القدوس متروك، وقد تابعه في بعض الحديث الثوريُّ وشريكٌ، وأما هو فسمَّنَ الحديثَ فأفسده، وذكر مكة والحجر وأنَّ هناك بساتين، وخبط في مواضع.وأخرجه الطبراني في "المعجم الكبير" (6073)، وفي "الأحاديث الطوال" (9) عن أحمد بن القاسم ابن مساور الجوهري، عن سعيد بن سليمان الواسطي، بهذا الإسناد.وأخرجه مطولًا ومختصرًا أبو الشيخ في "طبقات محدثي أصبهان" (12)، وأبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 1/ 50 من طريق محمد بن حميد الرازي، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 190 - 193 من طريق أحمد بن حاتم، كلاهما عن عبد الله بن عبد القدوس، به.وأخرجه مختصرًا ومقطعًا أحمد 39 / (23704)، والحارث بن أبي أسامة في "مسنده" (929 - بغية الباحث)، والطحاوي في "شرح المعاني" 2/ 8، والطبراني في "الكبير" (6071) و (6072)، وأبو الشيخ في "الطبقات" (11)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 98 من طريق شريك النخعي، وأخرجه أحمد في "العلل" (2667) و (5579)، والطبراني في "الكبير" (6074) - وعنه أبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 1/ 50 - من طريق سفيان الثوري، كلاهما عن عبيد المكتب، به.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (6076) -وعنه أبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 1/ 50، وفي "الحلية" 1/ 193 - 195 - من طريق ابن لَهِيعة، عن يزيد بن أبي حبيب، عن سلم بن الصلت العبدي، عن أبي الطفيل، به مطولًا. وإسناده ضعيف؛ ابن لَهِيعة في حفظه سوء، وسلم العبدي لم نقف له على ترجمة.وخالفه ابن إسحاق عند أحمد (23738)، والبيهقي في "الدلائل" 2/ 98 - 99، فقال: حدثنا يزيد بن أبي حبيب عن رجل من عبد القيس، عن سلمان، قال: لما قلت: وأين تقع هذه من الذي علي يا رسول الله؟ أخذها رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلبها على لسانه، ثم قال: "خذها فأوفهم منها" فأخذتها فأوفيتهم منها حقهم كله أربعين أوقية، مختصرًا. وإسناده أحسن من سابقه لكن فيه رجل مبهم.وانظر ما قبله.
6690 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق وعلي بن حَمْشاذ، قالا: حدثنا أبو المثنَّى العَنْبري، حدثنا علي بن المديني، حدثنا سعيد بن محمد الورَّاق، عن موسى الجُهَني، عن زيد بن وهب، عن سلمان قال: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، يقول: "الدُّنيا سِجنُ المؤمن، وجَنَّةُ الكافر".وسمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "أطول الناس شبعًا في الدنيا، أكثرهم جُوعًا يومَ القيامة" [1]. هذا حديث غريب صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "দুনিয়া মুমিনের জন্য কারাগার এবং কাফিরের জন্য জান্নাত (সুখের স্থান)।"
তিনি আরও বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "দুনিয়াতে যে ব্যক্তি সবচেয়ে বেশি পরিতৃপ্ত (পেট ভরে থাকে), কিয়ামতের দিন সে-ই সবচেয়ে বেশি ক্ষুধার্ত থাকবে।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف جدًا من أجل سعيد بن محمد الوراق، وبه أعله الذهبي في "التلخيص"، فقال: الوراق تركه الدارقطني وغيره. قلنا وكان الوراق يرويه مرة عن زيد بن وهب عن سلمان، ومرة يرويه عن زيد عن عطية بن عامر عن سلمان، وعطية بن عامر هذا -وهو الجهني- مجهول.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (6087) عن محمد بن هشام المستملي ومعاذ بن المثنى، كلاهما عن علي بن المديني، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي الدنيا في "ذم الدنيا" (4)، وفي "الزهد" (4)، وفي "الجوع" (3) عن الحسن بن الصباح، والبيهقي في "شعب الإيمان" (5257) من طريق محمد بن الصباح البزاز، و (5258) من طريق أبي موسى إسحاق بن إبراهيم الهروي، ثلاثتهم عن سعيد الوراق، به. روايتا ابن أبي الدنيا الأولى والثانية بذكر شطره الأول فقط.وأخرجه ابن ماجه (3351)، والطبري في مسند عمر من "تهذيب الآثار" (1034)، والعقيلي في "الضعفاء" (1345)، وأبو نعيم في الحلية" 1/ 198، والمزي في "تهذيب الكمال" 20/ 151 من طريق محمد بن الصباح، والبزار في "مسنده" (2498) من طريق محمد بن إسماعيل وإبراهيم بن سعيد، وأبو يعلى كما في "المطالب العالية" (3137) عن أبي موسى إسحاق بن إبراهيم الهروي، والطبراني في "الكبير" (6183) من طريق سعيد بن عنبسة الرازي، خمستهم عن سعيد الوراق، عن موسى الجهني، عن زيد بن وهب، عن عطية بن عامر، عن سلمان. فزادوا عطية بن عامر بين زيد وسلمان، وتقدمت روايتا محمد بن الصباح وأبي موسى الهروي عند البيهقي ليس فيهما ذكر الواسطة! وجاء اسم عطية في رواية الطبراني مقلوبًا إلى: عامر بن عطية! ورواية أبي يعلى بذكر شطره الأول، ورواية ابن ماجه والطبري والعقيلي بذكر شطره الثاني، وباقي الروايات تامة. وقال العقيلي: في إسناده نظر.ويغني عن شطره الأول حديثُ أبي هريرة بلفظه عند مسلم (2956) وغيره، وحديثُ عبد الله ابن عمرو الآتي عند المصنف برقم (8080)، وإسناده محتمل للتحسين.وشطره الثاني سيأتي من حديث أبي جحيفة برقم (7317)، وإسناده تالف.ومثله عن ابن عمر عند ابن ماجه (3350)، والترمذي (2478)، وسنده ضعيف جدًا. وانظر الكلام عليه وعلى شواهده في "سنن ابن ماجه".
6691 - حدثنا عبد الباقي بن قانع الحافظ، حدثنا محمد بن العبّاس المُؤدِّب، حدثنا عُبيد بن إسحاق العطَّار، حدثنا قيس بن الربيع، عن أبي هاشم الرُّمَّاني، عن زاذان عن سلمان قال: قلتُ: يا رسولَ الله، قرأتُ في التوراة: بَرَكةُ الطعام الوضوءُ قبلَه وبعدَه [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ذكرُ إسلامِ زيد بن سَعْنة [2] مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত... তিনি বলেন, আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল! আমি তাওরাতে পড়েছি যে, খাদ্যের বরকত হলো তার আগে ও পরে ওযু করা।" . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আযাদকৃত গোলাম যায়দ ইবনে সা’নাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ইসলাম গ্রহণের আলোচনা।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف، عبيد بن إسحاق العطار ضعيف، وقد خالف الناس في روايته لهذا الحديث، فجعل الخبر كلَّه من التوراة، وستأتي الإشارة إلى ذلك، وقيس بن الربيع اختلفت أقوال النقاد فيه، وهو إلى الضعف أقرب، وكان قد ابتُلي بابنٍ يُدخل في كتبه ما ليس من حديثه.وقد تفرد قيس بن الربيع به، فمثله لا يحتمل التفرد، لذلك قال الإمام أحمد عن هذا الحديث -فيما نقل ابن القيم في "تهذيب السنن" 5/ 297 - 298 - : هو منكر. وضعفه أيضًا أبو داود والترمذي والذهبي في "التلخيص". وقال أبو حاتم في "العلل" (1502): حديث منكر … يشبه هذا الحديث أحاديث أبي خالد الواسطي: عمرو بن خالد (وهو متروك متهم)، عنده من هذا النحو أحاديثُ موضوعة عن أبي هاشم. يقصد بذلك أنَّ قيس بن الربيع لم يسمعه من أبي هاشم الرماني بل هو ممّا رواه أبو خالد الواسطي عن أبي هاشم الرماني، فدُسَّ في كتب قيس وهو لا يعرف، فحدَّث به.أبو هاشم الرماني: هو يحيى بن دينار، وقيل في اسم أبيه غير ذلك، وزاذان: هو أبو عبد الله الكندي مولاهم الكوفي الضرير.وأخرجه أحمد 39/ (23732)، وأبو داود (3761)، والترمذي (1846) من طرق عن قيس ابن الربيع، بهذا الإسناد، بلفظ: قرأتُ في التوراة بركة الطعام الوضوء بعده، قال: فذكرت ذلك لرسول الله صلى الله عليه وسلم وأخبرته بما قرأت في التوراة، فقال: "بركةُ الطعام الوضوءَ قبله والوضوء بعده". ووقع في رواية أبي داود في كلام سلمان عن التوراة: الوضوء قبله. وكذلك وقع عند المصنف فيما سيأتي برقم (7259) من طريق مالك بن إسماعيل عن قيس بن الربيع. وهذا من اضطراب قيس بن الربيع. وقال الترمذي: لا نعرف هذا الحديث إلَّا من حديث قيس بن الربيع، وقيس بن الربيع يضعَّف في الحديث.قلنا: ولا نعلم حديثًا صحيحًا في الوضوء قبل الطعام ولا بعده، ونرى أن المقصود في هذا الخبر ما فهمه بعضُ العلماء وهو غسل اليدين، منهم أبو داود، فبوَّب عليه في "سننه": باب في غسل اليد قبل الطعام.وقال ابن تيمية في مجموع الفتاوى 21/ 227: ولم يرد لفظ الوضوء بمعنى غسل اليد والفم إلَّا في لغة اليهود، فإنه قد روي: أن سلمان الفارسي قال للنبي صلى الله عليه وسلم: إنا نجد في التوراة أن من بركة الطعام الوضوء قبله، فقال: "من بركة الطعام الوضوء قبله والوضوء بعده".وقال البيهقي في "السنن الكبرى" 7/ 275 بعد أن أخرج حديث سلمان هذا وضعفه بقيس: لم يثبت في غسل اليد قبل الطعام حديث.وروى الخلال عن أبي بكر المروذي قال: رأيت أبا عبد الله (يعني الإمام أحمد) يغسل يديه قبل الطعام، وبعده، وإن كان على وضوء.وقال: سألت يحيى بن معين؛ وذكرت له حديث قيس بن الربيع عن أبي هاشم عن زاذان عن سلمان، الحديث، فقال لي يحيى بن معين: ما أحسن الوضوء قبل الطعام وبعده. نقل ذلك ابن القيم في "تهذيب السنن" 5/ 298.وأما فيما ورد في غسل اليدين بعد الطعام، فانظر حديث أبي هريرة الآتي برقم (7380).
[2] اختُلف في سعنة، فقيل: بالنون، وقيل: بالتحتانية. قال ابن عبد البرّ في "الاستيعاب: النون أكثر.
6692 - أخبرني دَعْلَج بن أحمد السِّجْزي ببغداد، حدثنا أحمد بن علي الأبَّار، حدثنا محمد بن أبي السَّرِي العسقلاني، حدثنا الوليد بن مُسلم، حدثنا محمد بن حمزة بن يوسف بن عبد الله بن سَلَام، عن أبيه، عن جدِّه، عن عبد الله بن سَلَام قال: إِنَّ الله تبارك وتعالى لمَّا أراد هُدى زيد بن سَعْنة قال زيدُ بن سَعْنة: ما من علامات النُّبوة شيءٌ إلَّا وقد عرفتُها في وجهِ محمدٍ صلى الله عليه وسلم حينَ نظرتُ إليه إِلَّا شيئين لم أخبُرْهما منه: هل يَسبِقُ حِلمُه جهلَه، ولا يزيدُه شدَّة الجهل عليه إلَّا حلمًا؟ فكنتُ ألطُفُ له [1] لأن أخالطَه فأعرفَ حِلمَه من جهله.قال زيدُ بن سَعْنة: فخرج رسول الله صلى الله عليه وسلم يومًا من الحُجُرات ومعه عليُّ بن أبي طالب، فأتاه رجلٌ على راحلته كالبدويِّ، فقال يا رسولَ الله، إنَّ قريةَ بني فلان قد أسلموا ودخلوا في الإسلام، وكنتُ حدثتُهم إن أسلموا أَتاهم الرزقُ رَغَدًا، وقد أصابتهم سَنَةٌ وشِدَّة وقُحوطٌ من الغيث، فأنا أخشى يا رسولَ الله أن يخرجوا من الإسلام طَمَعًا كما دخلوا فيه طَمَعًا، فإن رأيتَ أن ترسل إليهم بشيء تعينهم به، فعلت، فنظر إلى رجلٍ إلى جانبه أُراه عليًّا [2]، فقال: يا رسولَ الله، ما بقي منه شيءٌ.قال زيد بن سَعْنة، فدَنَوتُ إليه، فقلت: يا محمد، هل لك أن تبيعني تمرًا معلومًا من حائطِ بني فلانٍ إلى أجلِ كذا وكذا؟ فقال: "لا يا يهوديُّ، ولكن أبيعك تمرًا معلومًا إلى أجلِ كذا وكذا، ولا أسمِّي حائطَ فلان" فقلتُ: نعم، فبايَعَني، فأطلقتُ هِمْياني فأعطيتُه ثمانين مِثقالًا من ذهبٍ في تمر معلوم إلى أجلِ كذا وكذا، فأعطاها الرجلَ، فقال: "اعجَلْ [3] عليهم وأعِنْهم بها".قال زيد بن سَعْنة: فلما كان قبلَ مَحَلِّ الأجل بيومين أو ثلاثةٍ أتيتُه، فأخذتُ بمَجامعِ قميصِه وردائِه، ونظرتُ إليه بوجهٍ غليظ، فقلتُ له: ألا تقضِيني يا محمدُ حقِّي، فوالله ما عَلِمتُكم بني عبد المطلب بمُطْلٍ، ولقد كان لي بمُخالطتِكم علمٌ، ونظرتُ إلى عمر فإذا عيناه تدورانِ في وجهه كالفَلَك المُستدير، ثم رماني ببصرِه، فقال: يا عدوَّ الله، أتقولُ الرسول الله صلى الله عليه وسلم ما أسمعُ، وتصنعُ به ما أرى؟! فوالذي بعثَه بالحقِّ لولا ما أُحاذِرُ فَوْتَه لضربتُ بسيفي رأسك، ورسول الله صلى الله عليه وسلم ينظرُ إلى عمر في سكون وتُوَّدَةٍ وتبسُّم، ثم قال: "يا عمرُ، أنا وهو كُنَّا أحوج إلى غير هذا؛ أن تأمرَني بحُسن الأداءِ، وتأمره بحُسن التِّباعة، اذهَبْ به يا عمرُ فأَعطِه حقَّه، وزِدْه عشرينَ صاعًا من تمر".فقلتُ: ما هذه الزيادةُ يا عمر؟ قال: أمرني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن أزيدَك مكانَ ما رُعْتُكَ، قلت: وتعرفُني يا عمرُ؟ قال: لا، من أنت؟ قلتُ: زيدُ بن سَعْنة، قال: الحَبْر، قلت: الحَبْرُ، قال: فما دعاك أن فعلتَ برسولِ الله صلى الله عليه وسلم ما فعلتَ وقلتَ له ما قلتَ؟ قلتُ له: يا عمرُ، لم يكن من علاماتِ النبوة شيءٌ إِلَّا وقد عرفتُه في وجهِ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم حينِ نظرتُ إليه إلَّا اثنتين لم أخبُرْهما منه: هل يَسبِقُ حِلمُه جهله، ولا تزيدُه [4] شِدَّة الجهلِ عليه إلَّا حِلمًا فقد اختبرتُهما، فأُشهدك يا عمرُ أني قد رضيت بالله ربًا، وبالإسلام دينًا، وبمحمد صلى الله عليه وسلم نبيًّا، وأُشهدك أن شَطْر مالي -فإنِّي أكثرُها [5] مالًا- صدقةٌ على أمة محمِّد صلى الله عليه وسلم، فقال عمر: أو على بعضهم، فإنَّك لا تَسَعُهم، قلتُ: أو على بعضهم، فرجع زيدٌ إلى رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فقال زيدٌ: أشهد أن لا إله إلَّا الله، وأشهد أنَّ محمدًا عبده [6] ورسوله، وآمنَ به وصدَّقه وبايعه، وشَهِدَ معه مشاهدَ كثيرة، ثم تُوفِّي زيدٌ في غزوة تبوك مُقبلًا غيرَ مُدبِر، ورحم الله زيدًا [7].هذا حديث صحيح الإسناد ولم يُخرجاه، وهو من غُرَرِ الحديث، ومحمد بن أبي السَّرِي العسقلاني ثقة. ذكرُ سَفِينةَ مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم
আব্দুল্লাহ ইবনে সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
যখন আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআ'লা যায়িদ ইবনে সা'নাহকে হেদায়াত দিতে চাইলেন, তখন যায়িদ ইবনে সা'নাহ বলেন: আমি যখনই মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারার দিকে তাকিয়েছি, তখনই তাঁর মধ্যে নবুওয়াতের সব নিদর্শন দেখতে পেয়েছি, কেবল দুটি বিষয় ছাড়া, যা আমি পরীক্ষা করিনি: (১) তাঁর ধৈর্য কি তাঁর অজ্ঞতাকে ছাড়িয়ে যায়, (২) চরম অজ্ঞতা কি তাঁর ধৈর্যকে আরও বাড়িয়ে দেয় না? তাই আমি তাঁর সাথে মেলামেশা করার সুযোগ খুঁজছিলাম, যাতে আমি তাঁর ধৈর্যের গভীরতা জানতে পারি।
যায়িদ ইবনে সা'নাহ বলেন: একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘর থেকে বের হলেন। তাঁর সাথে ছিলেন আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তখন মরুচারীর মতো দেখতে এক ব্যক্তি তাঁর বাহনের পিঠে চড়ে এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! বনী অমুকের গোত্রের লোকেরা ইসলাম গ্রহণ করেছে। আমি তাদের বলেছিলাম যে, তারা ইসলাম গ্রহণ করলে স্বচ্ছলভাবে রিযক পাবে। কিন্তু তারা দুর্ভিক্ষ, কঠোরতা এবং বৃষ্টিপাতের অভাবের শিকার হয়েছে। হে আল্লাহর রাসূল! আমি আশঙ্কা করছি যে, তারা যেমন পার্থিব লোভে ইসলামে প্রবেশ করেছে, তেমনি হয়তো লোভে পড়ে ইসলাম থেকে বেরিয়ে যাবে। আপনি যদি তাদের কাছে এমন কিছু পাঠান যা দিয়ে তাদের সাহায্য করা যায়, তবে তা করুন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর পাশে থাকা একজনের দিকে তাকালেন—আমি মনে করি তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন। তিনি (আলী) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! এখন (বাইতুল মালে) আর কিছু অবশিষ্ট নেই।
যায়িদ ইবনে সা'নাহ বলেন: তখন আমি তাঁর কাছে এগিয়ে গিয়ে বললাম: হে মুহাম্মাদ! আপনি কি বনী অমুক গোত্রের বাগান থেকে নির্দিষ্ট সময়ের জন্য নির্দিষ্ট পরিমাণ খেজুর আমার কাছে বিক্রি করবেন? তিনি বললেন: "না, হে ইয়াহুদী, তবে আমি তোমার কাছে নির্দিষ্ট সময়ের জন্য নির্দিষ্ট পরিমাণ খেজুর বিক্রি করতে পারি, কিন্তু অমুক ব্যক্তির বাগানের নাম উল্লেখ করব না।" আমি বললাম: হ্যাঁ। তখন তিনি আমার সাথে ক্রয়-বিক্রয় সম্পন্ন করলেন। আমি আমার থলে খুলে নির্দিষ্ট সময় ও পরিমাণের জন্য আশি মিসকাল স্বর্ণ তাঁকে দিলাম। তিনি তা ওই লোকটিকে দিলেন এবং বললেন: "তাড়াতাড়ি তাদের কাছে যাও এবং এর দ্বারা তাদের সাহায্য করো।"
যায়িদ ইবনে সা'নাহ বলেন: এরপর সেই নির্দিষ্ট সময় আসার দু-তিন দিন আগে আমি তাঁর কাছে গেলাম। আমি তাঁর জামা ও চাদরের আস্তিন ধরে ফেললাম এবং রুক্ষ চেহারায় তাঁর দিকে তাকিয়ে বললাম: হে মুহাম্মাদ! আপনি কি আমার পাওনা পরিশোধ করবেন না? আল্লাহর কসম! আমি জানি, আবদুল মুত্তালিবের বংশধরেরা পাওনা পরিশোধে টালবাহানা করে থাকে। তোমাদের সাথে মেলামেশার অভিজ্ঞতা আমার আছে। আমি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে তাকালাম, দেখলাম তাঁর চোখ দুটি ঘূর্ণায়মান গ্রহের মতো তাঁর চেহারায় ঘুরছে। এরপর তিনি আমার দিকে দৃষ্টি নিক্ষেপ করে বললেন: হে আল্লাহর শত্রু! আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তুমি যা শোনালে, তা কি তুমি বলছো? আর তাঁর সাথে যা করছো, তা কি আমি দেখছি? যাঁর হাতে আমার জীবন, তাঁর শপথ! যদি আমি মৃত্যুর আশঙ্কা না করতাম, তবে তরবারি দিয়ে তোমার গর্দান উড়িয়ে দিতাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উমরের দিকে স্থিরভাবে, শান্তভাবে এবং হাসিমুখে তাকালেন। অতঃপর তিনি বললেন: "হে উমর! আমার এবং তার এর চেয়ে ভিন্ন কিছুর প্রয়োজন ছিল—তুমি আমাকে ভালোভাবে পাওনা পরিশোধ করতে আদেশ দিতে এবং তাকে ভালোভাবে পাওনা চাইতে আদেশ দিতে। হে উমর! তুমি তাকে নিয়ে যাও এবং তার পাওনা পরিশোধ করো, আর তাকে অতিরিক্ত বিশ সা' খেজুর দাও।"
আমি (যায়িদ) বললাম: হে উমর! এই বাড়তিটুকু কেন? উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে আদেশ করেছেন যে আমি তোমাকে ভয় দেখানোর কারণে তোমাকে অতিরিক্ত দেব। আমি বললাম: হে উমর! আপনি কি আমাকে চেনেন? তিনি বললেন: না, তুমি কে? আমি বললাম: আমি যায়িদ ইবনে সা'নাহ। তিনি বললেন: (আপনি সেই) ধর্মীয় পণ্ডিত? আমি বললাম: হ্যাঁ, সেই ধর্মীয় পণ্ডিত। তিনি বললেন: তাহলে তুমি কেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এমন আচরণ করলে এবং তাঁকে এমন কথা বললে? আমি তাঁকে বললাম: হে উমর! আমি যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারার দিকে তাকিয়েছি, তখনই নবুওয়াতের সব নিদর্শন দেখতে পেয়েছি, কেবল দুটি বিষয় ছাড়া, যা আমি পরীক্ষা করিনি: (১) তাঁর ধৈর্য কি তাঁর অজ্ঞতাকে ছাড়িয়ে যায়, (২) চরম অজ্ঞতা কি তাঁর ধৈর্যকে আরও বাড়িয়ে দেয় না? এখন আমি সেই দুটি বিষয় পরীক্ষা করে নিয়েছি। তাই হে উমর, আমি আপনাকে সাক্ষী রেখে বলছি, আমি আল্লাহকে রব হিসেবে, ইসলামকে দীন হিসেবে এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নবী হিসেবে গ্রহণ করে সন্তুষ্ট। আর আমি আপনাকে সাক্ষী রেখে বলছি যে, আমার সম্পদের অর্ধেক (কারণ আমি ধনীদের মধ্যে অন্যতম) মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উম্মতের জন্য সদকা করে দিলাম। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: নাকি তাদের কিছু অংশের জন্য? কারণ, তুমি তাদের সবাইকে দিতে পারবে না। আমি বললাম: তাদের কিছু অংশের জন্য। এরপর যায়িদ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ফিরে গেলেন এবং বললেন: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর বান্দা ও রাসূল। তিনি তাঁর প্রতি ঈমান আনলেন, তাঁকে সত্যবাদী হিসেবে স্বীকার করলেন, তাঁর হাতে বায়আত গ্রহণ করলেন এবং তাঁর সাথে বহু যুদ্ধে অংশগ্রহণ করলেন। অতঃপর যায়িদ তাবুক যুদ্ধে সম্মুখগামী অবস্থায় মৃত্যুবরণ করেন, পশ্চাদপসরণকারী অবস্থায় নয়। আল্লাহ যায়িদের উপর রহম করুন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] المثبت من (م)، وفي (ص) و (ب): ألطف به وفي رواية ابن حبان: أتلطف له. وهي أحسن.
[2] في رواية ابن حبان: أراه عمر.
6692 [3] - تحرَّف في النسخ الخطية إلى: اعدل.
6692 [4] - في النسخ الخطية: تزده!
6692 [5] - في (م) و (ص): أكثر، وفي (ب) تحرف إلى: أكثرهما، والصواب ما أثبتناه كما في المصادر.
6692 [6] - في (م): أنَّ محمدًا رسول الله عبده ورسوله.
6692 [7] - إسناده ضعيف من أجل حمزة بن يوسف -وقيل: حمزة بن محمد بن يوسف- فقد تفرَّد بالرواية عنه ابنه محمد، ولم يؤثر توثيقه عن معتبر، وذكره ابن حبان في "الثقات"، على عادته في ذكر المجاهيل، وقال الذهبي في "التلخيص": ما أنكره وأركَّه! لا سيما قوله: "مقبلًا غير مدبر"، فإنه لم يكن في غزوة تبوك قتال، وقال في "تاريخ الإسلام" 1/ 444: غريب، من الأفراد.وأخرجه مطولًا ابن حبان (288) عن الحسن بن سفيان ومحمد بن الحسن بن قُتَيبة، كلاهما عن محمد بن المتوكل بن أبي السري بهذا الإسناد.وأخرجه مختصرًا بقصة السَّلف ابن ماجه (2281) عن يعقوب بن حميد بن كاسب، عن الوليد بن مسلم، عن محمد بن حمزة، عن أبيه، عن جده عبد الله بن سلام. ليس فيه والد حمزة. وانظر (2268). وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 47 عن أبي منصور ظفر بن محمد العلوي، عن محمد ابن علي الشيباني، عن أحمد بن حازم وحده، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (6439) عن علي بن عبد العزيز وحده، به.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 5/ 100 عن أبي نعيم الفضل بن دكين به. وفي روايته ورواية الطبراني امتنع سفينةُ من إخباره باسمه.وأخرجه كذلك أحمد 36 / (21928)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (1192)، والطبراني (6439)، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 369، والبيهقي 6/ 47 من طرق عن حشرج بن نباتة، به. ورواية أحمد ذكر في أولها حديث: "الخلافة ثلاثون سنة".وأخرجه مختصرًا أحمد 36 / (21921) من طريق حماد بن زيد، و (21925) و (21932) من طريق حماد بن سلمة، كلاهما عن سعيد بن جمهان به.وأخرج أحمد 36 / (21924) من طريق شريك النخعي، عن عمران النخلي، عن مولى لأم سلمة، قال: كنت مع النبي صلى الله عليه وسلم في سفر، فانتهينا إلى واد قال: فجعلتُ أُعبر الناس أو أحملهم، قال: فقال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما كنت اليوم إلَّا سفينة" أو "ما أنت إلَّا سفينة". وشريك سيئ الحفظ، وعمران النخلي -وهو ابن عبد الله بن كيسان- روى عنه ابنه حماد وشريك، وذكره ابن حبان في "الثقات". وسيأتي في الحديث التالي أنه كان مملوكًا لأم سلمة. والنَّخلي: نسبة إلى نخلة، قال السمعاني: وظنّي أنها القرية المعروفة على ستة فراسخ من مكة.
6693 - أخبرنا محمد بن علي الشيباني بالكوفة، حدثنا أحمد بن حازم الغِفاري (ح)وحدثنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا علي بن عبد العزيز؛ قالا: حدثنا أبو نُعيم، حدثنا حَشْرج بن نُباتة، قال: [حدثني سعيد بن جُمْهان، قال] [1]: سألتُ سَفينةَ عن اسمه، فقال: أمَا إني مُخبرُك باسمي، كان اسمي قيسًا فسمَّاني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم سفينةَ، قلت: لِمَ سمَّاك سفينةَ؟ قال: خرج ومعه أصحابُه فثَقُل عليهم متاعُهم، فقال: "ابسُط كساءَك" فبسطتُه، فجعلَ فيه متاعَهم، ثم حمله عليَّ، فقال: "احمِلْ، ما أنت إلَّا سَفينةٌ"، فقال: لو حملتُ يومَئذ وِقْرَ بعيرٍ أو بعيرينِ أو خمسةٍ أو ستةٍ ما ثَقُل عليَّ [2]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
সফীনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি অবশ্যই তোমাকে আমার নাম বলব। আমার নাম ছিল কাইস। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার নাম রাখলেন সফীনা। জিজ্ঞাসা করা হলো: তিনি আপনাকে সফীনা কেন নাম দিলেন? তিনি বললেন: তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীগণসহ বের হলেন। তাদের আসবাবপত্র তাদের জন্য বোঝা হয়ে গেল। তিনি বললেন: "তোমার চাদরটি বিছাও।" আমি তা বিছিয়ে দিলাম। তিনি তাতে তাদের আসবাবপত্র রাখলেন এবং আমার ওপর তা চাপিয়ে দিলেন। এরপর বললেন: "তুমি বহন করো, তুমি তো কেবলই একটি সফীনা (জাহাজ/ভারবাহী)।" তিনি (সফীনা) বললেন: আমি যদি সেই দিন এক, দুই, পাঁচ কিংবা ছয়টি উটের বোঝা বহন করতাম, তবুও আমার কাছে তা ভারী মনে হতো না।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] ما بين معقوفين سقط من النسخ الخطية، وأثبتناه من مصادر التخريج. وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 47 عن أبي منصور ظفر بن محمد العلوي، عن محمد ابن علي الشيباني، عن أحمد بن حازم وحده، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (6439) عن علي بن عبد العزيز وحده، به.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 5/ 100 عن أبي نعيم الفضل بن دكين به. وفي روايته ورواية الطبراني امتنع سفينةُ من إخباره باسمه.وأخرجه كذلك أحمد 36 / (21928)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (1192)، والطبراني (6439)، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 369، والبيهقي 6/ 47 من طرق عن حشرج بن نباتة، به. ورواية أحمد ذكر في أولها حديث: "الخلافة ثلاثون سنة".وأخرجه مختصرًا أحمد 36 / (21921) من طريق حماد بن زيد، و (21925) و (21932) من طريق حماد بن سلمة، كلاهما عن سعيد بن جمهان به.وأخرج أحمد 36 / (21924) من طريق شريك النخعي، عن عمران النخلي، عن مولى لأم سلمة، قال: كنت مع النبي صلى الله عليه وسلم في سفر، فانتهينا إلى واد قال: فجعلتُ أُعبر الناس أو أحملهم، قال: فقال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما كنت اليوم إلَّا سفينة" أو "ما أنت إلَّا سفينة". وشريك سيئ الحفظ، وعمران النخلي -وهو ابن عبد الله بن كيسان- روى عنه ابنه حماد وشريك، وذكره ابن حبان في "الثقات". وسيأتي في الحديث التالي أنه كان مملوكًا لأم سلمة. والنَّخلي: نسبة إلى نخلة، قال السمعاني: وظنّي أنها القرية المعروفة على ستة فراسخ من مكة.
[2] إسناده حسن، حشرج بن نباتة وسعيد بن جمهان، صدوقان. أبو نعيم هو الفضل بن دكين. وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 47 عن أبي منصور ظفر بن محمد العلوي، عن محمد ابن علي الشيباني، عن أحمد بن حازم وحده، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (6439) عن علي بن عبد العزيز وحده، به.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 5/ 100 عن أبي نعيم الفضل بن دكين به. وفي روايته ورواية الطبراني امتنع سفينةُ من إخباره باسمه.وأخرجه كذلك أحمد 36 / (21928)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (1192)، والطبراني (6439)، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 369، والبيهقي 6/ 47 من طرق عن حشرج بن نباتة، به. ورواية أحمد ذكر في أولها حديث: "الخلافة ثلاثون سنة".وأخرجه مختصرًا أحمد 36 / (21921) من طريق حماد بن زيد، و (21925) و (21932) من طريق حماد بن سلمة، كلاهما عن سعيد بن جمهان به.وأخرج أحمد 36 / (21924) من طريق شريك النخعي، عن عمران النخلي، عن مولى لأم سلمة، قال: كنت مع النبي صلى الله عليه وسلم في سفر، فانتهينا إلى واد قال: فجعلتُ أُعبر الناس أو أحملهم، قال: فقال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما كنت اليوم إلَّا سفينة" أو "ما أنت إلَّا سفينة". وشريك سيئ الحفظ، وعمران النخلي -وهو ابن عبد الله بن كيسان- روى عنه ابنه حماد وشريك، وذكره ابن حبان في "الثقات". وسيأتي في الحديث التالي أنه كان مملوكًا لأم سلمة. والنَّخلي: نسبة إلى نخلة، قال السمعاني: وظنّي أنها القرية المعروفة على ستة فراسخ من مكة.
6694 - وحدثنا بذكر كُنية سَفِينة أبو العبّاس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد ابن عبد الله بن عبد الحَكَم، حدثنا إسماعيل بن مَسْلَمة بن قَعْنب، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن أبي حفص سعيد بن جُمْهان، عن سفينةَ أبي عبد الرحمن، قال: أعتقَتْني أمُّ سلمة واشترطَت علي أن أخدُمَ النبيَّ صلى الله عليه وسلم ما عاش [1].
সফীনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উম্মু সালামা আমাকে আযাদ (মুক্ত) করে দেন এবং আমার উপর এই শর্ত আরোপ করেন যে, আমি যতদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জীবিত থাকবেন, ততদিন তাঁর খিদমত করব।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حديث قوي، وهذا إسناد حسن من أجل إسماعيل بن مسلمة بن قعنب.وأخرجه أحمد 36/ (21927) و 44 / (26711)، وابن ماجه (2526)، والنسائي (4977) و (11746) من طرق عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وسلف من طريق عبد الوارث بن سعيد عن سعيد بن جمهان برقم (2885).
6695 - وحدثنا أبو العبَّاس، حدثنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، أخبرني أسامة بن زيد، أنَّ محمد بن عبد الله بن عمرو بن عثمان حدَّثه، عن محمد بن المنكدِر، أنَّ سَفينة مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: ركبتُ البحرَ، فانكسرَت سفينتي التي كنتُ فيها، فركبتُ لوحًا من ألواحها، فطر حني اللوحُ [1] في أجَمَةٍ فيها الأسدُ، فأقبل إليَّ يُريدني، فقلتُ: يا أبا الحارث، أنا مولى رسول الله، فطأطأَ رأسَه وأقبل إليَّ فدفعني بمَنكِبِه حتى أخرجني من الأجَمَة ووَضَعَني على الطريق، وهمهَمَ، فظننتُ أنه يُودِّعني، فكان ذلك آخرَ عهدي به [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم ولم يُخرجاه. ذكر زياد بن لَبِيد الأنصاري رضي الله عنه- [3]6695/ 1 - أخبرنا أبو جعفر البغدادي، حدثنا أبو عُلاثة، حدثنا أبي، حدثنا ابن لَهِيعة، حدثنا أبو الأسود، عن عُزوة، في تسمية من شَهِد بدرًا من الأنصار، ثم من بني بَيَاضة بن عامر بن زُريق بن عبد حارثة: زياد بن لَبِيد بن ثعلبة بن سِنان بن عامر بن عَديّ بن أُمية بن بَيَاضة.6695/ 2 - أخبرني إسماعيل بن محمد بن الفضل الشَّعراني، حدثنا جدِّي، حدثنا إبراهيم بن المنذر الحِزامي، حدثنا محمد بن فُليح، عن موسى بن عُقبة، عن ابن شِهاب، في تسمية مَن شَهِدَ العَقبة من الأنصار، ثم من بني بَياضةَ: زياد بن لَبِيد، وقد شهد بدرًا.6695/ 3 - حدثنا علي حَمْشاذ العَدْل، حدثنا بِشر بن موسى، يحيى بن إسحاق السَّيلَحيني (ح)وحدثنا هشام بن علي السَّدُوسي، حدثنا عيسى بن إبراهيم البِرَكي؛ قالا: حدثنا عبد العزيز بن مُسلم، حدثنا الأعمش، عن سالم بن أبي الجعد، عن زياد بن لَبيد الأنصاري، قال: أتيتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم وهو يحدِّث أصحابَه وهو يقول: "قد ذهب أوانُ العِلم"، قلتُ بأبي وأمِّي، كيف يذهبُ أوانُ العلم ونحن نقرأُ القرآنَ ونعلِّمه أبناءَنا، ويعلِّمُه أبناؤنا أبناءَهم إلى أن تقوم الساعة؟! قال: "ثَكِلَتك أمُّك يا ابن لَبيدٍ، إن كنتُ لَأراك أفقهَ أهل المدينة، أوَليس اليهودُ والنصارى يقرؤون التوراةَ والإنجيلَ ولا يَنتفِعون منهما بشيء؟! " [4].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه. ذكرُ سعد بن الرَّبيع الأنصاري رضي الله عنه-
সফীনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি সমুদ্রে আরোহণ করলাম। আমার নৌকাটি ভেঙে গেল। আমি নৌকার একটি কাঠের পাটাতনে আরোহণ করলাম। সেই পাটাতনটি আমাকে এমন একটি ঝোপের মধ্যে নিক্ষেপ করল যেখানে একটি সিংহ ছিল। সিংহটি আমার দিকে এগিয়ে এলো এবং আমাকে আক্রমণ করতে চাইছিল। আমি বললাম: "হে আবুল হারিস, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুক্ত দাস (মাওলা)।" তখন সিংহটি তার মাথা নীচু করল এবং আমার দিকে এগিয়ে এসে তার কাঁধ দ্বারা আমাকে ঠেলে দিল, যতক্ষণ না সে আমাকে ঝোপের মধ্য থেকে বের করে এনে রাস্তার ওপর রেখে দিল। এরপর সে গুঙিয়ে উঠল, আমি মনে করলাম সে আমাকে বিদায় জানাচ্ছে। এটাই ছিল তার সাথে আমার শেষ দেখা।
যিয়াদ ইবনে লাবীদ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করলাম। তিনি তখন তাঁর সাহাবীদের সাথে কথা বলছিলেন এবং বলছিলেন: "জ্ঞানের যুগ শেষ হয়ে গেছে।" আমি বললাম, আমার পিতা-মাতা আপনার উপর উৎসর্গ হোক! আমরা কুরআন পাঠ করছি, আমাদের সন্তানদের তা শিক্ষা দিচ্ছি এবং আমাদের সন্তানেরা কিয়ামত পর্যন্ত তাদের সন্তানদের তা শিক্ষা দিতে থাকবে, তাহলে জ্ঞানের যুগ কিভাবে শেষ হয়ে যাবে? তিনি বললেন: "হে ইবনে লাবীদ, তোমার মা তোমাকে হারাক! আমি তো মনে করতাম তুমি মদীনার লোকেদের মধ্যে সর্বাধিক জ্ঞানী। ইহুদী ও খ্রিষ্টানরা কি তাওরাত ও ইঞ্জিল পাঠ করে না? অথচ তারা তা থেকে কোনোই উপকার লাভ করে না!"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في: (م) فطرحني الموج، وفي (ص): وطرح بي الموج. والمثبت من (ب).
[2] صحيح إن صحَّ سماعُ محمد بن المنكدر له من سفينة، وهو الراجح، وهذا إسناد لا بأس برجاله. وسلف الكلام عليه مفصلًا برقم (4281).وأخرجه الطبراني في "المعجم الكبير" (6432) -وعنه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (3511) - من طريق أحمد بن صالح، والبيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 45 من طريق يوسف بن عدي، كلاهما عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسنادوأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 45، وفي "الاعتقاد" ص 316 من طريق جعفر بن عون، عن أسامة بن زيد، به.قوله: "أجَمة" هي: المكان الكثير الشّجر.
6695 [3] - تقدَّم ذكرُ المصنف لزياد بن لبيد هذا بالأرقام (6642) و (6643).
6695 [4] - حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن سالم بن أبي الجعد لم يسمع من زياد. وسلف برقمي (343) و (6643).
6696 - Null
6696 - أخبرنا أبو جعفر البغدادي، حدثنا أبو عُلَاثة، حدثنا أبي، حدثنا ابن لَهِيعة، حدثنا أبو الأسوَد، عن عُرْوة، في تسمية المسلمين الذين بايعوا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم بالعَقَبة من الأنصار من بني الحارث بن الخَزْرج: سعدُ بن الرَّبيع بن عمرو بن أبي زُهير بن مالك بن امرئ القيس بن ثعلبة بن كعب بن الخَزرَج بن الحارث، وهو نقيبٌ، وقد شهد بدرًا.
উরওয়া থেকে বর্ণিত, আনসারদের মধ্যে বনু হারিস ইবনু খাযরাজ গোত্রের যেসব মুসলিম আকাবায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বাইআত করেছিলেন, তাদের নাম উল্লেখ প্রসঙ্গে: সাদ ইবনু রাবী' ইবনু আমর ইবনু আবী যুহায়র ইবনু মালিক ইবনু ইমরুউল কায়স ইবনু সা'লাবাহ ইবনু কা'ব ইবনু খাযরাজ ইবনু হারিস। তিনি ছিলেন নকী (নেতা/প্রতিনিধি), এবং তিনি বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন।
6697 - أخبرني إسماعيل بن محمد الشَّعراني، حدثنا جدِّي [1]، حدثنا إبراهيم ابن المنذر، حدثنا محمد بن فُليح، عن موسى بن عُقبة، عن ابن شِهاب، في تسمية من استُشِهد يوم أحد من الأنصار من بني الحارث بن الخَزْرج: سعد بن الرَّبيع.
ইবনু শিহাব থেকে বর্ণিত, আনসারদের মধ্যে বনু হারিস ইবনু খাজরাজ গোত্রের যারা উহুদের দিন শহীদ হয়েছিলেন, তাদের নাম উল্লেখ প্রসঙ্গে [তিনি বলেন]: সা‘দ ইবনু রাবী‘ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] لفظة "جدي" سقطت من (م) و (ص)، وأثبتناها من (ب).
6698 - أخبرنا موسى بن إسماعيل بن القاضي، حدثنا أبي، حدثنا إبراهيم بن حمزة الزُّبيري، حدثنا إسماعيل بن قيس، عن أبيه، عن خارجةَ بن زيد بن ثابت، عن أمِّ سعد بنت سعد بن الربيع: أنها دخلت على أبي بكر الصِّدِّيق، فألقى لها ثوبَه حتى جلست عليه، فدخلَ عليه عمرُ بن الخطاب فقال: يا خليفةَ رسولِ الله، مَن هذه؟ قال: هذه بنتُ مَن هو خيرٌ منِّي ومنك، قال: ومَن هو خيرٌ منِّي ومنك إِلَّا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم؟ قال أبو بكر: رجلٌ قُبِضَ على عهِد رسول الله صلى الله عليه وسلم تبوَّأ مَقعدَه من الجنة، وبقيتُ أنا وأنت [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه. ذكر سعد القَرَظِ المُوذِّن رضي الله عنه-
উম্মে সা'দ বিনতে সা'দ ইবনুর রাবী' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি একবার আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলেন। তখন তিনি (আবূ বকর) তার (উম্মে সা'দ) জন্য নিজের কাপড় বিছিয়ে দিলেন, যাতে তিনি তার উপর বসতে পারেন। এ সময় উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে প্রবেশ করলেন এবং বললেন: হে রাসূলুল্লাহর খলীফা! ইনি কে? তিনি (আবূ বকর) বললেন: ইনি এমন এক ব্যক্তির কন্যা, যিনি আমার এবং তোমার চেয়ে উত্তম। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ব্যতীত আর কে আছেন যিনি আমার ও আপনার চেয়ে উত্তম? আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: (তিনি এমন) একজন ব্যক্তি, যিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে ইন্তিকাল করেছেন এবং জান্নাতে তাঁর স্থান করে নিয়েছেন, আর আমি ও তুমি বেঁচে আছি।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده واهٍ، إسماعيل بن قيس -وهو ابن سعد بن زيد بن ثابت الأنصاري- ضعيف منكر الحديث، وبه ضعفه الذهبي في "التلخيص". وأبوه قيس لم نقف له على ترجمة، فهو مجهول.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (5401) -وعنه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (3134) - عن مصعب بن إبراهيم بن حمزة، عن أبيه، بهذا الإسناد.