আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
6699 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الإمام وعلي بن حَمْشَاذَ العَدْل، قالا: حدثنا بِشر بن موسى الأسدي، حدثنا عبد الله بن الزُّبير الحُمَيدي، حدثنا عبد الرحمن بن عمَّار بن سعدِ القَرَظِ مؤذِّنُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، حدثني أبي، عن جدِّي: أَنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم أمرَ بلالًا أن يُدخِلَ إصبَعَه في أُذنه، وقال: "إنه أرفعُ لصوتِك"، وأنَّ أذانَ بلال [1] كان مَثْنَى مَثْنى، وإقامتَه مفردةٌ، وقد قامت الصلاةُ مرةً مرةً واحدة.وأنَّه كان يُؤذِّن يومَ الجمعة على رسول الله إذا كان الفيءُ مثلَ الشِّراك. وأنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم كان إذا خرجَ إلى العيدين سَلَكَ على دار سعد بن أبي وقّاص، ثم على أصحاب الفَساطِيط، ثم بدأ بالصلاةِ قبلَ الخطبة، ثم كبَّر في الأولى سبعًا قبلَ القراءة، وفي الآخرة خمسًا قبل القراءة، ثم خَطَب الناسَ، ثم انصرف من الطريق الآخر من طريق بني زريق، فذَبَح أُضحيَّتَه عند طرف الزُّقاق بيده بشَفْرةٍ، ثم خرج إلى دار عمار بن ياسر ودار أبي هريرة بالبَلاطَ، وكان يخرُجُ إلى العيدين ماشيًا، ويرجعُ ماشيًا، وكان يُكبِّر بين أضعاف الخُطبة، ويُكثِر التكبيرَ في الخطبة للعِيدين، وكان إذا خَطَب في الحرب خطب على قوس، وإذا خطب في الجمعة خطب على عَصًا.وأنَّ بلالًا كان إذا كبَّر بالأذان استقبلَ القبلةَ، ثم يقول: الله أكبرُ الله أكبرُ، أشهدُ أنْ لا إلهَ إِلَّا الله، مرَّتينِ، أشهدُ أنَّ محمدًا رسول الله، مرَّتين، ويستقبلُ القبلةَ ثم ينحرِفُ عن القبلة، فيقول: حيَّ على الصلاة مرَّتين، ثم ينحرف عن يسار القبلة، فيقول: حيَّ على الفلاح، مرَّتين، ثم يستقبلُ القبلةَ فيقول: الله أكبرُ الله أكبرُ، لا إله إلَّا اللهُ [2]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
সা'দ আল-কারায (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নির্দেশ দিলেন যেন তিনি তাঁর আঙ্গুল তাঁর কানের মধ্যে প্রবেশ করান। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এটা তোমার আওয়াজকে আরো উঁচু করে দেবে।"
আর বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আযান ছিল জোড়ায় জোড়ায় (দু'বার দু'বার), এবং তাঁর ইকামত ছিল বেজোড় (একবার করে), তবে 'ক্বাদ ক্বামাতিস সালাহ' একবার মাত্র বলা হত।
আর তিনি জুমু'আর দিন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সামনে আযান দিতেন যখন ছায়া জুতার ফিতার মতো (খুব সামান্য) হয়ে যেত।
আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যখন দুই ঈদের (সালাতের) জন্য বের হতেন, তখন তিনি সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘরের রাস্তা ধরে যেতেন, এরপর তাঁবুর মালিকদের নিকট দিয়ে যেতেন, অতঃপর খুতবার আগে সালাত (নামায) শুরু করতেন। এরপর তিনি প্রথম রাকা'আতে কিরাতের আগে সাতবার তাকবীর দিতেন, এবং শেষের (দ্বিতীয়) রাকা'আতে কিরাতের আগে পাঁচবার তাকবীর দিতেন। এরপর তিনি লোকদের উদ্দেশ্যে খুতবা দিতেন। এরপর বনী যুরাইকের রাস্তা ধরে অন্য পথ দিয়ে ফিরে আসতেন। অতঃপর সরু রাস্তার মুখে নিজের হাতে ধারালো ছুরি দিয়ে তাঁর কুরবানী যবেহ করতেন। এরপর তিনি আম্মার ইবনু ইয়াসির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বাড়ি এবং বালাত নামক স্থানে আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বাড়ির দিকে বের হতেন। তিনি দুই ঈদের (সালাতের জন্য) হেঁটে যেতেন এবং হেঁটে ফিরে আসতেন। আর তিনি খুতবার ফাঁকে ফাঁকে তাকবীর দিতেন এবং দুই ঈদের খুতবায় বেশি বেশি তাকবীর দিতেন। আর তিনি যখন যুদ্ধের সময় খুতবা দিতেন, তখন ধনুকের ওপর ভর করে খুতবা দিতেন, আর যখন জুমু'আর খুতবা দিতেন, তখন লাঠির ওপর ভর করে খুতবা দিতেন।
আর বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন আযানের জন্য তাকবীর (অর্থাৎ আযান শুরু) করতেন, তখন তিনি ক্বিবলামুখী হতেন, এরপর বলতেন: "আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার", "আশহাদু আল্লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ"—এই বাক্য দুটি দু'বার বলতেন, "আশহাদু আন্না মুহাম্মাদার রাসূলুল্লাহ"—এই বাক্যটিও দু'বার বলতেন। তিনি ক্বিবলামুখী হয়েই এটি বলতেন, এরপর তিনি ক্বিবলা থেকে পাশ ফিরে বলতেন: "হায়্যা আলাস সালাহ" দু'বার। এরপর তিনি ক্বিবলার বাম দিকে ফিরে বলতেন: "হায়্যা আলাল ফালাহ" দু'বার। এরপর তিনি ক্বিবলামুখী হয়ে বলতেন: "আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার, লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: بلالًا.
[2] إسناده ضعيف لضعف عبد الرحمن -وهو ابن سعد بن عمار بن سعد القَرَظ- وما وقع هنا في تسميته ابنَ عمار؛ فإما أن الحميدي نسبه إلى جدِّه، أو وهمَ. وقد اضطرب عبد الرحمن بن سعد في إسناده؛ فمرة يرويه مرسلًا كما في رواية المصنف هنا، ومرة يرويه متصلًا كما سيأتي، وأبوه مجهول الحال.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (5448) عن بشر بن موسى بهذا الإسناد، مختصرًا بذكر أمره صلى الله عليه وسلم بلالًا بإدخال إصبعيه في أذنيه.وأخرجه مختصرًا الدارمي (1647)، والدارقطني (1727) من طريق أحمد بن الحجاج، عن عبد الرحمن بن سعد بن عمار بن سعد المؤذن، عن عبد الله بن محمد بن عمار، عن أبيه، عن جده قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يكبر في العيدين في الأولى سبعًا، وفي الأخرى خمسًا، وكان يبدأ بالصلاة قبل الخطبة. فغاير في إسناده، وعبد الله بن محمد بن عمار هذا ضعيف.وأخرجه مختصرًا ابنُ أبي خيثمة في السفر الثاني من "تاريخه" (2868)، والعقيلي في "الضعفاء" (1288) من طريق يعقوب بن حميد بن كاسب، عن عبد الرحمن بن سعد، عن عمر ابن حفص ابن عمار بن سعد، عن أبيه، عن جده: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان يخرج إلى العيدين من طريق دار بني هاشم، ويرجع على طريق أبي هريرة. ورواه يعقوب بن حميد أيضًا عند الطبراني في "الكبير" (1072)، والبيهقي 1/ 396، عن عبد الرحمن بن سعد بن عمار بن سعد، عن عبد الله بن محمد وعمر وعمار ابني حفص، عن آبائهم، عن أجدادهم عن بلال، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إذا أذّنت فاجعل إصبعيك في أذنيك، فإنه أرفع لصوتك"، فجعله من مسند بلال. ويعقوب بن حميد ضعيف.ورواه تامًا ومقطعًا هشامُ بن سعد عن عبد الرحمن بن سعد، واختلف عليه:فرواه إسحاق بن إبراهيم بن أبي حسّان الأنماطي عند الطبراني في "الكبير" (5448) عنه، عن عبد الرحمن بن عمار بن سعد القرظ، حدثني أبي، عن جدي، مرسلًا.ورواه ابن ماجه (710) و (731) و (1101) و (1107) و (1277) و (1287) و (1294) و (1298) و (3156)، ويحيى بن محمد بن أبي صغير الحلبي عند الطبراني في "الصغير" (1170 - 1174)، وعبدان عبد الله بن عثمان عند البيهقي 1/ 396، ثلاثتهم (ابن ماجه ويحيى وعبدان) عنه، عن عبد الرحمن بن سعد، قال: حدثني أبي، عن أبيه، عن جده، موصولًا.ورواه الحسن بن سفيان عند ابن عدي في "الكامل" 4/ 314، وأبي نعيم في "معرفة الصحابة" (3184) و (5215)، عنه، عن عبد الرحمن بن سعد، حدثني أبي، عن جدي، وفي رواية أبي نعيم: أبي عن جدِّه.ورواه محمد بن سعيد الخريمي الدمشقي عند ابن عدي 4/ 313 - ومن طريقه البيهقي 3/ 206 و 309 - عنه، عن عبد الرحمن بن سعد، قال: حدثني أبي، عن آبائه: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر بعضه.وأخرج ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2255)، والفريابي في "أحكام العيدين" (105)، والطبراني في "الكبير" (5449)، والبيهقي 3/ 287 من طريق الزهري، عن حفص بن عمر بن سعد القرظ، أن أباه وعمومته أخبروه، عن أبيه سعد: أنَّ السُّنة في الأضحى والفطر أن يكبر الإمام في الركعة الأولى سبع تكبيرات قبل القراءة، ويكبر في الركعة الثانية خمس تكبيرات قبل القراءة.وفي باب التفات المؤذن ذات اليمين وذات الشمال عن أبي جحيفة عند البخاري (634)، ومسلم (503).وفي باب وضع إصبعي المؤذن في أذنيه عن أبي جحيفة أيضًا عند أحمد 31 / (18759)، والترمذي (197)، وسنده صحيح.وفي باب شفع الأذان وإفراد الإقامة عن أنس عند البخاري (603)، ومسلم (378).
6700 - حدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا الحسن بن علي بن شَبيب المَعْمَري، حدثنا محمد بن مُصفَّى، حدثنا بقيَّة، حدثنا الزُّبيدي، عن الزُّهْري، عن حفص بن عمر بن سعد [1] القَرَظ، أنَّ أباه وعمومته أخبروه: أنَّ سعد القَرَظ كان مؤذنًا لأهل قُباء، فانتقله عمرُ بن الخطاب فاتخذه مؤذنًا [2]. ذكرُ جُنَادة بن أبي أُمية الأزدي رضي الله عنه-
হাফস ইবনে উমর ইবনে সাদ আল-কারাজ থেকে বর্ণিত, তাঁর পিতা ও তাঁর চাচাগণ তাঁকে জানিয়েছিলেন যে, সাদ আল-কারাজ কুবাবাসীর মুয়াযযিন ছিলেন। অতঃপর উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে স্থানান্তরিত করেন এবং তাঁকে মুয়াযযিন হিসেবে নিযুক্ত করেন। জুনাদা ইবনে আবি উমাইয়্যা আল-আযদীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আলোচনা।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] أقحم هنا لفظ "بن" في (م) و (ص)، وجاء على الصواب في (ب). مواضع من هذا الكتاب، وكلاهما لا بأس به.
[2] إسناده محتمل للتحسين من أجل بقية -وهو ابن الوليد- ومن أجل حفص بن عمر بن سعد، وهو قد روى عنه ولده عمر والزهري، وذكره ابن حبان في "الثقات". الزبيدي: هو محمد ابن الوليد بن عامر.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (5449) عن الحسن بن علي المعمري، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2255)، وأبو بكر الفريابي في "أحكام العيدين" (105) عن محمد بن مصفي، به. وزادوا فيه: أنَّ السنة في صلاة الأضحى والفطر أن يكبر الإمام في الأولى سبع تكبيرات قبل القراءة، ويكبر في الركعة الثانية خمس تكبيرات قبل القراءة.ورواه الشافعي -كما في "معرفة السنن" البيهقي (2634) - عن الثقة، عن الزهري، عن حفص ابن عمر بن سعد القرظ: أنَّ جدَّه سعدًا، فذكره. مواضع من هذا الكتاب، وكلاهما لا بأس به.
6701 - أخبرني أحمد بن يعقوب الثقفي، حدثنا موسى بن زكريا، حدثنا خليفة ابن خياط، قال: جُنادة بن أبي أُمية بن زَهْران [1] بن كعب بن الحارث بن كعب بن عبد الله بن مالك بن نَصْر الأزدي، تُوفِّي سنةَ ثمانين.
৬৭০১ - আমাকে আহমদ ইবনু ইয়া'কূব আস-সাকাফী সংবাদ দিয়েছেন, আমাদের কাছে মূসা ইবনু যাকারিয়া হাদীস বর্ণনা করেছেন, আমাদের কাছে খালীফা ইবনু খাইয়্যাত হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: জুনাদাহ ইবনু আবী উমায়্যাহ ইবনু যাহরান [১] ইবনু কা'ব ইবনু হারিস ইবনু কা'ব ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু মালিক ইবনু নাসর আল-আযদী, আশি (৮০) সনে তাঁর মৃত্যু হয়।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: هرار، والمثبت من "طبقات خليفة" ص 305، وهو الموافق لما في "الاستيعاب" لابن عبد البر، وغيره. مواضع من هذا الكتاب، وكلاهما لا بأس به.
6702 - حدثنا أبو العبّاس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو زُرعة عبد الرحمن بن عَمرو الدِّمشقي، حدثنا أحمد [1] بن خالد الوَهْبي، حدثنا محمد بن إسحاق، عن يزيد بن أبي حبيب، عن مَرْثَد بن عبد الله اليَزَني، عن حُذافة الأزدي، عن جُنادة بن أبي أُميَّة، قال: دخلتُ على رسول الله صلى الله عليه وسلم في نَفَرٍ من الأزد يومَ الجُمعة، فدعانا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إلى طعام بينَ يديه، فقلنا: إنا صِيامٌ، فقال: "صمتُم أمسِ؟ " قلنا: لا، قال: "أفتصومون غدًا؟ قلنا: لا، قال: "فأفطِروا"، ثم قال: "لا تصوموا يومَ الجُمعة مُفردًا" [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه. ذكرُ سَوَاد بن قارِب الأزدي رضي الله عنه-
জুনাদা বিন আবি উমাইয়াহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি জুমুআর দিন আযদ গোত্রের কয়েকজন লোকের সাথে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট প্রবেশ করলাম। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সামনে রাখা খাবারের দিকে আমাদের ডাকলেন। আমরা বললাম: আমরা সাওম (রোযা) পালনকারী। তিনি বললেন: "তোমরা কি গতকাল সাওম পালন করেছিলে?" আমরা বললাম: না। তিনি বললেন: "তাহলে কি তোমরা আগামীকাল সাওম পালন করবে?" আমরা বললাম: না। তিনি বললেন: "তাহলে ইফতার (রোযা ভেঙ্গে দাও)।" অতঃপর তিনি বললেন: "তোমরা শুধু জুমুআর দিনে এককভাবে সাওম পালন করো না।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في النسخ الخطية: محمد، والمثبت من "إتحاف المهرة" لابن حجر (3980)، ومثله في رواية الطبراني (2173) عن أحمد بن عبد الوهاب الحَوطي عن أحمد بن خالد. وكلٌّ من محمد وأحمد أخوانِ، لكن المعروف بالرواية عن ابن إسحاق وعنه أبو زرعة هو أحمد، كما في عدة مواضع من هذا الكتاب، وكلاهما لا بأس به.
[2] النهي عن صوم الجمعة مفردًا صحيح لغيره، وحذافة كذا وقع عند المصنف، ومثله في رواية الطبراني المذكورة، والذي في مصادر التخريج ومصادر ترجمته: حذيفة، وهو الأزدي -ويقال: البارقي- وتفرَّد بالرواية عنه مرثد بن عبد الله اليزني، لذا قال الذهبي عنه في "الميزان": مجهول، روى في كراهية صوم الجمعة ومحمد بن إسحاق -وإن كان مدلسًا وقد عنعنه- قد توبع، وجنادة الأزدي مختلف في صحبته.وأخرجه أحمد 39 / (24009/ 4) قال: حدثنا يزيد بن هارون، قال: أخبرنا محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد. ووقع عنده حذيفة الأزدي.وأخرجه النسائي (2787) من طريق محمد بن سلمة الحراني، عن ابن إسحاق، به. وليس فيه مرثد بن عبد الله وهو مخالف لما رواه أصحاب ابن إسحاق كما قال المزي في "تحفة الأشراف" 2/ 438.وأخرجه النسائي (2786) من طريق الليث بن سعد، عن يزيد بن أبي حبيب، عن أبي الخير مرثد، عن حذيفة البارقي، عن جنادة.وصحَّ النهي عن إفراد الجمعة بالصوم عن غير واحد من الصحابة، منهم جابر عند البخاري (1984)، ومسلم (1143)، وأبو هريرة عند البخاري (1985)، ومسلم (1144)، وجويرية بنت الحارث عند البخاري (1986).
6703 - حدثنا أبو بكر أحمد بن سلمان الفقيه إملاءً، حدثنا هلال العلاء بن الرَّقِّي، حدثنا عثمان بن عبد الرحمن الوقَّاصي، عن محمد بن كعب القُرَظي، قال: بَيْنا عمرُ بن الخطاب قاعدٌ في المسجد إذ مرَّ رجلٌ في مُؤخَّر المسجد، فقال رجلٌ: يا أميرَ المؤمنين، أتعرِفُ هذا المارَّ؟ قال: لا، فمن هو؟ قال: سَواد بن قارِب، وهو رجلٌ من أهل اليمن من بيتٍ فيهم شَرَف وموضِعٌ، وهو الذي أتاه رَئيُّه بظهور النبيِّ صلى الله عليه وسلم فقال عمر: عليَّ به، فدُعِي به فقال: أنتَ سَوادُ بن قارب؟ قال: نعم، قال: فأنت الذي أتاك رئيُّك بظُهور رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: نعم، قال: فأنت على ما كنتَ عليه من كِهانتِك [1]؟ فغضب غضبًا شديدًا، وقال: يا أمير المؤمنين، ما استقبلني بهذا أحدٌ منذ أسلمتُ، فقال عمر: يا سبحانَ الله! والله ما كنَّا عليه من الشِّرك أعظمُ ممّا كنتَ عليه من كهانتك، أخبرني بإتيانك رَئيُّك بظُهورِ رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: نعم يا أميرَ المؤمنين، بَينا أنا ذاتَ ليلة بين النائم واليقظان إذ أتاني رَئِيٌّ فضربني برجله، وقال قُمْ يا سَوادَ بنَ قاربٍ، فافهَمْ واعقِلْ إن كنتَ تعقِلُ، إنه قد بُعِث رسولُ الله صلى الله عليه وسلم من لُؤي بن غالب يدعو إلى الله وإلى عبادتِه، ثم أنشأَ يقول:عَجبتُ للجِنِّ وتَجْساسِها … وشَدِّها العِيسَ بأحلاسِهاتَهوِي إلى مكةَ تَبْغي الهُدَى … ما خَيِّرُ الجنِّ كأنجاسِهافارحَلْ إلى الصَّفْوة من هاشمٍ … واسمُ بعَيَنيْكَ إلى راسِهاقال: فلم أرفَعْ بقوله رأسًا، وقلتُ: دعني أنَمْ، فإني أمسيتُ ناعسًا، فلما أن كانت الليلةُ الثانية أتاني فضربَني برجلِه، وقال: ألم أقُلْ لك يا سوادَ بنَ قارب: قُمْ فافهَمْ واعقِلْ إن كنتَ تعقلُ؟! قد بُعِثَ رسولٌ من لُؤَي بن غالب، يدعو إلى الله وإلى عبادتِه، ثم أنشأ الجنِّيُّ يقول:عَجبتُ للجِنِّ وتَطْلابِها [2] … وشَدِّها العِيسَ بأقْتابِها تَهوْي إلى مكةَ تَبْغي الهُدى … ما صادقُ [3] الجنِّ ككَذَّابِهافارحَلْ إلى الصَّفوةِ من هاشمٍ … بينَ زَواياها وحُجَّابِهاقال: فلم أرفَعْ بقوله رأسًا، فلما أن كان الليلةُ الثالثة أتاني فضربَني برجلِه، وقال: ألم أقلُ لك يا سوادَ بنَ قارب: افهَمْ واعقِلْ إن كنتَ تَعقِل [4]؟! أنه قد بُعث رسولُ الله من لؤي بن غالب، يدعو إلى الله وإلى عبادتِه، ثم أنشأَ يقول:عجبتُ للجِنِّ وأخبارِها … وشدِّها العِيسَ بأكْوارِهاتَهوِي إلى مكةَ تَبْغي الهُدَى … ما مُؤمنو الجنِّ ككفَّارِهافارحَلْ إلى الصَّفوةِ من هاشمٍ … ليس قُدَامَاها كأدبارِهاقال: فوقع في نفسي حبُّ الإسلام ورغبتُ فيه، فلما أصبحتُ شَدَدتُ على راحلتي فانطلقت متوجهًا إلى مكة، فلما كنتُ في بعض الطريق أُخبرتُ أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قد هاجر إلى المدينة، فأتيتُ المدينة فسألتُ عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم، فقيل لي: في المسجد، فانتهيتُ إلى المسجد، فعَقَلتُ ناقتي ودخلتُ، وإذا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم والناسُ حولَه، فقلتُ: اسمع مَقَالتي يا رسولَ الله، فقال أبو بكر: ادُنْه، فلم يَزَلْ حتى صِرتُ بين يديه، قال: "هاتِ، فأخبِرْني بإتيانِك رَئيُّك" فقلتُ:أتاني نَجِيِّي [5] بعد هَدْءٍ ورَقْدةٍ … ولم يكُ فيما قد بَلَوتُ بكاذبِثلاثَ ليالٍ قولُه كلَّ ليلةٍ … أتاك رسولٌ من لؤيِّ بن غالبِفشمَّرتُ من ذَيلي الإزارَ ووسَّطَتْ … بِيَ الذَّعَلِبُ الوَجْناءُ بينَ السَّباسبِفأشهدُ أنَّ الله لا ربَّ غيرُهُ … وأنَّك مأمونٌ على كلِّ غائبِوأنَّك أدنَى المُرسلينَ وَسيلةً … إلى الله يا ابنَ الأكرمينَ الأطايبِ فمُرْنا بما يأتيك يا خيرَ مَن مَشَى … وإن كان فيما جاءَ شَيْبُ الذُّوائبِوكنْ لي شفيعًا يومَ لا ذو [6] شَفاعةٍ … سِواكَ بِمُعْن عن سَوَادِ بنِ قاربِففَرِحَ رسولُ الله وأصحابُه بإسلامي فرحًا شديدًا حتى رُئِيَ في وجوههِم، قال: فوَثَبَ عمرُ فالتزمه، وقال: قد كنتُ أُحِبُّ أن أسمعَ هذا منك [7]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ذكرُ سَلْمان بن عامر الضَّبيِّ رضي الله عنه-
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদা তিনি মসজিদে বসেছিলেন, এমন সময় মসজিদের পিছনের অংশ দিয়ে এক ব্যক্তি অতিক্রম করল। তখন এক ব্যক্তি বলল, হে আমীরুল মু'মিনীন, আপনি কি এই পথচারীকে চেনেন? তিনি (উমর) বললেন, না, সে কে? লোকটি বলল, সে হলো সাওয়াদ ইবনে কারিব। সে ইয়ামানের এমন এক বংশের লোক, যাদের মধ্যে সম্মান ও মর্যাদা বিদ্যমান ছিল। আর সে হলো সেই ব্যক্তি, যার কাছে তার জিন (সহচর) এসে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের আবির্ভাবের খবর দিয়েছিল।
তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, তাকে আমার কাছে ডেকে আনো। তাকে ডাকা হলে তিনি (উমর) বললেন, তুমিই কি সাওয়াদ ইবনে কারিব? সে বলল, হ্যাঁ। তিনি বললেন, তুমিই কি সেই ব্যক্তি, যার কাছে তার জিন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের আবির্ভাবের খবর দিয়েছিল? সে বলল, হ্যাঁ। তিনি (উমর) বললেন, তুমি কি এখনো তোমার সেই ভবিষ্যদ্বক্তার (কাহিন) অবস্থায় আছো? একথা শুনে সে ভীষণ রাগান্বিত হলো এবং বলল, হে আমীরুল মু'মিনীন! ইসলাম গ্রহণের পর কেউ আমাকে এই কথা বলে সম্বোধন করেনি।
তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, সুবহানাল্লাহ! আল্লাহর কসম, আমাদের যে শিরকের অবস্থা ছিল, তা তোমার এই ভবিষ্যদ্বক্তার অবস্থা থেকেও ভয়াবহ ছিল। তুমি আমাকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের আবির্ভাবের বিষয়ে তোমার জিনের আগমনের খবর দাও।
সে বলল, হ্যাঁ, হে আমীরুল মু'মিনীন! এক রাতে আমি যখন ঘুম ও জাগরণের মাঝামাঝি অবস্থায় ছিলাম, তখন আমার জিন সহচর এসে আমাকে পা দিয়ে আঘাত করল এবং বলল, ওহে সাওয়াদ ইবনে কারিব, ওঠো! তুমি যদি বুদ্ধিমান হও তবে বোঝার চেষ্টা করো এবং অনুধাবন করো। লূআই ইবনে গালিব গোত্র থেকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে প্রেরণ করা হয়েছে, যিনি আল্লাহ ও তাঁর ইবাদতের দিকে ডাকছেন। এরপর সে আবৃত্তি করতে লাগল:
“আমি আশ্চর্য হই সেই জিনদের জন্য এবং তাদের অনুসন্ধিৎসুতার জন্য...
যারা তাদের সওয়ারিগুলোকে জিন পরিধান করায়,
তারা হিদায়াতের সন্ধানে মক্কার দিকে দ্রুত ছুটে চলেছে...
সৎ জিনেরা অসৎ জিনদের মতো নয়,
সুতরাং তুমি হাশেম বংশের সেই নির্বাচিত ব্যক্তিত্বের দিকে যাত্রা করো...
এবং তোমার দৃষ্টি তাঁর প্রধানের দিকে নিবদ্ধ করো।”
সে (সাওয়াদ) বলল, আমি তার কথায় কর্ণপাত করলাম না এবং বললাম, আমাকে ঘুমাতে দাও, আমি রাতে খুব ঘুমকাতর হয়ে পড়েছি।
যখন দ্বিতীয় রাত এলো, সে আমার কাছে এসে আমাকে পা দিয়ে আঘাত করল এবং বলল, আমি কি তোমাকে বলিনি, হে সাওয়াদ ইবনে কারিব: ওঠো! তুমি যদি বুদ্ধিমান হও তবে বোঝার চেষ্টা করো এবং অনুধাবন করো?! লূআই ইবনে গালিব গোত্র থেকে একজন রাসূল প্রেরিত হয়েছেন, যিনি আল্লাহ ও তাঁর ইবাদতের দিকে ডাকছেন। এরপর জিনটি আবৃত্তি করতে লাগল:
“আমি আশ্চর্য হই সেই জিনদের জন্য এবং তাদের অনুসন্ধানের জন্য...
যারা তাদের সওয়ারিগুলোকে হাওদা দিয়ে কষে বেঁধেছে,
তারা হিদায়াতের সন্ধানে মক্কার দিকে দ্রুত ছুটে চলেছে...
সত্যবাদী জিনেরা মিথ্যাবাদী জিনদের মতো নয়,
সুতরাং তুমি হাশেম বংশের সেই নির্বাচিত ব্যক্তিত্বের দিকে যাত্রা করো...
যারা তাঁর (কা'বার) কোণ ও পর্দাগুলোর মাঝে অবস্থান করে।”
সে বলল, আমি তার কথায় কর্ণপাত করলাম না।
এরপর যখন তৃতীয় রাত এলো, সে আমার কাছে এসে আমাকে পা দিয়ে আঘাত করল এবং বলল, আমি কি তোমাকে বলিনি, হে সাওয়াদ ইবনে কারিব: তুমি যদি বুদ্ধিমান হও তবে বোঝার চেষ্টা করো এবং অনুধাবন করো?! লূআই ইবনে গালিব গোত্র থেকে রাসূলুল্লাহকে প্রেরণ করা হয়েছে, যিনি আল্লাহ ও তাঁর ইবাদতের দিকে ডাকছেন। এরপর সে আবৃত্তি করতে লাগল:
“আমি আশ্চর্য হই সেই জিনদের জন্য এবং তাদের খবরগুলোর জন্য...
যারা তাদের সওয়ারিগুলোকে পালান দিয়ে কষে বেঁধেছে,
তারা হিদায়াতের সন্ধানে মক্কার দিকে দ্রুত ছুটে চলেছে...
মু'মিন জিনেরা কাফির জিনদের মতো নয়,
সুতরাং তুমি হাশেম বংশের সেই নির্বাচিত ব্যক্তিত্বের দিকে যাত্রা করো...
যাদের পূর্ববর্তীরা তাদের পরবর্তীদের মতো নয়।”
সে বলল, ফলে আমার অন্তরে ইসলামের প্রতি ভালোবাসা সৃষ্টি হলো এবং আমি তার প্রতি আগ্রহী হলাম। যখন সকাল হলো, আমি আমার সওয়ারির পিঠে হাওদা বাঁধলাম এবং মক্কার দিকে মুখ করে যাত্রা শুরু করলাম। আমি যখন পথে ছিলাম, তখন আমাকে জানানো হলো যে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মদীনায় হিজরত করেছেন। তখন আমি মদীনায় এসে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের ব্যাপারে জিজ্ঞেস করলাম। আমাকে বলা হলো: তিনি মসজিদে আছেন।
আমি মসজিদে পৌঁছলাম, আমার উটটিকে বেঁধে ভেতরে প্রবেশ করলাম। দেখলাম, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এবং লোকেরা তাঁকে ঘিরে আছেন। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমার কথা শুনুন। তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, কাছে এসো। তিনি আমার সাথে কথা বলা অব্যাহত রাখলেন, যতক্ষণ না আমি তাঁর সামনে পৌঁছলাম।
তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "বলো! তোমার জিন সহচর তোমার কাছে আসার খবর দাও।"
তখন আমি বললাম:
“গভীর ঘুম ও বিশ্রামের পর আমার সহচর এসেছিল,
যাকে আমি পরীক্ষা করে কখনো মিথ্যাবাদী পাইনি।
তিন রাত ধরে প্রতি রাতে তার কথা ছিল:
‘লূআই ইবনে গালিব গোত্র থেকে তোমার কাছে রাসূল এসেছেন।’
তখন আমি আমার তহবন্দের নিম্নাংশ গুটিয়ে নিলাম এবং
শক্তিশালী দ্রুতগামী সওয়ারি আমাকে মরুভূমির মধ্য দিয়ে বহন করে নিয়ে চলল।
আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আল্লাহ ছাড়া কোনো রব নেই,
এবং আপনি সকল অদৃশ্য বিষয়ের ক্ষেত্রে আমানতদার।
আর আপনিই প্রেরিত রাসূলদের মধ্যে আল্লাহর কাছে সবচেয়ে নিকটবর্তী,
হে সর্বোত্তম মহৎদের সন্তান!
হাঁটা মানুষের মধ্যে যিনি শ্রেষ্ঠ, আপনি আপনার কাছে যা আসে, তা দিয়ে আমাদের আদেশ করুন,
যদিও এর মধ্যে কেশ শুভ্রকারী বিষয় থাকে।
আর আপনি আমার জন্য সুপারিশকারী হোন, যেদিন
আপনি ছাড়া সাওয়াদ ইবনে কারিবের জন্য অন্য কারো সুপারিশ কার্যকর হবে না।”
এতে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এবং তাঁর সাহাবীগণ আমার ইসলাম গ্রহণে ভীষণ খুশি হলেন, এমনকি তাঁদের চেহারায় সেই আনন্দ দেখা যাচ্ছিল। রাবী বললেন, এরপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লাফ দিয়ে উঠে তাকে জড়িয়ে ধরলেন এবং বললেন, আমি তোমার কাছে থেকে এই কথাগুলো শোনার জন্য পছন্দ করতাম।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] المثبت من (ب)، وفي (م) عليه منه من كهانتك، وفي (ص): عليه من قبل كهانتك.
[2] في (م) و (ص): وطلابها، والمثبت من (ب).
6703 [3] - في نسخنا الخطية: صدق، والمثبت من مصادر التخريج.
6703 [4] - المثبت من (م) و (ب)، وفي (ص): افهم إن كنت تفهم، واعقل إن كنت تعقل.
6703 [5] - المثبت من (ب)، وفي (م) و (ص): بحق.
6703 [6] - سقط من (م) و (ص)، وفي (ب): ذي! والمثبت من المصادر. قال: دخل سواد بن قارب على عمر بن الخطاب، فذكر نحوه وسعيد بن عُبَيد الله وأبوه ضعيفان.وأخرجه أبو نعيم في "المعرفة" (3552) من طريق الحسن بن عمارة، عن عبد الله بن عبد الرحمن، قال: دخل سواد بن قارب على عمر بن الخطاب، فذكر نحوه والحسن بن عمارة متروك.وأخرجه البيهقي 2/ 248 - 249 من طريق أحمد بن موسى الحمار الكوفي، عن زياد بن ماروية القصري، عن محمد بن تراس الكوفي، عن أبي بكر بن عيّاش، عن أبي إسحاق، عن البراء بن عازب، فذكر نحوه. وقال الذهبي في "تاريخ الإسلام" 1/ 593: هذا حديث منكر بالمرة، ومحمد ابن تراس وزياد مجهولان لا تقبل روايتهما، وأخاف أن يكون موضوعًا على أبي بكر بن عيّاش، ولكن أصل الحديث مشهور قلنا: زياد القصري ترجمه الخطيب في "تاريخه" 9/ 506، ونقل عن الدار قطني قوله فيه: ما علمت إلَّا خيرًا. وأما ابن تراس فلم نتبينه.وأخرجه ابن شاهين -كما في "الإصابة" لابن حجر 4/ 530 - من طريق الفضل بن عيسى، عن العلاء بن زيدل، عن أنس بن مالك قال: دخل رجلٌ من دوس يقال له: سواد بن قارب على النبي صلى الله عليه وسلم، فذكر القصة. وإسناده تالف لا يفرح به، الفضل بن عيسى -وهو الرقاشي- والعلاء ابن زيدل ساقطا الحديث.وقد صحَّ هذا الخبر مختصرًا، فقد روى البخاري في "صحيحه" (3866) من حديث عبد الله ابن عمر، قال: ما سمعتُ عمر لشيء قطُّ يقول: إني لأظنه كذا، إلَّا كان كما يظن؛ بينما عمر جالسٌ، إذ مرَّ به رجل جميل، فقال: لقد أخطأ ظني، أو إنَّ هذا على دينه في الجاهلية، أو لقد كان كاهنَهم، عليَّ الرجل، فدُعي له، فقال له ذلك، فقال: ما رأيتُ كاليوم استُقبل به رجل مسلم، قال: فإني أعزم عليك إلا ما أخبرتني، قال: كنتُ كاهنَهم في الجاهلية، قال: فما أعجبُ ما جاءتك به جنيَّتُك؟ قال: بينما أنا يومًا في السوق، جاءتني أعرفُ فيها الفزَع، فقالت: ألم ترَ الجنَّ وإبلاسها؟ ويأسَها من بعد إنكاسها ولحوقَها بالقِلاص وأحلاسها. قال عمر: صدق، بينما أنا نائم عند آلهتهم، إذ جاء رجلٌ يعجل فذبحه، فصرخَ به صارخ لم أسمع صارخًا قطُّ أشدَّ صوتًا منه يقول: يا جَليح، أمر نَجيح، رجلٌ فَصيح، يقول: لا إله إلا الله، فوثبَ القومُ، قلت: لا أبرح حتى أعلم ما وراء هذا، ثم نادى: يا جَليح، أمر نجيح، رجلٌ فصيح، يقول: لا إله إلَّا الله، فقمتُ، فما نشبنا أن قيل: هذا نبي.قوله: "أتاه رئيُّه"، هو الجني يعرض للإنسان ويطلعه على ما يزعم من الغَيْب.قوله: "وتجساسها" يروى بالجيم المعجمة وبالحاء المهملة قال ابنُ الأَعرابي: تَجَسَّستُ الخَبَرَ وتَحَسَّسته بمعنًى واحدٍ، وقال غيره: التحسُّسُ: شبهُ التَّسمُّعِ والتَّبصر، والتجسُّسُ، بالجيم البحثُ عن العَورة. انظر "لسان العرب" مادة (حسس)."أحلاسها" جمع جلس ما ولي ظهر الدابَّة تحت الرحل والسرج.العِيس بالكسر: الإبل البِيض يخالط بياضَها شيء من الشَّقرة، واحدها أعيَسُ، والأنثى: عَيْساءُ.
6703 [7] - إسناده ضعيف جدًا؛ عثمان بن عبد الرحمن الوقاصي متروك الحديث. وأعلَّه الذهبي في "التلخيص" بالانقطاع، يعني أنَّ محمدًا القرظي روايته عن عمر مرسلة.وأخرجه أبو يعلى في "معجمه" (329) - ومن طريقه البيهقي في "الدلائل" 2/ 252 - 253، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 327 - 326 - وابن قانع في "معجم الصحابة" 1/ 296 - ومن طريقه المعافى بن زكريا في "الجليس الصالح" ص 224 - 226، وابن النجار في "ذيل تاريخ بغداد" 4/ 132 - 134 - والطبراني في الكبير (6475)، وفي "الأحاديث الطوال" (31)، وأبو نعيم في "دلائل النبوة" (62)، وفي "معرفة الصحابة" (3554)، والبيهقي في "الدلائل" 2/ 253 - 254 من طريق علي بن منصور الأبناوي، عن عثمان بن عبد الرحمن الوقّاصي، بهذا الإسناد. وتحرَّف في رواية أبي يعلى إلى محمد بن عثمان! وقال الذهبي في "تاريخ الإسلام" 1/ 594: عثمان بن عبد الرحمن متفق على تركه، وعلي بن منصور فيه جهالة، مع أنَّ الحديث منقطع.وأخرجه بنحوه البخاري في "التاريخ الكبير" 4/ 202، والبغوي في "معجم الصحابة" (1180)، والطبراني (6476)، وابن عدي في "الكامل" 2/ 210 - 211، وابن منده في "معرفة الصحابة" 2/ 804، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (3553)، والبيهقي 2/ 253، وابن عساكر 72/ 320 - 321 و 321 - 322 من طريق الحكم بن يعلى بن عطاء المحاربي، عن عباد بن عبد الصمد، قال: سمعت سعيد بن جبير قال: أخبرني سواد بن قارب الأزدي قال: كنت نائمًا، فذكره. وقال البخاري عقبه: ولا يصح الحكم بن يعلى. قلنا: إسناده ضعيف جدًا؛ الحكم المحاربي متروك الحديث، وعباد بن عبد الصمد واهي الحديث.وأخرجه ابن أبي خيثمة في السفر الثاني من "تاريخه" (1050)، والخرائطي في "هواتف الجانِّ" ص 27، وابن منده في "المعرفة" 2/ 803، وأبو نعيم في "المعرفة" (3551)، والبيهقي 2/ 248 - 249، وابن عساكر 72/ 316 - 19 و 319 - 320 من طريق محمد بن عمران بن محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن سعيد بن عبيد الله بن الوليد الوصافي، عن أبيه، عن أبي جعفر الباقر، قال: دخل سواد بن قارب على عمر بن الخطاب، فذكر نحوه وسعيد بن عُبَيد الله وأبوه ضعيفان.وأخرجه أبو نعيم في "المعرفة" (3552) من طريق الحسن بن عمارة، عن عبد الله بن عبد الرحمن، قال: دخل سواد بن قارب على عمر بن الخطاب، فذكر نحوه والحسن بن عمارة متروك.وأخرجه البيهقي 2/ 248 - 249 من طريق أحمد بن موسى الحمار الكوفي، عن زياد بن ماروية القصري، عن محمد بن تراس الكوفي، عن أبي بكر بن عيّاش، عن أبي إسحاق، عن البراء بن عازب، فذكر نحوه. وقال الذهبي في "تاريخ الإسلام" 1/ 593: هذا حديث منكر بالمرة، ومحمد ابن تراس وزياد مجهولان لا تقبل روايتهما، وأخاف أن يكون موضوعًا على أبي بكر بن عيّاش، ولكن أصل الحديث مشهور قلنا: زياد القصري ترجمه الخطيب في "تاريخه" 9/ 506، ونقل عن الدار قطني قوله فيه: ما علمت إلَّا خيرًا. وأما ابن تراس فلم نتبينه.وأخرجه ابن شاهين -كما في "الإصابة" لابن حجر 4/ 530 - من طريق الفضل بن عيسى، عن العلاء بن زيدل، عن أنس بن مالك قال: دخل رجلٌ من دوس يقال له: سواد بن قارب على النبي صلى الله عليه وسلم، فذكر القصة. وإسناده تالف لا يفرح به، الفضل بن عيسى -وهو الرقاشي- والعلاء ابن زيدل ساقطا الحديث.وقد صحَّ هذا الخبر مختصرًا، فقد روى البخاري في "صحيحه" (3866) من حديث عبد الله ابن عمر، قال: ما سمعتُ عمر لشيء قطُّ يقول: إني لأظنه كذا، إلَّا كان كما يظن؛ بينما عمر جالسٌ، إذ مرَّ به رجل جميل، فقال: لقد أخطأ ظني، أو إنَّ هذا على دينه في الجاهلية، أو لقد كان كاهنَهم، عليَّ الرجل، فدُعي له، فقال له ذلك، فقال: ما رأيتُ كاليوم استُقبل به رجل مسلم، قال: فإني أعزم عليك إلا ما أخبرتني، قال: كنتُ كاهنَهم في الجاهلية، قال: فما أعجبُ ما جاءتك به جنيَّتُك؟ قال: بينما أنا يومًا في السوق، جاءتني أعرفُ فيها الفزَع، فقالت: ألم ترَ الجنَّ وإبلاسها؟ ويأسَها من بعد إنكاسها ولحوقَها بالقِلاص وأحلاسها. قال عمر: صدق، بينما أنا نائم عند آلهتهم، إذ جاء رجلٌ يعجل فذبحه، فصرخَ به صارخ لم أسمع صارخًا قطُّ أشدَّ صوتًا منه يقول: يا جَليح، أمر نَجيح، رجلٌ فَصيح، يقول: لا إله إلا الله، فوثبَ القومُ، قلت: لا أبرح حتى أعلم ما وراء هذا، ثم نادى: يا جَليح، أمر نجيح، رجلٌ فصيح، يقول: لا إله إلَّا الله، فقمتُ، فما نشبنا أن قيل: هذا نبي.قوله: "أتاه رئيُّه"، هو الجني يعرض للإنسان ويطلعه على ما يزعم من الغَيْب.قوله: "وتجساسها" يروى بالجيم المعجمة وبالحاء المهملة قال ابنُ الأَعرابي: تَجَسَّستُ الخَبَرَ وتَحَسَّسته بمعنًى واحدٍ، وقال غيره: التحسُّسُ: شبهُ التَّسمُّعِ والتَّبصر، والتجسُّسُ، بالجيم البحثُ عن العَورة. انظر "لسان العرب" مادة (حسس)."أحلاسها" جمع جلس ما ولي ظهر الدابَّة تحت الرحل والسرج.العِيس بالكسر: الإبل البِيض يخالط بياضَها شيء من الشَّقرة، واحدها أعيَسُ، والأنثى: عَيْساءُ.
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6704 - أخبرني أحمد بن يعقوب، حدثنا موسى بن زكريا، حدثنا خليفة بن خيَّاط، قال: سلمان بن عامر بن أوس بن حُجْر بن عمرو بن الحارث بن تَيْم بن ذُهْل بن مالك بن بكر بن سعد بن ضَبَّة، نزل البصرة، وله دارٌ حضرةَ الجامع، وبها تُوفِّي في خلافة عثمان.
খালিফা ইবনে খাইয়াত থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সালমান ইবনে আমের ইবনে আউস ইবনে হুজর ইবনে আমর ইবনে হারিস ইবনে তাইম ইবনে যূহল ইবনে মালিক ইবনে বকর ইবনে সা'দ ইবনে দাব্বাহ বসরায় বসবাস শুরু করেন। জামে মসজিদের সন্নিকটে তাঁর একটি ঘর ছিল, এবং উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতকালে সেখানেই তাঁর ইন্তেকাল হয়।
6705 - حدثنا [1] أبو عاصم، حدثنا أبو نَعَامة العَدَوي عمرو بن عيسى، حدثنا عبد العزيز بن بُشير [2]، عن سلمان بن عامر الضبِّي، قال: أتيتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقلتُ: يا رسولَ الله، إنَّ أبي كان يَصِلُ الرَّحمَ، ويَقرِي الضَّيفَ، ويفي بالذِّمَّة، قال: "ولم يدركِ الإسلامَ؟ قلت: لا، قال: فلما ولَّيتُ قال: "عليَّ بالشيخ" فقال لي: "يكونَ ذلك في عَقِبَكَ، فلن يَذِلُّوا أبدًا، ولن يُخزَوا أبدًا، ولن يفتقروا أبدًا" [3]. ذكرُ صَعْصَعة بن ناجيَة المُجاشعي رضي الله عنه-
সালমান ইবনু আমির আদ-দাব্বী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল! আমার পিতা আত্মীয়তার সম্পর্ক বজায় রাখতেন, মেহমানদারি করতেন এবং প্রতিশ্রুতি রক্ষা করতেন।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কিন্তু সে কি ইসলাম পায়নি?" আমি বললাম: "না।" বর্ণনাকারী বললেন: যখন আমি ফিরে যাচ্ছিলাম, তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমার কাছে সেই শাইখকে (বৃদ্ধকে) ডাকো।" অতঃপর তিনি আমাকে বললেন: "এগুলো তোমার বংশধরদের মধ্যে থাকবে। তারা কখনো লাঞ্ছিত হবে না, কখনো অপদস্থ হবে না এবং কখনো দরিদ্র হবে না।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] القائل: حدثنا، هو خليفة بن خياط في الإسناد السابق. ولا نسبوه عدويًا، بل ضبيًّا كما تقدم، والله أعلم. وقد تابع عبد العزيز هذا جمعٌ غير مسمَّين من رجال ونساء كما سيأتي.وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 4/ 136، ويعقوب الفسوي في "المعرفة والتاريخ" 1/ 321 - ومن طريقه الخطيب في موضح أوهام الجمع والتفريق 1/ 454 - وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1135)، والطحاوي في "مشكل "الآثار" (4362)، والطبراني في "الكبير" (6213)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (3360) من طرق عن أبي عاصم الضحاك مخلد، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (1091) من طريق زهير بن هنيد، عن أبي نعامة، عن أشياخ من قومه ونسوة من خالاته عن سلمان بن عامر الضبي، وكان جدَّه لأمه: أن بني طهية استعدت عليه رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فقالوا: يارسول الله، إن سلمان أغار علينا في الإسلام فبعث رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى سلمان فأتاه فقال: يا سلمان، ما يقول هؤلاء؟ " قال: ما يقولون يا رسول الله؟ قال: "يقولون: إنك أغرت عليهم في الإسلام"، قال: لا يا رسول الله، أغرت عليهم في الجاهلية، وأسلمت على المال، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "انظروا إلى المال فإن كان مخضرَمًا فهو لسلمان، وإن كان غير مخضرم فهو لبني طهية"، فنظروا فإذا هو مخضرم، فأحرزه سلمان. قال سلمان: فقلت: يا رسول الله، إنَّ أبي كان يقري الضيف، ويكرم الجار، ويفي بالذمة، ويعطي في النائبة، فما ينفعه ذاك؟ قال: "مات مشركًا؟ " قلت: نعم، قال: "لا ينفعه ذلك" فَوَجَمَ لها سلمانُ وولَّى، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "ردوا الشيخ" فرجع، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم: "أما إنها لا تنفعه، ولكنها تكون في عقبه؛ إنهم لن يخذوا أبدًا، ولن يذلوا أبدًا، ولن يفتقروا أبدًا". قال البغوي: هذا حديث غريب لم يرو إلَّا من هذا الوجه. ووقع فيه نسبة كل من زهير وأبي نعامة سعديًا! والمعروف أنهما عدويان.ويشهد لكون الأعمال الصالحة لا تنفع صاحبها مع كفره حديث عائشة عند مسلم (214)، وسلف برقم (3566).وحديث عدي بن حاتم عند أحمد 30/ (18262)، وابن حبان (332).
[2] انقلب في النسخ الخطية إلى: بشير بن عبد العزيز، وكذلك انقلب في "المعجم الكبير". للطبراني، والمثبت من مصادر التخريج، وهو الموافق لما في كتب الرجال. ولا نسبوه عدويًا، بل ضبيًّا كما تقدم، والله أعلم. وقد تابع عبد العزيز هذا جمعٌ غير مسمَّين من رجال ونساء كما سيأتي.وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 4/ 136، ويعقوب الفسوي في "المعرفة والتاريخ" 1/ 321 - ومن طريقه الخطيب في موضح أوهام الجمع والتفريق 1/ 454 - وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1135)، والطحاوي في "مشكل "الآثار" (4362)، والطبراني في "الكبير" (6213)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (3360) من طرق عن أبي عاصم الضحاك مخلد، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (1091) من طريق زهير بن هنيد، عن أبي نعامة، عن أشياخ من قومه ونسوة من خالاته عن سلمان بن عامر الضبي، وكان جدَّه لأمه: أن بني طهية استعدت عليه رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فقالوا: يارسول الله، إن سلمان أغار علينا في الإسلام فبعث رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى سلمان فأتاه فقال: يا سلمان، ما يقول هؤلاء؟ " قال: ما يقولون يا رسول الله؟ قال: "يقولون: إنك أغرت عليهم في الإسلام"، قال: لا يا رسول الله، أغرت عليهم في الجاهلية، وأسلمت على المال، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "انظروا إلى المال فإن كان مخضرَمًا فهو لسلمان، وإن كان غير مخضرم فهو لبني طهية"، فنظروا فإذا هو مخضرم، فأحرزه سلمان. قال سلمان: فقلت: يا رسول الله، إنَّ أبي كان يقري الضيف، ويكرم الجار، ويفي بالذمة، ويعطي في النائبة، فما ينفعه ذاك؟ قال: "مات مشركًا؟ " قلت: نعم، قال: "لا ينفعه ذلك" فَوَجَمَ لها سلمانُ وولَّى، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "ردوا الشيخ" فرجع، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم: "أما إنها لا تنفعه، ولكنها تكون في عقبه؛ إنهم لن يخذوا أبدًا، ولن يذلوا أبدًا، ولن يفتقروا أبدًا". قال البغوي: هذا حديث غريب لم يرو إلَّا من هذا الوجه. ووقع فيه نسبة كل من زهير وأبي نعامة سعديًا! والمعروف أنهما عدويان.ويشهد لكون الأعمال الصالحة لا تنفع صاحبها مع كفره حديث عائشة عند مسلم (214)، وسلف برقم (3566).وحديث عدي بن حاتم عند أحمد 30/ (18262)، وابن حبان (332).
6705 [3] - إسناده فيه لين من أجل عبد العزيز بن بُشير، وهو رجلٌ ضبِّيٌ كما وقع في روايتي أبي داود في "القدر" والطحاوي في "مشكل الآثار"، وهو مجهول؛ تفرد بالرواية عنه أبو نعامة عمرو ابن عيسى العدوي ووهم علي بن المديني في "العلل" (178) فجعله ابنَ بُشير بن كعب العدوي، وتبعه على ذلك ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 5/ 378، وتبعهما المزي في "التهذيب" 18/ 116، ووهَّم الرواية التي فيها نسبته بالضبِّي، فقال: روى له أبو داود في كتاب "القدر" هذا الحديث الواحد، ووقع عنده: عبد العزيز بن بشير الضبيِّ، والصواب: العدوي!قلنا: ولا يعرف البُشير بن كعب العدوي ولد يروي عنه، لذلك لم ينسبه البخاري في "التاريخ" ولا ابن حبان في "الثقات" عدويًّا، وكذلك لم ينسبه أحد ممّن أخرج الحديث إلى كعب ولا نسبوه عدويًا، بل ضبيًّا كما تقدم، والله أعلم. وقد تابع عبد العزيز هذا جمعٌ غير مسمَّين من رجال ونساء كما سيأتي.وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 4/ 136، ويعقوب الفسوي في "المعرفة والتاريخ" 1/ 321 - ومن طريقه الخطيب في موضح أوهام الجمع والتفريق 1/ 454 - وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1135)، والطحاوي في "مشكل "الآثار" (4362)، والطبراني في "الكبير" (6213)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (3360) من طرق عن أبي عاصم الضحاك مخلد، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (1091) من طريق زهير بن هنيد، عن أبي نعامة، عن أشياخ من قومه ونسوة من خالاته عن سلمان بن عامر الضبي، وكان جدَّه لأمه: أن بني طهية استعدت عليه رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فقالوا: يارسول الله، إن سلمان أغار علينا في الإسلام فبعث رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى سلمان فأتاه فقال: يا سلمان، ما يقول هؤلاء؟ " قال: ما يقولون يا رسول الله؟ قال: "يقولون: إنك أغرت عليهم في الإسلام"، قال: لا يا رسول الله، أغرت عليهم في الجاهلية، وأسلمت على المال، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "انظروا إلى المال فإن كان مخضرَمًا فهو لسلمان، وإن كان غير مخضرم فهو لبني طهية"، فنظروا فإذا هو مخضرم، فأحرزه سلمان. قال سلمان: فقلت: يا رسول الله، إنَّ أبي كان يقري الضيف، ويكرم الجار، ويفي بالذمة، ويعطي في النائبة، فما ينفعه ذاك؟ قال: "مات مشركًا؟ " قلت: نعم، قال: "لا ينفعه ذلك" فَوَجَمَ لها سلمانُ وولَّى، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "ردوا الشيخ" فرجع، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم: "أما إنها لا تنفعه، ولكنها تكون في عقبه؛ إنهم لن يخذوا أبدًا، ولن يذلوا أبدًا، ولن يفتقروا أبدًا". قال البغوي: هذا حديث غريب لم يرو إلَّا من هذا الوجه. ووقع فيه نسبة كل من زهير وأبي نعامة سعديًا! والمعروف أنهما عدويان.ويشهد لكون الأعمال الصالحة لا تنفع صاحبها مع كفره حديث عائشة عند مسلم (214)، وسلف برقم (3566).وحديث عدي بن حاتم عند أحمد 30/ (18262)، وابن حبان (332).
6706 - Null
6706 - أخبرنا أبو محمد المُزَني، حدثنا أبو خَليفة القاضي، حدثنا محمد بن سلَّام الجُمَحي، حدثنا مَعمَر بن المثنَّى، قال: صعصعةُ بن ناجية بن عَقَّال بن محمد بن سفيان ابن مُجاشِع بن، دارِم جدُّ الفرزدقِ بنِ غالب، وَفَدَ على النبيِّ صلى الله عليه وسلم.
সা‘সা‘আহ ইবনু নাজিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: সা‘সা‘আহ ইবনু নাজিয়াহ ইবনু ‘আক্কাল ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু সুফইয়ান ইবনু মুজাশি‘ ইবনু দারিম, যিনি কবি ফারাজদাক ইবনু গালিবের দাদা, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রতিনিধি হিসেবে আগমন করেছিলেন।
6707 - أخبرنا أبو بكر محمد بن عبد الله الحَفيد، حدثنا محمد بن زكريا الغَلَابي، حدثنا العلاء بن الفضل بن عبد الملك بن أبي سَوِيَّة المِنْقَرِي، حدثنا عَبَّاد ابن كُسَيب [1]، حدثني الطُّفيل بن عمرو الرَّبَعي، عن صَعْصَعة بن ناجية المُجاشِعي -وهو جَدَّ الفرزدق بن غالب- قال: قَدِمتُ على النبيِّ صلى الله عليه وسلم فَعَرَض عليَّ الإسلامِ، فأسلمتُ وعلَّمني آياتٍ من القرآنِ، فقلتُ: يا رسول الله، إني عَمِلتُ أعمالًا في الجاهلية، فهل لي فيها من أجرٍ؟ قال: "وما عَمِلتَ؟ " فقلتُ: إني ضَلَّت ناقتانِ لي عَشْراوان، فخرجتُ على جَمَل لي أتبَعُهما [2]، فرُفِعَ لي [بيتانِ] [3] في فَضَاءٍ من الأرض، فقصدتُ قصدَهما، فوجدتُ شيخًا كبيرًا، فقلتُ: أحَسَستُم بناقتينِ عَشراوَينِ؟ قال: ما ناراهما؟ قلت: مِيسَمُ [4] بنِ دارِم، قال: قد أصَبْنا ناقتَيْكَ وبِغْناهما، وقد نَعَشَ اللهُ بهما أهلَ بيتينِ من قومِك من العرب من مُضَرَ.فبينما هو يخاطبني إذ نادتِ امرأةٌ من البيت الآخر: وَلَدَتْ وَلَدَتْ، قال: وما وَلَدَت؟ إن كان غلامًا فقد شَرِكَنا في قَومِنا [5]، وإن كانت جاريةً فادفِنَّها، فقالت: جاريةٌ، فقلتُ: وما هذه المولودة؟ قال: ابنةٌ لي، فقلت: إني أشتريها منك، فقال: يا أخا بني تَميم، أتبيعُ ابنتَك؟ وإني رجلٌ من العرب من مُضَرا فقلت: إني لا أشتري منك رقبتَها، بل إنما أشتري منك رُوحَها أن لا تقتُلَها، قال: بِمَ تشتريها؟ فقلت: بناقتيَّ هاتينِ وولدِهما، قال: وتَزيدُني بعيرَك هذا؟ قلت: نعم، على أن تُرسِلَ معي رسولًا، فإذا بلغتُ إلى أهلي رَدَدتُ لك البعير، ففَعَلَ، فلمَّا بلغتُ إلى أهلي رَدَدتُ إليه البعيرَ، فلمَّا كان في بعض الليل فكَّرتُ في نفسي أنَّ هذه مَكرُمةٌ ما سَبَقَني إليها أحدٌ من العرب، وظَهَرَ الإسلامُ وقد أحييتُ ثلاثَ مئة وستينَ من المَوءودة، أَشتري كلَّ واحدة منهنُّ بناقتينِ عَشْراوَين وجملٍ، فهل لي في ذلك مِن أجر؟ فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "تمَّ لك أجرُه إذ مَنَّ الله عليك بالإسلام" [6].قال عبَّادٌ: ومِصداقُ قولِ صَعْصَعةَ قولُ الفرزدق:وجدِّي الذي مَنَعَ الوائِداتِ … فأحيا الوَئيدَ [7] فلم تُوءَدِ
সা'সা'আহ ইবনু নাজিয়াহ আল-মুজাশি'ঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম। তিনি আমার কাছে ইসলামের দাওয়াত পেশ করলেন। আমি ইসলাম গ্রহণ করলাম এবং তিনি আমাকে কুরআনের কিছু আয়াত শিক্ষা দিলেন। আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! জাহিলিয়াতের যুগে আমি কিছু কাজ করেছিলাম, সেগুলোর জন্য কি আমি কোনো সাওয়াব পাব?
তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কী কাজ করেছিলে?"
আমি বললাম: আমার গর্ভবতী দুটি উটনী হারিয়ে গিয়েছিল। আমি আমার একটি উটে চড়ে সেগুলোর সন্ধানে বের হলাম। এরপর মাঠের মাঝে [দূরে] আমি দুটি ঘর দেখতে পেলাম। আমি সেগুলোর দিকে এগিয়ে গেলাম। সেখানে এক বৃদ্ধ লোককে পেলাম। আমি জিজ্ঞেস করলাম: আপনারা কি গর্ভবতী দুটি উটনী দেখেছেন? সে বলল: সেগুলোর চিহ্ন কী? আমি বললাম: বানু দারিমের চিহ্ন। সে বলল: আমরা তোমার উটনী দুটি পেয়েছি এবং সেগুলোকে যবেহ করেছি। আল্লাহ এর মাধ্যমে তোমার মুদার গোত্রের আরবীয় সম্প্রদায়ের দুটি পরিবারকে রক্ষা করেছেন (দারিদ্র্য দূর করেছেন)।
যখন সে আমার সাথে কথা বলছিল, তখন অন্য ঘর থেকে একজন মহিলা ডাকল: জন্ম হয়েছে! জন্ম হয়েছে! সে বলল: কী জন্ম হয়েছে? যদি ছেলে হয়, তবে সে আমাদের গোত্রের অংশীদার হবে। আর যদি মেয়ে হয়, তবে তাকে দাফন করে ফেলো। মহিলাটি বলল: মেয়ে হয়েছে। আমি জিজ্ঞেস করলাম: এই নবজাতক কে? সে বলল: আমার কন্যা। আমি বললাম: আমি তাকে তোমার কাছ থেকে কিনে নিব। সে বলল: হে বানু তামিমের ভাই! তুমি কি তোমার কন্যাকে বিক্রি করবে? আর আমি তো মুদার গোত্রের একজন আরবীয় লোক। আমি বললাম: আমি তোমার কাছ থেকে তার দাসত্ব কিনছি না, বরং আমি তার প্রাণ কিনছি, যাতে তুমি তাকে হত্যা না করো। সে বলল: কীসের বিনিময়ে কিনবে? আমি বললাম: আমার এই দুটি উটনী এবং সেগুলোর বাচ্চার বিনিময়ে। সে বলল: আর তুমি কি তোমার এই উটটিও অতিরিক্ত দিবে? আমি বললাম: হ্যাঁ, এই শর্তে যে, তুমি আমার সাথে একজন দূত পাঠাবে। যখন আমি আমার পরিবারের কাছে পৌঁছব, তখন উটটি তোমাকে ফেরত দিব। সে তা-ই করল। যখন আমি আমার পরিবারের কাছে পৌঁছলাম, তখন উটটি তাকে ফেরত দিলাম।
এরপর রাতের কিছু অংশে আমি মনে মনে ভাবলাম যে, এ এমন এক মহৎ কাজ, যা আমার আগে কোনো আরব করেনি। এরপর ইসলাম প্রকাশ পেল, আর আমি সেই সময় পর্যন্ত ৩ শত ৬০ জন জীবন্ত প্রোথিত হওয়া মেয়েকে বাঁচিয়েছি। আমি তাদের প্রত্যেককে দুটি গর্ভবতী উটনী ও একটি উটের বিনিময়ে কিনে নিয়েছি। এর জন্য কি আমার কোনো সাওয়াব হবে?
তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ যখন তোমাকে ইসলামের মাধ্যমে অনুগ্রহ করেছেন, তখন তোমার সাওয়াব পূর্ণ হয়ে গেছে।"
আব্বাদ (ইবনু কুসাইব) বলেন: সা'সা'আহ-এর কথার সত্যতা ফারাযদাকের এই কবিতার মাধ্যমে পাওয়া যায়: "আমার দাদা তিনিই, যিনি (কন্যাদের) জীবন্ত প্রোথিতকারীদের বাধা দিয়েছিলেন... তিনি জীবন্ত প্রোথিত কন্যাকে বাঁচিয়ে তুলেছিলেন, ফলে তাকে আর প্রোথিত করা হয়নি।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في (ص) و (م) إلى: عباءة بن كليب، وفي (ب) إلى عبادة بن كريب.
[2] لفظ "أتبعهما" زيادة من (ب).
6707 [3] - لم ترد في نسخنا الخطية، وأثبتناها من المطبوع، ومن رواية الطبراني.
6707 [4] - تحرَّف في النسخ الخطية إلى: "فأناديهما، قلت: مقسم" والتصويب من مصادر التخريج.ومعنى "ما ناراهما" أي ما علامتهما، لأنَّ العلامة عليها كانت تكوى بالنار.
6707 [5] - في روايتي العقيلي وأبي نعيم: في قوتنا، وهو أوجه.
6707 [6] - إسناده ضعيف بمرَّة، محمد بن زكريا الغلابي متهم، لكنه متابع، والعلاء بن الفضل ضعيف، وعباد بن كسيب مجهول، وقال البخاري في ترجمته من "التاريخ الكبير" 6/ 40: لا يصح.وكذا الطفيل بن عمرو، قال العقيلي: لا يتابع على حديثه، ولا يعرف إلَّا به، وقال البخاري في ترجمته أيضًا 4/ 364: لم يصح حديثه.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (7412) عن محمد بن زكريا الغلابي، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 4/ 319، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1199)، والبزار (72 - كشف الأستار)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (1302)، والعقيلي في "الضعفاء الكبير" (710)، والطبراني (7412)، وأبو نعيم في معرفة الصحابة" (3877 - 3879) من طرق عن العلاء بن الفضل به. وقال البخاري عقبه: فيه نظر. داحة، وإبراهيم هذا لم نقف له على ترجمة وإنما ذكر في كتب التراجم بأنه يروي عن عقّال كما في "ثقات" ابن حبان 8/ 526 - 527، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 40/ 480، وجعله ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 4/ 385، وابن حبان 8/ 313 مرة أخرى فيمن يروي عن شبة ابن عقال!وعقّال بن شبة بن عقال هو وأبوه وجده مجاهيل الحال. وقد اختلف على عبد الله بن حرب الليثي في إسناده؛ فمرة يرويه عن إبراهيم عن عقال بن شبة عن أبيه عن جده عن أبيه، ومرة يرويه عن عقال عن أبيه عن جده.فأخرجه عمرُو بن مرزوق كما عند المصنف، ومحمدُ بن محمد بن مرزوق عند أبي يعلى كما في "المطالب العالية" (2546) - ومن طريقه ابن عساكر 73/ 115، والضياء في "المختارة" (4) - والطبراني (7413)، وعقبةُ بن مُكرم عند ابن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 10، وأبي نعيم في "معرفة الصحابة" (3880)، وابن عساكر 73/ 116 و 117، ثلاثتهم عن عبد الله بن حرب الليثي بهذا الإسناد.وخالفهم محمد بن صالح المعروف بكيلجة عند ابن الأعرابي في "معجمه" (227) - ومن طريقه ابن عساكر 73/ 116 - وأبو رفاعة عبد الله بن محمَّد بن عمر عند ابن الأعرابي (1999)، وهشام ابن علي السيرافي عند ابن عساكر 73/ 116، فرووه عن عبد الله بن حرب الليثي، عن إبراهيم بن إسحاق، عن عقال، عن أبيه، عن جده صعصعة بن ناجية. ليس فيه جدُّ عقال.ويغني عنه ما رواه النسائي (2323)، وابن حبان (3341) من حديث طارق المحاربي مرفوعًا: "يد المعطي العليا، وابدأ بمن تَعُول، أمَّك وأباك وأختك وأخاك، ثم أدناك أدناك". وإسناده صحيح، وقد سلف مطولًا عند المصنف برقم (4265).وما رواه المصنف من حديث أبي رمثة الآتي برقم (7432).
6707 [7] - في النسخ الخطية: الوليد، والمثبت من "تلخيص الذهبي"، وهو الموافق لما في المصادر. داحة، وإبراهيم هذا لم نقف له على ترجمة وإنما ذكر في كتب التراجم بأنه يروي عن عقّال كما في "ثقات" ابن حبان 8/ 526 - 527، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 40/ 480، وجعله ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 4/ 385، وابن حبان 8/ 313 مرة أخرى فيمن يروي عن شبة ابن عقال!وعقّال بن شبة بن عقال هو وأبوه وجده مجاهيل الحال. وقد اختلف على عبد الله بن حرب الليثي في إسناده؛ فمرة يرويه عن إبراهيم عن عقال بن شبة عن أبيه عن جده عن أبيه، ومرة يرويه عن عقال عن أبيه عن جده.فأخرجه عمرُو بن مرزوق كما عند المصنف، ومحمدُ بن محمد بن مرزوق عند أبي يعلى كما في "المطالب العالية" (2546) - ومن طريقه ابن عساكر 73/ 115، والضياء في "المختارة" (4) - والطبراني (7413)، وعقبةُ بن مُكرم عند ابن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 10، وأبي نعيم في "معرفة الصحابة" (3880)، وابن عساكر 73/ 116 و 117، ثلاثتهم عن عبد الله بن حرب الليثي بهذا الإسناد.وخالفهم محمد بن صالح المعروف بكيلجة عند ابن الأعرابي في "معجمه" (227) - ومن طريقه ابن عساكر 73/ 116 - وأبو رفاعة عبد الله بن محمَّد بن عمر عند ابن الأعرابي (1999)، وهشام ابن علي السيرافي عند ابن عساكر 73/ 116، فرووه عن عبد الله بن حرب الليثي، عن إبراهيم بن إسحاق، عن عقال، عن أبيه، عن جده صعصعة بن ناجية. ليس فيه جدُّ عقال.ويغني عنه ما رواه النسائي (2323)، وابن حبان (3341) من حديث طارق المحاربي مرفوعًا: "يد المعطي العليا، وابدأ بمن تَعُول، أمَّك وأباك وأختك وأخاك، ثم أدناك أدناك". وإسناده صحيح، وقد سلف مطولًا عند المصنف برقم (4265).وما رواه المصنف من حديث أبي رمثة الآتي برقم (7432).
6708 - حدثنا علي بن حَمْشاذ العَدْل، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا عمرو بن مرزوق، حدثنا عبد الله بن حرب اللَّيثي، حدثني إبراهيم بن أسعد، حدثني عَقَّال بن شَبَّة بن عِقال بن صَعْصَعة بن ناجية المُجاشِعي، حدثني أبي، عن جدِّي، عن أبيه صَعْصَعة بن ناجية قال: دخلتُ على رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلتُ: يا رسولَ الله، ربما فَضَلَتْ لي الفضلةُ خبَّأتُها للنَّائبة وابنِ السبيل، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "أُمَّك وأباك، أختَك وأخاك، أَدْناك أدْناك" [1]. ذكرُ قيس بن عاصم المِنْقَري رضي الله عنه-
সা'সা'আহ ইবনু নাজিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলাম এবং বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল! মাঝে মাঝে আমার কাছে কিছু উদ্বৃত্ত অর্থ জমা হয়, আমি তা বিপদগ্রস্ত ও মুসাফিরের জন্য সঞ্চয় করে রাখি।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার মা ও তোমার বাবা, তোমার বোন ও তোমার ভাই, তোমার নিকটতম, তোমার নিকটতম (ব্যক্তিদের হক আদায় করো)।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف مسلسل بالمجاهيل؛ إبراهيم بن أسعد، كذا وقع عند المصنف وعند الطبراني، وزاد: يلقب بابن داحة، وجاء في بقية مصادر التخريج: إبراهيم بن إسحاق، وزاد بعضهم: ابن داحة، وإبراهيم هذا لم نقف له على ترجمة وإنما ذكر في كتب التراجم بأنه يروي عن عقّال كما في "ثقات" ابن حبان 8/ 526 - 527، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 40/ 480، وجعله ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 4/ 385، وابن حبان 8/ 313 مرة أخرى فيمن يروي عن شبة ابن عقال!وعقّال بن شبة بن عقال هو وأبوه وجده مجاهيل الحال. وقد اختلف على عبد الله بن حرب الليثي في إسناده؛ فمرة يرويه عن إبراهيم عن عقال بن شبة عن أبيه عن جده عن أبيه، ومرة يرويه عن عقال عن أبيه عن جده.فأخرجه عمرُو بن مرزوق كما عند المصنف، ومحمدُ بن محمد بن مرزوق عند أبي يعلى كما في "المطالب العالية" (2546) - ومن طريقه ابن عساكر 73/ 115، والضياء في "المختارة" (4) - والطبراني (7413)، وعقبةُ بن مُكرم عند ابن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 10، وأبي نعيم في "معرفة الصحابة" (3880)، وابن عساكر 73/ 116 و 117، ثلاثتهم عن عبد الله بن حرب الليثي بهذا الإسناد.وخالفهم محمد بن صالح المعروف بكيلجة عند ابن الأعرابي في "معجمه" (227) - ومن طريقه ابن عساكر 73/ 116 - وأبو رفاعة عبد الله بن محمَّد بن عمر عند ابن الأعرابي (1999)، وهشام ابن علي السيرافي عند ابن عساكر 73/ 116، فرووه عن عبد الله بن حرب الليثي، عن إبراهيم بن إسحاق، عن عقال، عن أبيه، عن جده صعصعة بن ناجية. ليس فيه جدُّ عقال.ويغني عنه ما رواه النسائي (2323)، وابن حبان (3341) من حديث طارق المحاربي مرفوعًا: "يد المعطي العليا، وابدأ بمن تَعُول، أمَّك وأباك وأختك وأخاك، ثم أدناك أدناك". وإسناده صحيح، وقد سلف مطولًا عند المصنف برقم (4265).وما رواه المصنف من حديث أبي رمثة الآتي برقم (7432).
6709 - أخبرنا أبو محمد المُزَني، حدثنا أبو خليفة القاضي، حدثنا محمد بن سلَّام الجُمَحي، حدثنا أبو عُبيدة قال: قيسُ بن عاصم بن سِنان [1] بن خالد بن مِنْقَر ابن عُبيد بن مُقاعِس بن عمرو بن كعب بن سعد بن زيد مَنَاة بن تَميم، وقد ترأّسَ، وَفَدَ على النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: "هذا سيِّدُ أهل الوَبَر" [2].
আবু উবাইদা থেকে বর্ণিত, কায়েস ইবনু আসিম ইবনু সিনান ইবনু খালিদ ইবনু মিনকার ইবনু উবাইদ ইবনু মুকায়িস ইবনু আমর ইবনু কা'ব ইবনু সা'দ ইবনু যায়দ মানাত ইবনু তামীম। তিনি সর্দার ছিলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রতিনিধি রূপে আগমন করেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন বললেন: "এ হলো পশমবাসীদের (মরুচারী আরবদের) সর্দার।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: سيار.
[2] سيأتي قريبًا برقم (6711)، ويأتي هناك تخريجه.
6710 - حدثنا أبو جعفر أحمد بن عُبيد بن إبراهيم الأسَدي الحافظ بهَمَذان، حدثنا محمد بن زكريا الغَلَابي، حدثنا العلاء بن الفضل بن عبد الملك بن أبي سَوِيَّة المِنْقري، حدثني أبي الفضلُ بن عبد الملك، عن أبيه عبد الملك بن أبي سويَّة المِنْقري، قال: شهدتُ قيسَ بن عاصم وهو يُوصِي، فجمع بنيه وهم اثنانِ وثلاثون ذكرًا، فقال: يا بنيَّ، إذا أنا مِتُّ فسوِّدوا أكبرَكم تَخلُفوا آباءَكم، ولا تُسوِّدوا أصغرَكم فيُزرِيَ بكم ذاك عند أكفائِكم، ولا تُقيموا عليَّ نائحةً، فإني سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم نَهَى عن النِّياحة، وعليكم بإصلاحِ المال؛ فإنه مَنْبَهةٌ للكريم [1]، ويُستغنى به عن اللَّئيم، ولا تُعطوا رِقابَ الإبل في غير حقِّها، ولا تمنعوها من حقِّها، وإياكم وكلَّ عِرقِ سُوءٍ، فمهما يسرَّكم يومًا فما يسوءَكم أكثرُ، واحذروا أبناءَ أعدائِكم، فإنهم لكم أعداءٌ على منهاج آبائِهم، وإذا أنا مِتُّ فادفِنوني في موضع لا يَطَّلع عليَّ هذا الحيُّ من بكر بن وائل، فإنها كانت بيني وبينهم خُماشاتٌ في الجاهلية، فأخاف أن يَنبِشُوني من قبري، فتُفسِدوا عليهم دنياهم ويُفسِدوا عليكم آخرتَكم.ثم دعا بكنِانتِه فأمر ابنَه الأكبرَ، وكان يُسمّى عليًّا، فقال: أخرِجْ سهمًا من كِنانتي، فأخرجه، فقال: اكسِرْه، فكسرَه، ثم قال: أخرِجْ سهمين، فأخرجهما، فقال: اكسِرْهما، فكسرهما، ثم قال: أخرِجْ ثلاثةَ أسهُمٍ، فأخرج ثلاثةَ أسهُمٍ، فقال: اكسِرْها، فكسرها، ثم قال: أخرِجْ ثلاثين سهمًا، فأخرجها، فقال: اعصِبْها بوَتَر، فعَصَبها، ثم قال: اكسِرْها، فلم يستطع كسرَها، فقال: يا بَنِيَّ، هكذا أنتم في الاجتماع، وكذاك أنتم في الفُرقة، ثم أنشأَ يقول:إنما المجدُ ما بَنَى والد الصِّدْ … قِ وأحيا فِعالَهُ المولودُوكَفَى المجد والشَّجاعة والحِلْـ … ـمُ إذا زانَه عَفافٌ وجُودُ وثلاثونَ يا بَنِيَّ إذا ما … عَقَدَتْهُمْ [2] للنائباتِ [3] العُهودُكثلاثينَ مِن قِداحٍ إذا ما … شدَّها للزَّمانِ عَقدٌ شديدُلم تَبَدَّدْ وإن تَقطَّعَتِ الأَسـ … ـهُمُ أَودَى بجَمعِها التبديدُوذوو السِّنِّ والمُروءَةِ أَولى … إن يَكُنْ منكمُ لهمْ تسويدُوعليهمْ حِفظُ الأصاغرِ حتى … يَبْلُغَ الحِنْتَ الأصغرُ المجهودُ [4]
কায়স ইবনু আসিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি যখন ওসিয়ত করছিলেন, তখন তার বত্রিশ জন পুত্রকে একত্রিত করে বললেন: হে আমার সন্তানেরা, আমি যখন মারা যাবো, তখন তোমাদের মধ্যে যে সবচেয়ে বড়, তাকে নেতা বানাবে। তাহলে তোমরা তোমাদের পূর্বপুরুষদের অনুসরণ করবে। আর তোমাদের মধ্যে যে সবচেয়ে ছোট, তাকে নেতা বানাবে না, কারণ এটি তোমাদের সমকক্ষদের কাছে তোমাদেরকে হেয় প্রতিপন্ন করবে।
তোমরা আমার জন্য কোনো মাতমকারী (বিলাপকারী) নিযুক্ত করো না, কেননা আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে মাতম করতে নিষেধ করতে শুনেছি। আর তোমাদের উচিত তোমাদের সম্পদকে সচল রাখা (উন্নত করা), কারণ এটি সম্মানিত ব্যক্তির জন্য মর্যাদা বৃদ্ধির কারণ, এবং এর মাধ্যমে নীচ ব্যক্তির (সাহায্য চাওয়া) থেকে অমুখাপেক্ষী থাকা যায়।
তোমরা উটগুলিকে অযথা ক্ষতি করো না, আবার এর হক থেকেও বঞ্চিত করো না। আর তোমরা মন্দ স্বভাবের সবকিছু থেকে সাবধান থাকবে। কারণ তা যদি কোনোদিন তোমাদের আনন্দও দেয়, তবে তার মন্দ ফল তার চেয়ে বেশি হবে। আর তোমরা তোমাদের শত্রুদের সন্তানদের থেকে সতর্ক থাকবে, কেননা তারা তোমাদের শত্রুই, তাদের পিতাদের পথ ধরেই তারা চলবে।
আর যখন আমি মারা যাবো, তখন আমাকে এমন স্থানে দাফন করবে, যেখানে বকর ইবনু ওয়াইল গোত্রের লোকেরা আমাকে দেখতে না পায়। কেননা জাহিলিয়াতের যুগে তাদের ও আমার মাঝে ছোটখাটো শত্রুতা ছিল। আমি ভয় করি যে তারা আমার কবর খুঁড়ে ফেলবে, যার ফলে তোমরা তাদের পার্থিব জীবন নষ্ট করবে এবং তারা তোমাদের পরকাল নষ্ট করবে।
অতঃপর তিনি তাঁর তূণ (তীর রাখার পাত্র) আনতে বললেন। এরপর তিনি তাঁর জ্যেষ্ঠ পুত্রকে, যার নাম ছিল আলি, নির্দেশ দিলেন: "আমার তূণ থেকে একটি তীর বের করো।" সে সেটি বের করলো। তিনি বললেন: "তা ভেঙে ফেলো।" সে ভেঙে ফেললো। তারপর বললেন: "দুটি তীর বের করো।" সে বের করলো। তিনি বললেন: "তা ভেঙে ফেলো।" সে ভেঙে ফেললো। তারপর বললেন: "তিনটি তীর বের করো।" সে তিনটি তীর বের করলো। তিনি বললেন: "তা ভেঙে ফেলো।" সে ভেঙে ফেললো। তারপর বললেন: "ত্রিশটি তীর বের করো।" সে ত্রিশটি তীর বের করলো। তিনি বললেন: "এগুলো একটি ধনুকের রশি দিয়ে বাঁধো।" সে তা বাঁধলো। অতঃপর বললেন: "এবার এটা ভেঙে ফেলো।" কিন্তু সে ভাঙতে পারল না।
অতঃপর তিনি বললেন: হে আমার সন্তানেরা, ঐকবদ্ধ অবস্থায় তোমরা এমন, আর বিচ্ছিন্ন অবস্থায় তোমরা এমন। এরপর তিনি এই কবিতাগুলো আবৃত্তি করতে শুরু করলেন:
নিশ্চয়ই মহত্ত্ব তাই, যা সত্যবাদী পিতা নির্মাণ করে,
আর সন্তান তার কার্যাবলীকে বাঁচিয়ে রাখে।
মহত্ত্ব, সাহস ও ধৈর্যের জন্য যথেষ্ট, যখন তাকে সংযম ও দানশীলতা শোভিত করে।
হে আমার সন্তানেরা, যখন বিপদাপদে ত্রিশজন একত্রিত হয় এবং তারা চুক্তি দ্বারা আবদ্ধ থাকে,
তখন তারা ত্রিশটি তীরের মতো, যখন কঠিন সময়ে সেগুলোকে দৃঢ় বন্ধনে বাঁধা হয়।
তা বিচ্ছিন্ন হয় না, যদিও তীরগুলো কেটে ফেলা হয়— বিচ্ছিন্নতা তাদের ঐক্যকে ধ্বংস করে দেয়।
আর তোমাদের মধ্যে যদি বয়োজ্যেষ্ঠ ও মর্যাদাসম্পন্ন ব্যক্তিরা নেতৃত্ব দেয়, তবে তারাই অগ্রাধিকার পাওয়ার যোগ্য।
আর তাদের (নেতাদের) দায়িত্ব হলো ছোটদেরকে রক্ষা করা, যতক্ষণ না দুর্বল ছোটজনও সাবালকত্বে পৌঁছায়।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في (ص): للكرم.
[2] المثبت من رواية الطبراني، وفي (م) و (ص): اعتقدتم، وفي (ب): اعقدتم.
6710 [3] - تحرَّف في نسخنا الخطية إلى لنائبات والمثبت من رواية الطبراني وغيره.
6710 [4] - خبر حسن، وهذا إسناد تالف؛ محمد بن زكريا الغلابي متهم، والعلاء بن الفضل ضعيف، وأبوه وجده لم نجد لهما ترجمة. وللحديث طريق آخر عند المصنف يأتي بعده.وأخرجه الطبراني في "المعجم الكبير" 18/ (871)، وفي "المعجم الأوسط" (6127) - وعنه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5682) - عن محمد بن زكريا الغلابي، بهذا الإسناد.وأخرجه مقطعًا الطيالسي (1181) و (1356)، وابن سعد في "الطبقات" 9/ 36، وأحمد 34/ (20612)، والبخاري في "الأدب المفرد" (361)، وابن أبي الدنيا في "إصلاح المال" (103)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1163 - 1165)، والبزار (1378 - كشف الأستار)، والنسائي (1990)، والطبري في مسند عمر من "تهذيب الآثار" 1/ 56، وأبو بكر الخلال في "الحث على التجارة" (49)، وابن حبان في "روضة العقلاء" ص 145 و 224، والطبراني في "الكبير" (18/ (869)، والبيهقي في "الشعب" (1165) و (10497)، والمزي في "تهذيب الكمال" 7/ 201 - 202 من طريق شعبة، عن قتادة، عن مُطرِّف بن عبد الله بن الشِّخِّير، عن حَكِيم بن قيس بن عاصم، عن أبيه. وإسناده حسن.وقد سلفت قطعة النهي عن النوح فقط من هذا الطريق عند المصنف برقم (1425).ووردت هذه الوصية أيضًا من ثلاثة طرق عن الحسن البصري عن قيس بن عاصم، ذكر المصنف في الحديث التالي أحدَها واقتصر على جزء من الحديث، ولم يسقه بتمامه، وهذا الحديث والذي يليه ذُكرا في سياق واحدٍ عند كثير ممّن أخرجه، وسيأتي هناك ذكر طرقه.قوله: "خُماشات" واحدها خُماشة: أي جراحات وجنايات، وهي كلُّ ما كان دون القتل والدِّية من قطع، أو جدع، أو جرح، أو ضرب، أو نهب ونحو ذلك من أنواع الأذى. قاله ابن الأثير في "النهاية".
6711 - حدثنا علي بن حمشاذ العَدْل، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا محمد بن يزيد الواسطي، حدثنا زياد الجصَّاص، عن الحسن، حدثني قيس بن عاصم المِنْقري، قال: قدمتُ على رسول الله صلى الله عليه وسلم فلما رآني سمعتُه يقول: "هذا سيِّد أهل الوَبَرِ"، فلما نزلتُ أتيتُه، فجعلت أحدِّثُه، فقلتُ: يا رسولَ الله، ما المالُ الذي لا يكون عليَّ فيه تَبِعةٌ من ضيفٍ ضافَني وعيالٍ كَثُروا؟ فقال: "نِعْمَ المالُ الأربعون، والأكثر ستونَ، وويلٌ لأصحابِ المِئين [1] إِلَّا من أعطى في رِسْلِها ونَجْدِتها، وأفقر ظَهْرَها، وأطعمَ القائعَ والمُعتَرَّ".قلت: يا نبي الله ما أكرمَ هذه الأخلاقَ وأحسنَها! يا نبي الله، لا يُحَلُّ بالوادي الذي أنا فيه لكثرة [2] إبلي، قال: "فكيف تصنعُ؟ " قلتُ: تَغدُو الإبل ويغدو الناسُ، فمَن شَاءَ أخذَ برأسِ بعيرٍ فذهبَ به، فقال: "فما تصنعُ بإفقار ظَهرِها؟ " قلتُ: إني لا أُفقِرُ الصغيرَ، ولا النابَ المُديرة، قال: "فمالك أحبُّ إليك أم مال مواليك؟ " قلتُ: مالي أحبُّ إليَّ من مال موالِيَّ، قال: "فإنَّ لك من مالك ما أكلتَ فأفنَيتَ، أو لبستَ فأبليتَ، أو أعطيتَ فأمضيتَ، وإلَّا فلمواليك" فقلتُ: واللهِ لو بقيتُ لأفنينَّ عَدَدَها.قال الحسنُ [3]: ففعَلَ واللهِ، فلمّا حَضَرَت قيسًا الوفاةُ أَوصَى بنيه، فقال: إياكم والمسألةَ؛ فإنها أَخِرُ كَسْبِ المرءِ، إنّ أحدًا لم يسأل إلَّا تَرَك كَسْبَه [4]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ذكرُ عَمرو بن الأهتَم المِنقَري رضي الله عنه-
কায়েস ইবনু আসিম আল-মিনক্বারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করলাম। যখন তিনি আমাকে দেখলেন, তখন আমি তাঁকে বলতে শুনলাম: "এ হলো পশম তাঁবুতে বসবাসকারীদের (বেদুইনদের) সর্দার।" অতঃপর যখন আমি অবতরণ করলাম, আমি তাঁর নিকট এসে তাঁর সাথে কথা বলতে শুরু করলাম। আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! সেই সম্পদ কোনটি, যার কারণে আমার উপর কোনো দায় বর্তাবে না—যদি কোনো মেহমান আমার নিকট আসে এবং আমার পরিবার-পরিজন অনেক বেশি হয়?
তিনি বললেন: "উত্তম সম্পদ হলো চল্লিশটি (উট)। ষাটটি হলে আরও বেশি উত্তম। আর শত শত উটের মালিকদের জন্য দুর্ভোগ, তবে সে ছাড়া, যে তার (উটগুলির) স্বচ্ছলতার সময় এবং কষ্টের সময় (আল্লাহর পথে) দান করে, সেগুলোর পৃষ্ঠকে হালকা রাখে (বোঝা চাপিয়ে দুর্বল না করে), এবং যে সাহায্যপ্রার্থী (দরিদ্র) এবং যে সওয়ালকারী (ভিক্ষুক) তাকে খাদ্য খাওয়ায়।"
আমি বললাম, হে আল্লাহর নবী! এই চরিত্রগুলি কতই না মহৎ এবং কতই না সুন্দর! (আমি আরও বললাম,) হে আল্লাহর নবী! আমার উটের আধিক্যের কারণে আমি যে উপত্যকায় থাকি, সেখানে (অন্যদের জন্য) আর প্রবেশ করা সম্ভব হয় না। তিনি বললেন: "তাহলে তুমি কী করো?" আমি বললাম, উটগুলি সকালে চলে যায় এবং লোকেরাও সকালে বেরিয়ে পড়ে। এরপর যার ইচ্ছা হয়, সে উটের লাগাম ধরে নিয়ে যায়। তিনি বললেন: "তাহলে তুমি সেগুলোর পৃষ্ঠ হালকা রাখার বিষয়ে কী করো?" আমি বললাম, আমি ছোট উটকে এবং বুড়ো (প্রজননের জন্য রক্ষিত) উটনীকে দুর্বল করি না (বোঝা চাপাই না)। তিনি বললেন: "তোমার সম্পদ তোমার নিকট অধিক প্রিয়, নাকি তোমার মাওলাদের (উত্তরাধিকারীদের) সম্পদ?" আমি বললাম, আমার সম্পদ আমার মাওলাদের সম্পদ অপেক্ষা অধিক প্রিয়। তিনি বললেন: "তবে তোমার সম্পদ থেকে তোমার জন্য ততটুকুই থাকবে, যতটুকু তুমি খেয়ে শেষ করেছ, অথবা পরিধান করে পুরোনো করে ফেলেছ, অথবা দান করে তা কার্যকর করেছ। অন্যথায় তা তোমার মাওলাদের (উত্তরাধিকারীদের) জন্য।" তখন আমি বললাম, আল্লাহর কসম! আমি যদি বেঁচে থাকি, তবে অবশ্যই সেগুলোর (উটগুলির) সংখ্যা নিঃশেষ করে দেব (দান করে)।
হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আল্লাহর কসম! তিনি তা-ই করেছিলেন। যখন কায়েসের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মৃত্যু আসন্ন হলো, তখন তিনি তাঁর পুত্রদেরকে উপদেশ দিয়ে বললেন: তোমরা যাচনা (ভিক্ষা) করা থেকে দূরে থাকবে। কেননা তা হলো মানুষের শেষ উপার্জন। যে কেউ যাচনা করে, সে তার উপার্জন ছেড়ে দেয়।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في نسخنا الخطية: المئتين، وما أثبتناه هو الموافق لما في رواية "الأدب المفرد" وغيره. "إصلاح المال" (52)، وإبراهيم الحربي في غريب الحديث 1/ 206، وابن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 348، والطبراني في "الكبير" (18/ 870)، وفي "الأحاديث الطوال" (19) من طريق علي بن الجعد، عن محمد بن يزيد الواسطي به.وأخرجه مطولًا ومختصرًا أيضًا: ابن شبة 2/ 532 - 533، وبحشل في "تاريخ واسط" ص 119، والبزار (3663 - كشف الأستار)، وأبو يعلى في "المفاريد" (108)، والطبري في مسند عمر من "تهذيب الآثار" 1/ 57، وفي مسند ابن عباس أيضًا 1/ 269، والبغوي في "معجم الصحابة" (1961)، وابن حبان في "الثقات" 6/ 320 - 322، وابن عدي في "الكامل" 3/ 187، وأبو طاهر المخلص في "المخلصيات" (1902) و (3015)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5684)، والمزي في ترجمة قيس بن عاصم من "التهذيب" 24/ 60 - 61 و 61 - 62 من طرق عن زياد بن أبي زياد الجصاص، به. وتحرَّف زياد في بعض المصادر إلى: يزيد!وله طريق ثانٍ أخرجه مطولًا البخاري في "الأدب المفرد" (953)، والبزار (2744 - كشف الأستار)، وابن الأعرابي في "المعجم" (259)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (3065) من طريق الصعق بن حزن، عن القاسم بن مطيب، عن يونس بن عبيد، عن الحسن البصري، به والقاسم ابن مطيب ذكره البخاري وابن أبي حاتم وسكتا عنه، ووثقه الدارقطني في "العلل" 5/ 143، وتعنَّت ابنُ حبان فقال: يخطئ عمَّن يروي على قلَّة روايته، فاستحقَّ التركَ لما كثر ذلك منه. قلنا: بل مثله يصلح في المتابعات والشواهد.وله طريق ثالث، أخرجه ابن عبد البر في "التمهيد" 4/ 213 من طريق عبد الملك بن قريب الأصمعي، عن المبارك بن فضالة، قال: سمعت الحسن به ولم يسق لفظه بتمامه. وفيه إلى الأصمعي من لم نتبينه. وبمجموع هذه الطرق يرتقي الحديث إلى الحسن، والله تعالى أعلم.وأخرج الطبري في مسند عمر 1/ 57 من طريق عبيد -وهو ابن عبد الرحمن الصِّيد- عن الحسن، عن قيس بن عاصم المنقري: أنه قال لبنيه لما حضرته الوفاة: "يا بنيَّ، إياكم والمسألة، فإنها أَخِرُ كسب الرجل"، وراويه عن عبيد لم نتبينه.وأخرج ابن سعد في "الطبقات" 6/ 162 من طريق سفيان الثوري، قال: حدثني أسلم المنقري، عن رجل: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: لقيس بن عاصم: "هذا سيد أهل الوبر". ورجاله ثقات سوى الرجل المبهم.قوله: "المئين": جمع مَئة.وقوله: "إلَّا من أعطى في نجدتها ورسلها" قال ابن الأثير في "النهاية" 2/ 223: المراد بالنَّجدة: الشدة والجَذب، وبالرِّسْل: الرخاء والخصب؛ لأن الرِّسل اللَّبَن، وإنما يكثر في حال الرخاء والخصب، فيكون المعنى أنه يخرج حقَّ الله في حال الضيق والسعة، والجدب والخصب؛ لأنه إذا أخرج حقها في سنة الضيق والجدب كان ذلك شاقًا عليه، فإنه إجحاف به، وإذا أخرجها في حال الرخاء كان ذلك سهلًا عليه؛ ولذلك قيل في الحديث: يا رسول الله، وما نجدتها ورسلها؟ قال: "عسرها ويسرها"، فسمى النجدة عسرًا والرسل يسرًا؛ لأن الجدب عسر، والخصب يسر، فهذا الرجل يُعطي حقها في حال الجدب والضيق، وهو المراد بالنجدة، وفي حال الخصب والسعة، وهو المراد بالرسل. والله أعلم.وقوله: "فإنها أَخِر كسب المرء"، قال ابن الأثير 1/ 29: أي أرذله وأدناه، ويُروى بالمدِّ، أي: إنَّ السؤال آخر ما يكتسب به المرءُ عند العجز عن الكسب.
[2] في نسخنا الخطية بكثرة، والمثبت من نسخة المحمودية، وهو الموافق لمصادر التخريج. "إصلاح المال" (52)، وإبراهيم الحربي في غريب الحديث 1/ 206، وابن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 348، والطبراني في "الكبير" (18/ 870)، وفي "الأحاديث الطوال" (19) من طريق علي بن الجعد، عن محمد بن يزيد الواسطي به.وأخرجه مطولًا ومختصرًا أيضًا: ابن شبة 2/ 532 - 533، وبحشل في "تاريخ واسط" ص 119، والبزار (3663 - كشف الأستار)، وأبو يعلى في "المفاريد" (108)، والطبري في مسند عمر من "تهذيب الآثار" 1/ 57، وفي مسند ابن عباس أيضًا 1/ 269، والبغوي في "معجم الصحابة" (1961)، وابن حبان في "الثقات" 6/ 320 - 322، وابن عدي في "الكامل" 3/ 187، وأبو طاهر المخلص في "المخلصيات" (1902) و (3015)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5684)، والمزي في ترجمة قيس بن عاصم من "التهذيب" 24/ 60 - 61 و 61 - 62 من طرق عن زياد بن أبي زياد الجصاص، به. وتحرَّف زياد في بعض المصادر إلى: يزيد!وله طريق ثانٍ أخرجه مطولًا البخاري في "الأدب المفرد" (953)، والبزار (2744 - كشف الأستار)، وابن الأعرابي في "المعجم" (259)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (3065) من طريق الصعق بن حزن، عن القاسم بن مطيب، عن يونس بن عبيد، عن الحسن البصري، به والقاسم ابن مطيب ذكره البخاري وابن أبي حاتم وسكتا عنه، ووثقه الدارقطني في "العلل" 5/ 143، وتعنَّت ابنُ حبان فقال: يخطئ عمَّن يروي على قلَّة روايته، فاستحقَّ التركَ لما كثر ذلك منه. قلنا: بل مثله يصلح في المتابعات والشواهد.وله طريق ثالث، أخرجه ابن عبد البر في "التمهيد" 4/ 213 من طريق عبد الملك بن قريب الأصمعي، عن المبارك بن فضالة، قال: سمعت الحسن به ولم يسق لفظه بتمامه. وفيه إلى الأصمعي من لم نتبينه. وبمجموع هذه الطرق يرتقي الحديث إلى الحسن، والله تعالى أعلم.وأخرج الطبري في مسند عمر 1/ 57 من طريق عبيد -وهو ابن عبد الرحمن الصِّيد- عن الحسن، عن قيس بن عاصم المنقري: أنه قال لبنيه لما حضرته الوفاة: "يا بنيَّ، إياكم والمسألة، فإنها أَخِرُ كسب الرجل"، وراويه عن عبيد لم نتبينه.وأخرج ابن سعد في "الطبقات" 6/ 162 من طريق سفيان الثوري، قال: حدثني أسلم المنقري، عن رجل: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: لقيس بن عاصم: "هذا سيد أهل الوبر". ورجاله ثقات سوى الرجل المبهم.قوله: "المئين": جمع مَئة.وقوله: "إلَّا من أعطى في نجدتها ورسلها" قال ابن الأثير في "النهاية" 2/ 223: المراد بالنَّجدة: الشدة والجَذب، وبالرِّسْل: الرخاء والخصب؛ لأن الرِّسل اللَّبَن، وإنما يكثر في حال الرخاء والخصب، فيكون المعنى أنه يخرج حقَّ الله في حال الضيق والسعة، والجدب والخصب؛ لأنه إذا أخرج حقها في سنة الضيق والجدب كان ذلك شاقًا عليه، فإنه إجحاف به، وإذا أخرجها في حال الرخاء كان ذلك سهلًا عليه؛ ولذلك قيل في الحديث: يا رسول الله، وما نجدتها ورسلها؟ قال: "عسرها ويسرها"، فسمى النجدة عسرًا والرسل يسرًا؛ لأن الجدب عسر، والخصب يسر، فهذا الرجل يُعطي حقها في حال الجدب والضيق، وهو المراد بالنجدة، وفي حال الخصب والسعة، وهو المراد بالرسل. والله أعلم.وقوله: "فإنها أَخِر كسب المرء"، قال ابن الأثير 1/ 29: أي أرذله وأدناه، ويُروى بالمدِّ، أي: إنَّ السؤال آخر ما يكتسب به المرءُ عند العجز عن الكسب.
6711 [3] - تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: الحسين. "إصلاح المال" (52)، وإبراهيم الحربي في غريب الحديث 1/ 206، وابن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 348، والطبراني في "الكبير" (18/ 870)، وفي "الأحاديث الطوال" (19) من طريق علي بن الجعد، عن محمد بن يزيد الواسطي به.وأخرجه مطولًا ومختصرًا أيضًا: ابن شبة 2/ 532 - 533، وبحشل في "تاريخ واسط" ص 119، والبزار (3663 - كشف الأستار)، وأبو يعلى في "المفاريد" (108)، والطبري في مسند عمر من "تهذيب الآثار" 1/ 57، وفي مسند ابن عباس أيضًا 1/ 269، والبغوي في "معجم الصحابة" (1961)، وابن حبان في "الثقات" 6/ 320 - 322، وابن عدي في "الكامل" 3/ 187، وأبو طاهر المخلص في "المخلصيات" (1902) و (3015)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5684)، والمزي في ترجمة قيس بن عاصم من "التهذيب" 24/ 60 - 61 و 61 - 62 من طرق عن زياد بن أبي زياد الجصاص، به. وتحرَّف زياد في بعض المصادر إلى: يزيد!وله طريق ثانٍ أخرجه مطولًا البخاري في "الأدب المفرد" (953)، والبزار (2744 - كشف الأستار)، وابن الأعرابي في "المعجم" (259)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (3065) من طريق الصعق بن حزن، عن القاسم بن مطيب، عن يونس بن عبيد، عن الحسن البصري، به والقاسم ابن مطيب ذكره البخاري وابن أبي حاتم وسكتا عنه، ووثقه الدارقطني في "العلل" 5/ 143، وتعنَّت ابنُ حبان فقال: يخطئ عمَّن يروي على قلَّة روايته، فاستحقَّ التركَ لما كثر ذلك منه. قلنا: بل مثله يصلح في المتابعات والشواهد.وله طريق ثالث، أخرجه ابن عبد البر في "التمهيد" 4/ 213 من طريق عبد الملك بن قريب الأصمعي، عن المبارك بن فضالة، قال: سمعت الحسن به ولم يسق لفظه بتمامه. وفيه إلى الأصمعي من لم نتبينه. وبمجموع هذه الطرق يرتقي الحديث إلى الحسن، والله تعالى أعلم.وأخرج الطبري في مسند عمر 1/ 57 من طريق عبيد -وهو ابن عبد الرحمن الصِّيد- عن الحسن، عن قيس بن عاصم المنقري: أنه قال لبنيه لما حضرته الوفاة: "يا بنيَّ، إياكم والمسألة، فإنها أَخِرُ كسب الرجل"، وراويه عن عبيد لم نتبينه.وأخرج ابن سعد في "الطبقات" 6/ 162 من طريق سفيان الثوري، قال: حدثني أسلم المنقري، عن رجل: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: لقيس بن عاصم: "هذا سيد أهل الوبر". ورجاله ثقات سوى الرجل المبهم.قوله: "المئين": جمع مَئة.وقوله: "إلَّا من أعطى في نجدتها ورسلها" قال ابن الأثير في "النهاية" 2/ 223: المراد بالنَّجدة: الشدة والجَذب، وبالرِّسْل: الرخاء والخصب؛ لأن الرِّسل اللَّبَن، وإنما يكثر في حال الرخاء والخصب، فيكون المعنى أنه يخرج حقَّ الله في حال الضيق والسعة، والجدب والخصب؛ لأنه إذا أخرج حقها في سنة الضيق والجدب كان ذلك شاقًا عليه، فإنه إجحاف به، وإذا أخرجها في حال الرخاء كان ذلك سهلًا عليه؛ ولذلك قيل في الحديث: يا رسول الله، وما نجدتها ورسلها؟ قال: "عسرها ويسرها"، فسمى النجدة عسرًا والرسل يسرًا؛ لأن الجدب عسر، والخصب يسر، فهذا الرجل يُعطي حقها في حال الجدب والضيق، وهو المراد بالنجدة، وفي حال الخصب والسعة، وهو المراد بالرسل. والله أعلم.وقوله: "فإنها أَخِر كسب المرء"، قال ابن الأثير 1/ 29: أي أرذله وأدناه، ويُروى بالمدِّ، أي: إنَّ السؤال آخر ما يكتسب به المرءُ عند العجز عن الكسب.
6711 [4] - حديث حسن، وهذا إسناد ضعيف لضعف زياد الجصاص -وهو ابن أبي زياد- وقد توبع، والحسن -وهو البصري- مع أنه صرَّح بسماعه من قيس، إلَّا أنَّ علي بن المديني قال: لم يسمع منه شيئًا، فيما رواه ابن أبي حاتم في "المراسيل" (143).وأخرجه مطولًا مجموعًا إلى الحديث السابق الطبراني في "الكبير" 18/ (870) عن عبد الله بن أحمد بن حنبل، بهذا الإسناد.وأخرجه مطولًا ومختصرًا: ابنُ شبة في "تاريخ المدينة" 2/ 530 - 532، وابنُ أبي الدنيا في "إصلاح المال" (52)، وإبراهيم الحربي في غريب الحديث 1/ 206، وابن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 348، والطبراني في "الكبير" (18/ 870)، وفي "الأحاديث الطوال" (19) من طريق علي بن الجعد، عن محمد بن يزيد الواسطي به.وأخرجه مطولًا ومختصرًا أيضًا: ابن شبة 2/ 532 - 533، وبحشل في "تاريخ واسط" ص 119، والبزار (3663 - كشف الأستار)، وأبو يعلى في "المفاريد" (108)، والطبري في مسند عمر من "تهذيب الآثار" 1/ 57، وفي مسند ابن عباس أيضًا 1/ 269، والبغوي في "معجم الصحابة" (1961)، وابن حبان في "الثقات" 6/ 320 - 322، وابن عدي في "الكامل" 3/ 187، وأبو طاهر المخلص في "المخلصيات" (1902) و (3015)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5684)، والمزي في ترجمة قيس بن عاصم من "التهذيب" 24/ 60 - 61 و 61 - 62 من طرق عن زياد بن أبي زياد الجصاص، به. وتحرَّف زياد في بعض المصادر إلى: يزيد!وله طريق ثانٍ أخرجه مطولًا البخاري في "الأدب المفرد" (953)، والبزار (2744 - كشف الأستار)، وابن الأعرابي في "المعجم" (259)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (3065) من طريق الصعق بن حزن، عن القاسم بن مطيب، عن يونس بن عبيد، عن الحسن البصري، به والقاسم ابن مطيب ذكره البخاري وابن أبي حاتم وسكتا عنه، ووثقه الدارقطني في "العلل" 5/ 143، وتعنَّت ابنُ حبان فقال: يخطئ عمَّن يروي على قلَّة روايته، فاستحقَّ التركَ لما كثر ذلك منه. قلنا: بل مثله يصلح في المتابعات والشواهد.وله طريق ثالث، أخرجه ابن عبد البر في "التمهيد" 4/ 213 من طريق عبد الملك بن قريب الأصمعي، عن المبارك بن فضالة، قال: سمعت الحسن به ولم يسق لفظه بتمامه. وفيه إلى الأصمعي من لم نتبينه. وبمجموع هذه الطرق يرتقي الحديث إلى الحسن، والله تعالى أعلم.وأخرج الطبري في مسند عمر 1/ 57 من طريق عبيد -وهو ابن عبد الرحمن الصِّيد- عن الحسن، عن قيس بن عاصم المنقري: أنه قال لبنيه لما حضرته الوفاة: "يا بنيَّ، إياكم والمسألة، فإنها أَخِرُ كسب الرجل"، وراويه عن عبيد لم نتبينه.وأخرج ابن سعد في "الطبقات" 6/ 162 من طريق سفيان الثوري، قال: حدثني أسلم المنقري، عن رجل: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: لقيس بن عاصم: "هذا سيد أهل الوبر". ورجاله ثقات سوى الرجل المبهم.قوله: "المئين": جمع مَئة.وقوله: "إلَّا من أعطى في نجدتها ورسلها" قال ابن الأثير في "النهاية" 2/ 223: المراد بالنَّجدة: الشدة والجَذب، وبالرِّسْل: الرخاء والخصب؛ لأن الرِّسل اللَّبَن، وإنما يكثر في حال الرخاء والخصب، فيكون المعنى أنه يخرج حقَّ الله في حال الضيق والسعة، والجدب والخصب؛ لأنه إذا أخرج حقها في سنة الضيق والجدب كان ذلك شاقًا عليه، فإنه إجحاف به، وإذا أخرجها في حال الرخاء كان ذلك سهلًا عليه؛ ولذلك قيل في الحديث: يا رسول الله، وما نجدتها ورسلها؟ قال: "عسرها ويسرها"، فسمى النجدة عسرًا والرسل يسرًا؛ لأن الجدب عسر، والخصب يسر، فهذا الرجل يُعطي حقها في حال الجدب والضيق، وهو المراد بالنجدة، وفي حال الخصب والسعة، وهو المراد بالرسل. والله أعلم.وقوله: "فإنها أَخِر كسب المرء"، قال ابن الأثير 1/ 29: أي أرذله وأدناه، ويُروى بالمدِّ، أي: إنَّ السؤال آخر ما يكتسب به المرءُ عند العجز عن الكسب.
6712 - حدثنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنْبري، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الغَسِيلي، حدثنا محمد بن سلَّام الجُمَحي، عن أبي عُبيدة مَعمَر بن المثنَّى، قال: عمرُو بن الأهتَم بن سُمَي بن سِنان بن خالد بن مِنْقَر بن عُبيد بن مُقاعِس بن عمرو ابن كعب بن سعد بن زيد مَنَاة بن تَميم، واسم الأَهتَم سِنانٌ [1]، هُتِمَت ثَنِيَّتاه يومَ الكِلاب.
আবু উবাইদা মা'মার ইবনুল মুছান্না থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরু ইবনুল আহতাম হলেন সুমাই ইবনু সিনান ইবনু খালিদ ইবনু মিনকার ইবনু উবাইদ ইবনু মুকাইস ইবনু আমর ইবনু কা'ব ইবনু সা'দ ইবনু যায়েদ মানাত ইবনু তামীমের বংশধর। আল-আহতামের (আহতাম নামের ব্যক্তির) আসল নাম হলো সিনান। কিলাবের যুদ্ধের দিন তাঁর সামনের দাঁতগুলো ভেঙে গিয়েছিল।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: سيار.
6713 - حدثنا أبو زكريا العَنْبري، حدثنا أبو بكر أحمد بن محمد بن عُبيدة الوَبَري (ح).وحدثنا أبو إسحاق إبراهيمُ بن محمد بن يحيى المُزكِّي، حدثنا إبراهيم بن محمد ابن إدريس المَعْقِلي [1]؛ قالا: حدثنا علي بن حرب المَوْصلي، حدثنا أبو سعد [2] الهيثم بن محفوظ، عن أبي المقوِّم [3] الأنصاري يحيى بن أبي يزيد عن الحَكَم بن عُتيبة، عن مِقْسَم، عن ابن عبّاس، قال: جلسَ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم قيسُ بن عاصم والزِّبْرِقانُ بن بدر وعمرو بن الأهتَم التميميون، ففَخَرَ الزِّبْرقانُ فقال: يا رسولَ الله، أنا سيِّدُ تميم، والمُطاعُ فيهم، والمُجاب فيهم، أمنعهم من الظُّلم فآخذُ لهم بحقوقهم، وهذا يعلمُ ذاك -يعني عمرو بن الأهتم- فقال: عمرُو بن الأهتم: والله يا رسول الله، إنه لشديدُ العارضة، مانعٌ لجانبِه، مُطاع في أدنَيهِ.قال الزِّبرقان: والله يا رسولَ الله، لقد عَلِمَ منِّي غيرَ ما قال، وما منعه أن يتكلَّم به إلَّا الحسدُ. قال عمرٌو: أنا أحسدُك؟! فوالله إنك لَلَئيمُ الخال، حديثُ المال، أحمقُ الوالد، مُضيَّعٌ في العَشيرة، والله يا رسولَ الله، لقد صدقتُ فيما قلتُ أولًا، وما كذبتُ فيما قلتُ آخرًا، لكني رجلٌ رضيتُ فقلتُ أحسنَ ما علمتُ، وغضبتُ فقلتُ أقبحَ ما وجدتُ، ووالله لقد صدقتُ في الأمرين جميعًا، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "إنَّ من البيان لَسِحرًا، إنَّ من البيان لَسِحرًا" [4]. وقد رُوي عن أبي بَكْرة الأنصاري [5] أنه حضر هذا المجلسَ:
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট কায়স ইবনে আসিম, যিবরিকান ইবনে বদর এবং আমর ইবনুল আহতাম—এই তিনজন বনু তামীম গোত্রের লোক বসেছিলেন। তখন যিবরিকান অহংকার করে বলল: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমিই তামীম গোত্রের নেতা, তাদের মধ্যে আমাকেই মান্য করা হয়, আমার ডাকেই তারা সাড়া দেয়। আমি তাদের উপর থেকে জুলুম প্রতিরোধ করি এবং তাদের হক আদায় করে দিই। আর এ (অর্থাৎ আমর ইবনুল আহতাম) তা জানে।
তখন আমর ইবনুল আহতাম বলল: আল্লাহর কসম, হে আল্লাহর রাসূল, সে তো কঠোর আত্মমর্যাদাবোধ সম্পন্ন, নিজের পক্ষকে সুরক্ষিত রাখে এবং তার নিকটবর্তী মহলে তাকে মান্য করা হয়। যিবরিকান বলল: আল্লাহর কসম, হে আল্লাহর রাসূল, সে আমার সম্পর্কে যা বলেছে তার চেয়েও বেশি কিছু জানে। হিংসা ছাড়া তাকে অন্য কিছু বলতে বাধা দেয়নি।
আমর বলল: আমি তোমাকে হিংসা করি?! আল্লাহর কসম, তুমি তো নীচ মামার বংশধর, নতুন ধনী, নির্বোধের পুত্র এবং গোত্রের মাঝে মূল্যহীন। আল্লাহর কসম, হে আল্লাহর রাসূল, আমি প্রথমে যা বলেছিলাম, তাতেও সত্য বলেছিলাম, আর শেষে যা বললাম, তাতেও মিথ্যা বলিনি। কিন্তু আমি এমন লোক যে সন্তুষ্ট হলে সবচেয়ে ভালো যা জানি, তা বলি; আর রাগান্বিত হলে সবচেয়ে খারাপ যা খুঁজে পাই, তা বলি। আল্লাহর কসম, আমি উভয় ক্ষেত্রেই সত্য বলেছি।
তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই কিছু কিছু বাগ্মিতা জাদুস্বরূপ। নিশ্চয়ই কিছু কিছু বাগ্মিতা জাদুস্বরূপ।"
আবূ বাকরাহ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও বর্ণিত আছে যে তিনি এই মজলিসে উপস্থিত ছিলেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: العقلي، وصوبناه من "الإكمال" لابن ماكولا 7/ 319، وضبطه بقوله: بفتح الميم وبالعين المهملة وبالقاف المكسورة.
[2] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: سعيد. وانظر "كنى الحاكم" 5/ 108.
6713 [3] - بكسر الواو، انظر ابن ناصر الدين في "توضيح المشتبه" 8/ 251.
6713 [4] - إسناده واهٍ، إبراهيم بن محمد المعقلي مجهول الحال، روى عنه اثنان، ولم نجد من وثقه، وقد توبع، والهيثم بن محفوظ مجهول، قال الذهبي في "الميزان": لا يدرى من هو وأبو المقوِّم، قال ابن ناصر الدين في "توضيح المشتبه" 8/ 251: اختلف في اسمه؛ فقال عبّاس الدوري: سمعت يحيى يقول: يحيى بن ثعلبة أبو المقوّم. وقال الحاكم أبو أحمد أبو المقوّم بحير بن ثعلبة الأنصاري، عن أبي محمد الحكم بن عتيبة، روى عنه إسحاق بن محمد بن كثير وأبو سعد الهيثم بن محفوظ. وقال ابن منده: أبو المقوّم يحيى بن ثعلبة الكوفي، حدّث عن الحكم بن عتيبة. قلنا: نُرى أنه تحرَّف على أبي أحمد الحاكم، فقد انفرد من بين الثلاثة بتسميته بَحيرًا. ويحيى بن ثعلبة هذا، ضعفه ابنُ معين -كما في "تاريخ ابن طهمان" (283) - فقال: ليس بشيء، وأورده الدارقطني في كتابه "الضعفاء والمتروكون" (584)، وقال الحافظ ابن كثير في "البداية والنهاية" 7/ 243: إسناده غريب جدًا. وضعَّفه العراقي في "تخريج الإحياء".وأخرجه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5122) عن إبراهيم بن محمد الدَّيْبُلي، عن إبراهيم ابن محمد بن إدريس، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو أحمد الحاكم في "الأسامي والكنى" 5/ 108 عن جعفر بن أحمد بن كعب الكلابي، والبيهقي في "دلائل النبوة" 5/ 316 - 317 من طريق محمد بن عبد الله بن الحسين العلاف، كلاهما عن علي بن حرب الموصلي، به. وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 9/ 37، وأبو نعيم (3096) و (5121)، والبيهقي في 5/ 316 من طريق حماد بن زيد، وابن شبة في "تاريخ المدينة" 2/ 524 - 526 من طريق عباد بن عباد المهلبي، كلاهما عن محمد بن الزبير الحنظلي قال: قدم عمر و بن الأهتم والزبرقان بن بدر وقيس ابن عاصم على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكر نحوه ومحمد الحنظلي واهٍ.وأخرج أحمد 4 / (2761) و 5 / (2814) و (2859) و (3025) و (3068)، وأبو داود (5011)، وابن ماجه (3756)، وابن حبان (5780) من طرق عن سماك بن حرب، عن عكرمة، عن ابن عبّاس: أنَّ أعرابيًا جاء إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فتكلم بكلام بيِّن، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "إنَّ من البيان سحرًا، وإنَّ من الشعر حُكْمًا". وهذا صحيح لغيره، وإسناده حسن.وروى الترمذي (2845) من طريق سماك هذا قوله: "إن من الشعر حكمًا"، فقط، وحسنه.ويشهد له حديث ابن عمر عند البخاري (5767)، بلفظ: جاء رجلان من المشرق فخطبا، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "إنَّ من البيان لسحرًا".وانظر ما بعده.
6713 [5] - كذا نسبه أنصاريًا، وهو غريب، فهو ثقفيٌّ من مواليهم.
6714 - أخبرنا أبو منصور محمد بن علي الفارسي، حدثنا أبو بكر محمد بن شاذانَ الجَوْهري، حدثنا سعيد بن سليمان النَّشِيطي، حدثنا عُيينة بن عبد الرحمن ابن جَوْشَن، عن أبيه، عن أبي بَكْرة قال: كُنَّا عند النبيِّ صلى الله عليه وسلم فَقَدِمَ عليه وفدُ بني تميم، فيهم قيسُ بن عاصم وعمرو بن الأهتَم والزِّبْرقان بن بدر، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم لعمرو بن الأهتم: "ما تقولُ في الزِّبْرقان بن بدر؟ " فقال: يا رسولَ الله، مُطاعٌ في أَدنَيهِ، شديدُ العارضة، مانعٌ لما وراء ظهره، فقال الزِّبْرقان: يا رسولَ الله، والله إنه ليعلمُ منِّي أكثرَ ممّا وصفَني به، ولكنه حَسَدني، فقال عمرو: والله يا رسولَ الله، إنه لَزَمِرُ [1] المُروءة، ضَيِّق العَطَن، لَئيمُ الخال أحمقُ الوالد، والله ما كذبت أولًا، ولقد صدقتُ آخرًا، ولكني رضيتُ فقلتُ أحسن ما علمتُ، وغضبتُ فقلتُ أقبحَ ما علمتُ، فقال النبيُّ: "إنَّ من البيان لَسِحرًا، وإنَّ من الشِّعر لَحُكمًا" [2]. ذكرُ صَعْصَعةَ بن مُعاوية عمِّ الأحنف بن قيس رضي الله عنهما
আবূ বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম। তখন তাঁর কাছে বনু তামীম গোত্রের একটি প্রতিনিধিদল এলো। তাদের মধ্যে ছিলেন কাইস ইবনু আসিম, আমর ইবনুল আহতাম এবং যিবরিকান ইবনু বদর। তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমর ইবনুল আহতামকে বললেন: "যিবরিকান ইবনু বদর সম্পর্কে তুমি কী বলো?" তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! তিনি তার গোত্রের মধ্যে মান্যবর (নেতা), প্রভাবশালী এবং নিজের গোত্রের রক্ষক। তখন যিবরিকান বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহর শপথ! সে আমার সম্পর্কে যা বর্ণনা করেছে, তার চেয়েও বেশি কিছু সে জানে, কিন্তু সে আমাকে হিংসা করেছে। আমর বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহর শপথ! সে তো হলো দুর্বল ব্যক্তিত্বের অধিকারী, সংকীর্ণ হৃদয়ের, নীচ মামার বংশধর এবং নির্বোধ পিতার সন্তান। আল্লাহর শপথ! আমি প্রথমে মিথ্যা বলিনি, আর শেষেও আমি সত্য বলেছি। কিন্তু আমি যখন সন্তুষ্ট ছিলাম, তখন আমার জানা মতে তার সর্বোত্তম গুণগুলো বলেছি। আর যখন আমি রাগান্বিত হলাম, তখন আমার জানা মতে তার নিকৃষ্টতম গুণগুলো বললাম। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই কোনো কোনো বর্ণনায় (বাক-চাতুরীতে) জাদু রয়েছে এবং নিশ্চয়ই কোনো কোনো কবিতায় হিকমত (জ্ঞান বা প্রজ্ঞা) রয়েছে।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّفت في (ص) و (م) إلى: إنه أدبر، وفي (ب): إنه إذا أمر، وفي "أوسط الطبراني" إلى: إنه لزمن وكله تحريف، والصواب ما أثبتنا، يُقال: رجل زَمِر المروءة، أي: قليلُها، من زَمِرَ الشيء زَمَرًا وزَمَارةً وزُمُورةً: قلَّ.
[2] قوله: "إنَّ من البيان لسحرًا، وإنَّ من الشعر لحكمًا" صحيح لغيره، كما بينّا في الذي قبله، وهذا إسناد ضعيف من أجل سعيد بن سليمان النشيطي، ومع ضعفه خولف في وصله، والمرسل أصحُّ.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (7671) من طريق الحسن بن كثير اليمامي، عن سعيد بن سليمان، بهذا الإسناد.وخالف سعيدَ بن سليمان مسلمةُ بن محارب الزيادي عند البلاذري في "أنساب الأشراف" 12/ 271، فرواه عن عيينة بن عبد الرحمن، عن أبيه: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال لعمرو بن الأهتم، فذكره مرسلًا. ومسلمةُ هذا ذكره البخاري في "الكبير" وابنُ أبي حاتم، وسكتا عليه، وقد روى عنه غير واحد، وذكره ابن حبان في "الثقات"، فحاله أحسن من النشيطي.وأخرج الطبراني في "الأوسط" (8304) من طريق بكار بن عبد العزيز بن أبي بكرة، عن أبيه، عن أبي بكرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إنَّ من الشعر حكمة". وقال: لم يروه عن بكار بن عبد العزيز إلَّا النضر بن طاهر. قلنا: والنضر بن طاهر متهم بسرقة الحديث، فالإسناد واهٍ.قوله: "أدنَيهِ" الناس القريبون منه.وقوله: "شديد العارضة" أي: شديد الناحية ذو جَلَد وصرامة.
6715 - أخبرنا أبو محمد المُزَني [1]، أخبرنا أبو خليفة، حدثنا محمد بن سلَّام الجُمَحي، حدثنا أبو عُبيدة مَعمَر بن المثنَّى، قال: صَعْصَعَةُ بن معاوية بن حُصين ابن عُمير بن عُبادة بن النَّزّال بن مُرَّة بن عُبيد بن مُقاعِس بن عمرو بن كعب بن سعد ابن زيد مَنَاة بن تَميم، عمُّ الأحنف بن قيس.
৬৭১৫ - আমাদেরকে খবর দিয়েছেন আবু মুহাম্মাদ আল-মুযানী, আমাদেরকে খবর দিয়েছেন আবু খালীফাহ, আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু সাল্লাম আল-জুমাহী, আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আবু উবাইদাহ মা'মার ইবনুল মুছান্না, তিনি বলেন: সা'সাআ ইবনু মু'আবিয়া ইবনু হুসাইন ইবনু উমায়ের ইবনু উবাদাহ ইবনু নাযযাল ইবনু মুররাহ ইবনু উবাইদ ইবনু মুক্বা'ইস ইবনু আমর ইবনু কা'ব ইবনু সা'দ ইবনু যায়িদ মানাত ইবনু তামীম হলেন আহনাফ ইবনু ক্বায়সের চাচা।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] أبو محمد المزني سقط من (م) و (ص)، وأثبتناه من (ب).
6716 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا أبو زكريا يحيى بن محمد بن يحيى الشَّهيد، حدثنا هُدْبة بن خالد، حدثنا جَرير بن حازم، عن الحسن، عن صَعْصَعة بن معاوية قال: قدمتُ على النبيِّ صلى الله عليه وسلم فسمعتُه يقول هذه الآية: {مَنْ يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ خَيْرًا يَرَهُ (7) وَمَنْ يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ شَرًّا يَرَهُ}، فقلت: لا أُبالي أن لا أسمعَ غيرَها، حَسْبي حَسْبي [1]. ذكرُ الأحنف بن قيس رضي الله عنه-
সা'সা'আহ ইবনু মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উপস্থিত হলাম। তখন আমি তাঁকে এই আয়াতটি পাঠ করতে শুনলাম: "কেউ অণু পরিমাণ সৎকর্ম করলে তা সে দেখতে পাবে। আর কেউ অণু পরিমাণ অসৎকর্ম করলে তাও সে দেখতে পাবে।" আমি বললাম: আমি আর অন্য কিছু না শুনলেও আমার কোনো চিন্তা নেই, আমার জন্য এটাই যথেষ্ট, এটাই যথেষ্ট।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده صحيح، وقد صرَّح الحسن -وهو البصري- بسماعه من صعصعة كما سيأتي. وأخرجه أحمد 34/ (20593) عن يزيد بن هارون، و 34/ (20594) عن الأسود بن عامر، والنسائي (11630) من طريق يونس بن محمد، ثلاثتهم عن جرير بن حازم، بهذا الإسناد. وصرَّح الحسن بسماعه من صعصعة في روايتي الأسود ويونس.وأخرجه أحمد (20595) عن عفان بن مسلم، عن جرير بن حازم، قال: سمعت الحسن، قال: قدم صعصعةُ المدينةَ، فذكره كالمرسل. أو أن يمشي على ظَهْر قَدَميهِ من شِقِّ الخِنصر، أو مَيلٌ في صَدْر القدم. وقد حَنِفَ كفَرِحَ وكَرُمَ، فهو أحنفُ، ورِجلٌ حَنْفاءُ. قاله صاحب "القاموس المحيط".
6717 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حدثنا مصعب بن عبد الله قال: والأحنفُ بن قيس بن حُصين بن النزَّال بن عُبيد [1]، مُخضرَمٌ، أدرك النبيَّ صلى الله عليه وسلم، ووجَّه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم مُصَدِّقَه إلى قومِه، فأعانَ الأحنفُ مُصَدِّقَ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فدعا له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم [2].قال: واسمُ الأحنف: الضحَّاك، ويقال صَخْرُ بن قيس بن معاوية بن حُصين، وُلِدَ وهو أحنفُ، فقالت أمُّه:واللهِ لولا حَنَفٌ [3] في رِجلِهِ … ما كان في الحيِّ غلامُ مِثلِهِ وكان أحلمَ العرب.
মুসআব ইবনে আবদুল্লাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আহনাফ ইবনে কায়স ইবনে হুসাইন ইবনে নাযযাল ইবনে উবায়েদ ছিলেন একজন 'মুখাদরাম' (যিনি জাহেলিয়াত ও ইসলামের উভয় যুগ পেয়েছিলেন), যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগ পেয়েছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর গোত্রের কাছে যাকাত সংগ্রহকারী (মুসাদ্দিক) প্রেরণ করেন। আহনাফ সেই যাকাত সংগ্রহকারীকে সহায়তা করেন। ফলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর জন্য দোয়া করেছিলেন। তিনি আরও বলেন: আহনাফের আসল নাম ছিল দাহ্হাক, আবার সাখর ইবনে কায়স ইবনে মু'আবিয়া ইবনে হুসাইন-ও বলা হয়। তিনি বাঁকানো পা (আহনাফ) নিয়ে জন্মগ্রহণ করেন। তখন তাঁর মা বলেছিলেন: "আল্লাহর কসম, যদি তার পায়ে বাঁকানো ভাব (হানাফ) না থাকতো, তবে এই গোত্রে তার মতো কোনো যুবক ছিল না।" তিনি ছিলেন আরবদের মধ্যে সবচেয়ে সহনশীল (আহলম)।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] أُقحم "بن" في النسخ الخطية بعد عبيد. أو أن يمشي على ظَهْر قَدَميهِ من شِقِّ الخِنصر، أو مَيلٌ في صَدْر القدم. وقد حَنِفَ كفَرِحَ وكَرُمَ، فهو أحنفُ، ورِجلٌ حَنْفاءُ. قاله صاحب "القاموس المحيط".
[2] أخرج أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (1121)، وفي "تاريخ أصبهان" 1/ 224 من طريق عمر بن مصعب بن الزبير، عن عمه عروة بن الزبير، قال: حدثني الأحنف بن قيس، أنه قدم على عمر بن الخطاب بفتح تستر، فقال: يا أمير المؤمنين، إنَّ الله قد فتح عليك تستر، وهي من أرض البصرة، فقال رجلٌ من المهاجرين: يا أميرَ المؤمنين، إن هذا -يعني الأحنف بن قيس- الذي كفَّ عنّا بني مرة بن عبيد حين بعثَنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في صدقاتهم، وقد كانوا همُّوا بنا. وإسناده ضعيف.وانظر الحديث التالي. أو أن يمشي على ظَهْر قَدَميهِ من شِقِّ الخِنصر، أو مَيلٌ في صَدْر القدم. وقد حَنِفَ كفَرِحَ وكَرُمَ، فهو أحنفُ، ورِجلٌ حَنْفاءُ. قاله صاحب "القاموس المحيط".
6717 [3] - الحَنَفُ، بالتحريك: الاعوجاجُ في الرِّجْل، أو أن يُقبِلَ إحدى إبهامَيْ رِجلَيه على الأخرى، أو أن يمشي على ظَهْر قَدَميهِ من شِقِّ الخِنصر، أو مَيلٌ في صَدْر القدم. وقد حَنِفَ كفَرِحَ وكَرُمَ، فهو أحنفُ، ورِجلٌ حَنْفاءُ. قاله صاحب "القاموس المحيط".
6718 - حدثنا بصحةِ ما ذكره مصعبٌ: الشيخُ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا علي ابن عبد العزيز، حدثنا حجَّاج بن مِنْهال، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن علي بن زيد، عن الحسن، أنَّ الأحنف بن قيس قال: بَيْنا أنا أطوفُ بالبيت في زمن عثمانَ بن عفان إذ أخذ رجلٌ من بني ليثٍ بيدي، فقال: ألا أبشِّرُك؟ قلتُ: بلى، فقال: هل تذكرُ إذ بعثني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إلى قومِك بني سعد، فجعلتُ أعرِضُ عليهم الإسلامَ وأدعوهم إليه، فقلتَ أنت: إنه يدعو إلى الخير، ويأمر به، وإنه يدعو إلى الخير ويأمرُ بالخير؟ فبلَّغتُ ذلك إلى النبيِّ صلى الله عليه وسلم، فقال: "اللهمَّ اغفِرْ للأحنفِ بن قيس"، فكان الأحنفُ يقول: ما مِن عملِ شيءٍ أرجَى لي منه [1]. ذكرُ الأسود بن سَريع رضي الله عنه-
আহনাফ ইবনে কায়েস থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যুগে আমি যখন বাইতুল্লাহ তাওয়াফ করছিলাম, তখন বানু লাইস গোত্রের একজন লোক আমার হাত ধরল এবং বলল: আমি কি তোমাকে একটি সুসংবাদ দেব না? আমি বললাম: অবশ্যই। সে বলল: তোমার কি মনে আছে, যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে তোমার গোত্র বানু সা'দের কাছে পাঠিয়েছিলেন? তখন আমি তাদের কাছে ইসলাম পেশ করছিলাম এবং তাদের সেদিকে আহবান জানাচ্ছিলাম। আর তুমি তখন বলেছিলে: ‘তিনি (মুহাম্মাদ) কল্যাণের দিকে আহ্বান করেন এবং তার নির্দেশ দেন, আর তিনি কল্যাণের দিকে আহ্বান করেন এবং কল্যাণের নির্দেশ দেন?’ আমি তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছে দিয়েছিলাম। তখন তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! তুমি আহনাফ ইবনে কায়েসকে ক্ষমা করে দাও।" আহনাফ (পরবর্তীকালে) বলতেন: "এই কাজের চেয়ে বেশি আশা জাগানো আর কোনো আমল আমার জন্য নেই।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف لضعف علي بن زيد: وهو ابن جدعان. الحسن: هو البصري.وضعفه الحافظ ابن حجر في "الإصابة"، فقال: تفرَّدَ به علي بن زيد وفيه ضعف.وأخرجه أحمد 38/ (23161) عن سليمان بن حرب، حدثنا حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وأخرج أحمد في "الزهد" (1298)، وفي "العلل" (1791) و (5199) عن أبي عبيدة الحداد عبد الواحد بن واصل، عن عبد الله بن عون، عن جبر بن حبيب: أنَّ الأحنف بلَّغه رجلان أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم دعا له، فسجد. ورجاله ثقات، وجبر من صغار التابعين.
6719 - Null