আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
6759 - حدثنا أبو العبّاس محمد بن يعقوب، حدثنا الرَّبيع بن سليمان، حدثنا أَسَد بن موسى، حدثنا ابن لَهِيعة، حدثني محمد بن زيد بن المهاجر بن قُنفذ، عن عُمير، مولى آبي اللَّحم قال: رأيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم على أحجارِ الزيت يستسقي رافعًا كفَّيه [1]. ذكرُ عمرو بن أُميَّة الضَّمْري رضي الله عنه-
উমায়ের, মাওলা আবি লাহম থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসুলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে আহজারুয-যাইত (জলপাইয়ের পাথর) নামক স্থানে বৃষ্টির জন্য প্রার্থনা (ইসতিসকা) করতে দেখেছি, যখন তিনি তাঁর উভয় হাত উপরে তুলেছিলেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف، ابن لَهِيعة -وهو عبد الله- سيِّئ الحفظ، لكنه متابع. وأخرجه أحمد 39/ (24009/ 38) عن حسن بن موسى، عن ابن لَهِيعة، بهذا الإسناد.وسلف عند المصنف برقم (1238) من طريق سعيد بن أبي هلال، عن يزيد بن عبد الله، عن عمير مولى آبي اللحم، عن آبي اللحم. فجعله من مسند آبي اللحم. وتكلمنا على إسناده هناك. وأخرجه ابن حبان (731) من طريق هشام بن عمار، عن حاتم بن إسماعيل، بهذا الإسناد.وفي الباب عن أنس بن مالك عند الترمذي (2517) وقال: غريب. ونقل عن يحيى القطان أنه قال: هذا عندي حديث منكر. قلنا: ورجاله ثقات سوى المغيرة بن أبي قُرَّة السدوسي، فقد روى عنه اثنان، وذكره ابن حبان في "الثقات". وإنما أنكره القطان لتفرُّد المغيرة به!وعن ابن عمر عند الخطيب البغدادي في رواة مالك كما في كنز العمال (5689)، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 8/ 279. قال الخطيب: غير محفوظ عن مالك وابن ريسان متروك. قلنا: بل متهم بالكذب، وشيخه أيضًا إسحاق بن محمد البيروتي متروك كما قال الذهبي في "الميزان"، فالحديث تالف لا يفرح به.وعن عبد الرحمن بن أبي ليلى مرسلًا عند علي بن الجعد في "مسنده" (2386). ورجاله ثقات غير شريك النخعي، فحديثه حسن في المتابعات والشواهد.وبمجموع هذه الروايات -سوى حديث ابن عمر- يرتقي الحديث إلى الحسن، والله تعالى أعلم.
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6760 - حدثني أبو بكر بن بالَوَيهِ، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حدثنا مصعب بن عبد الله الزُّبيري قال: عمرُو بن أُميَّة بنُ خُويلد بن عبد الله بن إياس بن عُبيد بن ناشرة بن كعب بن ضَمْرة بن بكر بن عبد مَنَاة بن كِنانة.
৬৭৬০ - আমাকে বর্ণনা করেছেন আবু বকর ইবনু বালাওয়াইহি, আমাদেরকে বর্ণনা করেছেন ইবরাহীম ইবনু ইসহাক আল-হারবী, আমাদেরকে বর্ণনা করেছেন মুসআব ইবনু আব্দুল্লাহ আয-যুবাইরী। তিনি বলেছেন: আমর ইবনু উমাইয়া ইবনু খুওয়াইলিদ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু ইয়াস ইবনু উবাইদ ইবনু নাশীরা ইবনু কা'ব ইবনু যামরা ইবনু বাকর ইবনু আব্দুল মানাত ইবনু কিনানাহ।
6761 - حدثنا أبو العبّاس محمد بن يعقوب، حدثنا الرَّبيع بن سليمان، حدثنا أسد بن موسى، حدثنا حاتم بن إسماعيل، حدثنا يعقوب بن عمرو بن عبد الله بن عمرو بن أُمية الضَّمري، عن جعفر بن عمرو بن أُمية، عن أبيه عمرو بن أُمية الضَّمري أنه قال: يا رسولَ الله، أُرسِلُ راحلتي وأتوكَّلُ؟ فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "بل قيِّدْها وتوكَّلْ" [1]. ذكرُ عُمير بن سَلَمة الضَّمْري رضي الله عنه-
আমর ইবনে উমাইয়াহ আদ-দামরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ, আমি কি আমার বাহনকে ছেড়ে দেব এবং (আল্লাহর উপর) ভরসা করব?" তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, "বরং তুমি সেটাকে বেঁধে দাও এবং (আল্লাহর উপর) ভরসা কর।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات غير يعقوب بن عمرو بن عبد الله الضمري، فقد روى عنه اثنان، وذكره ابن حبان في "ثقاته"، وقال في "صحيحه": مشهور مأمون. وقال الذهبي في "التلخيص": سنده جيد. وأخرجه ابن حبان (731) من طريق هشام بن عمار، عن حاتم بن إسماعيل، بهذا الإسناد.وفي الباب عن أنس بن مالك عند الترمذي (2517) وقال: غريب. ونقل عن يحيى القطان أنه قال: هذا عندي حديث منكر. قلنا: ورجاله ثقات سوى المغيرة بن أبي قُرَّة السدوسي، فقد روى عنه اثنان، وذكره ابن حبان في "الثقات". وإنما أنكره القطان لتفرُّد المغيرة به!وعن ابن عمر عند الخطيب البغدادي في رواة مالك كما في كنز العمال (5689)، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 8/ 279. قال الخطيب: غير محفوظ عن مالك وابن ريسان متروك. قلنا: بل متهم بالكذب، وشيخه أيضًا إسحاق بن محمد البيروتي متروك كما قال الذهبي في "الميزان"، فالحديث تالف لا يفرح به.وعن عبد الرحمن بن أبي ليلى مرسلًا عند علي بن الجعد في "مسنده" (2386). ورجاله ثقات غير شريك النخعي، فحديثه حسن في المتابعات والشواهد.وبمجموع هذه الروايات -سوى حديث ابن عمر- يرتقي الحديث إلى الحسن، والله تعالى أعلم.
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6762 - أخبرني أحمد بن يعقوب الثَّقفي، حدثنا موسى بن زكريا، حدثنا خَليفة ابن خيَّاط قال: عُمَيرُ بن سَلَمة بن مُنتاب بن طلحة بن جُدَى بن ضَمْرة.
৬৭৬২ - আমাকে খবর দিয়েছেন আহমাদ ইবনু ইয়া‘কূব আস-সাকাফী, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন মূসা ইবনু যাকারিয়া, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন খালীফা ইবনু খাইয়্যাত। তিনি বললেন: উমায়র ইবনু সালামা ইবনু মুনতাব ইবনু তালহা ইবনু জুদা ইবনু দম্রা।
6763 - حدثنا علي بن حَمْشاذ العَدْل، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي وزياد بن الخليل التُّستَري، قالا: حدثنا إبراهيم بن المنذر الحِزامي، حدثنا عبد العزيز ابن أبي حازم، عن يزيد بن عبد الله بن الهاد، عن محمد بن إبراهيم التَّيمي، عن عيسى بن طلحة بن عُبيد الله، عن عُمير بن سَلَمة الضَّمْري قال: بينما نحن نسيرُ معَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم وهو مُحرِمٌ ببعض نواحي الرَّوحاء، إذا نحن بحمارٍ معقور، فذكرتُ ذلك للنبيِّ صلى الله عليه وسلم فقال: "دَعُوه"، فأتاه صاحبُه الذي عقرَه، وهو رجل من بَهْز، فقال: يا رسولَ الله، شأنَكم بهذا الحمارِ، فأمر رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أبا بكر أن يَقسِمَه بين الرِّفاق، ثم مرَّ فلمَّا كان بالأُثاية مرَّ بظَبْي حاقفٍ في ظلِّ شجرةٍ فيه سهمٌ، فأمرَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم إنسانًا فنادَى: أن لا يأخُذَه إنسانٌ، فنَفَذَ الناسُ وتركوه [1]. ذكرُ أبي الجَعْد الضَّمْري رضي الله عنه-
উমাইর ইবনু সালামা আদ্-দামরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে রুহাওয়ার কিছু এলাকায় চলছিলাম, যখন তিনি ইহরামরত ছিলেন। হঠাৎ আমরা একটি যবেহ করা গাধা দেখতে পেলাম। আমি এ বিষয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জানালাম। তিনি বললেন: "তোমরা এটিকে ছেড়ে দাও।" অতঃপর যিনি সেটিকে যবেহ করেছিলেন, বেহয গোত্রের সেই লোকটি এসে বললেন, ইয়া রাসুলাল্লাহ! এই গাধাটির ব্যাপারে আপনারা সিদ্ধান্ত দিন। তখন রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নির্দেশ দিলেন যেন এটিকে সাথীদের মধ্যে ভাগ করে দেন। অতঃপর তিনি চলে গেলেন। এরপর যখন তিনি আছায়া নামক স্থানে পৌঁছালেন, তখন গাছের ছায়ায় একটি তিরবিদ্ধ হরিণকে দেখলেন, যা বসে ছিল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একজন লোককে নির্দেশ দিলেন, সে যেন ঘোষণা করে দেয় যে, কেউ যেন এটিকে গ্রহণ না করে। ফলে লোকেরা সামনে এগিয়ে গেল এবং এটিকে ছেড়ে দিল।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده صحيح كما قال الذهبي في "التلخيص".وأخرجه مختصرًا النسائي (4837)، وابن حبان (5112) من طريق بكر بن مضر، عن يزيد ابن عبد الله بن الهاد بهذا الإسناد.وأخرجه بتمامه أحمد 24/ (15450) عن هشيم، عن يحيى بن سعيد الأنصاري، عن محمد ابن إبراهيم التيمي، به.وخالف هشيمًا مالكٌ في "الموطأ" 1/ 351 - ومن طريقه النسائي (3786)، وابن حبان (5111) - ويزيدُ بن هارون عند أحمد 25/ (15744)، فروياه (مالك ويزيد) عن يحيى الأنصاري، به عن عمير بن سلمة، عن الرجل البَهْزي. فجعلاه من مسند البهزي، واسمه زيد بن كعب. وانظر لهذا الخلاف "علل الدارقطني" (3182) فقد استوعبها. وهذا من الاختلاف الذي لا يضرُّ، لأنَّ الصحابة كلهم ثقات عدول.قوله: "معقور"، يقال: عَقَر البعيرَ والفرس بالسيف فانْعَقَر، أي: ضرب به قوائمه.وقوله: "حاقف" أي: نائم قد انحنى في نومه.
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6764 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حدثنا مصعب بن عبد الله قال: أبو الجَعْد الضَّمْري عمرُو بن بكر بن جُنادة بن مُراد بن كعب بن ضَمْرة.
৬৭৬৪ - আমাকে হাদিস বর্ণনা করেছেন আবু বকর মুহাম্মাদ ইবনু আহমাদ ইবনু বালাওয়াইহি, আমাদেরকে হাদিস বর্ণনা করেছেন ইব্রাহিম ইবনু ইসহাক আল-হারবি, আমাদেরকে হাদিস বর্ণনা করেছেন মুসআব ইবনু আব্দুল্লাহ, তিনি বলেন: আবু আল-জা'দ আল-দমরি হলেন আমর ইবনু বকর ইবনু জুনাদাহ ইবনু মুরাদ ইবনু কা'ব ইবনু দামরাহ।
6765 - أخبرنا أحمد بن سلمان الفقيه، حدثنا الحسن بن مُكرَم، حدثنا يزيد ابن هارون، أخبرنا محمد بن عمرو بن عَلقَمة، عن عَبيدة بن سفيان الحَضْرمي، قال: سمعتُ أبا الجَعْد الضَّمْري يقول: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "من تَرَك جُمعةً ثلاثًا تهاونًا بها، طبَعَ اللهُ على قلبِه" [1]. ذكرُ الصَّعْب بن جَثَّامة رضي الله عنه-
আবূল জা'দ আদ-দামরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "যে ব্যক্তি অবহেলাবশত তিন জুমা ত্যাগ করে, আল্লাহ তার অন্তরে মোহর মেরে দেন।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن عمرو بن علقمة. وحسنه الذهبي في "التلخيص".وأخرجه ابن ماجه (1125) من طريق يزيد بن هارون وغيرِه عن محمد بن عمرو، بهذا الإسناد.وسلف برقم (1047)، وذكرنا ما يشهد له هناك.
6766 - أخبرنا أبو محمد المُزَني، حدثنا أبو خَليفة، حدثنا محمد بن سلَّام الجُمَحي، حدثنا أبو عُبيدة قال: الصَّعْب بن جَثَّامة بن قيس بن عبد الله بن وهب بن يَعْمَر بن عوف بن كعب بن سُلْمى بن ليث، وأمُّ الصَّعب زينبُ بنت حرب بن أُميَّة ابن عبد شمس بن عبد [1] مَنَاف أخت أبي سفيان، واسمُها فاختة بنت حرب، وكان يَنزِلُ وَدَّانَ.
আবূ উবাইদা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: (তিনি হলেন) সা’ব ইবনু জাছছামাহ ইবনু কাইস ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু ওয়াহব ইবনু ইয়া’মার ইবনু আওফ ইবনু কা’ব ইবনু সুলমা ইবনু লাইছ। আর সা’ব-এর মা হলেন যাইনাব বিনত হারব ইবনু উমাইয়াহ ইবনু আবদ শামস ইবনু আবদে মানাফ, যিনি আবূ সুফিয়ান-এর বোন। তাঁর (যাইনাব-এর) আসল নাম ছিল ফাখিতাহ বিনত হারব। আর তিনি ওয়াদ্দান-এ বসবাস করতেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] لفظ "عبد" لم يرد في نسخنا الخطية، وهو في النسخة المحمودية. كما في طبعة الميمان. رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد ذلك عن قتل النِّساء والصِّبيان. ويُؤيِّد كونَ النَّهي في غزوة حُنَين ما سيأتي في حديث رباح بن الرَّبيع الآتي [سلف عند الحاكم برقم (2597)] فقال لأحدِهم: "الحَقْ خالدًا فقُل له: لا تَقتُل ذُرّية ولا عَسيفًا"، وخالد أوَّل مشاهده مع النبي صلى الله عليه وسلم غزوة الفتح، وفي ذلك العام كانت غزوة حُنَين.وأخرجه عبد الله في زوائد "المسند" 27/ (16686) من طريق عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن عبد الرحمن بن الحارث، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة، عن ابن عبّاس: أنَّ الصعب بن جثامة قال: قلت: يا رسول الله، الدار من دور المشركين نصبّحها للغارة، فنصيب الولدان تحت بطون الخيل ولا نشعر؟ فقال: "إنهم منهم". فجعله من حديث ابن عباس، وإسناده ضعيف.
6767 - أخبرني إسماعيل بن محمد بن إسماعيل الفقيه بالرِّيِّ، حدثنا محمد ابن الفَرَج، حدثنا حجَّاج بن محمد، عن ابن جُريج، أخبرني عمرو بن دينار، أنَّ ابن شِهاب أخبره عن عبيد الله بن عبد الله بن عُتبة، عن ابن عبّاس، عن الصَّعْب بن جثَّامة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قيل له: إنَّ خيلًا أغارت من الليل، فأصابت من أبناء المشركين، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "هم مِن [1] آبائِهم" [2]. ذكرُ قَبَاث [3] بن أَشيَم رضي الله عنه-
সা'ব ইবনে জাছছামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল যে, রাতে একদল অশ্বারোহী (শত্রুপক্ষের উপর) আক্রমণ করে মুশরিকদের সন্তানদেরও আঘাত/হত্যা করেছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তারা তাদের (মুশরিক) পিতাদের অন্তর্ভুক্ত।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حرف "من" سقط من (م) و (ص)، وأثبتناه من (ب). رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد ذلك عن قتل النِّساء والصِّبيان. ويُؤيِّد كونَ النَّهي في غزوة حُنَين ما سيأتي في حديث رباح بن الرَّبيع الآتي [سلف عند الحاكم برقم (2597)] فقال لأحدِهم: "الحَقْ خالدًا فقُل له: لا تَقتُل ذُرّية ولا عَسيفًا"، وخالد أوَّل مشاهده مع النبي صلى الله عليه وسلم غزوة الفتح، وفي ذلك العام كانت غزوة حُنَين.وأخرجه عبد الله في زوائد "المسند" 27/ (16686) من طريق عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن عبد الرحمن بن الحارث، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة، عن ابن عبّاس: أنَّ الصعب بن جثامة قال: قلت: يا رسول الله، الدار من دور المشركين نصبّحها للغارة، فنصيب الولدان تحت بطون الخيل ولا نشعر؟ فقال: "إنهم منهم". فجعله من حديث ابن عباس، وإسناده ضعيف.
[2] إسناده صحيح.وأخرجه النسائي (8569) عن يوسف بن سعيد وإبراهيم بن الحسن، عن حجاج، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 26/ (16424)، ومسلم (1745) (28) من طريق عبد الرزاق، عن ابن جريج، به.وأخرجه عبد الله بن أحمد في زياداته على "المسند" 27/ (16657) و (16664) و (16685) من طرق عن عمرو بن دينار، به.وأخرجه أحمد 26/ (16422) و (16424) و (16426)، وابنه عبد الله 27/ (16668) و (16669) و (16670) و (16677) و (16681) و (16682)، والبخاري (3012) و (3013)، ومسلم (1745) (26) و (27)، وأبو داود (2672)، وابن ماجه (2839)، والترمذي (1570)، والنسائي (8568) و (8570)، وابن حبان (136) و (137) و (4786) و (4787) من طرق عن الزهري، به.ووقع في رواية محمد بن عمرو عن الزهري عند عبد الله بن أحمد (16681) وابن حبان (137) و (4787): ثم نهى عنهم يوم حنين. وفي مخطوط "المسند": خيبر، وهو خطأ قديم.قال الحافظ ابن حجر عن هذه الزيادة في "فتح الباري" 9/ 270: وهي مُدرَجة في حديث الصَّعب، وذلك بَيِّنٌ في "سنن أبي داود" (2672) فإنَّه قال في آخره: قال سفيان: قال الزهري: ثمَّ نَهى رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد ذلك عن قتل النِّساء والصِّبيان. ويُؤيِّد كونَ النَّهي في غزوة حُنَين ما سيأتي في حديث رباح بن الرَّبيع الآتي [سلف عند الحاكم برقم (2597)] فقال لأحدِهم: "الحَقْ خالدًا فقُل له: لا تَقتُل ذُرّية ولا عَسيفًا"، وخالد أوَّل مشاهده مع النبي صلى الله عليه وسلم غزوة الفتح، وفي ذلك العام كانت غزوة حُنَين.وأخرجه عبد الله في زوائد "المسند" 27/ (16686) من طريق عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن عبد الرحمن بن الحارث، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة، عن ابن عبّاس: أنَّ الصعب بن جثامة قال: قلت: يا رسول الله، الدار من دور المشركين نصبّحها للغارة، فنصيب الولدان تحت بطون الخيل ولا نشعر؟ فقال: "إنهم منهم". فجعله من حديث ابن عباس، وإسناده ضعيف.
6767 [3] - ضبطه ابن ماكولا في "الإكمال" 7/ 93 بالضم، وتبعه أصحابُ كتب "المشتبه"، وقال ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 19/ 228، وابن ناصر الدين الدمشقي في "توضيح المشتبه" 7/ 162 - 163: قيده أبو عبد الله الصوري بخطِّه وغيرُه بفتح القاف. وقال الحافظ ابن حجر في ترجمته من "الإصابة": والمشهور فتح أوله، وقيل: بالضم. وفي "القاموس": قباث كسَحَاب، وكذا ضبطه الصاغاني. رواه الناس، ولا يعرف لابن أبي أويس رواية عن الزبير بن موسى، والذي يظهر أنه لا يدركه فبين وفاتيهما قرابة مئة سنة حسب ما ذكر الذهبي في ترجمتيهما من "تاريخ الإسلام"، فالظاهر أنه سقط من رواية الحاكم عبدُ العزيز بن أبي ثابت بين إسماعيلَ والزُّبير، فرجع الحديث إلى عبد العزيز بن أبي ثابت، وهو واهي الحديث، وسلف الحديث من طريقه عند الحاكم برقم (4258)، وذكرنا هناك من أخرجه. وإسماعيل بن أبي أويس فيه لينٌ، والزبير بن موسى روى عنه جمعٌ، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وأبو الحويرث -وهو عبد الرحمن بن معاوية بن الحويرث الزرقي- سيئ الحفظ.وأخرجه الطبراني 19 / (75) -وعنه أبو نعيم في "دلائل النبوة" (84) - عن العباس الأسفاطي نفسه، فرواه كما رواه الناس عن إبراهيم بن المنذر الحزامي، عن عبد العزيز بن أبي ثابت، به.وأخرج أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5790)، وابن عساكر 49/ 229 من طريق زكريا بن يحيى الكسائي، عن محمد بن فضيل، عن عبد الله بن سعيد بن أبي سعيد، عن جده، قال: دخل قباث بن أشيم أخو بني الملوَّح على مروان بن الحكم، وقباث يومئذ أكبر العرب، فقال له مروان: أنت أكبر أو رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ فقال: رسول الله صلى الله عليه وسلم أكبر مني، وأنا أقدم منه بعشرين سنة، قال: فما أبعدُ ذكرك؟ قال: أذكر خَثَى الفيل. قلنا: إسناده تالف، زكريا الكسائي وعبد الله بن سعيد متروكا الحديث.وأخرج الترمذي (3619): أنَّ الذي سأل قباث عن ذلك هو عثمانُ بن عفان، وإسناده أصحُّ من حديث أبي الحويرث هذا. وانظر حديث ابن عبّاس السالف (4225).
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6768 - أخبرنا يحيى بن منصور القاضي، حدثنا أبو بكر بن رجاء، حدثنا إبراهيم بن المنذر الحِزامي، حدثنا عمر بن أبي بكر المَوصلي، عن زكريا بن عيسى الشَّغْبي، عن ابن شِهاب قال: قَبَاث بن أشيَم بن عامر بن المُلوَّح بن يَعْمَر بن عوف ابن كعب بن عامر بن ليث الضِّبابي.
ইবনু শিহাব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কাবাছ ইবনু আশইয়াম ইবনু আমির ইবনু মুলওয়াহ ইবনু ইয়া’মার ইবনু আউফ ইবনু কা'ব ইবনু আমির ইবনু লাইছ আদ্-দ্বিবাবী।
6769 - حدثنا علي بن حَمْشاذ العَدْل، حدثنا العبّاس بن الفضل الأسفاطي، حدثنا إسماعيل بن أبي أُوَيس، حدثني الزبير بن موسى، عن أبي الحُوَيرث، قال: سمعتُ عبد الملك بن مروان يقول للقَباث بن أشيَم: يا قَبَاثُ، أنت أكبرُ أم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم؟ فقال: رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أكبرُ منِّي وأنا أسنُّ منه؟ وُلِد رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عامَ الفِيل، وتنبَّأ على رأس الأربعينَ من الفيل [1].
কাবাথ ইবনে আশয়াম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (আবূ হুয়াইরিস বলেন,) আমি আব্দুল মালিক ইবনে মারওয়ানকে কাবাথ ইবনে আশয়ামের কাছে জিজ্ঞাসা করতে শুনেছি: "হে কাবাথ! আপনি বড় নাকি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বড়?" তিনি উত্তরে বললেন: "আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার চেয়ে মহান, কিন্তু আমি তাঁর চেয়ে বয়োজ্যেষ্ঠ (বয়সে পুরোনো)। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হস্তীর বছরে (আমুল ফিল) জন্মগ্রহণ করেন এবং হস্তীর বছর থেকে চল্লিশ বছর পূর্ণ হওয়ার পর তিনি নবুওয়াত লাভ করেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف؛ كذا وقع في "المستدرك": إسماعيل بن أبي أويس عن الزبير بن موسى، والمعروف أنه من رواية عبد العزيز بن أبي ثابت عن الزبير بن موسى، كما رواه الناس، ولا يعرف لابن أبي أويس رواية عن الزبير بن موسى، والذي يظهر أنه لا يدركه فبين وفاتيهما قرابة مئة سنة حسب ما ذكر الذهبي في ترجمتيهما من "تاريخ الإسلام"، فالظاهر أنه سقط من رواية الحاكم عبدُ العزيز بن أبي ثابت بين إسماعيلَ والزُّبير، فرجع الحديث إلى عبد العزيز بن أبي ثابت، وهو واهي الحديث، وسلف الحديث من طريقه عند الحاكم برقم (4258)، وذكرنا هناك من أخرجه. وإسماعيل بن أبي أويس فيه لينٌ، والزبير بن موسى روى عنه جمعٌ، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وأبو الحويرث -وهو عبد الرحمن بن معاوية بن الحويرث الزرقي- سيئ الحفظ.وأخرجه الطبراني 19 / (75) -وعنه أبو نعيم في "دلائل النبوة" (84) - عن العباس الأسفاطي نفسه، فرواه كما رواه الناس عن إبراهيم بن المنذر الحزامي، عن عبد العزيز بن أبي ثابت، به.وأخرج أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5790)، وابن عساكر 49/ 229 من طريق زكريا بن يحيى الكسائي، عن محمد بن فضيل، عن عبد الله بن سعيد بن أبي سعيد، عن جده، قال: دخل قباث بن أشيم أخو بني الملوَّح على مروان بن الحكم، وقباث يومئذ أكبر العرب، فقال له مروان: أنت أكبر أو رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ فقال: رسول الله صلى الله عليه وسلم أكبر مني، وأنا أقدم منه بعشرين سنة، قال: فما أبعدُ ذكرك؟ قال: أذكر خَثَى الفيل. قلنا: إسناده تالف، زكريا الكسائي وعبد الله بن سعيد متروكا الحديث.وأخرج الترمذي (3619): أنَّ الذي سأل قباث عن ذلك هو عثمانُ بن عفان، وإسناده أصحُّ من حديث أبي الحويرث هذا. وانظر حديث ابن عبّاس السالف (4225).
6770 - أخبرنا أبو جعفر البغدادي، حدثنا عمرو بن إسحاق بن إبراهيم بن زِبْرِيق [1]، حدثنا أصبَغ بن عبد العزيز، حدثني أبي عبد العزيز بن أصبَغ بن أبان بن سليمان، عن جدِّه أبان، عن أبيه سليمان قال: كان إسلامُ قَبَاث بن أَشيَم أنَّ رجالًا من قومِه وغيرَهم من العرب أتَوْه، فقالوا: إنَّ محمدَ بن عبد الله بن عبد المطلب قد خرَجَ يدعو إلى دينٍ غير دينِنا، فقام قَباثٌ حتى أتى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فلمَّا دخل عليه قال له: "اجلِسْ يا قَباثُ" فأوجَمَ قَباثٌ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أنت القائل: لو خرجَتْ نساءُ قريش ردَّتْ محمدًا وأصحابَه؟ " قال: قَباثُ: والذي بعثك بالحقِّ، ما تحدَّثَ به لساني، ولا تَزمزمَتْ به شفتاي، ولا سَمِعَه منِّي أحدٌ، وما هو إلَّا شيءٌ هَجَسَ في نفسي، أشهدُ أن لا إله إلَّا الله وحدَه لا شريكَ له، وأشهدُ أنَّك عبدُه ورسولُه، وأنَّ ما جئتَ به الحقُّ [2].
কাবাছ ইবনে আশয়াম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কাবাছ ইবনে আশয়ামের ইসলাম গ্রহণের ঘটনাটি এমন ছিল যে, তাঁর গোত্রের এবং অন্যান্য আরবের কিছু লোক তাঁর কাছে এসে বলল: নিশ্চয়ই মুহাম্মাদ ইবনে আবদুল্লাহ ইবনে আবদুল মুত্তালিব আমাদের ধর্ম ছাড়া অন্য একটি ধর্মের দিকে আহ্বান করতে বেরিয়েছেন। অতঃপর কাবাছ উঠে দাঁড়িয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট আসলেন। যখন তিনি তাঁর কাছে প্রবেশ করলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "বসো, হে কাবাছ!" তখন কাবাছ নীরব হয়ে গেলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি সেই ব্যক্তি, যে বলেছিলে: যদি কুরাইশের নারীরা বেরিয়ে আসতো, তবে তারা মুহাম্মাদ ও তাঁর সঙ্গীদের ফিরিয়ে দিতো?" কাবাছ বললেন: যিনি আপনাকে সত্য সহকারে প্রেরণ করেছেন, তাঁর কসম! আমার জিহ্বা তা উচ্চারণ করেনি, আমার ঠোঁট তা ফিসফিস করেনি, আর কেউ আমার কাছ থেকে তা শোনেনি। এটি কেবল একটি বিষয় যা আমার মনে উদিত হয়েছিল। আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, তিনি এক, তাঁর কোনো শরীক নেই, এবং আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আপনি তাঁর বান্দা ও রাসূল, আর আপনি যা নিয়ে এসেছেন তা সত্য।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في (م) و (ص) إلى: رزيق.
[2] إسناده ضعيف مسلسل بالمجاهيل، عمرو بن إسحاق بن زبريق لم نقف له على ترجمة لكن روى عنه ثلاثة، منهم الطبراني وقد أكثر عنه الرواية في كتبه، وأصبغ بن عبد العزيز بن أصبغ كذا سماه الحاكم، وسماه ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 2/ 321: عبد العزيز بن مروان بن أبان بن سليمان بن مالك الليثي، وقال: سألت أبي عنه، فقال: هو مجهول. قلنا: ولم نعرف أباه ولا جده أيضًا، وقال الهيثمي في "المجمع" 8/ 287 بعد أن عزاه للطبراني: وفيه من لم أعرفهم.وأخرجه الطبراني في "المعجم الكبير" 19/ (72)، وفي "الأوسط" (4909) -ومن طريقه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5789)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 49/ 232 - 233 - وابن عساكر أيضًا من طريق محمد بن عمرو بن إسحاق، كلاهما عن عمرو بن إسحاق، بهذا الإسناد. وقال الطبراني: لا يروى هذا الحديث عن قباث بن أشيم إلا بهذا الإسناد، تفرد به أصبغ بن عبد العزيز الحمصي.وأخرج نحوه ابن عساكر 49/ 232 من طريق سهل بن عمار، عن عمر بن عبد الله بن رزين، عن سفيان بن حسين، عن خالد بن دريك، عن قباث. وسهل متهم بالكذب، فلا يفرح به.قوله: "ولا تزمزمت به شفتاي" الزمزمة: صوت خفيّ لا يكاد يُفهم. قاله ابن الأثير في "النهاية في غريب الحديث" 2/ 313. ضعف -متابعان وعبد الرحمن بن زياد- وقيل: عامر بن زياد -ترجمه البخاري في "الكبير" 5/ 282، وابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 5/ 234، ولم يذكرا فيه جرحًا ولا تعديلًا، ولم نقف على أحد روى عنه غير يونس بن سيف، وأورده ابن حبان في "الثقات" 5/ 83.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 19/ (73)، وفي "مسند الشاميين" (2011) عن بكر بن سهل الدمياطي، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 5/ 282 عن عبد الله بن صالح، به.وأخرجه ابن سعد 9/ 414، والبخاري في "التاريخ الكبير" 5/ 282 و 7/ 192، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (926)، والبزار (461 - كشف الأستار)، والطبراني في "الكبير" 19/ (74)، وفي "مسند الشاميين" (487) و (488)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5791)، والبيهقي 3/ 61، والخطيب في "المتفق والمفترق" (908) من طرق عن ثور بن يزيد الرَّحَبي، عن يونس بن سيف الكَلاعي، به.ورواه الحميدي عند ابن قانع في "معرفة الصحابة" 2/ 364، والبيهقي 3/ 61، وإبراهيم بن إسحاق الطالقاني عند البيهقي 3/ 61، كلاهما عن الوليد بن مسلم، عن ثور، عن يونس، عن قباث، فأسقطا منه عبد الرحمن بن زياد، وقد خالفا الناس.وخالف محمدُ بن الوليد الزبيدي معاويةَ بن صالح وثورًا عند البخاري 5/ 282، وابن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 364، والطبراني في "مسند الشاميين" (1867)، فرواه عن يونس بن سيف، عن عامر بن زياد، عن قباث. فسمَّى عبدَ الرحمن عامرًا، ووقع في "مسند الشاميين": عبد الرحمن، فكأنَّ أحدهم رسمه على الصواب. فقد قال ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 7/ 143: سمعت محمد بن عوف الحمصي يقول: كل من روى عن يونس بن سيف فإنه يقول: عن عبد الرحمن بن زياد عن قباث، إلَّا محمد بن الوليد الزبيدي، فإنه يقول: عن عامر بن زياد عن قباث.ويشهد له حديث أبي بن كعب السالف برقم (823)، وسنده حسن.تترى: أي: متفرّقين.
6771 - حدثنا أبو إسحاق إبراهيم بن فِراس الفقيه بمكة حرسها الله، حدثنا بكر بن سهل الدِّمياطي، حدثنا عبد الله بن صالح، حدثني معاوية بن صالح، عن يونس ابن سيف، عن عبد الرحمن بن زياد، عن قَبَاث بن أشيَم اللَّيثي، عن رسولِ الله صلى الله عليه وسلم قال: "صلاةُ الرجلين يؤمُّ أحدُهما صاحبَه، أزكى عند الله من صلاةِ أربعةٍ تَتْرَى، وصلاةُ أربعةٍ يؤمُّ أحدُهم أصحابَه، أزكى عند الله من صلاةِ ثمانية تَتْرَى، وصلاةُ ثمانيةٍ يؤمُّ أحدُهم أصحابَه [1]، أزكى عند الله من صلاةِ مئةٍ تَتْرَى" [2]. ذكرُ عُمير بن قَتَادة اللَّيثي رضي الله عنه-
কাবাছ ইবনু আশইয়াম আল-লাইসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দুই ব্যক্তির সালাত, যাদের একজন অন্যজনের ইমামতি করে, তা আল্লাহর কাছে চার ব্যক্তির বিচ্ছিন্নভাবে (একা একা) আদায় করা সালাতের চেয়ে অধিক পবিত্র (উত্তম)। আর চার ব্যক্তির সালাত, যাদের একজন অন্যদের ইমামতি করে, তা আল্লাহর কাছে আট ব্যক্তির বিচ্ছিন্নভাবে আদায় করা সালাতের চেয়ে অধিক পবিত্র (উত্তম)। আর আট ব্যক্তির সালাত, যাদের একজন অন্যদের ইমামতি করে, তা আল্লাহর কাছে একশো ব্যক্তির বিচ্ছিন্নভাবে আদায় করা সালাতের চেয়ে অধিক পবিত্র (উত্তম)।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] المثبت من نسخة المحمودية كما في طبعة الميمان، وفي (م): أحدهما صاحبه، وفي (ص): أحدهما صاحبهم. ضعف -متابعان وعبد الرحمن بن زياد- وقيل: عامر بن زياد -ترجمه البخاري في "الكبير" 5/ 282، وابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 5/ 234، ولم يذكرا فيه جرحًا ولا تعديلًا، ولم نقف على أحد روى عنه غير يونس بن سيف، وأورده ابن حبان في "الثقات" 5/ 83.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 19/ (73)، وفي "مسند الشاميين" (2011) عن بكر بن سهل الدمياطي، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 5/ 282 عن عبد الله بن صالح، به.وأخرجه ابن سعد 9/ 414، والبخاري في "التاريخ الكبير" 5/ 282 و 7/ 192، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (926)، والبزار (461 - كشف الأستار)، والطبراني في "الكبير" 19/ (74)، وفي "مسند الشاميين" (487) و (488)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5791)، والبيهقي 3/ 61، والخطيب في "المتفق والمفترق" (908) من طرق عن ثور بن يزيد الرَّحَبي، عن يونس بن سيف الكَلاعي، به.ورواه الحميدي عند ابن قانع في "معرفة الصحابة" 2/ 364، والبيهقي 3/ 61، وإبراهيم بن إسحاق الطالقاني عند البيهقي 3/ 61، كلاهما عن الوليد بن مسلم، عن ثور، عن يونس، عن قباث، فأسقطا منه عبد الرحمن بن زياد، وقد خالفا الناس.وخالف محمدُ بن الوليد الزبيدي معاويةَ بن صالح وثورًا عند البخاري 5/ 282، وابن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 364، والطبراني في "مسند الشاميين" (1867)، فرواه عن يونس بن سيف، عن عامر بن زياد، عن قباث. فسمَّى عبدَ الرحمن عامرًا، ووقع في "مسند الشاميين": عبد الرحمن، فكأنَّ أحدهم رسمه على الصواب. فقد قال ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 7/ 143: سمعت محمد بن عوف الحمصي يقول: كل من روى عن يونس بن سيف فإنه يقول: عن عبد الرحمن بن زياد عن قباث، إلَّا محمد بن الوليد الزبيدي، فإنه يقول: عن عامر بن زياد عن قباث.ويشهد له حديث أبي بن كعب السالف برقم (823)، وسنده حسن.تترى: أي: متفرّقين.
[2] محتمل للتحسين لغيره، بكر بن سهل الدمياطي وعبد الله بن صالح - وإن كان فيهما ضعف -متابعان وعبد الرحمن بن زياد- وقيل: عامر بن زياد -ترجمه البخاري في "الكبير" 5/ 282، وابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 5/ 234، ولم يذكرا فيه جرحًا ولا تعديلًا، ولم نقف على أحد روى عنه غير يونس بن سيف، وأورده ابن حبان في "الثقات" 5/ 83.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 19/ (73)، وفي "مسند الشاميين" (2011) عن بكر بن سهل الدمياطي، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 5/ 282 عن عبد الله بن صالح، به.وأخرجه ابن سعد 9/ 414، والبخاري في "التاريخ الكبير" 5/ 282 و 7/ 192، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (926)، والبزار (461 - كشف الأستار)، والطبراني في "الكبير" 19/ (74)، وفي "مسند الشاميين" (487) و (488)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5791)، والبيهقي 3/ 61، والخطيب في "المتفق والمفترق" (908) من طرق عن ثور بن يزيد الرَّحَبي، عن يونس بن سيف الكَلاعي، به.ورواه الحميدي عند ابن قانع في "معرفة الصحابة" 2/ 364، والبيهقي 3/ 61، وإبراهيم بن إسحاق الطالقاني عند البيهقي 3/ 61، كلاهما عن الوليد بن مسلم، عن ثور، عن يونس، عن قباث، فأسقطا منه عبد الرحمن بن زياد، وقد خالفا الناس.وخالف محمدُ بن الوليد الزبيدي معاويةَ بن صالح وثورًا عند البخاري 5/ 282، وابن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 364، والطبراني في "مسند الشاميين" (1867)، فرواه عن يونس بن سيف، عن عامر بن زياد، عن قباث. فسمَّى عبدَ الرحمن عامرًا، ووقع في "مسند الشاميين": عبد الرحمن، فكأنَّ أحدهم رسمه على الصواب. فقد قال ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 7/ 143: سمعت محمد بن عوف الحمصي يقول: كل من روى عن يونس بن سيف فإنه يقول: عن عبد الرحمن بن زياد عن قباث، إلَّا محمد بن الوليد الزبيدي، فإنه يقول: عن عامر بن زياد عن قباث.ويشهد له حديث أبي بن كعب السالف برقم (823)، وسنده حسن.تترى: أي: متفرّقين.
6772 - Null
6772 - أخبرني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حدثنا مُصعب بن عبد الله الزُّبيري قال: عُميرُ بن قَتَادة بن سعد بن عامر ابن لَيث.
৬৭৭২ - আবূ বকর মুহাম্মাদ ইবনু আহমাদ ইবনু বালায়ওয়াইহি আমাকে খবর দিয়েছেন, তিনি বলেন, আমাদের কাছে ইবরাহীম ইবনু ইসহাক আল-হারবী হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, মুসআব ইবনু আব্দুল্লাহ আয-যুবাইরী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উমায়র ইবনু কাতাদাহ ইবনু সা‘দ ইবনু ‘আমির ইবনু লাইস।
6773 - أخبرنا أبو جعفر البغدادي، حدثنا أبو عُلَاثة، حدثني أبي، حدثنا محمد ابن سَلَمةَ الحَرَّاني، عن بكر بن خُنيس [1] [عن أبي بَدر] [2] عن عبد الله بن عُبيد بن عُمير، عن أبيه، عن جدِّه قال: كانت في نفسي مسألةٌ قد أحزنَني أنِّي لم أسألْ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم عنها، ولم أسمع أحدًا يسألُه عنها، فكنتُ أتحيَّنُه، فدخلتُ عليه ذاتَ يوم وهو يتوضأ، فوافقتُه على حالتين كنتُ أحبُّ أن أوافقَه عليهما، وجدتُه فارغًا طيِّبَ النفس، فقلتُ: يا رسول الله، ائذَنْ لي فأسألَكَ؟ قال: "نعم، سَلْ عَمَّا بَدَا لك"، قلتُ: يا رسول الله، ما الإيمان؟ قال: "السماحةُ والصبرُ"، قلتُ: فأيُّ المؤمنين أفضلُ إيمانًا؟ قال: "أحسنهم خُلقًا"، قلتُ: فأيُّ المسلمين أفضلُ إسلامًا؟ قال: "من سَلِمَ المسلمون من لسانِه ويدِه"، قلتُ: فأيُّ الجهاد أفضلُ؟ فطأطأ رأسَه، فصمتَ طويلًا حتى خفتُ أن أكونَ قد شققتُ عليه، وتمنَّيتُ أن لم أكن سألتُه، وقد سمعتُه بالأمس يقول: "إنَّ أعظمَ المسلمين في المسلمين جُرمًا لَمَن سألَ عن شيءٍ لم يُحرَّمْ عليهم [3]، فحُرِّمَ عليهم من أجلِ مسألتِه"، فقلتُ: أعوذُ بالله من غضبِ الله وغضبِ رسولِه، فرفع رأسَه، فقال: "كيف قلتَ؟ " قلتُ: أيُّ الجهاد أفضلُ؟ فقال: "كلمةُ عدلٍ عندَ إمامٍ جائرٍ" [4]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . أبو بَدْرٍ [5] الراوي عن عبد الله بن عبيد بن عمير اسمُه بشّار بنُ الحَكَم، شيخٌ من البصرة، قد روى عن ثابت البُناني غيرَ حديث. ذكرُ شدَّاد بن الهادِ اللَّيثي رضي الله عنه-
শাদ্দাদ ইবনুল হাদি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার মনে একটি প্রশ্ন ছিল, যা আমাকে কষ্ট দিচ্ছিল যে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এ বিষয়ে জিজ্ঞাসা করিনি এবং অন্য কাউকেও তাঁকে এই বিষয়ে জিজ্ঞাসা করতে শুনিনি। তাই আমি সুযোগ খুঁজতে লাগলাম। একদিন আমি তাঁর কাছে প্রবেশ করলাম যখন তিনি ওযু করছিলেন। আমি তাঁকে এমন দুটি অবস্থায় পেলাম যা আমি পছন্দ করতাম – আমি দেখলাম তিনি কর্মহীন ও প্রফুল্লচিত্ত আছেন।
আমি বললাম, ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমাকে অনুমতি দিন, আমি আপনাকে প্রশ্ন করি? তিনি বললেন, "হ্যাঁ, তোমার যা মনে আসে প্রশ্ন করো।" আমি বললাম, ইয়া রাসূলুল্লাহ! ঈমান কী? তিনি বললেন, "সহজতা (উদারতা) এবং ধৈর্য।"
আমি বললাম, তবে ঈমানের দিক থেকে কোন মুমিনগণ উত্তম? তিনি বললেন, "তাদের মধ্যে যারা চরিত্রে সবচেয়ে সুন্দর।"
আমি বললাম, তবে ইসলামের দিক থেকে কোন মুসলিমগণ উত্তম? তিনি বললেন, "যার জিহ্বা ও হাত থেকে মুসলিমরা নিরাপদ থাকে।"
আমি বললাম, তবে কোন জিহাদ উত্তম? তিনি মাথা নীচু করলেন এবং দীর্ঘ সময় নীরব থাকলেন, এমনকি আমি ভয় পেলাম যে আমি হয়তো তাঁকে কষ্ট দিয়ে ফেলেছি, আর আমি কামনা করলাম, যদি আমি এই প্রশ্নটি না করতাম! কারণ আমি গতদিন তাঁকে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয় মুসলিমদের মধ্যে সে-ই সবচেয়ে বড় অপরাধী, যে এমন কিছু সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করে যা তাদের উপর হারাম করা হয়নি, কিন্তু তার প্রশ্নের কারণে তা তাদের উপর হারাম করে দেওয়া হয়।"
তখন আমি বললাম, আমি আল্লাহর ক্রোধ এবং তাঁর রাসূলের ক্রোধ থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই। এরপর তিনি মাথা তুললেন এবং বললেন, "তুমি কী বলেছিলে?" আমি বললাম, কোন জিহাদ উত্তম? তিনি বললেন, "জালিম শাসকের সামনে ন্যায়সঙ্গত কথা বলা।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في (م) إلى: حنش، وفي (ص) إلى: حنيش. الكبير" 17 / (105) -وعنه أبو نعيم في "الحلية" 3/ 357 - من طريق عمرو بن خالد الحراني، عن بكير بن خنيس، عن أبي بدر، عن عبد الله بن عبيد بن عمير، به. وقال أبو نعيم عقبه: غريب من حديث عبد الله بن عبيد بن عمير، لم نكتبه بهذا التمام إلَّا من هذا الوجه، وقال سليمان (يعني الطبراني): وأبو بدر هو عندي بشار بن الحكم البصري، صاحب ثابت البناني.وأخرجه مطولًا ومختصرًا البخاري في "التاريخ الكبير" 5/ 25، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (911)، ومحمد بن نصر المروزي في "تعظيم الصلاة" (645) و (663) و (882)، وأبو يعلى في "معجمه" (129)، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" (16)، وابن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 229، والفاكهي في "الفوائد" (198)، والطبراني في "الكبير" 17/ (103)، وفي "الأوسط" (8123)، وأبو القاسم بن بشران في "الأمالي" (601)، وأبو نعيم في "الحلية" 3/ 357، وفي "معرفة الصحابة" (5262)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (9262)، وقوام السنة في "الترغيب والترهيب" (20) من طرق عن سويد أبي حاتم، عن عبد الله بن عبيد بن عمير، عن أبيه، عن جده. وفي رواية المروزي والفاكهي وابن بشران لما سأله عن أفضل الجهاد، قال: "من أُهريق دمه وعُقر جواده"، وعند بعضهم زيادات على ما في رواية الحاكم.وقال أبو نعيم عقبه: هذا حديث تفرَّد به سويد موصولًا عن عبد الله، ورواه صالح بن كيسان عن الزهري عن عبد الله عن أبيه، من دون جده. قلنا: وسويد -وهو ابن إبراهيم الجحدري الحناط- ضعيف.ورواية صالح بن كيسان أخرجها البخاري في "التاريخ" 5/ 25، وابن نصر المروزي (643) من طريقين عن يعقوب بن إبراهيم بن سعد، عن أبيه، عن صالح، عن ابن شِهاب، عن عبد الله ابن عبيد بن عمير، عن أبيه عبيد بن عمير: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قيل له: ما الإسلام؟ قال: "إطعام الطعام وطيب الكلام" قيل: فما الإيمان؟ قال: "السماحة والصبر" قيل: فمن أفضل المسلمين إسلامًا؟ قال: "من سلم المسلمون من لسانه ويده" قيل: فمن أفضل المؤمنين إيمانًا؟ قال: "أحسنهم خلقا"، قيل: فما أفضل الهجرة؟ قال: من هجر ما حرم الله عليه. ورجاله ثقات لكنه مرسل.ورواه مرسلًا كذلك عبد الرزاق (4844)، وسعيد بن منصور (2557) مختصرًا عن ابن عيينة، عن عمرو بن دينار قال: سمعت عبيد بن عمير يحدث قال: قيل: أي الجهاد أفضل؟ قال: "من عقر جواده وأهريق دمه" قيل: فأي الصلوات أفضل؟ قال: "طول القنوت" قيل: فأي الصدقة أفضل؟ قال: "جهد المقُل" قيل: فأي الهجرة أفضل؟ قال: "من هجر ما نهاه الله عنه ورسولُه" قيل: فأي الناس أحكم؟ قال: "الذي يحكم للناس كما يحكم لنفسه" قيل: فأي الناس أعلم؟ قال: "الذي يجمع علمَ الناس إلى علمه". قال: لا أعلم عبيدًا إلَّا رفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم. ورجاله ثقات أيضًا.ورواه عثمان بن أبي سليمان عند أحمد 24/ (15401)، وأبي داود (1449)، والنسائي (2317) عن علي بن عبد الله الأزدي، عن عبيد بن عمير، عن عبد الله بن حُبشي: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم سئل: أي الأعمال أفضل؟ قال: "إيمان لا شك فيه، وجهاد لا غُلول فيه، وحجة مبرورة" قيل: فأيُّ الصلاة أفضل؟ قال: "طول القنوت" قيل: فأي الصدقة أفضل؟ قال: "جهد المقلِّ" قيل: فأي الهجرة أفضل؟ قال: "من هجر ما حرم الله عليه" قيل: فأي الجهاد أفضل؟ قال: "من جاهد المشركين بماله ونفسه" قيل: فأي القتل أشرف؟ قال: "من أهريق دمه، وعقر جواده" فجعله من حديث عبد الله بن حبشي، ورجاله لا بأس بهم.ورواه جرير بن حازم عند ابن المبارك في "الجهاد" (51) قال: حدثني عبد الله بن عبيد بن عمير قال: قيل يا رسول الله: أي الجهاد أفضل؟ قال: "من عقر جواده وأهريق دمه"، فأعضله.ورواه عمران بن حدير كما في "التاريخ الكبير" للبخاري 5/ 143، و"علل الحديث" لابن أبي حاتم (1941) عن بديل بن ميسرة، عن عبد الله بن عبيد الليثي، عن أبيه -قال بديل: ولم يسمعه من أبيه- قال النبي صلى الله عليه وسلم: "الإسلام طِيب الكلام". قلنا: سماعُ عبد الله بن عبيد من أبيه ثبَّته البخاري، لكن ربما هذا الحديث بعينه لم يسمعه من أبيه.قال أبو حاتم الرازي: قد صحَّ الحديث عن عبيد بن عمير عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا، واختلفوا فيمن فوق عبيد بن عمير، وقصر قوم مثل جرير بن حازم وغيره؛ فقالوا: عن عبد الله بن عبيد ابن عمير، عن النبي صلى الله عليه وسلم لا يقولون: عبيد، وحديث عمران بن حدير أشبه؛ لأنه بيَّن عورته. فسأله ابنه: فحديث الزهري هذا؟ قال: أخاف ألا يكون محفوظًا، أخاف أن يكون: صالح بن كيسان عن عبد الله بن عبيد نفسه؛ بلا زهري.وفي باب "الإيمانُ السماحةُ والصبر" عن عمرو بن عبسة عند أحمد 32/ (19435)، وعن عبادة ابن الصامت عنده أيضًا 37 / (22717)، وعن جابر عند ابن أبي شيبة 11/ 33، وأبي يعلى (1854)، ولا يخلو كل منها من مقال، لكن تتقوى بمجموع طرقها.وفي باب أفضل المؤمنين أحسنهم خلقًا عن أبي هريرة سلف عند المصنف برقم (1).وفي باب المسلم من سلم المسلمون من لسانه ويده عن أبي هريرة وجابر وفضالة بن عبيد وبلال بن الحارث، سلفت أحاديثهم عند المصنف على التوالي بالأرقام (22) و (23) و (24) و (6325).وفي باب أفضل الجهاد كلمة عدل عند إمام جائر عن طارق بن شِهاب عند أحمد 31 (18828) و (18830)، والنسائي (7786).وعن أبي أمامة عند أحمد 36/ (22158)، وابن ماجه (4012).وعن أبي سعيد الخدري عند أبي داود (4344)، وابن ماجه (4011)، والترمذي (2174)، وسيأتي عند المصنف برقم (8754) من طريق آخر.وانظر حديث جابر السالف برقم (4945).ويشهد لقوله: "أعظم المسلمين جرمًا … إلخ" حديث سعد بن أبي وقاص عند البخاري (7289)، ومسلم (2358).
[2] ما بين المعقوفين سقط من النسخ الخطية، وسيشير الحاكم إلى وجوده في الإسناد عقب الحديث، وسمَّاه بشارَ بن الحكم، وكذا هو موجود في مصادر التخريج. الكبير" 17 / (105) -وعنه أبو نعيم في "الحلية" 3/ 357 - من طريق عمرو بن خالد الحراني، عن بكير بن خنيس، عن أبي بدر، عن عبد الله بن عبيد بن عمير، به. وقال أبو نعيم عقبه: غريب من حديث عبد الله بن عبيد بن عمير، لم نكتبه بهذا التمام إلَّا من هذا الوجه، وقال سليمان (يعني الطبراني): وأبو بدر هو عندي بشار بن الحكم البصري، صاحب ثابت البناني.وأخرجه مطولًا ومختصرًا البخاري في "التاريخ الكبير" 5/ 25، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (911)، ومحمد بن نصر المروزي في "تعظيم الصلاة" (645) و (663) و (882)، وأبو يعلى في "معجمه" (129)، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" (16)، وابن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 229، والفاكهي في "الفوائد" (198)، والطبراني في "الكبير" 17/ (103)، وفي "الأوسط" (8123)، وأبو القاسم بن بشران في "الأمالي" (601)، وأبو نعيم في "الحلية" 3/ 357، وفي "معرفة الصحابة" (5262)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (9262)، وقوام السنة في "الترغيب والترهيب" (20) من طرق عن سويد أبي حاتم، عن عبد الله بن عبيد بن عمير، عن أبيه، عن جده. وفي رواية المروزي والفاكهي وابن بشران لما سأله عن أفضل الجهاد، قال: "من أُهريق دمه وعُقر جواده"، وعند بعضهم زيادات على ما في رواية الحاكم.وقال أبو نعيم عقبه: هذا حديث تفرَّد به سويد موصولًا عن عبد الله، ورواه صالح بن كيسان عن الزهري عن عبد الله عن أبيه، من دون جده. قلنا: وسويد -وهو ابن إبراهيم الجحدري الحناط- ضعيف.ورواية صالح بن كيسان أخرجها البخاري في "التاريخ" 5/ 25، وابن نصر المروزي (643) من طريقين عن يعقوب بن إبراهيم بن سعد، عن أبيه، عن صالح، عن ابن شِهاب، عن عبد الله ابن عبيد بن عمير، عن أبيه عبيد بن عمير: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قيل له: ما الإسلام؟ قال: "إطعام الطعام وطيب الكلام" قيل: فما الإيمان؟ قال: "السماحة والصبر" قيل: فمن أفضل المسلمين إسلامًا؟ قال: "من سلم المسلمون من لسانه ويده" قيل: فمن أفضل المؤمنين إيمانًا؟ قال: "أحسنهم خلقا"، قيل: فما أفضل الهجرة؟ قال: من هجر ما حرم الله عليه. ورجاله ثقات لكنه مرسل.ورواه مرسلًا كذلك عبد الرزاق (4844)، وسعيد بن منصور (2557) مختصرًا عن ابن عيينة، عن عمرو بن دينار قال: سمعت عبيد بن عمير يحدث قال: قيل: أي الجهاد أفضل؟ قال: "من عقر جواده وأهريق دمه" قيل: فأي الصلوات أفضل؟ قال: "طول القنوت" قيل: فأي الصدقة أفضل؟ قال: "جهد المقُل" قيل: فأي الهجرة أفضل؟ قال: "من هجر ما نهاه الله عنه ورسولُه" قيل: فأي الناس أحكم؟ قال: "الذي يحكم للناس كما يحكم لنفسه" قيل: فأي الناس أعلم؟ قال: "الذي يجمع علمَ الناس إلى علمه". قال: لا أعلم عبيدًا إلَّا رفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم. ورجاله ثقات أيضًا.ورواه عثمان بن أبي سليمان عند أحمد 24/ (15401)، وأبي داود (1449)، والنسائي (2317) عن علي بن عبد الله الأزدي، عن عبيد بن عمير، عن عبد الله بن حُبشي: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم سئل: أي الأعمال أفضل؟ قال: "إيمان لا شك فيه، وجهاد لا غُلول فيه، وحجة مبرورة" قيل: فأيُّ الصلاة أفضل؟ قال: "طول القنوت" قيل: فأي الصدقة أفضل؟ قال: "جهد المقلِّ" قيل: فأي الهجرة أفضل؟ قال: "من هجر ما حرم الله عليه" قيل: فأي الجهاد أفضل؟ قال: "من جاهد المشركين بماله ونفسه" قيل: فأي القتل أشرف؟ قال: "من أهريق دمه، وعقر جواده" فجعله من حديث عبد الله بن حبشي، ورجاله لا بأس بهم.ورواه جرير بن حازم عند ابن المبارك في "الجهاد" (51) قال: حدثني عبد الله بن عبيد بن عمير قال: قيل يا رسول الله: أي الجهاد أفضل؟ قال: "من عقر جواده وأهريق دمه"، فأعضله.ورواه عمران بن حدير كما في "التاريخ الكبير" للبخاري 5/ 143، و"علل الحديث" لابن أبي حاتم (1941) عن بديل بن ميسرة، عن عبد الله بن عبيد الليثي، عن أبيه -قال بديل: ولم يسمعه من أبيه- قال النبي صلى الله عليه وسلم: "الإسلام طِيب الكلام". قلنا: سماعُ عبد الله بن عبيد من أبيه ثبَّته البخاري، لكن ربما هذا الحديث بعينه لم يسمعه من أبيه.قال أبو حاتم الرازي: قد صحَّ الحديث عن عبيد بن عمير عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا، واختلفوا فيمن فوق عبيد بن عمير، وقصر قوم مثل جرير بن حازم وغيره؛ فقالوا: عن عبد الله بن عبيد ابن عمير، عن النبي صلى الله عليه وسلم لا يقولون: عبيد، وحديث عمران بن حدير أشبه؛ لأنه بيَّن عورته. فسأله ابنه: فحديث الزهري هذا؟ قال: أخاف ألا يكون محفوظًا، أخاف أن يكون: صالح بن كيسان عن عبد الله بن عبيد نفسه؛ بلا زهري.وفي باب "الإيمانُ السماحةُ والصبر" عن عمرو بن عبسة عند أحمد 32/ (19435)، وعن عبادة ابن الصامت عنده أيضًا 37 / (22717)، وعن جابر عند ابن أبي شيبة 11/ 33، وأبي يعلى (1854)، ولا يخلو كل منها من مقال، لكن تتقوى بمجموع طرقها.وفي باب أفضل المؤمنين أحسنهم خلقًا عن أبي هريرة سلف عند المصنف برقم (1).وفي باب المسلم من سلم المسلمون من لسانه ويده عن أبي هريرة وجابر وفضالة بن عبيد وبلال بن الحارث، سلفت أحاديثهم عند المصنف على التوالي بالأرقام (22) و (23) و (24) و (6325).وفي باب أفضل الجهاد كلمة عدل عند إمام جائر عن طارق بن شِهاب عند أحمد 31 (18828) و (18830)، والنسائي (7786).وعن أبي أمامة عند أحمد 36/ (22158)، وابن ماجه (4012).وعن أبي سعيد الخدري عند أبي داود (4344)، وابن ماجه (4011)، والترمذي (2174)، وسيأتي عند المصنف برقم (8754) من طريق آخر.وانظر حديث جابر السالف برقم (4945).ويشهد لقوله: "أعظم المسلمين جرمًا … إلخ" حديث سعد بن أبي وقاص عند البخاري (7289)، ومسلم (2358).
6773 [3] - قوله: لم يحرم عليهم، سقط من (م) و (ص)، وأثبتناه من (ب). الكبير" 17 / (105) -وعنه أبو نعيم في "الحلية" 3/ 357 - من طريق عمرو بن خالد الحراني، عن بكير بن خنيس، عن أبي بدر، عن عبد الله بن عبيد بن عمير، به. وقال أبو نعيم عقبه: غريب من حديث عبد الله بن عبيد بن عمير، لم نكتبه بهذا التمام إلَّا من هذا الوجه، وقال سليمان (يعني الطبراني): وأبو بدر هو عندي بشار بن الحكم البصري، صاحب ثابت البناني.وأخرجه مطولًا ومختصرًا البخاري في "التاريخ الكبير" 5/ 25، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (911)، ومحمد بن نصر المروزي في "تعظيم الصلاة" (645) و (663) و (882)، وأبو يعلى في "معجمه" (129)، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" (16)، وابن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 229، والفاكهي في "الفوائد" (198)، والطبراني في "الكبير" 17/ (103)، وفي "الأوسط" (8123)، وأبو القاسم بن بشران في "الأمالي" (601)، وأبو نعيم في "الحلية" 3/ 357، وفي "معرفة الصحابة" (5262)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (9262)، وقوام السنة في "الترغيب والترهيب" (20) من طرق عن سويد أبي حاتم، عن عبد الله بن عبيد بن عمير، عن أبيه، عن جده. وفي رواية المروزي والفاكهي وابن بشران لما سأله عن أفضل الجهاد، قال: "من أُهريق دمه وعُقر جواده"، وعند بعضهم زيادات على ما في رواية الحاكم.وقال أبو نعيم عقبه: هذا حديث تفرَّد به سويد موصولًا عن عبد الله، ورواه صالح بن كيسان عن الزهري عن عبد الله عن أبيه، من دون جده. قلنا: وسويد -وهو ابن إبراهيم الجحدري الحناط- ضعيف.ورواية صالح بن كيسان أخرجها البخاري في "التاريخ" 5/ 25، وابن نصر المروزي (643) من طريقين عن يعقوب بن إبراهيم بن سعد، عن أبيه، عن صالح، عن ابن شِهاب، عن عبد الله ابن عبيد بن عمير، عن أبيه عبيد بن عمير: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قيل له: ما الإسلام؟ قال: "إطعام الطعام وطيب الكلام" قيل: فما الإيمان؟ قال: "السماحة والصبر" قيل: فمن أفضل المسلمين إسلامًا؟ قال: "من سلم المسلمون من لسانه ويده" قيل: فمن أفضل المؤمنين إيمانًا؟ قال: "أحسنهم خلقا"، قيل: فما أفضل الهجرة؟ قال: من هجر ما حرم الله عليه. ورجاله ثقات لكنه مرسل.ورواه مرسلًا كذلك عبد الرزاق (4844)، وسعيد بن منصور (2557) مختصرًا عن ابن عيينة، عن عمرو بن دينار قال: سمعت عبيد بن عمير يحدث قال: قيل: أي الجهاد أفضل؟ قال: "من عقر جواده وأهريق دمه" قيل: فأي الصلوات أفضل؟ قال: "طول القنوت" قيل: فأي الصدقة أفضل؟ قال: "جهد المقُل" قيل: فأي الهجرة أفضل؟ قال: "من هجر ما نهاه الله عنه ورسولُه" قيل: فأي الناس أحكم؟ قال: "الذي يحكم للناس كما يحكم لنفسه" قيل: فأي الناس أعلم؟ قال: "الذي يجمع علمَ الناس إلى علمه". قال: لا أعلم عبيدًا إلَّا رفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم. ورجاله ثقات أيضًا.ورواه عثمان بن أبي سليمان عند أحمد 24/ (15401)، وأبي داود (1449)، والنسائي (2317) عن علي بن عبد الله الأزدي، عن عبيد بن عمير، عن عبد الله بن حُبشي: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم سئل: أي الأعمال أفضل؟ قال: "إيمان لا شك فيه، وجهاد لا غُلول فيه، وحجة مبرورة" قيل: فأيُّ الصلاة أفضل؟ قال: "طول القنوت" قيل: فأي الصدقة أفضل؟ قال: "جهد المقلِّ" قيل: فأي الهجرة أفضل؟ قال: "من هجر ما حرم الله عليه" قيل: فأي الجهاد أفضل؟ قال: "من جاهد المشركين بماله ونفسه" قيل: فأي القتل أشرف؟ قال: "من أهريق دمه، وعقر جواده" فجعله من حديث عبد الله بن حبشي، ورجاله لا بأس بهم.ورواه جرير بن حازم عند ابن المبارك في "الجهاد" (51) قال: حدثني عبد الله بن عبيد بن عمير قال: قيل يا رسول الله: أي الجهاد أفضل؟ قال: "من عقر جواده وأهريق دمه"، فأعضله.ورواه عمران بن حدير كما في "التاريخ الكبير" للبخاري 5/ 143، و"علل الحديث" لابن أبي حاتم (1941) عن بديل بن ميسرة، عن عبد الله بن عبيد الليثي، عن أبيه -قال بديل: ولم يسمعه من أبيه- قال النبي صلى الله عليه وسلم: "الإسلام طِيب الكلام". قلنا: سماعُ عبد الله بن عبيد من أبيه ثبَّته البخاري، لكن ربما هذا الحديث بعينه لم يسمعه من أبيه.قال أبو حاتم الرازي: قد صحَّ الحديث عن عبيد بن عمير عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا، واختلفوا فيمن فوق عبيد بن عمير، وقصر قوم مثل جرير بن حازم وغيره؛ فقالوا: عن عبد الله بن عبيد ابن عمير، عن النبي صلى الله عليه وسلم لا يقولون: عبيد، وحديث عمران بن حدير أشبه؛ لأنه بيَّن عورته. فسأله ابنه: فحديث الزهري هذا؟ قال: أخاف ألا يكون محفوظًا، أخاف أن يكون: صالح بن كيسان عن عبد الله بن عبيد نفسه؛ بلا زهري.وفي باب "الإيمانُ السماحةُ والصبر" عن عمرو بن عبسة عند أحمد 32/ (19435)، وعن عبادة ابن الصامت عنده أيضًا 37 / (22717)، وعن جابر عند ابن أبي شيبة 11/ 33، وأبي يعلى (1854)، ولا يخلو كل منها من مقال، لكن تتقوى بمجموع طرقها.وفي باب أفضل المؤمنين أحسنهم خلقًا عن أبي هريرة سلف عند المصنف برقم (1).وفي باب المسلم من سلم المسلمون من لسانه ويده عن أبي هريرة وجابر وفضالة بن عبيد وبلال بن الحارث، سلفت أحاديثهم عند المصنف على التوالي بالأرقام (22) و (23) و (24) و (6325).وفي باب أفضل الجهاد كلمة عدل عند إمام جائر عن طارق بن شِهاب عند أحمد 31 (18828) و (18830)، والنسائي (7786).وعن أبي أمامة عند أحمد 36/ (22158)، وابن ماجه (4012).وعن أبي سعيد الخدري عند أبي داود (4344)، وابن ماجه (4011)، والترمذي (2174)، وسيأتي عند المصنف برقم (8754) من طريق آخر.وانظر حديث جابر السالف برقم (4945).ويشهد لقوله: "أعظم المسلمين جرمًا … إلخ" حديث سعد بن أبي وقاص عند البخاري (7289)، ومسلم (2358).
6773 [4] - صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف؛ بكر بن خنيس ضعيف، وأبو بدر -وهو بشار بن الحكم- قال أبو زرعة: منكر الحديث، وقال ابن حبان: ينفرد عن ثابت بأشياء ليست من حديثه، وقال ابن عدي: منكر الحديث عن ثابت البناني وغيره، ثم قال: يروي عن ثابت وغيره ممّا لا يرويه غيره، وأحاديثه عن ثابت أفرادات، وأرجو أنه لا بأس به. وقال الذهبي في "التلخيص": أورد له الحاكم حديثًا ضعيفًا.أبو علاثة: هو محمد بن عَمرو بن خالد الحَراني.وأخرجه مختصرًا البخاري في "التاريخ الكبير" 5/ 25 و 6/ 530، ومطولًا الطبراني في "المعجم الكبير" 17 / (105) -وعنه أبو نعيم في "الحلية" 3/ 357 - من طريق عمرو بن خالد الحراني، عن بكير بن خنيس، عن أبي بدر، عن عبد الله بن عبيد بن عمير، به. وقال أبو نعيم عقبه: غريب من حديث عبد الله بن عبيد بن عمير، لم نكتبه بهذا التمام إلَّا من هذا الوجه، وقال سليمان (يعني الطبراني): وأبو بدر هو عندي بشار بن الحكم البصري، صاحب ثابت البناني.وأخرجه مطولًا ومختصرًا البخاري في "التاريخ الكبير" 5/ 25، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (911)، ومحمد بن نصر المروزي في "تعظيم الصلاة" (645) و (663) و (882)، وأبو يعلى في "معجمه" (129)، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" (16)، وابن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 229، والفاكهي في "الفوائد" (198)، والطبراني في "الكبير" 17/ (103)، وفي "الأوسط" (8123)، وأبو القاسم بن بشران في "الأمالي" (601)، وأبو نعيم في "الحلية" 3/ 357، وفي "معرفة الصحابة" (5262)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (9262)، وقوام السنة في "الترغيب والترهيب" (20) من طرق عن سويد أبي حاتم، عن عبد الله بن عبيد بن عمير، عن أبيه، عن جده. وفي رواية المروزي والفاكهي وابن بشران لما سأله عن أفضل الجهاد، قال: "من أُهريق دمه وعُقر جواده"، وعند بعضهم زيادات على ما في رواية الحاكم.وقال أبو نعيم عقبه: هذا حديث تفرَّد به سويد موصولًا عن عبد الله، ورواه صالح بن كيسان عن الزهري عن عبد الله عن أبيه، من دون جده. قلنا: وسويد -وهو ابن إبراهيم الجحدري الحناط- ضعيف.ورواية صالح بن كيسان أخرجها البخاري في "التاريخ" 5/ 25، وابن نصر المروزي (643) من طريقين عن يعقوب بن إبراهيم بن سعد، عن أبيه، عن صالح، عن ابن شِهاب، عن عبد الله ابن عبيد بن عمير، عن أبيه عبيد بن عمير: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قيل له: ما الإسلام؟ قال: "إطعام الطعام وطيب الكلام" قيل: فما الإيمان؟ قال: "السماحة والصبر" قيل: فمن أفضل المسلمين إسلامًا؟ قال: "من سلم المسلمون من لسانه ويده" قيل: فمن أفضل المؤمنين إيمانًا؟ قال: "أحسنهم خلقا"، قيل: فما أفضل الهجرة؟ قال: من هجر ما حرم الله عليه. ورجاله ثقات لكنه مرسل.ورواه مرسلًا كذلك عبد الرزاق (4844)، وسعيد بن منصور (2557) مختصرًا عن ابن عيينة، عن عمرو بن دينار قال: سمعت عبيد بن عمير يحدث قال: قيل: أي الجهاد أفضل؟ قال: "من عقر جواده وأهريق دمه" قيل: فأي الصلوات أفضل؟ قال: "طول القنوت" قيل: فأي الصدقة أفضل؟ قال: "جهد المقُل" قيل: فأي الهجرة أفضل؟ قال: "من هجر ما نهاه الله عنه ورسولُه" قيل: فأي الناس أحكم؟ قال: "الذي يحكم للناس كما يحكم لنفسه" قيل: فأي الناس أعلم؟ قال: "الذي يجمع علمَ الناس إلى علمه". قال: لا أعلم عبيدًا إلَّا رفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم. ورجاله ثقات أيضًا.ورواه عثمان بن أبي سليمان عند أحمد 24/ (15401)، وأبي داود (1449)، والنسائي (2317) عن علي بن عبد الله الأزدي، عن عبيد بن عمير، عن عبد الله بن حُبشي: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم سئل: أي الأعمال أفضل؟ قال: "إيمان لا شك فيه، وجهاد لا غُلول فيه، وحجة مبرورة" قيل: فأيُّ الصلاة أفضل؟ قال: "طول القنوت" قيل: فأي الصدقة أفضل؟ قال: "جهد المقلِّ" قيل: فأي الهجرة أفضل؟ قال: "من هجر ما حرم الله عليه" قيل: فأي الجهاد أفضل؟ قال: "من جاهد المشركين بماله ونفسه" قيل: فأي القتل أشرف؟ قال: "من أهريق دمه، وعقر جواده" فجعله من حديث عبد الله بن حبشي، ورجاله لا بأس بهم.ورواه جرير بن حازم عند ابن المبارك في "الجهاد" (51) قال: حدثني عبد الله بن عبيد بن عمير قال: قيل يا رسول الله: أي الجهاد أفضل؟ قال: "من عقر جواده وأهريق دمه"، فأعضله.ورواه عمران بن حدير كما في "التاريخ الكبير" للبخاري 5/ 143، و"علل الحديث" لابن أبي حاتم (1941) عن بديل بن ميسرة، عن عبد الله بن عبيد الليثي، عن أبيه -قال بديل: ولم يسمعه من أبيه- قال النبي صلى الله عليه وسلم: "الإسلام طِيب الكلام". قلنا: سماعُ عبد الله بن عبيد من أبيه ثبَّته البخاري، لكن ربما هذا الحديث بعينه لم يسمعه من أبيه.قال أبو حاتم الرازي: قد صحَّ الحديث عن عبيد بن عمير عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا، واختلفوا فيمن فوق عبيد بن عمير، وقصر قوم مثل جرير بن حازم وغيره؛ فقالوا: عن عبد الله بن عبيد ابن عمير، عن النبي صلى الله عليه وسلم لا يقولون: عبيد، وحديث عمران بن حدير أشبه؛ لأنه بيَّن عورته. فسأله ابنه: فحديث الزهري هذا؟ قال: أخاف ألا يكون محفوظًا، أخاف أن يكون: صالح بن كيسان عن عبد الله بن عبيد نفسه؛ بلا زهري.وفي باب "الإيمانُ السماحةُ والصبر" عن عمرو بن عبسة عند أحمد 32/ (19435)، وعن عبادة ابن الصامت عنده أيضًا 37 / (22717)، وعن جابر عند ابن أبي شيبة 11/ 33، وأبي يعلى (1854)، ولا يخلو كل منها من مقال، لكن تتقوى بمجموع طرقها.وفي باب أفضل المؤمنين أحسنهم خلقًا عن أبي هريرة سلف عند المصنف برقم (1).وفي باب المسلم من سلم المسلمون من لسانه ويده عن أبي هريرة وجابر وفضالة بن عبيد وبلال بن الحارث، سلفت أحاديثهم عند المصنف على التوالي بالأرقام (22) و (23) و (24) و (6325).وفي باب أفضل الجهاد كلمة عدل عند إمام جائر عن طارق بن شِهاب عند أحمد 31 (18828) و (18830)، والنسائي (7786).وعن أبي أمامة عند أحمد 36/ (22158)، وابن ماجه (4012).وعن أبي سعيد الخدري عند أبي داود (4344)، وابن ماجه (4011)، والترمذي (2174)، وسيأتي عند المصنف برقم (8754) من طريق آخر.وانظر حديث جابر السالف برقم (4945).ويشهد لقوله: "أعظم المسلمين جرمًا … إلخ" حديث سعد بن أبي وقاص عند البخاري (7289)، ومسلم (2358).
6773 [5] - تحرَّف في النسخ الخطية إلى: بكر.
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6774 - أخبرني أحمد بن يعقوب الثَّقفي، حدثنا موسى بن زكريا التُّستَري، حدثنا خليفة بن خيَّاط قال: شدَّادُ بن الهاد بن عمرو بن عبد الله بن جابر بن نَمِر بن عامر بن ليث بن بكر، واسمُ الهادِ أسامةُ، وهو أبو عبد الله بن شدَّاد بن الهاد، تحوَّل إلى الكوفة.
৬৭৭৪। আমাকে (হাদীস) শুনিয়েছেন আহমদ ইবনে ইয়াকুব আস-সাকাফী, তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন মূসা ইবনে যাকারিয়্যা আত-তুস্তারী, তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন খালিফা ইবনে খাইয়াত। তিনি বলেছেন: শাদ্দাদ ইবনুল হাদ ইবনে আমর ইবনে আবদুল্লাহ ইবনে জাবির ইবনে নামির ইবনে আমির ইবনে লাইস ইবনে বকর। আর আল-হাদ-এর নাম হলো উসামা। এবং তিনি হলেন আবু আবদুল্লাহ ইবনে শাদ্দাদ ইবনুল হাদ। তিনি কুফায় স্থানান্তরিত হয়েছিলেন।
6775 - أخبرناه أبو محمد المُزَني، حدثنا أبو خليفة، حدثنا محمد بن سلَّام، حدثنا أبو عبيدة؛ فذكر هذا النسب، وقال: إنما سُمِّي الهاد؛ لأنه كان يَهدي الطريق.
আবু উবাইদা থেকে বর্ণিত, তিনি এই বংশের পরিচয় উল্লেখ করে বললেন: তাঁকে 'আল-হাদ' নামে অভিহিত করা হয়েছিল এই কারণে যে, তিনি পথ দেখাতেন।
6776 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا جَرير بن حازم، قال: سمعتُ محمد بن عبد الله بن أبي يعقوب يُحدِّث عن عبد الله بن شدَّاد بن الهاد، عن أبيه قال: خرجَ علينا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في إحدى صلاتَي النهار الظُّهرِ أو العصر، وهو حاملٌ الحسن أو الحسين، فتقدَّم فوضعه عند قدمه اليمنى، فسجد رسولُ الله صلى الله عليه وسلم سجدةً أطالها، فرفعتُ رأسي بين الناس، فإذا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ساجدٌ، وإذا الغلامُ راكبٌ ظهرَه، فعُدْتُ فسجدت، فلما انصرف رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، قال ناسٌ: يا رسولَ الله، لقد سجدتَ في صلاتك هذه سجدةً ما كنتَ تسجدُها، أشيءٌ أُمرتَ به أو كان يُوحَى إليك؟ فقال: "كلٌّ لم يكن، ولكنَّ ابني ارتحَلَني، فكرهتُ أن أُعجِلَه حتى يقضيَ حاجتَه" [1]. ذكرُ الحارث بن مالك ابنِ البَرْصاء اللَّيثي رضي الله عنه-
শাদ্দাদ ইবনুল হাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দিনের দুই সালাতের কোনো একটি—যোহর অথবা আসর—আদায় করার জন্য আমাদের কাছে এলেন। তখন তিনি হাসান অথবা হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বহন করছিলেন। তিনি সামনে অগ্রসর হলেন এবং তাকে (শিশুটিকে) তাঁর ডান পায়ের কাছে রাখলেন। অতঃপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি সিজদা করলেন যা তিনি দীর্ঘায়িত করলেন। আমি লোকজনের মাঝে মাথা উঠালাম, দেখলাম আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সিজদারত এবং শিশুটি তাঁর পিঠের উপর আরোহণ করে আছে। তখন আমিও আবার সিজদায় ফিরে গেলাম। যখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত শেষ করলেন, তখন কিছু লোক বলল: হে আল্লাহর রাসূল! এই সালাতে আপনি এমন একটি সিজদা করেছেন যা আপনি পূর্বে করতেন না। এটি কি এমন কোনো বিষয়, যার জন্য আপনাকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে অথবা আপনার প্রতি ওহী নাযিল হয়েছে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এর কোনোটাই হয়নি। বরং আমার সন্তান (নাতি) আমাকে সওয়ারি বানিয়েছিল, তাই আমি অপছন্দ করলাম যে সে তার প্রয়োজন পূরণ না করা পর্যন্ত তাকে তাড়াহুড়ো করে তুলে দেই।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده صحيح. وجوَّد إسنادَه الذهبي في "التلخيص".وأخرجه أحمد 25/ (16033) و 45/ (27647)، والنسائي (731) من طريق يزيد بن هارون، بهذا الإسناد. وسلف برقم (4831). وحديث ابن البرصاء هذا في "مسند الحميدي" (582).وأخرجه أحمد 31/ (19019) عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 24/ (15404) و (15405) و 31/ (19020)، والترمذي (1611) من طرق عن زكريا بن أبي زائدة، به. وقال الترمذي: حسن صحيح.وقول سفيان: "على الكفر"، يعني لن تغزى مكة بعد ذلك اليوم لأجل أن أهلها كافرون، فقد روى البخاري في "صحيحه" (2118) من حديث عائشة مرفوعًا: "يغزو جيش الكعبةَ".
6777 - أخبرنا أبو محمد المُزَني، حدثنا أبو خليفة، حدثنا محمد بن سلَّام، حدثنا أبو عُبيدة قال: الحارثُ ابن البَرْصاء هو الحارث بن مالك بن قيس بن عُوَيذ [1] ابن عبد الله بن جابر بن عبد مَنَاف بن شِجْع بن عامر بن ليث، وأمُّه البَرْصاء بنتُ عبد الله بن رَبيعة الهِلاليَّة، أقام بمكةَ ثم نزل الكوفةَ.
আবু উবাইদা থেকে বর্ণিত, আল-হারিস ইবনুল বারসা হলেন আল-হারিস ইবনু মালিক ইবনু ক্বাইস ইবনু উওয়াইয ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু জাবির ইবনু আব্দ মানাফ ইবনু শি’জ’ ইবনু আমির ইবনু লাইস। আর তাঁর মাতা হলেন আল-বারসা বিনতু আব্দুল্লাহ ইবনু রাবি’আ আল-হিলালিয়্যাহ। তিনি মক্কায় অবস্থান করেছিলেন, অতঃপর কুফায় বসতি স্থাপন করেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] كذا في النسخ الخطية، ومثله في "معرفة الصحابة" لأبي نعيم 2/ 780، وأما في "الإكمال" لابن ماكولا 6/ 304، و"الاستيعاب" لابن عبد البر ص 146، و"أسد الغابة" لابن الأثير 1/ 413، و"الإصابة" لابن حجر 1/ 596 ففيها: عوذ. وحديث ابن البرصاء هذا في "مسند الحميدي" (582).وأخرجه أحمد 31/ (19019) عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 24/ (15404) و (15405) و 31/ (19020)، والترمذي (1611) من طرق عن زكريا بن أبي زائدة، به. وقال الترمذي: حسن صحيح.وقول سفيان: "على الكفر"، يعني لن تغزى مكة بعد ذلك اليوم لأجل أن أهلها كافرون، فقد روى البخاري في "صحيحه" (2118) من حديث عائشة مرفوعًا: "يغزو جيش الكعبةَ".
6778 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق وعلي بن حَمْشاذَ، قالا: أخبرنا بشر بن موسى، حدثنا الحُميدي، حدثنا سفيان، حدثنا زكريا بن أبي زائدة، عن الشَّعبي، عن الحارث ابن مالك ابن البَرصاء قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول يومَ فتح مكةَ: "لا تُغزَى مكةُ بعدَ هذا العام أبدًا" [1]. قال سفيان تفسيرُه: على الكفر. ذكرُ مالك بن الحُوَيرت اللَّيثي رضي الله عنه-
হারেস ইবনু মালেক ইবনুল বারসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মক্কা বিজয়ের দিন বলতে শুনেছি: "এই বছরের পর মক্কাকে আর কখনও আক্রমণ করা হবে না।" সুফিয়ান বলেন, এর ব্যাখ্যা হলো: (এই নিষেধাজ্ঞা) কুফুরীর বিরুদ্ধে (যুদ্ধ করা)। মালিক ইবনুল হুওয়ায়রিস আল-লাইসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আলোচনা।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] صحيح لكن من حديث مطيع بن الأسود، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن اختلف على زكريا بن أبي زائدة في روايته عن الشعبي، وهو ممّن يدلس عنه كثيرًا، ولم نقف على تصريحه بسماعه لهذا الحديث منه، ونُرى أنَّ الأصحَّ أنه من رواية الشعبي عن عبد الله بن مطيع عن أبيه مطيع، وهذه الرواية صححها مسلم، وصرَّح فيها زكريا بسماعه من الشعبي عند أحمد 24/ (15409)، ولا سيما أنَّ عبد الله بن أبي السَّفر تابعه عليها، وكذا الشعبي صرَّح بسماعه له من عبد الله بن مطيع عند مسلم (1782) وغيره، والله تعالى أعلم، وسيأتي حديث مطيع عند المصنف برقم (7919)، لكن روايته مختصرة ببعضه. وحديث ابن البرصاء هذا في "مسند الحميدي" (582).وأخرجه أحمد 31/ (19019) عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 24/ (15404) و (15405) و 31/ (19020)، والترمذي (1611) من طرق عن زكريا بن أبي زائدة، به. وقال الترمذي: حسن صحيح.وقول سفيان: "على الكفر"، يعني لن تغزى مكة بعد ذلك اليوم لأجل أن أهلها كافرون، فقد روى البخاري في "صحيحه" (2118) من حديث عائشة مرفوعًا: "يغزو جيش الكعبةَ".