হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6859)


6859 - حدثني أبو جعفر أحمد بن عُبيد بن إبراهيم الأسدي الحافظ بهَمَذان، حَدَّثَنَا إبراهيم بن الحسين بن دِيزِيلَ، حَدَّثَنَا أبو مُسهِر عبد الأعلى بن مُسهر، حَدَّثَنَا عبد الله بن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، عن عمِّه يزيد بن يزيد بن جابر، عن أبيه قال: تزوَّج النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم عائشةَ ولها سبعُ سنينَ، ودخلَ بها ولها تسعُ سنين، وقُبِضَ عنها ولها ثمانِ عشرةَ سنة، وتوفِّيت زمنَ معاويةَ سنة سبعٍ وخمسين [1].




ইয়াযীদ ইবনু জাবির থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিবাহ করেন, যখন তাঁর বয়স ছিল সাত বছর। তাঁর সাথে বাসর (মিলন) করেন যখন তাঁর বয়স ছিল নয় বছর। আর যখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করেন, তখন তাঁর (আয়েশা রাঃ-এর) বয়স ছিল আঠারো বছর। এবং তিনি (আয়েশা রাঃ) মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শাসনামলে সাতান্ন হিজরীতে ইন্তেকাল করেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد لا بأس برجاله، لكنه مرسل، ويزيد بن جابر روى عنه ثلاثة، وذكره ابن حبان في "الثقات"، فمثله حسن الحديث.ولم نقف عليه من هذا الطريق عند غير المصنّف.وأخرج البخاري (5133)، ومسلم (1422) - واللفظ له - من حديث عائشة: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم تزوجها وهي بنت سبع سنين، وزُفَّت إليه وهي بنت تسع سنين، ولُعَبُها معها، ومات عنها وهي بنت ثمان عشرة.وانظر الحديث التالي، وما سيأتي برقم (6879).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6860)


6860 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حَدَّثَنَا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حَدَّثَنَا مصعب بن عبد الله الزُّبيري، حدثني عبد الله بن معاوية، عن هشام ابن عُرْوة: أنَّ عُرْوة كتبَ إلى الوليد بن عبد الملك بن مروان: ونكحَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عند مُتوفَّى خديجةَ عائشةَ، وكان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أُرِيَها في المَنام ثلاثَ مِرارٍ، يُقال: هذه امرأتُك عائشة [1].وكانت عائشةُ يومَ نَكَحَها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بنتَ ستِّ سنين، ثم بَنَى بها يومَ قَدِمَ المدينةَ وهي بنتُ تسعِ سنين، وماتت عائشةُ أمُّ المؤمنين ليلةَ الثلاثاء بعد صلاةِ الوترِ، ودُفنت من ليلتها بالبقيع لخمسَ عشرة ليلةً خَلَتْ، وصلَّى عليها أبو هريرة، وكان مروانُ غائبًا، وكان أبو هريرة يَخْلُفه [2].




হিশাম ইবনে উরওয়া থেকে বর্ণিত, উরওয়া ওয়ালিদ ইবনে আব্দুল মালিক ইবনে মারওয়ানকে লিখেছিলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মৃত্যুর পর আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিবাহ করেছিলেন। আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে স্বপ্নে তাঁকে (আয়েশাকে) তিনবার দেখানো হয়েছিল। বলা হয়েছিল: ইনি আপনার স্ত্রী আয়েশা। যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে বিবাহ করেন, তখন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বয়স ছিল ছয় বছর। এরপর যখন তিনি মদীনায় আগমন করলেন, তখন তাঁর (আয়েশার) বয়স নয় বছর ছিল এবং তিনি তাঁর সাথে বাসর করেছিলেন। উম্মুল মুমিনীন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মঙ্গলবার রাতে বিতরের সালাতের পর ইন্তিকাল করেন এবং ঐ রাতেই মাসের পনেরো দিন অতিবাহিত হওয়ার পর তাঁকে বাকী'তে দাফন করা হয়। এবং আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর জানাযার সালাত আদায় করিয়েছিলেন। মারওয়ান (তখন) অনুপস্থিত ছিলেন এবং আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর স্থলাভিষিক্ত ছিলেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] من قوله: وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم أريها، إلى هنا سقط من (م) و (ص). و (7011)، ومسلم (2438)، وابن حبان (7093) من طرق عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال لها: "رأيتك في المنام، مرتين إذا رجل يحملك في سَرَقة من حرير، فيقول: هذه امرأتُك، فأكشف عنها، فإذا هي أنت، فأقول: إن يكُ هذا من عند الله يُمضه"، ووقع في رواية مسلم وحده: "أريتك في المنام ثلاث ليال".وأخرج الترمذي (3880)، وابن حبان (7094) من طريق عبد الله بن أبي مليكة، عن عائشة: أنَّ جبريل جاء بصورتها في خرقة حرير خضراء إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال: "هذه زوجتك في الدنيا والآخرة".قال الترمذي: حديث حسن غريب، لا نعرفه إلَّا من حديث عبد الله بن عمرو بن علقمة. قلنا: وعبد الله بن عمرو ثقة.وأخرج ابن سعد في "الطبقات" 10/ 76 عن عفان بن مسلم، عن حماد بن سلمة، عن هشام بن عروة، عن عروة: أن عبد الله بن الزبير دفن عائشة ليلًا. وسنده صحيح.وأخرج عبد الرزاق (1593) و (6366) و (6570) عن ابن جريج، قال: أخبرني نافع قال: صلينا على عائشة وأم سلمة وسط البقيع بين القبور، قال: والإمام يوم صلينا على عائشة أبو هريرة، وحضر ذلك ابن عمر. وسنده صحيح.



[2] إسناده ضعيف من أجل عبد الله بن معاوية - وهو ابن عاصم الزبيري - قال البخاري: منكر الحديث، وقال النَّسَائي: ضعيف، وقال العقيلي: حدث عن هشام بمناكير لا أصل لها، وقال أبو حاتم الرازي: مستقيم الحديث، كما في "الجرح والتعديل" 5/ 178، لكن نقل عنه ابن حجر في "لسان الميزان" 5/ 17 أنه قال: منكر الحديث، فكأنه وهم والله أعلم. وقال الساجي: صدوق وفي بعض أحاديثه مناكير، وذكره ابن حبان في "ثقاته" 7/ 46 فقال: ربما خالف، يُعتبر حديثه إذا بيّن السماع في روايته.وأخرج أحمد (41/ 24867) و (43/ 26397)، والبخاري (5133) و (5134)، ومسلم (1422) (69) و (70)، والنسائي (5346) و (5347) و (5543)، وابن حبان (7097) و (7118) من طرق عن هشام بن عروة، عن أبيه عن عائشة قالت: تزوجني رسول الله صلى الله عليه وسلم متوفَّى خديجةَ، قبل مخرجه إلى المدينة بسنتين أو ثلاث، وأنا بنت سبع سنين، فلما قدمنا المدينة جاءتني نسوة وأنا ألعب في أُرجوحة، وأنا مجمَّمة، فذهبن بي، فهيأنني وصنعنني، ثم أتين بي رسول الله صلى الله عليه وسلم، فبنى بي وأنا بنت تسع سنين. وهو عند بعضهم مختصر.وأخرج مسلم (1422) (71) من طريق الزهري، عن عروة، عن عائشة: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم تزوجها وهي بنت سبع سنين، وزفت إليه وهي بنت تسع سنين، ولعبُها معها، ومات عنها وهي بنت ثمان عشرة.وأخرج أحمد (40/ 24152)، ومسلم (1422) (72)، والنسائي (5348) من طريق الأسود، والنسائي (5345) من طريق عبد الله بن عبيد الله بن أبي مليكة، كلاهما عن عائشة نحوه.وأخرج أحمد (40/ 24142) و (42/ 25285)، والبخاري (3895) و (5078) و (5125) و (7011)، ومسلم (2438)، وابن حبان (7093) من طرق عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال لها: "رأيتك في المنام، مرتين إذا رجل يحملك في سَرَقة من حرير، فيقول: هذه امرأتُك، فأكشف عنها، فإذا هي أنت، فأقول: إن يكُ هذا من عند الله يُمضه"، ووقع في رواية مسلم وحده: "أريتك في المنام ثلاث ليال".وأخرج الترمذي (3880)، وابن حبان (7094) من طريق عبد الله بن أبي مليكة، عن عائشة: أنَّ جبريل جاء بصورتها في خرقة حرير خضراء إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال: "هذه زوجتك في الدنيا والآخرة".قال الترمذي: حديث حسن غريب، لا نعرفه إلَّا من حديث عبد الله بن عمرو بن علقمة. قلنا: وعبد الله بن عمرو ثقة.وأخرج ابن سعد في "الطبقات" 10/ 76 عن عفان بن مسلم، عن حماد بن سلمة، عن هشام بن عروة، عن عروة: أن عبد الله بن الزبير دفن عائشة ليلًا. وسنده صحيح.وأخرج عبد الرزاق (1593) و (6366) و (6570) عن ابن جريج، قال: أخبرني نافع قال: صلينا على عائشة وأم سلمة وسط البقيع بين القبور، قال: والإمام يوم صلينا على عائشة أبو هريرة، وحضر ذلك ابن عمر. وسنده صحيح.



6861 - Null









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6861)


6861 - حَدَّثَنَا أبو عبد الله محمد بن أحمد بن بُطَّة الأصبهاني، حَدَّثَنَا الحسن بن الجَهْم، حَدَّثَنَا الحسين بن الفَرَج، حَدَّثَنَا محمد بن عمر قال: عائشةُ بنت أبي بكر رضي الله عنها أمُّها أمُّ رُومان بنت عُمير بن عامر، من بني دُهمان بن الحارث بن غَنْم بن مالك بن كِنانة، تزوَّجها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في شوال سنةَ عشرٍ من النُّبوة قبلَ الهجرة بثلاث سنين، وعرَّس بها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في شوال على رأسِ ثمانية أشهرٍ من الهجرة، وكانت يومَ ابتنى بها بنتَ تسعِ سنينَ.




আয়িশা বিনতে আবু বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর মাতা ছিলেন উম্মু রুমান বিনতে উমাইর ইবন আমির, যিনি বানু দুহমান ইবন হারিস ইবন গানম ইবন মালিক ইবন কিনানাহ গোত্রের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নবুওয়াতের দশম বছরে হিজরতের তিন বছর পূর্বে শাওয়াল মাসে তাঁকে বিবাহ করেন। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হিজরতের আট মাস পূর্তিতে শাওয়াল মাসে তাঁর সাথে বাসর সম্পন্ন করেন। যখন তিনি তাঁর সাথে বাসর করেন, তখন তাঁর বয়স ছিল নয় বছর।









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6862)


6862 - قال ابن عمر: فحدثنا موسى بن محمد بن عبد الرحمن، عن رَيْطة، عن عَمْرة، عن عائشة أنها سُئلت: متى بَنَى بكِ رسولُ الله؟ فقالت: لما هاجرَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إلى المدينة خلَّفَنا وخلَّف بناتِه، فلما قَدِمَ المدينة بعث إلينا زيدَ بن حارثة وبعث معه أبا رافعٍ مولاه، وأعطاهم بعيرَينِ وخمسَ مئة درهم أخذَها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم من أبي بكر يشتريان بها ما يحتاجانِ إليه من الظَّهْر، وبعث أبو بكر معهما عبدَ الله بن أُريقط الدِّيلي ببعيرين أو ثلاثةٍ، وكتب إلى عبد الله بن أبي بكر يأمُرُه أن يحملَ أهلَه: أمَّ رُومان وأنا وأختي أسماءَ امرأةَ الزُّبير، فخرجوا مُصطحِبِينَ.فلما انتهوا إلى قُديد اشترى زيدُ بن حارثة بتلك الخمسِ مئة درهم ثلاثةَ أبعرة، ثم دخلوا مكةَ جميعًا، وصادفوا طلحةَ بن عبيد الله يريدُ الهجرةَ بآلِ أبي بكر، فخرجنا جميعًا، وخرجَ زيدُ بن حارثة وأبو رافع بفاطمةَ وأمِّ كلثوم وسَوْدةَ بنت زَمْعة، وحمل زيدٌ أمَّ أيمنَ وأسامةَ بن زيد، وخرج عبدُ الله بن أبي بكر بأمِّ رُومان وأختيه، وخرج طلحةُ بن عبيد الله، واصطحبنا جميعًا، حتَّى إذا كُنَّا بالبَيْض من تمنِّي [1] نفَرَ بعيري وأنا في مِحَفَّة معي فيها أُمِّي، فجعلَتْ أمِّي تقول: وابِنتاهُ واعَرُوساهْ! حتَّى أُدرك بعيرنا وقد هَبطَ من لَفْت [2] فَسَلِمَ.ثم إنَّا قَدِمنا المدينة فنزلتُ مع عِيالِ أبي بكر، ونزل آلُ [3] رسولِ الله صلى الله عليه وسلم وهو يومئذٍ يبني المسجدَ وأبياتَنا حولَ المسجد، فأنزل فيها أهلَه، ومكثنا أيامًا في منزلِ أبي بكر.قال أبو بكر: يا رسولَ الله، ما يمنعُك أن تَبنيَ بأهلِك؟ فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "الصَّدَاق"، فأعطاه أبو بكر اثنتي عشرةَ [4] أوقيّةً ونَشًّا، فبعث [بها] رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إلينا، وبَنَى بي رسول الله صلى الله عليه وسلم في بيتي هذا الذي أنا فيه، وهو الذي توفِّي فيه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ودُفِنَ فيه، وجَعَلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم لنفسِه بابًا في المسجد وِجاهَ باب عائشةَ. قالت: وبَنَى رسول الله صلى الله عليه وسلم بسَوْدة في أحدِ تلك [5] البيوت التي إلى جنبي، وكان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يكونُ عندها.قال: وتُوفِّيَت عائشة رضي الله عنها سنةَ ثمانٍ وخمسين في شهر رمضانَ [6].




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল: রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কখন আপনার সাথে দাম্পত্য জীবন শুরু করেন?

তিনি (আয়িশা) বললেন: যখন রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদীনায় হিজরত করলেন, তখন তিনি আমাদের এবং তাঁর কন্যাদের রেখে গেলেন। যখন তিনি মদীনায় পৌঁছলেন, তখন তিনি আমাদের কাছে যায়িদ ইবনু হারিসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পাঠালেন এবং তাঁর সাথে তাঁর মুক্ত দাস আবূ রাফি' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কেও পাঠালেন। তিনি তাঁদেরকে দুটি উট এবং পাঁচশো দিরহাম দিলেন। এই দিরহামগুলো রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছ থেকে নিয়েছিলেন, যাতে তারা সেগুলোর মাধ্যমে পথ চলার জন্য প্রয়োজনীয় যানবাহন ক্রয় করতে পারে। আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁদের দুজনের সাথে আব্দুল্লাহ ইবনু উরাইকিত আদ-দীলীকে দু'টি বা তিনটি উট দিয়ে পাঠালেন। আর তিনি (আবূ বাকর) আব্দুল্লাহ ইবনু আবী বাকর-এর কাছে চিঠি লিখলেন, তাঁকে নির্দেশ দিলেন যেন তিনি তাঁর পরিবারবর্গ— উম্মু রুমান, আমি (আয়িশা) এবং আমার বোন আসমা (যিনি যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী ছিলেন)—-কে নিয়ে আসেন। এরপর তাঁরা সকলে একসাথে বেরিয়ে পড়লেন।

যখন তাঁরা কুদাইদ নামক স্থানে পৌঁছলেন, তখন যায়িদ ইবনু হারিসা সেই পাঁচশো দিরহাম দিয়ে তিনটি উট কিনলেন। এরপর তাঁরা সকলে মিলে মক্কায় প্রবেশ করলেন। সেখানে তাঁরা তালহা ইবনু উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দেখা পেলেন, যিনি আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পরিবারের সাথে হিজরত করার ইচ্ছা পোষণ করছিলেন। তাই আমরা সকলে একসাথে বের হলাম। যায়িদ ইবনু হারিসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও আবূ রাফি' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), উম্মু কুলসূম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), এবং সাওদাহ বিন্ত যামআ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নিয়ে বের হলেন। যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উম্মু আইমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং উসামা ইবনু যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কেও বহন করলেন। আব্দুল্লাহ ইবনু আবী বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উম্মু রুমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং তাঁর দুই বোনকে নিয়ে বের হলেন। আর তালহা ইবনু উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও বের হলেন। আমরা সকলেই একত্রে পথ চলছিলাম।

যখন আমরা তামান্নীর কাছে বাইদ নামক স্থানে পৌঁছলাম, তখন আমার উটটি চমকে উঠল। আমি আমার মায়ের সাথে একটি হাওদার মধ্যে ছিলাম। আমার মা তখন বলতে লাগলেন: ওগো আমার কন্যা! ওগো আমার বধূ! শেষে আমাদের উটটিকে ধরে ফেলা হলো। ততক্ষণে এটি লাফত নামক স্থান থেকে নিচে নেমে গিয়েছিল। তবে আমরা নিরাপদ ছিলাম।

এরপর আমরা মদীনায় পৌঁছলাম। আমি আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পরিবারের সাথে উঠলাম। রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবারও সেখানে নামলেন। সেই দিনগুলোতে তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদ এবং মসজিদের আশেপাশে আমাদের জন্য ঘর নির্মাণ করছিলেন। তিনি তাঁর পরিবারকে সেই ঘরগুলোতে রাখলেন। কিন্তু আমরা আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বাড়িতে কিছুদিন অবস্থান করলাম।

আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইয়া রাসুলাল্লাহ! কী কারণে আপনি আপনার পরিবারের সাথে দাম্পত্য জীবন শুরু করতে দেরি করছেন? রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "মোহরানার জন্য।" তখন আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বারো উকিয়া (وقية) এবং এক নাশ (نش) পরিমাণ স্বর্ণ দিলেন। রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা আমাদের কাছে পাঠিয়ে দিলেন। এরপর রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার এই ঘরে আমার সাথে দাম্পত্য জীবন শুরু করেন, যে ঘরে আমি এখন আছি। এটি সেই ঘর, যেখানে রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তিকাল করেন এবং তাঁকে দাফন করা হয়। আর রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদের মধ্যে নিজের জন্য একটি দরজা তৈরি করেছিলেন, যা ছিল আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দরজার মুখোমুখি।

তিনি (আয়িশা) বললেন: রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাওদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে আমার পাশের ঐ ঘরগুলোর একটিতে দাম্পত্য জীবন শুরু করেছিলেন এবং রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছে অবস্থান করতেন।

(বর্ণনাকারী) বলেন: আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আটান্ন হিজরিতে রমযান মাসে ইন্তিকাল করেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] قوله: بالبيض، قال صاحب "مراصد الاطلاع" 1/ 243: بالفتح، من منازل بني كِنانة بالحجاز.وقال 1/ 275: "تمنِّي" بفتحتين وتشديد النون وكسرها: أرض إلى المدينة دون ثنيَّة هَرْشَى (في طريق مكة قريبة من الجُحفة، تُرى من البحر) بها جبالٌ يُقال لها: البَيض.



[2] لفت: قال في "المراصد" 3/ 1206: هي ثنيّة بين مكّة والمدينة. ونقل عن القاضي عياض في ضبطها ثلاثة أوجه: بفتح اللَّام وسكون الفاء، وبالتحريك، وبكسر اللَّام وسكون الفاء.



6862 [3] - في النسخ الخطية: إلى، ومثله في "ذيل المذيل" للطبري، ولم ترد في (ص)، والمثبت من "طبقات ابن سعد".



6862 [4] - في (ز) و (ب): اثني عشر، والمثبت من (ص).



6862 [5] - تحرّف في النسخ الخطية إلى: ثلاث، وأثبتناه على الصواب من "طبقات ابن سعد".



6862 [6] - إسناده ضعيف، وسبق الكلام على إسناده إلى محمد بن عمر الواقدي عند الحديث السالف برقم (4060)، وموسى بن محمد بن عبد الرحمن: هو ابن عبد الله بن حارثة بن النعمان، وأبوه المعروف بأبي الرّجال، فهو معروف النسب، لكن لم نقف له على ترجمة، وكذا ريطة لم نعرفها.وأخرجه ابن سعد في الطبقات" 10/ 62 - 6 والطبري كما في "المنتخب من ذيل المذيل" 11/ 601 - 602 من طريق الواقدي، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 23/ (60)، وابن عبد البر في ترجمة أم رومان من "الاستيعاب" ص 951 - 952 من طريق محمد بن الحسن بن زيالة المخزومي، عن عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة بنحوه. وابن زبالة متهم.وقصة الصداق سلفت مختصرة بسياق آخر عند المصنّف برقم (2799).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6863)


6863 - قال ابن عمر: فحدثني عبد الواحد بن ميمون مولى عُرْوة، عن حَبيب مولى عُرْوة قال: لما ماتت خديجة حَزِنَ عليها النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فأتاه [جبريل] [1] بعائشةَ في مهدٍ، فقال: يا رسولَ الله، هذه تذهبُ ببعض حُزنك، وإنَّ في هذه خَلَفًا من خديجةَ. ثم ردَّها، فكان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يختلفُ إلى بيت أبي بكر ويقول: "يا أمَّ رُومان، استوصِي بعائشةَ خيرًا، واحفظيني فيها"، فكان لعائشةَ بذلك منزلةٌ عند أهلها، ولا يشعرون بأمرِ الله فيها، فأتاهم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في بعضِ ما كان يأتيهم، وكان لا يُخطِئُه يومٌ واحد إلَّا أن يأتيَ بيتَ أبي بكر منذ أسلمَ إلى أن هاجَر، فيجدُ عائشةَ مُتستِّرةً بباب أبي بكر، تبكي بُكاء حزينًا، فسألها فشَكَت أُمَّها وذكرت أنها تَولَع، فدمعت عينا رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فدخل على أُمِّ رُومان فقال: "يا أمَّ رومان، ألم أُوصِك بعائشةَ أن تحفظيني فيها؟ " فقالت: يا رسولَ الله، إنها بلَّغتِ الصدِّيقَ عنا وأغضبته علينا، فقال النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم: "وإنْ فعلَتْ"، قالت أمُّ رُومان: لا جَرَمَ، لا سُؤْتُها أبدًا.وكانت عائشةُ وُلدت السنةَ الرابعةَ من النُّبوة في أولها، وتزوَّجها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في السنة العاشرة في شوَّال، وهي يومئذ ابنةُ ستِّ سنينَ، وتزوَّجها بعدَ سَوْدةَ بشهر [2].




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাকে আব্দুল ওয়াহিদ ইবনু মাইমূন, যিনি উরওয়াহের আযাদকৃত গোলাম, তিনি হাবীব, যিনি উরওয়াহের আযাদকৃত গোলাম, তার থেকে বর্ণনা করেন যে, যখন খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তিকাল করলেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার জন্য দুঃখিত হলেন। তখন তাঁর কাছে [জিবরীল] (আঃ) আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে একটি দোলনায় নিয়ে আসলেন এবং বললেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), ইনি আপনার কিছু দুঃখ দূর করবেন। নিশ্চয়ই এনার মধ্যে খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্থলবর্তী (পরিবর্তন) রয়েছে। এরপর তিনি তাকে ফিরিয়ে নিলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বাড়িতে আসা-যাওয়া করতেন এবং বলতেন: "হে উম্মু রূমান, আয়েশার প্রতি উত্তম আচরণের উপদেশ দিও এবং তার বিষয়ে আমার হক রক্ষা করো।" এর ফলে আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর তার পরিবারের কাছে একটি বিশেষ মর্যাদা তৈরি হয়েছিল, যদিও তারা তার বিষয়ে আল্লাহর নির্দেশ সম্পর্কে অবগত ছিলেন না। এরপর একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের কাছে আসলেন, যেমন তিনি আসতেন। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইসলাম গ্রহণের পর থেকে হিজরত করা পর্যন্ত একদিনও এমন যেত না যে তিনি আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বাড়িতে না যেতেন। এসে তিনি দেখলেন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দরজায় আবৃত অবস্থায় বিষণ্নভাবে কাঁদছেন। তিনি তাকে জিজ্ঞেস করলেন। আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার মায়ের (উম্মু রূমানের) বিরুদ্ধে অভিযোগ করলেন এবং বললেন যে তিনি (মা) তাকে নিয়ে রাগ দেখান বা বেশি কড়া হন। এতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চোখ অশ্রুসিক্ত হলো। এরপর তিনি উম্মু রূমানের কাছে প্রবেশ করলেন এবং বললেন: "হে উম্মু রূমান, আমি কি তোমাকে আয়েশার ব্যাপারে উপদেশ দেইনি যে তার বিষয়ে আমার হক রক্ষা করবে?" তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), সে তো আমাদের পক্ষ থেকে সিদ্দীক (আবূ বকর)-কে আমাদের বিষয়ে জানিয়ে দিয়েছে এবং তাকে আমাদের ওপর রাগিয়ে দিয়েছে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি সে তা করেও থাকে [তবুও তোমরা উত্তম ব্যবহার করবে]?" উম্মু রূমান বললেন: আর কখনও নয়, আমি কখনও তাকে কষ্ট দেব না। আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবুয়তের চতুর্থ বছরের শুরুতে জন্মগ্রহণ করেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নবুয়তের দশম বছরে শাওয়াল মাসে তাকে বিবাহ করেন, যখন তার বয়স ছিল ছয় বছর। আর তিনি সাওদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিবাহের এক মাস পর তাকে বিবাহ করেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] سقط من نسخنا الخطية، والمثبت من "طبقات ابن سعد".



[2] إسناده ضعيف، عبد الواحد بن ميمون ضعيف منكر الحديث، له ترجمة في "لسان الميزان"، وحبيب مولى عروة روى عنه جمع، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقال: يخطئ، والخبر مع ضعفه مرسل.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 77 عن محمد بن عمر الواقدي، بهذا الإسناد.تَولع: أي: تستخف بحقها فيؤذيها ذلك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6864)


6864 - قال ابن عمر: فحدَّثني ابن أبي سَبْرة، عن موسى بن مَيْسرة، عن سالم سَبَلان قال: ماتت عائشةُ الليلةَ السابعةَ عَشرةَ من رمضان بعد الوِتر، فأمرَتْ أن تُدفَن من ليلتها، فاجتمع الأنصارُ وحضروا، فلم تُرَ ليلةٌ أكثرَ ناسًا منها، نزل أهلُ العوالي، فدُفنت بالبقيع [1].




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সালেম সাবলান বলেন: আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রমজানের সতেরোতম রাতে বিতরের পরে ইন্তেকাল করেন। তিনি নির্দেশ দেন যেন তাঁকে ঐ রাতেই দাফন করা হয়। ফলে আনসারগণ একত্রিত হলেন এবং উপস্থিত হলেন। ঐ রাতের চেয়ে বেশি লোক সমাগম আর কখনো দেখা যায়নি। আল-আওয়ালীর অধিবাসীরাও নেমে এসেছিল। অতঃপর তাঁকে বাকী কবরস্থানে দাফন করা হয়।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده تالف، ابن أبي سبرة. وهو أبو بكر بن عبد الله بن محمد بن أبي سبرة - متهم بالوضع.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 75، والطبري كما في "المنتخب من ذيل المذيل" 11/ 602 من طريق الواقدي، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6865)


6865 - قال ابن عمر: فحدثني ابن جُريج، عن نافع قال: شَهِدتُ أبا هريرة صلَّى على عائشةَ بالبقيع وابنُ عمر في الناس لا يُنكِره، وكان مروانُ اعتمر تلك السنةَ، فاستخلفَ أبا هريرة [1].




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। ইবনু জুরাইজ নাফি‘ থেকে বর্ণনা করেছেন, নাফি‘ বলেন: আমি বাকী নামক স্থানে আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জানাযার সালাত আদায় করতে দেখেছি। ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও তখন লোকজনের মাঝে উপস্থিত ছিলেন এবং তিনি তাতে কোনো আপত্তি করেননি। সেই বছর মারওয়ান উমরাহ করতে গিয়েছিলেন, তাই তিনি আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তাঁর স্থলাভিষিক্ত নিযুক্ত করেছিলেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] خبر صحيح، ومحمد بن عمر الواقدي متابع.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 75، والطبري كما في "المنتخب من ذيل المذيل" 11/ 602 من طريق الواقدي، بهذا الإسناد.وأخرج عبد الرزاق (1593) و (6366) و (6570) عن ابن جريج، أخبرني نافع قال: صلينا على عائشة وأمِّ سلمة وسط البقيع بين القبور، قال: والإمام يوم صلينا على عائشة أبو هريرة، وحضر ذلك ابن عمر. وسنده صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6866)


6866 - حَدَّثَنَا أبو العبّاس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا أبو البَخْتري عبدُ الله بن شاكر، حَدَّثَنَا محمد بن بشر العَبْدي، حَدَّثَنَا إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس بن أبي حازم، قال: قالت عائشةُ، وكانت تُحدِّث نفسها أن تُدفَن في بيتها مع رسولِ الله صلى الله عليه وسلم وأبي بكر، فقالت: إني أحدَثتُ بعدَ رسول الله صلى الله عليه وسلم حَدَثًا، ادفِنُوني مع أزواجه، فدُفنت بالبقيع [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মনে মনে ইচ্ছা পোষণ করতেন যে তাঁকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও আবূ বকরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে তাঁর ঘরে দাফন করা হবে। অতঃপর তিনি বললেন: নিশ্চয়ই আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরে কিছু পরিবর্তন সৃষ্টি করেছি (বা: আমার মধ্যে পরিবর্তন এসেছে), তোমরা আমাকে তাঁর (রাসূলুল্লাহর) অন্যান্য স্ত্রীদের সাথে দাফন করো। অতঃপর তাঁকে বাকীতে (জান্নাতুল বাকী) দাফন করা হয়।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده صحيح.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 73 من طريق حسن بن صالح، وابن أبي شيبة 3/ 349 و 260/ 15 عن أبي أسامة حماد بن أسامة، كلاهما عن إسماعيل بن أبي خالد، به. وروايتا ابن أبي شيبة مختصرتان.قال الذهبي في "السير" 2/ 193: تعني بالحَدَث مسيرها يومَ الجَمَل، فإنها ندمت ندامة كلية، وتابت من ذلك، على أنها ما فعلت ذلك إلَّا متأولةً، قاصدةً للخير، كما اجتهد طلحةُ بن عبيد الله والزُّبير بن العوام وجماعةٌ من الكِبار، رضي الله عن الجميع. سلمة، قال: لما بعث علي عمارًا والحسن إلى الكوفة ليستنفراهم، فخطب عمارٌ، فقال: إني لأعلم أنها زوجته في الدنيا والآخرة، ولكن الله عز وجل ابتلاكم لتتبعوه أو إياها.وسيأتي مرفوعًا من حديث عائشة برقمي (6878) و (6892).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6867)


6867 - حَدَّثَنَا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حَدَّثَنَا عبد الرحمن بن مَهدي، حَدَّثَنَا أبو بكر بن عيّاش، عن أبي حَصين، عن عبد الله بن زياد الأسَدي [1]، قال: سمعتُ عمار بن ياسر يَحلِفُ بالله إنها زوجتُه صلى الله عليه وسلم في الدنيا والآخرة [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!




আব্দুল্লাহ ইবন যিয়াদ আল-আসাদী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আম্মার ইবন ইয়াসিরকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল্লাহর নামে শপথ করে বলতে শুনেছি যে, নিশ্চয়ই তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর স্ত্রী) দুনিয়া ও আখিরাতে তাঁর স্ত্রী।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] المثبت من (ز) و (ب)، وفي (م): التستري، وفي (ص): العبيدي. سلمة، قال: لما بعث علي عمارًا والحسن إلى الكوفة ليستنفراهم، فخطب عمارٌ، فقال: إني لأعلم أنها زوجته في الدنيا والآخرة، ولكن الله عز وجل ابتلاكم لتتبعوه أو إياها.وسيأتي مرفوعًا من حديث عائشة برقمي (6878) و (6892).



[2] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أبي بكر بن عياش. وأبو حَصين: هو عثمان بن عاصم بن حُصين الأسدي.وأخرجه الترمذي (3889) عن محمد بن بشار، عن عبد الرحمن بن مهدي، بهذا الإسناد. وقال: حسن صحيح.وأخرجه البخاري (7100) من طريق يحيى بن آدم، عن أبي بكر بن عيّاش، به. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه أحمد 30/ (18331)، والبخاري (3772) و (7101) من طريق أبي وائل شقيق بن سلمة، قال: لما بعث علي عمارًا والحسن إلى الكوفة ليستنفراهم، فخطب عمارٌ، فقال: إني لأعلم أنها زوجته في الدنيا والآخرة، ولكن الله عز وجل ابتلاكم لتتبعوه أو إياها.وسيأتي مرفوعًا من حديث عائشة برقمي (6878) و (6892).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6868)


6868 - أخبرنا أحمد بن سهل الفقيه ببُخارى، حَدَّثَنَا صالح بن محمد بن حبيب الحافظ، حَدَّثَنَا عُبيد الله [1] بن عمر القوَاريري، حَدَّثَنَا حَرَمي بن عُمارة، حدثني الحَرِيشُ بن الخِرِّيت [2]، حَدَّثَنَا ابن أبي مُليكة، عن عائشة أنها قالت: تُوفِّي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في بيتي، وفي يومي وليلتي، وبين سَحْري ونَحْري، ودخل عبدُ الرحمن بن أبي بكر ومعه سِواكٌ من أَراكٍ رَطْبٌ، فنظر إليه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فقلتُ: يا عبد الرحمن، اقضَمُه من ذلك المكان، فدفعه إلي فناولتُه إياه، فردّه إليَّ، فَقَضِمتُه وسوَّيْتُه، فدفعتُه إلى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فتسوَّك به [3].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه!




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওফাত হয়েছিল আমার ঘরে, আমার দিনে ও আমার রাতেই, এবং আমার কণ্ঠ ও বুকের মাঝখানে। (এই সময়) আবদুর রহমান ইবনে আবী বকর প্রবেশ করলেন। তাঁর সাথে ছিল সজীব আরাক গাছের ডালের একটি মিসওয়াক। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেটির দিকে তাকালেন। আমি বললাম: হে আবদুর রহমান, আপনি সেটি একপাশ চিবিয়ে নরম করে দিন। তিনি সেটি আমাকে দিলেন। আমি তা নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দিতে চাইলাম, কিন্তু তিনি সেটি আমার দিকে ফিরিয়ে দিলেন। তখন আমি সেটি চিবিয়ে নরম করলাম ও সমান করে দিলাম। এরপর আমি তা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দিলাম, আর তিনি তা দিয়ে মিসওয়াক করলেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: عبد الله، وفي نسخة على هامش (ز): عبيد الله، على الصواب.



[2] تحرّف في النسخ الخطية إلى: الحرث.



6868 [3] - حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف من أجل الحريش بن الخريت، وقد توبع. ابن أبي مليكة: هو عبد الله بن عبيد الله بن أبي مليكة.وأخرجه تامًّا ومختصرًا أحمد 41/ (24774)، والبخاري (3100)، والنسائي (7489)، وابن حبان (6616) من طريق نافع بن عمر، عن عبد الله بن أبي مليكة بنحوه.وأخرجه البخاري (4449) و (6510) من طريق عمر بن سعيد النوفلي، عن ابن أبي مليكة، أنَّ أبا عمرو ذكوان مولى عائشة أخبره: أن عائشة كانت تقول … فذكر نحوه، فزاد في الإسناد ذكوان مولى عائشة، قال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 12/ 768: قوله: "ابن أبي مُلَيكةَ أنَّ ذَكْوانَ أَخبَرَه أَنَّ عائشة" سيأتي بعد حديث من رواية ابن أبي مُلَيكةَ عن عائشة بلا واسطة، لكن في كلّ من الطَّريقَين ما ليس في الآخَر، فالظاهر أنَّ الطَّريقين محفوظان.وللحديث طرق أخرى سيأتي تخريجها عند الرواية التالية.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6869)


6869 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حَدَّثَنَا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حَدَّثَنَا إسماعيل ابن عُليَّة، عن أيوب، عن ابن أبي مُليكة قال: قالت عائشةُ: مات رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في بيتي ويومي، وبين سحْري ونَحْري، ودخل عليه عبدُ الرحمن بن أبي بكر ومعه سِواكٌ رَطْبٌ، فنظر إليه حتَّى ظننتُ أنَّ له فيه حاجةً، فأخذتُه فمضغتُه ونَفَضْتُه وطيَّبتُه ثم دفعتُه إليه، فاستنَّ كأحسنِ ما رأيتُه مستنًّا قَطُّ، ثم ذهب يرفعُه إليَّ فسقطَتْ يدُه، فأخذتُ أدعو له بدعاءٍ كان يدعو له به جبريلُ، وكان هو يدعو به إذا مَرِضَ، فلم يَدْعُ به في مرضه ذاك، فرفع بصرَه إلى السماء وقال: "الرَّفيقَ الأعلى" وفاضَتْ نفسُه صلى الله عليه وسلم، فالحمدُ لله الذي جمع بين رِيقي وريقِه في آخرِ يومٍ من الدنيا [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমার ঘরে এবং আমার (পালা) দিনে, আমার বুক ও গলার মধ্যবর্তী স্থানে মাথা রেখে মৃত্যুবরণ করেন। তাঁর নিকট আব্দুর রহমান ইবনু আবী বকর প্রবেশ করলেন। তাঁর সাথে ছিল একটি ভেজা মিসওয়াক। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেটির দিকে এমনভাবে তাকালেন যে আমি বুঝলাম, তিনি সেটি চান। তখন আমি মিসওয়াকটি নিলাম, চিবিয়ে নরম করলাম, ঝাঁকিয়ে পরিষ্কার করলাম এবং সুগন্ধযুক্ত করে তাঁর হাতে দিলাম। তিনি এমন সুন্দরভাবে মিসওয়াক করলেন, যেমন সুন্দরভাবে তাঁকে আর কখনো মিসওয়াক করতে দেখিনি। এরপর যখন তিনি মিসওয়াকটি আমার দিকে তুলে দিতে চাইলেন, তাঁর হাত নিচে পড়ে গেল। তখন আমি তাঁর জন্য এমন দোয়া পড়তে শুরু করলাম যা জিবরাঈল (আঃ) তাঁর জন্য পড়তেন এবং অসুস্থ হলে তিনি নিজেও ঐ দোয়া পড়তেন। কিন্তু তিনি সেই অসুস্থতায় সেই দোয়া পড়েননি। তিনি তাঁর দৃষ্টি আসমানের দিকে তুলে বললেন: "সর্বোচ্চ বন্ধু (আল্লাহকে চাই)।" এরপর তাঁর রূহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হয়ে গেল। সকল প্রশংসা আল্লাহর, যিনি দুনিয়ার শেষ দিনে আমার এবং তাঁর লালাকে একত্র করে দিলেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده صحيح. أيوب: هو السختياني. وهو في "مسند أحمد" 40/ (24216).وأخرجه ابن حبان (7116) من طريق عثمان بن أبي شيبة، عن إسماعيل ابن علية، به.وأخرجه البخاري (4451) من طريق حماد بن زيد، وابن حبان (6617) من طريق إسحاق بن إبراهيم الثقفي، كلاهما عن أيوب السختياني، به.وأخرجه تامًّا ومقطعًا أحمد 40/ (24354) و 41/ (24482)، والبخاري (4438) و (4446)، والنسائي (1969) و (7069) من طريق القاسم بن محمد، وأخرجه أحمد 41/ (24583) و (24905) و 42/ (25433) و (25640)، والبخاري (890) و (1389) و (4437) و (4450) و (4586) و (6348) و (6509)، ومسلم (2443) (84) و (2444) (86) و (87)، وابن ماجه (1620)، والنسائي (7065) و (7066) و (10867) و (11046)، وابن حبان (6592) من طريق عروة بن الزبير، وأحمد 43/ (25947)، والبخاري (4440) و (5674)، ومسلم (2444) (85)، والترمذي (3496)، والنسائي (7068) و (10868) من طريق عباد بن عبد الله بن الزبير، والبخاري (4463) و (6348) و (6509)، ومسلم (2444) (87) من طريق سعيد بن المسيب، وأحمد 41/ (24946)، ومسلم (2191) (46)، وابن ماجه (1619)، والنسائي (10869) من طريق مسروق، وأخرجه أحمد 41/ (24891) و (24935) من طريق الأسود، والنسائي (7067) و (10870)، وابن حبان (6591) من طريق أبي بردة الأشعري، وأحمد 40/ (24454) من طريق المطلب بن عبد الله، وأحمد 43/ (26346) من طريق عبيد الله بن عبد الله بن عتبة، ثمانيتهم عن عائشة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6870)


6870 - حَدَّثَنَا أبو العبّاس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا الحسن بن علي بن عفّان، حَدَّثَنَا أبو أسامة، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة قالت: كنتُ أدخل البيتَ الذي دُفِنَ معهما عمر، والله ما دخلتُ إِلَّا وأنا مشدودٌ عليَّ ثيابي حياءً من عمر [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি সেই ঘরে প্রবেশ করতাম যেখানে তাঁদের (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ও আবূ বকর) সাথে উমরকে দাফন করা হয়েছিল। আল্লাহর কসম! আমি উমরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রতি লজ্জাবশত আমার কাপড় শক্তভাবে জড়িয়ে না নিয়ে কখনও প্রবেশ করতাম না।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده صحيح. وقد سلف برقم (4450). وأما قصة إقراء جبريل السلامَ على عائشة، فهذه حادثة أخرى لم تره فيها معاينةً، وإنما سمعت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يناجيه فيها كما في الروايات الآتي تخريجُها.أبو الموجه: هو محمد بن عمرو الفَزَاري، وأبو عمار: هو الحسين بن حريث المروزي.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 67 عن محمد بن يزيد الواسطي، بهذا الإسناد.وتابع محمدًا الواسطيَّ عبدُ الرحيم بن سليمان عند ابن أبي شيبة 12/ 130 - 131، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3013)، والطبراني في "الكبير" 23/ (95)، وأبو بكر بنُ عيّاش عند الدينوري في "المجالسة" (298)، فروياه عن مجالد، عن الشعبي، عن مسروق، به.وخالفهم سفيانُ بن عيينة عند الحميدي (277)، وأحمد 41/ (24462) و 42/ (25131)، والطبراني في 23/ (90)، والآجري في "الشريعة" (987) و (1893)، وأبي طاهر المخلص في "المخلصيات" (2606)، وأبي نعيم في "الحلية" 2/ 46 والخطيب في "تاريخه" 7/ 140، فرواه عن مجالد، عن الشعبي، عن أبي سلمة، عن عائشة. وفسّر سفيانُ بن عيينة الدخيلَ بالضيف.وأخرجه أحمد 40/ (24281) و 41/ (24815) و 42/ (25746) و 43/ (25880)، والبخاري (6253)، ومسلم (2447)، وأبو داود (5232)، وابن ماجه (3696)، والترمذي (2693) من طريق زكريا بن أبي زائدة، عن عامر الشعبي، عن أبي سلمة، أنَّ عائشة حدثته: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال لها: "إنَّ جبريل يقرئك السلام" قالت: وعليه السلام ورحمة الله. وصرّح الشعبي عند البخاري وغيره بسماعه له من أبي سلمة.وأخرجه كذلك أحمد 41/ (24574) و (24857)، والبخاري (3217) و (3768) و (6201) و (6249)، ومسلم (2447)، والترمذي (3881)، والنسائي (8851) و (8852) و (10136) و (10137)، وابن حبان (7098) من طريق الزهري، عن أبي سلمة، عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا عائش، هذا جبريل يقرأ عليك السلام"، فقالت: وعليه السلام ورحمة الله، قالت: وهو يرى ما لا نرى.وأخرجه أحمد 42/ (25173)، والنسائي (8850) و (10135) من طريق معمر، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة. جعل مكان أبي سلمة عروةَ بن الزبير. وقال النسائي عن هذه الرواية: خطأ.وأخرجه أحمد 42/ (25154) و (25186) من طريق القاسم بن محمد، عن عائشة مختصرًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6871)


6871 - أخبرنا أبو العبّاس القاسم بن القاسم السَّيَّاري بمَرْوٍ، حَدَّثَنَا أبو المُوجِّه، حَدَّثَنَا أبو عمَّار، حَدَّثَنَا محمد بن يزيد الواسطي، عن مجالد بن سعيد، عن الشَّعْبي، عن مسروق قال: قالت لي عائشةُ: لقد رأيتُ جبريلَ عليه السلام واقفًا في حُجْرتي هذه ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم يُناجِيه، فلما دخل قلتُ: يا رسولَ الله، مَن هذا الذي رأيتُك تناجيه؟ قال: "وهل رأَيتِه؟ " قلت: نعم، قال: "فيمن شبَّهتِه؟ " قلت [1]: بدِحْيةَ الكَلْبي، قال: "لقد رأيتِ خيرًا [2] كثيرًا، ذاكِ جبريل" فما لَبِثَ إِلَّا يسيرًا حتَّى قال: "يا عائشةُ، هذا جبريلُ يقرأُ عليك السلام"، قالت: قلتُ: وعليه السلامُ، جزاه الله من دَخيلٍ خيرًا [3].




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি জিবরাঈল (আঃ)-কে আমার এই হুজরার মধ্যে দাঁড়ানো অবস্থায় দেখেছি এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাথে গোপনে কথা বলছিলেন। অতঃপর যখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রবেশ করলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল, আপনি যার সাথে গোপনে কথা বলছিলেন, তিনি কে? তিনি বললেন, তুমি কি তাকে দেখেছ? আমি বললাম, হ্যাঁ। তিনি বললেন, কার সাথে তাকে সাদৃশ্যপূর্ণ মনে করেছ? আমি বললাম, দিহ্‌ইয়া আল-কালবি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে। তিনি বললেন, তুমি নিশ্চয়ই অনেক কল্যাণ দেখেছ। তিনি ছিলেন জিবরাঈল। এরপর অল্পক্ষণ অতিবাহিত না হতেই তিনি বললেন, হে আয়িশা, এই জিবরাঈল তোমাকে সালাম দিচ্ছেন। (আয়িশা) বললেন, আমি বললাম, তাঁর উপরেও শান্তি বর্ষিত হোক। মেহমান হিসেবে আল্লাহ তাঁকে উত্তম প্রতিদান দিন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] المثبت من (ب)، وفي بقية النسخ: قالت. وأما قصة إقراء جبريل السلامَ على عائشة، فهذه حادثة أخرى لم تره فيها معاينةً، وإنما سمعت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يناجيه فيها كما في الروايات الآتي تخريجُها.أبو الموجه: هو محمد بن عمرو الفَزَاري، وأبو عمار: هو الحسين بن حريث المروزي.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 67 عن محمد بن يزيد الواسطي، بهذا الإسناد.وتابع محمدًا الواسطيَّ عبدُ الرحيم بن سليمان عند ابن أبي شيبة 12/ 130 - 131، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3013)، والطبراني في "الكبير" 23/ (95)، وأبو بكر بنُ عيّاش عند الدينوري في "المجالسة" (298)، فروياه عن مجالد، عن الشعبي، عن مسروق، به.وخالفهم سفيانُ بن عيينة عند الحميدي (277)، وأحمد 41/ (24462) و 42/ (25131)، والطبراني في 23/ (90)، والآجري في "الشريعة" (987) و (1893)، وأبي طاهر المخلص في "المخلصيات" (2606)، وأبي نعيم في "الحلية" 2/ 46 والخطيب في "تاريخه" 7/ 140، فرواه عن مجالد، عن الشعبي، عن أبي سلمة، عن عائشة. وفسّر سفيانُ بن عيينة الدخيلَ بالضيف.وأخرجه أحمد 40/ (24281) و 41/ (24815) و 42/ (25746) و 43/ (25880)، والبخاري (6253)، ومسلم (2447)، وأبو داود (5232)، وابن ماجه (3696)، والترمذي (2693) من طريق زكريا بن أبي زائدة، عن عامر الشعبي، عن أبي سلمة، أنَّ عائشة حدثته: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال لها: "إنَّ جبريل يقرئك السلام" قالت: وعليه السلام ورحمة الله. وصرّح الشعبي عند البخاري وغيره بسماعه له من أبي سلمة.وأخرجه كذلك أحمد 41/ (24574) و (24857)، والبخاري (3217) و (3768) و (6201) و (6249)، ومسلم (2447)، والترمذي (3881)، والنسائي (8851) و (8852) و (10136) و (10137)، وابن حبان (7098) من طريق الزهري، عن أبي سلمة، عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا عائش، هذا جبريل يقرأ عليك السلام"، فقالت: وعليه السلام ورحمة الله، قالت: وهو يرى ما لا نرى.وأخرجه أحمد 42/ (25173)، والنسائي (8850) و (10135) من طريق معمر، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة. جعل مكان أبي سلمة عروةَ بن الزبير. وقال النسائي عن هذه الرواية: خطأ.وأخرجه أحمد 42/ (25154) و (25186) من طريق القاسم بن محمد، عن عائشة مختصرًا.



[2] تحرّف في النسخ الخطية كلمة "خيرًا" إلى: جبريل. وأما قصة إقراء جبريل السلامَ على عائشة، فهذه حادثة أخرى لم تره فيها معاينةً، وإنما سمعت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يناجيه فيها كما في الروايات الآتي تخريجُها.أبو الموجه: هو محمد بن عمرو الفَزَاري، وأبو عمار: هو الحسين بن حريث المروزي.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 67 عن محمد بن يزيد الواسطي، بهذا الإسناد.وتابع محمدًا الواسطيَّ عبدُ الرحيم بن سليمان عند ابن أبي شيبة 12/ 130 - 131، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3013)، والطبراني في "الكبير" 23/ (95)، وأبو بكر بنُ عيّاش عند الدينوري في "المجالسة" (298)، فروياه عن مجالد، عن الشعبي، عن مسروق، به.وخالفهم سفيانُ بن عيينة عند الحميدي (277)، وأحمد 41/ (24462) و 42/ (25131)، والطبراني في 23/ (90)، والآجري في "الشريعة" (987) و (1893)، وأبي طاهر المخلص في "المخلصيات" (2606)، وأبي نعيم في "الحلية" 2/ 46 والخطيب في "تاريخه" 7/ 140، فرواه عن مجالد، عن الشعبي، عن أبي سلمة، عن عائشة. وفسّر سفيانُ بن عيينة الدخيلَ بالضيف.وأخرجه أحمد 40/ (24281) و 41/ (24815) و 42/ (25746) و 43/ (25880)، والبخاري (6253)، ومسلم (2447)، وأبو داود (5232)، وابن ماجه (3696)، والترمذي (2693) من طريق زكريا بن أبي زائدة، عن عامر الشعبي، عن أبي سلمة، أنَّ عائشة حدثته: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال لها: "إنَّ جبريل يقرئك السلام" قالت: وعليه السلام ورحمة الله. وصرّح الشعبي عند البخاري وغيره بسماعه له من أبي سلمة.وأخرجه كذلك أحمد 41/ (24574) و (24857)، والبخاري (3217) و (3768) و (6201) و (6249)، ومسلم (2447)، والترمذي (3881)، والنسائي (8851) و (8852) و (10136) و (10137)، وابن حبان (7098) من طريق الزهري، عن أبي سلمة، عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا عائش، هذا جبريل يقرأ عليك السلام"، فقالت: وعليه السلام ورحمة الله، قالت: وهو يرى ما لا نرى.وأخرجه أحمد 42/ (25173)، والنسائي (8850) و (10135) من طريق معمر، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة. جعل مكان أبي سلمة عروةَ بن الزبير. وقال النسائي عن هذه الرواية: خطأ.وأخرجه أحمد 42/ (25154) و (25186) من طريق القاسم بن محمد، عن عائشة مختصرًا.



6871 [3] - إسناده ضعيف من أجل مجالد بن سعيد، وقد اختلف عليه؛ فرواه مرة عن الشعبي عن مسروق كما في هذه الرواية، ومرة عن الشعبي عن أبي سلمة، وهو الموافق لرواية زكريا بن أبي زائدة عن الشعبي. هذا، وقد جمع مجالد في روايته بين حديثين؛ حديث قصة مجيء جبريل إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في صورة دحية الكلبي وأمره إياه بالخروج إلى بني قريظة، وبين حديث قصة إقراء النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم السلام على عائشة من قبل جبريل. ولا يحفظ في قصة رؤية عائشة لجبريل على صورة دحية أنه قرأ عليها السلام. وسلفت هذه القصة عند المصنّف برقم (4379) من طريق القاسم بن محمد عن عائشة. وأما قصة إقراء جبريل السلامَ على عائشة، فهذه حادثة أخرى لم تره فيها معاينةً، وإنما سمعت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يناجيه فيها كما في الروايات الآتي تخريجُها.أبو الموجه: هو محمد بن عمرو الفَزَاري، وأبو عمار: هو الحسين بن حريث المروزي.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 67 عن محمد بن يزيد الواسطي، بهذا الإسناد.وتابع محمدًا الواسطيَّ عبدُ الرحيم بن سليمان عند ابن أبي شيبة 12/ 130 - 131، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3013)، والطبراني في "الكبير" 23/ (95)، وأبو بكر بنُ عيّاش عند الدينوري في "المجالسة" (298)، فروياه عن مجالد، عن الشعبي، عن مسروق، به.وخالفهم سفيانُ بن عيينة عند الحميدي (277)، وأحمد 41/ (24462) و 42/ (25131)، والطبراني في 23/ (90)، والآجري في "الشريعة" (987) و (1893)، وأبي طاهر المخلص في "المخلصيات" (2606)، وأبي نعيم في "الحلية" 2/ 46 والخطيب في "تاريخه" 7/ 140، فرواه عن مجالد، عن الشعبي، عن أبي سلمة، عن عائشة. وفسّر سفيانُ بن عيينة الدخيلَ بالضيف.وأخرجه أحمد 40/ (24281) و 41/ (24815) و 42/ (25746) و 43/ (25880)، والبخاري (6253)، ومسلم (2447)، وأبو داود (5232)، وابن ماجه (3696)، والترمذي (2693) من طريق زكريا بن أبي زائدة، عن عامر الشعبي، عن أبي سلمة، أنَّ عائشة حدثته: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال لها: "إنَّ جبريل يقرئك السلام" قالت: وعليه السلام ورحمة الله. وصرّح الشعبي عند البخاري وغيره بسماعه له من أبي سلمة.وأخرجه كذلك أحمد 41/ (24574) و (24857)، والبخاري (3217) و (3768) و (6201) و (6249)، ومسلم (2447)، والترمذي (3881)، والنسائي (8851) و (8852) و (10136) و (10137)، وابن حبان (7098) من طريق الزهري، عن أبي سلمة، عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا عائش، هذا جبريل يقرأ عليك السلام"، فقالت: وعليه السلام ورحمة الله، قالت: وهو يرى ما لا نرى.وأخرجه أحمد 42/ (25173)، والنسائي (8850) و (10135) من طريق معمر، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة. جعل مكان أبي سلمة عروةَ بن الزبير. وقال النسائي عن هذه الرواية: خطأ.وأخرجه أحمد 42/ (25154) و (25186) من طريق القاسم بن محمد، عن عائشة مختصرًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6872)


6872 - وأخبرني أبو الحسن علي بن محمد بن عُبيد القرشي بالكوفة، حَدَّثَنَا الحسن بن علي بن عفّان العامري، حَدَّثَنَا أسباط بن محمد القرشي، حَدَّثَنَا مُطرِّف، عن أبي إسحاق، عن مُصعب بن سعد قال: فَرَضَ عمرُ لأمهاتِ المؤمنين عشرةَ آلاف، وزاد عائشةَ ألفينِ، وقال: إنها حبيبةُ رسول الله صلى الله عليه وسلم [1].




মুসআব ইবনু সা'দ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উম্মাহাতুল মু'মিনীনদের জন্য দশ হাজার (ভাতা) নির্ধারণ করলেন এবং আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্য অতিরিক্ত দুই হাজার বাড়িয়ে দিলেন। তিনি বললেন: তিনি তো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রিয়তমা।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد منقطع بين مصعب بن سعد وعمر، وسيأتي موصولًا في الرواية التالية، والمرسل أصح. مطرف هو ابن طريف، وأبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السبيعي. وانظر "علل الدارقطني" (226).وأخرجه مطولًا ومختصرًا ابن سعد في "الطبقات" 10/ 66، والخرائطي في "اعتلال القلوب" (25) - ومن طريقه الخطيب في "تاريخ بغداد" 5/ 100 - والمحاملي في "الأمالي" رواية البيّع (242) من طرق عن أسباط بن محمد، بهذا الإسناد.وأخرجه كذلك مطولًا ومختصرًا أبو عبيد القاسم بن سلام في "الأموال" (554)، وابن أبي شيبة 12/ 302، وابن زنجويه في "الأموال" (803) و (876) من طرق عن أبي إسحاق السبيعي، به.وأخرج أبو عبيد (550) - وعنه ابن زنجويه (798) - من طريق مجالد بن سعيد، عن الشعبي، قال: لما افتتح عمر العراق والشام وجبى الخراج، جمع أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال: إني قد رأيت أن أفرض العطاء لأهله الذين افتتحوه، فقالوا: نعم الرأي رأيت يا أمير المؤمنين، فقال: فيمن نبدأ؟ قالوا: ومن أحق بذلك منك؟ ابدأ بنفسك، قال: لا، ولكني أبدًا بآل رسول الله صلى الله عليه وسلم، فكتب: عائشة أم المؤمنين في اثني عشر ألفًا، وكتب وسائر أزواج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في عشرة آلاف. ومجالد ضعيف.وأخرج ابن زنجويه (799) من طريق أبي بكر بن عيّاش عن عبد الله، عن ابن شِهاب الزهري، عن سعيد بن المسيب قال: لما أُتي عمر بخمس الأعاجم … وفيه: ثم أمر لأمهات المؤمنين بعشرة آلاف، ولعائشة باثني عشر ألفًا. وإسناده إلى سعيد حسنٌ إن شاء الله، وعبد الله: هو ابن علي الأزرق.وأخرج أبو عبيد (601)، وابن زنجويه (874) من طريق يونس بن يزيد، عن سعيد بن المسيب: أنَّ عمر فرض لأزواج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في اثني عشر ألفًا اثني عشر ألفًا، غير جويرية وصفية، فرض لهما في ستة آلاف ستة آلاف. وفي إسناده عبد الله بن صالح، وهو سيئ الحفظ.وأخرج معمر في "الجامع" (20036) عن الزهري عن إبراهيم بن عبد الرحمن بن عوف، قال: لما أتي عمر بكنوز كسرى … وفيه وفرض لأزواج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لكل امرأة منهن اثني عشر ألف درهم، إلَّا صفية وجويرية، فرض لكل واحدة منهما ستة آلاف درهم. قلنا: وكان هذا من عمر باديَ الرأي، ثم نبّهته عائشة إلى أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان يعدل بينهنّ، فعَدَل بينهنّ عمر، أخرج هذا الخبر أحمد 25/ (15905)، ويعقوب الفسوي في "المعرفة والتاريخ" 1/ 463، والبيهقي 6/ 349 من طريق علي بن رباح، عن ناشرة بن سمي اليزني، عن عمر. ورجاله ثقات.ويقوّي هذا ما رواه ابن أبي شيبة 12/ 317 وابن أبي الدنيا في "مجابي الدعوة" (45) من طريق يزيد بن هارون، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة أنه قدم على عمر من البحرين … وفيه: أنَّ عمر فرض لأزواج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في اثني عشر ألفًا اثني عشر ألفًا. وإسناده حسن قال ابن سعد في "الطبقات" 3/ 276: هذا المجتمَع عليه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6873)


6873 - أخبرَناه أبو العبّاس محمد بن أحمد المحبوبي بمَرْوٍ، حَدَّثَنَا سعيد [1] ابن مسعود حَدَّثَنَا عُبيد الله بن موسى، أخبرنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن مصعب بن سعد، عن سعد قال: كان عطاءُ أهلِ بدر ستةَ آلاف ستةَ آلاف، وكان عطاءُ أمهات المؤمنين عشرةَ آلاف عشرةَ آلاف لكلِّ امرأةٍ منهن، غيرَ ثلاثِ نسوةٍ: عائشةَ، فإنَّ عمر قال: أُفضِّلُها بألفينِ لحبِّ رسول الله صلى الله عليه وسلم إياها، وصفيةَ وجُوَيريةَ سبعةَ آلاف سبعةَ آلاف [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه لإرسال مُطَرِّف بن طريف إياه.




সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণকারীদের ভাতা ছিল ছয় হাজার ছয় হাজার (মুদ্রা)। আর উম্মাহাতুল মু'মিনীনদের (নবীজীর স্ত্রীগণ)-এর ভাতা ছিল তাদের প্রত্যেকের জন্য দশ হাজার দশ হাজার (মুদ্রা)। তবে তিনজন মহিলা ব্যতীত: আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), কেননা উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছিলেন: আমি তাঁকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ভালোবাসার কারণে অন্য স্ত্রীদের চেয়ে দুই হাজার বেশি দেব। আর সাফিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং জুওয়াইরিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর (ভাতা ছিল) সাত হাজার সাত হাজার (মুদ্রা)।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: سفيان.



[2] رجاله ثقات، لكن اختلف على أبي إسحاق في وصله وإرساله، والإرسال أصحُّ وأكثر.وأخرجه الدورقي في "مسند سعد" (68) عن عبيد الله بن موسى، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن زنجويه في "الأموال" (876) و (803) عن عبيد الله بن موسى، عن إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن مصعب بن سعد، فذكره مرسلًا كالحديث السابق عند المصنّف، ليس فيه والده سعد.وكذلك رواه سفيان الثوري عند ابن أبي شيبة 12/ 302، والبلاذريِّ في "أنساب الأشراف"، وأبو خيثمة زهيرُ بن معاوية عند أبي عبيد القاسم بن سلام في "الأموال" (554)، وابن سعد 3/ 283، وابن المنذر في "الأوسط" (6366)، كلاهما عن أبي إسحاق السبيعي، عن مصعب مرسلًا، وعندهم أن عطاءَ صفيةَ وجويريةَ كان ستة آلاف بدل سبعة آلاف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6874)


6874 - أخبرنا أبو الفضل الحسن بن يعقوب بن يوسف العَدْل، حَدَّثَنَا يحيى بن أبي طالب، حَدَّثَنَا زيد بن الحُباب، أخبرنا عمر بن سعيد بن أبي حُسين المكي، حدثني عبد الله بن أبي مُليكة، حدثني ذَكْوان أبو عمرو مولى عائشة: أنَّ دُرْجًا قَدِمَ إلى عمر من العِراق وفيه جوهرٌ، فقال لأصحابه: تدرون ما ثمنُه؟ قالوا: لا، ولم يدروا كيف يَقسِمونَه، فقال: تأذنونَ أن أبعثَ به إلى عائشةَ لحبِّ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم إياها؟ قالوا: نعم، فبعثَ به [1] إليها، ففتحته فقالت: ماذا فُتِحَ على ابن الخطاب بعدَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم؟! اللهم لا تُبقِني لعطيَّتِه لقابلٍ [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين إذا صحَّ سماعُ ذكوان أبي عمرو، ولم يخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইরাক থেকে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট একটি বাক্স (উপহার সামগ্রী) এলো, আর তাতে ছিল মণিমুক্তা। তিনি তাঁর সঙ্গীদের বললেন, তোমরা কি জানো এর মূল্য কত? তারা বললেন, না। আর তারা এটাও জানতেন না যে কিভাবে তা বন্টন করা হবে। তখন তিনি বললেন, তোমরা কি আমাকে অনুমতি দাও যে আমি তা আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পাঠিয়ে দেই, যেহেতু রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে ভালোবাসতেন? তাঁরা বললেন, হ্যাঁ। অতঃপর তিনি সেটি তাঁর কাছে পাঠিয়ে দিলেন। তিনি বাক্সটি খুললেন এবং বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর (মৃত্যুর) পরে ইবনুল খাত্তাবের উপর (সম্পদের) কী দ্বার উন্মোচিত হলো?! হে আল্লাহ! তুমি আমাকে তার এই দান গ্রহণ করার জন্য পরবর্তী বছর পর্যন্ত জীবিত রেখো না।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في نسخنا الخطية بها، والمثبت من النسخة المحمودية كما في طبعة الميمان.



[2] إسناده جيد كما قال ابن كثير في "مسند الفاروق" 2/ 324، وقد اختلف على زيد بن الحباب في وصله بذكر عائشة وإرساله بعدم ذكرها.فرواه يحيى بن أبي طالب كما في هذه الرواية، ومحمدُ بن العلاء عند عبد الله في "فضائل الصحابة" (58)، كلاهما عن زيد بن الحباب، بهذا الإسناد. وقال الذهبي في "التلخيص": فيه إرسال.وخالفهما أحمدُ بن حنبل في "فضائل الصحابة" (1642)، وزهيرُ بن حرب عند أبي يعلى كما في "المطالب العالية" (2075) و (4369) - ومن طريقه الضياء المقدسي في "المختارة" (1/ 147) - كلاهما (أحمد وزهير) عن زيد بن الحباب، به موصولًا بذكر عائشة. وسقط من الموضع الثاني من "المطالب" ذكر عائشة!قوله: "دُرْجًا": هو كالسَّفط الصغير تضع فيه المرأةُ خِفَّ متاعها وطِيبَها. قاله ابن الأثير في مادة (درج) من "النهاية".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6875)


6875 - حَدَّثَنَا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حَدَّثَنَا بِشر بن موسى، حَدَّثَنَا الحُميدي، حَدَّثَنَا سفيان، عن عبد الله بن عثمان بن خُثيم، عن ابن أبي مُليكة قال: جاء ابن عبّاس يستأذنُ على عائشةَ في مرضِها، فأبَتْ أن تأذنَ له، فقال لها بنو أخيها: ائذني له، فإنه من خير ولدِك، قالت: دعوني مِن تزكيتِه، فلم يزالوا بها حتَّى أذِنت له، فلما دخلَ عليها قال ابن عَبَّاس: إنَّما سُمِّيتِ أُمّ المؤمنين لِتسعَدي، وإنه لاسمُك قبل أن تُولدي، إنَّكِ كنتِ من أحبِّ أزواج النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم إليه، ولم يكن رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يحبُّ إلَّا طيّبًا، وما بينَكِ وبينَ أن تَلقَي الأحبةَ إلَّا أن تُفارقَ [1] الروحُ الجسدَ، ولقد سقطَتْ قِلادتُك ليلةَ الأبواء، فجعل الله للمسلمين خِيْرةً في ذلك، فأنزل الله تبارك وتعالى آيةَ التيمُّم، ونزلت فيكِ آياتٌ من القرآن، فليس مسجدٌ من مساجِد المسلمين إِلَّا يُتلى فيه عُذرُكِ آناءَ الليل وآناءَ النهار. فقالت: دَعْني من تزكيتِك لي يا ابنَ عبّاس، فوَدِدتُ أَنِّي كنتُ نَسيًا منسيًّا [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: অসুস্থতার সময় আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশের অনুমতি চাইলেন ইবনে আব্বাস, কিন্তু তিনি তাঁকে অনুমতি দিতে অস্বীকার করলেন। তখন তাঁর ভাইয়ের ছেলেরা তাঁকে বললেন: আপনি তাঁকে অনুমতি দিন, কারণ সে আপনার সন্তানদের মধ্যে উত্তম। তিনি বললেন: আমাকে তার প্রশংসা করা থেকে বিরত রাখো। কিন্তু তারা ক্রমাগত অনুরোধ করতে থাকলে তিনি অবশেষে তাঁকে অনুমতি দিলেন। যখন তিনি (ইবনে আব্বাস) তাঁর কাছে প্রবেশ করলেন, তখন বললেন: আপনাকে তো 'উম্মুল মু'মিনীন' (মুমিনদের মাতা) নাম দেওয়া হয়েছে যেন আপনি সৌভাগ্যবতী হন, আর এই নামটি তো আপনার জন্মের আগেই স্থির ছিল। আপনি ছিলেন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট তাঁর স্ত্রীদের মধ্যে সবচেয়ে প্রিয়। আর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পবিত্রতা ছাড়া অন্য কাউকে ভালোবাসতেন না। আপনার এবং প্রিয়জনদের সাথে সাক্ষাতের মধ্যে কেবল এতটুকুই দূরত্ব যে, রূহ শরীর থেকে বিচ্ছিন্ন হবে। আবওয়া নামক স্থানে আপনার গলার হার একবার হারিয়ে গিয়েছিল, আর আল্লাহ এতে মুসলিমদের জন্য কল্যাণ নিহিত রেখেছিলেন, ফলে আল্লাহ তা'আলা তায়াম্মুমের আয়াত নাযিল করেন। এবং আপনার বিষয়ে কুরআনে একাধিক আয়াত নাযিল হয়েছে। মুসলিমদের এমন কোনো মসজিদ নেই যেখানে আপনার পবিত্রতার ঘোষণা দিন-রাত তেলাওয়াত করা হয় না। তখন তিনি (আয়েশা) বললেন: হে ইবনে আব্বাস, আমাকে তোমার এই প্রশংসা করা থেকে বিরত রাখো। আমি তো কামনা করি, যদি আমি সম্পূর্ণরূপে বিস্মৃত হয়ে যেতাম।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في النسخ الخطية: تفارقي!



[2] خبر صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل عبد الله بن عثمان بن خثيم، وباقي رجاله ثقات، لكن ابن أبي مليكة - وهو عبد الله بن عبيد الله - لم يشهد هذه الحادثة، بل أخبره بها ذكوانُ مولى عائشة كما سيأتي في التخريج.وأخرجه أحمد (3/ 1905) من طريق معمر، وابن حبان (7108) من طريق يحيى بن سليم، كلاهما عن عبد الله بن عثمان بن خثيم بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (4/ 2496) من طريق زائدة بن قدامة، وأحمد (5/ 3262) من طريق معمر، وأبو يعلى (2648) من طريق بشر بن المفضل، ثلاثتهم عن عبد الله بن عثمان بن خثيم، عن عبد الله بن أبي مليكة، أنه حدَّثه ذكوانُ حاجبُ عائشة: أنه جاء عبدُ الله بن عبّاس يستأذن على عائشة … فذكره.وأخرجه البخاري (4753) من طريق عمر بن سعيد بن أبي الحسين، عن ابن أبي مليكة، قال: استأذن ابن عبّاس قبل موتها على عائشة … فذكر نحوه.وأخرجه مختصرًا البخاري (3771) و (4754) من طريق القاسم بن محمد، عن عائشة.وأخرج أحمد 3/ (1906) و 4/ (2497) عن سفيان بن عيينة، عن ليث بن أبي سليم، عن رجل، عن ابن عبّاس، أنه قال لها: إنما سميت أم المؤمنين لتسعدي، وإنه لاسمك قبل أن تولدي. وهذا الرجل المبهم سمَّاه زهيرُ بن معاوية عند ابن سعد في "الطبقات" 10/ 74، وزائدةُ ابن قدامة عند الخطيب في "موضح الأوهام" 1/ 462 في روايتيهما عن ليث: عبدَ الرحمن بن سابط، وهو ثقة. وليث حسن في المتابعات والشواهد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6876)


6876 - حدثني علي بن عيسى، حَدَّثَنَا إبراهيم بن أبي طالب، حَدَّثَنَا ابن أبي عمر، حَدَّثَنَا سفيان، عن أبي سعد سعيد بن المَرزُبان، عن عبد الرحمن بن الأسود، عن أبيه قال: قالت عائشة: ما تزوَّجني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حتَّى أتاه جبريلُ بصُورتي، وقال: هذه زوجتُك، وتزوَّجني وإني لجاريةٌ عليَّ حَوْف، فلمَّا تزوجني ألقى الله عليَّ حياءً وأنا صغيرةُ [1].قال سفيان: قال الزُّهْري: الحَوْف: سُيُورٌ [2] تكون في وَسَطِها.هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বিবাহ করেননি, যতক্ষণ না জিবরীল (আঃ) আমার আকৃতি নিয়ে তাঁর কাছে এলেন এবং বললেন, ‘এই আপনার স্ত্রী।’ তিনি আমাকে বিবাহ করলেন যখন আমি ছিলাম একজন বালিকা, যার পরিধানে ছিল ‘হাওফ’। যখন তিনি আমাকে বিবাহ করলেন, আল্লাহ আমার উপর লজ্জা (হায়া) চাপিয়ে দিলেন, যদিও আমি ছিলাম ছোট। সুফিয়ান বলেন: যুহরী বলেছেন: ‘হাওফ’ হলো: ফিতা বা রশি যা কোমরে ব্যবহৃত হয়।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف من أجل سعيد بن المرزبان. وقال الذهبي في "السير" 2/ 164: تفرَّد به أبو سعد البقَّال، ليِّن الحديث. ابن أبي عمر: هو محمد بن يحيى العدني.وأخرجه الحميدي في "مسنده" (234)، والبلاذري في "أنساب الأشراف" 1/ 411، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3029)، والبزار (2660 - كشف الأستار)، وأبو يعلى (4822)، والطبراني (23/ 64) و (154)، وابن عدي في "الكامل" 3/ 385 من طرق عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد.وأخرج البزار بنحوه (2659) من طريق عبد الرحمن بن محمد المحاربي، عن أبي سعد، به.وأخرج أحمد (40/ 24142) و (41/ 24971)، والبخاري (3895) و (5125) و (7011) و (7012)، ومسلم (2438) من طريق عروة بن الزبير، عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أريتك قبل أن أتزوجك مرتين، رأيت الملك يحملك في سرقة من حرير، فقلت له: اكشف، فكشف فإذا هي أنت، فقلت: إن يكن هذا من عند الله يمضه، ثم أريتك يحملك في سرقة من حرير، فقلت: اكشف، فكشف، فإذا هي أنت، فقلت: إن يك هذا من عند الله يمضه".وقصة إتيان الملَك بصورتها، ستأتي ضمن حديثها الآتي برقم (6879).



[2] السُّيُور: جمع سَيْر، وهو حِزام من جِلْد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6877)


6877 - أخبرنا عبد الله بن الحسين القاضي بمَرْوٍ، حَدَّثَنَا الحارث بن أبي أسامة، حَدَّثَنَا يزيد بن هارون، أخبرنا حماد بن سَلَمة، حَدَّثَنَا هشام بن عُرْوة، عن عوف بن الحارث بن الطُّفيل، عن رُمَيثةَ أمِّ عبد الله بن محمد بن أبي عَتيق، عن أمِّ سلمة قالت: كلَّمني صواحبي أن أُكلِّمَ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم أن يأمرَ الناسَ فيُهدُون له حيث كان، فإنَّ الناسَ يتحرَّونَ بهداياهم يومَ عائشة، وإِنَّا نُحِبُّ الخيرَ كما تحبُّه عائشةُ، فقلتُ: يا رسولَ الله، إنَّ صواحبي كلَّمْنَني أن أكلِّمك أن تأمرَ الناسَ فيُهدون لكَ حيث كنتَ، فإنَّ الناس يتحرَون بهداياهم يومَ عائشةَ، وإنَّا نحبُّ الخيرَ كما تحبُّه عائشةُ، فسكت رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فلم يُراجِعْني، فجاءني صواحبي، فأخبرتُهن بأنَّه صلى الله عليه وسلم لم يُكلِّمني، فقُلنَ: والله لا تَدَعيهِ، وما هذا حينَ تَدَعيه، قالت: فدارَ فكلَّمتُه، فقلتُ: إِنَّ صواحبي قُلنَ لي أن أُكلِّمَك تأمرُ الناسَ فيُهدون لكَ حيث كنتَ، فقلتُ له مثلَ المقالة الأُولى مرَّتين أو ثلاثًا، كلُّ ذلك يسكتُ عنها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، ثم قال: "يا أُمّ سَلَمة، لا تُؤذيني في عائشةَ، فإنِّي والله ما نزل الوحيُ عليَّ وأنا في بيتِ امرأةٍ من نسائي غيرَ عائشة" قالت: فقلتُ: أعوذُ بالله أن أسُوءَك في عائشة [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার সহধর্মিণীরা আমাকে বললেন যে, আমি যেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কথা বলি এবং তাঁকে আদেশ করতে বলি যে, মানুষ যেন তাঁকে যেখানে পান সেখানেই হাদিয়া (উপহার) পাঠান। কারণ লোকেরা তাদের হাদিয়া-উপহার নিয়ে আয়িশা’র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দিনের অপেক্ষা করে (বা সেই দিনের লক্ষ্য রাখে), আর আমরাও কল্যাণ (সওয়াব) পছন্দ করি যেমনটি আয়িশা পছন্দ করেন। তখন আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার সহধর্মিণীরা আমার সাথে কথা বলেছেন যে, আমি যেন আপনার কাছে বলি, আপনি মানুষকে আদেশ করুন যে, তারা যেন আপনার কাছে যেখানে আপনি থাকেন সেখানেই হাদিয়া পাঠায়। কারণ লোকেরা তাদের হাদিয়া নিয়ে আয়িশা’র দিনের অপেক্ষা করে, আর আমরাও কল্যাণ (সওয়াব) পছন্দ করি যেমনটি আয়িশা পছন্দ করেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চুপ থাকলেন এবং আমাকে কোনো উত্তর দিলেন না।

তখন আমার সহধর্মিণীরা আমার কাছে এলেন। আমি তাঁদের জানালাম যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে কোনো কথা বলেননি। তাঁরা বললেন: আল্লাহর কসম! তুমি তাঁকে ছেড়ে দিও না, এটা ছেড়ে দেওয়ার সময় নয়। তিনি (উম্মু সালামা) বলেন: অতঃপর আমি ফিরে গিয়ে তাঁর সাথে কথা বললাম এবং বললাম: আমার সহধর্মিণীরা আমাকে বলেছেন যে, আমি যেন আপনার কাছে বলি যে, আপনি মানুষকে আদেশ করুন যে, তারা যেন আপনাকে যেখানে আপনি থাকেন সেখানেই হাদিয়া পাঠায়। আমি তাঁকে প্রথমবারের মতো দু'বার বা তিনবার বললাম। প্রতিবারই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চুপ থাকতেন। এরপর তিনি বললেন: "হে উম্মু সালামা! আয়িশার বিষয়ে আমাকে কষ্ট দিও না। কেননা আল্লাহর কসম! আমার অন্য কোনো স্ত্রীর ঘরে থাকাকালে আমার প্রতি ওহী নাযিল হয়নি, শুধু আয়িশার ঘরে থাকাকালে ছাড়া।" তিনি (উম্মু সালামা) বললেন: আমি আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই যে, আমি যেন আয়িশার বিষয়ে আপনাকে খারাপ কিছু বলি।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد، عوف بن الحارث روى عنه جمع، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وأخرج له البخاري حديثًا في "صحيحه"، فمثله حسن الحديث إن شاء الله، ورميثة: هي أخت عوف بن الحارث الراوي عنها، وذكرها ابن حبان في "الثقات"، وقد توبعت عليه.وأخرجه أحمد (44/ 26513) عن عفان بن مسلم، عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (26512)، وابن حبان (7109) من طريق حماد بن أسامة، والنسائي (8847) من طريق عبدة بن سليمان، كلاهما عن هشام بن عروة، به.وأخرجه تامًّا ومقطعًا البخاري (2580) و (3775)، والترمذي (3879)، والنسائي (8323) و (8846) من طريق حماد بن زيد، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة نحوه. وقال الترمذي: حسن غريب.وأخرجه البخاري (2574)، ومسلم (2441)، والنسائي (8848) من طريق عبدة بن سليمان، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة مختصرًا بلفظ: أن الناس كانوا يتحرَّونَ بهداياهم يومَ عائشةَ، يبتغون بذلك مرضاةَ رسول الله صلى الله عليه وسلم. وقال النسائي: وهذان الحديثان صحيحان عن عبدة، يعني طريقيه: عن هشام عن عوف عن رميثة، وعن هشام عن أبيه عروة.وأخرجه البخاري (2581) من طريق سليمان بن بلال، عن هشام بن عروة، عن أبيه، به مطولًا، وفيه زيادات. وانظر "العلل" للدارقطني (3820)، و"فتح الباري" لابن حجر 8/ 218.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6878)


6878 - حَدَّثَنَا أبو أحمد محمد بن الحسين الشَّيباني، حَدَّثَنَا أبو عبد الرحمن أحمد بن شُعيب الفقيه النَّسائي بمصر، حَدَّثَنَا سعيد بن يحيى بن سعيد الأُموي، حدثني أبي، حدثني أبو العَنْبَس، عن أبيه، حدثتنا عائشةُ: أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم ذكر فاطمةَ، قالت: فتكلَّمتُ أنا، فقال: "أما ترضَيْنَ أن تكوني زوجتي في الدنيا والآخرة؟ " قلتُ: بلى والله، قال: "فأنتِ زوجتي في الدنيا والآخرة" [1].أبو العَنْبس هذا سعيد بن كثير مدنيٌّ ثقة، والحديث صحيح ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কথা আলোচনা করলেন। (আয়িশা রাঃ) বললেন, তখন আমি কিছু বললাম। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি কি এতে সন্তুষ্ট নও যে তুমি দুনিয়া ও আখিরাতে আমার স্ত্রী হবে?" আমি বললাম, হ্যাঁ, আল্লাহর কসম! (আমি সন্তুষ্ট)। তিনি বললেন, "তাহলে তুমি দুনিয়া ও আখিরাতে আমার স্ত্রী।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده حسن، رجاله ثقات غير والد أبي العنبس - واسمه كثير بن عبيد - فقد روى عنه جمع، وذكره ابن حبان في "الثقات". أبو العنبس: هو سعيد بن كثير.وأخرجه ابن حبان (7095) عن ابن خزيمة، عن سعيد بن يحيى بن سعيد، بهذا الإسناد.وأخرج الترمذي (3880)، وابن حبان (7094) من طريق عبد الله بن عبيد الله بن أبي مليكة، عن عائشة قالت: جاء بي جبريل إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم في خرقة حرير، فقال: "هذه زوجتك في الدنيا والآخرة". وقال الترمذي: حسن غريب.وسيأتي معناه برقم (6892)، وانظر (6867).