হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6899)


6899 - حَدَّثَنَا أبو العبّاس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا أبو أسامة الحَلَبي، حَدَّثَنَا حجَّاج بن أبي مَنيع، عن جدِّه، عن الزُّهْري قال: ثم تزوَّج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم حفصةَ بنتَ عمر بن الخطاب، وكانت قبله تحتَ خُنيس بن حُذافة السَّهْمي [1].




যুহরী থেকে বর্ণিত, অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কন্যা হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিবাহ করেন। তাঁর পূর্বে তিনি খুনাইস ইবনু হুযাফা আস-সাহমীর স্ত্রী ছিলেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده جيد إلى الزهري، وهو مرسل أو معضل.وأخرجه البيهقي في "السنن" 7/ 70 - 71 عن أبي عبد الله الحاكم مطولًا.وأخرجه البيهقي في "السنن" 7/ 70 - 71، وفي "دلائل النبوة" 7/ 282 - 284 من طريق يعقوب بن سفيان، عن حجاج بن أبي منيع، به مطولًا.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 206 من طريق محمد بن عبد الله، عن الزهري، به مطولًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6900)


6900 - حَدَّثَنَا علي بن حَمْشاذَ العَدْل، حَدَّثَنَا هشام بن علي السَّدوسي، حَدَّثَنَا موسى بن إسماعيل، حَدَّثَنَا حماد بن سَلَمة، عن علي بن زيد، عن سعيد بن المسيّب قال: آمَتْ حفصةُ بنت عمر بن الخطاب من زوجِها، وآمَ عثمانُ من رُقيَّة، فمرَّ عمرُ بعثمان فقال: هل لك في حفصة؟ فلم يُحِرْ إليه شيئًا، فأتى عمر النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال: ألم تَرَ إلى عثمانَ، عرضتُ عليه حفصةَ فأعرضَ عنّي ولم يُحِرْ إليَّ شيئًا، فقال النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم: "فخيرٌ من ذلك، أتزوَّجُ أنا حفصة، وأُزوِّجُ عثمانَ أمَّ كُلثوم"، فتزوَّج النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم حفصةَ، وزوج عثمانَ أُمَّ كُلثوم بنت رسولِ الله صلى الله عليه وسلم [1].




সাঈদ ইবনুল মুসাইয়াব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কন্যা হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার স্বামী থেকে বিধবা হলেন, এবং উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রুকাইয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (এর মৃত্যুর কারণে) বিধবা হলেন, তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছ দিয়ে যাচ্ছিলেন এবং বললেন: হাফসার বিষয়ে আপনার কি কোনো আগ্রহ আছে? কিন্তু তিনি তাকে কোনো উত্তর দিলেন না। এরপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন: আপনি কি উসমানকে দেখেননি? আমি তার কাছে হাফসার প্রস্তাব দিলাম, কিন্তু তিনি আমার দিক থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন এবং কোনো উত্তর দিলেন না। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এর চেয়েও উত্তম হবে। আমি হাফসাকে বিবাহ করব এবং উসমানের সাথে উম্মে কুলসুমের বিবাহ দেব।" অতঃপর নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাফসাকে বিবাহ করলেন এবং উসমানের সাথে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা উম্মে কুলসুম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিবাহ দিলেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناده ضعيف من أجل علي بن زيد: وهو ابن جُدعان.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 82 وإسحاق بن راهويه في "مسنده" (2006) عن سليمان بن حرب، عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 82، عن سليمان بن حرب، عن حماد بن زيد، عن علي بن زيد بنحوه، ولم يسق لفه. وزاد قال سعيد فخار الله لهما جميعًا، كان رسول الله صلى الله عليه وسلم لحفصة خيرًا من عثمان، وكانت بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم لعثمان خيرًا من حفصة بنت عمر.ويشهد له حديث عمر عند البخاري (4005) وغيره.وانظر حديث أنس الآتي برقم (7032).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6901)


6901 - فحدَّثني أبو عبد الله الأصبهاني، حَدَّثَنَا الحسن بن الجَهْم، حَدَّثَنَا الحسين بن الفَرَج، حَدَّثَنَا محمد بن عمر، أنَّ أسامة بن زيد بن أسلم حدثه عن أبيه، عن جده، عن عمر قال: وُلدت حفصةُ وقريشٌ تبني البيتَ قبل مبعثِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم بخمس سنين [1].




উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জন্মগ্রহণ করেন যখন কুরাইশরা কাবাঘর নির্মাণ করছিল, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নবুওয়াত প্রাপ্তির পাঁচ বছর আগে।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف من أجل أسامة بن زيد، وسبق الكلام على إسناده إلى محمد بن عمر الواقدي عند الحديث السالف برقم (4060).وأخرجه ابن سعد في الطبقات" 10/ 80، والطبري في "تاريخه" 11/ 603 من طريق محمد بن عمر الواقدي، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6902)


6902 - قال ابن عمر: وحدثني أبو بكر بن عبد الله بن أبي سَبْرة، عن حسين بن أبي حسين قال: تزوّج رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حفصةَ في شعبان على رأس ثلاثين شهرًا قبلَ أُحد [1].




ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবূ বাকর ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু আবী সাবরাহ আমার নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি হুসাইন ইবনু আবী হুসাইন থেকে বর্ণনা করেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উহুদের [যুদ্ধের] ত্রিশ মাস আগে শাবান মাসে হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিবাহ করেছিলেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] أخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 82 والطبري في "تاريخه" 11/ 603 من طريق محمد بن عمر الواقدي، بهذا الإسناد. وابن أبي سبرة متَّهم.وأخرجه ابن سعد 10/ 206 عن الواقدي، عن محمد بن عبد الله، عن الزهري. وعن الواقدي، عن كثير بن زيد عن المطلب بن عبد الله بن حنطب قالا؛ فذكراه مطولًا.وأخرجه الزبير بن بكار في "المنتخب من كتاب أزواج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم"، ص 39 عن محمد بن حسن، عن محمد بن موسى أبي غزية، عن سعيد بن أبي زيد، عن ربيح بن عبد الرحمن بن أبي سعيد الخدري، عن أبيه، عن جده قال: تزوّج رسول الله صلى الله عليه وسلم حفصةَ بنت عمر في شعبان على رأس ثلاثين شهرًا من الهجرة قبل أحد بشهرين. وإسناده تالف لا يُفرح به فيه محمد بن حسن - وهو ابن زبالة - متروك متهم.وتزوُّجُ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وحفصة قبل أُحد هو ما ذهب إليه الواقديُّ وصاحبه ابن سعد، وذلك بعد وفاة زوجها خُنيس بن حُذافة السَّهمي من جِراحات أصابته ببدر، وقيل: إنه قُتل بأُحد، قال ابن سيّد الناس في "عيون الأثر" 2/ 369: والأول أشهر. وانظر "فتح الباري" 15/ 351.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6903)


6903 - قال ابن عمر: حَدَّثَنَا مَعمَر، عن الزُّهْري، عن سالم، عن أبيه، قال: تُوفِّيت حفصةُ في شعبان سنةَ خمسٍ وأربعين، فصلَّى عليها مروانُ بن الحَكَم وهو يومئذٍ عاملُ المدينة [1].




আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পঁয়তাল্লিশ (৪৫) হিজরীর শাবান মাসে ইন্তেকাল করেন। তখন মদীনার গভর্নর মারওয়ান ইবনুল হাকাম তাঁর জানাযার সালাত পড়ান।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] أخرجه ابن سعد 10/ 84، والطبري في "تاريخه" 11/ 603 من طريق محمد بن عمر الواقدي، بهذا الإسناد. ومن فوق الواقدي ثقات. وذكره ابن حبان في ثقات التابعين 5/ 316، وقال ابن حجر في "الإصابة" 5/ 559: قيس بن زيد تابعيّ صغير، أرسل حديثًا، فذكره جماعةٌ منهم الحارث بن أبي أسامة في الصحابة!أبو عمران الجوني: هو عبد الملك بن حبيب الأزدي، ويقال: الكندي.وأخرجه أبو نعيم في "الحلية" 2/ 50 من طريق علي بن محمد بن أبي الشوارب، ثنا موسى بن إسماعيل التبوذكي، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 82 والبلاذري في "أنساب الأشراف" 1/ 426، والحارث في "مسنده" كما في "بغية الباحث" (1000) و (1001)، والطبراني في "الكبير" 18/ (934)، وأبو نعيم في "الحلية" 2/ 50 وفي "معرفة الصحابة" (5720) من طرق عن حماد بن سلمة، به.وله شاهد من حديث عقبة بن عمرو عند الطحاوي في "شرح المشكل" (4614)، وإسناده حسن في المتابعات والشواهد، وقال الذهبي في "السير" 2/ 228 - 229: إسناده صالح.وآخر من حديث أنس يأتي ذكره في الحديث التالي.وفي الباب عن عمر، سلف برقم (2856).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6904)


6904 - قال ابن عمر: فحدثني علي بن مُسلم [عن] [1] المَقبُري، عن أبيه قال: رأيتُ مروانَ حَمَلَ بين عمودَيْ سريرِ حفصةَ من عند دار آلِ حَزْم إلى دار المغيرة بن شُعبة، وحملَها أبو هريرة من دارِ المغيرة إلى قبرها [2].




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আলী ইবনু মুসলিম আমাকে মাকবুরীর সূত্রে তাঁর পিতা থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি (পিতা) বলেন: আমি মারওয়ানকে দেখলাম হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খাটিয়ার দু’পাশের স্তম্ভ ধরে আলে হাযমের বাড়ি থেকে মুগীরা ইবনু শু‘বার বাড়ি পর্যন্ত বহন করতে। আর আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে মুগীরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বাড়ি থেকে তাঁর কবর পর্যন্ত বহন করেছিলেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] ما بين المعقوفين سقط من النسخ الخطية، وأثبتناه من مصادر التخريج. وذكره ابن حبان في ثقات التابعين 5/ 316، وقال ابن حجر في "الإصابة" 5/ 559: قيس بن زيد تابعيّ صغير، أرسل حديثًا، فذكره جماعةٌ منهم الحارث بن أبي أسامة في الصحابة!أبو عمران الجوني: هو عبد الملك بن حبيب الأزدي، ويقال: الكندي.وأخرجه أبو نعيم في "الحلية" 2/ 50 من طريق علي بن محمد بن أبي الشوارب، ثنا موسى بن إسماعيل التبوذكي، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 82 والبلاذري في "أنساب الأشراف" 1/ 426، والحارث في "مسنده" كما في "بغية الباحث" (1000) و (1001)، والطبراني في "الكبير" 18/ (934)، وأبو نعيم في "الحلية" 2/ 50 وفي "معرفة الصحابة" (5720) من طرق عن حماد بن سلمة، به.وله شاهد من حديث عقبة بن عمرو عند الطحاوي في "شرح المشكل" (4614)، وإسناده حسن في المتابعات والشواهد، وقال الذهبي في "السير" 2/ 228 - 229: إسناده صالح.وآخر من حديث أنس يأتي ذكره في الحديث التالي.وفي الباب عن عمر، سلف برقم (2856).



[2] علي بن مسلم - وهو ابن خبّاب - مجهول، ذكره ابن أبي حاتم 6/ 203، وسكت عنه، ولم يذكر أيّ راو عنه، وذكره ابن حبان في "ثقاته"، وقال: يروي عن سعيد المقبري، روى عنه العراقيون.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 84 - وعنه البلاذري في "أنساب الأشراف" 1/ 428 - والطبري في "تاريخه" 11/ 603 من طريق محمد بن عمر الواقدي، بهذا الإسناد. وذكره ابن حبان في ثقات التابعين 5/ 316، وقال ابن حجر في "الإصابة" 5/ 559: قيس بن زيد تابعيّ صغير، أرسل حديثًا، فذكره جماعةٌ منهم الحارث بن أبي أسامة في الصحابة!أبو عمران الجوني: هو عبد الملك بن حبيب الأزدي، ويقال: الكندي.وأخرجه أبو نعيم في "الحلية" 2/ 50 من طريق علي بن محمد بن أبي الشوارب، ثنا موسى بن إسماعيل التبوذكي، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 82 والبلاذري في "أنساب الأشراف" 1/ 426، والحارث في "مسنده" كما في "بغية الباحث" (1000) و (1001)، والطبراني في "الكبير" 18/ (934)، وأبو نعيم في "الحلية" 2/ 50 وفي "معرفة الصحابة" (5720) من طرق عن حماد بن سلمة، به.وله شاهد من حديث عقبة بن عمرو عند الطحاوي في "شرح المشكل" (4614)، وإسناده حسن في المتابعات والشواهد، وقال الذهبي في "السير" 2/ 228 - 229: إسناده صالح.وآخر من حديث أنس يأتي ذكره في الحديث التالي.وفي الباب عن عمر، سلف برقم (2856).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6905)


6905 - قال ابن عمر: وحدثني عبد الله بن نافع قال: نزَلَ في قبر حفصةَ عبدُ الله وعاصمٌ ابنا عمر، وسالمٌ وعبد الله وحمزة بنو عبد الله بن عمر [1].




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আবদুল্লাহ ইবনে নাফি' আমাকে বলেছেন: উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দুই পুত্র আবদুল্লাহ ও আসিম এবং আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পুত্রগণ—সালিম, আবদুল্লাহ ও হামযাহ—হফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কবরে নেমেছিলেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف، عبد الله بن نافع - وهو مولى ابن عمر - ضعيف.وأخرجه ابن سعد 10/ 84، والطبري في "تاريخه" 11/ 603 من طريق محمد بن عمر الواقدي، عن عبد الله بن نافع، عن أبيه. فزادا فيه: عن أبيه. وذكره ابن حبان في ثقات التابعين 5/ 316، وقال ابن حجر في "الإصابة" 5/ 559: قيس بن زيد تابعيّ صغير، أرسل حديثًا، فذكره جماعةٌ منهم الحارث بن أبي أسامة في الصحابة!أبو عمران الجوني: هو عبد الملك بن حبيب الأزدي، ويقال: الكندي.وأخرجه أبو نعيم في "الحلية" 2/ 50 من طريق علي بن محمد بن أبي الشوارب، ثنا موسى بن إسماعيل التبوذكي، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 82 والبلاذري في "أنساب الأشراف" 1/ 426، والحارث في "مسنده" كما في "بغية الباحث" (1000) و (1001)، والطبراني في "الكبير" 18/ (934)، وأبو نعيم في "الحلية" 2/ 50 وفي "معرفة الصحابة" (5720) من طرق عن حماد بن سلمة، به.وله شاهد من حديث عقبة بن عمرو عند الطحاوي في "شرح المشكل" (4614)، وإسناده حسن في المتابعات والشواهد، وقال الذهبي في "السير" 2/ 228 - 229: إسناده صالح.وآخر من حديث أنس يأتي ذكره في الحديث التالي.وفي الباب عن عمر، سلف برقم (2856).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6906)


6906 - أخبرني أبو بكر الشافعي، حَدَّثَنَا محمد بن غالب، حَدَّثَنَا موسى بن إسماعيل، حَدَّثَنَا حماد بن سَلَمة، أخبرنا أبو عمران الجَوْنِي، عن قيس بن زيد: أَنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم طلَّق حفصة بنت عمر، فدخل عليها خالاها قُدَامةُ وعثمانُ ابنا مَظْعون، فبكت وقالت: والله ما طلَّقني عن شَنيع، وجاء النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فقال: "قال لي جبريل عليه السلام: راجع حفصةَ، فإنَّها صوَّامة قوَّامة، وإنَّها زوجتُك في الجنة" [1].




কাইস ইবনু যায়দ থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাফসা বিনত উমারকে তালাক দিয়েছিলেন। তখন তাঁর দুই মামা কুদামা ও উসমান ইবনু মা'ঊন তাঁর নিকট প্রবেশ করলেন। তিনি কেঁদে বললেন, আল্লাহর কসম! তিনি কোনো খারাপ (আচরণের) কারণে আমাকে তালাক দেননি। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসলেন এবং বললেন, "জিবরীল (আঃ) আমাকে বললেন: আপনি হাফসাকে ফিরিয়ে নিন। কেননা তিনি অত্যন্ত সাওম পালনকারিণী ও অত্যন্ত সালাত আদায়কারিণী এবং তিনি জান্নাতে আপনার স্ত্রী।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف، ورجاله ثقات معروفون غير قيس بن زيد، قال أبو حاتم الرازي كما في "الجرح والتعديل" 7/ 98: روى عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مرسلًا، لا أعلم له صحبة، روى عنه أبو عمران الجوني، وقال أبو نعيم في "معرفة الصحابة": مجهول، لا تصحُّ له صحبة ولا رؤية، وذكره ابن حبان في ثقات التابعين 5/ 316، وقال ابن حجر في "الإصابة" 5/ 559: قيس بن زيد تابعيّ صغير، أرسل حديثًا، فذكره جماعةٌ منهم الحارث بن أبي أسامة في الصحابة!أبو عمران الجوني: هو عبد الملك بن حبيب الأزدي، ويقال: الكندي.وأخرجه أبو نعيم في "الحلية" 2/ 50 من طريق علي بن محمد بن أبي الشوارب، ثنا موسى بن إسماعيل التبوذكي، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 82 والبلاذري في "أنساب الأشراف" 1/ 426، والحارث في "مسنده" كما في "بغية الباحث" (1000) و (1001)، والطبراني في "الكبير" 18/ (934)، وأبو نعيم في "الحلية" 2/ 50 وفي "معرفة الصحابة" (5720) من طرق عن حماد بن سلمة، به.وله شاهد من حديث عقبة بن عمرو عند الطحاوي في "شرح المشكل" (4614)، وإسناده حسن في المتابعات والشواهد، وقال الذهبي في "السير" 2/ 228 - 229: إسناده صالح.وآخر من حديث أنس يأتي ذكره في الحديث التالي.وفي الباب عن عمر، سلف برقم (2856).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6907)


6907 - حَدَّثَنَا علي بن حَمْشاذَ، حَدَّثَنَا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حَدَّثَنَا مسلم بن إبراهيم، حَدَّثَنَا الحسن بن أبي جعفر، حَدَّثَنَا ثابت، عن أنس: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم طلَّق حفصةَ تطليقةً، فأتاه جبريلُ عليه الصلاة والسلام فقال: يا محمدُ، طلَّقتَ حفصةَ وهي صوَّامة قوَّامة، وهي زوجتُك في الجنَّة؟! فراجَعَها [1]. ‌‌ذكر أم المؤمنين أمِّ سلمةَ بنت أبي أُميّة رضي الله عنها




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এক তালাক দিয়েছিলেন। অতঃপর তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছে জিবরীল (আঃ) এলেন এবং বললেন: "হে মুহাম্মাদ! আপনি হাফসাকে তালাক দিয়েছেন, অথচ তিনি হচ্ছেন অধিক সাওম পালনকারিণী ও অধিক কিয়ামুল্লাইল আদায়কারিণী। আর তিনি জান্নাতে আপনার স্ত্রী হবেন!" তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে ফিরিয়ে নিলেন। উম্মুল মু'মিনীন উম্মে সালামা বিনতে আবি উমায়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আলোচনা।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حسن لغيره كسابقه، وهذا إسناد ضعيف من أجل الحسن بن أبي جعفر، واختلف عليه في روايته كما سيأتي.وأخرجه الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (4615) عن محمد بن إبراهيم بن يحيى، عن مسلم بن إبراهيم، بهذا الإسناد.وخالف الوليدُ بن عبد الرحمن الجاروديُّ مسلمَ بن إبراهيم عند ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3052)، والبزار في "مسنده" (1401)، والطبراني في "الكبير" 23/ (306)، وابن عدي في "الكامل" 2/ 307 وأبي نعيم في "الحلية" 2/ 50، وفي "معرفة الصحابة" (7402)، فرواه عن الحسن بن أبي جعفر، عن عاصم بن بهدلة، عن زر بن حبيش، عن عمار بن ياسر.وهذا من ضعف الحسن بن أبي جعفر.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (151). ومن طريقه ابن الفاخر في "موجبات الجنة" (422)، والضياء المقدسي في "المختارة" 7/ (2507) - من طريق شعبة، عن قتادة، عن أنس قال: طلَّق النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم حفصة، فاغتمَّ الناس من ذلك، ودخل عليها خالها عثمان بن مظعون، وأخوه قُدامة، فبينما هما عندها، وهم مغتمين، إذ دخل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم على حفصة، فقال: "يا حفصة، أتاني جبريل آنفًا، فقال: إن الله يقرئك السلام، ويقول لك: راجِعْ حفصة، فإنها صوَّامة قوَّامة، وهي زوجتك في الجنة". وقال: لم يروه عن شعبة إلَّا يحيى بن أبي بكير، تفرَّد به موسى بن أبي سهل. قلنا: وموسى بن أبي سهل المصري، لم نقف له على ترجمة.وأخرجه البزار في "مسنده" (7091) من طريق سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة عن أنس، مختصرًا بقصة طلاقها وإرجاعها. وجعل الدارقطني في "العلل" (2548) أنَّ الصواب في رواية ابن أبي عروبة عن قتادة أنها مرسلة.وسلف الحديث مختصرًا عند المصنّف برقم (2855) بسند صحيح.



6908 - Null



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আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6908)


6908 - حَدَّثَنَا علي بن حَمْشاذ العَدْل، حَدَّثَنَا بِشر بن موسى، حَدَّثَنَا الحُميدي، عن سفيان قال: أم سلمة أولُ مهاجرةٍ من النساء.




সুফিয়ান থেকে বর্ণিত, উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হলেন নারীদের মধ্যে প্রথম হিজরতকারিণী।









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6909)


6909 - أخبرنا إسماعيل بن محمد بن الفضل بن محمد الشَّعراني، حَدَّثَنَا جدِّي، حَدَّثَنَا إبراهيم بن المنذر الحِزامي، حَدَّثَنَا محمد بن فُليح، عن موسى بن عقبة، عن ابن شِهاب قال: وممَّن قَدِمَ على النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم بمكة من مُهاجِرة أرض الحبشة الأُولى، ثم هاجرَ إلى المدينة، أبو سلمة بنُ عبد الأسد، وامرأتُه أمُّ سلمة بنتُ أبي أُمية.




ইবনে শিহাব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবিসিনিয়া (হাবশা) থেকে প্রথম হিজরতকারীদের মধ্যে যারা মক্কায় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করেছিলেন, অতঃপর মদীনায় হিজরত করেন—তাঁদের মধ্যে ছিলেন আবু সালামাহ ইবনু আব্দুল আসাদ এবং তাঁর স্ত্রী উম্মু সালামাহ বিনত আবী উমাইয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6910)


6910 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيِه، حَدَّثَنَا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حَدَّثَنَا مصعب بن عبد الله الزُّبيري قال: كانت أمُّ سلمة اسمُها رَمَلَةُ، وهي أولُ ظَعينةٍ دخلت المدينةَ مهاجرةً، وكانت قبل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم عند أبي سلمة عبد الله بن عبد الأسد بن هلال بن عبد الله بن عمر بن مخزوم، وهو أولُ من هاجر إلى أرض الحبشة، وشَهِدَ بدرًا، وتُوفِّي على عهد رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فوَلَدَت لأبي سلمة: سلمةَ وعمرَ ودُرَّةَ وزينبَ، أمُّهم أمُّ سلمة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فخَلَفَ عليها النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم بعد أبي سلمة، وقد روى ابنُها عمرُ بن أبي سلمة عن النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم.




মুসআব ইবনু আব্দুল্লাহ আয-যুবাইরী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উম্মু সালামার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রকৃত নাম ছিল রামলা। তিনিই প্রথম মহিলা যিনি মুহাজির হিসেবে মদীনায় প্রবেশ করেন। তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পূর্বে আবূ সালামা আব্দুল্লাহ ইবনু আব্দুল আসাদ ইবনু হিলাল ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু উমর ইবনু মাখযূম-এর স্ত্রী ছিলেন। তিনিই (আবূ সালামা) প্রথম ব্যক্তি যিনি আবিসিনিয়ায় (হাবশায়) হিজরত করেন এবং তিনি বদর যুদ্ধেও অংশগ্রহণ করেন। আর তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জীবদ্দশায় ইন্তিকাল করেন। তিনি আবূ সালামার ঔরসে সালামা, উমর, দুররাহ এবং যায়নাবকে জন্ম দেন। এদের মাতা হলেন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আবূ সালামার ইন্তিকালের পরে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বিবাহ করেন। তাঁর পুত্র উমর ইবনু আবী সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে হাদীস বর্ণনা করেছেন।









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6911)


6911 - فحدثنا أبو العبّاس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا الحسن بن علي بن عفَّان العامري، حَدَّثَنَا أبو أسامة، عن الأعمش، عن شَقيق، عن أمِّ سلمة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إذا حضرتُم الميتَ أو المريضَ فقولوا خيرًا، فإنَّ الملائكة يُؤمِّنون على ما تقولون"، فلما تُوفِّي أبو سلمة أتيتُ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقلتُ: كيف أقولُ؟ قال: "قولي: اللهمَّ اغفر لنا وله، وأعقِبْني منه عُقبى صالحةً"، فقلتُها، فأعقبَني الله محمدًا صلى الله عليه وسلم [1].




উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমরা কোনো মৃত ব্যক্তি বা রোগীর নিকট উপস্থিত হবে, তখন ভালো কথা বলবে। কারণ তোমরা যা বলো, ফেরেশতারা তার উপর 'আমীন' বলেন।"

তিনি (উম্মে সালামাহ) বললেন, যখন আবু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মৃত্যু হলো, তখন আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললাম: আমি কীভাবে বলব (অর্থাৎ কী দু‘আ করব)? তিনি বললেন: "তুমি বলো: 'আল্লাহুম্মাগফির লানা ওয়া লাহ, ওয়া আ‘কিবনী মিনহু ‘উকবা সালিহাহ।' (অর্থাৎ: হে আল্লাহ! আমাদের এবং তাকে ক্ষমা করে দিন, আর তার পক্ষ থেকে আমাকে উত্তম বিকল্প [বা সওয়াব] দান করুন)।"

অতঃপর আমি তা বললাম। আর আল্লাহ আমাকে তার পক্ষ থেকে মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে উত্তম বিকল্প হিসেবে দান করলেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده صحيح. أبو أسامة: هو حماد بن أسامة، وشقيق: هو ابن سلمة.وأخرجه أحمد 44/ (26497) و (26608) و (26739)، ومسلم (919)، وأبو داود (3115)، وابن ماجه (1447)، والترمذي (977)، والنسائي (1964) و (10841)، وابن حبان (3005) من طرق عن الأعمش، به. وقال الترمذي: حسن صحيح.وفي الباب عن شداد بن أوس سلف برقم (1302). ك "مسند أحمد" و "صحيح ابن حبان".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6912)


6912 - أخبرناه الحسن بن يعقوب بن يوسف العدل، حَدَّثَنَا السَّري بن خُزيمة، حَدَّثَنَا موسى بن إسماعيل، حَدَّثَنَا حماد بن سَلَمة، أخبرنا ثابت، عن ابن عمر بن أبي سلمة، عن أبيه، عن أمِّ سلمة قالت: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "إذا أصابت أحدَكم مصيبةٌ فليقُلْ: إنَّا لله وإنَا إليه راجعون، اللهمَّ عندَك أحتسب مُصيبتي، فأجُرْني فيها"، وكنتُ إذا أردتُ أن أقول: وأبدلني بها خيرًا منها، قلتُ: ومَن خيرٌ من أبي سلمة؟ فلم أزل حتَّى قلتُها، فلما انقضت عِدَّتُها خطَبَها أبو بكر فردَّته، وخطبَها عمرُ فردَّته، فبعث إليها النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ليَخطِبَها فقالت: مرحبًا برسول الله صلى الله عليه وسلم وبرسولِه، أقرِئْ رسول الله صلى الله عليه وسلم السلامَ، وأخبِرْه أنِّي امرأة مُصبِية غَيْرَى، وأنه ليس أحدٌ من أوليائى [شاهدًا، فبعث إليها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "أما قولُك: إني مُصبِيةٌ، فَإِنَّ الله سيكفيك صِبيانَك، وأما قولُك: إني غَيْرَى، فسأدعو الله أن يُذهِبَ غَيْرتَك، وأما الأولياءُ، فليس أحدٌ منهم] [1] شاهدٌ ولا غائبٌ إلَّا سَيَرْضاني"، فقالت لابنها: قُمْ يا عمرُ، فزوِّج رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فزوَّجَها إياه، وقال لها: "لا أنقصُكِ ممّا أعطيتُ أُختَك فلانةً: جَرَّتينِ [2] ورَحاءَين ووِسادةً من أَدَمٍ حَشْوُها لِيفٌ".فكان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يأتيها وهي تُرِضُع زينبَ، فكانت إذا جاء النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم أخذَتْها فوضعتها في حِجْرها تُرضعُها. قالت: وكان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حَبِيًا كريمًا فيرجعُ، فَفَطِنَ لها لها عمارُ بن ياسر، وكان أخًا لها من الرَّضاعة، فأراد رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن يأتيَها ذاتَ يوم، فجاء عمار فدخل عليها فانتشطَ زينبَ من حِجْرِها، وقال: دَعِي هذه المقبوحةَ المشقوحةَ التي قد آذيتِ بها رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فجاء رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فدخل يُقلِّبُ بصرَه في البيت: أين زُنَابُ؟ ما لي لا أرى زُنَابَ؟ " فقالت: جاء عمَّارٌ فذهب بها، فبنَى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بأهله، وقال: "إن شئت أن أسبِّعَ لك، سبَّعتُ للنِّساء" [3].هذا حديث صحيح الإسناد.قال: ابن عمر بن أبي سلمة الذي لم يُسمِّه حماد بن سَلَمة في هذا الحديث، سمَّاه غيرُه سعيدَ [4] بن عمر بن أبي سلمة، ولم يُخرجاه.




উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কারো উপর কোনো বিপদ আপতিত হয়, তখন সে যেন বলে: 'ইন্না লিল্লাহি ওয়া ইন্না ইলাইহি রাজিউন' (নিশ্চয়ই আমরা আল্লাহর জন্য এবং নিশ্চয়ই আমরা তাঁর দিকেই প্রত্যাবর্তনকারী)। 'আল্লাহুম্মা ইনদাকা আহতাসিবু মুসিবাতী, ফাআ’জুরনী ফীহা' (হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছে আমার এই বিপদের প্রতিদান কামনা করছি, সুতরাং আমাকে এর পুরস্কার দিন)।"
তিনি (উম্মে সালামাহ) বলেন: আমি যখন 'ওয়া আবদিলনী বিহা খায়রান মিনহা' (এবং আমাকে এর বিনিময়ে এর চেয়ে উত্তম কিছু দিন) বলতে চাইতাম, তখন আমি বলতাম, আবু সালামার (চেয়ে) উত্তম আর কে হতে পারে? আমি এভাবেই থাকতাম, শেষ পর্যন্ত আমি (তা বলতে) পারলাম।
যখন আমার ইদ্দতকাল শেষ হলো, তখন আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বিয়ের প্রস্তাব দিলেন, কিন্তু আমি তা প্রত্যাখ্যান করলাম। এরপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে প্রস্তাব দিলেন, আমি তাঁকেও প্রত্যাখ্যান করলাম। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছে প্রস্তাব দেওয়ার জন্য লোক পাঠালেন। তখন আমি বললাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর দূতকে স্বাগতম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আমার পক্ষ থেকে সালাম পৌঁছিয়ে দিন এবং তাঁকে জানিয়ে দিন যে, আমি একজন সন্তানবতী ও অধিক আত্মসম্মানবোধসম্পন্ন (ঈর্ষাপরায়ণ) মহিলা, আর আমার অভিভাবকদের কেউই (উপস্থিত) নেই।
তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছে (এই বার্তা) পাঠালেন: "তোমার এই কথা যে, তুমি সন্তানবতী—নিশ্চয়ই আল্লাহ্ তোমার সন্তানদের জন্য যথেষ্ট হবেন। আর তোমার এই কথা যে, তুমি ঈর্ষাপরায়ণ—অচিরেই আমি আল্লাহর কাছে দু’আ করব যেন তিনি তোমার এই ঈর্ষা দূর করে দেন। আর অভিভাবকের (অলিদের) ব্যাপারে—তাদের মধ্যে উপস্থিত বা অনুপস্থিত কেউই নেই যে আমাকে (এই বিয়েতে) সম্মতি দেবে না।"
অতঃপর তিনি তাঁর পুত্রকে বললেন: হে উমার! ওঠো এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আমার বিয়ে সম্পন্ন করো। সুতরাং সে (তাঁর পুত্র) তাঁকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বিয়ে দিলেন।
আর তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তোমার বোন অমুককে আমি যা দিয়েছি, তা থেকে আমি তোমাকে কম দেব না: দুটি কলসি, দুটি যাঁতা এবং পশুর চামড়ার তৈরি একটি বালিশ, যার ভেতরে খেজুরের ছোবড়ার পুর ভরা থাকবে।"
এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছে আসতেন যখন তিনি যায়নাবকে দুধ পান করাচ্ছিলেন। যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসতেন, তিনি তাকে (যায়নাবকে) তুলে নিজের কোলে রেখে দুধ পান করাতেন। তিনি (উম্মে সালামাহ) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ছিলেন অত্যন্ত লজ্জাশীল ও সম্মানিত। তাই তিনি ফিরে যেতেন।
তখন আম্মার ইবনু ইয়াসির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)—যিনি তাঁর দুধভাই ছিলেন—বিষয়টি টের পেলেন। একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছে আসতে চাইলেন। তখন আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে তাঁর কাছে প্রবেশ করলেন এবং যায়নাবকে তাঁর কোল থেকে দ্রুত উঠিয়ে নিলেন। তিনি (আম্মার) বললেন: এই ঘৃণিত, অভিশপ্ত মেয়েটিকে ছেড়ে দাও, যার দ্বারা তুমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কষ্ট দিচ্ছ!
এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এসে ঘরে প্রবেশ করলেন এবং চারদিকে চোখ বুলিয়ে দেখতে লাগলেন (এবং জিজ্ঞাসা করলেন): "জুনাব (যায়নাবের আদরের ডাকনাম) কোথায়? আমি জুনাবকে দেখছি না কেন?" তিনি (উম্মে সালামাহ) বললেন: আম্মার এসে তাকে নিয়ে গেছেন।
অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর পরিবারের সাথে ঘর-সংসার শুরু করলেন এবং বললেন: "তুমি যদি চাও, আমি তোমার জন্য সাত দিন থাকব। (তবে মনে রেখো) আমি (যদি সাত দিন থাকি), তবে অন্যান্য স্ত্রীদের জন্যেও সাত দিন করে (বন্টন) করব।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] ما بين المعقوفين مكانه في النسخ الخطية بياض، وأثبتناه من بعض مصادر التخريج ك "مسند أحمد" و "صحيح ابن حبان".



[2] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: حرير.



6912 [3] - حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات غير ابن عمر بن أبي سلمة فمجهول، وانظر تمام الكلام عليه فيما سلف برقم (2793).وأخرجه أبو داود (3119) عن موسى بن إسماعيل، بهذا الإسناد مختصرًا.وسلف برقم (6787) محمد بن صالح بن هانئ عن السري بن خزيمة، ليس فيه ابن عمر بن أبي سلمة، وجعل قصة الدعاء فيه من حديث أم سلمة عن أبي سلمة.



6912 [4] - كذا قال المصنّف، ولم نقف فيما بين أيدينا من المصادر التي خرجت هذا الحديث من سمَّاه، ولا يعرف لعمر بن أبي سلمة ابنٌ اسمه سعيد، ولا ذكرَ له في كتب التراجم، وربما كان سعيدٌ محرفًا عن محمد، ومحمد بن عمر هذا روى عن أبيه غير هذا الحديث، وهو مجهول الحال.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6913)


6913 - فحدَّثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيِه، حَدَّثَنَا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حَدَّثَنَا مصعب بن عبد الله الزُّبيري، حَدَّثَنَا عبد العزيز بن محمد، عن عبد الرحمن بن حُميد بن عبد الرحمن بن عَوف، عن عبد الملك بن أبي بكر بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام، عن أبيه: أنَّ أمَّ سلمة بنت أبي أمية، حين تزوَّجها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أخذت بثوبِه مانعةً للخروج من بيتها، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "إن شئتِ زدتُكِ وحاسبتُك للبِكْرِ سبعٌ، وللثيِّب ثلاثٌ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه!




উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁকে বিবাহ করলেন, তখন তিনি (উম্মে সালামাহ) নিজ ঘর থেকে বের হতে না দেওয়ার জন্য রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাপড় ধরেছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তুমি যদি চাও, আমি তোমার জন্য (অবস্থানের দিন সংখ্যা) বৃদ্ধি করব এবং আমি তোমার জন্য (অন্যান্য স্ত্রীদের সাথে ভাগ করার) এই নীতি নির্ধারণ করব যে, কুমারীর জন্য সাত দিন এবং বিবাহিত মহিলার জন্য তিন দিন (অবস্থান করতে হবে)।”




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل عبد العزيز بن محمد - وهو الدراوري - وقد توبع، وقد اختُلف فيه على عبد الملك بن أبي بكر وعلى أبيه أيضًا في وصله وإرساله كما هو مبين في "مسند أحمد" (44/ 26504) و (26619).وأخرجه مسلم (1460) (42) من طريق سليمان بن بلال وأبي ضمرة أنس بن عياض، كلاهما عن عبد الرحمن بن حميد، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه مسلم (1460) (43) من طريق عبد الواحد بن أيمن، عن أبي بكر بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام، عن أم سلمة، ذكر: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم تزوجها، وذكر أشياء هذا فيها، قال: "إن شئتِ أن أسبع لك، وأسبع لنسائيّ، وإن سبعت لك سبعت لنسائي".وأخرجه أحمد (26504)، ومسلم (1460) (41)، وأبو داود (2122)، وابن ماجه (1917)، والنسائي (8876)، وابن حبان (4210) من طريق سفيان الثوريّ، عن محمد بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم، عن عبد الملك بن أبي بكر بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام، عن أبيه، عن أم سلمة.وأخرجه مسلم (1460) (42) من طريق مالك، عن عبد الله بن أبي بكر، عن عبد الملك بن أبي بكر، عن أبي بكر بن عبد الرحمن: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم حين تزوج أم سلمة. وسقط من طبعة عبد الباقي ذكر أبي بكر بن عبد الرحمن، واستدركناه من "تحفة الأشراف" (18229). و "جمهرة نسب قريش" للزبير بن بكار ص 482، وغيرهما.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6914)


6914 - حَدَّثَنَا أبو عبد الله الأصبهانيّ، حَدَّثَنَا الحسين بن الجَهْم، حَدَّثَنَا الحسين بن الفَرَج، حَدَّثَنَا محمد بن عمر، قال: وأمُّ سلمة اسمُها هندُ بنت أبي أُمية، واسمُ أبي أُمية سُهَيل بن المغيرة بن عبد الله بن عمر بن مخزوم، وأمُّها عاتكة بنت عامر بن ربيعة بن مالك بن جَذِيمة [1] بن علقمة بن فِراس بن غَنْم بن مالك بن كِنانة، تزوَّجها أبو سلمة عبدُ الله بن عبد الأسد بن هِلال، وهاجر بها إلى أرض الحبشة في الهجرتين جميعًا، فوَلَدَت له هناك زينبَ، ووَلَدَت له بعد ذلك سلمةَ وعمر ودُرَّةَ بني أبي سَلَمة.




মুহাম্মদ ইবনু উমর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নাম হলো হিন্দ বিনতে আবী উমাইয়াহ। আর আবূ উমাইয়াহর নাম হলো সুহাইল ইবনুল মুগীরাহ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু উমার ইবনু মাখযূম। আর তাঁর মা হলেন আতিকাহ বিনতে আমির ইবনু রাবী'আহ ইবনু মালিক ইবনু জাযীমাহ ইবনু আলক্বামাহ ইবনু ফিরাস ইবনু গানম ইবনু মালিক ইবনু কিনানাহ। তাঁকে আবূ সালামাহ আব্দুল্লাহ ইবনু আব্দুল আসাদ ইবনু হিলাল বিবাহ করেছিলেন। তিনি উভয় হিজরতেই তাঁকে (উম্মে সালামাহকে) নিয়ে হাবশার (আবিসিনিয়ার) ভূমিতে হিজরত করেছিলেন। অতঃপর সেখানে তিনি তাঁর জন্য যায়নাবকে জন্ম দেন এবং এর পরে তাঁকে সালামাহ, উমার ও দুররাহকে জন্ম দেন, যারা আবূ সালামাহর সন্তান।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: خزيمة، والتصويب من "طبقات ابن سعد" 10/ 85، و "جمهرة نسب قريش" للزبير بن بكار ص 482، وغيرهما.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6915)


6915 - قال ابن عمر: حَدَّثَنَا عمر بن عثمان، عن عبد الملك بن عُبيد، عن سعيد بن عبد الرحمن بن يَربُوع، عن عمر بن أبي سَلَمة بن عبد الأَسد، قال: خرج أبي إلى أُحد، فرماه أبو أسامة الجُشَمي في عَضُدِه بسهم، فمكث شهرًا يداوي جرحَه ثم بَرَأ الجرحُ، وبعث رسول الله صلى الله عليه وسلم أبي إلى قَطَنٍ [1] في المحرَّم على رأسِ خمسةٍ وثلاثين شهرًا، فغاب تسعًا وعشرين ليلةٌ، ثم رجعَ فدخل المدينةَ لثمانٍ خَلَونَ من صَفَر سنة أربع، والجرحُ منتقِضٌ، فمات منها لثمانٍ خلونَ من جُمادى الآخرة سنةَ أربع من الهجرة، فاعتدَّتْ أمِّي، وحلَّتْ لعشرِ ليالٍ بَقِينَ من شوال سنةَ أربع، وتزوَّجها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في ليالٍ بقينَ من شوال سنةَ أربع [2].ثم إنَّ أهل المدينة قالوا: دخلَتْ أيِّم العرب على سيِّد الإسلام والمسلمين أولَ العشاء عَروسًا، وقامت من آخر الليل تطحنُ، وهي أمُّ المؤمنين أمُّ سلمة رضي الله عنها [3].




উমর ইবনু আবী সালামাহ ইবনু আব্দিল আসাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার পিতা উহুদ যুদ্ধের উদ্দেশ্যে বের হলেন, তখন আবূ উসামা আল-জুশামী তার বাহুতে একটি তীর নিক্ষেপ করলেন। এরপর তিনি এক মাস ধরে তার জখমের চিকিৎসা করালেন এবং জখমটি সেরে উঠলো। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমার পিতাকে পঁয়ত্রিশ মাস শেষে মুহাররাম মাসে কাতান (নামক স্থানের) দিকে প্রেরণ করলেন। তিনি ঊনত্রিশ রাত অনুপস্থিত থাকলেন, এরপর ফিরে এসে চতুর্থ হিজরির সফর মাসের আট দিন অতিবাহিত হওয়ার পর মদীনায় প্রবেশ করলেন। (কিন্তু) তার সেই জখমটি আবার চাঙ্গা হয়ে উঠেছিল। এরপর তিনি হিজরতের চতুর্থ বছর জুমাদাল আখিরাহ মাসের আট দিন অতিবাহিত হওয়ার পর ওই জখমের কারণেই মারা গেলেন। তখন আমার মা (উম্মে সালামা) ইদ্দত পালন করলেন এবং চতুর্থ হিজরির শাওয়াল মাসের দশ রাত বাকি থাকতে ইদ্দত শেষ করলেন। আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম চতুর্থ হিজরির শাওয়াল মাসের কয়েক রাত বাকি থাকতে তাকে (আমার মাকে) বিবাহ করলেন। এরপর মদীনার লোকেরা বলল: আরবের একজন বিধবা নারী ইসলাম ও মুসলিমদের নেতার নিকট প্রথম রাতে নববধূ রূপে প্রবেশ করলেন, আর রাতের শেষভাগে উঠে তিনি (আটা) পিষতে লাগলেন। আর তিনি হলেন উম্মুল মু'মিনীন উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] بالتحريك كما في "مراصد الاطلاع" 3/ 1108 وقال: جبل لبني أسد، وفي "مغازي الواقديّ" 1/ 342: ماء من مياه بني أسد. أول العشاء عروسًا، وقامت من آخر الليل تطحن، يعني أم سلمة.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (9955) من طريق سليمان بن بلال، عن كثير بن زيد، عن المطلب بن عبد الله، فذكره. وإسناده حسن.



[2] من قوله: وتزوجها رسول الله صلى الله عليه وسلم، إلى هنا سقط من (م) و (ص).والخبر أخرجه ابن سعد في "الطبقات" 3/ 221 و 10/ 85 - ومن طريقه الطبري في "تاريخه" 11/ 603 - 604 - عن الواقديّ، بهذا الإسناد. ورواية ابن سعد الأُولى فيها بعض اختلاف. وفيها: عبد الرحمن بن سعيد، بدل سعيد بن عبد الرحمن. وشيخ الواقديّ فيه - وهو عمر بن عثمان - مجهول، وكذا شيخه عبد الملك بن عبيد - وهو ابن سعيد المخزومي - مجهول الحال. أول العشاء عروسًا، وقامت من آخر الليل تطحن، يعني أم سلمة.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (9955) من طريق سليمان بن بلال، عن كثير بن زيد، عن المطلب بن عبد الله، فذكره. وإسناده حسن.



6915 [3] - وأخرجه ابن سعد 10/ 90 - ومن طريقه الطبري في "تاريخه" 11/ 604 - عن الواقديّ، عن كثير بن زيد، عن المطلب بن عبد الله بن حنطب قال: دخلت أيم العرب على سيّد المسلمين أول العشاء عروسًا، وقامت من آخر الليل تطحن، يعني أم سلمة.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (9955) من طريق سليمان بن بلال، عن كثير بن زيد، عن المطلب بن عبد الله، فذكره. وإسناده حسن.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6916)


6916 - قال ابن عمر: وحدثني عبد الله بن نافع، عن أبيه قال: أوصَتْ أمُّ سَلَمة أن لا يُصلِّيَ عليها والي المدينة، وهو الوليدُ بن عُتبة بن أبي سفيان، فماتت حين دخلَتْ سنةُ تسعٍ وخمسين، وصلَّى عليها ابن أخيها عبدُ الله بن عبد الله بن أبي أمية [1].




উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ওসিয়ত করেছিলেন যে মদীনার গভর্নর, আল-ওয়ালীদ ইবনু উতবা ইবনু আবী সুফইয়ান, যেন তাঁর জানাযার সালাত না পড়ান। এরপর তিনি উনপঞ্চাশ হিজরি (৫৯ হিজরি) শুরু হওয়ার সময় মৃত্যুবরণ করেন। আর তাঁর ভাতিজা আব্দুল্লাহ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু আবী উমাইয়া তাঁর জানাযার সালাত আদায় করান।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف، الواقديّ وشيخه ضعيفان.وأخرجه الطبري في "تاريخه" 11/ 604 من طريق الواقديّ، بهذا الإسناد.ويخالفه ما أخرجه ابن سعد 10/ 93 عن الواقديّ أيضًا عن عبد الله بن نافع، عن أبيه قال: ماتت أمُّ سلمة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في سنة تسع وخمسين، فصلَّى عليها أبو هريرة بالبقيع.وأخرجه عن الواقديّ أيضًا 10/ 93 عن ابن جريج، عن نافع قال: صلَّى أبو هريرة على أمَّ سلمة بالبقيع.قال الذهبي في "تاريخ الإسلام" 2/ 743: الواقديّ عن ابن جريج عن نافع قال: صلَّى أبو هريرة على أم سلمة. هذا من غلط الواقديّ، أبو هريرة مات قبلها.وقال ابن حجر في "الإصابة": قال الواقديّ: ماتت في شوال سنة تسع وخمسين، وصلَّى عليها أبو هريرة، ولها أربع وثمانون سنة، كذا قال وتلقّاه عنه جماعة، وليس بجيد، فقد ثبت في "صحيح مسلم" (2882) أنَّ الحارث بن عبد الله بن أبي ربيعة وعبد الله بن صفوان دخلا على أمّ سلمة في ولاية يزيد بن معاوية فسألاها عن الجيش الّذي يخسف به … الحديث. وكانت ولاية يزيد بعد موت أبيه في سنة ستين.وقال ابن حبان: ماتت في آخر سنة إحدى وستين بعد ما جاءها الخبر بقتل الحسين بن علي. قلت: وهذا أقرب.قال محارب بن دثار: أوصت أمُّ سلمة أن يصلّي عليها سعيد بن زيد، وكان أمير المدينة يومئذ مروان بن الحكم، وقيل: الوليد بن عتبة بن أبي سفيان.قلت: والثّاني أقرب فإن سعيد بن زيد مات قبل تاريخ موت أمّ سلمة على الأقوال كلها، فكأنها كانت أوصت بأن يصلّي سعيد عليها في مرضة مرضتها ثم عوفيت، ومات سعيد قبلها.قلنا: رواية محارب بن دثار التي ذكرها ابن حجر سيوردها المصنّف قريبًا برقم (6922)، وانظر تعليقنا عليها هناك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6917)


6917 - أخبرني أبو عبد الله محمد بن علي بن عبد الحميد الصنعاني بمكة، حَدَّثَنَا إسحاق بن إبراهيم بن عبَّاد، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن الزُّهْريّ، عن هند بنت الحارث الفِراسية قالت: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ لعائشةَ مني شُعبة ما نزلَها [1] أحدٌ"، قال: فلما تزوَّج رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أمَّ سلمة، سُئِلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فقيل: يا رسولَ الله، ما فعلت الشُعبة؟ فسكت رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فعلِمَ أَنَّ أَمَّ سلمة قد نزلت عندَه [2].




হিন্দ বিনত আল-হারিস আল-ফিরাসিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: “নিশ্চয়ই আয়েশার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জন্য আমার নিকট এমন একটি বিশেষ স্থান (শুবাহ/শাখা) রয়েছে, যেখানে আর কেউ অবস্থান নেয়নি।” বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম উম্মে সালামাহকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বিবাহ করলেন, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে জিজ্ঞাসা করা হলো এবং বলা হলো: হে আল্লাহর রাসূল, সেই স্থানটির কী হলো? তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম নীরব থাকলেন। এতে (প্রশ্নকর্তারা) জানতে পারলেন যে, উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই স্থানটিতে অবস্থান নিয়েছেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في (م) و (ص): نولها، والمثبت من (ز) و (ب)، وهو الموافق لمصادر التخريج.



[2] رجاله ثقات، وهند الفراسية من التابعيات الثقات من صواحب أمِّ سلمة، فحديثها هذا مرسل.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 92 - ومن طريقه الطبري في "تاريخه" 11/ 604 - عن الواقديّ، والبلاذري في "أنساب الأشراف" 1/ 432 من طريق سفيان بن عيينة، كلاهما عن معمر، بهذا الإسناد. وفي رواية سفيان: فعُرف أنَّ أم سلمة قد نزلت عنده بمنزلة لطيفة. وهي توضح المقصود.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6918)


6918 - أخبرني أبو عبد الله محمد بن أحمد القاضي ببغداد، حَدَّثَنَا الحارث بن أبي أسامة، حدَّثني محمد بن سُهيل، عن أبي عُبيدة مَعمَر بن المثنَّى قال: تزوَّج رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بالمدينة قبلَ وقعة بدر في سنة اثنتين من التاريخ [1] أمَّ سلمة واسمُها هند بنت أبي أمية بن المغيرة بن عبد الله بن عمر بن مخزوم. وأولُ من مات من أزواجِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم زينبُ، وآخر من مات منهنَّ أمُّ سلمة.




আবু উবাইদাহ মা'মার ইবনুল মুসান্না থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হিজরতের দ্বিতীয় সনে, বদর যুদ্ধের পূর্বে মদিনায় উম্মে সালামাহকে বিবাহ করেন। তাঁর নাম ছিল হিন্দ বিনতে আবি উমাইয়া ইবনুল মুগীরাহ ইবনে আবদুল্লাহ ইবনে উমার ইবনে মাখজুম। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীদের মধ্যে সর্বপ্রথম ইন্তেকাল করেন যয়নব, আর তাঁদের মধ্যে সর্বশেষ ইন্তেকাল করেন উম্মে সালামাহ।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] قوله: سنة اثنتين من التاريخ، قال الذهبي في "التلخيص": هو خطأ. قلنا: قد تقدم قريبًا نقل المصنّف لسنة زواج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم من أمّ سلمة. وقال في "السير" 2/ 210: تزوجها النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم حين حلَّت في شوال سنة أربع.