আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
6939 - أخبرني عبد الله بن إسحاق بن إبراهيم الخُراساني العَدْل ببغداد، حدّثنا إبراهيم بن الهيثم البَلَديّ، حدَّثني إسماعيل بن أبي أُويس المدنيّ، حدَّثني أبي، عن يحيى بن سعيد، عن عَمْرة، عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأزواجه: "أسرعُكنَّ لُحوقًا بي أطولُكن يدًا"، قالت عائشة: فكُنَّا إذا اجتمعنا في بيت إحدانا بعدَ وفاةِ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم نمدُّ أيديَنا في الجِدار نتطاول، فلم نزل نفعلُ ذلك حتى تُوفِّيَت زينبُ بنت جحش زوجُ النبيِّ صلى الله عليه وسلم، وكانت امرأةً قصيرةً ولم تكن أطولَنا، فعرفنا حينئذٍ أنَّ النبيّ صلى الله عليه وسلم إنما أراد بطول اليد الصدقةَ، قالت [1]: وكانت زينبُ امرأةً صَناعةَ اليدِ فكانت تدبُغُ وتخرُز وتصدَّقُ في سبيل الله عز وجل [2]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রীদেরকে বললেন: "তোমাদের মধ্যে যে সবচেয়ে দীর্ঘ হাত বিশিষ্টা, সে-ই আমার সাথে সবচেয়ে দ্রুত মিলিত হবে।" আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মৃত্যুর পর যখন আমরা আমাদের কারো ঘরে একত্রিত হতাম, তখন আমরা আমাদের হাত দেয়ালে প্রসারিত করে লম্বা হাত বোঝার চেষ্টা করতাম। আমরা এরূপ করতে থাকলাম যতক্ষণ না নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী যায়নাব বিনত জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তেকাল করলেন। তিনি ছিলেন বেঁটে মহিলা এবং আমাদের মধ্যে সবচেয়ে লম্বা হাত বিশিষ্টা ছিলেন না। তখন আমরা বুঝতে পারলাম যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাতের দৈর্ঘ্য দ্বারা সাদকা (দানশীলতা)-কেই বুঝিয়েছিলেন। (বর্ণনাকারী) বলেন: যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন কর্মঠ হাতের অধিকারিণী, তাই তিনি চামড়া প্রক্রিয়াজাত করতেন, সেলাই করতেন এবং আল্লাহর পথে দান করতেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرّف في نسخنا الخطية إلى: قال. والقائل هي عائشة. وأخرجه أحمد (41/ 24899)، والبخاري (1420)، والنسائي (2333)، وابن حبان (3315) من طريق الشعبيّ، عن مسروق، عن عائشة. لكن وقع في هذه الرواية مكان زينب سودة. وانظر تعليق الحافظ ابن حجر عليها في "الفتح" 5/ 56 - 60.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل إسماعيل بن أبي أويس وأبيه، واسمه عبد الله بن عبد الله.وأخرجه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (7421) عن محمد بن أحمد بن عليّ، عن إبراهيم البلدي، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 105، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3086)، والبزار في مسنده (18/ 276) و (311)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (210)، والطبراني في "الكبير" (24/ 133) - وعنه أبو نعيم في "الحلية" 2/ 534 - من طرق عن إسماعيل بن أبي أويس، به.وأخرجه ابن سعد 10/ 105 عن الواقديّ، عن موسى بن محمد بن عبد الرحمن بن عبد الله بن حارثة بن النعمان، عن أبيه، عن أمه عمرة، عن عائشة قالت: يرَحِمَهُ اللهُ زينب بنت جحش لقد نالت في هذه الدنيا الشرف الذي لا يبلغه شرف: إنَّ الله زوجها نبيه صلى الله عليه وسلم في الدنيا ونطق به القرآن، وإنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال لنا ونحن حوله: "أسرعُكن بي لحوقًا أطولكن باعًا" فبشرها رسول الله صلى الله عليه وسلم بسرعة لحوقها به، وهي زوجته في الجنة. موسى بن محمد معروف النسب مجهول الحال؛ لم نقف له على ترجمة.وأخرجه بنحوه مسلم (2452)، وابن حبان (3314) و (6665) من طريق عائشة بنت طلحة، عن عائشة به. وأخرجه أحمد (41/ 24899)، والبخاري (1420)، والنسائي (2333)، وابن حبان (3315) من طريق الشعبيّ، عن مسروق، عن عائشة. لكن وقع في هذه الرواية مكان زينب سودة. وانظر تعليق الحافظ ابن حجر عليها في "الفتح" 5/ 56 - 60.
6940 - حدّثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل وعبد الله بن الحسين القاضي، قالا: حدّثنا الحارث بن أبي أسامة، حدّثنا علي بن عاصم، عن داود بن أبي هند، عن عامر [1] قال: كانت زينبُ بنت جَحْش تقول للنبيِّ صلى الله عليه وسلم: أنا أعظمُ نسائِك عليك حقًّا، أنا خيرُهنَّ منْكَحًا، وأكرمُهنَّ سفيرًا [2]، وأقربهنَّ رَحِمًا، ثم تقول: زوَّجَنيكَ الرحمنُ عز وجل من فوقِ عرشِه، وكان جبريلُ عليه السلام هو السفيرَ بذلك، وأنا ابنةُ عمَّتِك، وليس لك من نسائك قريبةٌ غيري [3]. قد ذكرتُ في أول الترجمة أنَّ أمّ زينب بنت جحش أميمة بنت عبد المطلب بن هاشم، وهي عمة النبيّ صلى الله عليه وسلم. ذكرُ جُويرية بنت الحارث أمِّ المؤمنين رضي الله عنها
যায়নাব বিনতে জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতেন: আপনার স্ত্রীদের মধ্যে আপনার উপর আমার হক্ব (অধিকার) সবচেয়ে বেশি। আমি তাদের মধ্যে বিবাহসূত্রে (বা বিবাহের বৈশিষ্ট্যে) সর্বশ্রেষ্ঠ এবং দূত বা মধ্যস্থতাকারীর দিক থেকে সবচেয়ে সম্মানিত। আর আমি তাদের মধ্যে আত্মীয়তার বন্ধনে আপনার নিকটতম। এরপর তিনি বলতেন: মহাপরাক্রমশালী পরম দয়ালু আল্লাহ তাআলা তাঁর আরশের উপর থেকে আমাকে আপনার সাথে বিবাহ দিয়েছেন, আর জিবরীল আলাইহিস সালাম ছিলেন সেই বিবাহের দূত। আমি আপনার ফুফুর কন্যা, আর আপনার অন্যান্য স্ত্রীদের মধ্যে আমি ছাড়া আপনার কোনো নিকটাত্মীয়া নেই।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] كذا في (ز) وضبب عليها و (ب): عامر، ومكانها بياض في (م) و (ص).
[2] في (ز) و (ب) وألزمهن سترًا، وفي (م) و (ص): وأكرمهن سترًا، وهي محرفة عن "سفيرًا"، والتصويب من "جامع الآثار في السير" لابن ناصر الدين الدمشقي 7/ 142، فقد نقله عن "مستدرك الحاكم"، وهو الموافق لرواية قوام السنة الآتي تخريجها.
6940 [3] - إسناده ضعيف، علي بن عاصم - وهو الواسطي - ليّن، وقد توبع، وعامر - وهو الشعبي - روايته عن زينب مرسلة كما قال ابن ناصر الدين الدمشقي 7/ 142.وأخرجه الطبري في "تاريخه" 11/ 608، وأخرجه قوام السنة في "الحجة في بيان المحجة" (451)، وابن قدامة في "إثبات صفة العلو " (17) من طريق عبد الصمد بن علي بن مكرم، كلاهما (الطبري وابن مكرم) عن الحارث بن محمد بن داهر التميمي - وهو ابن أبي أسامة - بهذا الإسناد. وسقط ابن أبي أسامة من كتاب "الحجة".وأخرج الطبري في "تفسيره" 22/ 14 عن محمد بن حميد، عن جرير بن عبد الحميد، عن مغيرة بن مقسم، عن الشعبيّ، قال: كانت زينب زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم تقول للنبي صلى الله عليه وسلم: إني لأُدِلُّ عليك بثلاث ما من نسائك امرأةٌ تُدِلُّ بهن: إنَّ جدِّي وجدَّك واحد، وإني أَنكحنَيك الله من السماء، وإنَّ السفير لجبرائيل عليه السلام.وفي الباب عن أنس بن مالك عند البخاريّ (7420)، وفيه: كانت زينب تفخر على أزواج النبيّ صلى الله عليه وسلم؛ تقول: زوَجكُنَّ أهاليكنَّ، وزوجني اللهُ من فوق سبعِ سماواتٍ.
6941 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن سليمان المَوصلي، حدّثنا علي بن حرب الموصليّ، حدّثنا سفيان بن عُيَينة، عن ابن أبي نَجِيح، عن مجاهد قال: قالت جُوَيريَةُ بنتُ الحارث لرسول الله صلى الله عليه وسلم: إِنَّ أزواجك يَفخَرْنَ عليَّ يَقُلنَ: لم يتزوَّجْكِ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، إنما أنت مِلكُ يمينٍ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ألم أُعْظِمْ صَدَاقَكِ؟ ألم أُعتِقْ أربعين رَقَبةً [1] من قومِك؟ " [2].
জুওয়ায়রিয়াহ বিনতে আল-হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: আপনার অন্যান্য স্ত্রীগণ আমার উপর গর্ব করে (তাঁরা) বলেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনাকে বিবাহ করেননি, বরং আপনি হচ্ছেন শুধু দাসী (মিল্ক ইয়ামিন)। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি কি তোমার মোহরানা বৃদ্ধি করিনি? আমি কি তোমার কওমের চল্লিশটি দাস/দাসী মুক্ত করিনি?"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] لفظة "رقبة" ليست في (م) و (ص). وأخرجه مطولًا أحمد (43/ 26365)، وأبو داود (3931)، وابن حبان (4054) و (4055) من طرق عن محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد.وسيأتي بنحوه مطولًا برقم (6944) من طريق ابن ثوبان عن عائشة.
[2] رجاله ثقات إلَّا أنَّ مجاهدًا لم يذكر أنه تحمله من جويرية، مع احتمال سنّه للسماع منها، لكن صورته هنا صورة المرسل. ابن أبي نجيح: هو عبد الله بن يسار المكي.وأخرجه عبد الرزاق (13119) - ومن طريقه الطبراني في "الكبير" (24/ 155) - وسعيد بن منصور في "سننه" (909)، وابن سعد في "الطبقات" 10/ 114، وإسحاق بن راهويه في "مسنده" (2078) من طرق عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد.وخالفهم يعقوبُ بن حميد عند ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3104)، فرواه عن سفيان بن عيينة، عن ابن أبي نجيح، عن مجاهد، عن ابن عبّاس: أنَّ جويرية … فوصله بذكر ابن عبّاس. ويعقوب بن حميد ليس بذاك القوي. وأخرجه مطولًا أحمد (43/ 26365)، وأبو داود (3931)، وابن حبان (4054) و (4055) من طرق عن محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد.وسيأتي بنحوه مطولًا برقم (6944) من طريق ابن ثوبان عن عائشة.
6942 - حدّثنا أبو العبّاس محمد بن يعقوب، حدّثنا أحمد بن عبد الجبار، حدّثنا يونس بن بُكير، عن ابن إسحاق، عن محمد بن جعفر بن الزُّبير، عن عُرْوة بن الزُّبير، عن عائشة قالت: لما أصابَ رسول الله صلى الله عليه وسلم سَبايا بني المُصطَلِق، وقعت جويريةُ بنت الحارث بن أبي ضِرار في السَّهم لثابتِ بن قيس بن الشمَّاس، فكاتبَتْه على نفسِها، وكانت امرأةً حُلوةً مليحةً لا يكادُ يراها أحدٌ إلَّا أخذت بنفسه، قال: فأتت رسول الله صلى الله عليه وسلم تستعينُ به على كِتابتها [1].
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনু মুসতালিকের বন্দিনীদের লাভ করলেন, তখন জুওয়াইরিয়া বিনত আল-হারিস ইবন আবি দিরার সাবিত ইবন কাইস ইবন শাম্মাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ভাগে পড়লেন। তখন তিনি মুক্তিপণ দিয়ে নিজেকে মুক্ত করার জন্য তার সাথে চুক্তিবদ্ধ হলেন (মুকাতাবা করলেন)। তিনি ছিলেন একজন মিষ্টি, লাবণ্যময়ী মহিলা। এমন ছিল যে, তাকে যে দেখত, সে-ই তার প্রতি আকৃষ্ট হয়ে যেত। তিনি (বর্ণনাকারী) বলেন: অতঃপর তিনি (জুওয়াইরিয়া) তাঁর মুকাতাবা চুক্তির ব্যাপারে সাহায্য চাওয়ার জন্য রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده حسن، ومحمد بن إسحاق قد صرّح بالتحديث عند غير المصنّف، فانتفت شبهة تدليسه. وأخرجه مطولًا أحمد (43/ 26365)، وأبو داود (3931)، وابن حبان (4054) و (4055) من طرق عن محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد.وسيأتي بنحوه مطولًا برقم (6944) من طريق ابن ثوبان عن عائشة.
6943 - وحدثنا أبو عبد الله الأصبهانيّ، حدّثنا الحسن بن الجَهْم، حدّثنا الحسين بن الفَرَج، حدّثنا محمد بن عمر قال: وجويريةُ بنت الحارث بن أبي ضِرار بن حَبيب بن عائذ بن مالك بن جَذِيمة هو المُصطلق [1] من [2] خُزاعة، تزوَّجها مُسافِع بن صفوان، فقُتل يومَ المُرَيسيع.
মুহাম্মদ ইবনে উমার থেকে বর্ণিত, জুওয়াইরিয়াহ বিনত আল-হারিছ ইবনে আবী দ্বিরার ইবনে হাবীব ইবনে আয়িয ইবনে মালিক ইবনে জাযীমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যিনি খুযা’আ গোত্রের মুসত্বালিক (শাখার অন্তর্ভুক্ত) ছিলেন, তাঁকে মুসাফি' ইবনে সাফওয়ান বিবাহ করেছিলেন। অতঃপর তিনি (মুসাফি') মুরাইসী’র যুদ্ধের দিন নিহত হন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في النسخ الخطية: بن المصطلق، وأثبتناه على الصواب من "طبقات ابن سعد" 10/ 113، و "تاريخ الطبري" 11/ 608، و "جمهرة أنساب العرب" ص 239، بينما في "ثقات ابن حبان" 3/ 66: جذمة بن سعد بن عمرو، وسعد هو المصطلق.
[2] في (م) و (ص): بن.
6944 - فحدثنا عبد الله بن يزيد بن قُسيط [1]، عن أبيه، عن محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، عن عائشةَ قالت: أصابَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم نساءَ بني المُصطلق، فأخرج الخُمْسَ منه ثم قَسَمَه بين الناس، وأعطَى الفارسَ سهمينِ والراجلَ سهمًا، فوقعت جُويريةُ بنت الحارث بن أبي ضِرار في سهم ثابت بن قيس بن شمَّاس الأنصاريّ، وكانت تحتَ ابن عمٍّ لها يقال له: صفوانُ بن مالك بن جَذيمة، فقُتِلَ عنها، فكاتبها ثابتُ بن قيس على نفسِها على تسع أَواقٍ، وكانت امرأةً حُلوةً لا يكادُ يراها أحدٌ إِلَّا أخذت بنفسِه، فبَيْنا النبيُّ صلى الله عليه وسلم عندي إذ دخلت جُويريةُ تسأله في كتابتها، فوالله ما هو إلَّا أن رأيتُها حتى كرهتُ دخولَها على النبيِّ صلى الله عليه وسلم، وعَرَفتُ أن سَيرى فيها مثلَ الذي رأيتُ، فقالت: يا رسولَ الله، أنا جُويرية بنت الحارث سيِّدِ قومِه، وقد أصابني من الأمر ما قد علمتَ، فوقعتُ في سهم ثابت بن قيس، فكاتبنَي على تسع أَواقٍ فأعنِّي في فِكاكي، فقال: "أوَخيرٌ من ذلك؟ " قالت: ما هو؟ قال: "أُؤدِّي عنكِ كتابتَك وأتزوَّجُكِ"، قالت: نعم يا رسول الله، قال: "فقد فعلتُ"، فخرج الخبرُ إلى الناس، فقالوا: أصهارُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يُستَرقُّون؟! فأعتقُوا ما كان في أيديهم من سَبْي بني المُصطلِق، فبلغ عِتقُهم مئةَ أهل بيتٍ بتزويجه إياها، فلا أعلمُ امرأةً كانت أعظمَ بركةً على قومِها منها، وذلك مُنصَرَفَه عن غزوة المُريسيع [2].
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনু মুসতালিক গোত্রের নারীদের (যুদ্ধবন্দী হিসেবে) পেলেন। তিনি সেখান থেকে খুমুস (এক-পঞ্চমাংশ) বের করলেন, অতঃপর তা লোকদের মধ্যে বণ্টন করে দিলেন। তিনি ঘোড়সওয়ারকে দিলেন দুই অংশ এবং পদাতিককে দিলেন এক অংশ। অতঃপর জুয়াইরিয়া বিনতে হারিস ইবনে আবী যিরার আনসারী সাহাবী সাবিত ইবনে কায়স ইবনে শাম্মাসের ভাগে পড়লেন। তিনি তাঁর চাচাতো ভাই সাফওয়ান ইবনে মালিক ইবনে জাযীমার বিবাহাধীনে ছিলেন। সে নিহত হলো। এরপর সাবিত ইবনে কায়স নয় উকিয়া (মুদ্রার বিনিময়ে) মুক্তি লাভের চুক্তিতে তাঁর সাথে কিতাবাত (চুক্তি) করলেন। তিনি ছিলেন খুব সুন্দরী মহিলা, যাকে দেখত সে-ই তাঁর প্রতি আকৃষ্ট হতো।
আমি যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ছিলাম, তখন জুয়াইরিয়া তাঁর কিতাবাতের বিষয়ে তাঁকে জিজ্ঞাসা করার জন্য প্রবেশ করলেন। আল্লাহর শপথ! আমি তাঁকে দেখার পর পরই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে তাঁর প্রবেশ করাকে অপছন্দ করলাম, আর বুঝতে পারলাম যে আমি যা দেখেছি, তিনিও অবশ্যই তাই দেখবেন। তিনি বললেন, ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমি হলাম জুয়াইরিয়া বিনতে হারিস, যিনি তাঁর গোত্রের নেতা। আমার ওপর যা ঘটেছে, তা আপনি অবগত আছেন। আমি সাবিত ইবনে কায়সের অংশে পড়েছিলাম। তিনি আমার সাথে নয় উকিয়ার বিনিময়ে কিতাবাত করেছেন। সুতরাং আমার মুক্তি লাভে আমাকে সাহায্য করুন।
তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এর চেয়েও কি উত্তম কিছু চাও?" তিনি বললেন, সেটি কী? তিনি বললেন, "আমি তোমার কিতাবাতের অর্থ পরিশোধ করে দেব এবং তোমাকে বিবাহ করব।" জুয়াইরিয়া বললেন, 'হ্যাঁ, ইয়া রাসূলুল্লাহ!' তিনি বললেন, "আমি তা-ই করলাম।" এ খবর জনগণের কাছে পৌঁছলে তারা বলল: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর শ্বশুরকুল কি দাস হিসেবে থাকবে?! তখন তারা বনু মুসতালিকের যত যুদ্ধবন্দী তাদের হাতে ছিল, সবাইকে মুক্ত করে দিল। তাঁর (জুয়াইরিয়ার) বিবাহের কারণে তাদের মুক্তির সংখ্যা একশ পরিবারের কাছে পৌঁছেছিল। সুতরাং আমি তাঁর চেয়ে বেশি বরকতময়ী কোনো নারীকে তাঁর গোত্রের জন্য দেখিনি। এটি ছিল মুরাইসী'র যুদ্ধ থেকে ফেরার সময়কার ঘটনা।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] انقلب اسمه في النسخ الخطية إلى: يزيد بن عبد الله بن قسيط، وأثبتناه على الصواب من مصادر التخريج.
[2] حديث حسن، وهذا إسناد ضعيف، وعبد الله بن يزيد فيه جهالة.وهو في "المغازي" للواقدي 1/ 411، ومن طريقه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 113، وابن عساكر 3/ 216. ووقع في مطبوع "مغازي الواقديّ": عن ثوبان بدلًا من: محمد بن عبد الرحمن.وسلف مختصرًا برقم (6942) من طريق عروة عن عائشة.
6945 - قال ابن عمر: فحدثني عبدُ الله بن أبي الأبيض مولى جُويرية، عن أبيه قال: سَبَى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بني المُصطلِق، فوقعت جُوَيريةُ في السَّبي، فجاء أبوها فافتداها وأنكحَها رسولَ الله صلى الله عليه وسلم بعدُ [1].وأما حديث محمد بن إسحاق إلى آخره قريبٌ من لفظِ الواقدي، والمعاني كلُّها واحدة.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আব্দুল্লাহ ইবনু আবিল আবইয়াদ, যিনি জুওয়ায়রিয়ার আযাদকৃত গোলাম, তার পিতার সূত্রে আমাকে বলেছেন যে, তার পিতা বলেছেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বানু মুসতালিককে বন্দী করেন। জুওয়ায়রিয়্যাহ বন্দীদের মধ্যে পড়েন। অতঃপর তার পিতা এসে তাকে মুক্তিপণ দিয়ে মুক্ত করে নিলেন এবং এরপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বিবাহ করেন। আর মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাকের হাদীস তার শেষ পর্যন্ত ওয়াকিদীর শব্দাবলীর কাছাকাছি, এবং সকল অর্থই এক।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف بمرَّة، وعبد الله بن أبي الأبيض وأبوه لم نقف لهما على ترجمة.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 114، والطبري في "تاريخه" 11/ 609 من طريق الواقديّ، بهذا الإسناد.
6946 - قال ابن عمر: وحدثني عبد الله بن أبي الأبيض، عن أبيه قال: تُوفِّيَت جُويرية بنت الحارث زوجُ النبيِّ صلى الله عليه وسلم في شهر ربيع الأول سنةَ ستٍّ وخمسين في إمارة معاوية، وصلَّى عليها مروانُ بن الحكم، وهو يومئذ والي المدينة [1].
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আব্দুল্লাহ ইবনে আবী আল-আবইয়াদ আমাকে তার পিতা থেকে বর্ণনা করেছেন যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী জুওয়াইরিয়াহ বিনত আল-হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শাসনামলে ছাপ্পান্ন (৫৬) হিজরির রবিউল আউয়াল মাসে ইন্তেকাল করেন। মারওয়ান ইবনে আল-হাকাম, যিনি তখন মদিনার গভর্নর ছিলেন, তিনি তাঁর জানাজার সালাত আদায় করেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 116، والطبري في "تاريخه" 11/ 609 - 610 من طريق الواقديّ، بهذا الإسناد.
6947 - قال ابن عمر وأخبرني محمد بن يزيد، عن جدَّته، وكانت مولاةَ جُويرية بنت الحارث، عن جُويرية قالت: تزوّجني رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا ابنةُ عشرين سنة. قال: وتُوفِّيَت جويرية سنةَ خمسين، وهي يومئذ ابنةُ خمسٍ وستين سنةً، وصلَّى عليها مروان بن الحكم [1].
জুয়াইরিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বিয়ে করেন যখন আমার বয়স ছিল বিশ বছর। ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: জুয়াইরিয়াহ পঞ্চাশ হিজরিতে ইন্তেকাল করেন, তখন তাঁর বয়স ছিল পঁয়ষট্টি বছর। মারওয়ান ইবনু হাকাম তাঁর জানাযার সালাত আদায় করেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف، ولم نعرف محمد بن يزيد ولا جدته.وأخرجه ابن سعد 10/ 116، والطبري 11/ 609 - 610، وابن عساكر 3/ 219 من طريق الواقديّ، بهذا الإسناد.
6948 - قال ابن عمر: وحدثني حزام بن هشام، عن أبيه قال: قالت جُويرية بنت الحارث: رأيتُ قبل قُدومِ النبيِّ صلى الله عليه وسلم بثلاثِ ليالٍ كأنَّ [1] القمر أقبلَ يسيرُ من يثربَ حتى وقع في حَجْري، فكرهتُ أن أخبرَ بها أحدًا من الناس، حتى قَدِمَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فلما سُبِينا رجوتُ الرؤيا، فلما أعتقني وتزوّجني، والله ما كلَّمتُه في قومي حتى كان المسلمون هم الذين أرسَلُوهم، وما شَعَرتُ [إلَّا] بجارية من بنات عمِّي تُخبِرني الخبرَ، فَحَمِدتُ الله عز وجل [2].
জুওয়াইরিয়াহ বিনতে আল-হারিথ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর (আমার কাছে) আগমনের তিন রাত আগে স্বপ্নে দেখলাম, যেন চাঁদ ইয়াসরিব (মদিনা) থেকে চলতে চলতে আসছিল এবং আমার কোলে এসে পড়ল। আমি লোকদের কাছে এই স্বপ্নের কথা প্রকাশ করা অপছন্দ করলাম, যতক্ষণ না আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আগমন করলেন। অতঃপর যখন আমাদের বন্দী করা হলো, তখন আমি সেই স্বপ্নের বাস্তবায়নের আশা রাখলাম। আর যখন তিনি আমাকে মুক্ত করলেন এবং বিয়ে করলেন, আল্লাহর শপথ, আমি আমার গোত্রের ব্যাপারে তাঁর সাথে কোনো কথা বলিনি, বরং মুসলিমরাই স্বতঃস্ফূর্তভাবে তাদের (আমার গোত্রের বন্দীদের) মুক্তি দিয়েছিল। আমি শুধু আমার চাচাতো বোনের একটি দাসীকে খবর দিতে শুনলাম, (তখনই আমি জানতে পারলাম)। অতঃপর আমি মহান আল্লাহর প্রশংসা করলাম।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في النسخ الخطية: كأنه، إلَّا (ب)، ففيها: كأنهن، والمثبت من النسخة المحمودية، وهو الموافق لما في مصدري التخريج.
[2] من فوق الواقديّ لا بأس بهم.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 4/ 50 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.
6949 - حدّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدّثنا أحمد بن عبد الجبار، حدّثنا يونس بن بُكير، عن ابن إسحاق قال: وجُويرية بنت الحارث كان اسمُها بَرَّةَ بنت الحارث بن أبي ضِرار بن حبيب بن عائذ بن مالك بن جَذيمة من خُزَاعة، كانت عند ابن عمٍّ لها يقال له: مُسافِع بن صفوان بن ذي الشُّفْرَينِ [1].
ইবনু ইসহাক থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: জুওয়াইরিয়াহ বিনত আল-হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নাম ছিল বাররাহ বিনত আল-হারিস ইবনু আবী দিরার ইবনু হাবীব ইবনু আইয ইবনু মালিক ইবনু জাযীমাহ। তিনি খুযাআহ গোত্রের ছিলেন এবং তাঁর এক চাচাতো ভাইয়ের বিবাহ বন্ধনে ছিলেন, যার নাম ছিল মুসাফি' ইবনু সাফওয়ান ইবনু যিশ শুফরাইন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] كذا في النسخ الخطية: الشفرين، بالتثنية، ونراه وهمًا، والذي في "طبقات ابن سعد" 10/ 113: مسافع بن صفوان ذي الشفر بن سرح بن مالك بن جذيمة، وفي "المحبر" لمحمد بن حبيب ص 89، و "أنساب الأشراف" للبلاذري 1/ 441، و "إمتاع الأسماع" للمقريزي 6/ 83: مسافع بن صفوان بن ذي الشفر، وزاد ابن حبيب: ابن أبي سرح وعليه يكون ما في "طبقات ابن سعد" تحريفًا. وفي "نزهة الألقاب" لابن حجر: ذو الشفرة.
6950 - حدَّثني [1] محمد بن عمرو بن عطاء، عن زينبَ بنت أبي سلمة، عن جُويريةَ بنت الحارث: أنَّ اسمها كان بَرَّة، وغَيَّره صلى الله عليه وسلم فسمَّاها جويريةَ، وكان يَكرَه أن يقال: خرجَ من عند بَرَّة [2].صحيح علي شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
জুবাইরিয়াহ বিনতে আল-হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর নাম ছিল বাররাহ। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা পরিবর্তন করে তাঁর নাম রাখেন জুবাইরিয়াহ। তিনি (নবী) এটা অপছন্দ করতেন যে কেউ বলুক: ‘তিনি বাররাহর কাছ থেকে বের হয়েছেন।’
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] القائل هو محمد بن إسحاق كما في الإسناد السابق.
[2] إسناده حسن، ولم نقف عليه من طريق ابن إسحاق بهذا اللفظ عند غير المصنّف، وتابعه عليه الواقديّ، وسيأتي في التخريج عن ابن إسحاق بلفظ آخر.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 115، والطبري في "تاريخه" 11/ 609 من طريق الواقديّ عن عبد الله بن عبد الرحمن بن يحنّس، عن زيد بن أبي عتاب، عن محمد بن عمرو بن عطاء، عن زينب بنت أبي سلمة، عن جويرية بنت الحارث: أنَّ اسمها كان برة فغيره رسول الله صلى الله عليه وسلم فسماها جويرية، وكان يكره أن يقال: خرج من عند برة. وإسناده من فوق الواقديّ لا بأس بهم.ويشهد له بلفظه حديث ابن عبّاس عند مسلم (2140)، وهو الآتي برقم (6961)، وانظر كلامنا عليه هناك.لكن أخرج أبو داود (4953) من طريق يزيد بن أبي حبيب، عن محمد بن إسحاق، عن محمد بن عمرو بن عطاء، أن زينب بنت أبي سلمة سألته: ما سمَّيتَ ابنتَك؟ قال: سميتُها بَرَّة، فقالت: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن هذا الاسم، سُمِّيتُ برَّةَ، فقال النبيّ صلى الله عليه وسلم: "لا تزكُّوا أنفسكم، الله أعلم بأهل البر منكم" فقال: ما نسميها؟ قال: "سمُّوها زينب". وهو صحيح، ابن إسحاق صرّح بالسماع من شيخه عند البخاريّ في "الأدب المفرد" (821)، وقد توبع أيضًا. وليس في هذا الخبر ذكر جويرية.وأخرجه كذلك مسلم (2142) (19) من طريق يزيد بن أبي حبيب، عن محمد بن عمرو، به ليس فيه محمد بن إسحاق!وتابع ابنَ إسحاق الوليدُ بن كثير عند مسلم (2142) (18)، فرواه عن محمد بن عمرو، حدثتني زينب بنت أمُّ سلمة، قالت: كان اسمي برَّةَ، فسمَّاني رسولُ صلى الله عليه وسلم زينب، قالت: ودخلت عليه زينبُ بنت جحش، واسمها برَّة، فسمَّاها زينب. هو موسى بن مسعود النهدي، وشيخه زهير: هو ابن محمد التميمي.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 115، والطبري في "تاريخه" 11/ 609 من طريق الواقديّ، عن إسحاق بن يحيى بن طلحة، بهذا الإسناد.وأخرجه معضلًا عبد الرزاق (13234) عن معمر، وابن سعد 10/ 115 عن مالك بن أنس ومحمد بن عبد الرحمن بن أبي ذئب، ثلاثتهم عن الزهريّ قال: ضُرب على صفيةَ وجويريةَ الحجاب، وقَسَمَ لهما النبيّ صلى الله عليه وسلم كما قسم لنسائه. ورجاله ثقات.
6951 - حدّثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن غالب، حدّثنا أبو حُذيفة، حدّثنا زُهير، عن إسحاقَ بن يحيى بن طلحة، عن الزُّهْري، عن مالك بن أوس، عن عمر: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم ضَرَبَ على جويريةَ الحِجابَ، وكان يُقسِمُ لها كما يقسِمُ لنسائِه [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুওয়াইরিয়ার ওপর পর্দা আরোপ করেন এবং তিনি তার (জুওয়াইরিয়ার) জন্য রাত বণ্টন করতেন, যেমন তিনি তার অন্যান্য স্ত্রীদের জন্য বণ্টন করতেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف بمرّة من أجل إسحاق بن يحيى بن طلحة، فهو متروك الحديث. أبو حذيفة: هو موسى بن مسعود النهدي، وشيخه زهير: هو ابن محمد التميمي.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 115، والطبري في "تاريخه" 11/ 609 من طريق الواقديّ، عن إسحاق بن يحيى بن طلحة، بهذا الإسناد.وأخرجه معضلًا عبد الرزاق (13234) عن معمر، وابن سعد 10/ 115 عن مالك بن أنس ومحمد بن عبد الرحمن بن أبي ذئب، ثلاثتهم عن الزهريّ قال: ضُرب على صفيةَ وجويريةَ الحجاب، وقَسَمَ لهما النبيّ صلى الله عليه وسلم كما قسم لنسائه. ورجاله ثقات.
6952 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الزاهد الأصبهانيّ، حدّثنا أحمد بن مَهدي بن رُستُم، حدّثنا سعيد بن كثير بن عُفير وسعيدُ بن أبي مريم وأبو صالح، قالوا: حدّثنا الليث بن سعد، عن ابن شِهاب، أنَّ عبيد بن السَّبَّاق أخبره عن جُوَيرية بنت الحارث: أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم دخل عليها، فقال: "هل مِن طعامٍ؟ " قالت: لا والله يا رسول الله، ما عندنا طعامٌ إلَّا عظمٌ من شاةٍ أُعطيَتْه مولاتي من الصدقة، فقال: "قَرِّبيها، فقد بَلَغَت مَحِلَّها" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه. ذكرُ أمِّ المؤمنين صَفيَّةَ بنت حُيَي رضي الله عنها
জুওয়াইরিয়াহ বিনত আল-হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছে প্রবেশ করলেন, অতঃপর জিজ্ঞাসা করলেন: "খাওয়ার মতো কিছু আছে কি?" তিনি বললেন: না, আল্লাহর শপথ, হে আল্লাহর রাসূল, আমাদের নিকট কোনো খাবার নেই, তবে একটি ছাগলের গোশতবিহীন হাড় আছে, যা আমার মনিবাকে সাদকা হিসেবে দেওয়া হয়েছিল। তিনি বললেন: "ওটা কাছে নিয়ে এসো, কেননা তা (সাদকা হিসেবে যার প্রাপ্য ছিল তার নিকট) তার সঠিক স্থানে পৌঁছে গেছে।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده صحيح.وأخرجه أحمد 45/ (27424)، ومسلم (1073)، وابن حبان (5117) من طرق عن الليث بن سعد، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه أحمد (45/ 27420)، ومسلم (1073)، وابن حبان (5118) من طريق سفيان بن عيينة، عن الزهريّ، به.وفسره الحميدي في "مسنده" (319) بقوله: يعني ليس هي الآن صدقة.
6953 - حدَّثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدّثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حدّثنا مصعب بن عبد الله الزُّبيريّ، حدّثنا عبد العزيز بن محمد، عن عمرو بن أبي عمرو، أنه سمع أنس بن مالك يقول: لما افتَتَح النبيُّ صلى الله عليه وسلم خيبَرَ اصطفى صفيَّةَ بنتَ حُيي لنفسه، خرج بها النبيُّ صلى الله عليه وسلم يُردِفُها وراءَه، ثم قال: رأيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يضعُ رجله حتى تقوم عليها فتركب، فلمَّا بلغ سَدَّ الصهباء عَرَّسَ بها، فَصَنَعَ حَيْسًا في نِطْع، وأمرني فدعوتُ له من حوله، فكانت تلك وليمة رسول الله صلى الله عليه وسلم [1].6953 م - قال مصعب: وهي صفيَّة بنت حيي بن أخطب بن سعية بن ثعلبة بن عبيد بن الخزرج بن أبي حبيب بن النضر بن النحَّام بن ينحوم، من بني إسرائيل من سبط موسى عليه السلام، وأُمُّها بَرَّة بنت سَمَوال، هلكت في زمن معاوية.
আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বার জয় করলেন, তখন তিনি সাফিয়্যা বিনতে হুয়াইকে নিজের জন্য মনোনীত করলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে নিয়ে বের হলেন, তাঁকে পিছনে সওয়ার করে। অতঃপর (আনাস ইবনে মালেক) বললেন: আমি দেখেছি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর (পায়ের) পা রাখতেন যাতে তিনি (সাফিয়্যা) তার উপর ভর করে আরোহণ করতে পারেন। যখন তিনি সাহবার বাঁধের কাছে পৌঁছালেন, সেখানে তিনি তাঁর সাথে বাসর যাপন করলেন। এরপর তিনি একটি চামড়ার দস্তরখানে 'হায়স' (খেজুর, পনির ও ঘি মিশ্রিত খাদ্য) তৈরি করলেন। আর আমাকে নির্দেশ দিলেন, তাই আমি তাঁর আশেপাশের লোকজনকে দাওয়াত দিলাম। আর এটাই ছিল রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওয়ালীমা।
৬৯৫৩ ম - মুস'আব বললেন: তিনি হলেন সাফিয়্যা বিনত হুয়াই ইবনে আখতাব ইবনে সা'ইয়াহ ইবনে সা'লাবাহ ইবনে উবাইদ ইবনে খাযরাজ ইবনে আবী হাবীব ইবনে নাযর ইবনে নুহহাম ইবনে ইয়ানহুম। তিনি ইসরাঈল গোত্রের এবং মূসা (আঃ)-এর বংশোদ্ভূত। আর তাঁর মা ছিলেন বার্রাহ বিনত সামওয়াল। তিনি মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শাসনামলে ইন্তেকাল করেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد جيد.وأخرجه بأطول ممّا هنا البخاري (2235) و (2893) و (4211)، وأبو داود (2995) من طرق عن يعقوب بن عبد الرحمن، عن عمرو بن أبي عمرو، عن أنس بن مالك.وأخرج البخاري أيضًا (5169)، والنسائي (6565) من طريق شعيب بن الحبحاب، عن أنس: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أعتق صفية وتزوجها، وجعل عتقها صداقها، وأولم عليها بحيس.وأخرجه مطولًا ضمن قصة غزوة خيبر: أحمد 19/ (11992)، والبخاري (371)، ومسلم (1365) (84)، والنسائي (5549) و (6564) من طريق عبد العزيز بن صهيب، عن أنس. وفيه: فأصبح النَّبيّ صلى الله عليه وسلم عروسًا، فقال: "من كان عنده شيء فليجئ به" وبسط نطعًا، فجعل الرجل يجيء بالتمر، وجعل الرجلُ يجيء بالسمن، قال: وأحسبه قد ذكر السَّويق، قال: فحاسوا حيسًا، فكانت وليمة رسول الله صلى الله عليه وسلم.وخالفهم الزهري عند أحمد (12078)، وأبي داود (3744)، وابن ماجه (1909)، والترمذي (1095) و (1096)، والنسائي (6566)، وابن حبان (4061) و (4064)، فرواه عن أنس بن مالك: أن النَّبيَّ صلى الله عليه وسلم أولم على صفية بسويق وتمر. وقال الترمذي: غريب.قلنا: رواية جميعهم فيها الحيس: وهو طعام يُصنع من الأقط والسَّمن والتمر، بينما السَّويق طعام يصنع من دقيق الحِنطة والشعير.
6954 - أخبرنا عبد الله بن إسحاق الخُراساني العَدْل، حدثنا يحيى بن جعفر بن الزبرقان، حدثنا عبد الوهاب بن عطاء، أخبرنا خالد الحذاء، عن كثير بن زيد، عن الوليد بن رباح، عن أبي هريرة قال: لما دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم بصفية بات أبو أيوب على باب النَّبيِّ صلى الله عليه وسلم، فلما أصبح فرأى رسول الله صلى الله عليه وسلم كبر، ومع أبي أيوبَ السَّيفُ، فقال: يا رسول الله، كانت جاريةً حديثة عهد بعرس، وكنت قتلت أباها وأخاها وزوجها، فلم آمَنْها عليكَ، فَضَحِكَ رسول الله صلى الله عليه وسلم وقال له خيرًا [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাফিয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে দাম্পত্য জীবনে প্রবেশ করলেন, তখন আবূ আইয়ূব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দরজার সামনে রাত্রি যাপন করলেন। যখন সকাল হলো এবং তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখলেন, তখন উচ্চস্বরে তাকবীর ধ্বনি দিলেন। আবূ আইয়ূব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে ছিল তরবারি। তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ, সাফিয়্যা একজন নববিবাহিতা যুবতী। (জিহাদের সময়) আমরা তার পিতা, ভাই এবং স্বামীকে হত্যা করেছিলাম, তাই আমি তার পক্ষ থেকে আপনার (নিরাপত্তার) জন্য শঙ্কিত ছিলাম। শুনে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হেসে দিলেন এবং তাকে উত্তম কথা বললেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده حسن في المتابعات والشواهد من أجل كثير بن زيد - وهو الأسلمي - ففيه بعض اللِّين.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 122 - ومن طريقه الطبري في "تاريخه" 11/ 610، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 16/ 46 - عن الواقدي، عن كثير بن زيد بهذا الإسناد.وفي الباب عن ابن عبّاس عند ابن سعد 2/ 109، ومن طريقه أخرجه ابن عساكر 16/ 45، وفي إسناده محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى، وحديثه حسن في المتابعات والشواهد، وهذا منها.وعن عروة بن الزبير مرسلًا عند البيهقي في "الدلائل" 4/ 231 - 233، ومن طريقه ابن عساكر 16/ 46.
6955 - أخبرنا علي بن عبد الرحمن السَّبيعي بالكوفة، حدثنا أحمد بن حازم الغفاري، حدثنا أبو نعيم، حدثنا عيسى بن طهمان قال: سمعتُ أنس بن مالك يقول: أطعم النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم على صفية بنت حُيَي خبزًا ولحمًا [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাফিয়্যা বিনতে হুয়াই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিবাহ করার সময় রুটি ও গোশত দ্বারা ওয়ালিমা (ভোজ) খাইয়েছিলেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] رجاله ثقات، لكن لعيسى بن طهمان بعض الأوهام، ونُرى أنَّ هذا منه، فالمحفوظ أن إطعام النَّبيّ صلى الله عليه وسلم الناسَ لحمًا وخبزًا كان في وليمة زينب بن جحش، وبذلك أعله الذهبي في "التلخيص"، فقال: غلط، إنما هذي زينب. قلنا: وتقدم في أحاديث الباب أن طعام صفية كان حيسًا. ولم نقف على رواية عيسى بن طهمان هذه عند غير المصنف.وأما خبر إطعامه صلى الله عليه وسلم في وليمة زينب اللحم والخبز، فقد رواه أحمد 19/ (11943)، والبخاري (4793)، ومسلم (1428) وغيرهم من طرق عن أنس بن مالك وهذا هو المحفوظ في حديث أنس.
6956 - حدثنا أبو عبد الله الأصبهاني، حدثنا الحسن بن الجهم بن مَصْقَلة، حدثنا الحسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر، حدثني محمد بن موسى، عن عُمارة بن المهاجر، عن آمنة بنت أبي قيس الغفارية قالت: أنا إحدى النساء اللاتي زَفَفْنَ صفية إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فسمعتُها تقول: ما بلغت سبع عشرةَ، أو جَهْدي أن بلغت سبع عشرةَ سنةً ليلة دخلت على رسول الله صلى الله عليه وسلم.قال: وتوفيت صفية سنة اثنتين وخمسين في زمن معاويةَ، وقُبِرَت بالبقيع [1].
আমিনা বিনত আবি কায়স আল-গিফারিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি সেই মহিলাদের মধ্যে একজন, যারা সাফিয়্যাহকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে সজ্জিত করে নিয়ে গিয়েছিল। আমি তাঁকে (সাফিয়্যাহকে) বলতে শুনেছি: আমি যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মিলিত হই, তখন আমার বয়স সতেরো বছর পূর্ণ হয়নি, অথবা (তিনি বলেছিলেন) আমার কঠিন চেষ্টা সত্ত্বেও (অর্থাৎ সবেমাত্র) সতেরো বছর পূর্ণ হয়েছিল। রাবী বলেন: সাফিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মুআবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শাসনামলে বাহান্ন (৫২) হিজরি সনে ইন্তেকাল করেন এবং তাঁকে বাকী’ (কবরস্থান)-এ দাফন করা হয়।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] من فوق محمد بن عمر الواقدي لا بأس بهم فمحمد بن موسى: هو محمد بن موسى بن أبي عبد الله الفطري، صدوق لا بأس به، وشيخه عمارة بن المهاجر روى عنه جماعة، وذكره ابن حبان في "الثقات" 261/ 7، وآمنة ذكرها الحافظ ابن حجر في "الإصابة" 7/ 518 باسم: أمية بنت أبي قيس، ولم يذكر لها سوى هذا الخبر.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 125 - ومن طريقه الطبري في "تاريخه" 11/ 610، وابن عساكر 3/ 223 - عن محمد الواقدي، بهذا الإسناد.
6957 - أخبرنا دَعْلَج بن أحمد السِّجزي، حدثنا عبد العزيز بن معاوية البصري [1]، حدثنا شاذُّ بن فَيَّاض أبو عُبيدة، حدثنا هاشم بن سعيد، عن كنانة، عن صفية قالت: دخل علي رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا أبكي، فقال: "يا بنتَ حُيَي، ما يُبكيكِ؟ " قلتُ: بلغني أنَّ حفصة وعائشة تنالان منِّي وتقولان: نحن خيرٌ منها، نحن بنات عم رسول الله صلى الله عليه وسلم وأزواجه، قال: "ألا قلت لهم: كيف تكونان خيرًا مني وأبي هارونُ، وعمِّي موسى، وزوجي محمد؟! " صلوات الله عليهم [2]. ذكر أم المؤمنين ميمونة بنت الحارث رضي الله عنها
সফিয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি কাঁদছিলাম, এমন সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে এলেন এবং জিজ্ঞেস করলেন: "হে হুয়াইয়ের কন্যা! তুমি কেন কাঁদছো?" আমি বললাম, আমার কাছে খবর এসেছে যে হাফসা এবং আয়েশা আমার সম্পর্কে (খারাপ) কথা বলছে এবং তারা বলছে: আমরা তার চেয়ে উত্তম। আমরা তো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চাচাতো বোন এবং তাঁর স্ত্রী। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তাদেরকে কেন বললে না যে, তোমরা কীভাবে আমার চেয়ে উত্তম হতে পারো? যখন আমার পিতা হলেন হারুন (আঃ), আমার চাচা হলেন মূসা (আঃ), আর আমার স্বামী হলেন মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)?" আল্লাহর সালাত ও শান্তি তাদের উপর বর্ষিত হোক।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: الصبري.
[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف من أجل هاشم بن سعيد الكوفي.وأخرجه الترمذي (3892) من طريق عبد الصمد بن عبد الوارث، عن هاشم بن سعيد الكوفي، بهذا الإسناد. وقال غريب لا نعرفه من حديث صفية إلا من حديث هاشم الكوفي، وليس إسناده بذاك.ويشهد له حديث أنس بن مالك عند أحمد 19/ (12392)، والترمذي (3894)، والنسائي (8870)، وابن حبان (7211)، قال: بلغ صفيةَ أنَّ حفصة قالت: إني ابنة يهودي، فبكت، فدخل عليها النَّبيّ صلى الله عليه وسلم وهي تبكي، فقال: "ما شأنُكِ؟ " فقالت: قالت لي حفصة: إني ابنة يهودي، فقال النَّبيّ صلى الله عليه وسلم: "إنك ابنة نبيٍّ، وإنَّ عمك لنبيٌّ، وإنك لتحت نبيّ، ففيم تفخر عليك؟! " ثم قال: "اتقي الله يا حفصة". وإسناده صحيح.
6958 - حدثني بكير بن أحمد بن سَهْل الصُّوفي بمكة، وكتبه لى بخطِّه، حدثنا الحسن بن علي بن شبيب المعمري، حدثنا أبو ثَوْر إبراهيم بن خالد الكلبي، حدثنا أبو قَطَن قال: قال لي شُعبة: قال لي مِسعَر بن كِدام: جدَّتي [1] زوجُ رسول الله صلى الله عليه وسلم ميمونة بنت الحارث، وما أخبرت بهذا أحدًا قبلك.وهي ميمونة بنت الحارث بن حَزْن بن بُجَير بن الهُزم بن رُويبة بن عبد الله بن هلال بن عامر بن صعصعة، وأمها هند بنت عوف بن زُهير بن الحارث بن حماطة بن جُرَش من حِمْيَر.
মিসআর ইবনে কিদাম থেকে বর্ণিত, তিনি (শু'বাকে) বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর স্ত্রী মায়মুনা বিনতে হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার দাদী (বা নানী)। আমি এর পূর্বে আর কাউকে এই বিষয়ে অবহিত করিনি। আর তিনি হলেন মায়মুনা বিনতে হারিস ইবনে হাযন ইবনে বুজাইর ইবনে আল-হুজম ইবনে রুয়াইবা ইবনে আবদুল্লাহ ইবনে হিলাল ইবনে আমির ইবনে সা'সা'আ। আর তাঁর মাতা হলেন হিন্দ বিনতে আওফ ইবনে যুহাইর ইবনে আল-হারিস ইবনে হামাতা ইবনে জুরশ, যিনি ছিলেন হিমইয়ার গোত্রের।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: حدثتني، والتصويب من مصدر التخريج.وأخرجه أبو بكر البزاز في "حديث شعبة" (103) عن عبد الله بن أحمد قال: أخبرت عن أبي قطن، بهذا الإسناد.ومسعر يلتقي نسبه بنسب أم المؤمنين ميمونة في هلال بن عامر بن صعصعة، فهذا مراده أنها جدته.
6959 - Null