হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6959)


6959 - حدثنا أبو عبد الله الأصبهاني، حدثنا الحسن بن الجهم، حدثنا الحسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر قال: ميمونة بنت الحارث بن حَماطة بن جُرَش، وهي خالة عبد الله بن عبّاس، وأختُ أمّ الفضل بنت الحارث، كانت تزوّجت في الجاهلية مسعود بن عمرو بن عُمير الثقفي، ثم فارقها فخَلَف عليها أبو رُهم بن عبد العُزَّى بن أبي قيس من بني مالك بن حِسْل بن عامر بن لؤي، فتُوفِّي عنها، فتزوجها رسول الله صلى الله عليه وسلم، زوَّجَها إياه العبّاس بن عبد المطلب، وكان يلي أمرها، تزوجها رسول الله صلى الله عليه وسلم بسرف على عشرة أميال من مكة، وكانت آخر امرأة تزوجها رسول الله صلى الله عليه وسلم، وذلك سنة سبع في عُمرة القضية.6959 م - قال ابن عمر: وتُوفِّيَت ميمونة رضي الله عنها سنة إحدى وستين، وهي آخرُ من مات من أزواج النَّبيِّ صلى الله عليه وسلم، وكان لها يومَ تُوفِّيَت ثمانون أو إحدى وثمانون سنة، وكانت على كبر سِنَّها جَلْدةً.




মুহাম্মাদ ইবনু উমর থেকে বর্ণিত, মাইমুনাহ বিনতে হারিস ইবনু হামাতা ইবনু জুরাশ ছিলেন আবদুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খালা এবং উম্মুল ফাদল বিনতে হারিসের বোন। জাহিলিয়াতের যুগে তিনি মাসউদ ইবনু আমর ইবনু উমায়ের সাকাফী-কে বিবাহ করেছিলেন। এরপর মাসউদ তাঁকে তালাক দেন। অতঃপর তাঁকে বিবাহ করেন আবূ রুহম ইবনু আবদুল উয্‌যা ইবনু আবী কায়স, যিনি বনী মালিক ইবনু হিসল ইবনু আমির ইবনু লুয়াই গোত্রের লোক ছিলেন। আবূ রুহম তাঁর কাছ থেকে ইনতিকাল করেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বিবাহ করেন। আব্বাস ইবনু আবদুল মুত্তালিব তাঁকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বিবাহ দেন, যেহেতু আব্বাস তাঁর (বিবাহ সংক্রান্ত) অভিভাবকত্বের দায়িত্বে ছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে মক্কার দশ মাইল দূরে অবস্থিত সারিফ নামক স্থানে বিবাহ করেন। তিনিই ছিলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সর্বশেষ বিবাহিতা স্ত্রী। এই বিবাহটি সপ্তম হিজরীতে উমরতুল কাযা (পূরণীয় উমরাহ)-এর সময় হয়েছিল। ইবনু উমর (অন্য সূত্রে) বলেন: মাইমুনাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একষট্টি হিজরীতে ইনতিকাল করেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীদের মধ্যে তিনিই সর্বশেষ ইনতিকালকারী। তাঁর মৃত্যুর সময় তাঁর বয়স ছিল আশি অথবা একাশি বছর। অধিক বয়স হওয়া সত্ত্বেও তিনি শক্তিশালী ও দৃঢ়চেতা ছিলেন।









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6960)


6960 - أخبرنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، حدثنا محمد بن غالب، حدثنا عمرو بن مرزوق، حدثنا شُعبة، عن عطاء بن أبي ميمونة، عن أبي رافع، عن أبي هريرة قال: كان اسم ميمونةَ برَّةَ، فسماها رسول الله صلى الله عليه وسلم ميمونة [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وقد رُوي بإسناد صحيح له شاهد:




আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মাইমূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নাম ছিল বাররাহ। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর নাম রাখলেন মাইমূনা।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] صحيح بذكر زينب لا ميمونة، وهذا إسناد رجاله ثقات، وقد اختلف على شعبة في تسمية صاحبة القصة، فرواه عمرو بن مرزوق عند البخاري في "الأدب المفرد" (832)، وابن أبي خيثمة في السفر الثالث من "تاريخه الكبير" 2/ 84، والمصنف في هذه الرواية، عن شعبة بلفظ: ميمونة. ورواه أبو داود الطيالسي (2567)، وعبد الصمد بن عبد الوارث عند ابن راهويه في "مسنده" (26) عن شعبة على الشكّ: كان اسم زينب أو ميمونة برة … إلخ.وخالفهم أكثر أصحاب شعبة، فرووه عنه بذكر زينب على الصواب، أخرجه كذلك أحمد 15/ (9560) و 16 / (9914)، والبخاري (6192)، ومسلم (2141)، وابن ماجه (3732)، وابن حبان (5830) من طرق عن شعبة به. و (3308)، فرواه الثلاثة عن محمد بن عبد الرحمن الطلحي، به بذكر جويرية مكان ميمونة.وزاد سفيان والمسعودي في روايتهما: فخرج وهي في مصلاها ورجع وهي في مصلاها، فقال: "لم تزالي في مصلاك هذا؟ " قالت: نعم، قال: "قد قلت بعدك أربع كلمات ثلاث مرات، لو وزنت بما قلت لوزنتهن: سبحان الله وبحمده عدد خلقه ورضا نفسه وزنة عرشه ومداد كلماته".وتقدم عند المصنف برقم (6950) حديثُ زينب بنت أبي سلمة، عن جويرية: أنَّ اسمها كان برَّة فغيره النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6961)


6961 - أخبرناه أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا عُبيد الله بن موسى، أخبرنا إسرائيل، عن محمد بن عبد الرحمن قال: سمعتُ كُريبًا أبا رِشدِين يُحدِّثُ عن ابن عباس قال: كان اسم ميمونة بَرَّةَ، فسماها رسول الله صلى الله عليه وسلم ميمونة [1].




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মাইমুনার নাম ছিল বাররাহ, অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার নাম রাখলেন মাইমুনা।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] صحيح بذكر جويرية لا ميمونة، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن تفرد إسرائيل - وهو ابن يونس السبيعي - بتسميتها ميمونة وخالفه أصحاب محمد بن عبد الرحمن - وهو ابن عبيد مولى آل طلحة - فرووه عنه بلفظ: جويرية.وأخرجه ابن أبي خيثمة في السفر الثالث من "تاريخه الكبير" 2/ 84 - ومن طريقه ابن عبد البر في الاستيعاب ص 937 - عن عاصم بن يوسف اليربوعي، عن إسرائيل، بهذا الإسناد.وخالفه سفيان بن عيينة عند أحمد 4 / (2334)، ومسلم (2140)، وأبي داود (1503)، وشعبة عند ابن حبان (5829)، وعبد الرحمن المسعودي عند أحمد 5/ (2900) و (3005) و (3308)، فرواه الثلاثة عن محمد بن عبد الرحمن الطلحي، به بذكر جويرية مكان ميمونة.وزاد سفيان والمسعودي في روايتهما: فخرج وهي في مصلاها ورجع وهي في مصلاها، فقال: "لم تزالي في مصلاك هذا؟ " قالت: نعم، قال: "قد قلت بعدك أربع كلمات ثلاث مرات، لو وزنت بما قلت لوزنتهن: سبحان الله وبحمده عدد خلقه ورضا نفسه وزنة عرشه ومداد كلماته".وتقدم عند المصنف برقم (6950) حديثُ زينب بنت أبي سلمة، عن جويرية: أنَّ اسمها كان برَّة فغيره النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6962)


6962 - أخبرني إسماعيل بن محمد بن الفضل بن محمد الشعراني، حدثنا جَدِّي، حدثنا إبراهيم بن المنذر الحزامي، حدثنا محمد بن فليح، عن موسى بن عقبة، عن ابن شهاب قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم من العام القابل عامَ الحديبية مُعتمِرًا في ذي القعدة سنة سبع، وهو الشهر الذي صده فيه المشركون عن المسجد الحرام، حتى إذا بلغ يأجَجَ بعث جعفر بن أبي طالب بين يديه إلى ميمونة بنت الحارث بن حَزْن العامرية، فخطبها عليه، فجعلت أمرها إلى العباس بن عبد المطلب، وكانت أختها أم الفضل تحته، فزوجها العباس رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأقام النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم بسَرِفَ حتى قدمت ميمونةُ، فبنى بها بسَرِفَ، وقدَّر الله تعالى أن يكون موتُ ميمونة بنت الحارث بسرف بعد ذلك بحين، فتوفِّيَت حيث بَنَى بها رسول الله صلى الله عليه وسلم [1].




ইবনু শিহাব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পরের বছর, অর্থাৎ হুদায়বিয়ার বছর, সাত হিজরির যিলক্বদ মাসে উমরাহ আদায়ের উদ্দেশ্যে বের হন। এই মাসেই মুশরিকরা তাঁকে মাসজিদুল হারাম থেকে বাধা দিয়েছিল। অবশেষে যখন তিনি ইয়া'জাজ নামক স্থানে পৌঁছলেন, তখন তিনি তাঁর আগে আগে জা'ফর ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে মাইমূনাহ বিনত আল-হারিছ ইবনু হাযন আল-'আমিরিয়্যার নিকট প্রেরণ করলেন, যেন তাঁর পক্ষ থেকে তিনি তাঁকে বিবাহের প্রস্তাব দেন। তখন তিনি (মাইমূনাহ) তাঁর বিষয়টি আব্বাস ইবনু আবদুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাতে সোপর্দ করেন—কারণ তাঁর বোন উম্মুল ফাদল ছিলেন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিবাহে। অতঃপর আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তাঁর বিবাহ সম্পন্ন করালেন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সারীফ নামক স্থানে অবস্থান করলেন, যতক্ষণ না মাইমূনাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেখানে এসে পৌঁছলেন। অতঃপর তিনি সারীফেই তাঁর সাথে বাসর উদযাপন করেন। আর আল্লাহ তাআলা এই ফয়সালা করেন যে, এরপর কিছুকাল পরে মাইমূনাহ বিনত আল-হারিছ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মৃত্যুও সারীফেই হবে। সুতরাং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যেখানে তাঁর সাথে বাসর উদযাপন করেছিলেন, সেখানেই তিনি ইন্তিকাল করেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكنه مرسل أو معضل، وتابع الزهري عليه عروة بن الزبير.وأخرجه البيهقي مطولًا في "دلائل النبوة" 4/ 314 - 316 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن عبد البر في "التمهيد" 3/ 159 - 160 من طريق أحمد بن زهير، عن إبراهيم بن المنذر به.وأخرجه البيهقي 4/ 314 - 316 من طريق إسماعيل بن إبراهيم بن عقبة، عن عمه موسى بن عقبة به.وأخرجه البيهقي أيضًا من طريق ابن لهيعة، عن أبي الأسود، عن عروة بن الزبير، به.وانظر الحديثين بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6963)


6963 - حدثنا أبو العبّاس محمد بن يعقوب حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بكير، عن ابن إسحاق، حدثني ابن أبي نجيح، عن عطاء ومجاهد، عن ابن عباس: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم تزوّج ميمونة بنت الحارث وأقام بمكة ثلاثًا، فأتاه حُويطِب بن عبد العُزَّى في نَفَرٍ من قريش في اليوم الثالث، فقالوا له: إنه قد انقضي أجلك فاخرج عنا، قال: "وما عليكم لو تركتموني فأعرَستُ بين أظهركم فصنعتُ لكم طعامًا فحضرتموه"، قالوا: لا حاجة لنا في طعامك، فاخرُجْ عنَّا، فخرج بميمونة بنت الحارث حتى أعرَسَ بها بسَرِفَ [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وممّا يُتعَجَّب من قضاء الله وقدره أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بَنَى بميمونة بنت الحارث بسَرِفَ، وردَّها إلى المدينة عند مُنصَرَفه من عُمرة القضاء، وبقيت عنده إلى أن خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم لفتح مكة، وقد أخرجها معه إلى أن فتح الطائف وانصرف راجعًا إلى المدينة، فماتت ميمونة بسَرِفَ في الموضع الذي بَنَى بها رسول الله صلى الله عليه وسلم عند تزويجها.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মাইমুনা বিনত আল-হারিসকে বিবাহ করেছিলেন এবং মক্কায় তিন দিন অবস্থান করেছিলেন। অতঃপর তৃতীয় দিন কুরাইশদের একটি দলের সাথে হুওয়াইতিব ইবনে আব্দুল উযযা তাঁর নিকট আসলেন। তারা তাঁকে বলল: আপনার নির্ধারিত সময়কাল শেষ হয়ে গেছে, তাই আপনি আমাদের কাছ থেকে চলে যান। তিনি বললেন: "তোমরা যদি আমাকে ছেড়ে দাও, তাহলে কী হবে? (আমি চাই) আমি তোমাদের উপস্থিতিতে বিবাহ সম্পন্ন করি এবং তোমাদের জন্য খাবার তৈরি করি, আর তোমরা তাতে উপস্থিত থাকো।" তারা বলল: আপনার খাবারের আমাদের কোনো প্রয়োজন নেই, আপনি আমাদের কাছ থেকে চলে যান। অতঃপর তিনি মাইমুনা বিনত আল-হারিসকে নিয়ে সেখান থেকে বের হয়ে গেলেন এবং 'সারিফ' নামক স্থানে তাঁকে বিবাহ করলেন।

এই হাদীসটি মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ, কিন্তু তারা (বুখারী ও মুসলিম) এটি বর্ণনা করেননি। আল্লাহর ফায়সালা ও তাকদীরের প্রতি বিস্ময় প্রকাশ করা যায় যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মাইমুনা বিনত আল-হারিসের সাথে সারিফ-এ বিবাহ সম্পন্ন করেছিলেন। ক্বাযা উমরাহ থেকে ফেরার সময় তিনি তাঁকে মদীনায় ফিরিয়ে আনেন। তিনি তাঁর সাথে ততদিন ছিলেন যতদিন না রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মক্কা বিজয়ের জন্য বের হয়েছিলেন। তিনি তাঁকে সাথে নিয়ে বের হয়েছিলেন এবং যখন তিনি তায়েফ জয় করে মদীনার দিকে প্রত্যাবর্তন করছিলেন, তখন মাইমুনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) 'সারিফ' নামক সেই স্থানেই ইন্তেকাল করেন, যে স্থানে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে বিবাহ করার সময় তাঁর সাথে বাসর করেছিলেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده حسن. ابن أبي نجيح: هو عبد الله.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 4/ 330 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقرن بابن أبي نجيح أبان بن صالح.وأخرجه الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (5805)، وفي "شرح معاني الآثار" 2/ 268 - 269، والطبراني في "الكبير" (11401) من طرق عن ابن إسحاق به. وقرنا بابن أبي نجيح أبان بن صالح أيضًا.وأخرج أحمد 4 / (2393)، والبخاري (4259) تعليقًا، والنسائي (3190)، وابن حبان (4133) من طريقين عن ابن إسحاق به: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم تزوج ميمونة بنت الحارث في سفره وهو حرام. وقُرن عندهم - إلَّا النسائي - بابن أبي نجيح أبان بن صالح. وقال النسائي عقبه: والمشهور عن عطاء عن ابن عباس أنَّ النَّبيَّ صلى الله عليه وسلم احتجم وهو محرم.وانظر الحديثين بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6964)


6964 - حدثنا بصحة ما ذكرتُه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا وهب بن جرير بن حازم، حدثنا أبي، قال: سمعت أبا فَزَارة يُحدِّث عن يزيد بن الأصم، عن ميمونة: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم تزوجها حلالًا، وبَنَى بها حلالًا بنى بها بسَرِفَ. وماتت بسَرِفَ في الليلة التي بَنَى بها فيها، وكانت خالتي، فنزلتُ في قبرها أنا وابن عبّاس، فلما وضعناها في اللحد مال رأسها، فأخذتُ رِدائي فجمعته فوضعته عند رأسها، فأخذه ابن عباس فرمى به، ووضع عند رأسها كَذَّانَةٌ، قال: وكانت حَلَقَت في الحج، وكان رأسُها مُجمَّمًا، وبين سَرِفَ ومكةَ اثنا عشر ميلًا [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم ولم يخرجاه.وقد نَطَقَ هذا الإسناد الصحيح بأن رسول الله صلى الله عليه وسلم تزوجها حلالًا، فأما أخبار عكرمة عن ابن عبّاس فإنها ناطقةٌ أنه صلى الله عليه وسلم تزوجها وهو مُحرِمٌ.




মায়মূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে ইহরামহীন অবস্থায় বিবাহ করেছিলেন এবং ইহরামহীন অবস্থায় তার সাথে বাসর করেছিলেন। তিনি সারিফে তার সাথে বাসর করেছিলেন। এবং তিনি সারিফেই ইন্তেকাল করেন, যেই রাতে তার সাথে বাসর হয়েছিল। তিনি ছিলেন আমার খালা। এরপর আমি এবং ইবনু আব্বাস তার কবরে অবতরণ করলাম। যখন আমরা তাকে লাহদে রাখলাম, তখন তার মাথা একদিকে হেলে গেল। আমি আমার চাদরটি নিয়ে ভাঁজ করে তার মাথার কাছে রাখলাম। তখন ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেটি নিয়ে ছুঁড়ে ফেলে দিলেন এবং তার মাথার কাছে একটি কাদদানা (মাটির ঢেলা) রাখলেন। তিনি (রাবী) বললেন, তিনি (মায়মূনা) হাজ্জে চুল মুণ্ডন করেছিলেন এবং তার চুল ছিল জুন্মাম (কান ও ঘাড়ের মধ্যবর্তী স্থান পর্যন্ত পৌঁছানো)। আর সারিফ এবং মক্কার মধ্যে দূরত্ব ছিল বারো মাইল।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده صحيح أبو فزارة: هو راشد بن كيسان العبسي.وأخرجه أحمد 44/ (26828)، والترمذي (845)، وابن حبان (4134) من طرق عن وهب بن جرير، بهذا الإسناد وقال الترمذي غريب، وروى غير واحد هذا الحديث عن يزيد بن الأصم مرسلًا: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم تزوج ميمونة وهو حلال.وأخرجه مسلم (1411)، وابن ماجه (1964)، وابن حبان (4136) من طريق يحيى بن آدم عن جرير بن حازم به مختصرًا.وأخرجه أحمد 44 / (26815) و (26841)، وأبو داود (1843)، وابن حبان (4137) و (4138) من طريق حماد بن سلمة، والنسائي (5383) من طريق الوليد بن زوران، كلاهما عن ميمون بن مهران، عن يزيد بن الأصم، به.وخالفهما سفيان بن حبيب، فرواه مرسلًا عند النسائي (3219) عن حبيب بن الشهيد، عن ميمون بن مهران، عن يزيد بن الأصم: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم تزوج ميمونة وهو مُحلٌّ.وأخرجه كذلك مرسلًا النسائي (5384) من طريق شعبة عن الحكم، عن يزيد بن الأصم، قال: ما تزوج رسول الله صلى الله عليه وسلم ميمونة وهو محرم. وهي خالة يزيد.وسيأتي مرسلًا أيضًا عند المصنف بعد حديث من طريق الزهري عن يزيد بن الأصم.قوله: "كَذَّانة": هو الحجر الرّخو.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6965)


6965 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه وعلي بن حَمْشَاذ العدل، قالا: أخبرنا بشر بن موسى، حدثنا الحميدي، حدثنا سفيان، عن عمرو بن دينار، أخبرني أبو الشعثاء، عن ابن عباس: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم نَكَحَ وهو مُحرم.قال عمرو: قد ذكرتُه للزهري، ثم قال: يا عمرو، مَن تُراها؟ قلتُ: يقولون: ميمونة، فقال ابن شهاب: أخبرني يزيد بن الأصم: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم تزوجها وهو حلال، فقال عمرٌو لابن شهاب: تجعل أعرابيًّا يبولُ على عَقِبه مثل ابن عبّاس؟ فقال ابن شهاب: هي خالته، فقال عمرو: هي خالة ابن عباس أيضًا [1]هذا حديث صحيح على شرط الشيخين.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইহরাম অবস্থায় বিবাহ করেছিলেন।

আমর (ইবনু দীনার) বলেন, আমি যুহরীকে এ বিষয়ে জানালাম। তখন তিনি (যুহরী) বললেন: হে আমর, আপনার কী মনে হয়, তিনি কে? আমি বললাম: লোকেরা বলে, তিনি হলেন মাইমূনাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।

তখন ইবনু শিহাব (যুহরী) বললেন: ইয়াযীদ ইবনু আসম আমাকে জানিয়েছেন যে, নবী কারীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন তাঁকে বিবাহ করেন, তখন তিনি হালাল (ইহরামমুক্ত) অবস্থায় ছিলেন।

এতে আমর ইবনু দীনার ইবনু শিহাবকে বললেন: আপনি কি এমন এক বেদুঈনকে, যে নিজের গোড়ালির ওপর পেশাব করে (অর্থাৎ অনভিজ্ঞ বা নিম্নস্তরের লোক), ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সমতুল্য মনে করেন?

তখন ইবনু শিহাব বললেন: সে তো তাঁর (মাইমূনাহর) ভাগ্নে। আমর বললেন: তিনি তো ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এরও খালা।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده الأول صحيح، وإسناده الثاني لم يذكر يزيد بن الأصم من حدثه بالخبر، فهو مرسل، لكن تقدم في الرواية أنه رواه عن ميمونة صاحبة القصة، وهي خالته، وصرّح عند مسلم وغيره بتحديثها إياه. سفيان: هو ابن عيينة، وأبو الشعثاء: اسمه جابر بن زيد اليحمدي.وأخرجه بشطريه مسلم (1410) (46) من طرق عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد.وأخرج شطره الأول أحمد 3 / (1919)، والبخاري (5114)، وابن ماجه (1965)، والنسائي (5386) من طرق عن سفيان بن عيينة به.وأخرجه كذلك أحمد 3 / (2014) و 4 / (2437) و 5 / (2980) و (3116)، ومسلم (1410) (47)، والترمذي (844)، والنسائي (3806) و (3807)، وابن حبان (4131) من طرق عن عمرو بن دينار به.وأخرجه كذلك أحمد 4 / (2200) و (2273) و (2560) و (2587)، والبخاري (1837) و (4258)، وأبو داود (1844)، والترمذي (842) و (843)، والنسائي (3186) و (3189) و (3808 - 3810) و (5385) و (5389)، وابن حبان (4129) و (4133) من طرق عن ابن عباس.وانظر للتوفيق بين هذه الأحاديث "فتح الباري" للحافظ ابن حجر عند شرحه للحديث (5114)، والتعليق على الحديث (2200) من "مسند أحمد".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6966)


6966 - أخبرنا عبد الله بن الحسين القاضي بمَرْوٍ، حدثنا الحارث بن أبي أسامة، حدثنا كثير بن هشام قال: جعفر بن بُرْقان: حدثنا يزيد بن الأصم ابن أخت ميمونة قال: تلقيتُ عائشة رضي الله عنها وهي مُقبلةٌ من مكة أنا وابن الطلحة بن عبيد الله، وهو ابن أختها، وقد كنَّا وَقَعْنا في حائط من حيطان المدينة، فأصبنا منه، فبلغها ذلك، فأقبلت على ابن أختها تلومُه وتَعدُلُه، وأقبلت عليّ فوعظتني موعظة بليغة، ثم قالت: أما علمت أن الله تعالى ساقك حتى جعلك في أهل بيت نبيه؟! ذهبَتْ والله ميمونةٌ ورُميَ برَسَنِكَ على غاربكَ، أما إنها كانت من أتقانا الله عز وجل وأوصلنا للرَّحِم [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এবং তালহা ইবনে উবাইদুল্লাহর পুত্র, যিনি তাঁর (আয়িশার) ভাগ্নে ছিলেন, মক্কা থেকে প্রত্যাবর্তনের পথে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে সাক্ষাৎ করলাম। আমরা মদীনার একটি প্রাচীরে প্রবেশ করে সেখান থেকে কিছু ফল গ্রহণ করেছিলাম। যখন তাঁর (আয়িশার) কাছে সে খবর পৌঁছল, তখন তিনি তাঁর ভাগ্নের দিকে ফিরে তাকে ভর্ৎসনা ও তিরস্কার করতে লাগলেন। এরপর তিনি আমার দিকে ফিরে এলেন এবং আমাকে কঠোর উপদেশ দিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: ‘তুমি কি জানো না যে আল্লাহ তাআলা তোমাকে পরিচালিত করে তাঁর নবীর পরিবারভুক্ত করেছেন? আল্লাহর কসম! মাইমূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তো চলে গেছেন, আর তোমার লাগাম তোমার ঘাড়ে ফেলে দেওয়া হয়েছে (অর্থাৎ, এখন তুমি নিজের দায়িত্ব)! নিশ্চয়ই তিনি (মাইমূনা) ছিলেন আমাদের মধ্যে আল্লাহ আযযা ওয়া জাল-কে সবচেয়ে বেশি ভয়কারী এবং আত্মীয়তার সম্পর্ক বজায় রাখার ব্যাপারে সবচেয়ে বেশি যত্নশীল।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده صحيح كما قال الحافظ ابن حجر في الإصابة" 8/ 128. وقال الذهبي في "التلخيص": فيه دليل على أن ميمونة ماتت قبل عائشة رضي الله عنها، فبطل قول من قال: ماتت سنة إحدى وستين.وهو في مسند الحارث" كما في بغية الباحث" (455).وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 134، وابن أبي شيبة 6/ 88، وأبو نعيم في الحلية" 4/ 97 من طريق كثير بن هشام، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن عساكر 65/ 126 من طريق محمد بن سليمان الحراني، عن جعفر بن برقان به. وأخرجه مختصرًا أبو زرعة الدمشقي في تاريخه ص 495 من طريق ميمون بن مهران، عن يزيد بن الأصم أنه سمع عائشة رضي الله عنها تقول: كانت ميمونة أتقانا الله، وأوصلنا للرحم. وقال أبو زرعة عقبه: فدلنا قول عائشة رضي الله عنها هذا: "كانت ميمونة"، أنها تقدمتها بالموت، وهي وحفصة توفيتا قبل عائشة رضي الله عنها. وصالح بن محمد - وهو ابن زائدة المدني - ضعيف، وأم ذرة - وهي مولاة عائشة رضي الله عنها روى عنها ثلاثة، ووثقها العجلي في "الثقات"، وذكرها ابن حبان في "الثقات"، فإن لم تكن هي، فلم نعرفها.وأخرجه ابن سعد في الطبقات" 10/ 133 عن محمد بن عمر الواقدي، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6967)


6967 - حدثنا أبو عبد الله الأصبهاني، حدثنا الحسن بن الجهم، حدثنا الحسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر حدثني إبراهيم بن محمد مولى خُزاعة، عن صالح بن محمد، عن أمّ ذَرَّةَ، عن ميمونة قالت: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم ذات ليلة من عندي، فأغلقتُ دونَه الباب، فجاء يستفتح فأبيتُ أن أفتح، فقال: "أقسمتُ إِلَّا فتحت لي"، فقلتُ له: تذهب إلى أزواجِك في ليلتي؟ فقال: "ما فعلتُ، ولكن وجدتُ حَقْنًا من بول" [1].




মাইমুনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার নিকট থেকে বের হলেন। তখন আমি তাঁর জন্য দরজা বন্ধ করে দিলাম। এরপর তিনি ফিরে এসে দরজা খুলতে চাইলেন, কিন্তু আমি খুলতে অস্বীকার করলাম। তখন তিনি বললেন: "আমি শপথ করছি, তুমি অবশ্যই আমার জন্য দরজা খুলবে।" আমি তাকে বললাম: আপনি কি আমার পালার রাতে আপনার অন্য স্ত্রীদের কাছে যাচ্ছেন? তিনি বললেন: "আমি এমন করিনি। বরং আমি প্রস্রাবের চাপ অনুভব করছিলাম।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف جدًّا، تفرد به الواقدي، وفيه كلام معروف، وإبراهيم مولى خزاعة لم نعرفه، وصالح بن محمد - وهو ابن زائدة المدني - ضعيف، وأم ذرة - وهي مولاة عائشة رضي الله عنها روى عنها ثلاثة، ووثقها العجلي في "الثقات"، وذكرها ابن حبان في "الثقات"، فإن لم تكن هي، فلم نعرفها.وأخرجه ابن سعد في الطبقات" 10/ 133 عن محمد بن عمر الواقدي، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6968)


6968 - حدثنا أبو جعفر محمد بن صالح بن هانئ حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى الشهيد رحمه الله، حدثنا عبد الله بن عبد الوهاب الحَجَبي، حدثنا عبد العزيز الدَّرَاوَرْدي، أخبرني إبراهيم بن عُقبة، عن كريب، عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الأخوات مؤمنات: ميمونة زوج النَّبيِّ صلى الله عليه وسلم وأختها أم الفضل بنت الحارث، وأختها سلمى بنت الحارث امرأة حمزة، وأسماء بنت عُميس أختُهنَّ لأُمِّهنَّ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "এই বোনেরা মুমিনা: মায়মূনা, যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, এবং তাঁর বোন উম্মুল ফাদল বিনতে হারিস, এবং তাঁর বোন সালমা বিনতে হারিস, যিনি হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী, এবং আসমা বিনতে উমাইস, যিনি মায়ের দিক থেকে তাদের বোন।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده قوي من أجل عبد العزيز الدراوردي. ويغلب على ظننا أنه موقوف من قول ابن عباس، وهمَ الدراوردي في رفعه.وأخرجه النسائي (8328) عن عمرو بن منصور، عن عبد الله بن عبد الوهاب، بهذا الإسناد. وأخرجه النسائي (5288) من طريق سفيان - وهو ابن عيينة - عن عمرو بن دينار، عن عطاء، عن ابن عبّاس قال: توفي رسول الله صلى الله عليه وسلم وعنده تسع نسوة يُصيبهنَّ إلا سودة، فإنها وهبت يومها وليلتها لعائشة.وقال البزار في "مسنده" (5172): والذي يحفظ عن ابن عبّاس من غير هذا الوجه: أنَّ التي لم يكن يقسم لها سودة بنت زمعة، لأنها وهبت يومها لعائشة.وقال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 15/ 224: قال عِياض: قال الطحاويُّ: هذا وهمٌ، وصوابه سَوْدة، كما تقدَّم أنَّها وَهَبَت يومها لعائشة، وإنما غَلِطَ فيه ابن جُرَيج راويه عن عطاء. كذا قال. قال عياض: قد ذكروا في قوله تعالى: {تُرْجِي مَنْ تَشَاءُ مِنْهُنَّ} [الأحزاب: 51] أَنَّه آوى عائشة رضي الله عنها وحفصة وزينب وأُمّ سَلَمة، فكان يستوفي لهنَّ القَسْمَ، وأرجأ سودةَ وجُويرية وأُمّ حبيبة وميمونة، وصفيّة، فكان يقيم لهنَّ ما شاء! قال: فيحتمل أن تكون رواية ابن جُريج صحيحة ويكون ذلك في آخر أمره حيثُ آوى الجميع، فكان يقسم لجميعهن إلا لصفية.قال ابن حجر: يترجّح أن مُرادَ ابن عبّاس بالتي لا يَقسِمُ لها سَوْدة كما قاله الطحاوي، لحديث عائشة رضي الله عنها: أن سودة وَهَبَت يومها لعائشة، وكان النَّبيّ صلى الله عليه وسلم يَقسم لعائشة يومها ويوم سودة، وسيأتي في باب مُفرَد، ويأتي بسط القصة هناك إن شاء الله تعالى.لكن يحتمل أن يقال: لا يَلزَمُ من أنه كان لا يبيت عند سودة أن لا يقسم لها، بل كان يقسم لها لكن يبيت عند عائشة رضي الله عنها لما وَقَعَ من تلك الهِبَة. نعم يجوز نفي القسم عنها مجازًا، والراجح عندي ما ثبت في "الصحيح"، ولعل البخاري حذف هذه الزيادة عمدًا.قوله: "فإذا رفعتُم نعشها" قال الحافظ ابن حجر: بعين مُهملة وشين مُعجَمة: السرير الذي يُوضع عليه الميت.وقوله: "فلا تُزعزعوها" بزاءين معجمتين وعينينِ مُهملتين، والزّعزعة: تحريك الشيء الذي يُرفع.وقوله: "ولا تُزلزلوها" الزلزلة: الاضطراب. ويُستفاد منه أن حُرْمة المؤمن بعد موته باقية كما كانت في حياته، وفيه حديث: كسرُ عَظم المؤمن ميِّتًا ككسره حيًّا" أخرجه أبو داود (3207) وابن ماجه (1616) وصححه ابن حبان (3167).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6969)


6969 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الشَّيباني، حدثنا محمد بن عبد الوهاب العَبْدي، أخبرنا جعفر بن عون، أخبرنا ابن جُرَيج، عن عطاء قال: حضرنا مع ابن عباس جنازة ميمونة بسَرِفَ، فقال ابن عباس: هذه ميمونة، إذا رفعتم نَعْشَها فلا تُزَعزعوها ولا تُزلزِلُوها، فإنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان عنده تسع نسوة، كان يَقسِمُ لثمانٍ، وواحدة لم يكن يَقسِمُ لها. قال عطاء: هي صفية [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه!




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আতা (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমরা ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে সারীফে মাইমূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জানাযায় উপস্থিত ছিলাম। তখন ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইনি হলেন মাইমূনা। যখন তোমরা তাঁর খাটিয়া উঠাবে, তখন তা দোলাবে না এবং কাঁপাবে না। কেননা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট নয়জন স্ত্রী ছিলেন, তিনি আটজনের জন্য (রাত) বন্টন করতেন, কিন্তু একজনের জন্য বন্টন করতেন না। আতা (রাহিমাহুল্লাহ) বললেন: তিনি হলেন সাফিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده صحيح، وابن جريج صرَّح بالتحديث عند البخاري وغيره فانتفت شبهة تدليسه.وقال الذهبي في "التلخيص": بل التي لم يقسم لها سودة قلنا وهذا هو الصواب كما سيأتي بيانه.وأخرجه أحمد 3 / (2044)، والنسائي (5285) من طريق جعفر بن عون، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد 5 / (3259) و (3261)، والبخاري (5067)، ومسلم (1465)، والنسائي (8875) من طرق عن ابن جريج، به. ولم يذكر البخاري والنسائي قول عكرمة في آخره، واستدراك الحاكم لهذا الحديث ذهول منه. وأخرجه النسائي (5288) من طريق سفيان - وهو ابن عيينة - عن عمرو بن دينار، عن عطاء، عن ابن عبّاس قال: توفي رسول الله صلى الله عليه وسلم وعنده تسع نسوة يُصيبهنَّ إلا سودة، فإنها وهبت يومها وليلتها لعائشة.وقال البزار في "مسنده" (5172): والذي يحفظ عن ابن عبّاس من غير هذا الوجه: أنَّ التي لم يكن يقسم لها سودة بنت زمعة، لأنها وهبت يومها لعائشة.وقال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 15/ 224: قال عِياض: قال الطحاويُّ: هذا وهمٌ، وصوابه سَوْدة، كما تقدَّم أنَّها وَهَبَت يومها لعائشة، وإنما غَلِطَ فيه ابن جُرَيج راويه عن عطاء. كذا قال. قال عياض: قد ذكروا في قوله تعالى: {تُرْجِي مَنْ تَشَاءُ مِنْهُنَّ} [الأحزاب: 51] أَنَّه آوى عائشة رضي الله عنها وحفصة وزينب وأُمّ سَلَمة، فكان يستوفي لهنَّ القَسْمَ، وأرجأ سودةَ وجُويرية وأُمّ حبيبة وميمونة، وصفيّة، فكان يقيم لهنَّ ما شاء! قال: فيحتمل أن تكون رواية ابن جُريج صحيحة ويكون ذلك في آخر أمره حيثُ آوى الجميع، فكان يقسم لجميعهن إلا لصفية.قال ابن حجر: يترجّح أن مُرادَ ابن عبّاس بالتي لا يَقسِمُ لها سَوْدة كما قاله الطحاوي، لحديث عائشة رضي الله عنها: أن سودة وَهَبَت يومها لعائشة، وكان النَّبيّ صلى الله عليه وسلم يَقسم لعائشة يومها ويوم سودة، وسيأتي في باب مُفرَد، ويأتي بسط القصة هناك إن شاء الله تعالى.لكن يحتمل أن يقال: لا يَلزَمُ من أنه كان لا يبيت عند سودة أن لا يقسم لها، بل كان يقسم لها لكن يبيت عند عائشة رضي الله عنها لما وَقَعَ من تلك الهِبَة. نعم يجوز نفي القسم عنها مجازًا، والراجح عندي ما ثبت في "الصحيح"، ولعل البخاري حذف هذه الزيادة عمدًا.قوله: "فإذا رفعتُم نعشها" قال الحافظ ابن حجر: بعين مُهملة وشين مُعجَمة: السرير الذي يُوضع عليه الميت.وقوله: "فلا تُزعزعوها" بزاءين معجمتين وعينينِ مُهملتين، والزّعزعة: تحريك الشيء الذي يُرفع.وقوله: "ولا تُزلزلوها" الزلزلة: الاضطراب. ويُستفاد منه أن حُرْمة المؤمن بعد موته باقية كما كانت في حياته، وفيه حديث: كسرُ عَظم المؤمن ميِّتًا ككسره حيًّا" أخرجه أبو داود (3207) وابن ماجه (1616) وصححه ابن حبان (3167).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6970)


6970 - حدثنا محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الثقفي، حدثنا أحمد ابن المقدام، حدثنا زهير بن العلاء العبدي، حدثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة ابن دِعامة قال: تزوّج رسول الله صلى الله عليه وسلم ميمونة بنت الحارث بن فروة - وهي أختُ أمِّ الفضل امرأةِ العبّاس بن عبد المطّلب - حين اعتمر بمكة، ووَهَبَت نفسها للنبي، وفيها نزل: {وَامْرَأَةً مُؤْمِنَةً إِنْ وَهَبَتْ نَفْسَهَا لِلنَّبِيِّ إِنْ أَرَادَ النَّبِيُّ أَنْ يَسْتَنْكِحَهَا خَالِصَةً لَكَ مِنْ دُونِ الْمُؤْمِنِينَ} [الأحزاب: 50]، ثم صَدَرَت معه إلى المدينة، وكانت قبله عند فَرْوة بن عبد العُزَّى بن أسد من بني غَنْم بن دُودَان [1]. ‌‌ذكر أم المؤمنين زينب بنت خزيمة العامرية




কাতাদাহ ইবনে দিআমাহ থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মাইমুনাহ বিনতে হারিস ইবনে ফারওয়াহকে বিবাহ করেন। তিনি ছিলেন উম্মুল ফাদলের বোন, যিনি ছিলেন আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিবের স্ত্রী, যখন তিনি মক্কায় উমরাহ করার উদ্দেশ্যে গিয়েছিলেন। আর তিনি (মাইমুনাহ) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে নিজেকে সমর্পণ করেছিলেন। এবং তাঁর (মাইমুনার) ব্যাপারেই এই আয়াতটি নাযিল হয়: "আর কোনো মু'মিন নারী যদি নিজেকে নবীর কাছে নিবেদন করে এবং নবীও যদি তাকে বিবাহ করতে চান, তবে সে শুধু আপনার জন্যেই হালাল—অন্য মু'মিনদের জন্য নয়।" [সূরা আল-আহযাব: ৫০]। অতঃপর তিনি তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মদীনায় প্রত্যাবর্তন করেন। এর পূর্বে তিনি গানম ইবনে দূদান গোত্রের ফারওয়াহ ইবনে আব্দুল উযযা ইবনে আসাদের বিবাহাধীনে ছিলেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرّف في نسخنا الخطية إلى: تميم بن جودان والمثبت من كتب "الأنساب" والتراجم، منها "جمهرة أنساب العرب لابن حزم 1/ 191، و "الاستيعاب" ص 937، وقد غلَّط ابن عبد البر قتادة في ذكر نسب ميمونة ونسب زوجها فقال: إن زوجها من بني عامر، وميمونة إنما هي ميمونة بنت الحارث بن حزن عند جميعهم.قلنا: والإسناد إلى قتادة ضعيف لضعف زهير بن العلاء.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6971)


6971 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب [1]، حدثنا أبو أسامة الحلبي، حدثنا حجاج بن أبي منيع، عن جده، عن الزهري قال: تزوّج رسول الله صلى الله عليه وسلم زينب بنت خُزيمة أحد بني هلال بن عامر: وكانت قبله عند عبد الله بن جَحْش، فقُتل عنها يومَ أحد [2].




যুহরী থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যয়নাব বিনত খুযাইমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিবাহ করেন, যিনি ছিলেন বনী হিলাল ইবনু আমির গোত্রের একজন। তাঁর (রাসূলের) পূর্বে তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিবাহে ছিলেন। উহুদের দিনে তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনু জাহশ) শহীদ হন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] سقط هذا الشيخ من "م" و (ص).



[2] رجاله لا بأس بهم. أبو أسامة: الله أبو أسامة: هو عبد بن محمد بن أبي أسامة، وجد حجاج: هو عبيد الله بن أبي زياد.وأخرجه ضمن خبر مطول البيهقي 7/ 70 - ومن طريقه ابن عساكر 3/ 182 - عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في الكبير" 24/ (148) عن أبي أسامة الحلبي، به.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3095)، والبيهقي 7/ 70 - ومن طريقه ابن عساكر 3/ 182 - من طريقين عن حجاج بن أبي منيع به. وفي هذه المصادر زيادة: توفيت ورسول الله صلى الله عليه وسلم حتى لم تلبث معه إلا يسيرًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6972)


6972 - أخبرناه أبو سعيد أحمد بن يعقوب الثقفي، حدثنا موسى بن هارون، حدثنا أبو همام، حدثني ابن وهب، عن يونس، عن ابن شهاب قال: تُوفِّيَت زينب بنت خزيمة ورسول الله صلى الله عليه وسلم حيٌّ.قال ابنُ شِهاب: وهي زينبُ بنت خُزيمة بن الحارث بن عبد الله بن عمرو بن عبد مناف بن هلال بن عامر بن صعصعة، وهي أُمُّ المساكين، كانت تُسمَّى به في الجاهلية، تُوفِّيت بالمدينة بعد الهجرة في حياة رسول الله صلى الله عليه وسلم [1].




ইবনে শিহাব থেকে বর্ণিত, যায়নাব বিনত খুযাইমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তিকাল করেন, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জীবিত ছিলেন। ইবনে শিহাব বলেন: তিনি হলেন যায়নাব বিনত খুযাইমাহ ইবনুল হারিস ইবনে আবদুল্লাহ ইবনে আমর ইবনে আবদে মানাফ ইবনে হিলাল ইবনে আমির ইবনে সা'সাআহ। তিনি 'উম্মুল মাসাকিন' (মিসকিনদের মাতা)। জাহিলিয়্যাতের যুগে তাকে এই নামে ডাকা হতো। তিনি হিজরতের পর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জীবদ্দশায় মদিনায় ইন্তিকাল করেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] رجاله ثقات. أبو همام: هو الوليد بن شجاع بن الوليد بن قيس السكوني. وانظر ما قبله. عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البيهقي 7/ 70 من طريق يعقوب بن سفيان، عن الحجَّاج بن أبي منيع، به.وأخرجه الطبري في "تاريخه" 3/ 168، وابن عساكر 3/ 232 من طريق عقيل بن خالد، عن الزهري، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6973)


6973 - أخبرني أبو الحسين بن [1] يعقوب الحافظ رحمه الله، حدثنا محمد بن إسحاق الثَّقفي، حدثنا أبو الأشعث، حدثنا زهير بن العلاء، حدثنا سعيد بن أبي عَروبة، عن قَتَادة قال: ثم تزوَّج رسول الله صلى الله عليه وسلم زينب بنت خزيمة، وهي أم المساكين، من بني عامر بن صَعْصَعة، وكانت قبله عند الطُّفيل بن الحارث، فتوفيت عند النَّبيِّ صلى الله عليه وسلم، ولم تلبَثْ عندَه إلَّا يسيرًا [2]. ‌‌ذكرُ العاليَةِ




কাতাদা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যয়নাব বিনত খুযাইমাকে বিবাহ করেন। আর তিনি ছিলেন ‘উম্মুল মাসাকীন’ (দরিদ্রদের মাতা), যিনি বনু আমির ইবনু সা‘সা‘আহ গোত্রের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন। তাঁর পূর্বে তিনি তুফাইল ইবনুল হারিসের স্ত্রী ছিলেন। অতঃপর তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থাকা অবস্থায় ইন্তেকাল করেন এবং তাঁর সাথে অল্প কিছুদিন ব্যতীত বেশিদিন থাকেননি। আলিয়াহের বর্ণনা।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] لفظة "ابن" سقطت من "م" و (ص). وأبو الحسين بن يعقوب: هو محمد بن محمد بن يعقوب الحجَّاجي النيسابوري. عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البيهقي 7/ 70 من طريق يعقوب بن سفيان، عن الحجَّاج بن أبي منيع، به.وأخرجه الطبري في "تاريخه" 3/ 168، وابن عساكر 3/ 232 من طريق عقيل بن خالد، عن الزهري، به.



[2] إسناده ضعيف من أجل زهير بن العلاء، وهو بمعنى سابقه. أبو الأشعث هو أحمد بن المقدام بن سليمان بن الأشعث. عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البيهقي 7/ 70 من طريق يعقوب بن سفيان، عن الحجَّاج بن أبي منيع، به.وأخرجه الطبري في "تاريخه" 3/ 168، وابن عساكر 3/ 232 من طريق عقيل بن خالد، عن الزهري، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6974)


6974 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو أسامة الحلبي، حدثنا حجاج بن أبي منيع، عن جدِّه، عن الزُّهري قال: وتزوج رسول الله صلى الله عليه وسلم العالية امرأة من بني بكر بن كلاب [1].




যুহরী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আলিয়াকে বিবাহ করেছিলেন, যিনি বনু বকর ইবন কিলাব গোত্রের একজন মহিলা ছিলেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] لا بأس برجاله. أبو أسامة: هو عبد الله بن محمد بن أبي أسامة. وجدُّ حجاج: هو عبيد الله بن أبي زياد.وأخرجه ضمن خبر مطول البيهقي 7/ 70، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخه" 3/ 183 - 184 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البيهقي 7/ 70 من طريق يعقوب بن سفيان، عن الحجَّاج بن أبي منيع، به.وأخرجه الطبري في "تاريخه" 3/ 168، وابن عساكر 3/ 232 من طريق عقيل بن خالد، عن الزهري، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6975)


6975 - حدثناه أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا الحسن بن علي بن شَبيب المَعْمَري، حدثنا يحيى بن يوسف الزَّمِّي [1]، حدثنا أبو معاوية الضَّرير [2]، عن جميل بن زيد [3] الطائي، عن زيد بن كعب بن عُجْرة، عن أبيه قال: تزوّج رسول الله صلى الله عليه وسلم العالية امرأةً من بني غفار، فلما دخلَتْ عليه ووَضَعَتْ ثيابها رأى بكَشْحِها بياضًا، فقال لها النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم: البَسِي ثيابك، والحَقِي بأهلك"، وأمرَ لها بالصَّدَاق [4] هذه ليست بالكلابية، إنما هي أسماء بنت النُّعمان الغفارية [5].




কাব ইবনে উজরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আলিয়াহ নামের বনি গিফার গোত্রের এক মহিলাকে বিবাহ করেন। যখন তিনি তাঁর নিকট প্রবেশ করলেন এবং পোশাক খুললেন, তখন তিনি তার কোমরের দিকে শুভ্রতা (শ্বেতির মতো দাগ) দেখতে পেলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন, "তোমার পোশাক পরিধান করো এবং তোমার পরিবারের সাথে মিলিত হও।" এবং তিনি তাকে মোহরানা প্রদান করার নির্দেশ দিলেন। এই মহিলা ছিলেন না কালাব গোত্রের, বরং ইনি ছিলেন আসমা বিনত নু'মান আল-গিফারিয়াহ।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى الرقي. شيخًا من الأنصار، ذكر أنه كانت له صحبة، يقال له: كعب بن زيد أو زيد بن كعب، فحدثني: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم تزوج امرأة من بني غفار، فلما دخل عليها فوضع ثوبه وقعد على الفراش، أبصر بكشحها بياضًا، فانحاز عن الفراش، ثم قال: "خذي عليك ثيابك"، ولم يأخذ مما آتاها شيئًا. وانظر تتمة تخريجه والكلام عليه فيه.



[2] تحرَّف في النسخ إلى: الصوري، وضبب عليها في (ز). شيخًا من الأنصار، ذكر أنه كانت له صحبة، يقال له: كعب بن زيد أو زيد بن كعب، فحدثني: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم تزوج امرأة من بني غفار، فلما دخل عليها فوضع ثوبه وقعد على الفراش، أبصر بكشحها بياضًا، فانحاز عن الفراش، ثم قال: "خذي عليك ثيابك"، ولم يأخذ مما آتاها شيئًا. وانظر تتمة تخريجه والكلام عليه فيه.



6975 [3] - تحرَّف في النسخ الخطية إلى: يزيد. شيخًا من الأنصار، ذكر أنه كانت له صحبة، يقال له: كعب بن زيد أو زيد بن كعب، فحدثني: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم تزوج امرأة من بني غفار، فلما دخل عليها فوضع ثوبه وقعد على الفراش، أبصر بكشحها بياضًا، فانحاز عن الفراش، ثم قال: "خذي عليك ثيابك"، ولم يأخذ مما آتاها شيئًا. وانظر تتمة تخريجه والكلام عليه فيه.



6975 [4] - إسناده واهٍ، جميل بن زيد الطائي قال عنه ابن معين والنسائي: ليس بثقة، وقال أبو حاتم: ضعيف الحديث، وقال ابن حبان في "الثقات" 6/ 147: واهٍ، وقال الدَّارَقُطْنيّ: مقلّ متروك، وقال مرة: يعتبر به وقال البخاري: لم يصح حديثه، وقال البغوي في معجمه كما في ترجمته من اللسان 2/ 488: ضعيف الحديث جدًّا، والاضطراب في حديث الغفارية منه. قلنا: وقد اضطرب فيه ألوانًا، كما هو مبين في "مسند أحمد".تنبيه: قال الذهبي في "تلخيص المستدرك": قال ابن معين: زيد ليس بثقة. وتعقبه الحافظ ابن حجر في ترجمة زيد بن كعب بن عجرة من "اللسان" 3/ 561، فقال: كذا قال! وإنما قال ابنُ معين ذلك في جميل بن زيد الراوي عنه، وقد تقدم ذلك في ترجمته واختلف عليه في السند اختلافًا كثيرًا تقدم بعضه.وأخرجه سعيد بن منصور في سننه" (829)، والطحاوي في شرح المشكل" (647) من طريق أبي معاوية الضرير، عن جميل بن زيد الطائي، عن زيد بن كعب بن عجرة، قال: تزوج رسول الله صلى الله عليه وسلم … فذكره. ليس فيه عن أبيه. وانظر "العلل" لابن أبي حاتم (1274).وأخرجه أحمد 25 / (16032) عن القاسم بن مالك المزني عن جميل بن زيد، قال: صحبت شيخًا من الأنصار، ذكر أنه كانت له صحبة، يقال له: كعب بن زيد أو زيد بن كعب، فحدثني: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم تزوج امرأة من بني غفار، فلما دخل عليها فوضع ثوبه وقعد على الفراش، أبصر بكشحها بياضًا، فانحاز عن الفراش، ثم قال: "خذي عليك ثيابك"، ولم يأخذ مما آتاها شيئًا. وانظر تتمة تخريجه والكلام عليه فيه.



6975 [5] - قال ابن عبد البر في ترجمة عمرة بنت يَزِيد بن الجون الكلابية من "الاستيعاب" ص 921: وقيل (يعني في اسمها): عمرة بنت يزيد بن عبيد بن رُواس بن كلاب الكلابية، وهذا أصح، تزوجها رسول الله صلى الله عليه وسلم فبلغه أنَّ بها برصًا، فطلقها ولم يدخل بها. وقيل: إنها التي تزوجها رسول الله صلى الله عليه وسلم فتعوذت منه حين أدخلت عليه، فقال لها: لقد عُذتِ بمعاذ، فطلقها، وأمر أسامة ابن زيد فمتعها بثلاثة أثواب. هكذا روى عبد الله بن القاسم عن هشام بن عروة عن أبيه عن عائشة.وقال أبو عبيدة: إنما ذلك لأسماء بنت النعمان بن الجون. وقال قتادة: إنما قال ذلك في امرأة من بني سليم، فالاختلاف فيها كثير على ما ذكرناه في باب أسماء وغيره.ونقل ابن عبد البر في ترجمة أسماء بنت النعمان ص 871، قال: ذكر ابن وهب، عن يونس، عن ابن شهاب قال: فارق رسول الله صلى الله عليه وسلم أخت بني الجون من أجل بياض كان بها. فالله أعلم. أحمد بن المقدام، بهذا الإسناد.وأخرج البخاري (5255) من حديث أبي أسيد الساعدي قال: خرجنا مع النَّبيِّ صلى الله عليه وسلم حتى انطلقنا إلى حائط يقال: له الشوط، حتى انتهينا إلى حائطين، فجلسنا بينهما، فقال النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم: "اجلسوا هاهنا" ودخل، وقد أتي بالجونية، فأنزلت في بيت في نخل في بيت أميمة بنت النعمان بن شراحيل، ومعها دايتها حاضنة لها، فلما دخل عليها النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم قال: "هَبِي نفسك لي" قالت: وهل تهب الملكة نفسها للسُّوقة؟ قال: فأهوى بيده يضع يده عليها لتسكن، فقالت: أعوذ بالله منك، فقال: "قد عذتِ بمَعاذٍ" ثم خرج علينا فقال: "يا أبا أسيد، اكسُها رازقيتين، وألحقها بأهلها". والرازقية: ثياب من كتان بيض طوال.ورواه البخاري (5256) معلقًا بلفظ آخر، عن عبّاس بن سهل، عن أبيه وأبي أسيد قالا: تزوج النَّبيّ صلى الله عليه وسلم أميمة بنت شراحيل، فلما أُدخلت عليه بسط يده إليها، فكأنها كرهت ذلك، فأمر أبا أسيد أن يجهزها ويكسوها ثوبين رازقيين.وله سياق آخر من حديث سهل بن سعد عند البخاري (5637)، ومسلم (2007) قال: ذكر للنبي صلى الله عليه وسلم امرأة من العرب، فأمر أبا أسيد الساعدي أن يرسل إليها، فأرسل إليها فقدمت، فنزلت في أجم بني ساعدة، فخرج النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم حتى جاءها، فدخل عليها فإذا امرأة منكسة رأسها، فلما كلمها النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم قالت: أعوذ بالله منك، فقال: "قد أعذتك مني" فقالوا لها: أتدرين من هذا؟ قالت: لا، قالوا: هذا رسول الله صلى الله عليه وسلم جاء ليخطبك، قالت: كنت أنا أشقى من ذلك، فأقبل النَّبيّ صلى الله عليه وسلم يومئذ حتى جلس في سقيفة بني ساعدة هو وأصحابه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6976)


6976 - كما حدَّثَناه أبو الحسين [1] بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق، حدثنا أبو الأشعث، حدثنا زهير بن العلاء، حدثنا سعيد بن أبي عَرُوبة، عن قتادة قال: ثم تزوج رسول الله صلى الله عليه وسلم من أهل اليمن أسماء بنت النعمان الغفارية، وهي ابنة النعمان بن الحارث بن شَراحيل بن النُّعمان، فلما دخل بها دعاها، فقالت: تعال أنتَ، فطلقها [2]. ‌‌ذكر الأنصارية من بني النجار




কাতাদা থেকে বর্ণিত, অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইয়েমেনের বাসিন্দা আসমা বিনত আন-নু'মান আল-গিফারিয়্যাহকে বিবাহ করেন। আর তিনি ছিলেন নু'মান ইবনু হারিস ইবনু শারাহিল ইবনু নু'মানের কন্যা। যখন তিনি তার সাথে সহবাসের জন্য প্রবেশ করলেন, তখন তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে ডাকলেন। কিন্তু সে (আসমা) বলল: তুমি আমার কাছে এসো। ফলে তিনি তাকে তালাক দিলেন। বানু নাজ্জারের আনসারী নারীর আলোচনা।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرّف في "م" و (ص) إلى الحسن. أحمد بن المقدام، بهذا الإسناد.وأخرج البخاري (5255) من حديث أبي أسيد الساعدي قال: خرجنا مع النَّبيِّ صلى الله عليه وسلم حتى انطلقنا إلى حائط يقال: له الشوط، حتى انتهينا إلى حائطين، فجلسنا بينهما، فقال النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم: "اجلسوا هاهنا" ودخل، وقد أتي بالجونية، فأنزلت في بيت في نخل في بيت أميمة بنت النعمان بن شراحيل، ومعها دايتها حاضنة لها، فلما دخل عليها النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم قال: "هَبِي نفسك لي" قالت: وهل تهب الملكة نفسها للسُّوقة؟ قال: فأهوى بيده يضع يده عليها لتسكن، فقالت: أعوذ بالله منك، فقال: "قد عذتِ بمَعاذٍ" ثم خرج علينا فقال: "يا أبا أسيد، اكسُها رازقيتين، وألحقها بأهلها". والرازقية: ثياب من كتان بيض طوال.ورواه البخاري (5256) معلقًا بلفظ آخر، عن عبّاس بن سهل، عن أبيه وأبي أسيد قالا: تزوج النَّبيّ صلى الله عليه وسلم أميمة بنت شراحيل، فلما أُدخلت عليه بسط يده إليها، فكأنها كرهت ذلك، فأمر أبا أسيد أن يجهزها ويكسوها ثوبين رازقيين.وله سياق آخر من حديث سهل بن سعد عند البخاري (5637)، ومسلم (2007) قال: ذكر للنبي صلى الله عليه وسلم امرأة من العرب، فأمر أبا أسيد الساعدي أن يرسل إليها، فأرسل إليها فقدمت، فنزلت في أجم بني ساعدة، فخرج النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم حتى جاءها، فدخل عليها فإذا امرأة منكسة رأسها، فلما كلمها النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم قالت: أعوذ بالله منك، فقال: "قد أعذتك مني" فقالوا لها: أتدرين من هذا؟ قالت: لا، قالوا: هذا رسول الله صلى الله عليه وسلم جاء ليخطبك، قالت: كنت أنا أشقى من ذلك، فأقبل النَّبيّ صلى الله عليه وسلم يومئذ حتى جلس في سقيفة بني ساعدة هو وأصحابه.



[2] إسناده ضعيف من أجل زهير بن العلاء، وسياق خبره هذا يخالف حديث أبي أسيد الذي في الصحيح كما سيأتي. أبو الأشعث: هو أحمد بن المقدام بن سليمان بن الأشعث.وأخرجه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (7458) من طريق الحسين بن أبي معشر، وابن عساكر 3/ 229 من طريق محمد بن الحسين، الزعفراني، كلاهما عن أبي الأشعث أحمد بن المقدام، بهذا الإسناد.وأخرج البخاري (5255) من حديث أبي أسيد الساعدي قال: خرجنا مع النَّبيِّ صلى الله عليه وسلم حتى انطلقنا إلى حائط يقال: له الشوط، حتى انتهينا إلى حائطين، فجلسنا بينهما، فقال النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم: "اجلسوا هاهنا" ودخل، وقد أتي بالجونية، فأنزلت في بيت في نخل في بيت أميمة بنت النعمان بن شراحيل، ومعها دايتها حاضنة لها، فلما دخل عليها النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم قال: "هَبِي نفسك لي" قالت: وهل تهب الملكة نفسها للسُّوقة؟ قال: فأهوى بيده يضع يده عليها لتسكن، فقالت: أعوذ بالله منك، فقال: "قد عذتِ بمَعاذٍ" ثم خرج علينا فقال: "يا أبا أسيد، اكسُها رازقيتين، وألحقها بأهلها". والرازقية: ثياب من كتان بيض طوال.ورواه البخاري (5256) معلقًا بلفظ آخر، عن عبّاس بن سهل، عن أبيه وأبي أسيد قالا: تزوج النَّبيّ صلى الله عليه وسلم أميمة بنت شراحيل، فلما أُدخلت عليه بسط يده إليها، فكأنها كرهت ذلك، فأمر أبا أسيد أن يجهزها ويكسوها ثوبين رازقيين.وله سياق آخر من حديث سهل بن سعد عند البخاري (5637)، ومسلم (2007) قال: ذكر للنبي صلى الله عليه وسلم امرأة من العرب، فأمر أبا أسيد الساعدي أن يرسل إليها، فأرسل إليها فقدمت، فنزلت في أجم بني ساعدة، فخرج النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم حتى جاءها، فدخل عليها فإذا امرأة منكسة رأسها، فلما كلمها النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم قالت: أعوذ بالله منك، فقال: "قد أعذتك مني" فقالوا لها: أتدرين من هذا؟ قالت: لا، قالوا: هذا رسول الله صلى الله عليه وسلم جاء ليخطبك، قالت: كنت أنا أشقى من ذلك، فأقبل النَّبيّ صلى الله عليه وسلم يومئذ حتى جلس في سقيفة بني ساعدة هو وأصحابه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6977)


6977 - أخبرنا أبو الحسين بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق، حدثنا أبو الأشعث، حدثنا زهير بن العلاء، حدثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة قال: وتزوج رسول الله صلى الله عليه وسلم أم شريك الأنصارية من بني النجار، قال: "إِنِّي أحبُّ أن أتزوَّجَ في الأنصار"، ثم قال: "إنّي أكرهُ غَيْرتَهنَّ"، فلم يدخُلْ بها [1]. ‌‌ذكرُ سَبَا [2] بنت أسماء بن الصَّلْت السلمية




কাতাদা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনী নাজ্জার গোত্রের আনসারী নারী উম্মে শারীককে বিবাহ করেছিলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেন: "আমি আনসারদের মধ্যে বিবাহ করতে ভালোবাসি।" অতঃপর তিনি বললেন: "কিন্তু আমি তাদের (আনসার নারীদের) তীব্র ঈর্ষাকে অপছন্দ করি।" ফলে তিনি তার সাথে সহবাস করেননি।

[এরপর সা'বা বিনতে আসমা বিনতে সল্ত আস-সুলামিয়্যার আলোচনা রয়েছে।]




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف كسابقه.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 7/ 228 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (7466) و (7467) من طريق الحسين بن أبي معشر، عن أبي الأشعث أحمد بن المقدام به.



[2] كذا في النسخ الخطية: سبا. وفي "طبقات ابن سعد" 10/ 144: سبا، ويقال: سَنا بنت الصلت بن حبيب بن حارثة بن هلال بن حرام بن سماك بن عوف السلمي، ونحوه في "تاريخ الطبري" 3/ 166. وقال الدَّارَقُطْنيّ في "المؤتلف والمختلف" 3/ 1320: باب سَنا وسَبَأ: أما سنا، فهي امرأة، وهي سَنا بنت أسماء بن الصلت تزوجها رسول الله صلى الله عليه وسلم، فماتت قبل أن يدخل بها. وبنحوه ذكر ابن ماكولا في "الإكمال" 4/ 379، فقال: أما سَنَا بالنون، فهي سنا بنت أسماء بن الصلت السلمية، تزوجها رسول الله صلى الله عليه وسلم، فماتت قبل أن يدخل بها.قال الدَّارَقُطْنيّ: قال ابن أبي خيثمة: وخالفهما قتادة، فقال: وتزوج أنسا بنت أسماء بن الصلت والصواب: سَنَا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (6978)


6978 - أخبرنا أبو النضر الفقيه، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا أبو عبيد [1] قال: وزعم حفص بن النضر السُّلمي وعبد القاهر بن السَّرِي السلمي: أنَّ النَّبيَّ صلى الله عليه وسلم تزوّج سَبَا بنتَ أسماء بن الصلت السلمية، فماتت قبل أن يَدخُل بها [2]. ‌‌ذكر الكلابية أو الكنديةفقد اختلف في اسمها كما اختلف في قبيلتها، وآخر ذلك سمَّتْ نفسها الشَّقيَّة، وبذلك عُرفت إلى أن ماتت.




হাফস ইবনুন নযর আস-সুলামী ও আব্দুল ক্বাহির ইবনুস সারী আস-সুলামী থেকে বর্ণিত, যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাবা বিনত আসমা ইবনুস সলত আস-সুলামিয়্যাহকে বিবাহ করেছিলেন, কিন্তু তিনি তাঁর সাথে সহবাস করার আগেই মারা যান। (তিনি) কিলাবিয়্যাহ (কিলাব গোত্রের) নাকি কিনদিয়্যাহ (কিনদাহ গোত্রের)— এ নিয়ে মতভেদ রয়েছে। তাঁর গোত্রের নামের মতো তাঁর নাম নিয়েও মতভেদ আছে। অবশেষে, তিনি নিজেই নিজের নাম রাখেন ‘আশ-শাকিয়্যাহ’ (হতভাগিনী), আর মৃত্যুর আগ পর্যন্ত তিনি এই নামেই পরিচিত ছিলেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] هو القاسم بن سلام، وهو الذي يروي عنه علي بن عبد العزيز البغوي، وقد روى هذا الخبر كل من أبي عبيد القاسم بن سلام، وأبي عبيدة معمر بن المثنى، كما سيأتي، وذكره الذهبي في "السير" 2/ 256 عن القاسم بن سلام أبي عبيد، وذكره ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 910، وابن حجر في "الإصابة" 4/ 1865 عن أبي عبيدة معمر بن المثنى.



[2] أخرجه الدَّارَقُطْنيّ في "المؤتلف والمختلف" 3/ 1320 من طريق ابن أبي خيثمة قال: ذكر الأثرم أبو الحسن، عن أبي عبيدة معمر بن المثنى.وأخرجه ابن منده في "معرفة الصحابة" ص 978 - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخه" 3/ 230 - من طريق عبد الواحد بن عبد الله المحاربي، عن حفص بن النضر، عن قتادة، قال: تزوج رسول الله صلى الله عليه وسلم سبا بنت أسماء بن الصلت السلمية.وأخرجه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (7467)، والبيهقي في "الدلائل" 7/ 288 من طريق زهير بن العلاء، عن سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة قال: وتزوج أسماء بنت الصلت من بني حرام من بني سليم، فتوفيت قبل أن يدخل بها وزهير ضعيف كما سبق غير مرة. ثم قال: وقال حفص بن النضر عن قتادة: تزوج سبا بنت أسماء بن الصلت السلمية.