আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
6999 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْر بن نصر، قال: قُرِئ علي بن وهب، أخبرك عبد الرحمن بن أبي المَوَال، عن فائد مولى عبيد الله بن علي بن أبي رافع، عن عبيد الله بن علي بن أبي رافع، عن جدته سَلْمى مولاة رسول الله صلى الله عليه وسلم وخادمته قالت: قلما كان إنسانٌ يأتي رسول الله صلى الله عليه وسلم فيشكو إليه وجعًا في رأسه إلا قال له: "احتجم"، ولا وَجَعًا في رجليه إلا قال له: "اخضِبُهما بالحِنَّاء" [1]. ذكرُ ميمونةَ بنت سعد مولاة رسول الله صلى الله عليه وسلم
সালমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, খুব কম মানুষই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসতেন এবং তাদের মাথার ব্যথার অভিযোগ করতেন, আর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে বলতেন: "শিঙ্গা লাগাও (হিজামা করো)।" আর যখন কেউ তাঁর কাছে পায়ের ব্যথার অভিযোগ করত, তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বলতেন: "হেনা দ্বারা তা রঞ্জিত করো (মেহেদি লাগাও)।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حديث محتمل للتحسين، وهذا إسناد لا بأس برجاله، غير أنه قد اختلف في إسناده على فائد مولى عبيد الله، كما سيأتي.فرواه ابن وهب كما عند المصنف في هذه الرواية، وعند البخاري في "التاريخ الكبير" 1/ 411، والطبري في مسند ابن عبّاس من "تهذيب الآثار" 1/ 509، عن عبد الرحمن بن أبي الموالي، عن فائد مولى عبيد الله بن علي بن أبي رافع، عن مولاه عبيد الله، عن جدته سلمى، به. غير أنه لم يذكر مولى فائد في إسناد "التاريخ الكبير". وعبيد الله بن علي لين الحديث كما قال ابن حجر، وقال الذهبي في "الميزان": صويلح الحديث فيه شيء.قال ابن وهب: وأخبرنيه أيضًا عبد الرحمن بن أبي الموالي عن عبد الله بن حسن يمثل ذلك عن النَّبيّ صلى الله عليه وسلم، كما في "التاريخ الكبير" 1/ 411، والطبري 1/ 509.ورواه كرواية ابن وهب يحيى بنُ حسان عند أبي داود (3858) وغيره، عن ابن أبي الموال، عن فائد، عن عبيد الله بن علي بن رافع، عن جدته.وتابعه زيد بن الحباب عند ابن ماجه (3502)، والترمذي بإثر (2054)، فرواه عن فائد، عن عبيد الله، عن جدته. ولفظه: كان لا يُصيب النَّبيّ صلى الله عليه وسلم قرحة ولا شوكة، إلا وضع عليه الحناء.ورواه أبو سعيد مولى بني هاشم عند أحمد 45/ (27618)، ويحيى الحماني عند الطبراني في "الكبير" 24/ (755)، وأبي نعيم في "معرفة الصحابة" (7671)، كلاهما عن عبد الرحمن بن أبي الموال، عن فائد، عن علي بن عبيد الله بن أبي رافع عن جدته سلمى. قال أبو سعيد مولى بني هاشم في روايته: عن عمته، بدلًا من جدته. وجعلا مكانَ عبيد الله علي بن عبيد الله. قال الترمذي: وعبيد الله بن علي أصح.وتابعهما حمادُ بن خالد عند الترمذي (2054)، فرواه عن فائد، عن علي بن عبيد الله، عن جدته.وقال الترمذي غريب، إنما نعرفه من حديث فائد.ورواه أبو عامر عبد الملك بن عمرو العقدي فيما سيأتي عند المصنف برقم (7646)، وعند أحمد 45 / (27617)، وغسانُ بن مالك فيما سيأتي عند المصنف أيضًا (8450)، كلاهما عن عبد الرحمن بن أبي الموال، عن أيوب بن الحسن بن علي بن أبي رافع، عن جدته سلمى خادم رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأسقطا فائدًا وجعلا حفيدَ سلمى أيوبَ.وفي باب فضل الحجامة عن غير واحد من الصحابة، سيذكر المصنف بعضها فيما سيأتي برقم (7655) وما بعده.
7000 - أخبرنا أبو عبد الله الصَّفَّار، حدثنا أحمد بن مهران، حدثنا عبيد الله بن موسى، أخبرنا إسرائيل، عن زيد بن جُبير، عن أبي يزيد الضِّنِّي [1]، عن ميمونة بنت سعد مولاة النَّبيِّ صلى الله عليه وسلم قالت: سُئِلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عن ولد الزِّنى، قال: "نَعْلانِ أَجاهد بهما، أحبُّ إليَّ من أن أُعتِق ولد الزنى" [2]. ذكرُ أُميمة مولاة رسول الله صلى الله عليه وسلم
মাইমূনা বিনতে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে যেনার সন্তান সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। তিনি বললেন: "দু'টি জুতো, যা পরিধান করে আমি জিহাদে অংশগ্রহণ করি, তা আমার কাছে যেনার সন্তানকে মুক্ত করে দেওয়ার চেয়েও অধিক প্রিয়।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في النسخ الخطية: الضبي، والتصويب من "الإكمال" 5/ 231 لابن ماكولا، حيث قال: وأما الضِّنِّي بكسر الضاد والنون المشددة، فهو أبو يزيد الضِّنِّي، روى عن ميمونة بنت سعد مولاة النَّبيّ صلى الله عليه وسلم.
[2] إسناده ضعيف، أبو يزيد الضِّنِّي مجهول، قال البخاري كما في "العلل الكبير" للترمذي (201): أبو يزيد لا أعرف اسمه، وهو رجل مجهول. وقال الدَّارَقُطْنيّ في "السنن" (2271): ليس بمعروف. إسرائيل: هو ابن يونس السبيعي.وأخرجه أحمد 45/ (27624)، وابن ماجه (2531)، والنسائي (4893) من طريقين عن إسرائيل، بهذا الإسناد.وأخرج عبد الرزاق (13867)، وابن أبي شيبة (12685 - عوامة) من طريق معمر، عن الزهري قال: بلغني أن عمر بن الخطاب كان يقول: لأن أحمل على نعلين في سبيل الله، أحبّ إلي من أن أعتق ولد الزنى. وهو مع انقطاعه بين الزهري وعمر موقوفٌ.وسلف عند المصنف برقم (2912) حديث أبي هريرة مرفوعًا: "ولد الزنى شَرُّ الثلاثة"، قال أبو هريرة: لأن أُمتِّعَ بسوطٍ في سبيل الله، أحبُّ إليَّ من أن أعتق ولدَ زِنْية. وانظر الرواية (2914) وكلام السيدة عائشة عقبها.وأخرج عبد الرزاق (13860) من طريق عروة، عن عائشة، كانت إذا قيل لها: هو شر الثلاثة، عابت ذلك، وقالت: ما عليه من وزر أبويه، قال الله: {وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَى}. وإسناده صحيح.وسيأتي عند المصنف برقم (7230) مرفوعًا، ولا يصحُّ رفعه.
7001 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بكير، عن يزيد بن سنان أبي فَرْوة الرهاوي، حدثنا أبو يحيى الكلاعي، عن جبير بن نفير قال: دخلتُ على أميمة مولاة رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلت: حدثيني بشيء سمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم، قالت: كنتُ يومًا أُفرغ على يديه وهو يتوضأ، إذ دخل عليه رجلٌ، فقال: يا رسول الله، إني أريد الرجوع إلى أهلي، فأوصني بوصيةٍ أحفظها، فقال: "لا تُشركنَّ بالله شيئًا وإن قُطِّعت وحُرِّقت بالنار، ولا تَعصِيَنَّ والديكَ، وإن أمَرَاك أن تَخَلَّى من أهلك ودنياك فتخلَّى، ولا تترك صلاة متعمدًا، فمن تركها متعمدًا برئت منه ذِمَّةُ الله عز وجل وذمَّة رسوله صلى الله عليه وسلم ولا تشرين الخمر، فإنها رأسُ كل خطيئة، ولا تزداد [1] في تُخومٍ، فإنَّك تأتي يوم القيامة وعلى عُنقك مقدار سبع أرضين، ولا تَفِرنَّ يومَ الزَّحف، فإنه مَن فرَّ يوم الزحف فقد باء بغضب من الله، ومأواه جهنَّمُ وبئس المصير، وأنفق على أهلك من طولك، ولا تَرفَع عصاك عنهم، وأخفهم في الله عز وجل" [2]. ذكر رَيْحانة مولاة النَّبيِّ صلى الله عليه وسلم بعد التسرِّي
উমায়মা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদিন আমি তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর) হাতে পানি ঢালছিলাম, যখন তিনি ওযু করছিলেন। তখন এক ব্যক্তি তাঁর কাছে এসে বললো: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি আমার পরিবারের কাছে ফিরে যেতে চাই। আমাকে এমন কিছু উপদেশ দিন যা আমি স্মরণ রাখব। তিনি বললেন: "আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শিরক (অংশীদার) করবে না, যদিও তোমাকে কেটে ফেলা হয় এবং আগুনে পুড়িয়ে ফেলা হয়। আর তোমার বাবা-মায়ের অবাধ্য হবে না, এমনকি যদি তারা তোমাকে তোমার পরিবার ও তোমার দুনিয়াবি সম্পদ ছেড়ে দিতে আদেশ করে, তবুও তুমি তা ছেড়ে দেবে। আর ইচ্ছাকৃতভাবে সালাত (নামাজ) ত্যাগ করবে না। কেননা যে ইচ্ছাকৃতভাবে তা ত্যাগ করে, আল্লাহ্ তা‘আলার এবং তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জিম্মা (দায়িত্ব ও নিরাপত্তা) তার থেকে উঠে যায়। আর মদ পান করবে না, কারণ তা সকল পাপের মূল। আর [জমির] সীমানায় [অন্যায়ভাবে] এক বিঘতও বৃদ্ধি করবে না; কেননা তুমি কিয়ামতের দিন আগমন করবে এমন অবস্থায় যে, সাত যমিনের পরিমাণ [জমি] তোমার কাঁধে থাকবে। আর যুদ্ধের দিন (রণক্ষেত্র থেকে) পলায়ন করবে না। কারণ যে যুদ্ধের দিন পলায়ন করবে, সে আল্লাহর গযব নিয়ে প্রত্যাবর্তন করবে, এবং তার আবাসস্থল হবে জাহান্নাম—আর তা কতই না নিকৃষ্ট ঠিকানা! এবং তোমার সামর্থ্য অনুযায়ী তোমার পরিবারের জন্য খরচ করবে। আর তাদের উপর থেকে তোমার লাঠি উঠিয়ে রাখবে না (অর্থাৎ, প্রয়োজনমতো তাদের শাসন করবে), এবং আল্লাহ্ আযযা ওয়া জাল-এর ব্যাপারে তাদের মধ্যে ভয় সঞ্চার করবে।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] كذا في نسخنا الخطية، وفي بعض مصادر التخريج: تزدادن، وفي بعضها الآخر: تزدد. وعن أبي ذر عند الطبراني في "الدعاء" (1649)، وفي إسناده النضر بن معبد ضعيف.وللتولي يوم الزحف انظر حديثي أبي أيوب وعمير السالفين برقمي (60) و (197).وفي باب الخمر رأس كل خطيئة عن ابن عبّاس، سيأتي عند المصنف برقم (7417)، وسنده حسن إن شاء الله.
[2] إسناده ضعيف بمرَّة من أجل يزيد بن سنان الرهاوي، فإنَّ الجمهور على تضعيفه. أبو يحيى الكلاعي: هو سليم بن عامر الخبائري. وقال الذهبي في "التلخيص": سنده واهٍ.وأخرجه الطبري في كما في "ذيل المذيل" من 11/ 622 عن أبي كريب، عن يونس بن بكير، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3447)، ومحمد بن نصر المروزي في "تعظيم قدر الصلاة" (912)، والطبراني في "المعجم الكبير" 24 / (479)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (7518) من طرق عن يزيد بن سنان الرهاوي به.وقد روي نحو هذا الخبر من طريق صفوان بن عمرو عن عبد الرحمن بن جبير بن نفير عن معاذ بن جبل قال: أوصاني رسول الله صلى الله عليه وسلم بعشر كلمات … وذكرهن. أخرجه أحمد 36/ (22075)،ورجاله ثقات لكنه منقطع، فعبد الرحمن بن جبير لم يدرك معاذًا.وفي الباب عن أبي الدرداء عند البخاري في "الأدب المفرد" (18)، وابن ماجه (4034) وغيرهما، وفي إسناده ضعف.وعن سلمة بن شريح عن عبادة بن الصامت عند محمد بن نصر في "تعظيم قدر الصلاة" (920)، والطبري في مسند عمر من "تهذيب الآثار" 1/ 412 - 413، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 3/ 947 و 5/ 1414، والشاشي في "مسنده" (1309)، وسلمة مجهول.وعن مكحول عن أم أيمن عند عبد بن حميد (1594)، والبيهقي 7/ 304، ورجاله ثقات لكنه منقطع، وهو في "مسند أحمد" 45 / (27364) مختصرًا بقصة ترك الصلاة متعمدًا. وروي هذا الخبر عن مكحول أيضًا مرسلًا عند هناد في "الزهد" (988)، وحسين المروزي في "البر والصلة" (105) وغيرهما. وعن أبي ذر عند الطبراني في "الدعاء" (1649)، وفي إسناده النضر بن معبد ضعيف.وللتولي يوم الزحف انظر حديثي أبي أيوب وعمير السالفين برقمي (60) و (197).وفي باب الخمر رأس كل خطيئة عن ابن عبّاس، سيأتي عند المصنف برقم (7417)، وسنده حسن إن شاء الله.
7002 - حدثنا أبو العبّاس، حدثنا أبو أسامة الحلبي، حدثنا حجاج بن أبي منيع، عن جده، عن الزُّهْري قال: واستَسَرَّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ريحانة من بني قريظة، ثم أعتقها ولَحِقَت بأهلها [1].
যুহরী থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনু কুরাইযার রায়হানাকে গ্রহণ করেন, অতঃপর তাকে মুক্ত করে দেন এবং সে তার পরিবারের কাছে ফিরে যায়।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده جيد إلى الزهري.وأخرجه مطولًا ابن منده في "معرفة الصحابة" ص 979 - 980، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (7484) من طريق يونس بن يزيد عن ابن شهاب الزهري، به.وأخرجه موصولًا الطبراني في "الكبير" (5588) و 22 / (1087) - ومن طريقه أبو نعيم في "المعرفة" (7366) - من طريق يونس بن يزيد، عن ابن شهاب، عن أبي أمامة بن سهل، عن أبيه سهل، فذكره. وفي سنده شيخ الطبراني القاسم بن عبد الله الإخميمي، اتهمه غير واحد كالدارقطني وابن عدي.
7003 - Null
7004 - Null
7005 - Null
7003 - قال أبو عُبيدةَ مَعمرُ بن المثنّى: وكانت من سَرَاري رسول الله صلى الله عليه وسلم ريحانة بنت زيد بن شمعون من بني النضير، قال بعضُهم: من بني قريظة، فكانت تكون في النخل، وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقيل عندها أحيانًا، وكان سَبَاها في شوال سنة أربعٍ.قال أبو عبيدة: وهنَّ أربعٌ: مارية القبطية، وريحانة، وجميلة أصابها في السبي فكادَها نساؤُه، خِفْنَ أَن تَغلِبَهنَّ عليه، وكانت له جاريةٌ أخرى نَفيسةُ وَهَبَتها له زينب بنت جحش، وقد كان هَجَرَها في شأن صفية بنت حُيَي ذا الحِجَّة والمحرَّم وصَفَر، فلما كان شهر ربيع الأول الذي قُبِضَ فيه النَّبيّ صلى الله عليه وسلم رَضِيَ عن زينب ودخل عليها، فقالت ما أدري ما أجزيك! فَوَهَبَتها له صلى الله عليه وسلم. ذكر بناتِ رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد فاطمة رضي الله عنهنذكر زينب بنتِ خديجة رضي الله عنها، وهي أكبر بنات رسول الله صلى الله عليه وسلم
আবু উবায়দা মা'মার ইবনুল মুসান্না থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দাসীদের (সারারি) মধ্যে ছিলেন রাইহানা বিনত যায়দ ইবনু শামউন, যিনি ছিলেন বনু নাযীর গোত্রের। কেউ কেউ বলেন, তিনি বনু কুরাইযা গোত্রের ছিলেন। তিনি খেজুর বাগানে থাকতেন, আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাঝে মাঝে তাঁর কাছে দিবানিদ্রা (কাইলুলা) যেতেন। তিনি তাঁকে চতুর্থ হিজরির শাওয়াল মাসে বন্দি করেন। আবু উবায়দা (আরও) বলেন: তাঁরা (দাসীরা) ছিলেন চারজন: মারিয়া আল-কিবতিয়্যা, রাইহানা, এবং জামীলা—যাকে তিনি বন্দিত্বে লাভ করেন, কিন্তু তাঁর (নবীর) স্ত্রীগণ তাঁর (জামীলার) বিরুদ্ধে ষড়যন্ত্র করেন, এই ভয়ে যে তিনি তাঁদের উপর প্রভাব বিস্তার করবেন। তাঁর আরেকটি মূল্যবান দাসী ছিলেন, যাকে যায়নাব বিনত জাহশ তাঁকে উপহার দিয়েছিলেন। তিনি (নবী) সাফিয়্যা বিনত হুয়াইয়ের কারণে যুল-হাজ্জা, মুহাররাম ও সফর মাসে যায়নাবকে ত্যাগ (এড়িয়ে) করে ছিলেন। যখন রবিউল আউয়াল মাস এলো, যে মাসে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করেন, তখন তিনি যায়নাবের প্রতি সন্তুষ্ট হন এবং তাঁর কাছে যান। তখন তিনি (যায়নাব) বললেন, ‘আমি জানি না কীভাবে আপনার প্রতিদান দেব!’ অতঃপর তিনি (যায়নাব) সেই দাসীকে তাঁকে (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপহার দিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যাদের বর্ণনা—ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পরে (আল্লাহ্ তাঁদের সকলের উপর সন্তুষ্ট হোন)। যায়নাব বিনত খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বর্ণনা, আর তিনি ছিলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যাদের মধ্যে সর্বজ্যেষ্ঠ।
7004 - حدثني محمد بن القاسم العَتَكي، حدثنا الفضل بن محمد الشَّعراني، حدثنا أبو صالح، حدثني الليث، عن عُقيل عن ابن شهاب قال: كان أكبر بناتِ النَّبيّ صلى الله عليه وسلم زينب بنت خديجة.
ইবনে শিহাব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যাদের মধ্যে সবচেয়ে বড় ছিলেন খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কন্যা যায়নাব।
7005 - أخبرني محمد بن يعقوب الحافظ، أخبرنا محمد بن إسحاق الثقفي، قال: سمعتُ عبيد الله بن محمد بن سليمان الهاشمي يقول: ولدت زينب بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم سنة ثلاثين من مولد النَّبيّ صلى الله عليه وسلم، وماتت سنة ثمان من الهجرة.
উবাইদুল্লাহ ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু সুলাইমান আল-হাশিমি থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্মের ত্রিশ বছর পর জন্মগ্রহণ করেন এবং তিনি হিজরতের অষ্টম বছর ইন্তেকাল করেন।
7006 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بكير، عن ابن إسحاق، حدثني عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حَزْم قال: حُدِّثتُ عن زينب بنتِ رسول الله صلى الله عليه وسلم قالت: بينما أنا أتجهز [للحوق] [1] بأبي لقيتني هند بنت عتبة بن ربيعة، فقالت: يا بنتَ محمد، ألم يبلغني أنَّك تُريدين اللحوق بأبيك؟ قالت: فقلتُ: ما أردتُ ذلك، فقالت: أي ابنة عم، لا تفعلي، إن كانت لك حاجةٌ في متاعِ ممّا يَرفُقُ بكِ في سَفَرِك، وتبلغين به إلى أبيك، فإنَّ عندي حاجتك، قالت زينب: والله ما أراها قالت ذلك [2] إلا لتفعل، ولكني خِفْتُها، فأنكرتُ أن أكونَ أُريد ذلك، فتجهزتُ، فلما فَرَغتُ من جَهَازي قدم حَمُويَ كِنانة بن الربيع أخو زوجي، فقدم لي بعيرًا فركبته وأخذ [3] قوسه وكنانته، فخرج بها [4] نهارًا يقودها، وهي في هَودج لها، فتحدّث بذلك رجال قريش، فخرجوا في طلبها حتى أدركوها بذي طُوًى، فكان أول من سَبَقَ إليها هبَّارُ بن الأسود بن المطلب بن أسد بن عبد العُزَّى ونافع بن عبدِ قيس الفهري -[جد] بني أبي عبيدة بإفريقية [5]. فروّعَها هبَّارٌ بالرُّمح وهي في هَوْدجها، وكانت المرأة حاملًا فيما يزعمون [فلما ريعَتْ طَرَحَت ذا بَطْنِها] [6] فنزل حَمُوها [7] ونَثَلَ كِنانته، ثم قال: لا يدنو مني رجلٌ إلَّا وضعتُ فيه سهمًا، فتكركر [8] الناسُ عنه، وأتى أبو سفيان في جلةٍ من قريش فقال: أيُّها الرجلُ، كُفَّ عَنَّا نَبْلَكَ حتى نُكلِّمك، فكفَّ، فأقبل أبو سفيان حتى وَقَفَ عليه، فقال: إنَّك لم تُصَبْ، خرجت بالمرأةِ على رؤوس الناس علانيةً وقد عرفتَ مُصيبتنا ونَكْبتنا، وما دخل علينا من محمد صلى الله عليه وسلم فيظن الناس وقد خرجت [9] بابنته إليه علانية على رؤوس الناس بين أظهرِنا، أنَّ ذلك عن ذُلّ أصابَنا [10] عن مُصيبتنا التي كانت، وأنَّ ذلك ضَعْفٌ بنا ورَهَقٌ [11]، ولَعَمري ما لنا بحبسها عن أبيها حاجةٌ، ولكن ارجع بالمرأة، حتى إذا هَدأ الصوتُ وتحدث الناسُ: أنا قد رددناها، فسُلَّها سرًا فألحقها بأبيها، قال: ففعل، فرجع فأقامَتْ ليالي، حتى إذا هدأَ الصوتُ، خرَجَ بها ليلًا حتى سلَّمها إلى زيد بن حارثة وصاحبه، فقدما بها على رسول الله صلى الله عليه وسلم [-4]. هذا حديث فيه إرسال بين عبد الله بن أبي بكر وزينب رضي الله عنهم، ولولاه لحكمتُ بصحَّته على شرط مسلم، وقد رُوي بإسناد صحيح على شرط الشيخين مختصرًا:
যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি যখন আমার আব্বার (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাথে মিলিত হওয়ার জন্য প্রস্তুতি নিচ্ছিলাম, তখন আমার সাথে হিন্দ বিনত উতবা বিন রাবীআর দেখা হল। সে বলল, হে মুহাম্মাদের কন্যা! আমার কাছে কি এ খবর পৌঁছায়নি যে, তুমি তোমার আব্বার সাথে মিলিত হতে যাচ্ছ? যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন আমি বললাম, আমি এর (মিলিত হওয়ার) ইচ্ছা করিনি। সে (হিন্দ) বলল, হে চাচাতো বোন! তুমি এমন করো না। তোমার সফরের জন্য যদি এমন কোনো আসবাবপত্রের প্রয়োজন হয় যা তোমার পথচলাকে সহজ করবে এবং তোমার আব্বার কাছে পৌঁছাতে সাহায্য করবে, তবে তোমার প্রয়োজনীয় সব জিনিস আমার কাছে পাবে। যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহর কসম! আমার মনে হয়, সে (হিন্দ) এটি শুধু করার জন্যই বলেছিল, কিন্তু আমি তাকে ভয় পেলাম, তাই আমি অস্বীকার করলাম যে, আমি এমন কোনো ইচ্ছা করছি। এরপর আমি প্রস্তুতি নিলাম। যখন আমি আমার প্রস্তুতি শেষ করলাম, তখন আমার স্বামী আবুল আসের ভাই (আমার হামু) কিনানাহ ইবনুর রাবী আমার কাছে এলো। সে আমার জন্য একটি উট নিয়ে এলো। আমি তাতে আরোহণ করলাম। সে তার ধনুক ও তীর রাখার থলে (তীরদান) নিল। এরপর সে দিনের বেলা উটটি হাঁকিয়ে চলল, আর আমি আমার হাওদার মধ্যে ছিলাম। কুরাইশের লোকেরা এ কথা বলাবলি করতে লাগল। ফলে তারা যায়নাবকে ধরার জন্য বের হল এবং যু-তুওয়া নামক স্থানে তাঁকে ধরে ফেলল। সর্বপ্রথম তাঁর কাছে পৌঁছায় হাবার ইবনুল আসওয়াদ ইবনুল মুত্তালিব ইবনু আসাদ ইবনু আব্দুল ‘উযযা এবং নাফি‘ ইবনু আব্দুল কাইস আল-ফিহরী। হাবার বর্শা দ্বারা তাঁকে (যায়নাবকে) ভয় দেখিয়েছিলেন, যখন তিনি তাঁর হাওদার মধ্যে ছিলেন। তারা ধারণা করত যে, যায়নাব তখন গর্ভবতী ছিলেন। যখন তিনি ভয় পেলেন, তখন তাঁর গর্ভপাত হয়ে গেল। তখন তাঁর হামু (কিনানাহ) নিচে নামল এবং তার তূন থেকে তীর বের করল। এরপর সে বলল, কোনো ব্যক্তি যেন আমার কাছে না আসে, অন্যথায় আমি তার দেহে তীর নিক্ষেপ করব। ফলে লোকেরা তার কাছ থেকে সরে গেল। অতঃপর আবু সুফিয়ান কুরাইশদের এক দল গণ্যমান্য ব্যক্তি নিয়ে সেখানে এলেন এবং বললেন, হে লোক! তুমি তোমার তীর বর্ষণ বন্ধ করো, যেন আমরা তোমার সাথে কথা বলতে পারি। তখন সে (কিনানাহ) ক্ষান্ত হলো। এরপর আবু সুফিয়ান এগিয়ে এসে তার (কিনানাহর) কাছে দাঁড়ালেন। আবু সুফিয়ান বললেন: তুমি ভুল করোনি। তুমি লোকজনের সামনে প্রকাশ্যে এই মহিলাকে নিয়ে বের হয়েছো। আর তুমি আমাদের বিপদ, ধ্বংস এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কারণে আমাদের উপর যা আপতিত হয়েছে, তা তো জানোই। এখন যদি তুমি তার কন্যাকে প্রকাশ্যে, লোকজনের সামনে, আমাদের উপস্থিতিতে তার (মুহাম্মাদ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছে নিয়ে যাও, তবে মানুষ ভাববে যে, আমাদের উপর আপতিত দুর্দশার কারণে আমরা অপমানিত হয়েছি, এবং আমাদের দুর্বলতা ও হীনতার কারণেই এটা ঘটেছে। আমার জীবনের কসম! তার পিতাকে তাকে আটকে রাখার কোনো প্রয়োজন আমাদের নেই। তবে মহিলাকে নিয়ে ফিরে যাও। এরপর যখন পরিস্থিতি শান্ত হবে এবং লোকেরা বলাবলি করবে যে, আমরা তাকে ফিরিয়ে দিয়েছি, তখন তুমি তাকে গোপনে তার পিতার কাছে পাঠিয়ে দেবে। তিনি (কিনানাহ) বললেন, আমি তাই করলাম। সে (কিনানাহ) ফিরে গেল এবং যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেখানে কয়েক রাত থাকলেন। যখন উত্তেজনা শান্ত হলো, তখন কিনানাহ রাতে বের হয়ে তাঁকে (যায়নাবকে) যায়দ ইবনু হারিসা এবং তাঁর সঙ্গীর কাছে অর্পণ করলেন। অতঃপর তারা উভয়ে তাঁকে নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উপস্থিত হলেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] ما بين المعقوفين زيادة من مصادر التخريج.
[2] قولها: قالت ذلك، سقط من (م) و (ص).
7006 [3] - في النسخ الخطية: وأخذت، وهو خطأ، والتصويب من المصادر.
7006 [4] - في النسخ: بي، والتصويب من المصادر.
7006 [5] - في (ز) و (ب) بعد كلمة الفهري: بقريه بني أبي عبيد بإفريقية، وفي (م) و (ص) بعدها: يروعها هبار، لكن تُرك فراغ بمقدار كلمة في (ص) بعد الفهري. وفي الطبراني: بقينة بني أبي عبيدة بن عتبة بن نافع الذي بإفريقية. والصواب ما أثبتنا إن شاء الله، فإنَّ نافعًا هذا هو والد عقبة بن نافع الأمير المشهور في فتوحات إفريقية والمغرب، وابنه أبو عبيدة وبنوه في إفريقية. وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 155 - 156 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد مختصرًا.وأخرجه ابن هشام في "السيرة" 1/ 653 - 655 من طريق زياد بن عبد الله، والطبري في "تاريخه" 2/ 469 من طريق سلمة بن الفضل، والطبراني في "المعجم الكبير" 22/ (1050) من طريق محمد بن سلمة، ثلاثتهم عن محمد بن إسحاق، به.وانظر ما بعده.
7006 [6] - ما بين المعقوفين لم يرد في النسخ، وأثبتناه من المصادر. وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 155 - 156 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد مختصرًا.وأخرجه ابن هشام في "السيرة" 1/ 653 - 655 من طريق زياد بن عبد الله، والطبري في "تاريخه" 2/ 469 من طريق سلمة بن الفضل، والطبراني في "المعجم الكبير" 22/ (1050) من طريق محمد بن سلمة، ثلاثتهم عن محمد بن إسحاق، به.وانظر ما بعده.
7006 [7] - تحرَّف في النسخ إلى: فتراجموها. وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 155 - 156 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد مختصرًا.وأخرجه ابن هشام في "السيرة" 1/ 653 - 655 من طريق زياد بن عبد الله، والطبري في "تاريخه" 2/ 469 من طريق سلمة بن الفضل، والطبراني في "المعجم الكبير" 22/ (1050) من طريق محمد بن سلمة، ثلاثتهم عن محمد بن إسحاق، به.وانظر ما بعده.
7006 [8] - تحرّف في النسخ إلى: فتكلكل، والمثبت من المصادر، ومعناه: رجع الناس عنه. وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 155 - 156 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد مختصرًا.وأخرجه ابن هشام في "السيرة" 1/ 653 - 655 من طريق زياد بن عبد الله، والطبري في "تاريخه" 2/ 469 من طريق سلمة بن الفضل، والطبراني في "المعجم الكبير" 22/ (1050) من طريق محمد بن سلمة، ثلاثتهم عن محمد بن إسحاق، به.وانظر ما بعده.
7006 [9] - في النسخ أخرج، والمثبت من ابن هشام والطبراني، وفي الطبري: خرج بابنته. وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 155 - 156 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد مختصرًا.وأخرجه ابن هشام في "السيرة" 1/ 653 - 655 من طريق زياد بن عبد الله، والطبري في "تاريخه" 2/ 469 من طريق سلمة بن الفضل، والطبراني في "المعجم الكبير" 22/ (1050) من طريق محمد بن سلمة، ثلاثتهم عن محمد بن إسحاق، به.وانظر ما بعده.
7006 [10] - في النسخ: أصابتنا، والمثبت من المصادر وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 155 - 156 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد مختصرًا.وأخرجه ابن هشام في "السيرة" 1/ 653 - 655 من طريق زياد بن عبد الله، والطبري في "تاريخه" 2/ 469 من طريق سلمة بن الفضل، والطبراني في "المعجم الكبير" 22/ (1050) من طريق محمد بن سلمة، ثلاثتهم عن محمد بن إسحاق، به.وانظر ما بعده.
7006 [11] - كذا في النسخ، وفي المصادر: ووهن. وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 155 - 156 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد مختصرًا.وأخرجه ابن هشام في "السيرة" 1/ 653 - 655 من طريق زياد بن عبد الله، والطبري في "تاريخه" 2/ 469 من طريق سلمة بن الفضل، والطبراني في "المعجم الكبير" 22/ (1050) من طريق محمد بن سلمة، ثلاثتهم عن محمد بن إسحاق، به.وانظر ما بعده.
7006 [-4] - لا بأس برجاله، لكنه معضل، وأشار المصنف عقبه إلى هذا. وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 155 - 156 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد مختصرًا.وأخرجه ابن هشام في "السيرة" 1/ 653 - 655 من طريق زياد بن عبد الله، والطبري في "تاريخه" 2/ 469 من طريق سلمة بن الفضل، والطبراني في "المعجم الكبير" 22/ (1050) من طريق محمد بن سلمة، ثلاثتهم عن محمد بن إسحاق، به.وانظر ما بعده.
7007 - أخبرناه أبو الحسين أحمد بن عثمان المقرئ ببغداد، حدثنا أبو الأحوص محمد بن الهيثم القاضي، حدثنا سعيد بن أبي مريم، أخبرنا يحيى بن أيوب، حدثنا يزيد بن الهاد، حدثني عمر بن عبد الله بن عُروة بن الزبير، عن عُروة بن الزبير، عن عائشة زوج النَّبيّ صلى الله عليه وسلم: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم لما قَدِمَ المدينة خرجت ابنته زينب من مكة مع كنانة - أو ابن كنانة - فخرجوا في أثرها، فأدركها هبَّارُ بن الأسود، فلم يزل يَطعُنُ بعيرَها برمجه حتى صَرَعَها وألقَت ما في بطنها وأهراقت دمًا، فحُمِلت، فاشتَجَرَ فيها بنو هاشم وبنو أمية، فقالت بنو أمية: نحن أحقُ بها، وكانت تحتَ ابن عمهم أبي العاص، فصارت عند هند بنت عتبة بن ربيعة، وكانت تقول لها هند: هذا بسبب أبيك، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم لزيد بن حارثة: "ألا تنطلِقُ فتجِيءَ بزينب؟ " قال: بلى يا رسول الله، قال: "فخُذُ خاتمي" فأعطاه إياه، فانطلق زيد وترك بعيره، فلم يزل يتلطَّفُ حتى لقي راعيًا، فقال: لمن ترعى؟ قال: لأبي العاص، قال فلمن هذه الغَنَم؟ قال: لزينب بنتِ محمد، فسار معه شيئًا، ثم قال له: هل لك أن أعطيك شيئًا تُعطِها إياه ولا تذكره لأحدٍ؟ قال: نعم، فأعطاه الخاتم، فانطلق الراعي فأدخلَ غنمه وأعطاها الخاتم، فعرفته، فقالت: مَن أعطاك هذا؟ قال: رجلٌ، قالت: وأين تركته؟ قال: بمكان كذا وكذا، قال: فسكتت حتى إذا كان [1] الليل خرجَتْ إليه، فلما جاءته قال لها: اركبي، قالت: لا، ولكن اركَبْ أنتَ بين يديَّ، فرَكِبَ وركبت وراءه حتى أتت، فكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "هي أفضل بناتي، أُصيبت في".فبلغ ذلك عليَّ بن الحسين، فانطلق إلى عُزوة فقال: ما حديثٌ بلغني عنك تُحدِّثُ به تَنقُصُ به حق فاطمة؟ قال: عُرْوة: والله إني لا أُحبُّ [2] أنَّ لي ما بينَ المشرق والمغرب وإنِّي أنتقِصُ فاطمة حقًّا هو لها، وأما بعد، فإنَّ لك أن لا أحدث به أبدًا [3].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন মদীনায় আগমন করলেন, তখন তাঁর কন্যা যায়নাব মক্কা থেকে কিনানা—অথবা ইবনু কিনানা (কিনানার ছেলে)-এর সাথে বের হলেন। এরপর তারা (কুরাইশরা) তাঁর পিছু ধাওয়া করল। অতঃপর হাব্বার ইবনুল আসওয়াদ তাঁকে ধরে ফেলল এবং সে তার বর্শা দিয়ে উটটিকে আঘাত করতে থাকল, যতক্ষণ না সে উটটিকে ফেলে দিল। ফলে (যায়নাব) গর্ভপাত করলেন এবং রক্তক্ষরণ হতে থাকল। তাকে বহন করে নিয়ে যাওয়া হলো। এ নিয়ে বনু হাশিম ও বনু উমাইয়ার মধ্যে ঝগড়া শুরু হলো। বনু উমাইয়া বলল: আমরাই তাঁর বেশি হকদার। কারণ তিনি তাদের চাচাতো ভাই আবুল আসের অধীনে ছিলেন। এরপর তিনি হিন্দ বিনতে উতবাহ ইবনে রাবি‘আর কাছে চলে গেলেন। হিন্দ তাকে বলতেন: এটা তোমার পিতার কারণে হয়েছে।
অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যায়দ ইবনু হারিসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তুমি কি যাবে এবং যায়নাবকে নিয়ে আসবে না?" যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হ্যাঁ, ইয়া রাসূলাল্লাহ! তিনি বললেন: "তবে আমার আংটিটি নাও।" তিনি তাকে সেটি দিলেন। যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যাত্রা করলেন এবং নিজের উটটিকে ছেড়ে দিলেন। তিনি বিনয়ের সাথে চেষ্টা করতে থাকলেন। অবশেষে তিনি এক রাখালের সাক্ষাৎ পেলেন। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: তুমি কার পশু চরাও? সে বলল: আবুল আসের। তিনি বললেন: আর এই বকরীগুলো কার? সে বলল: মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা যায়নাবের।
এরপর তিনি তার সাথে কিছুদূর চললেন। অতঃপর তিনি তাকে বললেন: আমি কি তোমাকে এমন কিছু দেব যা তুমি তাকে দেবে এবং কারো কাছে তা উল্লেখ করবে না? সে বলল: হ্যাঁ। এরপর তিনি তাকে আংটিটি দিলেন। রাখালটি চলে গেল, তার বকরীগুলো ভেতরে ঢুকালো এবং যায়নাবকে আংটিটি দিল। তিনি তা চিনতে পারলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: কে তোমাকে এটি দিয়েছে? সে বলল: এক ব্যক্তি। তিনি বললেন: তাকে কোথায় রেখে এসেছ? সে বলল: অমুক অমুক জায়গায়। রাবী বলেন: তিনি চুপ রইলেন, যখন রাত হলো, তিনি তার কাছে গেলেন। যখন তিনি তাঁর কাছে আসলেন, তিনি (যায়দ) তাঁকে বললেন: আপনি আরোহণ করুন। তিনি বললেন: না, বরং আপনি আমার সামনে আরোহণ করুন। অতঃপর তিনি (যায়দ) আরোহণ করলেন এবং যায়নাব তাঁর পেছনে আরোহণ করলেন যতক্ষণ না তিনি (মদীনায়) পৌঁছলেন।
এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: "সে আমার কন্যাদের মধ্যে সবচেয়ে উত্তম, আমার কারণে সে ক্ষতিগ্রস্ত হয়েছে।"
এই সংবাদ আলী ইবনুল হুসায়নের কাছে পৌঁছল। তিনি উরওয়ার কাছে গিয়ে বললেন: আমার কাছে আপনার এমন একটি হাদীসের কথা পৌঁছেছে যা আপনি বর্ণনা করেন, যার দ্বারা ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর অধিকার খর্ব হয়। উরওয়া বললেন: আল্লাহর কসম! আমার কাছে পূর্ব ও পশ্চিমের মধ্যবর্তী সমস্ত কিছু থাকলেও আমি ফাতিমার প্রাপ্য হক খর্ব করতে পছন্দ করি না। কিন্তু এরপরেও, আপনার জন্য রইল এই প্রতিশ্রুতি যে, আমি আর কখনও এটি বর্ণনা করব না।
[ইমাম হাকেম (রঃ) বলেন:] এটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুসারে সহীহ হাদীস, কিন্তু তাঁরা এটি সংকলন করেননি।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في (ز) و (ب): جاء، والمثبت من (م) و (ص). من أفضل، وخير العمل كذا، وإنما تريد من خير العمل.
[2] رسمت في نسخنا الخطية: إني لأحب، سوى (م) ففيها: إني أحب! من أفضل، وخير العمل كذا، وإنما تريد من خير العمل.
7007 [3] - إسناده حسن إن شاء الله من أجل يحيى بن أيوب - وهو الغافقي المصري - وأعله الذهبي به في "التلخيص" وقال: خبر منكر، ويحيى ليس بالقوي.وقد سلف عند المصنف برقم (2848). من أفضل، وخير العمل كذا، وإنما تريد من خير العمل.
7008 - وقد أخبرنيه أبو محمد بن زياد العدل، حدثنا الإمام أبو بكر محمد بن إسحاق، حدثنا محمد بن يحيى، حدثنا ابن أبي مريم، فساق الحديث.قال الإمام أبو بكر في آخره [1]: هذه اللفظة: "أفضلُ بناتي" معناه: أي: من أفضل بناتي؛ لأنَّ الأخبار ثابتةٌ صحيحةٌ عن النَّبيِّ صلى الله عليه وسلم أن فاطمة عليها السلام سيدة نساء هذه الأمة [2]، وكذلك ثابت عن النَّبيِّ صلى الله عليه وسلم أنه قال: "فاطمة سيدة نساء أهل الجنة إِلَّا مريمَ بنتَ عِمران" [3]، وقد أمليتُ من هذا الجنس أنَّ العرب قد تقول: "أفضلُ" تريد: من أفضل، وفي كتبي ما فيه الغُنية والكفاية [4] إن شاء الله عز وجل. وقد شَفَى الإمام أبو بكر رضي الله عنه في بيان هذه اللفظة، ولا نزيد على ما يقوله، إذ هو الإمامُ المقدَّم حقًّا، لكن تحتَ هذه الكلمة حرفٌ يؤدِّي معنى آخر غير ما قاله، وهو: أنَّ العِلم محيطٌ بأنَّ زينب أكبر من فاطمة رضي الله عنهما سنًّا، ولدت قبلها، ويمكن أن يُقال: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أراد بقوله: "أفضل" أي: أكبرُ وأقدم أولادي، والله أعلم.
আবূ মুহাম্মাদ ইবনু যিয়াদ আল-আদল থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন ইমাম আবূ বকর মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক, তিনি বলেন, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু ইয়াহইয়া, তিনি বলেন, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন ইবনু আবী মারইয়াম, অতঃপর তিনি হাদীসটি বর্ণনা করেন। ইমাম আবূ বকর এর শেষে বলেছেন: এই শব্দটি: "আমার কন্যাদের মধ্যে সর্বশ্রেষ্ঠ" এর অর্থ হলো: অর্থাৎ 'আমার কন্যাদের মধ্যে অন্যতম শ্রেষ্ঠ'; কারণ নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে সহীহ ও সুপ্রতিষ্ঠিত খবরসমূহ (হাদীস) রয়েছে যে ফাতিমা (আঃ) এই উম্মতের মহিলাদের নেত্রী, একইভাবে নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে প্রমাণিত আছে যে তিনি বলেছেন: "ফাতিমা হলেন জান্নাতের মহিলাদের নেত্রী, তবে মারইয়াম বিনতে ইমরান ব্যতীত"। আর আমি এই বিষয়ে লিখেছি যে আরবরা "আফদাল" (সর্বশ্রেষ্ঠ) বলে 'মিন আফদাল' (অন্যতম শ্রেষ্ঠ) উদ্দেশ্য নিতে পারে। আর আমার গ্রন্থসমূহে ইন শা আল্লাহু আয্যা ওয়া জাল এর পর্যাপ্ত ও যথেষ্ট বর্ণনা রয়েছে। আর ইমাম আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই শব্দটির ব্যাখ্যায় সন্তোষজনক বর্ণনা দিয়েছেন। আমরা তাঁর কথার উপর আর কিছু যোগ করব না, কারণ তিনি নিঃসন্দেহে একজন অগ্রণী ইমাম। কিন্তু এই শব্দের নিচে এমন একটি দিক লুকিয়ে আছে যা তাঁর (ইমাম আবূ বকরের) বক্তব্যের চেয়ে ভিন্ন আরেকটি অর্থ প্রকাশ করে। আর তা হলো: জ্ঞান দ্বারা প্রমাণিত যে যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর চেয়ে বয়সে বড় ছিলেন; তিনি তাঁর আগে জন্মগ্রহণ করেছিলেন। আর এটা বলা যেতে পারে যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর বাণী "আফদাল" (সর্বশ্রেষ্ঠ) দ্বারা উদ্দেশ্য করেছেন: আমার সন্তানদের মধ্যে সবচেয়ে বড় এবং প্রাচীন। আর আল্লাহই সর্বজ্ঞ।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في (ز) و (ب): آخر. وأبو بكر هذا هو الإمام محمد بن إسحاق بن خزيمة. من أفضل، وخير العمل كذا، وإنما تريد من خير العمل.
[2] سلف برقم (4794) من حديث أم المؤمنين عائشة رضي الله عنها. من أفضل، وخير العمل كذا، وإنما تريد من خير العمل.
7008 [3] - سلف برقم (4786) من حديث أبي سعيد الخدري رضي الله عنه. من أفضل، وخير العمل كذا، وإنما تريد من خير العمل.
7008 [4] - من ذلك قوله في "صحيحه" 4/ 174: إنَّ العرب قد تقول: إن أفضل العمل كذا، وإنما تريد: من أفضل، وخير العمل كذا، وإنما تريد من خير العمل.
7009 - Null
7009 - حدثني أبو عبد الله الأصبهاني، حدثنا الحسن بن الجهم، حدثنا الحسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر، عن يحيى بن عبد الله بن أبي قتادة، عن عبد الله بن أبي بكر بن حَزْم قال: تُوفِّيت زينب بنتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم سنة ثمان من الهجرة.
আব্দুল্লাহ ইবনে আবী বকর ইবনে হাযম থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা যয়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হিজরতের অষ্টম বছরে ইনতিকাল করেন।
7010 - قال محمد بن عمر: وأخبرني هشام بن محمد الكَلْبي، قال: أخبرني أبي، عن أبي صالح [1]، عن ابن عبّاس قال: كان أسنَّ ولدِ رسول الله صلى الله عليه وسلم القاسم، ثم زينبُ، فتزوّج زينب أبو العاص بن الربيع، فولدت له عليًا وأمامة، وفيها يقول أبو العاص:ذكرتُ زينب لمَّا وَرَّكَتْ [2] إِرَمَا … فقلتُ: سَقْيًا لشخصٍ يسكنُ الحَرَمابنتُ الأمين جزاها الله صالحة … وكلُّ بَعْلٍ سيُثْني بالذي عَلِما [3]
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সন্তানদের মধ্যে বয়সে সবচেয়ে বড় ছিলেন কাসিম, এরপর ছিলেন যায়নাব। অতঃপর যায়নাবকে আবুল আস ইবনু রাবি’ বিয়ে করেন। তিনি তার (আবুল আসের) জন্য আলী ও উমামাহকে জন্ম দেন। আর তার (যায়নাবের) প্রসঙ্গে আবুল আস বলেছিলেন:
"আমি যায়নাবের কথা স্মরণ করলাম, যখন তিনি ইরমে বসতি স্থাপন করলেন,
আমি বললাম: হারামের অধিবাসীর প্রতি সিক্ত (রহমতের) বর্ষণ হোক।
আমানতদারের কন্যা, আল্লাহ তাকে উত্তম প্রতিদান দিন,
এবং প্রত্যেক স্বামী সেই বিষয়ে প্রশংসা করবে যা সে জানতে পেরেছে।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في (ز) و (ب): عن صالح، وسقط من (م)، وفي (ص): قال أخبرني عن ابن عباس. والمثبت من "طبقات ابن سعد" 3/ 6.
[2] تحرَّف في النسخ إلى: ورثت، والمثبت من "طبقات ابن سعد" 5/ 7 و 10/ 32.
7010 [3] - إسناده تالف، مسلسل بالهلكي. أبو صالح: هو باذام مولى أم هانئ، وهو ضعيف.
7011 - Null
7011 - فحدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالويه، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حدثنا مصعب بن عبد الله الزبيري قال: كانت زينب بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم أسنّ بناته، وكان سبب وفاتها أنَّها لما أُخرجت من مكة إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم أدركها هبَّارُ بن الأسود ورجلٌ آخر، فدفعها أحدهما فيما قيل، فسقطت على صخرةٍ، فأسقطت حَمْلَها إذ كانت حاملةً، فأهراقَتِ الدَّمَ، فلم يزل بها وجعُها حتى ماتت منها.
মুস'আব ইবনু আব্দুল্লাহ আয-যুবাইরী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যাদের মধ্যে যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন বয়সে সকলের বড়। তাঁর মৃত্যুর কারণ ছিল এই যে, তাঁকে যখন মক্কা থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট নিয়ে আসা হচ্ছিল, তখন হাব্বার ইবনুল আসওয়াদ ও অন্য একজন লোক তাঁকে ধরে ফেলে। বলা হয়, তাদের একজন তাঁকে ধাক্কা দেয়। ফলে তিনি একটি পাথরের উপর পড়ে যান। তিনি তখন গর্ভবতী ছিলেন, তাই তাঁর গর্ভপাত হয়ে যায় এবং অতিরিক্ত রক্তক্ষরণ হয়। এই আঘাতের ব্যথা সবসময় তাঁর সাথে ছিল, অবশেষে এই কারণেই তিনি মৃত্যুবরণ করেন।
7012 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بكير، عن ابن إسحاق، حدثنا يحيى بن عباد بن عبد الله بن الزبير، عن أبيه، عن عائشة قالت: لما بعث أهل مكة في فداء أساراهم بعثت زينب بنتُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم في فداء أبي العاص بقلادة، وكانت خديجة أدخلتها بها على أبي العاص حين بَنَى عليها، فلما رآها رسول الله صلى الله عليه وسلم رَقَّ لها رِقَّةً شديدة، وقال: "إن رأيتُم أن تُطلِقوا لها أسيرها، وتردُّوا عليها الذي لها" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন মক্কাবাসীরা তাদের বন্দীদের মুক্তির জন্য মুক্তিপণ পাঠাল, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবুল আসকে মুক্ত করার জন্য একটি হার পাঠালেন। এই হারটি খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে আবুল আসের সাথে বাসর রাতে দিয়েছিলেন। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হারটি দেখলেন, তিনি গভীরভাবে ব্যথিত ও সহানুভূতিশীল হয়ে পড়লেন এবং বললেন: “যদি তোমরা মনে করো যে তোমরা তার বন্দীকে মুক্ত করে দেবে এবং তার জিনিস তাকে ফিরিয়ে দেবে।”
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده حسن من أجل ابن إسحاق: وهو محمد بن إسحاق بن يسار. وهو مكرر (4352).
7013 - حدثني علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا عُبيد بن شريك البار، حدثنا يحيى بن عبد الله بن بكير، حدثنا عبد الله بن السَّمْح، عن عقيل، عن ابن شهاب، عن أنس قال: أجارت زينب بنت النَّبيِّ صلى الله عليه وسلم امرأة أبي العاص زوجها أبا العاص بن الربيع، فأجاز رسول الله صلى الله عليه وسلم جوارها [1].
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা, আবূল আসের স্ত্রী, যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর স্বামী আবূল আস ইবনু রাবী’কে নিরাপত্তা বা আশ্রয় দিয়েছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর এই আশ্রয় প্রদানকে বৈধ বলে ঘোষণা করেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] رجاله لا بأس بهم، لكن الصواب أنَّ فيه بين عبد الله بن السمح وعُقيل بن خالد رجلًا هو عباد بن كثير الثقفي كما رواه جمعٌ عن يحيى بن بكير عند الطبراني، وعباد هذا متروك.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 22/ (1048)، وفي "الأوسط" (9006) من طرق عن يحيى بن بكير، عن عبد الله بن السمح، عن عباد بن كثير، عن عقيل، عن ابن شهاب، عن أنس.وأخرجه مطولًا عبد الرزاق (12649) عن ابن جريج، عن رجل، عن ابن شهاب، فذكره مرسلًا.وفي باب إجازة جوار المسلمين على بعضهم، انظر ما سلف عند المصنف من حديث علي وأبي هريرة وعائشة بالأرقام (2680) و (2681) و (2683). وانظر حديث أم سلمة أيضًا الآتي بعد حديث.
7014 - حدثناه أبو علي الحافظ، أخبرنا أبو محمد بن صاعد، حدثنا عبد الله ابن شبيب، حدثنا أيوب بن سليمان بن بلال، حدثني أبو بكر بن أبي أُويس، عن سليمان، قال: قال يحيى بن سعيد وصالح بن كَيْسان، عن الزهري، عن أنس قال: لما أُسِرَ أبو العاص قالت زينب: إنّي قد أجرتُ أبا العاص، فقال النَّبيّ صلى الله عليه وسلم: "قد أجَرْنا من أجرتِ زينب؛ إنه يُجيرُ على المسلمين أدناهم" [1].
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আবুল আস বন্দী হলেন, তখন যায়নাব বললেন: আমি আবুল আসকে নিরাপত্তা (আশ্রয়) দিয়েছি। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "যায়নাব যাকে নিরাপত্তা দিয়েছে, আমরাও তাকে নিরাপত্তা দিলাম। কারণ মুসলমানদের মধ্যে সর্বনিম্ন ব্যক্তিও অন্যান্য মুসলমানদের পক্ষ থেকে নিরাপত্তা দিতে পারে।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل عبد الله بن شبيب سليمان: هو ابن بلال المدني.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (555) و (2974)، وابن المنذر في "الأوسط" (6264)، والطحاوي في "شرح المشكل" (1245)، والمحاملي في "الأمالي" (330 - رواية ابن البيع) - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخه" 67/ 16 و 16 - 17 - من طريق عبد الله بن شبيب، بهذا الإسناد. ووقع خطأ في المطبوع من "أمالي المحاملي"، وكذا في "تاريخ دمشق"، فليصحح.وأخرجه الدُّولابي في "الذرية الطاهرة" (59) عن النضر بن سلمة المروزي، عن أيوب بن سليمان بن بلال، عن أبي بكر، عن سليمان بن بلال، عن صالح بن كيسان وحده، به. والنضر لا يفرح به، متهم.وانظر ما قبله وما بعده. وأخرجه البيهقي 9/ 95 - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخه" 67/ 17 - 18 - عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البيهقي 9/ 95 - ومن طريقه ابن عساكر 67/ 17 - 18 - عن أبي بكر أحمد بن الحسن، عن أبي العباس محمد بن يعقوب، به.وأخرجه أبو الفضل الزهري في "حديثه" (162) - ومن طريقه ابن عساكر - عن يحيى بن محمد بن صاعد، عن محمد بن عبد الله بن عبد الحكم، به.وأخرجه الدولابي في "الذرية الطاهرة" (54)، والطحاوي في "شرح المشكل" (1244) كلاهما عن يونس بن عبد الأعلى، عن عبد الله بن وهب، به.وأخرجه ابن زنجويه في "الأموال" (731)، والطبراني في "الكبير" 22/ (1047) و 23/ (590)، وفي "الأوسط" (4822) من طرق عن ابن لهيعة، به. وسقط من "الأموال": عراك بن مالك. وقال الطبراني: لا يُروى هذا الحديث عن أم سلمة إلا بهذا الإسناد، تفرد به ابن لهيعة.وأخرج عبد الرزاق (9444) عن ابن عيينة، عن ابن عجلان عن سعيد المقبري قال: لما صلى النَّبيّ صلى الله عليه وسلم الفجر، قامت زينب فقالت: إنه ذكر زوجي قد جيء به، وإني قد أجرته، فقال النَّبيّ صلى الله عليه وسلم: "إن هذا الأمر ما لي به من علم، وإنه ليجير على القوم أدناهم". وإسناده جيد إلى سعيد المقبري.وأخرج نحوه أيضًا (9440) من طريق عبد الله البهي، و (9441) من طريق حسن بن محمد بن علي مرسلًا.
7015 - حدثنا أبو العبّاس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم أخبرنا ابن وهب، أخبرنا ابن لهيعة، عن موسى بن جبير الأنصاري، عن عراك بن مالك الغفاري، عن أبي بكر بن عبد الرحمن، عن أم سلمة زوج النَّبيِّ صلى الله عليه وسلم: أنَّ زينب بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم أرسل إليها أبو العاص بن الربيع: أن خُذِي لي أمانًا من أبيكِ، فخرجت فأطلعت رأسها من باب حجرتها والنبي صلى الله عليه وسلم في الصبح [1] يُصلِّي بالناس فقالت: أيها الناسُ إِنِّي زينب بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم، وإني قد أجرتُ أبا العاص، فلما فَرَغَ النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم من الصلاة، قال: "أيها الناسُ، إنَّه لا علم لي بهذا حتى سمعتموه، ألا وإنَّه يُجِيرُ على المسلمين أدناهم" [2].
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট আবূল আস ইবনু রাবী' এই মর্মে সংবাদ পাঠালেন যে, তুমি তোমার পিতার নিকট থেকে আমার জন্য নিরাপত্তার (আমান) ব্যবস্থা করে দাও। অতঃপর তিনি (যায়নাব) বের হয়ে এলেন এবং তাঁর কক্ষের দরজা থেকে মাথা বের করলেন। তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজরের সালাতে লোকজনের ইমামতি করছিলেন। তিনি বললেন, হে লোক সকল! আমি যায়নাব, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা। আমি আবূল আসকে নিরাপত্তা দিয়েছি। নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সালাত শেষ করলেন, তখন বললেন, "হে লোক সকল! তোমরা যা শুনেছ, তা জানার পূর্বে আমার এ বিষয়ে কোনো জ্ঞান ছিল না। জেনে রাখো, মুসলিমদের মধ্যে সর্বনিম্ন ব্যক্তিও (কারও পক্ষে) নিরাপত্তা দিতে পারে।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] قوله في الصبح، ليس في (ز) و (ب). وأخرجه البيهقي 9/ 95 - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخه" 67/ 17 - 18 - عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البيهقي 9/ 95 - ومن طريقه ابن عساكر 67/ 17 - 18 - عن أبي بكر أحمد بن الحسن، عن أبي العباس محمد بن يعقوب، به.وأخرجه أبو الفضل الزهري في "حديثه" (162) - ومن طريقه ابن عساكر - عن يحيى بن محمد بن صاعد، عن محمد بن عبد الله بن عبد الحكم، به.وأخرجه الدولابي في "الذرية الطاهرة" (54)، والطحاوي في "شرح المشكل" (1244) كلاهما عن يونس بن عبد الأعلى، عن عبد الله بن وهب، به.وأخرجه ابن زنجويه في "الأموال" (731)، والطبراني في "الكبير" 22/ (1047) و 23/ (590)، وفي "الأوسط" (4822) من طرق عن ابن لهيعة، به. وسقط من "الأموال": عراك بن مالك. وقال الطبراني: لا يُروى هذا الحديث عن أم سلمة إلا بهذا الإسناد، تفرد به ابن لهيعة.وأخرج عبد الرزاق (9444) عن ابن عيينة، عن ابن عجلان عن سعيد المقبري قال: لما صلى النَّبيّ صلى الله عليه وسلم الفجر، قامت زينب فقالت: إنه ذكر زوجي قد جيء به، وإني قد أجرته، فقال النَّبيّ صلى الله عليه وسلم: "إن هذا الأمر ما لي به من علم، وإنه ليجير على القوم أدناهم". وإسناده جيد إلى سعيد المقبري.وأخرج نحوه أيضًا (9440) من طريق عبد الله البهي، و (9441) من طريق حسن بن محمد بن علي مرسلًا.
[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل ابن لهيعة، وروايته صالحة إذا روى عنه عبد الله بن وهب. وأخرجه البيهقي 9/ 95 - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخه" 67/ 17 - 18 - عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البيهقي 9/ 95 - ومن طريقه ابن عساكر 67/ 17 - 18 - عن أبي بكر أحمد بن الحسن، عن أبي العباس محمد بن يعقوب، به.وأخرجه أبو الفضل الزهري في "حديثه" (162) - ومن طريقه ابن عساكر - عن يحيى بن محمد بن صاعد، عن محمد بن عبد الله بن عبد الحكم، به.وأخرجه الدولابي في "الذرية الطاهرة" (54)، والطحاوي في "شرح المشكل" (1244) كلاهما عن يونس بن عبد الأعلى، عن عبد الله بن وهب، به.وأخرجه ابن زنجويه في "الأموال" (731)، والطبراني في "الكبير" 22/ (1047) و 23/ (590)، وفي "الأوسط" (4822) من طرق عن ابن لهيعة، به. وسقط من "الأموال": عراك بن مالك. وقال الطبراني: لا يُروى هذا الحديث عن أم سلمة إلا بهذا الإسناد، تفرد به ابن لهيعة.وأخرج عبد الرزاق (9444) عن ابن عيينة، عن ابن عجلان عن سعيد المقبري قال: لما صلى النَّبيّ صلى الله عليه وسلم الفجر، قامت زينب فقالت: إنه ذكر زوجي قد جيء به، وإني قد أجرته، فقال النَّبيّ صلى الله عليه وسلم: "إن هذا الأمر ما لي به من علم، وإنه ليجير على القوم أدناهم". وإسناده جيد إلى سعيد المقبري.وأخرج نحوه أيضًا (9440) من طريق عبد الله البهي، و (9441) من طريق حسن بن محمد بن علي مرسلًا.
7016 - حدثنا أبو بكر إسماعيل بن محمد بن إسماعيل الفقيه بالرّيّ، حدثنا أبو حاتم، حدثنا عبد الله بن جعفر الرَّقِّي، حدثنا عيسى بن يونس، عن الأوزاعي ومَعمر، عن الزُّهْري، عن أنس قال: رأيتُ على زينب بنتِ رسول الله صلى الله عليه وسلم قميص حرير سيراء [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা যায়নাবের গায়ে ডোরাকাটা রেশমের কামিজ দেখেছি।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] صحيح لكن بذكر أم كلثوم بدلًا من زينب كما قال جمعٌ من أهل العلم، وهذا إسناد رجاله ثقات. أبو حاتم: هو محمد بن إدريس الرازي الإمام، وعيسى بن يونس: هو السبيعي.وأخرجه الطحاوي في "شرح المشكل" (4840)، وفي "شرح المعاني" 4/ 254 من طريق أبي أمية الطرسوسي محمد بن إبراهيم، عن عبد الله بن جعفر الرقي بهذا الإسناد. ولم يسق لفظه.وأخرجه عبد الرزاق (19945)، وابن ماجه (3598)، وابن أبي عاصم (2973)، والنسائي (9503)، وأبو يعلى (3586)، والطحاوي في "شرح المشكل" (4841)، وفي "شرح المعاني" من طرق عن معمر وحده، بهذا الإسناد.وخالف الأوزاعي ومعمرًا جمع من أصحاب الزهري، فرووه عن الزهري عن أنس: أنه رأى على أم كلثوم حلة سيراء.رواه كذلك شعيب بن أبي حمزة عند البخاري (5842)، والنسائي (9505)، ومحمد بن الوليد الزبيدي عند أبي داود (4058)، والنسائي (9504)، والحاكم في الرواية الآتية برقم (7034)، وابن جريج عند النسائي (9506)، ويحيى بن سعيد الأنصاري عند النسائي (9507)، ومحمد بن عبد الله بن أبي عتيق عند الطبراني في "الكبير" 22 / (1064) و "الأوسط" (4610)، وعبيد الله بن أبي زياد عند الحاكم (7034)، والبيهقي 2/ 425، ستتهم عن الزهري به.قال النسائي: وهذا أولى بالصواب من الذي قبله، يعني من رواية معمر. وكذلك قال البخاري في "التاريخ الأوسط": قال معمر، عن الزهري عن أنس: رأى على زينب بنت النَّبيّ صلى الله عليه وسلم، وأم كلثوم أصح. وقال الدَّارَقُطْنيّ في "العلل" (2598): والصحيح قول من قال: أم كلثوم، وقال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 18/ 97: والمحفوظ ما قال الأكثر.قوله: سِيَراء، قال ابن الأثير في مادة (سير) من "النهاية في الغريب": السيراء بكسر السين وفتح الياء والمد: نوع من البرود يُخالطه حرير كالسُّيور، فهو فِعَلاء من السير: القد. هكذا يُروى على الصفة. وقال بعض المتأخرين: إنما هو حلّة سيراء على الإضافة، واحتج بأنَّ سيبويه قال: لم يأتِ فِعَلاء صفةً، ولكن اسمًا. وشرحَ السِّيراء بالحرير الصافي، ومعناه حلّة حرير. وانظر ما قاله الحافظ ابن حجر في "الفتح" 18/ 90، ففيه شيء من التفصيل.
7017 - حدثنا أبو عمرو [1] أحمد بن الحسن الأصبهاني، حدثنا أبو جعفر محمد بن عمر بن حفص، حدثنا إسحاق بن إبراهيم شاذان [2]، حدثنا سعد [3] بن الصلت، حدثنا الأعمش، عن أبي سفيان، عن أنس بن مالك قال: تُوفِّيَت زينب بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم، فخَرَجَ بجنازتها وخرجنا معه، فرأيناه كئيبًا حزينًا، فلما دخل النَّبيّ صلى الله عليه وسلم قبرها فخرج مُلتمِعَ اللون، وسألناه عن ذلك، فقال: "إنها كانت امرأةً مِسقامةً، فذكرتُ شِدَّةَ الموت وضمَّةَ القبر، فدعوت الله أن يُخفِّفَ عنها" [4].
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা যয়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তেকাল করলেন। তিনি তাঁর জানাযা নিয়ে বের হলেন এবং আমরাও তাঁর সঙ্গে বের হলাম। আমরা তাঁকে বিষণ্ণ ও শোকাহত অবস্থায় দেখলাম। যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কবরে প্রবেশ করলেন, তখন তিনি ফ্যাকাশে চেহারায় (বর্ণ পরিবর্তিত অবস্থায়) বেরিয়ে এলেন। আমরা তাঁকে এর কারণ জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই সে ছিল একজন রোগাক্রান্ত (দুর্বল) মহিলা। আমি তার জন্য মৃত্যুর কঠোরতা এবং কবরের চাপার (সংকোচনের) কথা স্মরণ করলাম। তাই আমি আল্লাহর কাছে দুআ করলাম যেন তিনি তার কষ্ট লাঘব করে দেন।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرّف في نسخنا الخطية إلى: عمر. والتصويب من "تلخيص تاريخ نيسابور" للخليفة النيسابوري ص 76، ومن "تاريخ الإسلام" للذهبي 8/ 122، وهو أحمد بن الحسن بن علي بن منده الأصبهاني. بجلي كوفي، وهو جد شاذان والد أمه، وأما سعيد بن الصلت فآخرُ مصري، ترجمه أيضًا ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 4/ 34، والبخاري 3/ 483.
[2] أُقحم في النسخ هنا: بن فصار ابن شاذان، وإنما شاذان لقبه كما في "الجرح والتعديل" لابن أبي حاتم 2/ 211، وانظر "نزهة الألباب في الألقاب" لابن حجر (1615). بجلي كوفي، وهو جد شاذان والد أمه، وأما سعيد بن الصلت فآخرُ مصري، ترجمه أيضًا ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 4/ 34، والبخاري 3/ 483.
7017 [3] - تحرَّف في النسخ الخطية إلى سعيد، وأثبتناه على الصواب من كتب التراجم: "الجرح والتعديل" لابن أبي حاتم 4/ 86، و "الثقات" لابن حبان 6/ 378، و"سير النبلاء" 9/ 317، وهو بجلي كوفي، وهو جد شاذان والد أمه، وأما سعيد بن الصلت فآخرُ مصري، ترجمه أيضًا ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 4/ 34، والبخاري 3/ 483.
7017 [4] - حديث حسن إن شاء الله بطرقه، وهذا إسناد لا بأس برجاله غير شيخ الحاكم، فمجهول، وقد توبع. أبو سفيان: هو طلحة بن نافع.وأعله الدَّارَقُطْنيّ في "العلل" (2679) بالاضطراب، فقال: يرويه الأعمش، واختلف عليه؛ فرواه سعد بن الصلت عن الأعمش عن أبي سفيان عن أنس. قلنا: هذه الطريق أخرجها - غيرُ المصنف - ابن أبي داود في "البعث" (8)، ومن طريقه ابن عساكر في "معجمه" (142)، وابن الجوزي في "الموضوعات" (1769)، وفي "العلل المتناهية" (1517)، والذهبي في "تذكرة الحفاظ" 4/ 117.ثم قال الدَّارَقُطْنيّ: وخالفه حبيب بن خالد الأسدي، رواه عن الأعمش عن عبد الله بن المغيرة عن أنس. قلنا: أخرجه من هذه الطريق أبو عوانة في "صحيحه" كما في "اللآلئ المصنوعة" للسيوطي 2/ 361، والطبراني في "الكبير" (745) و 22/ (1054). وحبيب بن خالد الأسدي قال أبو حاتم: ليس بالقوي، وعبد الله بن المغيرة لم نعرفه.ثم قال الدَّارَقُطْنيّ: ورواه أبو حمزة السكري عن الأعمش عن سليمان عن أنس. قلنا: أخرجه من هذه الطريق أبو طاهر المخلِّص في "المخلصيات" (249)، وابن الجوزي في "الموضوعات" (1768)، وفي "المقلق" له (88)، والضياء في "المختارة" 6/ (2162) من طريق علي بن الحسن بن شقيق، عن أبي حمزة، به. ولفظه: "ذكرتُ ضعف ابنتي وشدة عذاب القبر، فأُتِيتُ فأُخبرتُ أنه قد خُفِّف عنها، ولقد ضُغِطَت ضغطة سمع صوتها ما بين الخافقين". وسقط من بعض نسخ "الموضوعات" لابن الجوزي ذكر سليمان بين الأعمش وأنس، وجاء على الصواب في كتابه "المقلق" وسمّاه فيه: سليمان بن المغيرة وكذا سماه مسلم بن الحجَّاج في بعض كتبه فيما نقله عنه الدَّارَقُطْنيّ في "العلل". وسليمان هذا إن كان محفوظًا فيه أنه ابن المغيرة، فإنه أصغر من الأعمش ولم يدرك أنسًا، وإلا فلا نعرفه، والظاهر أنه وهم.وله مخرج آخر فقد أخرجه أبو عوانة في "صحيحه" كما في "اللآلئ المصنوعة" للسيوطي 2/ 361، والطبراني في "الكبير" 22/ (1055)، وفي "الأوسط" (5810) من طريق إسحاق بن سليمان الرازي، عن سعيد بن مسروق، عن أنس بن مالك، قال: لما ماتت زينب بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم ظهر من النَّبيّ صلى الله عليه وسلم حزن، ثم سُرّي عنه، فقلنا: يا رسول الله، رأيناك حزينًا، ثم سُرّي عنك، فقال: "رأيتُ زينب وضعفَها، ولقد هُوّن عليها، وعلي ذلك لقد ضُغطت ضغطة بلغت الخافقين". قال الطبراني: لم يروه عن سعيد بن مسروق إلا زكريا بن سلام، تفرد به إسحاق بن سليمان. قلنا: ورجاله لا بأس بهم بالجملة، لكن لا يعرف لسعيد بن مسروق سماع من أنس بن مالك، كما أن الذهبي في "تاريخ الإسلام" 3/ 865 تشكَّك في لقيِّ إسحاق بن سليمان له.وأخرجه ابن الجوزي في "الموضوعات" (1770)، وفي "العلل المتناهية" (1518) من طريق معاوية العبسي، عن زاذان أبي عمر قال: لما دفن رسول الله صلى الله عليه وسلم ابنته جلس عند القبر فتربَّد وجهه، ثم سُرّي عنه، فسأله أصحابه عن ذلك، فقال: ذكرتُ ابنتي وضعفها وعذاب القبر، فدعوتُ الله ففرج عنها، وايمُ الله، لقد ضُمَّت ضمةً سمعها ما بين الخافقين". ومعاوية العبسي لم نعرفه.
7018 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الشَّيباني، حدثنا إبراهيم بن عبد الله السَّعْدي، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا محمد بن إسحاق، حدثني داود بن الحصين، عن عكرمة عن ابن عباس: أن النَّبيّ صلى الله عليه وسلم ردَّ ابنته زينب على زوجها أبي العاص بعد سنتين بنكاحها الأول، ولم يُحدِث صَداقًا [1]. ذكرُ رُقيَّةَ بنتِ رسول الله صلى الله عليه وسلم
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কন্যা যয়নাবকে তাঁর স্বামী আবুল আসের কাছে তাদের প্রথম বিবাহের মাধ্যমেই দুই বছর পর ফিরিয়ে দিয়েছিলেন এবং নতুন কোনো মোহর নির্ধারণ করেননি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা রুকাইয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আলোচনা।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده حسن. وسلف برقم (2847) من طريق يزيد بن هارون.