আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
7039 - أخبرنا أبو جعفر أحمد بن عُبيد بن إبراهيم بن محمد بن عبيد بن عبد الملك الأسدي الحافظ بهمذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين بن ديزيل، حدثنا إسحاق بن محمد الفَرْوي [1]، حدثتنا أم عُرْوة [2] بنت جعفر بن الزبير، عن أبيها، عن جدها الزبير، عن أمه صفية بنت عبد المطلب: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لَمَّا خرج إلى أحد جعل نساءه في أُطُمٍ يقال له: فارع [3]، وجعل معهنَّ حسان بن ثابت، فجاء اليهود إلى الأُطم يلتمسون غِرَّةَ نساء النَّبيِّ صلى الله عليه وسلم، فترقَّى إنسانٌ من الأُطم علينا، فقلتُ له: يا حسان، قُمْ إليه فاقتله، فقال: والله ما كان ذلك في، ولو كان ذلك فيَّ كنتُ مع النَّبيِّ صلى الله عليه وسلم، فقلتُ له: اربط هذا السيف على ذراعي، فربطه، فقمتُ إليه فضربتُ رأسه حتى قطعته، فقلتُ له: خُذ بأذنيه فارم به عليهم، فقال: والله ما ذلك فيَّ، فأخذتُ برأسه فرميتُ به عليهم، فتضعْضَعُوا وهم يقولون: قد علمنا أن محمدًا لم يكن ليترك أهله خُلوفًا ليس معهن أحدٌ.قالت: وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا اشتدَّ على المشركين شدَّ حسانُ مع رسول الله صلى الله عليه وهو معنا في الحصْن، فإذا رجع رجع وراءه كما يرجع رسول الله صلى الله عليه وسلم، وهو ثَمَّ، فمرَّ بنا سعد بن معاذ وقد أخذ صُفْرةً وهو بعُرس قبل ذلك بأيام، وهو يرتجز:مهلًا قليلًا يَلحقِ الهَيْجا حَمَلْ … لا بأس بالموت إذا حلَّ الأَجَلْقالت عائشة: فما رأيتُ رجلًا أحمل منه في ذلك اليوم [4]. هذا حديث كبير غريب بهذا الإسناد، وقد روي بإسناد صحيح:
সাফিয়্যাহ বিনতে আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন উহুদের দিকে বের হলেন, তখন তিনি তাঁর স্ত্রীদেরকে ফারি’ নামক একটি দুর্গে (উতুম) রাখলেন এবং তাঁদের সাথে হাসসান ইবনু ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে রেখে গেলেন। এরপর ইহুদিরা দুর্গের কাছে এসে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীদের অসতর্কতার সুযোগ খুঁজতে লাগল। তাদের মধ্য থেকে একজন আমাদের দুর্গে উঠে এলো। আমি হাসসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললাম, হে হাসসান, উঠে যাও এবং তাকে হত্যা করো। সে বলল, আল্লাহর কসম, এটা আমার পক্ষে সম্ভব নয়। যদি এটা আমার দ্বারা সম্ভব হতো, তাহলে আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে থাকতাম। তখন আমি তাকে বললাম, এই তলোয়ারটি আমার বাহুতে বেঁধে দাও। সে বেঁধে দিল। আমি উঠে গিয়ে তার মাথায় আঘাত করলাম এবং তা ছিন্ন করে দিলাম। আমি হাসসানকে বললাম, তুমি তার কান ধরে তা (মাথাটি) তাদের (ইহুদীদের) দিকে নিক্ষেপ করো। সে বলল, আল্লাহর কসম, এটা আমার দ্বারা সম্ভব নয়। তখন আমি নিজে মাথাটি ধরলাম এবং তাদের দিকে নিক্ষেপ করলাম। এতে তারা ভীতসন্ত্রস্ত হয়ে পিছু হটতে শুরু করল এবং বলতে লাগল, আমরা জানতাম যে, মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর পরিবারকে সঙ্গীবিহীন অবস্থায় রেখে যাবেন না।
তিনি (সাফিয়্যাহ) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন মুশরিকদের উপর তীব্র আক্রমণ করতেন, তখন হাসসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আক্রমণ করতেন, অথচ সে আমাদের সাথেই দুর্গে ছিল। যখন তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফিরে আসতেন, সেও তাঁর পিছনে ফিরে আসত। সে সেখানে ছিল। এরপর আমাদের পাশ দিয়ে সা‘দ ইবনু মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) গেলেন। এর কয়েক দিন আগে তাঁর বিবাহের জর্দি (হলুদ রং) লেগেছিল। তিনি এই বলে কবিতা আবৃত্তি করছিলেন:
“আর অল্প সময় অপেক্ষা করো, হিজা হামাল এখানে এসে পৌঁছাবে। যখন মৃত্যু নির্ধারিত হয়ে আসে, তখন আর ভয় থাকে না।”
আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন, সেদিন আমি তার চেয়ে বেশি ধৈর্যশীল বা সাহসী আর কোনো লোককে দেখিনি।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرّف في (ز) و (ب) إلى: إبراهيم. اسمُ أُطم من آطام المدينة. وقال أبو عبيد البكري في "معجم ما استعجم" 3/ 1013: فارع على وزن فاعل: أطم حسّان بن ثابت. قلنا: والأطم بضم الطاء وسكونها: الحصن والبيت المرتفع، وجمعه: آطام وأُطُوم.
[2] تحرّف في النسخ الخطية إلى: فروة. اسمُ أُطم من آطام المدينة. وقال أبو عبيد البكري في "معجم ما استعجم" 3/ 1013: فارع على وزن فاعل: أطم حسّان بن ثابت. قلنا: والأطم بضم الطاء وسكونها: الحصن والبيت المرتفع، وجمعه: آطام وأُطُوم.
7039 [3] - تحرّف في النسخ الخطية إلى: بارع، وفارع بالفاء، قال صاحب "مراصد الاطلاع" 3/ 1013: اسمُ أُطم من آطام المدينة. وقال أبو عبيد البكري في "معجم ما استعجم" 3/ 1013: فارع على وزن فاعل: أطم حسّان بن ثابت. قلنا: والأطم بضم الطاء وسكونها: الحصن والبيت المرتفع، وجمعه: آطام وأُطُوم.
7039 [4] - حسن لغيره، وهذا إسناده ضعيف، إسحاق بن محمد الفروي لين الحديث، وأم عروة بنت جعفر لا تُعرَف، وجعفر روى عنه جمع - كما ذكر ابن حجر في "تهذيب التهذيب" - وذكره ابن حبان في "ثقاته". وذكر أحد في هذه الرواية، وهم، والصواب أنَّ ذلك كان في غزوة الخندق كما نبه عليه الحافظ ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 12/ 429، والذهبي في "السير" 2/ 522.وأخرجه ابن منده في "معرفة الصحابة" ص 934، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (7493) و (7720)، وابن عساكر 12/ 429 من طرق عن إسماعيل بن إسحاق القاضي، عن إسحاق بن محمد الفروي، بهذا الإسناد. ووقع عند أبي نعيم وحده: لما خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى أحد أو الخندق. على الشك.وأخرجه ابن أبي خيثمة في السفر الثاني من "تاريخه" (3348) و (3971 م) - ومن طريقه ابن عساكر 12/ 430 - والطبراني في "الكبير" 24 / (809)، وفي "الأوسط" (3754)، وابن عساكر 12/ 429 من طرق عن إسحاق الفروي، عن أم عروة، عن أبيها جعفر، عن صفية. ليس فيه ذكر الزبير بن العوام. وقال الطبراني: لا يروى هذا الحديث عن صفية إلا بهذا الإسناد، تفرَّد به إسحاق بن محمد الفروي.وأخرجه البزار في "مسنده" (978) عن عبد الله بن شبيب، عن إسحاق الفروي، عن أم عروة بنت جعفر بن الزبير، عن أبيها، عن جدها الزبير بن العوام، فذكره، فجعله من مسند الزبير بن العوام. وقال: هذا الحديث لا نعلمه يروى عن الزبير إلا من هذا الوجه بهذا الإسناد. قلنا: وعبد الله بن شبيب ذاهب الحديث لا يحتج به.وأخرجه أبو يعلى (683)، وابن عساكر 12/ 429 - 430 من طريق محمد بن الحسن بن زبالة، عن أم عروة، عن أبيها، عن جدها الزبير، قال: لما خلف رسول الله صلى الله عليه وسلم نساءه بالمدينة خلفهن في فارع، وفيهن صفية بنت عبد المطلب، وخلف فيهن حسان بن ثابت، وأقبل رجل من المشركين ليدخل عليهن، فقالت صفية لحسان: عندك الرجل، فجبن حسان وأبى عليه، فتناولت صفية السيف فضربت به المشرك حتى قتلته، فأخبر بذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم، فضرب لصفية بسهم كما كان يضرب للرجال. جعله من مسند الزبير، وابن زبالة متهم بالكذب، لا يفرح به.وأخرجه ابن هشام في "السيرة" 2/ 228، والطبري في "تاريخه" 2/ 577، والبيهقي في "الكبرى" 6/ 308، وفي "الدلائل" 3/ 442 - 443 - ومن طريقه ابن عساكر 12/ 431 - من طريق ابن إسحاق، حدثني يحيى بن عباد بن عبد الله بن الزبير، عن أبيه عباد قال. فذكر القصة بطولها. وهذا إسناد لا بأس به، وعباد بن عبد الله، تابعي فهو مرسل.
7040 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد [1] بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكير، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن صفيَّةَ بنتِ عبد المطلب - قال عُرْوة: وسمعتها تقول: أنا أول امرأة قتلت رجلًا - كنتُ في فارع حصن حسانَ بن ثابت، وكان حسانُ معنا في النساء والصبيان حين خندق النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم، قالت صفية: فمرَّ بنا رجلٌ من يهود، فجعل يُطيفُ بالحصن، فقلتُ لحسان: إنَّ هذا اليهودي بالحِصن كما تَرَى، ولا آمنه أن يدلّ على عورتنا، وقد شُغِلَ عَنَّا رسول الله صلى الله عليه وسلم وأصحابه، فقُمْ إليه فاقتله، فقال: يَغْفِرُ الله لكِ يا بنت عبد المطلب، والله لقد عرفتِ ما أنا بصاحب هذا، قالت صفيَّةُ: فلما قال ذلك ولم أرَ عنده شيئًا، احتجزتُ وأخذتُ عمودًا من الحصن، ثم نزلتُ من الحصن إليه، فضربته بالعمود حتى قتلته، ثم رجعتُ إلى الحصن، فقلتُ: يا حسان، انزل فاستَلِبْه، فإنه لم يمنعني أن أسلُبَه [2] إلَّا أنه رجلٌ، فقال: ما لي بسَلَبه من حاجةٍ [3].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه. ذكرُ أَرْوى بنتِ عبد المطلب عمة رسول الله صلى الله عليه وسلمولم أجد إسلامها إِلَّا في كتاب أبي عبد الله الواقدي [4].
সাফিয়্যাহ বিনত আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উরওয়াহ বলেন: আমি তাকে বলতে শুনেছি: আমিই প্রথম নারী, যে একজন পুরুষকে হত্যা করেছে। (তিনি বলেন) আমি ছিলাম হাসসান ইবনু সাবিতের ফার নামক দুর্গে। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন পরিখা খনন করেন (খন্দকের যুদ্ধ), তখন হাসসান আমাদের সাথে নারী ও শিশুদের মাঝে ছিলেন। সাফিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তখন আমাদের পাশ দিয়ে একজন ইহুদি পুরুষ যাচ্ছিল এবং সে দুর্গের চারপাশে ঘুরতে লাগল। আমি হাসসানকে বললাম: তুমি দেখছ যে এই ইহুদি দুর্গের আশেপাশে ঘুরছে। আমি নিরাপদ বোধ করছি না, সে হয়তো আমাদের দুর্বলতার স্থান সম্পর্কে শত্রুদের জানিয়ে দেবে। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর সাহাবীগণ তো আমাদের থেকে ব্যস্ত হয়ে আছেন। তুমি তার কাছে যাও এবং তাকে হত্যা করো। হাসসান বললেন: হে আব্দুল মুত্তালিবের কন্যা, আল্লাহ তোমাকে ক্ষমা করুন! আল্লাহর কসম, তুমি জানো যে আমি এ কাজের লোক নই। সাফিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যখন সে এই কথা বলল এবং আমি তার কাছে কোনো সাহস দেখলাম না, তখন আমি আমার কাপড় শক্ত করে বাঁধলাম এবং দুর্গ থেকে একটি খুঁটি নিলাম। তারপর আমি দুর্গ থেকে তার কাছে নেমে গেলাম এবং খুঁটি দিয়ে আঘাত করে তাকে হত্যা করলাম। এরপর আমি দুর্গে ফিরে এলাম এবং বললাম: হে হাসসান, তুমি নিচে নেমে যাও এবং তার পোশাক ও অস্ত্র খুলে নাও (তার যুদ্ধলব্ধ মালপত্র নিয়ে নাও)। তাকে খুলে নিতে আমাকে যা বাধা দিয়েছে, তা কেবল এই যে সে একজন পুরুষ। হাসসান বললেন: তার যুদ্ধলব্ধ জিনিসপত্রের আমার কোনো দরকার নেই।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في النسخ إلى: محمد.
[2] في (ز): أستلبه.
7040 [3] - حسن لغيره، ورجاله لا بأس بهم، لكن تصريح عروة وهو ابن الزبير - بسماعه من صفية وهم، ربما كان من يونس بن بكير، فيونس فيه كلام، وقد رواه غيره فلم يذكر التصريح بالسماع، وقال الذهبي في "التلخيص": عروة لم يدرك صفية، وقال في "السير" 2/ 271: توفيت صفية في سنة عشرين. قلنا: وعروة وُلد بعد بثلاث سنين أو أكثر.وأخرجه البيهقي في "السنن" 6/ 308، وفي "الدلائل" 3/ 443 عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد. وقرن بالحاكم في "الدلائل" أحمد بن الحسن القاضي، ولم يسق لفظه. وقال: وزاد فيه: هي أول امرأة قتلت رجلًا من المشركين.وأخرجه ابن سعد في الطبقات" 10/ 41 عن أبي أسامة حماد بن أسامة، والطبراني في "الكبير" 24/ (804) من طريق حماد بن سلمة، كلاهما عن هشام بن عروة، عن أبيه عروة مرسلًا. وإسناده صحيح إلى عروة.ورواه عارم محمد بن الفضل السدوسي - عند البخاري في "الكبير" 3/ 29 - عن حماد بن زيد عن هشام بن عروة معضلًا.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 12/ 432 من طريق الزبير بن بكار، عن علي بن صالح، عن عبد الله بن مصعب، عن أبيه قال: كان ابن الزبير حدث أنه كان في فارع أُطم حسان بن ثابت مع النساء يوم الخندق ومعهم عمر بن أبي سلمة، ثم ذكر نحوه وإسناده لين، وهو مرسل أيضًا، فمصعب - وهو ابن ثابت بن عبد الله بن الزبير - لم يدرك جده عبد الله.
7040 [4] - كذا قال المصنف، مع أنه أسند حديثًا برقم (5121) إسناده خير من إسناد الواقدي بإسلام أروى بنت عبد المطلب.
7041 - كما حدثناه محمد بن أحمد بن بُطَّة، حدثنا الحسن بن الجهم، حدثنا الحسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر، حدثني سلمة بن بُخْت، عن عميرة [1] بنت عبيد الله بن كعب عن أمِّ درَّة [2]، عن بَرَّةَ بنتِ أبي تجراة قالت: كانت قريش لا تُنكِرُ صلاةَ الضُّحى، إنما تُنكر الوقت، وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا جاء وقت العصر تفرّقوا إلى الشِّعاب، فصلوا فُرادَى، ومَثْنى، فبينا [3] طليب بن عُمير وحاطب بن عبد شمس يُصلُّون بشعب أجياد، بعضُهم ينظرُ إلى بعض، إذ هَجَمَ عليهم ابن الأصداء وابنُ الغَيْطَلة [4]، وكانا فاحشَينِ، فرموهم بالحجارة ساعةً حتى خرجا، وانصرفا وهما يشتدَّان، وأتيا أبا جهل وأبا لهب وعُقبة بن أبي معيط، فذاكروهم الخبرَ، فتَلَطَّفوا [5] لهم في الصُّبح، وكانوا يَخرُجونَ في غَلَس الصُّبح فيتوضؤون ويصلون، فبينما هم في شعب إذ هَجَمَ عليهم أبو جهل وعقبة وأبو لهب وعِدَّةٌ من سفهائهم، فبَطَشوا بهم، فنالوا منهم، وأظهر أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم الإسلام وتكلموا به وبادَوْهم، وذبُّوا عن أنفسهم، وتعمَّد طليب بن عُمير إلى أبي جهل فضربه شجَّة، فأخذوه وأوثقوه، فقام دونه أبو لهب حتى خَلَّاه، وكان ابن أخته، فقيل لأروى بنتِ عبد المطلب: ألا ترين إلى ابنك طليب قد اتَّبع محمدًا وصار غَرَضًا له؟! وكانت أروى قد أسلمت، فقالت: خيرُ أيامٍ طُليب يومُ يَذُبُّ عن ابن خاله وقد جاء بالحقِّ من عند الله تعالى، فقالوا: وقد اتبعتِ محمدًا؟ قالت: نعم، فخرج بعضهم إلى أبي لهب فأخبره، فأقبل حتى دخل عليها، فقال: عجبًا لكِ ولا تباعك محمدًا وتَركِك دين عبد المطلب! قالت: قد كان ذلك، فقُمْ دونَ ابن أخيك فاعضُده وامنعه، فإن ظهر أمره فأنت بالخيار، إن شئتَ أن تدخُل معه أو تكون على دينك، وإن لم يكن كنت قد أعذرت ابن أخيك، قال: ولنا طاقةٌ بالعرب قاطبةً؟ ثم يقولون: جاء بدينٍ محدث، قال: ثم انصرف أبو لهب [6]. ذكر أم هانئ فاختةَ بنتِ أبي طالب بن عبد المطلبابنة عم رسول الله صلى الله عليه وسلم وأُختِ عليٍّ، صلوات الله على محمد وآله.
বার্রাহ বিনত আবী তাজরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
কুরাইশরা চাশতের (দুহার) সালাতকে অস্বীকার করত না, বরং তারা কেবল সময় নিয়ে আপত্তি করত। আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সময়ে যখন আসরের ওয়াক্ত আসতো, তখন সাহাবীগণ উপত্যকাগুলোতে ছড়িয়ে যেতেন এবং একা একা বা দু’জন দু’জন করে সালাত আদায় করতেন। একবার তুলাইব ইবনু উমায়র এবং হাতেব ইবনু আব্দ শামস আজিয়াদ উপত্যকায় সালাত আদায় করছিলেন, আর তাঁরা একে অপরের প্রতি লক্ষ্য রাখছিলেন, এমন সময় তাদের উপর ইবনু আসদা ও ইবনু গাইতলা আক্রমণ করে বসল। তারা উভয়েই ছিল অশ্লীলভাষী। তারা তাঁদেরকে পাথর ছুঁড়ে মারতে শুরু করল যতক্ষণ না তারা সেখান থেকে বেরিয়ে এলেন। তারা উভয়ে (আক্রমণকারীরা) দ্রুত দৌড়ে চলে গেল।
তারা আবূ জাহল, আবূ লাহাব ও উক্ববা ইবনু আবী মুয়াইত্ব-এর নিকট এসে ঘটনাটি তাদের স্মরণ করিয়ে দিল। অতঃপর তারা (কুরাইশরা) ফজরের সালাতে তাদের উপর প্রতিশোধ নেওয়ার ফন্দি আঁটল। (সাহাবীগণ) রাতের শেষভাগে ফজরের অন্ধকারে বের হতেন, ওযু করতেন এবং সালাত আদায় করতেন।
তাঁরা যখন উপত্যকায় ছিলেন, তখন আবূ জাহল, উক্ববা, আবূ লাহাব এবং তাদের বেশ কিছু নির্বোধ ব্যক্তি তাদের উপর আক্রমণ করল। তারা তাঁদেরকে ধরে প্রহার করল এবং তাদের ক্ষতিসাধন করল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাহাবীগণ তখন প্রকাশ্যে ইসলাম ঘোষণা করলেন এবং ইসলাম নিয়ে কথা বললেন, এবং তাদের প্রতিহত করলেন ও নিজেদেরকে রক্ষা করলেন।
আর তুলাইব ইবনু উমায়র উদ্দেশ্যমূলকভাবে আবূ জাহলের দিকে এগিয়ে গেলেন এবং তাকে আঘাত করে ক্ষতবিক্ষত করে দিলেন। অতঃপর তারা তুলাইবকে ধরে বেঁধে ফেলল। তখন আবূ লাহাব তার পক্ষ হয়ে দাঁড়াল যতক্ষণ না তাকে মুক্ত করে দেওয়া হলো, কারণ তুলাইব ছিল তার ভাগিনা (বোনের ছেলে)।
অতঃপর আরওয়া বিনত আব্দুল মুত্তালিবকে বলা হলো: তুমি কি দেখছো না তোমার ছেলে তুলাইব মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে অনুসরণ করেছে এবং এখন সে (শত্রুদের) লক্ষ্যবস্তুতে পরিণত হয়েছে?! আরওয়া ইসলাম গ্রহণ করেছিলেন। তিনি বললেন: তুলাইবের জীবনের শ্রেষ্ঠ দিন হলো সেই দিন, যেদিন সে তার খালাতো ভাইয়ের পক্ষ সমর্থন করে, আর তিনি আল্লাহর পক্ষ থেকে সত্য নিয়ে এসেছেন। তারা বলল: তুমিও কি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে অনুসরণ করেছো? তিনি বললেন: হ্যাঁ। অতঃপর তাদের কেউ কেউ আবূ লাহাবের নিকট গিয়ে তাকে খবর দিল।
সে (আবূ লাহাব) ফিরে এসে তার (আরওয়ার) নিকট প্রবেশ করল এবং বলল: তোমার জন্য বিস্ময়! তুমি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অনুসরণ করছো আর আব্দুল মুত্তালিবের ধর্ম ত্যাগ করছো! আরওয়া বললেন: হ্যাঁ, এমনটাই ঘটেছে। তুমি তোমার ভাতিজার (মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর) পক্ষ হয়ে দাঁড়াও, তাকে সাহায্য করো এবং তাকে রক্ষা করো। যদি তার ব্যাপারটা প্রকাশ পায় (অর্থাৎ তিনি জয়ী হন), তবে তোমার এখতিয়ার থাকবে—তুমি চাইলে তার সাথে যোগ দিতে পারো অথবা তোমার ধর্মে থাকতে পারো। আর যদি তা না হয়, তবে তুমি তোমার ভালােবাসার কারণে (তাকে সাহায্যের চেষ্টা করে) দায়িত্বমুক্ত থাকবে। আবূ লাহাব বলল: আমাদের কি এমন শক্তি আছে যে আমরা সমস্ত আরব জাতির বিরুদ্ধে লড়তে পারি? অতঃপর তারা বলবে, সে (মুহাম্মাদ) একটি নতুন ধর্ম নিয়ে এসেছে। বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর আবূ লাহাব চলে গেল।
(আলোচনাটি) উম্মে হানী ফখিতা বিনত আবী তালিব ইবনু আব্দুল মুত্তালিবের আলোচনা—যিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের চাচাতো বোন এবং আলীর বোন। (আল্লাহর সালাত ও সালাম বর্ষিত হোক মুহাম্মাদ ও তাঁর বংশধরদের উপর।)
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرّفت في النسخ الخطية إلى: عنترة، والتصويب من ترجمة أبيها في "طبقات بن سعد" 7/ 268، وقد روى لها ابن سعد في كتابه بضع روايات.
[2] كتبت في النسخ مهملة من غير نقط، وكذا في المطبوع من "طبقات ابن سعد". وفي هذه الطبقة: أم ذرة (بالذال المعجمة) وهي المدنية مولاة عائشة، وهي لا بأس بها، روى عنها ثلاثة، ووثقها العجلي في "الثقات"، وذكرها ابن حبان في "الثقات"، ولها ترجمة في "التهذيب"، فإن لم تكن هي فلم نعرفها.
7041 [3] - تحرف في النسخ إلى: فمشى والتصويب من "أنساب الأشراف" للبلاذري 1/ 117.
7041 [4] - تحرف في النسخ إلى: الأصيدي وابن القبطية، والتصويب من "أنساب البلاذري"، وانظر "سيرة ابن هشام" 1/ 416، و"طبقات ابن سعد" 1/ 170 و 179، و"نسب قريش" لمصعب الزبيري ص 401.
7041 [5] - اضطربت نسخنا الخطية في كتابتها، والمثبت من النسخة المحمودية كما في طبعة الميمان، وهو الأقرب للصواب إن شاء الله؛ وجاء في "أساس البلاغة" للزمخشري 2/ 169: تلطَّفتُ بفلان: احتلت له حتى اطلعت على أسراره، ومنه: {وَلْيَتَلَطَّفْ وَلَا يُشْعِرَنَّ بِكُمْ أَحَدًا}.
7041 [6] - إسناده ضعيف، عميرة بنت عبيد الله لم نقف لها على ترجمة، وقد روى ابن سعد من طريقها في "الطبقات" روايات تزيد عن الخمس عشرة. وأم ذرة تقدم الكلام عليها في الهامش السابق. وبرة بنت أبي تجراة لها رواية عن النَّبيِّ صلى الله عليه وسلم، لذلك ذكرها ابن سعد وابن حبان وأبو نعيم وغيرهم في الصحابة، وكذا المصنف فيما سيأتي برقم (7119). وسيتكرر هذا الخبر برقم (7053).وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 43 - ومن طريقه البلاذري في "أنساب الأشراف" 1/ 117، وابن عساكر في "تاريخه" 25/ 144 - 145 - عن محمد بن عمر الواقدي، بهذا الإسناد. وقرن البلاذري بابن سعد الوليد بن صالح. الأشهر في اسمها فاختة، وقد أشار إلى ذلك الحافظ ابن حجر في "الإصابة" 8/ 317.
7042 - أخبرني محمد بن المؤمل بن الحسن، حدثنا الفضل بن محمد، حدثنا أحمد بن حنبل قال: أم هانئ بنت أبي طالب اسمها: هند، وأمها فاطمة بنت أسد بن هاشم.هكذا ذكر الإمام أبو عبد الله رضي الله عنه اسم أم هانئ، وقد تواترت الأخبار بأنَّ اسمها فاختةُ [1].
আহমদ ইবনে হাম্বল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উম্মে হানি বিনতে আবী তালিবের নাম হলো হিন্দ, এবং তাঁর মাতা হলেন ফাতিমা বিনতে আসাদ ইবনে হাশিম। এভাবেই ইমাম আবূ আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উম্মে হানির নাম উল্লেখ করেছেন। কিন্তু অসংখ্য (মুতাওয়াতির) বর্ণনায় এসেছে যে, তাঁর নাম হলো ফাখিতা।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] علق الذهبي في "التلخيص" على المصنف، فقال: أين التواتر؟! قلنا: الأنسب أن يقال: إنَّ الأشهر في اسمها فاختة، وقد أشار إلى ذلك الحافظ ابن حجر في "الإصابة" 8/ 317.
7043 - أخبرناه أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا ابن أبي ذئب (ح)وأخبرنا الحسن بن يعقوب العدل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا أبو داود الطيالسي، حدثنا ابن أبي ذئب، عن سعيد المقبري، عن أبي مُرَّة، عن فاختة - وهي أم هانيءٍ - ابنة أبي طالب، قالت: رأيت النَّبيَّ صلى الله عليه وسلم قد صلَّى يوم الفتح في ثوب واحدٍ قد خالف بين طَرَفيهِ ثمانِ رَكَعات [1].وقد روى عنها عبد الله بن جعفر بن أبي طالب:
উম্মে হানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মক্কা বিজয়ের দিন একটি মাত্র কাপড়ে আট রাকাত সালাত আদায় করতে দেখেছি, যার দুই প্রান্ত তিনি পরস্পর বিপরীত দিকে করে রেখেছিলেন। আর তাঁর (উম্মে হানির) থেকে আবদুল্লাহ ইবনু জা'ফর ইবনু আবী তালিবও বর্ণনা করেছেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده صحيح ابن أبي ذئب: هو محمد بن عبد الرحمن بن المغيرة، وأبو مرة: اسمه يزيد، واختلف في ولائه، فقيل: مولى عقيل بن أبي طالب، وقيل: مولى أم هانئ.وأخرجه أحمد 44 / (26892) عن زيد بن الحباب، عن ابن أبي ذئب، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (8631) من طريق خالد بن الحارث، عن ابن أبي ذئب، به مطولًا.وأخرجه مطولًا ومختصرًا أحمد 44/ (26896) و (26903) و (26907) و (26908) و 45 / (27379) و (27388) و (27392)، والبخاري (357) و (3171) و (6158)، ومسلم (336) (71) و (719) و (82) و (83)، وابن ماجه (465)، والنسائي (244)، وابن حبان (1188) و (2537) من طرق عن أبي مرة به.وأخرجه أحمد 44 / (26900) و (26904)، والبخاري (1103) و (1176) و (4292)، ومسلم (719) (80)، وأبو داود (1291)، والترمذي (474)، والنسائي (490) من طريق عبد الرحمن بن أبي ليلى وبنحوه أحمد 44/ (26898) من طريق باذام أبي صالح، كلاهما عن أم هانئ.وأخرجه أبو داود (1290)، وابن ماجه (1323) من طريق كريب مولى ابن عبّاس، عن أم هانيء: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم الفتح صلَّى سبحة الضحى ثماني ركعات، ثم سلّم من كل ركعتين. وسنده لين.وانظر "مسند أحمد" 44 / (26887).وانظر ما بعده، وما سيأتي برقم (7047).
7044 - أخبرنا عَبْدانُ بن يزيد الدقاق بهَمَذَان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا محمد بن إسماعيل الجعفري، حدثنا عبد الله بن سلمة بن أسلم، عن أبيه، عن عبد الله بن جعفر بن أبي طالب قال: سمعتُ أم هانئ فاختة بنت أبي طالب تقول: رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم صلى عام الفتح ملتحفًا في ثوبٍ واحدٍ ثمان ركعات [1].
উম্মে হানী ফখিতা বিনতে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মক্কা বিজয়ের বছর একটি মাত্র কাপড়ে আবৃত (বা চাদর পরিহিত) অবস্থায় আট রাকাত সালাত আদায় করতে দেখেছি।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف عبد الله بن سلمة ضعفه الدَّارَقُطْنيّ، وقال أبو نعيم: متروك، كما في "اللسان" لابن حجر 4/ 488، وقال العقيلي في "الضعفاء" 3/ 236: منكر الحديث. وصنع له الحافظ في "اللسان" ترجمتين برقمي (4261) و (4262)، فوهم، وإنما هما واحد. وأبوه مجهول، ذكره الخطيب في "تلخيص المتشابه في الرسم" 1/ 89، فقال: سلمة بن أسلم الربعي، وقيل: الجهني، مدني، حدَّث عن أنس بن مالك ومعاوية بن حديج، روى عنه ابنه عبد الله.ولم نقف على الخبر عند غير المصنف من هذا الطريق. وانظر ما قبله.
7045 - حدثنا أبو عبد الله الأصبهاني، حدثنا الحسن بن الجهم، حدثنا الحسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر قال: وفيما ذُكر: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم خَطَب إلى عمه أبي طالب أم هانئ قبل أن يُوحَى إليه، وخطبها معه هبيرة بن أبي وهب، فزوجها هبيرة، فقال له النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم: "يا عمِّ، زوجت هبيرة وتركتني؟! " فقال: يا ابن أخي، أنا صاهرت إليهم، والكريمُ يُكافئ الكريم، ثم أسلمَتْ ففَرَّق الإسلام بينها وبين هبيرة، فخطبها رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى نفسها، فقالت: والله إن كنتُ لأحبك في الجاهلية، فكيف في الإسلام؟! [1]
উম্মে হানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম নবুয়্যত প্রাপ্তির পূর্বে তাঁর চাচা আবু তালিবের নিকট উম্মে হানীকে (বিবাহের জন্য) প্রস্তাব দিয়েছিলেন। তাঁর সাথে হুবাইরা ইবনে আবি ওয়াহাবও উম্মে হানীকে প্রস্তাব দিয়েছিলেন। অতঃপর আবু তালিব হুবাইরার সাথে তাঁকে বিবাহ দেন। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁকে (আবু তালিবকে) বললেন: "হে চাচা, আপনি হুবাইরার সাথে বিয়ে দিলেন, আর আমাকে ছেড়ে দিলেন?!" তিনি বললেন: "হে আমার ভ্রাতুষ্পুত্র, আমি তাদের সাথে আত্মীয়তার সম্পর্ক স্থাপন করেছি। আর সম্মানিত ব্যক্তি সম্মানিত ব্যক্তিরই প্রতিদান দেয়।" অতঃপর তিনি (উম্মে হানী) ইসলাম গ্রহণ করলেন এবং ইসলাম তাঁর ও হুবাইরার মধ্যে বিচ্ছেদ ঘটালো। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর (উম্মে হানী) নিকট পুনরায় বিবাহের প্রস্তাব দিলেন। তিনি বললেন: "আল্লাহর কসম, আমি তো জাহেলিয়াতের যুগেও আপনাকে ভালোবাসতাম, তাহলে ইসলামের যুগে কেমন করে (না বাসতে পারি)!"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] أسند هذا الخبر هشام بن محمد بن السائب الكلبي - كما في "طبقات ابن سعد" 10/ 146 - عن أبيه، عن أبي صالح، عن ابن عباس، وزاد في آخره قالت: ولكني امرأة مُصبَية، وأكره أن يؤذوك، فقال رسول الله: "خير نساء ركبن المطايا نساء قريش، أحناه على ولد في صغره، وأرعاه على زوج في ذاتِ يده" وهشام الكلبي وأبوه متهمان، فلا يفرح بهما.وانظر ما بعده.
7046 - أخبرنا أبو العباس المحبوبي، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا عبيد الله بن موسى، عن إسرائيل، عن السُّدِّي [1]، عن أبي صالح، عن أم هانئ قالت: خطبني رسول الله صلى الله عليه وسلم فاعتذرتُ إليه فَعَذَرَني، ثم أنزل الله عز وجل: {يَاأَيُّهَا النَّبِيُّ إِنَّا أَحْلَلْنَا لَكَ أَزْوَاجَكَ اللَّاتِي آتَيْتَ أُجُورَهُنَّ} إلى قوله: {اللَّاتِي هَاجَرْنَ مَعَكَ} [الأحزاب: 50]، قالت: فلم أَحِلَّ له؛ لم أهاجر معه، كنتُ من الطلقاء [2].
উম্মে হানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বিবাহের প্রস্তাব দিলেন। আমি তাঁর নিকট ওযর পেশ করলাম এবং তিনি আমার ওযর কবুল করলেন। অতঃপর আল্লাহ আযযা ওয়া জাল এই আয়াত নাযিল করলেন: "হে নবী! আমি আপনার জন্য বৈধ করেছি আপনার স্ত্রীগণকে, যাদের আপনি মোহর প্রদান করেছেন..." থেকে শুরু করে "...যারা আপনার সঙ্গে হিজরত করেছে" পর্যন্ত (সূরা আহযাব: ৫০)। তিনি (উম্মে হানী) বললেন, (এই আয়াতের কারণে) আমি তাঁর জন্য বৈধ হলাম না, কারণ আমি তাঁর সাথে হিজরত করিনি। আমি ছিলাম ‘তুলাকা’দের (মক্কা বিজয়ের পর মুক্তিপ্রাপ্তদের) অন্তর্ভুক্ত।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: الشعبي، والتصويب من مكرريه السالفين برقمي (2789) و (3616).
[2] إسناده ضعيف من أجل أبي صالح، وسلف الكلام عليه عند مكرره المذكور. ورواه عبد الكريم بن أبي المخارق - وهو ضعيف - واختلف عليه:فرواه عنه علي بن عبد الله بن راشد عند البخاري في "التاريخ" 1/ 418، قال: حدثني أيوب بن أبي صفوان مولى عبد الله بن الحارث: أنَّ ابن عباس كان لا يُصلّي الضحى. قال البخاري: لم يذكر في أوله عبد الله بن الحارث، وقال في آخره: قال عبد الله: فصلاهن بعد ابن عباس.ورواه سفيان بن عيينة عند الحميدي (335)، والبخاري في "التاريخ" 1/ 418، عن عبد الكريم بن أبي المخارق، عن عبد الله بن الحارث، به. ليس فيه أيوب بن صفوان.وأخرجه الطبري 23/ 137 من طريق مسعر بن كدام، عن عبد الكريم بن أبي المخارق، عن موسى بن أبي كثير، عن ابن عبّاس: أنه بلغه أنَّ أم هانئ ذكرت أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم فتح مكة صلَّى الضحى ثمان ركعات، فقال ابن عباس: قد ظننت أنَّ لهذه الساعة صلاة، يقول الله: {يُسَبِّحْنَ بِالْعَشِيِّ وَالْإِشْرَاقِ}.وأخرج إسحاق بن راهويه في "مسنده" (2116) من طريق يزيد بن أبي زياد، عن عبد الله بن الحارث قال: سألت عن صلاة الضحى في إمارة عثمان وأصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم متوافرون، فلم أجد أحدًا يخبرني إلَّا أم هانئ بنت أبي طالب، فإنها أخبرتني أنَّ رسول الله صلى الله عليه دخل عليها فصلَّى ثمان ركعات. قال: وقال ابن عباس: كنت أتي على هذه الآية: {يُسَبِّحْنَ بِالْعَشِيِّ وَالْإِشْرَاقِ}، فأقول: أي شيء الإشراق؟ فهذه صلاة الإشراق. ويزيد بن أبي زياد حسن في المتابعات والشواهد، ولا سيما أن عبد الله الحارث مولاه. وهو عند أحمد 44/ (26901) و 45/ (27391)، وابن ماجه (1379) من هذا الطريق، لكن ليس فيه قصة ابن عباس.وأخرج الطبراني في "الكبير" 24/ (986)، وفي "الأوسط" (4246) من طريق حجاج بن نصير، عن أبي بكر الهذلي - واسمه سلمى - عن عطاء، عن ابن عبّاس، قال: كنت أمر بهذه الآية فما أدري ما هي؟ قوله: {بِالْعَشِيِّ وَالْإِشْرَاقِ} حتى حدثتني أم هانئ بنت أبي طالب: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل عليها، فدعا بوضوء في جفنة، فكأني أنظر إلى أثر العجين فيها، فتوضأ، ثم قام فصلى الضحى، فقال: "يا أم هانئ هذه صلاة الإشراق". فجعل الاستشهاد بالآية مرفوعًا إلى النَّبيّ صلى الله عليه وسلم. قال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن عطاء عن ابن عباس إلَّا أبو بكر الهذلي، تفرد به حجاج بن نصير، قلنا: وإسناده ضعيف جدًّا، حجاج ضعيف، وشيخه أبو بكر الهذلي متروك.وأخرج أحمد بن منيع في "مسنده" كما في "المطالب العالية" (3694) - ومن طريقه ابن شاهين في "الترغيب في فضائل الأعمال" (130) - عن أبي أحمد الزبيري، عن حنظلة بن عبد الحميد، عن الضحاك بن قيس، عن ابن عبّاس قال: لقد أتى علينا زمان ما ندري ما وجهُ هذه الآية: {يُسَبِّحْنَ بِالْعَشِيِّ وَالْإِشْرَاقِ} حتى رأينا الناس يصلون الضحى. وحنظلة بن عبد الحميد - ويقال: حنظلة بن عبد الرحمن القاص - نسبه ابن معين إلى الضعف والضحاك مجهول الحال.ويخالف خبر ابن عبّاس هذا ما رواه عبد الرزاق (4871) عن ابن ابن جريج قال: أخبرني سليمان الأحول، أنه سمع عطاء الخراساني يقول لطاووس: إنَّ ابن عباس يقول: صلاة الضحى في القرآن، ولكن لا يغوص عليها إلا غائص، ثم قرأ: {يُسَبِّحْنَ بِالْعَشِيِّ وَالْإِشْرَاقِ}، قال طاووس: والله ما صلاها ابن عباس حتى مات إلَّا أن يطوف بالبيت وإسناده صحيح.وأما خبر أم هانئ بأنَّ النَّبيّ صلى الله عليه وسلم صلى في بيتها ثمان ركعات، فقد أخرجه أحمد 44/ (26899)، ومسلم (719) (81)، والنسائي (487) و (488)، وابن حبان (1187) و (2538) من طريقين عن ابن شهاب قال: حدثني عبد الله بن عبد الله بن الحارث، عن عبد الله بن الحارث، عن أم هانئ.وقال الترمذي: حسن صحيح.وأخرجه أحمد 44 / (26889) من طريق معمر، عن الزهري، عن عن عبد الله بن الحارث، عن أم هانئ. فأسقط منه الواسطة بين الزهري وعبد الله بن الحارث.وأخرجه ابن ماجه (614)، والنسائي (486) من طريق الليث بن سعد، عن الزهري، عن عبد الله بن عبد الله بن الحارث بن نوفل، عن أم هانئ. فأسقط منه عبد الله بن الحارث.وله طرق أخرى عن أم هانئ تقدم تخريجها في الروايتين السالفتين برقمي (7043) و (7044).
7047 - حدَّثَناه أبو العبّاس محمد بن يعقوب وأبو الفضل بن يعقوب العَدْل، قالا: حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا عبد الوهاب بن عطاء، أخبرنا سعيد بن أبي عروبة، عن أيوب بن صفوان، عن عبد الله بن الحارث: أنَّ ابن عبّاس كان لا يُصلِّي الضُّحى حتى أدخلناه على أمِّ هانئ، فقلتُ لها: أخبري ابن عباس بما أخبرتينا به، فقالت أم هانئ: دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم في بيتي، فصلى صلاةَ الضُّحى ثمان ركعات، فخرج ابن عبّاس وهو يقول: لقد قرأتُ ما بين اللوحين، فما عرفتُ صلاة الإشراق إِلَّا الساعةَ: {يُسَبِّحْنَ بِالْعَشِيِّ وَالْإِشْرَاقِ} [ص: 18]، ثم قال ابن عباس: هذه صلاة الإشراق [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . وقد روى عبد الله بن عباس عن أم هانئ حديثًا آخر:
উম্মে হানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবদুল্লাহ ইবনুল হারিস থেকে বর্ণিত যে, ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যুহার (চাশতের) সালাত আদায় করতেন না, যতক্ষণ না আমরা তাঁকে উম্মে হানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে নিয়ে যাই। আমি তাঁকে (উম্মে হানিকে) বললাম: আপনি ইবনু আব্বাসকে সেই বিষয়ে অবহিত করুন যা আমাদের অবহিত করেছিলেন। তখন উম্মে হানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমার ঘরে প্রবেশ করলেন এবং আট রাক'আত চাশতের সালাত আদায় করলেন। এরপর ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই বলে বের হলেন: আমি তো দুই মলাটের মধ্যের (সম্পূর্ণ কুরআন) পড়েছি, কিন্তু এই মুহূর্তের আগে ইশরাকের সালাত সম্পর্কে অবগত ছিলাম না। [তারপর তিনি তিলাওয়াত করলেন:] "সন্ধ্যায় ও প্রভাতে তারা তাঁর পবিত্রতা ও মহিমা ঘোষণা করে।" (সূরা সাদ, ৩৮:১৮)। অতঃপর ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এটাই হলো ইশরাকের সালাত।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] قصه صلاته صلى الله عليه وسلم الضُّحى ثمان ركعات صحيحة، وهذا إسناد ضعيف، أيوب بن صفوان ويقال: ابن أبي صفوان مجهول، وذكره البخاري في "تاريخه" 1/ 418، وابن أبي حاتم 2/ 250، وسكتا عنه، وذكره ابن حبان في "ثقاته" 5/ 55، وقد اختلف عليه في هذا الحديث كما ذكر البخاري في "تاريخه".فرواه عبد الوهاب بن عطاء - كما في هذه الرواية - عن سعيد بن أبي عروبة، عن أيوب بن صفوان، عن عبد الله بن الحارث، عن أم هانئ.وخالفه عبد الأعلى بن عبد الأعلى عند البخاري في "التاريخ" 1/ 418، والطبري في "التفسير" 23/ 137، فرواه عن سعيد بن أبي عروبة، عن متوكل، عن أيوب بن صفوان، عن عبد الله بن الحارث، عن أم هانئ. فذكر بين سعيد وأيوب: متوكلًا.ورواه صدقة بن عبد الله عند الطبري 23/ 137، عن سعيد بن أبي عروبة، عن أبي المتوكل، عن أيوب بن صفوان، عن عبد الله بن الحارث بن نوفل، عن أم هانئ. فسماه أبا المتوكل، ومتوكل هذا أو أبو المتوكل لم نعرفه، وربما كان الوهم من سعيد بن أبي عروبة، فإنه كان قد اختلط، والله أعلم. ورواه عبد الكريم بن أبي المخارق - وهو ضعيف - واختلف عليه:فرواه عنه علي بن عبد الله بن راشد عند البخاري في "التاريخ" 1/ 418، قال: حدثني أيوب بن أبي صفوان مولى عبد الله بن الحارث: أنَّ ابن عباس كان لا يُصلّي الضحى. قال البخاري: لم يذكر في أوله عبد الله بن الحارث، وقال في آخره: قال عبد الله: فصلاهن بعد ابن عباس.ورواه سفيان بن عيينة عند الحميدي (335)، والبخاري في "التاريخ" 1/ 418، عن عبد الكريم بن أبي المخارق، عن عبد الله بن الحارث، به. ليس فيه أيوب بن صفوان.وأخرجه الطبري 23/ 137 من طريق مسعر بن كدام، عن عبد الكريم بن أبي المخارق، عن موسى بن أبي كثير، عن ابن عبّاس: أنه بلغه أنَّ أم هانئ ذكرت أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم فتح مكة صلَّى الضحى ثمان ركعات، فقال ابن عباس: قد ظننت أنَّ لهذه الساعة صلاة، يقول الله: {يُسَبِّحْنَ بِالْعَشِيِّ وَالْإِشْرَاقِ}.وأخرج إسحاق بن راهويه في "مسنده" (2116) من طريق يزيد بن أبي زياد، عن عبد الله بن الحارث قال: سألت عن صلاة الضحى في إمارة عثمان وأصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم متوافرون، فلم أجد أحدًا يخبرني إلَّا أم هانئ بنت أبي طالب، فإنها أخبرتني أنَّ رسول الله صلى الله عليه دخل عليها فصلَّى ثمان ركعات. قال: وقال ابن عباس: كنت أتي على هذه الآية: {يُسَبِّحْنَ بِالْعَشِيِّ وَالْإِشْرَاقِ}، فأقول: أي شيء الإشراق؟ فهذه صلاة الإشراق. ويزيد بن أبي زياد حسن في المتابعات والشواهد، ولا سيما أن عبد الله الحارث مولاه. وهو عند أحمد 44/ (26901) و 45/ (27391)، وابن ماجه (1379) من هذا الطريق، لكن ليس فيه قصة ابن عباس.وأخرج الطبراني في "الكبير" 24/ (986)، وفي "الأوسط" (4246) من طريق حجاج بن نصير، عن أبي بكر الهذلي - واسمه سلمى - عن عطاء، عن ابن عبّاس، قال: كنت أمر بهذه الآية فما أدري ما هي؟ قوله: {بِالْعَشِيِّ وَالْإِشْرَاقِ} حتى حدثتني أم هانئ بنت أبي طالب: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل عليها، فدعا بوضوء في جفنة، فكأني أنظر إلى أثر العجين فيها، فتوضأ، ثم قام فصلى الضحى، فقال: "يا أم هانئ هذه صلاة الإشراق". فجعل الاستشهاد بالآية مرفوعًا إلى النَّبيّ صلى الله عليه وسلم. قال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن عطاء عن ابن عباس إلَّا أبو بكر الهذلي، تفرد به حجاج بن نصير، قلنا: وإسناده ضعيف جدًّا، حجاج ضعيف، وشيخه أبو بكر الهذلي متروك.وأخرج أحمد بن منيع في "مسنده" كما في "المطالب العالية" (3694) - ومن طريقه ابن شاهين في "الترغيب في فضائل الأعمال" (130) - عن أبي أحمد الزبيري، عن حنظلة بن عبد الحميد، عن الضحاك بن قيس، عن ابن عبّاس قال: لقد أتى علينا زمان ما ندري ما وجهُ هذه الآية: {يُسَبِّحْنَ بِالْعَشِيِّ وَالْإِشْرَاقِ} حتى رأينا الناس يصلون الضحى. وحنظلة بن عبد الحميد - ويقال: حنظلة بن عبد الرحمن القاص - نسبه ابن معين إلى الضعف والضحاك مجهول الحال.ويخالف خبر ابن عبّاس هذا ما رواه عبد الرزاق (4871) عن ابن ابن جريج قال: أخبرني سليمان الأحول، أنه سمع عطاء الخراساني يقول لطاووس: إنَّ ابن عباس يقول: صلاة الضحى في القرآن، ولكن لا يغوص عليها إلا غائص، ثم قرأ: {يُسَبِّحْنَ بِالْعَشِيِّ وَالْإِشْرَاقِ}، قال طاووس: والله ما صلاها ابن عباس حتى مات إلَّا أن يطوف بالبيت وإسناده صحيح.وأما خبر أم هانئ بأنَّ النَّبيّ صلى الله عليه وسلم صلى في بيتها ثمان ركعات، فقد أخرجه أحمد 44/ (26899)، ومسلم (719) (81)، والنسائي (487) و (488)، وابن حبان (1187) و (2538) من طريقين عن ابن شهاب قال: حدثني عبد الله بن عبد الله بن الحارث، عن عبد الله بن الحارث، عن أم هانئ.وقال الترمذي: حسن صحيح.وأخرجه أحمد 44 / (26889) من طريق معمر، عن الزهري، عن عن عبد الله بن الحارث، عن أم هانئ. فأسقط منه الواسطة بين الزهري وعبد الله بن الحارث.وأخرجه ابن ماجه (614)، والنسائي (486) من طريق الليث بن سعد، عن الزهري، عن عبد الله بن عبد الله بن الحارث بن نوفل، عن أم هانئ. فأسقط منه عبد الله بن الحارث.وله طرق أخرى عن أم هانئ تقدم تخريجها في الروايتين السالفتين برقمي (7043) و (7044).
7048 - حدَّثَناه أبو العبّاس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، أخبرني عياض بن عبد الله، عن مَخْرَمة بن سليمان، عن كريب مولي ابن عباس، عن عبد الله بن عبّاس، أنَّ أم هانئ بنت أبي طالب حدثته، أنها قالت: يا رسول الله، يزعُمُ ابن أمِّي عليٌّ أنه قاتلٌ مَن أجَرتُ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "قد أجرنا من أجرت" [1]. حديث ثالث لعبد الله بن عباس عن أم هانئ:
উম্মে হানী বিনতে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমার মায়ের ছেলে আলী মনে করেন যে, আমি যাকে আশ্রয় দিয়েছি, তিনি তাকে হত্যা করবেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তুমি যাকে আশ্রয় দিয়েছ, আমরাও তাকে আশ্রয় দিলাম।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد، عياض بن عبد الله - وهو ابن عبد الرحمن الفهري - حسن الحديث في المتابعات والشواهد، وقد توبع.وأخرجه أبو داود (2763)، والنسائى (6832) من طرق عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد.وأخرجه مطولًا أحمد 44 / (26892)، والبخاري (357) و (3171) و (6158)، ومسلم (719) (82)، والنسائي (8631)، وابن حبان (1188) و (2537) من طريق أبي مرة، عن أم هانئ.
7049 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا العباس بن محمد الدوري، حدثنا الحسن بن بشر الهَمْداني، حدثنا سَعْدان بن الوليد بيَّاع السَّابِري، عن عطاء، عن ابن عباس، عن أم هانئ بنت أبي طالب قالت: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم: "هل عندكِ طعامٌ آكلُه؟ " وكان جائعًا، فقلتُ: إنَّ عندي لكسرًا يابسةً، وإِنِّي لأستحيي أن أُقرِّبَها إليك، فقال: "هلُمِّيها"، فكسرتها ونشرت عليها الملح، فقال: "هل من إدام؟ " فقلتُ: يا رسول الله، ما عندي إلا شيءٌ من خَلٍّ، قال: "هلُمِّيه"، فلما جئته به صبه على طعامه فأكل منه، ثم حَمِدَ الله تعالى، ثم قال: "نِعمَ الإدام الخلُّ يا أم هانئ، لا يُقفِرُ بيتٌ فيه خل" [1]. وقد روى عبد الله بن عمر بن الخطاب عن أمِّ هانئ:
উম্মে হানি বিনতে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন, "তোমার কাছে কি এমন কোনো খাবার আছে যা আমি খেতে পারি?" তিনি ক্ষুধার্ত ছিলেন। আমি বললাম, "আমার কাছে কিছু শুকনো রুটির টুকরা আছে, আর তা আপনার সামনে পেশ করতে আমি লজ্জা পাচ্ছি।" তিনি বললেন, "তা নিয়ে এসো।" অতঃপর আমি তা ভেঙ্গে তাতে লবণ ছিটিয়ে দিলাম। তিনি বললেন, "সালাদের জন্য কিছু আছে কি?" আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল, আমার কাছে সিরকা (খল্ল) ছাড়া আর কিছুই নেই।" তিনি বললেন, "তা নিয়ে এসো।" যখন আমি তা নিয়ে এলাম, তিনি তা তার খাবারের উপর ঢেলে দিলেন এবং তা থেকে খেলেন। এরপর তিনি আল্লাহ তাআলার প্রশংসা করলেন। অতঃপর তিনি বললেন, "হে উম্মে হানি! সিরকা কতই না উত্তম তরকারি! যে বাড়িতে সিরকা থাকে, সে বাড়ি কখনো নিঃস্ব হয় না।" [১] আর আবদুল্লাহ ইবনু উমর ইবনুল খাত্তাবও উম্মে হানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এই হাদীস বর্ণনা করেছেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف الحسن بن بشر ضعيف، وشيخه سعدان بن الوليد لم نقف له على ترجمة، فهو مجهول لا يعرف.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (5545) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقرن بالحاكم أبا سعيد بن أبي عمرو، وجعله من مسند ابن عبّاس يحكي فيه قصة أم هانئ.وأخرجه كذلك الطبراني في "الأوسط" بإثر (6934)، وفي "الصغير" (951) عن محمد بن الحسين بن البستنبان، عن الحسن بن بشر، به.وأخرجه مختصرًا أبو عوانة في "صحيحه" (8381)، والطبراني في "الكبير" (11338) من طريق طلحة بن عمرو، عن عطاء، عن ابن عبّاس مرفوعًا: "نعم الإدام الخل". وضعف أبو عوانة طلحة بن عمرو.وأخرجه الترمذي في "الجامع" (1841)، وفي "العلل الكبير" (569) عن أبي حمزة ثابت الثمالي، عن الشعبي، عن أم هانئ. وقال حسن غريب من هذا الوجه، لا نعرفه من حديث أم هانئ إلا من هذا الوجه! وأبو حمزة الثمالي اسمه ثابت بن أبي صفية، وأم هانئ ماتت بعد علي بن أبي طالب بزمان، وسألت محمدًا عن هذا الحديث، فقال: لا أعرفُ للشعبي سماعًا من أم هانئ، فقلت: أبو حمزة كيف هو عندك؟ فقال: أحمد بن حنبل تكلم فيه، وهو عندي مقارب الحديث. قلنا: كذا قال البخاري في الثمالي وغيره من أهل الحديث قد اتفقوا على ضعفه وبعضهم عده في المتروكين. وقوله: "نعم الإدام الخلُّ" صحَّ من حديث عائشة ومن حديث جابر، كلاهما عند مسلم برقمي (2051) و (2052)، وفي حديث جابر أنَّ ذلك وقع عند إحدى زوجات النَّبيّ صلى الله عليه وسلم، وليس عند أم هانئ.
7050 - أخبرني محمد بن عيسى الرازي التاجر ببغداد، حدثنا علي بن الحسين بن الجنيد، حدثنا المُعافى بن سليمان، حدثنا حكيم بن نافع، عن موسى بن عقبة، عن نافع، عن ابن عمر قال: دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم على أم هانئ وقِرْبةٌ معلَّقةٌ، فَشَرِبَ قائمًا [1].وقد رُوي حديث لولد أم هانئ عن آبائهم عنها:
ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উম্মে হানির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঘরে প্রবেশ করলেন, এমতাবস্থায় একটি মশক ঝোলানো ছিল। অতঃপর তিনি দাঁড়িয়ে পানি পান করলেন। উম্মে হানির সন্তানদের পক্ষ হতে তাদের পিতাদের মাধ্যমেও তাঁর (উম্মে হানির) সূত্রে একটি হাদীস বর্ণিত হয়েছে।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف من أجل حكيم بن نافع.ولم نقف عليه بهذا اللفظ عند غير المصنف.وأخرج أحمد 8/ (4601) و (4765) و (4833)، وابن حبان (5243) من طريق يزيد بن عطارد، قال: سألت ابن عمر عن الشرب قائمًا، فقال: قد كنا على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم نشرب قيامًا، ونأكل ونحن نسعى. وإسناده ضعيف لجهالة يزيد بن عطارد.وأخرجه أحمد 10/ (5874)، وابن ماجه (3301)، والترمذي (1880)، وابن حبان (5322) و (5325) من طريق حفص بن غياث عن عبيد الله بن عمر عن نافع عن ابن عمر قال: كنا نشرب ونحن قيام، ونأكل ونحن نمشي على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم. وهذا مع أنَّ رجاله ثقات، إلَّا أنَّ أهل العلم وهموا فيه حفص بن غياث، منهم ابن معين وابن حنبل وابن المديني والبخاري، كما هو مبين في "مسند أحمد".وحديث الباب قد روي مثله من حديث أنس، ومن حديثه عن أمه أم سليم، وأنه دخل على أم سليم وكلاهما لا يصح، كما هو مبين في "مسند أحمد" (12188) و (27115).وأصح ما جاء في هذا حديث كبشة بنت ثابت الأنصارية: أنَّ النَّبيّ صلى الله عليه وسلم دخل عليها …أخرجه أحمد 45/ (27448)، وابن ماجه (3423)، والترمذي، (1892)، وصححه ابن حبان (5318).
7051 - أخبرني أبو جعفر أحمد بن عُبيدٍ الحافظ الأسدي بهمذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا أبو مصعب ومحمد بن عبد الله بن ردّاد، قالا: [حدثنا إبراهيم ابن محمد] [1] حدثنا عثمان بن عبد الله بن أبي عتيق حدثني سعيد بن عمرو بن جَعْدة بن هبيرة، عن أبيه، عن جده [2] جَعْدةَ بن هبيرة قال: سمعتُ أُمِّي أم هانئ بنت أبي طالب قالت: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنَّ الله تعالى فضَّل قريشًا بسبع خصال لم يُعطَها أحدٌ قبلهم، ولا يُعطاها [3] أحدٌ بعدهم: فيهم النُّبوة، وفيهم الحِجابةُ، وفيهم السقايةُ، ونَصَرَهم على الفيل وهم لا يعبدون الله، وعبدوا الله عشر سنين لم يَعبُده غيرهم، ونزلت فيهم سورةٌ لم يُشرَك فيها غيرهم: {لإِيلَافِ قُرَيْشٍ} ".وقد روي عن يحيى بن جعدة بن هبيرة عن جدته أم هانئ:
উম্মে হানি বিনতে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা কুরাইশকে সাতটি বিশেষত্বের দ্বারা শ্রেষ্ঠত্ব দান করেছেন, যা তাদের পূর্বে কাউকে দেওয়া হয়নি এবং তাদের পরেও কাউকে দেওয়া হবে না: তাদের মধ্যে নবুওয়াত রয়েছে, তাদের মধ্যে রয়েছে কাবা ঘরের তত্ত্বাবধান (হিজাবাহ), তাদের মধ্যে রয়েছে হাজীদের পানি পান করানো (সিকায়াহ), এবং তিনি হাতি বাহিনীর (আসহাবুল ফীল) বিরুদ্ধে তাদের সাহায্য করেছেন, যখন তারা আল্লাহর ইবাদত করত না, আর তারা দশ বছর আল্লাহর ইবাদত করেছে যখন অন্য কেউ তাঁর ইবাদত করত না, আর তাদের সম্পর্কে এমন একটি সূরা নাযিল হয়েছে, যেখানে তাদের ছাড়া অন্য কাউকে শরীক করা হয়নি: {لإِيلَافِ قُرَيْشٍ}।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] ما بين المعقوفين سقط من النسخ، وأثبتناه على الصواب من الرواية السالفة برقم (4019)، ومن مصادر التخريج.
[2] في النسخ بعد هذا: عن أبيه، وهو غلط، ولعلَّ الغلط فيه من محمد بن عبد الله بن رداد فإنه لا يعرف، ولم نقف له على ترجمة، وقد روى هذا الخبر عن أبي مصعب - وهو أحمد بن أبي بكر الزهري - غير واحد فجعله من رواية سعيد بن عمرو عن أبيه عمرو عن جدته أم هانئ، وهي والدة جعدة بن هبيرة. وقد تقدم تخريج طريق أبي مصعب عند الرواية السالفة برقم (4019)، وهو حديث ضعيف.
7051 [3] - رسمت في النسخ الخطية: يعطها، وأثبتنا الجادة، وهي الموافقة لروايتي الطبراني وابن عدي.
7052 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله بن دينار الزاهد العدل، حدثنا أحمد بن محمد بن نصر، حدثنا أبو نعيم، حدثنا مسعر، عن أبي العلاء العبدي - وهو هلال بن خباب - عن يحيى بن جَعْدة بن هبيرة، عن جدته أم هانئ قالت: إن كنتُ لأسمعُ قراءة رسول الله صلى الله عليه وسلم في الليل وأنا على عريش أهلي [1]. ومن نساء بنات عبد المطلب بن هاشم بن عبد مناف أروى بنت عبد المطلبوهي إحدى عمَّاتِ رسول الله صلى الله عليه وسلم ورضي عنها.
উম্মে হানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাতের বেলা আমার পরিবারের ঘরের মাচার ওপর থাকাবস্থায় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের ক্বিরাআত (কুরআন তিলাওয়াত) শুনতে পেতাম। এবং আব্দুল মুত্তালিব ইবনে হাশিম ইবনে আবদে মানাফের কন্যাদের মধ্যে ছিলেন আরওয়া বিনতে আব্দুল মুত্তালিব, যিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের ফুফুদের (চাচি) মধ্যে একজন ছিলেন। আল্লাহ তাঁর প্রতি সন্তুষ্ট হোন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده صحيح. أبو نعيم: هو الفضل بن دكين، ومسعر: هو ابن كِدام.وأخرجه أحمد 44/ (26905)، وابن ماجه (1349)، والنسائي (1087) من طريق وكيع، وأحمد 45/ (27382) عن أبي معاوية محمد بن خازم، كلاهما عن أبي العلاء العبدي، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 44 / (26894) من طريق ثابت بن يزيد عن هلال بن خباب، به.
7053 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن أحمد الأصبهاني، حدثنا الحسن بن الجهم بن مَصْقَلة الأصبهاني، حدثنا الحسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر قال: كانت أروى بنت عبد المطلب قد أسلمت، فحدثني سلمة بن بُخْت، عن عميرة [1] بنت عُبيد الله بن كعب، عن أم درَّة [2]، عن بَرَّةَ بنت أبي تجراة قالت: كانت قريش لا تُنكر أن تُصلِّي الضُّحى، إنما تُنكِرُ الوقت.قلت: الحديث كما مرَّ ذكره، فإنه مُعاد هاهنا، فتأمل.قال الحاكم: هذا حديث رواه المدنيون بهذا الإسناد، والواقدي مُقدَّم في هذا العلم قد حكم به، وقد أنكر هشام بن عُرْوة أن يكون قد أسلم من بنات عبد المطلب غيرُ صفيّة أم الزبير [3]، والله أعلم. ومن نساء قريشٍ اللاتي رَوَينَ عن رسول الله صلى الله عليه وسلمفاطمة بنت قيس بن وهب [4] بن ثعلبة بن وائل بن عمرو بن شَيْبان بن مُحارِب بن فهر.
বَرَّةَ بنت أبي تجراة (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: কুরাইশরা সালাতুদ-দুহা (চাশতের নামাজ) আদায় করাকে অস্বীকার করত না, বরং তারা কেবল এর সময়টিকে অস্বীকার করত। মুহাম্মদ ইবনে উমর (আল-ওয়াকিদী) বলেছেন: আরওয়া বিনত আব্দুল মুত্তালিব ইসলাম গ্রহণ করেছিলেন। মুহাম্মদ ইবনে উমর এই বর্ণনাটি সালমাহ বিন বুখ্ত, তিনি উমাইরাহ বিনত উবাইদুল্লাহ বিন কা’ব, তিনি উম্মে দুররা, তার সূত্রে বَرَّةَ بنت أبي تجরাة থেকে বর্ণনা করেন। আমি বলি: এই হাদীসটির উল্লেখ পূর্বে করা হয়েছে এবং এখানে তা পুনরাবৃত্তি করা হলো, সুতরাং ভেবে দেখুন। আল-হাকিম বলেন: মদীনার লোকেরা এই সনদেই হাদীসটি বর্ণনা করেছেন এবং ওয়াকিদী এই বিদ্যায় অগ্রগণ্য ও তিনি এর ফায়সালা করেছেন। তবে হিশাম ইবনে উরওয়াহ অস্বীকার করেছেন যে আব্দুল মুত্তালিবের কন্যাদের মধ্যে যুবাইরের মাতা সাফিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ব্যতীত অন্য কেউ ইসলাম গ্রহণ করেছিলেন। আর আল্লাহই ভালো জানেন। আর কুরাইশ নারীদের মধ্যে যারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে বর্ণনা করেছেন, তাদের মধ্যে রয়েছেন ফাতেমা বিনত কায়স বিন ওয়াহব বিন সা’লাবাহ বিন ওয়াইল বিন আমর বিন শায়বান বিন মুহারিব বিন ফিহ্র।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرّف في النسخ إلى: غيرة، والمثبت من مكرره السالف برقم (7041)، وإسناده ضعيف.
[2] انظر التعليق عليها عند مكرره المذكور.
7053 [3] - وصله البخاري في "تاريخه الأوسط" (225)، وسلف قريبًا برقم (7036) مسندًا لأبيه عروة بن الزبير من طريق آخر.
7053 [4] - تحرَّف في (ز) و (م) و (ص) إلى: وهيب وأثبتناه على الصواب من (ب)، وهو الموانق لما في "طبقات ابن سعد" 10/ 259، و "الثقات" لابن حبان 3/ 336، وكما في مصادر ترجمة أخيها الضحاك بن قيس.
7054 - Null
7054 - حدثني بصحة هذا النسب أبو بكر محمد بن أحمد بن بالويه، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الحرْبي، حدثنا مصعب بن عبد الله الزُّبيري.
৭০৫৪ - আমাকে এই নসবের (বংশ শৃঙ্খলের) বিশুদ্ধতা সম্পর্কে বর্ণনা করেছেন আবূ বাকর মুহাম্মাদ ইবনে আহমাদ ইবনে বালওয়াইহ, আমাদেরকে বর্ণনা করেছেন ইবরাহীম ইবনে ইসহাক আল-হার্বী, আমাদেরকে বর্ণনা করেছেন মুসআব ইবনে আব্দুল্লাহ আয-যুবাইরী।
7055 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، أخبرني ابن أبي الزناد، عن هشام بن عروة، عن أبيه قال: دخلتُ على مروان بن الحكم فقلتُ له: إنَّ امرأةً من أهلِكَ طُلِّقت فمررتُ عليها وهي تنتقِلُ فعِبتُ ذلك عليها، فقالوا: أمرتنا فاطمة ابنة قيس، وأخبرتنا: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أمرها أن تنتقل حينَ طلقها زوجها إلى ابن أم مكتوم، فقال مروان: أجَلْ، هي أمرتهنَّ بذلك، قال عُزوة: فقلتُ: أما والله لقد عابت ذلك عائشة أشدَّ العيب، وقالت: إنَّ فاطمة كانت مع زوجها في مكانٍ وَحْش، فخيف على ناحيتها، ولذلك أرخص لها رسول الله صلى الله عليه وسلم [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه بهذه السياقة.
উরওয়া থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মারওয়ান ইবনুল হাকামের নিকট প্রবেশ করে তাকে বললাম, আপনার পরিবারের এক মহিলাকে তালাক দেওয়া হয়েছিল। আমি তার পাশ দিয়ে যাওয়ার সময় দেখলাম সে (ইদ্দত চলাকালীন) অন্য বাড়িতে স্থানান্তরিত হচ্ছে। আমি তাকে এর জন্য দোষারোপ করলাম (বা এটা অপছন্দ করলাম)। তখন তারা বলল: ফাতিমা বিনত কায়স আমাদের এই নির্দেশ দিয়েছেন এবং তিনি আমাদের জানিয়েছেন যে, তার স্বামী যখন তাকে তালাক দেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে ইবনু উম্মে মাকতুমের (বাড়িতে) স্থানান্তরিত হতে নির্দেশ দিয়েছিলেন। তখন মারওয়ান বললেন: হ্যাঁ, তিনি (ফাতিমা) তাদের এই নির্দেশই দিয়েছেন। উরওয়া বলেন: আমি তখন বললাম: আল্লাহর কসম! আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এটাকে কঠোরভাবে দোষারোপ করেছেন। তিনি (আয়েশা) বলেছেন: ফাতিমা তার স্বামীর সাথে এক জনমানবশূন্য স্থানে ছিলেন, তাই তার নিরাপত্তার আশঙ্কা ছিল। এই কারণেই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে (স্থানান্তরিত হওয়ার) অনুমতি দিয়েছিলেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل ابن أبي الزناد: وهو عبد الرحمن.وأخرجه مختصرًا أبو داود (2292) عن سليمان بن داود، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن ماجه (2032) من طريق عبد العزيز بن عبد الله، عن ابن أبي الزناد، به. وعلقه البخاري بإثر الحديث (5326) عن ابن أبي الزناد.وأخرج البخاري (5321)، وأبو داود (2295) من طريق القاسم بن محمد وسليمان بن يسار: أنَّ يحيى بن سعيد بن العاص طلق بنت عبد الرحمن بن الحكم، فانتقلها عبد الرحمن، فأرسلت عائشة أم المؤمنين إلى مروان بن الحكم، وهو أمير المدينة: اتق الله وارددها إلى بينها، قال مروان في حديث سليمان: إن عبد الرحمن بن الحكم غلبني. وقال القاسم بن محمد: أوَما بلغك شأن فاطمة بنت قيس؟ قالت: لا يضرُّك أن لا تذكر حديث فاطمة، فقال مروان بن الحكم: إن كان بك شر، فحسبك ما بين هذين من الشر.وأخرج البخاري (5325)، ومسلم (1481) (54)، وأبو داود (2293) من طريق القاسم بن محمد - واللفظ له - ومسلم (1481) (52) من طريق هشام بن عروة، والبخاري (5327) من طريق ابن شهاب الزهري ثلاثتهم عن عروة بن الزبير قال لعائشة: ألم تري إلى فلانة بنت الحكم، طلقها زوجها البتة فخرجت؟ فقالت: بئسما صنعت قال: ألم تسمعي في قول فاطمة؟ قالت: أما إنه ليس لها خير في ذكر هذا الحديث.وأخرج البخاري (5323)، ومسلم (1481) (54) من طريق عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة أنها قالت: ما لفاطمة ألا تتقي الله؟ يعني في قولها: لا سكنى ولا نفقة.قال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 16/ 297: قوله: "وَحْش" بفتح الواو وسكون المهملة بعدها مُعجمة، أي: خالٍ لا أنِيسَ به، ولرواية ابن أبي الزناد هذه شاهدٌ من رواية أبي أسامة عن هشام بن عروة لكن قال: عن أبيه عن فاطمة بنت قيس، قالت: قلت: يا رسول الله، إن زوجي طلقني ثلاثًا فأخافُ أن يُقتحم علي، فأمرها فتحوَّلت.قلنا: هذه الرواية أخرجها مسلم (1482) (53)، وابن ماجه (2033)، والنسائي (5709) من طريق حفص بن غياث (وليس من طريق أبي أسامة) عن هشام، عن أبيه، عن فاطمة بنت قيس قالت، فذكرته. قال الحافظ 16/ 296: والاقتحام: الهجوم على الشَّخص بغير إذنٍ.فائدة: قال الحافظ في "فتح الباري" 16/ 298: طعن أبو محمد بن حزم في رواية ابن أبي الزناد المعلَّقة فقال: عبد الرحمن بن أبي الزناد ضعيف جدًّا، وحكم على روايته هذه بالبطلان، وتُعقِّبَ بأنَّه مُختلف فيه، ومَن طَعَنَ فيه لم يذكر ما يدلُّ على تركه فضلًا عن بطلان روايته، وقد جزم يحيى بن معين بأنَّه أثبتُ الناس في هشام بن عروة، وهذا من روايته عن هشام، فلله در البخاري ما أكثر استحضاره، وأحسن تصرفه في الحديث والفقه!
7056 - أخبرني محمد بن علي الصَّنعاني بمكة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا عبد الرزاق عن ابن جريج، أخبرنا عطاء، أخبرني عبد الرحمن بن عاصم بن ثابت، أنَّ فاطمة بنت قيس أختَ الضحاك بن قيس أخبرته، وكانت عند رجل من بني مخزوم، وذكر الحديث بطوله، وقال في آخره: فلما انقضت عِدَّتُها خطبها أبو جَهْم ومعاوية بن أبي سفيان، فاستأمرت النَّبيّ صلى الله عليه وسلم، فقال: "أمَّا معاوية فصُعلوكٌ لا مال له، وأما أبو جَهم فإنِّي أخافُ عليكِ شقاشقه [1] "، فتزوجت أسامة بن زيد [2].وقد روى جابر بن عبد الله عن فاطمة بنت قيس:
ফাতেমা বিনত কায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি দাহহাক ইবনে কায়েসের বোন ছিলেন এবং বনু মাখযূম গোত্রের এক ব্যক্তির স্ত্রী ছিলেন। অতঃপর তিনি দীর্ঘ হাদীসটি উল্লেখ করলেন। হাদীসের শেষে তিনি বলেন: যখন তার ইদ্দতকাল শেষ হলো, তখন আবূ জাহম এবং মু'আবিয়া ইবনু আবী সুফিয়ান তাকে বিবাহের প্রস্তাব দিলেন। তখন তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পরামর্শ চাইলেন। তিনি বললেন: "মু'আবিয়ার ব্যাপার হলো, সে একজন দরিদ্র (সা'লুক), তার কোনো সম্পদ নেই। আর আবূ জাহমের ব্যাপারে আমি তোমার উপর তার রূঢ় প্রকৃতির কারণে আশঙ্কা করি।" এরপর তিনি উসামা ইবনু যায়েদকে বিবাহ করলেন। জাবির ইবনু আব্দুল্লাহও ফাতেমা বিনত কায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এই হাদীস বর্ণনা করেছেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] هكذا كتبت في النسخ الخطية، شقاشقه، والظاهر أنه تصحيف، قال ابن الأثير في مادة (سفسف) من "النهاية: 2/ 374: وفي حديث فاطمة بنت قيس: "إني أخاف عليك سفاسفه" هكذا أخرجه أبو موسى في السين والفاء، ولم يفسره. وقال: ذكره العسكري بالفاء والقاف، ولم يورده أيضًا في السين والقاف والمشهور المحفوظ في حديث فاطمة إنما هو "إني أخاف عليك قسقاسته" بقافين قبل السينين، وهي العصا، فأما سفاسفه وسقاسقه بالفاء أو القاف فلا أعرفه، إلا أن يكون من قولهم لطرائق السيف: سفاسقه، بفاء بعدها قاف، وهي التي يقال لها: الفرند، فارسية معربة. قلنا: والذي في مصادر التخريج: قسقاسته وفي رواية عند أحمد: قصقاصته، وقيل في معناها: العصا، وقيل: بل تحريكها، وانظر "النهاية" مادة (قسقس).
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد محتمل للتحسين عبد الرحمن بن عاصم بن ثابت، وإن تفرد بالرواية عنه عطاء - وهو ابن أبي رباح - ذكره ابن حبان في "الثقات"، وهو متابع. ابن جريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز.وهو في "مصنف" عبد الرزاق (12021)، ومن طريقه أخرجه أحمد 45 / (27336).وأخرجه النسائي (5708) من طريق مخلد بن يزيد الحراني، عن ابن جريج، به.وأخرجه أحمد 45 / (27327) و (27328) و (27333)، ومسلم (1480) (36)، وأبو داود (2284)، والنسائي (5989)، وابن حبان (4049) و (4290) من طريق أبي سلمة بن عبد الرحمن، وأخرجه أحمد (27320) و (27321) و (27324)، ومسلم (1480) (47) و (48)، وابن ماجه (1869)، والترمذي (1135)، والنسائي، (9200)، وابن حبان (4254) من طريق أبي بكر بن الجهم، كلاهما عن فاطمة بنت قيس. حديث الاستحاضة، والحديثُ في الجملة لا أصل له، والله أعلم. قلنا: وقع في "علل" ابن أبي حاتم وحده: فاطمة بنت أبي حبيش، بدل بنت قيس، وهذا يحتمل أحد أمرين: الأول عدله أحد النساخ قديمًا، أو أنَّ الإمام أبا حاتم ذكره على الصواب الذي ينبغي أن يكون، وليس كما رواه الضُّبعي، والله أعلم.واجتهد الحافظ ابن حجر في حلِّ هذا الإشكال، فقال في "فتح الباري" 2/ 110: وقع في "سنن أبي داود" (بل النسائي 207) عن فاطمة بنت قيس، فظنّ بعضُهم أنَّها القُرشيّة الفِهْريَّة، والصواب أنَّها بنت أبي حُبَيش، واسم أبي حبيش قيس. قلنا: وعليه فلا إشكال، وقد وقع في حديثي أم سلمة وعائشة التاليين عند المصنف نسبة فاطمة ببنت قيس أيضًا، لكن يُعكر عليه أنَّ المصنف انفرد بنسبتها هكذا في حديثي أم سلمة وعائشة، وروى الحديثين غيره من الناس فنسبوها بنت أبي حبيش كما سيأتي التنبيه عليه هناك. والأمر الآخر أنه يبعد على كلِّ هؤلاء الحفاظ أن لا يتنبهوا لهذا الأمر، والله تعالى أعلم بالصواب.والحديث أخرجه أبو العبّاس السراج في "حديثه" (431)، والطبراني في "الأوسط" (2960) و (7818)، وفي "الصغير" (235)، والبيهقي 1/ 335 من طرق عن وهب بن بقية، بهذا الإسناد. وقع عند بعضهم: عن جابر عن فاطمة بنت قيس، وعند بعضهم الآخر: عن جابر: أنَّ فاطمة سألت النَّبيَّ صلى الله عليه وسلم، وهذا من اضطراب جعفر الضبعي، والله أعلم. وقال الطبراني: لم يروه عن ابن جريج إلَّا جعفر بن سليمان. وقال البيهقي: قال أبو بكر بن إسحاق: جعفر بن سليمان فيه نظر، ولا يُعرف هذا الحديث لابن جريج ولا لأبي الزبير من وجهٍ غير هذا، وبمثله لا تقوم حجة، واختلف عليه فيه.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 2/ 148 من طريق الحسن بن عمر بن شقيق، والدارقطني في "سننه" (848) - ومن طريقه البيهقي 1/ 355 - من طريق قَطَن بن نُسير الغبري، كلاهما عن جعفر بن سليمان به. وقال ابن عدي: وهذا الحديث لم يحدث به عن ابن جريج بهذا الإسناد غير جعفر بن سليمان، ويقال: إنه أخطأ فيه أراد به إسنادًا آخر عن ابن جريج، لعله يرويه عن الزهري عن عروة عن عائشة، فلعل جعفرًا أراد هذا الحديث فأخطأ عليه، فقال: عن أبي الزبير عن جابر. وقال البيهقي: وهكذا رواه قطن بن نسير عن جعفر بن سليمان، فقال في الحديث: إنَّ فاطمة بنت قيس سألت، ولا يعرف إلَّا من جهة جعفر بن سليمان، والله أعلم.وانظر ما بعده.قال الحافظ في "فتح الباري" 2/ 105: وفي الحديث دليل على أنَّ المرأة إذا مَيَّزت دم الحيض من دم الاستحاضة تَعتبِر دم الحيض وتعمل على إقباله وإدباره، فإذا انقَضَى قَدْره اغتسلت عنه ثم صار حُكْم دم الاستحاضة حُكْم الحَدَث فتتوضأ لكل صلاة، لكنها لا تصلي بذلك الوضوء أكثر من فريضة واحدة مُؤداة أو مَقْضيَّة، لظاهر قوله: "ثمَّ توضَّئي لكلِّ صلاة"، وبهذا قال الجمهور.وعند الحنفيَّة: أنَّ الوضوء مُتعلِّق بوقت الصلاة فلها أن تُصلِّي به الفريضة الحاضرة وما شاءَت من الفوائت ما لم يَخرُج وقت الحاضرة، وعلى قولهم المراد بقوله: "وتوضَّئي لكلٍّ صلاة" أي: لوَقْت كل صلاة، ففيه مَجاز الحذف، ويحتاج إلى دليل.وعند المالكيَّة: يُستَحب لها الوضوء لكلِّ صلاة، ولا يجبُ إِلَّا بِحَدَثٍ آخر.وقال أحمد وإسحاق: إن اغتسلت لكلِّ فرض فهو أحوَط.
7057 - حدثنا إسماعيل بن علي الخُطَبي ببغداد، حدثنا عبد الله بن بن أحمد بن جنبل ومحمد بن عَبْدوس بن كامل، قالا: حدثنا وهب بن بَقيَّة الواسطي، حدثنا جعفر بن سليمان الضُّبَعي، عن ابن جريج، عن أبي الزبير، عن جابر، عن فاطمة بنت قيس قالت: سألتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم عن المستحاضة، فقال: "تقعد أيامَ أقْرائِها، ثم تغتسل وتُصلِّي عند طُهرِها" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . وقد روت عائشةُ وأمُّ سَلَمة رضي الله عنهما عن فاطمة بنت قيس.أما حديثُ أمِّ سلمة:
ফাতিমা বিনত কায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে ইস্তিহাযাগ্রস্ত (অনিয়মিত রক্তস্রাবযুক্ত) মহিলা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন, “সে তার স্বাভাবিক ঋতুস্রাবের দিনগুলো বিরত থাকবে, অতঃপর যখন তার পবিত্রতা আসবে, তখন সে গোসল করবে এবং সালাত আদায় করবে।” আয়িশা ও উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফাতিমা বিনত কায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। আর উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস হলো:
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] كذا رواه الحاكم، ورواه الناس بلفظ: "تغتسل عند كل طهر"، ورجاله ثقات غير جعفر بن سليمان الضُّبعي، فله أحاديثُ مناكير، وهذا منها، فقد أنكر حديثه هذا غير واحد من أهل العلم، فقد جاء في "العلل ومعرفة الرجال" (4122): سُئل أحمد عن حديث أبي الزبير عن جابر عن فاطمة بنت قيس في المُستحاضة، فقال: ليس بصحيح، أو ليس له أصل، يعني حديث جعفر بن سليمان عن ابن جريج. وقال أبو حاتم الرازي كما في "العلل" لابنه (120): ليس هذا بشيء.والأمر الآخر أنه جعله من مسند فاطمة بنت قيس، وإنما هي فاطمة بنت أبي حبيش، فقد قال الدَّارَقُطْنيّ في "السنن": تفرد به جعفر بن سليمان، ولا يصح عن ابن جريج عن أبي الزبير، وهم فيه، وإنما هي فاطمة بنت أبي حبيش. وقال ابن عبد الهادي في "تعليقة على العلل" ص 106 - 107: إنَّ التي سألت فاطمة بنت أبي حبيش، لا بنت قيس، وهو أشبه؛ فإنَّ بنت قيس لا مدخل لها في حديث الاستحاضة، والحديثُ في الجملة لا أصل له، والله أعلم. قلنا: وقع في "علل" ابن أبي حاتم وحده: فاطمة بنت أبي حبيش، بدل بنت قيس، وهذا يحتمل أحد أمرين: الأول عدله أحد النساخ قديمًا، أو أنَّ الإمام أبا حاتم ذكره على الصواب الذي ينبغي أن يكون، وليس كما رواه الضُّبعي، والله أعلم.واجتهد الحافظ ابن حجر في حلِّ هذا الإشكال، فقال في "فتح الباري" 2/ 110: وقع في "سنن أبي داود" (بل النسائي 207) عن فاطمة بنت قيس، فظنّ بعضُهم أنَّها القُرشيّة الفِهْريَّة، والصواب أنَّها بنت أبي حُبَيش، واسم أبي حبيش قيس. قلنا: وعليه فلا إشكال، وقد وقع في حديثي أم سلمة وعائشة التاليين عند المصنف نسبة فاطمة ببنت قيس أيضًا، لكن يُعكر عليه أنَّ المصنف انفرد بنسبتها هكذا في حديثي أم سلمة وعائشة، وروى الحديثين غيره من الناس فنسبوها بنت أبي حبيش كما سيأتي التنبيه عليه هناك. والأمر الآخر أنه يبعد على كلِّ هؤلاء الحفاظ أن لا يتنبهوا لهذا الأمر، والله تعالى أعلم بالصواب.والحديث أخرجه أبو العبّاس السراج في "حديثه" (431)، والطبراني في "الأوسط" (2960) و (7818)، وفي "الصغير" (235)، والبيهقي 1/ 335 من طرق عن وهب بن بقية، بهذا الإسناد. وقع عند بعضهم: عن جابر عن فاطمة بنت قيس، وعند بعضهم الآخر: عن جابر: أنَّ فاطمة سألت النَّبيَّ صلى الله عليه وسلم، وهذا من اضطراب جعفر الضبعي، والله أعلم. وقال الطبراني: لم يروه عن ابن جريج إلَّا جعفر بن سليمان. وقال البيهقي: قال أبو بكر بن إسحاق: جعفر بن سليمان فيه نظر، ولا يُعرف هذا الحديث لابن جريج ولا لأبي الزبير من وجهٍ غير هذا، وبمثله لا تقوم حجة، واختلف عليه فيه.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 2/ 148 من طريق الحسن بن عمر بن شقيق، والدارقطني في "سننه" (848) - ومن طريقه البيهقي 1/ 355 - من طريق قَطَن بن نُسير الغبري، كلاهما عن جعفر بن سليمان به. وقال ابن عدي: وهذا الحديث لم يحدث به عن ابن جريج بهذا الإسناد غير جعفر بن سليمان، ويقال: إنه أخطأ فيه أراد به إسنادًا آخر عن ابن جريج، لعله يرويه عن الزهري عن عروة عن عائشة، فلعل جعفرًا أراد هذا الحديث فأخطأ عليه، فقال: عن أبي الزبير عن جابر. وقال البيهقي: وهكذا رواه قطن بن نسير عن جعفر بن سليمان، فقال في الحديث: إنَّ فاطمة بنت قيس سألت، ولا يعرف إلَّا من جهة جعفر بن سليمان، والله أعلم.وانظر ما بعده.قال الحافظ في "فتح الباري" 2/ 105: وفي الحديث دليل على أنَّ المرأة إذا مَيَّزت دم الحيض من دم الاستحاضة تَعتبِر دم الحيض وتعمل على إقباله وإدباره، فإذا انقَضَى قَدْره اغتسلت عنه ثم صار حُكْم دم الاستحاضة حُكْم الحَدَث فتتوضأ لكل صلاة، لكنها لا تصلي بذلك الوضوء أكثر من فريضة واحدة مُؤداة أو مَقْضيَّة، لظاهر قوله: "ثمَّ توضَّئي لكلِّ صلاة"، وبهذا قال الجمهور.وعند الحنفيَّة: أنَّ الوضوء مُتعلِّق بوقت الصلاة فلها أن تُصلِّي به الفريضة الحاضرة وما شاءَت من الفوائت ما لم يَخرُج وقت الحاضرة، وعلى قولهم المراد بقوله: "وتوضَّئي لكلٍّ صلاة" أي: لوَقْت كل صلاة، ففيه مَجاز الحذف، ويحتاج إلى دليل.وعند المالكيَّة: يُستَحب لها الوضوء لكلِّ صلاة، ولا يجبُ إِلَّا بِحَدَثٍ آخر.وقال أحمد وإسحاق: إن اغتسلت لكلِّ فرض فهو أحوَط.
7058 - فحدَّثَناه أبو العبّاس محمد بن يعقوب، حدَّثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدَّثنا سُريج بن النُّعمان، حدَّثنا عبد الله بن عمر، عن سالم أبي النَّضر، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أمِّ سلمةَ قالت: جاءت فاطمةُ بنت قيسٍ رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: إني أُستحاض، قال: "ليس ذاكِ بالحيضِ، إنما هو عِرقٌ، لتَقعُدْ أَيامَ أَقْرائِها، ثم تَغتسِلْ، ثم تَستثفِرْ [1] بثوبٍ وتُصلِّي" [2]. وأما حديث عائشة:
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ফাতিমা বিনত ক্বায়স আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলেন এবং বললেন: আমার ইস্তিহাযা (দীর্ঘ রক্তস্রাব) হয়। তিনি বললেন: "এটা হায়েয (মাসিক) নয়; বরং এটা একটি (ছিঁড়ে যাওয়া) শিরা থেকে আসে। সে যেন তার (স্বাভাবিক) মাসিক দিনগুলোতে (নামাজ পড়া) ছেড়ে দেয়, এরপর গোসল করে নেয়, এরপর সে যেন কাপড়ের মাধ্যমে (লজ্জাস্থান) শক্ত করে বেঁধে নেয় এবং সালাত আদায় করে।" আর আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস সম্পর্কে (বলতে গেলে):
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: تستثفن، والمثبت من النسخة المحمودية، وهو الموافق لرواية الإمام أحمد.ومعنى "تستثفر": تشد فرجها بخرقة عريضة بعد أن تحتشي قطنًا، وتوثق طرفيها في شيء تشده على وسطها، فتمنع بذلك سيل الدم، وهو مأخوذ من ثَفَر الدابة الذي يجعل تحت ذنبها. قاله في مادة (ثفر) من "النهاية". وأخرجه أحمد (26510)، وابن ماجه (623)، والنسائي في "المجتبى" (354) من طريق عبيد الله بن عمر، وأحمد (26716)، وأبو داود (274)، والنسائي (208) و (355) من طريق مالك، كلاهما عن نافع مولى ابن عمر، عن سليمان بن يسار، عن أم سلمة. فأبهما المرأة ولم يسمياها.وأخرجه أبو داود (275) من طريق الليث بن سعد، و (277) من طريق صخر بن جويرية، كلاهما عن نافع، عن سليمان بن يسار، أنَّ رجلًا أخبره عن أم سلمة، فذكره. وانظر "علل الدارقطني" (3957/ 8).وانظر ما قبله وما بعده.قولها: "أُستَحاضُ" بضم الهمزة وفتح المثنَّاة، أي: استمرَّ بها الدَّمُ بعد أيامها المُعتادة، فهي مُستحاضة، والاستحاضة: جَرَيان الدَّم من فَرْجِ المرأة في غير أوانه. قاله الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 1/ 679.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف عبد الله بن عمر: وهو العمري. سالم أبو النضر: هو ابن أبي أمية التيمي المدني.وأخرجه أحمد 44/ (26593) عن سريج بن النعمان، بهذا الإسناد. ولم ينسب فاطمة فيه.وأخرجه أحمد (26740)، وأبو داود (278) من طريق وهيب بن خالد، عن أيوب السختياني، عن سليمان بن يسار، عن أم سلمة. ولم ينسب فاطمة، ورواه عن أيوبَ سفيانُ بن عيينة عند الحميدي (304) والدارقطني (793)، وعبدُ الوارث بن سعيد عند الدارقطني (794)، فنسبا فاطمة: بنت أبي حُبيش. وأخرجه أحمد (26510)، وابن ماجه (623)، والنسائي في "المجتبى" (354) من طريق عبيد الله بن عمر، وأحمد (26716)، وأبو داود (274)، والنسائي (208) و (355) من طريق مالك، كلاهما عن نافع مولى ابن عمر، عن سليمان بن يسار، عن أم سلمة. فأبهما المرأة ولم يسمياها.وأخرجه أبو داود (275) من طريق الليث بن سعد، و (277) من طريق صخر بن جويرية، كلاهما عن نافع، عن سليمان بن يسار، أنَّ رجلًا أخبره عن أم سلمة، فذكره. وانظر "علل الدارقطني" (3957/ 8).وانظر ما قبله وما بعده.قولها: "أُستَحاضُ" بضم الهمزة وفتح المثنَّاة، أي: استمرَّ بها الدَّمُ بعد أيامها المُعتادة، فهي مُستحاضة، والاستحاضة: جَرَيان الدَّم من فَرْجِ المرأة في غير أوانه. قاله الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 1/ 679.