হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7079)


7079 - حدثني علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدَّثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدَّثنا أبو النُّعمان عارمٌ، حدَّثنا حماد عن ثابت البُناني، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم رأى في المسجد حَبْلًا ممدودًا بين ساريتَينِ، فقال: "ما هذا الحبلُ؟ " فقيل: يا رسول الله، حَمْنةُ بنت جحش تُصلِّي، فإذا أَعيَتْ تعلَّقت بالحبل، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لتُصَلِّ ما أطاقَتْ [1]، فإذا أعيَتْ فلتقعُدْ" [2].




আব্দুল রহমান বিন আবি লায়লা থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদে দুটি খুঁটির মাঝে একটি দড়ি ঝুলন্ত অবস্থায় দেখতে পেলেন। তিনি বললেন: "এই দড়িটি কিসের?" তখন বলা হলো: হে আল্লাহর রাসূল, হামনাহ বিনত জাহাশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সালাত আদায় করেন। অতঃপর যখন তিনি ক্লান্ত হয়ে যান, তখন তিনি এই দড়িতে ঝুলে থাকেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে যেন সালাত আদায় করে ততক্ষণ, যতক্ষণ সে শক্তি রাখে। অতঃপর যখন সে ক্লান্ত হয়ে যায়, তখন সে যেন বসে পড়ে।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] كذا في النسخ، وفي رواية أحمد: لتصلي، على الجادة. وأخرجه أحمد 20/ (12916) عن عبد الرحمن بن مهدي، وبرقم 21/ (13691) عن عفان بن مسلم، وابن حبان (2493) من طريق يزيد بن هارون، ثلاثتهم عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 20/ (13121) عن معاذ بن معاذ وابن أبي عدي، وابنُ حبان (2587) من طريق إسماعيل بن جعفر، ثلاثتهم عن حميد، به. ولم يذكر أحد منهم عن حميد أنها حمنة، بل قالوا: فلانة.وأخرجه أحمد 19/ (11986)، ومسلم (784)، وأبو داود (1312)، والنسائي (1308)، وابن حبان (2492) من طريق إسماعيل بن علية، والبخاري (1150)، ومسلم (784)، وابن ماجه (1371)، والنسائي (1308) من طريق عبد الوارث بن سعيد، كلاهما عن عبد العزيز بن صهيب، به. وعند جميعهم أنها زينب إلا في إحدى روايتي أبي داود، فقد شذَّ فيها هارونُ بن عبَّاد - وهو مستور الحال - من بين أصحاب ابن عُلية، فقال: حمنة بدلًا من زينب.وحاول الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 4/ 365 أن يجمع بين الروايتين بكلام غير مقنعٍ، فانظره إن شئت.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات لكنه مرسل، وسيأتي موصولًا في الحديث التالي.ووهم حمادُ بن سلمة في اسم المصلِّية، والصواب أنها زينب بن جحش كما سيأتي التنبيه عليه في الحديث التالي.وأخرجه أحمد 20/ (12915) عن عبد الرحمن بن مهدي، وبرقم 21/ (13690) عن عفان بن مسلم، كلاهما عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وفي الباب عن عائشة عند البخاري (1151)، ومسلم (785)، قالت: كانت عندي امرأة من بني أسد، فدخل علي رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "من هذه؟ " قلت: فلانة لا تنام بالليل، فذكر من صلاتها، فقال: "مه، عليكم ما تطيقون من الأعمال، فإنَّ الله لا يملُّ حتى تملوا". وأخرجه أحمد 20/ (12916) عن عبد الرحمن بن مهدي، وبرقم 21/ (13691) عن عفان بن مسلم، وابن حبان (2493) من طريق يزيد بن هارون، ثلاثتهم عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 20/ (13121) عن معاذ بن معاذ وابن أبي عدي، وابنُ حبان (2587) من طريق إسماعيل بن جعفر، ثلاثتهم عن حميد، به. ولم يذكر أحد منهم عن حميد أنها حمنة، بل قالوا: فلانة.وأخرجه أحمد 19/ (11986)، ومسلم (784)، وأبو داود (1312)، والنسائي (1308)، وابن حبان (2492) من طريق إسماعيل بن علية، والبخاري (1150)، ومسلم (784)، وابن ماجه (1371)، والنسائي (1308) من طريق عبد الوارث بن سعيد، كلاهما عن عبد العزيز بن صهيب، به. وعند جميعهم أنها زينب إلا في إحدى روايتي أبي داود، فقد شذَّ فيها هارونُ بن عبَّاد - وهو مستور الحال - من بين أصحاب ابن عُلية، فقال: حمنة بدلًا من زينب.وحاول الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 4/ 365 أن يجمع بين الروايتين بكلام غير مقنعٍ، فانظره إن شئت.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7080)


7080 - وحدثني عليٌّ، حدَّثنا إسماعيل، حدَّثنا أبو النعمان، حدَّثنا حماد بن سلمة، عن حُميد، عن أنس، بمثله [1].




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। (এই সূত্রে) অনুরূপ বর্ণনা করা হয়েছে।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده صحيح. حميد: هو الطويل. وأخرجه أحمد 20/ (12916) عن عبد الرحمن بن مهدي، وبرقم 21/ (13691) عن عفان بن مسلم، وابن حبان (2493) من طريق يزيد بن هارون، ثلاثتهم عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 20/ (13121) عن معاذ بن معاذ وابن أبي عدي، وابنُ حبان (2587) من طريق إسماعيل بن جعفر، ثلاثتهم عن حميد، به. ولم يذكر أحد منهم عن حميد أنها حمنة، بل قالوا: فلانة.وأخرجه أحمد 19/ (11986)، ومسلم (784)، وأبو داود (1312)، والنسائي (1308)، وابن حبان (2492) من طريق إسماعيل بن علية، والبخاري (1150)، ومسلم (784)، وابن ماجه (1371)، والنسائي (1308) من طريق عبد الوارث بن سعيد، كلاهما عن عبد العزيز بن صهيب، به. وعند جميعهم أنها زينب إلا في إحدى روايتي أبي داود، فقد شذَّ فيها هارونُ بن عبَّاد - وهو مستور الحال - من بين أصحاب ابن عُلية، فقال: حمنة بدلًا من زينب.وحاول الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 4/ 365 أن يجمع بين الروايتين بكلام غير مقنعٍ، فانظره إن شئت.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7081)


7081 - أخبرنا أبو جعفر بن عُبيدٍ الحافظ وعَبْدانُ بن يزيد الدقَّاق بهَمَذان، قالا: حدَّثنا إبراهيم بن الحسين، حدَّثنا إسحاق بن محمد بن إسماعيل الفَرْوي، حدَّثنا عبد الله بن عمر، عن أخيه عبيد الله بن عمر، عن إبراهيم بن محمد بن عبد الله بن جَحْش، عن أبيه، عن حَمْنة بنت جحش: أنها قيل لها: قُتِلَ أخوك، قالت: رحمه الله، إنا لله وإنا إليه راجعون، فقيل لها: قُتِلَ خالُك حمزةُ، فقالت: إنَّا لله وإنا إليه راجعون، فقيل لها: قُتِلَ زوجُك، قالت: واحَرْباهُ [1]، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ للزوج من المرأة لشُعبة ما هي لشيءٍ" [2].




হামনাহ বিনত জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে বলা হলো: আপনার ভাই শহীদ হয়েছেন। তিনি বললেন: আল্লাহ তাঁকে রহম করুন, ইন্না লিল্লাহি ওয়া ইন্না ইলাইহি রাজিউন। এরপর তাঁকে বলা হলো: আপনার মামা হামযা শহীদ হয়েছেন। তিনি বললেন: ইন্না লিল্লাহি ওয়া ইন্না ইলাইহি রাজিউন। এরপর তাঁকে বলা হলো: আপনার স্বামী শহীদ হয়েছেন। তিনি বললেন: হায়! আমার যুদ্ধ! অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই স্বামীর জন্য নারীর অন্তরে এমন একটি আকর্ষণ (বা গভীর সম্পর্ক) রয়েছে, যা অন্য কোনো কিছুর জন্য নেই।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] أُعجمت في النسخ: واحزناه! من الحزن، لكن قال الزبيدي في "تاج العروس" 2/ 252: هذه الكلمة (أي: واحرباه) استعملوها في مقام الحزن والتأسف مطلقًا، كما قالوا: وا أسفا، قال:والَهْفَ قلبي وهل يُجدي تلهُّفه … غَوثًا ووا حَرَبا لو ينفعُ الحربُ… قيل: كان حرب بن أمية إذا مات لأحد ميت سألهم عن حاله ونفقته وكسوته وجميع ما يفعله، فيصنعه لأهله ويقوم به لهم، فكانوا لا يفقدون من ميتهم إلا صوته، فيخف حزنهم لذلك، فلما مات حرب بكى عليه أهلُ مكة ونواحيها، فقالوا: وا حَرْباه، بالسكون، ثم فتحوا الراء، واستمرَّ ذلك في البكاء في المصائب، فقالوه في كل ميت يعزّ عليهم. وقال الفاكهي في "أخبار مكة" 3/ 218: وأول من قيل عليه: واحرباه، حرب بن أمية، فاشتقت النوائح من ذلك، فقلنَ: يا حرباه.وقال ابن سِيده في "المحكم" في قصة حرب بن أمية: هذا لا يعجبني؛ وذهب إلى أنه من الحَرَب: وهو أن يُسلَب الرجلُ مالَه الذي يعيش به.



[2] إسناده ضعيف لضعف إسحاق الفروي وعبد الله بن عمر: وهو ابن حفص العُمري.وأخرجه البيهقي 4/ 66 عن أبي عبد الله الحاكم، عن أحمد بن عبيد بن إبراهيم وعبد الرحمن بن حمدان الجلاب، كلاهما عن إبراهيم بن الحسين، بهذا الإسناد.وأخرجه مختصرًا الخطيب في "الأسماء المبهمة" 7/ 500 من طريق محمد بن إسماعيل، عن إسحاق الفروي، به.وأخرجه ابن ماجه (1590) عن محمد بن يحيى، عن إسحاق بن محمد الفروي، عن عبد الله بن عمر، عن إبراهيم بن محمد بن عبد الله بن جحش، به. ليس فيه عبيد الله بن عمر.وأخرجه ابن سعد 10/ 229 عن خالد بن مخلد البجلي والواقدي، كلاهما عن عبد الله بن عمر، عن عبد الله بن إبراهيم، عن أبيه، عن محمد بن عبد الله بن جحش، قال: قمن النساء حين رجع رسول الله صلى الله عليه وسلم من أحد يسألن الناس عن أهليهن، فذكر نحوه، وزاد محمد بن عمر في حديثه: وقال لها النبي صلى الله عليه وسلم: "كيف قلتِ على مصعب ما لم تقولي على غيره؟ " قالت: يا رسول الله، ذكرتُ يُتمَ ولدِه. فجعل عبد الله بن عمر العمري في هذه الرواية مكان أخيه عبيدِ الله بن عمر عبدَ الله بنَ إبراهيم، وهذا لم نقف له على ترجمة.وأخرج نحوه عبد الرزاق في "تفسيره 1/ 319 عن معمر، عن الجحشي: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال لحمنة بنت جحش … والجحشي هذا: هو سعيد بن عبد الرحمن بن جحش، وهو من صغار التابعين كما في "تقريب التهذيب"، وعليه فروايته لهذا الخبر مرسلة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7082)


7082 - أخبرني عبد العزيز بن عبد الرحمن الدبَّاس بمكة، حدَّثنا محمد بن علي بن زيد الصائغ، حدَّثنا إبراهيم بن المنذر الحِزامي، حدَّثنا عمر بن عثمان التَّيْمي [1]، عن أبيه، عن ابن شِهاب، أخبرني عُرْوة، أنَّ عائشة أخبرته: أَنَّ أَمَّ حَبيبةَ بنت جَحْش - وهي امرأةُ عبد الرحمن بن عوف، وهي أختُ زينبَ بنتِ جَحْش زوج النبيِّ صلى الله عليه وسلم - جاءت رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فحدَّثته: أنها استُحيضت سبعَ سنين، فاستفتَته في ذلك، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "إنَّ هذه ليست بالحَيْضة، لكن هذا عِرْقُ، فاغتسِلي ثم صلِّي"، فكانت تغتسلُ في مِرْكَنٍ حتى تعلوَ الماءَ حُمْرةُ الدَّم، ثم تقومُ فتُصلِّي [2]. ‌‌ذكرُ فاطمةَ بنت أبي حُبيشوهي من بني أَسَد [3] بن عبد العُزَّى، وهي خالة عبد الله بن أبي مُلَيكة المكي، رضي الله عنها.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উম্মু হাবীবা বিনতে জাহ্শ—যিনি আবদুর রহমান ইবনু আউফের স্ত্রী এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী যায়নাব বিনতে জাহ্শের বোন—রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলেন এবং তাঁকে জানালেন যে, তিনি সাত বছর যাবৎ ইস্তিহাযায় (অতিরিক্ত রক্তস্রাবে) ভুগছেন। তিনি এ বিষয়ে তাঁর কাছে ফতোয়া চাইলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটি হায়েয নয়, বরং এটি একটি শিরা (রগ)। সুতরাং তুমি গোসল করো এবং তারপর সালাত আদায় করো।" অতঃপর তিনি একটি বড় পাত্রে (মারকান-এ) গোসল করতেন, এমনকি রক্তের লালচে রং পানির উপর ভেসে উঠত। এরপর তিনি দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করতেন। ফাতেমা বিনতে আবূ হুবাইশ-এর বর্ণনা: তিনি বানু আসাদ ইবনু আবদুল উয্‌যার লোক ছিলেন এবং তিনি মক্কার আবদুল্লাহ ইবনু আবী মুলাইকার খালা ছিলেন। আল্লাহ্‌ তাঁর প্রতি সন্তুষ্ট হোন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في النسخ إلى: اليمني، إلا (ص) فتحرَّف فيها إلى: التميمي.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن. عمر بن عثمان: هو ابن عمر بن موسى بن عبيد الله بن معمر التيمي.وسلف برقم (625) من طريق عمرو بن الحارث، عن ابن شهاب، عن عروة بن الزُّبير وعَمْرة، عن عائشة.



7082 [3] - تحرَّف في النسخ إلى: أسيد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7083)


7083 - أخبرنا أبو الحسين محمد بن أحمد بن تَميم الخيَّاط ببغداد، حدَّثنا أبو قِلابة، حدَّثنا أبو عاصم، عن عثمان بن الأسود [1]، عن ابن أبي مُليكة: أنَّ خالتَه فاطمة بنت أبي حُبيش أتت عائشةَ، فقالت: إنِّي أخافُ أن أكونَ من أهل النار، لم أُصلِّ منذ نحوٍ من سنتين، فسألتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فقال: "لِتدَعِ الصلاةَ في كلِّ شهرٍ أيامَ قُروئها، ثم تتوضأ لكلِّ صلاة، فإنما هو عِرقٌ" [2]. ‌‌ذكرُ فاطمةَ بنت المُجَلِّل القُرشية أمِّ جَميل رضي الله عنها




ফাতিমা বিনত আবি হুবাইশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসেছিলেন এবং বলেছিলেন: "আমি আশঙ্কা করি যে আমি জাহান্নামের অধিবাসী হব, কারণ আমি প্রায় দুই বছর ধরে সালাত আদায় করিনি।" অতঃপর আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলাম, তখন তিনি বললেন: "সে যেন প্রতি মাসে তার ঋতুস্রাবের দিনগুলোতে সালাত ছেড়ে দেয়। অতঃপর সে যেন প্রত্যেক সালাতের জন্য ওযু করে, কারণ এটি শিরা থেকে নির্গত রক্ত মাত্র।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] كذا وقع في النسخ الخطية: ابن الأسود، وهو خطأ أو تحريف، فالحديث لا يعرف إلا بعثمان بن سعد، وقد جاء على الصواب عند المصنف في مكرره السالف برقم (633)، فقد رواه بالإسناد نفسه.



[2] إسناد ضعيف من أجل عثمان بن سعد - وهو القرشي - كما سلف بيانه عند مكرره (633).أبو قلابة: هو عبد الملك بن محمد بن عبد الله الرقاشي، وأبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد النبيل، وابن أبي مليكة: هو عبد الله بن عبيد الله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7084)


7084 - حدَّثنا أبو النَّضر الفقيه بالطَّابَران وأبو يحيى الخَتَنُ الفقيه ببُخارى، قالا: حدَّثنا صالح بن محمد بن حَبيب البغدادي، حدَّثنا سعيدٌ بن سليمان الواسطي، حدثني عبد الرحمن بن عثمان بن إبراهيم بن محمد بن حاطب القرشي، حدثني أبي عثمانُ، عن جدِّي محمد بن حاطب، عن أُمِّه أمِّ جميل قالت: أقبلتُ بك، حتى إذا كنتُ من المدينة بليلةٍ أو ليلتين طبختُ لك طَبيخًا، ففَنِيَ الحَطَبُ، فخرجتُ أطلُبُ الحطَبَ، فتناولتَ القِدرَ فانكفأَت على ذِراعك، فقدمتُ المدينة فأتيتُ بك النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فقلتُ: يا رسولَ الله، هذا محمدُ بن حاطب، وهو أولُ من سُمّي بكَ، فمَسَحَ على رأسِكَ ودعا بالبَرَكة، ثم تَفَلَ في فيك، وجعلَ يَتفُلُ على يَدِك ويقول: "أذهب البأسَ ربَّ الناس، اشفِ أنت الشافي، لا شِفاءَ إلا شفاؤُك، شفاءً لا يُغَادِرُ سقمًا" [1]. ‌‌ذكرُ أمِّ أيمنَ مولاةِ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم وحاضنتِه




উম্মু জামিল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি তোমাকে নিয়ে আসছিলাম। যখন আমি মদীনার এক রাত অথবা দুই রাতের দূরত্বে ছিলাম, তখন আমি তোমার জন্য রান্না করছিলাম। কাঠ ফুরিয়ে গেলে আমি কাঠ খুঁজতে বাইরে গেলাম। তুমি তখন হাঁড়ি ধরেছিলে এবং তা তোমার বাহুর উপর উল্টে পড়ে গেল। এরপর আমি মদীনায় পৌঁছলাম এবং তোমাকে নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম। আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! এ হলো মুহাম্মাদ ইবনু হাতিব, আর সে হলো আপনার নামে নাম রাখা প্রথম ব্যক্তি। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমার মাথায় হাত বুলিয়ে দিলেন এবং বরকতের জন্য দু'আ করলেন। এরপর তিনি তোমার মুখে থুথু দিলেন এবং তোমার হাতের ওপর থুথু দিতে লাগলেন আর বলতে লাগলেন: "আযহিবিল বা'সা রাব্বান নাস, ইশফি আনতাশ শাফি, লা শিফাআ ইল্লা শিফাউকা, শিফাআন লা ইউগাদিরু সাকামা।" (অর্থ: হে মানুষের রব! কষ্ট দূর করে দিন। আপনিই আরোগ্য দানকারী, আরোগ্য দান করুন। আপনি ছাড়া আরোগ্যদাতা কেউ নেই। এমন আরোগ্য দান করুন যা কোনো রোগকে অবশিষ্ট রাখে না।)




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حديث حسن، وهذا إسناد ضعيف، عبد الرحمن بن عثمان بن إبراهيم ضعفه أبو حاتم الرازي، وأورده ابن حبان في "الثقات"، وأبوه عثمان قال عنه أبو حاتم: يكتب حديثه وهو شيخ، وأورده ابن حبان في "الثقات" أيضًا، وهما متابعان.وأخرجه أحمد 24/ (15453) و 45/ (27466)، وابن حبان (2977) من طرق عن عبد الرحمن بن عثمان، بهذا الإسناد. وزادا في آخره. قالت: فما قمت بك من عنده حتى برئت يدك.وأخرجه مختصرًا بنحوه أحمد 24/ (15452) و (15454) و 30/ (18276) و (18277) و (18281)، والنسائي (7496) و (9944) و (10796 - 10798)، وابن حبان (2976) من طرق عن سماك بن حرب، عن محمد بن حاطب، به.وأما نصُّ دعائه صلى الله عليه وسلم، فهو صحيح، صحَّ من حديث عائشة عند البخاري (5675)، ومسلم (2191)، ومن حديث أنس بن مالك عند البخاري (5742).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7085)


7085 - حدَّثنا أبو عبد الله الأصبهاني، حدَّثنا الحسن بن الجَهْم، حدَّثنا الحسين بن الفَرَج، حدَّثنا محمد بن عمر قال: ومِنهنَّ أُمُّ أيمَنَ مولاةُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم وحاضنتُه، واسمُها بَرَكةُ، كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وَرِثَها وخمسةَ أجمال وقطعةَ غَنَم مما ذُكِرَ، فأعتقَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أمَّ أيمن حين تزوَّجَ خديجة، فتزوَّجها عبيدُ بن يزيد [1] من بني الحارث بن الخَزرج، فولدت له أيمن [2]، فقُتل يومَ حُنَين [3] شهيدًا.وكان زيدُ بن حارثة لخديجةَ، فوهبته لرسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فأعتَقه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وزوَّجه أمَّ أيمنَ بعدَ النُّبوة، فولدت له أسامةَ بن زيد.




মুহাম্মদ বিন উমর থেকে বর্ণিত, আর তাদের মধ্যে ছিলেন উম্মু আইমান, যিনি ছিলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুক্ত দাসী (মাওলাত) এবং তাঁর লালনকারিণী। তাঁর নাম ছিল বারাকাহ। যা কিছু উল্লেখ করা হয়েছে, তার মধ্যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে, পাঁচটি উট এবং কিছু সংখ্যক ভেড়ার উত্তরাধিকারী হয়েছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিবাহ করেন, তখন তিনি উম্মু আইমানকে মুক্ত করে দেন। অতঃপর উম্মু আইমানকে বনী হারিস বিন খাজরাজ গোত্রের উবায়েদ বিন ইয়াযিদ বিবাহ করেন। তাদের ঘরে আইমান জন্মগ্রহণ করেন। আইমান হুনাইনের যুদ্ধের দিন শহীদ হন। আর যায়েদ বিন হারিসা ছিলেন খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মালিকানাধীন। তিনি তাঁকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে হেবা (উপহার) করেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে মুক্ত করে দেন এবং নবুওয়াতের পর উম্মু আইমানের সাথে বিবাহ দেন। তাঁদের ঘরে উসামা বিন যায়েদ জন্মগ্রহণ করেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] كذا في النسخ الخطية: ابن يزيد، وفي "الطبقات" لابن سعد 5/ 368، و "الإصابة" لابن حجر: ابن زيد، وفي "معجم الصحابة" لابن قانع 1/ 54، و "معرفة الصحابة" لأبي نعيم 1/ 318: ابن عمرو.



[2] في النسخ: أم أيمن، وهو خطأ.



7085 [3] - تحرَّف في (ز) و (ب) خيبر، وضبب عليها في (ز)، وترك مكانها بياضًا في (م) و (ص)، والمحفوظ - كما في السير والتراجم - أنَّ أيمنَ استُشهد يوم حُنين.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7086)


7086 - فحدثني يحيى بن سعيد بن دينار، عن شيخ من بني سعد بن بكر قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يقول لأمِّ أيمنَ: "يا أمَّهْ"، وكان إذا نظَرَ إليها قال: "هذه بقيَّةُ أهلِ بيتي" [1].




উম্মু আইমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে (উম্মু আইমানকে) বলতেন, "ইয়া আম্মাহ্" (হে আমার মাগো)। আর যখন তিনি তাঁর দিকে তাকাতেন, তখন বলতেন, "ইনি হলেন আমার আহলে বাইতের (পরিবারের) অবশিষ্টজন।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف جدًّا، مسلسل بالضعفاء والمجاهيل والمبهمين.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 212 عن الواقدي، بهذا الإسناد.وانظر ما سيأتي برقم (7089).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7087)


7087 - أخبرنا أحمد بن كامل القاضي، حدَّثنا عبد الله بن رَوْح المَدائني، حدَّثنا شَبَابة، حدَّثنا أبو مالك النَّخَعي، عن الأسود بن قيس، عن نُبيحٍ العَنَزي، عن أمِّ أيمنَ قالت: قامَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم من الليل إلى فَخَّارٍ من جانب البيت [1] فبالَ فيها، فقمتُ من الليل وأنا عطشَى، فشربتُ ما في الفخَّارة وأنا لا أشعُرُ، فلما أصبحَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم قال: "يا أُمَّ أيمنَ، قُومي إلى تلك الفَخَّارةِ فأَهرِقي ما فيها"، قلت: قد والله شربتُ ما فيها، قالت: فضَحِكَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حتى بَدَتْ نواجِذُه، ثم قال: "أَمَا إِنَّكِ لَا تَيْجَعُ [2] بَطنُكِ بعدَه أبدًا" [3].




উম্মু আইমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক রাতে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘরের এক কোণে রাখা একটি মাটির পাত্রের কাছে উঠে গেলেন এবং তাতে পেশাব করলেন। এরপর আমি রাতের বেলায় উঠলাম, আর আমি ছিলাম পিপাসার্ত। আমি অজান্তে সেই মাটির পাত্রের ভেতরের জিনিস পান করে ফেললাম। যখন সকাল হলো, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হে উম্মু আইমান! তুমি সেই মাটির পাত্রটির কাছে যাও এবং এর ভেতরে যা আছে তা ফেলে দাও।" আমি বললাম, আল্লাহর কসম! আমি এর ভেতরের জিনিস পান করে ফেলেছি। তিনি (উম্মু আইমান) বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমনভাবে হাসলেন যে তাঁর মাড়ির দাঁত পর্যন্ত দেখা গেল। এরপর তিনি বললেন, "শুনে রাখো! এরপর তোমার পেটে আর কখনো ব্যথা হবে না।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] رسمت في (ز) و (ب): السه، بدون نقط، وضبب عليها، ومكانها بياض في (م) و (ص).والمثبت من مصادر التخريج.



[2] رسمت في النسخ: تفجع، ولا نراه يصح، والمثبت هو الموافق لمصادر التخريج، قال الجوهري في "الصحاح" 3/ 1294: وَجِعَ فلانٌ يَوجَع ويُبجَعُ وياجعُ، فهو وَجِعٌ. فإذا القدح ليس فيه شيء، فقال لامرأة يقال لها: بركة، كانت تخدم أم حبيبة جاءت بها من أرض الحبشة: "أين البول الذي كان في القَدَح؟ " قالت: شربتُه، فقال: "لقد احتظرتِ من النار بحِظار". وإسناده محتمل للتحسين، وقد سلف عند المصنف برقم (602) مختصرًا، وكذلك رواه مختصرًا أبو داود (25)، والنسائي (31)، وابن حبان (1426).



7087 [3] - إسناده واهٍ، أبو مالك النخعي - واسمه عبد الملك بن الحسين وقيل: عبادة بن الحسين - متروك الحديث، وسماع نبيح العنزي من أم أيمن، فيه نظر، قال الحافظ ابن حجر في "التلخيص الحبير" 1/ 66: نبيح لم يلحق أم أيمن.وقال الدارقطني في "العلل" (4106): يرويه أبو مالك النخعي - واسمه عبد الملك بن حسين - واختلف عنه:فرواه شبابة عن أبي مالك، عن الأسود بن قيس، عن نبيح العنزي، عن أم أيمن.وخالفه سلم بن قُتَيبة وقرة بن سليمان، فروياه عن أبي مالك، عن يعلى بن عطاء، عن الوليد بن عبد الرحمن، عن أم أيمن. وأبو مالك ضعيف، والاضطراب فيه من جهته.قلنا: أما رواية شبابة بن سوار التي عند المصنف، فأخرجها الطبري في "تاريخه" 11/ 621، والطبراني في "الكبير" 25/ (230)، وأبو نعيم في "الحلية" 2/ 67، وفي "دلائل النبوة" (365) من طرق عن شبابة، بهذا الإسناد.وأما طريق سلم بن قُتَيبة، فأخرجها أبو يعلى كما في "المطالب العالية" (3823) - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 4/ 303 - عن محمد بن أبي بكر المقدمي، عن سلم بن قُتَيبة، عن الحسن (وفي "تاريخ دمشق": الحسين) عن يعلى بن عطاء، عن الوليد بن عبد الرحمن، عن أم أيمن قالت: كان لرسول الله صلى الله عليه وسلم فخارة يبول فيها، فذكرته لكن جُعل فيه الحسن بن حرب أو الحسين بن حريث مكان أبي مالك النخعي، وهو خطأ أو تحريف، صوابه ما أخرجه ابن السكن كما في ترجمة أم أيمن مولاة النبي صلى الله عليه وسلم من "الإصابة" لابن حجر - من طريق عبد الملك بن حسين، عن يعلى بن عطاء، به. وعبد الملك بن حسين هو أبو مالك النخعي نفسه، فرجع الحديث إليه.وأخرج ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3342)، والطبراني في "الكبير" 24/ (477) و (527)، وابن المقرئ في "معجمه" (129)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (7517)، والبيهقي 7/ 67 من طريق ابن جريج، قال: حدثتني حكيمة بنت أميمة بنت رقيقة، عن أمها أنها قالت: كان النبي صلى الله عليه وسلم يبول في قدح عَيْدانٍ، ثم يُرفَع تحت سريره، فبال فيه، ثم جاء فأراده، فإذا القدح ليس فيه شيء، فقال لامرأة يقال لها: بركة، كانت تخدم أم حبيبة جاءت بها من أرض الحبشة: "أين البول الذي كان في القَدَح؟ " قالت: شربتُه، فقال: "لقد احتظرتِ من النار بحِظار". وإسناده محتمل للتحسين، وقد سلف عند المصنف برقم (602) مختصرًا، وكذلك رواه مختصرًا أبو داود (25)، والنسائي (31)، وابن حبان (1426).



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আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7088)


7088 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدَّثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حدَّثنا مصعب بن عبد الله قال: تُوفِّيَت أمُّ أيمن مولاةُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم وحاضنتُه في أولِ خلافةِ عثمانَ بن عفان رضي الله عنه.




মুস'আব ইবনে আব্দুল্লাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আযাদকৃত দাসী ও ধাত্রী উম্মু আইমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতের প্রথম দিকে ইনতিকাল করেন।









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7089)


7089 - حدثني أحمد بن محمد بن رُمَيح، حدَّثنا يحيى بن محمد بن صاعد، حدثني أبي قال: خاصمَ ابن أبي الفُرات مولى أسامةَ بن زيدٍ الحسنَ بن أُسامة ونازعَه، فقال له ابن أبي الفُرات في كلامه: يا ابنَ بَرَكةَ، يُريدُ أمَّ أيمن، فقال الحسن: اشْهَدُوا، ورفعَه إلى أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حَزْم وهو يومئذٍ قاضي المدينة، وقصَّ عليه القصةَ، فقال أبو بكر لابن أبي الفُرات: ما أردتَ بقولك له: يا ابنَ بركة؟ قال: سمَّيتُها باسمِها، فقال أبو بكر: إنما [1] أردتَ بهذا التصغيرَ بها، وحالُها من الإسلام حالُها، ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم يقول لها: "يا أمَّهْ" و "يا أمَّ أيمن"، لا أقالَني الله عز وجل إن أقَلتُك، فضربَه سبعينَ سوطًا [2]. ‌‌ذكرُ أَروى بنت كُرَيز القُرشية رضي الله عنها




(বর্ণনাকারীর) পিতা থেকে বর্ণিত, উসামা ইবনে যায়িদের আযাদকৃত গোলাম ইবনে আবুল ফুরাত, উসামার পুত্র হাসান ইবনে উসামার সাথে ঝগড়া ও বিবাদে লিপ্ত হলো। কথার একপর্যায়ে ইবনে আবুল ফুরাত তাকে বলল, "হে বারাকার পুত্র!"—এখানে সে উম্মে আইমানকে বোঝাতে চাইছিল। তখন হাসান বললেন, "তোমরা সাক্ষী থাকো!" এবং সে ঘটনাটি আবূ বকর ইবনে মুহাম্মাদ ইবনে আমর ইবনে হাযমের কাছে উত্থাপন করল, যিনি সেই সময় মদীনার কাযী (বিচারক) ছিলেন। সে তাঁর কাছে ঘটনাটি বর্ণনা করল। আবূ বকর ইবনে আবুল ফুরাতকে জিজ্ঞেস করলেন, "তাকে 'হে বারাকার পুত্র!' বলার মাধ্যমে তুমি কী বোঝাতে চেয়েছিলে?" সে বলল, "আমি তাঁর (উম্মে আইমানের) নাম ধরেই ডেকেছি।" আবূ বকর বললেন, "তুমি এর মাধ্যমে কেবল তাঁকে হেয় করতে চেয়েছো! অথচ ইসলামে তাঁর মর্যাদা অনেক উচ্চে। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে 'ইয়া উম্মাহ (ওহে আমার মা)' এবং 'ইয়া উম্মে আইমান' বলে ডাকতেন। আল্লাহ তা'আলা যেন আমাকে ক্ষমা না করেন, যদি আমি তোমাকে ক্ষমা করি।" অতঃপর তিনি তাকে সত্তরটি বেত্রাঘাত করলেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في (م) و (ص): لا إنما.



[2] إسناده ضعيف لإعضاله ولجهالة حال محمد بن صاعد والد يحيى.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 215 - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخه" 13/ 27 - عن الواقدي، فذكره.



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আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7090)


7090 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدَّثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حدَّثنا مصعب بن عبد الله الزُّبيري قال: أسلمت أروى بنتُ كُريز بن ربيعة بن حَبيب بن عبد شمس، وهاجرت إلى المدينة، وماتت في خلافةِ عثمانَ رضي الله عنه. ‌‌ذكرُ أسماءَ بنتِ أبي بكر الصِّدِّيق رضي الله عنهما




মুসআব ইবনু আব্দুল্লাহ আয-যুবাইরি থেকে বর্ণিত, আরওয়া বিনত কুরাইয ইবনু রাবীআহ ইবনু হাবীব ইবনু আবদি শামস ইসলাম গ্রহণ করেন, মদীনায় হিজরত করেন এবং উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খেলাফতকালে মৃত্যুবরণ করেন। আসমা বিনত আবী বাকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আলোচনা।









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7091)


7091 - حدَّثنا أبو عبد الله الأصبهاني، حدَّثنا الحسن بن الجَهْم، حدَّثنا الحسين بن الفَرَج، حدَّثنا محمد بن عمر قال: وأسماءُ بنتُ أبي بكر، أمُّها قُتيلة بنت عبد العُزَّى بن أسعد بن جابر بن مالك بن حِسْل بن عامر بن لؤي، وهي أختُ عبد الله بن أبي بكر لأبيه وأمِّه، أسلمت قديمًا بمكة، وبايعت رسول الله صلى الله عليه وسلم، تزوَّجها الزُّبيرُ بن العوَّام، فولدت له عبد الله وعُرْوة وعاصمًا والمُهاجرَ وخديجةَ الكبرى وأمَّ الحسن وعائشة بنت الزُّبير، سبعةً.




মুহাম্মদ বিন উমর থেকে বর্ণিত, আসমা বিনত আবি বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তাঁর মাতা ছিলেন কুতাইলা বিনত আব্দুল উযযা ইবনে আসআদ ইবনে জাবির ইবনে মালিক ইবনে হিসল ইবনে আমির ইবনে লুয়াই। তিনি তাঁর পিতা-মাতার দিক থেকে আব্দুল্লাহ ইবনে আবি বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সহোদরা বোন ছিলেন। তিনি মক্কায় বহু পূর্বে ইসলাম গ্রহণ করেন এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাতে বাইয়াত গ্রহণ করেন। তিনি যুবাইর ইবনুল আওয়াম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিবাহ করেন এবং তাঁর ঔরসে আব্দুল্লাহ, উরওয়া, আসিম, মুহাজির, খাদীজা আল-কুবরা, উম্মুল হাসান এবং আয়িশা বিনত যুবাইর—এই সাতজন জন্মগ্রহণ করেন।









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7092)


7092 - أخبرني عبد الله بن الحسين القاضي بمَرْوٍ، حدَّثنا الحارث بن أبي أسامة، حدَّثنا داود بن المُحبَّر، حدَّثنا حماد بن سلمة، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن أسماء بنت أبي بكر: أنها اتخذت خَنْجرًا في زمن سعيد بن العاص في الفتنة، فوضعته تحت مِرفَقتِها، فقيل لها: ما تصنعين بهذا؟ قالت: إن دَخَلَ عليَّ لِصٌّ بَعَجِتُ بطنَه، وكانت عمياءَ [1].




আসমা বিনত আবি বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি সাঈদ ইবনু আসের শাসনামলে ফিতনার সময় একটি ছুরি (খঞ্জর) গ্রহণ করলেন এবং তা তার হাতের কনুইয়ের নিচে রাখতেন। তাকে জিজ্ঞাসা করা হলো: আপনি এটা দিয়ে কী করবেন? তিনি বললেন: যদি কোনো চোর আমার কাছে প্রবেশ করে, তবে আমি তার পেট চিরে ফেলব। অথচ তিনি ছিলেন অন্ধ।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] خبر صحيح، داود بن المحبر - وإن كان متروكًا - متابع.وأخرجه الطبري في "ذيل المذيل" كما في "منتخبه" 11/ 616 عن الحارث بن أبي أسامة، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 10/ 241 - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخه" 69/ 20 - عن يزيد بن هارون، عن حماد بن سلمة، عن هشام بن عروة، عن أبيه، أو عن فاطمة بنت المنذر: أنَّ أسماء بنت أبي بكر اتخذت خنجرًا زمن سعيد بن العاص للصوص، وكانوا قد استعرُّوا بالمدينة، فكانت تجعله تحت رأسها. قلنا: "واستعرُّوا" أي: كثروا وساءَت أخلاقهم.المِرفقة: المِخدَّة والمتَّكَأ.



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আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7093)


7093 - أخبرني أبو بكر بن بالَوَيهِ، حدَّثنا إبراهيم بن إسحاق، حدَّثنا مصعب بن عبد الله قال: ماتت أسماءُ بنت أبي بكر بعد قتلِ ابنِها عبد الله بن الزُّبير بليالٍ، وكان قتلُه يومَ الثلاثاء لسبعَ عشرةَ ليلةً خلت من جُمادى الأولى، سنة ثلاثٍ وسبعين. ‌‌ذكرُ ضُبَاعَةَ بنتِ الزُّبير رضي الله عنها




মুসআব ইবনু আব্দুল্লাহ থেকে বর্ণিত, আসমা বিনত আবি বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর পুত্র আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবায়ের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিহত হওয়ার কয়েক রাত পরে ইন্তেকাল করেন। আর তাঁকে (আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবায়েরকে) হত্যা করা হয়েছিল তিয়াত্তর সনের জুমাদাল ঊলা মাসের সতেরো রাত অতিবাহিত হওয়ার পর, মঙ্গলবার দিনে। দুব্বাআ বিনত যুবায়ের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আলোচনা।









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7094)


7094 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدَّثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حدَّثنا مصعب بن عبد الله الزُّبيري قال: وضُباعةُ بنتُ الزُّبير بن عبد المطلب بن هاشم زوَّجها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم من المِقداد بن عمرو بن ثعلبة، فولدت له عبد الله وكَريمةَ، وقُتل عبدُ الله يومَ الجَمَل مع عائشة، فمرَّ به عليٌّ قتيلًا، فقال: بئسَ ابن الأخت.




মুসআব ইবনে আবদুল্লাহ আয-যুবাইরি থেকে বর্ণিত, দুবাআ বিনত আয-যুবাইর ইবনে আব্দুল মুত্তালিব ইবনে হাশিমকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিকদাদ ইবনে আমর ইবনে সা'লাবার সাথে বিবাহ দেন। অতঃপর তিনি তার জন্য আবদুল্লাহ ও কারীমা নামের সন্তান জন্ম দেন। আবদুল্লাহ আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে জামাল (উট)-এর যুদ্ধের দিন নিহত হন। যখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিহত অবস্থায় তার পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, তখন তিনি বললেন: "ভাগ্নের জন্য এই পরিণতি কতই না মন্দ।"









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7095)


7095 - حدَّثنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفَّار، حدَّثنا أحمد بن مَهدي بن رُسْتُم الأصبهاني، حدَّثنا عبد الصمد بن عبد الوارث، حدَّثنا همَّام بن يحيى، عن قَتَادةَ، عن إسحاق بن عبد الله بن الحارث، عن جدَّته أمِّ الحَكَم، عن أختِها ضُباعةَ بنت الزُّبير: أنها دَفَعَت إلى رسولِ الله صلى الله عليه وسلم لحمًا، فنَهَسَ منه، ثم صلَّى ولم يتوضَّأ [1]. ‌‌وأما أختُها أُمُّ الحَكَم بنت الزُّبير [2] رضي الله عنها




দুবাআ বিনতে জুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গোশত পেশ করলেন। অতঃপর তিনি তা থেকে কামড় দিয়ে খেলেন, এরপর তিনি সালাত আদায় করলেন কিন্তু উযু করেননি [১]। আর তার বোন উম্মুল হাকাম বিনতে জুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ব্যাপারে [২]।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن اختلف فيه على قتادة وعلى غيره ممن رواه عن إسحاق بن عبد الله بن الحارث كما هم مُبيَّن في "مسند أحمد" عند الرواية (27091).وقد ترجم المزي في "تهذيبه" لأم الحكم فقال: ويقال: أم حَكيم صفية، ويقال: عاتكة، ويقال: ضباعة بنت الزبير بن عبد المطلب بن هاشم القرشية الهاشمية بنت عم النبي صلى الله عليه وسلم.وأخرجه أحمد 45/ (27357) عن عبد الصمد بن عبد الوارث، بهذا الإسناد. وقال فيه: عن جدته أم حكيم. وقرن بعبد الصمد عفان بن مسلم.وانظر ما سيأتي برقمي (7097) و (7098).ويشهد له حديثُ ابن عباس عند البخاري (207)، ومسلم (354): أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أكل كتف شاة، ثم صلَّى ولم يتوضأ.وحديثُ ميمونة عند البخاري (210)، ومسلم (356).



[2] ويقال: هي ضُباعة بنت الزبير كما في التعليق السابق.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7096)


7096 - فحدثنا أبو عبد الله الأصبهاني، حدَّثنا الحسن بن الجَهْم، حدَّثنا الحسين بن الفَرَج، حدَّثنا محمد بن عمر قال: وأمُّ الحَكَم بنت الزُّبير بن عبد المطلب بن هاشم تزوَّجها ربيعةُ بن الحارث بن عبد المطلب، فولدت له محمدًا وعبّاسًا وعبد شمس وعبدَ المطلب وأُميّة - رجلٌ [1]. وأروى الكبرى.




মুহাম্মদ ইবন উমার থেকে বর্ণিত, উম্মুল হাকাম বিনত যুবাইর ইবন আব্দুল মুত্তালিব ইবন হাশিমকে রাবীআহ ইবনুল হারিস ইবন আব্দুল মুত্তালিব বিবাহ করেন। তিনি তাঁর জন্য মুহাম্মদ, আব্বাস, আবদ শামস, আব্দুল মুত্তালিব এবং উমাইয়্যাহ—একজন পুরুষ (ছেলে) [1]—ও আরওয়া আল-কুবরা-কে জন্ম দেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] لفظ "رجل" ليس في (م) و (ص). وأخرجه الحارث بن أبي أسامة في "مسنده" كما في "بغية الباحث" (95) - ومن طريقه أبو نعيم في "المعرفة" (7897) - عن داود بن المحبر، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3158) عن هدبة بن خالد، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" 1/ 65، والطبراني في "الكبير" 25/ (213) من طريق حجاج بن المنهال، ثلاثتهم عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7097)


7097 - حدَّثنا أبو عمرو عثمان بن أحمد السمَّاك، حدَّثنا عبد الرحمن بن محمد الحارثي، حدَّثنا معاذ بن هشام، حدثني أبي، عن قَتَادةَ، عن إسحاق بن عبد الله بن نَوْفل، عن أمِّ الحَكَم بنت الزُّبير: أنها ناولت النبيَّ صلى الله عليه وسلم كَتِفًا من لحم، فأكل منها ثم صلى [1].قد وَهِمَ حماد بن سَلَمة رحمه الله في هذا الاسم فقال: أم حَكِيم [2].




উম্মুল হাকাম বিনত আয-যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এক টুকরা মাংসের কাঁধ এগিয়ে দিলেন। তিনি তা থেকে খেলেন, অতঃপর সালাত আদায় করলেন। হাম্মাদ ইবনু সালামা (রাহিমাহুল্লাহ) এই নামের ব্যাপারে ভুল করেছেন এবং ‘উম্মু হাকীম’ বলেছেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات غير عبد الرحمن الحارثي، وقد توبع، واختلف فيه على قتادة وعلى غيره ممّن رواه عن إسحاق بن عبد الله بن الحارث كما هو مُبيَّن في "مسند أحمد" عند الرواية (27091).وأخرجه أحمد 45/ (27356) عن معاذ بن هشام، بهذا الإسناد. وقال فيه: عن أم حكيم.وأخرجه أحمد (27091) و (27354) عن يزيد بن هارون، و (27355) عن روح بن عبادة، كلاهما عن سعيد بن أبي عروبة، عن قَتادةَ، عن صالح أبي الخليل، عن عبد الله بن الحارث بن نوفل، عن أم حكيم بنت الزبير.وانظر الحديث التالي، وما سلف برقم (7095). وأخرجه الحارث بن أبي أسامة في "مسنده" كما في "بغية الباحث" (95) - ومن طريقه أبو نعيم في "المعرفة" (7897) - عن داود بن المحبر، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3158) عن هدبة بن خالد، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" 1/ 65، والطبراني في "الكبير" 25/ (213) من طريق حجاج بن المنهال، ثلاثتهم عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.



[2] قد وقع تسميتها بأم حكيمٍ أيضًا عن إسحاق بن راهويه في "مسنده" (2169) عن عبد الأعلى، عن داود بن أبي هند، عن إسحاق بن عبد الله بن الحارث، أنَّ أم حكيم بنت الزبير قالت؛ فذكر هذا الحديث. وأخرجه الحارث بن أبي أسامة في "مسنده" كما في "بغية الباحث" (95) - ومن طريقه أبو نعيم في "المعرفة" (7897) - عن داود بن المحبر، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3158) عن هدبة بن خالد، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" 1/ 65، والطبراني في "الكبير" 25/ (213) من طريق حجاج بن المنهال، ثلاثتهم عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7098)


7098 - كما حدَّثَناه إبراهيم بن عِصمةَ العَدْل، حدَّثنا السَّري بن خُزيمة، حدَّثنا موسى بن إسماعيل، حدَّثنا حماد بن سَلَمة، عن عمار مولى بني هاشم، عن أُمِّ حَكِيم ابنة عبد المطلب قالت: أكلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عندي عظمًا، فجاء بلالٌ فآذنَه بالصلاة، فصلَّى ولم يتوضَّأ [1]. ‌‌ذكرُ أُمامةَ بنتِ حمزةَ بن عبد المطلب رضي الله عنهما




উম্মু হাকীম বিনতে আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে একটি মাংসখণ্ড খেলেন। অতঃপর বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে সালাতের জন্য তাঁকে খবর দিলেন। অতঃপর তিনি সালাত আদায় করলেন, কিন্তু ওযু করলেন না।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] صحيح لغيره، رجاله ثقات، فإن كان عمار مولى بني هاشم - وهو عمار بن أبي عمار - سمع من أم حكيم، فالإسناد صحيح، لكن لا يُعرف له رواية عنها في غير هذا الحديث، والله أعلم. وأخرجه الحارث بن أبي أسامة في "مسنده" كما في "بغية الباحث" (95) - ومن طريقه أبو نعيم في "المعرفة" (7897) - عن داود بن المحبر، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3158) عن هدبة بن خالد، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" 1/ 65، والطبراني في "الكبير" 25/ (213) من طريق حجاج بن المنهال، ثلاثتهم عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.



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