আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
7119 - حدثني [1] علي بن محمد بن عُبيد الله العُمري، حدثني منصور بن عبد الرحمن، عن أمِّه [2]، عن برَّةَ بنتِ أبي تَجْراة قالت: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم حينَ أراد الله كرامتَه وابتداءَه بالنُّبوة، كان إذا خرجَ لحاجتِه أبعدَ حتى لا يَرَى بيتًا ويُفضي إلى الشِّعاب وبُطون الأودية، فلا يمرُّ بحَجَرٍ ولا شَجَرٍ إلَّا قالت: السلامُ عليك يا رسولَ الله، وكان يَلتفِتُ عن يمينه وعن شماله وخلفَه فلا يرى أحدًا [3]. ذكرُ حَبيبة بنتِ أبي تَجْراة رضي الله عنها
বাররাহ বিন্ত আবি তাজরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন আল্লাহ তাআলা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সম্মান দান করার এবং তাঁর নবুয়তের সূচনা করার ইচ্ছা করলেন, তখন তিনি যখন নিজের প্রয়োজনে (হাজতে) বের হতেন, এত দূরে চলে যেতেন যে কোনো বাড়িঘর দেখতে পেতেন না এবং (পাহাড়ের) সংকীর্ণ পথ ও উপত্যকার গভীরে চলে যেতেন। তিনি কোনো পাথর বা গাছের পাশ দিয়ে অতিক্রম করতেন না, যা বলত না: 'আসসালামু আলাইকা ইয়া রাসূলুল্লাহ' (হে আল্লাহর রাসূল, আপনার উপর শান্তি বর্ষিত হোক)। আর তিনি তখন ডানে, বামে ও পেছনে ফিরে তাকাতেন, কিন্তু কাউকে দেখতে পেতেন না।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] القائل هو محمد بن عمر الواقدي.
[2] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: أبيه. والتصويب من مصادر التخريج.
7119 [3] - إسناده ضعيف، وعلي بن محمد بن عبيد الله لم نقف له على ترجمة. منصور بن عبد الرحمن: هو ابن طلحة العبدري، وأمه: هي صفية بنت شيبة. وضعفه الذهبي في "التلخيص".وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 1/ 132 و 10/ 234، ومن طريقه الطبري في "تاريخه" 2/ 295.وأخرجه الفاكهي في "أخبار مكة" (2902) عن عبد الله بن شبيب الربعي، عن ابن أبي أويس، عن مسلم بن خالد، عن داود بن عبد الرحمن، عن منصور بن عبد الرحمن الحجبي، به. وإسنادُه واهٍ من أجل عبد الله بن شبيب، لا يفرح به.وفي الباب عن جابر بن سمرة عند مسلم (2277) مرفوعًا: "إني لأعرف حجرًا بمكة كان يُسلِّم عليَّ قبل أن أُبعث، إني لأعرفه الآن".وعن علي سلف برقم (4284)، وسنده ضعيف جدًّا.
7120 - أخبرني مَخْلد بن جعفر، حدَّثنا محمد بن جَرير، حدثني محمد بن عمر بن علي المُقدَّمي، حدَّثنا الخليل بن عثمان [1]، قال: سمعتُ عبد الله بن نُبَيهٍ يُحدِّث عن جدَّته صفيةَ بنت شَيْبة، عن حَبيبةَ بنت أبي تَجْراة قالت: كانت لنا صُفَّةٌ في الجاهلية، قالت: فاطَّلعتُ من كُوَّةٍ بين الصَّفا والمَروةِ، فأشرفتُ على رسول الله صلى الله عليه وسلم، وإذا هو يَسعَى ويقولُ لأصحابه: "اسْعَوا، فإِنَّ الله تعالى كَتَبَ عليكم السَّعْيَ"، قالت: رأيتُه في شِدَّة السعي يَدورُ الإزارُ حولَ بطنِه حتى رأيتُ بياضَ إبطَيْه وفَخِذيه [2].
হাবীবা বিন্তে আবী তাজরাআহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, জাহিলিয়্যাতের যুগে আমাদের একটি চত্বর ছিল। তিনি বলেন, তখন আমি সাফা ও মারওয়ার মাঝখানের একটি জানালা দিয়ে উঁকি দিলাম, আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে দেখলাম। তিনি সাঈ (দৌড়ানো) করছিলেন এবং তাঁর সাহাবীদেরকে বলছিলেন: "তোমরা সাঈ করো, কারণ আল্লাহ তাআলা তোমাদের উপর সাঈ ফরয করেছেন।" তিনি বলেন, আমি তাঁকে সাঈয়ের তীব্রতার কারণে এমন অবস্থায় দেখলাম যে তাঁর লুঙ্গি পেটের চারপাশে ঘুরে গিয়েছিল, এমনকি আমি তাঁর বগল ও উরুর শুভ্রতাও দেখতে পেলাম।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: عمر، والتصويب من مصدري التخريج، وهو الذي أثبته المزي في شيوخ محمد المقدمي من "تهذيب الكمال".
[2] حسن بطرقه، وهذا إسناد ضعيف، الخليل بن عثمان - وهو التميمي كما في رواية الطبراني - وعبد الله بن نُبيه لم نقف لهما على ترجمة. وضعفه الذهبي في "التلخيص".وأخرجه ابن خزيمة (2764)، والطبراني في "الكبير" 24/ (576) من طريق محمد بن عمر المقدمي، بهذا الإسناد.
7121 - حدَّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدَّثنا محمد بن عبيد الله المُنادي، حدَّثنا يونس بن محمد المُؤدِّب، حدَّثنا عبد الله بن المُؤمَّل المكي، عن عمر بن عبد الرحمن بن مُحيصِن، حدثني عطاء بن أبي رباح، عن حَبيبةَ بنت أبي تَجْراة قالت: دخلتُ دار أبي حُسين في نِسوةٍ من قريش، ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم يطوفُ بين الصَّفا والمَرْوة، وهو يَسعَى يَدورُ به إزارُه من شِدَّة السَّعْي، وهو يقولُ لأصحابه: "اسْعَوا، فإنَّ الله عز وجل كتَبَ عليكم السَّعْيَ" [1]. ذكرُ أمِّ فَرُوةَ بنت أبي قُحافة أختِ أبي بكر الصِّدِّيق رضي الله عنهما
হাবীবা বিন্তে আবি তাজরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি কুরাইশের কিছু মহিলার সাথে আবূ হুসাইনের বাড়িতে প্রবেশ করলাম, আর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন সাফা ও মারওয়ার মধ্যে তাওয়াফ (সাঈ) করছিলেন। তিনি দ্রুত চলছিলেন, আর দ্রুত গতির কারণে তাঁর লুঙ্গি তাঁর চারপাশে ঘুরছিল। তিনি তাঁর সাহাবীগণকে বলছিলেন: "তোমরা দ্রুত চলো (সাঈ করো), কেননা আল্লাহ আযযা ওয়া জাল তোমাদের উপর সাঈ ফরয করেছেন।" আবূ বকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বোন আবূ কুহাফার কন্যা উম্মু ফারওয়ার আলোচনা।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حسن بطرقه كسابقه، وهذا إسناد ضعيف لضعف عبد الله بن المؤمل، على انقطاع فيه، فقد أسقط عبد الله بن المؤمل منه الواسطة بين عطاء وحبيبة، وهي صفيةُ بنت شيبة، واضطرب فيه كثيرًا، قال ابن القطان الفاسي: وعندي أنَّ الخطأ فيه إنما هو من عبد الله بن المؤمل … يحتمل بسوء حفظه أن يحمل عليه، وقد ظهر اضطرابه في الحديث، فأسقط عطاء تارة، وابن محيصن أخرى، وصفية بنت شيبة أخرى، وأبدل ابن محيصن بابن أبي حسين أخرى، وجعل المرأة عبدرية تارة، ومن أهل اليمن أخرى، وفي الطواف تارة، وفي السعي بين الصفا والمروة أخرى، وهو دليل على سوء حفظه وقلة ضبطه. وانظر تفصيل القول فيه في "مسند أحمد".وقال الدارقطني في "العلل" (4117): والصحيح قول من قال: عن ابن محيصن، عن عطاء، عن صفية، عن حبيبة بنت أبي تجراة.وأخرجه أحمد 44/ (27367) عن يونس بن محمد، عن عبد الله بن المؤمل، عن عمر بن عبد الرحمن، عن عطاء، عن صفية بنت شيبة، عن حبيبة بنت أبي تجراة. فذكر الواسطة بين عطاء وحبيبة.وأخرجه أحمد أيضًا (27368) عن سريج بن النعمان، عن عبد الله بن المؤمل، عن عطاء، عن صفية بنت شيبة، عن حبيبة بنت أبي تجراة. فأسقط منه ابن محيصن.وأخرجه أحمد 45/ (27463) عن عبد الرزاق، عن معمر، عن واصل مولى أبي عيينة، عن موسى بن عبيد، عن صفية بنت شيبة، أن امرأة أخبرتها: أنها سمعت النبي صلى الله عليه وسلم بين الصفا والمروة يقول: "كتب عليكم السعي، فاسعوا". وموسى بن عبيد - وليس بالربذي - مستور، روى عنه اثنان، وذكره ابن حبان في "ثقاته"، واختلف فيه أيضًا على عبد الرزاق كما هو مبين في "المسند".وانظر أيضًا "مسند أحمد" 45/ (27281).
7122 - حدثني أبو بكر بن بالَوَيهِ، حدَّثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حدَّثنا مصعب بن عبد الله قال: وأمُّ فَرُوةَ بنت أبي قُحافة أخت أبي بكر الصدِّيق عمَّةُ عائشة، وأمُّها هِند بنت نُقَيد [1] بن بُجَير بن عَبد [2] بن قُصَي، زوَّجها أبو بكرٍ الأشعثَ بنَ قيس، فولدت له محمدًا وإسحاقَ وحَبَّانة [3] وقَريبة، وعاشت بعد النبي صلى الله عليه وسلم. ذكرُ أُمَيمة بنتِ رُقَيقة رضي الله عنها
মুসআব ইবনু আবদুল্লাহ্ থেকে বর্ণিত, আর উম্মু ফারওয়াহ বিনতে আবী কুহাফা ছিলেন আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বোন এবং আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ফুফু। এবং তাঁর মা ছিলেন হিন্দ বিনতে নুকাইদ ইবনু বুজাইর ইবনু আব্দ ইবনু কুসাই। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে আশ'আছ ইবনু কায়সের সাথে বিবাহ দিয়েছিলেন। তিনি তার জন্য মুহাম্মদ, ইসহাক, হাব্বানাহ ও ক্বারীবাহকে জন্ম দিয়েছিলেন। আর তিনি নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরেও জীবিত ছিলেন। উমাইমাহ বিনতে রুকায়কাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সম্পর্কে আলোচনা।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في النسخ إلى: نفيل، والتصويب من "طبقات ابن سعد" 6/ 78 و 10/ 236، و "ثقات ابن حبان" 3/ 350، و "سير أعلام النبلاء" للذهبي 3/ 439، وغيرها. وأخرجه تامًّا ومختصرًا أحمد (27006) و (27008) و (27009) و (27010)، وابن ماجه (2874)، والترمذي (1597)، والنسائي (7756) و (7765) و (8660) و (8672) و (9196) و (11525)، وابن حبان (4553) من طرق عن محمد بن المنكدر، به.
[2] تحرَّف في النسخ إلى: عبيد، وليس في ولد قصي بن عُبيدٌ مصغرًا، إنما هو عَبْد، انظر "جمهرة الأنساب" لابن حزم ص 14 و 128، و "الاستيعاب" لابن عبد البر ص 959. وأخرجه تامًّا ومختصرًا أحمد (27006) و (27008) و (27009) و (27010)، وابن ماجه (2874)، والترمذي (1597)، والنسائي (7756) و (7765) و (8660) و (8672) و (9196) و (11525)، وابن حبان (4553) من طرق عن محمد بن المنكدر، به.
7122 [3] - تحرَّف في النسخ إلى: حياة، والمثبت من "توضيح المشتبه" لابن ناصر الدين 3/ 50 و 7/ 208، ومثله في "طبقات ابن سعد" 6/ 78. وأخرجه تامًّا ومختصرًا أحمد (27006) و (27008) و (27009) و (27010)، وابن ماجه (2874)، والترمذي (1597)، والنسائي (7756) و (7765) و (8660) و (8672) و (9196) و (11525)، وابن حبان (4553) من طرق عن محمد بن المنكدر، به.
7123 - حدَّثنا أبو العبّاس محمد بن يعقوب، حدَّثنا أحمد بن عبد الجبار، حدَّثنا يونس بن بُكير، عن ابن إسحاق، حدثني محمد بن المُنكدر، عن أُميمة بنت رُقَيقة التميمية قالت: بايعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم في النِّسوة من المسلمين، فقلنا له: جئناك يا رسولَ الله نبايعُك على أن لا نُشرِكَ بالله شيئًا، ولا نَسرِقَ، ولا نزنيَ، ولا نقتُلَ أولادَنا، ولا نأتيَ ببُهتانٍ نفتريه بين أيدينا وأرجلِنا، ولا نَعصيَك في معروفٍ، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "فيما استطعتُنَّ وأطقتُنَّ" فقلنا: الله ورسولُه أرحمُ بنا من أنفسِنا، فقلنا: بايِعْنا يا رسولَ الله، قال: "اذهبْنَ، قد بايعتُكنَّ، إنما قولي لامرأةٍ واحدةٍ كقَولي لمئةِ امرأةٍ"، وما صافحَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم منَّا أحدًا [1].
উমাইমা বিনত রুকাইকাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি মুসলিম নারীদের সাথে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বায়আত গ্রহণ করি। আমরা তাঁকে বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা আপনার কাছে এসেছি এই শর্তে বায়আত করার জন্য যে, আমরা আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করব না, চুরি করব না, ব্যভিচার করব না, আমাদের সন্তানদের হত্যা করব না, নিজেদের হাত ও পায়ের সামনে (মনগড়া) কোনো মিথ্যা অপবাদ রটনা করব না, আর কোনো ভালো কাজে আমরা আপনার অবাধ্যতা করব না। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যতটুকু তোমরা সাধ্যমত এবং সামর্থ্য অনুযায়ী করতে পারো।" আমরা বললাম: আল্লাহ এবং তাঁর রাসূল আমাদের প্রতি আমাদের নিজেদের চেয়েও অধিক দয়ালু। আমরা বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাদের বায়আত গ্রহণ করুন। তিনি বললেন: "তোমরা যাও, আমি তোমাদের বায়আত গ্রহণ করেছি। নিশ্চয়ই আমার কথা একজন নারীর জন্য যেমন, একশ নারীর জন্যও তেমন।" আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের মধ্যে কোনো নারীর সাথে মুসাফাহা (হস্তমর্দন) করেননি।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن، وابن إسحاق - وهو محمد - قد صرَّح بالتحديث، فانتفت شبهة تدليسه، وقد توبع.وأخرجه أحمد 44/ (27007) من طريق إبراهيم بن سعد، عن ابن إسحاق، بهذا الإسناد. وأخرجه تامًّا ومختصرًا أحمد (27006) و (27008) و (27009) و (27010)، وابن ماجه (2874)، والترمذي (1597)، والنسائي (7756) و (7765) و (8660) و (8672) و (9196) و (11525)، وابن حبان (4553) من طرق عن محمد بن المنكدر، به.
7124 - حدَّثنا أبو عبد الله الأصبهاني، حدَّثنا الحسن بن الجَهْم، حدَّثنا الحسين بن الفَرَج، حدَّثنا محمد بن عمر قال: أُميمة بنت رُقَيقةَ ورُقَيقةُ أمُّها، وأبوها عبدُ الله بن بِجاد بن عُمير بن الحارث بن حارثة بن سعد بن تَيْم بن مُرَّة، وأمُّها رُقَيقةُ بنتُ خُوَيلد بن أسد بن عبد العُزَّى أختُ خديجةَ بنت خُوَيلد بن أسد بن عبد العزَّى زوج النبيِّ صلى الله عليه وسلم، واغتَرَبتْ [1] أُمَيمةُ فتزوَّجها حبيبُ بن كُعَيب بن عُتير الثَّقفي، فولدت له، وعاشت أُميمةُ بنت رُقيقةً بعدَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، وروَتْ عنه.
মুহাম্মদ ইবন উমার থেকে বর্ণিত, উমাইমা বিনত রুকায়কাহ। রুকায়কাহ হলেন তাঁর মা। আর উমাইমার পিতা ছিলেন আবদুল্লাহ ইবন বিজাদ ইবন উমাইর ইবনুল হারিস ইবন হারিসা ইবন সা‘দ ইবন তাইম ইবন মুররাহ। এবং তাঁর মা রুকায়কাহ বিনত খুওয়াইলিদ ইবন আসাদ ইবন আবদুল উযযা ছিলেন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী খাদীজা বিনত খুওয়াইলিদ ইবন আসাদ ইবন আবদুল উযযার বোন। উমাইমা স্থানান্তরে চলে গেলেন এবং তাঁকে বিবাহ করলেন হাবীব ইবন কু‘আইব ইবন উতাইর আস-সাকাফী। তিনি তাঁর ঘরে সন্তানের জন্ম দেন। আর উমাইমা বিনত রুকায়কাহ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরে জীবিত ছিলেন এবং তাঁর থেকে (হাদীস) বর্ণনা করেছেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] قال الجوهري في "الصحاح" 1/ 191: اغترب فلانٌ: إذا تزوَّج إلى غير أقاربه. ابن رومان، عن عروة، عن بريرة، أنها قالت: كان فيَّ ثلاث من السنة تصدق علي بلحم، فأهديته لعائشة، فدخل رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: "ما هذا اللحم؟ " فقالت: لحم تُصدّق به على بريرة فأهدته لنا، فقال: "هو على بريرة صدقة ولنا هدية"، وكاتبتُ على تسع أواق، فقالت عائشة: إن شاء مواليك عددتُ لهم ثمنك عدةً واحدةً، فقالت: إنهم يقولون إلا أن تشترطي لهم الولاء، فذكرت ذلك للنبيِّ صلى الله عليه وسلم، فقال: "اشتريها واشترطي لهم، فإنما الولاءُ لمن أعتق" قالت: وأعتقني فكان لي الخيار. ونقل المزي في "تحفة الأشراف" (15784): أنَّ النسائي قال عقبه: حديث يزيد بن رومان خطأ. يعني أن الصواب حديث عروة عن عائشة، لا عن بريرة.وكذلك رواه وهيبُ بن خالد على الصواب فخالف الثقفيَّ عند مسلم (1504) (13)، والنسائي (5616)، فرواه عن عبيد الله بن عمر، عن يزيد بن رومان، عن عروة، عن عائشة مختصرًا، فجعله من حديث عائشة. وكذلك رواه الناس من غير طريق عروة.فأخرجه أحمد 40/ (24187)، والبخاري (2578)، ومسلم (1504) (10)، وابن حبان (4269) و (5115) من طريق عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة، قالت: كان في بريرة ثلاث قضيّات: أراد أهلها أن يبيعوها ويشترطوا ولاءها، فذكرت ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم، فقال: "اشتريها وأعتقيها، فإنَّ الولاء لمن أعتق" قالت: وعتقت، فخيرها رسول الله صلى الله عليه وسلم فاختارت نفسها، قالت: وكان الناس يتصدقون عليها وتهدي لنا، فذكرت ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم، فقال: "هو عليها صدقة، وهو لكم هدية، فكلوه".وبنحوه أخرجه أحمد 42/ (25452) و (25468)، والبخاري (5097)، و (5279)، و (5430)، ومسلم (1504) (14)، وابن ماجه (2076)، والنسائي (5611)، وابن حبان (5116) من غير طريقٍ عن القاسم، عن عائشة.ورواه مختصرًا الأسودُ عن عائشةَ عند أحمد (25426)، والبخاري (1493)، وغيرهما.
7125 - فحدَّثنا بصحَّة ما ذكره أبو عبد الله الواقدي، أبو العباس محمد بن يعقوب، حدَّثنا أحمد بن عبد الجبار، حدَّثنا يونس بن بُكير، عن عيسى بن عبد الله التميمي، عن محمد بن المنكدِر، عن أُميمة خالةِ فاطمةَ بنتِ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: سمعتُها تقول: بايَعْنا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فأخذَ علينا أن لا نُشرِكَ بالله شيئًا. قال: ثم ذكر نحوَ حديثِ ابن إسحاق عن ابن المنكدر [1]. ذكرُ بَرِيرةَ مولاةِ عائشةَ رضي الله عنهاقد اتَّفق الشيخانِ رضي الله عنهما على حديث يزيد بن رُومان عن عُرْوة عن بَرِيرةَ رضي الله عنها أنها قالت: فيَّ ثلاثٌ من السُّنة: تُصُدِّقَ عليَّ بلحم، فأهديتُ إلى عائشة … الحديث، وكان عليَّ تسعُ أواقٍ، فقالت عائشةُ: إن شاء مواليكِ عَدَدتُها إليهم، في ذِكرِ الوَلاء بطوله [2]. وليلي مولاة عائشة رضي الله عنها
উমাইমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খালা ছিলেন, তিনি থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি তাঁকে বলতে শুনেছি যে, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বাইআত (শপথ) গ্রহণ করেছিলাম। তিনি আমাদের কাছ থেকে এই মর্মে অঙ্গীকার নিয়েছিলেন যে, আমরা আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করব না। [বর্ণনাকারী বলেন] অতঃপর তিনি ইবনু ইসহাক কর্তৃক ইবনুল মুনকাদির সূত্রে বর্ণিত হাদীসের অনুরূপ বর্ণনা করেন।
(এরপর আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আযাদকৃত দাসী বারীরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সম্পর্কিত উল্লেখ রয়েছে। তিনি বলেন: আমার মধ্যে তিনটি সুন্নাত (বিধান) রয়েছে: আমার উপর সাদকার গোশত দেওয়া হয়েছিল, যা আমি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট হাদিয়া দিয়েছিলাম... সম্পূর্ণ হাদীস, যার মধ্যে ওয়ালা (মুক্তির অধিকার) সম্পর্কিত বর্ণনা রয়েছে। [এবং লাইলী, আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আযাদকৃত দাসী সম্পর্কিত উল্লেখও রয়েছে।])
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده حسن في المتابعات.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 28/ 80 عن محمد بن العلاء، عن يونس بن بكير، بهذا الإسناد. ابن رومان، عن عروة، عن بريرة، أنها قالت: كان فيَّ ثلاث من السنة تصدق علي بلحم، فأهديته لعائشة، فدخل رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: "ما هذا اللحم؟ " فقالت: لحم تُصدّق به على بريرة فأهدته لنا، فقال: "هو على بريرة صدقة ولنا هدية"، وكاتبتُ على تسع أواق، فقالت عائشة: إن شاء مواليك عددتُ لهم ثمنك عدةً واحدةً، فقالت: إنهم يقولون إلا أن تشترطي لهم الولاء، فذكرت ذلك للنبيِّ صلى الله عليه وسلم، فقال: "اشتريها واشترطي لهم، فإنما الولاءُ لمن أعتق" قالت: وأعتقني فكان لي الخيار. ونقل المزي في "تحفة الأشراف" (15784): أنَّ النسائي قال عقبه: حديث يزيد بن رومان خطأ. يعني أن الصواب حديث عروة عن عائشة، لا عن بريرة.وكذلك رواه وهيبُ بن خالد على الصواب فخالف الثقفيَّ عند مسلم (1504) (13)، والنسائي (5616)، فرواه عن عبيد الله بن عمر، عن يزيد بن رومان، عن عروة، عن عائشة مختصرًا، فجعله من حديث عائشة. وكذلك رواه الناس من غير طريق عروة.فأخرجه أحمد 40/ (24187)، والبخاري (2578)، ومسلم (1504) (10)، وابن حبان (4269) و (5115) من طريق عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة، قالت: كان في بريرة ثلاث قضيّات: أراد أهلها أن يبيعوها ويشترطوا ولاءها، فذكرت ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم، فقال: "اشتريها وأعتقيها، فإنَّ الولاء لمن أعتق" قالت: وعتقت، فخيرها رسول الله صلى الله عليه وسلم فاختارت نفسها، قالت: وكان الناس يتصدقون عليها وتهدي لنا، فذكرت ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم، فقال: "هو عليها صدقة، وهو لكم هدية، فكلوه".وبنحوه أخرجه أحمد 42/ (25452) و (25468)، والبخاري (5097)، و (5279)، و (5430)، ومسلم (1504) (14)، وابن ماجه (2076)، والنسائي (5611)، وابن حبان (5116) من غير طريقٍ عن القاسم، عن عائشة.ورواه مختصرًا الأسودُ عن عائشةَ عند أحمد (25426)، والبخاري (1493)، وغيرهما.
[2] وهم المصنفُ رحمه الله في عزوه للشيخين من هذا الطريق، وهو عند النسائي (4998) عن عمرو بن علي، عن عبد الوهاب بن عبد المجيد الثقفي، عن عبيد الله بن عمر، عن يزيد ابن رومان، عن عروة، عن بريرة، أنها قالت: كان فيَّ ثلاث من السنة تصدق علي بلحم، فأهديته لعائشة، فدخل رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: "ما هذا اللحم؟ " فقالت: لحم تُصدّق به على بريرة فأهدته لنا، فقال: "هو على بريرة صدقة ولنا هدية"، وكاتبتُ على تسع أواق، فقالت عائشة: إن شاء مواليك عددتُ لهم ثمنك عدةً واحدةً، فقالت: إنهم يقولون إلا أن تشترطي لهم الولاء، فذكرت ذلك للنبيِّ صلى الله عليه وسلم، فقال: "اشتريها واشترطي لهم، فإنما الولاءُ لمن أعتق" قالت: وأعتقني فكان لي الخيار. ونقل المزي في "تحفة الأشراف" (15784): أنَّ النسائي قال عقبه: حديث يزيد بن رومان خطأ. يعني أن الصواب حديث عروة عن عائشة، لا عن بريرة.وكذلك رواه وهيبُ بن خالد على الصواب فخالف الثقفيَّ عند مسلم (1504) (13)، والنسائي (5616)، فرواه عن عبيد الله بن عمر، عن يزيد بن رومان، عن عروة، عن عائشة مختصرًا، فجعله من حديث عائشة. وكذلك رواه الناس من غير طريق عروة.فأخرجه أحمد 40/ (24187)، والبخاري (2578)، ومسلم (1504) (10)، وابن حبان (4269) و (5115) من طريق عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة، قالت: كان في بريرة ثلاث قضيّات: أراد أهلها أن يبيعوها ويشترطوا ولاءها، فذكرت ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم، فقال: "اشتريها وأعتقيها، فإنَّ الولاء لمن أعتق" قالت: وعتقت، فخيرها رسول الله صلى الله عليه وسلم فاختارت نفسها، قالت: وكان الناس يتصدقون عليها وتهدي لنا، فذكرت ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم، فقال: "هو عليها صدقة، وهو لكم هدية، فكلوه".وبنحوه أخرجه أحمد 42/ (25452) و (25468)، والبخاري (5097)، و (5279)، و (5430)، ومسلم (1504) (14)، وابن ماجه (2076)، والنسائي (5611)، وابن حبان (5116) من غير طريقٍ عن القاسم، عن عائشة.ورواه مختصرًا الأسودُ عن عائشةَ عند أحمد (25426)، والبخاري (1493)، وغيرهما.
7126 - أخبرني مَخلَد بن جعفر، حدَّثنا محمد بن جَرير، حدَّثنا موسى بن عبد الرحمن المسروقي، حدَّثنا إبراهيم بن سعد، حدَّثنا المِنْهال بن عبيد الله، عمَّن ذكرَه عن ليلى مولاةِ عائشةَ قالت: دخلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم لقضاءِ حاجةٍ، فدخلتُ فلم أرَ شيئًا، ووجدتُ ريحَ المسك، فقلتُ: يا رسولَ الله، إني لم أرَ شيئًا! قال: "إِنَّ الأرضَ أُمِرَت أن تَكفِيه مِنَّا معاشرَ الأنبياء" [1]. قال الحاكم رحمةُ الله عليه: قد بقي عليَّ في الصحابيات رضي الله عنهن جماعةٌ لم أذكُرُهنَّ إيثارًا للتخفيف، وخشيةً لتطويل الكتاب، وأيضًا فإني ترجمتُ كتاب الصحابة للفضائل، ولستُ أجدُ الفضائل بعد أزواج رسول الله صلى الله عليه وسلم إِلَّا لبعضهنَّ، فاستخرتُ الله تعالى، وجعلتُ هذا آخرَ الكتابِ؛ كتابِ مناقب الصحابة رضي الله عنهم أجمعين. ذكرُ فضائل القبائلوهي تراجم لم يذكرها الشيخان رضي الله عنهما في الكتابين. فمنها ذكرُ فضائل قريش
লায়লা, আইশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আযাদকৃত দাসী, থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রাকৃতিক প্রয়োজন পূরণের জন্য প্রবেশ করলেন। তখন আমি প্রবেশ করলাম, কিন্তু (মল-মূত্র) কিছু দেখতে পেলাম না এবং আমি মৃগনাভির (কস্তুরীর) সুবাস পেলাম। আমি বললাম, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি তো কিছুই দেখতে পেলাম না!" তিনি বললেন, "নিশ্চয়ই যমীনকে এই নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যে সে যেন আমাদের—নবীগণের দলকে—আমাদের (মল-মূত্র) থেকে যথেষ্ট করে দেয় (অর্থাৎ তা গিলে নেয়)।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده مظلم، المنهال بن عبيد الله لم نقف له على ترجمة، وشيخه مبهم، - يغلب على ظننا أنه أبو عبد الله المدني كما سمّي في بعض الروايات، وليلى قال ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 936: حديثها ليس بالقائم الإسناد، روى عنها أبو عبد الله المدني وهو مجهول. وقال ابن كثير في "البداية والنهاية" 8/ 296: رواه أبو نعيم من حديث أبي عبد الله المدني - وهو أحد المجاهيل - عنها.وأخرجه أبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 1/ 176 من طريق عبد الرحيم بن واقد، عن عبد الكريم بن عبد الرحمن، عن أبي عبد الله، عن ليلى مولاة عائشة وحاجبتها، عن عائشة، أنها قالت: قلت: يا رسول الله، إنك إذا خرجت من المَخرج دخلت في أثرك، فلم أرَ شيئًا، وأجد رائحة المسك، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنا معاشر الأنبياء، بُنيت أجسادنا على أرواح الجنة، فما خرج منها شيء ابتلعته الأرض". فجعله من مسند عائشة. وعبد الرحيم بن واقد قال الخطيب في "تاريخه" 12/ 370: في حديثه غرائب ومناكير لأنها عن الضعفاء والمجاهيل، وعبد الكريم قال ابن حبان في "الثقات": مستقيم الحديث، وقال الأزدي: واهي الحديث، وأبو عبد الله مجهول كما تقدم.وأخرجه كذلك ابن سعد في "الطبقات" 1/ 144، والطبراني في "الأوسط" (7835)، وأبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 1/ 211، وفي "دلائل النبوة" (364)، من طريق إسماعيل بن أبان الوراق، عن عنبسة بن عبد الرحمن، عن محمد بن زاذان، عن أم سعد، عن عائشة، قالت: قلت: يا رسول الله، تدخل الخلاء فلا يرى منك شيء من الأذى! قال: "أوما علمتِ يا عائشة أن الأرض تبتلع ما يخرج من الأنبياء، فلا يرى منه شيءٌ؟ ". وقال الطبراني: لا يروى هذا الحديث عن عائشة إلا بهذا الإسناد، تفرَّد به إسماعيل بن أبان. قلنا: إسناده هالك، عنبسة وشيخه ابن زاذان متروكان.وأخرجه ابن حبان في "المجروحين" 1/ 246 - 247، وابن عدي في "الكامل" 3/ 232، والبيهقي في "الدلائل" 6/ 70، والخطيب في "تاريخ بغداد" 8/ 607 - ومن طريقه ابن الجوزي في "العلل المتناهية (288) - من طريق الحسين بن علوان، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة بنحوه.وقال البيهقي عقبه: هذا من موضوعات الحسين بن علوان لا ينبغي ذكره، ففي الأحاديث الصحيحة والمشهورة في معجزاته صلى الله عليه وسلم كفاية عن كذب ابن علوان. قلنا: والحسين بن علوان كذَّبه ابن معين وغيره. وأخرجه الدارقطني في "الأفراد" - ومن طريقه ابن الجوزي في "العلل المتناهية (289) - عن محمد بن سليمان الباهلي، عن محمد بن حسان الأموي، عن عبدة بن سليمان، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة. ومحمد بن حسان أورده الحافظ ابن حجر في "اللسان" 7/ 59، ونقل عن ابن الجوزي تكذيبه، ولم يعقب عليه بشيء.وأخرج السهمي في "تاريخ جرجان" ص 526 من طريق عبد الله بن الليث الإستراباذي، عن إسحاق بن الصلت، عن مالك بن أنس، عن أبي الزبير، عن جابر بن عبد الله قال: رأيتُ من رسول الله صلى الله عليه وسلم ثلاثة أشياء لو لم يأتِ القرآنُ لآمنت به؛ تصحرنا في جبَّانة ينقطع الطريق دونها، فأخذ النبيُّ صلى الله عليه وسلم الوضوء، ورأينا نخلتين متفرقتين، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "يا جابر، اذهب إليهما فقل لهما: اجتمعا لي سترًا" فاجتمعا حتى كانا أصلًا واحدًا، فتوضأ النبي صلى الله عليه وسلم، فبادرته بالماء وقلتُ: لعلَّ الله يُطلعني على ما خرج من جوفه فأكله، فرأيتُ الأرضَ بيضاءَ، فقلت: يا رسول الله، أما كنتَ توضأتَ؟ قال: "بلى، ولكنَّا معشرَ النبيين أُمرت الأرضُ أن تُواريَ ما خرج منا من الغائط والبول"، الحديث. قلنا: وهذا خبر مكذوب، عبد الله بن الليث الإستراباذي لم نقف له على ترجمة إِلَّا عند السهمي، ولم يذكر فيه جرحًا ولا تعديلًا وذكر راويين عنه، فهو مجهولٌ لا تعلم حاله، وشيخه إسحاق بن الصلت ذكر الذهبي في ترجمته من "الميزان" 1/ 192، وكذا ابن حجر في "لسان الميزان 2/ 62 أنه أتى عن مالك بخبر منكر جدًّا، والإسناد إليه مظلم.
7127 - حدَّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدَّثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدَّثنا عثمان بن عمر، حدَّثنا ابن أبي ذِئب، عن الزُّهْري، عن طلحة بن عبد الله بن عوف، عن عبد الرحمن بن أَزْهَر، عن جُبَير بن مُطْعِمٍ، أَنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "للرجل من قُريشٍ من القوَّةِ ما للرجلينِ من غير قريشٍ". قال الزُّهْري: يعني نُبْلَ الرأي [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
জুবাইর ইবনে মুত'ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কুরাইশের একজন লোকের মধ্যে সেই পরিমাণ শক্তি (বা ক্ষমতা) রয়েছে, যা কুরাইশ ব্যতীত অন্য গোত্রের দুইজনের মধ্যে থাকে।" যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: তিনি এর দ্বারা মতামতের মহত্ত্ব (বা দূরদর্শী বুদ্ধি) বুঝিয়েছেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده صحيح. ابن أبي ذئب: هو محمد بن عبد الرحمن بن المغيرة.وأخرجه أحمد 27/ (16742) و (16766) عن يزيد بن هارون، وابن حبان (6265) من طريق أحمد بن عبد الله بن يونس، كلاهما عن ابن أبي ذئب، بهذا الإسناد.قال السندي في شرحه على "مسند أحمد": قوله: "نبل الرأي"، بضم فسكون، بمعنى الذكاء والنجابة، ويمكن أن يكون بفتح فسكون، أي: سهم الرامي، أي: سهام رأي القرشي تُصيب ضِعفَ ما تُصيب سهامُ رأي غيره، يريد أن رأيه أقل خطأ، وكأنه لذلك خُصُّوا بالإمامة الكبرى.وقال الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" 8/ 153 - 154: تأملنا هذا، فكان معناه عندنا - والله أعلم - أنه على القرشي ذي الرأي، لا على من سواه من غير أهل الرأي وإن كان قرشيًا، وذلك أنَّ الشيء إذا وصف به رجل من قوم ذوي عدد، جاز أن تضاف الصفة إلى أولئك القوم جميعًا، وإن كان المراد به خاصًّا منهم.
7128 - أخبرنا أبو الحسن علي بن محمد بن عُقبة الشَّيباني بالكوفة، حدَّثنا إبراهيم بن إسحاق الزُّهْري، حدَّثنا قَبيصة بن عُقبة، حدَّثنا سفيان، عن عبد الله بن عثمان بن خُثَيم، عن إسماعيل بن عُبيد بن رِفاعة بن رافع الزُّرَقي، عن أبيه، عن جدِّه: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال لعمر بن الخطاب: "يا عمرُ، اجمَعْ لي قومَك" فجمعهم، ثم دخلَ عليه، فقال: يا رسولَ الله قد جمعتُهم، فيدخلُون عليك أم تخرُجُ إليهم؟ فقال: "بل أخرُجُ إليهم"، فسمعَتْ بذلك المهاجرون والأنصارُ، فقالوا: لقد جاء في قريش وحيٌ، فحَضَرَ الناظرُ والمستمعُ ما يُقال لهم، فقامَ بينَ أظهُرِهم فقال: "هل فيكم غيرُكم؟ " قالوا: نعم، فينا حلفاؤُنا وأبناءُ أخواتِنا ومَوالينا [فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "حلفاؤُنا منَّا، وبنو أَخواتنا منَّا، ومَوالينا] [1] منَّا" فقال: "أنتُم تسمعونَ: أوليائي منكم المُتَّقون، فإنْ كنتُم أولئكَ فذلك، وإلَّا فأبصرُوا ثم أبصِرُوا، لا يَأْتِيَنَّ النَّاسُ بالأعمالِ وتأتونَ بالأثقالِ فيُعرَضَ عنكم"، ثم نادَى فرفعَ صوتَه فقال: "إنَّ قريشًا أهلُ أمانةٍ، مَن بَغَاهِمُ العواثِرَ كبَّه الله لمَنْخِره" قالها ثلاثًا [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
রিফাআ ইবনে রাফি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "হে উমার! তুমি আমার জন্য তোমার সম্প্রদায়কে (কুরাইশদের) একত্রিত করো।" অতঃপর তিনি তাদের একত্রিত করলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করে বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আমি তাদের একত্রিত করেছি। তারা কি আপনার নিকট প্রবেশ করবে, নাকি আপনি তাদের নিকট যাবেন?" তিনি বললেন: "বরং আমিই তাদের নিকট যাব।" মুহাজির ও আনসারগণ তা শুনতে পেলেন এবং তারা বললেন: কুরাইশদের ব্যাপারে নিশ্চয়ই কোনো ওহী এসেছে। অতঃপর দর্শক ও শ্রোতা সকলেই তারা কী বলা হয় তা শোনার জন্য উপস্থিত হলেন। তিনি তাদের মাঝে দাঁড়িয়ে বললেন: "তোমাদের মধ্যে কি তোমাদের ছাড়া অন্য কেউ আছে?" তারা বললেন: হ্যাঁ, আমাদের মধ্যে আমাদের মিত্ররা, আমাদের ভাগিনারা এবং আমাদের মুক্ত দাসরা (মাওয়ালী) আছে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমাদের মিত্ররা আমাদেরই অংশ, আমাদের ভাগিনারা আমাদেরই অংশ এবং আমাদের মাওয়ালীরা আমাদেরই অংশ।" তিনি বললেন: "তোমরা মনোযোগ দিয়ে শোনো! তোমাদের মধ্যে যারা মুত্তাকী, তারাই আমার বন্ধু। যদি তোমরা তাদের অন্তর্ভুক্ত হও, তবে তা উত্তম। আর যদি না হও, তবে সতর্ক হও, আবার সতর্ক হও! এমন যেন না হয় যে, লোকেরা (কিয়ামতের দিন) নেক আমল নিয়ে হাজির হবে আর তোমরা বোঝা (পাপের ভার) নিয়ে আসবে, ফলে তোমাদের থেকে মুখ ফিরিয়ে নেওয়া হবে।" অতঃপর তিনি উচ্চস্বরে ঘোষণা করে বললেন: "নিশ্চয়ই কুরাইশরা আমানতের অধিকারী। যে ব্যক্তি তাদের বিপদে ফেলার চেষ্টা করবে, আল্লাহ তাকে মুখ থুবড়ে ফেলে দেবেন।"— তিনি এ কথা তিনবার বললেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] ما بين المعقوفين سقط من النسخ، واستدركناه من مصادر التخريج.
[2] إسناده ضعيف لجهالة إسماعيل بن عبيد بن رفاعة. سفيان: هو الثَّوري. ولبعضه شواهد يأتي ذكرها.وأخرجه تامًّا ومختصرًا ابن أبي شيبة 12/ 167، وأحمد 31/ (18992) و (18993)، وابن أبي عاصم في "السنة" (1507)، والطبراني في "الكبير" (4547) من طريق وكيع، عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.وسلف مختصرًا عند المصنف برقم (3305) من طريق أبي حذيفة النهدي، عن سفيان الثوري.وأخرجه تامًّا ومختصرًا أحمد (18994)، والبخاري في "الأدب المفرد" (75)، والبزار في "مسنده" (3725)، والبغوي في "الصحابة" (681)، والطبراني (4544) و (4545) و (4546)، والبيهقي في "معرفة السنن" (221) من طرق عن عبد الله بن عثمان بن خثيم، به. وقال البزار عقبه: لا نعلم يرويه بهذا اللفظ إلا رفاعة بن رافع، وهذا الطريق عنه من حسان الأسانيد التي تروى في ذلك.وأخرجه معمر في "الجامع" (19897) عن ابن خثيم، عن رجل من الأنصار، عن أبيه، فذكره.وقوله: "بنو أخواتنا وموالينا منا" قد صحَّ من حديث أنس بن مالك بلفظ: "ابن أخت القوم منهم، أو من أنفسهم" و "مولى القوم من أنفسهم"، أخرجهما البخاري (6762) و (6761) وغيرُه.وقوله: "أوليائي المتقون" له شاهد من حديث أبي هريرة اختلف في وصله وإرساله، قال الدارقطني في "العلل" (1769): يرويه محمد بن عمرو واختلف عنه؛ فرواه محمد بن فليح وعيسى بنُ يونس وغيرُهما، رووه عن محمد بن عمرو عن أبي سلمة عن أبي هريرة. وخالفهم إسماعيلُ بن جعفر وخالدٌ الواسطي، فروياه عن محمد بن عمرو عن أبي سلمة، مرسلًا، والمرسل أصحُّ.وعن عبد الله بن عمر عند أحمد 10/ (6168)، وأبي داود (4242)، واختلف أيضًا في وصله وإرساله، وسيأتي عند المصنف برقم (8647) لكن دون قوله: "أوليائي المتقون"، فانظر الكلام عليه هناك.
7129 - حدَّثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدَّثنا الحسن بن علي بن شَبيب المَعْمَري، حدَّثنا أبو الرَّبيع الزَّهْراني، حدَّثنا حماد بن واقِد الصفَّار، حدَّثنا محمد بن ذَكْوان خالُ ولدِ حماد بن زيد، عن محمد بن المُنكِدر، عن عبد الله بن عمر قال: إِنَّا لَبِفِناءِ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم إذا مرَّت امرأةٌ، فقال رجلٌ من القوم: هذه ابنهُ محمد، فقال أبو سفيان: إنَّ مَثَلَ محمدٍ في بني هاشم مَثَلُ الرَّيحانة في وَسَط النَّتْن [1]، فانطلقتِ المرأة فأخبرت النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فخرجَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم يُعرَف الغضبُ في وجهه، فقال: "ما بالُ أقوالٍ تَبلُغني عن أقوام، إنَّ الله تبارك وتعالى خلقَ السماواتِ [سبعًا] [2] فاختار العُليا منها فأسكَنَها مَن شاءَ من خلقِه، ثم خلَقَ الخَلْقَ، فاختارَ [3] بني آدمَ، واختار من بني آدمَ العربَ، واختار من العربِ مُضَرَ، واختارٍ من مُضَرَ قريشًا، واختار من قُريشٍ بني هاشمٍ، واختارني من بني هاشم، فأنا من خِيارٍ إلى خِيار، فمن أحبَّ العربَ فبحُبِّي أحبَّهم، ومن أبغضَ العربَ فببُغْضي أبغضَهم" [4]. وقد قيل في هذا الإسناد: عن محمد بن ذَكْوان، عن عمرو بن دينار، عن عبد الله بن عمر:
আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আঙ্গিনার কাছে ছিলাম, যখন এক মহিলা পাশ দিয়ে গেলেন। তখন দলের একজন লোক বলল: ইনি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা। তখন আবূ সুফিয়ান বলল: বনু হাশিমের মধ্যে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপমা হলো দুর্গন্ধের মাঝখানে থাকা সুগন্ধি ফুলের মতো। অতঃপর মহিলাটি দ্রুত গিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খবর দিলেন। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বেরিয়ে আসলেন, তাঁর চেহারায় রাগের চিহ্ন স্পষ্ট ছিল। তিনি বললেন: কিছু লোকের পক্ষ থেকে আমার কাছে এমন কথা পৌঁছে, তাদের কী হয়েছে? নিশ্চয়ই আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা আসমানসমূহ (সাতটি) সৃষ্টি করেছেন। অতঃপর সেগুলোর মধ্য থেকে সর্বোচ্চ আসমানটি বেছে নিলেন এবং সেখানে তাঁর সৃষ্টির মধ্যে যাদেরকে ইচ্ছা তাদের বসবাস করালেন। এরপর তিনি সৃষ্টিকে সৃষ্টি করলেন। অতঃপর সৃষ্টিসমূহের মধ্য থেকে বনী আদমকে বেছে নিলেন। আর বনী আদম থেকে আরবদেরকে বেছে নিলেন। আরবদের থেকে মুদারকে বেছে নিলেন। মুদার থেকে কুরাইশকে বেছে নিলেন। আর কুরাইশ থেকে বনু হাশিমকে বেছে নিলেন। আর বনু হাশিম থেকে আমাকে বেছে নিলেন। সুতরাং আমি শ্রেষ্ঠদের মধ্য থেকে শ্রেষ্ঠতমদের অন্তর্ভুক্ত। অতএব, যে আরবদের ভালোবাসে, সে আমার ভালোবাসার কারণেই তাদেরকে ভালোবাসে। আর যে আরবদের ঘৃণা করে, সে আমার প্রতি বিদ্বেষের কারণেই তাদের ঘৃণা করে।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] المثبت من (ز)، وهو الموافق لما في المصادر، وتحرَّف في بقية النسخ إلى: البيت. وأخرجه الحكيم الترمذي في "نوادر الأصول" (391)، والعقيلي في "الضعفاء" (1945)، والحاكم فيما سيأتي برقمي (7130) و (7173)، وفي "معرفة علوم الحديث" ص 166 - وعنه البيهقي في "دلائل النبوة" 1/ 171 - 172، وقرن بالحاكم أبا سعيد بن أبي عمرو - من طرق عن عبد الله بن بكر السهمي، عن يزيد بن عوانة، عن محمد بن ذكوان، عن عمرو بن دينار، به. ويزيد بن عوانة مجهول، وقال العقيلي: لا يتابع عليه.وقال السهميُّ في رواية الحكيم الترمذي ورواية الحاكم الأولى: ولا أحسبُ محمدًا إلا قد حدثنيه عن عمرو بن دينار، عن عبد الله بن عمر. يعني أنه يغلب على ظنه أنه سمعه أيضًا من محمد بن ذكوان مباشرة.وأخرجه أبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 2/ 133 - 134 من طريق عبد الوهاب بن المندلث الضبي، والجورقاني في "الأباطيل" (162) من طريق الحسن بن مكرم، كلاهما عن عبد الله السهمي، عن محمد بن ذكوان، عن عمرو بن دينار، به. لم يذكرا أنه شكّ فيه. وقال الجورقاني عقبه: غريب.وسيأتي الحديث مختصرًا عند المصنف برقم (7172) من طريق عمارة بن مِهْران المعولي، عن عمرو بن دينار، عن سالم بن عبد الله، عن ابن عمر بزيادة سالم بين ابن دينار وابن عمر.وخالفهم حماد بن زيد، فرواه عن عمرو بن دينار عن محمد بن علي الباقر مرسلًا: "إنَّ الله اختار فاختار العرب، ثم اختار منهم كنانة، أو النضر بن كنانة، ثم اختار منهم قريشًا، ثم اختار منهم بني هاشم، ثم اختارني من بني هاشم"، رواه من طرق عن حماد: ابنُ سعد في "الطبقات" 1/ 4، ويعقوب الفسوي في "المعرفة والتاريخ" 1/ 497، والبيهقي في "السنن" 7/ 134، وفي "الدلائل" 1/ 167، وهذا إسناد صحيح إلى الباقر.وقصة اختياره صلى الله عليه وسلم صحَّت من حديث وائلة بن الأسقع عند مسلم (2276) مرفوعًا: "إن الله اصطفى كِنانةَ من ولد إسماعيل، واصطفى قريشًا من كنانة، واصطفى من قريش بني هاشم، واصطفاني من بني هاشم".وقد ورد في باب حبّ العرب أحاديث لا تصح، سيوردُ المصنفُ منها حديثَ سلمان وحديثَ أنس وحديثَ ابن عبّاس وحديثَ أبي هريرة، وأرقامها على التوالي (7171) و (7174) و (7175) و (8146).
[2] لفظة "سبعًا" أثبتناها من مصادر التخريج، وفي (ص): السبع، ولم ترد في بقية النسخ. وأخرجه الحكيم الترمذي في "نوادر الأصول" (391)، والعقيلي في "الضعفاء" (1945)، والحاكم فيما سيأتي برقمي (7130) و (7173)، وفي "معرفة علوم الحديث" ص 166 - وعنه البيهقي في "دلائل النبوة" 1/ 171 - 172، وقرن بالحاكم أبا سعيد بن أبي عمرو - من طرق عن عبد الله بن بكر السهمي، عن يزيد بن عوانة، عن محمد بن ذكوان، عن عمرو بن دينار، به. ويزيد بن عوانة مجهول، وقال العقيلي: لا يتابع عليه.وقال السهميُّ في رواية الحكيم الترمذي ورواية الحاكم الأولى: ولا أحسبُ محمدًا إلا قد حدثنيه عن عمرو بن دينار، عن عبد الله بن عمر. يعني أنه يغلب على ظنه أنه سمعه أيضًا من محمد بن ذكوان مباشرة.وأخرجه أبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 2/ 133 - 134 من طريق عبد الوهاب بن المندلث الضبي، والجورقاني في "الأباطيل" (162) من طريق الحسن بن مكرم، كلاهما عن عبد الله السهمي، عن محمد بن ذكوان، عن عمرو بن دينار، به. لم يذكرا أنه شكّ فيه. وقال الجورقاني عقبه: غريب.وسيأتي الحديث مختصرًا عند المصنف برقم (7172) من طريق عمارة بن مِهْران المعولي، عن عمرو بن دينار، عن سالم بن عبد الله، عن ابن عمر بزيادة سالم بين ابن دينار وابن عمر.وخالفهم حماد بن زيد، فرواه عن عمرو بن دينار عن محمد بن علي الباقر مرسلًا: "إنَّ الله اختار فاختار العرب، ثم اختار منهم كنانة، أو النضر بن كنانة، ثم اختار منهم قريشًا، ثم اختار منهم بني هاشم، ثم اختارني من بني هاشم"، رواه من طرق عن حماد: ابنُ سعد في "الطبقات" 1/ 4، ويعقوب الفسوي في "المعرفة والتاريخ" 1/ 497، والبيهقي في "السنن" 7/ 134، وفي "الدلائل" 1/ 167، وهذا إسناد صحيح إلى الباقر.وقصة اختياره صلى الله عليه وسلم صحَّت من حديث وائلة بن الأسقع عند مسلم (2276) مرفوعًا: "إن الله اصطفى كِنانةَ من ولد إسماعيل، واصطفى قريشًا من كنانة، واصطفى من قريش بني هاشم، واصطفاني من بني هاشم".وقد ورد في باب حبّ العرب أحاديث لا تصح، سيوردُ المصنفُ منها حديثَ سلمان وحديثَ أنس وحديثَ ابن عبّاس وحديثَ أبي هريرة، وأرقامها على التوالي (7171) و (7174) و (7175) و (8146).
7129 [3] - في (ز) و (ب): فاختار من بني، بزيادة "من" وضبب عليها في (ز)، والمثبت من (م) و (ص). وأخرجه الحكيم الترمذي في "نوادر الأصول" (391)، والعقيلي في "الضعفاء" (1945)، والحاكم فيما سيأتي برقمي (7130) و (7173)، وفي "معرفة علوم الحديث" ص 166 - وعنه البيهقي في "دلائل النبوة" 1/ 171 - 172، وقرن بالحاكم أبا سعيد بن أبي عمرو - من طرق عن عبد الله بن بكر السهمي، عن يزيد بن عوانة، عن محمد بن ذكوان، عن عمرو بن دينار، به. ويزيد بن عوانة مجهول، وقال العقيلي: لا يتابع عليه.وقال السهميُّ في رواية الحكيم الترمذي ورواية الحاكم الأولى: ولا أحسبُ محمدًا إلا قد حدثنيه عن عمرو بن دينار، عن عبد الله بن عمر. يعني أنه يغلب على ظنه أنه سمعه أيضًا من محمد بن ذكوان مباشرة.وأخرجه أبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 2/ 133 - 134 من طريق عبد الوهاب بن المندلث الضبي، والجورقاني في "الأباطيل" (162) من طريق الحسن بن مكرم، كلاهما عن عبد الله السهمي، عن محمد بن ذكوان، عن عمرو بن دينار، به. لم يذكرا أنه شكّ فيه. وقال الجورقاني عقبه: غريب.وسيأتي الحديث مختصرًا عند المصنف برقم (7172) من طريق عمارة بن مِهْران المعولي، عن عمرو بن دينار، عن سالم بن عبد الله، عن ابن عمر بزيادة سالم بين ابن دينار وابن عمر.وخالفهم حماد بن زيد، فرواه عن عمرو بن دينار عن محمد بن علي الباقر مرسلًا: "إنَّ الله اختار فاختار العرب، ثم اختار منهم كنانة، أو النضر بن كنانة، ثم اختار منهم قريشًا، ثم اختار منهم بني هاشم، ثم اختارني من بني هاشم"، رواه من طرق عن حماد: ابنُ سعد في "الطبقات" 1/ 4، ويعقوب الفسوي في "المعرفة والتاريخ" 1/ 497، والبيهقي في "السنن" 7/ 134، وفي "الدلائل" 1/ 167، وهذا إسناد صحيح إلى الباقر.وقصة اختياره صلى الله عليه وسلم صحَّت من حديث وائلة بن الأسقع عند مسلم (2276) مرفوعًا: "إن الله اصطفى كِنانةَ من ولد إسماعيل، واصطفى قريشًا من كنانة، واصطفى من قريش بني هاشم، واصطفاني من بني هاشم".وقد ورد في باب حبّ العرب أحاديث لا تصح، سيوردُ المصنفُ منها حديثَ سلمان وحديثَ أنس وحديثَ ابن عبّاس وحديثَ أبي هريرة، وأرقامها على التوالي (7171) و (7174) و (7175) و (8146).
7129 [4] - إسناده ضعيف بمرة؛ حماد بن واقد وشيخه محمد بن ذكوان ضعيفان. ولم نقف عليه من طريقهما عن محمد بن المنكدر عند غير المصنف، ورواه غيرُ واحد عن حماد بن واقد، وغيرُ واحد عن محمد بن ذكوان عن عمرو بن دينار، لا عن محمد بن المنكدر، وقد أشار المصنفُ عقبه لروايته عن ابن دينار.وأخرجه ابن أبي الدنيا في "الإشراف في منازل الأشراف" (343) عن هاشم بن الوليد، والطبراني في "الكبير" (13650)، وفي "الأوسط" (6182)، وابن عدي في "الكامل" 2/ 248 و 6/ 200، وأبو نعيم في "دلائل النبوة" (18)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (1330) و (1493)، وفي "دلائل النبوة" 1/ 172 من طريق أبي الأشعث أحمد بن المقدام العجلي، كلاهما عن حماد بن واقد، عن محمد بن ذكوان، عن عمرو بن دينار، عن ابن عمر. وأخرجه الحكيم الترمذي في "نوادر الأصول" (391)، والعقيلي في "الضعفاء" (1945)، والحاكم فيما سيأتي برقمي (7130) و (7173)، وفي "معرفة علوم الحديث" ص 166 - وعنه البيهقي في "دلائل النبوة" 1/ 171 - 172، وقرن بالحاكم أبا سعيد بن أبي عمرو - من طرق عن عبد الله بن بكر السهمي، عن يزيد بن عوانة، عن محمد بن ذكوان، عن عمرو بن دينار، به. ويزيد بن عوانة مجهول، وقال العقيلي: لا يتابع عليه.وقال السهميُّ في رواية الحكيم الترمذي ورواية الحاكم الأولى: ولا أحسبُ محمدًا إلا قد حدثنيه عن عمرو بن دينار، عن عبد الله بن عمر. يعني أنه يغلب على ظنه أنه سمعه أيضًا من محمد بن ذكوان مباشرة.وأخرجه أبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 2/ 133 - 134 من طريق عبد الوهاب بن المندلث الضبي، والجورقاني في "الأباطيل" (162) من طريق الحسن بن مكرم، كلاهما عن عبد الله السهمي، عن محمد بن ذكوان، عن عمرو بن دينار، به. لم يذكرا أنه شكّ فيه. وقال الجورقاني عقبه: غريب.وسيأتي الحديث مختصرًا عند المصنف برقم (7172) من طريق عمارة بن مِهْران المعولي، عن عمرو بن دينار، عن سالم بن عبد الله، عن ابن عمر بزيادة سالم بين ابن دينار وابن عمر.وخالفهم حماد بن زيد، فرواه عن عمرو بن دينار عن محمد بن علي الباقر مرسلًا: "إنَّ الله اختار فاختار العرب، ثم اختار منهم كنانة، أو النضر بن كنانة، ثم اختار منهم قريشًا، ثم اختار منهم بني هاشم، ثم اختارني من بني هاشم"، رواه من طرق عن حماد: ابنُ سعد في "الطبقات" 1/ 4، ويعقوب الفسوي في "المعرفة والتاريخ" 1/ 497، والبيهقي في "السنن" 7/ 134، وفي "الدلائل" 1/ 167، وهذا إسناد صحيح إلى الباقر.وقصة اختياره صلى الله عليه وسلم صحَّت من حديث وائلة بن الأسقع عند مسلم (2276) مرفوعًا: "إن الله اصطفى كِنانةَ من ولد إسماعيل، واصطفى قريشًا من كنانة، واصطفى من قريش بني هاشم، واصطفاني من بني هاشم".وقد ورد في باب حبّ العرب أحاديث لا تصح، سيوردُ المصنفُ منها حديثَ سلمان وحديثَ أنس وحديثَ ابن عبّاس وحديثَ أبي هريرة، وأرقامها على التوالي (7171) و (7174) و (7175) و (8146).
7130 - حدَّثَناه محمد بن صالح بن هانئ، حدَّثنا الحسين بن الفضل البَجَلي ومحمد بن أحمد بن أنس القرشي، قالا: حدَّثنا عبد الله بن بكر السَّهْمي، حدَّثنا يزيد بن عَوَانة، عن محمد بن ذَكْوان؛ قال عبد الله بن بكر: ولا أحسبُ محمدًا إِلَّا قد حدَّثَنيه عن عمرو بن دينار، عن عبد الله بن عمر قال: بَيْنا نحن جُلوسٌ بفِناءِ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكرَ الحديثَ بتمامه نحوَه [1].
আব্দুল্লাহ ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আঙ্গিনায় বসেছিলাম, এরপর [বর্ণনাকারী] সম্পূর্ণ হাদীসটি এর অনুরূপ বর্ণনা করলেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف بمرةٍ كسابقه. الأعرابي في "معجمه" (1120)، والطبراني في "الكبير" (753)، و "الأوسط" (5924)، وابن عدي في "الكامل" 6/ 214، وكلا الحديثين فيه ضعف، لكن هذه الثلاثة أحاديث يشدُّ بعضها بعضًا.وفي الباب أيضًا عن ابن عبّاس عند تَمَّام في "مسند المقلين" (9) و (10)، وأبي نعيم في "أخبار أصبهان" 2/ 109، وأبي طاهر السلفي في الرابع عشر من "المشيخة البغدادية" (1). وإسناده واهٍ، فيه عبد الرحمن بن مسلم المشهور بأبي مسلم الخراساني، قال الذهبي في "الميزان" 5/ 590: ليس بأهلٍ أن يُحمل عنه شيءٌ، هو شرٌّ من الحجاج وأسفكُ للدماء.وعن عمرو بن العاص عند ابن عساكر في "تاريخه" 8/ 306، وإسناده واهٍ.
7131 - حدَّثنا أبو زكريا العَنْبري وأبو بكر بن جعفر المُزكَّي في آخرينَ، حدَّثنا أبو عبد الله محمد بن إبراهيم العَبْدي، حدَّثنا عُبيد الله بن محمد بن حفص بن عمر بن موسى بن عبيد الله بن مَعمَر التَّيمي، قال: سمعتُ أبي يقول: سمعتُ عمِّي عبيدَ الله [1] بن عمر بن موسى يقول: حدَّثنا رَبيعةُ بن أبي عبد الرحمن، عن سعيد بن المسيب، عن عمرو بن عثمان بن عفان قال: قال لي أَبي: يا بُنيَّ، إن وَلِيتَ من أمر الناس شيئًا، فأكرِمْ قريشًا، فإنِّي سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "من أهانَ قريشًا أهانَه الله عز وجل" [2].
উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর পুত্রকে বললেন: হে বৎস, তুমি যদি মানুষের কোনো বিষয়ে কর্তৃত্ব লাভ করো, তবে কুরাইশদের সম্মান করবে। কারণ আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি কুরাইশদের অপমান করবে, আল্লাহ তাআলা তাকে অপমান করবেন।”
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] أقحم في النسخ الخطية هنا: ابن حفص. الأعرابي في "معجمه" (1120)، والطبراني في "الكبير" (753)، و "الأوسط" (5924)، وابن عدي في "الكامل" 6/ 214، وكلا الحديثين فيه ضعف، لكن هذه الثلاثة أحاديث يشدُّ بعضها بعضًا.وفي الباب أيضًا عن ابن عبّاس عند تَمَّام في "مسند المقلين" (9) و (10)، وأبي نعيم في "أخبار أصبهان" 2/ 109، وأبي طاهر السلفي في الرابع عشر من "المشيخة البغدادية" (1). وإسناده واهٍ، فيه عبد الرحمن بن مسلم المشهور بأبي مسلم الخراساني، قال الذهبي في "الميزان" 5/ 590: ليس بأهلٍ أن يُحمل عنه شيءٌ، هو شرٌّ من الحجاج وأسفكُ للدماء.وعن عمرو بن العاص عند ابن عساكر في "تاريخه" 8/ 306، وإسناده واهٍ.
[2] محتمل للتحسين لغيره، وهذا إسناد ضعيف، محمد بن حفص والد عبيد الله ترجمه البخاري 1/ 65، وابن أبي حاتم 7/ 236، وسكتا عنه، ولم يذكرا راويًا عنه غير ولده عبيد الله، وذكره ابن حبان في "ثقاته"، وعمُّه عبيد الله بن عمر بن موسى ترجمه أيضًا البخاري 5/ 395، وابن أبي حاتم 5/ 327، وسكتا عنه ولم يُذكر راوٍ عنه غير ابن أخيه، وذكره ابن حبان في "ثقاته"، وقال العقيلي في "ضعفائه" (1075): لا يتابع على حديثه، ثم روى له هذا الحديثَ، وليَّنه الذهبيُّ في "ميزانه" 3/ 14.وأخرجه أحمد 1/ (460)، وابن حبان (6269) من طريق إسحاق بن إسماعيل الطالقاني، كلاهما (أحمد والطالقاني) عن عبيد الله بن محمد بن حفص، بهذا الإسناد. وذكر في رواية أحمد قصة.وحسَّن العراقيُّ حديث عثمان في "محجة القرب" ص 208.ويشهد له حديث سعد بن أبي وقاص التالي عند المصنف.وحديث أنس عند ابن أبي عاصم في "السنة" (1506)، والبزار في "مسنده" (7199)، وابن الأعرابي في "معجمه" (1120)، والطبراني في "الكبير" (753)، و "الأوسط" (5924)، وابن عدي في "الكامل" 6/ 214، وكلا الحديثين فيه ضعف، لكن هذه الثلاثة أحاديث يشدُّ بعضها بعضًا.وفي الباب أيضًا عن ابن عبّاس عند تَمَّام في "مسند المقلين" (9) و (10)، وأبي نعيم في "أخبار أصبهان" 2/ 109، وأبي طاهر السلفي في الرابع عشر من "المشيخة البغدادية" (1). وإسناده واهٍ، فيه عبد الرحمن بن مسلم المشهور بأبي مسلم الخراساني، قال الذهبي في "الميزان" 5/ 590: ليس بأهلٍ أن يُحمل عنه شيءٌ، هو شرٌّ من الحجاج وأسفكُ للدماء.وعن عمرو بن العاص عند ابن عساكر في "تاريخه" 8/ 306، وإسناده واهٍ.
7132 - أخبرني أبو بكر بن أبي نَصْر المُزكِّي بمَرْو من أصلِ كتابه، حدَّثنا الحارث بن أبي أسامة، حدَّثنا سليمان بن داود الهاشمي، حدَّثنا إبراهيم بن سعد، حدثني صالح بن كَيْسان، عن ابن شِهاب، عن محمد بن أبي سفيان بن العلاء بن جاريةَ الثَّقفي، عن يوسف بن الحَكَم أبي الحجَّاج بن يوسف، عن محمد بن سعد بن أبي وقَّاص، عن أبيه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "من يُرِدْ هَوَانَ قريشٍ أهانَه الله" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . وقد روى هذا الحديثَ الليثُ بن سعد عن يزيد بن عبد الله بن أسامة بن الهاد عن إبراهيم بن سعد، وهو من غُرَر [2] الحديث فيما رواه الأكابرُ عن الأصاغر:
সা'দ ইবনু আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কুরাইশদের অপমান বা লাঞ্ছনা কামনা করবে, আল্লাহ তাকে লাঞ্ছিত করবেন।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] محتمل للتحسين كسابقه، وهذا إسناد ضعيف، محمد بن أبي سفيان روى عنه جمع، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وزعم ابن المديني أنه ليس له غير هذا الحديث، وقال الحاكم في "معرفة علوم الحديث" ص 160: لا نعلم له راويًا غير الزهري! ويوسف بن الحكم والد الحجاج روى عنه اثنان، وقال العجلي: ثقة، إنما روى حديثًا واحدًا، وذكر له هذا الحديث، وأورده ابن حبان في "ثقاته". وقد اختلف فيه على ابن شهاب الزهري، وكذلك اختلف فيه على إبراهيم بن سعد - وهو ابن إبراهيم بن عبد الرحمن بن عوف - وعدَّه أبو حاتم الرازي كما في "العلل" لابنه (2612) حديثًا مضطربًا.وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 1/ 103، والترمذي (3905)، وأبو يعلى (775)، والشاشي (123)، وتمام في "الفوائد" (1422)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (545)، والداني في "الفتن" (127)، والخطيب في "الفصل للوصل" 2/ 904 - 905 و 905، والبغوي في "شرح السنة" (3849)، وابن عساكر في "تاريخه" 53/ 108، والضياء المقدسي في "المختارة" 3/ (1045) من طريق سليمان بن داود، بهذا الإسناد، وقال الترمذي: غريب من هذا الوجه. وتابع سليمانَ بن داود يعقوبُ بن حميد عند ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (215)، وفي "السنة" (1503)، وتمام في "الفوائد" (1422)، والخطيب في "الفصل للوصل" 2/ 906، والضياء في "المختارة" 3/ (1044)، وإبراهيم بن حمزة عند الخطيب 2/ 905 - 906، ومصعب الزبيري عند الخطيب في 2/ 907، فرووه عن إبراهيم بن سعد، به كرواية سليمان بن داود الهاشمي.ورواه سعدُ بن إبراهيم بن سعد عند أحمد 3/ (1473)، ويزيد بن الهاد عند ابن أبي شيبة 12/ 171، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (216)، وفي "السنة" (1504)، والشاشي في "مسنده" (125)، والحاكم في الرواية التالية (7133)، والخطيب 2/ 907، ويحيى بن عباد عند الخطيب 2/ 909، ويونس بن محمد عنده أيضًا 2/ 909 - 910، جميعهم عن إبراهيم بن سعد، عن صالح بن كيسان، عن الزهري، عن محمد بن أبي سفيان، عن يوسف بن الحكم، عن سعد بن أبي وقاص. ليس فيه محمد بن سعد.ورواه يعقوب بن إبراهيم بن سعد عن أبيه، مرة بذكر محمد بن سعد، ومرة من دون ذكره:فرواه أحمد (1473)، والشاشي في "مسنده" (124)، والحاكم في "معرفة علوم الحديث" ص 159 من طريقه عن أبيه، عن صالح بن كيسان، عن الزهري، عن محمد بن أبي سفيان، عن يوسف بن الحكم، عن سعد بن أبي وقاص. ليس فيه محمد بن سعد.ورواه الترمذي (3905 م)، والبزار في "مسنده" (1175) من طريقه، عن أبيه، عن صالح بن كيسان، عن الزهري، عن محمد بن أبي سفيان، عن يوسف بن الحكم، عن محمد بن سعد، عن أبيه سعد بن أبي وقاص.وكذلك صنع أبو كامل المظفر بن مدرك عن إبراهيم بن سعد، مرة لا يذكر محمد بن سعد كما عند أحمد (1586) عن صالح بن كيسان، عن ابن شِهاب، عن محمد بن أبي سفيان، عن يوسف بن الحكم، عن سعد بن أبي وقاص.ومرة يذكره كما عند أحمد أيضًا (1587) عن صالح بن كيسان، عن ابن شِهاب، عن محمد بن أبي سفيان، عن محمد بن سعد، عن أبيه سعد.وكذلك صنع أبو صالح كاتب الليث، فرواه عن إبراهيم بن سعد عند الفسوي في "المعرفة والتاريخ" - ومن طريقه الخطيب 2/ 908 - عن صالح بن كيسان، عن ابن شِهاب، عن محمد بن أبي سفيان، عن يوسف بن الحكم، عن سعد ليس فيه محمد بن سعد.ومرة يرويه عن إبراهيم بن سعد كما عند الطبراني في "الأوسط" (3200) عن صالح بن كيسان، عن ابن شِهاب، عن محمد بن أبي سفيان، عن يوسف بن الحكم، عن محمد بن سعد، عن أبيه سعد. وخالفهم يحيى بن عباد عند أبي بكر الخلال في "السنة" (708)، ويحيى الحماني عند الخطيب في "الفصل للوصل" 2/ 904، فروياه عن إبراهيم بن سعد، عن صالح بن كيسان، عن ابن شِهاب، عن محمد بن أبي سفيان، عن محمد بن سعد، عن أبيه سعد. ليس فيه يوسف بن الحكم.وأما اختلافهم على الزهري:فرواه ابن إسحاق عند الطبراني في "الأوسط" (3808) عن مكحول، عن الزهري، عن محمد بن أبي سفيان، عن محمد بن سعد. عن أبيه سعد، ليس فيه يوسف بن الحكم.وأخرجه معمر في "جامعه" (19905)، ومن طريقه أحمد (1521)، وابن عدي في "الكامل" 2/ 746، والضياء في "المختارة" 3/ (1030) عن ابن شِهاب الزهري، عن عمر بن سعد، عن أبيه سعد. وقال أحمد في روايته: عن عمر بن سعد أو غيره، ووقع في "الكامل" مكان عمر بن سعد: عامر بن سعد، وهو خطأ. والزهري لم يسمع من عمر بن سعد فيما قال ابن معين، وقال الدارقطني في "العلل" (627): ووهم فيه معمرٌ، والصحيح حديث صالح بن كيسان.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (327)، والأوسط" (3609) من طريق محمد بن عبد الرحمن بن مجبر، عن ابن شِهاب الزهري، عن عامر بن سعد، عن أبيه سعد بن أبي وقاص. وابن مجبر متروك، وقال الدارقطني: وهو وهم، والصحيح حديث الزهري عن محمد بن أبي سفيان.ورواه عُقيل - فيما قال الدارقطني في "العلل" - عن الزهري عن سعد، لم يذكر بينهما أحدًا.وقال أيضًا: قال ابن أبي ذئب: عن الزهري أنه بلغه عن سعد، وحديث صالح هو الصواب.
[2] في (ص): عزيز.
7133 - أخبرَناه أبو النَّضر الفقيه وأبو إسحاق القارئ وأبو الحسن العَنَزي، قالوا: حدَّثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدَّثنا عبد الله بن صالح ويحيى بن عبد الله بن بُكَير، حدَّثنا الليث بن سعد، حدثني ابن الهاد، عن إبراهيم بن سعد، عن صالح بن كَيْسان، عن ابن شِهاب، عن محمد بن أبي سفيان، عن يوسف بن أبي عقيل، عن سعد بن أبي وقَّاص قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "من يُرِدْ هَوَانَ قريشٍ أهانَه الله عز وجل" [1]. يوسفُ بن أبي عَقيل: هو ابن الحَكَم بلا شكٍّ، وقد صحَّتِ الروايةُ عن رسول الله صلى الله عليه وسلم: أنَّ الولد لا يَجْني على أبيه [2].
সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি কুরাইশদের অপমান কামনা করবে, আল্লাহ তা'আলা তাকে অপমানিত করবেন।”
[ইউসুফ ইবনু আবী আকীল নিঃসন্দেহে ইবনু আল-হাকাম। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এই বর্ণনাটি সহীহ সাব্যস্ত হয়েছে যে, সন্তান তার পিতার কৃত অপরাধের জন্য দায়ী হয় না।]
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] محتمل للتحسين كسابقه.
[2] حديث: "لا يجني عليك، ولا تجني عليه" سلف عند المصنف برقم (3632)، وإسناده صحيح. ولشطره الأول انظر حديث علي بن الحسين عن عمر السالف برقم (4735).ويشهد لشطره الثاني حديث أبي هريرة عند البخاري (6585): "يَرِدُ عليَّ يوم القيامة رهط من أصحابي، فيُحلؤون عن الحوض، فأقول: يا رب أصحابي، فيقول: إنك لا علم لك بما أحدثوا بعدك، إنهم ارتدوا على أدبارهم القهقرى".وحديثه الآخر عند مسلم (247): "ترد علي أمتي الحوض، وأنا أذود الناس عنه، كما يذود الرجل إبل الرجل عن إبله" قالوا: يا نبي الله، أتعرفنا؟ قال: "نعم، لكم سيما ليست لأحد غيركم؛ تردون عليَّ غرًّا محجلين من آثار الوضوء، وليُصدَّن عني طائفة منكم فلا يصلون، فأقول: يا رب، هؤلاء من أصحابي، فيُجيبني ملك، فيقول: وهل تدري ما أحدثوا بعدك؟ ".ونحوه من حديث أنس عند البخاري (6582)، ومسلم (2304).
7134 - أخبرنا أبو الحسين أحمد بن عثمان بن يحيى المُقرئ ببغداد، حدَّثنا أبو قلابة الرَّقَاشي، حدَّثنا أبو حُذيفة، حدَّثنا زهير بن محمد، عن عبد الله بن محمد بن عَقيل، عن حمزة بن أبي سعيد الخُدْري، عن أبيه قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول على المنبر: "ما بالُ أقوامٍ يقولون: إنَّ رَحِمي لا تنفعُ؟ بلى والله، إِنَّ رَحِمي موصولةٌ في الدنيا والآخرة.وإنِّي أيها الناس فَرَطُكم على الحوض، فإذا جئتُ قام رجالٌ، فقال هذا: يا رسولَ الله، أنا فلانٌ، وقال هذا: يا رسولَ الله، أنا فلانٌ، وقال هذا: يا رسولَ الله، أنا فلانٌ [1]، فأقولُ: قد عرفتُكم، ولكنَّكم أحدَثتُم بعدي ورجعتُم القَهْقَرى" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মিম্বরে দাঁড়িয়ে বলতে শুনেছি: "কিছু লোকের কী হয়েছে যে তারা বলে, আমার আত্মীয়তা (বংশগত সম্পর্ক) কোনো উপকার করবে না? আল্লাহর কসম, অবশ্যই! আমার আত্মীয়তার সম্পর্ক দুনিয়া ও আখিরাতে যুক্ত। হে লোকসকল, নিশ্চয়ই আমি হাউযের (কাউসারের) নিকট তোমাদের অগ্রগামী থাকব। যখন আমি সেখানে পৌঁছাব, তখন কিছু লোক দাঁড়াবে। তাদের একজন বলবে: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি অমুক। আরেকজন বলবে: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি অমুক। (এভাবে আরো কয়েকজন বলবে)। তখন আমি বলব: আমি তোমাদের চিনতে পেরেছি, কিন্তু তোমরা আমার পরে (দীনের মধ্যে) নতুন কিছু আবিষ্কার করেছ এবং তোমরা উল্টো দিকে ফিরে গিয়েছ।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] المرة الثالثة من قوله: "وقال هذا .. أنا فلان" لم ترد في (م) و (ص). ولشطره الأول انظر حديث علي بن الحسين عن عمر السالف برقم (4735).ويشهد لشطره الثاني حديث أبي هريرة عند البخاري (6585): "يَرِدُ عليَّ يوم القيامة رهط من أصحابي، فيُحلؤون عن الحوض، فأقول: يا رب أصحابي، فيقول: إنك لا علم لك بما أحدثوا بعدك، إنهم ارتدوا على أدبارهم القهقرى".وحديثه الآخر عند مسلم (247): "ترد علي أمتي الحوض، وأنا أذود الناس عنه، كما يذود الرجل إبل الرجل عن إبله" قالوا: يا نبي الله، أتعرفنا؟ قال: "نعم، لكم سيما ليست لأحد غيركم؛ تردون عليَّ غرًّا محجلين من آثار الوضوء، وليُصدَّن عني طائفة منكم فلا يصلون، فأقول: يا رب، هؤلاء من أصحابي، فيُجيبني ملك، فيقول: وهل تدري ما أحدثوا بعدك؟ ".ونحوه من حديث أنس عند البخاري (6582)، ومسلم (2304).
[2] إسناده ضعيف لتفرد عبد الله بن محمد بن عقيل به وهو ليس بالقوي، وقد اضطرب في روايته، فمرةً يرويه عن حمزة بن أبي سعيد، وأخرى عن سعيد بن المسيب، وثالثة عن عبد الرحمن بن أبي سعيد، وحمزة بن أبي سعيد تفرَّد بالرواية عنه ابن عقيل، ولم يؤثر توثيقه عن معتبَر.وانظر الكلام عليه في "مسند أحمد".وأخرجه أحمد 17/ (11138) عن أبي عامر العقدي، عن زهير بن محمد، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو يعلى (1238) من طريق العقدي نفسه، عن زهير، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن عبد الرحمن بن أبي سعيد الخدري، عن أبيه. فجعل مكان حمزة عبد الرحمن بن أبي سعيد.وأخرجه أحمد 17/ (11139) و 18/ (11591) من طريق عبيد الله بن عمرو، عن ابن عقيل، عن حمزة بن أبي سعيد، عن أبيه. كرواية الحاكم.وأخرجه أحمد 17/ (11345) من طريق شريك النخعي، عن ابن عقيل، عن سعيد بن المسيب، عن أبي سعيد الخدري. وشريك سيئ الحفظ. ولشطره الأول انظر حديث علي بن الحسين عن عمر السالف برقم (4735).ويشهد لشطره الثاني حديث أبي هريرة عند البخاري (6585): "يَرِدُ عليَّ يوم القيامة رهط من أصحابي، فيُحلؤون عن الحوض، فأقول: يا رب أصحابي، فيقول: إنك لا علم لك بما أحدثوا بعدك، إنهم ارتدوا على أدبارهم القهقرى".وحديثه الآخر عند مسلم (247): "ترد علي أمتي الحوض، وأنا أذود الناس عنه، كما يذود الرجل إبل الرجل عن إبله" قالوا: يا نبي الله، أتعرفنا؟ قال: "نعم، لكم سيما ليست لأحد غيركم؛ تردون عليَّ غرًّا محجلين من آثار الوضوء، وليُصدَّن عني طائفة منكم فلا يصلون، فأقول: يا رب، هؤلاء من أصحابي، فيُجيبني ملك، فيقول: وهل تدري ما أحدثوا بعدك؟ ".ونحوه من حديث أنس عند البخاري (6582)، ومسلم (2304).
7135 - أخبرني الشيخ أبو بكر بن إسحاق، فيما قرأتُه عليه من أصلِ كتابه، أخبرنا محمد بن أحمد بن الوليد الكَرَابيسي ببغداد، حدَّثنا إسحاق بن سعيد بن الأُرْكُون الدِّمشقي، حدَّثنا خُلَيد بن دَعْلَج، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أمان أهلِ الأرض من الاختلافِ المُوالاة لقريشٍ، قريشٌ أهلُ الله، أهلُ آلاءِ الله، فإذا خالفَتْها قبيلةٌ من العرب صاروا [1] حِزبَ إبليسَ" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "পৃথিবীবাসীর মধ্যে মতানৈক্য ও বিভেদ থেকে নিরাপত্তা হলো কুরাইশদের প্রতি ভালোবাসা ও আনুগত্য রাখা। কুরাইশ হলো আল্লাহর পরিবার (আহলুল্লাহ) এবং তারা হলো আল্লাহর অনুগ্রহের (আলা) ধারক। যখন আরবের কোনো গোত্র তাদের বিরোধিতা করবে, তখন তারা ইবলিসের দলে পরিণত হবে।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في (ز) و (ب): صار.
[2] إسناده تالف من أجل ابن الأُركون وشيخه خليد بن دَعلج كما سلف بيانه برقم (4766).ووهَّاه الذهبي في "التخليص" وقال: في إسناده ضعيفان.
7136 - أخبرني أبو جعفر محمد بن علي بن دُحَيم الشَّيباني بالكوفة، حدَّثنا أحمد بن حازم الغِفاري، حدَّثنا محمد بن طَريف البَجَلي، حدَّثنا محمد بن فُضَيل، عن الأعمش، عن أبي سَبْرة النَّخَعي، عن محمد بن كعب القُرَظي، عن العباس بن عبد المطَّلب قال: كُنَّا نلقَى النَّفرَ من قريش وهم يتحدَّثون، فيَقطَعونَ حديثَهم، فذَكَرنا ذلك لرسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "ما بالُ أقوامٍ يتحدَّثون، فإذا رأَوُا الرجلَ من أهلي قَطعُوا حديثَهم؟! والله لا يدخُلُ قلبَ رجلٍ الإيمانُ حتى يُحِبَّهم لله تعالى ولِقَرابتي" [1].هذا حديث يُعرَف من حديث يزيد بن أبي زياد عن عبد الله بن الحارث عن العبّاس، فإذا حصل هذا الشاهدُ من حديث ابن فُضيل عن الأعمش، حكمنا له بالصِّحة.وأما حديثُ يزيد بن أبي زياد:
আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা কুরাইশদের কিছু লোকের সাথে সাক্ষাৎ করতাম যখন তারা কথা বলত, তখন তারা তাদের কথা বলা বন্ধ করে দিত। আমরা বিষয়টি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উল্লেখ করলাম। তিনি বললেন: "লোকদের কী হয়েছে যে তারা কথা বলতে থাকে, আর যখন তারা আমার পরিবারভুক্ত কোনো লোককে দেখে, তখন তারা তাদের কথা বন্ধ করে দেয়?! আল্লাহর কসম, কোনো ব্যক্তির অন্তরে ঈমান প্রবেশ করবে না, যতক্ষণ না সে আল্লাহ তাআলার সন্তুষ্টির জন্য এবং আমার আত্মীয়তার কারণে তাদেরকে ভালোবাসে।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف، أبو سبرة النخعي روى عنه ثلاثة، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقال ابن معين: لا أعرفه، وقد انفرد بهذا الطريق، ومحمد بن كعب لم يدرك العباس بن عبد المطلب.وأخرجه ابن ماجه (140) عن محمد بن طريف، بهذا الإسناد. في رفعه، واختلف فيه أيضًا على مسعر بن كدام، وعلى أبي صادق - وهو الأزدي الكوفي - كما سيأتي. والموقوف أصحُّ كما قال الدارقطني في "العلل" (359)، وربيعة بن ناجذ لم يذكروا عنه راويًا غير أبي صادق، وقال الذهبي في "الميزان": لا يكاد يعرف، وذكره ابن حبان في "ثقاته".وقوله فيه: "اسمعوا وأطيعوا ما لم يخير … إلخ" منكر.وأخرجه تامًّا ومختصرًا البزار (759)، وابن الأعرابي في "معجمه" (2320)، والطبراني في "الأوسط" (3521)، وفي "الصغير" (425)، وأبو نعيم في "الحلية" 7/ 242، وأبو عمرو الداني في "الفتن" (203)، والبيهقي 8/ 143، والضياء في "المختارة" 2/ (450)، والرافعي في "التدوين في أخبار قزوين" 2/ 422 من طرق عن الفيض بن الفضل البجلي، بهذا الإسناد.وخالف الفيضَ وكيعٌ عند ابن أبي شيبة 12/ 172 و 544، وابن أبي عاصم في السنة" (1513)، وأبي بكر الخلال في "السنة" (63)، وشعيبُ بنُ إسحاق عند أبي عمرو الداني في "الفتن" (204)، فروياه عن مسعر، عن عثمان بن المغيرة، عن أبي صادق، عن ربيعة، عن علي موقوفًا. جعلا شيخ مسعر عثمان، ووقفاه. ووقع في رواية ابن أبي عاصم مكان مسعر سفيان، ونظنه تحريفًا من الناسخ.وكذلك رواه أبو عوانة عن عثمان بن المغيرة موقوفًا، والموقوف أشبه بالصواب. قاله الدارقطني في "العلل".وخالفهم داودُ بن عبد الجبار كما في "علل الدارقطني" 3/ 199، فرواه عن مسعر، عن عثمان بن المغيرة، عن أبي صادق، به مرفوعًا. وداود بن عبد الجبار تالفٌ لا يُفرح به.ورواه قبيصة بن عقبة عن سفيان الثوري عند ابن أبي شيبة 12/ 171 - وعنه ابن أبي عاصم في السنة" (1514) - عن الحارث بن حَصيرة، عن أبي صادق، عن علي موقوفًا. ليس فيه ربيعة بن ناجذ. وقبيصة في سفيان فيه كلام، والحارث بن حصيرة ضعيف يعتبر به.وأخرجه ابن أبي شيبة 15/ 23 عن وكيع، عن إبراهيم بن مرثد، عن عمه أبي صادق، عن علي، قال: الأئمة من قريش، ومن فارق الجماعة شبرًا فقد نزع ربقة الإسلام من عنقه. وإبراهيم بن مرثد مجهول.وأخرجه عبد الله بن أحمد في زوائده على "المسند" 2/ (790)، والبزار (512)، والدارقطني في "العلل" (426) من طريقين عن محمد بن جابر، عن عبد الملك بن عمير، عن عمارة بن رويبة، عن علي مرفوعًا: "الناس تبع لقريش برُّهم لبرهم، وفاجرُهم تبع لفاجرهم". ومحمد بن جابر - وهو ابن سيار السحيمي - ضعيف.وأخرجه معمر في "جامعه" (19903) عن ليث بن أبي سليم، قال: وقال علي: الأئمة من قريش، فمؤمن الناس تبع لمؤمنهم، وكافر الناس تبع لكافرهم. وليث سيئ الحفظ، وروايته عن علي منقطعة.وأخرجه نعيم بن حماد في "الفتن" (287) عن هشيم، عن العوام بن حوشب، عمَّن حدثه عن علي، قال: الأئمة من قريش، خيارهم على خيارهم، وشرارهم على شرارهم، ألا وليس بعد قريش إلَّا الجاهلية. وإسناده ضعيف لإبهام راويه عن علي.وأخرج أبو يعلى (564)، والطبراني في "الدعاء" (2116) من طريق حفص بن خالد، قال: حدثني أبي، عن جدي، عن عليّ: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم خطب الناس ذات يوم فقال: "إنّ الأمراء من قريش - ثلاث مرار - ما أقاموا ثلاثًا: ما حكموا فعدلوا، وما عاهدوا فوفوا، وما استُرحموا فرحموا، فمن لم يفعل ذلك منهم، فعليه لعنة الله والملائكة والناس أجمعين". وفي إسناده غيرُ واحد مجهول، لكن صحَّ معناه عن غير ما صحابيٍّ كما سيأتي ذكرهم.وقوله: "الأئمة من قريش" قال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 11/ 58: جمعتُ طرقه عن نحو أربعين صحابيًا.قلنا: منها حديث أبي هريرة عند البخاري (3495)، ومسلم (1818) بلفظ: "الناس تبع لقريش في هذا الشأن، مسلمهم تبع لمسلمهم، وكافرهم تبع لكافرهم".ومنها حديث ابن عمر عند البخاري (3501)، ومسلم (1820) بلفظ: "لا يزال هذا الأمر في قريش ما بقي منهم اثنان".وفي باب السمع والطاعة عن أنس بن مالك عند البخاري (693) وغيره بلفظ: "اسمعوا وأطيعوا وإن استُعمل حبشي كأن رأسه زبيبة".وعن أبي ذر عند مسلم (648) بلفظ: إنَّ خليلي أوصاني أن أسمع وأطيع، وإن كان عبدًا مجدَّع الأطراف.وقوله فيه: "اسمعوا وأطيعوا ما لم يُخيّر أحدكم بن إسلامه وضربه عنقه … إلخ" منكر، والطاعة مشروطة للحاكم المسلم وفيما لا معصية فيه، لقوله صلى الله عليه وسلم في حديث أم الحصين عند أحمد 45/ (27269)، ومسلم (1838): "ولو استُعمل عليكم عبد يقودكم بكتاب الله، فاسمعوا له وأطيعوا".ولقوله صلى الله عليه وسلم في حديث أنس عند أحمد 19/ (12307)، والحاكم (8738)، وفي حديث أبي برزة عند أحمد 23/ (19777)، وفي حديث أبي موسى الأشعري عند أحمد أيضًا 32/ (19541): "الأئمة من قريش، إنَّ لهم عليكم حقًّا، ولكم عليهم حقًّا مثل ذلك، ما إن استُرحموا فرحموا، وإن عاهدوا وفوا، وإن حكموا عدلوا، فمن لم يفعل ذلك منهم، فعليه لعنة الله والملائكة والناس أجمعين". ونحوه من حديث أبي هريرة عند أحمد أيضًا 13/ (7653).
7137 - فحدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدَّثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدَّثنا يعلى بن عُبيد، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن يزيد بن أبي زياد، عن عبد الله بن الحارث، عن العبّاس بن عبد المطَّلب قال: قلتُ: يا رسولَ الله، إذا لَقِيَ قريشٌ بعضُها بعضًا لَقُوا بالبِشَارة، وإذا لَقِيناهم لَقُونا بوجوهٍ لا نعرفُها، قال: فغضِبَ غضبًا شديدًا، ثم قال: "والذي نفسُ محمدٍ بيده، لا يدخُلُ قلبَ رجلٍ الإيمانُ حتى يُحِبَّكم لله ولرسولِه" [1].
আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! কুরাইশরা যখন একে অপরের সাথে দেখা করে, তারা আনন্দের সাথে সাক্ষাৎ করে। আর যখন তারা আমাদের সাথে দেখা করে, তখন এমন মুখভঙ্গি নিয়ে দেখা করে যা আমরা চিনি না।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন খুব কঠোরভাবে রাগান্বিত হলেন, অতঃপর বললেন: "যার হাতে মুহাম্মাদের জীবন, তাঁর শপথ! কোনো ব্যক্তির হৃদয়ে ঈমান প্রবেশ করবে না যতক্ষণ না সে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জন্য তোমাদেরকে ভালোবাসে।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف. وقد سبق بيانه وتخريجه عند الرواية (5521). في رفعه، واختلف فيه أيضًا على مسعر بن كدام، وعلى أبي صادق - وهو الأزدي الكوفي - كما سيأتي. والموقوف أصحُّ كما قال الدارقطني في "العلل" (359)، وربيعة بن ناجذ لم يذكروا عنه راويًا غير أبي صادق، وقال الذهبي في "الميزان": لا يكاد يعرف، وذكره ابن حبان في "ثقاته".وقوله فيه: "اسمعوا وأطيعوا ما لم يخير … إلخ" منكر.وأخرجه تامًّا ومختصرًا البزار (759)، وابن الأعرابي في "معجمه" (2320)، والطبراني في "الأوسط" (3521)، وفي "الصغير" (425)، وأبو نعيم في "الحلية" 7/ 242، وأبو عمرو الداني في "الفتن" (203)، والبيهقي 8/ 143، والضياء في "المختارة" 2/ (450)، والرافعي في "التدوين في أخبار قزوين" 2/ 422 من طرق عن الفيض بن الفضل البجلي، بهذا الإسناد.وخالف الفيضَ وكيعٌ عند ابن أبي شيبة 12/ 172 و 544، وابن أبي عاصم في السنة" (1513)، وأبي بكر الخلال في "السنة" (63)، وشعيبُ بنُ إسحاق عند أبي عمرو الداني في "الفتن" (204)، فروياه عن مسعر، عن عثمان بن المغيرة، عن أبي صادق، عن ربيعة، عن علي موقوفًا. جعلا شيخ مسعر عثمان، ووقفاه. ووقع في رواية ابن أبي عاصم مكان مسعر سفيان، ونظنه تحريفًا من الناسخ.وكذلك رواه أبو عوانة عن عثمان بن المغيرة موقوفًا، والموقوف أشبه بالصواب. قاله الدارقطني في "العلل".وخالفهم داودُ بن عبد الجبار كما في "علل الدارقطني" 3/ 199، فرواه عن مسعر، عن عثمان بن المغيرة، عن أبي صادق، به مرفوعًا. وداود بن عبد الجبار تالفٌ لا يُفرح به.ورواه قبيصة بن عقبة عن سفيان الثوري عند ابن أبي شيبة 12/ 171 - وعنه ابن أبي عاصم في السنة" (1514) - عن الحارث بن حَصيرة، عن أبي صادق، عن علي موقوفًا. ليس فيه ربيعة بن ناجذ. وقبيصة في سفيان فيه كلام، والحارث بن حصيرة ضعيف يعتبر به.وأخرجه ابن أبي شيبة 15/ 23 عن وكيع، عن إبراهيم بن مرثد، عن عمه أبي صادق، عن علي، قال: الأئمة من قريش، ومن فارق الجماعة شبرًا فقد نزع ربقة الإسلام من عنقه. وإبراهيم بن مرثد مجهول.وأخرجه عبد الله بن أحمد في زوائده على "المسند" 2/ (790)، والبزار (512)، والدارقطني في "العلل" (426) من طريقين عن محمد بن جابر، عن عبد الملك بن عمير، عن عمارة بن رويبة، عن علي مرفوعًا: "الناس تبع لقريش برُّهم لبرهم، وفاجرُهم تبع لفاجرهم". ومحمد بن جابر - وهو ابن سيار السحيمي - ضعيف.وأخرجه معمر في "جامعه" (19903) عن ليث بن أبي سليم، قال: وقال علي: الأئمة من قريش، فمؤمن الناس تبع لمؤمنهم، وكافر الناس تبع لكافرهم. وليث سيئ الحفظ، وروايته عن علي منقطعة.وأخرجه نعيم بن حماد في "الفتن" (287) عن هشيم، عن العوام بن حوشب، عمَّن حدثه عن علي، قال: الأئمة من قريش، خيارهم على خيارهم، وشرارهم على شرارهم، ألا وليس بعد قريش إلَّا الجاهلية. وإسناده ضعيف لإبهام راويه عن علي.وأخرج أبو يعلى (564)، والطبراني في "الدعاء" (2116) من طريق حفص بن خالد، قال: حدثني أبي، عن جدي، عن عليّ: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم خطب الناس ذات يوم فقال: "إنّ الأمراء من قريش - ثلاث مرار - ما أقاموا ثلاثًا: ما حكموا فعدلوا، وما عاهدوا فوفوا، وما استُرحموا فرحموا، فمن لم يفعل ذلك منهم، فعليه لعنة الله والملائكة والناس أجمعين". وفي إسناده غيرُ واحد مجهول، لكن صحَّ معناه عن غير ما صحابيٍّ كما سيأتي ذكرهم.وقوله: "الأئمة من قريش" قال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 11/ 58: جمعتُ طرقه عن نحو أربعين صحابيًا.قلنا: منها حديث أبي هريرة عند البخاري (3495)، ومسلم (1818) بلفظ: "الناس تبع لقريش في هذا الشأن، مسلمهم تبع لمسلمهم، وكافرهم تبع لكافرهم".ومنها حديث ابن عمر عند البخاري (3501)، ومسلم (1820) بلفظ: "لا يزال هذا الأمر في قريش ما بقي منهم اثنان".وفي باب السمع والطاعة عن أنس بن مالك عند البخاري (693) وغيره بلفظ: "اسمعوا وأطيعوا وإن استُعمل حبشي كأن رأسه زبيبة".وعن أبي ذر عند مسلم (648) بلفظ: إنَّ خليلي أوصاني أن أسمع وأطيع، وإن كان عبدًا مجدَّع الأطراف.وقوله فيه: "اسمعوا وأطيعوا ما لم يُخيّر أحدكم بن إسلامه وضربه عنقه … إلخ" منكر، والطاعة مشروطة للحاكم المسلم وفيما لا معصية فيه، لقوله صلى الله عليه وسلم في حديث أم الحصين عند أحمد 45/ (27269)، ومسلم (1838): "ولو استُعمل عليكم عبد يقودكم بكتاب الله، فاسمعوا له وأطيعوا".ولقوله صلى الله عليه وسلم في حديث أنس عند أحمد 19/ (12307)، والحاكم (8738)، وفي حديث أبي برزة عند أحمد 23/ (19777)، وفي حديث أبي موسى الأشعري عند أحمد أيضًا 32/ (19541): "الأئمة من قريش، إنَّ لهم عليكم حقًّا، ولكم عليهم حقًّا مثل ذلك، ما إن استُرحموا فرحموا، وإن عاهدوا وفوا، وإن حكموا عدلوا، فمن لم يفعل ذلك منهم، فعليه لعنة الله والملائكة والناس أجمعين". ونحوه من حديث أبي هريرة عند أحمد أيضًا 13/ (7653).
7138 - حدَّثنا أبو محمد عبد الرحمن بن حَمْدان الجَلَّاب بهَمَذان، حدَّثنا أبو حاتم الرازي، حدَّثنا الفَيْضُ بن الفضل البَجَلي، حدَّثنا مِسعَر بن كِدَام، عن سَلَمة بن كُهيل، عن أبي صادق، عن ربيعة بن ناجِذ، عن علي بن أبي طالب قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "الأئمةُ من قريش، أبرارُها أمراءُ أبرارِها، وفُجَّارُها أُمراءُ فجَّارِها، ولكلٍّ حقٌّ، فآتُوا كلَّ ذي حقٍّ حقَّه، وإن أمَّرتُ عليكم عبدًا حبشيًّا مُجدَّعًا فاسمعوا له وأطيعوا، ما لم يُخيِّرْ أحدَكم بين إسلامِه وضَرْبِه عُنقَه، فإن خُيِّرَ بين إسلامِه وضَرْبِه عُنقَه، فليُقدِّم عُنقَه، فإنه لا دُنيا له ولا آخرةَ بعد إسلامِه" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ذكرُ فَضْل المهاجرين
আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "খলীফাগণ কুরাইশ বংশীয় হবে। তাদের মধ্যে যারা নেককার, তারা নেককারদের শাসক হবে; আর যারা পাপাচারী, তারা পাপাচারীদের শাসক হবে। এবং প্রত্যেকেরই অধিকার আছে। অতএব, তোমরা প্রত্যেক অধিকারীকে তার অধিকার দাও। যদি তোমাদের উপর একজন নাক-কাটা হাবশী গোলামকেও শাসক নিযুক্ত করা হয়, তবুও তোমরা তার কথা শোনো এবং তার আনুগত্য করো, যতক্ষণ না সে তোমাদের কাউকে তার ইসলাম ও গর্দান উড়িয়ে দেওয়ার মধ্যে একটিকে বেছে নিতে বাধ্য করে। যদি সে ইসলাম অথবা গর্দান উড়িয়ে দেওয়ার মধ্যে একটি বেছে নিতে বাধ্য হয়, তবে সে যেন তার গর্দানকে (মৃত্যুকে) প্রাধান্য দেয়। কেননা ইসলামের পর তার জন্য কোনো দুনিয়া বা আখিরাত নেই।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف، الفيض بن الفضل روى عنه جمع، وذكره ابن حبان في "ثقاته"، وقد خولف في رفعه، واختلف فيه أيضًا على مسعر بن كدام، وعلى أبي صادق - وهو الأزدي الكوفي - كما سيأتي. والموقوف أصحُّ كما قال الدارقطني في "العلل" (359)، وربيعة بن ناجذ لم يذكروا عنه راويًا غير أبي صادق، وقال الذهبي في "الميزان": لا يكاد يعرف، وذكره ابن حبان في "ثقاته".وقوله فيه: "اسمعوا وأطيعوا ما لم يخير … إلخ" منكر.وأخرجه تامًّا ومختصرًا البزار (759)، وابن الأعرابي في "معجمه" (2320)، والطبراني في "الأوسط" (3521)، وفي "الصغير" (425)، وأبو نعيم في "الحلية" 7/ 242، وأبو عمرو الداني في "الفتن" (203)، والبيهقي 8/ 143، والضياء في "المختارة" 2/ (450)، والرافعي في "التدوين في أخبار قزوين" 2/ 422 من طرق عن الفيض بن الفضل البجلي، بهذا الإسناد.وخالف الفيضَ وكيعٌ عند ابن أبي شيبة 12/ 172 و 544، وابن أبي عاصم في السنة" (1513)، وأبي بكر الخلال في "السنة" (63)، وشعيبُ بنُ إسحاق عند أبي عمرو الداني في "الفتن" (204)، فروياه عن مسعر، عن عثمان بن المغيرة، عن أبي صادق، عن ربيعة، عن علي موقوفًا. جعلا شيخ مسعر عثمان، ووقفاه. ووقع في رواية ابن أبي عاصم مكان مسعر سفيان، ونظنه تحريفًا من الناسخ.وكذلك رواه أبو عوانة عن عثمان بن المغيرة موقوفًا، والموقوف أشبه بالصواب. قاله الدارقطني في "العلل".وخالفهم داودُ بن عبد الجبار كما في "علل الدارقطني" 3/ 199، فرواه عن مسعر، عن عثمان بن المغيرة، عن أبي صادق، به مرفوعًا. وداود بن عبد الجبار تالفٌ لا يُفرح به.ورواه قبيصة بن عقبة عن سفيان الثوري عند ابن أبي شيبة 12/ 171 - وعنه ابن أبي عاصم في السنة" (1514) - عن الحارث بن حَصيرة، عن أبي صادق، عن علي موقوفًا. ليس فيه ربيعة بن ناجذ. وقبيصة في سفيان فيه كلام، والحارث بن حصيرة ضعيف يعتبر به.وأخرجه ابن أبي شيبة 15/ 23 عن وكيع، عن إبراهيم بن مرثد، عن عمه أبي صادق، عن علي، قال: الأئمة من قريش، ومن فارق الجماعة شبرًا فقد نزع ربقة الإسلام من عنقه. وإبراهيم بن مرثد مجهول.وأخرجه عبد الله بن أحمد في زوائده على "المسند" 2/ (790)، والبزار (512)، والدارقطني في "العلل" (426) من طريقين عن محمد بن جابر، عن عبد الملك بن عمير، عن عمارة بن رويبة، عن علي مرفوعًا: "الناس تبع لقريش برُّهم لبرهم، وفاجرُهم تبع لفاجرهم". ومحمد بن جابر - وهو ابن سيار السحيمي - ضعيف.وأخرجه معمر في "جامعه" (19903) عن ليث بن أبي سليم، قال: وقال علي: الأئمة من قريش، فمؤمن الناس تبع لمؤمنهم، وكافر الناس تبع لكافرهم. وليث سيئ الحفظ، وروايته عن علي منقطعة.وأخرجه نعيم بن حماد في "الفتن" (287) عن هشيم، عن العوام بن حوشب، عمَّن حدثه عن علي، قال: الأئمة من قريش، خيارهم على خيارهم، وشرارهم على شرارهم، ألا وليس بعد قريش إلَّا الجاهلية. وإسناده ضعيف لإبهام راويه عن علي.وأخرج أبو يعلى (564)، والطبراني في "الدعاء" (2116) من طريق حفص بن خالد، قال: حدثني أبي، عن جدي، عن عليّ: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم خطب الناس ذات يوم فقال: "إنّ الأمراء من قريش - ثلاث مرار - ما أقاموا ثلاثًا: ما حكموا فعدلوا، وما عاهدوا فوفوا، وما استُرحموا فرحموا، فمن لم يفعل ذلك منهم، فعليه لعنة الله والملائكة والناس أجمعين". وفي إسناده غيرُ واحد مجهول، لكن صحَّ معناه عن غير ما صحابيٍّ كما سيأتي ذكرهم.وقوله: "الأئمة من قريش" قال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 11/ 58: جمعتُ طرقه عن نحو أربعين صحابيًا.قلنا: منها حديث أبي هريرة عند البخاري (3495)، ومسلم (1818) بلفظ: "الناس تبع لقريش في هذا الشأن، مسلمهم تبع لمسلمهم، وكافرهم تبع لكافرهم".ومنها حديث ابن عمر عند البخاري (3501)، ومسلم (1820) بلفظ: "لا يزال هذا الأمر في قريش ما بقي منهم اثنان".وفي باب السمع والطاعة عن أنس بن مالك عند البخاري (693) وغيره بلفظ: "اسمعوا وأطيعوا وإن استُعمل حبشي كأن رأسه زبيبة".وعن أبي ذر عند مسلم (648) بلفظ: إنَّ خليلي أوصاني أن أسمع وأطيع، وإن كان عبدًا مجدَّع الأطراف.وقوله فيه: "اسمعوا وأطيعوا ما لم يُخيّر أحدكم بن إسلامه وضربه عنقه … إلخ" منكر، والطاعة مشروطة للحاكم المسلم وفيما لا معصية فيه، لقوله صلى الله عليه وسلم في حديث أم الحصين عند أحمد 45/ (27269)، ومسلم (1838): "ولو استُعمل عليكم عبد يقودكم بكتاب الله، فاسمعوا له وأطيعوا".ولقوله صلى الله عليه وسلم في حديث أنس عند أحمد 19/ (12307)، والحاكم (8738)، وفي حديث أبي برزة عند أحمد 23/ (19777)، وفي حديث أبي موسى الأشعري عند أحمد أيضًا 32/ (19541): "الأئمة من قريش، إنَّ لهم عليكم حقًّا، ولكم عليهم حقًّا مثل ذلك، ما إن استُرحموا فرحموا، وإن عاهدوا وفوا، وإن حكموا عدلوا، فمن لم يفعل ذلك منهم، فعليه لعنة الله والملائكة والناس أجمعين". ونحوه من حديث أبي هريرة عند أحمد أيضًا 13/ (7653).