হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7139)


7139 - حدَّثنا علي بن حَمْشاذ العَدْل، حدَّثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدَّثنا أبو النُّعمان محمد بن الفضل، حدَّثنا حماد بن زيد، حدَّثنا حجَّاج الصوَّاف، عن أبي الزُّبير، عن جابر: أنَّ الطُّفيل بن عمرو قال للنبيِّ صلى الله عليه وسلم: هل لكَ في حِصْنٍ ومَنَعَةٍ، حِصْنِ دَوْس؟ فأبى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم لِمَا ذُخِرَ للأنصار، قال: فهاجرَ الطُّفيل وهاجَرَ معه رجلٌ من قومِه، فمَرِضَ الرجلُ، قال: فضَجِرَ - أو كلمةً شبيهة - فجاء إلى قَرَنٍ فأخذَ مِشقَصًا فقطع رواجِبَه فمات، فرآه الطُّفيل في المَنام، فقال: ما فُعلَ بكَ؟ قال: غُفِرَ لي بهجرتي إلى النبيِّ صلى الله عليه وسلم، فقال: ما شأنُ يديكَ؟ قال: قيل لي: إنَّا لن نُصلِحَ منكَ ما أفسدتَ مِن نفسِك. قال: فقَصَّها الطُّفيلُ على النبيِّ صلى الله عليه وسلم، فقال: "اللهمَّ ولِيدَيهِ فَاغفِرُ"، ورفعَ يَدَيْهِ [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় তুফায়ল ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: আপনার জন্য কি দাওস-এর দুর্গের মতো সুরক্ষিত ও প্রতিরক্ষামূলক কোনো দুর্গ পছন্দ হবে? কিন্তু রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা প্রত্যাখ্যান করলেন, কারণ (আল্লাহ তাআলা) আনসারদের জন্য যা কিছু জমা করে রেখেছিলেন (অর্থাৎ মদীনা ও তার সাহায্য), তার কারণে। তিনি (জাবির/তুফায়ল) বলেন: এরপর তুফায়ল হিজরত করলেন এবং তার কওমের একজন লোকও তার সাথে হিজরত করলেন। অতঃপর লোকটি অসুস্থ হয়ে পড়ল। তিনি বললেন: লোকটি অস্থির হয়ে পড়ল – অথবা একই রকম কোনো শব্দ (ব্যবহৃত হয়েছিল) – ফলে সে একটি শিংযুক্ত স্থানে গেল, একটি চওড়া ফলাযুক্ত তীর (মিশক্বাস) নিল, অতঃপর তার হাতের রগগুলো কেটে ফেলল এবং মারা গেল। তুফায়ল তাকে স্বপ্নে দেখলেন এবং জিজ্ঞেস করলেন: তোমার সাথে কেমন ব্যবহার করা হলো? লোকটি বলল: নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে আমার হিজরতের কারণে আমাকে ক্ষমা করে দেওয়া হয়েছে। তুফায়ল জিজ্ঞেস করলেন: তোমার হাত দু’টির কী অবস্থা? সে বলল: আমাকে বলা হয়েছে: 'তুমি তোমার নিজের যে অংশ নষ্ট করেছ, তা আমরা তোমার জন্য ঠিক করব না।' তিনি (জাবির/তুফায়ল) বলেন: অতঃপর তুফায়ল ঘটনাটি নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে বর্ণনা করলেন। তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আল্লাহ! তার হাত দু’টিকেও ক্ষমা করে দিন।" এবং তিনি তাঁর হাত দু’টি উঠালেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده صحيح.وأخرجه أحمد 23/ (14982)، ومسلم (116) من طريق سليمان بن حرب، عن حماد بن زيد، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه ابن حبان (3017) من طريق إسماعيل بن عليّة، عن حجاج بن أبي عثمان الصواف، به. ووقع في رواية البخاري في "الأدب المفرد" (614): فقطع وَدَجَيهِ فمات.وسياق حديث جابر بن سمرة يؤيده: أنَّ رجلًا كانت به جراحة، فأتى قرنًا له فأخذ مشقصًا، فذبح به نفسه، فلم يصل عليه النبي صلى الله عليه وسلم. أخرجه مسلم (978)، وابن حبان (3095) والسياق له. وقد سلف بنحوه عند الحاكم (1363).القَرَنُ: هو الجَعْبة، والمِشقص: هو نصلٌ طويل حاد.والرواجب، قال في "النهاية": هي ما بين عقد الأصابع من داخل، واحدُها: راجبة، والبراجم: العقد المتشنجة في ظاهر الأصابع.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7140)


7140 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الزاهد الأصبهاني، حدَّثنا أحمد بن مِهْران، حدَّثنا عبيد الله بن موسى، حدَّثنا إسرائيل، عن سِماك، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عباس في قوله عز وجل: {كُنْتُمْ خَيْرَ أُمَّةٍ أُخْرِجَتْ لِلنَّاسِ} [آل عمران: 110]، قال: هم الذين هاجروا مع النبي صلى الله عليه وسلم إلى المدينة [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মহান আল্লাহ তাআলার বাণী— {তোমরাই শ্রেষ্ঠ উম্মত, মানবজাতির জন্য তোমাদের আবির্ভাব হয়েছে} [সূরা আলে ইমরান: ১১০] প্রসঙ্গে তিনি বলেন, তারা হলেন তারা, যারা নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মদীনায় হিজরত করেছেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده حسن. وهو مكرر (3198).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7141)


7141 - أخبرني أبو محمد بن زياد العَدْل، حدَّثنا محمد بن إسحاق، حدَّثنا أحمد بن عبد الرحمن بن وهب، حدثني عمِّي، أخبرني سليمان بن بلال، عن كثير بن زيد، عن عبد الرحمن بن أبي سعيد الخُدْري، عن أبيه، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "للمهاجرينَ مَنابرُ من ذَهَبٍ يَجلِسُون عليها يومَ القيامة، قد أمنوا من الفَزَع". قال: ثم يقول أبو سعيد: والله لو حَبَوتُ بها أحدًا لحَبَوتُ بها قومي [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه. ‌‌ذكرُ فضائِل أهل بدر




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মুহাজিরদের জন্য স্বর্ণের মিম্বর (বসার স্থান) থাকবে, যার উপর তারা কিয়ামতের দিন বসবে, যখন তারা (মহাত্রাস) থেকে নিরাপদ থাকবে।" তিনি (আবূ সাঈদ) বলেন: অতঃপর আবূ সাঈদ বলতেন: আল্লাহর কসম, যদি আমি এই মর্যাদার দ্বারা (এই হাদিসটি প্রদান করে) কাউকে বিশেষিত করতাম, তবে আমি আমার কওমকে (গোত্রকে)ই বিশেষিত করতাম।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف من أجل كثير بن زيد - وهو الأسلمي - فقد تفرَّد به، وهو ممن لا يحتمل تفرده، فالأكثر على تضعيفه، كما أنه إنما يروي عن عبد الرحمن بن أبي سعيد بواسطة ابنه رُبيح بن عبد الرحمن، ولا نعرف له رواية عن والد ربيح إلا في هذا الخبر. وأحمد بن عبد الرحمن قال أبو حاتم الرازي: خلط ثم رجع، وكان صدوقًا، وبنحوه قال أبو زرعة، وأعله الذهبي في "التلخيص" بأحمد هذا، فقال: أحمد واهٍ. قلنا: لكنه متابع. وعمه: هو عبد الله بن وهب المصري، وأبو محمد بن زياد: هو عبد الله بن محمد بن علي بن زياد.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (340)، والبزار (1269 - كشف الأستار)، وتمام في "الفوائد" (1607) من طريق سفيان بن حمزة، وابن حبان (7262)، والآجري في "الشريعة" (1117) من طريق عبد العزيز بن أبي حازم، كلاهما عن كثير بن زيد، بهذا الإسناد. وقال البزار: لا نعلمه بهذا اللفظ إلا بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7142)


7142 - حدَّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدَّثنا محمد بن سِنان القزَّاز، حدَّثنا عمر بن يونس بن القاسم اليَمَامي، حدَّثنا عكرمة بن عمار، حدَّثنا أبو زُمَيل قال: قال ابن عباس: قال عمر بن الخطاب: كتَبَ حاطبُ بن أبي بَلْتعةَ إلى أهل مكةَ، فأطلعَ الله تعالى عليه نبيَّه صلى الله عليه وسلم، فبعثَ عليًّا والزبيرَ في أثرٍ الكتاب، فأدركا امرأةً على بعير، فاستخرجاه [1] من قَرْنٍ من قُرونها، فأتَيا به نبيَّ الله صلى الله عليه وسلم فقُرِئَ عليه، فأرسلَ إلى حاطب، فقال: "يا حاطبُ، إِنَّكَ [2] كتبتَ هذا الكتابَ؟ قال: نعم يا رسولَ الله، قال: "فما حملَكَ على ذلك؟ " قال: يا رسولَ الله، إني والله لناصحٌ لله ولرسوله صلى الله عليه وسلم ولكنِّي كنتُ غَريبًا في أهل مكةَ، وكان أهلي بين ظَهرانَيْهم، فخشيتُ عليهم، فكتبتُ كتابًا لا يضرُّ الله ورسوله شيئًا، وعسى أن يكون فيه منفعةٌ لأهلي، قال عمر: فاختَرطتُ سيفي فقلت: يا رسولَ الله، أمكِنِّي منه، فإنه قد كفَرَ، فأضربَ عُنقَه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا ابنَ الخطاب، وما يُدريك لعلَّ الله قد اطَّلعَ على أهلِ هذه العصابة من أهلِ بدرٍ، فقال: اعملُوا ما شئتُم، فإنِّي قد غفرتُ لكم؟! " [3].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه هكذا، إنما اتَّفقا على حديث عبيد الله بن أبي رافع عن عليٍّ: بعثني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أنا والزُّبيرَ إلى رَوضةِ خَاخٍ، بغير هذا اللفظ [4].




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: হাতিব ইবনু আবী বালতা'আ মক্কার অধিবাসীদের কাছে পত্র লিখেছিলেন। আল্লাহ তাআলা তাঁর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সে বিষয়ে অবহিত করলেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আলী ও যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সেই পত্রের সন্ধানে পাঠালেন। তাঁরা (রাস্তায়) একটি উটের পিঠে থাকা এক মহিলাকে পেলেন এবং তার চুলের খোপা থেকে পত্রটি বের করলেন। তারপর তাঁরা সেটি আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে নিয়ে আসলেন এবং তাঁর সামনে তা পাঠ করা হলো। তিনি হাতিবের কাছে লোক পাঠালেন এবং বললেন: “হে হাতিব, তুমিই কি এই পত্রটি লিখেছো?” তিনি বললেন: “হ্যাঁ, ইয়া রাসূলাল্লাহ।” তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তোমাকে কিসে এই কাজ করতে প্ররোচিত করলো?” তিনি (হাতিব) বললেন: “ইয়া রাসূলাল্লাহ, আল্লাহর শপথ! আমি আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রতি অবশ্যই বিশ্বস্ত। কিন্তু আমি মক্কাবাসীর মধ্যে একজন বহিরাগত ছিলাম এবং আমার পরিবার তাদের মাঝেই ছিল। আমি তাদের জন্য আশঙ্কা করলাম। তাই আমি এমন একটি পত্র লিখেছিলাম যা আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোনো ক্ষতি করবে না, আর হয়তো এর মাধ্যমে আমার পরিবারের কোনো উপকার হতে পারে।” উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তখন আমার তরবারি কোষমুক্ত করে বললাম: “ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাকে তার উপর কর্তৃত্ব দিন, কেননা সে কুফুরি করেছে, তাই আমি তার গর্দান উড়িয়ে দেব।” তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “হে খাত্তাবের পুত্র! তুমি কী জানো, সম্ভবত আল্লাহ বদর যুদ্ধে অংশগ্রহণকারী এই দলটির প্রতি দৃষ্টিপাত করেছেন এবং বলেছেন: ‘তোমরা যা ইচ্ছা করো, নিশ্চয় আমি তোমাদেরকে ক্ষমা করে দিয়েছি’?”




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في نسخنا الخطية: فاستخرجا، والمثبت من النسخة المحمودية كما في طبعة الميمان.



[2] في المصادر: أنت، وهو الأنسب.



7142 [3] - صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل محمد بن سنان القزار، وقد توبع. أبو زميل: هو سماك بن الوليد الحنفي.وأخرجه البزار (197)، وأبو يعلى كما في "المطالب العالية" لابن حجر (3756/ 1) ومن طريقه الضياء المقدسي في "المختارة" 1/ (174) - والطحاوي في "شرح المشكل" (4436) من طرق عن عمر بن يونس اليمامي، بهذا الإسناد. ورواية الضياء سقط منها ذكر عمر.وأخرجه تامًّا ومختصرًا يعقوب بن شيبة في "مسند عمر" ص 54 - 55، والطبراني في "الأوسط" (2647)، والقطيعي في "جزء الألف دينار" (255)، والضياء المقدسي 1/ (175 - 177) من طريق أبي حذيفة موسى بن مسعود، عن عكرمة بن عمار، به.وسلف عن ابن عبّاس في آخر حديث طويل برقم (4702).وسلف أيضًا عن عبد الرحمن بن حاطب بن أبي بلتعة برقم (5393)، وذكرنا شواهده هناك.وسيأتي مختصرًا من حديث أبي هريرة برقم (7144).



7142 [4] - البخاري (3007) و (4274) و (4890)، ومسلم (2494)، بلفظ: بعثني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أنا والزبير والمقداد بن الأسود، ولم يذكر المصنف المقداد بن الأسود.ووقع في رواية أبي عبد الرحمن السلمي عن علي عند البخاري (3983) و (6259): بعثني رسول الله صلى الله عليه وسلم وأبا مرثد الغنوي والزبير بن العوام، وكلنا فارس.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7143)


7143 - أخبرني عبد الرحمن بن الحسن القاضي بهَمَذان، حدَّثنا إبراهيم بن الحسين، حدَّثنا آدم بن أبي إياس، حدثني محمد بن إسماعيل بن أبي فُديك المَديني، حدَّثنا عبد الملك بن زيد، عن مصعب بن مصعب، عن الزُّهْري، عن أبي سَلَمة بن عبد الرحمن بن عَوف، عن أبيه قال: كلَّمَ طلحةُ بنُ عبيد الله [1] عامرَ بن فُهَيرة بشيءٍ، فقال له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "مهلًا يا طلحةُ، فإنه قد شَهِدَ بدرًا كما شهدتَ، وخيرُكم خيرُكم لمَوالِيهِ" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবদুর রহমান ইবনে আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তালহা ইবনে উবায়দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমের ইবনে ফুহাইরাকে কোনো বিষয়ে কিছু বললে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "হে তালহা, থামো! কারণ, সেও তোমার মতোই বদরের যুদ্ধে অংশ নিয়েছে। আর তোমাদের মধ্যে সর্বোত্তম ব্যক্তি হলো সেই, যে তার মাওলাদের (মুক্ত দাস/অধীনস্তদের) প্রতি উত্তম ব্যবহার করে।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] أقحم في النسخ هنا: ابن.



[2] إسناده ضعيف بمرة، عبد الرحمن بن الحسن وعبد الملك بن زيد - وهو ابن سعيد بن زيد - ومصعب بن مصعب ضعفاء. انظر لترجمة الأخيرين "اللسان" لابن حجر (4914) و (7768).وأبو سلمة بن عبد الرحمن، قال ابن معين: لم يسمع من أبيه شيئًا.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (337) عن محمد بن خلف العسقلاني، والطبراني في "الكبير" (287)، و "الأوسط" (9305)، و "الصغير" (1121) - وعنه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5159) - عن هاشم بن مرثد، كلاهما عن آدم بن أبي أياس، بهذا الإسناد. وقال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن الزهري إلا مصعب بن مصعب، ولا عن مصعب إلا عبد الملك بن زيد، ولا عن عبد الملك إِلَّا ابن أبي فديك، تفرَّد به آدم، ولا يروى عن عبد الرحمن بن عوف إلا بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7144)


7144 - أخبرني أبو العباس محمد بن أحمد المحبُوبي، حدَّثنا سعيد بن مسعود، حدَّثنا يزيد بن هارون، أخبرنا حمّاد بن سلمة، عن عاصم، عن [1] أبي صالح، عن أبي هريرة، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم قال: "إِنَّ الله تعالى اطَّلعَ على [2] أهل بدرٍ، فقال: اعْمَلُوا ما شِئْتُم، فقد غَفَرتُ لكم" [3]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه بهذا اللفظ على اليقين: إنَّ الله اطَّلع عليهم فغَفَرَ لهم، إنما أخرجاه [4] على الظنِّ: "وما يُدريكَ لعلَّ الله اطَّلعَ على أهل بدرٍ؟! ". ‌‌ذكرُ فضائل الأنصار رضي الله عنهم




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা বদরের যোদ্ধাদের উপর দৃষ্টি দিলেন এবং বললেন: তোমরা যা ইচ্ছা করো, আমি তোমাদের ক্ষমা করে দিয়েছি।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف حرف الجرّ "عن" في النسخ الخطية إلى: بن.



[2] في (م) و (ص): إلى. هذه الواقعة من أي عمل كان، فهو مغفور.وقيل: إنَّ المراد ذنوبهم تقع إذا وَقَعَت مغفورة. وقيل: هي بشارة بعدم وقوع الذُّنوب منهم، وفيه نظر ظاهر، لمَا سيأتي (عند شرح حديث البخاري: 4011) في قصة قدامة بن مظعون حين شرب الخمر في أيام عمر، وحَدَّه عمر، فهاجره بسبب ذلك، فرأى عمرُ في المنام مَن يأمره بمصالحته، وكان قدامةُ بدريًّا. والذي يُفهَم من سياق القصة الاحتمالُ الثاني.



7144 [3] - إسناده حسن من أجل عاصم - وهو ابن أبي النجود - وقد انفرد بهذا اللفظ، والأخبار التي رويت في هذا إنما جاءت بعبارة الترجي: "لعلَّ الله قد اطلع … فقال: اعملوا ما شئتم، فقد غفرت لكم"، وسنذكر كلام الحافظ ابن حجر في ذلك. أبو صالح: هو ذكوان السمان.وأخرجه أبو داود (4654) عن موسى بن إسماعيل، وابن حبان (4798) من طريق أبي نصر التمار عبد الملك القشيري، كلاهما عن حماد بن سلمة، به. ورواية ابن حبان مطولة ذكر في أولها قصة.وانظر ما سلف برقمي (5393) و (7142).قال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 12/ 60 - 61: المراد منه هنا: الاستدلال على فضل أهل بدر بقولِه صلى الله عليه وسلم المذكور، وهي بشارة عظيمة لم تقع لغيرهم.ووقع الخبر بألفاظٍ: منها: "فقد غَفَرت لكم"، ومنها: "فقد وَجَبَت لكم الجنَّة". وكلها بلفظ: "لعلَّ الله اطَّلَعَ، لكن قال العلماء: إنَّ الترجي في كلام الله وكلام رسوله للوقوع. وقد وقع عند أحمد (7940) وأبي داود (4654) وابن أبي شيبة (12/ 155) من حديث أبي هريرة بالجزمِ ولفظه: "إنَّ الله اطَّلع على أهل بدر، فقال: اعملوا ما شئتُم، فقد غفرتُ لكم"، وعند أحمد (14484 و 15262) بإسناد على شرط مسلم من حديث جابر مرفوعًا: "لن يدخل النار أحدٌ شهدَ بدرًا [والحديبية] ".وقد استُشكِلَ قوله: "اعملوا ما شئتُم"، فإنَّ ظاهره أنَّه للإباحة، وهو خلاف عَقْد الشَّرع، وأجيب: بأنه إخبار عن الماضي، أي: كلّ عمل كان لكم فهو مغفور، ويؤيِّده أنَّه لو كان لمَا يَستَقبلونه من العمل لم يقع بلفظ الماضي، ولقال: فسأغفرُه لكم، وتُعقِّب بأنَّه لو كان للماضي، لما حَسُن الاستدلال به في قصة حاطب لأنه صلى الله عليه وسلم خاطَبَ به عمرَ مُنكِرًا عليه ما قال في أمر حاطبٍ، وهذه القصّة كانت بعد بدر بستِّ سنين، فدَلَّ على أنَّ المراد ما سيأتي، وأورده بلفظ الماضي مبالغة في تحقيقه.وقيل: إنَّ صيغة الأمر في قوله: "اعملوا" للتشريف والتكريم، والمراد عدم المؤاخذة بما يَصدُر منهم بعد ذلك، وأنَّهم خُصّوا بذلك لمَا حصل لهم من الحال العظيمة التي اقتضت محو ذنوبهم السابقة، وتأهَّلوا لأن يغفر الله لهم الذُّنوب اللاحقة إن وَقَعَت، أي: كلّ ما عَمِلتُموه بعد هذه الواقعة من أي عمل كان، فهو مغفور.وقيل: إنَّ المراد ذنوبهم تقع إذا وَقَعَت مغفورة. وقيل: هي بشارة بعدم وقوع الذُّنوب منهم، وفيه نظر ظاهر، لمَا سيأتي (عند شرح حديث البخاري: 4011) في قصة قدامة بن مظعون حين شرب الخمر في أيام عمر، وحَدَّه عمر، فهاجره بسبب ذلك، فرأى عمرُ في المنام مَن يأمره بمصالحته، وكان قدامةُ بدريًّا. والذي يُفهَم من سياق القصة الاحتمالُ الثاني.



7144 [4] - البخاري (3007)، ومسلم (2494) من حديث عليّ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7145)


7145 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدَّثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدَّثنا عبد الرحمن - وهو ابن مَهْدي - حدَّثنا زهير بن محمد، عن عبد الله بن محمد بن عَقِيل، عن الطُّفيل بن أبي بن كعب، عن أبيه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إذا كانَ يومُ القيامة كنتُ إمامَ النبيِّين وخطيبَهم وصاحبَ شفاعتِهم غيرَ فَخْرٍ" [1].7145 م - ثم سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "لولا الهجرةُ كنتُ امْرَأً من الأنصار، ولو سَلَكتِ الأنصارُ واديًا أو شِعبًا لكنتُ مع الأنصار" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة [3].




উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যখন কিয়ামতের দিন হবে, তখন আমি নবীগণের ইমাম, তাদের খতিব এবং তাদের সুপারিশকারী হব, তবে এতে কোনো গর্ব নেই।”

এরপর (তিনি আরও বলেন,) আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যদি হিজরত না থাকত, তবে আমি আনসারদেরই একজন হতাম। আর যদি আনসাররা কোনো উপত্যকা বা গিরিপথ ধরে চলত, তবে আমিও আনসারদের সাথেই থাকতাম।”




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل عبد الله بن محمد بن عقيل. وسلف برقمي (241) و (242).



[2] صحيح لغيره.وأخرجه أحمد 35/ (21246)، والترمذي (3899) من طريق أبي عامر العقدي، وعبد الله بن أحمد (21257) من طريق أبي حذيفة موسى بن محمد، كلاهما عن زهير بن محمد، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الله بن أحمد أيضًا (21253) و (21258) من طريق عبيد الله بن عمرو، عن ابن عقيل، به.وسيأتي برقم (7148) نحوه من حديث أبي قتادة الأنصاري. وانظر التعليق الآتي على كلام المصنف.



7145 [3] - كذا قال، وقد أخرجه البخاري كرواية أبيِّ بن كعب من حديث أبي هريرة برقم (3779) و (7244) بلفظ: "لو أنَّ الأنصار سلكوا واديًا أو شِعبًا، لسلكتُ في وادي الأنصار، ولولا الهجرة لكنتُ امرأ من الأنصار".ورواه البخاري (4333) ومسلم (1059) من حديث أنس بلفظ: "لو سلك الناس واديًا وسلكت الأنصار شعبًا، لاخترتُ شِعب الأنصار"، وفيه قصة.ورواه البخاري (4330) و (7245) ومسلم (1061) من حديث عبد الله بن زيد بن عاصم، وفيه القصة أيضًا. شيخَ الزهريِّ عبدَ الرحمن أخا عبد الله بن كعب! وهذا وهمٌ من معمر، فقد خالف سفيان وشعيبًا، ورواه أيضًا ابن سعد 2/ 220 عن الواقدي، عن معمر ومحمد بن عبد الله، عن الزهري، عن عبد الله بن كعب، عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم. فرواه على الصواب.ويشهد له حديثُ أنس عند البخاري (3801)، ومسلم (2510): "الأنصار كَرِشي وعَيبتي، والناس سيكثرون ويقلُّون، فاقبلوا من محسنهم، وتجاوزوا عن مسيئهم".وحديثُ ابن عباس التالي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7146)


7146 - حدَّثنا أبو بكر أحمد بن كامل القاضي، حدَّثنا عبد الله بن رَوْح، حدَّثنا يزيد بن هارون، أخبرنا سفيان بن حسين، عن الزُّهْري، عن عبد الله بن كعب بن مالك، عن أبيه كعب بن مالك أنه قال: إنَّ آخرَ خُطبة خطبناها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، قال: "يا معشرَ المهاجرين، إنَّكم قد أصبحتُم تَزيدُونَ، وإِنَّ الأنصارَ قد انْتَهَوا [1]، وإنَّهم عَيْبتي التي آوِي إليها، فأكرِمُوا مُحسِنَهم، وتجاوَزُوا عن مُسِيئِهم" [2]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




কা'ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের উদ্দেশ্যে তাঁর সর্বশেষ যে খুতবাটি দিয়েছিলেন, তাতে তিনি বললেন: "হে মুহাজিরগণ, তোমরা সংখ্যায় ক্রমশ বৃদ্ধি পাচ্ছ, কিন্তু আনসাররা (সংখ্যায়) আর বৃদ্ধি পাচ্ছে না। আর তারা হলো আমার বিশ্বস্ত পাত্র, যার দিকে আমি আশ্রয় নিই। সুতরাং তোমরা তাদের নেককারদের সম্মান করো এবং তাদের ভুলকারীদের ক্ষমা করে দাও।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] رسمت في (ز) و (ب): اسعوا، من دون نقط، وضبب عليها في (ز)، وفي بقية النسخ مكانها بياض، والمثبت من مصادر التخريج. شيخَ الزهريِّ عبدَ الرحمن أخا عبد الله بن كعب! وهذا وهمٌ من معمر، فقد خالف سفيان وشعيبًا، ورواه أيضًا ابن سعد 2/ 220 عن الواقدي، عن معمر ومحمد بن عبد الله، عن الزهري، عن عبد الله بن كعب، عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم. فرواه على الصواب.ويشهد له حديثُ أنس عند البخاري (3801)، ومسلم (2510): "الأنصار كَرِشي وعَيبتي، والناس سيكثرون ويقلُّون، فاقبلوا من محسنهم، وتجاوزوا عن مسيئهم".وحديثُ ابن عباس التالي.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات غير أن سفيان بن حسين له عن الزهري أوهامٌ، وهذا منها، فقد جعلَ صحابيَّ الحديث كعبَ بن مالك، وقد خالفه من هو أوثق منه، فقالوا: عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، كما سيأتي.وأخرجه تامًّا ومقطعًا ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1712) و (1713) و (1743)، والدُّولابي في "الكنى" (1737)، والطبراني في "الكبير" 19/ (158)، وأبو طاهر المخلص في "المخلصيات" (1085) و (1892) من طرق عن سفيان بن حسين، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 25/ (16075) من طريق شعيب بن أبي حمزة، عن الزهري، عن عبد الله بن كعب، عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم.وأخرجه أحمد (21951) من طريق معمر، عن الزهري، عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك، وكان أبوه أحد الثلاثة الذين تيب عليهم، عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، فذكره. فجعل معمرٌ شيخَ الزهريِّ عبدَ الرحمن أخا عبد الله بن كعب! وهذا وهمٌ من معمر، فقد خالف سفيان وشعيبًا، ورواه أيضًا ابن سعد 2/ 220 عن الواقدي، عن معمر ومحمد بن عبد الله، عن الزهري، عن عبد الله بن كعب، عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم. فرواه على الصواب.ويشهد له حديثُ أنس عند البخاري (3801)، ومسلم (2510): "الأنصار كَرِشي وعَيبتي، والناس سيكثرون ويقلُّون، فاقبلوا من محسنهم، وتجاوزوا عن مسيئهم".وحديثُ ابن عباس التالي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7147)


7147 - حدَّثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدَّثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدَّثنا أبو الوليد الطيالسي، حدَّثنا عبدُ الرحمن بن سليمان بن الغَسِيل، حدَّثنا عِكْرمة، عن ابن عبّاس قال: خرجَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم في مرضه وقد عَصَبَ رأسَه بخِرقةٍ، فقال: "إنَّ الناسَ يَكثُرونَ ويَقِلُّ الأنصارُ، حتى يكونوا في الناس مثلَ المِلْحِ في الطعام، فمن وَلِيَ منكم عملًا، فليَقبَلْ مِن مُحسِنِهم ويتجاوَزْ عن مُسِيئِهم" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর অসুস্থতার সময় (ঘর থেকে) বের হলেন, তখন তিনি একটি কাপড় দিয়ে তাঁর মাথা বেঁধে রেখেছিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই মানুষের সংখ্যা বৃদ্ধি পাবে, আর আনসারদের সংখ্যা কমে যাবে, এমনকি তারা (অন্যান্য) মানুষের মাঝে খাদ্যে লবণের মতো হয়ে যাবে। সুতরাং তোমাদের মধ্যে যে কেউ কোনো কাজের দায়িত্ব লাভ করবে, সে যেন তাদের (আনসারদের) সৎকর্মশীলদের গ্রহণ করে এবং তাদের মন্দকর্মশীলদের ক্ষমা করে দেয়।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد جيد من أجل عبد الرحمن بن الغسيل.وأخرجه أحمد 3/ (2074) و 4/ (2629)، والبخاري (927) و (3628) و (3800) من طرق عن عبد الرحمن بن الغسيل بهذا الإسناد. ورواياتُ البخاري أو في من رواية الحاكم، ورواية أحمد الأولى مختصرة بلفظ: خَطبَ الناس، وعليه عِصابة دَسِمة.واستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7148)


7148 - حدَّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدَّثنا بَحْر بن نَصْر، قال: قُرِئ على عبد الله بن وهب: أخبرك أبو صخر، أن يحيى بن النَّضْر الأنصاري حدثه، أنه سمع أبا قَتَادة يقول: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقولُ على المِنبر للأنصار: "ألا إنَّ الناس دِثَاري، وإنَّ الأنصارَ شِعاري، ولو سلك الناسُ واديًا وسلكتِ الأنصارُ شُعبة، لاتَّبعتُ شُعبة الأنصار، فمن وَلِيَ أمرَ الأنصارِ فليُحسِنَ إلى مُحسِنِهم، وليتجاوَزْ عن مُسِيئِهم، ومن أفزَعَهم فقد أفزعَ الذي [1] بين هذين - وأشار إلى نفسِه - لولا الهجرةُ لكنتُ امْرَأً من الأنصار" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবু কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে মিম্বারের উপর দাঁড়িয়ে আনসারদের উদ্দেশ্যে বলতে শুনেছেন: "সাবধান! নিশ্চয়ই (অন্যান্য) লোকেরা আমার বাইরের পোশাক (দিছার) স্বরূপ, আর আনসারগণ হলো আমার ভেতরের পোশাক (শি'আর) স্বরূপ। যদি মানুষ একটি উপত্যকা দিয়ে চলে এবং আনসারগণ একটি সংকীর্ণ পথে (শূ'বা) চলে, তবে আমি অবশ্যই আনসারদের সেই সংকীর্ণ পথটি অনুসরণ করব। সুতরাং, যে ব্যক্তি আনসারদের কোনো দায়িত্ব গ্রহণ করে, সে যেন তাদের সৎকর্মশীলদের প্রতি সদাচার করে এবং তাদের খারাপ কাজকারীকে ক্ষমা করে দেয়। আর যে ব্যক্তি তাদের ভীত বা সন্ত্রস্ত করবে, সে তাকেই ভীত বা সন্ত্রস্ত করল—যাকে [রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজের প্রতি ইঙ্গিত করে] এই দুটির (পাঁজর/বক্ষের) মাঝে রয়েছে। যদি হিজরত না থাকত, তবে আমি আনসারদেরই একজন মানুষ হতাম।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في النسخ: والذي … إلخ، بزيادة حرف الواو، وفي رواية "المسند الآتية: فقد أفزع هذا الذي بين هاتين. وأخرج ابن حبان (6264) وغيره من طريق الزهري، عن يزيد بن وديعة الأنصاري، عن أبي هريرة مرفوعًا: "الأنصار أعفة صبر"، وسنده حسن في المتابعات والشواهد.وأخرج ابن أبي شيبة 12/ 160 من طريق محمد بن إسحاق، عن عاصم بن عمر بن قتادة مرسلًا، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا ذكر الأنصار قال: "أعفة صُبر".وانظر ما بعده.



[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل أبي صخر: وهو حميد بن زياد المدني.وأخرجه أحمد 37/ (22614) عن هارون بن معروف، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد.ويشهد لقوله: "الناس دثاري، والأنصار شعاري" حديثُ أبي هريرة عند أحمد 15/ (9434)، والنسائي (8265).ويشهد لباقيه ما قبله من الأحاديث.قوله: "الأنصار شعاري"، الشعار بوزن كتاب: ما يلي الجسد من الثوب، و "دثاري": هو الثوب الذي فوق الشِّعار. والمعنى: أنَّ الأنصار هم الخاصة والبطانة، والناس هم العامة. وأخرج ابن حبان (6264) وغيره من طريق الزهري، عن يزيد بن وديعة الأنصاري، عن أبي هريرة مرفوعًا: "الأنصار أعفة صبر"، وسنده حسن في المتابعات والشواهد.وأخرج ابن أبي شيبة 12/ 160 من طريق محمد بن إسحاق، عن عاصم بن عمر بن قتادة مرسلًا، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا ذكر الأنصار قال: "أعفة صُبر".وانظر ما بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7149)


7149 - أخبرنا أبو عمرو عثمان بن أحمد السَّمّاك ببغداد، حدَّثنا يحيى بن جعفر بن الزِّبْرِقان، حدَّثنا أبو داود الطَّيالسي وعبدُ الصمد بن عبد الوارث، حدَّثنا محمد بن ثابت البُناني، عن أبيه، عن أنس بن مالك، عن أبي طلحة: أنه دخل على رسولِ الله صلى الله عليه وسلم في وَجَعِه الذي مات فيه، فقال: "أقرِئْ قومَكَ السَّلامَ، فإنهم - ما عَلِمتُ - أعِفَّةٌ صُبُرٌ" [1]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সেই অসুস্থতার সময় তাঁর নিকট প্রবেশ করলেন, যে অসুস্থতায় তিনি ইন্তেকাল করেন। তখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার সম্প্রদায়কে আমার সালাম পৌঁছে দাও। কেননা আমার জানামতে তারা হলো পবিত্র (চরিত্রবান) ও ধৈর্যশীল।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حديث صحيح غير أمره بإقراء السلام، وهذا إسناد ضعيف من أجل محمد بن ثابت البناني.وأخرجه الترمذي (3903) عن عبدة بن عبد الله الخزاعي، عن أبي داود وعبد الصمد، بهذا الإسناد. وقال: حسن صحيح، وفي نسخة: حسن غريب.وأخرجه أحمد 19/ (12521) عن عبد الصمد وحده، به عن أنس، ليس فيه أبو طلحة.وأخرج الروياني (985)، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" (28)، والشاشي (1056) و (1057)، والطبراني في "المعجم الكبير" (4709)، والصيداوي في "معجم شيوخه" من طريق مسلم بن إبراهيم، عن الحسن بن أبي جعفر، عن ثابت البناني، عن أنس، عن أبي طلحة مرفوعًا: جزاكم الله يا معشر الأنصار خيرًا، فإنكم ما علمت أعفَّة صُبر". والحسن بن أبي جعفر ضعيف. وأخرج ابن حبان (6264) وغيره من طريق الزهري، عن يزيد بن وديعة الأنصاري، عن أبي هريرة مرفوعًا: "الأنصار أعفة صبر"، وسنده حسن في المتابعات والشواهد.وأخرج ابن أبي شيبة 12/ 160 من طريق محمد بن إسحاق، عن عاصم بن عمر بن قتادة مرسلًا، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا ذكر الأنصار قال: "أعفة صُبر".وانظر ما بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7150)


7150 - حدَّثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدَّثنا محمد بن غالب، حدَّثنا عبد الله بن عبد الوهاب، حدَّثنا عاصم بن سُوَيد، حدثني يحيى بن سعيد، عن أنس بن مالك، قال: جاءَ أُسيد بن حُضَير الأشهلي إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وقد كان قَسَمَ طعامًا، فذَكَر له أهلَ بيتٍ من الأنصار من بني ظَفَرٍ فيهم حاجةٌ، قال: وجُلُّ أهل ذلك البيت نِسوةٌ، قال: فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "تركتنا يا أُسيدُ حتى ذهبَ ما في أيدينا، فإذا سمعتَ بشيء قد جاءنا، فاذكُر لي أهلَ ذلك البيتِ"، قال: فجاءه بعدَ ذلك طعامٌ من خيبرَ [1] شعيرٌ وتمرٌ، قال: فقَسَمَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في الناس، وقَسَمَ في الأنصار فأجزلَ، وقَسَمَ في أهل ذلك البيت فأجزلَ، قال: فقال له أُسيدُ بن حُضير متشكِّرًا: جزاكَ الله أيْ نبيَّ الله عنَّا أفضلَ الجَزاء، أو قال: خيرًا، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "وأنتم يا معشرَ الأنصار، فجزاكم الله أطيبَ الجزاء - أو قال: خيرًا - فإنكم - ما عَلِمتُ - أعِفَّةٌ صُبُر، وسترونَ بعدي أَثَرةً في الأمر والقَسْم، فاصبِرُوا حتى تلقوني على الحَوْض" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আনাস) বলেন, উসাইদ ইবনে হুযাইর আল-আশহালী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিছু খাদ্য বণ্টন করেছিলেন। উসাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে আনসারদের বনু যাফর গোত্রের একটি অভাবী পরিবারের কথা বললেন। তিনি (উসাইদ) বললেন, সেই পরিবারের অধিকাংশ সদস্যই নারী। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন, "হে উসাইদ, তুমি আমাদের ছেড়ে দিলে যতক্ষণ না আমাদের হাতে যা ছিল, তা শেষ হয়ে গেল। যখন তুমি শুনবে যে আমাদের কাছে কিছু এসেছে, তখন তুমি আমার কাছে সেই পরিবারের কথা উল্লেখ করো।" বর্ণনাকারী বলেন, এরপরে তাঁর কাছে খায়বার থেকে খাদ্য—যব ও খেজুর—এলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন লোকদের মাঝে তা বণ্টন করলেন, আর আনসারদের মাঝে উদারভাবে বণ্টন করলেন এবং সেই পরিবারেও উদারভাবে বণ্টন করলেন। বর্ণনাকারী বলেন, তখন উসাইদ ইবনে হুযাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কৃতজ্ঞতা প্রকাশ করে বললেন, "হে আল্লাহর নবী! আল্লাহ আপনাকে আমাদের পক্ষ থেকে সর্বোত্তম প্রতিদান দিন" – অথবা তিনি বললেন, "কল্যাণ দিন"। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমরাও, হে আনসার সম্প্রদায়! আল্লাহ তোমাদেরকে উত্তম প্রতিদান দিন" – অথবা তিনি বললেন, "কল্যাণ দিন" – "কারণ আমি যা জানি, তোমরা হলে সচ্চরিত্র ও ধৈর্যশীল। তোমরা আমার পরে (বণ্টন ও প্রশাসনের) বিষয়ে স্বজনপ্রীতি ও পক্ষপাতিত্ব দেখতে পাবে। সুতরাং তোমরা ধৈর্য ধারণ করবে, যতক্ষণ না তোমরা হাউযের (কাউসার) কাছে আমার সাথে মিলিত হও।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في (ز) و (ب) إلى: خبز. كلاهما عن عاصم بن سويد، بهذا الإسناد.وأخرجه الطحاوي في "السنن المأثورة" (408)، والبيهقي في "معرفة السنن" (238) و (239) من طريق محمد بن إدريس الشافعي، عن عبد الوهاب الثقفي، عن يحيى بن سعيد الأنصاري، عن محمد بن إبراهيم بن الحارث التيمي مرسلًا. وهذا إسناد صحيح إلى محمد التيمي.ويشهد له حديث أسيد بن حضير نفسه عند البخاري في "التاريخ الكبير" 8/ 439، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1739) و (1770)، وأبي يعلى (945)، وابن حبان (7279)، والطبراني (568)، ورواية بعضهم مختصرة، وإسناده حسن.وأخرج أحمد 31/ (19092) و (19094)، والبخاري (3792) و (7057)، ومسلم (1845)، والترمذي (2189)، والنسائي (5901) و (8286) من طريق أنس بن مالك، عن أسيد بن حضير: أنَّ رجلًا من الأنصار قال: يا رسول الله، ألا تستعملني كما استعملت فلانًا؟ قال: "ستلقَون بعدي أثرة، فاصبروا حتى تلقَوني على الحوض".ولقوله: "أعفة صُبُر" انظر الحديث قبله.وسيأتي عند المصنف (7276) حديثُ جابر، وفيه أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال للأنصار: "جَزَى الله الأنصار عنَّا خيرًا".قوله: "أثَرة" قال صاحب القاموس (أثر): محركة، والأُثرة بالضم وبالكسر، وكالحُسني؛ يعني أُثْرَى، وهي الاستئثار. قال صاحب "النهاية": أراد أنه يستأثر عليكم، فيُفضل غيركم في نصيبه من الفيء.



[2] حديث جيد، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم غير عاصم بن سويد، قال أبو حاتم الرازي: شيخ محله الصدق، روى حديثين منكرين، وقال ابن معين: لا أعرفه. فقال ابن عدي: وإنما لا يعرفه لأنه رجلٌ قليل الرواية جدًّا، ولعلَّ جميع ما يرويه لا يبلغ خمسةَ أحاديث. وساق له ابن عدي هذا الحديثَ، وذكره ابن حبان في "ثقاته". قلنا: وقد خالفه من هو أوثق منه، وهو عبد الوهاب بن عبد المجيد الثقفيُّ، فرواه عن يحيى بن سعيد عن محمد بن إبراهيم بن الحارث مرسلًا.ولبعضه شواهدُ صحيحة يأتي ذكرها.وأخرجه النسائي (8287) عن علي بن حُجر، وابن حبان (7277) من طريق محمد بن الصباح، كلاهما عن عاصم بن سويد، بهذا الإسناد.وأخرجه الطحاوي في "السنن المأثورة" (408)، والبيهقي في "معرفة السنن" (238) و (239) من طريق محمد بن إدريس الشافعي، عن عبد الوهاب الثقفي، عن يحيى بن سعيد الأنصاري، عن محمد بن إبراهيم بن الحارث التيمي مرسلًا. وهذا إسناد صحيح إلى محمد التيمي.ويشهد له حديث أسيد بن حضير نفسه عند البخاري في "التاريخ الكبير" 8/ 439، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1739) و (1770)، وأبي يعلى (945)، وابن حبان (7279)، والطبراني (568)، ورواية بعضهم مختصرة، وإسناده حسن.وأخرج أحمد 31/ (19092) و (19094)، والبخاري (3792) و (7057)، ومسلم (1845)، والترمذي (2189)، والنسائي (5901) و (8286) من طريق أنس بن مالك، عن أسيد بن حضير: أنَّ رجلًا من الأنصار قال: يا رسول الله، ألا تستعملني كما استعملت فلانًا؟ قال: "ستلقَون بعدي أثرة، فاصبروا حتى تلقَوني على الحوض".ولقوله: "أعفة صُبُر" انظر الحديث قبله.وسيأتي عند المصنف (7276) حديثُ جابر، وفيه أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال للأنصار: "جَزَى الله الأنصار عنَّا خيرًا".قوله: "أثَرة" قال صاحب القاموس (أثر): محركة، والأُثرة بالضم وبالكسر، وكالحُسني؛ يعني أُثْرَى، وهي الاستئثار. قال صاحب "النهاية": أراد أنه يستأثر عليكم، فيُفضل غيركم في نصيبه من الفيء.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7151)


7151 - أخبرني الأستاذ أبو الوليد، حدَّثنا الحسن بن سفيان، حدَّثنا عبد الوارث بن عبد الصمد، حدثني أبي، حدثني عبد الله بن أبي يزيد، عن موسى بن أنس، عن أنس: أنَّ الأنصار اشتدَّتْ عليهم السَّوَاني، فأتَوُا النبيَّ صلى الله عليه وسلم ليدعوَ لهم، أو يَحفِرَ لهم نهرًا، فأُخبر النبيُّ صلى الله عليه وسلم، فقال: "لا تسألوني اليومَ عن شيء إِلَّا أُعطِيتُم"، فلما سمعوا ما قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم قالوا: ادعُ الله لنا بالمغفرة، قال: "اللهمَّ اغفِرْ للأنصار، ولأبناءِ الأنصار، ولأبناءِ أبناءِ الأنصار" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আনসারদের জন্য সেচ বা পানি তোলার কাজ কঠিন হয়ে গিয়েছিল, তাই তারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলেন যেন তিনি তাদের জন্য দু'আ করেন অথবা তাদের জন্য একটি নদী খনন করে দেন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জানানো হলো। তিনি বললেন: "আজ তোমরা আমার কাছে যা-ই চাইবে, তা-ই দেওয়া হবে।" যখন তারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই কথা শুনলেন, তখন তারা বললেন: আল্লাহর কাছে আমাদের জন্য মাগফিরাতের (ক্ষমার) দু'আ করুন। তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! আনসারদেরকে ক্ষমা করে দাও, আনসারদের সন্তানদেরকে এবং আনসারদের সন্তানদের সন্তানদেরকে ক্ষমা করে দাও।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات غير عبد الله بن أبي يزيد، ويقال: ابن يزيد - وهو المازني - فقد روى عنه اثنان، وذكره ابن حبان في "ثقاته"، وقد صحَّ من غير هذا الطريق كما سيأتي. وأخرجه أحمد 20/ (13226) عن عبد الصمد بن عبد الوارث، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 19/ (12414)، والنسائي (10073) من طريق ثابت البناني، عن أنس.وأخرجه بنحوه أحمد 20/ (13268) من طريق عبيد الله بن أبي بكر، عن أبيه، عن جده أنس، وقال في آخره: "اللهم اغفر للأنصار، ولأبناء الأنصار، ولأبناء أبناء الأنصار" قالوا: يا رسول الله، وأولادنا من غيرنا، قال: "وأولاد الأنصار" قالوا: يا رسول الله، وموالينا، قال: "وموالي الأنصار".وأخرجه أيضًا بإثره (13268 م) من طريق أم الحكم بنت النعمان بن صهبان أنها سمعت أنسًا يقول عن النبي صلى الله عليه وسلم مثل هذا، غير أنه زاد فيه: "وكنائن الأنصار".وأخرجه من دون ذكر القصة أحمد 20/ (12651)، والنسائي (8292)، وابن حبان (7280) من طريق قتادة، وأحمد (12651 م) من طريق أبي قلابة، ومسلم (2507) (173)، وابن حبان (7282) من طريق إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، والترمذي (3909) من طريق عطاء بن السائب، جميعهم عن أنس. ولفظ رواية قتادة وأبي قلابة: "اللهم اغفر للأنصار، ولأبناء الأنصار، ولأبناء أبناء الأنصار"، ورواية النضر: "اللهم اغفر للأنصار، ولأبناء الأنصار، ولأزواج الأنصار، ولذراري الأنصار"، ورواية إسحاق: "اللهم اغفر للأنصار، ولذراريِّ الأنصار، ولذراري ذراريهم، ولموالي الأنصار"، ورواية عطاء بن السائب: "اللهم اغفر للأنصار، ولأبناء الأنصار، ولأبناء أبناء الأنصار، ولنساء الأنصار". وقال الترمذي: غريب من هذا الوجه.وأخرجه البخاري (4906) من طريق عبد الله بن الفضل، أنه سمع أنس بن مالك يقول: حزنت على من أصيب بالحَرَّة، فكتب إليَّ زيدُ بن أرقم - وبلغه شدة حزني - يذكر: أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "اللهم اغفر للأنصار، ولأبناء الأنصار". فجعله من مسند زيد بن أرقم.وكذلك صنع حمادُ بن سلمة عند ابن حبان (7281)، فرواه عن ثابت البناني، عن أبي بكر بن أنس، قال: كتب زيد بن أرقم إلى أنس بن مالك يعزيه بولده وأهله الذين أصيبوا يوم الحرة، فكتب في كتابه: وإني مبشرك ببشرى من الله، سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "اللهم اغفر للأنصار، ولأبناء الأنصار، ولأبناء أبناء الأنصار، ولنساء الأنصار، ولنساء أبناء الأنصار، ولنساء أبناء أبناء الأنصار".ورواه النضر بن أنس، واختلف عليه فيه:فرواه أحمد 20/ (12594) من طريق حرب بن ميمون، عن النضر بن أنس، عن أنس.وخالفه قتادة عند مسلم (2506) (172)، وعليُّ بن زيد بن جدعان عند الترمذي (3902)، فروياه عن النضر بن أنس، عن زيد بن أرقم مرفوعًا: "اللهم اغفر للأنصار، ولأبناء الأنصار، وأبناء أبناء الأنصار". هذا لفظ قتادة، ولفظ ابن جدعان: أنَّ زيد بن أرقم كتب إلى أنس بن مالك يُعزّيه فيمن أصيب من أهله وبني عمِّه يوم الحَرَّة، فكتب إليه: إني أبشرك ببشرى من الله، إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "اللهم اغفر للأنصار، ولذراري الأنصار، ولذراري ذراريهم"، قال الترمذي عقبه: حسن صحيح.وانظر ما سلف برقم (5875).والسَّواني: جمع سانية، وهي الناقة التي يُستقى عليها الماء. والمعنى: اشتدَّ عليهم العمل في استخراج المياه ونقلها على السواني إلى البيوت.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7152)


7152 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ، حدَّثنا السَّرِي بن خُزيمة، حدَّثنا محمد بن كَثير، حدَّثنا حماد بن سَلَمة، عن ثابت، عن أنس: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم استقبل [1] غِلمانًا من غِلمان الأنصار وإماءً وعَبيدًا، فقال: "والله إنِّي لأُحبُّكم" [2]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনসারদের কিছু বালক, দাসী এবং গোলামদের সামনে এলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "আল্লাহর শপথ! আমি অবশ্যই তোমাদের ভালোবাসি।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في نسخنا الخطية: استعمل، والمثبت من النسخة المحمودية، وهو الموافق لما في مصادر التخريج. عليكم، فأحسنوا إلى محسنهم، وتجاوزوا عن مسيئهم".



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل محمد بن كثير - وهو ابن أبي عطاء الثقفي - وقد توبع.وأخرجه أحمد 21/ (14043) عن عفان، وابن حبان (4329) من طريق هدبة بن خالد، كلاهما عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 19/ (12522) من طريق محمد بن ثابت، عن أبيه ثابت بنحوه.وأخرجه أحمد 20/ (12797)، والبخاري (3785) و (5180)، ومسلم (2508) (174) من طريق عبد العزيز بن صهيب، عن أنس بنحوه.وأخرج أحمد 19/ (12305) و (12306) و 21/ (13711)، والبخاري (3786) و (5234) و (6645)، ومسلم (2509) (175)، والنسائي (8271)، وابن حبان (7270) من طريق هشام بن زيد، عن أنس: أنَّ امرأة من الأنصار أتت النبيَّ صلى الله عليه وسلم معها أولادٌ لها، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "والذي نفسي بيده، إنكم لأحبُّ الناس إليَّ" قالها ثلاث مرار.وأخرج أحمد أيضًا 20/ (12950) و (13137)، والنسائي (8270)، وابن حبان (7266) و (7271) من طريق حميد الطويل، عن أنس بن مالك قال: خرج نبي الله صلى الله عليه وسلم، فتلقَّته الأنصار بينهم، فقال: "والذي نفس محمد بيده، إني لأُحبُّكم، إنَّ الأنصار قد قَضَوا ما عليهم، وبقي الذي عليكم، فأحسنوا إلى محسنهم، وتجاوزوا عن مسيئهم".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7153)


7153 - أخبرنا الحسن بن يعقوب العدل، حدَّثنا يحيى بن أبي طالب، حدَّثنا عبد الوهاب بن عطاء، حدَّثنا سعيدٌ بن أبي عَرُوبة، عن قَتادةَ، عن أنس بن مالك قال: افتخرَ الحيَّانِ من الأنصار الأوسُ والخزرجُ، فقالتِ الأوسُ: مِنَّا مَن اهتزَّ لموته عرشُ الرحمن سعدُ بن معاذ، ومِنَّا من حَمَتْه الدَّبْرُ عاصمُ بن ثابت بن الأَقلَح، ومِنَّا مَن غسَّلته الملائكةُ حنظلةُ ابن الراهب، ومِنَّا من أُجيزت شهادتُه بشهادةِ رجلينِ خُزيمةُ بن ثابت.وقال الخزرجيُّون: مِنَّا أربعةٌ جمعوا القرآنَ لم يجمعه غيرُهم: أُبيُّ بن كعب، ومعاذُ بن جبل، وزيدُ بن ثابت، وأبو زيد [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আনসারদের দুটি গোত্র—আউস ও খাজরাজ—একে অপরের সাথে শ্রেষ্ঠত্ব জাহির করত। আউস গোত্র বলল: আমাদের মধ্যে রয়েছেন সেই ব্যক্তি যাঁর মৃত্যুতে দয়াময়ের আরশ কেঁপে উঠেছিল—তিনি হলেন সা'দ ইবনে মু'আয। এবং আমাদের মধ্যে রয়েছেন সেই ব্যক্তি যাঁর দেহকে ভীমরুল রক্ষা করেছিল—তিনি হলেন আসিম ইবনে সাবিত ইবনুল আফলাহ। এবং আমাদের মধ্যে রয়েছেন সেই ব্যক্তি যাঁকে ফেরেশতারা গোসল দিয়েছিলেন—তিনি হলেন হানযালা ইবনু আর-রাহিব। এবং আমাদের মধ্যে রয়েছেন সেই ব্যক্তি, যাঁর সাক্ষ্যকে দু'জন লোকের সাক্ষ্য হিসেবে গ্রহণ করা হয়েছিল—তিনি হলেন খুযাইমা ইবনে সাবিত। আর খাজরাজ গোত্রের লোকেরা বলল: আমাদের মধ্যে রয়েছেন চারজন ব্যক্তি, যাঁরা কুরআন সংকলন করেছিলেন এবং তাঁরা ছাড়া অন্য কেউ তা সংকলন করেননি: উবাই ইবনে কা'ব, মু'আয ইবনে জাবাল, যায়দ ইবনে সাবিত এবং আবূ যায়দ।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي.وأخرجه البزار في "مسنده" (7090)، وأبو يعلى (2953)، والحكيم الترمذي في "النوادر" (65)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" 10/ 374 و 14/ 222، والطبراني في "الكبير" (3488)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (2226)، وفي "دلائل النبوة" (420)، وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 140، وابن عساكر 16/ 368 و 368 - 369، والضياء في "المختارة" 7/ (2570 - 2572) من طرق عن عبد الوهاب بن عطاء الخفاف، بهذا الإسناد.وأخرج أحمد 21/ (13441) عن عبد الوهاب بن عطاء، عن سعيد، عن قَتادةَ، عن أنس قال: جمع القرآن على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم أربعة نفر، كلهم من الأنصار: أبي بن كعب، ومعاذ بن جبل، وزيد بن ثابت، وأبو زيد.وأخرج أحمد (13454)، وكذا مسلم (2467) عن محمد بن عبد الله الرزي، كلاهما (أحمد ومحمد) عن عبد الوهاب، عن سعيد، قال قتادة، عن أنس بن مالك: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال وجنازة سعد موضوعة: "اهتزَّ لها عرشُ الرحمن".وسيأتي مختصرًا بقصة خُزيمة بن ثابت برقم (7233)، وهذه القصة سلفت من حديث خزيمة نفسه برقم (2218).وأخرج ابن حبان (7032) من طريق شعبة، عن قَتادةَ عن أنس: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال وجنازةُ سعد موضوعة: "اهتزَّ لها عرشُ الرحمن "فطفق المنافقون في جنازته، وقالوا: ما أخفَّها، فبلغ ذلك النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: "إنما كانت تحمله الملائكةُ معهم".وأخرج أحمد 21/ (13942)، والبخاري (3810)، ومسلم (2465)، والترمذي (3794)، والنسائي (7946) و (8228)، وابن حبان (7130) من طريق شعبة، والبخاري (5003)، ومسلم (2465) من طريق همام بن يحيى، كلاهما عن قَتادةَ، قال: سألت أنس بن مالك: من جمع القرآن على عهد النبي صلى الله عليه وسلم؟ قال: أربعة، كلهم من الأنصار: أبي بن كعب، ومعاذ بن جبل، وزيد بن ثابت، وأبو زيد. سقط من مطبوع "صحيح مسلم" ذكرُ قتادة، واستدركناه من "تحفة الأشراف" 1/ 359.وأخرج البخاري (5004) من طريق عبد الله بن المثنى، قال: حدثني ثابت البناني وثمامة، عن أنس بن مالك، قال: مات النبي صلى الله عليه وسلم ولم يجمع القرآن غير أربعة: أبو الدرداء، ومعاذ بن جبل، وزيد بن ثابت، وأبو زيد. قال: ونحن ورثناه.ويشهد لقصة عاصم بن ثابت حديثُ أبي هريرة عند أحمد 13/ (7928)، والبخاري (3045)، والنسائي (8788).ولقصة غسيل الملائكة حنظلة انظر ما سلف برقم (4979).وأبو زيد المذكور، قال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 11/ 240: ذكر علي بن المديني أنَّ اسمه أوس، وعن يحيى بن معين: هو ثابت بن زيد، وقيل: هو سعد بن عبيد بن النعمان، وبذلك جزم الطبراني [في "الأوسط" (1542)] عن شيخه أبي بكر بن صدقة، قال: وهو الذي كان يقال له: القارئ، وكان على القادسية، واستشهد بها، وهو والد عمير بن سعد، وعن الواقدي: هو قيس بن السكن بن زعوراء بن حرام الأنصاري النجاري، ويرجحه قول أنس: "أحد عمومتي"، فإنه من قبيلة بني حرام.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7154)


7154 - حدَّثنا أبو العبّاس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، أخبرني سفيان الثَّوري، عن سليمان الأعمش، عن موسى بن عبد الله بن يزيد الخَطْمي، حدَّثنا عبد الرحمن بن هِلال، عن جَرير بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "المهاجرونَ والأنصارُ بعضُهم أولياءُ بعضٍ في الدنيا والآخرة، والطُّلقاءُ من قريشٍ والعُتَقاءُ من ثَقيفٍ، بعضُهم أولياءُ بعضٍ في الدنيا والآخرة" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه. ‌‌ذكرُ فَضيلةِ أسلمَ وغِفارٍ ومُزَينةَ وغيرها




জারীর ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মুহাজিরগণ এবং আনসারগণ দুনিয়া ও আখিরাতে একে অপরের অভিভাবক, আর কুরাইশ গোত্রের তুলাকা (মুক্তিপ্রাপ্তরা) এবং সাকীফ গোত্রের উতাকা (মুক্তিপ্রাপ্তরা), তারাও দুনিয়া ও আখিরাতে একে অপরের অভিভাবক।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده صحيح. وأخرجه أحمد 31/ (19218) عن عبد الرزاق، عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد. لكن وقع في نُسخِه خطأ نُبِّه عليه هناك.وخالف الثوريَّ شريكٌ النخعيُّ عند أحمد بإثر (19215)، والطبراني في "الكبير" (2456)، فرواه عن الأعمش، عن تميم بن سلمة، عن عبد الرحمن بن هلال، به. فجعل مكان موسى بن عبد الله تميمَ بن سلمة، وشريك سيئ الحفظ.وأخرجه أحمد (19215)، وابن حبان (7260) من طريق عن عاصم بن أبي النجود، عن أبي وائل شقيق بن سلمة، عن جرير.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7155)


7155 - حدَّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، أخبرني معاوية بن صالح، عن عبد الرحمن بن عائذ الأزدي، عن عمرو بن عَبَسَة السُّلمي قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يَعرِضُ الخيلَ وعنده عُيَينةُ بن بدر الفَزَاري، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أنا أعلمُ بالخَيْل منك"، فقال عُيينة: وأنا أعلمُ بالرِّجال منك، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "فَمَن خيرُ الرِّجال؟ " قال: رِجالٌ يَحمِلون سُيوفَهم على عواتِقهم ورماحَهم على مَناسجِ خيولهم من رجال نجدٍ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "كذبتَ، بل خيرُ الرجال رجالُ اليمن، والإيمانُ يمانٍ إلى لَخْم وجُذَام، ومأكولُ حِميرَ خيرٌ من آكِلها، وحَضْرموتٍ خيرٌ من بني الحارث، والله ما أُبالي لو هَلَكَ الحارثانِ جميعًا، لَعَنَ الله الملوك الأربعةَ: جَمْدًا، ومِخوَسًا، ومِشرَحًا، وأَبْضَعةَ، وأختَهم العَمَرَّدة".ثم قال: "أمرَني ربِّي أن ألعَنَ قريشًا مرَّتينِ، فلعنتُهم، وأمرني أن أُصلِّيَ عليهم مرَّتين، فصلَّيتُ عليهم مرَّتين".ثم قال: "لعنَ الله تميمَ بن مُرٍّ وبكرَ بن وائل - سبعًا - ولعنَ الله قبيلتينِ من قبائل بني تَميم: مُقاعِسَ ومُلادِسَ". ثم قال: "عُصِيَّةُ عصتِ الله ورسولَه غيرَ [1] قيسٍ وجَعْدةَ وعِصْمةً".ثم قال: "أسلمُ وغِفارٌ ومُزَينةُ وأخلاطُهم [2] من جُهَينةَ خيرٌ من بني أسدٍ وتميمٍ وغَطَفانَ وهَوَازِنَ عند الله يومَ القيامة".ثم قال: "شَرُّ قبيلتينِ في العرب نَجْرانُ وبنو تَغلِبَ، وأكثرُ القبائل في الجنَّة مَذْحِج" [3]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث غريب المتن، صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আমর ইবনে আবাসা আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একবার ঘোড়া পরিদর্শন করছিলেন। তাঁর কাছে উয়ায়না ইবনে বদর আল-ফাজারী উপস্থিত ছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: “ঘোড়া সম্পর্কে আমি তোমার চেয়ে বেশি জানি।” তখন উয়ায়না বলল: আর আমি পুরুষ (মানুষ) সম্পর্কে আপনার চেয়ে বেশি জানি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তাহলে সর্বোত্তম পুরুষ কারা?” সে বলল: তারা হল নজদের সেই পুরুষরা যারা তাদের তরবারি কাঁধে বহন করে এবং তাদের বর্শা ঘোড়ার কেশরের উপর রাখে।

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তুমি মিথ্যা বলেছ। বরং সর্বোত্তম পুরুষ হল ইয়ামানবাসী পুরুষরা। ঈমান ইয়ামানে (সুদূর) লাخم ও জুযাম পর্যন্ত রয়েছে। হিমেরের ভক্ষণযোগ্য বস্তু তার ভক্ষণকারীর চেয়ে উত্তম। আর হাদরামাউত বনু হারিসের চেয়ে উত্তম। আল্লাহর কসম! আমার কোনো পরোয়া নেই যদি উভয় হারিস ধ্বংস হয়ে যায়। আল্লাহ চার বাদশাহকে লানত করুন: জামদ, মিখওয়াস, মিশরাহ ও আবদা'আ—এবং তাদের বোন আমররাদা (কে)।”

এরপর তিনি বললেন: “আমার রব আমাকে দুইবার কুরাইশকে লানত করতে নির্দেশ দিলেন, তাই আমি তাদের লানত করলাম। আর আমাকে দুইবার তাদের জন্য দু’আ করতে নির্দেশ দিলেন, তাই আমি দুইবার তাদের জন্য দু’আ করলাম।”

এরপর তিনি বললেন: “আল্লাহ তাযীম ইবনে মুর এবং বকর ইবনে ওয়ায়েলকে—সাতবার—লানত করুন। আর আল্লাহ বনু তামিম গোত্রের দুটি শাখাকে লানত করুন: মুকাইস ও মুলাদিসকে।”

এরপর তিনি বললেন: “উসায়্যা (গোত্র) আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের অবাধ্যতা করেছে; কায়স, জা’দাহ ও ইসমা ছাড়া [তারা অবাধ্য নয়]।”

এরপর তিনি বললেন: “আসলাম, গিফার, মুযায়না এবং তাদের সংমিশ্রিত লোকজন যারা জুহায়না থেকে এসেছে, তারা কিয়ামতের দিন আল্লাহর কাছে বনু আসাদ, তামিম, গাতফান ও হাওয়াজিনের চেয়ে উত্তম।”

এরপর তিনি বললেন: “আরবের দুটি গোত্র সবচেয়ে নিকৃষ্ট: নজ্‌রান ও বনু তাগলিব। আর জান্নাতে সবচেয়ে বেশি গোত্র হবে মাযহিজ।”




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: عبد، وصوّبناه من المصادر. (804) من طرق عن جبير بن نفير، عن عمرو بن عبسة. وجبير بن نفير كان يرسل، ولم يصرِّح بسماعه من عمرو بن عبسة، ولم نقف له على رواية ذكر فيها سماعًا منه، وذكر البخاري في ترجمته من "تاريخه الكبير" 2/ 223 من سمع منهم، فلم يذكر عمرَو بنَ عبسة، والله تعالى أعلم.وفي الباب عن معاذ بن جبل قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم في دارنا يعرض الخيل، قال: فدخل عليه عيينة بن حصين، فقال للنبي صلى الله عليه وسلم: أنت أبصرُ بالخيل مني، وأنا أبصرُ بالرجال منك، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "فأيُّ الرجال خير؟ " فقال: رجال يحملون سيوفَهم على عواتقهم، ويعرضون رماحهم على مناسج خيولهم، ويلبسون البرود من أهل نجد، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "كذبتَ، خيارُ الرجال رجال ذي يمن، الإيمانُ يمان، وأكثرُ قبيلة في الجنة مذحج، ومأكولُ حمير خيرٌ من آكلها، حضرموت خيرٌ من كِندة، فلعن الله الملوكَ الأربعة: جمدًا ومشرحًا ومخوسًا وأبضعًا، وأختَهم العمرَّدة". رواه الطبراني في "الكبير" 20/ (192) من طريق خالد بن معدان، عن معاذ، وخالد لم يسمع من معاذ، فهو منقطع.ويشهد لقوله: "الإيمان يمان" حديثُ أبي هريرة عند البخاري (3499)، ومسلم (52).ولقوله: "عصية عصت الله ورسوله" حديثًا أنسٍ وابنِ عمر عند البخاري (2814) و (3513)، ومسلم (677) (2518). وسيأتي من حديث سلمة بن الأكوع عند المصنف برقم (7158).ولقوله: "أسلم وغفار ومزينة وأخلاطهم من جهينة خير من بني أسد وتميم وغطفان وهوازن عند الله يوم القيامة" حديثُ أبي هريرة عند البخاري (3528)، ومسلم (2521). وانظر حديثي أبي أيوب وأبي هريرة التاليين عند المصنف.فائدة: الملوك الأربعة الذين لُعنوا في هذا الخبر؛ ذكر ابن سعد في "الطبقات" 7/ 13 أنهم كانوا وفدوا على النبي صلى الله عليه وسلم مع الأشعث بن قيس، فأسلموا ورجعوا إلى بلادهم، ثم ارتدوا، فقتلوا يوم النُّجير، وإنما سُموا ملوكًا لأنه كان لكل واحد منهم واد يملكه بما فيه. وقد ذكرهم ابن حزم في "جمهرة أنساب العرب" ص 428.والنُّجير؛ ذكر ياقوت في "معجمه": أنه حصن باليمن قرب حضرموت منيع، لجأ إليه أهل الردة مع الأشعث بن قيس في أيام أبي بكر رضي الله عنه، فحاصره زياد بن لبيد البياضي حتى افتتحه عنوة، وقتل من فيه، وأسر الأشعث بن قيس، وذلك في سنة (12) للهجرة. وفي تحديده خلاف، انظر "معجم ما استعجم" للبكري 4/ 1299.قوله: "على مناسج خيولهم" جمع مِنسج بكسر الميم، وهو للفرس بمنزلة الكاهل للإنسان.ولخم وجُذام: قبيلتان من اليمن. ومأكول حمير، أي: أمواتهم، فإنهم أكلتهم الأرض.خير من آكلها، أي: أحيائها.الحارثان: ظاهره أن المراد بهما حضرموت وبنو الحارث، فكأنه أطلق عليهما الحارثان تغلبيًا، ولعل المراد ملوك كندة وحضرموت والله تعالى أعلم.جَمْدًا: بفتح فسكون، أو بفتحتين، ففي "القاموس": جمد بن معدي كرب من ملوك كندة، أو هو بالتحريك.ومِخْوسًا: ضبط بكسر فسكون، ولم يذكر المصنف أخاهم الرابع، وهو مِشرَح، وضبطُه كمخوس أخيه.وأبضعة: بفتح فسكون، وأختهم العمرَّدة، بفتحات مع تشديد الراء.



[2] في (ز) و (ب): واختلافهم، وفي (م) و (ص): وأحلافهم، والمثبت من مصادر التخريج. (804) من طرق عن جبير بن نفير، عن عمرو بن عبسة. وجبير بن نفير كان يرسل، ولم يصرِّح بسماعه من عمرو بن عبسة، ولم نقف له على رواية ذكر فيها سماعًا منه، وذكر البخاري في ترجمته من "تاريخه الكبير" 2/ 223 من سمع منهم، فلم يذكر عمرَو بنَ عبسة، والله تعالى أعلم.وفي الباب عن معاذ بن جبل قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم في دارنا يعرض الخيل، قال: فدخل عليه عيينة بن حصين، فقال للنبي صلى الله عليه وسلم: أنت أبصرُ بالخيل مني، وأنا أبصرُ بالرجال منك، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "فأيُّ الرجال خير؟ " فقال: رجال يحملون سيوفَهم على عواتقهم، ويعرضون رماحهم على مناسج خيولهم، ويلبسون البرود من أهل نجد، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "كذبتَ، خيارُ الرجال رجال ذي يمن، الإيمانُ يمان، وأكثرُ قبيلة في الجنة مذحج، ومأكولُ حمير خيرٌ من آكلها، حضرموت خيرٌ من كِندة، فلعن الله الملوكَ الأربعة: جمدًا ومشرحًا ومخوسًا وأبضعًا، وأختَهم العمرَّدة". رواه الطبراني في "الكبير" 20/ (192) من طريق خالد بن معدان، عن معاذ، وخالد لم يسمع من معاذ، فهو منقطع.ويشهد لقوله: "الإيمان يمان" حديثُ أبي هريرة عند البخاري (3499)، ومسلم (52).ولقوله: "عصية عصت الله ورسوله" حديثًا أنسٍ وابنِ عمر عند البخاري (2814) و (3513)، ومسلم (677) (2518). وسيأتي من حديث سلمة بن الأكوع عند المصنف برقم (7158).ولقوله: "أسلم وغفار ومزينة وأخلاطهم من جهينة خير من بني أسد وتميم وغطفان وهوازن عند الله يوم القيامة" حديثُ أبي هريرة عند البخاري (3528)، ومسلم (2521). وانظر حديثي أبي أيوب وأبي هريرة التاليين عند المصنف.فائدة: الملوك الأربعة الذين لُعنوا في هذا الخبر؛ ذكر ابن سعد في "الطبقات" 7/ 13 أنهم كانوا وفدوا على النبي صلى الله عليه وسلم مع الأشعث بن قيس، فأسلموا ورجعوا إلى بلادهم، ثم ارتدوا، فقتلوا يوم النُّجير، وإنما سُموا ملوكًا لأنه كان لكل واحد منهم واد يملكه بما فيه. وقد ذكرهم ابن حزم في "جمهرة أنساب العرب" ص 428.والنُّجير؛ ذكر ياقوت في "معجمه": أنه حصن باليمن قرب حضرموت منيع، لجأ إليه أهل الردة مع الأشعث بن قيس في أيام أبي بكر رضي الله عنه، فحاصره زياد بن لبيد البياضي حتى افتتحه عنوة، وقتل من فيه، وأسر الأشعث بن قيس، وذلك في سنة (12) للهجرة. وفي تحديده خلاف، انظر "معجم ما استعجم" للبكري 4/ 1299.قوله: "على مناسج خيولهم" جمع مِنسج بكسر الميم، وهو للفرس بمنزلة الكاهل للإنسان.ولخم وجُذام: قبيلتان من اليمن. ومأكول حمير، أي: أمواتهم، فإنهم أكلتهم الأرض.خير من آكلها، أي: أحيائها.الحارثان: ظاهره أن المراد بهما حضرموت وبنو الحارث، فكأنه أطلق عليهما الحارثان تغلبيًا، ولعل المراد ملوك كندة وحضرموت والله تعالى أعلم.جَمْدًا: بفتح فسكون، أو بفتحتين، ففي "القاموس": جمد بن معدي كرب من ملوك كندة، أو هو بالتحريك.ومِخْوسًا: ضبط بكسر فسكون، ولم يذكر المصنف أخاهم الرابع، وهو مِشرَح، وضبطُه كمخوس أخيه.وأبضعة: بفتح فسكون، وأختهم العمرَّدة، بفتحات مع تشديد الراء.



7155 [3] - رجاله ثقات، وفي لعن قريش وتميم وبكر وغيرهم مِرارًا نكارةٌ، واستغرب متنَه الحاكم عقبَه، ووقع في رواية الحاكم معاوية بن صالح - وهو ابن حدير - عن عبد الرحمن بن عائذ، وخالفه عافيةُ بن أيوب المصري، فجعل بينهما شريحَ بن عبيد، كما سيأتي. وعبد الرحمن بن عائذ كان يُرسل، ولم يُصرّح بالسماع من عمرو بن عبسة، ونقل ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 34/ 454 عن أحمد بن محمد بن عيسى البغدادي صاحب "تاريخ الحمصيين" الصحابةَ الذين لقيهم ابن عائذ، فلم يذكر منهم عمرَو بنَ عبسة، والله أعلم.وأخرجه الطبراني في "مسند الشاميين" (2040) من طريق عافية بن أيوب المصري، عن معاوية بن صالح، عن شريح بن عبيد، عن عبد الرحمن بن عائذ، عن عمرو مرفوعًا: "أكثر القبائل في الجنة مذحج". فزاد فيه شريحَ بن عبيد، ولكن إسناده ضعيف.وأخرجه أحمد 32/ (19446)، والنسائي (8293) من طريق صفوان بن عمرو، حدثني شريح بن عبيد، عن عبد الرحمن بن عائذ الأزدي، به. ورواية النسائي مختصرة بذكر مذحج.وأخرجه أحمد (19442) من طريق عثمان بن عبيد أبي دوس اليحصبي، عن عبد الرحمن بن عائذ، به مختصرًا بلفظ: "شرُّ قبيلتين في العرب نجران وبنو تغلب".وأخرجه مختصرًا أحمد (19450) من طريق يزيد بن يزيد بن جابر، عن رجل، عن عمرو بن عبسة. وفيه رجل مبهم، هذا إن سلم من الانقطاع أيضًا.وأخرجه تامًّا ومقطعًا البخاريُّ في "التاريخ الكبير" 4/ 248 - 249، وابن شبة في "تاريخ المدينة" 12/ 548، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 1/ 327 - 329، وابي أبي خيثمة في السفر الثاني من "تاريخه" (130) و (3025) و (3162) و (3192) و (3270) و (3289)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2270) و (2283)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (804) من طرق عن جبير بن نفير، عن عمرو بن عبسة. وجبير بن نفير كان يرسل، ولم يصرِّح بسماعه من عمرو بن عبسة، ولم نقف له على رواية ذكر فيها سماعًا منه، وذكر البخاري في ترجمته من "تاريخه الكبير" 2/ 223 من سمع منهم، فلم يذكر عمرَو بنَ عبسة، والله تعالى أعلم.وفي الباب عن معاذ بن جبل قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم في دارنا يعرض الخيل، قال: فدخل عليه عيينة بن حصين، فقال للنبي صلى الله عليه وسلم: أنت أبصرُ بالخيل مني، وأنا أبصرُ بالرجال منك، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "فأيُّ الرجال خير؟ " فقال: رجال يحملون سيوفَهم على عواتقهم، ويعرضون رماحهم على مناسج خيولهم، ويلبسون البرود من أهل نجد، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "كذبتَ، خيارُ الرجال رجال ذي يمن، الإيمانُ يمان، وأكثرُ قبيلة في الجنة مذحج، ومأكولُ حمير خيرٌ من آكلها، حضرموت خيرٌ من كِندة، فلعن الله الملوكَ الأربعة: جمدًا ومشرحًا ومخوسًا وأبضعًا، وأختَهم العمرَّدة". رواه الطبراني في "الكبير" 20/ (192) من طريق خالد بن معدان، عن معاذ، وخالد لم يسمع من معاذ، فهو منقطع.ويشهد لقوله: "الإيمان يمان" حديثُ أبي هريرة عند البخاري (3499)، ومسلم (52).ولقوله: "عصية عصت الله ورسوله" حديثًا أنسٍ وابنِ عمر عند البخاري (2814) و (3513)، ومسلم (677) (2518). وسيأتي من حديث سلمة بن الأكوع عند المصنف برقم (7158).ولقوله: "أسلم وغفار ومزينة وأخلاطهم من جهينة خير من بني أسد وتميم وغطفان وهوازن عند الله يوم القيامة" حديثُ أبي هريرة عند البخاري (3528)، ومسلم (2521). وانظر حديثي أبي أيوب وأبي هريرة التاليين عند المصنف.فائدة: الملوك الأربعة الذين لُعنوا في هذا الخبر؛ ذكر ابن سعد في "الطبقات" 7/ 13 أنهم كانوا وفدوا على النبي صلى الله عليه وسلم مع الأشعث بن قيس، فأسلموا ورجعوا إلى بلادهم، ثم ارتدوا، فقتلوا يوم النُّجير، وإنما سُموا ملوكًا لأنه كان لكل واحد منهم واد يملكه بما فيه. وقد ذكرهم ابن حزم في "جمهرة أنساب العرب" ص 428.والنُّجير؛ ذكر ياقوت في "معجمه": أنه حصن باليمن قرب حضرموت منيع، لجأ إليه أهل الردة مع الأشعث بن قيس في أيام أبي بكر رضي الله عنه، فحاصره زياد بن لبيد البياضي حتى افتتحه عنوة، وقتل من فيه، وأسر الأشعث بن قيس، وذلك في سنة (12) للهجرة. وفي تحديده خلاف، انظر "معجم ما استعجم" للبكري 4/ 1299.قوله: "على مناسج خيولهم" جمع مِنسج بكسر الميم، وهو للفرس بمنزلة الكاهل للإنسان.ولخم وجُذام: قبيلتان من اليمن. ومأكول حمير، أي: أمواتهم، فإنهم أكلتهم الأرض.خير من آكلها، أي: أحيائها.الحارثان: ظاهره أن المراد بهما حضرموت وبنو الحارث، فكأنه أطلق عليهما الحارثان تغلبيًا، ولعل المراد ملوك كندة وحضرموت والله تعالى أعلم.جَمْدًا: بفتح فسكون، أو بفتحتين، ففي "القاموس": جمد بن معدي كرب من ملوك كندة، أو هو بالتحريك.ومِخْوسًا: ضبط بكسر فسكون، ولم يذكر المصنف أخاهم الرابع، وهو مِشرَح، وضبطُه كمخوس أخيه.وأبضعة: بفتح فسكون، وأختهم العمرَّدة، بفتحات مع تشديد الراء.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7156)


7156 - أخبرنا عبد الله بن إسحاق الخُراساني العَدْل ببغداد، حدثنا يحيى بن جعفر، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا أبو مالك الأشجعي، عن موسى بن طلحة، عن أبي أيوب الأنصاري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أسلمُ [1] وغِفارٌ وأشجعُ ومُزَينةُ وجُهَينةُ ومن كان من بني كَعْبٍ، مواليَّ دونَ الناس، واللهُ ورسولُه مولاهم" [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين.




আবূ আইয়্যুব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আসলাম, গিফার, আশজা, মুযাইনা, জুহাইনা এবং বনু কা'ব গোত্রের যারা আছে, তারা অন্যান্য সাধারণ মানুষ অপেক্ষা আমার বেশি আপন (বা বন্ধু)। আর আল্লাহ এবং তাঁর রাসূল তাদের অভিভাবক।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] قوله أسلم، سقط من نسخنا الخطية، وأثبتناه من "تلخيص الذهبي"، وهو رواية الأكثرين عن يزيد بن هارون.



[2] إسناده صحيح. أبو مالك الأشجعي: هو سعد بن طارق.وأخرجه أحمد (38/ (23543)، ومسلم (2519)، والترمذي (3940) من طرق عن يزيد بن هارون، بهذا الإسناد. وزاد مسلم والترمذي ذكر الأنصار بدل أسلم، وفي رواية مسلم: "ومن كان من بني عبد الله"، وفي رواية الترمذي: "ومن كان من بني عبد الدار"، وقال: حسن صحيح.واستدراك المصنف له على الصحيح ذهول.وانظر ما بعده.وفي الباب عن أبي هريرة عند البخاري (3504)، ومسلم (2520). وزادا فيه قريشًا والأنصار.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7157)


7157 - أخبرنا الحسن بن حَليم المَرْوزي، حدثنا أبو المُوجِّه، حدثنا محمد بن عبد العزيز بن [أبي] [1] رِزْمة، حدثنا الفضل بن موسى، عن خُثَيم بن عِراك، عن أبيه، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "غفارٌ غَفَرَ الله لها، وأسلمُ سالَمَها الله، أما إنِّي لم أقلْه ولكنَّ الله قالَه" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه بهذه الزيادة.وللزيادة شاهد آخرُ بإسنادٍ صحيح:




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "গিফার গোত্র, আল্লাহ তাদের ক্ষমা করুন; আর আসলাম গোত্র, আল্লাহ তাদের নিরাপত্তা দিন। জেনে রাখো, আমি নিজে এই কথা বলিনি, বরং আল্লাহই এই কথা বলেছেন।"




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] سقط من النسخ الخطية. وانظر ما قبله.ويشهد له حديث خُفاف بن إيماء السالف برقم (6656).



[2] إسناده صحيح. أبو الموجِّه: هو محمد بن عمرو الفزاري.وأخرجه مسلم (2516) (185) عن حسين بن حريث، عن الفضل بن موسى، بهذا الإسناد. وفيه الزيادةُ التي نفاها المصنف: "أما إني لم أقلها ولكن قالها الله". فاستدراكه له ذهولٌ منه.وأخرجه البخاري (3514)، ومسلم (2515) من طريق محمد بن سِيرِين، وأحمد 16/ (10064)، ومسلم (2515) من طريق محمد بن زياد، وأحمد 15/ (9414)، والبخاري بإثر الحديث (1006)، ومسلم (2515) من طريق الأعرج، ثلاثتهم عن أبي هريرة، به دون الزيادة.وانظر ما بعده. وانظر حديث أبي ذر السالف برقم (5547). وانظر ما قبله.ويشهد له حديث خُفاف بن إيماء السالف برقم (6656).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7158)


7158 - أخبرنا الحسين بن الحسن بن أيوب، حدثنا عبد الله بن أحمد بن أبي مَسَرَّة، حدثنا عبد الله بن الزُّبير الحُميدي، حدثنا علي بن يزيد بن أبي حَكيمةَ الأسلمي، حدثني إياس بن سَلَمة بن الأكوَع، عن أبيه: أن النبيَّ صلى الله عليه وسلم كان يقومُ في الصلاة فيدعو على قبائلَ من العرب، فيقول: "لعنَ الله رِعْلًا وذَكوان وعُصِيَّةَ التي عصتِ الله ورسولَه وبني لِحْيانَ"، ويقول: "غِفارٌ غفرَ اللهُ لها، وأسلمُ سالَمَها الله، لستُ أنا قلتُهنَّ ولكنَّ الله عز وجل قالها"، ثم يُكبِّر بعد أن يدعوَ على مَن دعا [1]. ‌‌ذكرُ فضيلةٍ أخرى للأوس والخزرج لم يُقدَّرْ ذكرها من فضائل الأنصار




সালামাহ ইবনুল আকওয়া’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাতে দাঁড়াতেন এবং আরবের কিছু গোত্রের বিরুদ্ধে বদ-দোয়া করতেন। তিনি বলতেন: "আল্লাহ রিল, যাকওয়ান, উসাইয়াহ—যারা আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের অবাধ্যতা করেছে—এবং বনী লিহ্ইয়ানকে অভিশাপ দিন।" তিনি আরো বলতেন: "গিফারকে আল্লাহ ক্ষমা করুন, আর আসলামকে আল্লাহ নিরাপত্তা দিন। আমি নিজ থেকে এগুলো বলিনি, বরং আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল এগুলো বলেছেন।" অতঃপর তিনি যাদের বিরুদ্ধে বদ-দোয়া করতেন, তাদের বিরুদ্ধে বদ-দোয়া করার পর তাকবীর বলতেন।




تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات غير علي بن يزيد بن أبي حكيمة، فقد روى عنه اثنان، وذكره ابن حبان في "الثقات"، فهو مستور.وأخرجه أحمد 27 / (16517) من طريق عمر بن راشد اليمامي، عن إياس بن سلمة، به مختصرًا بلفظ: "أسلم سالمها الله، وغفار غفر الله لها، أما والله ما أنا قلته ولكن الله قاله". وعمر بن راشد ضعيف أيضًا. وانظر ما قبله.ويشهد له حديث خُفاف بن إيماء السالف برقم (6656).