আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
7159 - أخبرنا الحسين بن الحسن، حدثنا عبد الله بن أحمد بن أبي مَسَرَّة، حدثنا عبد الله بن الزُّبير الحُميدي، حدثنا علي بن يزيد بن أبي حَكيمة [1]، عن أبيه وغيرِه، عن سلمة بن الأكوع: أنَّ عامر بن الطُّفيل لم يدخلِ المدينةَ إلَّا بأمانٍ من رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلما جاء النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال له النبيُّ: "يا عامرُ، مَن أَسلَمَ يَسلَمُ"، قال: نعم، على أنَّ ليَ الوَبَرَ ولك المَدَرَ، قال: "هذا لا يكونُ، أَسلِمْ تَسلَمْ يا عامرُ"، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "اذهَبْ حتى ننظُرَ في أمرِك إلى غدٍ"، فأرسلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إلى الأنصار، فقال: "ماذا تَرَون؟ إني قد دعوتُ هذا الرجلَ، فأبَى أن يُسلِمَ إلَّا أن يكون له الوَبَرُ وليَ المَدَرُ"، فقالوا: ما شاء الله، ثم شئتَ يا رسولَ الله، ما أخذُوا مِنَّا عِقالًا إلَّا أخذنا منهم عِقالَين، فالله ورسولُه أعلم، فرجع عامرٌ إلى النبيِّ صلى الله عليه وسلم الغدَ، فقال له النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "تُسلِمُ يا عامرُ"، قال: لا، إلّا أن يكونَ لي الوَبَرُ ولك المَدَرُ، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "ليسَ إلَّا ذلك؟ "، فأبَى إلَّا أن يكونَ له الوَبرُ وللنبيِّ صلى الله عليه وسلم المَدَرُ، فأبَى النبيُّ صلى الله عليه وسلم، فقال عامرٌ: أما [2] والله لأملأنَّها عليك خَيْلًا ورِجالًا، فقال له النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "يأبَى الله ذلكَ عليكَ وابنا قَيْلَة الأوسُ والخزرجُ"، ثم ولَّى عامرٌ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "اللهمَّ اكفِنيهِ"، فرماه الله بالذُّبَحَة قبل أن يأتيَ أهلَه، فقال عامرٌ حينَ أخذته الذُّبَحة: يا آل عامرٍ، هذه [3] غُدَّةٌ كغُدَّة البَكْر، فهلكَ ساعةَ أخذته دونَ أهلِه [4].
সালামা ইবনুল আকওয়া’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমের ইবনু তুফাইল রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছ থেকে নিরাপত্তা নিয়েই কেবল মদিনায় প্রবেশ করেছিল। অতঃপর যখন সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলো, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "হে আমের, যে ইসলাম গ্রহণ করে, সে নিরাপত্তা লাভ করে।"
সে বলল: হ্যাঁ, তবে এই শর্তে যে, পশমযুক্ত অঞ্চল (মরুভূমি/যাযাবর এলাকা) আমার হবে এবং ইট-মাটির অঞ্চল (আবাদি ভূমি/শহর) আপনার হবে। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটা হতে পারে না। ইসলাম গ্রহণ করো, হে আমের, তুমি নিরাপত্তা লাভ করবে।"
অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যাও, কাল পর্যন্ত আমরা তোমার বিষয়টি দেখব।"
অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনসারদের কাছে লোক পাঠালেন এবং বললেন: "তোমরা কী মনে করো? আমি এই লোকটিকে (ইসলামের) দাওয়াত দিয়েছি, কিন্তু সে ইসলাম গ্রহণ করতে অস্বীকার করেছে, যদি না পশমযুক্ত অঞ্চল তার হয় এবং ইট-মাটির অঞ্চল আমার হয়।"
তারা বলল: আল্লাহ যা চেয়েছেন এবং অতঃপর আপনি যা চেয়েছেন, হে আল্লাহর রাসূল। তারা আমাদের কাছ থেকে যদি একটি রশিও নেয়, আমরা তাদের কাছ থেকে দুটি রশি নেব। আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই সর্বাধিক জ্ঞাত।
পরের দিন আমের নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছে ফিরে এলো। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তুমি কি ইসলাম গ্রহণ করবে, হে আমের?"
সে বলল: না, তবে এই শর্তে যে, পশমযুক্ত অঞ্চল আমার হবে এবং ইট-মাটির অঞ্চল আপনার হবে। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এ ছাড়া আর কিছুই নয়?" কিন্তু সে এই শর্ত ছাড়া অন্য কিছু মানতে অস্বীকার করল যে, পশমযুক্ত অঞ্চল তার হবে এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য হবে ইট-মাটির অঞ্চল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা প্রত্যাখ্যান করলেন।
তখন আমের বলল: আল্লাহর কসম, আমি অবশ্যই ঘোড়সওয়ার ও পদাতিক বাহিনী দিয়ে এটিকে আপনার উপর ভরে তুলব (আক্রমণ করব)।
তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "আল্লাহ এবং কায়লার দুই পুত্র—আউস ও খাজরাজ—তোমার জন্য তা অস্বীকার করবে (তোমাকে বাধা দেবে)।"
এরপর আমের চলে গেল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আল্লাহ! আমার পক্ষ থেকে তাকে যথেষ্ট হয়ে যান (তার অনিষ্ট থেকে আমাকে রক্ষা করুন)।"
অতঃপর আল্লাহ তাআলা তার পরিবারের কাছে পৌঁছানোর আগেই তাকে 'জুবাহাহ' (এক প্রকার মরণব্যাধি/গলায় ফোঁড়া) দ্বারা আঘাত করলেন। যখন জুবাহাহ তাকে আক্রমণ করল, তখন আমের বলল: হে আমেরের গোত্রের লোকেরা! এটা উট শাবকের ফোঁড়ার মতো একটি ফোঁড়া। আর আক্রমণ করার পরপরই সে তার পরিবারের কাছে পৌঁছানোর আগেই মারা গেল।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في (ز) و (ب) إلى: حليمة، وضبب عليها في الأولى، وفي (م) و (ص) مكانها بياض. وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 8/ 326 - 327 عن الحميدي، بهذا الإسناد.وأخرج البخاري في "صحيحه" (4091) من حديث أنس: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم بعث خالَه - أخ لأم سُليم - في سبعين راكبًا، وكان رئيس المشركين عامر بن الطفيل خيَّر بين ثلاث خصال، فقال: يكون لك أهلُ السهل، ولي أهل المَدَر، أو أكون خليفتك، أو أغزوك بأهل غطفان بألف وألف، فطُعن عامر في بيت أم فلان فقال: غُدّة كغدّة البكر في بيت امرأة من آل فلان! ائتوني بفرسي، فمات على ظهر فرسه.فانطلق حرامٌ أخو أم سليم - وهو رجل أعرج - ورجل من بني فلان، قال: كونا قريبًا حتى آتيَهم، فإن آمنوني كنتم، وإن قتلوني أتيتم أصحابكم، فقال: أتؤمِّنوني أبلِّغ رسالة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فجعل يحدّثهم، وأَومؤوا إلى رجل، فأتاه من خلفه فطعنه حتى أنفذه بالرمح، قال: الله أكبر، فزتُ وربِّ الكعبة، فلُحِق الرجل، فقُتلوا كلهم غيرَ الأعرج كان في رأس جبل، فأنزل الله علينا، ثم كان من المنسوخ: (إنا قد لَقِينا ربنا فرضيَ عنا وأرضانا). فدعا النبي صلى الله عليه وسلم عليهم ثلاثين صباحًا، على رِغْلٍ وذكوانَ وبني لِحيان وعُصيةَ الذين عَصَوا الله ورسوله، صلى الله عليه وسلم.
[2] ليست في (م) و (ص)، وضبب عليها في (ز). وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 8/ 326 - 327 عن الحميدي، بهذا الإسناد.وأخرج البخاري في "صحيحه" (4091) من حديث أنس: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم بعث خالَه - أخ لأم سُليم - في سبعين راكبًا، وكان رئيس المشركين عامر بن الطفيل خيَّر بين ثلاث خصال، فقال: يكون لك أهلُ السهل، ولي أهل المَدَر، أو أكون خليفتك، أو أغزوك بأهل غطفان بألف وألف، فطُعن عامر في بيت أم فلان فقال: غُدّة كغدّة البكر في بيت امرأة من آل فلان! ائتوني بفرسي، فمات على ظهر فرسه.فانطلق حرامٌ أخو أم سليم - وهو رجل أعرج - ورجل من بني فلان، قال: كونا قريبًا حتى آتيَهم، فإن آمنوني كنتم، وإن قتلوني أتيتم أصحابكم، فقال: أتؤمِّنوني أبلِّغ رسالة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فجعل يحدّثهم، وأَومؤوا إلى رجل، فأتاه من خلفه فطعنه حتى أنفذه بالرمح، قال: الله أكبر، فزتُ وربِّ الكعبة، فلُحِق الرجل، فقُتلوا كلهم غيرَ الأعرج كان في رأس جبل، فأنزل الله علينا، ثم كان من المنسوخ: (إنا قد لَقِينا ربنا فرضيَ عنا وأرضانا). فدعا النبي صلى الله عليه وسلم عليهم ثلاثين صباحًا، على رِغْلٍ وذكوانَ وبني لِحيان وعُصيةَ الذين عَصَوا الله ورسوله، صلى الله عليه وسلم.
7159 [3] - ليست في (م) و (ص). وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 8/ 326 - 327 عن الحميدي، بهذا الإسناد.وأخرج البخاري في "صحيحه" (4091) من حديث أنس: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم بعث خالَه - أخ لأم سُليم - في سبعين راكبًا، وكان رئيس المشركين عامر بن الطفيل خيَّر بين ثلاث خصال، فقال: يكون لك أهلُ السهل، ولي أهل المَدَر، أو أكون خليفتك، أو أغزوك بأهل غطفان بألف وألف، فطُعن عامر في بيت أم فلان فقال: غُدّة كغدّة البكر في بيت امرأة من آل فلان! ائتوني بفرسي، فمات على ظهر فرسه.فانطلق حرامٌ أخو أم سليم - وهو رجل أعرج - ورجل من بني فلان، قال: كونا قريبًا حتى آتيَهم، فإن آمنوني كنتم، وإن قتلوني أتيتم أصحابكم، فقال: أتؤمِّنوني أبلِّغ رسالة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فجعل يحدّثهم، وأَومؤوا إلى رجل، فأتاه من خلفه فطعنه حتى أنفذه بالرمح، قال: الله أكبر، فزتُ وربِّ الكعبة، فلُحِق الرجل، فقُتلوا كلهم غيرَ الأعرج كان في رأس جبل، فأنزل الله علينا، ثم كان من المنسوخ: (إنا قد لَقِينا ربنا فرضيَ عنا وأرضانا). فدعا النبي صلى الله عليه وسلم عليهم ثلاثين صباحًا، على رِغْلٍ وذكوانَ وبني لِحيان وعُصيةَ الذين عَصَوا الله ورسوله، صلى الله عليه وسلم.
7159 [4] - إسناده ضعيف لجهالة علي بن يزيد وأبيه. وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 8/ 326 - 327 عن الحميدي، بهذا الإسناد.وأخرج البخاري في "صحيحه" (4091) من حديث أنس: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم بعث خالَه - أخ لأم سُليم - في سبعين راكبًا، وكان رئيس المشركين عامر بن الطفيل خيَّر بين ثلاث خصال، فقال: يكون لك أهلُ السهل، ولي أهل المَدَر، أو أكون خليفتك، أو أغزوك بأهل غطفان بألف وألف، فطُعن عامر في بيت أم فلان فقال: غُدّة كغدّة البكر في بيت امرأة من آل فلان! ائتوني بفرسي، فمات على ظهر فرسه.فانطلق حرامٌ أخو أم سليم - وهو رجل أعرج - ورجل من بني فلان، قال: كونا قريبًا حتى آتيَهم، فإن آمنوني كنتم، وإن قتلوني أتيتم أصحابكم، فقال: أتؤمِّنوني أبلِّغ رسالة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فجعل يحدّثهم، وأَومؤوا إلى رجل، فأتاه من خلفه فطعنه حتى أنفذه بالرمح، قال: الله أكبر، فزتُ وربِّ الكعبة، فلُحِق الرجل، فقُتلوا كلهم غيرَ الأعرج كان في رأس جبل، فأنزل الله علينا، ثم كان من المنسوخ: (إنا قد لَقِينا ربنا فرضيَ عنا وأرضانا). فدعا النبي صلى الله عليه وسلم عليهم ثلاثين صباحًا، على رِغْلٍ وذكوانَ وبني لِحيان وعُصيةَ الذين عَصَوا الله ورسوله، صلى الله عليه وسلم.
7160 - حدثنا أبو عمرو عثمان بن أحمد بن السمَّاك، حدثنا عبد الملك بن محمد، حدثنا أبو عامر العَقَدي، حدثنا قُرَّة بن خالد، حدثنا أبو الزُّبير، عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن يَصعَدُ ثَنيَّةَ المُرَار - أو المَرَار - فإنَّه يُحَطُّ عنه ما حُطَّ عن بني إسرائيلَ"، فكان أولَ من صَعِدَها خَيْلُنا خَيْلُ بني الخَزرَج، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "كلُّكم مغفورٌ لهم إلَّا صاحبَ الجَمَل الأحمر"، قال: وإذا هو أعرابيٌّ يَنشُدُ ضالَّةً له، قلنا: تعالَ يستغفِرْ لك رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فقال: لأن أجِدَ ضالَّتي أحبُّ إليَّ من أن يَستغفِرَ لي صاحبُكم [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি মুরার (বা মারার) গিরিপথে আরোহণ করবে, তার থেকে সেই (গুনাহ) ক্ষমা করে দেওয়া হবে, যা বনী ইসরাঈলের থেকে ক্ষমা করা হয়েছিল।" তিনি (জাবির) বলেন, আমাদের খাযরাজ গোত্রের ঘোড়সওয়াররাই সর্বপ্রথম তাতে আরোহণ করে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমাদের সকলের গুনাহ মাফ করে দেওয়া হলো, তবে লাল উটের মালিক ছাড়া।" তিনি (জাবির) বলেন, দেখা গেল লোকটি একজন বেদুঈন, যে তার হারিয়ে যাওয়া জিনিস খুঁজছিল। আমরা তাকে বললাম: আসুন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করবেন। কিন্তু সে বলল: আমার হারিয়ে যাওয়া জিনিসটি খুঁজে পাওয়া আমার কাছে আপনার এই সঙ্গী (নবী)-এর আমার জন্য ক্ষমা চাওয়ার চেয়েও বেশি প্রিয়।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده قوي. عبد الملك بن محمد: هو أبو قلابة الرقاشي، وأبو عامر العقدي: هو عبد الملك بن عمرو القيسي.وأخرجه مسلم (2780) عن عبيد الله بن معاذ العنبري، عن أبيه، عن قرة بن خالد بهذا الإسناد.فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.ورواه خداش بن عياش عند الترمذي (3863) عن أبي الزبير، عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "ليدخلن الجنة من بايع تحت الشجرة إلَّا صاحبَ الجمل الأحمر"، وقال: غريب. فجعل قصة الجمل الأحمر في بيعة الرضوان بالحديبية، وخداش روى عنه ثلاثة، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقال الترمذي: لا نعرفه.ورواه الليث بن سعد عند أحمد 23 / (14778)، وأبي داود (4653)، والترمذي (3860)، والنسائي (11444)، وابن حبان (4802)، عن أبي الزبير، عن جابر بلفظ: "لا يدخل النارَ أحدٌ ممن بايع تحت الشجرة"، ليس فيه ذكر صاحب الجمل.وروى أبو سفيان طلحةُ بن نافع عن جابر مرفوعًا بلفظ: لن يدخل النارَ رجل شهد بدرًا والحديبيةَ"، أخرجه أحمد 23/ (15262).قوله: "المرار" قال النووي في "شرح مسلم" 17/ 126: هكذا هو في الرواية الأولى: المُرَار بضم الميم وتخفيف الراء، وفي الثانية: المُرار أو المَرار بضم الميم أو فتحها على الشك، وفي بعض النسخ بضمها أو كسرها، والله أعلم. والمرار شجر مُرٌّ، وأصل الثنيَّة: الطريقُ بين جَبَلينِ، وهذه الثنية عند الحديبية.
7161 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدثنا أحمد بن مِهْران، حدثنا رَوْح بن عُبادة، عن هشام بن حسَّان، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما ضَرَّ امرأةً نزلت بينَ جاريتَينِ من الأنصار، أو أُنزلت بين أبوَيْها" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه. ذكرُ فضيلةِ بني تَميمٍ
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে নারী আনসারদের দুইজন প্রতিবেশীর (বা সেবিকার) মধ্যে অবস্থান করে, অথবা তার পিতা-মাতার মধ্যে অবস্থান করে, তার কোনো ক্ষতি হবে না।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] رجاله ثقات، وأعله أبو حاتم الرازي في "العلل" بالوقف.وأخرجه أحمد 43 / (26207)، وكذا البزار في "مسنده" (52)، وابن حبان (7267) من طريق يحيى بن حبيب بن عربي، كلاهما (أحمد ويحيى) عن روح بن عبادة، بهذا الإسناد.ورواه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1817) عن يحيى بن حبيب بن عربي، عن روح بن عبادة، به موقوفًا من كلام عائشة، وبوّب عليه: قول عائشة رضي الله عنها: ما ضرَّ امرأة .. إلخ. فخالف روايتي البزار وابن حبان.ورواه يحيى بن معين - كما في "علل الرازي" (2580) - عن السكن بن إسماعيل الأصم، عن هشام بن حسان، عن هشام بن عروة، عن يحيى بن سعيد الأنصاري، عن عائشة قولها. قال أبو حاتم: هذا الحديثُ أفسدَ حديثَ روح بن عبادة، وبيَّن، علتَه، وهذا الصحيح، ولا يحتمل أن يكون: عن أبيه عن عائشة عن النبي صلى الله عليه وسلم، فيُروى عن يحيى بن سعيد عن عائشة أشبهُ، ولو كان عن أبيه، كان أسهل عليه حفظًا. وقال الدارقطني في "العلل" (3830): يرويه هشام بن عروة، واختلف عنه، فرواه هشام بن حسان، عن هشام، عن أبيه، عن عائشة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قاله روح بن عبادة عنه.ورواه الخليل بن مرة وسلمة بن سعيد، عن هشام، عن أبيه، عن عائشة موقوفًا وكلاهما غير محفوظ عن هشام.ثم أخرجه عن محمد بن هارون أبي حامد الحضرمي، عن سليمان بن عمر الرقي، عن أبيه، عن الخليل بن مرة، عن هشام، عن أبيه، عن عائشة قولها. ثم قال: وحدثنا الحضرمي في مواضع أُخر عن النبي صلى الله عليه وسلم.
7162 - أخبرني علي بن عيسى الحِيرِي، حدثنا أحمد بن نَجْدة القرشي، حدثنا [سعيد بن] [1] منصور، حدثنا مَسلَمة بن عَلْقمة المازني، عن داود بن أبي هند، عن عامر، عن أبي هريرة قال: ثلاثٌ سمعتُهنَّ لبني تميم من رسول الله صلى الله عليه وسلم لا أُبغِضُ تميمًا بعدَهنَّ أبدًا: كان على عائشةَ نذرُ محرَّرٍ من ولد إسماعيل، فسُبِيَ سَبْيٌ من بني العَنْبَر، فقال لعائشة: "إِنْ سَرَّكِ أن تَفِي بنَدْرِك، فأعتِقي محرَّرًا من هؤلاء"، فجعلَهم من ولد إسماعيلَ، وِجيءَ بنَعَمٍ من نَعَمِ صَدقةِ بني سعدٍ، فلمَّا رآها راعَهُ، فقال: "هذا نَعَمُ قومي"، فجعلَهم قومَه [2]، وقال: "هم أشدُّ الناسِ قتالًا في المَلاحِم" [3]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه! في ذكر فضل [4] هذه الأُمةِ على سائر الأُمَم
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট থেকে বনু তামিম গোত্রের জন্য তিনটি বিষয় শুনেছি, যার পর আমি আর কখনোই তামিমকে ঘৃণা করব না:
(১) আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপর ইসমাঈল (আঃ)-এর বংশধরদের মধ্য থেকে একজন দাসকে মুক্ত করার মানত ছিল। অতঃপর বনু আনবার গোত্রের কিছু যুদ্ধবন্দীকে আনা হলো। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন, "যদি তুমি তোমার মানত পূর্ণ করতে চাও, তবে এদের মধ্য থেকে একজনকে মুক্ত করো।" এভাবে তিনি তাদেরকে ইসমাঈল (আঃ)-এর বংশধর বলে গণ্য করলেন।
(২) আর বনু সা'দ গোত্রের সাদাকার উট/পশু আনা হলো। যখন তিনি এগুলো দেখলেন, তখন তিনি বিস্মিত হলেন (বা খুব পছন্দ করলেন), অতঃপর বললেন, "এগুলো আমার গোত্রের পশু।" এভাবে তিনি তাদের (বনু সা'দ) তাঁর গোত্রের অন্তর্ভুক্ত করলেন।
(৩) এবং তিনি (আরো) বললেন, "তারা (বনু তামিম) হচ্ছে মহাযুদ্ধের (মালাহিম) সময় সবচেয়ে কঠিনভাবে যুদ্ধকারী মানুষ।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] ما بين المعقوفين سقط من النسخ، وهذه السلسلة معروفة، تكرَّرت كثيرًا عند المصنف. سمعتُ من رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول فيهم، سمعتُه يقول: "هم أشدُّ أمتي على الدجال"، قال: وجاءت صدقاتهم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "هذه صدقات قومنا"، وكانت سبيّة منهم عند عائشة، فقال: "أعتقيها فإنها من ولد إسماعيل".
[2] في نسخنا الخطية: قومي، والمثبت من النسخة المحمودية كما في طبعة الميمان، وهو الموافق لما في المصادر. سمعتُ من رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول فيهم، سمعتُه يقول: "هم أشدُّ أمتي على الدجال"، قال: وجاءت صدقاتهم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "هذه صدقات قومنا"، وكانت سبيّة منهم عند عائشة، فقال: "أعتقيها فإنها من ولد إسماعيل".
7162 [3] - حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل مسلمة بن علقمة المازني.وأخرجه مختصرًا مسلم (2525) عن حامد بن عمر البكراوي، عن مسلمة بن علقمة المازني، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه أحمد 15 / (9068)، والبخاري (2543) و (4366)، ومسلم (2525)، وابن حبان (6808) من طريق أبي زرعة، عن أبي هريرة، قال: ما زلت أحبُّ بني تميم منذ ثلاثٍ سمعتُ من رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول فيهم، سمعتُه يقول: "هم أشدُّ أمتي على الدجال"، قال: وجاءت صدقاتهم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "هذه صدقات قومنا"، وكانت سبيّة منهم عند عائشة، فقال: "أعتقيها فإنها من ولد إسماعيل".
7162 [4] - في (ز) و (ب): فضائل.
7163 - أخبرني أبو عبد الله محمد بن علي الصنعاني، بمكة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم بن عبَّاد، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن بَهْز بن حَكيم بن معاوية، عن أبيه، عن جدِّه: أنه سمع النبيِّ صلى الله عليه وسلم في قول الله عز وجل: {كُنتُمْ خَيْرَ أُمَّةٍ أُخْرِجَتْ لِلنَّاسِ} [آل عمران:110] قال: "أنتم تُتِمُّون سبعينَ أمةً، أنتم خيرُها وأكرمُها على الله عز وجل" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وقد تابع سعيدُ بن إياس الجُرَيري بهذا في روايته عن أبيه، وأتى بزيادة في المتن:
মু'আবিয়াহ ইবন হাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আল্লাহ তা'আলার এই বাণী সম্পর্কে বলতে শুনেছেন: “তোমরাই শ্রেষ্ঠ জাতি, মানবজাতির জন্য তোমাদের আবির্ভাব হয়েছে।” [সূরা আলে ইমরান: ১১০] তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা সত্তরটি উম্মতকে পূর্ণ করবে। তোমরা হলে সেই উম্মতগুলোর মধ্যে শ্রেষ্ঠ এবং আল্লাহর নিকট সর্বাধিক সম্মানিত।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده حسن.وأخرجه الترمذي (3001) عن عبد بن حميد، عن عبد الرزاق، بهذا الإسناد. وقال: حديث حسن، وقد روى غير واحد هذا الحديث عن بهز بن حكيم نحو هذا، ولم يذكروا فيه: {كُنتُمْ خَيْرَ أُمَّةٍ أُخْرِجَتْ لِلنَّاسِ}.وأخرجه أحمد 33 / (20029) و (20049)، وابن ماجه (4287) و (4288) من طرق عن بهز بن حكيم به. لم يذكر أحد منهم الآية.وأخرجه ضمن حديث مطول أحمد (20011)، والنسائي (11367) من طريق عمرو بن دينار، عن حكيم بن معاوية، به.وانظر ما بعده.
7164 - أخبرَناه أبو العبّاس محمد بن أحمد المحبوبي، حدثنا سعيد بن مسعود (ح)وأخبرنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا محمد بن مَسْلَمة؛ قالا: حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا الجُرَيري، عن حَكيم بن معاوية، عن أبيه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أنتم تُوفُونَ سبعينَ أمَّةً، أنتم أكرمُهم على الله عز وجل وأفضلهم" [1].
মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সত্তর উম্মত পূর্ণ করবে (বা, সত্তর উম্মতের সংখ্যা পূর্ণকারী), আর তোমরা আল্লাহ তাআলার নিকট তাদের মধ্যে সবচেয়ে সম্মানিত ও শ্রেষ্ঠ।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حديث حسن، والإسنادان رجالهما لا بأس بهم غير محمد بن مسلمة - وهو ابن الوليد الواسطي - فضعيف، لكنه متابع، ويزيد بن هارون وإن كانت روايته عن سعيد بن إياس الجريري بعد اختلاطه، تابعه حماد بن سلمة، وهو ممن روى عن الجريري قبل اختلاطه.وأخرجه أحمد 33 / (20015) و (20025) من طريق حماد بن سلمة، عن سعيد الجريري، بهذا الإسناد. وزاد في الرواية الثانية: "وما بين مصراعينِ من مصاريع الجنَّة مسيرةُ أربعين عامًا، وليأتينَّ عليه يومٌ وإنه لَكَظِيظ".
7165 - أخبرنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا أبو المثنّى ومحمد بن أيوب قالا: حدثنا محمد بن كثير، حدثنا سفيان، عن مَيسَرة الأشجعي، عن أبي حازم، عن أبي هريرة في قوله عز وجل: {كُنتُمْ خَيْرَ أُمَّةٍ أُخْرِجَتْ لِلنَّاسِ}: تجرُّونَهم بالسلاسِل فتُدخِلونَهم الإسلامَ [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه! باب في ذِكرِ فضائل [2] التابعين
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার এই বাণী সম্পর্কে {তোমরাই শ্রেষ্ঠ উম্মত, মানবজাতির (কল্যাণের) জন্য তোমাদের আবির্ভাব হয়েছে}: তোমরা তাদেরকে শিকল দ্বারা টেনে এনে ইসলামের মধ্যে প্রবেশ করাও।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده صحيح.وأخرجه البخاري (4557) عن محمد بن يوسف، والنسائي (11005) من طريق أبي داود الحفري، كلاهما عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه أحمد 13 / (8013)، والبخاري (3010)، وأبو داود (2677)، وابن حبان (134) من طريق محمد بن زياد، عن أبي هريرة مرفوعًا: "عَجِبَ اللهُ من قوم يَدخُلونَ الجنَّةَ في السَّلاسل".قال ابن حبان شارحًا: والقصدُ في هذا الخبر السَّبيُ الذين يسبيهم المسلمون من دار الشرك مُكتَّفين في السلاسل يُقادون بها إلى دُور الإسلام حتى يُسلموا فيدخلوا الجنة.
[2] في (م) و (ص): فضل.
7166 - أخبرني عبد الرحمن بن الحسن القاضي بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا شُعبة، عن عمرو بن مُرَّة قال: سمعتُ أبا حمزة يُحدِّث عن زيد بن أرقَم قال: قالتِ الأنصارُ: يا رسولَ الله، إنَّ لكل نبيٍّ أتباعًا، وإنَّا قد اتَّبعناك، فادعُ الله أن يجعلَ أتباعَنا منا، فدعا لهم أن يجعلَ أتباعَهم منهم، قال: فنَمَيتُ ذلك إلى عبد الرحمن بن أبي ليلى، فقال: قد زعمَ ذلك زيدُ بن أرقم [1].صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه!
যায়েদ ইবনে আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আনসারগণ বললেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), প্রত্যেক নবীরই অনুসারী থাকে, আর আমরা আপনার অনুসরণ করেছি, সুতরাং আপনি আল্লাহর কাছে দু’আ করুন যেন তিনি আমাদের অনুসারীদেরকে আমাদের মধ্য থেকেই করেন। অতঃপর তিনি তাদের জন্য দু’আ করলেন যেন আল্লাহ তাদের অনুসারীদেরকে তাদের মধ্য থেকেই করেন। (রাবী আমর ইবনু মুররাহ বলেন:) আমি এই কথাটি (বর্ণনাটি) আবদুর রহমান ইবনু আবী লায়লার কাছে জানালাম, তখন তিনি বললেন: যায়েদ ইবনু আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই দাবিই করেছেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] حديث صحيح،، وهذا إسناد ضعيف من أجل عبد الرحمن بن الحسن شيخ المصنف، وقد وصله عن آدم بذكر زيد بن أرقم، وخالف البخاريُّ (3788)، فرواه عن آدم بن أبي إياس عن شعبة ليس فيه زيد بن أرقم من جهة أبي حمزة: واسمه طلحة بن يزيد الأنصاري، لكنه موصول من جهة عمرو بن مرة عن عبد الرحمن بن أبي ليلى عن زيد بن أرقم، فعمرٌو هو القائل: نَميتُ ذلك … إلخ.وأخرجه ابن أبي شيبة 12/ 161، وأحمد 32 / (19336)، كلاهما عن محمد بن جعفر المعروف بغندر، عن شعبة، عن عمرو بن مرة، عن أبي حمزة مرسلًا، ليس فيه ذكر زيد بن أرقم.وخالفهما محمدُ بن بشار عند البخاري (3787)، فرواه عن غندر عن شعبة، فوصله بذكر زيد بن أرقم، فروايته عن غندر شاذّة.ورواه مرسلًا أيضًا أبو داود الطيالسي في مسنده (710)، وعلي بن الجعد كما في "الجعديات" لأبي القاسم البغوي (86)، كلاهما عن شعبة، عن عمرو بن مرة، عن أبي حمزة مرسلًا.وخالف أصحابَ شعبة عمرُو بنُ مرزوق عند الطبراني في "الكبير" (4977)، فرواه عن شعبة، عن عمرو بن مرة، عن أبي حمزة، عن زيد بن أرقم. فوصله، وعمرو له بعضُ أوهام، والله أعلم.واستدراك المصنف له على الصحيح ذهول. وأخرجه أحمد 15 / (9399)، ومسلم (2832)، وابن حبان (7231) من طريق يعقوب بن عبد الرحمن الزهري، عن سهيل بن أبي صالح، به. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.ورواه يحيى بنُ سعيد الأنصاري عند أحمد 35 / (21385) و (21494)، والمحاملي في "الأمالي" (214 - رواية الفارسي) عن أبي صالح، عن رجل من بني أسد، أنَّ أبا ذر أخبره قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أشد أمتي لي حبًا قوم يكونون - أو يخرجون - بعدي، يود أحدُهم أنه أعطى أهله وماله وإنه رآني". وإسناده ضعيف لأجل الرجل المبهم.وأما حديث أبي هريرة، فرواه عنه الأعرجُ أيضًا عند أحمد 15/ (9794)، والبخاري (3589)، وهمامُ بن منبّه عند أحمد 13/ (8141)، ومسلم (2364)، وابن حبان (6765)، بلفظ: "ليأتيَنّ على أحدكم زمان، لأن يراني أحبُّ إليه من أن يكون له مثلُ أهله وماله". وهذا اللفظ أصحُّ.وفي الباب عن سمرة بن جندب عند البزار (4629)، والطبراني في "الكبير" (7097)، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول لنا: "إن أحدكم سيوشك أن يحب أن ينظر إليّ نظرة بما له من أهل ومال".وسنده ضعيف.
7167 - أخبرنا أبو نصر أحمد بن سهل الفقيه ببُخارى، حدثنا أبو عِصمةَ سهل بن المتوكِّل، حدثنا عبد الله بن مَسْلَمة، حدثنا عبد الرحمن بن أبي الزِّناد، حدثنا عمرو بن أبي عمرو، حدثنا سُهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنَّ أُناسًا من أُمَّتي يأتونَ بعدي، يَوَدُّ أحدُهم لو اشترى رُؤيتي بأهلِه ومالِه" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه!والحديثُ المُفسَّر الصحيح في هذا الباب قولُه صلى الله عليه وسلم: "خيرُ الناس قَرْني، ثم الذين يَلُونَهم"، قد اتفقا على إخراجه [2]. ذكرُ فضائلِ الأُمَّة بعدَ الصحابةِ والتابعين
আবু নসর আহমদ ইবনু সাহল আল-ফাকীহ বুখারায় আমাদের অবহিত করেছেন, তিনি বলেন, আবু ইসমা সাহল ইবনুল মুতাওয়াক্কিল আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, আব্দুল্লাহ ইবনু মাসলামা আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, আব্দুর রহমান ইবনু আবিয যিনাদ আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, আমর ইবনু আবি আমর আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, সুহায়ল ইবনু আবি সালিহ আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি তার পিতা থেকে, তিনি আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন যে, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আমার উম্মতের কিছু লোক আমার পরে আসবে। তাদের মধ্যে কেউ কেউ তার পরিবার-পরিজন ও ধন-সম্পদের বিনিময়েও আমার দর্শন ক্রয় করতে চাইবে।" [১]
এটা সহীহ ইসনাদযুক্ত হাদীস, কিন্তু শায়খাইন (বুখারী ও মুসলিম) এটা সংকলন করেননি। এই অধ্যায়ের ব্যাখ্যামূলক সহীহ হাদীসটি হলো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই বাণী: "উত্তম মানুষ আমার যুগ, অতঃপর যারা তাদের নিকটবর্তী," এটি সংকলনে তাঁরা (শায়খাইন) ঐক্যমত পোষণ করেছেন। [২]
সাহাবা ও তাবেঈদের পরে উম্মতের মর্যাদার আলোচনা।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناد حسن من أجل عبد الرحمن بن أبي الزناد. أبو صالح: هو ذكوان السَّمّان. وأخرجه أحمد 15 / (9399)، ومسلم (2832)، وابن حبان (7231) من طريق يعقوب بن عبد الرحمن الزهري، عن سهيل بن أبي صالح، به. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.ورواه يحيى بنُ سعيد الأنصاري عند أحمد 35 / (21385) و (21494)، والمحاملي في "الأمالي" (214 - رواية الفارسي) عن أبي صالح، عن رجل من بني أسد، أنَّ أبا ذر أخبره قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أشد أمتي لي حبًا قوم يكونون - أو يخرجون - بعدي، يود أحدُهم أنه أعطى أهله وماله وإنه رآني". وإسناده ضعيف لأجل الرجل المبهم.وأما حديث أبي هريرة، فرواه عنه الأعرجُ أيضًا عند أحمد 15/ (9794)، والبخاري (3589)، وهمامُ بن منبّه عند أحمد 13/ (8141)، ومسلم (2364)، وابن حبان (6765)، بلفظ: "ليأتيَنّ على أحدكم زمان، لأن يراني أحبُّ إليه من أن يكون له مثلُ أهله وماله". وهذا اللفظ أصحُّ.وفي الباب عن سمرة بن جندب عند البزار (4629)، والطبراني في "الكبير" (7097)، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول لنا: "إن أحدكم سيوشك أن يحب أن ينظر إليّ نظرة بما له من أهل ومال".وسنده ضعيف.
[2] رواه البخاري (2652)، ومسلم (2533) من حديث ابن مسعود، وسلف عند المصنف من حديثي جَعْدة بن هُبيرة وعمران بن حصين برقمي (4932) و (6101).
7168 - حدثنا أبو العبّاس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عَوف [1] بن سفيان الطائي بحِمْص، حدثنا عبد القدُوس بن الحجَّاج، حدثنا الأوزاعي، حدثنا أَسِيد بن عبد الرحمن، حدثني صالح بن محمد [2]، عن أبي جُمُعة قال: تغدَّينا معَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم ومعنا أبو عُبيدةَ بن الجرَّاح قال: فقلنا: يا رسولَ الله، أحدٌ خيرٌ منَّا؟ أسلَمْنا معكَ وجاهَدْنا معك، قال: "نعم، قومٌ يكونون بعدَكم، يُؤمِنون بي ولم يَرَوني" [3]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবু জুমুআ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে দুপুরের খাবার খাচ্ছিলাম, আর আমাদের সাথে আবু উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও ছিলেন। আমরা জিজ্ঞাসা করলাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ, আমাদের চেয়েও কি কেউ উত্তম আছে? আমরা তো আপনার সাথে ইসলাম গ্রহণ করেছি এবং আপনার সাথে জিহাদও করেছি। তিনি বললেন: "হ্যাঁ, এমন কিছু লোক, যারা তোমাদের পরে আসবে; তারা আমাকে না দেখেই আমার প্রতি ঈমান আনবে।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في النسخ إلى: عفوف.
[2] قال ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 23/ 318: هكذا رواه هؤلاء عن الأوزاعي، ولم يتابع على قوله: "صالح بن محمد"، وإنما هو صالح بن جبير. قلنا: وقع في بعض المصادر التي أخرجت الحديث من طريق الأوزاعي: صالح بن جبير، مصوَّبًا من قبل بعض المحققين، وعند بعضهم الآخر من دون إشارة، كما في "المعجم الكبير" للطبراني، وعنه أبو نعيم في "معرفة الصحابة".
7168 [3] - حديث حسن بلفظ: "هل من أحد أعظم منا أجرًا؟ "، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم غير صالح بن جبير الذي سماه الأوزاعي ابنَ محمد، فهو ليس بالمشهور كما قال الذهبي في "الميزان"، وقال أبو حاتم الرازي: مجهول، ووثقه ابن معين وقد اضطرب فيه الأوزاعي، فمرة يرويه عن أسيد بن عبد الرحمن عن صالح بن جبير عن أبي جمعة، ومرة يرويه عن أبي عبيدٍ الحاجب عن صالح بن جبير عن أبي جمعة، ومرة يرويه عن أسيد عن خالد بن دريك عن عبد الله بن محيريز عن أبي جمعة.وأخرجه أحمد 28/ (16976)، والبخاري في "التاريخ الكبير" 2/ 311، والطبراني في "المعجم الكبير" (3537)، وابن منده في "الإيمان" (210)، وأبو نعيم في "معجم الصحابة" (2171)، والحافظ في "الأمالي المطلقة" ص 41 من طريق أبي المغيرة عبد القدوس بن الحجاج الحمصي، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو مسهر عبد الأعلى في نسخته (3) - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخه" 8/ 419 و 23/ 317 - 318 - والبخاري في "الكبير" 2/ 311، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2135) من طريق بشر بن بكر التنيسي، وأبو يعلى في "مسنده" (1559)، - ومن طريقه ابن عساكر 23/ 318 - من طريق عبد الله بن عطارد البصري، وابن عساكر 23/ 318 من طريق عبد الله بن كثير، كلهم عن الأوزاعي، به.وخالفهم الوليد بن مسلم عند ابن أبي عاصم (2134) والطبراني (3539)، فرواه عن الأوزاعي، حدثنا أبو عبيد الحاجب، عن صالح بن جبير، عن أبي جمعة. فجعل الواسطة بين الأوزاعي وصالح أبا عبيد المذحجي حاجب سليمان بن عبد الملك.وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 2/ 310، وابن قانع في "الصحابة" 1/ 187 - 188، والطبراني في "الكبير" (3541)، وأبو أحمد الحاكم في "الكنى" 3/ 188، والكلاباذي في "معاني الأخبار" ص 376، وأبو نعيم في "الصحابة" (2172)، وابن عبد البر في "التمهيد" 20/ 249، وابن عساكر 23/ 318 - 319، وابن حجر في "الأمالي المطلقة" ص 40 من طريق مرزوق بن نافع، عن صالح بن جبير، عن أبي جمعة. ومرزوق مجهول، لم يرو عنه غيرُ ضمرة بن ربيعة، ولم يوثقه معتبَر.وأخرجه البخاري في "التاريخ" 2/ 311، وفي "خلق أفعال العباد" (390) - ومن طريقه المزي في "تهذيب الكمال" 13/ 25 - 26 - وابن أبي عاصم (2136)، والروياني في "مسنده" (1545)، والطبراني في "الكبير" (3540)، وفي "مسند الشاميين" (2066)، وأبو الحسن الخلعي في "الخلعيات" (1047)، وابن عساكر 23/ 319، والذهبي في "ميزان الاعتدال" 2/ 291، والحافظ في "الأمالي" ص 42 - 43 من طريق أبي صالح عبد الله بن صالح، عن معاوية بن صالح، عن صالح بن جبير، عن أبي جمعة قال: قدم علينا أبو جمعة الأنصاري، قال: كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ومعنا معاذ بن جبل عاشر عشرة، فقلنا: يا رسول الله، هل من أحد أعظم منا أجرًا، آمنا بك واتبعناك؟ قال: "وما يمنعكم من ذاك ورسول الله بين أظهركم يأتيكم بالوحي من السماء؟ بل قوم يأتون من بعدكم يأتيهم كتاب بين لوحين فيؤمنون به ويعملون بما فيه، أولئك أعظم منكم أجرًا". فغاير فيه، إذ جعل الذي معهم معاذ بن جبل، وقال فيه: من أعظم منا أجرًا؟ بدل من خير منا؟.قال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 11/ 13 عن حديث أبي جُمعة: لم تَتَّفِق الرُّواة على لفظه، فقد رواه بعضُهم بلفظ الخيريَّة كما تقدَّم، ورواه بعضهم بلفظ: قلنا: يا رسولَ الله، هل من قوم أعظَمُ منّا أجرًا؟ الحديث، أخرجه الطبراني (3540)، وإسناد هذه الرِّواية أقوى من إسناد الرِّواية المتقدمة، يعني رواية: أحدٌ خيرٌ منا؟قلنا: وهذا لعدة أمور: أولها: أنها من طريق معاوية بن صالح الحضرمي، وهو ممّن عرف برواية الحديث أكثر من أسيد بن عبد الرحمن، وهو ثقة احتجَّ به مسلم، ولا يضره أنه من رواية عبد الله بن صالح عنه، فقد قال الحافظ ابن حجر في "هُدى الساري": إنَّ ما يجيء من روايته عن أهل الحذق كيحيى بن معين والبخاري وأبي زرعة وأبي حاتم فهو من صحيح حديثه، وما يجيء من رواية الشيوخ عنه فيتوقف فيه.وثانيها: أنَّ روايته هذه توافق حديثَ أبي ثعلبة الخشني الآتي عند المصنف برقم (8110): "للعامل فيهنَّ أجرُ خمسين يعملُ مثلَ عملِه"، وزيادةُ الأجر لا يقتضي الأفضلية، كما يدلُّ عليه حديثُ أبي سعيد الخدري عند البخاري (3673) ومسلم (2541): "لا تسبُّوا أصحابي، فإنَّ أحدكم لو أنفقَ مثل أُحد ذهبًا ما بلغ مُدَّ أحدِهم ولا نَصِيفَه".والأمر الثالث: أنَّ كلَّ من أسلم بعد الصحابة إنما هو في ميزانهم، لأنهم هم من فتح البلدان ونشر الإسلام، فلا يُدرك المتأخرُ أجرَهم.وأخرجه أحمد (28/ (16977)، والدارمي (2786)، والطحاوي في "شرح المشكل" (2459)، والطبراني (3538)، وأبو نعيم في "الحلية"5/ 148 - 149، وفي "معرفة الصحابة" (2170)، والخطيب في "المتفق والمفترق" (255)، وابن عساكر 9/ 99 - 100، وابن حجر في "الأمالي المطلقة" ص 41 من طريق أبي المغيرة عبد القدوس بن الحجاج، وابن قانع 1/ 188، وابن عساكر 9/ 100 و 23/ 321، وابن حجر ص 41 من طريق الوليد بن مزيد البيروتي، والطحاوي 3/ 175، وابن قانع 1/ 188، والطبراني (3538)، وأبو نعيم في "الحلية"5/ 148 - 149، وفي "معرفة الصحابة" (2170) و (6735)، وابن عساكر 9/ 100 و 23/ 321 - 322 من طريق يحيى بن عبد الله البَابْلُتي الحرّاني، وابن سعد 9/ 513، وابن البختري في "الأمالي" (165)، وقاضي المارستان في "مشيخته" (523)، وابن عساكر 23/ 320 - 321 من طريق محمد بن مصعب القَرْقَساني، أربعتهم عن الأوزاعي، عن أسيد بن عبد الرحمن، عن خالد بن دريك، عن عبد الله بن محيريز، قال: قلت لأبي جمعة، رجل من الصحابة: حدِّثنا حديثًا سمعتَه من رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: نعم، أحدثكم حديثًا جيدًا، تغدَّينا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ومعنا أبو عبيدة بن الجراح، فقال: يا رسول الله، أحدٌ خيرٌ منَّا؟ أسلمنا معك، وجاهدنا معك، قال: "نعم، قومٌ يكونون من بعدكم يُؤمنون بي ولم يروني".
7169 - أخبرنا أبو عبد الله [1] محمد بن عبد الله الزاهد، حدثنا أحمد بن مَهدي بن رُستُم، حدثنا أبو عامر العَقَدي، حدثنا محمد بن أبي حُميد، عن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن عمر قال: كنتُ مع النبيِّ صلى الله عليه وسلم جالسًا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أتدرونَ أيُّ أهلِ الإيمان أفضلُ إيمانًا؟ " قالوا: يا رسولَ الله الملائكةُ، قال: "هم كذلك، ويَحِقُّ ذلك لهم، وما يَمنعُهم وقد أنزلَهم الله المنزلةَ التي أنزلَهم بها، بل غيرُهم؟ قالوا: يا رسولَ الله، فالأنبياءُ الذين أكرمَهم الله تعالى بالنُّبوة والرِّسالة، قال: "هم كذلك، وحُقَّ لهم، بل غيرهم" قال: قلنا: يا رسول الله، فمَنْ هُم؟ قال: "أقوامٌ يأتونَ من بعدي في أصلابِ الرِّجال، فيُؤمنونَ بي ولم يَرَوني، ويَجِدون الوَرَقَ المعلَّقَ فيعملونَ بما فيه، فهؤلاءِ أفضلُ أهلِ الإيمان إيمانًا" [2]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে উপবিষ্ট ছিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা কি জানো ঈমানদারদের মধ্যে কার ঈমান সর্বোত্তম?" তারা বলল: হে আল্লাহর রাসূল! ফেরেশতাগণ। তিনি বললেন: "তাঁরা তো বটেই। আর তাঁদের জন্য এটিই স্বাভাবিক, কারণ আল্লাহ তাঁদের যে মর্যাদা দিয়েছেন, এরপর আর কিসে তাঁদের (ঈমান আনতে) বাধা দেবে? বরং অন্যেরা?" তারা বলল: হে আল্লাহর রাসূল! তবে কি নবী-রাসূলগণ, যাঁদেরকে আল্লাহ তাআলা নবুওয়াত ও রিসালাত দ্বারা সম্মানিত করেছেন? তিনি বললেন: "তাঁরা তো বটেই। আর এটি তাঁদের প্রাপ্য। বরং অন্যেরা।" তিনি (উমর) বললেন: আমরা বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! তবে তাঁরা কারা? তিনি বললেন: "আমার পরে পুরুষদের ঔরসে একদল লোক আসবে। তারা আমাকে দেখেনি, তবুও আমার প্রতি ঈমান আনবে এবং (কিতাবের) ঝুলন্ত পাতা দেখবে, অতঃপর তার মধ্যে যা আছে তদনুযায়ী আমল করবে। এরাই ঈমানদারদের মধ্যে ঈমানের দিক থেকে সর্বোত্তম।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: عبيد الله. والتصويب من المواضع الأخرى في هذا الكتاب. وأخرجه البزار (288) عن محمد بن المثنى، عن أبي عامر العقدي، بهذا الإسناد.وأخرجه إسحاق في "مسنده" كما في "المطالب العالية (1/ 2922)، والبزار (288)، وأبو يعلى (160)، والخطيب في "شرف أصحاب الحديث" (62)، وابن عبد البر في "التمهيد" 20/ 248، وبيبى بنت عبد الصمد في "جزئها" (104)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 58/ 255، والحافظ ابن حجر في "الأمالي المطلقة" ص 37 من طرق عن محمد بن أبي حميد المدني، عن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن عمر.وأخرجه البزار (289)، والعقيلي في "الضعفاء" (1785)، والمعافى بن زكريا في "الجليس الصالح" ص 375 من طريق المنهال بن بحر القشيري، عن هشام الدستوائي، عن يحيى بن أبي كثير، عن زيد بن أسلم، به. وقال العقيلي عن المنهال بن بحر: في حديثه نظر، وذكره ابن عدي في "الكامل" 6/ 331، وذكر له حديثًا منكرًا، ثم قال: وليس للمنهال بن بحر كثير رواية. ثم قال العقيلي: وهذا الحديث ليس بمحفوظ من حديث يحيى بن أبي كثير، إنما يعرف بمحمد بن أبي حُميد عن زيد بن أسلم، ولم يأت به عن هشام عن يحيى بن أبي كثير غيرُ المنهال بن بحر.كذا قال، وقال البزار: إنما يرويه الحفاظُ الثقاتُ عن هشام عن يحيى عن زيد بن أسلم عن عمر مرسلًا! وإنما يُعرف هذا الحديثُ من حديث محمد بن أبي حميد، ومحمد رجل من أهل المدينة ليس بقوي، قد حدَّث عنه جماعة ثقات، واحتملوا حديثه. انتهى، فاقتضى كلامُه أنَّ ناسًا من الثقات رووه عن هشام، لكن المنهال انفرد بوصله، فالله أعلم.وفي الباب عن عبد الله بن عمرو، وأنس بن مالك وابن عبّاس، لكن بلفظ: "من أعجب الخلق إيمانًا؟ " والباقي بنحو حديث عمر.فأما حديث عبد الله بن عمرو، فيرويه إسماعيل بن عيّاش، عن المغيرة بن قيس التميمي، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، عند الحسن بن عرفة في "جزئه" (19)، ومن طريقه أخرجه اللالكائي في "السنة" (1670) و (1671)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 538، والخطيب في "شرف أصحاب الحديث" (56)، وقوام السنة في "الترغيب" (48)، وقاضي المارستان في "مشيخته" (511)، وابن حجر في "الأمالي" ص 38 - 39. قال الحافظ ابن حجر عقبه: حديث غريب، ومغيرة بن قيس بصري، قال أبو حاتم: منكر الحديث، وإسماعيل بن عيّاش روايته عن غير الشاميين ضعيفة، وهذا منها، لكنه يعتضد بالذي قبله (يعني حديث عمر).وأما حديث أنس، فيرويه البزار في مسنده (7294) من طريق سعيد بن بشير، عن قتادة، عن أنس. وقال: غريب من حديث أنس. قلنا: وسعيد بن بشير ضعيف يعتبر به، وقتادة يدلس عن أنس، ولم يذكر سماعًا. وأما حديث ابن عبّاس، فيرويه الطحاوي في "شرح المشكل" (2472)، والطبراني (12560) من طريق محمد بن معاوية بن يزيد بن مالج، عن خلف بن خليفة، عن عطاء بن السائب، عن الشعبي، عن ابن عبّاس. وخلف وعطاء قد اختلطا، وقال البزار: لا نعلم أسند عطاء عن الشعبي إلَّا هذا. قلنا: وغالب الظن أن روايته عنه مرسلة، والله أعلم.وأخرج نحوه يونس بن بكير في زياداته على "سيرة ابن إسحاق" (438) - ومن طريقه البيهقي في "الدلائل"6/ 538 - عن مالك بن مغول، عن طلحة بن مصرف، عن أبي صالح ذكوان السمان مرسلًا. وإسناده حسن إلى ذكوان.ورواه موصولًا محمد بن جبال السلمي، عن خالد بن يزيد العمري، عن سفيان الثوري، عن مالك بن مِغْول، عن طلحة، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، عند الإسماعيلي في "معجمه" (168)، واللالكائي في "أصول الاعتقاد" (1669)، والسهمي في "تاريخ جرجان" ص 404، وأبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 18/ 308 - 309. وخالد بن يزيد العمري متهم بالكذب والوضع، لا يفرح به كما في "لسان الميزان" لابن حجر (2910).
[2] إسناده ضعيف بمرَّة من أجل محمد بن أبي حميد، و به ضعَّفه الذهبي في "التلخيص"، فقال: محمد ضعفوه، وكذا ضعَّفه الحافظ ابن حجر في "المطالب العالية" (1/ 2922)، وفي "الأمالي المطلقة" ص 40. وأخرجه البزار (288) عن محمد بن المثنى، عن أبي عامر العقدي، بهذا الإسناد.وأخرجه إسحاق في "مسنده" كما في "المطالب العالية (1/ 2922)، والبزار (288)، وأبو يعلى (160)، والخطيب في "شرف أصحاب الحديث" (62)، وابن عبد البر في "التمهيد" 20/ 248، وبيبى بنت عبد الصمد في "جزئها" (104)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 58/ 255، والحافظ ابن حجر في "الأمالي المطلقة" ص 37 من طرق عن محمد بن أبي حميد المدني، عن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن عمر.وأخرجه البزار (289)، والعقيلي في "الضعفاء" (1785)، والمعافى بن زكريا في "الجليس الصالح" ص 375 من طريق المنهال بن بحر القشيري، عن هشام الدستوائي، عن يحيى بن أبي كثير، عن زيد بن أسلم، به. وقال العقيلي عن المنهال بن بحر: في حديثه نظر، وذكره ابن عدي في "الكامل" 6/ 331، وذكر له حديثًا منكرًا، ثم قال: وليس للمنهال بن بحر كثير رواية. ثم قال العقيلي: وهذا الحديث ليس بمحفوظ من حديث يحيى بن أبي كثير، إنما يعرف بمحمد بن أبي حُميد عن زيد بن أسلم، ولم يأت به عن هشام عن يحيى بن أبي كثير غيرُ المنهال بن بحر.كذا قال، وقال البزار: إنما يرويه الحفاظُ الثقاتُ عن هشام عن يحيى عن زيد بن أسلم عن عمر مرسلًا! وإنما يُعرف هذا الحديثُ من حديث محمد بن أبي حميد، ومحمد رجل من أهل المدينة ليس بقوي، قد حدَّث عنه جماعة ثقات، واحتملوا حديثه. انتهى، فاقتضى كلامُه أنَّ ناسًا من الثقات رووه عن هشام، لكن المنهال انفرد بوصله، فالله أعلم.وفي الباب عن عبد الله بن عمرو، وأنس بن مالك وابن عبّاس، لكن بلفظ: "من أعجب الخلق إيمانًا؟ " والباقي بنحو حديث عمر.فأما حديث عبد الله بن عمرو، فيرويه إسماعيل بن عيّاش، عن المغيرة بن قيس التميمي، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، عند الحسن بن عرفة في "جزئه" (19)، ومن طريقه أخرجه اللالكائي في "السنة" (1670) و (1671)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 538، والخطيب في "شرف أصحاب الحديث" (56)، وقوام السنة في "الترغيب" (48)، وقاضي المارستان في "مشيخته" (511)، وابن حجر في "الأمالي" ص 38 - 39. قال الحافظ ابن حجر عقبه: حديث غريب، ومغيرة بن قيس بصري، قال أبو حاتم: منكر الحديث، وإسماعيل بن عيّاش روايته عن غير الشاميين ضعيفة، وهذا منها، لكنه يعتضد بالذي قبله (يعني حديث عمر).وأما حديث أنس، فيرويه البزار في مسنده (7294) من طريق سعيد بن بشير، عن قتادة، عن أنس. وقال: غريب من حديث أنس. قلنا: وسعيد بن بشير ضعيف يعتبر به، وقتادة يدلس عن أنس، ولم يذكر سماعًا. وأما حديث ابن عبّاس، فيرويه الطحاوي في "شرح المشكل" (2472)، والطبراني (12560) من طريق محمد بن معاوية بن يزيد بن مالج، عن خلف بن خليفة، عن عطاء بن السائب، عن الشعبي، عن ابن عبّاس. وخلف وعطاء قد اختلطا، وقال البزار: لا نعلم أسند عطاء عن الشعبي إلَّا هذا. قلنا: وغالب الظن أن روايته عنه مرسلة، والله أعلم.وأخرج نحوه يونس بن بكير في زياداته على "سيرة ابن إسحاق" (438) - ومن طريقه البيهقي في "الدلائل"6/ 538 - عن مالك بن مغول، عن طلحة بن مصرف، عن أبي صالح ذكوان السمان مرسلًا. وإسناده حسن إلى ذكوان.ورواه موصولًا محمد بن جبال السلمي، عن خالد بن يزيد العمري، عن سفيان الثوري، عن مالك بن مِغْول، عن طلحة، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، عند الإسماعيلي في "معجمه" (168)، واللالكائي في "أصول الاعتقاد" (1669)، والسهمي في "تاريخ جرجان" ص 404، وأبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 18/ 308 - 309. وخالد بن يزيد العمري متهم بالكذب والوضع، لا يفرح به كما في "لسان الميزان" لابن حجر (2910).
7170 - حدثنا أبو بكر إسماعيل بن محمد بن إسماعيل بالرَّيِّ، حدثنا أبو حاتم، حدثنا يحيى بن صالح الوُحَاظي، حدثنا جَمِيع [1] بن ثُوَبَ، حدثنا عبد الله بن بُسْر صاحبُ النبيِّ صلى الله عليه وسلم [قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "طُوبَى لمن رآني، وطُوبَى لمن رأى من رآني، ولمن رأى مَن رأى مَن رآني وآمنَ بي" [2]. 7170 م - قال جَميعٌ: وحدثنا خالد بن مَعْدَان، عن أبي أُمامةَ، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم، نحوَه [3]] [4]. هذا حديث [5] قد رُويَ بأسانيدَ قريبةٍ عن أنس بن مالك رضي الله عنه [6] ممَّا عَلَونا في أسانيدَ منها، وأقربُ هذه الروايات إلى الصِّحة ما ذكرناه. فضلُ كافَّةِ العرب
আবদুল্লাহ ইবনু বুসর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সুখবর তার জন্য, যে আমাকে দেখেছে। সুখবর তার জন্য, যে এমন ব্যক্তিকে দেখেছে, যে আমাকে দেখেছে। আর সুখবর তার জন্যও, যে এমন ব্যক্তিকে দেখেছে, যে এমন ব্যক্তিকে দেখেছে, যে আমাকে দেখেছে এবং আমার প্রতি ঈমান এনেছে।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] ضُبط كزُبير وكأَمير، قاله الزبيدي في "تاج العروس" 20/ 470. وثُوَب: بضم المثلثة وفتح الواو، بوزن زُفَر، انظر "التاج" أيضًا 2/ 112. كما في "المطالب العالية" لابن حجر (4176)، والضياء (9 / (86) و (87) من طريق بقية بن الوليد، عن محمد بن عبد الرحمن اليحصبي، عن عبد الله بن بسر يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "طوبى لمن رآني، وطوبى لمن آمن بي، ولم يرني، وطوبى له وحسن مآب". وبقيةُ بن الوليد حسن الحديث في المتابعات والشواهد، وقد صرَّح بالسماع في جميع طبقات الإسناد، ولحديثه شواهدُ يأتي ذكرُ بعضِها.وأخرج أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (6437) عن أبي بكر بن خلاد، عن محمد بن أحمد بن الوليد الكرابيسي، عن عبد الله بن عبد الجبار الخبائري، حدثنا جميع بن ثوب، حدثني عبد الرحمن بن جبير بن نفير، عن أبيه، عن جده نفير، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "طوبى لمن رآني، ولمن رأى من رآني، ولمن رأى من رأى من رآني"، فجعله من مسند نفير. وجميع بن ثوب متروك كما سبق.وفي الباب عن أبي عبد الرحمن الجهني عند أحمد 28 / (17388)، قال: بينا نحن عند رسول الله صلى الله عليه وسلم طلع رَكْبانِ، فلما رآهما قال: "كِنديان مَذحِجيان" حتى أتياه، فإذا رجالٌ من مذحج، قال: فدنا إليه أحدُهما ليبايعه، قال: فلمَّا أخذ بيده، قال: يا رسول الله، أرأيتَ من رآك فآمن بك وصدَّقك واتبعك، ماذا له؟ قال: "طوبى له" قال: فمسح على يده فانصرف، ثم أقبل الآخرُ حتى أخذ بيده ليبايعه، قال: يا رسول الله، أرأيتَ من آمن بك وصدَّقك واتبعك ولم يَرَك؟ قال: "طوبي له، ثم طوبى له، ثم طوبى له" قال: فمسح على يده، فانصرف. وإسناده حسن.وحديث أبي سعيد الخدري عند أحمد 18/ (11673)، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم: أنَّ رجلًا قال له: يا رسول الله، طوبى لمن رآك وآمن بك، قال: "طُوبى لمن رآني وآمنَ بي، ثم طُوبى ثم طُوبى ثم طُوبى لمن آمنَ بي ولم يرني". وإسناده ضعيف.وحديث أنس عند أحمد 20 / (12578)، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "طوبى لمن آمنَ بي ورآني - مرة - وطوبى لمن آمنَ بي ولم يرني - سبعَ مرار - ". وإسناده ضعيف أيضًا.قوله: "طُوبى" قال ابن الأثير في "النهاية": طُوبَى: اسمُ الجنَّة، وقيل: هي شجرة فيها، وأصلُها: فُعْلى من الطِّيبِ، فلمَّا ضُمت الطاء انقلبت الياء واوًا.
[2] إسناده ضعيف جدًّا، جميع بن ثوب، قال البخاري وأبو حاتم والدارقطني: منكر الحديث، وقال النسائي: متروك الحديث، ثم إنه إنما يروي عن التابعين لم يدرك طبقة الصحابة، وما عند الحاكم من تصريحه بالسماع من عبد الله بن بسر إما أنَّ فيه سقطًا، أو أنه يكذب، ولم نقف على هذا الحديث من هذا الطريق عند غيره، وإنما يعرف حديث عبد الله بن بسر من طريق محمد بن عبد الرحمن اليحصبي عنه كما سيأتي. وضعفه الذهبي في "التلخيص" فقال: جميع واهٍ.وأخرجه يعقوب بن سفيان الفسوي في "المعرفة والتاريخ" 2/ 351 - وعنه ابن أبي عاصم في "السنة" (1486)، ومن طريق ابن أبي عاصم الضياء المقدسي في "المختارة" 9/ (71) - وأبو يعلى كما في "المطالب العالية" لابن حجر (4176)، والضياء (9 / (86) و (87) من طريق بقية بن الوليد، عن محمد بن عبد الرحمن اليحصبي، عن عبد الله بن بسر يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "طوبى لمن رآني، وطوبى لمن آمن بي، ولم يرني، وطوبى له وحسن مآب". وبقيةُ بن الوليد حسن الحديث في المتابعات والشواهد، وقد صرَّح بالسماع في جميع طبقات الإسناد، ولحديثه شواهدُ يأتي ذكرُ بعضِها.وأخرج أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (6437) عن أبي بكر بن خلاد، عن محمد بن أحمد بن الوليد الكرابيسي، عن عبد الله بن عبد الجبار الخبائري، حدثنا جميع بن ثوب، حدثني عبد الرحمن بن جبير بن نفير، عن أبيه، عن جده نفير، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "طوبى لمن رآني، ولمن رأى من رآني، ولمن رأى من رأى من رآني"، فجعله من مسند نفير. وجميع بن ثوب متروك كما سبق.وفي الباب عن أبي عبد الرحمن الجهني عند أحمد 28 / (17388)، قال: بينا نحن عند رسول الله صلى الله عليه وسلم طلع رَكْبانِ، فلما رآهما قال: "كِنديان مَذحِجيان" حتى أتياه، فإذا رجالٌ من مذحج، قال: فدنا إليه أحدُهما ليبايعه، قال: فلمَّا أخذ بيده، قال: يا رسول الله، أرأيتَ من رآك فآمن بك وصدَّقك واتبعك، ماذا له؟ قال: "طوبى له" قال: فمسح على يده فانصرف، ثم أقبل الآخرُ حتى أخذ بيده ليبايعه، قال: يا رسول الله، أرأيتَ من آمن بك وصدَّقك واتبعك ولم يَرَك؟ قال: "طوبي له، ثم طوبى له، ثم طوبى له" قال: فمسح على يده، فانصرف. وإسناده حسن.وحديث أبي سعيد الخدري عند أحمد 18/ (11673)، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم: أنَّ رجلًا قال له: يا رسول الله، طوبى لمن رآك وآمن بك، قال: "طُوبى لمن رآني وآمنَ بي، ثم طُوبى ثم طُوبى ثم طُوبى لمن آمنَ بي ولم يرني". وإسناده ضعيف.وحديث أنس عند أحمد 20 / (12578)، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "طوبى لمن آمنَ بي ورآني - مرة - وطوبى لمن آمنَ بي ولم يرني - سبعَ مرار - ". وإسناده ضعيف أيضًا.قوله: "طُوبى" قال ابن الأثير في "النهاية": طُوبَى: اسمُ الجنَّة، وقيل: هي شجرة فيها، وأصلُها: فُعْلى من الطِّيبِ، فلمَّا ضُمت الطاء انقلبت الياء واوًا.
7170 [3] - ما بين المعقوفين لم يرد في النسخ الخطية، وأثبتناه من "تلخيص الذهبي". وأخرجه تمام في "فوائده" (260) و (1682) من طريق أبي القاسم يزيد بن محمد بن عبد الصمد، عن يحيى بن صالح الوحاظي، بهذا الإسناد. ولفظه: "طوبى لمن رآني، ولمن رأى من رآني، ولمن رأى من رأى من رآني". ولا يصح بهذا اللفظ.وأخرجه أحمد 36/ (22138) و (22139) و (22214) و (22277)، وابن حبان (7233) من طرق عن همام بن يحيى العوذي، عن قتادة، عن أيمن، عن أبي أمامة بلفظ: "طوبى لمن رآني وآمن بي، وطوبى لمن آمن بي ولم يرني؛ سبع مرار"، وقُرن عند أحمد في الرواية الثانية بهمام حمادُ بن الجعد. وأيمنُ شيخُ قتادة لم يُنسب في شيء من هذه الطرق، وقال الحافظ العراقي في "الأربعين العشارية" ص 231: لا أعرفُه. قلنا: ذكره البخاري في "تاريخه" 2/ 27 فلم ينسبه أيضًا، وذكر له هذا الحديث، ثم قال: ولم يَذكر قتادة سماعَه من أيمن، ولا أيمن من أبي أمامة. وكذا ذكره ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 2/ 319، ولم ينسبه أيضًا، وأما ابن حبان فنسبَه في "صحيحه" 16/ 216، وفي "ثقاته" 4/ 48 ابنَ مالك الأشعري، وأيمنُ هذا تفرّد بالرواية عنه قتادة، ولم يوثقه معتبر، فهو مجهول.قلنا: ولفظ حديث أيمن عن أبي أمامة يتحسَّن بالشواهد كما تقدم في الحديث السابق.وخالف عبدُ الملك بن عمرو أبو عامر العقديُّ همامًا، فرواه عن قتادة، عن أيمن، عن أبي هريرة، عند ابن حبان (7232)، فجعله من مسند أبي هريرة.ورواه هشيم - فيما قال الدارقطني في "العلل" (2708) - عن منصور بن زاذان، عن قتادة، عن ثمامة بن عبد الله بن أنس، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا. وقال: والمحفوظ عن أيمن عن أبي أمامة.وأما ابن حبان فذهب إلى صحة الحديثين، فقال في "صحيحه": سمع هذا الخبرَ أيمنُ عن أبي هريرة وأبي أمامة معًا!
7170 [4] - إسناده ضعيف جدًّا كسابقه. وأخرجه تمام في "فوائده" (260) و (1682) من طريق أبي القاسم يزيد بن محمد بن عبد الصمد، عن يحيى بن صالح الوحاظي، بهذا الإسناد. ولفظه: "طوبى لمن رآني، ولمن رأى من رآني، ولمن رأى من رأى من رآني". ولا يصح بهذا اللفظ.وأخرجه أحمد 36/ (22138) و (22139) و (22214) و (22277)، وابن حبان (7233) من طرق عن همام بن يحيى العوذي، عن قتادة، عن أيمن، عن أبي أمامة بلفظ: "طوبى لمن رآني وآمن بي، وطوبى لمن آمن بي ولم يرني؛ سبع مرار"، وقُرن عند أحمد في الرواية الثانية بهمام حمادُ بن الجعد. وأيمنُ شيخُ قتادة لم يُنسب في شيء من هذه الطرق، وقال الحافظ العراقي في "الأربعين العشارية" ص 231: لا أعرفُه. قلنا: ذكره البخاري في "تاريخه" 2/ 27 فلم ينسبه أيضًا، وذكر له هذا الحديث، ثم قال: ولم يَذكر قتادة سماعَه من أيمن، ولا أيمن من أبي أمامة. وكذا ذكره ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 2/ 319، ولم ينسبه أيضًا، وأما ابن حبان فنسبَه في "صحيحه" 16/ 216، وفي "ثقاته" 4/ 48 ابنَ مالك الأشعري، وأيمنُ هذا تفرّد بالرواية عنه قتادة، ولم يوثقه معتبر، فهو مجهول.قلنا: ولفظ حديث أيمن عن أبي أمامة يتحسَّن بالشواهد كما تقدم في الحديث السابق.وخالف عبدُ الملك بن عمرو أبو عامر العقديُّ همامًا، فرواه عن قتادة، عن أيمن، عن أبي هريرة، عند ابن حبان (7232)، فجعله من مسند أبي هريرة.ورواه هشيم - فيما قال الدارقطني في "العلل" (2708) - عن منصور بن زاذان، عن قتادة، عن ثمامة بن عبد الله بن أنس، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا. وقال: والمحفوظ عن أيمن عن أبي أمامة.وأما ابن حبان فذهب إلى صحة الحديثين، فقال في "صحيحه": سمع هذا الخبرَ أيمنُ عن أبي هريرة وأبي أمامة معًا!
7170 [5] - في (ز) وحدها: صحيح، بدل حديث.
7170 [6] - أخرجه أحمد 20 / (12578) بإسناد ضعيف، وذكرنا لفظه في التعليق على الحديث السابق.
7171 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الزاهد الأصبهاني، حدثنا أحمد بن مَهدي بن رُستُم، حدثنا أبو بدر شُجاع بن الوليد، حدثنا قابوسُ بن أبي ظَبْيان، عن أبيه، عن سلمان قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا سلمان، لا تُبغِضُني فتُفارِقَ دينَك" فقلت: يا رسولَ الله، وكيف أُبغِضُك وبكَ هداني اللهُ عز وجل؟ قال: "تُبغِضُ العربَ فتُبغِضُني [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বললেন, "হে সালমান, তুমি আমাকে ঘৃণা করো না, তাহলে তুমি তোমার দ্বীন (ধর্ম) থেকে বিচ্ছিন্ন হয়ে যাবে।" আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল, আমি আপনাকে কীভাবে ঘৃণা করব? আল্লাহ তাআলা তো আপনার মাধ্যমেই আমাকে হেদায়েত দান করেছেন। তিনি বললেন, "তুমি আরবদেরকে ঘৃণা করবে, ফলে তুমি আমাকেও ঘৃণা করবে।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف لضعف قابوس بن أبي ظبيان، ولانقطاعة بين أبي ظبيان - واسمه حصين بن جندب - وبين سلمان الفارسي. وقال الذهبي في "التلخيص": قابوس تُكلِّم فيه.وأخرجه أحمد 39 / (23731)، والترمذي (3927) من طرق عن شجاع بن الوليد، بهذا الإسناد.وقال الترمذي: حسن غريب لا نعرفه إلَّا من حديث أبي بدر شجاع بن الوليد، وسمعت محمد بن إسماعيل يقول: أبو ظبيان لم يُدرك سلمان، مات سلمان قبل علي.وانظر حديث أنس الآتي (7174).
7172 - أخبرنا أبو محمد الحسن بن محمد المِهْرجاني، حدثنا عبد العزيز بن معاوية، حدثنا أبو سفيان زياد بن سهل الحارثي، حدثنا عُمارة بن مِهْران المِعْوَلي، حدثنا عمرو بن دِينار، عن سالم بن عبد الله، عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لمَّا خلَقَ اللهُ الخَلْقَ اختارَ العربَ، ثم اختارَ من العرب قريشًا، ثم اختارَ من قريشٍ بني هاشم، ثم اختارَني من بني هاشم، فأنا خِيرةٌ من خِيرةٍ" [1].
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন আল্লাহ তা'আলা সৃষ্টিজগত সৃষ্টি করলেন, তখন তিনি আরবদেরকে মনোনীত (নির্বাচন) করলেন। এরপর আরবদের মধ্যে থেকে তিনি কুরাইশদেরকে মনোনীত করলেন। এরপর কুরাইশদের মধ্যে থেকে তিনি বনু হাশিমকে মনোনীত করলেন। এরপর বনু হাশিমের মধ্যে থেকে তিনি আমাকে মনোনীত করলেন। সুতরাং, আমি হলাম শ্রেষ্ঠের মধ্যে শ্রেষ্ঠ।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده محتمل للتحسين، زياد بن سهل الحارثي لم نقف له على ترجمة سوى ما قاله هارون بن سفيان المستملي المعروف بالدِّيك، من أنه كان ثقةً بصريًا، كما في "حديث أبي الفضل الزهري" ص 407، و تاريخ بغداد 16/ 36، وبقية رجاله ثقات غير عبد العزيز بن معاوية، فصدوق.وأخرجه ابن المغازلي في "مناقب علي" (151) من طريق محمد بن يونس الكُديمي، عن زياد بن سهل الحارثي، بهذا الإسناد. وتحرَّف فيه ابن مهران إلى: ابن ميمون. والكديمي ضعيف جدًّا.وانظر ما بعده.ويشهد له حديث واثلة بن الأسقع عند مسلم (2276) مرفوعًا: "إنَّ الله اصطفى كِنانةَ من ولد إسماعيل، واصطفَى قريشًا من كِنانة، واصطفَى من قريش بني هاشم، واصطفاني من بني هاشم".
7173 - حدثنا أبو العبّاس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغاني، حدثنا عبد الله بن بكر السَّهمي، حدثنا يزيد بن عَوَانة، عن محمد بن ذَكْوان خالِ ولد حماد بن زيد، عن عمرو بن دينار، عن ابن عمر، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم نحوَه [1].قد صحَّت الروايةُ عن عمرو بن دينار، فإن كان عن سالمٍ فهو غريبٌ صحيح، وإن كان عن ابن عمر فقد سمع عمرُو بن دينار من ابن عمر.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এর অনুরূপ বর্ণনা রয়েছে। আবূ আল-আব্বাস মুহাম্মাদ ইবনে ইয়াকুব আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, (তিনি) মুহাম্মাদ ইবনে ইসহাক আস-সাগানী থেকে, (তিনি) আব্দুল্লাহ ইবনে বকর আস-সাহমী থেকে, (তিনি) ইয়াযীদ ইবনে আওয়ানা থেকে, (তিনি) মুহাম্মাদ ইবনে যাকওয়ান—যিনি হাম্মাদ ইবনে যায়দের সন্তানদের মামা—থেকে, (তিনি) আমর ইবনে দীনার থেকে, (তিনি) ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এর অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। আমর ইবনে দীনার থেকে এই বর্ণনাটি সহীহ প্রমাণিত হয়েছে। যদি এটি সালিম থেকে হয়ে থাকে, তবে তা গরীব এবং সহীহ। আর যদি এটি ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে হয়ে থাকে, তবে আমর ইবনে দীনার ইবনে উমরের নিকট থেকে শুনেছেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف، ولم يسُقِ المصنفُ لفظه هنا، ولا فيما سلف برقم (7130)، وأحال في لفظه على الرواية التي قبلها (7129)، وهناك تكلمنا عليها.وانظر ما قبله. وهذا الحديث لا نعلم رواه عن ثابت إلَّا الهيثم بن جمّاز، والحسن بن أبي جعفر روى شبيها به، والحسن والهيثم فلا يحتج بحديثهما إذا انفرد الحديث.وأخرج إسماعيل الصفار في "مجموع فيه مصنفاته" (575) - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخه" 30/ 144 - عن إبراهيم بن الوليد الجشاش، عن يحيى الحمّاني، عن أبي إسرائيل إسماعيل بن خليفة، عن علي بن زيد، عن أنس مرفوعًا: "حبُّ أبي بكر وعمر سُنةٌ وبعضُهما كفرٌ، وحبُّ الأنصار إيمانٌ وبغضُهم كفر، وحبُّ العرب إيمانٌ وبعضهم كفرٌ"، وإسناده ضعيف جدًّا، مسلسل بالضعفاء.وأخرج البيهقي في "شعب الإيمان" (1495) من طريق ابن أبي ليلى، عن عدي بن ثابت، عن البراء، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "حب العرب إيمان وبغضهم نفاق". وقال عقبه: كذا جاء به، والمحفوظ عن شعبة عن عدي بن ثابت عن البراء بمعناه في الأنصار [البخاري (3783) ومسلم (75)]، وإنما يُعرف هذا المتن من حديث الهيثم بن جماز عن ثابت عن أنس. قلنا: وإسنادُه مظلم، فيه غيرُ واحد مجهول وضعيف.وفي الباب عن ابن عمر مرفوعًا عند الدارقطني في "الأفراد"كما في "الغرائب الملتقطة" لابن حجر (1407)، بلفظ: "حبُّ العرب إيمانٌ، وبعضُهم نفاق". وفي إسناده مورع بن جبير، لم نقف له على ترجمة، وقد روى حديثين غير هذا، أثرُ الوضع ظاهرٌ عليهما، أحدهما في "الترغيب" لابن شاهين (553)، وفي "الغرائب الملتقطة" (3257)، والثاني في "مشيخة أبي طاهر" (53).ورواه الطبراني في "المعجم الكبير" 13/ (13831) من طريق سهل بن عامر، عن عباد بن الربيع، عن الأعمش، عن حبيب بن أبي ثابت، عن ابن عمر، مرفوعًا بلفظ: "لا يبغض العربَ مؤمنٌ، ولا يحبُّ ثقيف مؤمنٌ". وإسناده تالف، سهل بن عامر أتهمه أبو حاتم الرازي كما في "الجرح والتعديل" 4/ 202 بافتعال الحديث، وقال البخاري: منكر الحديث.وعن جابر مرفوعًا عند ابن عساكر في تاريخه 30/ 144، وابن حجر في "الغرائب الملتقطة" (1404)، بلفظ: "حبُّ أبي بكر وعمر من الإيمان، وبعضُهما من الكفر، وحبُّ العرب من الإيمان، وبعضُهم من الكفر … ". وإسناده تالف، فيه علي بن الحسن الشامي وخُليد بن دعلج، الأول متروك اتهمه الدارقطني كما في "سؤالات البرقاني" (368)، والثاني ضعيف.وعن علي بن أبي طالب عند عبد الله بن أحمد في زياداته على "المسند"2/ (614) من طريق إسماعيل بن عيّاش، عن زيد بن جَبيرة عن داود بن الحُصين عن عبيد الله بن أبي رافع، عن علي مرفوعًا: "لا يبغض العرب إلّا منافق"، وزيد بن جبيرة مدنيٌّ متروكُ الحديث، وإسماعيل ابن عيّاش ضعيفٌ في روايته عن غير أهل بلده، وهذا منها.ورواه ابن عدي في "الكامل" 3/ 203 من هذا الطريق نفسه إلَّا أنه جعله من مسند عبيد الله بن أبي رافع، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم!وعن ابن عبّاس مرفوعًا عند الطبراني في "المعجم الكبير" (11312)، ولفظه: "بغضُ بني هاشم والأنصار كفرٌ، وبغضُ العرب نفاقٌ". وإسنادُه تالف، فيه غيرُ واحد متهم.وعن أبي هريرة عند أبي الشيخ في "طبقات محدثي أصبهان" 4/ 273 وعنه أبو نعيم في "أخبار أصبهان" 2/ 340 - عن أبي زُفَر الهُذيل بن عبد الله الضبيّ، عن أحمد بن يونس، عن محمَّد بن عبد الصمد بن جابر الضبّي، عن أبيه، عن عطاء بن أبي ميمونة عنه بلفظ: "أحبُّوا العربَ وبقاءَهم وصلاحهم، فإن صلاحَهم نورٌ في الإسلام وإنَّ فناءَهم وفسادَهم ظلمةٌ في الإسلام". وإسناده مسلسل بالمجاهيل والضعفاء بلةَ الانقطاع بين عطاء وأبي هريرة.وانظر ما بعده، وما سلف برقمي (7129) و (7171).
7174 - حدثني علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، أخبرنا أبو مسلم إبراهيم بن عبد الله، أنَّ مَعقِل بن مالك حدثهم، قال: حدثنا الهيثم بن جِمَّاز [1]، عن ثابت، عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "حُبُّ العربِ إيمانٌ، وبُغضُهم نِفاقٌ" [2]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আরবদের ভালোবাসা ঈমান, এবং তাদের প্রতি বিদ্বেষ (ঘৃণা) হলো নিফাক (মুনাফিকি)।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في النسخ الخطية: حماد، والمثبت من مصادر التخريج وكتب الرجال. وهذا الحديث لا نعلم رواه عن ثابت إلَّا الهيثم بن جمّاز، والحسن بن أبي جعفر روى شبيها به، والحسن والهيثم فلا يحتج بحديثهما إذا انفرد الحديث.وأخرج إسماعيل الصفار في "مجموع فيه مصنفاته" (575) - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخه" 30/ 144 - عن إبراهيم بن الوليد الجشاش، عن يحيى الحمّاني، عن أبي إسرائيل إسماعيل بن خليفة، عن علي بن زيد، عن أنس مرفوعًا: "حبُّ أبي بكر وعمر سُنةٌ وبعضُهما كفرٌ، وحبُّ الأنصار إيمانٌ وبغضُهم كفر، وحبُّ العرب إيمانٌ وبعضهم كفرٌ"، وإسناده ضعيف جدًّا، مسلسل بالضعفاء.وأخرج البيهقي في "شعب الإيمان" (1495) من طريق ابن أبي ليلى، عن عدي بن ثابت، عن البراء، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "حب العرب إيمان وبغضهم نفاق". وقال عقبه: كذا جاء به، والمحفوظ عن شعبة عن عدي بن ثابت عن البراء بمعناه في الأنصار [البخاري (3783) ومسلم (75)]، وإنما يُعرف هذا المتن من حديث الهيثم بن جماز عن ثابت عن أنس. قلنا: وإسنادُه مظلم، فيه غيرُ واحد مجهول وضعيف.وفي الباب عن ابن عمر مرفوعًا عند الدارقطني في "الأفراد"كما في "الغرائب الملتقطة" لابن حجر (1407)، بلفظ: "حبُّ العرب إيمانٌ، وبعضُهم نفاق". وفي إسناده مورع بن جبير، لم نقف له على ترجمة، وقد روى حديثين غير هذا، أثرُ الوضع ظاهرٌ عليهما، أحدهما في "الترغيب" لابن شاهين (553)، وفي "الغرائب الملتقطة" (3257)، والثاني في "مشيخة أبي طاهر" (53).ورواه الطبراني في "المعجم الكبير" 13/ (13831) من طريق سهل بن عامر، عن عباد بن الربيع، عن الأعمش، عن حبيب بن أبي ثابت، عن ابن عمر، مرفوعًا بلفظ: "لا يبغض العربَ مؤمنٌ، ولا يحبُّ ثقيف مؤمنٌ". وإسناده تالف، سهل بن عامر أتهمه أبو حاتم الرازي كما في "الجرح والتعديل" 4/ 202 بافتعال الحديث، وقال البخاري: منكر الحديث.وعن جابر مرفوعًا عند ابن عساكر في تاريخه 30/ 144، وابن حجر في "الغرائب الملتقطة" (1404)، بلفظ: "حبُّ أبي بكر وعمر من الإيمان، وبعضُهما من الكفر، وحبُّ العرب من الإيمان، وبعضُهم من الكفر … ". وإسناده تالف، فيه علي بن الحسن الشامي وخُليد بن دعلج، الأول متروك اتهمه الدارقطني كما في "سؤالات البرقاني" (368)، والثاني ضعيف.وعن علي بن أبي طالب عند عبد الله بن أحمد في زياداته على "المسند"2/ (614) من طريق إسماعيل بن عيّاش، عن زيد بن جَبيرة عن داود بن الحُصين عن عبيد الله بن أبي رافع، عن علي مرفوعًا: "لا يبغض العرب إلّا منافق"، وزيد بن جبيرة مدنيٌّ متروكُ الحديث، وإسماعيل ابن عيّاش ضعيفٌ في روايته عن غير أهل بلده، وهذا منها.ورواه ابن عدي في "الكامل" 3/ 203 من هذا الطريق نفسه إلَّا أنه جعله من مسند عبيد الله بن أبي رافع، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم!وعن ابن عبّاس مرفوعًا عند الطبراني في "المعجم الكبير" (11312)، ولفظه: "بغضُ بني هاشم والأنصار كفرٌ، وبغضُ العرب نفاقٌ". وإسنادُه تالف، فيه غيرُ واحد متهم.وعن أبي هريرة عند أبي الشيخ في "طبقات محدثي أصبهان" 4/ 273 وعنه أبو نعيم في "أخبار أصبهان" 2/ 340 - عن أبي زُفَر الهُذيل بن عبد الله الضبيّ، عن أحمد بن يونس، عن محمَّد بن عبد الصمد بن جابر الضبّي، عن أبيه، عن عطاء بن أبي ميمونة عنه بلفظ: "أحبُّوا العربَ وبقاءَهم وصلاحهم، فإن صلاحَهم نورٌ في الإسلام وإنَّ فناءَهم وفسادَهم ظلمةٌ في الإسلام". وإسناده مسلسل بالمجاهيل والضعفاء بلةَ الانقطاع بين عطاء وأبي هريرة.وانظر ما بعده، وما سلف برقمي (7129) و (7171).
[2] إسناده ضعيف بمرَّة، معقل بن مالك - وهو الباهلي البصري - روى عنه جمع، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وزعم الأزديُّ أنه متروك، فخطَّأه الحافظ ابن حجر في "التقريب"، وقال الذهبي في "الكاشف" (5556): ثقة، وذهل في "تلخيص المستدرك" فقال: ضعيف. قلنا: فمثلُه صدوقٌ حسن الحديث إن شاء الله، ولا سيما أنه قد توبع.وأما شيخُه الهيثم بن جمَّاز فقد قال فيه أحمد: كان منكرَ الحديث، تُرك حديثه، وقال النسائي في "الضعفاء" (609): متروك، وضعَّفه ابن معين وأبو حاتم وأبو زرعة والدارقطني وقال العقيلي: الهيثم بن جَمّاز الحنفي حديثُه غير محفوظ. وقال الذهبي في "التلخيص": الهيثم متروك.وأخرجه العقيلي في "الضعفاء" (1909)، والطبراني في "الأوسط" (2537)، وأبو نعيم في "الحلية" 2/ 333، وابن حجر في "الغرائب الملتقطة" (1408) من طُرق عن أبي مسلم إبراهيم بن عبد الله، عن معقل بن مالك بهذا الإسناد. بلفظ: "حبُّ قريش إيمانٌ، وبعضُهم كفرٌ، وحبُّ العرب إيمانٌ، وبعضُهم كفرٌ، فمن أحبَّ العربَ فقد أحبَّني، ومن أبغض العربَ فقد أبغضني". وقال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن ثابت إلَّا الهيثم، وقال أبو نعيم غريبٌ من حديث ثابت عن أنس، تفرد به الهيثم بن جماز.وأخرجه البزار في "مسنده" (6997) من طريق سعيد بن عبد الله، عن الهيثم بن جماز، به. وقال: وهذا الحديث لا نعلم رواه عن ثابت إلَّا الهيثم بن جمّاز، والحسن بن أبي جعفر روى شبيها به، والحسن والهيثم فلا يحتج بحديثهما إذا انفرد الحديث.وأخرج إسماعيل الصفار في "مجموع فيه مصنفاته" (575) - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخه" 30/ 144 - عن إبراهيم بن الوليد الجشاش، عن يحيى الحمّاني، عن أبي إسرائيل إسماعيل بن خليفة، عن علي بن زيد، عن أنس مرفوعًا: "حبُّ أبي بكر وعمر سُنةٌ وبعضُهما كفرٌ، وحبُّ الأنصار إيمانٌ وبغضُهم كفر، وحبُّ العرب إيمانٌ وبعضهم كفرٌ"، وإسناده ضعيف جدًّا، مسلسل بالضعفاء.وأخرج البيهقي في "شعب الإيمان" (1495) من طريق ابن أبي ليلى، عن عدي بن ثابت، عن البراء، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "حب العرب إيمان وبغضهم نفاق". وقال عقبه: كذا جاء به، والمحفوظ عن شعبة عن عدي بن ثابت عن البراء بمعناه في الأنصار [البخاري (3783) ومسلم (75)]، وإنما يُعرف هذا المتن من حديث الهيثم بن جماز عن ثابت عن أنس. قلنا: وإسنادُه مظلم، فيه غيرُ واحد مجهول وضعيف.وفي الباب عن ابن عمر مرفوعًا عند الدارقطني في "الأفراد"كما في "الغرائب الملتقطة" لابن حجر (1407)، بلفظ: "حبُّ العرب إيمانٌ، وبعضُهم نفاق". وفي إسناده مورع بن جبير، لم نقف له على ترجمة، وقد روى حديثين غير هذا، أثرُ الوضع ظاهرٌ عليهما، أحدهما في "الترغيب" لابن شاهين (553)، وفي "الغرائب الملتقطة" (3257)، والثاني في "مشيخة أبي طاهر" (53).ورواه الطبراني في "المعجم الكبير" 13/ (13831) من طريق سهل بن عامر، عن عباد بن الربيع، عن الأعمش، عن حبيب بن أبي ثابت، عن ابن عمر، مرفوعًا بلفظ: "لا يبغض العربَ مؤمنٌ، ولا يحبُّ ثقيف مؤمنٌ". وإسناده تالف، سهل بن عامر أتهمه أبو حاتم الرازي كما في "الجرح والتعديل" 4/ 202 بافتعال الحديث، وقال البخاري: منكر الحديث.وعن جابر مرفوعًا عند ابن عساكر في تاريخه 30/ 144، وابن حجر في "الغرائب الملتقطة" (1404)، بلفظ: "حبُّ أبي بكر وعمر من الإيمان، وبعضُهما من الكفر، وحبُّ العرب من الإيمان، وبعضُهم من الكفر … ". وإسناده تالف، فيه علي بن الحسن الشامي وخُليد بن دعلج، الأول متروك اتهمه الدارقطني كما في "سؤالات البرقاني" (368)، والثاني ضعيف.وعن علي بن أبي طالب عند عبد الله بن أحمد في زياداته على "المسند"2/ (614) من طريق إسماعيل بن عيّاش، عن زيد بن جَبيرة عن داود بن الحُصين عن عبيد الله بن أبي رافع، عن علي مرفوعًا: "لا يبغض العرب إلّا منافق"، وزيد بن جبيرة مدنيٌّ متروكُ الحديث، وإسماعيل ابن عيّاش ضعيفٌ في روايته عن غير أهل بلده، وهذا منها.ورواه ابن عدي في "الكامل" 3/ 203 من هذا الطريق نفسه إلَّا أنه جعله من مسند عبيد الله بن أبي رافع، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم!وعن ابن عبّاس مرفوعًا عند الطبراني في "المعجم الكبير" (11312)، ولفظه: "بغضُ بني هاشم والأنصار كفرٌ، وبغضُ العرب نفاقٌ". وإسنادُه تالف، فيه غيرُ واحد متهم.وعن أبي هريرة عند أبي الشيخ في "طبقات محدثي أصبهان" 4/ 273 وعنه أبو نعيم في "أخبار أصبهان" 2/ 340 - عن أبي زُفَر الهُذيل بن عبد الله الضبيّ، عن أحمد بن يونس، عن محمَّد بن عبد الصمد بن جابر الضبّي، عن أبيه، عن عطاء بن أبي ميمونة عنه بلفظ: "أحبُّوا العربَ وبقاءَهم وصلاحهم، فإن صلاحَهم نورٌ في الإسلام وإنَّ فناءَهم وفسادَهم ظلمةٌ في الإسلام". وإسناده مسلسل بالمجاهيل والضعفاء بلةَ الانقطاع بين عطاء وأبي هريرة.وانظر ما بعده، وما سلف برقمي (7129) و (7171).
7175 - حدثنا أبو محمد المُزَني وأبو سعيد الثَّقفي، في آخَرِينَ، قالوا: حدثنا محمد بن عبد الله بن سليمان الحَضْرمي، حدثنا العلاء بن عمرو الحَنَفي، حدثنا يحيى بن بُرَيد [1] الأشعَري، أخبرنا ابن جُريج، عن عطاء، عن ابن عبّاس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أحِبُّوا العربَ لثلاث: لأنِّي عربيٌّ، والقرآنَ عربيٌّ، وكلامَ أهل الجنَّة عربيٌّ" [2]. تابعه محمد بن الفضل عن ابن جُريج:
আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা তিনটি কারণে আরবদেরকে ভালোবাসো: কারণ আমি আরবী, কুরআন আরবী, এবং জান্নাতবাসীদের ভাষাও আরবী।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في النسخ الخطية: يزيد، وأُهمل في (ص) إلّا أنَّ الاسم فيها جاء مقلوبًا. وكذلك جاء في بعض مصادر التخريج: يزيد بالياء المثناة بدل الباء الموحدة، وما أثبتناه هو الصواب، انظر "المؤتلف والمختلف" للدارقطني (1/ 171)، و "الإكمال" لابن ماكولا 1/ 227. الحنفي، وليس بعمدة، وأما ابن الفضل فمتهم، وأظن الحديث موضوعًا. وصرَّح الذهبي في "ميزان الاعتدال" 3/ 103 بأنه موضوع. قلنا: وابن الفضل المذكور في كلام الذهبي: هو محمد بن الفضل ابن عطية الذي تابعَ يحيى بنَ بُريد في الرواية التالية عند المصنف.والحديث في "معرفة علوم الحديث" للمصنف ص 161 - 162 عن أبي سعيد أحمد بن يعقوب الثقفي وحده، بهذا الإسناد.وأخرجه العقيلي في "الضعفاء" (1327) - ومن طريقه ابن الجوزي في "الموضوعات" (859) - والطبراني في "الكبير" (11441)، وفي "الأوسط" (5583)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (1496)، وفي "مناقب الشافعي" 1/ 32 - 33 من طريق محمد بن عبد الله الحضرمي، به. وقال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن ابن جريج إلّا يحيى بن بريد، تفرد به العلاء بن عمرو.وأخرجه محمد بن الحسين الآبري في "مناقب الشافعي" (37)، والمعافى بن زكريا في "الجليس الصالح" ص 593، وتمام في "الفوائد" (134) - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخه" 19/ 115 - وأبو نعيم في "صفة الجنة" (268)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (1364)، وابن عساكر 20/ 140 من طرق عن العلاء بن عمرو الحنفي، به.وفي الباب عن أبي هريرة مرفوعًا: "أنا عربي، والقرآن عربي، ولسان أهل الجنة عربي"، أخرجه الطبراني في "الأوسط" (9147)، وقال: لم يرو هذا الحديث عن شبل إلَّا عبد العزيز بن عمران، تفرد به إبراهيم بن المنذر، ولا يُروى عن أبي هريرة إلَّا بهذا الإسناد. قلنا: وعبد العزيز بن عمران - وهو الزهري المدني - متروك، وشيخه شبل بن العلاء بن عبد الرحمن ضعَّفه ابن عدي في "الكامل"، وقال الدارقطني كما في "سؤالات البرقاني له": ليس بالقوي.
[2] إسناده ضعيف بمرَّة، العلاء بن عمرو الحنفي ويحيى بن بُريد الأشعري ضعيفان، انظر "لسان الميزان" (5280) و (8417). وأسند العقيليُّ في "الضعفاء" عن عبد الله بن عمر بن أبان قال: سمعت أنا والعلاء بن عمرو من رجل حديثًا عن سعيد بن مسلمة، فسألوا العلاءَ عنه بحضرتي، فقال: حدثنا سعيد بن مسلمة. يعني أنه يكذب.وقال أبو حاتم الرازي كما في "العلل" لابنه 6/ 426: هذا حديث كذب، وقال العقيلي: منكر لا أصلَ له، وقال الذهبي في "التلخيص": يحيى ضعَّفه أحمد وغيرُه، وهو من رواية العلاء بن عمرو الحنفي، وليس بعمدة، وأما ابن الفضل فمتهم، وأظن الحديث موضوعًا. وصرَّح الذهبي في "ميزان الاعتدال" 3/ 103 بأنه موضوع. قلنا: وابن الفضل المذكور في كلام الذهبي: هو محمد بن الفضل ابن عطية الذي تابعَ يحيى بنَ بُريد في الرواية التالية عند المصنف.والحديث في "معرفة علوم الحديث" للمصنف ص 161 - 162 عن أبي سعيد أحمد بن يعقوب الثقفي وحده، بهذا الإسناد.وأخرجه العقيلي في "الضعفاء" (1327) - ومن طريقه ابن الجوزي في "الموضوعات" (859) - والطبراني في "الكبير" (11441)، وفي "الأوسط" (5583)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (1496)، وفي "مناقب الشافعي" 1/ 32 - 33 من طريق محمد بن عبد الله الحضرمي، به. وقال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن ابن جريج إلّا يحيى بن بريد، تفرد به العلاء بن عمرو.وأخرجه محمد بن الحسين الآبري في "مناقب الشافعي" (37)، والمعافى بن زكريا في "الجليس الصالح" ص 593، وتمام في "الفوائد" (134) - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخه" 19/ 115 - وأبو نعيم في "صفة الجنة" (268)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (1364)، وابن عساكر 20/ 140 من طرق عن العلاء بن عمرو الحنفي، به.وفي الباب عن أبي هريرة مرفوعًا: "أنا عربي، والقرآن عربي، ولسان أهل الجنة عربي"، أخرجه الطبراني في "الأوسط" (9147)، وقال: لم يرو هذا الحديث عن شبل إلَّا عبد العزيز بن عمران، تفرد به إبراهيم بن المنذر، ولا يُروى عن أبي هريرة إلَّا بهذا الإسناد. قلنا: وعبد العزيز بن عمران - وهو الزهري المدني - متروك، وشيخه شبل بن العلاء بن عبد الرحمن ضعَّفه ابن عدي في "الكامل"، وقال الدارقطني كما في "سؤالات البرقاني له": ليس بالقوي.
7176 - حدَّثَناه أبو عبد الله محمد بن بُطَّة الأصبهاني، حدثنا عبد الله بن محمد بن زكريا، حدثنا إسماعيل بن عمرو، حدثنا محمد بن الفضل، عن ابن جُرَيج، عن عطاء، عن ابن عبّاس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "احفَظُوني في العرب لثلاثِ خِصالٍ: لأنِّي عربيٌّ، والقرآنَ، عربيٌّ، ولسانَ أهل الجنَّة عربيٌّ [1]. قال الحاكم رحمه الله تعالى: حديثُ يحيى بن بُرَيد عن ابن جريج حديثٌ صحيح!وإنما ذكرتُ حديث محمد بن الفضل متابعًا له، والمتهاونُ بقول المصطفى صلى الله عليه وسلم: "كلام أهل الجنَّة عربيٌّ"، مُتهاوِنٌ بالله ورسوله صلى الله عليه وسلم، فإِنَّ شواهده تُنذِرُ بالوعيد منه صلى الله عليه وسلم لمن يختارُ الفارسيةَ على العربية نُطقًا وكتابةً، وقد رُوِّينا في ذلك أحاديث:فمنها:
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা তিনটি বৈশিষ্ট্যের কারণে আরবের মধ্যে আমার মর্যাদা রক্ষা করো/আমাকে সম্মান করো: কারণ আমি আরবি, এবং কুরআন আরবি, এবং জান্নাতবাসীদের ভাষা আরবি।" [১] আল-হাকিম (রাহিমাহুল্লাহু তাআলা) বলেন: ইবনে জুরাইজ থেকে ইয়াহইয়া ইবনে বুরাইদের হাদীসটি সহীহ! আমি মুহাম্মাদ ইবনুল ফাযলের হাদীসটি এর সমর্থক হিসেবে উল্লেখ করেছি। আর যে ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই বাণী: "জান্নাতবাসীদের ভাষা আরবি," এর প্রতি তুচ্ছতাচ্ছিল্য করে, সে আল্লাহ ও তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি তুচ্ছতাচ্ছিল্য করে। এর স্বপক্ষে প্রমাণাদি সতর্ক করে যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে কঠোর হুঁশিয়ারি রয়েছে সেই ব্যক্তির জন্য, যে কথা ও লেখায় আরবির ওপর ফারসি ভাষাকে বেছে নেয়। এ বিষয়ে আমরা কিছু হাদীস বর্ণনা করেছি। তন্মধ্যে একটি হলো:
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده تالف، إسماعيل بن عمرو - وهو البجلي - ضعيف، ومحمد بن الفضل - وهو ابن عطية العبسي - متهم بالكذب، وقال الذهبي في "التلخيص": متهم، وأظن الحديث موضوعًا. قلنا: تقدم تخريجه والكلام عليه في الرواية السابقة.
7177 - ما حدثني أبو عمرو سعيد بن القاسم بن العلاء المُطوِّعي، حدثنا أحمد بن الليث بن الخليل، حدثنا إسحاق بن إبراهيم الحَريري ببَلْخ، حدثنا عُمر بن هارون، حدثنا أسامة بن زيد اللَّيثي، عن نافع، عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن أحسنَ منكم أن يتكلَّمَ بالعربية، فلا يتكلمَنَّ بالفارسيَّة، فإنه يُورِثُ النِّفاقَ" [1]. ومنها:
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে যে কেউ ভালোভাবে আরবিতে কথা বলতে পারে, সে যেন ফারসি ভাষায় কথা না বলে, কেননা তা নিফাক (কপটতা) সৃষ্টি করে।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده تالف، أحمد بن الليث بن الخليل لم نقف له على ترجمة، وذكره ابن منده في "فتح الباب" (1131) فيمن كنيته أبو بكر، وإسحاق بن إبراهيم ذكره ابن حبان في "الثقات" 8/ 108، ووقع فيه: الجزيري، وإنما ينسب للجزيرة جزري كما هو معروف، وهو أيضًا بلخي لا جزري، لكن أفاد محققه أنه في نسخة: الحريزي، وقال ابن حبان: يروي عن الثوري بنسخة مستقيمة، وذكره ابن منده في "فتح الباب" (214) ووقع عنده: الحَريري بالحاء المهملة، وهو الموافق لنسخنا الخطية، وأما عمر بن هارون - وهو ابن يزيد البلخي - فمتروك الحديث، واتهمه ابن معين بالكذب وبه أعلَّه الذهبيُّ في "التلخيص"، فقال: عمر كذَّبه ابن معين، وتركه الجماعة، وقال ابن كثير في "مسند عمر": موضوع، وقال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 9/ 333: سنده واهٍ.وأخرجه أبو سعيد النقاش في "ثلاثة مجالس من أماليه" (3) عن إسرائيل بن عبد الله الطرازي، عن سعيد بن القاسم بن العلاء، بهذا الإسناد. وقال عقبه: لا أعلم أحدًا رواه عن أسامة غير عمر بن هارون البلخي.ومن طريق سعيد بن القاسم أورده ابن تيمية في "اقتضاء الصراط المستقيم" 1/ 523 من طريق الحافظ السلفي.وأورده ابن تيمية أيضًا 1/ 524، وابن كثير في "مسند عمر" (677) من طريق محمد بن الحسن بن محمد المقرئ، عن أحمد بن الخليل به. ووقع عند ابن كثير زيادة: عن عمر! وقال ابن تيمية عقبه: وهذا الكلام يشبه كلام عمر بن الخطاب، وأما رفعه فموضع تبيُّن. وقال ابن كثير: غريب منكر، بل موضوع مكذوب، والصحيح أنه من قول عمر.
7178 - ما حدثنا أبو عبد الرحمن محمد بن عبد الله البَيرُوتي، حدثنا أبو فَرْوة، حدثني أبي، حدثني طلحة بن زيد، عن الأوزاعي، عن يحيى بن أبي كَثير، عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن تكلَّمَ بالفارسيّةِ زادَتْ في خِبِّه [1] ونَقَصَت من مُرُوءَتِه" [2].
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি ফারসি ভাষায় কথা বলে, তার ধূর্ততা বৃদ্ধি পায় এবং তার মান-সম্মান হ্রাস পায়।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في (ز) و (ب): خبثه، وفي (م) و (ص): حبه، ويغلب على ظننا أنَّ ما أثبتناه هو الصواب، فالخِبُّ، بكسر الخاء وتشديد الباء الموحدة: هو الخِداع والخُبث والغِشُّ كما في "القاموس" (خبب).
[2] إسناده تالف، محمد بن يزيد بن سنان والد أبي فروة - وهو يزيد - ليس بالقوي، وشيخه طلحة بن زيد - وهو القرشي الرقي - متهم بالكذب، وقال ابن عدي: وهذا الحديث بهذا الإسناد باطل، وقال الذهبي في "التلخيص": ليس بصحيح، إسناده واهٍ، بمرة، وقال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 9/ 333: إسناده واهٍ.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 4/ 109 - ومن طريقه ابن الجوزي في "الموضوعات" (1487) - عن عبد الله بن إسحاق المدائني والحسين بن محمد بن أبي معشر، كلاهما عن أبي فروة يزيد بن محمد بهذا الإسناد.