হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7199)


7199 - أخبرني عبد الله بن محمد بن موسى العَدْل، حدثنا محمد بن أيوب، أخبرنا يزيد بن عبد العزيز الطَّيالسي، حدثنا خالد بن عبد الله الواسطي، عن حسين بن قيس الرَّحَبي، عن عِكْرمة، عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن استعملَ رجلًا من عِصابة، وفي تلك العِصابة مَنْ هو أرضَى لله منه، فقد خانَ الله وخانَ رسولَه وخانَ المؤمنين" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি কোনো দলের মধ্য থেকে এমন ব্যক্তিকে (নেতা বা কর্মচারী হিসাবে) নিযুক্ত করে, অথচ সেই দলের মধ্যে এমন ব্যক্তি বিদ্যমান আছে যে তার চেয়েও আল্লাহর কাছে অধিক সন্তুষ্টির (বা পছন্দনীয়), তাহলে সে আল্লাহ্‌র সাথে, তাঁর রাসূলের সাথে এবং মুমিনদের সাথে বিশ্বাসঘাতকতা করল।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، حسين بن قيس الرحبي المعروف بحنش متروك.وأخرجه ابن أبي عاصم في "السنة" (1462)، وابن عدي في "الكامل" 2/ 352، وأبو القاسم بن بشران في "أماليه" (1162)، من طريق وهب بن بقية والعقيلي في "الضعفاء" (329) من طريق عفّان بن مسلم، كلاهما عن خالد بن عبد الله، بهذا الإسناد.وأخرجه وكيع في "أخبار القضاة" 1/ 68، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 53/ 256 من طريق إسماعيل بن عياش، عن حسين بن قيس، به ورواية ابن عساكر مطولة.لكن قد جاء من طريقين آخرين عن عكرمة يشد أحدهما الآخر، فيحتمل بهما التحسين، فقد أخرج نحوه البيهقي 10/ 118 من طريق عثمان بن صالح، عن ابن لهيعة، عن يزيد بن أبي حبيب، عن عكرمة، به. بلفظ: "من استعمل عاملًا من المسلمين وهو يعلم أنَّ فيهم أولى بذلك منه، وأعلم بكتاب الله وسنة نبيه، فقد خان الله ورسوله وجميع المسلمين". وابن لهيعة في حفظه سوء.كما أخرجه الخطيب في "تاريخه" 6/ 592 من طريق إبراهيم بن زياد القرشي، عن خصيف بن عبد الرحمن، عن عكرمة به مطولًا. وسنده ضعيف، إبراهيم بن زياد وخصيف ضعيفان.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 11/ (11216) ومن طريقه الشجري في "ترتيب الأمالي الخميسية" (2586) من طريق حمزة بن أبي حمزة الجزري النصيبي، عن عمرو بن بن دينار، عن ابن عباس، به ضمن حديث مطول. وحمزة متروك متهم، فلا يفرح به.وانظر ما بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7200)


7200 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق، حدثنا عبد الله بن الحسن بن أحمد الحَرَّاني، حدثنا جَدِّي، حدثنا موسى بن أعيَن، عن بكر بن حُنَيس [1]، عن رجاء بن حَيْوة، عن جُنادة بن أبي أُمية، عن يزيد بن أبي سفيان، قال: قال لي أبو بكر الصِّديِّق حين بعثني إلى الشام: يا يزيدُ إنَّ لك قرابةً عَسَيتَ أن تُؤثرَهم بالإمارة، ذلك أكثرُ ما أخافُ عليك، فقد قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَنْ وَلِيَ من أمر المسلمين شيئًا، فأمَّرَ عليهم أحدًا محاباةً [2]، فعليه لعنةُ الله، لا يَقبَلُ اللهُ منه صرفًا ولا عَدْلًا حتى يُدخِلَه جهنَّمَ" [3].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইয়াযীদ ইবনু আবী সুফিয়ান থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে শামের (সিরিয়ার) উদ্দেশ্যে প্রেরণ করলেন, তখন তিনি আমাকে বললেন: “হে ইয়াযীদ! তোমার কিছু আত্মীয়-স্বজন আছে। আশঙ্কা হয়, তুমি তাদেরকেই নেতৃত্ব দেওয়ার ক্ষেত্রে অগ্রাধিকার দেবে। তোমার ব্যাপারে আমি সবচেয়ে বেশি এই বিষয়টিই ভয় করি। কেননা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ‘যে ব্যক্তি মুসলমানদের কোনো দায়িত্ব গ্রহণ করল, অতঃপর (শুধুমাত্র) পক্ষপাতিত্বের বশে তাদের উপর কাউকে নেতা বা কর্মকর্তা নিযুক্ত করল, তার উপর আল্লাহর অভিশাপ। আল্লাহ তার কাছ থেকে কোনো নফল কিংবা ফরয (ইবাদত) কবুল করবেন না, যতক্ষণ না তিনি তাকে জাহান্নামে প্রবেশ করান।’”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: حنش. ونسب فيها: الجزار، وانظر التعليق على سند الحديث (2219).



[2] المثبت من "مسند أحمد"، وفي نسخنا الخطية: محاماة! ونسب فيها: الجزار، وانظر التعليق على سند الحديث (2219).



7200 [3] - إسناده ضعيف لضعف بكر بن خنيس، وبه أعلَّه الذهبي في "تلخيصه".وأخرجه أحمد 1/ (21) من طريق بقية بن الوليد، عن شيخ قرشي، عن رجاء بن حيوة، بهذا الإسناد، مطولًا. وهذا إسناد ضعيف أيضًا لإبهام الشيخ القرشي، وبقية ليس بذاك القوي. ونسب فيها: الجزار، وانظر التعليق على سند الحديث (2219).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7201)


7201 - أخبرني أبو عَوْن محمد بن أحمد بن ماهان البزَّار [1] بمكة حرسها الله تعالى على الصَّفا، حدثنا محمد بن علي بن زيد، حدثنا سعيد بن منصور، حدثنا شَريك، عن سِماك بن حرب، عن حَنَش، عن علي قال: بَعَثَني رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى اليمن، فقلتُ: تَبعَثُني إلى قوم ذَوِي أسنانٍ وأنا حَدَثُ السِّنِّ؟! قال: "إذا جلس إليك الخَصْمَانِ، فلا تقضِ لأحدِهما حتى تسمعَ من الآخر كما سمعتَ من الأول". قال عليٌّ: فما زلتُ قاضيًا [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে ইয়েমেনে প্রেরণ করলেন। আমি বললাম: আপনি কি আমাকে এমন এক সম্প্রদায়ের নিকট পাঠাচ্ছেন যারা প্রবীণ এবং আমি অল্পবয়স্ক? তিনি বললেন: "যখন তোমার সামনে দুইজন বিবাদকারী বসবে, তখন তুমি তাদের একজনের পক্ষে ফায়সালা দেবে না, যতক্ষণ না তুমি অন্যজনের বক্তব্য প্রথমজনের বক্তব্য শোনার মতো করেই শোনো।" আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর থেকে আমি সফলতার সাথে বিচার কাজ পরিচালনা করেছি।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] كذا وقع في نسخنا الخطية، وهو تحريف فيما نرى، وقد تكرر عند المصنف في عدة مواضع، ونسب فيها: الجزار، وانظر التعليق على سند الحديث (2219).



[2] حسن لغيره، شريك - هو ابن عبد الله النخعي - وحنش - وهو ابن المعتمر - وإن كانا فيهما ضعف متابعان.وأخرجه أبو داود (3582) عن عمرو بن عون، والنسائي (8366) من طريق أحمد بن سليمان كلاهما عن شريك بن عبد الله، بهذا الإسناد وفيه زيادة، وهذه الزيادة سلفت مفردة عند المصنف برقم (4709)، وانظر ما سلف أيضًا برقم (7179).وأخرجه أحمد 2 / (690) من طريق زائدة، عن سماك، به.وأخرجه بنحوه مطولًا ابن حبان (5065) من طريق أسباط بن نصر، عن سماك، عن عكرمة، عن ابن عباس، عن علي، به.وأخرجه وكيع في "أخبار القضاة" 1/ 87 من طريق أبي جحيفة السوائي، عن علي، به. وفيه الزيادة المذكورة. وأخرجه ابن ماجه (2312) من طريق محمد بن بلال، عن عمران القطان، عن حسين بن عمران، عن أبي إسحاق الشيباني، به. فزاد محمدُ بن بلال بين عمران والشيباني حسينًا، ومحمد هذا قالوا في ترجمته: يغرب عن عمران، وطريق عمرو بن عاصم أصح.وانظر في أحاديث الباب "سنن ابن ماجه".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7202)


7202 - أخبرنا أزهر بن حَمدُون المُنادي ببغداد، حدثنا أبو قِلابة، حدثنا عمرو بن عاصم الكِلابي، حدثنا أبو العوام، عن أبي إسحاق الشَّيباني، عن ابن أبي أَوفى قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ""إِنَّ الله مع القاضي ما لم يَجُرْ، فإذا جارَ تَبَرّأَ اللهُ عز وجل منه" [1]. أبو العوام هذا: عِمران بن داوَرَ [2] القطَّان، والإسناد صحيح، ولم يُخرجاه.




ইবনু আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “নিশ্চয় আল্লাহ বিচারকের সঙ্গে থাকেন যতক্ষণ না সে জুলুম করে। যখন সে জুলুম করে, তখন মহান আল্লাহ তার থেকে সম্পর্ক ছিন্ন করে নেন।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده حسن من أجل أبي العوام عمران بن داور القطّان أبو قلابة: هو عبد الملك بن محمد الرقاشي، وأبو إسحاق الشيباني: هو سليمان أبي سليمان بن فيروز الكوفي.وأخرجه الترمذي (1330)، وابن حبان (5062) من طريق عمرو بن عاصم، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: غريب لا نعرفه إلّا من حديث عمران القطان. وأخرجه ابن ماجه (2312) من طريق محمد بن بلال، عن عمران القطان، عن حسين بن عمران، عن أبي إسحاق الشيباني، به. فزاد محمدُ بن بلال بين عمران والشيباني حسينًا، ومحمد هذا قالوا في ترجمته: يغرب عن عمران، وطريق عمرو بن عاصم أصح.وانظر في أحاديث الباب "سنن ابن ماجه".



[2] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: داود.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7203)


7203 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا أبو عُتبة أحمد [1] بن الفرج، حدثنا بقيّة بن الوليد، عن يزيد بن أبي مريم، عن القاسم بن مُخيمِرة، عن أبي مريم صاحب رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن وَلِيَ من أمر المسلمين شيئًا فاحتجب دونَ خَلَّتِهم وحاجتِهم وفقرهِم، وفاقَتِهم، احتجبَ اللهُ عز وجل يوم القيامة دون خَلَّتِه وفاقتِه وحاجتِه وفقرِه" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، وإسناده شاميٌّ صحيح.وله شاهدٌ بإسناد البصريين صحيح عن عَمرو بن مُرَّة الجُهَني عن رسول الله صلى الله عليه وسلم:




আবু মারইয়াম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি মুসলমানদের কোনো বিষয়ের (ক্ষমতা বা দায়িত্বের) ভার গ্রহণ করে, এবং তাদের অভাব, প্রয়োজন, দারিদ্র্য ও চরম দুর্গতি থেকে নিজেকে আড়াল করে রাখে, আল্লাহ আযযা ওয়া জালও কিয়ামতের দিন তার চরম অভাব, দুর্গতি, প্রয়োজন ও দারিদ্র্য থেকে নিজেকে আড়াল করে রাখবেন।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: محمد، وقد تكرر عند المصنف في غير موضع على الصواب وانظر ترجمته في "تاريخ بغداد" 5/ 558، و "تاريخ الإسلام" 6/ 491.



[2] حديث صحيح إن كان القاسم بن مخيمرة سمع من أبي مريم صحابيِّ الحديث، فقد قال ابن معين: لم نسمع أنه سمع من أحد من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم. وأبو مريم: هو الأزدي كما جاء منسوبًا في بعض مصادر التخريج، وقد اختلف فيه قول أهل العلم: هل هو عمرو بن مرة، أم هما اثنان، وممَّن جعلهما اثنين المصنف، فأورد لهذا الحديث شاهدًا وهو الحديث التالي، وانظر القول في ذلك في "مسند أحمد" 24/ (15651).وأحمد بن الفرج وبقية بن الوليد - وإن كانا فيهما ضعف - متابعان.وأخرجه أبو داود (2948)، والترمذي (1333) من طريق يحيى بن حمزة، عن يزيد بن بن أبي مريم، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (15651) من طريق أبي الشمّاخ الأزدي، عن ابن عم له من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، فذكر نحوه. وانظر ما بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7204)


7204 - أخبرَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أبو المثنى، حدثنا محمد بن عبد الله الخُزاعي، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن علي بن الحَكَم، عن أبي حسن، عن عمرو بن مُرَّة قال: قلتُ لمعاوية بن أبي سفيان: إني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن أغلقَ بابَه دونَ ذوي الحاجةِ والخَلَّةِ والمَسْكنة، أغلقَ الله بابَ السماء دون خَلَّتِهِ [وحاجتِه] [1] وفقرِه ومَسْكَنتِه" [2]




আমর ইবনে মুররাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি মুআবিয়া ইবনে আবি সুফিয়ানকে বললাম যে, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি অভাবী, প্রয়োজনগ্রস্ত ও দরিদ্রদের জন্য তার ঘরের দরজা বন্ধ করে দেয়, আল্লাহ তা'আলাও তার অভাব, প্রয়োজন, দরিদ্রতা ও অসহায়ত্বের সময় তার জন্য আকাশের দরজা বন্ধ করে দেন।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] زيادة من "تلخيص الذهبي" ليست في نسخنا الخطية.



[2] إسناده ضعيف لجهالة أبي حسن - وهو الجزري - فقد قال ابن المديني: مجهول ولا أدري سمع من عمرو بن مرة أم لا. قلنا: وإنما صحَّحه الحاكم لكونه توهم أنَّ أبا حسن الجزري هذا هو عبد الحميد بن عبد الرحمن الذي سبق أن وثَّقه في الرواية السالفة برقم (621)، وانظر التعليق عليه هناك. أبو المثنى: هو معاذ بن المثنى العَنبَري.وأخرجه أحمد 29 / (18033)، والترمذي (1332) من طريق إسماعيل بن إبراهيم، عن علي بن الحكم، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7205)


7205 - أخبرني الحسن بن حَليم [1] المروزي، أخبرنا أبو الموجِّه، أخبرنا عَبْدانُ، أخبرني مصعب بن ثابت بن عبد الله بن الزُّبير، عن أبيه: أنَّ أباه عبد الله بن الزُّبير كانت بينه وبين أخيه عمرو بن الزُّبير خُصومةٌ، فدخل عبدُ الله بن الزُّبير على سعيد بن العاص وعمرُو بن الزُّبير معه على السرير، فقال سعيدٌ لعبد الله: هاهنا قال: لا، قضاءُ رسولِ الله وسنةُ رسول الله صلى الله عليه وسلم: أَنَّ الخصمين يَقعدانِ بين يَدَي الحاكم [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর এবং তাঁর ভাই আমর ইবনুয যুবাইরের মধ্যে একটি বিবাদ চলছিল। অতঃপর আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবাইর সাঈদ ইবনুল আসের নিকট প্রবেশ করলেন, যখন আমর ইবনুয যুবাইর তাঁর (সাঈদের) সাথে পালঙ্কে বসে ছিলেন। সাঈদ আব্দুল্লাহকে বললেন, ‘এখানে (এসে বসুন)?’ তিনি (আব্দুল্লাহ) বললেন, ‘না, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বিচার এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাত হলো এই যে, বাদী-বিবাদী উভয়কে বিচারকের সামনে বসতে হবে।’

এই হাদীসটির সনদ সহীহ, কিন্তু তারা (বুখারী ও মুসলিম) এটি উদ্ধৃত করেননি।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: حكيم، وقد تكررت رواية المصنِّف عنه كثيرًا.



[2] إسناده ضعيف لضعف مصعب بن ثابت. أبو الموجِّه: هو محمد بن عمرو الفزاري، وعبدان هو عبد الله بن عثمان بن جبلة.وأخرجه أحمد 26/ (16104)، وأبو داود (3588) من طريق عبد الله بن المبارك، عن مصعب بن ثابت، عن عبد الله بن الزبير، بإسقاط ثابت.وانظر تتمة الكلام عليه في "مسند أحمد".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7206)


7206 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثنا محمد بن عبد الله بن نُمير، حدثنا أبو معاوية، عن الأعمش، عن القاسم، عن أبيه، عن عبد الله قال: من عَرَضَ له قضاءٌ فليقضِ بما في كتاب الله، فإن جاءه أمرٌ ليس في كتاب الله فليقضِ بما قضى به نبيُّه، فإن جاءه أمرٌ ليس في كتاب الله عز وجل ولم يقضِ به نبيُّه صلى الله عليه وسلم، فليقضِ بما قاله الصالحون، فإن جاءه أمرٌ ليس في كتاب الله ولم يقض به نبيُّه صلى الله عليه وسلم ولم يقضِ به الصالحون فليَجتهِدْ رأيَه، فإن لم يُحسِنُ، فليُقِرَّ ولا، يستحيي [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.والقاسم: هو ابن عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود.




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যার সামনে কোনো বিচার (ক্বাদা) পেশ করা হয়, সে যেন কিতাবুল্লাহ (আল্লাহর কিতাব) অনুসারে ফয়সালা করে। অতঃপর যদি এমন কোনো বিষয় আসে যা আল্লাহর কিতাবে নেই, তবে সে যেন তার নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ফয়সালা অনুসারে ফয়সালা করে। আর যদি এমন কোনো বিষয় আসে যা আল্লাহ তাআলার কিতাবে নেই এবং নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-ও সে বিষয়ে ফয়সালা দেননি, তবে সে যেন নেককার ব্যক্তিরা (সালেহুন) যা বলেছেন তা অনুসারে ফয়সালা করে। যদি এমন কোনো বিষয় আসে যা আল্লাহর কিতাবে নেই, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-ও ফয়সালা দেননি এবং নেককার ব্যক্তিরাও ফয়সালা দেননি, তবে সে যেন তার নিজস্ব মতামতের ভিত্তিতে ইজতিহাদ (গবেষণামূলক সিদ্ধান্ত) করে। কিন্তু যদি সে (ইজতিহাদ) উত্তমভাবে করতে না পারে, তবে সে যেন (নিজের অক্ষমতা) স্বীকার করে নেয় এবং লজ্জা না পায়।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] رجاله ثقات القاسم: هو ابن عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود، وأبوه عبد الرحمن قد اختلف في سماعه من أبيه عبد الله بن مسعود.كما اختلف فيه على الأعمش كما سيأتي في التخريج.وأخرجه ابن أبي شيبة 7/ 242 عن يحيى بن أبي زائدة، والدارمي (173) من طريق جرير بن عبد الحميد، وابن عبد البر في "جامع بيان العلم" (1599) من طريق أبي معاوية محمد بن خازم، ثلاثتهم عن الأعمش، بهذا الإسناد.وأخرج نحوه مختصرًا عبد الرزاق (15295)، والطبراني 9 / (8921)، والخطيب في "الفقيه والمتفقه" (538) من طريق عبد الرحمن المسعودي، عن القاسم بن عبد الرحمن، عن ابن مسعود. ليس فيه عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود.وأخرجه بنحوه ابن أبي شيبة 4/ 544، والنسائي في "المجتبى" (5397) من طريق أبي معاوية، وابن أبي شيبة 7/ 241 عن يحيى بن أبي زائدة، والدارمي (172) من طريق أبي عوانة، والطبراني في "الكبير" 9/ (8920)، والبيهقي 10/ 115 من طريق سفيان الثَّوري، وابن عبد البر (1597) من طريق عبد الواحد بن زياد، خمستهم عن الأعمش، عن عمارة بن عمير، عن عبد الرحمن بن يزيد النخعي، عن ابن مسعود وقال النسائي عقبه: هذا الحديث جيد جيد.ووقع في رواية الطبراني والبيهقي: وربما قال: عن حريث بن ظهير، يعني بدل عبد الرحمن بن يزيد النخعي، قلنا: وهذه الطريق أخرجها الدارمي (167)، والنسائي (5398) من طريق سفيان الثوري، والدارمي (171)، والبيهقي 10/ 115 من طريق شعبة، كلاهما عن الأعمش، عن عمارة بن عمير، عن حرث بن ظهير، عن ابن مسعود. وحريث بن ظهير تفرَّد بالرواية عنه عمارة، ووصفه بالجهالة الذهبي وابن حجر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7207)


7207 - أخبرنا الحسن بن يعقوب العدل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا عبد الوهاب بن عطاء، أخبرنا سعيد بن أبي عَروبة، عن قَتَادة، عن سعيد بن أبي بُرْدة، عن أبيه، عن جَدِّه أبي موسى: أنَّ رجلينِ ادَّعَيا بعيرًا أو دابَّةً إلى النبي صلى الله عليه وسلم، وليس لواحدٍ منهما بيِّنةٌ، فجعله النبيُّ صلى الله عليه وسلم بينَهما [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.وقد خالف همَّامُ بن يحيى بن سعيدَ بن أبي عَروبة في متن هذا الحديث:




আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, দুই ব্যক্তি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে একটি উট বা একটি পশুর দাবি করে বসল। তাদের কারো কাছে কোনো প্রমাণ ছিল না। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেটিকে তাদের উভয়ের মধ্যে ভাগ করে দিলেন।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث مُعَلٌّ عند أهل الحديث مع الاختلاف في إسناده على قتادة، كما أن أبا بردة لم يسمعه من أبيه أبي موسى كما بيَّناه في تعليقنا على "مسند أحمد".وأخرجه أحمد 32 / (19603)، وأبو داود (3613) و (3614)، وابن ماجه (2330)، والنسائي (5955) من طريق عن سعيد بن أبي عروبة، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (5954) من طريق محمد بن كثير، عن حماد بن سلمة، عن قتادة، عن النَّضر بن أنس، عن أبي بردة، عن أبي موسى، بنحو رواية همام التالية عند المصنف. قال النسائي عقبه: خطأ ومحمد بن كثير هذا هو المصيصي، وهو صدوق إلّا أنه كثير الخطأ. قلنا: محمد بن كتير متابع، لما بيناه في تعليقنا على "المسند". وانظر ما بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7208)


7208 - أخبرَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن أيوب (ح)وأخبرني أبو الوليد وأبو بكر بن قُرَيش، حدثنا الحسن بن سفيان، حدثنا هُدْبة بن خالد، حدثنا همَّام بن يحيى، عن قَتَادة، عن سعيد بن أبي بُرْدة، عن أبيه، عن أبي موسى: أنَّ رجلينِ ادَّعيا بعيرًا، فأقام كلُّ واحدٍ منهما شاهدَينِ، فقسمه النبيُّ صلى الله عليه وسلم بينَهما [1].وهذا الحديث أيضًا صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবু মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, দুজন লোক একটি উটের মালিকানা দাবি করল। অতঃপর তাদের প্রত্যেকেই দুজন করে সাক্ষী পেশ করল। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সেটিকে তাদের উভয়ের মধ্যে ভাগ করে দিলেন।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث مُعَلٌّ كما سبق.وأخرجه أبو داود (3615) من طريق حجاج بن منهال، عن همام بن يحيى، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7209)


7209 - أخبرنا الحسن بن حَلِيم [1] المروزي، حدثنا أبو المُوجِّه، أخبرنا عَبْدان، أخبرنا عبد الله، أخبرني أسامة بن زيد [عن] [2] مولى أمِّ سَلَمة، عن أمِّ سَلَمة قالت: أتى رجلان النبيِّ صلى الله عليه وسلم يَتَدارآنِ في مواريثَ بينهما، ليس لهما بيّنةٌ، فأمرهما النبيُّ صلى الله عليه وسلم أن يقتسما ويتوخَّيا، ثم يَستَهما، ولْيُحلِلْ كلُّ واحدٍ منهما صاحبَه [3].صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.ومولى أمٍّ سَلمة: هو عُبيد الله بن أبي رافع المخرَّج في "الصحيحين".




উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: দু’জন লোক নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এল, যারা তাদের মধ্যকার উত্তরাধিকার সম্পত্তি নিয়ে বিবাদে লিপ্ত ছিল এবং তাদের কোনো প্রমাণ ছিল না। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের দু'জনকে নির্দেশ দিলেন যে, তারা যেন তা ভাগ করে নেয় এবং তারা যেন সতর্কর্তা অবলম্বন করে (বা ইনসাফের চেষ্টা করে), এরপর তারা যেন লটারির আশ্রয় নেয় এবং তাদের প্রত্যেকে যেন তাদের অপর সাথীর জন্য হালাল করে দেয় (বা তাকে দায়মুক্ত করে)।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: حكيم. أسامة بن زيد، حيث سمَّى مولى أم سلمة عُبيدَ الله بن أبي رافع، والصوابُ رواية الجمهور عن أسامة بن زيد أنَّ اسمه عَبد الله بن رافع، كما تقدَّم في تخريج الحديث السابق.



[2] سقط من نسخنا الخطية، واستدرك من مصادر التخريج. أسامة بن زيد، حيث سمَّى مولى أم سلمة عُبيدَ الله بن أبي رافع، والصوابُ رواية الجمهور عن أسامة بن زيد أنَّ اسمه عَبد الله بن رافع، كما تقدَّم في تخريج الحديث السابق.



7209 [3] - إسناده حسن من أجل أسامة بن زيد: وهو الليثي، ومولى أم سلمة: هو عبد الله بن رافع، جاء مسمّى في مصادر التخريج، وليس هو عُبيدَ الله بن أبي رافع كما ذهب إليه المصنِّف بناءً على ما أورده في الرواية التالية.أبو الموجِّه: هو محمد بن عمرو الفزاري، وعبدان: هو عبد الله بن عثمان بن جَبَلة، وعبد الله: هو ابن المبارك.وأخرجه بنحوه أبو داود (3584) عن الربيع بن نافع، عن ابن المبارك، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 44 / (26717) عن وكيع، وأبو داود (3585) من طريق عيسى بن يونس، كلاهما عن أسامة بن زيد، به. أسامة بن زيد، حيث سمَّى مولى أم سلمة عُبيدَ الله بن أبي رافع، والصوابُ رواية الجمهور عن أسامة بن زيد أنَّ اسمه عَبد الله بن رافع، كما تقدَّم في تخريج الحديث السابق.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7210)


7210 - حدثنا أبو نصر أحمد بن سهل الفقيه ببخاري، حدثنا صالح بن محمد بن حبيب الحافظ، حدثنا محمد بن أبي بكر وأحمد بن المِقدام، قالا: حدثنا الفُضيل بن سليمان، حدثنا أسامة بن زيد، حدثني عُبيد الله بن أبي رافع مولى أمِّ سَلَمة، قال: سمعتُ أمَّ سَلَمةَ تقول: كنتُ عند النبيِّ صلى الله عليه وسلم فجاءه رجلانِ يختصمانِ في ميراثٍ بينهما، وليس لواحدٍ منهما بينِّةٌ، وقال كلُّ واحدٍ منهما لصاحبه: يا رسول الله، حَقِّي هذا الذي طلبتُه لفلان، قال: "لا، ولكن اذهبا فتَوخَّيا ثم استَهِما، ثم اقسِما، ثمَّ لْيُحلِلْ كلُّ واحدٍ منكما صاحبَه" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম, তখন তাঁর কাছে দুইজন লোক আসলেন, যারা তাদের মাঝে থাকা একটি উত্তরাধিকার (সম্পত্তি) নিয়ে ঝগড়া করছিল এবং তাদের কারও কাছেই কোনো প্রমাণ (সাক্ষ্য) ছিল না। তাদের প্রত্যেকেই তাদের সাথীকে উদ্দেশ্য করে বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ, আমি যে জিনিসের দাবি করছি, এই অধিকার তো অমুকের জন্য। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না (এমন করো না), বরং তোমরা উভয়ে যাও এবং (সঠিক অংশ) অনুমান করো, এরপর লটারি করো, তারপর ভাগ করে নাও। এরপর তোমাদের প্রত্যেকেই যেন তার সাথীকে দায়মুক্ত করে দেয়।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف، الفضيل بن سليمان - وهو النميري - ليِّن، وقد خالف جميعَ من رواه عن أسامة بن زيد، حيث سمَّى مولى أم سلمة عُبيدَ الله بن أبي رافع، والصوابُ رواية الجمهور عن أسامة بن زيد أنَّ اسمه عَبد الله بن رافع، كما تقدَّم في تخريج الحديث السابق.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7211)


7211 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا عبد الوارث، عن عطاء بن السائب، عن أبي يحيى، عن ابن عباس: أنَّ رجلًا ادَّعى عند رجل حقًّا، فاختَصَما إلى نبي الله صلى الله عليه وسلم، فسأله البيِّنةَ، فقال: ما عندي بيِّنةٌ، فقال للآخر: "احلِفْ"، فحَلَفَ فقال: والله ما له عندي شيء، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "بَلَى، هو عندَك، ادفع إليه حقَّه" ثم قال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "شهادتُك بأنْ لا إله إلَّا اللهُ كفّارةٌ ليمينِك" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন ব্যক্তি আরেকজনের কাছে তার পাওনা হক দাবি করল। অতঃপর তারা আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে মোকদ্দমা নিয়ে আসলো। তিনি (নবী) তার কাছে প্রমাণ চাইলেন। সে বলল: আমার কাছে কোনো প্রমাণ নেই। অতঃপর তিনি অন্যজনকে বললেন: "শপথ করো।" সে শপথ করে বলল: আল্লাহর কসম! আমার কাছে তার কিছুই পাওনা নেই। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "অবশ্যই, তা তোমার কাছে আছে। তার পাওনা হক তাকে পরিশোধ করে দাও।" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তোমার 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' সাক্ষ্য দেওয়াটা তোমার শপথের কাফফারা হবে।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] ضعيف لاضطراب عطاء بن السائب في متنه وسنده، وتفرّده به، وقد عدَّ الإمام الذهبي هذا الحديث في "ميزان الاعتدال" 3/ 72 من مناكيره.أبو يحيى: اسمه زياد المكي الأعرج مولى قيس بن مخرمة.وأخرجه أحمد 4 / (2280)، وأبو داود (3275) من طريق حماد بن سلمة، عن عطاء بن السائب، بهذا الإسناد. ولفظه: أنَّ رجلين اختصما إلى النبي صلى الله عليه وسلم فسأل النبي صلى الله عليه وسلم المدَّعِي البينةَ، فلم تكن له بيّنة، فاستحلف المطلوب، فحلف بالله الذي لا إله إلّا هو، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنك قد فعلتَ، ولكن غُفر لك بإخلاصك قول: لا إله إلّا الله".وأخرجه أحمد (2695) و (2956) من طريق شريك النخعي، عن عطاء، به. بلفظ: اختصم إلى النبي صلى الله عليه وسلم رجلان، فوقعت اليمين على أحدهما، فحلف بالله الذي لا إله إلّا هو ما له عنده شيء، قال: فنزل جبريل على النبي صلى الله عليه وسلم فقال: إنه كاذب، إنَّ له عنده حقّه، فأمره أن يعطيه حقه، وكفارة يمينه، وكفارة يمينه معرفته أن لا إله إلّا الله، أو شهادته.وأخرجه النسائي (5963) من طريق سفيان الثوري، عن عطاء. به. وفيه: فقال للآخر: "احلِفْ" فحلف: اللهِ الذي لا إله إلّا هو، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "ادفع حقَّه وستكفِّرُ عنك لا إله إلّا الله ما صنعتَ".وأخرجه أبو داود (3620) مختصرًا، والنسائي (5964) تامًّا من طريق أبي الأحوص سلّام بن سليم، عن عطاء، به. وفيه: فقال النبي صلى الله عليه وسلم للمدعي: "أقم بينتك"، فقال: يا رسول الله، ليس لي بينة، فقال للآخر: "احِلفْ بالله الذي لا إله إلّا هو ما له عليك - أو عندك - شيء"، فحلف. وهذا اللفظ لا إشكال فيه. وأخرجه أحمد (26/ 16101)، والنسائي (5962) من طريق شعبة، عن عطاء بن السائب، عن أبي البختري، عن عبيدة، عن عبد الله بن الزبير، عن النبي صلى الله عليه وسلم: "أن رجلًا حلف بالله الذي لا إله إلّا هو كاذبًا، فغفر له". قال شعبة: من قِبَل التوحيد. فجعله من حديث ابن الزبير!وانظر حديث ابن عمر في "مسند أحمد" 9/ (5361).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7212)


7212 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الزاهد الأصبهاني، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى القاضي، حدثنا أبو نُعيم وأبو حذيفة، قالا: حدثنا سفيان، عن الحسن بن عمرو، عن محمد بن مسلم بن السائب [1]، عن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إذا رأيتَ أمَّتي تَهَابُ، فلا تقول للظالم: يا ظالمُ، فقد تُوُدِّعَ منهم" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, "যখন তুমি আমার উম্মতকে এমন দেখ যে, তারা কোনো জালিমকে (ভয়ে) 'ওহে জালিম' বলতেও ভয় পায়, তখন তাদের থেকে (আল্লাহর নিরাপত্তা ও সাহায্য) তুলে নেওয়া হয়েছে।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] هكذا هو في نسخنا الخطية، وهو وهم، فإنَّ محمد بن مسلم هذا هو ابن تَدرُس أبو الزبير المكي، وليس في اسم آبائه: السائب. وجاء على الصواب في مصادر التخريج. وعبد الله هذا الذي روى عنه: هو ابن عمرو بن العاص. ابن شعيب، عن جدِّ أبيه عبد الله بن عمرو. وعمرو لم يسمع من أبي جدِّه.وأخرجه البزار (2374) من طريق عبيد الله بن عبد الله الربعي، والعقيلي (1826)، والطبراني في "الكبير" (14314) من طريق النَّضر بن إسماعيل، كلاهما عن الحسن بن عمرو، عن مجاهد، عن ابن عمرو. قلنا: عبيد الله الربعي لم نعرفه، والنَّضر ضعيف.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (7825)، وابن عدي في 3/ 439 من طريق سنان بن هارون، عن الحسن بن عمرو، عن أبي الزبير، عن جابر، به. فجعله سنان من مسند جابر على الجادة، وسنان هذا ضعيف فكيف وقد خالف!



[2] إسناده ضعيف لانقطاعه، محمد بن مسلم - وهو أبو الزبير المكي - لم يسمع من عبد الله بن عمرو كما قال ابن معين وأبو حاتم وابن عدي، وقد أدخل أبو شهاب الحناط بينهما عمرَو بن شعيب كما سيأتي، وعمرو أيضًا لم يسمع من جدِّ أبيه عبد الله بن عمرو. أبو نعيم: هو الفضل بن دُكين، وأبو حذيفة: هو موسى بن مسعود النهدي، وسفيان: هو الثَّوري.وأخرجه أبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (634) من طريق أبي حذيفة وحده، عن سفيان الثَّوري، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 11 / (6776) عن إسحاق بن يوسف الأزرق، والبيهقي في "السنن الكبرى" 6/ 95، وفي "الشعب" (7140) من طريق عبيد الله بن موسى، والحارث بن أبي أسامة كما في "بغية الباحث" (7611)، والعقيلي في "الضعفاء" (1827) من طريق قبيصة بن عقبة، ثلاثتهم عن سفيان الثَّوري، به.وأخرجه أحمد (6521) عن ابن نمير، و (6784) عن عبد الرحمن بن محمد المحاربي، كلاهما عن الحسن بن عمرو، به.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 6/ 123، والبيهقي في "الكبرى" 6/ 95 وفي "الشعب" (7141) من طريق أبي شهاب عبد ربه بن نافع الحناط، عن الحسن بن عمرو. عن أبي الزبير، عن عمرو ابن شعيب، عن جدِّ أبيه عبد الله بن عمرو. وعمرو لم يسمع من أبي جدِّه.وأخرجه البزار (2374) من طريق عبيد الله بن عبد الله الربعي، والعقيلي (1826)، والطبراني في "الكبير" (14314) من طريق النَّضر بن إسماعيل، كلاهما عن الحسن بن عمرو، عن مجاهد، عن ابن عمرو. قلنا: عبيد الله الربعي لم نعرفه، والنَّضر ضعيف.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (7825)، وابن عدي في 3/ 439 من طريق سنان بن هارون، عن الحسن بن عمرو، عن أبي الزبير، عن جابر، به. فجعله سنان من مسند جابر على الجادة، وسنان هذا ضعيف فكيف وقد خالف!









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7213)


7213 - أخبرني محمد بن علي [1] بن دُحَيم الشَّيباني، حدثنا أحمد بن حازم الغِفاري، حدثنا مالك بن إسماعيل النَّهْدي، حدثنا الأجلح، عن الشَّعبي، عن عبد الله بن الخليل، عن زيد بن أرقم: أنَّ عليًّا بعثه النبيُّ صلى الله عليه وسلم إلى اليمن، فارتفع إليه ثلاثةٌ يتنازعون ولدًا، كلُّ واحد يَزعُمُ أنَّه ابنُه. قال: فخَلَا باثنين، فقال: أتَطيبانِ نَفْسًا لهذا الباقي بالولد؟ قالا: لا، وخَلَا باثنين، فقال لهما مثلَ ذلك، فقالا: لا، فقال: أُراكم شُركاءَ متشاكِسون [2] وأنا مُقرِعٌ بينكم، فأقرعَ بينهم فجعلَه لأحدِهم، وأغرَمَه ثُلُثَي الدِّيَة للباقين. قال: فذكر ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم، فضحك حتى بَدَتْ نَواجِذُه [3].قد أعرض الشيخان رضي الله عنهما عن الأجلح بن عبد الله الكِندي أصلًا، وليس في رواياته بالمتروك، فإنَّ الذي يُنقَم عليه به مذهبُه.




যায়দ ইবনু আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ইয়েমেনে প্রেরণ করেন। তখন তাঁর নিকট তিনজন লোক এল যারা একটি সন্তান নিয়ে বিতর্কে লিপ্ত ছিল। তাদের প্রত্যেকেই দাবি করছিল যে, সন্তানটি তার। তিনি (আলী) বলেন: তিনি তখন দু'জনকে আলাদা করে নিলেন এবং বললেন: তোমরা কি তোমাদের নিজেদের স্বতঃস্ফূর্তভাবে বাকি থাকা লোকটির জন্য সন্তানটিকে ছেড়ে দিতে প্রস্তুত? তারা দু'জন বলল: না। তিনি (আবার) দু'জনকে আলাদা করে নিলেন এবং তাদেরও অনুরূপ কথা বললেন। তারাও দু'জন বলল: না। তখন তিনি বললেন: আমি তোমাদেরকে বিবাদমান অংশীদার হিসেবে দেখতে পাচ্ছি। আর আমি তোমাদের মাঝে লটারী করব। অতঃপর তিনি তাদের মাঝে লটারী করলেন এবং লটারীর মাধ্যমে সন্তানটিকে তাদের একজনের জন্য নির্ধারণ করলেন, আর তাকে বাকি দুজনের জন্য দিয়াতের দুই-তৃতীয়াংশ জরিমানা করলেন। বর্ণনাকারী বলেন: তারপর বিষয়টি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করা হলো, তখন তিনি এমনভাবে হাসলেন যে তাঁর মাড়ির দাঁত দেখা গেল। ইমাম বুখারী ও ইমাম মুসলিম (রাহঃ) সম্পূর্ণরূপে আজলাহ ইবনু আব্দুল্লাহ আল-কিনদীর হাদিস বর্জন করেছেন, কিন্তু তাঁর বর্ণনাসমূহে তাঁকে পরিত্যক্ত (দুর্বল) বলা হয় না। কারণ তার বিরুদ্ধে যে কারণে দোষারোপ করা হয়, তা হলো তার মাযহাব (মতবাদ) সংক্রান্ত।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] جاء اسمه مقلوبًا في النسخ الخطية إلى: علي بن محمد، والتصويب من الأسانيد الأخرى عند المصنف.



[2] كذا في نسخنا الخطية، والجادة أن تكون منصوبة نعت منصوب للمفعول الثاني "شركاء".



7213 [3] - إسناده ضعيف لاضطرابه، وقد سلف بيانه برقم (2865).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7214)


7214 - حدثنا أبو الفضل محمد بن إبراهيم المزكِّي، حدثنا أحمد بن سَلَمة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا جَرير، عن منصور، عن مجاهد، عن يوسف مولى الزُّبير، عن عبد الله بن الزُّبير، قال: كانت جاريةٌ لزَمْعَةَ يَطَؤُها، وكانت تُظَنُّ برجلٍ آخرَ أنه يقع عليها، فمات زَمْعةُ وهي حاملٌ، فولدت غلامًا يُشبهُ الرجلَ الذي كان يُظَنُّ به [1]، فذكرت سَوْدةُ للنبي صلى الله عليه وسلم، فقال: "أما الميراثُ فله، وأما أنتِ فاحتَجِبي منه، فإنه ليس لك بأخٍ" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবন আয-যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যামআ'র একটি দাসী ছিল, যার সাথে তিনি সহবাস করতেন। ধারণা করা হত যে, অন্য একজন লোকও তার সাথে মিলিত হতো। এরপর যামআ' মারা গেলেন যখন দাসীটি গর্ভবতী ছিল। অতঃপর সে একটি ছেলে জন্ম দিল, যে সেই লোকটির মতো দেখতে হয়েছিল, যার সম্পর্কে (তার সাথে মিলিত হওয়ার) ধারণা করা হয়েছিল। তখন সাওদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ব্যাপারটি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করলেন। তিনি বললেন: "উত্তরাধিকারের ক্ষেত্রে, সে (শিশু) তার (যামআর) পাবে। আর তুমি, তার কাছ থেকে পর্দা করবে, কারণ সে তোমার ভাই নয়।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] كذا في نسخنا الخطية، والجادة: يظن بها، كما في بعض مصادر التخريج.



[2] حديث صحيح دون قوله: "فإنه ليس لك بأخٍ" وهذا إسناد ضعيف، يوسف مولى الزبير: هو ابن الزبير القرشي الأسدي مولاهم، وقد روى عنه اثنان ولم يؤثر توثيقه عن غير ابن حبان، وقال الحافظ: مقبول، وقد انفرد بهذه اللفظة، ولا يحتمل تفرده، وقد ضعفها بعضُ أهل العلم، كما بيَّناه في "مسند أحمد". جرير: هو ابن عبد الحميد، ومنصور: هو ابن المعتمر، ومجاهد: هو ابن جبر المكي.وقد أخرجه النسائي (5649) عن إسحاق بن إبراهيم بن راهويه، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 26/ (16127)، عن عبد الرزاق، عن سفيان الثَّوري، عن منصور، عن مجاهد، عن عبد الله بن الزبير، به. ليس فيه يوسف مولى ابن الزبير. وانظر تتمة الكلام عليه هناك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7215)


7215 - أخبرني الحسن بن حَليم المروَزي، أخبرنا أبو الموجِّه، أخبرنا عَبْدان، أخبرنا عبد الله، أخبرني ابن جُريج، أخبرنا زياد بن سعد، عن هِلال بن أسامة: أنَّ أبا ميمونة سُليمًا، من أهل المدينة رجلُ صِدْقٍ - قال: بينا أنا جالسٌ عند أبي هريرة جاءته امرأةٌ فارسية معها ابنٌ لها، وقد طلَّقها زوجُها، فقالت: يا أبا هريرة، ثم رَطَنَت فقالت بالفارسية: زوجي يريد أن يذهبَ بابني، قال: فجاء زوجُها فقال: من يُحاقُّني؟ فقال أبو هريرة: إنِّي لا أقولُ في هذا إلَّا أَنِّي سمعتُ أنَّ امرأةً جاءت إلى النبي صلى الله عليه وسلم وأنا قاعدٌ عنده، فقالت: فِداكَ أبي وأمِّي يا رسول الله، إِنَّ زوجي يريدُ أن يذهبَ بابني، وهو يَسقِيني من بئر أبي عِنَبة، وقد نَفَعَني، فقال: "استَهِما عليه" فقال زوجُها: من يُحاقُّني في ولدي يا رسولَ الله؟ فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "يا غلامُ، هذا أبوك، وهذه أمُّك، فخُذْ بيدِ أيِّهما شئتَ" فأخذ الغلامُ بيد أمِّه، فانطلقت به [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ মাইমূনাহ্ সুলাইম (যিনি মদীনার একজন সত্যবাদী লোক) বলেন, আমি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে বসা ছিলাম। এমন সময় একজন ফার্সি (ইরানী) মহিলা তার ছেলেকে সাথে নিয়ে তাঁর কাছে এলো। মহিলাটিকে তার স্বামী তালাক দিয়েছে। সে বলল, হে আবূ হুরায়রা! তারপর সে তার ভাষায় ফার্সিতে বলল: আমার স্বামী আমার ছেলেকে নিয়ে যেতে চায়। বর্ণনাকারী বলেন, এরপর তার স্বামী এলো এবং বলল: কে আমার সাথে ঝগড়া করবে (আমার সন্তানের অধিকার নিয়ে)?

আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এই বিষয়ে আমি কিছুই বলব না, তবে আমি শুনেছি যে, একবার আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে বসে ছিলাম, তখন একজন মহিলা তাঁর কাছে এসে বলল: ইয়া রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমার পিতা-মাতা আপনার উপর কুরবান হোক! আমার স্বামী আমার ছেলেকে নিয়ে যেতে চায়। অথচ সে (ছেলেটি) আমাকে আবূ ইনাবাহ্ কূপ থেকে পানি তুলে দেয় এবং সে আমার উপকারে আসে।

তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তার জন্য লটারি করো।" তখন তার স্বামী বলল: ইয়া রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমার সন্তানের ব্যাপারে কে আমার সাথে ঝগড়া করবে (আমার অধিকার বেশি)?

নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে বৎস! এ তোমার বাবা আর এ তোমার মা। তুমি এদের যার হাত ধরতে চাও ধরে নাও।" এরপর ছেলেটি তার মায়ের হাত ধরল এবং মা তাকে নিয়ে চলে গেল।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح. أبو الموجِّه: هو محمد بن عمرو الفزاري، وعبدان: هو عبد الله بن عثمان بن جبلة، وعبد الله: هو ابن المبارك، وابن جريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز.وأخرجه أبو داود (2277)، والنسائي (5660) من طرق عن ابن جريج، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 12/ (7352)، وابن ماجه (2351)، والترمذي (1357) من طريق سفيان بن عيينة، عن زياد بن سعد به مختصرًا. وقال الترمذي: حسن صحيح.وأخرجه أحمد 15 / (9771) من طريق يحيى بن أبي كثير، عن أبي ميمونة، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7216)


7216 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثنا أبو كامل الجَحْدري، حدثنا فُضَيل بن سليمان، عن موسى بن عُقبة، عن إسحاق بن يحيى، عن عُبادة بن الصامت، قال: قَضَى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في النَّخلة والنخلتين والثلاثِ، فيختلفون في حقوق ذلك، فقضى أنَّ لكلِّ نخلةٍ مبلغَ جَريدِها حَرِيمًا [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহ্‌র রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি, দুটি বা তিনটি খেজুর গাছের বিষয়ে ফয়সালা করেছেন—যখন লোকেরা সেগুলোর অধিকার নিয়ে মতভেদ করত। তখন তিনি ফয়সালা দিয়েছেন যে, প্রতিটি খেজুর গাছের জন্য তার ডালপালা যতদূর পর্যন্ত প্রসারিত হয়, ততদূর পর্যন্ত সংরক্ষিত এলাকা (হারিম) হিসেবে থাকবে।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف، فضيل بن سليمان - وهو النميري - ليِّن الحديث، وإسحاق بن يحيى - وهو ابن الوليد بن عبادة - مجهول الحال، ثم روايته عن جدِّ أبيه عبادة مرسلة.وهو في زوائد عبد الله على "مسند أحمد" 37 / (22778) ضمن حديث طويل.وأخرجه ابن ماجه (2488) عن عبد ربه بن خالد، عن فضيل بن سليمان، بهذا الإسناد.ويشهد له حديث أبي سعيد الخدري قال: اختصم إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم رجلان في حريم نخلة، فأمر بها، فذُرعت فوجدت سبعة أذرع - وفي رواية: خمسة أذرع - فقضى بذلك. قال عبد العزيز الدراوردي راويه: فأمر بجريدة من جريدها، فذرعت. أخرجه أبو داود (3640) وغيره، وسنده قوي.ويشهد له أيضًا حديث ابن عمر عند ابن ماجه (2489)، وسنده ضعيف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7217)


7217 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا إسماعيل بن قُتيبة، حدثنا يحيى بن يحيى، أخبرنا سفيان، عن إسماعيل بن أُمية، عن الزُّهْري، عن سعيد بن المسيّب، يبلغ به النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال: "حَرِيمُ قَلِيب العاديَّة خمسون ذراعًا، وحَريمُ قَلِيب البادي خمسةٌ وعشرون ذِراعًا" [1].وَصَله وأسنَده عمرُ بن قيس عن الزُّهري:




সাঈদ ইবনুল মুসায়্যিব থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম থেকে বর্ণনা করে বলেন: "পুরাতন কূয়ার সুরক্ষিত এলাকা হবে পঞ্চাশ হাত এবং নতুন কূয়ার সুরক্ষিত এলাকা হবে পঁচিশ হাত।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] رجاله ثقات، وقد اختلف على الزهري فيه، فرواه بعضهم عنه عن سعيد بن المسيب مرسلًا، ورواه بعضهم عن الزهري عن سعيد موقوفًا عليه. يحيى بن يحيى: هو ابن بكير النيسابوري، وسفيان: هو ابن عيينة.وأخرجه مسدد كما في "المطالب العالية" (1464) عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد مرسلًا.وأخرجه ابن أبي شيبة 6/ 374، وابن زنجويه في "الأموال" (1078)، وأبو داود في "المراسيل" (402)، والبيهقي 6/ 155 من طرق عن سفيان الثَّوري، عن إسماعيل بن أمية، به مرسلًا.وأخرجه مسدد أيضًا كما في "المطالب" (1464) من طريق زياد بن سعد، وتابعه صدقة بن عبد الله بن كثير كما في "علل" الدارقطني (1693)، كلاهما عن الزهري، به مرسلًا.وأخرجه موقوفًا على سعيد بن المسيب: يحيى بن آدم في "الخراج" (327) - ومن طريقه البيهقي 6/ 155 - من طريق يونس بن يزيد، وابن أبي شيبة 6/ 374 من طريق معمر، وأبو عبيد في "الأموال" (729)، وابن زنجويه (1079) من طريق الليث بن سعد، ثلاثتهم عن الزهري، عن سعيد بن المسيب.وانظر ما بعده.قوله: "البادي" وفي بعض مصادر التخريج البديء، وفي بعضها الآخر: البديّة، قال ابن الأثير في "النهاية" البَديء: بوزن البديع، البئر التي حُفرت في الإسلام، وليست بعاديّة قديمة.وقال ابن زنجويه في "الأموال" 2/ 653: البدية ما يُبتدأ حفرها في الإسلام، والعاديّة ما كان قديمًا. وأخرجه الدارقطني في "السنن" (4519) من طريق الحسن بن أبي جعفر، عن معمر، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة مرفوعًا. والحسن بن أبي جعفر ضعيف أو منكر الحديث.وقد سلفت من طريق معمر الصحيحة في الحديث السابق.وأخرجه الدارقطني (4519) من طريق إبراهيم بن أبي عبلة، عن الزهري، عن سعيد، عن أبي هريرة مرفوعًا. وفي إسناده محمد بن يوسف المقرئ، وهو متهم بالوضع.قال الدارقطني: الصحيح من الحديث أنه مرسل عن ابن المسيب، ومن أسنده فقد وهم.وقال البيهقي في "سننه" 6/ 155: روي من حديث معمر وإبراهيم بن أبي عبلة عن الزهري عن سعيد عن أبي هريرة مرفوعًا موصولًا، وهو ضعيف.ورواه سفيان بن حسين - كما في علل الدارقطني (1693) - عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن ضمرة مرفوعًا. وسفيان بن حسين ضعيف في حديث الزهري، وقال الدارقطني: المرسل أشبه.وفي الباب عن ابن عباس موقوفًا، ولفظه: حريم البئر خمسون ذراعًا، وحريم العين مئتا ذراع.أخرجه يحيى بن آدم في "الخراج" (335)، والبيهقي 6/ 257، وفي سنده إبراهيم بن أبي يحيى الأسلمي، متروك الحديث.وقد صحَّ من حديث أبي هريرة مرفوعًا عند أحمد 16 / (10411) وغيره: "حريم البئر أربعون ذراعًا من حواليها كلها لأعطان الإبل والغنم، وابن السبيل أول شارب … ".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7218)


7218 - أخبرَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا زياد بن الخليل التُّستَري، حدثنا هارون بن سعيد الأيْلي، حدثنا خالد بن نِزار، عن عمر بن قيس، عن الزُّهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم، قال: "حَرِيمُ البئر العاديَّة خمسون ذراعًا، وحَرِيمُ البئر المُحْدَثة خمسةٌ وعشرون ذِراعًا" [1].




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রাচীন কূয়ার সংরক্ষিত এলাকা হলো পঞ্চাশ হাত এবং নতুনভাবে খনন করা কূয়ার সংরক্ষিত এলাকা হলো পঁচিশ হাত।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، عمر بن قيس - وهو أبو حفص المكي المعروف بسندل - متروك الحديث، وجاء موصولًا مرفوعًا من طريق غيره، كما سيأتي في التخريج، ولا يصح منها شيء. وأخرجه الدارقطني في "السنن" (4519) من طريق الحسن بن أبي جعفر، عن معمر، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة مرفوعًا. والحسن بن أبي جعفر ضعيف أو منكر الحديث.وقد سلفت من طريق معمر الصحيحة في الحديث السابق.وأخرجه الدارقطني (4519) من طريق إبراهيم بن أبي عبلة، عن الزهري، عن سعيد، عن أبي هريرة مرفوعًا. وفي إسناده محمد بن يوسف المقرئ، وهو متهم بالوضع.قال الدارقطني: الصحيح من الحديث أنه مرسل عن ابن المسيب، ومن أسنده فقد وهم.وقال البيهقي في "سننه" 6/ 155: روي من حديث معمر وإبراهيم بن أبي عبلة عن الزهري عن سعيد عن أبي هريرة مرفوعًا موصولًا، وهو ضعيف.ورواه سفيان بن حسين - كما في علل الدارقطني (1693) - عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن ضمرة مرفوعًا. وسفيان بن حسين ضعيف في حديث الزهري، وقال الدارقطني: المرسل أشبه.وفي الباب عن ابن عباس موقوفًا، ولفظه: حريم البئر خمسون ذراعًا، وحريم العين مئتا ذراع.أخرجه يحيى بن آدم في "الخراج" (335)، والبيهقي 6/ 257، وفي سنده إبراهيم بن أبي يحيى الأسلمي، متروك الحديث.وقد صحَّ من حديث أبي هريرة مرفوعًا عند أحمد 16 / (10411) وغيره: "حريم البئر أربعون ذراعًا من حواليها كلها لأعطان الإبل والغنم، وابن السبيل أول شارب … ".