হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7219)


7219 - حدثنا إبراهيم بن عِصْمة العدل، حدثنا المسيَّب بن زهير، حدثنا عاصم بن علي، حدثنا محمد بن الفُرات التميمي، قال: سمعتُ مُحاربَ بن دِثار، يقول: أخبرني عبد الله بن عمر، أنه سمع النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول: "شاهدُ الزُّورِ لا تزولُ قدماه حتى يُوجِبَ اللهُ لهما النارَ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "মিথ্যা সাক্ষ্যদাতার দু'পা সরবে না, যতক্ষণ না আল্লাহ তার জন্য জাহান্নাম ওয়াজিব করে দেন।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، محمد بن الفرات التميمي متهم بالكذب.وأخرجه ابن ماجه (2373) عن سويد بن سعيد، عن محمد بن الفرات، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7220)


7220 - أخبرنا علي بن محمد بن عُقبة الشَّيباني بالكوفة، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الزُّهْري، حدثنا أبو نُعيم، حدثنا بشير بن سَلْمان [1] المؤذن، حدثنا سيّار أبو الحَكَم، عن طارق بن شِهاب، قال: كنَّا عند ابن مسعود فقال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "إنَّ بينَ يدي الساعة تسليمَ الخاصّة [2]، وفُشُوَّ التجارة حتى تُعينَ المرأةُ زوجَها على التجارة، وقطعَ الأرحام، وظهورَ شهادةِ الزُّور، وكِتمانَ شهادة الحقِّ" [3].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই কিয়ামতের নিকটবর্তী সময়ে (যেসব নিদর্শন ঘটবে তার মধ্যে) হলো: শুধু পরিচিতদেরকে সালাম দেওয়া, ব্যবসার ব্যাপক প্রসার হওয়া—এমনকি মহিলা তার স্বামীকে ব্যবসায় সাহায্য করবে, আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিন্ন করা, মিথ্যা সাক্ষ্যের প্রকাশ হওয়া এবং সত্য সাক্ষ্য গোপন করা।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في (ص) إلى: سليمان.



[2] تحرَّف في النسخ الخطية: إلى تسليم الحاجة، والتصويب من مصادر التخريج. وذهب البخاري في "التاريخ الكبير" 1/ 49، وأبو حاتم كما في "العلل" (2198) و (2336)، والدارقطني في "علله" (370) إلى أنه لا يصح من حديث ابن أبي مليكة عن عائشة، وأنَّ الصواب فيه هو من رواية أيوب عن إبراهيم بن ميسرة عن عائشة، ورواية إبراهيم عن عائشة منقطعة، وحينئذ فما وقع في "المسند" من تصحيح إسناد ابن أبي مليكة تساهل يُستدرك من هنا.وهو في "جامع" عبد الله بن وهب (533 - أبو الخير).ومن طريقه أخرجه ابن أبي حاتم في "العلل" (2336)، وابن عبد البر في "التمهيد" 16/ 256، وفي "الاستذكار" 27/ 355 - 356.



7220 [3] - إسناده حسن من أجل سوار - وهو أبو حمزة الكوفي - وليس بأبي الحكم، فقد نقل الحافظُ المزيُّ في "التهذيب" عن أحمد وأبي داود ويحيى والدارقطني وغيرهم أنهم قالوا: قد أخطأ من قال: هو سيار أبو الحكم - وسيار أبو حمزة هذا روى عنه جمع، وذكره ابن حبان في "ثقاته" 6/ 421.وأخرجه أحمد 6 / (3870) و 7 / (3982) من طريقين عن بشير بن سلمان، بهذا الإسناد.وسيأتي عند المصنف برقم (8583) من طريق أبي نعيم.وسيأتي شيء منه برقم (8584) و (8811) من طريق خارجة بن الصلت عن ابن مسعود موقوفًا.وأخرجه أحمد 6/ (3664) من طريق الأسود بن يزيد، و (3848) من طريق الأسود بن هلال، كلاهما عن ابن مسعود مرفوعًا بقصة التسليم. وذهب البخاري في "التاريخ الكبير" 1/ 49، وأبو حاتم كما في "العلل" (2198) و (2336)، والدارقطني في "علله" (370) إلى أنه لا يصح من حديث ابن أبي مليكة عن عائشة، وأنَّ الصواب فيه هو من رواية أيوب عن إبراهيم بن ميسرة عن عائشة، ورواية إبراهيم عن عائشة منقطعة، وحينئذ فما وقع في "المسند" من تصحيح إسناد ابن أبي مليكة تساهل يُستدرك من هنا.وهو في "جامع" عبد الله بن وهب (533 - أبو الخير).ومن طريقه أخرجه ابن أبي حاتم في "العلل" (2336)، وابن عبد البر في "التمهيد" 16/ 256، وفي "الاستذكار" 27/ 355 - 356.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7221)


7221 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، أخبرني محمد بن مُسلم، عن أيوب السَّختِياني، عن محمد بن سِيرِين، عن عائشة قالت: ما كان من شيء أبغضَ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم من الكذب، وما جرَّبه [1] رسولُ الله صلى الله عليه وسلم من أحد - وإن قلَّ - فيُخرجُ له من نفسِه حتى يُجدِّدَ له توبةً [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে মিথ্যার চেয়ে অধিক ঘৃণিত অন্য কিছুই ছিল না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যদি কোনো ব্যক্তির মধ্যে—তা সামান্যই হোক না কেন—মিথ্যার অভ্যাস দেখতে পেতেন, তবে তিনি তাকে অন্তর থেকে সরিয়ে দিতেন যতক্ষণ না সে তাওবা করত।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في نسخنا الخطية: جرّب، والمثبت من "تلخيص الذهبي". وذهب البخاري في "التاريخ الكبير" 1/ 49، وأبو حاتم كما في "العلل" (2198) و (2336)، والدارقطني في "علله" (370) إلى أنه لا يصح من حديث ابن أبي مليكة عن عائشة، وأنَّ الصواب فيه هو من رواية أيوب عن إبراهيم بن ميسرة عن عائشة، ورواية إبراهيم عن عائشة منقطعة، وحينئذ فما وقع في "المسند" من تصحيح إسناد ابن أبي مليكة تساهل يُستدرك من هنا.وهو في "جامع" عبد الله بن وهب (533 - أبو الخير).ومن طريقه أخرجه ابن أبي حاتم في "العلل" (2336)، وابن عبد البر في "التمهيد" 16/ 256، وفي "الاستذكار" 27/ 355 - 356.



[2] رجاله ثقات، لكن ابن سِيرِين - وهو محمد - لم يسمع من عائشة، وقد اختلف في إسناده على أيوب السختياني، كما بيناه في "مسند أحمد" 42 / (25183)، حيث رواه من طريقه عن ابن أبي ملكية أو غيره، عن عائشة. وذهب البخاري في "التاريخ الكبير" 1/ 49، وأبو حاتم كما في "العلل" (2198) و (2336)، والدارقطني في "علله" (370) إلى أنه لا يصح من حديث ابن أبي مليكة عن عائشة، وأنَّ الصواب فيه هو من رواية أيوب عن إبراهيم بن ميسرة عن عائشة، ورواية إبراهيم عن عائشة منقطعة، وحينئذ فما وقع في "المسند" من تصحيح إسناد ابن أبي مليكة تساهل يُستدرك من هنا.وهو في "جامع" عبد الله بن وهب (533 - أبو الخير).ومن طريقه أخرجه ابن أبي حاتم في "العلل" (2336)، وابن عبد البر في "التمهيد" 16/ 256، وفي "الاستذكار" 27/ 355 - 356.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7222)


7222 - حدثنا أبو زكريا يحيى بن محمد العنبري وأبو بكر محمد بن جعفر المزكِّي، قالا: حدثنا أبو عبد الله محمد بن إبراهيم العَبْدي، حدثنا عمرو بن مالك البصري، حدثنا محمد بن سليمان بن مَسمُول، حدثنا عبيد الله بن سَلَمة بن وَهْرام [عن أبيه] [1] عن طاووس اليَماني، عن ابن عباس قال: ذُكِرَ عند رسولِ الله صلى الله عليه وسلم الرجلُ يَشْهدُ بشهادة، فقال لي: "يا ابنَ عباس، لا تَشْهَدْ إلَّا على ما يُضيء لك كضياءِ هذه الشمسِ" وأومأ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بيدِه إلى الشمس [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এমন এক ব্যক্তি সম্পর্কে আলোচনা করা হলো যে সাক্ষ্য দেয়। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন, "হে ইবন আব্বাস, তুমি কেবল সেই বিষয়েই সাক্ষ্য দেবে যা তোমার নিকট এই সূর্যের আলোর মতো উজ্জ্বল ও স্পষ্ট হয়ে যায়।" আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হাত দিয়ে সূর্যের দিকে ইশারা করলেন।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] ما بين المعقوفين لم يرد في نسخنا الخطية، وأثبتناه على الصواب من مصادر التخريج.



[2] إسناده ضعيف جدًّا مسلسل بالضعفاء، ووهَّاه الذهبي في "تلخيصه". عمرو بن مالك - وهو الراسبي - البصري، ضعيف منكر الحديث، وكان يسرق الحديث، وشيخه ابن مسمول ضعيف أيضًا، أوردوا هذا الحديث في ترجمته من مناكيره، وشيخه عبيد الله بن سلمة لم يذكروا في الرواة عنه سوى ابن مسمول، وروي عن أبي حاتم تليينه، وقال الأزدي: منكر الحديث. وأما ابن المديني فلم يعرفه.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 6/ 207، والبيهقي 10/ 156 من طريقين عن عمرو بن مالك الراسبي، بهذا الإسناد.وأخرجه العقيلي في "الضعفاء الكبير" (1562) من طريق زيد بن المبارك الصنعاني، وابن عدي 6/ 207 من طريق سليمان الشاذكوني، كلاهما عن محمد بن سليمان بن مسمول، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7223)


7223 - حدثنا أبو بكر أحمد بن كامل بن خلف بن شَجَرة القاضي، حدثنا محمد بن سعد العَوْفي، حدثنا رَوْح بن عُبادة، حدثنا شُعبة، عن بُرَيد بن أبي مريم، عن أبي الحَوْراء، عن الحسن بن علي، قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "دَعْ ما يَرِيبُك إلى ما لا يَريبُك، فإنَّ الصدقَ طُمأنينةٌ، وإنَّ الكذبَ رِيبةٌ" [1].




হাসান ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যা তোমাকে সন্দেহে ফেলে, তা পরিহার করে যা তোমাকে সন্দেহে ফেলে না, তার দিকে যাও। কেননা সত্য হলো প্রশান্তি, আর মিথ্যা হলো সন্দেহ।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، محمد بن سعد العوفي، قال الدارقطني: لا بأس به، وقال الخطيب البغدادي: ليِّن، وقوَّى إسناده الذهبي في "تلخيصه". قلنا: ومحمد العوفي هذا قد توبع فيما سلف عند المصنف برقم (2199). من أهل العلم استنكره. وقال البيهقي في "معرفة السنن والآثار" (20241): تفرَّد به محمد بن عمرو بن عطاء. قلنا: وهو ثقة من رجال الشيخين.وقال ابن رسلان كما في "عون المعبود" 10/ 9: حملوا هذا الحديث على من لم تعرف عدالته من أهل البدو، والغالب أنهم لا تعرف عدالتهم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7224)


7224 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا محمد بن أحمد بن أنس القرشي، حدثنا عبد الله بن بكر السَّهمي، حدثنا هشام، عن يحيى بن أبي كَثير، عن زيد بن سلَّام، عن جَدِّه ممطور، عن أبي أُمامة، قال: قلتُ: يا رسولَ الله، ما الإثمُ؟ قال: "إذا حاكَ في صدرِكَ شيءٌ فدَعْه" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, ইয়া রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! গুনাহ (পাপ) কী? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: যখন কোনো কিছু তোমার অন্তরে খটকা সৃষ্টি করে, তখন তা পরিত্যাগ করো।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح، وسلف من طريق عبد الله بن بكر السهمي برقم (2201)، وانظر (33). من أهل العلم استنكره. وقال البيهقي في "معرفة السنن والآثار" (20241): تفرَّد به محمد بن عمرو بن عطاء. قلنا: وهو ثقة من رجال الشيخين.وقال ابن رسلان كما في "عون المعبود" 10/ 9: حملوا هذا الحديث على من لم تعرف عدالته من أهل البدو، والغالب أنهم لا تعرف عدالتهم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7225)


7225 - أخبرني أبو الحُسين [1] عُبيد الله بن محمد البَلْخي ببغداد، حدثنا أبو إسماعيل محمد بن إسماعيل، حدثنا سعيد بن أبي مريم، حدثنا نافع بن يزيد، عن ابن الهاد، عن محمد بن عمرو بن عطاء، عن عطاء، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا تجوزُ شهادةُ بدويٍّ على صاحبِ قريةٍ" [2].




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো শহরবাসীর (স্থায়ী বাসিন্দার) বিরুদ্ধে কোনো বেদুঈনের সাক্ষ্য গ্রহণযোগ্য হবে না।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] أقحم في النسخ الخطية بين الحسين وعبيد الله لفظ "بن". من أهل العلم استنكره. وقال البيهقي في "معرفة السنن والآثار" (20241): تفرَّد به محمد بن عمرو بن عطاء. قلنا: وهو ثقة من رجال الشيخين.وقال ابن رسلان كما في "عون المعبود" 10/ 9: حملوا هذا الحديث على من لم تعرف عدالته من أهل البدو، والغالب أنهم لا تعرف عدالتهم.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف، أبو الحسين عبيد الله بن محمد البلخي لم نقف له على ترجمة، وقد توبع، ومن فوقه ثقات. أبو إسماعيل محمد بن إسماعيل: هو ابن يوسف السلمي، وابن الهاد: هو يزيد بن عبد الله بن الهاد، وعطاء: هو ابن يسار.وأخرجه أبو داود (3602)، وابن ماجه (2367) من طريق عبد الله بن وهب، عن نافع بن يزيد، بهذا الإسناد. وقرن ابن وهب في رواية أبي داود بنافع بن يزيد يحيى بنَ أيوب.وقال الذهبي في "التلخيص": هو حديث منكر على نظافة إسناده! قلنا: ولم نقف على أحد غيره من أهل العلم استنكره. وقال البيهقي في "معرفة السنن والآثار" (20241): تفرَّد به محمد بن عمرو بن عطاء. قلنا: وهو ثقة من رجال الشيخين.وقال ابن رسلان كما في "عون المعبود" 10/ 9: حملوا هذا الحديث على من لم تعرف عدالته من أهل البدو، والغالب أنهم لا تعرف عدالتهم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7226)


7226 - أخبرنا عبد الرحمن بن الحسن القاضي بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا عبد الله بن الزُّبير الحُميدي، حدثنا مسلم بن خالد، حدثنا العلاء بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا تجوزُ شهادةُ ذي الظِّنّةِ ولا ذي الحِنَة" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সন্দেহভাজন ব্যক্তির সাক্ষ্য বৈধ নয় এবং যে ব্যক্তি বিদ্বেষ রাখে, তার সাক্ষ্যও বৈধ নয়।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف، عبد الرحمن بن الحسن شيخ المصنف ليِّن، ومسلم بن خالد - وهو المخزومي مولاهم المعروف بالزنجي - ضعيف.وأخرجه البيهقي 10/ 201 من طريق عبيد الله بن موسى، ومن طريق عبد الصمد بن النعمان، كلاهما عن مسلم بن خالد الزنجي بهذا الإسناد. ولفظه الأول عنده: لا تجوز شهادة ذي الخُلَّة ولا ذي الجِنَّة، ولا ذي الحِنَة المحقود. ولفظ الثاني: لا تجوز شهادة ذي الحِنَة والظِّنة، وقال: الظنة أحفظ من الخلة.ثم نقل تفسيره عن أحد الرواة، فقال: الجِنَّة الجنون، والحِنَة الذي يكون بينكم وبينه عداوة.وقال ابن الأثير في "النهاية" الحِنَة: العداوة، وهي لغة قليلة في الإحنة.وأخرجه أبو داود في "المراسيل" (397)، والبيهقي 10/ 201 من طريق ابن أبي ذئب عن الحكم بن مسلم، عن عبد الرحمن الأعرج مرسلًا، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا تجوز شهادة ذي الظنة والإحنة والجنة".وأشار البيهقي إلى أنه أصح شيء في هذا الباب وإن كان مرسلًا، قلنا: والحكم بن مسلم روى عنه اثنان، وذكره ابن حبان في "الثقات".وأخرجه عبد الرزاق (15366) من طريق ابن أبي ذئب عن الحكم، به. لكن جعل عبد الرحمن هو ابن فروخ، وليس عبد الرحمن الأعرج!وأخرج عبد الرزاق (15365) عن إبراهيم بن محمد الأسلمي، عن عبد الله، عن يزيد بن طلحة، عن طلحة بن عبد الله، عن أبي هريره مرفوعًا: "لا تجوز شهادة خصم ولا ظَنين".وإبراهيم الأسلمي متروك، ووصله منكر، والصواب أنه مرسل كما في "مراسيل أبي داود" (396). وانظر أحاديث الباب عند حديث عبد الله بن عمرو في "مسند أحمد" 11/ (6698).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7227)


7227 - أخبرنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا أحمد بن مِهران، حدثنا عُبيد الله [1] بن موسى، أخبرنا ابن جُريج، عن ابن أبي مُليكة، عن ابن عباس في شهادة الصِّبيان، قال: قال الله عز وجل: {مِمَّن تَرْضَوْنَ مِنَ الشُّهَدَاءِ} [البقرة: 282] وليسوا ممَّن نرضى [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি শিশুদের সাক্ষ্য সম্পর্কে বলেন: মহান আল্লাহ্‌ তা‘আলা বলেছেন: "{তোমরা সাক্ষ্য হিসেবে পছন্দ কর এমন সাক্ষীদের মধ্য থেকে}" (সূরা আল-বাকারা: ২৮২)। আর তারা এমন সাক্ষী নয়, যাদেরকে আমরা সন্তুষ্ট মনে গ্রহণ করি।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: عبد الله. وأخرجه أحمد 9 / (5544) من طريق أيوب بن سليمان الصنعاني - وهو مجهول - عن عطاء الخراساني، عن ابن عمر مطولًا.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 2/ 388، والخطيب في "تاريخ بغداد" 9/ 84 من طريق حفص بن عمر الحبطي، عن ابن جريج عن عطاء، عن ابن عمر، به مطولًا. وحفص بن عمر قال ابن معين: ليس بشيء، ولم يكن بثقة ولا مأمون، وأسقط الواسطة بين عطاء الخراساني وابن عمر.وأخرجه معمر في "جامعه" (20905) عن عطاء الخراساني، عن أبيه عمر موفق عمر موقوفًا. ولم يذكر الواسطة أيضًا.ورواه مطر الوراق، عن نافع، عن ابن عمر مرفوعًا:أخرجه أبو داود (3598)، وابن ماجه (2320)، وابن الأعرابي في "المعجم" (292)، والطبراني في "الأوسط" (2921)، وابن عدي 3/ 413، وأبو القاسم بن بشران في "الأمالي" (544) و (1033)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 6/ 82، وفي "الشعب" (6310)، والخطيب 4/ 619 من طرق عن مطر الوراق عن نافع عن ابن عمر مرفوعًا مطولًا ومختصرًا. وسنده حسن في المتابعات والشواهد من أجل مطر.وهناك خلافات أخرى استوعب ذكرها الإمام الدارقطني في "العلل" (2992). وسلف الحديث بنحوه (2253) من طريق يحيى بن راشد عن ابن عمر مرفوعًا، بسند صحيح.



[2] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أحمد بن مهران، وقد توبع.فقد أخرجه ابن المنذر في "الأوسط" (6705) عن محمد بن عبد الوهاب العبدي النيسابوري، عن عبيد الله بن موسى، بهذا الإسناد.وانظر ما سلف برقم (3168). وأخرجه أحمد 9 / (5544) من طريق أيوب بن سليمان الصنعاني - وهو مجهول - عن عطاء الخراساني، عن ابن عمر مطولًا.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 2/ 388، والخطيب في "تاريخ بغداد" 9/ 84 من طريق حفص بن عمر الحبطي، عن ابن جريج عن عطاء، عن ابن عمر، به مطولًا. وحفص بن عمر قال ابن معين: ليس بشيء، ولم يكن بثقة ولا مأمون، وأسقط الواسطة بين عطاء الخراساني وابن عمر.وأخرجه معمر في "جامعه" (20905) عن عطاء الخراساني، عن أبيه عمر موفق عمر موقوفًا. ولم يذكر الواسطة أيضًا.ورواه مطر الوراق، عن نافع، عن ابن عمر مرفوعًا:أخرجه أبو داود (3598)، وابن ماجه (2320)، وابن الأعرابي في "المعجم" (292)، والطبراني في "الأوسط" (2921)، وابن عدي 3/ 413، وأبو القاسم بن بشران في "الأمالي" (544) و (1033)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 6/ 82، وفي "الشعب" (6310)، والخطيب 4/ 619 من طرق عن مطر الوراق عن نافع عن ابن عمر مرفوعًا مطولًا ومختصرًا. وسنده حسن في المتابعات والشواهد من أجل مطر.وهناك خلافات أخرى استوعب ذكرها الإمام الدارقطني في "العلل" (2992). وسلف الحديث بنحوه (2253) من طريق يحيى بن راشد عن ابن عمر مرفوعًا، بسند صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7228)


7228 - أخبرنا أبو العباس قاسم بن القاسم السَّيَّاري بمَرْو، حدثنا محمد بن موسى بن حاتم، حدثنا علي بن الحسن [1] بن شَقيق أخبرنا أبو حمزة، حدثنا إبراهيم الصائغ، عن عطاء بن أبي مسلم، عن نافع عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "من أعانَ على خصومةٍ بغير حقٍّ، كان في سَخَطِ الله حتى يَنزِعَ" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি অন্যায়ভাবে কোনো বিবাদ বা ঝগড়ায় সাহায্য করে, সে আল্লাহর ক্রোধের মধ্যে থাকে যতক্ষণ না সে (সেই সাহায্য থেকে) বিরত হয়।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى الحسين. وأخرجه أحمد 9 / (5544) من طريق أيوب بن سليمان الصنعاني - وهو مجهول - عن عطاء الخراساني، عن ابن عمر مطولًا.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 2/ 388، والخطيب في "تاريخ بغداد" 9/ 84 من طريق حفص بن عمر الحبطي، عن ابن جريج عن عطاء، عن ابن عمر، به مطولًا. وحفص بن عمر قال ابن معين: ليس بشيء، ولم يكن بثقة ولا مأمون، وأسقط الواسطة بين عطاء الخراساني وابن عمر.وأخرجه معمر في "جامعه" (20905) عن عطاء الخراساني، عن أبيه عمر موفق عمر موقوفًا. ولم يذكر الواسطة أيضًا.ورواه مطر الوراق، عن نافع، عن ابن عمر مرفوعًا:أخرجه أبو داود (3598)، وابن ماجه (2320)، وابن الأعرابي في "المعجم" (292)، والطبراني في "الأوسط" (2921)، وابن عدي 3/ 413، وأبو القاسم بن بشران في "الأمالي" (544) و (1033)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 6/ 82، وفي "الشعب" (6310)، والخطيب 4/ 619 من طرق عن مطر الوراق عن نافع عن ابن عمر مرفوعًا مطولًا ومختصرًا. وسنده حسن في المتابعات والشواهد من أجل مطر.وهناك خلافات أخرى استوعب ذكرها الإمام الدارقطني في "العلل" (2992). وسلف الحديث بنحوه (2253) من طريق يحيى بن راشد عن ابن عمر مرفوعًا، بسند صحيح.



[2] خبر صحيح، وهذا إسناد قد اختلف فيه على عطاء بن أبي مسلم - وهو الخراساني - فقد رواه ابن الأعرابي في "معجمه" (640)، والطبراني في "الكبير" (13435)، وفي "الأوسط" (6491)، وفي "الشاميين" (2460)، وأبو نعيم في "الحلية" (10/ 219) من طريق عمار بن رزيق، عن فطر بن خليفة، عن القاسم بن أبي بزّة، عن عطاء الخراساني، عن حُمران عن ابن عمر به مطولًا.وحمران - وهو مولى العبلات - روى عنه ثلاثة، وذكره ابن حبان في "الثقات". وتحرّف عند بعض من أخرجه إلى: عمران.وأخرجه محمد بن فضيل في "الدعاء" (93)، وعنه أبو يعلى في "معجم شيوخه" (84) عن فطر بن خليفة، عن المثنى بن الصباح، عن عطاء الخراساني، عن ابن عمر به، مطولًا. ليس فيه حمران. والمثنى ضعيف. وأخرجه أحمد 9 / (5544) من طريق أيوب بن سليمان الصنعاني - وهو مجهول - عن عطاء الخراساني، عن ابن عمر مطولًا.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 2/ 388، والخطيب في "تاريخ بغداد" 9/ 84 من طريق حفص بن عمر الحبطي، عن ابن جريج عن عطاء، عن ابن عمر، به مطولًا. وحفص بن عمر قال ابن معين: ليس بشيء، ولم يكن بثقة ولا مأمون، وأسقط الواسطة بين عطاء الخراساني وابن عمر.وأخرجه معمر في "جامعه" (20905) عن عطاء الخراساني، عن أبيه عمر موفق عمر موقوفًا. ولم يذكر الواسطة أيضًا.ورواه مطر الوراق، عن نافع، عن ابن عمر مرفوعًا:أخرجه أبو داود (3598)، وابن ماجه (2320)، وابن الأعرابي في "المعجم" (292)، والطبراني في "الأوسط" (2921)، وابن عدي 3/ 413، وأبو القاسم بن بشران في "الأمالي" (544) و (1033)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 6/ 82، وفي "الشعب" (6310)، والخطيب 4/ 619 من طرق عن مطر الوراق عن نافع عن ابن عمر مرفوعًا مطولًا ومختصرًا. وسنده حسن في المتابعات والشواهد من أجل مطر.وهناك خلافات أخرى استوعب ذكرها الإمام الدارقطني في "العلل" (2992). وسلف الحديث بنحوه (2253) من طريق يحيى بن راشد عن ابن عمر مرفوعًا، بسند صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7229)


7229 - حدثنا جعفر بن محمد بن نُصير الخُلْدي، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا عارمٌ أبو النعمان، حدثنا معتمر بن سليمان، قال: سمعتُ أبي يحدِّث عن حَنَش، عن عِكْرمة، عن ابن عباس قال: من أعانَ باطلًا ليُدحِضَ بباطله حقًّا، فقد بَرِئَت منه ذِمَّةُ الله وذِمَّةُ رسول الله صلى الله عليه وسلم [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যে ব্যক্তি কোনো বাতিলের সহায়ক হয়, যেন সে তার বাতিল (মিথ্যা) দ্বারা কোনো হক (সত্যকে) পরাভূত করতে পারে, তার থেকে আল্লাহ্‌র এবং তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিরাপত্তা (যিম্মাহ) মুক্ত হয়ে যায়।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف، حنش - واسمه حسين بن قيس الرحبي - ضعَّفوه. عارم: اسمه محمد بن الفضل السدوسي.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (11539) عن علي بن عبد العزيز، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه الخرائطي في مساوئ الأخلاق (597) و (639) من طريق خالد بن عبد الله الطحان، والسرّاج في "حديثه" (2610)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 15/ 315 و 53/ 256 من طريق إسماعيل بن عياش، كلاهما عن حنش به مرفوعًا إلى النبي صلى الله عليه وسلم . وأخرجه مرفوعًا أيضًا ابن حبان في "المجروحين" 1/ 328، والطبراني في "الأوسط" (2944)، و "الصغير" (224)، وفي "الشاميين" (63)، وأبو نعيم في "الحلية" 5/ 248، وابن عساكر 43/ 132 من طريق سعيد بن رحمة، عن محمد بن حميد، عن إبراهيم بن أبي عبلة، عن عكرمة، بنحوه. وفيه عند بعضهم زيادة.قال الطبراني: لم يروه عن إبراهيم إلّا محمد، ولا عن محمد إلّا سعيد. قلنا: سعيد بن رحمة قال فيه ابن حبان: يروي عن محمد بن حمير ما لم يتابع عليه، لا يجوز الاحتجاج به لمخالفته الأثبات في الروايات.وأخرجه ضمن حديث مطول الخطيب في "تاريخ بغداد" 6/ 592، ومن طريقه ابن الجوزي في "العلل المتناهية" (1272) من طريق إبراهيم بن عبد الله بن أيوب، عن محمد بن بكار، عن إبراهيم بن زياد، عن خصيف بن عبد الرحمن، عن عكرمة به مرفوعًا.وإبراهيم بن عبد الله قال الدارقطني: ليس بثقة، وإبراهيم بن زياد قال الخطيب: في حديثه نكرة، وغمزه العقيلي، وقال ابن معين: لا أعرفه، وخصيف مختلف فيه، وليس بذاك القوي.وأخرجه بنحوه الطبراني في "الكبير" (11216) من طريق أبي محمد حمزة بن أبي حمزة النصيبي عن عمرو بن دينار، عن ابن عباس مرفوعًا. وفيه زيادة، وحمزة هذا متهم بالوضع فلا يفرح به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7230)


7230 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن غالب، حدثنا جعفر بن محمد بن جعفر المَدَائني، حدثنا عَبّاد بن العوّام، عن سفيان الثَّوري، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ليس [1] على ولدِ الزنى مِن وِزْرِ أبويه شيءٌ {وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَى} [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وقد صحَّ ضِدُّه بإسنادين صحيحين، أما الإسنادُ الأول:




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: অবৈধ সন্তানের উপর তার পিতা-মাতার গুনাহের কোনো বোঝা বর্তায় না। (আল্লাহর বাণী): {কেউ অন্য কারো বোঝা বহন করবে না।}




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] مكان "ليس" في (ز) بياض، وسقطت من (ص) و (م)، والمثبت من "تلخيص الذهبي" ومصادر التخريج. وأما ما نقله الشيخ ناصر الألباني رحمه الله في "السلسلة الضعيفة" (6115) من جرح الجورقاني في "الأباطيل" له، فهو وهم منه، فإنَّ ذاك المجروح هو جعفر بن محمد بن جعفر بن محمد بن علي بن الحسين القرشي الهاشمي، وأما جعفر الذي روى هذا الحديث فهو ثقفي كما ذكر الخطيب البغدادي.وأخرجه أبو بكر قاضي المارستان في "مشيخته" (422) من طريق عثمان بن أحمد الدقاق، عن محمد بن غالب بن حرب، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (4165) عن علي بن سعيد، عن جعفر بن محمد المدائني، به.وقال: لم يرفع هذا الحديث عن سفيان الثَّوري إلّا عباد بن العوام تفرَّد به جعفر بن محمد المدائني.وأخرجه عبد الرزاق (13861)، وأخرجه ابن المنذر في "الأوسط" (1938) من طريق عبد الله بن المبارك، والبيهقي 10/ 58 من طريق أبي نعيم، ثلاثتهم (عبد الرزاق وابن المبارك وأبو نعيم) عن سفيان الثوري به موقوفًا على عائشة.وأخرجه عبد الرزاق (13860) عن معمر، وابن أبي شيبة 2/ 216 و 3/ 455 عن وكيع، وابن أبي داود في "مسند عائشة" (53)، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 5/ 1435 من طريق عبدة بن سليمان، ثلاثتهم عن عروة، به موقوفًا على عائشة.وانظر ما سلف عن عائشة رضي الله عنها برقم (2891).



[2] صحيح موقوفًا، وقد تفرَّد برفعه جعفر بن محمد المدائني، وهو ليس بذاك المشهور، ولا يحتمل تفرده، وقد ترجمه الخطيب في "تاريخ بغداد" 8/ 59 فلم يذكر فيه جرحًا ولا تعديلًا، وذكره ابن حبان في "ثقاته"، وقد خالفه في رفع هذا الحديث جمع من الثقات، فجعلوه من قول عائشة، لذلك قال البيهقي: رفعه بعض الضعفاء، والصحيح موقوف. وأما ما نقله الشيخ ناصر الألباني رحمه الله في "السلسلة الضعيفة" (6115) من جرح الجورقاني في "الأباطيل" له، فهو وهم منه، فإنَّ ذاك المجروح هو جعفر بن محمد بن جعفر بن محمد بن علي بن الحسين القرشي الهاشمي، وأما جعفر الذي روى هذا الحديث فهو ثقفي كما ذكر الخطيب البغدادي.وأخرجه أبو بكر قاضي المارستان في "مشيخته" (422) من طريق عثمان بن أحمد الدقاق، عن محمد بن غالب بن حرب، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (4165) عن علي بن سعيد، عن جعفر بن محمد المدائني، به.وقال: لم يرفع هذا الحديث عن سفيان الثَّوري إلّا عباد بن العوام تفرَّد به جعفر بن محمد المدائني.وأخرجه عبد الرزاق (13861)، وأخرجه ابن المنذر في "الأوسط" (1938) من طريق عبد الله بن المبارك، والبيهقي 10/ 58 من طريق أبي نعيم، ثلاثتهم (عبد الرزاق وابن المبارك وأبو نعيم) عن سفيان الثوري به موقوفًا على عائشة.وأخرجه عبد الرزاق (13860) عن معمر، وابن أبي شيبة 2/ 216 و 3/ 455 عن وكيع، وابن أبي داود في "مسند عائشة" (53)، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 5/ 1435 من طريق عبدة بن سليمان، ثلاثتهم عن عروة، به موقوفًا على عائشة.وانظر ما سلف عن عائشة رضي الله عنها برقم (2891).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7231)


7231 - فحدَّثَناه أبو عبد الله الصَّفَّار، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى القاضي، حدثنا أبو حُذيفة، حدثنا سفيان الثَّوري، حدثنا سُهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة قال: سُئِلَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم عن ولد الزِّنى، قال: "هو شَرُّ الثلاثة" [1]. وأما الإسناد الثاني:




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে যেনার (অবৈধ) সন্তান সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। তিনি বললেন: “সে তিনজনের মধ্যে সবচেয়ে নিকৃষ্ট।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح. أبو حذيفة: هو موسى بن مسعود النهدي وسهيل: هو ابن أبي صالح السمان.وأخرجه الطحاوي في "شرح المشكل" (607)، والبيهقي 10/ 58 من طريقين عن أبي حذيفة، بهذا الإسناد.وقد سلف من طريق سفيان الثوري برقم (2889).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7232)


7232 - فأخبرَناه أبو النَّضر الفقيه، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا عمرو بن عون الواسطي، حدثنا أبو عَوَانة، عن عمر بن أبي سَلَمة، عن أبيه، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ولدُ الزِّنى شَرُّ الثلاثة" [1].




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “ব্যভিচারের সন্তান হলো তিনজনের মধ্যে সবচেয়ে নিকৃষ্ট।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات من أجل عمر بن أبي سلمة: وهو ابن عبد الرحمن بن عوف. أبو عوانة: هو الوضاح بن عبد الله اليشكري.وقد سلف من طريق أبي عوانة برقم (2890). من "ميزان الاعتدال": أنَّ عبد الحق الإشبيلي ضعَّف هذا الحديث بإسحاق بن الفرات، ثم ذكر الذهبي أن بعضهم تكلم فيه. وضعَّف الحافظ ابن حجر في "بلوغ المرام" إسناده.وأخرجه البيهقي 10/ 184 عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد. وقال: تفرَّد به سليمان بن عبد الرحمن الدمشقي.وأخرجه الدارقطني (4490)، وتمام في "الفوائد" (459) و (460)، والبيهقي 10/ 184 وفي "المعرفة" (20086)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 55/ 245 من طرق عن سليمان بن عبد الرحمن، به. وقال البيهقي في "المعرفة": غريب وفي إسناده من يُجهل.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7233)


7233 - أخبرنا الحسن بن يعقوب العدل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا عبد الوهاب بن [1] عطاء.وأخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أبو المثنَّى، حدثنا يحيى بن مَعِين، حدثنا عبد الوهاب بن عطاء، حدثنا سعيد، عن قَتَادة، عن أنس، قال: افتخرتِ الأوسُ والخزرجُ، فقالت الأوس: منَّا مَن أُجيزت شهادتُه بشهادةِ رجلين: خُزيمةُ بن ثابت [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আওস ও খাজরাজ গোত্র একে অপরের উপর গর্ব প্রকাশ করেছিল। তখন আওস গোত্র বলল: আমাদের মাঝে এমন ব্যক্তি আছেন যার সাক্ষ্যকে দুই ব্যক্তির সাক্ষ্যের সমান গণ্য করা হয়েছে: তিনি হলেন খুযাইমাহ ইবনু সাবিত।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية "بن" إلى: عن، وسلف مكررًا على الصواب برقم (7056). من "ميزان الاعتدال": أنَّ عبد الحق الإشبيلي ضعَّف هذا الحديث بإسحاق بن الفرات، ثم ذكر الذهبي أن بعضهم تكلم فيه. وضعَّف الحافظ ابن حجر في "بلوغ المرام" إسناده.وأخرجه البيهقي 10/ 184 عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد. وقال: تفرَّد به سليمان بن عبد الرحمن الدمشقي.وأخرجه الدارقطني (4490)، وتمام في "الفوائد" (459) و (460)، والبيهقي 10/ 184 وفي "المعرفة" (20086)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 55/ 245 من طرق عن سليمان بن عبد الرحمن، به. وقال البيهقي في "المعرفة": غريب وفي إسناده من يُجهل.



[2] إسناده قوي من أجل عبد الوهاب بن عطاء: وهو الخفاف. سعيد: هو ابن أبي عروبة.وسلف مطولًا برقم (7153). من "ميزان الاعتدال": أنَّ عبد الحق الإشبيلي ضعَّف هذا الحديث بإسحاق بن الفرات، ثم ذكر الذهبي أن بعضهم تكلم فيه. وضعَّف الحافظ ابن حجر في "بلوغ المرام" إسناده.وأخرجه البيهقي 10/ 184 عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد. وقال: تفرَّد به سليمان بن عبد الرحمن الدمشقي.وأخرجه الدارقطني (4490)، وتمام في "الفوائد" (459) و (460)، والبيهقي 10/ 184 وفي "المعرفة" (20086)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 55/ 245 من طرق عن سليمان بن عبد الرحمن، به. وقال البيهقي في "المعرفة": غريب وفي إسناده من يُجهل.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7234)


7234 - أخبرنا أحمد بن محمد بن سَلَمة العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا سليمان بن عبد الرحمن الدمشقي، حدثنا محمد بن مسروق، عن إسحاق بن الفُرات، عن ليث بن سعد، عن نافع، عن ابن عمر: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم رَدَّ اليمينَ على طالب الحقِّ [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অধিকার দাবিদারের উপর শপথ (চাওয়ার ক্ষমতা) ফিরিয়ে দিয়েছিলেন।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف، محمد بن مسروق - وهو الكندي الكوفي - مجهول الحال، قال ابن القطان: لا يعرف. وبه أعلَّه الذهبي في "تلخيصه"، وذكره ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 8/ 104، ولم يذكر فيه جرحًا ولا تعديلًا، وذكره ابن حبان في "ثقاته". ونقل الذهبي في ترجمة إسحاق بن الفرات من "ميزان الاعتدال": أنَّ عبد الحق الإشبيلي ضعَّف هذا الحديث بإسحاق بن الفرات، ثم ذكر الذهبي أن بعضهم تكلم فيه. وضعَّف الحافظ ابن حجر في "بلوغ المرام" إسناده.وأخرجه البيهقي 10/ 184 عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد. وقال: تفرَّد به سليمان بن عبد الرحمن الدمشقي.وأخرجه الدارقطني (4490)، وتمام في "الفوائد" (459) و (460)، والبيهقي 10/ 184 وفي "المعرفة" (20086)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 55/ 245 من طرق عن سليمان بن عبد الرحمن، به. وقال البيهقي في "المعرفة": غريب وفي إسناده من يُجهل.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7235)


7235 - أخبرني إسماعيل بن محمد بن الفضل بن محمد الشَّعراني، حدثنا جدِّي، حدثنا إبراهيم بن حمزة، حدثنا عبد العزيز بن محمد، عن كَثير بن زيد، عن الوليد بن رَبَاح، عن أبي هريرة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "الصُّلحُ جائزٌ بينَ المسلمين" [1].شاهدُه حديث عَمرو بن عوف [2]، وبه يعرف:




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মুসলমানদের মাঝে সন্ধি (বা আপোস) বৈধ।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن، وقد فصلنا القول فيه فيما سلف برقم (2340) و (2344). وأخرجه الترمذي (1352) تامًّا من طريق أبي عامر العقدي، عن كثير بن عبد الله، به. وقال: حسن صحيح.وانظر ما قبله.



[2] تحرَّف هنا في نسخنا الخطية إلى: عون. وأخرجه الترمذي (1352) تامًّا من طريق أبي عامر العقدي، عن كثير بن عبد الله، به. وقال: حسن صحيح.وانظر ما قبله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7236)


7236 - حدَّثَناه أبو عبد الله محمد بن يعقوب الشَّيباني، حدثنا محمد بن عبد الوهاب بن حبيب، حدثنا خالد بن مَخلَد، حدثنا كَثير بن عبد الله بن عمرو بن عَوف، عن أبيه، عن جدِّه، قال: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "الصُّلحُ جائزٌ بين المسلمين، إلَّا صلحًا حَرَّمَ حلالًا أو أحَلَّ حرامًا، والمسلمون على شُروطهم إلَّا شرطًا حَرَّمَ حلالًا" [1].




আমর ইবনু আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “মুসলমানদের মধ্যে আপোস-মীমাংসা বৈধ, তবে এমন আপোস নয় যা কোনো হালাল বস্তুকে হারাম করে দেয় অথবা কোনো হারাম বস্তুকে হালাল করে দেয়। আর মুসলিমগণ তাদের শর্তাবলির ওপর (অটল থাকবে), তবে এমন শর্ত নয় যা কোনো হালাল বস্তুকে হারাম করে দেয়।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف كثير بن عبد الله المزني، فالأكثرون على تضعيفه، وحسن الرأي فيه البخاري وتلميذه الترمذي، وأبوه عبد الله بن عمرو تفرَّد بالرواية عنه ولده كثير، ولم يؤثر توثيقه عنه غير ابن حبان.وأخرجه ابن ماجه (2353) عن أبي بكر بن أبي شيبة، عن خالد بن مخلد، بهذا الإسناد مختصرًا بشطره الأول. وأخرجه الترمذي (1352) تامًّا من طريق أبي عامر العقدي، عن كثير بن عبد الله، به. وقال: حسن صحيح.وانظر ما قبله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7237)


7237 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن حَيَّان، حدثنا إبراهيم بن معاوية أبو إسحاق الكَرابيسي، حدثنا هشام بن يوسف، عن مَعمَر، عن الزُّهْري، عن ابن كعب بن مالك، عن أبيه: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم حَجَرَ على معاذ بن جبل مالَه، وباعه بدَينٍ كان عليه [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




কা'ব ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মু'আয ইবনে জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সম্পদের উপর নিষেধাজ্ঞা আরোপ করেছিলেন এবং তা তাঁর উপর থাকা ঋণের কারণে বিক্রি করে দিয়েছিলেন।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف، وقد سلف مكررًا برقم (2379). إنما هو قول الرجل لصاحبه إذا ناوله الشيء: هاك، أي: خذ، فأسقطوا الكاف منه، وعوَّضوه المدّ بدلًا من الكاف.ومعنى "لا خِلابة" قال ابن الأثير: أي: لا خِداع.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7238)


7238 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا عبد الوهاب بن عطاء، أخبرنا سعيد، عن قَتَادة عن أنس بن مالك: أنَّ رجلًا كان على عهدِ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم يبتاعُ، وكان في عُقْدته ضعفٌ، فأتَى أهلُه رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فقالوا: يا نبيَّ الله، احجُزْ على فلان، فإنه يبتاعُ وفي عُقدتِه ضعفٌ، فدعاه نبيُّ الله صلى الله عليه وسلم، فنهاه عن البيع، قال: يا نبيَّ الله، إني لا أصبِرُ عن البيع، فقال: "إن كنتَ غيرَ تاركٍ البيعَ، فقُلْ: ها ولا خِلَابةَ" [1]. وهذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে এক ব্যক্তি কেনাবেচা করত, কিন্তু তার চুক্তির ক্ষেত্রে (বা বুদ্ধিমত্তার ক্ষেত্রে) দুর্বলতা ছিল। তখন তার পরিবারের লোকেরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: হে আল্লাহর নবী, আপনি অমুককে কেনাবেচা করা থেকে বিরত রাখুন, কারণ সে কেনাবেচা করে কিন্তু তার চুক্তির ক্ষেত্রে দুর্বলতা রয়েছে। এরপর আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে ডাকলেন এবং তাকে বেচাকেনা করতে নিষেধ করলেন। লোকটি বলল: হে আল্লাহর নবী, আমি বেচাকেনা ছাড়া থাকতে পারি না (তাতে ধৈর্য ধারণ করতে পারি না)। তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি তুমি বেচাকেনা না ছাড়তে পারো, তাহলে (যখন কিনবে) বলো: 'এই নাও, আর কোনো প্রতারণা করবে না'।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل يحيى بن أبي طالب وعبد الوهاب بن عطاء - وهو الخفاف - وقد توبعا.وأخرجه أحمد 21/ (13276)، وأبو داود (3501)، وابن حبان (5049) و (5050) من طرق عن عبد الوهاب بن عطاء بهذا الإسناد.وأخرجه ابن ماجه (2354)، والترمذي (1250)، والنسائي (6033) من طريق عبد الأعلى بن عبد الأعلى السامي، عن سعيد بن أبي عروبة، به.وفي الباب عن ابن عمر سلف عند المصنف برقم (2232).قوله: "في عقدته ضعف" أي: في رأيه ونظره في مصالح نفسه. قاله ابن الأثير في "النهاية".وقوله: "ها ولا خلابة" قال الخطابي في "معالم السنن" 3/ 67 - 68: ها وها معناه التقابض، وأصحاب الحديث يقولون: ها وها، مقصورَيْن والصواب مدُّهما ونصب الألف منهما. وقوله: هاء، إنما هو قول الرجل لصاحبه إذا ناوله الشيء: هاك، أي: خذ، فأسقطوا الكاف منه، وعوَّضوه المدّ بدلًا من الكاف.ومعنى "لا خِلابة" قال ابن الأثير: أي: لا خِداع.