আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
7319 - أخبرنا محمد بن علي الصَّنعاني بمكة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ائتَدِموا بالزَّيت وادَّهِنوا به، فإنَّه من شجرةٍ مُبارَكة" [1]. هذا حديث صحيح، على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা (যয়তুন) তেল দিয়ে আহার করো এবং তা দ্বারা মর্দন করো। কেননা তা এক বরকতময় গাছ থেকে এসেছে।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حسن بمجموع طرقه وشواهده، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن عبد الرزاق كان يضطرب فيه، فمرةً يصله ومرةً يرسله كما سيأتي.وأخرجه ابن ماجه (3319)، والترمذي (1851)، والطحاوي في "شرح المشكل" (4449) و (4450) من طرق عن عبد الرزاق، بهذا الإسناد.وأخرجه معمر في "جامعه" برواية عبد الرزاق (19568)، ومن طريق عبد الرزاق أخرجه الترمذي (1851 م) عن معمر، عن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا. وقال الترمذي: كان عبد الرزاق يضطرب في رواية هذا الحديث، فربما ذكر فيه عن عمر عن النبي صلى الله عليه وسلم، وربما رواه على الشك فقال: أحسبه عن عمر عن النبي صلى الله عليه وسلم، وربما قال: عن زيد بن أسلم عن أبيه عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا. ومثله قال أبو حاتم كما في "العلل" (1520).وأخرجه الطحاوي (4448)، والطبراني في "الأوسط" (9196) من طريق أبي قرة موسى بن طارق، عن زمعة بن صالح، عن زياد بن سعد، عن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن عمر. وزمعة وإن كان فيه ضعف يصلح في المتابعات والشواهد.وسلف الحديث عند المصنف من حديث أبي أسيد برقم (3546)، ومن حديث أبي هريرة برقم (3547).والإذن بالتداوي بالزيت جاء ضمن حديث زيد بن أرقم، وسيورده المصنف برقم (7631).
7320 - حدثنا أبو علي الحسين بن علي الحافظ، حدثنا عبد الله بن محمد بن ناجية، حدثنا عبد القدوس بن محمد بن عبد الكبير بن شعيب بن الحَبْحاب، حدثني محمد بن عبد الكبير، حدثني عمِّي عبد السلام بن شعيب، عن أبيه، عن أنس قال: أُتِيَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم بقَعْبٍ فيه لَبنٌ وعَسَلٌ [1]، فقال: "أُدْمَانِ في إناءٍ؟! لا آكلُه ولا أُحرِّمه" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একটি পাত্রে দুধ ও মধু আনা হলো। তিনি বললেন, "এক পাত্রে দুটি তরকারি (খাদ্যবস্তু)?!" (তারপর বললেন,) "আমি এটি খাবো না, তবে এটিকে হারামও ঘোষণা করছি না।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في (ز) و (م): فيه لبن من عسل، والمثبت من (ص) ومصادر التخريج. وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (7404) عن محمد بن أبان، عن عبد القدوس بن محمد، بهذا الإسناد. وقال: لم يروه عن شعيب بن الحبحاب إلّا ابنه عبد السلام، تفرد به عبد القدوس عن أبيه. كذا قال، لكن أخرجه القاسم بن موسى الأشيب في "جزئه" (26)، وكذا الضياء المقدسي في "الأحاديث المختارة" 6 / (2213) من طريق إبراهيم بن السندي، كلاهما (القاسم وإبراهيم) عن عبد القدوس بن محمد، عن عمه صالح بن عبد الكبير، عن عمِّه عبد السلام بن شعيب به. فجعلا مكان محمد بن عبد الكبير أخاه صالحًا، وصالح هذا مجهول الحال.القَعْب: هو القَدَح الكبير.والأُدْمان: مثنّى أُدْم، والأُدْم والإدام: ما يؤكل مع الخبز.
[2] إسناده ضعيف، محمد بن عبد الكبير لم يرو عنه سوى ابنه عبد القدوس، ولم يؤثر توثيقه عن غير ابن حبان، فهو في عداد المجهولين، وعمه عبد السلام بن شعيب كذلك لم يؤثر توثيقه عن غير ابن حبان. وهذا الحديث قد استنكره البخاري فيما نقله عنه الضياء في "المختارة"، وقال الذهبي في "تلخيص المستدرك": منكر. وضعّف إسناده بالجهالة الحافظُ ابن حجر في "فتح الباري" 16/ 479. وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (7404) عن محمد بن أبان، عن عبد القدوس بن محمد، بهذا الإسناد. وقال: لم يروه عن شعيب بن الحبحاب إلّا ابنه عبد السلام، تفرد به عبد القدوس عن أبيه. كذا قال، لكن أخرجه القاسم بن موسى الأشيب في "جزئه" (26)، وكذا الضياء المقدسي في "الأحاديث المختارة" 6 / (2213) من طريق إبراهيم بن السندي، كلاهما (القاسم وإبراهيم) عن عبد القدوس بن محمد، عن عمه صالح بن عبد الكبير، عن عمِّه عبد السلام بن شعيب به. فجعلا مكان محمد بن عبد الكبير أخاه صالحًا، وصالح هذا مجهول الحال.القَعْب: هو القَدَح الكبير.والأُدْمان: مثنّى أُدْم، والأُدْم والإدام: ما يؤكل مع الخبز.
7321 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْر [1] بن نصر، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني أبو هانئ الخَوْلاني، عن أبي علي الجَنْبي - وهو عمرو بن مالك - عن فَضَالة بن عُبيد، أنه سَمِع النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول: "أفلَحَ مَن هُدِيَ إلى الإسلام، وكان عيشُه كَفَافًا، وقَنِعَ به" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ফাদালাহ ইবনে উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "সেই ব্যক্তি সফল হয়েছে, যাকে ইসলামের দিকে পথপ্রদর্শন করা হয়েছে, যার জীবিকা ছিল প্রয়োজনমাফিক (ক্বাফাফান), এবং সে তাতেই সন্তুষ্ট ছিল।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: يحيى.
[2] إسناده صحيح. أبو هانئ الخولاني: هو حميد بن هانئ. وسلف برقم (98).
7322 - أخبرني أبو يحيى أحمد بن محمد بن صالح [1] السَّمَرقندي، حدثنا أبو عبد الله محمد بن نصر، حدثنا محمد بن محمد بن مرزوق الباهلي، حدثنا بِشر بن المبارَك الراسِبي، قال: ذهبتُ مع جَدِّي في وَلِيمةٍ فيها غالبٌ القطّان، قال: فجِيءَ بالخِوَان فوُضِعَ، فأمسك القومُ أيديَهم، فسمعتُ غالبًا القطّان يقول: ما لهم لا يأكلون؟ قالوا: ينتظرون الأُدْمَ، فقال غالب: حدَّثتنا كريمةُ بنت همَّام الطائيّة، عن عائشة أمِّ المؤمنين، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "أَكرِموا الخبزَ"، وإنَّ كرامةَ الخبز لا يُنتظَرُ به، فأكل وأكلنا [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আয়িশা উম্মুল মুমিনীন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমরা রুটিকে সম্মান করো।” আর রুটির সম্মান হলো, এর জন্য (অন্য কোনো তরকারির) অপেক্ষা করা হয় না। (এই কথা বলার পর তিনি) খেলেন এবং আমরাও খেলাম।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] وقع في نسخنا الخطية و"إتحاف المهرة" (23215): القاسم، وأثبتناه على الصواب من الرواية السالفة برقم (1154)، ومن الرواية الآتية برقم (7334)، ومن تاريخ الإسلام 8/ 95 للذهبي، وسمّاه: أحمد بن محمد بن إبراهيم بن صالح السمرقندي، فيكون منسوبًا في روايات المصنف إلى جد أبيه، ووقع في "لسان الميزان" 1/ 585: أحمد بن محمد بن إبراهيم بن حازم!
[2] إسناده ضعيف، بشر بن المبارك الراسبي روى عنه ثلاثة ولم يؤثر توثيقه عن غير ابن حبان، وكريمة بنت همّام روى عنها ثلاثة، ولم يؤثر توثيقها عن أحمد.قلت: نقل العقيلي في "الضعفاء" عقب حديث رواه من حديث ابن أم حرام رفعه (956): "أكرموا الخبز، فإنَّ الله أكرمه، وأخرجه لكم من بركات السماء والأرض"، عن ابن معين قال: أول هذا الحديث حق، وآخره باطل.وأخرجه البيهقي في "الشعب" (5482) من طريق محمد بن إسحاق، عن محمد بن محمد، بهذا الإسناد. ولم يسق لفظه.وأخرجه البيهقي (5481)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 55/ 106، والرافعي في "تاريخ قزوين" 4/ 9 من طريق محمد بن قبيصة، عن بشر بن المبارك، به.وقد رُوِيَت أحاديث في إكرام الخبز عن جماعة من الصحابة لا يصح منها شيء، وبعضها أشد ضعفًا من بعض، وقد تتبعها الشيخ ناصر الدين الألباني رحمه الله في "الضعيفة" (2884) و (2885)، والشيخ جاسم الدوسري في "الروض البسام" (973 - 975). وأخرجه أحمد 39/ (23733) من طريق قيس بن الربيع، عن عثمان بن شابور، عن شقيق أو نحوه: أنَّ سلمان دخل عليه رجل، فدعا له بما كان عنده، فقال: لولا أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم نهانا - أو لولا أنا نُهينا - أن يتكلّف أحدنا لصاحبه، لتكلّفنا لك. قيس فيه ضعف وشيخه عثمان مجهول.وانظر ما بعده.
7323 - أخبرنا علي بن عبد الله العطّار ببغداد، حدثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدثنا الحسين بن محمد المَرُّوذي [1]، حدثنا سليمان بن قَرْم، عن الأعمش، عن شَقيق، قال: دخلتُ أنا وصاحبٌ لي على سلمان، فقرَّب إلينا خبزًا ومِلحًا، فقال: لولا أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم نَهانا عن التكلُّفِ لتكلَّفتُ لكم، فقال صاحبي: لو كان في مِلْحنا سَعْترٌ، فَبَعَثَ بمِطْهرته إلى البقَّال فرَهَنَها، فجاء بسَعْتر فألقاه فيه، فلما أكلنا قال صاحبي: الحمد لله الذي قَنَّعَنا بما رَزَقَنا، فقال سلمانُ: لو قَنِعتَ بما رُزِقتَ، لم تكن مِطهَرتي مرهونةً عند البقَّال! [2] هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.وله شاهدٌ بمثل هذا الإسناد:
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (শফিক) বলেন: আমি ও আমার এক সাথী সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলাম। তিনি আমাদের সামনে রুটি ও লবণ পেশ করলেন। অতঃপর তিনি বললেন: যদি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে কষ্ট করে আয়োজন করতে নিষেধ না করতেন, তবে আমি অবশ্যই তোমাদের জন্য (ভালো খাবারের) ব্যবস্থা করতাম। তখন আমার সাথী বলল: যদি আমাদের এই লবণে সা'তার (এক প্রকার সুগন্ধী মসলা) থাকত! (শুনামাত্র) তিনি (সালমান) তাঁর ওযুর পাত্রটি নিয়ে মুদির দোকানে পাঠালেন এবং সেটি বন্ধক রাখলেন। এরপর (লোকটি) সা'তার নিয়ে আসলো এবং তা লবণের মধ্যে মিশিয়ে দিল। যখন আমরা খেলাম, আমার সাথী বলল: সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্য, যিনি আমাদেরকে তাঁর দেওয়া রিযিকে সন্তুষ্ট রেখেছেন। তখন সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তুমি যদি তোমার প্রাপ্ত রিযিকে সন্তুষ্ট থাকতে, তাহলে আমার ওযুর পাত্রটি মুদির দোকানে বন্ধক থাকত না!
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: المروزي. وأخرجه أحمد 39/ (23733) من طريق قيس بن الربيع، عن عثمان بن شابور، عن شقيق أو نحوه: أنَّ سلمان دخل عليه رجل، فدعا له بما كان عنده، فقال: لولا أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم نهانا - أو لولا أنا نُهينا - أن يتكلّف أحدنا لصاحبه، لتكلّفنا لك. قيس فيه ضعف وشيخه عثمان مجهول.وانظر ما بعده.
[2] حديث حسن بمجموع طرقه، وهذا إسناد ليّن من أجل سليمان بن قرم، وقد توبع.وأخرجه البيهقي في "الشعب" (9153) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد 39/ (23733) من طريق قيس بن الربيع، عن عثمان بن شابور، عن شقيق أو نحوه: أنَّ سلمان دخل عليه رجل، فدعا له بما كان عنده، فقال: لولا أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم نهانا - أو لولا أنا نُهينا - أن يتكلّف أحدنا لصاحبه، لتكلّفنا لك. قيس فيه ضعف وشيخه عثمان مجهول.وانظر ما بعده.
7324 - أخبرَناه علي بن عبد الله، حدثنا العباس بن محمد، حدثنا الحسين بن محمد، حدثنا الحسين بن الرَّمّاس، حدثنا عبد الرحمن بن مسعود العَبْدي، قال: سمعتُ سلمانَ الفارسيَّ يقول: نهانا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن نتكلَّفَ للضَّيف [1].
সালমান ফারসি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে মেহমানের জন্য অতিরিক্ত আয়োজনের চেষ্টা করতে (বা কষ্ট স্বীকার করতে) নিষেধ করেছেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حسن بمجموع طرقه، وإسناده ضعيف، عبد الرحمن بن مسعود العبدي روى عنه اثنان ولم يؤثر توثيقه عن أحد، فهو مجهول الحال، وقد توبع. والحسين بن الرماس ترجمه الخطيب في "تاريخه" 8/ 578 ونقل عن أحمد أنه قال: ما أرى به بأسًا.وأخرجه البيهقي في "الشعب" (9155) من أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 2/ 386، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" (298)، والطبراني في "الكبير" (6187)، والبيهقي في "الشعب" (9156)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 8/ 578 من طريق الحسين بن محمد المروذي به.وأخرجه أبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 1/ 56، والبيهقي (9154)، والخطيب 11/ 463 من طريق يونس بن محمد المؤدب، عن حسين بن الرّماس، به. وقرن بعبد الرحمن بن مسعودٍ سليمانَ بنَ رباح وزكريا بنَ إسحاق.وانظر ما قبله.
7325 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا الربيع بن سليمان، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني يحيى بن أيوب، عن عُبيد الله بن زَحْر، عن علي بن يزيد، عن القاسم، عن أبي أُمامة، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "إِنَّ أغبَطَ الناس عندي لَمؤمنٌ خفيفُ الحاذِ، ذو حَظٍّ من الصلاة، أحسَنَ عبادة الله، وأطاعَه [1] في السِّرّ غامضًا في الناس، لا يُشارُ إليه بالأصابع، وكان رِزقُه كَفَافًا، فصَبَرَ على ذلك"، ثم نَفَضَ [2] رسولَ الله صلى الله عليه وسلم بإصبعِه وقال: "عُجِّلتْ مَنيَّتُه، وقلَّتْ بَوَاكيهِ، وقلَّ تُراثُه" [3].هذا إسناد للشاميين صحيح عندهم، ولم يُخرجاه.
আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় আমার নিকট সবচেয়ে কাঙ্ক্ষিত মানুষ হলো সে এমন মু'মিন, যে হালকা অবস্থায় থাকে (অর্থাৎ জীবনের বোঝা হালকা), সালাতে যার অংশ রয়েছে, আল্লাহর ইবাদত উত্তমরূপে করে এবং গোপনে তাঁর আনুগত্য করে। মানুষের মাঝে সে থাকে অখ্যাত, আঙুল দিয়ে যাকে ইশারা করে দেখানো হয় না, আর তার রিযক ছিল প্রয়োজন অনুযায়ী পর্যাপ্ত (কফাফান); অতঃপর সে এর উপর ধৈর্য ধারণ করে।" এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নিজের আঙুল ঝেড়ে বললেন: "তার মৃত্যু ত্বরান্বিত হয়, তার রোদনকারী হয় কম এবং তার মীরাস (উত্তরাধিকার) হয় সামান্য।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في نسخنا الخطية: والطاعة، والمثبت من مصادر التخريج.
[2] كذا في نسخنا الخطية، وفي "مسند" أحمد و"سنن" الترمذي: نقر.
7325 [3] - إسناده ضعيف جدًّا، عبيد الله بن زحر ضعيف، وعلي بن يزيد - وهو الأَلهاني - واهي الحديث. القاسم: هو ابن عبد الرحمن الشامي.وأخرجه الترمذي (2347) من طريق عبد الله بن المبارك، عن يحيى بن أيوب، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 36/ (22167) من طريق أبي المهلب مطَّرح بن يزيد، و (22197) من طريق ليث بن أبي سليم، كلاهما عن عبيد الله بن زحر، به. وليس في الطريق الثانية ذكر لعلي بن يزيد الألهاني.وأخرجه ابن ماجه (4117) من طريق صدقة بن عبد الله السمين، عن إبراهيم بن مرة، عن أيوب بن سليمان، عن أبي أمامة. وهذا إسناد ضعيف أيضًا، صدقة ضعيف، وأيوب بن سليمان مجهول.وانظر تتمة تخريجه وشواهده في "مسند أحمد" 36/ (22167).
7326 - أخبرنا الحسين بن الحسن بن أيوب، حدثنا عبد الله بن أحمد بن أبي مَسَرَّة، حدثنا عبد الله بن يزيد المقرئ، حدثنا سعيد بن أبي أيوب، حدثنا شُرَحبيل بن شَريك، عن أبي عبد الرحمن، عن عبد الله بن عمرو، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "قد أفلحَ مَن أسلمَ، ورُزِق كَفَافًا، وقنَّعه اللهُ بما آتاه" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই সে ব্যক্তি সফলকাম, যে ইসলাম গ্রহণ করেছে, আর তাকে প্রয়োজনমাফিক রিযিক দেওয়া হয়েছে এবং আল্লাহ তাকে যা দিয়েছেন, তাতে সে তুষ্ট।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح. أبو عبد الرحمن: هو عبد الله بن يزيد الحُبلي.وأخرجه أحمد 11/ (6572)، ومسلم (1054)، والترمذي (2348) من طريق عبد الله بن يزيد المقرئ، بهذا الإسناد. واستدراك الحاكم له ذهول منه.وأخرجه أحمد (6609) من طريق ابن لهيعة، عن شرحبيل بن شريك، به.وأخرجه ابن ماجه (4138) من طريق عبيد الله بن أبي جعفر وحميد بن هانئ الخولاني، عن أبي عبد الرحمن الحبلي، به.وأخرجه ابن حبان (670) من طريق عبد الرحمن بن سلمة الجمحي، عن عبد الله بن عمرو.
7327 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن محمد البغدادي، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا علي بن عبد الله بن جعفر، حدثنا أبي، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي واقد اللَّيثي، قال: كان الناسُ في الجاهلية قبلَ الإسلام يَجُبُّون أسنِمةَ الإبل، ويقطعون ألَياتِ الغَنَم، فيأكلونها ويَجمُلُون منها الوَدَكَ، فلما قَدِمَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم سألوه عن ذلك، فقال: "ما قُطِعَ من البَهيمةِ وهي حَيَّةٌ، فهو مَيْتٌ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وقد قيل: عن زيد بن أسلم عن عطاء بن يسار عن أبي سعيد الخُدْري رضي الله عنه:
আবূ ওয়াকিদ আল-লাইসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: ইসলাম আসার পূর্বে জাহিলিয়্যাতের যুগে লোকেরা উটের কুঁজ কেটে নিত এবং ছাগলের চর্বিযুক্ত লেজ কেটে নিত। তারা সেগুলো খেতো এবং তা থেকে চর্বি বের করতো। যখন নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (মদিনায়) আসলেন, তখন তারা তাঁকে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করল। অতঃপর তিনি বললেন: "জীবন্ত প্রাণী থেকে যা কেটে নেওয়া হয়, তা মৃত (মৃতের সমতুল্য)।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث حسن بطرقه، وحسنه الترمذي، وقال: العمل عليه عند أهل العلم، وقال البخاري عنه: محفوظ. وقد اختلف فيه على زيد بن أسلم العدوي كما بينّاه في "مسند أحمد"، وعلي بن جعفر - وهو ابن نجيح السعدي مولاهم، وإن كان ضعيفا - قد توبع.وأخرجه أحمد 36/ (21903)، وأبو داود (2858)، والترمذي (1480) من طريق عبد الرحمن بن عبد الله بن دينار، عن زيد بن أسلم، بهذا الإسناد. وعبد الرحمن بن عبد الله فيه كلام، لكنه حسن في المتابعات والشواهد. وطريق عبد الرحمن بن عبد الله بن دينار هذه ستأتي عند المصنف برقم (7789).وانظر الحديثين بعده.يجملون: أي: يُذيبون، والوَدَك: الدُّهن. فأخرجه البزار (1220 - كشف الأستار) عن محمد بن مسكين، والطحاوي في "شرح المشكل" (1573) عن سليمان بن شعيب، كلاهما عن يحيى بن حسان، عن المسور بن الصلت، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد موصولًا. قال البزار عقبه: هكذا رواه المسور، وخالفه سليمان بن بلال فلم يصله. وكذلك أشار الطحاوي أنَّ الذي وصله هو المسور، وهو ضعيف.ثم أخرجاه بالسند المذكور من طريق يحيى بن حسان، عن سليمان بن بلال، عن زيد بن أسلم، عن عطاء مرسلًا. وقال البزار: لا نعلم أحدًا أسنده إلّا المسور، وليس هو بالحافظ.ورواه عبد الرحمن بنُ مهدي، عن سليمان بن بلال، عن زيد بن أسلم مرسلًا، فيما ذكره المصنف عقبَ هذه الرواية.وتابع سليمانَ بنَ بلال على إرساله معمرٌ، فأخرجه عبد الرزاق (8611) عنه عن زيد بن أسلم مرسلًا. ورجح الدارقطني في "العلل" (1152) و (2273) و (3037) المرسل على الموصول.وأخرجه المصنف فيما سيأتي برقم (7790) من طريق عبد العزيز بن عبد الله الأويسي عن سليمان بن بلال، عن زيد بن أسلم، عن عطاء، عن أبي سعيد.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 3/ 57، وأبو نعيم في "الحلية" 8/ 251 من طريق خارجة بن مصعب، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد. وخارجة بن مصعب - وهو السرخسي - متروك.
7328 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عبد الحَكَم، حدثنا يحيى بن حسان، حدثنا مِسوَر بن الصَّلْت وسليمان بن بلال [عن زيد بن أسلَم] [1] عن عطاء بن يَسَار، عن أبي سعيد الخُدْري: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم سُئِلَ عن جِبَاب أسنمةِ الإبل وألَيَات الغَنَم، فقال: "ما قُطِعَ من حيٍّ، فهو مَيْتٌ" [2]. رواه عبدُ الرحمن بن مهدي عن سليمان بن بلال عن زيد بن أسلم مرسلًا.وقيل: عن زيد بن أسلم عن ابن عمر:
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে উটের কুঁজ (যা জীবন্ত অবস্থায় কেটে নেওয়া হয়) এবং ভেড়ার চর্বিযুক্ত লেজের (যা জীবন্ত অবস্থায় কেটে নেওয়া হয়) অংশ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। তখন তিনি বললেন: "জীবন্ত প্রাণী থেকে যা কিছু কেটে নেওয়া হয়, তা মৃত (অর্থাৎ মৃত জানোয়ারের মতো হারাম)।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] ما بين المعقوفين سقط من النسخ الخطية، وكلام المصنف يقتضي وجوده، وجاء على الصواب في "إتحاف المهرة" (5497) و"تلخيص الذهبي"، وكذلك عند من أخرج الحديث. فأخرجه البزار (1220 - كشف الأستار) عن محمد بن مسكين، والطحاوي في "شرح المشكل" (1573) عن سليمان بن شعيب، كلاهما عن يحيى بن حسان، عن المسور بن الصلت، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد موصولًا. قال البزار عقبه: هكذا رواه المسور، وخالفه سليمان بن بلال فلم يصله. وكذلك أشار الطحاوي أنَّ الذي وصله هو المسور، وهو ضعيف.ثم أخرجاه بالسند المذكور من طريق يحيى بن حسان، عن سليمان بن بلال، عن زيد بن أسلم، عن عطاء مرسلًا. وقال البزار: لا نعلم أحدًا أسنده إلّا المسور، وليس هو بالحافظ.ورواه عبد الرحمن بنُ مهدي، عن سليمان بن بلال، عن زيد بن أسلم مرسلًا، فيما ذكره المصنف عقبَ هذه الرواية.وتابع سليمانَ بنَ بلال على إرساله معمرٌ، فأخرجه عبد الرزاق (8611) عنه عن زيد بن أسلم مرسلًا. ورجح الدارقطني في "العلل" (1152) و (2273) و (3037) المرسل على الموصول.وأخرجه المصنف فيما سيأتي برقم (7790) من طريق عبد العزيز بن عبد الله الأويسي عن سليمان بن بلال، عن زيد بن أسلم، عن عطاء، عن أبي سعيد.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 3/ 57، وأبو نعيم في "الحلية" 8/ 251 من طريق خارجة بن مصعب، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد. وخارجة بن مصعب - وهو السرخسي - متروك.
[2] حديث حسن بطرقه كسابقه، وهذا الإسناد فيه إشكال من جهة وصله في رواية سليمان بن بلال، فالمحفوظ عنه أنه أرسله كما سيأتي، ورواية غير المصنف من طريق يحيى بن حسان عنه مرسلة. وأما مِسوَر بن الصلت - وروايته هي المتصلة - فضعيف. فأخرجه البزار (1220 - كشف الأستار) عن محمد بن مسكين، والطحاوي في "شرح المشكل" (1573) عن سليمان بن شعيب، كلاهما عن يحيى بن حسان، عن المسور بن الصلت، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد موصولًا. قال البزار عقبه: هكذا رواه المسور، وخالفه سليمان بن بلال فلم يصله. وكذلك أشار الطحاوي أنَّ الذي وصله هو المسور، وهو ضعيف.ثم أخرجاه بالسند المذكور من طريق يحيى بن حسان، عن سليمان بن بلال، عن زيد بن أسلم، عن عطاء مرسلًا. وقال البزار: لا نعلم أحدًا أسنده إلّا المسور، وليس هو بالحافظ.ورواه عبد الرحمن بنُ مهدي، عن سليمان بن بلال، عن زيد بن أسلم مرسلًا، فيما ذكره المصنف عقبَ هذه الرواية.وتابع سليمانَ بنَ بلال على إرساله معمرٌ، فأخرجه عبد الرزاق (8611) عنه عن زيد بن أسلم مرسلًا. ورجح الدارقطني في "العلل" (1152) و (2273) و (3037) المرسل على الموصول.وأخرجه المصنف فيما سيأتي برقم (7790) من طريق عبد العزيز بن عبد الله الأويسي عن سليمان بن بلال، عن زيد بن أسلم، عن عطاء، عن أبي سعيد.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 3/ 57، وأبو نعيم في "الحلية" 8/ 251 من طريق خارجة بن مصعب، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد. وخارجة بن مصعب - وهو السرخسي - متروك.
7329 - حدَّثَناه أبو الطيِّب محمد بن أحمد الحِيرِي، حدثنا محمد بن عبد الوهاب العَبْدي، حدثنا موسى بن هارون البَرْدي، حدثنا مَعْن بن عيسى [1]، حدثنا هشام بن سعد، عن زيد بن أسلم، عن ابن عمر، أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال: "ما قُطِعَ من البَهيمةِ وهي حَيَّةٌ، فهو مَيْتٌ" [2].
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “জীবন্ত জন্তু থেকে যা কিছু কেটে নেওয়া হয়, তা মৃত।”
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: موسى. كذا قال، مع أنَّ الطبراني في "الأوسط" (7932)، وابن عدي في "الكامل" 5/ 230 و 231 أخرجاه من طريق عاصم بن عمر العمري، عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر. وعاصم بن عمر ضعيف، قال أبو حاتم - كما في "العلل" (1526) -: هذا حديث منكر.
[2] حديث حسن بطرقه، وهذا الإسناد فيه هشام بن سعد، وهو ليس بذاك القوي، وقد خالف غيرَه. كما في الحديثين السابقين - في روايته عن زيد بن أسلم بجعله من حديث ابن عمر.وأخرجه ابن ماجه (2316)، والبزار كما في "نصب الراية" 4/ 317، والدارقطني (4793) من طريق معن بن عيسى، بهذا الإسناد. وقال البزار: لا نعلمه يروى عن ابن عمر إلّا من هذا الوجه. كذا قال، مع أنَّ الطبراني في "الأوسط" (7932)، وابن عدي في "الكامل" 5/ 230 و 231 أخرجاه من طريق عاصم بن عمر العمري، عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر. وعاصم بن عمر ضعيف، قال أبو حاتم - كما في "العلل" (1526) -: هذا حديث منكر.
7330 - أخبرني محمد بن المؤمَّل بن الحسن، حدثنا الفضل بن محمد الشَّعراني، حدثنا نُعيم بن حمَّاد، حدثنا أبو أسامة، حدثنا حماد بن السائب، حدثنا إسحاق بن عبد الله بن الحارث، قال: سمعتُ ابنَ عباس يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "ذَكاةُ كلِّ مَسْكٍ دِباغُه"، فقلت له: إِنَّا نسافرُ مع هذه الأعاجم، ومعهم قُدُور يَطبُخون فيها المَيْتةَ ولحمَ الخنازير، فقال: "ما كان من فَخَّارٍ فاغلُوا فيها الماءَ ثم اغسِلوها، وما كان من النُّحاس فاغسِلوه، فالماءُ طَهُورٌ لكلِّ شيء" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "প্রত্যেক চামড়ার পবিত্রতা হলো তা দবাগ (চমড়া প্রক্রিয়াজাত) করা।" (বর্ণনাকারী ইসহাক ইবনু আবদুল্লাহ ইবনু হারিস বলেন) আমি তাকে বললাম: আমরা এই অনারবদের সাথে সফর করি। তাদের কাছে এমন হাঁড়ি থাকে, যাতে তারা মৃতজন্তু ও শূকরের মাংস রান্না করে। তিনি বললেন: "যদি তা মাটির তৈরি হয়, তবে তাতে পানি ফুটিয়ে নাও, তারপর তা ধুয়ে ফেল। আর যা তামা বা পিতলের তৈরি, তা ধুয়ে নাও। কেননা, পানি সবকিছুর জন্য পবিত্রকারী।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده تالف، حماد بن السائب - وهو محمد بن السائب الكلبي - متروك، قال الدارقطني كما في "موضح أوهام الجمع والتفريق" للخطيب 2/ 358: الذي روى عنه أبو أسامة هو محمد بن السائب الكلبي إلّا أنَّ أبا أسامة كان يُسميه حمادًا. أبو أسامة: هو حماد بن أُسامة القرشي مولاهم.وأخرجه الخطيب في "الموضح 2/ 357 - 358 من طريق محمد بن العلاء، عن أبي أسامة، بهذا الإسناد.ويغني عنه حديث أبي ثعلبة الخشني السالف برقم (508).والمَسْك، بفتح فسكون: هو الجِلد. وأخرجه الطحاوي في "شرح المشكل" (3750) عن محمد بن عبد الله بن عبد الحكم، بهذا الإسناد.وسلف برقم (4112).
7331 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، حدثنا حَرمَلة بن عبد العزيز بن الربيع بن سَبْرة الجُهَني، حدثني أبي عبد العزيز بن الربيع بن سَبْرة، عن أبيه، عن جَدِّه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأصحابه حين نَزَلَ الحِجْرَ: "من عَمِلَ من هذا الماء [طعامًا] [1] فليُلْقِه"، قال: فمنهم من عَجَنَ العجين، ومنهم من حاسَ الحَيْسَ فَأَلْقَوه [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
সাবরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হিজর (নামক স্থান)-এ অবতরণ করলেন, তখন তিনি তাঁর সাহাবীগণকে বললেন: "যে কেউ এই পানি দিয়ে কোনো খাবার তৈরি করেছে, সে যেন তা ফেলে দেয়।" বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর তাদের মধ্যে কেউ কেউ আটা মেখেছিল এবং কেউ কেউ ‘হাইস’ (খেজুর, ঘি ও পনির মিশ্রিত এক ধরনের খাবার) তৈরি করেছিল। সুতরাং তারা সেগুলো ফেলে দিল।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] لم يرد في نسخنا الخطية، وأثبتناه من المطبوع ومصدر التخريج. وأخرجه الطحاوي في "شرح المشكل" (3750) عن محمد بن عبد الله بن عبد الحكم، بهذا الإسناد.وسلف برقم (4112).
[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل عبد العزيز بن الربيع. وأخرجه الطحاوي في "شرح المشكل" (3750) عن محمد بن عبد الله بن عبد الحكم، بهذا الإسناد.وسلف برقم (4112).
7332 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا محمد بن غالب وإسحاق بن الحسن، قالا: حدثنا عفّان، حدثنا أبو عَوَانة، عن سِماك بن حرب، عن جابر بن سَمُرة قال: فُلِتَ [1] بغلٌ عند رجلٍ، فأتى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يستفتيه، فزعم جابر بن سَمُرة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال لصاحبها: "أما لك ما يُغنيكَ عنها؟ " قال: لا، قال: "اذهَبْ فكُلْها" [2].صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
জাবির ইবনু সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তির কাছে একটি খচ্চর মুক্ত হয়ে পড়েছিল। তখন সে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এসে ফতোয়া চাইল। জাবির ইবনু সামুরাহ বর্ণনা করেছেন যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার মালিককে বললেন: "তোমার কি এমন কিছু নেই যা এটিকে ছাড়াই তোমার প্রয়োজন মেটাবে?" সে বলল: "না।" তিনি বললেন: "যাও, এটি খেয়ে ফেলো।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] كذا في النسخ: فلت، بالفاء مبنيٌّ للمفعول، والمعنى: مات فجأةً، ويمكن أن تكون: قَلِتَ، بالقاف كسَمِعَ، والقَلَت: الهلاك.
[2] منكر، سماك بن حرب اختلف فيه كلام أهل العلم، لكنه إذا انفرد بأصل لم يكن حجة، لأنه كان يُلقَّن فيتلقن كما قال النسائي، وقد انفرد بهذا الحديث، كما أن الرواة اختلفوا عليه، فجعل الأكثرون أنَّ الدابة التي ماتت هي ناقة، وجعلها أبو عوانة عنه بغلًا! ومع ذلك فقد نقل الخطيب في "الجامع لأخلاق الراوي" (1336) أن أحمد سُئل عن معناه، فقال: صحيح، ولا أعرف معناه.وأخرجه أحمد 34/ (20824) عن عفّان بن مسلم، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الله بن أحمد (20918)، والطبراني في "الكبير" (1977)، والبيهقي 9/ 356 من طرق عن أبي عوانة، به. ووقع في رواية البيهقي: مات بغل أو قال: ناقة. وقال عبد الله بن أحمد: الصواب ناقة.وأخرجه أحمد (20815) من طريق شريك النخعي، و (20993) من طريق حماد بن سلمة، كلاهما عن سماك، به.
7333 - حدثنا بكر بن محمد الصَّيرفي بمَرْو، حدثنا أبو قِلابة الرَّقَاشي، حدثنا أبو عاصم، حدثنا الأوزاعي، حدثنا حسان بن عطيّة، عن أبي واقدٍ اللَّيثي قال: قلتُ: يا رسولَ الله، إنَّا بأرضٍ مَخْمَصةٍ، فما يَحِلُّ لنا من المَيْتة؟ قال: "إذا لم تَصطَبِحوا، ولم تَغْتبِقوا، ولم تَحتَفِئوا [1] بها بَقْلًا، فشأنَكم بها" [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আবু ওয়াকিদ আল-লায়সী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম: "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমরা এমন এক এলাকায় আছি যেখানে চরম ক্ষুধা (বা দুর্ভিক্ষ), এমতাবস্থায় মৃত জন্তু খাওয়া আমাদের জন্য কতটা হালাল?" তিনি বললেন: "যখন তোমরা সকালের নাস্তা না পাও, সন্ধ্যার খাবারও না পাও, এবং তা দিয়ে শাক-সবজির সাথে মিশিয়েও পেট না ভরাও, তবে তোমাদের জন্য তা গ্রহণ করা বৈধ।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في (ص) و (م): تحتفوا، والمثبت من (ز)، وكلا الوجهين قد ورد، قال أبو عبيد: هو من الحفأ مهموز مقصور، وهو أصل البَردي الأبيض الرطب، وقد يؤكل، يعني: ما لم تقتلعوا هذا بعينه فتأكلوه. ويروى: ما لم تحتفُّوا، بالتشديد من: احتففتُ الشيء: إذا أخذتَه كلَّه. وذُكر له وجوه أخرى، انظر "النهاية" (حفف) لابن الأثير.
[2] حديث محتمل للتحسين، وهذا إسناد قد اختلف فيه على الأوزاعي - وهو عبد الرحمن بن عمرو - فروى عنه منقطعًا بين حسان بن عطية وبين أبي واقد الليث كما في هذه الرواية، وروي عنه متصلًا بذكر الواسطة بينهما، واختلف في هذه الواسطة، فقيل: هو مسلم بن مِشكَم، وقيل: مسلم بن يزيد، وقيل: مرثد أبو مرثد، وجاء مرة عن رجل سُمّي له على الإبهام، وروي عنه عن حسان مرسلًا. وذكرنا تخريجها في "مسند أحمد".فقد أخرجه أحمد 36/ (21898) عن محمد بن القاسم، و (21901) عن الوليد بن مسلم، كلاهما عن الأوزاعي، بهذا الإسناد. وانظر تتمة تخريجه هناك.وفاتنا هناك أن نذكر الطريق التي سمي بها الواسطة: مسلم بن يزيد، فنذكرها هاهنا:فأخرجه ابن حذلم في "جزء من حديث الأوزاعي" (33) من طريق عبد الله بن كثير الطويل القارئ، عن الأوزاعي، عن حسان بن عطية، عن مسلم بن يزيد عن أبي واقد.وانظر الأحاديث غيرها.قوله: "تغتبقوا" من الغَبوق، بفتح الغين: الشُّرب بالعَشيّ، وخصَّ بعضهم به اللبن المشروب في ذلك الوقت. انظر "لسان العرب" (عبق).
7334 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق إملاءً، حدثنا إسماعيل بن قُتيبة، حدثنا يحيى بن يحيى.وأخبرني أحمد بن محمد بن صالح السَّمَرقندي، حدثنا محمد بن نصر، حدثنا يحيى بن يحيى، أخبرنا خارجة، عن ثَور بن يزيد، عن راشد بن سعد، عن سَمُرة بن جُندب، أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال: "إذا رَوَّيْتَ أهلَك من اللَّبن غَبُوقًا، فاجتنِبْ ما نهى اللهُ عنه من مَيْتَةٍ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، وله أصلٌ بإسناد صحيح على شرط الشيخين:
সামুরা ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তুমি তোমার পরিবারকে রাতের পানের জন্য পর্যাপ্ত দুধ দ্বারা পরিতৃপ্ত করো, তখন আল্লাহ যা নিষেধ করেছেন অর্থাৎ মৃত জন্তু (খাওয়া) থেকে বিরত থাকো।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، خارجة - وهو ابن مصعب الخراساني - متروك، ولم يتنبَّه لذلك الذهبيُّ في "تلخيصه".وأخرجه البيهقي 9/ 357 من طريق داود بن الحسين، عن يحيى بن يحيى، بهذا الإسناد. وفيه يقول ثور: عن راشد بن سعد وأعطاني كتابًا عن سمرة.وأخرج الطبراني في "الكبير" (7028) و (7046) من طريق جعفر بن سعد بن سمرة، عن خبيب بن سليمان بن سمرة، عند أبيه، عن جده سمرة، ضمن حديث طويل، وفيه: "إذا روَّيت أهلك غبوقًا من اللبن فاجتنب ما حُرِّم عليك من الطعام"، وفي سنده غير واحد ضعيف ومجهول.وأخرج الطبري في "تفسيره" 6/ 87 من طريق ابن إسحاق، حدثني عمر بن عبد الله بن عروة، عن جدِّه عروة بن الزبير، عمَّن حدَّثه: أنَّ رجلًا من الأعراب أتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فذكر حديثًا ثم سأله الأعرابي: ما غنايَ الذي أدعُه إذا وجدته؟ فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "إذا أروَيتَ أهلك غَبوقًا من الليل، فاجتنِبْ ما حرَّم اللهُ عليك من طعام". وسنده ضعيف.وانظر ما بعده. وأخرج الطبري 6/ 87 من طريقين عن هشيم، عن الخصيب بن زيد التميمي، عن الحسن: أنَّ رجلًا سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: إلى متى يحلُّ لي الحرام؟ فقال: "إلى أن يَروَى أهلك من اللبن أو تجيء مِيرتُهم". ورجاله ثقات لكنه مرسل، وفيه التصريح بسماع هشيم من الخصيب، وسماع الخصيب من الحسن البصري.قوله: "الضارورة" قال ابن الأثير في "النهاية": هو لغة في الضَّرورة.والغَبوق: الشرب بالعشيّ، والصَّبوح: الشرب بالغَدَاة.
7335 - حدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أبو المثنّى، حدثنا أبي، عن أبيه، حدثنا ابن عَوْن، قال: قرأتُ عند الحسن كتابَ سَمُرة بن جندب إلى بَنِيه، وفيه: إِنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قال: "يُجرئُ من الضَّرُورة - أو الضارورة - غَبُوقٌ أو صَبُوح" [1].
সামুরা ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “চরম অভাবের সময়ে — অথবা অভাবের সময়ে — রাতের খাবার (গাবূক) অথবা সকালের খাবার (সাবূহ) যথেষ্ট হয়।”
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] صحيح موقوفًا، وهذا إسناد رجاله ثقات لكن أبا المثنى - وهو معاذ بن المثنى بن معاذ بن معاذ العنبري - قد خالفه من هم أكثر وأوثق، فرووه موقوفًا كما سيأتي. ابن عون: هو عبد الله المزني.وأخرجه مرفوعًا تمام في "فوائده" (128) من طريق إسماعيل ابن عليّة، وأبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 1/ 94 من طريق رجل مبهم، كلاهما عن ابن عون، بهذا الإسناد. وكلا الإسنادين ضعيف.وأخرجه موقوفًا أبو إسحاق الفزاري في "السير" (357)، وكذا أبو عبيد في "غريب الحديث" 1/ 61 - ومن طريقه البيهقي 9/ 356 - عن معاذ بن معاذ العنبري، والطبري في "تفسيره" 6/ 87 من طريق إسماعيل ابن علية، ثلاثتهم (أبو إسحاق ومعاذ وابن علية) عن عبد الله بن عون، به. وأخرج الطبري 6/ 87 من طريقين عن هشيم، عن الخصيب بن زيد التميمي، عن الحسن: أنَّ رجلًا سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: إلى متى يحلُّ لي الحرام؟ فقال: "إلى أن يَروَى أهلك من اللبن أو تجيء مِيرتُهم". ورجاله ثقات لكنه مرسل، وفيه التصريح بسماع هشيم من الخصيب، وسماع الخصيب من الحسن البصري.قوله: "الضارورة" قال ابن الأثير في "النهاية": هو لغة في الضَّرورة.والغَبوق: الشرب بالعشيّ، والصَّبوح: الشرب بالغَدَاة.
7336 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ العدل، حدثنا الحسن بن علي بن شَبيب المَعمَري، حدثنا الهيثم بن خارجة، حدثنا المُعافَى بن عِمران، عن أبي بكر بن عبد الله بن أبي مريم، عن ضَمْرة بن حبيب، عن أم عبد الله [1] أختِ شدَّاد بن أوس: أنها بعثت إلى النبيِّ صلى الله عليه وسلم بقَدَحِ لبنٍ عند فِطْرِه، وذلك في طول النهار وشدَّة الحرِّ، فردَّ إليها الرسولَ: ["أنَّى لكِ هذا اللَّبنُ؟ " قالت: من شاةٍ لي، قال] [2]: "أنَّى لكِ هذه الشاةُ؟ " قالت: اشتريتُها من مالي، فشَرِبَ، فلمّا أن كان من الغد، أتت أمُّ عبد الله رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فقالت: يا رسولَ الله، بعثتُ إليك بذلك اللَّبن مَرْثِيَةً لك من شدّةِ الحرِّ وطولِ النهار، فرَدَدتَ إليَّ فيه الرسولَ، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "بذلكِ أُمِرَتِ الرسلُ ألَّا تأكلَ إلَّا طيّبًا، ولا تعملَ إلَّا صالحًا" [3]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
উম্মু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি শাদ্দাদ ইবনে আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বোন, থেকে বর্ণিত, তিনি (উম্মু আবদুল্লাহ) নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের ইফতারের সময় এক পেয়ালা দুধ পাঠালেন। এটি ছিল দীর্ঘ দিন এবং প্রচণ্ড গরমের সময়। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছে একজন দূতকে ফেরত পাঠালেন: "তুমি এই দুধ কোথা থেকে পেলে?" তিনি বললেন, "আমার একটি ছাগল থেকে।" তিনি বললেন, "তুমি এই ছাগল কোথা থেকে পেলে?" তিনি বললেন, "আমি আমার সম্পদ দিয়ে এটি কিনেছি।" অতঃপর তিনি পান করলেন।
পরের দিন উম্মু আবদুল্লাহ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট এলেন এবং বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল! প্রচণ্ড গরম ও দীর্ঘ দিনের কষ্টের কারণে আপনার প্রতি সমবেদনা জানিয়ে আমি এই দুধ পাঠিয়েছিলাম, কিন্তু আপনি তা দূত মারফত ফেরত পাঠালেন।" তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, "এইরূপ আদেশই সকল রাসূলকে দেওয়া হয়েছিল যে, তারা যেন পবিত্র বস্তু ছাড়া অন্য কিছু না খায় এবং সৎকর্ম ছাড়া অন্য কোনো কাজ না করে।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] وقع في نسخنا الخطية: أم عبد الله بن أخت شداد، وهو خطأ. ابن جعفر الوركاني، عن المعافى بن عمران، به مختصرًا.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3348)، والطبراني في "الكبير" 25/ (428)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (7981) من طريق الوليد بن مسلم، والطبراني في "الشاميين" (1488) من طريق عيسى بن يونس، كلاهما عن أبي بكر بن أبي مريم، به.ومع قول أبي نعيم المتقدم في "الحلية" بأنه تفرد به ابن أبي مريم، قال في "معرفة الصحابة" عقبه: ورواه عبد الله بن صالح، عن معاوية بن صالح، عن ضمرة نحوه! ولم نقف على هذا الطريق حتى نعرف صحته ولفظ متنه، ومع ذلك فيه عبد الله بن صالح - وهو كاتب الليث - وهو سيئ الحفظ.ويغني عنه حديث أبي هريرة عند مسلم (1015) وغيره مرفوعًا: "أيها الناس إنَّ الله طيبٌ لا يقبل إلّا طيبًا، وأنَّ الله أمر المؤمنين بما أمر به المرسلين، فقال: {يَاأَيُّهَا الرُّسُلُ كُلُوا مِنَ الطَّيِّبَاتِ وَاعْمَلُوا صَالِحًا إِنِّي بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌ} وقال: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُلُوا مِنْ طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْ} … " الحديث.قولها: "مَرثيَةً لك" أي: توجُّعًا وإشفاقًا، مِن رَثَى له: إذا رقَّ وتوجَّع، وهي من أبنية المصادر، نحو المغفرة والمعذرة. قاله صاحب "النهاية" (رثي).
[2] ما بين المعقوفين لم يرد في نسخنا الخطية، وأثبتناه من المطبوع ومصادر التخريج. ابن جعفر الوركاني، عن المعافى بن عمران، به مختصرًا.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3348)، والطبراني في "الكبير" 25/ (428)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (7981) من طريق الوليد بن مسلم، والطبراني في "الشاميين" (1488) من طريق عيسى بن يونس، كلاهما عن أبي بكر بن أبي مريم، به.ومع قول أبي نعيم المتقدم في "الحلية" بأنه تفرد به ابن أبي مريم، قال في "معرفة الصحابة" عقبه: ورواه عبد الله بن صالح، عن معاوية بن صالح، عن ضمرة نحوه! ولم نقف على هذا الطريق حتى نعرف صحته ولفظ متنه، ومع ذلك فيه عبد الله بن صالح - وهو كاتب الليث - وهو سيئ الحفظ.ويغني عنه حديث أبي هريرة عند مسلم (1015) وغيره مرفوعًا: "أيها الناس إنَّ الله طيبٌ لا يقبل إلّا طيبًا، وأنَّ الله أمر المؤمنين بما أمر به المرسلين، فقال: {يَاأَيُّهَا الرُّسُلُ كُلُوا مِنَ الطَّيِّبَاتِ وَاعْمَلُوا صَالِحًا إِنِّي بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌ} وقال: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُلُوا مِنْ طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْ} … " الحديث.قولها: "مَرثيَةً لك" أي: توجُّعًا وإشفاقًا، مِن رَثَى له: إذا رقَّ وتوجَّع، وهي من أبنية المصادر، نحو المغفرة والمعذرة. قاله صاحب "النهاية" (رثي).
7336 [3] - إسناده ضعيف من أجل أبي بكر بن أبي مريم، وبه أعله الذهبي في "التلخيص"، فقال: ابن أبي مريم واهٍ.وأخرجه ابن أبي الدنيا في "كتاب الورع" (116)، وعبد الله بن أحمد في زوائد "الزهد" (2357) - ومن طريقه الطبراني في "مسند الشاميين" (1488)، وأبو نعيم في "الحلية" 6/ 105 - عن الهيثم بن خارجة، بهذا الإسناد.ووقع في مطبوع الزهد زيادة "حدثني أبي" فصار الحديث من رواية أحمد، وهو خطأ، وقال أبو نعيم عقبه: هذه الأحاديث غرائب من حديث ضمرة، تفرَّد بها أبو بكر بن أبي مريم عنه.وأخرجه ابن أبي خيثمة في السفر الثاني من "التاريخ الكبير" (3264) و (3611) عن محمد ابن جعفر الوركاني، عن المعافى بن عمران، به مختصرًا.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3348)، والطبراني في "الكبير" 25/ (428)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (7981) من طريق الوليد بن مسلم، والطبراني في "الشاميين" (1488) من طريق عيسى بن يونس، كلاهما عن أبي بكر بن أبي مريم، به.ومع قول أبي نعيم المتقدم في "الحلية" بأنه تفرد به ابن أبي مريم، قال في "معرفة الصحابة" عقبه: ورواه عبد الله بن صالح، عن معاوية بن صالح، عن ضمرة نحوه! ولم نقف على هذا الطريق حتى نعرف صحته ولفظ متنه، ومع ذلك فيه عبد الله بن صالح - وهو كاتب الليث - وهو سيئ الحفظ.ويغني عنه حديث أبي هريرة عند مسلم (1015) وغيره مرفوعًا: "أيها الناس إنَّ الله طيبٌ لا يقبل إلّا طيبًا، وأنَّ الله أمر المؤمنين بما أمر به المرسلين، فقال: {يَاأَيُّهَا الرُّسُلُ كُلُوا مِنَ الطَّيِّبَاتِ وَاعْمَلُوا صَالِحًا إِنِّي بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌ} وقال: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُلُوا مِنْ طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْ} … " الحديث.قولها: "مَرثيَةً لك" أي: توجُّعًا وإشفاقًا، مِن رَثَى له: إذا رقَّ وتوجَّع، وهي من أبنية المصادر، نحو المغفرة والمعذرة. قاله صاحب "النهاية" (رثي).
7337 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الربيع بن سليمان، حدثنا أَسد بن موسى، حدثنا مسلم بن خالد، حدثني زيد بن أسلم، عن سُمَيّ، عن أبي صالح، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إذا دخلَ أحدُكم على أخيه فأطعَمَه طعامًا، فليأكُلْ منه ولا يَسأَلْه عنه، وإن سَقَاه شرابًا فليشرَبْ منه ولا يَسألْ عنه" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وله شاهدٌ صحيح على شرط مسلم وحدَه:
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ তার (মুসলিম) ভাইয়ের কাছে যায় এবং সে তাকে খাবার খাওয়ায়, তখন সে যেন তা থেকে খায় এবং খাবার সম্পর্কে তাকে কোনো প্রশ্ন না করে। আর যদি সে তাকে পানীয় পান করায়, তবে সে যেন তা পান করে এবং সে সম্পর্কে তাকে কোনো প্রশ্ন না করে।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف، مسلم بن خالد - وهو الزنجي - ضعيف. سُمَي: هو القرشي المخزومي مولاهم.وأخرجه أحمد 15/ (9184) عن حسين بن محمد، عن مسلم بن خالد، بهذا الإسناد.
7338 - حدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا بِشر بن موسى [حدثنا] [1] الحُمَيدي، حدثنا سفيان، عن ابن عَجْلان، عن سعيد، عن أبي هريرة روايةً قال: "إذا دخلتَ على أخيك المسلم، فأطعَمَك طعامًا، فكُلْ ولا تسألْه، وسَقَاك شرابًا، فاشرَبْه ولا تسألْ" [2].
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (মারফূ’ সূত্রে) বলেন: যখন তুমি তোমার মুসলিম ভাইয়ের কাছে যাও, আর সে তোমাকে কোনো খাবার খেতে দেয়, তখন তুমি খাও এবং তাকে প্রশ্ন করো না। আর সে যদি তোমাকে কোনো পানীয় পান করায়, তবে তুমি তা পান করো এবং তাকে প্রশ্ন করো না।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] سقطت من النسخ الخطية، وبشر بن موسى هذا هو راوية الحميدي: وهو عبد الله بن الزبير بن عيسى الأسدي.
[2] رجاله ثقات، لكن اختلف في رفعه ووقفه، فرواه المصنف كما هنا مرفوعًا، ورواه غيره عن سفيان موقوفًا، والموقوف أصوب كما قال الدارقطني في "العلل" (2076).ورواه عبد الرزاق (17023)، وابن أبي شيبة 8/ 290 كلاهما عن سفيان بن عيينة، عن ابن عجلان، عن سعيد، عن أبي هريرة موقوفًا، وزادوا: "فإن رابَكَ (يعني شرابه): فاشجَحْه بالماء".وأخرجه عبد الرزاق (1724) عن أبي معشر نجيح السندي، عن سعيد، عن أبيه، عن أبي هريرة موقوفًا أيضًا. وأبو معشر ضعيف.