হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7359)


7359 - حدثني علي بن عيسى، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا ابن أبي عمر، حدثنا سفيان، عن أبي الزَّعْراء، عن عمِّه أبي الأحوص، قال: قال عبد الله: كنا نَعُدُّ الإمَّعةَ في الجاهلية الرجلَ يُدعَى إلى الطعام فيذهبُ بآخرَ معه ولم يُدْعَ، وهو اليومَ فيكم المُحقِبُ دينَه الرِّجالَ [1].صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وقد رُوي بإسناد صحيح شاهد [له]:




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: জাহেলিয়াতের যুগে আমরা ‘ইম্‌মা‘আ’ মনে করতাম এমন ব্যক্তিকে, যাকে খাবারের দাওয়াত দেওয়া হতো কিন্তু সে অন্য এমন একজনকে তার সাথে নিয়ে যেত যাকে দাওয়াত দেওয়া হয়নি। আর আজ তোমাদের মাঝে ‘ইম্‌মা‘আ’ হলো সেই ব্যক্তি, যে তার দ্বীনকে অন্যদের সাথে জুড়ে দেয় (অর্থাৎ, দ্বীনের বিষয়ে অন্ধভাবে অন্যদের অনুসরণ করে)।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح. أبو الأحوص: هو عوف بن مالك الجُشمي، وأبو الزعراء: هو عمرو بن عمرو - ويقال: ابن عامر - بن مالك الجشمي، وسفيان: هو ابن عينية، وابن أبي عمر: هو محمد بن يحيى العدني.وأخرجه الطحاوي في "شرح المشكل" 15/ 408، والبيهقي في "المدخل" (378)، وابن عبد البر في "جامع بيان العلم" (1874) و (1876) من طرق عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. وزاد في رواية الطحاوي: الذي يمنح دينَه غيره، فيما ينتفع به ذلك الغير في دنياه، ويبقى إثمه عليه. والذي يظهر أنَّ هذا من كلام الطحاوي نفسه.وأخرجه البزار (2071)، والطبراني (8766)، وأبو الشيخ في "ذكر الأقران" (56) من طريق أبي إسحاق السبيعي، عن أبي الأحوص، به. وفي الطريق إليه عمرو بن عبد الغفار الفقيمي وهو متروك.والمُحقِب: هو الذي يقلّد الناس دينه لكل أحد بلا حجة ولا برهان ولا رويَّة، واشتقاقه من الإرداف على الحَقيبة. قاله ابن الأثير في "النهاية" (حقب).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7360)


7360 - أخبرَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن غالب، حدثنا سليمان بن حرب وعمرو بن مرزوق، قالا: حدثنا شُعبة، عن إبراهيم الهَجَري، عن أبي الأحوص، عن عبد الله، قال: كُنَّا نسمِّي الإمَّعةَ في الجاهلية الرجل يُدعى إلى الطعام فيَتبَعُه الرجلُ، وهو اليومَ الذي يُحقِبُ الناسَ دينَه، فكنا نسمّي العِضَةَ السِّحرَ، وهو اليومَ قيلَ وقالَ [1].




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা জাহিলিয়াতের যুগে ‘ইম্মাআ’ (Imma'ah) বলতাম সেই ব্যক্তিকে, যাকে খাবারের দাওয়াত দেওয়া হয় এবং অন্য এক ব্যক্তি তাকে অনুসরণ করে (বা তার সাথে যায়)। আর বর্তমানে সেই ব্যক্তিই সে, যে লোকেদেরকে তাদের দ্বীন থেকে ফিরিয়ে দেয় (বা তাদের দ্বীনের ক্ষতি করে)। আর আমরা ‘আল-‘ইদাহ’ বলতাম যাদুকে (সিহরকে)। আর বর্তমানে এটি হলো ‘ক্বিলা ওয়া ক্বালা’ (গুজব বা জনশ্রুতি)।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] خبر صحيح، إبراهيم - وهو ابن مسلم العبدي، وإن كان ضعيفًا - متابع في الرواية السابقة.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (8767) من طريق عمرو بن حكّام، عن شعبة، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7361)


7361 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، حدثني أَبي، أخبرنا الليث بن سعد، عن معاوية بن صالح، عن أبي طلحة - وهو نُعيم بن زياد - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال: "أَيُّما ضَيفٍ نزلَ بقومٍ فأصبحَ الضَّيفُ محرومًا، فله أن يأخذَ بقَدْرِ قِرَاهُ، ولا حَرَجَ عليه" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وله شاهد بإسناد صحيح:




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে কোনো মেহমান যদি কোনো সম্প্রদায়ের কাছে এসে অবস্থান করে এবং সেই মেহমান যদি বঞ্চিত অবস্থায় সকাল করে, তবে তার জন্য অনুমতি রয়েছে যে সে তার মেহমানদারীর প্রাপ্য পরিমাণ গ্রহণ করবে এবং এতে তার কোনো দোষ হবে না।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه أحمد 14/ (8948) عن قتيبة بن سعيد، عن الليث بن سعد، بهذا الإسناد.قوله: "بقدر قِراه" بكسر القاف: هو ما يصنع للضيف من طعام وشراب. وانظر في حكمه "فتح الباري" لابن حجر عند الحديثين (2461) و (6137).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7362)


7362 - حدَّثَناه أبو عبد الله محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عبد الوهاب الفرَّاء، حدثنا عمار بن عبد الجبار، حدثنا شُعبة، عن أبي الجُوديِّ، عن سعيد بن المهاجر، عن المِقدام بن أبي كَريمة، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم قال: "أيُّما مسلمٍ أضافَ قومًا فأصبحَ الضَّيفُ محرومًا، فإنَّ حقًّا على كلِّ مسلمٍ نصرُه حتى يأخُذَ بقِرَى ليلتِه من زرعِه ومالِه" [1].




আল-মিকদাম ইবনু আবী কারীমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে কোনো মুসলমান কোনো এক গোত্রের মেহমান হলো, কিন্তু সে মেহমান (আতিথেয়তার হক থেকে) বঞ্চিত অবস্থায় সকাল করলো, তবে প্রত্যেক মুসলমানের উপর আবশ্যক হলো তাকে সাহায্য করা—যাতে সে তার ফসল বা সম্পদ থেকে এক রাতের মেহমানদারীর অধিকার আদায় করে নিতে পারে।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف لجهالة سعيد بن المهاجر. أبو الجودي: هو الحارث بن عمير.وأخرجه أحمد 28/ (17178) و (17197) و (17198)، وأبو داود (3751) من طرق عن شعبة، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7363)


7363 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا الجُرَيري، عن أبي نَضْرة، عن أبي سعيد الخُدْري، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "إذا أتيتَ على راعٍ فنادِه ثلاثَ مرَّات، فإنْ أجابكَ وإلَّا فاشرَبْ من غير أن تُفسِدَ، وإذا أتيتَ على حائطِ بُستانٍ فنادِ صاحبَ البستانِ ثلاثَ مرَّات، فإنْ أجابكَ وإلَّا فكُلْ من غير أن تُفسِدَ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তুমি কোনো রাখালের কাছে আসো, তখন তাকে তিনবার ডাকো। যদি সে তোমার ডাকে সাড়া দেয় (তাহলে অনুমতি নাও), অন্যথায় কোনো ক্ষতি না করে (তার দুধ বা পানি) পান করো। আর যখন তুমি কোনো বাগানের প্রাচীরের কাছে আসো, তখন বাগানের মালিককে তিনবার ডাকো। যদি সে সাড়া দেয়, অন্যথায় কোনো ক্ষতি না করে (তার ফল) খাও।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، الجُريري - وهو سعيد بن إياس - وإن كان يزيد بن هارون سمع منه بعد اختلاطه، قد تابعه حماد بن سلمة وهو ممن سمع منه قبل اختلاطه، ثم هو متابع.وأخرجه أحمد 17/ (11159)، وابن ماجه (2300)، وابن حبان (5281) من طريق يزيد بن هارون، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 17/ (11045) من طريق حماد بن سلمة، و 18/ (11812) عن علي بن عاصم، كلاهما عن سعيد الجريري، به.وأخرجه أحمد 18/ (11419) من طريق شريك بن عبد الله النخعي، عن عبد الله بن عاصم، عن أبي سعيد، بنحوه. وشريك يعتبر به في المتابعات والشواهد.وانظر أحاديث الباب في "مسند أحمد" 17/ (11045).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7364)


7364 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا مسدَّد، حدثنا بشر بن المفضَّل، حدثنا عبد الرحمن بن إسحاق، عن أبيه إسحاق بن الحارث، عن عمِّه إسحاق بن عبد الله [و] عن [1] أبي بكر بن زيد [2]، عن عُميرٍ مولى آبي اللحم - وكان عميرٌ مولًى لبني غِفار - قال: أقبلتُ مع ساداتي نريدُ الهجرةَ حتى [إذا] دَنَوْنا من المدينة تركوني في ظهورِهم ودخلوا المدينةَ، فأصابتني مَجَاعةٌ شديدة، فقال لي بعضُ من مرَّ بي من أهل المدينة: لو دخلتَ بعضَ حوائطِ المدينة فأصبتَ من ثمرِها، فدخلتُ حائطًا، فأتيتُ نخلةً فقطعتُ منها قِنوَينِ [3]، فإذا صاحبُ الحائطِ، فخرج بي حتى أتى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فسألني عن أمرِي فأخبرتُه، فقال: "أيُّهما أفضلُ؟ فأشرتُ إلى أحدِهما، فأمرني بأخذِه، وأمر صاحبَ الحائطِ بأخذِ الآخرِ، وخلَّى سبيلي [4].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




উমায়ের মাওলা আবী আল-লাহম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (যিনি বানী গিফারের আযাদকৃত গোলাম ছিলেন)। তিনি বলেন: আমি আমার মালিকদের সাথে হিজরতের উদ্দেশ্যে আসছিলাম। যখন আমরা মদীনার কাছাকাছি পৌঁছালাম, তখন তারা আমাকে পিছনে রেখে নিজেরা মদীনায় প্রবেশ করলেন। আমার তীব্র ক্ষুধা পেল। মদীনার পথচারীদের মধ্যে কেউ একজন আমাকে বললেন: তুমি যদি মদীনার কোনো বাগানে প্রবেশ করো এবং সেখান থেকে কিছু ফল সংগ্রহ করো। তখন আমি একটি বাগানে প্রবেশ করলাম এবং একটি খেজুর গাছের কাছে এসে সেখান থেকে দু'টি ছড়া কেটে নিলাম। তখনই বাগানের মালিক উপস্থিত হলেন। তিনি আমাকে ধরে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট নিয়ে গেলেন। তিনি (রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)) আমার ব্যাপারটি জিজ্ঞেস করলেন এবং আমি তাঁকে (সব ঘটনা) বললাম। তিনি বললেন: "এই দু'টির মধ্যে কোনটি উত্তম?" আমি একটির দিকে ইশারা করলাম। অতঃপর তিনি আমাকে সেটি নিতে আদেশ দিলেন এবং বাগানের মালিককে অন্যটি নিতে আদেশ দিলেন। আর আমার পথ ছেড়ে দিলেন (আমাকে মুক্ত করে দিলেন)।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] سقطت الواو من النسخ الخطية، وأثبتناها من مصادر التخريج، فأبو بكر بن زيد هو شيخ عبد الرحمن بن إسحاق، وليس شيخ إسحاق بن عبد الله.



[2] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: يزيد، وجاء على الصواب في "تلخيص الذهبي".



7364 [3] - تحرف في النسخ الخطية إلى: قوتي، وجاء على الصواب في "تلخيص الذهبي".



7364 [4] - حديث حسن، عمُّ إسحاق والد عبد الرحمن لم نقف له على ترجمة، وتابعه أبو بكر بن زيد - وهو ابن المهاجر - متابعة قاصرة فهو شيخ عبد الرحمن بن إسحاق، وقد روى عنه اثنان ولم يؤثر توثيقه عن أحد. وقد روي من وجه آخر عن عمير كما سيأتي.وأخرجه أحمد 36/ (21942) عن رِبعي بن إبراهيم، عن عبد الرحمن بن إسحاق، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد 39 (24009/ 84) من طريق ابن لهيعة عن محمد بن زيد بن المهاجر، عن عمير بنحوه مختصرًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7365)


7365 - حدثنا أبو بكر أحمد بن سلمان الفقيه ببغداد، حدثنا أحمد بن عبيد الله النَّرْسي، حدثنا رَوْح بن عُبادة، حدثنا شُعبة، عن أبي بشر قال: سمعت عبَّاد بن شُرحبيل قال: أصابَتْنا مَجاعةٌ، فأتيتُ المدينةَ، فدخلتُ حائطًا من حِيطانها، فأخذتُ سُنبلًا فعَرَكتُه [1] فأكلتُ منه وجعلتُ منه في ثوبي، فجاء صاحبُ الحائط فضربني وأخذَ ثوبي، فأتيتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فقال: "ما علَّمتَه إذ كان جاهلًا، ولا أطعمتَه إذ كان ساغبًا أو جائعًا، قال: فردَّ عليَّ الثوبَ، وأمرَ لي بنصف وَسْقٍ أو وَسْقٍ [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আব্বাদ ইবনু শুরাহবিল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, আমাদের অঞ্চলে একবার দুর্ভিক্ষ দেখা দিয়েছিল। আমি মদীনাতে আসলাম এবং সেখানকার একটি বাগানে প্রবেশ করলাম। আমি একটি শস্যের শীষ নিলাম, সেটি ডলে তার থেকে কিছু খেলাম এবং কিছু আমার কাপড়ের মধ্যে রেখে দিলাম। তখন বাগানের মালিক এসে আমাকে মারধর করল এবং আমার কাপড়টি নিয়ে নিল। অতঃপর আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে যখন অজ্ঞ ছিল, তখন তুমি তাকে শিখিয়ে দিলে না কেন? আর সে যখন ক্ষুধার্ত বা অভুক্ত ছিল, তখন তুমি তাকে খেতে দিলে না কেন?" তিনি (আব্বাদ) বললেন: অতঃপর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নির্দেশে) তিনি (বাগানের মালিক) আমার কাপড়টি আমাকে ফিরিয়ে দিলেন এবং তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার জন্য আধা ওয়াসাক কিংবা এক ওয়াসাক শস্য দেওয়ার নির্দেশ দিলেন।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في "تلخيص الذهبي": ففركته، وهو الموافق لمصادر التخريج والعَرْك: الدَّلك.



[2] إسناده صحيح أبو بشر: هو جعفر بن إياس أبي وحشية.وأخرجه أحمد 29 / (17521)، وأبو داود (2621)، وابن ماجه (2298) من طرق عن شعبة، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي في "المجتبى" (5409) من طريق سفيان بن حسين، عن أبي بشر، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7366)


7366 - أخبرنا السَّيَّاري، حدثنا أبو الموجِّه وعبد الله بن جعفر قالا: أخبرنا علي بن حُجْر السَّعدي، حدثنا عاصم بن سويد، عن محمد بن موسى بن الحارث، عن أبيه، عن جابر بن عبد الله قال: أتى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بين عمرو بن عوف يومَ الأربعاء، فرأى أشياءَ لم يكن رآها قبلَ ذلك من حِصْنةٍ عن النخيل، فقال: "لو أنكم إذا جئتُم عيدَكم هذا مَكَثتُم حتى تسمعُوا من قَوْلي" قالوا: نَعَم بآبائنا أنتَ أي رسولَ الله وأمّهاتِنا، قال: فلما حضروا الجُمعةَ صلَّى بهم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم الجمعة، ثم صلَّى ركعتين في المسجد، وكان ينصرفُ إلى بيته قبلَ ذلك اليوم، ثم استوى فاستقبلَ الناسَ بوجهه، فتبِعَتْ له الأنصارُ أو من كان منهم حتى وفَّى بهم إليه، فقال: "يا معشرَ الأنصار"، قالوا: لبَّيكَ أيْ رسولَ الله، فقال: "كنتُم في الجاهلية إذ لا تَعبُدون الله تَحمِلونَ الكَلَّ، وتفعلون في أموالِكم المعروفَ، وتفعلون إلى ابن السَّبيل، حتى إذا مَنَّ الله عليكم بالإسلام، ومَنَّ عليكم بنبيِّه، إذا إنكم لتُحصِّنون أموالَكم، وفيما يأكل ابن آدمَ أَجْرٌ، وفيما يأكلُ السَّبُعُ أجرٌ، وفيما يأكل الطيرُ أجرٌ [1] "، فرجعَ القومَ، فما منهم أحدٌ إِلَّا هدم من حديقته ثلاثين بابًا [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرَّج.وفيه النهيُ الواضح عن تحصين الحيطان والنخيل والكُروم وغيرِها من أنواع الثِّمار عن المحتاجين والجائعين أن يأكلوا منها. وقد خرَّج الشيخانِ رضي الله عنهما حديثَ ابن عمر عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم: "إذا دخلّ أحدُكم حائطَ أخيه، فليأكُلْ منه ولا يَتَّخِذْ خُبْنَةً" [3].




জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক বুধবার রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বানু আমর ইবন আওফের এলাকায় আসলেন। তিনি সেখানে এমন কিছু দেখতে পেলেন যা এর আগে দেখেননি—তা হলো খেজুর গাছের চারপাশে বেড়া (সুরক্ষা প্রাচীর)। তখন তিনি বললেন: "যদি তোমরা এই ঈদের দিন [বা উৎসবে] এসে আমার কথা শোনা পর্যন্ত অপেক্ষা করতে।" তারা বলল: হ্যাঁ, হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের পিতা-মাতা আপনার জন্য উৎসর্গ হোন। তিনি (জাবির) বলেন: এরপর যখন জুমু'আর দিন উপস্থিত হলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের নিয়ে জুমু'আর সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি মসজিদে দুই রাকাত সালাত আদায় করলেন। (সাধারণত) তিনি ওই দিনের পূর্বে (জুমু'আর পর) নিজের বাড়িতে ফিরে যেতেন। অতঃপর তিনি সোজা হয়ে বসলেন এবং চেহারা দিয়ে মানুষের দিকে মুখ ফিরালেন। তখন আনসারগণ বা তাদের মধ্য থেকে যারা ছিল তারা তাঁর পিছু নিলেন, যতক্ষণ না তিনি তাদের সাথে সাক্ষাৎ করলেন। তিনি বললেন: "হে আনসার সম্প্রদায়!" তারা বলল: আমরা উপস্থিত, হে আল্লাহর রাসূল! তিনি বললেন: "তোমরা জাহিলিয়াতের যুগে ছিলে, যখন তোমরা আল্লাহর ইবাদত করতে না, তখন তোমরা বোঝা বহন করতে (দুর্বলদের সাহায্য করতে), তোমাদের সম্পদে তোমরা ভালো কাজ (দান-সদকা) করতে এবং মুসাফিরদের প্রতি (ভালো) ব্যবহার করতে। অবশেষে যখন আল্লাহ তোমাদের প্রতি ইসলামের মাধ্যমে অনুগ্রহ করলেন এবং তাঁর নবীর মাধ্যমে তোমাদের প্রতি অনুগ্রহ করলেন, তখন তোমরা তোমাদের ধন-সম্পদ সুরক্ষিত করছ (বেড়া দিয়ে রাখছ)। আর যা আদম সন্তান খায় তাতেও সওয়াব আছে; যা হিংস্র পশু খায় তাতেও সওয়াব আছে; আর যা পাখি খায় তাতেও সওয়াব আছে।" এরপর লোকেরা ফিরে গেল, এবং তাদের মধ্যে এমন কেউ ছিল না যে তার বাগান থেকে ত্রিশটি করে ফটক ভেঙে না দিয়েছিল।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] قوله: "وفيما يأكل الطير أجر" سقط من (ز).



[2] إسناده ضعيف، عاصم بن سويد قال أبو حاتم: شيخ محله، الصدق، روي حديثين منكرين، وقال ابن معين: لا أعرفه قال ابن عدي: لم يعرفه لأنه قليل الرواية جدًّا، لعله لم يُرَو عنه غير خمسة أحاديث. وشيخه محمد بن موسى إن كان هو الرؤاسي، فقد قال عنه أبو حاتم: مجهول، وإن كان غيره فلم نقف على أحد وثقه غير ابن حبان في "ثقاته" 7/ 397، وأشار إلى إسنادنا هذا، وأبوه كذلك لم يوثقه غير ابن حبان 5/ 405.وأخرجه ابن خزيمة (1872)، وعنه ابن حبان (2484) عن علي بن حجر السعدي، بهذا الإسناد.وقال ابن خزيمة عنه: إن صحَّ الخبر، فإني لا أقف على سماع موسى بن الحارث من جابر.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (2379)، والبيهقي في "الشعب" (3224) من طريق عبد الله بن عبد الوهاب الحَجَبي، عن عاصم بن سويد به. وقال الطبراني: لا يروى عن جابر إلَّا بهذا الإسناد، تفرَّد به الحَجَبي! وقد علمتَ أنه متابَع في إسناد الحاكم.



7366 [3] - هذا ذهول من الحاكم، فإنهما لم يخرجا حديث ابن عمر هذا، وإنما أخرجه الترمذي (1287) وابن ماجه (2301)، وفي سنده يحيى بن سليم الطائفي متكلم فيه، لكن جاء من حديث عبد الله بن عمرو ما يشهد لمعناه بسند حسن عند أحمد في "مسنده" 11/ (6683). وأبو حاتم الرازيان، بينما رجَّح الدارقطني في "العلل" (4/ 645) أنه رجل من الأنصار بعثه النبي صلى الله عليه وسلم على الصدقة، وتبعه ابن حجر على ذلك في "الإصابة" 3/ 94 وقال: وأفرده البغوي وابن منده؛ يعني عن ترجمة ابن أبي وقاص لهذا قال أبو حاتم - كما في "العلل" (2426) -: حديث مضطرب.وذهب ابن القطان الفاسي في بيان الوهم والإيهام 5/ 577 - 578 إلى أنَّ الحديث موصول وصحيح وليس بمرسل محتجًّا بأنَّ المرسل هو عن سعد الأنصاري صاحب السِّعاية وليس عن سعد بن أبي وقاص، لأنَّ عبد السلام بن حرب وسفيان الثَّوري روياه بإسناد المصنف فقالا فيه: عن زياد بن جبير عن سعد.أبو غسان: هو مالك بن إسماعيل النهدي.وأخرجه أبو داود (1686) عن محمد بن سوار، عن عبد السلام بن حرب، بهذا الإسناد.والرَّطُب، قال ابن الأثير في "النهاية": أراد ما لا يدخر ولا يبقى كالفواكه والبقول والأطبخة، وإنما خصَّ الرَّطْب لأنَّ خَطبه أيسر، والفساد إليه أسرع، فإذا ترك ولم يؤكل هلك، فوقعت المسامحة في ذلك بترك الاستئذان، وهذا فيما بين الآباء والأمهات والأبناء، دون الأزواج والزوجات فليس لأحدهما أن يفعل شيئًا إلَّا بإذن صاحبه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7367)


7367 - أخبرني أبو عبد الله محمد بن علي الصَّنعاني بمكة، حدثنا علي بن المبارك الصَّنعاني، حدثنا زيد [1] بن المبارك الصَّنعاني، حدثنا محمد بن سليمان بن مَسمُول، حدثنا القاسم بن مُخوَّل البَهْزي [2]، سمع أباه يقول: قلتُ: يا رسولَ الله، الإبلُ نَلْقاها وبها اللبنُ وهي مُصَرّاة، ونحن محتاجون، فقال: "نادِ صاحبَ الإبل ثلاثًا، فإن جاءَ وإلا فاحلُبْ واحتلبْ وَاحْلُلْ، ثم صُرَّ وبَقِّ اللبنَ لدَواعِيهِ" [3].




মাখওয়াল আল-বাহযী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমরা এমন উটের কাছে যাই যার স্তনে দুধ জমা করে রাখা হয়েছে (মুসাররাহ), অথচ আমরা খুব অভাবগ্রস্ত থাকি। তিনি বললেন, "উটটির মালিককে তিনবার ডাক দাও। যদি সে চলে আসে (ভালো), অন্যথায় তুমি দুধ দোহন করো, পান করো এবং তার বাঁধন খুলে দাও। অতঃপর (পুনরায়) স্তন বেঁধে দাও এবং তার অন্যান্য প্রয়োজনের জন্য দুধ অবশিষ্ট রেখে দাও।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: يزيد. وأبو حاتم الرازيان، بينما رجَّح الدارقطني في "العلل" (4/ 645) أنه رجل من الأنصار بعثه النبي صلى الله عليه وسلم على الصدقة، وتبعه ابن حجر على ذلك في "الإصابة" 3/ 94 وقال: وأفرده البغوي وابن منده؛ يعني عن ترجمة ابن أبي وقاص لهذا قال أبو حاتم - كما في "العلل" (2426) -: حديث مضطرب.وذهب ابن القطان الفاسي في بيان الوهم والإيهام 5/ 577 - 578 إلى أنَّ الحديث موصول وصحيح وليس بمرسل محتجًّا بأنَّ المرسل هو عن سعد الأنصاري صاحب السِّعاية وليس عن سعد بن أبي وقاص، لأنَّ عبد السلام بن حرب وسفيان الثَّوري روياه بإسناد المصنف فقالا فيه: عن زياد بن جبير عن سعد.أبو غسان: هو مالك بن إسماعيل النهدي.وأخرجه أبو داود (1686) عن محمد بن سوار، عن عبد السلام بن حرب، بهذا الإسناد.والرَّطُب، قال ابن الأثير في "النهاية": أراد ما لا يدخر ولا يبقى كالفواكه والبقول والأطبخة، وإنما خصَّ الرَّطْب لأنَّ خَطبه أيسر، والفساد إليه أسرع، فإذا ترك ولم يؤكل هلك، فوقعت المسامحة في ذلك بترك الاستئذان، وهذا فيما بين الآباء والأمهات والأبناء، دون الأزواج والزوجات فليس لأحدهما أن يفعل شيئًا إلَّا بإذن صاحبه.



[2] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: النهدي، وجاء على الصواب في "تلخيص الذهبي" ومصادر التخريج. وأبو حاتم الرازيان، بينما رجَّح الدارقطني في "العلل" (4/ 645) أنه رجل من الأنصار بعثه النبي صلى الله عليه وسلم على الصدقة، وتبعه ابن حجر على ذلك في "الإصابة" 3/ 94 وقال: وأفرده البغوي وابن منده؛ يعني عن ترجمة ابن أبي وقاص لهذا قال أبو حاتم - كما في "العلل" (2426) -: حديث مضطرب.وذهب ابن القطان الفاسي في بيان الوهم والإيهام 5/ 577 - 578 إلى أنَّ الحديث موصول وصحيح وليس بمرسل محتجًّا بأنَّ المرسل هو عن سعد الأنصاري صاحب السِّعاية وليس عن سعد بن أبي وقاص، لأنَّ عبد السلام بن حرب وسفيان الثَّوري روياه بإسناد المصنف فقالا فيه: عن زياد بن جبير عن سعد.أبو غسان: هو مالك بن إسماعيل النهدي.وأخرجه أبو داود (1686) عن محمد بن سوار، عن عبد السلام بن حرب، بهذا الإسناد.والرَّطُب، قال ابن الأثير في "النهاية": أراد ما لا يدخر ولا يبقى كالفواكه والبقول والأطبخة، وإنما خصَّ الرَّطْب لأنَّ خَطبه أيسر، والفساد إليه أسرع، فإذا ترك ولم يؤكل هلك، فوقعت المسامحة في ذلك بترك الاستئذان، وهذا فيما بين الآباء والأمهات والأبناء، دون الأزواج والزوجات فليس لأحدهما أن يفعل شيئًا إلَّا بإذن صاحبه.



7367 [3] - إسناده ضعيف، محمد بن سليمان بن مسمول ضعيف والقاسم بن مخول البهزي مجهول تفرَّد بالرواية عنه ابن مسمول، ومع ذلك أودعه ابن حبان "ثقاته" 5/ 306.وأخرجه مجموعًا إلى الحديث الآتي برقم (7463): أبو يعلى (1568)، وابن حبان (5882)، والطبراني في "الكبير" (20/ (763)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (6318) من طرق عن محمد بن سليمان بن مسمول بهذا الإسناد. وأبو حاتم الرازيان، بينما رجَّح الدارقطني في "العلل" (4/ 645) أنه رجل من الأنصار بعثه النبي صلى الله عليه وسلم على الصدقة، وتبعه ابن حجر على ذلك في "الإصابة" 3/ 94 وقال: وأفرده البغوي وابن منده؛ يعني عن ترجمة ابن أبي وقاص لهذا قال أبو حاتم - كما في "العلل" (2426) -: حديث مضطرب.وذهب ابن القطان الفاسي في بيان الوهم والإيهام 5/ 577 - 578 إلى أنَّ الحديث موصول وصحيح وليس بمرسل محتجًّا بأنَّ المرسل هو عن سعد الأنصاري صاحب السِّعاية وليس عن سعد بن أبي وقاص، لأنَّ عبد السلام بن حرب وسفيان الثَّوري روياه بإسناد المصنف فقالا فيه: عن زياد بن جبير عن سعد.أبو غسان: هو مالك بن إسماعيل النهدي.وأخرجه أبو داود (1686) عن محمد بن سوار، عن عبد السلام بن حرب، بهذا الإسناد.والرَّطُب، قال ابن الأثير في "النهاية": أراد ما لا يدخر ولا يبقى كالفواكه والبقول والأطبخة، وإنما خصَّ الرَّطْب لأنَّ خَطبه أيسر، والفساد إليه أسرع، فإذا ترك ولم يؤكل هلك، فوقعت المسامحة في ذلك بترك الاستئذان، وهذا فيما بين الآباء والأمهات والأبناء، دون الأزواج والزوجات فليس لأحدهما أن يفعل شيئًا إلَّا بإذن صاحبه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7368)


7368 - أخبرنا محمد بن علي الشَّيباني بالكوفة، حدثنا أحمد بن حازم، حدثنا أبو غسان، حدثنا عبد السلام بن حرب، حدثنا يونس بن عُبيد، عن زياد بن جُبير، عن سعد قال: لمَّا بايعَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم النِّساءَ، قامَتْ إليه امرأةٌ جليلةٌ كأنها من نساء مُضَر، فقالت: يا رسولَ الله، إنا كَلٌّ على آبائِنا وأبنائنا وأزواجِنا، فما يَحِلَّ لنا من أموالِهم؟ قال: "الرَّطْبُ تأكلْنَه وتُهدِينَه" [1]. وقد رواه سفيان الثَّوري عن يونس بن عُبيد:




সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মহিলাদের থেকে বায়আত (শপথ) নিচ্ছিলেন, তখন মুদার গোত্রের মহিলাদের মতো দেখতে একজন সম্ভ্রান্ত নারী তাঁর কাছে এসে দাঁড়ালেন এবং বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আমরা আমাদের পিতা, পুত্র ও স্বামীদের উপর নির্ভরশীল বোঝা স্বরূপ। এমতাবস্থায় তাদের সম্পদ থেকে আমাদের জন্য কী গ্রহণ করা হালাল?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কাঁচা জিনিস (খাদ্যদ্রব্য) যা তোমরা খাও এবং উপহার হিসেবে দাও।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] رجاله ثقات، لكن اختُلِفَ في نسبة سعد هذا، فجعله البعض سعد بن أبي وقاص كالبزار وعبد بن حميد في "مسنديهما"، وعليه تكون رواية زياد بن جبير هذه عنه مرسلة فيما قاله أبو زرعة وأبو حاتم الرازيان، بينما رجَّح الدارقطني في "العلل" (4/ 645) أنه رجل من الأنصار بعثه النبي صلى الله عليه وسلم على الصدقة، وتبعه ابن حجر على ذلك في "الإصابة" 3/ 94 وقال: وأفرده البغوي وابن منده؛ يعني عن ترجمة ابن أبي وقاص لهذا قال أبو حاتم - كما في "العلل" (2426) -: حديث مضطرب.وذهب ابن القطان الفاسي في بيان الوهم والإيهام 5/ 577 - 578 إلى أنَّ الحديث موصول وصحيح وليس بمرسل محتجًّا بأنَّ المرسل هو عن سعد الأنصاري صاحب السِّعاية وليس عن سعد بن أبي وقاص، لأنَّ عبد السلام بن حرب وسفيان الثَّوري روياه بإسناد المصنف فقالا فيه: عن زياد بن جبير عن سعد.أبو غسان: هو مالك بن إسماعيل النهدي.وأخرجه أبو داود (1686) عن محمد بن سوار، عن عبد السلام بن حرب، بهذا الإسناد.والرَّطُب، قال ابن الأثير في "النهاية": أراد ما لا يدخر ولا يبقى كالفواكه والبقول والأطبخة، وإنما خصَّ الرَّطْب لأنَّ خَطبه أيسر، والفساد إليه أسرع، فإذا ترك ولم يؤكل هلك، فوقعت المسامحة في ذلك بترك الاستئذان، وهذا فيما بين الآباء والأمهات والأبناء، دون الأزواج والزوجات فليس لأحدهما أن يفعل شيئًا إلَّا بإذن صاحبه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7369)


7369 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدثنا أحمد بن مِهران حدثنا أبو همَّام محمد بن مُحبَّب [1]، حدثنا سفيان، عن يونس، عن زياد بن جُبير، عن سعد بن أبي وقّاص قال: قالت امرأةٌ: يا رسول الله، إنا كلٌّ على آبائنا وإخوانِنا، فما يَحِلّ لنا من أموالِهم؟ قال: رَطْبُ ما تأكلينَ وتُهدِينَ" [2].حديث عبد السلام بن حرب صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন মহিলা বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমরা আমাদের পিতা ও ভাইদের উপর নির্ভরশীল। তাদের সম্পদ থেকে আমাদের জন্য কী গ্রহণ করা বৈধ?" তিনি বললেন, "যা তোমরা খাও এবং উপহার হিসেবে দাও, এমন সতেজ অংশ।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: حبيب.



[2] لا بأس برجاله على اختلاف كما سبق بيانه.وأخرجه البزار (1241)، وأبو أحمد العسكري في "تصحيفات المحدثين" 1/ 321 - 322 من طريق محمد بن محبب، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7370)


7370 - أخبرنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا الحسن بن علي بن بحر البَرِّي، حدثنا أَبي، حدثنا سُوَيد بن عبد العزيز، حدثنا محمد بن عَجْلان، عن سعيد بن أبي سعيد المَقْبُري، عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إنَّ الله تعالى لَيُدخِلُ بلُقْمة الخُبز وقبضةِ التمرِ ومثلِه مما يَنفَعُ المسكينَ ثلاثةً الجنَّةَ: الآمر به، والزوجة المُصلحةَ، والخادمَ الذي يُناوِلُ المسكينَ"، وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الحمدُ الله الذي لم ينسَ خَدَمَنا" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা একটি রুটির টুকরা, এক মুষ্টি খেজুর অথবা অনুরূপ এমন কিছু যা মিসকিনকে (গরীবকে) উপকৃত করে তার বিনিময়ে তিন ব্যক্তিকে জান্নাতে প্রবেশ করান: যে এর নির্দেশদাতা, নেককার স্ত্রী এবং যে খাদেম মিসকিনকে তা পরিবেশন করে।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বলেছেন: "সেই আল্লাহর প্রশংসা, যিনি আমাদের খাদেমদের ভোলেননি।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف لضعف سويد بن عبد العزيز، وبه أعلَّه الذهبي في "تلخيصه" فقال: سويد متروك! وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (5309)، وابن شاهين في "الترغيب في فضائل الأعمال" (376)، وابن الفاخر السمرقندي في موجبات الجنة" (229)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 54/ 360 من طرق عن سويد بن عبد العزيز، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن حبان (2092) من طريق حرملة بن يحيى، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد (38/ (23525) و (23537)، ومسلم (2003) (170)، والنسائي (6596)، من طريق سماك، عن جابر بن سمرة، عن أبي أيوب بنحوه.وأخرجه مطولًا ومختصرًا أحمد (23517)، ومسلم (2053) (171) من طريق أفلح مولى أبي أيوب، وأحمد (23507)، والنسائي (5996) و (6595) من طريق جبير بن نفير، وأحمد (23504) من طريق أبي عبد الرحمن الحبلي، و (23526) من طريق أبي سَوْرة، و (23570) من طريق أبي، رُهم، خمستهم عن أبي أيوب.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7371)


7371 - أخبرنا الحسن بن يعقوب العدل، حدثنا أحمد بن الخليل، حدثنا عبد الصمد بن عبد الوارث، حدثنا همّام عن قَتَادةَ، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدِّه، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "كُلُوا واشْرَبُوا وتصدَّقوا في غير سَرَفٍ ولا مَخِيلةٍ، إِنَّ الله تعالى يُحِبُّ أن يُرَى أثرُ نعمتِه على عبدِه" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবদুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা খাও, পান করো এবং দান করো অপচয় ও অহংকারমুক্তভাবে। নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা পছন্দ করেন যে তাঁর বান্দার উপর তাঁর নেয়ামতের ছাপ বা চিহ্ন দেখা যাক।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده حسن. همام: هو ابن يحيى العوذي.وأخرجه أحمد 11/ (6695)، وابن ماجه (3605)، والنسائي (2351) من طريق يزيد بن هارون عن همام بن يحيى، بهذ الإسناد. وأخرجه ابن حبان (2092) من طريق حرملة بن يحيى، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد (38/ (23525) و (23537)، ومسلم (2003) (170)، والنسائي (6596)، من طريق سماك، عن جابر بن سمرة، عن أبي أيوب بنحوه.وأخرجه مطولًا ومختصرًا أحمد (23517)، ومسلم (2053) (171) من طريق أفلح مولى أبي أيوب، وأحمد (23507)، والنسائي (5996) و (6595) من طريق جبير بن نفير، وأحمد (23504) من طريق أبي عبد الرحمن الحبلي، و (23526) من طريق أبي سَوْرة، و (23570) من طريق أبي، رُهم، خمستهم عن أبي أيوب.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7372)


7372 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وَهْب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن بكر بن سَوَادة، أن سفيان بن وَهْب حدَّثه عن أبي أيوب الأنصاريِّ: أنه أرسلَ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم بطعامٍ من خَضِرةٍ، فيه بصلٌ أو كُرَّاث، فلم يَرَ فيه أثرَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فأَبى أن يأكلَه، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما يَمنُعك أن تأكلَ؟ " قال: لم أرَ أثرَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: أستَحْيي من ملائكةِ الله تعالى وليس بمُحرَّمٍ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবূ আইয়ূব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট তরিতরকারির তৈরি খাবার পাঠালেন, যার মধ্যে ছিল পেঁয়াজ অথবা লিক। কিন্তু তিনি (আবু আইয়ূব) তাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খাওয়ার কোনো চিহ্ন দেখতে পেলেন না। তাই তিনি (নিজেই) তা খেতে অস্বীকার করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "তুমি কেন খাচ্ছো না?" তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর (খাওয়ার) চিহ্ন দেখতে পাইনি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি আল্লাহর ফেরেশতাগণকে লজ্জা করি, তবে এটি হারাম নয়।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح ابن وهب: هو عبد الله. وأخرجه ابن حبان (2092) من طريق حرملة بن يحيى، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد (38/ (23525) و (23537)، ومسلم (2003) (170)، والنسائي (6596)، من طريق سماك، عن جابر بن سمرة، عن أبي أيوب بنحوه.وأخرجه مطولًا ومختصرًا أحمد (23517)، ومسلم (2053) (171) من طريق أفلح مولى أبي أيوب، وأحمد (23507)، والنسائي (5996) و (6595) من طريق جبير بن نفير، وأحمد (23504) من طريق أبي عبد الرحمن الحبلي، و (23526) من طريق أبي سَوْرة، و (23570) من طريق أبي، رُهم، خمستهم عن أبي أيوب.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7373)


7373 - حدثنا علي بن حَمْشاذ العَدْل، حدثنا العباس بن الفضل الأسفاطي ومحمد بن غالب، قالا: حدثنا عمرو بن حَكَّام، حدثنا شُعبة، أخبرني علي بن زيد، قال: سمعتُ أبا المتوكِّل يحدِّث عن أبي سعيد الخُدْري قال: أهدَى ملكُ الهند [1] إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم جَرَّةً فيها زَنجبيل، فأطعم أصحابه قطعةً قطعةً، وأطعَمَني منها قطعةً [2]. قال الحاكم رحمه الله: لم أخرِّج من أول هذا الكتاب إلى هنا لعلي بن زيد بن جُدْعان القرشي رحمه الله حرفًا واحدًا [3]، ولم أحفظ في أكل رسول الله صلى الله عليه وسلم الزَّنجبيلَ [سواه] [4] فخرجته.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ভারতের বাদশাহ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একটি কলসি উপহার হিসেবে পাঠান, যার মধ্যে আদা ছিল। অতঃপর তিনি তাঁর সাহাবীগণকে টুকরা টুকরা করে তা খেতে দিলেন, এবং আমাকেও এর একটি টুকরা খেতে দিলেন। ইমাম আল-হাকিম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: এই কিতাবের শুরু থেকে এখন পর্যন্ত আমি আলী ইবনে যায়দ ইবনে জুদ’আন আল-কুরাশী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর বর্ণনা থেকে একটি হরফও উল্লেখ করিনি। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আদা খাওয়ার বিষয়ে এটি ছাড়া অন্য কোনো বর্ণনা আমার জানা নেই, তাই আমি এটি উদ্ধৃত করলাম।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] كذا وقع عند الحاكم ملك الهند، وعند غيره ممن أخرج الحديث: ملك الروم. عليه حديثُ عمرو بن حكام في حديث النَّضر، ولا يعرف إلَّا بعمرو هذا، لأنهما جميعًا يحدثان عن شعبة، فحدَّث بهذا عن النَّضر بن محمد.وأما حديث ابن جدعان عن أنس فأخرجه ابن عدي 5/ 137 من طريق سفيان بن حسين عنه به. وقال عقبه وأنا أظن أنَّ هذا الاختلاف من علي بن زيد، ثم قال بعدُ: لأنَّ علي بن زيد يحتمل أن يخلِّط، ويبرأ عمرو بن حكام من العُهدة، ويبقى عليه أنه لم يروه عن شعبة غيره!



[2] إسناده ضعيف لضعف عمرو بن حكام، وقد أنكر علي هذا الحديثَ غيرُ واحد من أهل العلم، منهم أبو حاتم وأبو زرعة كما في "العلل" (906)، فقد انفرد ابن حكام بروايته عن شعبة من بين أصحابه، وجعله من حديث أبي سعيد الخدري، والأشبه بالصواب أنه من حديث علي بن زيد بن جدعان عن أنس بن مالك كما قالوا، وفي الحالتين فإنَّ مدار الحديث على ابن جدعان وهو ضعيف لا يُعتمَد عليه. أبو المتوكل: هو علي بن داود الناجيّ.وأخرجه الطبري في مسند علي من "تهذيب الآثار" ص 212، والعقيلي في "الضعفاء" (1233)، وابن الأعرابي في "معجمه" (300)، والطبراني في "الأوسط" (2416) وابن عدي في "الكامل" 5/ 137، والإسماعيلي في "معجمه" 2/ 545، وأبو نعيم في "الطب النبوي" (162) من طرق عن عمرو بن حكام، بهذا الإسناد. وقال الطبراني: لم يروه عن شعبة إلَّا عمرو.وأخرجه العقيلي (1234) عن محمد بن إسماعيل الصايغ عن أحمد بن عمير الوادي، عن النَّضر بن محمد الجرشي، عن شعبة به. قال الصايغ هذا حديث عمرو بن حكام، وكان عند أحمد بن عمر عن عمرو بن حكام وعن النَّضر بن محمد، فانهدمت داره وتقطعت الكتب، فاختلط عليه حديثُ عمرو بن حكام في حديث النَّضر، ولا يعرف إلَّا بعمرو هذا، لأنهما جميعًا يحدثان عن شعبة، فحدَّث بهذا عن النَّضر بن محمد.وأما حديث ابن جدعان عن أنس فأخرجه ابن عدي 5/ 137 من طريق سفيان بن حسين عنه به. وقال عقبه وأنا أظن أنَّ هذا الاختلاف من علي بن زيد، ثم قال بعدُ: لأنَّ علي بن زيد يحتمل أن يخلِّط، ويبرأ عمرو بن حكام من العُهدة، ويبقى عليه أنه لم يروه عن شعبة غيره!



7373 [3] - ذهل المصنف فقد سبق له أن صحَّح حديثًا لابن جدعان برقم (4085). ووقع خطأ في تخريج الحديث في "صحيح ابن حبان"، حيث عُزي إلى أحمد والحاكم من هذا الطريق، فيستدرك.



7373 [4] - ما بين المعقوفين من الطبعة الهندية وليس في النسخ. ووقع خطأ في تخريج الحديث في "صحيح ابن حبان"، حيث عُزي إلى أحمد والحاكم من هذا الطريق، فيستدرك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7374)


7374 - أخبرنا الحسن بن يعقوب العدل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا زيد بن الحُبَاب، حدثنا معاوية بن صالح، حدثنا عامر، عن خالد بن مَعْدان، قال: شهدتُ وليمةً في منزل عبد الأعلى ومعنا أبو أُمامةَ الباهلي، فلمَّا أنْ فرغنا من الطعام، قام فقال: ما أُريد أن أكونَ خطيبًا، ولكني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم عند فراغه من الطعام، فسمعتُه يقول عند انقضاء الطعام: "الحمدُ لله كثيرًا طيبًا مباركًا فيه غيرَ مُودَّع، ولا مُستغنًى عنه" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد ولم يُخرجاه.وشاهدُه أصح وأشهر رواةً منه:




আবূ উমামা আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [খালিদ ইবনু মা'দান বলেন:] আমি আব্দুল আলা'র বাড়িতে একটি ওয়ালীমার দাওয়াতে উপস্থিত ছিলাম এবং আমাদের সাথে আবূ উমামা আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন। যখন আমরা খাওয়া শেষ করলাম, তিনি দাঁড়িয়ে বললেন: আমি বক্তা হতে চাই না, কিন্তু আমি রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খাবার শেষে বলতে শুনেছি। যখন তিনি খাদ্য গ্রহণ শেষ করতেন, তখন তিনি বলতেন: "আলহামদু লিল্লাহি কাসীরান ত্বাইয়্যিবান মুবারাকান ফীহি গায়রা মুওয়াদ্দাঈন ওয়ালা মুসতাগনান 'আনহু" (সকল প্রশংসা আল্লাহর জন্য, যা প্রাচুর্যময়, উত্তম, তাতে বরকত রয়েছে; যা পরিত্যাগ করা হয় না এবং যা থেকে মুখাপেক্ষীহীন হওয়া যায় না)।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد جيد. عامر: هو ابن جَشِيب.وأخرجه أحمد 36/ (22256) عن عبد الرحمن بن مهدي، والنسائي (6869)، وابن حبان (5217) من طريق ابن وَهْب، كلاهما عن معاوية بن صالح، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (22301)، والنسائي (6868) و (10042) من طريق السري بن ينعم، عن عامر بن جشيب به.وأخرجه ابن حبان (5218) من طريق عثمان بن أبي شَيْبة عن زيد بن الحباب، عن معاوية بن صالح، عن بَحير بن سعد، عن خالد بن معدان به فجعل الواسطة بين معاوية وخالد بحير بن سعد مكان عامر بن جشيب، وهذه رواية شاذّة، وزعم ابن حبان أن كلا الطريقين محفوظ. ووقع خطأ في تخريج الحديث في "صحيح ابن حبان"، حيث عُزي إلى أحمد والحاكم من هذا الطريق، فيستدرك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7375)


7375 - أخبرَناه أبو عبد الله محمد بن يعقوب، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا مسدَّد، حدثنا يحيي، حدثنا ثَوْر، حدثنا خالد بن مَعْدان، عن أبي أُمامة قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إذا رُفِعَتِ المائدة من بين يديه يقول: "الحمدُ لله حمدًا كثيرًا طيبًا مباركًا فيه غيرَ مودِّع، ولا مُستغنًى عنه، ربُّنا" [1].




আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে থেকে যখন দস্তরখান উঠিয়ে নেওয়া হতো, তখন তিনি বলতেন: "সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্য, এমন প্রশংসা যা প্রচুর, পবিত্র এবং বরকতময়; যা শেষ হয়ে যাওয়ার নয় এবং যাঁর (আল্লাহর) থেকে মুখাপেক্ষীহীন থাকা সম্ভব নয়— হে আমাদের প্রতিপালক।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح يحيى هو ابن سعيد القطان، وثور: هو ابن يزيد الكلاعي.وأخرجه أبو داود (3849) عن مسدد بن مسرهد بهذا الإسناد.وسلف من طريق يحيى القطان برقم (1956)، وهناك ذكرنا تتمة تخريجه.وانظر ما قبله.قوله: "مُودَّع" بفتح الدال الثقيلة، أي: غير متروك الطلب إليه، والرغبة فيما عنده.قوله: "ربُّنا" بالرفع على أنه خبر مبتدأ محذوف، أي: هو ربنا، أو على أنَّه مبتدأ خبره متقدم، ويجوز النصب على المدح، أو على النداء، ويجوز الجر بدلًا من الضمير في "عنه"، أو من الاسم قوله: "الحمد لله". انظر "فتح الباري" شرح حديث (5459). وأخرجه أحمد 40 / (24240)، والترمذي (2470) من طريق سفيان الثَّوري، عن أبي إسحاق السبيعي، به مختصرًا. وصحَّحه الترمذي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7376)


7376 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الرَّبيع بن سليمان، حدثنا أَسد بن موسى، حدثنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن أبي مَيْسرة، عن عائشة قالت: كانت لنا شاةٌ، فخَشِينا أن تموتَ، فقتلناها وقَسَمناها إِلَّا كَتِفَها [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমাদের একটি বকরী ছিল। আমরা আশঙ্কা করলাম যে সেটি মরে যাবে, তাই আমরা সেটিকে যবেহ করে দিলাম এবং এর কাঁধের অংশটুকু ছাড়া বাকি সব বণ্টন করে নিলাম।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح إسرائيل: هو ابن يونس بن عمرو بن عبد الله السبيعي، وأبو إسحاق جده، وأبو ميسرة: هو عمرو بن شرحبيل الهمداني الكوفي.ورواية المصنف مختصرة، وجاء بتمامه عند البيهقي في "الشعب" (3086) من طريق عبد الله بن رجاء عن إسرائيل، به، بلفظ: قال عائشة: كانت لنا شاةٌ أرادت أن تموتَ، فذبحناها فقسمناها، فجاء النبيُّ صلى الله عليه وسلم فقال: "يا عائشةُ، ما فعلت شاتُكم؟ "قالت: أرادت أن تموتَ فذبحناها، فقسمناها ولم يبقَ عندنا منها إلَّا كتفُ الشاة، قال: "كلُّها لكم إلّا الكتف". وأخرجه أحمد 40 / (24240)، والترمذي (2470) من طريق سفيان الثَّوري، عن أبي إسحاق السبيعي، به مختصرًا. وصحَّحه الترمذي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7377)


7377 - أخبرنا أبو حاتم محمد بن حبّان القاضي، حدثنا زكريا بن يحيى الساجِيّ، حدثنا بِشر بن هلال، حدثنا عمر بن علي المُقدَّمي، قال: سمعت مَعْن بن محمد يحدِّث عن سعيد بن أبي سعيد المَقْبري، قال: كنتُ أنا وحنظلةُ بالبَقيع مع أبي هريرة، فحدثنا أبو هريرة بالبَقِيع عن رسولَ الله صلى الله عليه وسلم أنه قال: "الطاعمُ الشاكرُ مثلُ الصائمِ الصابر" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “শোকরগুজারী ভোজনকারী ধৈর্যশীল রোযাদারের সমতুল্য।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده حسن من أجل معن بن محمد: وهو الغفاري.وأخرجه الترمذي (2486) من طريق محمد بن معن عن أبيه معن بن محمد، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 13/ (7806)، وابن حبان (315) من طريق معمر عن رجل من بني غفار، عن سعيد المقبري، به. لكن سقط الرجل الغفاري من سند ابن حبان قال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 16/ 500: وهذا الرجل هو معن بن محمد الغفاري فيما أظن لاشتهار الحديث من طريقه.وسلف برقم (1551) من طريق مَعْن بن محمَّد عن حنظلة بن عليّ الأسلمي عن أبي هريرة.وانظر ما بعده. سليمان بن بلال كما في رواية المصنِّف فجعله من حديث أبي هريرة، ورواه عبد العزيز بن محمد الدراوردي عنه عن محمد بن أبي حرة عن حكيم بن أبي حرة عن سنان بن سنّة، وسئل أبو زرعة عنهما - كما في "العلل" (1513) - فقال: حديث الدراوردي أشبه.وأخرجه أحمد (13 / (7889) عن عبيد الله بن أبي قرة عن سليمان بن بلال، بهذا الإسناد.وأما طريق الدراوردي التي جعلها من حديث سنان بن سنّة، فأخرجها أحمد وابنه عبد الله في زوائده على "المسند" 31 (19014)، وابن ماجه (1765) من طريقين عن عبد العزيز بن محمد الدراوردي بالإسناد المذكور، وانظر تتمة تخريجه هناك.وانظر الحديث السابق.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7378)


7378 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الربيع بن سليمان، حدثنا عبد الله [1] بن وهب، أخبرني سليمان بن بلال، عن محمد بن عبد الله بن أبي حُرَّة، عن حَكيم بن أبي حُرَّة [2]، عن سلمان الأغرّ، عن أبي هريرة قال: ولا أعلمه إلَّا عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "إنَّ للطاعم الشاكرِ من الأجر مثلَ ما للصائمِ الصابر" [3].




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ছাড়া অন্য কারো থেকে এটি বর্ণিত বলে জানি না। তিনি বলেছেন: "নিশ্চয়ই শুকরগুজার পানাহারকারীর জন্য ধৈর্যশীল রোজাদারের সমপরিমাণ সওয়াব রয়েছে।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في (ز) إلى: عُبيد الله. سليمان بن بلال كما في رواية المصنِّف فجعله من حديث أبي هريرة، ورواه عبد العزيز بن محمد الدراوردي عنه عن محمد بن أبي حرة عن حكيم بن أبي حرة عن سنان بن سنّة، وسئل أبو زرعة عنهما - كما في "العلل" (1513) - فقال: حديث الدراوردي أشبه.وأخرجه أحمد (13 / (7889) عن عبيد الله بن أبي قرة عن سليمان بن بلال، بهذا الإسناد.وأما طريق الدراوردي التي جعلها من حديث سنان بن سنّة، فأخرجها أحمد وابنه عبد الله في زوائده على "المسند" 31 (19014)، وابن ماجه (1765) من طريقين عن عبد العزيز بن محمد الدراوردي بالإسناد المذكور، وانظر تتمة تخريجه هناك.وانظر الحديث السابق.



[2] تحرَّف في النسخ الخطية إلى درة. سليمان بن بلال كما في رواية المصنِّف فجعله من حديث أبي هريرة، ورواه عبد العزيز بن محمد الدراوردي عنه عن محمد بن أبي حرة عن حكيم بن أبي حرة عن سنان بن سنّة، وسئل أبو زرعة عنهما - كما في "العلل" (1513) - فقال: حديث الدراوردي أشبه.وأخرجه أحمد (13 / (7889) عن عبيد الله بن أبي قرة عن سليمان بن بلال، بهذا الإسناد.وأما طريق الدراوردي التي جعلها من حديث سنان بن سنّة، فأخرجها أحمد وابنه عبد الله في زوائده على "المسند" 31 (19014)، وابن ماجه (1765) من طريقين عن عبد العزيز بن محمد الدراوردي بالإسناد المذكور، وانظر تتمة تخريجه هناك.وانظر الحديث السابق.



7378 [3] - حديث حسن، وهذا الإسناد اختلف فيه على محمد بن عبد الله بن أبي حرّة، فرواه عنه سليمان بن بلال كما في رواية المصنِّف فجعله من حديث أبي هريرة، ورواه عبد العزيز بن محمد الدراوردي عنه عن محمد بن أبي حرة عن حكيم بن أبي حرة عن سنان بن سنّة، وسئل أبو زرعة عنهما - كما في "العلل" (1513) - فقال: حديث الدراوردي أشبه.وأخرجه أحمد (13 / (7889) عن عبيد الله بن أبي قرة عن سليمان بن بلال، بهذا الإسناد.وأما طريق الدراوردي التي جعلها من حديث سنان بن سنّة، فأخرجها أحمد وابنه عبد الله في زوائده على "المسند" 31 (19014)، وابن ماجه (1765) من طريقين عن عبد العزيز بن محمد الدراوردي بالإسناد المذكور، وانظر تتمة تخريجه هناك.وانظر الحديث السابق.