আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
7519 - حدّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدّثنا حُميد بن عيّاش الرَّمْلي، حدّثنا مُؤمَّل بن إسماعيل، حدّثنا سفيان عن الأعمش، عن سالم بن أبي الجَعْد، عن أبي أُمامة قال: أبصر النبيُّ صلى الله عليه وسلم امرأةً معها صبيّتانِ قد حَمَلَتْ إحداهما، وهي تقودُ الأخرى، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "والداتٌ حاملاتٌ رَحيماتٌ، لولا ما يأتِينَ إلى أزواجهنَّ لَدَخَلَ مُصلِّياتُهنَّ الجنَّةَ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وقد أعضلَه شعبةُ عن الأعمش [2]:
আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একজন মহিলাকে দেখলেন, যার সাথে দুটি ছোট শিশু ছিল। সে তাদের একজনকে কোলে তুলে নিয়েছিল এবং অন্যজনকে হাত ধরে নিয়ে যাচ্ছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তারা হল জন্মদাত্রী, গর্ভধারিণী ও দয়াবান। যদি তারা তাদের স্বামীদের সাথে যে আচরণ করে (অর্থাৎ তাদের আচরণের ত্রুটি) না করত, তাহলে তাদের মধ্যে যারা সালাত (নামাজ) আদায় করে, তারা অবশ্যই জান্নাতে প্রবেশ করত।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف لانقطاعه، فقد صرّح سالم بن أبي الجعد بعدم سماعه لهذا الحديث من أبي أمامة عند أحمد في "مسنده" 36/ (22173)، وعند المصنّف في الرواية التالية حيث قال: ذُكر لي عن أبي أمامة. وإليه أشار المصنّف بقوله: أعضله شعبة، وسأل الترمذيّ - كما في "العلل الكبير" ص 386 - البخاريّ: سالم بن أبي الجعد سمع من أبي أمامة؟ فقال: ما أرى. قلنا: ومؤمل بن إسماعيل سيئ الحفظ. سفيان: هو الثَّوري.وأخرجه ابن ماجه (2013) عن محمد بن بشار، عن مؤمَّل بن إسماعيل، بهذا الإسناد.
[2] كذا وقع في النسخ الخطية، وهو سبق قلم، والصواب عن منصور - وهو ابن المعتمر - كما في الرواية التي ساقها المصنّف بعدها ليدلّل على إعضال شعبة للحديث.
7520 - أخبرَناه الشيخ أبو بكر بن إسحاق، حدّثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدّثنا أبو الوليد ومحمد بن كثير، قالا: حدّثنا شُعبة.وحدثنا أبو بكر بن بالوَيهِ، حدّثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدَّثني أبيّ، حدّثنا محمد بن جعفر، حدّثنا شعبة، عن منصور، عن سالم بن أبي الجَعْد، قال: ذُكر لي عن أبي أُمامة: أنَّ امرأةٌ أنتِ النبيّ صلى الله عليه وسلم ومعها ولدان، فأعطاها ثلاثَ تَمَرات، فأعطَتْ كلَّ واحد منهما تمرةً تمرةً، ثم إنَّ أحد الصبيين بكى فشَفَقَتْها، فأعطَتْ كلَّ واحد منهما النِّصفَ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "والداتٌ رحيماتٌ بأولادِهنَّ، لولا ما يَصنَعْنَ بأزواجهنَّ، دَخَلَ مُصلِّياتُهنَّ الجنَّةَ" [1].
আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, এক মহিলা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং তার সাথে ছিল দু’টি শিশু। অতঃপর তিনি তাকে তিনটি খেজুর দিলেন। তখন মহিলাটি তাদের প্রত্যেকের জন্য একটি করে খেজুর দিলেন। এরপর শিশু দু’টির মধ্যে একজন কেঁদে উঠল। ফলে তার (মহিলাটির) মনে দয়া উদ্রেক হলো। তখন তিনি (বাকি খেজুরটি ভেঙে) তাদের প্রত্যেককে অর্ধেক অর্ধেক দিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "মায়েরা তাদের সন্তানদের প্রতি অত্যন্ত দয়ালু হয়ে থাকে। যদি তারা তাদের স্বামীদের সাথে যে আচরণ করে (অর্থাৎ স্বামীদের অধিকার পালনে ত্রুটি), তা না করত, তবে তাদের মধ্যে যারা সালাত আদায়কারী, তারা অবশ্যই জান্নাতে প্রবেশ করত।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف لانقطاعه كما سلف بيانه في الرواية السابقة. أبو الوليد: هو هشام بن عبد الملك الطيالسي.وهو في "مسند أحمد" (36/ 22173) عن محمد بن جعفر، وقرن به حجاجَ بن محمد المصّيصي.وأخرجه أحمد أيضًا (22219) من طريق شريك النخعيّ، و (22311) عن زياد بن عبد الله البكائيّ، كلاهما عن منصور بن المعتمر، عن سالم، عن أبي أمامة، لم يذكرا فيه إرسالًا.
7521 - أخبرني أبو سهل أحمد بن محمد بن زياد النَّحْوي ببغداد، حدّثنا الحسن ابن مُكرَم، حدّثنا أبو عاصم، عن عَوف، عن أبي رجاء، عن سَمُرة بن جُندُب، أَنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "ألا إنَّ المرأةَ خُلقت من ضِلَعٍ، وإنك إِنْ تُرِدْ إقامتها تَكسِرْها، فدَارِها تَعِشْ بها ثلاث مرات [1].هذا حديث صحيح الإسناد على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وشاهدُه حديث ابن عَجْلان عن أبيه عن أبي هريرة عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال: "المرأةُ خُلِقَت من ضِلَعٍ أعوجَ، وإنك إن أقمتَها كسرتَها، وإن تركتَها [تستمتعْ بها] [2] وفيها عِوَج" [3].وهذا إسناد صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
সামুরাহ ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "সাবধান! নিশ্চয়ই নারীকে পাঁজরের হাড় থেকে সৃষ্টি করা হয়েছে। তুমি যদি তাকে সোজা করতে চাও, তবে তাকে ভেঙে ফেলবে। সুতরাং তুমি তার সাথে সদ্ব্যবহার করো (বা, মানিয়ে নাও), তবে তার সাথে বসবাস করতে পারবে"— (এ কথা তিনি) তিনবার বললেন।
এর সমর্থক হাদীসে আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: নারী সৃষ্টি করা হয়েছে বক্র পাঁজরের হাড় থেকে। তুমি যদি তাকে সোজা করতে যাও তবে তাকে ভেঙে ফেলবে। আর যদি তুমি তাকে ছেড়ে দাও (তাহলে তার থেকে উপকৃত হবে), কিন্তু তার মধ্যে বক্রতা রয়েই যাবে।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح أبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد النبيل، وعوف: هو ابن أبي جميلة، وأبو رجاء: هو عمران بن ملحان العطاردي.وأخرجه أحمد (33/ 20093) عن محمد بن جعفر، وابن حبان (4178) من طريق جعفر بن سليمان، كلاهما عن عوف بن أبي جميلة، بهذا الإسناد. لكن وقع أبو رجاء في رواية أحمد مبهمًا.قوله: "من ضلَع أعوج" شبه المرأة بالضلع في العِوَج، ويرمي الحديث إلى مداراة النساء وتألّف قلوبهن بالعفو عنهن والصبر عليهن، وأنَّ من رامَ تقويمهن فاته النفع بهن، فلا يتمُّ الاستمتاع بهن إلا بالصبر عليهن.
[2] ما بين المعقوفين لم يرد في النسخ الخطية، وأثبتناه من مصادر التخريج، والطبعة الهندية: تعش، مكان تستمتع.
7521 [3] - وصله أحمد 15/ (9524) عن يحيى بن سعيد، وابن حبان (4180) من طريق عبد الله بن رجاء كلاهما من محمد بن عجلان، عن أبيه، عن أبي هريرة. وسنده جيد.
7522 - حدّثنا بكر بن محمد بن حَمْدان الصَّيرَفي بمَرُو، حدّثنا أبو قلابة الرَّقَاشيّ، حدّثنا عبد الصمد بن عبد الوارث، حدّثنا عمر بن إبراهيم، عن قَتَادة، عن سعيد بن المسيّب، عن عبد الله بن عمرو، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم قال: "لا يَنظُرُ اللهُ إلى امرأةٍ لا تشكرُ لزوجِها ولا تَستَغني عنه" [1]. وقد قيل: عن شعبة عن قتادة متَّصِلًا:
আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আল্লাহ সেই নারীর দিকে (রহমতের) দৃষ্টি দেন না, যে তার স্বামীর প্রতি কৃতজ্ঞতা প্রকাশ করে না এবং তাকে ছাড়া অভাবমুক্ত থাকতে চায়।”
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد لا بأس برجاله، وقد اختُلف على قتادة في رفعه ووقفه كما بيَّنّاه في التعليق على الرواية (2806).
7523 - حدَّثَناه أبو علي الحافظ، أخبرنا علي بن العباس البَجَليّ، حدّثنا العباس بن يزيد البَحْرانيّ، حدّثنا معاذ بن هشام، حدّثنا شُعْبة، عن قَتَادة، عن سعيد بن المسيّب، عن عبد الله بن عمرو، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، قال: "لا يَنظُرُ اللهُ إلى امرأةٍ لا تَشكرُ لزوجِها، وهي لا تَستَغني عن زوجِها" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين إِنْ حَفِظَه العباسُ:
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, “আল্লাহ সেই নারীর দিকে তাকাবেন না, যে তার স্বামীর প্রতি কৃতজ্ঞতা প্রকাশ করে না, অথচ সে তার স্বামীর মুখাপেক্ষী।”
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل العباس بن يزيد البحرانيّ، وقد اختُلف على شعبة في رفعه ووقفه، كما اختُلف على قتادة، انظر ما سلف برقم (2806).وأخرجه أبو إسحاق المزكي في "المزكيات" (129) من طريق ابن خُزَيمة، عن العباس بن يزيد البحراني، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي الدنيا في "النفقة على العيال" (533)، والبزار في "مسنده" (2348)، والعقيلي في "الضعفاء" 1/ 588 تعليقًا، والطبراني في (الكبير) (14185) من طريق عبد الله بن المبارك، عن شعبة، به.وأخرجه أبو سعيد الشاشي في "حديثه" (53) عن ابن المبارك، عن سعيد، عن قتادة، به. فجعل سعيدًا مكان شعبة، كذا وقع عنده!
7524 - فإني سمعتُ أبا عليٍّ يقول: المحفوظُ من حديث شعبة ما حدَّثناه أبو بكر محمد بن إسحاق، حدّثنا أبو موسى، حدّثنا محمد بن جعفر، حدّثنا شعبة، عن قَتَادة، قال: سمعتُ سعيد بن المسيّب يحدّث عن عبد الله بن عَمرو أنه قال: لا ينظرُ اللهُ إلى امرأةٍ لا تشكرُ لزوجِها ولا تَستَغني عنه [1].
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: আল্লাহ তাআলা সেই মহিলার দিকে (দয়ার দৃষ্টিতে) তাকাবেন না, যে তার স্বামীর প্রতি কৃতজ্ঞতা প্রকাশ করে না, অথচ সে তার থেকে মুখাপেক্ষীহীন (স্বাধীন) নয়।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات لكن اختُلف على شعبة في رفعه كما في الرواية السابقة، ووقفه كما في هذه الرواية.وأخرجه النسائيّ (9088) من طريق يحيى القطان، عن شعبة، بهذا الإسناد.وتابع شعبةَ هشامٌ الدستوائيّ عن قتادة فرواه موقوفًا فيما ذكره العقيلي في "الضعفاء" 1/ 588.
7525 - أخبرنا أبو القاسم الحسن بن محمد بن الحسن [1] بن عُقْبة بن خالد السَّكُوني بالكوفة، حدّثنا عبد الله [2] بن غنّام بن حفص بن غِيَاث، حدّثنا أبي، عن أبيه، عن مِسعَر، عن أبي عُتْبة، عن عائشة قالت: قلت: يا رسولَ الله، مَن أعظمُ الناس حقًّا على المرأة؟ قال: "زوجُها" قلت: مَن أعظم الناس حقًّا على الرجل؟ قال: "أُمُّه" [3].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), নারীদের উপর মানুষের মধ্যে কার হক সবচেয়ে বেশি? তিনি বললেন, “তার স্বামী।” আমি বললাম, পুরুষদের উপর মানুষের মধ্যে কার হক সবচেয়ে বেশি? তিনি বললেন, “তার মা।”
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية الحسن إلى: أحمد.
[2] جاء في النسخ الخطية "عبد" من غير إضافة، وقد سلف الحديث برقم (7431)، وفيه هناك: عبد الله، على الصواب، وقد ترجم له الحاكم في "سؤالات الدارقطني" (123) وقال عنه: صدوق، لكن تحرَّف فيه هناك غنّام إلى عباس. ومسلم (2435) (74) و (75)، والترمذيّ (2017) و (3875)، وابن حبان (7006) من طرق عن هشام بن عروة، بهذا الإسناد. واستدراك المصنّف له ذهول منه.
7525 [3] - إسناده ضعيف لجهالة أبي عتبة، وقد سلف برقم (7431) من طريق أبي أحمد الزبيري عن مسعر بن كدام، وذكرنا هناك تخريجه. وطريق المصنّف التي هنا: حفص بن غياث عن مسعر، لم نقف عليها عند غير المصنّف. ومسلم (2435) (74) و (75)، والترمذيّ (2017) و (3875)، وابن حبان (7006) من طرق عن هشام بن عروة، بهذا الإسناد. واستدراك المصنّف له ذهول منه.
7526 - حدّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدّثنا الربيع بن سليمان، حدّثنا أسَد بن موسى، حدّثنا مبارك بن فَضَالة، عن ثابت، عن أنس قال: كان النبيُّ صلى الله عليه وسلم إذا أتي بشيء يقول: اذهبوا به إلى فلانة، فإنها كانت صديقةَ خديجةَ، اذهبُوا به إلى فلانةَ، فإنها كانت تُحِبُّ خديجةَ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট যখন কোনো কিছু আনা হতো, তখন তিনি বলতেন: "এটা অমুক মহিলার কাছে নিয়ে যাও, কারণ সে খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বন্ধু ছিল। এটা অমুক মহিলার কাছে নিয়ে যাও, কারণ সে খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ভালোবাসতো।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف، مبارك بن فضالة مدلِّس، وقد عنعنه، ولم نقف على تصريح له بسماعه من ثابت: وهو البناني.وأخرجه ابن حبان (7007) من طريق هشام بن عمار، عن أسد بن موسى، بهذا الإسناد.ويُغني عنه ما بعده. ومسلم (2435) (74) و (75)، والترمذيّ (2017) و (3875)، وابن حبان (7006) من طرق عن هشام بن عروة، بهذا الإسناد. واستدراك المصنّف له ذهول منه.
7527 - حدّثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدّثنا الفضل بن محمد الشَّعْراني، حدّثنا إبراهيم بن حمزة، حدّثنا عبد العزيز بن محمد، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة: أنَّ النبيّ صلى الله عليه وسلم كان يذبح الشاةَ، فيَتَتبَّعُ بها صدائق خديجة بنتِ خُوَيلِد [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه!
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি ছাগল যবেহ করতেন, অতঃপর তিনি তা দ্বারা খাদীজা বিনত খুয়াইলিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বান্ধবীদের সন্ধান করে বেড়াতেন (অর্থাৎ তাদের কাছে গোশত পাঠাতেন)।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل إبراهيم بن حمزة - وهو ابن محمد الزبيري - وعبد العزيز بن محمد - وهو الدراوردي - وقد توبعا.وأخرجه أحمد 40/ (24310) و 43/ (26379)، والبخاري (3816) و (3818) و (6004)، ومسلم (2435) (74) و (75)، والترمذيّ (2017) و (3875)، وابن حبان (7006) من طرق عن هشام بن عروة، بهذا الإسناد. واستدراك المصنّف له ذهول منه.
7528 - حدّثنا أحمد بن كامل القاضيّ، حدّثنا أحمد بن عُبيد الله [1] النَّرْسيّ، حدّثنا روح بن عُبادة، حدّثنا عوف، عن محمد، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لولا بنو إسرائيلَ لم يَخنَزِ اللحمُ، ولولا حوّاء لم تَخُنْ أُنثى زوجَها" [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি বনী ইসরাঈল না থাকত, তবে গোশত কখনও পচত না। আর যদি হাওয়া না থাকত, তবে কোনো নারী তার স্বামীর সাথে কখনও বিশ্বাসঘাতকতা করত না।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: عبد الله. فخيانة كل واحدة منهن بحسبها، وقريب من هذا حديث جَحَدَ آدمٌ فجحدت ذريتُه"، وفي الحديث إشارة إلى تسلية الرجال فيما يقع لهم من نسائهم بما وقع من أمهنَّ الكبرى، وأنَّ ذلك من طبعهن فلا يُفرِط في لوم من وقع منها شيء من غير قصد إليه، أو على سبيل النُّدور، وينبغي لهن أن لا يتمكَّنَّ بهذا في الاسترسال في هذا النوع، بل يضبطن أنفسهن، ويجاهدن هواهن، والله المستعان. انتهى كلام ابن حجر.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن قد خالف روح بن عبادة ثقتان فروياه عن عوف - وهو ابن أبي جميلة - عن خِلاس بن عمرو الهَجَري عن أبي هريرة، فجعلا مكان محمد وهو ابن سِيرِين - خلاسًا، وخلاس لم يسمع من أبي هريرة، ولم نقف عليه من طريق ابن سِيرين عند غير المصنّف، لكن صحَّ الحديث من غير هذا الوجه كما سيأتي.وأخرجه إسحاق بن راهويه في "مسنده" (115) عن معتمر بن سليمان، وأحمد في "مسنده" 13/ (8032) عن محمد بن جعفر، كلاهما عن عوف بن أبي جميلة، عن خلاس بن عمرو، عن أبي هريرة.وأخرجه أحمد 13/ (8170)، والبخاري (3330) و (3399)، ومسلم (1470) (63)، وابن حبان (4169) من طريق همام بن منبه، عن أبي هريرة.وأخرج شطره الثاني أحمد 14/ (8591) و (8597)، ومسلم (1470) (62) من طريق أبي يونس سُليم بن جُبير، عن أبي هريرة.قوله: "لولا بنو إسرائيل لم يخنز اللحم"، قال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 10/ 17: أي: يُنتِن، والخَنْز: التغير والنتن، قيل: أصله أنَّ بني إسرائيل ادَّخروا لهم السَّلْوى وكانوا نُهُوا عن ذلك فعوقبوا بذلك، حكاه القرطبي وذكره غيره عن قتادة، وقال بعضهم: معناه: لولا أنَّ بني إسرائيل سَنُّوا ادخار اللحم حتى أنتن لما ادُّخِر فلم يُنتن.وقوله: "لم تخن أنثى زوجها" فيه إشارة إلى ما وقع من حواء في تزيينها لآدم الأكل من الشجرة حتى وقع في ذلك، فمعنى خيانتها: أنها قبلت ما زيَّن لها إبليس حتى زيَّنته لآدم، ولما كانت هي أم بنات آدم أشبهنها بالولادة ونَزْع العِرق، فلا تكاد امرأة تسلم من خيانة زوجها بالفعل أو بالقول، وليس المراد بالخيانة هنا ارتكاب الفواحش، حاشا وكلا، ولكن لما مالت إلى شهوة النفس من أكل الشجرة، وحسنت ذلك لآدم، عُدَّ ذلك خيانة له، وأما من جاء بعدها من النساء فخيانة كل واحدة منهن بحسبها، وقريب من هذا حديث جَحَدَ آدمٌ فجحدت ذريتُه"، وفي الحديث إشارة إلى تسلية الرجال فيما يقع لهم من نسائهم بما وقع من أمهنَّ الكبرى، وأنَّ ذلك من طبعهن فلا يُفرِط في لوم من وقع منها شيء من غير قصد إليه، أو على سبيل النُّدور، وينبغي لهن أن لا يتمكَّنَّ بهذا في الاسترسال في هذا النوع، بل يضبطن أنفسهن، ويجاهدن هواهن، والله المستعان. انتهى كلام ابن حجر.
7529 - حدّثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدّثنا الحسين بن الفضل البَجَلي، حدّثنا سليمان بن حَرْب، حدّثنا أبو عوانة، حدّثنا داود بن عبد الله الأَوْديّ، عن عبد الرحمن بن عبد الله المُسْلي، عن الأشعث بن قيس، قال: تضيَّفتُ عمرَ بنَ الخطاب، فقام في بعض الليل فتناول امرأتَه فضربها، ثم نادانيّ: يا أشعثُ، قلت: لبَّيك، قال: احفَظْ عني ثلاثًا حفظتهن عن رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا تَسألِ الرجلَ فيمَ يَضْرِبُ امرأتَه، ولا تَسأله عمَّنَ يَعتمِدُ من إخوانِه ولا يعتمدُهم، ولا تَنَمْ إِلَّا على وِترٍ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আশ'আস ইবনে কায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মেহমান হলাম। রাতের কিছু অংশ পার হলে তিনি উঠে দাঁড়ালেন এবং তাঁর স্ত্রীর দিকে এগিয়ে গিয়ে তাকে প্রহার করলেন। অতঃপর তিনি আমাকে ডেকে বললেন: হে আশ'আস! আমি বললাম: লাব্বাইক (আমি উপস্থিত)। তিনি বললেন: আমার পক্ষ থেকে তিনটি বিষয় মনে রাখো, যা আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে মুখস্থ করেছি: 'কোনো ব্যক্তিকে তুমি জিজ্ঞাসা করবে না, কেন সে তার স্ত্রীকে প্রহার করছে; আর তুমি তাকে জিজ্ঞাসা করবে না যে, তার ভাইদের মধ্যে সে কাকে বিশ্বাস করে এবং কাকে বিশ্বাস করে না; আর তুমি বিতর সালাত আদায় করা ছাড়া ঘুমাবে না।'
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف لجهالة عبد الرحمن بن عبد الله المُسلي فقد تفرد بالرواية عنه داود بن عبد الله الأوديّ، وذكره أبو الفتح الأزدي في "الضعفاء"، وقال: فيه نظر، وأورد له هذا الحديث.أبو عوانة: هو الوضاح بن عبد الله اليَشكري.وأخرجه أحمد (1/ 122)، وأبو داود (2147)، وابن ماجه (1986)، والنسائي (9123) من طرق عن أبي عوانة، بهذا الإسناد. ولم يذكر أحد منهم قصة الاعتماد على الإخوان وجعلوا مكانها: ونسيتُ الثالثة، إلّا رواية أبي داود والنسائي فروايتهما مختصرة بذكر قصة ضرب المرأة.
7530 - أخبرنا عبد الله بن إسحاق بن الخُراساني العَدْل، حدّثنا أحمد بن عُبيدٍ النَّحْويّ، حدّثنا أبو عامر العقديّ، حدّثنا عبد الرحمن بن أبي بكر التّيميّ، قال: عن محمد بن طلحة، عن أبيه: أنَّ رجلًا من العرب كان يَغْشَى أبا بكر يقال له: عُفَير، فقال له أبو بكر: يا عُفَيرُ، ما سمعت من رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول في الوُدِّ؟ [قال: سمعته يقول: "الوُدُّ] [1] يُتَوارَثُ والبُعْضُ يُتَوارَثُ" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وقد رواه يوسف بن عطية عن أبي بكر بن عبد الله بن أبي مُلَيكة:
তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন আরব লোক ছিলেন যিনি আবূ বকরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে আসা-যাওয়া করতেন। তাকে উফাইর বলা হতো। তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: হে উফাইর, আপনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে ভালোবাসা (আল-উদ্দু) সম্পর্কে কী বলতে শুনেছেন? তিনি বললেন: আমি তাঁকে বলতে শুনেছি: "ভালোবাসা উত্তরাধিকারসূত্রে প্রাপ্ত হয়, আর বিদ্বেষও উত্তরাধিকারসূত্রে প্রাপ্ত হয়।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] ما بين المعقوفين لم يرد في النسخ الخطية، وأثبتناه من "تلخيص الذهبي". معتمدًا على رواية البيهقي في "شعب الإيمان" (7520) التي رواها عن البخاريّ فسماه: محمد بن عبد الرحمن بن فلان بن طلحة، ثم قال: يحتمل أن يكون هو محمد بن عبد الرحمن بن طلحة العبدري فابن المبارك روى عنه.قلنا: رواية البيهقي التي في "الشعب" عن البخاريّ هي كذلك جاءت في "تاريخ البخاري الكبير" 1/ 121: محمد بن طلحة بن عبد الرحمن بن فلان بن طلحة، وهذا مخالف لجميع من رواه عن ابن المبارك، ممن ذكرنا تخريجهم ومنهم البخاري نفسه في كتاب "الأدب المفرد"، حيث جاء عندهم: محمد بن عبد الرحمن عن محمد بن فلان، فما وقع في "التاريخ الكبير" لعله خطأ قديم من النساخ، والله تعالى أعلم.
[2] إسناده ضعيف جدًّا، أحمد بن عبيد النحوي فيه ضعف وعبد الرحمن بن أبي بكر - وهو ابن عبد الله المُليكي - التيمي قال الذهبي في "التلخيص": المُليكي واه، وفي الخبر انقطاع؛ يعني بين طلحة - وهو ابن عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي بكر الصديق - وبين جدِّ أبيه أبي بكر الصديق، وهو كذلك، فقد قال أبو زرعة الرازيّ: طلحة بن عبد الله عن أبي بكر الصديق مرسل.وسيذكر المصنّف في الرواية التالي الواسطة بينهما لكن إسنادها لا يفرح به.وأخرجه البخاريّ في "التاريخ الكبير" 1/ 121 و 7/ 81، وابن بشران في "الأمالي" (452)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5600)، والقضاعي في "مسند الشهاب" (218)، والخطيب في "موضح الأوهام" 1/ 24 - 25 من طريق أبي عامر العقديّ، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاريّ أيضًا في "التاريخ" 1/ 121 و 7/ 81، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2747)، والطبراني في "الكبير" (17/ 507)، وابن بشران (453)، وأبو نعيم (5600)، والبيقهي في "شعب الإيمان" (7519)، والخطيب 1/ 24 من طرق عن عبد الرحمن بن أبي بكر، به.وخالف هؤلاء الجمعَ جمعٌ آخر، فرووه بالإسناد نفسه لكن جعلوه من مسند أبي بكر الصديق نفسه.فأخرجه أبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (111) - ومن طريقه الخطيب 1/ 24 - من طريق المسيب بن شريك، وأبو الشيخ في "الأمثال" (216)، والخطيب 1/ 23 - 24 من طريق محمد بن إسماعيل بن أبي فديك، والخطيب 1/ 24 من طريق آدم بن أبي إياس، ثلاثتهم عن عبد الرحمن بن أبي بكر، عن محمد بن طلحة، عن أبيه، عن أبي بكر الصديق، رفعه هو، وهذه الطرق الثلاثة بعضها أشدُّ ضعفًا من بعض، فلا يفرح بها، ومدارها أيضًا على المُليكي.وأخرجه ابن المبارك في "البر والصلة" (94)، ومن طريقه البخاريّ في "الأدب المفرد" (43)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2748) عن محمد بن عبد الرحمن، عن محمد بن فلان ابن طلحة، عن أبي بكر بن حَزْم، عن رجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم قال: كفيتكم أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "الودُّ يُتوارث". ومحمد بن فلان ترجمه المزي وجعل الراوي عنه محمد بن عبد الرحمن هو ابن أبي ذئب، وتبعه على ذلك ابن حجر في "التقريب" وجعل ابن فلان هذا مجهولًا. وهذا هو الصواب فيما نظن، ثم رجع ابن حجر في "تهذيب التهذيب" فاستظهر أنَّ الروايتين هما واحد معتمدًا على رواية البيهقي في "شعب الإيمان" (7520) التي رواها عن البخاريّ فسماه: محمد بن عبد الرحمن بن فلان بن طلحة، ثم قال: يحتمل أن يكون هو محمد بن عبد الرحمن بن طلحة العبدري فابن المبارك روى عنه.قلنا: رواية البيهقي التي في "الشعب" عن البخاريّ هي كذلك جاءت في "تاريخ البخاري الكبير" 1/ 121: محمد بن طلحة بن عبد الرحمن بن فلان بن طلحة، وهذا مخالف لجميع من رواه عن ابن المبارك، ممن ذكرنا تخريجهم ومنهم البخاري نفسه في كتاب "الأدب المفرد"، حيث جاء عندهم: محمد بن عبد الرحمن عن محمد بن فلان، فما وقع في "التاريخ الكبير" لعله خطأ قديم من النساخ، والله تعالى أعلم.
7531 - حدَّثَناه أبو الفضل محمد بن إبراهيم المزكِّي، حدّثنا جعفر بن محمد بن الحسين، حدّثنا يحيى بن يحيى، حدّثنا يوسف بن عطية، عن أبي بكر المُليكيّ، عن محمد بن طلحة بن عَبد الله [1]، عن أبيه، عن عبد الرحمن بن أبي بكر، قال: لقيَ أبو بكر الصِّديقُ رجلًا من العرب يقال له: عُفَير، فقال له أبو بكر: ما سمعتَ من رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول في الود؟ قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إنّ الوُدَّ والعداوةَ يُتَوارِثانِ" [2].
আবদুর রহমান ইবনে আবি বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবু বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উফায়র নামে পরিচিত একজন আরব ব্যক্তির সাথে সাক্ষাৎ করলেন। তখন আবু বকর তাকে জিজ্ঞেস করলেন: বন্ধুত্ব (বা ভালোবাসা) সম্পর্কে আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কী বলতে শুনেছেন? তিনি (উফায়র) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই ভালোবাসা ও শত্রুতা উত্তরাধিকার সূত্রে লাভ হয়।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: عُبيد الله، مصغرًا، وجاء على الصواب في "إتحاف المهرة" (13848).
[2] إسناده ضعيف جدًّا، يوسف بن عطية - وهو ابن باب الصفار - متروك الحديث، وأبو بكر المليكي - وهو عبد الرحمن بن أبي بكر بن عبيد الله - وهاه الذهبي كما سبق.وأخرجه الطبراني في "المعجم الكبير" (508) من طريق علي بن سعيد المسروقيّ، عن يوسف بن عطية الوراق، بهذا الإسناد. وسقط منه محمد بن طلحة فليستدرك.
7532 - أخبرني أزهر بن أحمد بن حَمدُون الخِرَقي ببغداد، حدّثنا يحيى بن جعفر بن الزِّبْرِقان، حدّثنا زيد بن الحُباب، حدّثنا موسى بن عُلَيّ بن رَبَاح، قال: سمعتُ أَبي يذكر عن سُرَاقة بن مالك، قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ألا أدلُّك على الصَّدقة - أو من أعظمِ الصَّدقة - ابنتُك مردودةٌ عليك، ليس لها كاسِبٌ غيرُك" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
সুরাকাহ বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "আমি কি তোমাকে সদকা সম্পর্কে বলে দেবো না—অথবা সর্বশ্রেষ্ঠ সদকার মধ্যে একটি হলো—তোমার সেই কন্যা, যে তোমার কাছে ফেরত এসেছে এবং তুমি ছাড়া তার অন্য কোনো উপার্জনকারী (বা ভরণপোষণকারী) নেই।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف، عُلَي بن رباح لم يسمعه من سراقة بن مالك كما أوضحته رواية أحمد في "المسند"، فقد جاء فيها: بلغني عن سراقة بن مالك، فذكره.وأخرجه ابن ماجه (3667) عن أبي بكر بن أبي شيبة، عن زيد بن الحباب، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (29/ 17586) عن عبد الله بن يزيد المقرئ، عن موسى بن علي، به. وأما حديث أبي هريرة، فأخرجه أحمد (14/ 8425)، وأخرجه الخرائطي في "مكارم الأخلاق" (699) عن حماد بن الحسن الوراق، كلاهما (أحمد والوراق) عن حماد بن مسعدة، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي شيبة 8/ 552 - 553 من طريق مندل بن عليّ، والبيهقي في "شعب الإيمان" (8678) من طريق محمد بن عبد الله الأنصاريّ، كلاهما عن ابن جريح، به.وأخرجه بنحوه الطبراني في "الأوسط" (6199) من طريق عبيد بن عمرو الحنفيّ، عن أيوب السختيانيّ، عن محمد بن سَيرِين، عن أبي هريرة قال الهيثمي في المجمع 8/ 158: فيه من لم أعرفهم.وأخرج البزار في "مسنده" (9689) من طريق ليث بن أبي سليم، عن أبي رزين، عن أبي هريرة رفعه: "ومن سعى على ثلاث بنات فهو في الجنة، كان له كأجر مجاهد في سبيل الله صائمًا قائمًا". وسنده ضعيف لضعف ليث بن أبي سليم.وأما حديث أبي ثعلبة، فأخرجه أحمد 45/ (27220)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1311)، والروياني في "مسنده" (1473)، والدولابي في "الكنى" (138)، والطبراني في "الكبير" (22/ 601) من طرق عن حماد بن مسعدة، عن ابن جريج، عن أبي الزبير، عن عمر بن نبهان، عن أبي ثعلبة الأشجعي قال: قلت: مات لي يا رسول الله ولدان في الإسلام، فقال: "من مات له ولدان في الإسلام أدخله الله عز وجل الجنة بفضل رحمته إياهما"، قال: فلما كان بعد ذلك قال: لقيَني أبو هريرة قال: فقال: أنت الذي قال له رسول الله صلى الله عليه وسلم في الولدَين ما قال؟ قلت: نعم، قال: فقال: لأن يكون قاله لي أحبُّ إليَّ ممّا غلقت عليه حمص وفلسطين. وانفرد الطبراني من بينهم فنسبه خشنيًا.وأخرجه مختصرًا ابن سعد 5/ 172، والبخاري في "التاريخ الكبير" 6/ 201، والطبراني 22/ (956) من طريقين عن ابن جُرَيج، به. لم يذكروا قصة لقاء أبي هريرة.
7533 - حدّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدّثنا محمد بن سِنان القزَّاز، حدّثنا حماد بن مَسْعَدة، عن ابن جُرَيج، عن أبي الزُّبير، عن عمر بن نَبْهان، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن كُنَّ له ثلاث بناتٍ، فَصَبَرَ عَلى لأَوائِهِنَّ وَسَرّائهنَّ، أدخَلَه الله الجنة برحمته إياهنَّ" قال: فقال رجلٌ: وابنتانِ يا رسول الله؟ قال: "وابنَتانِ" قال رجل: يا رسول الله، وواحدةٌ؟ قال: "وواحدة" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যার তিনটি কন্যা সন্তান থাকে, আর সে তাদের কষ্ট ও স্বাচ্ছন্দ্য উভয় অবস্থায় ধৈর্য ধারণ করে, আল্লাহ তাদের প্রতি দয়া করে তাকে জান্নাতে প্রবেশ করাবেন।" একথা শুনে এক ব্যক্তি বললো: ইয়া রাসূলুল্লাহ, দু'টি সন্তান হলেও কি? তিনি বললেন: "দু'টি হলেও।" অন্য এক ব্যক্তি বললো: ইয়া রাসূলুল্লাহ, একটি হলেও কি? তিনি বললেন: "একটি হলেও।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف لاضطرابه ولجهالة عمر بن نبهان، ومحمد بن سنان القزاز - وإن كان فيه كلام - متابع، وقد اختُلف فيه على ابن جريج، قال الدارقطني في "العلل" (1166): واختُلف عنه، فرواه حمَّاد بن مسعدة وغيره عن ابن جُريج عن أبي الزبير عن عمر بن نبهان عن أبي ثعلبة.ورواه غيره عن ابن جُريج بهذا الإسناد عن أبي هريرة، ثم قال: والقولُ قول حمَّاد بن مَسْعَدة ومن تابعَه، لأنه ذكر فيه أبا ثعلبة، وذكر أبا هريرة في آخره. قلنا: وستأتي الإشارة إليه.وعُمر بن نَبهان، تفرَّد بالرواية عنه أبو الزُّبير - وهو محمد بن مسلم بن تَدْرُس - قال البخاريّ: لا أدري من عمر، ونحوه قال أبو حاتم، وجهّله الذهبي وابن حجر، وتساهل ابن حبان فذكره في "الثقات".وأما أبو ثعلبة، فقد نقل ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 6/ 138 في ترجمة عمر بن نبهان عن أبيه قوله فيه: لا أعرفه، ولا أعرف أبا ثعلبة. ونقل ابن حجر مثله في "التهذيب" عن البخاريّ، ثم ترجماه في الكنى ونسباه أشجعيًّا، وقالا: له صحبة! ونسبه كلٌّ من ابن سعد وابن أبي عاصم والدولابي أشجعيًا، بينما نسبه كلُّ من ابن حبان في ترجمة عمر بنُ نَبهَان من "الثقات"، والطبراني في "الكبير" خُشَنيًا، قال الدارقطني في "العلل": يقال: إنَّ هذا أبو ثعلبة الأشجعيّ، وليس بالخُشَنى. وأما حديث أبي هريرة، فأخرجه أحمد (14/ 8425)، وأخرجه الخرائطي في "مكارم الأخلاق" (699) عن حماد بن الحسن الوراق، كلاهما (أحمد والوراق) عن حماد بن مسعدة، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي شيبة 8/ 552 - 553 من طريق مندل بن عليّ، والبيهقي في "شعب الإيمان" (8678) من طريق محمد بن عبد الله الأنصاريّ، كلاهما عن ابن جريح، به.وأخرجه بنحوه الطبراني في "الأوسط" (6199) من طريق عبيد بن عمرو الحنفيّ، عن أيوب السختيانيّ، عن محمد بن سَيرِين، عن أبي هريرة قال الهيثمي في المجمع 8/ 158: فيه من لم أعرفهم.وأخرج البزار في "مسنده" (9689) من طريق ليث بن أبي سليم، عن أبي رزين، عن أبي هريرة رفعه: "ومن سعى على ثلاث بنات فهو في الجنة، كان له كأجر مجاهد في سبيل الله صائمًا قائمًا". وسنده ضعيف لضعف ليث بن أبي سليم.وأما حديث أبي ثعلبة، فأخرجه أحمد 45/ (27220)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1311)، والروياني في "مسنده" (1473)، والدولابي في "الكنى" (138)، والطبراني في "الكبير" (22/ 601) من طرق عن حماد بن مسعدة، عن ابن جريج، عن أبي الزبير، عن عمر بن نبهان، عن أبي ثعلبة الأشجعي قال: قلت: مات لي يا رسول الله ولدان في الإسلام، فقال: "من مات له ولدان في الإسلام أدخله الله عز وجل الجنة بفضل رحمته إياهما"، قال: فلما كان بعد ذلك قال: لقيَني أبو هريرة قال: فقال: أنت الذي قال له رسول الله صلى الله عليه وسلم في الولدَين ما قال؟ قلت: نعم، قال: فقال: لأن يكون قاله لي أحبُّ إليَّ ممّا غلقت عليه حمص وفلسطين. وانفرد الطبراني من بينهم فنسبه خشنيًا.وأخرجه مختصرًا ابن سعد 5/ 172، والبخاري في "التاريخ الكبير" 6/ 201، والطبراني 22/ (956) من طريقين عن ابن جُرَيج، به. لم يذكروا قصة لقاء أبي هريرة.
7534 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدّثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدّثنا مُسدَّد، حدّثنا المُعتمِر، قال: سمعتُ حميدًا يُحدِّث عن أنس قال: مرَّ النبيُّ صلى الله عليه وسلم بأُناسٍ من أصحابه وصبيٌّ بين ظهرانَي الطريق، فلما رأت أُمُّه الدوابَّ، خَشِيَتْ على ابنها أن يُوطأَ، فسَعَتْ والهةً، فقالت: ابني ابني، فاحتمَلَتْ ابنَها، فقال القومُ: يا نبيَّ الله، ما كانت هذه لِتُلقيَ ابنها في النار، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا واللهِ، لا يُلقي الله حبيبه في النَّار"، قال: فخَصَمَهم نبيُّ الله صلى الله عليه وسلم [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীগণের একদল লোকের কাছ দিয়ে যাচ্ছিলেন এবং রাস্তার মাঝখানে একটি শিশু ছিল। যখন তার মা (রাস্তার উপর দিয়ে) জন্তু-জানোয়ার আসতে দেখলেন, তিনি আশঙ্কা করলেন যে তার সন্তান পিষ্ট হতে পারে। তিনি তখন ব্যাকুল চিত্তে দৌড়ে এলেন এবং বললেন, "আমার ছেলে! আমার ছেলে!" অতঃপর তিনি তার সন্তানকে তুলে নিলেন। তখন লোকেরা বলল, "হে আল্লাহর নবী! এই মহিলা যেমন তার সন্তানকে আগুনে নিক্ষেপ করতে পারে না," তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আল্লাহর শপথ! আল্লাহ তাঁর প্রিয় বান্দাকে জাহান্নামে নিক্ষেপ করবেন না।" তিনি (বর্ণনাকারী) বলেন, এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের সাথে যুক্তিতে জয়ী হলেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح. المعتمر هو ابن سليمان، وحميد: هو الطويل.وسلف عند المصنّف برقم (195).
7535 - حدّثنا الحسن بن يعقوب بن يوسف العدل، حدّثنا محمد بن عبد الوهاب، أخبرنا جعفر بن عَون، أخبرنا أبو مالك الأشجعيّ، عن زياد بن حُدَير، عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "من وُلِدَت له أنثى فلم يَئِدْها، ولم يُهِنْها، ولم يُؤثِرْ ولدَه - يعني الذَّكر - عليها، أدخله الله بها الجنَّةَ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কারো যদি কন্যা সন্তান জন্ম নেয়, আর সে তাকে জীবন্ত কবর না দেয় (হত্যা না করে), এবং তাকে লাঞ্ছিত বা অপমান না করে, এবং তার পুত্র সন্তানকে—অর্থাৎ ছেলে সন্তানকে—তার (কন্যার) উপর প্রাধান্য না দেয়, তবে আল্লাহ এর বিনিময়ে তাকে জান্নাতে প্রবেশ করাবেন।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف، ابن حدير مترجم في باب من نسبه إلى أبيه من "التهذيب" وفروعه، ولم يذكروا له اسمًا، وقد سمّاه الحاكم في هذه الرواية زيادًا، وابن حدير غير المسمى لم يرو عنه غير أبي مالك الأشجعي سعدِ بن طارق، ولم يؤثر توثيقه عن أحد، لذا قال المنذري في "الترغيب": غير مشهور، وقال الذهبي في الميزان: لا يعرف، وقال ابن حجر في "التقريب": مستور؛ ففرّقوا بينه وبين زياد فجعلوهما اثنين، وهو الصواب إن شاء الله.وأخرجه ابن أبي شيبة 8/ 551، وأحمد (3/ 1957)، وأبو داود (5146) من طريق أبي معاوية محمد بن خازم، عن أبي مالك الأشجعي، بهذا الإسناد.
7536 - أخبرنا أبو الحسن محمد بن علي بن بكر العدل ابن ابنةِ إبراهيم بن هانئ، حدّثنا السَّرِيّ بن خُزَيمة، حدّثنا مسلم بن إبراهيم، حدّثنا عُبيد الرحمن بن فَضَالة، حدّثنا بكر بن عبد الله المُزَنيّ، عن أنس بن مالك قال: جاءت امرأةٌ إلى عائشة تسألُ ومعها صبيَّانِ، فأعطتها ثلاثَ تَمَرات، فأعطَتْ كلَّ صبي تمرةً، وأمسكَتْ لنفسِها تمرةً، فأكل الصبيَّانِ التمرتينِ، فعَمَدَتْ إلى التمرة فشقَّتها نِصفَينِ، فأعطَتْ كلَّ صبيٍّ لها نصفَ تمرة، فجاء النبيُّ صلى الله عليه وسلم فَأَخبَرَتْه، فقال: "وما يُعجِبُكِ منها، لقد رَحِمَها الله برحمتِها صَبِيَّيْها" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক মহিলা আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে কিছু চাইল এবং তার সাথে দুটি শিশু ছিল। তিনি (আয়েশা) তাকে তিনটি খেজুর দিলেন। সে প্রত্যেক শিশুকে একটি করে খেজুর দিল এবং নিজের জন্য একটি খেজুর রেখে দিল। শিশুরা দুটি খেজুর খেয়ে ফেলল। তখন সে (মহিলাটি) তার (নিজের জন্য রাখা) খেজুরটি নিলেন এবং দুই ভাগ করলেন, অতঃপর প্রত্যেক শিশুকে তার অর্ধেক করে অংশ দিলেন। অতঃপর নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসলেন। আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বিষয়টি জানালেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি এতে এত আশ্চর্য হচ্ছ কেন? তার এই শিশু দুটির প্রতি দয়ার কারণে আল্লাহ অবশ্যই তাকে দয়া করেছেন।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد جيد، أبو الحسن محمد بن علي بن بكر: هو محمد بن الحسن بن علي بن بكر، وقد تكلمنا عليه عند الرواية السالفة برقم (3503).وعبد الرحمن بن فضالة ذكره ابن سعد في "الطبقات" 9/ 276 مكبّرًا، وكناه أبا أمية، وكذلك جاء في بعض مصادر التخريج مكبرًا، كأبي نعيم في "الحلية" وقال: عبد الرحمن هو أخو مبارك يجمع حديثه، وجاء في "علل أحمد" (1563) و (4564) مصغرًا، وكناه أيضًا أبا أمية، ووثقه.وأما ابن حبان فذكر المكبر في "ثقاته" 7/ 91، وقال: يروي عن بكر بن عبد الله المزنيّ، روى عنه ابن المبارك وابن مهدي ووكيع، وهم إخوة ثلاثة: المبارك وعبد الرحمن وعُبيد الرحمن، ثم ترجم لعُبيد الرحمن المصغّر 7/ 92، فقال: يروي عن بكر بن عبد الله المزني عن أنس، روى عنه مسلم ابن إبراهيم، ليس في المحدثين عُبيد الرحمن غير هذا، والأشجعيِّ صاحب الثّوريّ، ووقع في رواية البزار وحده: عُبيد الله بن فضالة، وقال: وعبيد الله بن فضالة بصريّ، وهم إخوة: المبارك بن فضالة وعبيد الله بن فضالة والمفضّل بن فضالة، وكلهم قد حدَّث، ولا بأس بهم. وقال الذهبي في "الكنى" (493): عبد الرحمن بن فضالة - ويقال: عبيد الرحمن - البصري أخو مبارك؛ فجعله واحدًا اختُلف في اسمه. وأما البخاريّ فأعرض عن هذه الخلافات ولم يسمّه في روايته في "الأدب" فقال: ابن فضالة.وأخرجه البخاريّ في "الأدب المفرد" (89)، والبزار في "مسنده" (6762)، وأبو نعيم في "الحلية" 2/ 230، وقوام السنة في "الترغيب والترهيب" (1579) من طريق مسلم بن إبراهيم، عن عبد الرحمن بن فضالة، بهذا الإسناد. ووقع في رواية البزار: عبيد الله بن فضالة كما تقدم. وقال أبو نعيم: حديث غريب من حديث بكر، ومن حديث عبد الرحمن، تفرَّد به عنه مسلم بن إبراهيم، وعبد الرحمن هو أخو مبارك، يجمع حديثه.وروي من حديث عائشة نفسها، فقد أخرجه أحمد (41/ 24611)، ومسلم (2630)، وابن حبان (448) من طريق عراك بن مالك، وابن ماجه (3668) من طريق صعصعة عم الأحنف، كلاهما عن عائشة.وأخرج نحوه أحمد (24572)، والبخاري (5995)، ومسلم (2629)، والترمذيّ (1915)، وابن حبان (2939) من طريق عروة بن الزبير، عن عائشة قالت: جاءتني امرأة معها ابنتان تسألنيّ، فلم تجد عندي غير تمرة واحدة، فأعطيتها فقسمتها بين ابنتيها ثم قامت فخرجت، فدخل النبيّ صلى الله عليه وسلم، فحدثتُه، فقال: "مَن يلي من هذه البنات شيئًا، فأحسن إليهن، كنَّ له سترًا من النار".
7537 - أخبرنا علي بن محمد بن عُقبة الشَّيباني بالكوفة، حدّثنا إبراهيم بن إسحاق القاضيّ، حدّثنا محمد بن عُبيد الطنافسي، حدَّثني محمد بن عبد العزيز الراسِبيّ، عن أبي بكر بن عبيد الله بن أنس، عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن عالَ جاريتَينِ حتى تُدرِكا، دخلت الجنةَ أنا وهو كهاتَينِ - وأشار بإصبعيه السَّبّابةِ والوُسطى - وبابانِ مُعجَّلانِ عقوبتهما في الدنيا: البَغْيُ والعُقوقُ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি দু’টি মেয়ের বালেগ হওয়া পর্যন্ত তাদের প্রতিপালন করল, আমি এবং সে জান্নাতে এভাবে প্রবেশ করব।”— এই বলে তিনি তাঁর শাহাদাত ও মধ্যমা আঙ্গুল দিয়ে ইশারা করলেন— “আর দুটি পাপ এমন রয়েছে যার শাস্তি দুনিয়াতেই দ্রুত দেওয়া হয়: (তা হলো) সীমালঙ্ঘন বা অন্যায় এবং পিতা-মাতার অবাধ্যতা।”
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح لكن انقلب اسم عبيد الله أبي بكر بن أنس عند المصنّف وعند الترمذيّ، وقد نبَّه عليه كما سيأتي.وأخرج شطره الأول الترمذيّ (1914) عن محمد بن وزير الواسطيّ، عن محمد بن عبيدٍ الطنافسي، بهذا الإسناد. وقال: حسن غريب من هذا الوجه، وقد روى محمد بن عبيد عن محمد بن عبد العزيز غير حديث بهذا الإسناد، وقال: عن أبي بكر بن عبيد الله بن أنس، والصحيح هو عبيد الله بن أبي بكر بن أنس.وأخرجه على الصواب مسلم (2631) من طريق أبي أحمد الزبيريّ، عن محمد بن عبد العزيز الراسبيّ، عن عبيد الله بن أبي بكر بن أنس، عن أنس، به مختصرًا أيضًا.وأخرج أحمد (19/ 1298)، وابن حبان (447) من طريق حماد بن زيد، عن ثابت البنانيّ، عن أنس أو غيره مرفوعًا: "من عال ابنتين أو ثلاث بنات، أو أختين، أو ثلاث أخوات حتى يَبِنَّ أو يموت عنهنَّ، كنت أنا وهو كهاتين"، وأشار بإصبعيه السبابة والوسطي.وأخرج أحمد (34/ 20380) عن وكيع، عن محمد بن عبد العزيز الراسبيّ، عن مولى أبي بكرة، عن أبي بكرة مرفوعًا: "ذنبان معجَّلان لا يؤخَّران: البغيّ، وقطيعة الرحم". وانظر تخريجه والكلام عليه هناك.وانظر ما سلف برقم (7450).
7538 - أخبرنا أبو الطيِّب محمد بن علي بن الحسن [1] الحِيريّ، حدّثنا محمد بن عبد الوهاب بن حَبيب، حدّثنا يعلى بن عُبيد، حدّثنا فِطر بن خَليفة، قال: كنتُ جالسًا عند زيد بن علي بالمدينة، فمرَّ عليه شيخٌ يقال له: شُرَحبيل أبو سعد، فقال له زيد: من أين جئتَ يا أبا سعد؟ قال: من عند أميرِ المدينة، حدّثتُه بحديث، قال: فحدِّثْ به القومَ، قال: سمعتُ ابن عباس يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما مِن مسلمٍ تُدرِكُ له ابنتانِ فيُحسِنُ إليهما ما صَحِبَتاه أو صَحِبَهما، إِلَّا أَدخَلَتاه الجنَّةَ" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এমন কোনো মুসলিম নেই যার দুটি কন্যা সন্তান হয়, আর সে তাদের প্রতি ইহসান (উত্তম আচরণ) করে, যতক্ষণ তারা তার সাথে থাকে বা সে তাদের লালনপালন করে, তবে ঐ দুই কন্যা তাকে অবশ্যই জান্নাতে প্রবেশ করিয়ে দেবে।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: الحسين، وجاء على الصواب في "إتحاف المهرة" (7722).
[2] صحيح بما قبله، وهذا إسناد ضعيف من أجل شرحبيل أبي سعد: وهو ابن سعد الخطمي.وأخرجه أحمد 4/ (2104)، وابن ماجه (3670)، وابن حبان (2945) من طرق عن فطر بن خليفة، بهذا الإسناد. واقتصروا فيه على المرفوع دون القصة.وأخرجه أحمد (5/ 3424) من طريق عكرمة، عن شرحبيل، به.