আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
7699 - أخبرنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا إسماعيل بن قُتيبة، حدثنا يحيى بن يحيى، أخبرنا أبو معاوية، حدثنا الأعمش، عن شقيق قال: اشتكى رجلٌ بطنَه من الصَّفَر، فنُعِتَ له السَّكَرُ، فذكر ذلك لعبد الله، فقال: إِنَّ الله لم يَجْعَلْ شَفاءَكم فيما حَرَّم عليكم [1].
আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি 'সাফার' (রোগ)-এর কারণে পেটের ব্যথার অভিযোগ করলো। অতঃপর তার জন্য 'সাকার' (নেশা জাতীয় পানীয়) ওষুধ হিসেবে বর্ণনা করা হলো। সে বিষয়টি আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে উল্লেখ করলো। তখন তিনি বললেন: নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদের আরোগ্যকে এমন বস্তুর মধ্যে রাখেননি, যা তিনি তোমাদের জন্য হারাম করেছেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات، والأعمش وإن لم يصرح بسماعه من شقيق -وهو ابن سلمة- قد توبع.وأخرجه عبد الرزاق (17098)، وأحمد في "الأشربة" (117)، والبيهقي 10/ 5 من طرق عن الأعمش، بهذا الإسناد. لكن زاد في رواية البيهقي بين الأعمش وشقيق: حبيبَ بن حسان! وحبيبٌ ضعيف.وأخرجه عبد الرزاق (17097)، وابن أبي شيبة 8/ 23 و 130، وأحمد في "الأشربة" (130)، والطبراني في "الكبير" (9714) و (9716)، وابن عبد البر في "التمهيد" 24/ 200 من طريق منصور بن المعتمر، وابن أبي شيبة 8/ 130، والطحاوي في شرح المعاني 1/ 108، والطبراني (9716) من طريق عاصم بن بهدلة، كلاهما عن شقيق بن سلمة، به.وأخرجه ابن أبي شيبة 8/ 130 من طريق مسروق، عن عبد الله بن مسعود.وعلّقه البخاري في "صحيحه" بلا إسناد بين يدي الحديث (5614).وفي الباب عن أم سلمة مرفوعًا عند ابن حبان (1391)، وفي إسناده لين.وأخرج مسلم (1984) وغيره: أنَّ طارق بن سويد سأل النبي صلى الله عليه وسلم عن الخمر فنهاه- أو كره- أن يصنعها، فقال: إنما أصنعها للدواء، فقال: "إنه ليس بدواء، ولكنه داء".وانظر ما سيأتي عند المصنف برقم (8465). والصَّفَر، بالتحريك: هو اجتماع الماء في البطن كما يعرض للمستسقي، وهو أيضًا دودٌ يقع في الكبد وشراسيف الأضلاع. انظر "النهاية" لابن الأثير.
7700 - وحدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بحر بن نصر، حدثنا عبد الله ابن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، أنَّ عبدَربّ ن سعيد حدثه، أنه سمع نافعًا يقول: كان ابنُ عمر إذا دعا طبيبًا يُعالج بعضَ أهله [1]، اشتَرَط عليه أن لا يُداويَ بشيءٍ مما حرَّم الله عز وجل [2].
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি যখন তাঁর পরিবারের কারো চিকিৎসার জন্য কোনো চিকিৎসক ডাকতেন, তখন তার উপর এই শর্ত আরোপ করতেন যে, সে যেন আল্লাহ আযযা ওয়া জাল কর্তৃক হারাম ঘোষিত কোনো বস্তু দ্বারা চিকিৎসা না করে।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في (ز): أصحابه.
[2] إسناده صحيح.وأخرجه البيهقي 10/ 5 من طريقين عن أبي العباس محمد بن يعقوب، بهذا الإسناد.
7701 - أخبرني عبد الرحمن بن حَمْدان الجلَّاب بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن نصر، حدثنا حَرَميُّ بن حَفْص [1]، حدثنا عبد العزيز بن مسلم [2]، حدثنا محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة قال: أتتِ امرأةٌ النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فذكرت أنَّ بها طَيْفًا من الشيطان، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إن شئتِ دعوتُ الله عز وجل فبرَّأَكِ، وإنْ شئتِ، فلا حسابَ ولا عذابَ" قالت: يا رسولَ الله، فدَعْني إذًا [3].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন মহিলা নবী কারীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট আসলেন এবং উল্লেখ করলেন যে, তাকে শয়তানের কোনো স্পর্শ (বা প্রভাব) পেয়ে বসেছে। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “তুমি যদি চাও, আমি আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার কাছে দুআ করব, আর তিনি তোমাকে আরোগ্য দান করবেন। আর যদি তুমি চাও [তবে ধৈর্য ধারণ করতে পারো], তাহলে তোমার জন্য কোনো হিসাবও নেই এবং কোনো শাস্তিও নেই।” মহিলাটি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! তবে আমাকে ছেড়ে দিন (আমি ধৈর্য ধারণ করি)।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرّف في (ز) و (ب) إلى حصن، وفي (ص) و (م) إلى: حصين.
[2] تحرّف في النسخ الخطية إلى: معلم.
7701 [3] - صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن عمرو: وهو ابن علقمة الليثي.إبراهيم بن نصر: هو ابن عبد العزيز الرازي، وعبد العزيز بن مسلم: هو القَسملي البصري.وأخرجه أحمد 15 / (9689)، وابن حبان (2909) من طريق محمد بن عبيد؛ وقرن به ابن حبان في روايته عبدة بن سليمان كلاهما عن محمد بن عمرو بن علقمة بهذا الإسناد.ويشهد له حديث ابن عباس عند البخاري (5652)، ومسلم (2576).
7702 - حدثني طاهر بن محمد [1] بن الحسين البيهقي بيحي آباد، حدثنا خالي الفضل بن محمد بن المسيَّب، حدثنا سعيد بن أبي مريم، حدثنا الليث بن سعد، حدثني زِيادة [2] بن محمد الأنصاري، عن محمد بن كعب القُرَظي، عن فَضَالة بن عُبيد أنه قال: جاء رجلانِ من أهل العراق يَلتَمسانِ الشِّفاءَ لأَبٍ لهما حُبِسَ بَوْلُهُ، فَدَلَّه القومُ على فَضَالة، فجاء الرجلان ومعهما، فَضَالة، فذَكَرا الذي بأبيهما، فقال فضالة: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَنِ اشتكى منكم شيئًا -أو اشتكى أخٌ له- فليقل: ربَّنا الذي في السَّماءِ تقدَّسَ اسمُك، أمرُك في السماءِ والأرض، كما رحمتك في السماء والأرض، اغفِرْ لنا حُوبَنا وخَطايانا يا ربَّ الطَّيِّبِينَ، أَنزِلْ شِفاءٌ من شِفائِكَ ورحمةً من رحمتِكَ على هذا الوَجَعِ، فيبرأَ" [3].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ফাদালাহ ইবনে উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ইরাক থেকে দুজন লোক তাদের বাবার জন্য আরোগ্য লাভের সন্ধানে এসেছিল, যার প্রস্রাব আটকে গিয়েছিল। লোকেরা তাদের ফাদালাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে যেতে বলল। তখন সেই দুজন লোক ফাদালাহকে সাথে নিয়ে আসল এবং তাদের বাবার সমস্যা সম্পর্কে জানাল। তখন ফাদালাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি, "তোমাদের মধ্যে কেউ যদি কোনো কিছুর অভিযোগ করে – অথবা তার কোনো ভাই যদি অভিযোগ করে – তবে সে যেন বলে: 'আমাদের রব! যিনি আসমানে আছেন, আপনার নাম পবিত্র। আপনার কর্তৃত্ব আসমান ও জমিনে প্রতিষ্ঠিত। আসমান ও জমিনে আপনার যেমন রহমত রয়েছে, তেমনি আমাদের গুনাহ ও ত্রুটিগুলো ক্ষমা করে দিন। হে পুণ্যবানদের রব! এই ব্যথার ওপর আপনার আরোগ্যের পক্ষ থেকে আরোগ্য এবং আপনার রহমতের পক্ষ থেকে রহমত নাযিল করুন, যাতে সে আরোগ্য লাভ করে'।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] كذا في النسخ الخطية، وسبق عند المصنف في موضعين سمّاه فيهما: طاهر بن يحيى، فلعلَّ لفظ "محمد" تحرَّف عن يحيى، والله أعلم.
[2] في النسخ الخطية: زياد.
7702 [3] - إسناده ضعيف جدًا لضعف زيادة بن محمد الأنصاري، والمعروف في هذا الحديث أنه من رواية فضالة بن عبيد عن أبي الدرداء، هكذا رواه جمع عن سعيد بن أبي مريم، وإسقاط أبي الدرداء هنا وجعلُه من حديث فضالة بن عبيد وهمٌ، إما من الفضل بن محمد بن المسيب أو ممّن دونه.فقد أخرجه الدارمي في "الرد على الجهمية" (70)، وفي الرد على المريسي" 1/ 514، وأخرجه النسائي (10810) عن أحمد بن سعد بن الحكم، واللالكائي في" أصول الاعتقاد" (647) من طريق إسحاق بن إبراهيم بن جابر ثلاثتهم (الدارمي وأحمد وإسحاق) عن سعيد بن الحكم بن أبي مريم، عن الليث بن سعد، بهذا الإسناد، بذكر أبي الدرداء.وكذلك رواه غير سعيد بن أبي مريم عن الليث بذكر أبي الدرداء كما سلف عند المصنف برقم (1288).
7703 - حدثنا أبو إسحاق إبراهيم بن محمد بن يحيى، حدثنا إمامُ المسلمين أبو بكر محمد بن إسحاق بن خُزيمة رضي الله عنه، حدثنا محمد بن موسى الحَرَشي، حدثنا سهل بن أسلم العَدَوي، حدثنا يزيد بن أبي منصور، عن الدُّخَين، عن عُقْبة بن عامر الجُهَني: أنه جاء في رَكْبٍ عشرة إلى النبيِّ صلى الله عليه وسلم، فبايع تسعةً وأمسكَ عن رجل منهم، فقالوا: ما شأنُ هذا الرجل لا تبايعُه؟! فقال: "إِنَّ فِي عَضُدِه تَمِيمةً"، فقطع الرجلُ التميمة، فبايعه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، ثم قال: "مَن علَّق فقد أشرَكَ" [1].
উকবাহ ইবন আমির আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি দশজনের একটি কাফেলার সাথে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলেন। তিনি নয়জনের নিকট থেকে বাইয়াত গ্রহণ করলেন, কিন্তু তাদের মধ্য থেকে একজন লোক থেকে বিরত থাকলেন। তারা জিজ্ঞেস করল: "এই লোকটির কী হলো যে আপনি তার বাইয়াত নিচ্ছেন না?" তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই তার বাহুতে একটি তামীমাহ (কবচ/তাবিজ) রয়েছে।" অতঃপর লোকটি তামীমাহটি কেটে ফেলল। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার বাইয়াত গ্রহণ করলেন এবং তারপর বললেন: "যে ব্যক্তি (তাবিজ/কবচ) ঝুলায়, সে শির্ক করে।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث قوي، محمد بن موسى الحرشي -وإن كان فيه لين- متابع، وباقي رجاله لا بأس بهم.وأخرجه أحمد 28/ (17422) من طريق عبد العزيز بن مسلم، عن يزيد بن أبي منصور، بهذا الإسناد. وهذا إسناد قوي من أجل يزيد بن أبي منصور.وانظر ما سلف برقم (7691).وفي الباب عن رجل من صُدَاء بايع النبي صلى الله عليه وسلم عند ابن وهب في "الجامع (666 - أبو الخير)، ومن طريقه الطحاوي في "شرح المعاني" 4/ 325، وسنده حسن في المتابعات والشواهد. وأخرجه الترمذي (3588) عن عبد الوارث بن عبد الصمد، بهذا الإسناد. وقال: حسن غريب من هذا الوجه.ويشهد له حديث عثمان بن أبي العاص السالف برقم (1287)، وهو عند مسلم (2202).
7704 - أخبرنا أبو العباس المحبوبي، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا الجُرَيري، عن أبي العلاء، عن عثمان بن أبي العاص قال: قلتُ: يا رسول الله، إِنَّ الشيطانَ قد حالَ بيني وبين صلاتي وقراءتي، فقال: "إنَّ ذلك شيطانٌ يقال له: خنزَبٌ، فإذا أحسَسْتَه فتعوَّذْ بالله منه، واتفُلْ عن يسارك"، قال: ففعلتُ فأذهَبَ الله عنِّي [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه!
উসমান ইবনু আবিল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, "ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! শয়তান আমার এবং আমার সালাত ও কিরাত পাঠের মাঝে বাধা সৃষ্টি করছে।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই এটি এমন এক শয়তান, যাকে খানযাব বলা হয়। যখন তুমি তার উপস্থিতি অনুভব করবে, তখন তুমি আল্লাহর কাছে তার থেকে আশ্রয় চাইবে (আউযুবিল্লাহ পড়বে) এবং তোমার বাম দিকে থুথু ফেলবে (হালকা ফুঁ দেবে)।" তিনি (উসমান) বলেন: "আমি তাই করলাম। ফলে আল্লাহ আমার থেকে তা দূর করে দিলেন।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح، يزيد بن هارون وإن كان سمع من الجريري -وهو سعيد بن إياس- بعد اختلاطه، قد تابعه عن سعيد غير واحد ممن سمع منه قبل اختلاطه، فهو من صحيح حديثه.وأخرجه أحمد 29/ (17897) عن إسماعيل ابن عليّة، وأحمد 29/ (17898)، ومسلم (2203) من طريق سفيان الثوري، ومسلم (2203) من طريق عبد الأعلى السامي وسالم بن نوح وأبي أسامة، كلهم عن سعيد الجريري، بهذا الإسناد. واستدراك الحاكم له ذهولٌ منه. وأخرجه الترمذي (3588) عن عبد الوارث بن عبد الصمد، بهذا الإسناد. وقال: حسن غريب من هذا الوجه.ويشهد له حديث عثمان بن أبي العاص السالف برقم (1287)، وهو عند مسلم (2202).
7705 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ العَدْلِ، حدثنا موسى بن هارون، حدثنا عبد الوارث ابن عبد الصمد، حدثني أبي، حدثنا أبو مَطَر محمد بن سالم، حدثنا ثابت البُنَاني قال: إذا اشتَكيتَ فضَعْ يدك حيث تشتكي، ثم قُلْ: "باسم الله، أعوذُ بعزَّةِ الله وقُدْرتِه من شرِّ ما أجدُ من وَجَعي هذا، ثم ارفَعْ يدَك، ثم أَعِدْ ذلك وِترًا"، فإنَّ أنس بن مالك حدَّثني: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم حدَّثه بذلك [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তুমি কোনো অসুস্থতা বোধ করো, তখন তোমার হাত ব্যথার জায়গায় রাখো, অতঃপর বলো: "বিসমিল্লাহ, আঊযু বি-ইয্যাতিল্লাহি ওয়া ক্বুদ্রাতিহী মিন শাররি মা আজিদু মিন ওয়াজা‘য়ী হাযা" (আল্লাহ্র নামে, আমি আল্লাহ্র মর্যাদা ও তাঁর ক্ষমতার আশ্রয় নিচ্ছি আমার এই ব্যথায় আমি যা অনুভব করছি তার অনিষ্ট থেকে)। অতঃপর তোমার হাত তুলে নাও এবং এটিকে বিজোড় সংখ্যায় পুনরাবৃত্তি করো। নিশ্চয়ই আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে বলেছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে এই বিষয়ে বলেছেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن سالم: وهو الرَّبَعي البصري. وأخرجه الترمذي (3588) عن عبد الوارث بن عبد الصمد، بهذا الإسناد. وقال: حسن غريب من هذا الوجه.ويشهد له حديث عثمان بن أبي العاص السالف برقم (1287)، وهو عند مسلم (2202).
7706 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب بن يوسف الحافظ، حدثني أبي، حدثنا قُتيبة بن سعيد، حدثنا عبد الوهاب بن عبد المجيد، قال: سمعتُ يحيى بن سعيد يقول: أخبرني محمد بن عبد الرحمن بن حارثةَ، عن عَمْرة: أنَّ عائشة أصابها مَرَضٌ، وأنَّ بعضَ بني أخيها ذكروا شَكْواها لرجل من الزُّطِّ [1] يتطبَّبُ، وأنه قال لهم: إنهم لَيَذكُرون امرأةً مسحورةً سَحَرَتها جاريةٌ في حَجْرها صبيٌّ، في حَجْر الجارية الآن صبيٌّ قد بالَ في حَجْرها، فقالت [2]: ايتُوني بها، فأُتِيَ بها، فقالت عائشةُ: سَحَرتيني [3]؟ قالت: نعم، قالت: لِمَ؟ قالت: أردتُ أن أُعتَقَ. وكانت عائشةُ قد أعتَقَتْها عن دُبُرٍ منها، فقالت: إنَّ الله عليِّ أن لا تُعتَقِينَ [4] أبدًا، انظروا شرَّ البيوتِ مَلَكةً فبِيعُوها منهم، ثم اشتَرُوا بثمِنها رقبةً فأعتِقُوها [5].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.آخر كتاب الطب كتاب الأضاحيّبسم الله الرحمن الرحيم
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি অসুস্থ হয়ে পড়েছিলেন। এবং তার ভাইপোদের কেউ কেউ চিকিৎসার জন্য একজন জুত (Zutt) গোত্রের লোকের কাছে তাঁর অসুস্থতার কথা বর্ণনা করেছিল। সে (চিকিৎসক) তাদেরকে বলল: তোমরা এমন এক নারীর কথা বলছো, যাকে জাদু করা হয়েছে। তাকে জাদু করেছে তার অধীনে থাকা এক দাসী, যার কোলে তখন একটি শিশু ছিল। আর বর্তমানে সেই দাসীর কোলে যে শিশুটি আছে, সে তার কোলে পেশাব করে দিয়েছে। তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তাকে আমার কাছে নিয়ে এসো। সুতরাং তাকে আনা হলো। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জিজ্ঞেস করলেন: তুমি কি আমাকে জাদু করেছ? সে বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: কেন? সে বলল: আমি মুক্তি পেতে চেয়েছিলাম। অথচ আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে (তাঁর মৃত্যুর পরে) মুক্তি দেওয়ার প্রতিশ্রুতি দিয়েছিলেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন বললেন: আল্লাহর কসম, তুমি আর কখনোই মুক্ত হবে না। তোমরা সবচেয়ে নিকৃষ্ট মালিকানাধীন বাড়ির সন্ধান করো এবং তাদের কাছে একে বিক্রি করে দাও। তারপর সেই মূল্য দিয়ে একটি গোলাম খরিদ করে তাকে মুক্ত করে দাও।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: البرط.
[2] في النسخ الخطية: فقال، والصواب ما أثبتنا.
7706 [3] - في (ز) وحدها: سحرتني، وكلاهما جائز.
7706 [4] - كذا في النسخ الخطية بإثبات النون، والجادّة حذفها.
7706 [5] - إسناده صحيح. يحيى بن سعيد: هو الأنصاري.وأخرجه الدارقطني (4267)، ومن طريقه البيهقي 8/ 133 من طريق محمد بن المثنى، عن عبد الوهاب بن عبد المجيد الثقفي، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 40/ (24126) عن سفيان بن عيينة، عن يحيى الأنصاري، عن ابن أخي عمرة -وشك فيه- عن عمرة، فذكرته. وانظر تتمة تخريجه والكلام عليه في "المسند".
7707 - أخبرنا أبو الحسن علي بن محمد بن عُبيد القُرشي بالكوفة، حدثنا الحسن بن علي بن عفّان العامري، حدثنا زيد بن الحُبَاب، حدثنا عيّاش بن عُقبة الحضرمي، حدثني خَيْر [1] بن نُعيم، عن أبي الزُّبير، عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: {وَالْفَجْرِ (1) وَلَيَالٍ عَشْرٍ}، قال: "العَشْرُ عَشْرُ الأَضحى [2]، والوَتْرُ يومُ عَرَفة، والشَّفْعُ يومُ النَّحْر" [3].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) {وَالْفَجْرِ (1) وَلَيَالٍ عَشْرٍ}-এর ব্যাখ্যায় বলেছেন: "দশ রাত হলো ঈদুল আযহার (প্রথম) দশ রাত। আর 'বিতর' (বেজোড়) হলো আরাফার দিন এবং 'শাফা' (জোড়) হলো কুরবানীর দিন।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرف في النسخ الخطية إلى: جعفر. وأخرجه أحمد 44/ (26654)، ومسلم (1977) (41)، وابن ماجه (3150)، والترمذي (1523)، والنسائي (4435)، وابن حبان (5916) من طرق عن شعبة، بهذا الإسناد. على الشك في اسم عمرو أو عمر بن مسلم، وقال الترمذي: حسن صحيح.قلنا: وتابع شعبةَ عن مالك في رفعه عبدُ الله القعنبي وعبدُ الله بن يوسف عند الطبراني 23/ (562)، وخالفهم عبدُ الله بن وهب وعثمانُ بن عمر بن فارس، فروياه عن مالك به موقوفًا على أم سلمة عند الطحاوي في "شرح المشكل" (5508) و (5509)، وفي "شرح المعاني" 4/ 182.وأخرجه أحمد (26571)، ومسلم (1977) (42)، والنسائي (4436)، وابن حبان (5897) من طريق سعيد بن أبي هلال، وأحمد (26655)، ومسلم (1977) (42)، وأبو داود (2799)، وابن حبان (5917) و (5918) من طريق محمد بن عمرو بن علقمة، كلاهما عن عمرو بن مسلم، به مرفوعًا.وأخرجه أحمد (26474)، ومسلم (1977) (39) و (40)، وابن ماجه (3149)، والنسائي (4438) من طريق سفيان بن عيينة، عن عبد الرحمن بن حميد، عن سعيد بن المسيب، به مرفوعًا. وقال البيهقي في "معرفة السنن والآثار" (18923): هذا حديث قد ثبت مرفوعًا من أوجه لا يكون مثلها غلطًا، وأودعه مسلم بن الحجاج كتابه. قلنا: وإسناده من هذا الوجه صحيح لو لم يُخالَف سفيانُ فيه.فقد خالفه يحيى القطانُ وأبو ضَمْرة أنس بن عياض -فيما ذكر الدار قطني في "العلل" (3957/ 10 - طبعة الدباس) - فرواه عن عبد الرحمن بن حميد به موقوفًا. قلنا: ورواية أنس بن عياض أسندها الطحاوي في "المشكل" (5512).وأخرجه أبو عوانة في "صحيحه" (7789)، وابن عدي في "الكامل" 6/ 310، وأبو محمد الفاكهي في "فوائده" (84)، وأبو طاهر المخلص في "المخلصيات" (2692) من طريق مسلم ابن خالد الزنجي، عن ابن جريج، عن الزهري عن سعيد بن المسيب به مرفوعًا. قلنا: ومسلم الزنجي وإن كان ضعيفًا يعتبر به.وقد ذهب بعض الحنابلة وبعض الشافعية: إلى أنَّ من أراد أن يضحي فدخل العشر من ذي الحجة، يجب عليه أن يمسك عن قص الشعر والأظفار، وهو قول إسحاق وسعيد بن المسيب.وقال الحنفية والمالكية، وهو قول بعض الشافعية والحنابلة: يسن له أن يمسك عن قص الشعر والأظفار. انظر "الموسوعة الفقهية الكويتية" 5/ 170.وقال ابن عبد البر في "التمهيد" 17/ 235: واختلف قول الشافعي في ذلك، فمرة قال: من أراد أن يضحي لم يمس في العشر من شعره شيئًا ولا من أظفاره، وقال في موضعٍ آخر: أُحبُّ لمن أراد أن يضحي أن لا يمس في العشر من شعره ولا من أظفاره شيئًا حتى يضحي لحديث أم سلمة، فإن أخذ من شعره وأظفاره فلا بأس، لأنَّ عائشة قالت: كنت أقتلُ قلائدَ هدي رسول الله صلى الله عليه وسلم [بيديَّ، ثم يبعث بها وما يُمسك عن شيء ممّا يمسك عنه المحرم حتى ينحر هديه] الحديث. [رواه البخاري (1702) ومسلم (1321)].ثم نقل ابن عبد البر عن الإمام أحمد: فذكرته (يعني حديث أم سلمة هذا وحديث عائشة في قتل القلائد) ليحيى بن سعيد فقال يحيى: ذاك له وجه، وهذا له وجه؛ حديث عائشة إذا بعث بالهدي وأقام، وحديث أم سلمة إذا أراد أن يضحي بالمضر، قال أحمد: وهكذا أقول. قيل له فيمسك عن شعره وأظفاره؟ قال: نعم، كلُّ من أراد أن يضحي، فقيل له: هذا على الذي بمكة؟ فقال: لا بل على المقيم. وقال: هذا الحديث رواه شعبة عن مالك عن عمرو بن مسلمٍ عن سعيد ابن المسيب عن أم سلمة عن النبي صلى الله عليه وسلم، ورواه ابن عيينة عن عبد الرحمن بن حميد عن سعيد ابن المسيب عن أم سلمة رفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم. قال: وقد رواه يحيى بن سعيد القطان عن عبد الرحمن ابن حميدٍ هكذا ولكنه وقفه على أم سلمة. قال: وقد رواه محمد بن عمرٍو عن شيخ مالكٍ، قيل له: إنَّ قتادة يروي عن سعيد بن المسيب: أنَّ أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم كانوا إذا اشتروا ضحاياهم أمسكوا عن شعورهم وأظفارهم إلى يوم النحر، فقال: هذا يُقوّي هذا، ولم يره خلافًا، ولا ضعَّفه.
[2] في (ز) وحدها: الأضحية. وأخرجه أحمد 44/ (26654)، ومسلم (1977) (41)، وابن ماجه (3150)، والترمذي (1523)، والنسائي (4435)، وابن حبان (5916) من طرق عن شعبة، بهذا الإسناد. على الشك في اسم عمرو أو عمر بن مسلم، وقال الترمذي: حسن صحيح.قلنا: وتابع شعبةَ عن مالك في رفعه عبدُ الله القعنبي وعبدُ الله بن يوسف عند الطبراني 23/ (562)، وخالفهم عبدُ الله بن وهب وعثمانُ بن عمر بن فارس، فروياه عن مالك به موقوفًا على أم سلمة عند الطحاوي في "شرح المشكل" (5508) و (5509)، وفي "شرح المعاني" 4/ 182.وأخرجه أحمد (26571)، ومسلم (1977) (42)، والنسائي (4436)، وابن حبان (5897) من طريق سعيد بن أبي هلال، وأحمد (26655)، ومسلم (1977) (42)، وأبو داود (2799)، وابن حبان (5917) و (5918) من طريق محمد بن عمرو بن علقمة، كلاهما عن عمرو بن مسلم، به مرفوعًا.وأخرجه أحمد (26474)، ومسلم (1977) (39) و (40)، وابن ماجه (3149)، والنسائي (4438) من طريق سفيان بن عيينة، عن عبد الرحمن بن حميد، عن سعيد بن المسيب، به مرفوعًا. وقال البيهقي في "معرفة السنن والآثار" (18923): هذا حديث قد ثبت مرفوعًا من أوجه لا يكون مثلها غلطًا، وأودعه مسلم بن الحجاج كتابه. قلنا: وإسناده من هذا الوجه صحيح لو لم يُخالَف سفيانُ فيه.فقد خالفه يحيى القطانُ وأبو ضَمْرة أنس بن عياض -فيما ذكر الدار قطني في "العلل" (3957/ 10 - طبعة الدباس) - فرواه عن عبد الرحمن بن حميد به موقوفًا. قلنا: ورواية أنس بن عياض أسندها الطحاوي في "المشكل" (5512).وأخرجه أبو عوانة في "صحيحه" (7789)، وابن عدي في "الكامل" 6/ 310، وأبو محمد الفاكهي في "فوائده" (84)، وأبو طاهر المخلص في "المخلصيات" (2692) من طريق مسلم ابن خالد الزنجي، عن ابن جريج، عن الزهري عن سعيد بن المسيب به مرفوعًا. قلنا: ومسلم الزنجي وإن كان ضعيفًا يعتبر به.وقد ذهب بعض الحنابلة وبعض الشافعية: إلى أنَّ من أراد أن يضحي فدخل العشر من ذي الحجة، يجب عليه أن يمسك عن قص الشعر والأظفار، وهو قول إسحاق وسعيد بن المسيب.وقال الحنفية والمالكية، وهو قول بعض الشافعية والحنابلة: يسن له أن يمسك عن قص الشعر والأظفار. انظر "الموسوعة الفقهية الكويتية" 5/ 170.وقال ابن عبد البر في "التمهيد" 17/ 235: واختلف قول الشافعي في ذلك، فمرة قال: من أراد أن يضحي لم يمس في العشر من شعره شيئًا ولا من أظفاره، وقال في موضعٍ آخر: أُحبُّ لمن أراد أن يضحي أن لا يمس في العشر من شعره ولا من أظفاره شيئًا حتى يضحي لحديث أم سلمة، فإن أخذ من شعره وأظفاره فلا بأس، لأنَّ عائشة قالت: كنت أقتلُ قلائدَ هدي رسول الله صلى الله عليه وسلم [بيديَّ، ثم يبعث بها وما يُمسك عن شيء ممّا يمسك عنه المحرم حتى ينحر هديه] الحديث. [رواه البخاري (1702) ومسلم (1321)].ثم نقل ابن عبد البر عن الإمام أحمد: فذكرته (يعني حديث أم سلمة هذا وحديث عائشة في قتل القلائد) ليحيى بن سعيد فقال يحيى: ذاك له وجه، وهذا له وجه؛ حديث عائشة إذا بعث بالهدي وأقام، وحديث أم سلمة إذا أراد أن يضحي بالمضر، قال أحمد: وهكذا أقول. قيل له فيمسك عن شعره وأظفاره؟ قال: نعم، كلُّ من أراد أن يضحي، فقيل له: هذا على الذي بمكة؟ فقال: لا بل على المقيم. وقال: هذا الحديث رواه شعبة عن مالك عن عمرو بن مسلمٍ عن سعيد ابن المسيب عن أم سلمة عن النبي صلى الله عليه وسلم، ورواه ابن عيينة عن عبد الرحمن بن حميد عن سعيد ابن المسيب عن أم سلمة رفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم. قال: وقد رواه يحيى بن سعيد القطان عن عبد الرحمن ابن حميدٍ هكذا ولكنه وقفه على أم سلمة. قال: وقد رواه محمد بن عمرٍو عن شيخ مالكٍ، قيل له: إنَّ قتادة يروي عن سعيد بن المسيب: أنَّ أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم كانوا إذا اشتروا ضحاياهم أمسكوا عن شعورهم وأظفارهم إلى يوم النحر، فقال: هذا يُقوّي هذا، ولم يره خلافًا، ولا ضعَّفه.
7707 [3] - إسناده لا بأس برجاله، وأبو الزبير - وهو محمد بن مسلم بن تَدرُس - لم يُصرِّح بسماعه من جابر، وقد تفرّد به.وأخرجه أحمد 22/ (14511)، والنسائي (4086) و (11607) و (11608) من طرق عن زيد ابن الحباب، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد 44/ (26654)، ومسلم (1977) (41)، وابن ماجه (3150)، والترمذي (1523)، والنسائي (4435)، وابن حبان (5916) من طرق عن شعبة، بهذا الإسناد. على الشك في اسم عمرو أو عمر بن مسلم، وقال الترمذي: حسن صحيح.قلنا: وتابع شعبةَ عن مالك في رفعه عبدُ الله القعنبي وعبدُ الله بن يوسف عند الطبراني 23/ (562)، وخالفهم عبدُ الله بن وهب وعثمانُ بن عمر بن فارس، فروياه عن مالك به موقوفًا على أم سلمة عند الطحاوي في "شرح المشكل" (5508) و (5509)، وفي "شرح المعاني" 4/ 182.وأخرجه أحمد (26571)، ومسلم (1977) (42)، والنسائي (4436)، وابن حبان (5897) من طريق سعيد بن أبي هلال، وأحمد (26655)، ومسلم (1977) (42)، وأبو داود (2799)، وابن حبان (5917) و (5918) من طريق محمد بن عمرو بن علقمة، كلاهما عن عمرو بن مسلم، به مرفوعًا.وأخرجه أحمد (26474)، ومسلم (1977) (39) و (40)، وابن ماجه (3149)، والنسائي (4438) من طريق سفيان بن عيينة، عن عبد الرحمن بن حميد، عن سعيد بن المسيب، به مرفوعًا. وقال البيهقي في "معرفة السنن والآثار" (18923): هذا حديث قد ثبت مرفوعًا من أوجه لا يكون مثلها غلطًا، وأودعه مسلم بن الحجاج كتابه. قلنا: وإسناده من هذا الوجه صحيح لو لم يُخالَف سفيانُ فيه.فقد خالفه يحيى القطانُ وأبو ضَمْرة أنس بن عياض -فيما ذكر الدار قطني في "العلل" (3957/ 10 - طبعة الدباس) - فرواه عن عبد الرحمن بن حميد به موقوفًا. قلنا: ورواية أنس بن عياض أسندها الطحاوي في "المشكل" (5512).وأخرجه أبو عوانة في "صحيحه" (7789)، وابن عدي في "الكامل" 6/ 310، وأبو محمد الفاكهي في "فوائده" (84)، وأبو طاهر المخلص في "المخلصيات" (2692) من طريق مسلم ابن خالد الزنجي، عن ابن جريج، عن الزهري عن سعيد بن المسيب به مرفوعًا. قلنا: ومسلم الزنجي وإن كان ضعيفًا يعتبر به.وقد ذهب بعض الحنابلة وبعض الشافعية: إلى أنَّ من أراد أن يضحي فدخل العشر من ذي الحجة، يجب عليه أن يمسك عن قص الشعر والأظفار، وهو قول إسحاق وسعيد بن المسيب.وقال الحنفية والمالكية، وهو قول بعض الشافعية والحنابلة: يسن له أن يمسك عن قص الشعر والأظفار. انظر "الموسوعة الفقهية الكويتية" 5/ 170.وقال ابن عبد البر في "التمهيد" 17/ 235: واختلف قول الشافعي في ذلك، فمرة قال: من أراد أن يضحي لم يمس في العشر من شعره شيئًا ولا من أظفاره، وقال في موضعٍ آخر: أُحبُّ لمن أراد أن يضحي أن لا يمس في العشر من شعره ولا من أظفاره شيئًا حتى يضحي لحديث أم سلمة، فإن أخذ من شعره وأظفاره فلا بأس، لأنَّ عائشة قالت: كنت أقتلُ قلائدَ هدي رسول الله صلى الله عليه وسلم [بيديَّ، ثم يبعث بها وما يُمسك عن شيء ممّا يمسك عنه المحرم حتى ينحر هديه] الحديث. [رواه البخاري (1702) ومسلم (1321)].ثم نقل ابن عبد البر عن الإمام أحمد: فذكرته (يعني حديث أم سلمة هذا وحديث عائشة في قتل القلائد) ليحيى بن سعيد فقال يحيى: ذاك له وجه، وهذا له وجه؛ حديث عائشة إذا بعث بالهدي وأقام، وحديث أم سلمة إذا أراد أن يضحي بالمضر، قال أحمد: وهكذا أقول. قيل له فيمسك عن شعره وأظفاره؟ قال: نعم، كلُّ من أراد أن يضحي، فقيل له: هذا على الذي بمكة؟ فقال: لا بل على المقيم. وقال: هذا الحديث رواه شعبة عن مالك عن عمرو بن مسلمٍ عن سعيد ابن المسيب عن أم سلمة عن النبي صلى الله عليه وسلم، ورواه ابن عيينة عن عبد الرحمن بن حميد عن سعيد ابن المسيب عن أم سلمة رفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم. قال: وقد رواه يحيى بن سعيد القطان عن عبد الرحمن ابن حميدٍ هكذا ولكنه وقفه على أم سلمة. قال: وقد رواه محمد بن عمرٍو عن شيخ مالكٍ، قيل له: إنَّ قتادة يروي عن سعيد بن المسيب: أنَّ أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم كانوا إذا اشتروا ضحاياهم أمسكوا عن شعورهم وأظفارهم إلى يوم النحر، فقال: هذا يُقوّي هذا، ولم يره خلافًا، ولا ضعَّفه.
7708 - أخبرنا أحمد بن سلمان الفقيه ببغداد وبكر بن محمد الصَّيرَفي بمَرْو، قالا: حدثنا أبو قِلابة بن الرَّقَاشي، حدثنا يحيى بن كثير بن دِرهم، حدثنا شُعبة.وأخبرنا أحمد بن جعفر، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا محمد بن بكر، حدثنا شُعبة، عن مالك بن أنس، قال: سمعتُ عمرو بن مسلم يقول: سمعتُ سعيد بن المسيّب يقول: قالت أُمُّ سلمة: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن رأى هلال ذي الحِجَّة فأراد أن يُضحي، فلا يأخُذ من ظُفْرِه ولا من شَعْرِه حتى يُضحِّيَ" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث على شرط الشيخين.
উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে যিলহজ মাসের চাঁদ দেখবে এবং কুরবানি করার ইচ্ছা করবে, সে যেন কুরবানি করার আগ পর্যন্ত তার নখ বা চুল থেকে কিছুই না কাটে।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده جيد من أجل عمرو بن مسلم: وهو ابن عمارة بن أُكيمة الليثي، وقيل في اسمه: عُمر. وأخرجه أحمد 44/ (26654)، ومسلم (1977) (41)، وابن ماجه (3150)، والترمذي (1523)، والنسائي (4435)، وابن حبان (5916) من طرق عن شعبة، بهذا الإسناد. على الشك في اسم عمرو أو عمر بن مسلم، وقال الترمذي: حسن صحيح.قلنا: وتابع شعبةَ عن مالك في رفعه عبدُ الله القعنبي وعبدُ الله بن يوسف عند الطبراني 23/ (562)، وخالفهم عبدُ الله بن وهب وعثمانُ بن عمر بن فارس، فروياه عن مالك به موقوفًا على أم سلمة عند الطحاوي في "شرح المشكل" (5508) و (5509)، وفي "شرح المعاني" 4/ 182.وأخرجه أحمد (26571)، ومسلم (1977) (42)، والنسائي (4436)، وابن حبان (5897) من طريق سعيد بن أبي هلال، وأحمد (26655)، ومسلم (1977) (42)، وأبو داود (2799)، وابن حبان (5917) و (5918) من طريق محمد بن عمرو بن علقمة، كلاهما عن عمرو بن مسلم، به مرفوعًا.وأخرجه أحمد (26474)، ومسلم (1977) (39) و (40)، وابن ماجه (3149)، والنسائي (4438) من طريق سفيان بن عيينة، عن عبد الرحمن بن حميد، عن سعيد بن المسيب، به مرفوعًا. وقال البيهقي في "معرفة السنن والآثار" (18923): هذا حديث قد ثبت مرفوعًا من أوجه لا يكون مثلها غلطًا، وأودعه مسلم بن الحجاج كتابه. قلنا: وإسناده من هذا الوجه صحيح لو لم يُخالَف سفيانُ فيه.فقد خالفه يحيى القطانُ وأبو ضَمْرة أنس بن عياض -فيما ذكر الدار قطني في "العلل" (3957/ 10 - طبعة الدباس) - فرواه عن عبد الرحمن بن حميد به موقوفًا. قلنا: ورواية أنس بن عياض أسندها الطحاوي في "المشكل" (5512).وأخرجه أبو عوانة في "صحيحه" (7789)، وابن عدي في "الكامل" 6/ 310، وأبو محمد الفاكهي في "فوائده" (84)، وأبو طاهر المخلص في "المخلصيات" (2692) من طريق مسلم ابن خالد الزنجي، عن ابن جريج، عن الزهري عن سعيد بن المسيب به مرفوعًا. قلنا: ومسلم الزنجي وإن كان ضعيفًا يعتبر به.وقد ذهب بعض الحنابلة وبعض الشافعية: إلى أنَّ من أراد أن يضحي فدخل العشر من ذي الحجة، يجب عليه أن يمسك عن قص الشعر والأظفار، وهو قول إسحاق وسعيد بن المسيب.وقال الحنفية والمالكية، وهو قول بعض الشافعية والحنابلة: يسن له أن يمسك عن قص الشعر والأظفار. انظر "الموسوعة الفقهية الكويتية" 5/ 170.وقال ابن عبد البر في "التمهيد" 17/ 235: واختلف قول الشافعي في ذلك، فمرة قال: من أراد أن يضحي لم يمس في العشر من شعره شيئًا ولا من أظفاره، وقال في موضعٍ آخر: أُحبُّ لمن أراد أن يضحي أن لا يمس في العشر من شعره ولا من أظفاره شيئًا حتى يضحي لحديث أم سلمة، فإن أخذ من شعره وأظفاره فلا بأس، لأنَّ عائشة قالت: كنت أقتلُ قلائدَ هدي رسول الله صلى الله عليه وسلم [بيديَّ، ثم يبعث بها وما يُمسك عن شيء ممّا يمسك عنه المحرم حتى ينحر هديه] الحديث. [رواه البخاري (1702) ومسلم (1321)].ثم نقل ابن عبد البر عن الإمام أحمد: فذكرته (يعني حديث أم سلمة هذا وحديث عائشة في قتل القلائد) ليحيى بن سعيد فقال يحيى: ذاك له وجه، وهذا له وجه؛ حديث عائشة إذا بعث بالهدي وأقام، وحديث أم سلمة إذا أراد أن يضحي بالمضر، قال أحمد: وهكذا أقول. قيل له فيمسك عن شعره وأظفاره؟ قال: نعم، كلُّ من أراد أن يضحي، فقيل له: هذا على الذي بمكة؟ فقال: لا بل على المقيم. وقال: هذا الحديث رواه شعبة عن مالك عن عمرو بن مسلمٍ عن سعيد ابن المسيب عن أم سلمة عن النبي صلى الله عليه وسلم، ورواه ابن عيينة عن عبد الرحمن بن حميد عن سعيد ابن المسيب عن أم سلمة رفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم. قال: وقد رواه يحيى بن سعيد القطان عن عبد الرحمن ابن حميدٍ هكذا ولكنه وقفه على أم سلمة. قال: وقد رواه محمد بن عمرٍو عن شيخ مالكٍ، قيل له: إنَّ قتادة يروي عن سعيد بن المسيب: أنَّ أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم كانوا إذا اشتروا ضحاياهم أمسكوا عن شعورهم وأظفارهم إلى يوم النحر، فقال: هذا يُقوّي هذا، ولم يره خلافًا، ولا ضعَّفه.
7709 - أخبرنا عَبْدان بن يزيد الدَّقّاق همذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا ابن أبي ذئب، عن الحارث بن عبد الرحمن، عن أبي سلمةَ، عن أُمِّ سَلَمة قالت: إذا دخلَ عَشْرُ ذي الحِجَّة فلا تأخُذَنَّ مِن شَعرِك ولا من أظفارِك حتى تذبحَ [1] أُضحيَّتَك [2]. هذا شاهدٌ صحيح لحديث مالك وإن كان موقوفًا.
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন যিলহজ্জ মাসের প্রথম দশ দিন প্রবেশ করে, তখন তোমরা তোমাদের চুল ও নখ কাটবে না, যতক্ষণ না তোমরা তোমাদের কুরবানি (উদ্বিয়া) করো।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في (ز): تذبحن.
[2] إسناده جيد من أجل الحارث بن عبد الرحمن: وهو القرشي العامري.وأخرجه ابن أبي شيبة (14993 - عوامة) عن وكيع، عن ابن أبي ذئب، بهذا الإسناد. وليس فيه قولها «حتى تذبح أضحيتك». . . . في باب: من كره أن يأخذ من شعره إذا أراد الحجوأخرجه الطبراني في "الكبير" 23/ (557) من طريق جنادة بن سلم، عن محمد بن عمرو بن علقمة، عن أبي سلمة، به مرفوعًا. وجنادة فيه ضعف لكنه يُعتبر به.
7710 - أخبرني أحمد بن محمد بن سَلَمة العنزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا يزيد بن عبد ربِّه، حدثنا الوليد بن مسلم، قال: سألتُ محمد بن عَجْلان عن أخذ الشَّعر في الأيام العَشْر، فقال: حدثني نافعٌ: أنَّ ابنَ عمر مرَّ بامرأةٍ تأخذُ من شعر ابنها في أيام العَشْر، فقال: لو أخَّرتيهِ إلى يومِ النَّحر كان أحسنَ [1].
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এক মহিলার পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যিনি (যিলহজ্জ মাসের) দশ দিনের মধ্যে তাঁর ছেলের চুল কাটছিলেন। তিনি বললেন: যদি তুমি তা কুরবানীর দিন (ইয়াওমুন নহর) পর্যন্ত বিলম্বিত করতে, তবে তা উত্তম হতো।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده قوي من أجل محمد بن عجلان.وأخرج ابن أبي شيبة (14997 - عوامة) من طريق مجاهد عن ابن عمر قال: من أراد الحج فلا يأخذ من شعره شيئًا. عن شعره وأظفاره. زاد ابن عبد البر: قال قتادة: فأخبرت بذلك سعيد بن المسيب فقال: كذلك كانوا يقولون. وسنده حسن من أجل كثير بن أبي كثير، وسقط هذا من رواية إسحاق بن راهويه!
7711 - أخبرنا أبو الحسين أحمد بن عثمان الأدَمي، حدثنا محمد بن ماهان حدثنا عبد الرحمن بن مَهدي، حدثنا شُعبة، قال: سمعتُ قَتَادة يحدِّث، قال: جاء رجلٌ من العَتِيك، فحدَّث سعيدَ بن المسيّب أنَّ يحيى بن يَعْمَر يقول: من اشترى أُضحيَّةً في العَشْر، فلا يأخذَنَّ من شعره وأظفاره، قال سعيد: نعم، فقلتُ: عمَّن يا أبا محمد؟ قال: عن أصحابِ رسول الله صلى الله عليه وسلم [1].
কাতাদা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আতিক গোত্রের একজন লোক এসে সাঈদ ইবনুল মুসায়্যিবকে অবহিত করল যে, ইয়াহইয়া ইবনু ইয়া‘মার বলেছেন: যে ব্যক্তি [যিলহজ্জের] দশ দিনে কুরবানীর পশু ক্রয় করে, সে যেন তার চুল ও নখ স্পর্শ না করে (বা না কাটে)। সাঈদ বললেন: হ্যাঁ (এটা ঠিক)। আমি (রাবী) জিজ্ঞেস করলাম: হে আবূ মুহাম্মাদ! আপনি এটি কার কাছ থেকে [শুনেছেন]? তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাহাবীগণের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছ থেকে।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه إسحاق بن راهويه في "مسنده" (1817) عن النضر بن شميل، عن شعبة، بهذا الإسناد.وأخرجه الطحاوي في "شرح المشكل" 14/ 128 من طريق هشام الدستوائي وسعيد بن أبي عروبة - فرَّقهما - عن قتادة عن كثير بن أبي كثير: أنَّ يحيى بن يَعمَر كان يُفتي بخراسان: أَنَّ الرجل إذا اشترى أضحيّته وسمّاها ودخل العشرُ أن يكفَّ عن شعره وأظفاره حتى يضحي. قال قتادة: فذكرت ذلك لسعيد بن المسيّب، فقال: نعم، قلت: عمن يا أبا محمد؟ قال: عن أصحاب محمد صلى الله عليه وسلم. واللفظ لابن أبي عروبة.قلنا: وهذه الرواية فيها تسمية الواسطة بين قتادة ويحيى بن يعمر، وهو كثير بن أبي كثير وهو مولى لعبد الرحمن بن سمرة القرشي وليس عتكيًا كما في رواية المصنف، فالعَتيك فخذ من الأزد.وأما فتوى يحيى بن يعمر، فالذي يظهر أنه أخذها عن علي رضي الله عنه، فقد أخرج إسحاق بن راهويه (1818)، وابن عبد البر في "التمهيد" 17/ 238 من طريق حماد بن سلمة عن قتادة عن كثير بن أبي كثير عن يحيى بن يعمر أنَّ علي بن أبي طالب قال: إذا دخل العشر واشترى أضحيّةً أمسك عن شعره وأظفاره. زاد ابن عبد البر: قال قتادة: فأخبرت بذلك سعيد بن المسيب فقال: كذلك كانوا يقولون. وسنده حسن من أجل كثير بن أبي كثير، وسقط هذا من رواية إسحاق بن راهويه!
7712 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الشَّيباني، حدثنا يحيى بن محمد ابن يحيى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا يحيى، عن ثَوْر بن يزيد، عن راشد بن سعد، عن عبد الله بن لُحَي [1]، عن عبد الله بن قُرْط قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أعظمُ الأيام عندَ الله يومُ النَّحر، [ثم] [2] يومُ القَرِّ [3] "، وقُدِّم إلى النبيِّ صلى الله عليه وسلم بَدَناتٌ خمسٌ أو ستٌّ، فَطَفِقْنَ يَزْدَلِفْنَ بأيَّتِهِنَّ يبدأُ بها، فلما وَجَبَتْ جُنوبُها قال كلمةً خفيفةَ لم أفهمها، فسألتُ مَن يليه، فقال: قال: "مَن شاءَ اقتَطَعَ" [4].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে কুর্ত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহর কাছে দিনসমূহের মধ্যে সবচেয়ে মহান হলো ইয়াওমুন-নাহর (কুরবানীর দিন), অতঃপর ইয়াওমুল কার্র (কুরবানীর দিনের পরের দিন)।" আর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পাঁচ অথবা ছয়টি উট (কুরবানীর জন্য) পেশ করা হলো। উটগুলো যেন প্রতিযোগিতাপূর্বক এগিয়ে আসতে লাগল যে, তিনি তাদের মধ্যে কোনটি দ্বারা শুরু করবেন। যখন তাদের পার্শ্বদেশসমূহ (জমিনে) পড়ে গেল (অর্থাৎ জবাই সম্পন্ন হলো), তখন তিনি একটি মৃদু কথা বললেন যা আমি বুঝতে পারিনি। তাই আমি তাঁর পার্শ্ববর্তী ব্যক্তিকে জিজ্ঞাসা করলাম। সে বলল: তিনি বলেছেন: "যে ইচ্ছা করে, সে যেন (এগুলোর গোশত) কেটে নিয়ে যায়।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: يحيى. "التلخيص"، ولانقطاعه، فإنَّ أبا المثنى لم يسمع من هشام بن عروة فيما نقله الترمذي في "علله الكبير" (441) عن شيخه البخاري، ومع ذلك حسّنه الترمذي!وأخرجه ابن ماجه (3126) عن عبد الرحمن بن إبراهيم، والترمذي (1493) عن مسلم بن عمرو الحذاء، كلاهما عن عبد الله بن نافع بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن غريب.وفي الباب عن ابن عباس عند الطبراني (10894)، والدارقطني (4752)، والبيهقي 9/ 260.وسنده ضعيف جدًا. قال ابن العربي في "عارضة الأحوذي" 6/ 288: ليس في فضل الأضحيّة حديث صحيح.
[2] أثبتناها من "التلخيص"، وليست في النسخ الخطية. "التلخيص"، ولانقطاعه، فإنَّ أبا المثنى لم يسمع من هشام بن عروة فيما نقله الترمذي في "علله الكبير" (441) عن شيخه البخاري، ومع ذلك حسّنه الترمذي!وأخرجه ابن ماجه (3126) عن عبد الرحمن بن إبراهيم، والترمذي (1493) عن مسلم بن عمرو الحذاء، كلاهما عن عبد الله بن نافع بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن غريب.وفي الباب عن ابن عباس عند الطبراني (10894)، والدارقطني (4752)، والبيهقي 9/ 260.وسنده ضعيف جدًا. قال ابن العربي في "عارضة الأحوذي" 6/ 288: ليس في فضل الأضحيّة حديث صحيح.
7712 [3] - تحرّف في (ص) و (م) إلى: النفر. ويوم القَرّ هو ثاني أيام العيد، وقد فسَّره ثور كما وقع في رواية أبي داود. "التلخيص"، ولانقطاعه، فإنَّ أبا المثنى لم يسمع من هشام بن عروة فيما نقله الترمذي في "علله الكبير" (441) عن شيخه البخاري، ومع ذلك حسّنه الترمذي!وأخرجه ابن ماجه (3126) عن عبد الرحمن بن إبراهيم، والترمذي (1493) عن مسلم بن عمرو الحذاء، كلاهما عن عبد الله بن نافع بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن غريب.وفي الباب عن ابن عباس عند الطبراني (10894)، والدارقطني (4752)، والبيهقي 9/ 260.وسنده ضعيف جدًا. قال ابن العربي في "عارضة الأحوذي" 6/ 288: ليس في فضل الأضحيّة حديث صحيح.
7712 [4] - إسناده صحيح. يحيى: هو ابن سعيد القطان.وأخرجه أحمد 31/ (19075)، والنسائي (4083)، وابن حبان (2811) من طريق يحيى بن سعيد القطان، بهذا الإسناد. وروايتا النسائي وابن حبان مختصرتان.وأخرجه أبو داود (1765) من طريق عيسى بن يونس السبيعي، عن ثور بن يزيد، به. "التلخيص"، ولانقطاعه، فإنَّ أبا المثنى لم يسمع من هشام بن عروة فيما نقله الترمذي في "علله الكبير" (441) عن شيخه البخاري، ومع ذلك حسّنه الترمذي!وأخرجه ابن ماجه (3126) عن عبد الرحمن بن إبراهيم، والترمذي (1493) عن مسلم بن عمرو الحذاء، كلاهما عن عبد الله بن نافع بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن غريب.وفي الباب عن ابن عباس عند الطبراني (10894)، والدارقطني (4752)، والبيهقي 9/ 260.وسنده ضعيف جدًا. قال ابن العربي في "عارضة الأحوذي" 6/ 288: ليس في فضل الأضحيّة حديث صحيح.
7713 - حدثنا أبو نصر أحمد بن سهل الفقيه ببُخارى، حدثنا صالح بن محمد بن حَبيب الحافظ، حدثنا أبو سَلَمة يحيى بن المغيرة المَدِيني، حدثنا عبد الله بن نافع، حدثني أبو المثنّى سليمان بن يزيد عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما تُقرِّبَ إلى الله تعالى يومَ النَّحر بشيء هو أحبُّ إلى الله تعالى من إهراق الدَّم، وإنها لَتأتي يوم القيامة بقُرونِها وأشعارِها وأظلافِها، وإنَّ الدَّمَ ليَقَعُ من الله تعالى بمكانٍ قبلَ أن يقعَ إلى الأرض، فطِيبُوا بها نَفْسًا" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কুরবানীর দিনে রক্ত প্রবাহিত করা (পশু যবেহ করা) অপেক্ষা আল্লাহর কাছে অধিক প্রিয় আর কোনো আমল নেই। নিশ্চয়ই তা (কুরবানীর পশু) কিয়ামতের দিন তার শিং, লোম ও ক্ষুরসহ উপস্থিত হবে। আর রক্ত মাটিতে পড়ার আগেই আল্লাহ তাআলার কাছে একটি বিশেষ স্থানে পৌঁছে যায়। অতএব, তোমরা এর দ্বারা আত্মাকে সন্তুষ্ট করো (বা মনকে খুশি করো)।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف لضعف أبو المثنى سليمان بن يزيد -وهو الخزاعي- وبه أعلّه الذهبي في "التلخيص"، ولانقطاعه، فإنَّ أبا المثنى لم يسمع من هشام بن عروة فيما نقله الترمذي في "علله الكبير" (441) عن شيخه البخاري، ومع ذلك حسّنه الترمذي!وأخرجه ابن ماجه (3126) عن عبد الرحمن بن إبراهيم، والترمذي (1493) عن مسلم بن عمرو الحذاء، كلاهما عن عبد الله بن نافع بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن غريب.وفي الباب عن ابن عباس عند الطبراني (10894)، والدارقطني (4752)، والبيهقي 9/ 260.وسنده ضعيف جدًا. قال ابن العربي في "عارضة الأحوذي" 6/ 288: ليس في فضل الأضحيّة حديث صحيح.
7714 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، حدثنا إسماعيل بن قُتيبة، حدثنا أبو بكر بن أبي شَيْبة، حدثنا النَّضر بن إسماعيل البَجَلي، حدثنا أبو حمزة الثُّمَالي، عن سعيد بن جُبير، عن عمران بن حُصين، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "يا فاطمةُ، قُومي إلى أُضحيَّتِكِ فَاشْهَدِيها، فإنه يُغفَرُ لك عند أوّل قطْرةٍ تقطُر من دمِها كلُّ ذنبٍ عَملتِيه، وقولي: إِنَّ صلاتي ونُسُكي ومَحْيايَ وَمَمَاتي لله ربِّ العالمين، لا شريكَ له، وبذلك أُمرتُ وأنا من المسلمين"، قال عمرانُ: قلتُ: يا رسولَ الله، هذا لكَ ولأهلِ بيتِك خاصَّةً -فأهل ذاك أنتم- أَمْ للمسلمين عامَّةً؟ قال: "لا، بل للمسلمين عامَّةً" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وشاهدُه حديث عطيةَ عن أبي سعيد الذي:
ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "হে ফাতিমা, তুমি তোমার কুরবানীর পশুর কাছে দাঁড়াও এবং তা প্রত্যক্ষ করো। কারণ, তার রক্তের প্রথম ফোঁটাটি মাটিতে পড়ার সাথে সাথেই তুমি যে গুনাহ করেছ, তা ক্ষমা করে দেওয়া হবে। এবং তুমি বলো: 'নিশ্চয়ই আমার সালাত, আমার কুরবানী (বা ইবাদত), আমার জীবন এবং আমার মরণ বিশ্বজগতের প্রতিপালক আল্লাহর জন্যই। তাঁর কোনো শরীক নেই। আমাকে এরই নির্দেশ দেওয়া হয়েছে এবং আমি মুসলিমদের অন্তর্ভুক্ত'।" ইমরান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল, এই বিশেষ মর্যাদা কি শুধু আপনার ও আপনার পরিবারবর্গের জন্য — কারণ আপনারাই তার যোগ্য— নাকি সকল মুসলিমের জন্য?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "না, বরং সকল মুসলিমের জন্য।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف، أبو حمزة الثمالي - وهو ثابت بن أبي صفية- ضعيف، وبه أعلّه الذهبي في "التلخيص"، وقال أيضًا [النضر بن] إسماعيل ليس بذاك.وأخرجه الروياني في "مسنده" (138)، والطبراني في "الكبير" (18/ (600)، وفي "الأوسط" (2509)، وفي "الدعاء" (947)، وابن عدي في "الكامل" 7/ 26، والبيهقي في "السنن الكبرى" 5/ 238 - 239 و 9/ 283، وفي "الشعب" (6957)، وفي "الدعوات" (5451)، وفي "فضائل الأوقات" بإثر (212) من طرق عن النضر بن إسماعيل البجلي بهذا الإسناد. وقال الطبراني في "الأوسط": لا يروى عن عمران بن حصين إلّا بهذا الإسناد، وتفرَّد به أبو حمزة. وقال البيهقي في "السنن": لم نكتبه من حديث عمران إلّا من هذا الوجه، وليس بقوي.وفي الباب عن علي بن أبي طالب عند عبد بن حميد (78) والبيهقي 9/ 283، وسنده ضعيف جدًا لا يُفرح به.وانظر حديث أبي سعيد التالي، وحديث جابر السالف برقم (1734).
7715 - حدَّثَناه أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا الحسن بن علي بن شَبيب المَعْمَري، حدثنا داود بن عبد الحميد، حدثنا عمرو بن قيس المُلَائي، عن عطية، عن أبي سعيد الخُدْري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لفاطمة: "يا فاطمةُ [1]، قُومي إلى أُضحيَّتِكِ فاشهدِيها، فإنَّ لك بأولِ قطرةٍ تَقطُر من دمِها يُعْفَرُ لكِ ما سَلَفَ من ذنوبِكِ" قالت: يا رسولَ الله، هذا لنا أهلَ البيت خاصَّةً، أو لنا وللمسلمين عامَّةً؟ قال: "بل لنا وللمسلمين عامَّةٌ [2] " [3].
আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ফাতিমাকে বললেন: "হে ফাতিমা! তুমি তোমার কুরবানীর (পশুর) কাছে যাও এবং সেখানে উপস্থিত থাকো। কেননা এর রক্তবিন্দু থেকে যখন প্রথম ফোঁটা ঝরবে, তখন তোমার অতীতের সকল গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হবে।" তিনি (ফাতিমা) বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল! এটা কি কেবল আমাদের আহলে বাইতের জন্য বিশেষ, নাকি আমাদের এবং সাধারণ মুসলিমদের সবার জন্য?" তিনি বললেন, "বরং আমাদের এবং সাধারণ মুসলিমদের সবার জন্য।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] قوله: "يا فاطمة" ليس في (ز). وأخرجه البيهقي 9/ 271 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار في "مسنده" (8724) عن أبي الوليد محمد بن أحمد الأنطاكي، به. وقال: لا نعلم رواه عن هشام بن بن سعد عن زيد عن عطاء عن أبي هريرة إلّا إسحاق بن إبراهيم الحنيني، ولم يتابعه عليه غيره بهذه الرواية، وإنما أُتي في أحاديث رواها لم يتابع عليها لأنه لما كُفَّ بصره وبَعُدَ عن المدينة فصار إلى الثغر حدَّث بأحاديث عن أهل المدينة، فأُنكر بعضها عليه.وأخرجه العقيلي في "الضعفاء" (128)، وابن عدي في "الكامل" 1/ 341، وابن عبد البر في "التمهيد" 22/ 29 - 30 من طريق إسحاق بن إبراهيم الحنيني، به.قال ابن عدي: هذا الحديث لا يرويه عن هشام بن سعد إلّا الحنيني، والحنيني مع ضعفه يُكتَب حديثه. وقال ابن عبد البر: هذا عندهم ليس بالقوي، والحنيني عنده مناكير.وسيأتي برقم (7735) مختصرًا بنحوه من طريق أبي ثفال عن أبي هريرة.قال ابن عبد البر: قال الشافعي: الإبل أحبُّ إليَّ أن يضحَّى بها من البقر، والبقر أحبُّ إليَّ من الغنم، والضأن أحبُّ إليَّ من المعز، وقال أبو حنيفة وأصحابه: الجزور في الأضحية أفضل ما ضُحي به، ثم يتلوه البقر في ذلك ثم تتلوه الشاة.وحُجّة من ذهب إلى هذا المذهب قوله صلى الله عليه وسلم: المهجَر إلى الجمعة كالمُهدي بدنة، ثم الذي يليه كالمهدي بقرة، ثم الذي يليه كالمهدي شاة [البخاري (929) ومسلم (850)] فبانَ بهذا الحديث أنَّ التقرب إلى الله عز وجل بالإبل أفضل من التقرب إليه بالبقر ثم بالغنم على ما في هذا الحديث.وقد أجمعوا على أنَّ أفضل الهدايا الإبل، واختلفوا في الضحايا، فكان ما أجمعوا عليه في الهدي قاضيًا على ما اختلفوا فيه في الأضاحيّ لأنه قُربان كله، وقد أجمعوا على أنه ما استيسر من الهدي شاة، فدلَّ على نقصان ذلك عن مرتبة غيره، وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أفضل الرقاب أغلاها ثمنًا وأنفسها عند أهلها" [البخاري (2518) ومسلم (84)] ومعلوم أنَّ الإبل أكثر ثمنًا من الغنم، فوجب أن تكون أفضل، استدلالًا بهذا الحديث.
[2] قوله: "قال: بل لنا وللمسلمين عامة" سقط من (ص) و (م). وأخرجه البيهقي 9/ 271 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار في "مسنده" (8724) عن أبي الوليد محمد بن أحمد الأنطاكي، به. وقال: لا نعلم رواه عن هشام بن بن سعد عن زيد عن عطاء عن أبي هريرة إلّا إسحاق بن إبراهيم الحنيني، ولم يتابعه عليه غيره بهذه الرواية، وإنما أُتي في أحاديث رواها لم يتابع عليها لأنه لما كُفَّ بصره وبَعُدَ عن المدينة فصار إلى الثغر حدَّث بأحاديث عن أهل المدينة، فأُنكر بعضها عليه.وأخرجه العقيلي في "الضعفاء" (128)، وابن عدي في "الكامل" 1/ 341، وابن عبد البر في "التمهيد" 22/ 29 - 30 من طريق إسحاق بن إبراهيم الحنيني، به.قال ابن عدي: هذا الحديث لا يرويه عن هشام بن سعد إلّا الحنيني، والحنيني مع ضعفه يُكتَب حديثه. وقال ابن عبد البر: هذا عندهم ليس بالقوي، والحنيني عنده مناكير.وسيأتي برقم (7735) مختصرًا بنحوه من طريق أبي ثفال عن أبي هريرة.قال ابن عبد البر: قال الشافعي: الإبل أحبُّ إليَّ أن يضحَّى بها من البقر، والبقر أحبُّ إليَّ من الغنم، والضأن أحبُّ إليَّ من المعز، وقال أبو حنيفة وأصحابه: الجزور في الأضحية أفضل ما ضُحي به، ثم يتلوه البقر في ذلك ثم تتلوه الشاة.وحُجّة من ذهب إلى هذا المذهب قوله صلى الله عليه وسلم: المهجَر إلى الجمعة كالمُهدي بدنة، ثم الذي يليه كالمهدي بقرة، ثم الذي يليه كالمهدي شاة [البخاري (929) ومسلم (850)] فبانَ بهذا الحديث أنَّ التقرب إلى الله عز وجل بالإبل أفضل من التقرب إليه بالبقر ثم بالغنم على ما في هذا الحديث.وقد أجمعوا على أنَّ أفضل الهدايا الإبل، واختلفوا في الضحايا، فكان ما أجمعوا عليه في الهدي قاضيًا على ما اختلفوا فيه في الأضاحيّ لأنه قُربان كله، وقد أجمعوا على أنه ما استيسر من الهدي شاة، فدلَّ على نقصان ذلك عن مرتبة غيره، وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أفضل الرقاب أغلاها ثمنًا وأنفسها عند أهلها" [البخاري (2518) ومسلم (84)] ومعلوم أنَّ الإبل أكثر ثمنًا من الغنم، فوجب أن تكون أفضل، استدلالًا بهذا الحديث.
7715 [3] - إسناده ضعيف بمرّة، داود بن عبد الحميد وعطية -وهو ابن سعد العوفي- ضعيفان، وقال أبو حاتم: حديث منكر.وأخرجه البزار (1202 - الكشف)، والعقيلي في "الضعفاء" (453)، وابن أبي حاتم في "العلل" (1596) من طريق إسحاق بن إبراهيم البغوي، عن داود بن عبد الحميد، بهذا الإسناد. وأخرجه البيهقي 9/ 271 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار في "مسنده" (8724) عن أبي الوليد محمد بن أحمد الأنطاكي، به. وقال: لا نعلم رواه عن هشام بن بن سعد عن زيد عن عطاء عن أبي هريرة إلّا إسحاق بن إبراهيم الحنيني، ولم يتابعه عليه غيره بهذه الرواية، وإنما أُتي في أحاديث رواها لم يتابع عليها لأنه لما كُفَّ بصره وبَعُدَ عن المدينة فصار إلى الثغر حدَّث بأحاديث عن أهل المدينة، فأُنكر بعضها عليه.وأخرجه العقيلي في "الضعفاء" (128)، وابن عدي في "الكامل" 1/ 341، وابن عبد البر في "التمهيد" 22/ 29 - 30 من طريق إسحاق بن إبراهيم الحنيني، به.قال ابن عدي: هذا الحديث لا يرويه عن هشام بن سعد إلّا الحنيني، والحنيني مع ضعفه يُكتَب حديثه. وقال ابن عبد البر: هذا عندهم ليس بالقوي، والحنيني عنده مناكير.وسيأتي برقم (7735) مختصرًا بنحوه من طريق أبي ثفال عن أبي هريرة.قال ابن عبد البر: قال الشافعي: الإبل أحبُّ إليَّ أن يضحَّى بها من البقر، والبقر أحبُّ إليَّ من الغنم، والضأن أحبُّ إليَّ من المعز، وقال أبو حنيفة وأصحابه: الجزور في الأضحية أفضل ما ضُحي به، ثم يتلوه البقر في ذلك ثم تتلوه الشاة.وحُجّة من ذهب إلى هذا المذهب قوله صلى الله عليه وسلم: المهجَر إلى الجمعة كالمُهدي بدنة، ثم الذي يليه كالمهدي بقرة، ثم الذي يليه كالمهدي شاة [البخاري (929) ومسلم (850)] فبانَ بهذا الحديث أنَّ التقرب إلى الله عز وجل بالإبل أفضل من التقرب إليه بالبقر ثم بالغنم على ما في هذا الحديث.وقد أجمعوا على أنَّ أفضل الهدايا الإبل، واختلفوا في الضحايا، فكان ما أجمعوا عليه في الهدي قاضيًا على ما اختلفوا فيه في الأضاحيّ لأنه قُربان كله، وقد أجمعوا على أنه ما استيسر من الهدي شاة، فدلَّ على نقصان ذلك عن مرتبة غيره، وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أفضل الرقاب أغلاها ثمنًا وأنفسها عند أهلها" [البخاري (2518) ومسلم (84)] ومعلوم أنَّ الإبل أكثر ثمنًا من الغنم، فوجب أن تكون أفضل، استدلالًا بهذا الحديث.
7716 - أخبرنا أبو محمد عبد الرحمن بن حَمْدان الجَلّاب بهَمَذان، حدثنا أبو الوليد محمد بن أحمد بن بُرْد الأنطاكي، حدثنا إسحاق بن إبراهيم الحُنَيني، حدثنا هشام بن سعد، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يَسار، عن أبي هريرة قال: نزل جبريلُ عليه السلام على النبي صلى الله عليه وسلم، فقال له النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "يا جبريلُ، كيف رأيتَ عيدَنا؟ فقال: لقد تَباهَى به أهلُ السماء، اعلَمْ يا محمَّد أَنَّ الجَذَعَ من الضَّأْن خيرٌ من السَّيِّد من المَعْز، وأنَّ الجَذَعَ من الضَّأن خيرٌ من السيِّد من البقر، وأنَّ الجَذَع من الضّأْن خيرٌ من السيِّد من الإبل، ولو عَلِمَ الله ذبحًا خيرًا منه فَدَى به إبراهيمَ عليه السلام" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জিবরীল (আঃ) নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট অবতরণ করলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "হে জিবরীল! আমাদের ঈদকে আপনি কেমন দেখলেন?" তিনি বললেন: "আসমানবাসীরা এ নিয়ে গর্ব প্রকাশ করেছে। হে মুহাম্মদ! আপনি জেনে রাখুন, মেষের 'জাযা' (কম বয়সী) ছাগলের 'সাইয়্যিদ' (পূর্ণ বয়স্ক)-এর চেয়ে উত্তম। আর মেষের 'জাযা' গরুর 'সাইয়্যিদ'-এর চেয়ে উত্তম। আর মেষের 'জাযা' উটের 'সাইয়্যিদ'-এর চেয়েও উত্তম। যদি আল্লাহ এর চেয়ে উত্তম কোনো যবেহ সম্পর্কে জানতেন, তবে তা দ্বারাই তিনি ইবরাহীম (আঃ)-কে মুক্তি দিতেন।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف جدًا من أجل إسحاق بن إبراهيم الحنيني، وقال الذهبي في "التلخيص": هالك، وهشام ليس بمعتمد. وأخرجه البيهقي 9/ 271 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار في "مسنده" (8724) عن أبي الوليد محمد بن أحمد الأنطاكي، به. وقال: لا نعلم رواه عن هشام بن بن سعد عن زيد عن عطاء عن أبي هريرة إلّا إسحاق بن إبراهيم الحنيني، ولم يتابعه عليه غيره بهذه الرواية، وإنما أُتي في أحاديث رواها لم يتابع عليها لأنه لما كُفَّ بصره وبَعُدَ عن المدينة فصار إلى الثغر حدَّث بأحاديث عن أهل المدينة، فأُنكر بعضها عليه.وأخرجه العقيلي في "الضعفاء" (128)، وابن عدي في "الكامل" 1/ 341، وابن عبد البر في "التمهيد" 22/ 29 - 30 من طريق إسحاق بن إبراهيم الحنيني، به.قال ابن عدي: هذا الحديث لا يرويه عن هشام بن سعد إلّا الحنيني، والحنيني مع ضعفه يُكتَب حديثه. وقال ابن عبد البر: هذا عندهم ليس بالقوي، والحنيني عنده مناكير.وسيأتي برقم (7735) مختصرًا بنحوه من طريق أبي ثفال عن أبي هريرة.قال ابن عبد البر: قال الشافعي: الإبل أحبُّ إليَّ أن يضحَّى بها من البقر، والبقر أحبُّ إليَّ من الغنم، والضأن أحبُّ إليَّ من المعز، وقال أبو حنيفة وأصحابه: الجزور في الأضحية أفضل ما ضُحي به، ثم يتلوه البقر في ذلك ثم تتلوه الشاة.وحُجّة من ذهب إلى هذا المذهب قوله صلى الله عليه وسلم: المهجَر إلى الجمعة كالمُهدي بدنة، ثم الذي يليه كالمهدي بقرة، ثم الذي يليه كالمهدي شاة [البخاري (929) ومسلم (850)] فبانَ بهذا الحديث أنَّ التقرب إلى الله عز وجل بالإبل أفضل من التقرب إليه بالبقر ثم بالغنم على ما في هذا الحديث.وقد أجمعوا على أنَّ أفضل الهدايا الإبل، واختلفوا في الضحايا، فكان ما أجمعوا عليه في الهدي قاضيًا على ما اختلفوا فيه في الأضاحيّ لأنه قُربان كله، وقد أجمعوا على أنه ما استيسر من الهدي شاة، فدلَّ على نقصان ذلك عن مرتبة غيره، وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أفضل الرقاب أغلاها ثمنًا وأنفسها عند أهلها" [البخاري (2518) ومسلم (84)] ومعلوم أنَّ الإبل أكثر ثمنًا من الغنم، فوجب أن تكون أفضل، استدلالًا بهذا الحديث.
7717 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الرَّبيع بن سليمان، حدثنا أيوب بن سُوَيد عن الأوزاعي، عن عبد الله بن عامر، عن يزيد بن أبي حَبيب، عن البَرَاء بن عازب: أنَّ رجلًا قال له: إنَّا نكرهُ النَّقصَ في القَرْن والأُذن، فقال له البراء: اكرَهْ لنفسك ما شئتَ، ولا تُحرِّمْه على الناس، قال البراء: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أربعٌ لا تُجزئُ في الضحايا: العوراء البيِّنُ عَوَرُها، والمكسورةُ بعضُ قوائمِها بيِّنٌ كَسْرُها، والمريضةُ بيِّنٌ مَرَضُها، والعَجْفاء التي لا تُنْقِي" [1].
বারা' ইবনু আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তাঁকে বলল: নিশ্চয়ই আমরা শিং এবং কানে কোনো ত্রুটি (নকস) অপছন্দ করি। তখন বারা' তাকে বললেন: তোমার নিজের জন্য যা ইচ্ছা অপছন্দ করো, কিন্তু তা মানুষের জন্য হারাম করে দিও না। বারা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “চার প্রকার পশু কুরবানীর জন্য যথেষ্ট হবে না: ১. স্পষ্ট কানা যার কানা হওয়া স্পষ্ট; ২. ভাঙা পা-বিশিষ্ট যার ভাঙন স্পষ্ট; ৩. রোগী যার রোগ স্পষ্ট; এবং ৪. (এত) দুর্বল ও জীর্ণ যে যার মজ্জা নেই (অর্থাৎ যা অস্থিসার নয়)।”
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف، أيوب بن سويد ضعيف، وعبد الله بن عامر -وهو الأسلمي القارئ- ضعيف أيضًا، وفيه انقطاع أو إعضال بين يزيد بن أبي حبيب والبراء كما سيأتي.وانظر "العلل" لابن أبي حاتم (1607).وأخرجه الروياني في "مسنده" (436) عن الربيع بن سليمان، بهذا الإسناد.وأخرجه الترمذي (1497) من طريق محمد بن إسحاق، عن يزيد بن أبي حبيب، عن سليمان ابن عبد الرحمن، عن عبيد بن فيروز، عن البراء. وهذه الرواية هى الموافقة لرواية الجماعة عن سليمان بن عبد الرحمن كما في الرواية السالفة عند المصنف برقم (1736)، وانظر ما بعده.قوله: "لا تُنقي" يقال: أنقتِ الإبل، أي: سمنت وصار فيها نِقْيٌ، والنِّقي بالكسر: مخُّ العظم.
7718 - وحدثنا أبو العباس عَقِبَه، حدثنا الربيع، حدثنا أيوب بن سُوَيد، حدثنا الأوزاعي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سَلَمة بن عبد الرحمن، عن البَراء بن عازِب، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، بمثِلِه [1].قال الرّبيع في كتابي بالإسنادين: قال: حدثنا الأوزاعي.حديثُ أبي سلمة عن البراء بن عازب صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، إنما أخرج مسلم رحمه الله حديث سليمان بن عبد الرحمن عن عُبيد بن فَيرُوز عن البراء [2]، وهو فيما أُخذ على مسلم رحمه الله لاختلاف الناقلين فيه، وأصحُّه حديثُ يحيى بن أبي كثير عن أبي سلمة، إن سَلِمَ من [3] أيوب بن سُوَيد.
৭৭১৮ - আবূল আব্বাস আকিবাহ আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আর-রাবী‘ আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আইয়ুব ইবনু সুওয়াইদ আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আল-আওযাঈ আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, ইয়াহইয়া ইবনু আবী কাছীর থেকে, তিনি আবূ সালামা ইবনু আব্দুর রহমান থেকে, তিনি বারা' ইবন আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে অনুরূপ (একটি হাদীস বর্ণনা করেছেন) [১]। আর-রাবী‘ তাঁর কিতাবে উভয় ইসনাদ দ্বারা বলেছেন: তিনি বলেন, আল-আওযাঈ আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন। আবূ সালামাহ কর্তৃক বারা' ইবন আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হাদীসের ইসনাদ সহীহ। কিন্তু তারা (বুখারী ও মুসলিম) উভয়ে তা নিজ নিজ গ্রন্থে সংকলন করেননি। বরং ইমাম মুসলিম (রাহিমাহুল্লাহ) কেবল সুলাইমান ইবনু আব্দুর রহমান কর্তৃক উবাইদ ইবনু ফাইরূয থেকে, তিনি বারা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হাদীসটি সংকলন করেছেন [২]। বর্ণনাকারীদের মতভেদের কারণে ইমাম মুসলিম (রাহিমাহুল্লাহ)-এর উপর যে বিষয়ে সমালোচনা করা হয়েছে, এটি সেগুলোর অন্তর্ভুক্ত। আর এই বিষয়ে সবচেয়ে বিশুদ্ধ হলো ইয়াহইয়া ইবনু আবী কাছীর কর্তৃক আবূ সালামাহ থেকে বর্ণিত হাদীসটি, যদি তা আইয়ুব ইবনু সুওয়াইদ-এর (দুর্বলতা) ত্রুটি থেকে মুক্ত থাকে [৩]।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف من أجل أيوب بن سويد. وسئل أبو حاتم عن هذا الحديث من هذه الطريق فقال: باطل، إنما يروي يحيى بن أبي كثير عن إسماعيل بن أبي خالد الفَدَكي عن البراء مرسلًا.وجاء في "المراسيل" له (35): سمعت أبي يقول: إسماعيل بن أبي خالد الفدكي لم يدرك البراء، قلت (يعني ابن أبي حاتم): حدَّث يزيد بن هارون عن شيبان عن يحيى بن أبي كثير عن إسماعيل ابن أبي خالد الفدكي: أنَّ البراء بن عازب حدثه في الضحايا، قال: هذا وهمٌ!! وهو مرسل.وحديث المصنِّف أخرجه الروياني في "مسنده" (437)، وكذا الطحاوي في "معاني الآثار" 4/ 169 عن يونس بن عبد الأعلى، كلاهما (الروياني ويونس) عن الربيع بن سليمان، بهذا الإسناد.
[2] هذا ذهول من المصنِّف، فسليمان بن عبد الرحمن -وهو ابن قيس الدمشقي- وعبيد بن فيروز لم يخرج لهما مسلم شيئًا. وسبق كلام المصنف نفسه عقب الرواية (1736) بأن قال: حديث صحيح ولم يخرجاه لعلّة روايات سليمان بن عبد الرحمن.
7718 [3] - تحرّفت "من" في النسخ الخطية إلى: بن.