আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
7719 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث وسعيد بن أبي أيوب وعبد الله ابن عيّاش، أنَّ عيّاش بن عبّاس [1] حدّثهم عن عيسى بن هلال الصَّدَفي، عن عبد الله ابن عمرو: أنَّ رجلًا أتى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "وأُمِرتُ بيوم الأضحى عيدًا جعله اللهُ لهذه الأُمّة" قال الرجلُ: فإن لم أَجد [2] إِلَّا مَنيحةَ ابني [3] أو شاةَ ابني [4] وأهلي أو مَنيحتَهم، أذبحُها؟ قال: "لا، ولكن قلِّمْ أظفارَك، وقُصَّ شاربَك، واحلِقْ عانتَك، فذلك تمامُ أُضحيَّتِك عند الله عز وجل" [5].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট এসে উপস্থিত হলো। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে বললেন: "(আমি তো) কুরবানীর দিনকে ঈদ হিসেবে পালন করার জন্য আদিষ্ট হয়েছি, যাকে আল্লাহ এই উম্মতের জন্য নির্ধারণ করেছেন।" লোকটি বলল: যদি আমি আমার ছেলের দান করা পশু (বা দুগ্ধ/পশম ব্যবহারের জন্য দেওয়া পশু) অথবা আমার ছেলের বা পরিবারের ছাগল বা তাদের দান করা পশু ছাড়া অন্য কিছু না পাই, তবে কি আমি তা যবেহ করব? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না। বরং তুমি তোমার নখ কাটো, গোঁফ ছোট করো এবং তোমার নাভির নিচের লোম পরিষ্কার করো। আল্লাহ্র নিকট এটাই তোমার কুরবানীর পূর্ণতা। "
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في (ز): أبي عياش بن عياش، وفي (ص): أنَّ عباس بن عياش، وفي (م): أنَّ عياش بن عياش. والصواب في اسمه: عياش بن عباس، الأولى بالشين المعجمة، والثانية بالسين المهملة، وجاء كذلك على الصواب في "التلخيص".
[2] في النسخ الخطية: فلم أجد، وفي "التلخيص": فإن لم نجد.
7719 [3] - في (ز) و "التلخيص": انثى، ولم تُعجَم في (ص) و (م)، والمثبت من بعض مصادر التخريج، وفي البعض الآخر: أنثى، كما في (ز).
7719 [4] - "ابني" سقطت من (ز).
7719 [5] - إسناده ليِّن من أجل عيسى بن هلال الصدفي كما سلف برقم (4008).وأخرجه النسائي (4439) عن يونس بن عبد الأعلى، وابن حبان (5914) من طريق يزيد بن موهب، كلاهما عن عبد الله بن وهب، عن سعيد بن أبي أيوب، بهذا الإسناد. وفي رواية النسائي: وذكر آخرين.وأخرجه أحمد 11/ (6575)، وأبو داود (2789) من طريق عبد الله بن يزيد المقرئ عن سعيد ابن أبي أيوب وحده، به. ورواية أحمد مجموعة مع الحديث السالف برقم (4008).
7720 - أخبرنا عبد الله بن إسحاق بن الخُراساني العَدْل ببغداد، حدثنا أحمد بن حيَّان بن مُلاعِب، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا شُعْبة وسعيد، عن قَتَادة قال: سمعتُ جُرَيَّ بن كُلَيب، رجلًا منهم، عن علي بن أبي طالب: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن يُضحَّى بأعضَبِ القَرْنِ والأُذن.قال قَتَادة: وذكرتُ ذلك لسعيد بن المسيّب، قال: العَضَبُ النِّصْفُ فما فوقَ ذلك [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শিং এবং কানের অর্ধাংশ বা তার বেশি কাটা বা ভগ্ন অঙ্গযুক্ত পশু দ্বারা কুরবানি করতে নিষেধ করেছেন। কাতাদাহ (রহ.) বলেন, আমি এই বিষয়ে সাঈদ ইবনুল মুসাইয়্যাব (রহ.) এর নিকট উল্লেখ করলে তিনি বললেন: 'আল-আদাব' (কাটা বা ভগ্ন অঙ্গ) হলো অর্ধেক অথবা তার চেয়ে বেশি।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف كما بيّناه مفصلًا فيما سلف برقم (1737).وأخرجه أحمد 2/ (1048) و (1158)، وابن ماجه (3145)، والترمذي (1504)، وعبد الله ابن أحمد في زيادات "المسند" 2/ (1293) و (1294) من طرق عن سعيد بن أبي عروبة، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن صحيح.وطريق شعبة سلف تخريجها برقم (1737).
7721 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا أبو بكر بن عيّاش، حدثنا أبو إسحاق، عن شُريح بن النُّعمان، عن علي بن أبي طالب قال: نهى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن يُضحَّى بمُقابَلَةٍ ومُدابَرَةٍ أو شَرْقاءَ أو خَرْقاءَ أو جَدْعاء [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুকাবালাহ, মুদাবারাহ, শারকা’, খারকা’ অথবা জাদ‘আ’ (অর্থাৎ যার কান কাটা, চেরা বা ছিদ্রযুক্ত) পশু দ্বারা কুরবানি করতে নিষেধ করেছেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف، وسيأتي الكلام على إسناده في الحديث الذي يليه.وأخرجه أحمد 2/ (609)، وابن ماجه (3142)، والنسائي (4448) من طريق عن أبي بكر ابن عياش، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (4449) من طريق زياد بن خيثمة، عن أبي إسحاق، به.وسيأتي من طريق أبي إسحاق في الروايتين التاليتين، وفيه زيادة استشراف العين والأذن، وهناك يأتي تخريجه.قال السِّندي في شرحه على ابن ماجه: "بمقابَلة" بفتح الباء وكذا "مدابَرة"، الأُولى هي التي قطع مقدَّم أذنها، والثانية هي التي قطع مؤخر أذنها، والشرقاء: مشقوقة الأذن نصفين، والخرقاء: التي في أذنها ثقب مستدير، والجدعاء: من الجدع: وهو قطع الأنف والأذن والشفة، وهي بالأنف أخصُّ، فإذا أُطلق غلب عليه. وسيأتي تفسيره عن أبي إسحاق السبيعي بنحو هذا الكلام في الحديث الذي يليه.
7722 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا عُبيد الله بن موسى، أخبرنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن شُريح بن النُّعمان، عن علي قال: أمرنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن نستشرِفَ العينَ والأُذنَ، ولا نُضحِّىَ بمُقابَلة، ولا مُدابَرة، ولا شَرقاءَ، ولا خَرقاءَ.قال أبو إسحاق: المقابَلَة: ما قُطِعَ طَرَفُ أُذنِها، والمدابَرَة: ما قُطع من جانب الأُذن، والشَّرقاءُ: المشقوقة، والخَرْقاءُ: المثقوبة [1].هذا حديث صحيحٌ أسانيدُه كلُّها، ولم يُخرجاه، وأظنّه لزيادة ذكرها قيسُ بن الربيع عن أبي إسحاق، على أنهما لم يحتجَّا بقيس:
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে চোখ ও কান (ত্রুটিমুক্ত কিনা) ভালো করে পরীক্ষা করতে আদেশ দিয়েছেন। আর আমরা যেন মুকাবালাহ, মুদাবারাহ, শারকা ও খারকা ধরনের পশু দ্বারা কুরবানী না করি।
আবু ইসহাক (রাহ.) বলেন: মুকাবালাহ হলো যার কানের অগ্রভাগ কাটা হয়েছে, মুদাবারাহ হলো যার কানের পাশ (পিছনের দিক) থেকে কাটা হয়েছে, শারকা হলো যা চেরা বা ফাটানো এবং খারকা হলো যা ছিদ্র করা।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] رجاله ثقات غير شريح بن النعمان فقد روى عنه جمع وذكره ابن حبان في "الثقات"، وكذا ابن شاهين، وقال أبو حاتم الرازي: لا يحتج به شبه مجهول. وأبو إسحاق. وهو عمرو بن عبد الله السبيعي - لم يسمعه من شريح كما نصَّ عليه الدارقطني في "العلل" (380) بينهما سعيد بن عمرو بن أشوَع كما سيأتي في الرواية التالية عند المصنف. وقد خولف أبو إسحاق في رفعه، فرواه جمع منهم سفيان الثَّوري عن ابن أشوع موقوفًا من قول علي رضي الله عنه. وقصة الاستشراف ستأتي لاحقًا (7724 - 7726) بسند حسن.وأخرجه الترمذي (1498 م) عن الحسن بن علي، عن عبيد الله بن موسى، بهذا الإسناد. وقال: حسن صحيح.وأخرجه أحمد 2/ (1061) عن وكيع عن إسرائيل بن يونس، به.وأخرجه أحمد (851) و (1061) و (1275)، وأبو داود (2804)، والترمذي (1498)، والنسائي (4446) و (4447) من طرق عن أبي إسحاق السبيعي، به. وأخرجه وكيع في "أخبار القضاة" 3/ 13، والدارقطني في "المؤتلف والمختلف" 3/ 1279 - ومن طريقه ابن حزم في "المحلى" 7/ 359 - من طريق محمد بن عبد الله المخرمي، عن أبي كامل مظفر بن مدرك، بهذا الإسناد. ورواية وكيع مختصرة بشطره الثاني ورواية الدار قطني لم يسق لفظها، وتابع قيسَ بن الربيع على ذكر سعيد بن أشوع بين أبي إسحاق وشريح الجرّاحُ بن الضحاك فيما ذكره أبو حاتم - كما في "العلل" لابنه (1606) - والدارقطني في "العلل" 3/ 239، وقال أبو حاتم: وهذا أشبه؛ يعني الأشبه بالصواب وجوَّد الواسطة بينهما.وأخرج شطره الثاني البخاري في "التاريخ الكبير" 4/ 229، ووكيع 3/ 12 - 13، والدارقطني في "العلل" 3/ 239 من طريق سفيان الثَّوري، ووكيع 3/ 12 من طريق علي بن صالح، و 3/ 13 من طريق صالح بن صالح بن حي، ثلاثتهم عن سعيد بن عمرو بن أشوع، عن شريح، عن علي من قوله. ولم يُذكر عليٌّ في مطبوع "التاريخ الكبير"! وهذه الأسانيد أصح وأكثر، لذلك قال الدارقطني: يشبه أن يكون القول قول الثوري. وقال البخاري: لم يثبت رفعه.
7723 - حدَّثَناه أحمد بن كامل القاضي، حدثنا أحمد بن عبيد الله النَّرْسي [1]، حدثنا أبو كامل مظفَّر بن مُدرِك، حدثنا قيسُ بن الرَّبيع، حدثنا أبو إسحاق، عن شُريح، عن علي، فذكر بنحوه.قال قيسٌ: قلتُ لأبي إسحاق: سمعته من شُريح؟ قال: حدثني ابنُ أشوَعَ عنه [2].
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এরপর তিনি অনুরূপ (একটি) বর্ণনা উল্লেখ করলেন। কায়েস (ইবনুর রাবী) বললেন, আমি আবূ ইসহাককে জিজ্ঞাসা করলাম: আপনি কি শুরাইহের নিকট থেকে সরাসরি শুনেছেন? তিনি (আবূ ইসহাক) বললেন: ইবনু আশওয়া' শুরাইহ থেকে আমার নিকট তা বর্ণনা করেছেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في (ز) إلى: البركي. وأخرجه وكيع في "أخبار القضاة" 3/ 13، والدارقطني في "المؤتلف والمختلف" 3/ 1279 - ومن طريقه ابن حزم في "المحلى" 7/ 359 - من طريق محمد بن عبد الله المخرمي، عن أبي كامل مظفر بن مدرك، بهذا الإسناد. ورواية وكيع مختصرة بشطره الثاني ورواية الدار قطني لم يسق لفظها، وتابع قيسَ بن الربيع على ذكر سعيد بن أشوع بين أبي إسحاق وشريح الجرّاحُ بن الضحاك فيما ذكره أبو حاتم - كما في "العلل" لابنه (1606) - والدارقطني في "العلل" 3/ 239، وقال أبو حاتم: وهذا أشبه؛ يعني الأشبه بالصواب وجوَّد الواسطة بينهما.وأخرج شطره الثاني البخاري في "التاريخ الكبير" 4/ 229، ووكيع 3/ 12 - 13، والدارقطني في "العلل" 3/ 239 من طريق سفيان الثَّوري، ووكيع 3/ 12 من طريق علي بن صالح، و 3/ 13 من طريق صالح بن صالح بن حي، ثلاثتهم عن سعيد بن عمرو بن أشوع، عن شريح، عن علي من قوله. ولم يُذكر عليٌّ في مطبوع "التاريخ الكبير"! وهذه الأسانيد أصح وأكثر، لذلك قال الدارقطني: يشبه أن يكون القول قول الثوري. وقال البخاري: لم يثبت رفعه.
[2] إسناده كسابقه. وأخرجه وكيع في "أخبار القضاة" 3/ 13، والدارقطني في "المؤتلف والمختلف" 3/ 1279 - ومن طريقه ابن حزم في "المحلى" 7/ 359 - من طريق محمد بن عبد الله المخرمي، عن أبي كامل مظفر بن مدرك، بهذا الإسناد. ورواية وكيع مختصرة بشطره الثاني ورواية الدار قطني لم يسق لفظها، وتابع قيسَ بن الربيع على ذكر سعيد بن أشوع بين أبي إسحاق وشريح الجرّاحُ بن الضحاك فيما ذكره أبو حاتم - كما في "العلل" لابنه (1606) - والدارقطني في "العلل" 3/ 239، وقال أبو حاتم: وهذا أشبه؛ يعني الأشبه بالصواب وجوَّد الواسطة بينهما.وأخرج شطره الثاني البخاري في "التاريخ الكبير" 4/ 229، ووكيع 3/ 12 - 13، والدارقطني في "العلل" 3/ 239 من طريق سفيان الثَّوري، ووكيع 3/ 12 من طريق علي بن صالح، و 3/ 13 من طريق صالح بن صالح بن حي، ثلاثتهم عن سعيد بن عمرو بن أشوع، عن شريح، عن علي من قوله. ولم يُذكر عليٌّ في مطبوع "التاريخ الكبير"! وهذه الأسانيد أصح وأكثر، لذلك قال الدارقطني: يشبه أن يكون القول قول الثوري. وقال البخاري: لم يثبت رفعه.
7724 - أخبرنا أبو بكر بن عتَّاب، حدثنا يحيى بن جعفر بن الزِّبْرِقان، أخبرنا وهب بن جَرير [1]، حدثنا أبي، عن أبي إسحاق، عن سَلَمة بن كُهَيل، عن حُجَيَّة بن عَديّ: أنَّ رجلًا سأل عليًّا عن البقرة، فقال: عن سبعة، قال: القَرْن [2]؟ قال: لا يضرُّك، قال: العَرْجاءُ؟ قال: إذا بَلَغَتِ المَنْسَكَ، قال: وكان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أمرَنا أن نَستشرِفَ العينَ والأُذن [3].رواه سفيان الثَّوري وشُعبة عن سَلَمة.أما حديثُ الثَّوري:
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তাঁকে (কুরবানীর) গরু সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। তিনি বললেন, তা সাতজনের পক্ষ থেকে (দেওয়া যায়)। লোকটি জিজ্ঞাসা করল, (শিং ভাঙা) শিংযুক্ত পশু? তিনি বললেন, তাতে তোমাদের কোনো ক্ষতি নেই। লোকটি বলল, খোঁড়া (পশু)? তিনি বললেন, যদি তা (কুরবানীস্থলে) পৌঁছাতে পারে। তিনি (আলী) বললেন, আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের চোখ ও কান (ত্রুটিমুক্ত কিনা তা) ভালোভাবে দেখে নিতে নির্দেশ দিয়েছেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرّف في (ز) و (ب) إلى: جريج.
[2] قوله: "قال القرن" سقط من (ز) و (ب).
7724 [3] - إسناده حسن من أجل حجية بن عدي. وسلف من طريق محمد بن عبيد عن وهب بن جرير برقم (1739).
7725 - فحدَّثَناه أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدثنا أَسِيد بن عاصم، حدثنا الحسين بن حفص، عن سفيان، عن سَلَمة [1] بن كُهيل، عن حُجَيَّة بن عَدِي، قال: سأل رجلٌ عليًّا عن البقرة، قال: عن سبعة، فقال: مكسورةُ القَرْن؟ قال: لا بأس، قال: العَرْجاء؟ قال: إذا بَلَغَتِ المَنسَكَ، وقال: أمرَنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن نَستشرِفَ العينَ والأُذنَ [2].وأما حديث شُعبة:
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তাঁকে গরু সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বললেন: (তা) সাতজনের পক্ষ থেকে (কুরবানী করা যাবে)। লোকটি বলল: শিং ভাঙ্গা (গরু)? তিনি বললেন: কোনো অসুবিধা নেই। লোকটি বলল: খোঁড়া (গরু)? তিনি বললেন: যখন সে তার কুরবানীস্থলে পৌঁছাতে সক্ষম হয়। আর তিনি (আলী) বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে নির্দেশ দিয়েছেন যেন আমরা চোখ ও কান ভালো করে পরীক্ষা করে নিই। আর শু'বার হাদীসের ব্যাপারে:
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] من قوله: "أما حديث الثوري" إلى هنا سقط من (ز) و (ب).
[2] إسناده حسن كسابقه. الحسين بن حفص: هو ابن الفضل الهمداني.وأخرجه أحمد 2/ (32) و (734) و (1021)، وابن ماجه (3143)، وابن حبان (5920) من طريق عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.
7726 - فحدَّثَناه علي بن حَمْشاذَ العدل، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا أبو الوليد الطَّيَالسي وأبو عمر الحَوْضي، قالا: حدثنا شُعبة، عن سَلَمة بن كُهيل قال: سمعتُ حُجَيَّة بن عَدِيّ يقول: سمعتُ عليًّا، وسأله رجلٌ عن البقرة، فقال: عن سبعةٍ، قال: وسأله عن القَرْن، قال: لا يضرُّك، قال: وسأله عن العَرَج [1]، قال: إذا بلغَ المَنسَكَ، أمرنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن نَستشرِفَ العينَ والأُذن [2].هذه الأسانيد كلُّها صحيحة، ولم يحتجَّا بحُجيّة بن عديٍّ، وهو من كِبار أصحاب أمير المؤمنين عليٍّ رضي الله عنه.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হুজাইয়্যা ইবনু আদী বলেন: আমি তাঁকে বলতে শুনেছি, যখন এক ব্যক্তি তাঁকে গরু সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল, তখন তিনি বললেন: তা সাতজনের পক্ষ থেকে (কুরবানি করা যায়)। লোকটি (কুরবানিযোগ্য পশুর) শিং সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। তিনি বললেন: তা তোমাকে ক্ষতি করবে না। লোকটি খোঁড়া পশু সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। তিনি বললেন: যখন (তা হেঁটে) যবেহ করার স্থানে পৌঁছাতে পারে (তখন তা জায়েয)। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে চোখ ও কান উত্তমরূপে দেখে নেওয়ার নির্দেশ দিয়েছেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في (ص) و (م): الأعرج.
[2] إسناده حسن كسابقيه. وسلف من طريق شعبة مختصرًا برقم (1738).
7727 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الزاهد، حدثنا الحسن بن علي بن بحر البَرِّيّ، حدثني أبي، حدثنا عيسى بن يونس، حدثنا ثَوْر بن يزيد، حدثني أبو حُميد الرُّعَيني، حدثني يزيد بن خالد المصري، قال: أتيتُ عُتبة بن عبدٍ السُّلَمي، فقلت: يا أبا الوليد، إنِّي خرجتُ ألتمسُ الضحايا، فلم أجد شيئًا يُعجبني غير ثَرْماءَ، فكرهتُها، فما تقول؟ قال: أفلا جئتَني بها، فقلت: سبحانَ الله، أتجوزُ عنك، ولا تجوزُ عني؟! قال: نعم، إنك تشُكُّ ولا أشكُّ، إنما نهى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عن المصفَّرة والمُستأصَلة والبَخْقاءِ والمُشيَّعةِ والكَسْراء والمصفَّرةُ: التي تُستأصَل أُذُنها حتى يبدُوَ سِماخُها، والمستأصَلةُ قرنُها، والبَخْقاءُ: التي تُبخَقُ عينُها، والمشيَّعةُ: التي لا تَتْبعُ الغنَمَ عَجَفًا وضعفًا، والكَسْراءُ: الكَسِير [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
উতবা ইবনু আব্দ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইয়াযীদ ইবনু খালিদ আল-মিসরী বলেন: আমি উতবা ইবনু আব্দ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে বললাম: হে আবুল ওয়ালীদ, আমি কুরবানীর পশু (ضحايا) খুঁজতে বের হয়েছিলাম, কিন্তু থার্মা (সামনের দাঁত ভাঙা) ছাড়া আমার পছন্দমতো আর কিছুই পেলাম না। তাই আমি এটি অপছন্দ করলাম। আপনি কী বলেন? তিনি বললেন: তুমি কেন তা আমার কাছে নিয়ে আসোনি? আমি বললাম: সুবহানাল্লাহ! আপনার জন্য তা জায়েয, কিন্তু আমার জন্য নয়?! তিনি বললেন: হ্যাঁ, নিশ্চয়ই তুমি সন্দেহ করছো, কিন্তু আমি সন্দেহ করি না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তো কেবল আল-মুসাফ্ফারাহ, আল-মুস্তাআসালাহ, আল-বাখ্ক্বা', আল-মুশাইয়াআহ এবং আল-কাসরা' কুরবানী করতে নিষেধ করেছেন। আল-মুসাফ্ফারাহ হলো সেই পশু, যার কান গোড়া থেকে এমনভাবে কেটে নেওয়া হয়েছে যে তার শ্রবণ গহ্বর উন্মুক্ত হয়ে গেছে। আল-মুস্তাআসালাহ হলো যার শিং গোড়া থেকে উপড়ে ফেলা হয়েছে। আর আল-বাখ্ক্বা' হলো সেই পশু, যার চোখ নষ্ট হয়ে গেছে। আর আল-মুশাইয়াআহ হলো সেই পশু, যা অতিরিক্ত দুর্বলতা ও জীর্ণতার কারণে পালের সাথে চলতে পারে না। আর আল-কাসরা' হলো আঘাতপ্রাপ্ত (ভাঙা) পশু।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف، أبو حميد الرعيني وشيخه يزيد مجهولان، وانفردت رواية الحاكم بتسمية أبيه خالدًا، فإن صحَّت وإلّا فهي وهمٌ، فإن جميع من ترجم له وروى الحديث من طريقه سماه يزيد ذا مِصر حتى الحاكم في روايته السالفة برقم (1740)، وأما نسبته هنا بالمصري فيغلب على ظننا أنه محرَّف عن المُقرَئي -بضم أوله وقيل بكسره- وهي نسبة إلى بلدة شاميّة، فالرجل شامي لا مصري، والله تعالى أعلم.عيسى بن يونس: هو السَّبيعي، وثور بن يزيد: هو الكَلاعي الحمصي.وأخرجه أحمد 29/ (17652)، وأبو داود (2803) من طريق علي بن بحر، بهذا الإسناد. على الصواب في اسم يزيد ذي مِصر.وأخرجه أحمد 29/ (17653) عن أحمد بن جناب، وأبو داود (2803) عن إبراهيم بن موسى الرازي، كلاهما عن عيسى بن يونس به.وحديث البراء في بيان عيوب الأضاحي هو الصحيح في هذا الباب، وسلف برقم (1736). سفيان الثوري، عن عبد الله بن أبي نجيح، عن طاووس، عن ابن عباس موقوفًا قال: لا تجوز المُصرَّمة أطباؤها كلُّها. وسنده صحيح. وفسَّرها بأن يُصرَم طبيها (أي: ضَرْعها) فيقرح ولا يخرج منه اللبنُ فَيَيْبَسَ.قال ابن الأثير في "النهاية": "المصطَلَمة أطباؤها" أي: المقطوعة الضروع، والأَطْباء: واحدها طُبْي، بالضم والكسر. وفسَّرها بالأخلاف جمع خِلْف: وهو الضَّرْع.
7728 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا علي بن عاصم، حدثني ابن طاووس، عن أبيه، عن ابن عباس قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "لا تجوزُ في البُدْن [1]: العَوْراءُ، والعَجْفاءُ، والجَرْباءُ، والمُصطَلَمةُ أَطْباؤُها كلُّها" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “কুরবানীর পশুর মধ্যে চারটি জিনিস জায়েজ নয়: একচোখা প্রাণী, অতিশয় দুর্বল (ক্ষীণকায়) প্রাণী, খুজলি বা চর্মরোগযুক্ত প্রাণী এবং যে প্রাণীর স্তন বা বাঁট সম্পূর্ণ কেটে ফেলা হয়েছে।”
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] المثبت من (ز)، ومثله في روايتي الطبراني، وفي (ص) و (م): النذر، ومثله في رواية ابن الأعرابي. سفيان الثوري، عن عبد الله بن أبي نجيح، عن طاووس، عن ابن عباس موقوفًا قال: لا تجوز المُصرَّمة أطباؤها كلُّها. وسنده صحيح. وفسَّرها بأن يُصرَم طبيها (أي: ضَرْعها) فيقرح ولا يخرج منه اللبنُ فَيَيْبَسَ.قال ابن الأثير في "النهاية": "المصطَلَمة أطباؤها" أي: المقطوعة الضروع، والأَطْباء: واحدها طُبْي، بالضم والكسر. وفسَّرها بالأخلاف جمع خِلْف: وهو الضَّرْع.
[2] إسناده ضعيف، تفرَّد به مرفوعًا علي بن عاصم -وهو ابن صهيب الواسطي- وهو ضعيف.وقد خولف في رفعه كما سيأتي. ابن طاووس: هو عبد الله.وأخرجه ابن الأعرابي في "معجمه" (620)، والطبراني في "الكبير" (10928)، وفي "الأوسط" (3578) من طرق عن علي بن عاصم، بهذا الإسناد. زاد ابن الأعرابي: قال علي بن عاصم: كان عطاء يفتي به ولا يرفعه.وأخرجه إبراهيم الحربي في "غريب الحديث" 3/ 1198 عن أحمد بن حنبل، عن وكيع، عن سفيان الثوري، عن عبد الله بن أبي نجيح، عن طاووس، عن ابن عباس موقوفًا قال: لا تجوز المُصرَّمة أطباؤها كلُّها. وسنده صحيح. وفسَّرها بأن يُصرَم طبيها (أي: ضَرْعها) فيقرح ولا يخرج منه اللبنُ فَيَيْبَسَ.قال ابن الأثير في "النهاية": "المصطَلَمة أطباؤها" أي: المقطوعة الضروع، والأَطْباء: واحدها طُبْي، بالضم والكسر. وفسَّرها بالأخلاف جمع خِلْف: وهو الضَّرْع.
7729 - أخبرنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا موسى بن إسحاق الأنصاري، أخبرنا عبد الله بن أبي شَيْبة، حدثنا عبد الله بن إدريس، حدثنا عاصم بن كُلَيب، عن أبيه، قال: كنا نُؤَمّر [1] علينا في المَغازي أصحابَ محمَّد صلى الله عليه وسلم، وكُنَّا بفارسَ، فغَلَتْ علينا يومَ النَّحر المَسَانُّ، فكُنَّا نأخذُ المُسِنَّةَ بالجَذَعين، فقام فينا رجلٌ من مُزَينةَ فقال: كُنَّا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فأصابَنا مثلُ هذا اليوم، فكُنَّا نأخذُ المُسِنَّةَ بِالجَذَعينِ والثلاثة، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ الجَذَعَ يُوفِي بما يُوفِي به الثَّنِيُّ" [2]. رواه الثَّوري عن عاصم بن كليب، وسمَّى الصحابيَّ فيه:
কুলাইব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা যুদ্ধাভিযানে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণকে আমাদের নেতা নিযুক্ত করতাম। আমরা পারস্যে ছিলাম। এরপর কুরবানীর দিন আমাদের জন্য বয়স্ক পশু (কুরবানীর উপযুক্ত পশু) দুষ্প্রাপ্য হয়ে গেল। তখন আমরা একটি বয়স্ক পশুর বিনিময়ে দুটি 'জাযা'আ' (কম বয়সী পশু) নিতাম। তখন মুযাইনা গোত্রের এক ব্যক্তি আমাদের মাঝে দাঁড়িয়ে বলল: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম এবং এই দিনের মতোই আমাদের এমন পরিস্থিতি হয়েছিল। তখন আমরা একটি বয়স্ক পশুর বিনিময়ে দুটি বা তিনটি জাযা'আ (কম বয়সী পশু) নিতাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেন: "নিশ্চয়ই 'জাযা'আ' সেই প্রয়োজন পূর্ণ করে যা 'ছানিয়্য' (বয়স্ক পশু) পূর্ণ করে।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في النسخ الخطية: نؤم، والمثبت من "تلخيص الذهبي"، والعبارة في "المصنف": كنا في المغازي لا يؤمَّر علينا إلّا أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم. هَرِمَينِ أجذع الثمانية إلى عشرة، وفي حديث ابن نيار: "قال: عندي عَنَاقٌ جَذَعة". قال الخطابي: ولذلك لم تجزئ إذا كان لا يجزئ من المعز أقل من الثّني، وأما الضأن فالجَذَع منها يُجزئ. والثَّنِي: الذي أثنى، أي: ألقى ثنيَّته، وهو من الإبل ما استكمل السنة الخامسة ودخل في السادسة، ومن الظلّف ما استكمل الثانية ودخل في الثالثة، ومن الحافر ما استكمل الثالثة ودخل في الرابعة، وهو في كلها بعد الجَذَع، وقيل: الرباعي، والجمع ثُنْيانٌ وثِنَاءٌ.ولذلك اختَلَفَ القائلون بإجزاء الجَذَع من الضَّأن، وهم الجمهور في سِنّه على آراء: أحدها: أنه ما كمل سنةً ودخل في الثانية، وهو الأصحّ عند الشافعيَّة، وهو الأشهر عند أهل اللّغة، ثانيها: نصف سنة، وهو قول الحنفية والحنابلة، ثالثها سبعة أشهر، حكاه صاحب "الهداية" من الحنفية عن الزّعفراني، رابعها ستة أو سبعة، حكاه التِّرمذي عن وكيع.انظر "المغرب في بيان المعرب" للمطرزي، و "فتح الباري" 17/ 177.
[2] إسناده قوي، عاصم بن كليب -وهو ابن شهاب- وأبوه صدوقان لا بأس بهما، لكن اختلف على عاصم في تعيين راويه عن النبي صلى الله عليه وسلم، فجعله غيرُ واحد مُزنيًا، وشك شعبةُ، فقال: مزني أو جهني، وسماه سفيان الثوري: مجاشع بن مسعود السلمي. ويمكن الجمع بين هذه الروايات -إن لم يكن في إحداها وهمٌ- بأنَّ أمير القوم في تلك الغزاة كان مجاشع بن مسعود، فقد كان صاحبَ فتوح ومَغازٍ، وأنه أمَر هذا الرجل المزني أو الجهني أن ينادي بما كان أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم معه، وبذلك تتفق الروايات ولا تضادّ، والله تعالى أعلم.والحديث في "مصنف ابن أبي شيبة" 14/ 210.وأخرجه النسائي (4457) من طريق أبي الأحوص سلام بن سليم، عن عاصم بن كليب بهذا الإسناد. وقال فيه: رجل من مزينة.قال الأزهري: الجَذَع من المَعْز لسَنَة، ومن الضأن لثمانية أشهر، وعن ابن الأعرابي: الإجذاع: وقتٌ وليس بسِنّ، فالعَنَاق تُجذع لسنة، وربما أجذعت قبل تمامها للخِصب، فتسمن فيسرع إجذاعها، فهي جَدَعَة، ومن الضأن إذا كان ابنَ شابَّينِ أجذع لستة أشهر إلى سبعة، وإذا كان ابنَ هَرِمَينِ أجذع الثمانية إلى عشرة، وفي حديث ابن نيار: "قال: عندي عَنَاقٌ جَذَعة". قال الخطابي: ولذلك لم تجزئ إذا كان لا يجزئ من المعز أقل من الثّني، وأما الضأن فالجَذَع منها يُجزئ. والثَّنِي: الذي أثنى، أي: ألقى ثنيَّته، وهو من الإبل ما استكمل السنة الخامسة ودخل في السادسة، ومن الظلّف ما استكمل الثانية ودخل في الثالثة، ومن الحافر ما استكمل الثالثة ودخل في الرابعة، وهو في كلها بعد الجَذَع، وقيل: الرباعي، والجمع ثُنْيانٌ وثِنَاءٌ.ولذلك اختَلَفَ القائلون بإجزاء الجَذَع من الضَّأن، وهم الجمهور في سِنّه على آراء: أحدها: أنه ما كمل سنةً ودخل في الثانية، وهو الأصحّ عند الشافعيَّة، وهو الأشهر عند أهل اللّغة، ثانيها: نصف سنة، وهو قول الحنفية والحنابلة، ثالثها سبعة أشهر، حكاه صاحب "الهداية" من الحنفية عن الزّعفراني، رابعها ستة أو سبعة، حكاه التِّرمذي عن وكيع.انظر "المغرب في بيان المعرب" للمطرزي، و "فتح الباري" 17/ 177.
7730 - حدَّثَناه محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا السَّري بن خُزيمة، حدثنا أبو حُذيفة، حدثنا سفيان، عن عاصم بن كُليب، عن أبيه، قال: كُنَّا مع مُجاشِع بن مسعود السُّلَمي في غَزاةٍ فعزَّتِ الضَّحايا، فقال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إِنَّ الجَذَعَ يُوفِي ممّا يُوفِي منه الثَّنِيُّ" [1].رواه شُعبة عن عاصم بن كليب، ولم يسمِّ الصحابيَّ:
মুজাশী' ইবনু মাসউদ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [কুলিবের পিতা] বলেন: আমরা মুজাশী’ ইবনু মাসউদ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে একটি সামরিক অভিযানে ছিলাম। সে সময় কুরবানীর পশু দুষ্প্রাপ্য হয়ে গেল। তখন তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলতে শুনেছি: “নিশ্চয়ই ‘জাযা’ (দাঁত না ওঠা অল্প বয়স্ক পশু) দ্বারা তা-ই যথেষ্ট হবে যা ‘ছানি’ (পূর্ণ বয়স্ক পশু) দ্বারা যথেষ্ট হয়ে থাকে।”
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده قوي، وسلف الكلام عليه في الحديث السابق.وأخرجه أبو داود (2799)، وابن ماجه (3140) من طريق عبد الرزاق، عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد. وأخرجه النسائي (4458) من طريق خالد بن الحارث، عن شعبة به.
7731 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثنا أبي، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شُعبة، عن عاصم بن كُلَيب، عن أبيه، عن رجلٍ من مُزَينة أو جُهَينة، قال: كان أصحابُ رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا كان قبلَ الأضحى بيومٍ أو يومينِ أعطَوا جَذَعينٍ وأخذوا ثَنيًّا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنَّ الجَدْعَةَ تُجزئُ مما تُجزئُ منه الثَّنِيَّةُ" [1]. هذا حديث مختلَف فيه على عاصم بن كُليب، وهو ممن لم يُخرِّجاه الشيخان رضي الله عنهما، وقد اشترطتُ لنفسي الاحتجاجَ به، والحديثُ عندي صحيحٌ بعد أن أجمَعوا على ذكر الصحابيِّ فيه، ثم سمَّاه إمامُ الصَّنْعة سفيانُ بن سعيد الثَّوري رضي الله عنه.
মুযাইনা অথবা জুহায়নার গোত্রের একজন ব্যক্তি থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ যখন ঈদুল আযহার এক বা দুই দিন আগে হতো, তখন তারা জাযা' (কম বয়স্ক পশু) দিতেন এবং ছানি (কোরবানির উপযুক্ত বয়স্ক পশু) গ্রহণ করতেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয় জাদ'আ ঐ সকল ক্ষেত্রে যথেষ্ট হবে, যে সকল ক্ষেত্রে ছানি যথেষ্ট হয়।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده قوي من أجل عاصم بن كليب وأبيه. وهو في "مسند أحمد" 38/ (23123). وأخرجه النسائي (4458) من طريق خالد بن الحارث، عن شعبة به.
7732 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، أخبرني عبد الرحمن بن سلمان، عن [1] عُقَيل، عن ابن قُسَيط، عن سعيد بن المسيّب، عن بعض أزواجِ النبيِّ صلى الله عليه وسلم قالت: لأَن أُضحِّيَ بجَذَعٍ من الضَّأْن، أحبُّ إليَّ من أن أضحِّيَ بمُسِنَّة من المَعْز [2].رواه محمد بن إسحاق القرشي عن يزيد بن عبد الله بن قُسيط، وسمَّى الصحابيةَ أمَّ سَلَمة:
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ভেড়ার একটি ‘জাযা’ (Jadh’a, যা কুরবানীর জন্য যথেষ্ট) কুরবানী করা আমার কাছে ছাগলের একটি ‘মুসিন্নাহ’ (Musinnah, পূর্ণ বয়স্ক) কুরবানী করার চেয়ে অধিক প্রিয়।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: بن.
[2] خبر صحيح، عبد الرحمن بن سلمان -وهو الحَجْري المصري- وإن كان ليِّنًا توبع. ابن قسيط: هو يزيد بن عبد الله بن قسيط.وأخرجه البيهقي 9/ 271 من طريق الوليد بن كثير المخزومي، عن يزيد بن عبد الله بن قسيط، بهذا الإسناد. وسنده صحيح.
7733 - حَدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أبو المثنّى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا عبد الأعلى، حدثنا محمد بن إسحاق، حدثنا يزيد بن عبد الله بن قُسَيط، عن سعيد ابن المسيّب، عن أمِّ سَلَمة زوجِ النبيِّ صلى الله عليه وسلم، قالت: لأَن أُضحِّيَ بجَذَع من الضَّأْن، أحبُّ إليَّ من أن أُضحِّيَ بمُسِنَّة من المَعْز [1].وقد أُسنِد هذا الحديثُ عن أبي هريرة:
উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন, আমার কাছে একটি মেষের জাযাআহ (কুরবানীর উপযুক্ত কম বয়সী পশু) কুরবানী করা একটি ছাগলের মুসিন্না (এক বছর বা তার চেয়ে বেশি বয়সের পূর্ণাঙ্গ পশু) কুরবানী করার চেয়েও বেশি প্রিয়। এবং এই হাদীসটি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও বর্ণিত হয়েছে।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] خبر صحيح كسابقه، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن إسحاق: وهو ابن يسار.
7734 - حدَّثَناه الشيخ أبو بكر، أخبرنا عبيد بن شَريك البزَّار، حدثنا أبو الجُمَاهر محمد بن عثمان التَّنُوخي، حدثنا عبد العزيز بن محمد الدَّراوَرْدي، عن أبي ثِفَال، عن رَبَاح بن عبد الرحمن [1]، عن أبي هريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "دَمُ عَفْراء أحبُّ إليَّ من دمِ سَوداوينِ" [2].
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "একটি হালকা সাদা রঙের (পশুর) রক্ত আমার কাছে দুটি কালো রঙের (পশুর) রক্তের চেয়ে অধিক প্রিয়।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: عبد الله.
[2] إسناده ضعيف، أبو ثِفال -واسمه ثمامة بن وائل بن حصين- ورباح بن عبد الرحمن- وهو ابن أبي سفيان بن حُويطب - روى عنهما جمع وذكرهما ابن حبان في "الثقات"، بينما قال أبو حاتم الرازي - كما في "العلل" لابنه (129) -: أبو ثفال مجهول، ورباح مجهول. وعدَّ البزارُ ثمامةَ مشهورًا.وأخرجه أحمد 15/ (9404) عن قتيبة بن سعيد، عن عبد العزيز الدراوردي، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الرزاق (8165) عن سفيان الثوري، والبخاري في "التاريخ الكبير" 4/ 197 من طريق شعبة، كلاهما عن توبة العنبري، عن سُلمى بن عتاب، عن أبي هريرة موقوفًا. وقال البخاري عقبه: ويرفعه بعضهم ولا يصح. قلنا: وسلمى مجهول.قوله: "دم عفراء … إلخ" المقصود تفضيل الضأن على المعز الذي يغلب على لونه السواد، وليس المقصود مجرد اللون مع اتحاد النوع كما ذهب إليه بعض الشراح.
7735 - حدثنا أبو بكر، عن عُبيد [1]، حدثنا علي بن زيد الفرائضي، حدثنا إسحاق بن إبراهيم الحُنَيني عن داود بن قيس، عن أبي ثِفَال، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الجَذَعُ من الضَّأْن خيرٌ من السيِّد من المَعْز" [2].
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ছাগলের বয়স্কটার (সায়্যিদ) চেয়ে ভেড়ার বাচ্চা (জাযা) উত্তম।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في النسخ الخطية غير (ص): أبو بكر بن عبيدة، وفي (ص): أبو بكر بن عبيد، ولم نقف على راو بهذا الاسم، ويغلب على ظننا أنَّ الصواب ما أثبتنا كالإسناد السابق.
[2] إسناده ضعيف، إسحاق بن إبراهيم الحنيني ضعيف، وأبو ثفال سبق الكلام عليه في الحديث السابق، كما انفرد داود بن قيس بروايته بهذا اللفظ - كما يفيده كلام الدارقطني في "العلل" (2038) - وقد تابعه عبد الله بن عبد العزيز الليثي عن أبي ثفال عن أبي هريرة، لكن باللفظ الذي رواه الدراوردي في الحديث السابق، كما أنَّ الواسطة بين أبي ثفال وأبي هريرة سقطت.وأخرجه أحمد 15/ (9227) عن عتاب بن زياد عن عبد الله بن المبارك، عن داود بن قيس، بهذا الإسناد.وانظر ما سلف برقم (7716).
7736 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الربيع بن سليمان، حدثنا أسَد بن موسى، حدثنا قَزَعةُ بن سُوَيد، حدثني الحجَّاج [1] بن الحجَّاج، عن سَلَمة ابن جُنَادة، عن حَنَش بن الحارث، حدثني أبو هريرة: أنَّ رجلًا أتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم بجَذَعٍ من الضَّأْن مهزولٍ خَسيس، وجَذَع من المَعْز سمين يسيرٍ [2]، فقال: يا رسولَ الله، هو خيرُهما، أفأُضحِّي به؟ فقال: "ضحِّ به، فإنَّ الله أَعنُزًا" [3].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একটি দুর্বল, ক্ষীণকায় ভেড়ার বাচ্ছা এবং একটি মোটা, অল্পবয়সী ছাগলের বাচ্ছা নিয়ে এল। এরপর সে বলল: ‘হে আল্লাহর রাসূল! এটি উভয়ের মধ্যে উত্তম। আমি কি এটি দ্বারা কুরবানি করব?’ তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ‘তুমি এটি দ্বারা কুরবানি করো, কেননা আল্লাহ অবশ্যই ছাগলকে (গ্রহণ করেন)।’
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] وقع في النسخ الخطية: جماح، والتصويب من "التلخيص" و "إتحاف المهرة" (18011)، و "مسند أبي يعلى". وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 1/ 235 من طريق محمد بن خالد ابن عثمة، عن إبراهيم بن إسماعيل بن أبي حبيبة، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه الطبراني في "الكبير" (11561) من طريق إسحاق بن محمد الفروي، عن إبراهيم ابن إسماعيل بن أبي حبيبة، عن داود بن حصين، عن عكرمة، عن ابن عباس.وأخرجه أحمد 5/ (2802) عن حجاج بن محمد، عن ابن جريج قال: أخبرني عكرمة، عن ابن عباس، فذكره. وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن نرى أن حجاج بن محمد وهمَ في ذكر تصريح ابن جريج بالإخبار، فقد نصَّ ابنُ المديني على أنه لم يلق عكرمة وفاتنا أن ننبّه على ذلك في "المسند"، فليستدرك.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (11504) وفي "الأوسط" (8974) من طريق ابن لهيعة، عن أبي الأسود محمد بن عبد الرحمن، عن عكرمة عن ابن عباس: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أعطى سعد ابن أبي وقاص جَذَعًا من المعز، فأمره أن يضحي به.وسلف عند المصنف ضمن حديث برقم (1760 م) من طريق عطاء بن أبي رباح عن ابن عباس بسند حسن.
[2] كذا في النسخ، ولم ترد هذه اللفظة في "التلخيص"، وفي "مسند أبي يعلى": سيِّد، ونظنه هو الصحيح. وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 1/ 235 من طريق محمد بن خالد ابن عثمة، عن إبراهيم بن إسماعيل بن أبي حبيبة، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه الطبراني في "الكبير" (11561) من طريق إسحاق بن محمد الفروي، عن إبراهيم ابن إسماعيل بن أبي حبيبة، عن داود بن حصين، عن عكرمة، عن ابن عباس.وأخرجه أحمد 5/ (2802) عن حجاج بن محمد، عن ابن جريج قال: أخبرني عكرمة، عن ابن عباس، فذكره. وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن نرى أن حجاج بن محمد وهمَ في ذكر تصريح ابن جريج بالإخبار، فقد نصَّ ابنُ المديني على أنه لم يلق عكرمة وفاتنا أن ننبّه على ذلك في "المسند"، فليستدرك.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (11504) وفي "الأوسط" (8974) من طريق ابن لهيعة، عن أبي الأسود محمد بن عبد الرحمن، عن عكرمة عن ابن عباس: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أعطى سعد ابن أبي وقاص جَذَعًا من المعز، فأمره أن يضحي به.وسلف عند المصنف ضمن حديث برقم (1760 م) من طريق عطاء بن أبي رباح عن ابن عباس بسند حسن.
7736 [3] - إسناده ضعيف، قزعة بن سويد ضعيف، وسلمة بن جنادة روى عنه ثلاثة ولم يؤثر توثيقه عن غير ابن حبان، وحنش بن الحارث كذا جاء مسمى في رواية الحاكم ولم نجد من سمى أباه الحارث، وكلُّ من ترجم له سماه حنشًا العبدي كالبخاري في "التاريخ الكبير" 3/ 100 و 4/ 81، وابن أبي حاتم 3/ 291، وابن حبان في "الثقات"4/ 184، والدارقطني في "المؤتلف" 2/ 700، وحنش هذا لم يذكروا في الرواة عنه سوى سلمة بن جنادة، ولم يوثقه معتبَر، فهو في عداد المجهولين.وأخرجه أبو يعلى (6223) عن بشر بن الوليد عن قزعة بن سويد بهذا الإسناد. ولفظه في آخره: "فإنَّ الله الخير". وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 1/ 235 من طريق محمد بن خالد ابن عثمة، عن إبراهيم بن إسماعيل بن أبي حبيبة، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه الطبراني في "الكبير" (11561) من طريق إسحاق بن محمد الفروي، عن إبراهيم ابن إسماعيل بن أبي حبيبة، عن داود بن حصين، عن عكرمة، عن ابن عباس.وأخرجه أحمد 5/ (2802) عن حجاج بن محمد، عن ابن جريج قال: أخبرني عكرمة، عن ابن عباس، فذكره. وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن نرى أن حجاج بن محمد وهمَ في ذكر تصريح ابن جريج بالإخبار، فقد نصَّ ابنُ المديني على أنه لم يلق عكرمة وفاتنا أن ننبّه على ذلك في "المسند"، فليستدرك.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (11504) وفي "الأوسط" (8974) من طريق ابن لهيعة، عن أبي الأسود محمد بن عبد الرحمن، عن عكرمة عن ابن عباس: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أعطى سعد ابن أبي وقاص جَذَعًا من المعز، فأمره أن يضحي به.وسلف عند المصنف ضمن حديث برقم (1760 م) من طريق عطاء بن أبي رباح عن ابن عباس بسند حسن.
7737 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الشَّيباني، حدثنا علي بن الحسن الهِلالي، حدثنا محمد بن جَهْضَم، حدثنا إبراهيم بن إسماعيل بن أبي حَبيبة الأشهَلي، عن داود بن الحُصَين، عن القاسم بن محمد، عن عائشة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بعث إلى سعد بن أبي وقّاص بقَطيع من غَنَمٍ، فقَسَمَها بين أصحابه، فبقي منها تيسٌ، فضحَّى به في عُمرِته [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সা’দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট এক পাল বকরি পাঠালেন। অতঃপর তিনি তা তাঁর সাহাবীদের মধ্যে ভাগ করে দিলেন। এরপরও তার মধ্য থেকে একটি পাঁঠা অবশিষ্ট রয়ে গেল। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা দ্বারা তাঁর উমরাহর সময় কুরবানী করলেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث حسن لكن من حديث ابن عباس لا من حديث عائشة كما سيأتي، وهذا إسناد ضعيف من أجل إبراهيم بن إسماعيل بن أبي حبيبة، وقد اضطرب فيه فمرةً جعله من مسند عائشة كما في هذه الرواية، ومرة جعله من مسند ابن عباس، وهو الأصح كما سيأتي. وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 1/ 235 من طريق محمد بن خالد ابن عثمة، عن إبراهيم بن إسماعيل بن أبي حبيبة، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه الطبراني في "الكبير" (11561) من طريق إسحاق بن محمد الفروي، عن إبراهيم ابن إسماعيل بن أبي حبيبة، عن داود بن حصين، عن عكرمة، عن ابن عباس.وأخرجه أحمد 5/ (2802) عن حجاج بن محمد، عن ابن جريج قال: أخبرني عكرمة، عن ابن عباس، فذكره. وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن نرى أن حجاج بن محمد وهمَ في ذكر تصريح ابن جريج بالإخبار، فقد نصَّ ابنُ المديني على أنه لم يلق عكرمة وفاتنا أن ننبّه على ذلك في "المسند"، فليستدرك.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (11504) وفي "الأوسط" (8974) من طريق ابن لهيعة، عن أبي الأسود محمد بن عبد الرحمن، عن عكرمة عن ابن عباس: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أعطى سعد ابن أبي وقاص جَذَعًا من المعز، فأمره أن يضحي به.وسلف عند المصنف ضمن حديث برقم (1760 م) من طريق عطاء بن أبي رباح عن ابن عباس بسند حسن.
7738 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا وكيع، عن سفيان، عن عبد الله بن محمد بن عَقيل، عن أبي سَلَمة ابن عبد الرحمن، عن عائشة أو [1] أبي هريرة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم ضَحَّى بِكَبَشَينِ سَمِينَينِ عظيمَينِ أمْلَحَينِ أقرنَينِ مَوْجِيَّينِ، فذبح أحدَهما فقال: "اللهمَّ عن محمّدٍ وأهلِ بيتِه"، وذَبَح الآخر فقال: "اللهمَّ عن محمّدٍ وأُمَّتِه مَن شَهِدَ لك بالتوحيد، وشَهِدَ لي بالبَلَاغ" [2].
আয়িশা অথবা আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুটি মোটাতাজা, বিশাল, সাদা-কালো (ধূসর বর্ণের), শিংওয়ালা এবং খাসি করা মেষ দ্বারা কুরবানি করলেন। তিনি সেগুলোর একটি যবেহ করলেন এবং বললেন: "হে আল্লাহ! এটি মুহাম্মাদ এবং তাঁর আহলে বাইতের পক্ষ থেকে।" আর অপরটি যবেহ করলেন এবং বললেন: "হে আল্লাহ! এটি মুহাম্মাদ এবং তাঁর উম্মতের পক্ষ থেকে, যারা তোমার একত্ববাদের সাক্ষ্য দিয়েছে এবং আমার রিসালাত (বার্তা পৌঁছে দেওয়া) এর সাক্ষ্য দিয়েছে।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في النسخ الخطية: وأبي هريرة، والمثبت من "مسند أحمد" ومصادر التخريج التي ذكرت هناك. وهو في "مسند أحمد" 41/ (25046). وانظر "علل ابن أبي حاتم" (1599)، و "علل الدارقطني" (1792).وأخرجه أحمد 43/ (25886)، وابن ماجه (3122) من طريق عبد الرزاق، عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 43/ (25843) عن إسحاق بن يوسف، عن سفيان الثَّوري، عن ابن عقيل، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، أنَّ عائشة قالت، فذكرته. فصار من حديث أبي هريرة عن عائشة.وأخرج أحمد 4/ (2449)، ومسلم (1967)، وأبو داود (2792)، وابن حبان (5915) من طريق يزيد بن عبد الله بن قسيط، عن عروة بن الزبير، عن ئشة: أَنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أمر بكبش أقرن، يطأ في سواد، ويبرك في سواد، وينظر في سواد فأُتي به ليضحيَ به، فقال لها: "يا عائشة، هلمّي المُدْية" ثم قال: "اشحَذيها بحجر" ففعلت ثم أخذها وأخذ الكبش فأضجعه ثم ذبحه، ثم قال: "باسم الله، اللهم تقبل من محمد وآل محمد، ومن أمّة محمد"، ثم ضحَّى به، وسنده حسن.وفي باب الكبشين المَوجيّين عن أبي الدرداء عند أحمد 36/ (21713)، وسنده ضعيف، وانظر تتمة الكلام عليه هناك.وفي باب تضحيته صلى الله عليه وسلم بكبشين أملحين أقرنين عن أنس بن مالك عند البخاري (5554)، ومسلم (1966).
[2] صحيح لغيره دون قوله: "موجيّين"، وهذا إسناد اضطرب فيه عبد الله بن محمد بن عقيل وهو ليِّن، وقد ذكرنا طرقَ حديثه هذا واضطرابه فيه في "مسند أحمد" عند الحديث (25046)، وفاتنا هناك أن نستثني من التصحيح لفظة "موجيّين"، فليستدرك من هنا، والوجاء هو الخِصاء، والمعروف أنَّ الكبش كان فَحيلًا كما في حديث أبي سعيد التالي. سفيان: هو الثَّوري. وهو في "مسند أحمد" 41/ (25046). وانظر "علل ابن أبي حاتم" (1599)، و "علل الدارقطني" (1792).وأخرجه أحمد 43/ (25886)، وابن ماجه (3122) من طريق عبد الرزاق، عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 43/ (25843) عن إسحاق بن يوسف، عن سفيان الثَّوري، عن ابن عقيل، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، أنَّ عائشة قالت، فذكرته. فصار من حديث أبي هريرة عن عائشة.وأخرج أحمد 4/ (2449)، ومسلم (1967)، وأبو داود (2792)، وابن حبان (5915) من طريق يزيد بن عبد الله بن قسيط، عن عروة بن الزبير، عن ئشة: أَنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أمر بكبش أقرن، يطأ في سواد، ويبرك في سواد، وينظر في سواد فأُتي به ليضحيَ به، فقال لها: "يا عائشة، هلمّي المُدْية" ثم قال: "اشحَذيها بحجر" ففعلت ثم أخذها وأخذ الكبش فأضجعه ثم ذبحه، ثم قال: "باسم الله، اللهم تقبل من محمد وآل محمد، ومن أمّة محمد"، ثم ضحَّى به، وسنده حسن.وفي باب الكبشين المَوجيّين عن أبي الدرداء عند أحمد 36/ (21713)، وسنده ضعيف، وانظر تتمة الكلام عليه هناك.وفي باب تضحيته صلى الله عليه وسلم بكبشين أملحين أقرنين عن أنس بن مالك عند البخاري (5554)، ومسلم (1966).