আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
7759 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا سعيد بن إياس الجُرَيري، عن أبي نَضْرة، عن أبي سعيد الخُدْري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا أهلَ المدينة، لا تأكلوا لحمَ الأضاحيِّ فوقَ ثلاثةِ أيام"، فشكوا ذلك إلى النبيِّ صلى الله عليه وسلم أن لهم عِيالًا وحَشَمًا وخَدَمًا، فقال: "كُلُوا وأَطْعِمُوا واحبِسُوا" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে মদীনার অধিবাসীরা, তোমরা তিন দিনের বেশি কুরবানীর গোশত খাবে না।" অতঃপর তারা (সাহাবীরা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এই বিষয়ে অভিযোগ করলেন যে, তাদের পরিবার, আশ্রিত (লোক) ও সেবক রয়েছে। তখন তিনি বললেন: "তোমরা খাও, খাওয়াও এবং সংরক্ষণ করো।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، رجاله ثقات ورواية يزيد بن هارون عن سعيد الجريري وإن كانت بعد اختلاطه، تابعه عليه عن سعيد من رواه قبل اختلاطه، وقد توبع سعيد أيضًا. أبو نضرة: هو المنذر ابن مالك بن قِطْعة.وأخرجه أحمد 18/ (11811)، ومسلم (1973)، وابن حبان (5928) من طرق عن سعيد ابن إياس الجريري، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 17/ (11179) والنسائي (4502)، وابن حبان (5926) من طريق زينب بنت كعب، عن أبي سعيد.وأخرجه أحمد 18/ (11543) من طريق أيوب السختياني، والنسائي (4508) من طريق عبد الله ابن عون، كلاهما عن محمد بن سيرين، عن أبي سعيد. ويغلب على ظننا أنَّ ابن سِيرِين لم يسمع أبا سعيد.فقد رواه يزيد بن إبراهيم التُّستري -وهو ثقة- عن محمد بن سِيرِين، عن أبي العلانية، عن أبي سعيد. أخرجه أحمد 45/ (27157)، وأبو العلانية وثّقه أبو داود والبزار.وانظر ما بعده، وما سلف برقم (1402). وأخرجه أحمد 26/ (16213) و 45/ (27156) عن أبي عامر العقدي عبد الملك بن عمرو، بهذا الإسناد.وأخرجه أيضًا 18/ (11449) و 45/ (27156) عن عبد الرحمن بن مهدي، عن زهير بن محمد، به.وانظر ما قبله.وأخرج البخاري (3997) و (5568)، والنسائي (4501) من طريق عبد الله بن خبّاب، عن أبي سعيد الخدري: أنه قدم من سفر، فقدَّم إليه أهله لحمًا من لحوم الأضاحيّ، فقال: ما أنا بآكله حتى أسأل، فانطلق إلى أخيه لأمّه -وكان بدريًا- قتادة بن النعمان، فسأله فقال: إنه حَدَثَ بعدك أمرٌ نقضٌ لما كانوا يُنهَون عنه من أكل لحوم الأضاحيّ بعد ثلاثة أيام. وهو في "مسند أحمد" 26/ (16214) بنحوه.
7760 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا أبو عامر العَقَدي، حدثنا زهير بن محمد، عن شَريك بن عبد الله بن أبي نَمِرٍ، عن عبد الرحمن بن أبي سعيد الخُدْري، عن أبيه وعمِّه قَتَادة بن النُّعمان، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "كُلُوا الأضاحيَّ وادَّخِروا" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.آخر كتاب الأضاحيّ كتاب الذبائحبسم الله الرحمن الرحيم
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও তাঁর চাচা ক্বাতাদাহ ইবনু নু’মান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমরা কুরবানীর মাংস খাও এবং তা সংরক্ষণ করো।”
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده عن أبي سعيد صحيح، وعن قتادة بن النعمان منقطع، لأنَّ عبد الرحمن بن أبي سعيد لم يدركه. أبو عامر العقدي: عبد الملك بن عمرو. وأخرجه أحمد 26/ (16213) و 45/ (27156) عن أبي عامر العقدي عبد الملك بن عمرو، بهذا الإسناد.وأخرجه أيضًا 18/ (11449) و 45/ (27156) عن عبد الرحمن بن مهدي، عن زهير بن محمد، به.وانظر ما قبله.وأخرج البخاري (3997) و (5568)، والنسائي (4501) من طريق عبد الله بن خبّاب، عن أبي سعيد الخدري: أنه قدم من سفر، فقدَّم إليه أهله لحمًا من لحوم الأضاحيّ، فقال: ما أنا بآكله حتى أسأل، فانطلق إلى أخيه لأمّه -وكان بدريًا- قتادة بن النعمان، فسأله فقال: إنه حَدَثَ بعدك أمرٌ نقضٌ لما كانوا يُنهَون عنه من أكل لحوم الأضاحيّ بعد ثلاثة أيام. وهو في "مسند أحمد" 26/ (16214) بنحوه.
7761 - حدثنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا زياد بن الخليل التُّسْتَري، حدثنا عبد الرحمن بن المبارك، حدثنا حمّاد بن زيد عن عاصم، عن عِكْرمة، عن ابن عباس: أنَّ رجلًا أضجَعَ شاةً يريدُ أن يذبحَها، وهو يَحُدُّ شَفْرتَه، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "أتريدُ أن تُمِيتَها مَوْتاتٍ، هلَّا حَدَدتَ شَفْرتَك قبل أن تُضجِعَها؟! " [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি একটি বকরীকে যবেহ করার উদ্দেশ্যে শোয়াচ্ছিল, আর সে তখন তার ছুরি ধার দিচ্ছিল। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তুমি কি এটিকে একাধিকবার মৃত্যু দিতে চাও? কেন তুমি এটাকে শোয়ানোর আগে তোমার ছুরি ধার দাওনি?!"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل زياد بن الخليل، وقد توبع فيما سلف برقم (7754).
7762 - حدثنا عمرو بن محمد بن منصور العَدْل، حدثنا السَّرِي بن خُزيمة، حدثنا مسلم بن إبراهيم، حدثنا شُعبة، عن سليمان، عن أبي ظَبْيان، عن ابن عباس أنه قال: يقول الله تبارك وتعالى: {فَاذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ عَلَيْهَا صَوَافَّ} [الحج: 63]، قال: قِيامًا على ثلاثِ قوائم معقولةً: باسم الله والله أكبر، اللهمَّ منك وإليك [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তা’আলা বলেন: "সুতরাং সারিবদ্ধভাবে সেগুলোর উপর আল্লাহর নাম উচ্চারণ কর।" [সূরা হাজ্জ: ৩৬]। তিনি বলেন, এর অর্থ হলো, (কুরবানীর পশু) তিন পায়ে দাঁড়ানো থাকবে এবং (চতুর্থ পা) বাঁধা থাকবে। (তখন বলবে): ‘বিসমিল্লাহি ওয়াল্লাহু আকবার, আল্লাহুম্মা মিনকা ওয়া ইলাইকা’ (আল্লাহর নামে, আল্লাহ মহান, হে আল্লাহ! তোমার পক্ষ থেকে এবং তোমারই দিকে)।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح. مسلم بن إبراهيم: هو الأزدي البصري، وسليمان هو ابن مهران الأعمش، وأبو ظبيان: هو حُصين بن جندب.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 17/ 164 من طريق محمد بن إبراهيم بن أبي عدي، عن شعبة، بهذا الإسناد.وسلف برقم (3507).
7763 - أخبرنا محمد بن أحمد بن تَميم [1] القَنْطري، حدثنا أبو قِلابة، حدثنا أبو عاصم، أخبرنا ابن جُرَيج عن عمرو بن دينار، عن جابر بن زيد وعِكْرمة، عن ابن عباس في رجلٍ ذبح ونَسِيَ أن يُسمِّي، قال: يأكلُ، وفي المَجُوسيِّ يذبحُ ويُسمِّي، قال: لا يأكلُ [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে ব্যক্তি পশু যবেহ করেছে কিন্তু ‘বিসমিল্লাহ’ বলতে ভুলে গেছে, সে সম্পর্কে তিনি (ইবনে আব্বাস) বলেন: সে তা খেতে পারে। আর এমন অগ্নিপূজক (মাযূসী) সম্পর্কে, যে যবেহ করেছে এবং ‘বিসমিল্লাহ’ বলেছে, তিনি বলেন: সে তা খেতে পারবে না।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: غنم.
[2] خبر صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات غير أبي قلابة -وهو عبد الملك بن محمد بن عبد الله الرقاشي- فلا بأس به، إلّا أنه تغير حفظه لما قدم بغداد، فرواية البغداديين عنه يقع فيها وهمٌ، وهذا منها، ولم نقف على هذا الطريق عند غير المصنِّف، ورواه سفيان بن عيينة عن عمرو بن دينار، فجعله من رواية جابر بن زيد -وهو أبو الشعثاء- عن عكرمة عن ابن عباس، وهذا الطريق أصح.وأخرجه عبد الرزاق (8548)، والحميدي كما في "المطالب العالية" (2319)، وسعيد بن منصور في قسم التفسير من "سننه" (914)، ومن طريقه الدارقطني (4805)، والبيهقي 9/ 239 و 239 - 240 من طرق سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن جابر أبي الشعثاء، عن عَيْن -وهو عكرمة عن ابن عباس بنحوه قال ابن حجر في "فتح الباري" 17/ 53: سنده صحيح.وأخرجه عبد الرزاق (8538) عن معمر، عن أيوب السختياني، عن عكرمة، عن ابن عباس قال: المسلم اسمٌ من أسماء الله، فإذا نسي أحدكم أن يسمي على الذبيحة فليسمِّ وليأكل. وسنده صحيح.وأخرجه بنحوه عبد الرزاق (8541)، وسعيد بن منصور (915)، والبيهقي 9/ 240 من طريق يزيد بن أبي زياد، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس. ويزيد ضعيف.وأخرجه مالك في "الموطأ برواية أبي مصعب الزهري (2142) عن يحيى بن سعيد الأنصاري: أنَّ ابن عباس سئل عن الذي ينسى أن يسمي الله على ذبيحته، فقال: يسمّي الله ويأكل، ولا بأس عليه. ورجاله ثقات لكنه منقطع بين يحيى وابن عباس.وأخرجه الدارقطني (4808)، والبيهقي 9/ 239 من طريق محمد بن يزيد بن سنان، عن معقل ابن عبيد الله، عن عمرو بن دينار، عن عكرمة، عن ابن عباس مرفوعًا: "المسلم يكفيه اسمه، فإن نسي أن يسمّي حين يذبح فليذكر اسمَ الله وليأكله". وسنده ضعيف من أجل ابن سنان، وخالف الناس إذ رفعه.
7764 - أخبرني أحمد بن محمد بن سَلَمة العَنَزي، حدثنا معاذ بن نَجْدة [1] القرشي، حدثنا قَبِيصة بن عُقْبة، حدثنا سفيان، عن هارون بن أبي وَكيع -وهو هارون ابن عَنترَة- عن أبيه، عن ابن عباس في قول الله عز وجل: {وَلَا تَأْكُلُوا مِمَّا لَمْ يُذْكَرِ اسْمُ اللَّهِ عَلَيْهِ} [الأنعام: 121]، قال: خاصَمَهم المشركون، فقالوا: ما قَتَلُوا أَكلوا، وما قَتلَ اللهُ لم يأكلوا [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তাআলার এই বাণী সম্পর্কে: "আর তোমরা তা থেকে খেয়ো না, যার উপর আল্লাহর নাম উচ্চারিত হয়নি।" [সূরা আল-আন'আম: ১২১] তিনি বলেন: মুশরিকরা তাদের (মুসলিমদের) সাথে তর্ক করেছিল। তারা বলেছিল: যা তোমরা হত্যা করো, তা তোমরা খাও; কিন্তু যা আল্লাহ হত্যা করেন (অর্থাৎ স্বাভাবিকভাবে মারা যায়), তা তোমরা খাও না!
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرف في النسخ الخطية إلى: نجد.
[2] صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل معاذ بن نجدة القرشي وهارون بن أبي وكيع. سفيان: هو الثَّوري.وأخرجه النسائي (4511) و (1106) من طريق يحيى بن سعيد القطان، عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.وانظر (7282) و (7755). حبان (5894)، وفي سنده صالح بن دينار روى عنه اثنان وذكره ابن حبان في "الثقات"، فحديثه حسن في المتابعات والشواهد إن شاء الله.
7765 - أخبرني علي بن عيسى الحِيَري، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا ابن أبي عمر حدثنا سفيان، حدثنا عمرو بن دينار، قال: سمعتُ صُهيبًا مولى ابن عامر يُخبر، أنَّ عبد الله بن عمرو أخبره عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم قال: "ما مِن إنسانٍ يقتُلَ عُصفورًا فما فوقَها بغير حقِّها، إلَّا سأله الله عز وجل عنها يومَ القيامة" قيل: يا رسولَ الله، وما حقُّها؟ قال: "حقُّها أن يَذبحَها فيأكلَها [1]، ولا يقطع رأسَها فيَرميَ به" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো মানুষ যদি একটি চড়ুই বা তার চেয়ে বড় কোনো প্রাণীও অন্যায়ভাবে হত্যা করে, তবে আল্লাহ তা‘আলা কিয়ামতের দিন অবশ্যই তাকে সে সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করবেন।" বলা হলো, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! তার হক কী? তিনি বললেন, "তার হক হলো, সেটিকে যবেহ করে খাওয়া, আর তার মাথা কেটে ফেলে না দেওয়া।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في النسخ الخطية: فلا يأكلها، وهو تحريف قبيح، وجاء على الصواب في "تلخيص الذهبي". حبان (5894)، وفي سنده صالح بن دينار روى عنه اثنان وذكره ابن حبان في "الثقات"، فحديثه حسن في المتابعات والشواهد إن شاء الله.
[2] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة صهيب مولى ابن عامر، فلم يرو عنه غير عمرو ابن دينار، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وفرَّق بينه وبين أبي موسى الحذاءِ البخاريُّ وأبو حاتم وابن حبان، وذكره المزي في كنى "التهذيب"، وقال في الثاني: يحتمل أن يكون هو والذي قبله واحدًا، وتبعه ابن حجر، بينما جزم الذهبي في "الميزان" بأنهما واحد، وقال: ويكون صدوقًا.وأخرجه النسائي (4519) عن قتيبة بن سعيد، و (4841) عن محمد بن عبد الله بن يزيد المقرئ، كلاهما عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 11/ (6550) و (6960) من طريق شعبة، و (6551) و (6861) من طريق حماد بن سلمة، كلاهما عن عمرو بن دينار، به.وله شاهد من حديث الشَّريد بن سويد عند أحمد 32/ (19470)، والنسائي (4520)، وابن حبان (5894)، وفي سنده صالح بن دينار روى عنه اثنان وذكره ابن حبان في "الثقات"، فحديثه حسن في المتابعات والشواهد إن شاء الله.
7766 - أخبرنا أحمد بن جعفر القطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شُعبة، عن المِنهال بن عمرو قال: سمعتُ سعيد بن جُبَير يقول: مررتُ مع ابن عمر في طريق من طُرق المدينة، فإذا فتيةٌ قد نَصَبُوا دجاجةً يرمونها، قال: فغَضِبَ، وقال: مَن فعل هذا؟ فتفرَّقوا، فقال ابنُ عمر: لعنَ رسول الله صلى الله عليه وسلم من يُمثِّلُ بالحيوان [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة [2].
ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাঈদ ইবন জুবাইর (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে মদীনার কোনো এক রাস্তায় যাচ্ছিলাম। আমরা দেখলাম, কিছু যুবক একটি মুরগিকে বেঁধে নিশানা স্থির করেছে এবং সেটিকে লক্ষ্য করে তীর ছুঁড়ছে। তিনি (ইবন উমার) রাগান্বিত হলেন এবং বললেন, "এ কাজ কে করেছে?" (তাঁর রাগ দেখে) তারা ছত্রভঙ্গ হয়ে গেল। অতঃপর ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেই ব্যক্তিকে অভিশাপ (লা'নত) করেছেন, যে জীব-জন্তুকে বিকৃত করে বা অঙ্গহানি করে।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح. وهو في "مسند أحمد" 5/ (3133) و 9/ (5018).وأخرجه أحمد 9 (5801)، والنسائي (4516)، وابن حبان (5617) من طرق عن شعبة، بهذاالإسناد.وأخرجه أحمد 8/ (4622) و 9/ (5247) من طريق الأعمش، عن المنهال بن عمرو، به.وأخرجه بنحوه أحمد 9/ (5587) و 10/ (6259)، والبخاري (5515)، ومسلم (1958)، والنسائي (4515) من طريق أبي بشر جعفر بن أبي وحشية، عن سعيد بن جبير، به. بلفظ: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لعن من فعل هذا.وأخرج أحمد 9/ (5682)، والبخاري (5514) من طريق سعيد بن عمرو بن سعيد بن العاص، عن ابن عمر قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم ينهى أن تُصبَر بهيمة أو غيرها لقتل. وفيه قصة.وأخرج أحمد 9/ (5661) و 10/ (5956) من طريق أبي صالح الحنفي، عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، يُراه ابنَ عمر قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "من مَثَّل بذي رُوح ثم لم يتب، مثَّل اللهُ به يوم القيامة". وفي سنده ضعف.
[2] لعلَّ المصنف أراد أن يفرِّق هنا بين لفظي المنهال بن عمرو وجعفر بن أبي وحشية، فالأول لم يخرج الشيخان حديثه بخلاف الثاني، إلَّا أنَّ البخاري قد علَّق رواية المنهال بن عمرو بإثر الحديث (5515) من طريق سليمان بن حرب عن شعبة.
7767 - أخبرني محمد بن يزيد العدل، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا هلال بن بِشر، حدثنا أبو خَلَف عبد الله بن عيسى الخزَّاز، عن يونس بن عُبيد، عن عِكرِمة، عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأبي الهيثم بن التَّيِّهان: "إِيَّاكَ واللَّبُونَ، اذبَحْ لنا عناقًا"، فأمر أبو الهيثم امرأتَه فعَجَنَتْ لهم عجينًا، وقطَّع أبو الهيثم اللحمَ، وطبخَ وشَوَى [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ আল-হাইসাম ইবনু আল-তাইয়্যিহানকে বললেন: "দুগ্ধবতী পশু যবেহ করা থেকে বিরত থেকো। বরং আমাদের জন্য একটি বকরির বাচ্চা যবেহ করো।" অতঃপর আবূ আল-হাইসাম তার স্ত্রীকে আদেশ করলে সে তাদের জন্য আটা মাখল। আর আবূ আল-হাইসাম মাংস কাটলেন, রান্না করলেন এবং ভুনা করলেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف عبد الله بن عيسى الخزاز. وهذا الحديث قطعة من الحديث المطول السالف برقم (5334).قوله: "إياكَ واللَّبون" يحذّره من ذبح اللبون، وهي ذات الدَّرِّ كما في الرواية التالية، لكونها ترضع صغارها، وكذلك ليُفيدوا من لبنها. وأخرجه أحمد 11/ (6488) و (6831) و (6853)، والبخاري (2631)، وأبو داود (683)، وابن حبان (5095) من طرق عن الأوزاعي، بهذا الإسناد. وعند البخاري وأبي داود زيادة: قال حسان: فعددنا ما دون مَنيحة العنز من ردِّ السلام، وتشميت العاطس، وإماطة الأذى عن الطريق، ونحوه، فما استطعنا أن نبلغ خمس عشرة خصلة.واستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.
7768 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا عُبيد الله بن موسى، حدثنا الرَّبيع بن حبيب، عن نَوفَل بن عبد الملك، عن أبيه، عن علي، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم: أنه نَهَى عن ذبح ذواتِ الدَّرِّ، وعن السَّوْم بالسِّلعة قبل طلوعِ الشَّمس [1].
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুধ প্রদানকারী প্রাণী যবেহ করতে এবং সূর্যোদয়ের পূর্বে পণ্য নিয়ে দরদাম করতে নিষেধ করেছেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف، الربيع بن حبيب الأكثر على تضعيفه، ونوفل بن عبد الملك قال ابن معين: ليس بشيء، وجهّله أبو حاتم.وأخرجه ابن ماجه (2206) عن علي بن محمد وسهل بن أبي سهل، عن عبيد الله بن موسى، بهذا الإسناد.قوله: "عن السَّوم بالسلعة قبل طلوع الشمس" قال السيوطي في شرحه على "سنن ابن ماجه": لأنه وقت ذكر الله لا يشتغل فيه بشيء غيره. وقيل: يجوز أن يكون من رعي الإبل لأنها إن رعت قبل طلوع الشمس -والمرعى نَدٍ- أصابها منه الوباء، وربما قتلها. وأخرجه أحمد 11/ (6488) و (6831) و (6853)، والبخاري (2631)، وأبو داود (683)، وابن حبان (5095) من طرق عن الأوزاعي، بهذا الإسناد. وعند البخاري وأبي داود زيادة: قال حسان: فعددنا ما دون مَنيحة العنز من ردِّ السلام، وتشميت العاطس، وإماطة الأذى عن الطريق، ونحوه، فما استطعنا أن نبلغ خمس عشرة خصلة.واستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.
7769 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الربيع بن سليمان، حدثنا بشر بن بكر، حدثنا الأوزاعي، حدثني حسَّان بن عطيّة، حدثني أبو كَبْشة السَّلُولي، قال: سمعتُ عبد الله بن عمرو بن العاص يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أربعونَ خَصلةً أعلاهنَّ مِنْحةُ العَنْز، لا يعملُ عبدٌ بخَصْلةٍ منها رجاءَ ثوابها، وتصديقَ موعودِه، إلَّا أدخله اللهُ بها الجنَّةَ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "চল্লিশটি গুণ বা অভ্যাস রয়েছে, সেগুলোর মধ্যে সর্বোচ্চ হলো দুধের জন্য একটি ছাগী দান করা। কোনো বান্দা যদি এর মধ্য থেকে কোনো একটি অভ্যাস তার সওয়াবের প্রত্যাশায় এবং (জান্নাতের) প্রতিশ্রুতির প্রতি বিশ্বাস রেখে পালন করে, তবে আল্লাহ তাকে এর বিনিময়ে জান্নাতে প্রবেশ করাবেন।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح. بشر بن بكر: هو التنيسي، والأوزاعي: هو عبد الرحمن بن عمرو. وأخرجه أحمد 11/ (6488) و (6831) و (6853)، والبخاري (2631)، وأبو داود (683)، وابن حبان (5095) من طرق عن الأوزاعي، بهذا الإسناد. وعند البخاري وأبي داود زيادة: قال حسان: فعددنا ما دون مَنيحة العنز من ردِّ السلام، وتشميت العاطس، وإماطة الأذى عن الطريق، ونحوه، فما استطعنا أن نبلغ خمس عشرة خصلة.واستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.
7770 - أخبرنا أبو عَوْن محمد بن أحمد بن ماهان الجزّار بمكة على الصَّفَا، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا حجَّاج بن مِنهال، حدثنا حمّاد بن سَلَمة، عن حُميد، عن أبي المتوكِّل، عن جابر: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم وأصحابه مرُّوا بامرأةٍ، فذبحت لهم شاةً، واتَّخَذَتْ لهم طعامًا، فلما رجع قالت: يا رسول الله، إِنَّا اتَّخَذْنا لكم طعامًا، فادخُلوا فكُلوا، فدخلَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم وأصحابُه، وكانوا لا يَبدَؤون حتى يبدأَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم، فأخذ النبيُّ صلى الله عليه وسلم [1] لُقمةً فلم يستطع أن يُسِيغَها، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "هذه شاةٌ ذُبِحَتْ بغير إذن أهلِها"، فقالت المرأةُ [2]: يا نبيَّ الله، إنَّا لا نَحتشِمُ من آل مُعاذ ولا يَحتشِمون منَّا، أنْ نأخذَ منهم، ويأخذون منّا [3].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাহাবীগণ এক নারীর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তখন সে তাদের জন্য একটি বকরী যবেহ করল এবং তাদের জন্য খাবার তৈরি করল। যখন তারা ফিরে এলেন, তখন নারীটি বলল: হে আল্লাহর রাসূল, আমরা আপনাদের জন্য খাবার তৈরি করেছি, আপনারা প্রবেশ করুন এবং খান। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাহাবীগণ প্রবেশ করলেন। সাহাবীগণ ততক্ষণ পর্যন্ত খাওয়া শুরু করতেন না, যতক্ষণ না নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শুরু করতেন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক লোকমা গ্রহণ করলেন, কিন্তু তিনি তা গলাধঃকরণ করতে পারলেন না। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এই বকরীটি এর মালিকদের অনুমতি ছাড়া যবেহ করা হয়েছে।" তখন নারীটি বলল: হে আল্লাহর নবী, আমরা মু'আযের পরিবার-পরিজনের কাছ থেকে কিছু নিতে সংকোচ করি না এবং তারাও আমাদের কাছ থেকে কিছু নিতে সংকোচ করেন না। আমরা তাদের কাছ থেকে নিই, আর তারাও আমাদের কাছ থেকে নেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] قوله: "فأخذ النبي" سقط من (ز).
[2] قوله: هذه شاة ذبحت بغير إذن أهلها، فقالت المرأة" سقط من (ز).
7770 [3] - إسناده صحيح.وأخرجه أحمد 23/ (14785) عن عبد الصمد بن عبد الوارث، عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وسلف مختصرًا برقم (7269).
7771 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الزاهد الأصبهاني، حدثنا محمد ابن مَسْلَمة الواسطي، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا حمّاد بن سَلَمَة، عن أبي الزُّبير وعمرو بن دينار، عن جابر بن عبد الله: أنهم ذَبَحوا يومَ خيبر الحُمُر والبِغالَ والخيلَ، فنهاهم النبيُّ صلى الله عليه وسلم عن الحُمُرِ والبِغال، ولم يَنهَهُم عن الخيل [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় তারা খায়বারের দিন গাধা, খচ্চর এবং ঘোড়া জবাই করেছিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের গাধা ও খচ্চর (খেতে) নিষেধ করলেন, কিন্তু ঘোড়া (খেতে) নিষেধ করেননি।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح من جهة أبي الزبير -وهو محمد بن مسلم بن تدرس- عن جابر، وقد صرَّح بسماعه منه عند غير المصنف، وأما عمرو بن دينار عن جابر، ففي سماعه منه لهذا الحديث نظر كما سيأتي.وأخرجه أحمد 23/ (14840) و (14902)، وأبو داود (3789)، والنسائي (5272) من طريق عن حماد بن سلمة، عن أبي الزبير وحده، عن جابر.وأخرجه أحمد 22/ (14450)، ومسلم (1941)، وابن ماجه (3191)، والنسائي (4822) و (4836) و (6609)، وابن حبان (5269) و (5270) من طرق عن أبي الزبير بنحوه.وأخرجه الترمذي (1793)، والنسائي (4821) و (6608)، وابن حبان (5268) من طريق سفيان بن عيينة، والنسائي (4822) و (6609) من طريق الحسين بن واقد، كلاهما عن عمرو ابن دينار وحده عن جابر. وقال الترمذي: حسن صحيح، وهكذا روى غير واحد عن عمرو بن دينار عن جابر، ورواه حماد بن زيد عن عمرو بن دينار عن محمد بن علي عن جابر، ورواية ابن عيينة أصح، وسمعت محمدًا (يعني البخاري) يقول: سفيان بن عيينة أحفظ من حماد بن زيد.قلنا: قد صرَّح عمرو بن دينار بسماعه من جابر عن عبد الرزاق في "مصنفه" (8734)، لكن يعكّر على هذا التصريح بالسماع ما قاله سفيان بن عيينة فيما رواه عنه الحميدي في "مسنده" (1292): كل شيء سمعت من عمرو بن دينار، قال لنا فيه: سمعت جابرًا، إلّا هذين الحديثين؛ يعني لحوم الخيل والمخابَرة، فلا أدري بينه وبين جابر فيهما أحدٌ أم لا.وأما رواية حماد بن زيد التي زاد فيها محمدَ بنَ علي -وهو الباقر- بين عمرو بن دينار وجابر، فأخرجها البخاري (4219) و (5520) و (5524)، ومسلم (5062)، وأبو داود (3788)، والنسائي (6607)، وابن حبان (5273) من طرق عن حماد بن زيد عن عمرو بن دينار، عن محمد بن على الباقر، عن جابر. قال النسائي: ما أعلم أنَّ أحدًا وافق حماد بن زيد على محمد ابن علي!وقد أخرجه أبو داود (3808) من طريق ابن جريج قال: أخبرني عمرو بن دينار قال: أخبرني رجل عن جابر. وفي هذا تأييد لرواية حماد بن زيد، وأنه لم ينفرد بذكر واسطة بينهما. ولعلّه لهذا السبب أعرض الشيخان عن إخراج رواية من أسقط محمد بن علي الباقر، والله أعلم.وأخرج النسائي (4822) و (6609) من طريق عبد الله بن أبي نجيح، عن عطاء بن أبي رباح، عن جابر قال: أطعمَنا رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم خيبر لحوم الخيل، ونهانا عن لحوم الحُمُر. وأخرجه ابن ماجه (3197) من طريق سفيان الثوري، ومعمر، والنسائي (4826) من طريق الثوري، والنسائي (4823) من طريق عبيد الله بن عمرو الرقي، ثلاثتهم عن عبد الكريم الجزري، عن عطاء بن أبي رباح، عن جابر قال: كنا نأكل لحوم الخيل، قلت: البغال؟ قال: لا.زاد عبيد الله الرقي: على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم.وأخرج أحمد 22/ (14463)، والترمذي (1478) من طريق أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن جابر قال: حرَّم رسول الله صلى الله عليه وسلم -يعني يوم خيبر- الحُمر الإنسية ولحوم البغال، وكلَّ ذي ناب من رسول السباع، وذي مخلب من الطير. وقال الترمذي: حسن غريب.
7772 - أخبرنا الحسن بن يعقوب العَدْل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، أخبرنا عبد الوهاب بن عطاء، أخبرنا داود بن أبي هِند، عن الشَّعْبي، عن محمد بن صفوان أنه أصابَ أرنبَينِ فلم يجدْ حديدةً يُذكِّيهما، فذبحهما [1] بمَرُوةٍ، فأتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسولَ الله، إنِّي اصطدتُ أرنَبينِ فلم أجدْ حديدةً أُذكِّيهما، فذكَّيتُهما بمَرُوةٍ، أفآكلُ؟ قال: "نَعَمْ كُلْ" [2]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم مع الاختلاف فيه على الشعبيِّ، ولم يُخرجاه.
মুহাম্মাদ ইবনু সাফওয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি দুটি খরগোশ শিকার করলেন, কিন্তু সেগুলোকে যবেহ করার জন্য কোনো লোহার অস্ত্র পেলেন না। অতঃপর তিনি একটি ধারালো পাথর (মারওয়া) দিয়ে সেগুলোকে যবেহ করলেন। এরপর তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল! আমি দুটি খরগোশ শিকার করেছিলাম, কিন্তু সেগুলোকে যবেহ করার জন্য কোনো লোহার অস্ত্র খুঁজে পাইনি। তাই আমি একটি ধারালো পাথর (মারওয়া) দিয়ে সেগুলোকে যবেহ করেছি। আমি কি তা খেতে পারি?" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হ্যাঁ, খাও।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في (ز): يذكيها فذبحها، بالإفراد. الشعبي عن محمد بن صفوان، وروى عاصم الأحول عن الشعبي عن صفوان بن محمد أو محمد ابن صفوان، ومحمد بن صفوان أصح، وروى جابر الجعفي عن الشعبي عن جابر بن عبد الله نحو حديث قتادة عن الشعبي، ويحتمل أنَّ الشعبي روى عنهما جميعًا، قال محمد (يعني البخاري): حديث الشعبي عن جابر غير محفوظ.قال الخطابي: المَرْوة: حجارة بيض. قال الأصمعي: وهي التي يُقدَح منها النار، وإنما تجزئ الذكاة من الحجر بما كان له حدٌّ يقطع.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل يحيى بن أبي طالب وعبد الوهاب بن عطاء -وهو الخفّاف- وقد توبعا، واختُلف على الشعبي في اسم صحابيه ألوانًا كما في "علل الدارقطني" (3386)، ولا يضرّ.وأخرجه أحمد 25/ (15871)، وابن ماجه (3244)، والنسائي (4473) و (4806) من طرق عن داود بن أبي هند، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 25/ (15870)، وأبو داود (2822)، والنسائي (4806)، وابن حبان (5887) من طريق عاصم بن سليمان الأحول، عن الشعبي، به.وأخرجه ابن ماجه (712) من طريق أبي الأحوص سلام بن سليم، عن الشعبي، عن محمد بن صَيفي. كذا سماه ابنَ صيفي.وأخرجه أحمد 22/ 14486) من طريق جابر الجعفي، والترمذي (1472) من طريق قتادة، كلاهما عن الشعبي، عن جابر بنحوه.قال الترمذي عقبه: اختلف أصحاب الشعبي في رواية هذا الحديث، فروى داود بن أبي هند عن الشعبي عن محمد بن صفوان، وروى عاصم الأحول عن الشعبي عن صفوان بن محمد أو محمد ابن صفوان، ومحمد بن صفوان أصح، وروى جابر الجعفي عن الشعبي عن جابر بن عبد الله نحو حديث قتادة عن الشعبي، ويحتمل أنَّ الشعبي روى عنهما جميعًا، قال محمد (يعني البخاري): حديث الشعبي عن جابر غير محفوظ.قال الخطابي: المَرْوة: حجارة بيض. قال الأصمعي: وهي التي يُقدَح منها النار، وإنما تجزئ الذكاة من الحجر بما كان له حدٌّ يقطع.
7773 - أخبرنا الحسن بن يعقوب، حدثنا يحيى بن أبي طالب، أخبرنا عبد الوهاب، أخبرنا خالد، عن أبي المليح، عن نُبَيشةَ قال: سأل رجلٌ النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسولَ الله، إِنَّا كُنَّا نَعتِرُ عَتِيرةً في الجاهلية في رجبٍ، فما تأمرُنا؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "اذْبَحُوا للهِ في أيِّ شهرٍ ما كان، وبَرُّوا اللهَ وأطعِمُوا" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
নুবায়শাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করল এবং বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা জাহেলী যুগে রজব মাসে 'আতীরাহ' (বলিদান) দিতাম। আপনি আমাদের কী নির্দেশ দেন? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা আল্লাহর জন্য যেকোনো মাসেই (পশু) যবেহ করো, আল্লাহর প্রতি অনুগত থাকো এবং খাদ্য দান করো।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي كسابقه. أبو المليح هو ابن أسامة بن عمير الهذلي.وأخرجه أحمد 34/ (20723) و (20727) و (20729)، وابن ماجه (3160)، والنسائي (4541) و (4542) و (4543) من طرق عن خالد بن مهران الحذاء، بهذا الإسناد. ووقع في رواية النسائي الأولى: وربما قال -يعني خالدًا الحذاء-: عن أبي المليح، وربما ذكر أبا قلابة عن نبيشة. ووقع في رواية أحمد الثالثة ورواية النسائي الثانية: عن خالد عن أبي قلابة عن أبي المليح، قال خالد: وأحسبني قد سمعته من أبي المليح.وأخرجه أحمد (20726)، والنسائي (4540) من طريق عبد الله بن عون عن جميل غير منسوب، عن أبي المليح، به. وجميل هذا تفرد بالرواية عنه ابن عون، وقال ابن حبان بعدما ذكره في كتابه "الثقات": لا أدري من هو ولا ابن من هو!وأخرجه أبو داود (2830) من طريق بشر بن المفضل، والنسائي (4544) من طريق إسماعيل ابن عليّة، كلاهما عن خالد الحذاء، عن أبي قلابة -عبد الله بن زيد الجرمي- عن أبي المليح، به.وزاد في رواية النسائي: فلقيت أبا المليح فسألته، فحدثني عن نبيشة، فذكره.
7774 - أخبرنا أبو بكر محمد بن عبد الله الشافعي، حدثنا محمد بن الفَرَج، حدثنا حجَّاج بن محمد، حدثنا ابن جُرَيج، عن ابن خُثَيم، عن يوسف بن ماهَكَ، عن حَفْصة بنت عبد الرحمن، عن عائشة: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أمرَ في الفَرَع في كلِّ خمسةٍ واحدةً [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ‘ফারআ’ (প্রথম শাবক) সম্পর্কে আদেশ করেছেন যে, প্রতি পাঁচটির বিপরীতে একটি (পেশ করতে হবে)।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] رجاله ثقات غير ابن خثيم -وهو عبد الله بن عثمان المكي- فهو وإن كان صدوقًا إلَّا أنه تفرّد بهذا المتن ولم يتابعه عليه أحد، ولا يحتمل مثل هذا التفرد، كما أنه اضطرب في لفظه كما سيأتي، وجاء عن نُبيشة الهذلي ما يُفهَم منه المخالفة لهذا الحديث.هكذا رواه حجاج بن محمد -المصيصي- عن ابن جريج بلفظ: في كل خمسة واحدة.ورواه عبد الرزاق (7997)، ومن طريقه البيهقي 9/ 312، والحازمي في "الاعتبار" ص 156 - 157 عن ابن جريج، عن ابن خشيم، به. بلفظ: من كل خمسين بواحدة! وانظر اختلافات أخرى فيه على ابن جريج في "علل الدارقطني" 15/ 406 - 409.وتابعه على الخمسين القاسمُ بن يحيى المقدمي عن ابن خثيم، أخرجه الطبراني في "الأوسط" (1536).وخالف وهبُ بن خالد ابنَ جريج -من رواية عبد الرزاق عنه- والقاسمَ بن يحيى المقدّمي، فرواه عن ابن خثيم كرواية المصنِّف: "من الخمسة واحدة"، أخرجه أحمد 41/ (44530).ورواه حماد بن سلمة عن ابن خثيم فاختلفوا عليه فيه:فرواه عنه عفّان بن مسلم عند أحمد 42/ (25250)، وعبد الصمد بن عبد الوارث عنده 43/ (26134)، كلاهما عن ابن خثيم بلفظ: "من كل خمس شياه شاة".ورواه موسى بن إسماعيل عند أبي داود (2833) عن حماد، عن ابن خثيم، بلفظ: "من كل خمسين شاة شاة".وأما حديث نُبيشة الهذلي فأخرجه أحمد 34/ (20723)، وأبو داود (2830)، وابن ماجه (3167)، والنسائي (4541)، ولفظه: قالوا: يا رسول الله إنا كنا نُفرع في الجاهلية فَرَعًا، فما تأمرنا؟ قال: "في كل سائمة فرعٌ تَعْذُوه ماشيتك، حتى إذا استَحمَل ذَبَحتَه فتصدّقت بلحمه". فلم يأمرهم بعدد بعد أن سألوه ما يجب عليهم فيه. وإسناده صحيح.وانظر "الاعتبار في الناسخ والمنسوخ" ص 157، و "شرح السنة" للبغوي 4/ 351.
7775 - أخبرني إسماعيل بن محمد بن الفضل الشَّعْراني، حدثنا جدِّي، حدثنا أبو بكر بن شَيْبة الحِزَامي، حدثنا داود بن قيس الفرَّاء، قال: سمعتُ عمرو بن شعيب يُحدِّث عن أبيه، عن جدِّه عبد الله بن عمرو قال: سُئِلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عن الفَرَع، فقال: "الفَرَعُ حقٌّ، وأن تتركَه حتى يكونَ ابنَ مَخَاضٍ أو ابنَ لَبُونٍ يُتَحمَّلُ عليه في سبيل الله، أو تُعطيَه أرملةً، خيرٌ من أن تذبحَه يَلصَقُ لحمُه بوَبَرِه وتُولِّهَ ناقتَك" [1].
আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ‘ফারআ’ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বললেন: “ফারআ’ সত্য (বৈধ/প্রচলিত)। আর তুমি যদি এটিকে (হত্যা না করে) ছেড়ে দাও, যতক্ষণ না এটি ইবনে মাখাদ বা ইবনে লাবুন হয় এবং আল্লাহর পথে এর উপর বোঝা বহন করা যায়, অথবা কোনো বিধবাকে তা দান করো, তবে তা এটিকে যবেহ করার চেয়ে উত্তম, যখন তার গোশত তার পশমের সাথে লেগে থাকে এবং তুমি তোমার উটনীকে উদ্বিগ্ন করে তোলো।”
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده حسن.وأخرجه أحمد 11/ (6713) مطولًا و (6759) عن عبد الرزاق، عن داود بن قيس، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود (2842) من طريق عبد الملك بن عمرو العقدي، عن داود بن قيس، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه أُراه عن جده، فذكره. وفيه زيادة ذكر العقيقة، وستأتي عند المصنف وحدها في الرواية (7784).وأخرجه النسائي (4537) من طريق عبيد الله بن عبد المجيد الحنفي، عن داود بن قيس، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن أبيه وزيد بن أسلم: قالوا: يا رسول الله …ويقصد بأبيه الثاني عبد الله بن عمرو، وهو جد شعيب، وسمّاه أباه لأنه هو الذي ربَّاه، فالرواية متصلة، وأما رواية زيد بن أسلم فمرسلة.وأخرجه أبو داود (2842) عن عبد الله بن مَسلمة القعنبي عن داود بن قيس، عن عمرو بن شعيب: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم، فذكره مرسلًا.قوله: "الفَرَع حق" قال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 16/ 531: أي: ليس بباطل، وهو كلام خرج على جواب السائل، ولا مخالفة بينه وبين الحديث الآخر: "لا فرع ولا عتيرة"، فإنَّ معناه: لا فرع واجب، ولا عتيرة واجبة. وهو في "مصنف عبد الرزاق" (7992)، وقال في آخره قال عمرو: رجل أعلمني أنه سمعه من أبي هريرة.وأخرجه عبد الرزاق أيضًا (7993) عن سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، به.
7776 - وأخبرنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا ابن جُريج، أخبرني عمرو بن دينار، أنَّ ابنَ أبي عمَّار أخبره عن أبي هريرة، قال في الفَرَعة: هي حقٌّ، ولا تَذبَحْها وهي غَرَاةٌ من الغِرَاء [1] تَلصَقُ في يدك، ولكن أَمكِنْها من اللَّبن حتى إذا كانت من خِيَار المالِ فاذبَحْها [2]. هذا حديث صحيح بهذا الإسناد، والحديث المُسنَد قبل هذا صحيحٌ على ما اشترطتُ لهذا الكتاب.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ‘ফারআহ’ (প্রথা) সম্পর্কে বলেন: এটি সত্য (বা বৈধ), তবে তুমি সেটাকে জবাই করবে না যখন তা এমন ছোট হবে যে তোমার হাতের সাথে লেপ্টে থাকে। বরং সেটাকে দুধ পান করার সুযোগ দাও, যতক্ষণ না সেটা তোমার সম্পদের উত্তম অংশের অন্তর্ভুক্ত হয়, অতঃপর সেটা জবাই করো।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] وقع في النسخ الخطية: من الغراة، وهو تكرار للأولى، وجاء على الصواب في "تلخيص الذهبي" و"مصنف عبد الرزاق". والغَرَاة والغَرَا: الولد الرطب أول ما يولد، ويُجمَع على أغراء. والغَرَا والغِراء: مادة لاصقة. انظر "القاموس" وشرحه "التاج" مادة (غرو). وهو في "مصنف عبد الرزاق" (7992)، وقال في آخره قال عمرو: رجل أعلمني أنه سمعه من أبي هريرة.وأخرجه عبد الرزاق أيضًا (7993) عن سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، به.
[2] إسناده صحيح ابن أبي عمار: هو عمار المكي. وهو في "مصنف عبد الرزاق" (7992)، وقال في آخره قال عمرو: رجل أعلمني أنه سمعه من أبي هريرة.وأخرجه عبد الرزاق أيضًا (7993) عن سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، به.
7777 - حدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالويه، حدثنا الحسين بن الفضل البَجَلي وإسحاق بن الحسن [1] الحَرْبي، قالا: حدثنا عفّان بن مسلم، حدثنا يحيى ابن زُرَارة بن كَريم السَّهْمي، حدثني أبي، عن جدِّه الحارث بن عمرو السَّهْمي قال: رأيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فقلتُ: استغفِرْ لي، فقال: "غَفَرَ اللهُ لكم". قلتُ له ذلك مرةً أو مرتين، فقال رجلٌ: يا رسولَ الله، ما تَرَى في العَتائرِ والفَرائع؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن شَاء عَتَرَ ومَن شاء لم يَعتِرْ، ومَن شاء فَرَّعَ ومَن شاء لم يُفرِّعْ، وفي الشاة أُضحيَّتُها" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، فإنَّ الحارث بن عمرو السَّهمي صحابي مشهور، وولدُه بالبصرة مشهورون.وقد حدَّث عبد الرحمن بن مَهدي وسَلْم بن قُتيبة وغيرهم عن يحيى بن زُرَارة، وقد اتفق الشيخانِ رضي الله عنهما على الزُّهْري [3] عن سعيد بن المسيّب عن أبي هريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لا فَرَعَ ولا عَتِيرةَ" [4].
হারিস ইবনে আমর আস-সাহমি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখলাম। আমি বললাম: আমার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করুন। তিনি বললেন: "আল্লাহ তোমাদের ক্ষমা করুন।" আমি তাঁকে তা একবার অথবা দু'বার বললাম। তখন এক ব্যক্তি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আতা'ইরা (রজব মাসের কোরবানি) এবং ফারা' (প্রথম গর্ভের পশুর কোরবানি) সম্পর্কে আপনি কী বলেন? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে চায় সে আতা'ইরা করুক এবং যে চায় না সে তা না করুক। যে চায় সে ফারা' করুক এবং যে চায় না সে তা না করুক। আর ছাগলের মাঝে তার কুরবানি (উদ্বিয়া) রয়েছে।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرف في النسخ الخطية إلى: الحسين.
[2] إسناده حسن، يحيى بن زرارة بن كريم روى عنه جمع، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقد توبع، وأبوه زرارة روى عنه جمع أيضًا، وذكره ابن حبان في "الثقات".وأخرجه أحمد 25/ (15972)، والنسائي (4539) من طريق عفان بن مسلم، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (4538) من طريق عبد الله بن المبارك، و (10181) من طريق المعتمر بن سليمان، كلاهما عن يحيى بن زرارة، به.وسلف برقم (7758) من طريق عتبة بن عبد الملك السهمي عن زرارة.
7777 [3] - وقع في (ز): سعيد الزهري!
7777 [4] - أخرجه البخاري (5473) ومسلم (1976) من طريق معمر، والبخاري (5474) ومسلم (1976) من طريق سفيان بن عيينة، كلاهما عن الزهري، عن ابن المسيب، عن أبي هريرة.
7778 - أخبرنا الحسن بن يعقوب العَدْل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا عبد الوهاب بن عطاء، أخبرنا سعيد، عن قَتَادة، عن الحسن، عن سَمُرة بن جُندُب أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "الغلامُ مُرتَهَنٌ بعَقِيقتِه تُذبَحُ عنه يومَ سابعِه، ويُحلَقُ رأسُه، ويُسمَّى" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.وقد رواه مَطَر بن طَهْمان عن الحسن:
সামুরা ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: শিশু (বালক) তার আকীকার সাথে বন্ধক থাকে। তার পক্ষ থেকে সপ্তম দিনে (আকীকার পশু) যবেহ করা হয়, তার মাথা মুণ্ডন করা হয় এবং তার নাম রাখা হয়।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل يحيى بن أبي طالب وعبد الوهاب بن عطاء -وهو الخفّاف- وقد توبعا. سعيد: هو ابن أبي عروبة، والحسن: هو البصري.وأخرجه أحمد 33/ (20133) عن عبد الوهاب بن عطاء الخفاف، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (20083) و (20139)، وأبو داود (2838)، وابن ماجه (3165)، والترمذي (1522 م)، والنسائي (4532) من طرق عن سعيد بن أبي عروبة، به.وأخرجه أحمد (20083) و (20193) و (20256)، وأبو داود (2837) من طريق همام بن يحيى العوذي، وأحمد (20188) و (20194) من طريق أبان العطار، كلاهما عن قتادة به.وأخرجه الترمذي (1522) من طريق إسماعيل بن مسلم المكي، عن الحسن، به. وقال: حسن صحيح.وأخرج البخاري (5472 م) من طريق قريش بن أنس، عن حبيب بن الشهيد قال: أمرني ابن سيرين أن أسأل الحسن ممَّن سمع حديث العقيقة، فسألته فقال: من سمرة بن جندب. لكن قد تكلم غيرُ واحد من أهل العلم في هذه الرواية لتفرد قريش بن أنس بها، وانظر "فتح الباري" 16/ 522.