হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7799)


7799 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيه، حدثنا محمد بن بشر بن مَطَر، حدثنا خالد بن خِدَاش الزَّهْراني، حدثنا بشَّار بن الحَكَم، عن ثابت البُناني، عن أنس ابن مالك: أنَّ أبا ذرٍّ الغِفاري بالَ قائمًا، فانتَضَحَ من بَوْلِه على ساقَيْه وقَدَمَيه، فقال له رجلٌ: إنه قد أصابَ من بولك قدمَيْك وساقَيْك، فلم يَرُدَّ عليه شيئًا حتى انتهى إلى دار قوم، فاستوهبهم طَهُورًا، فأخرجوا إليه، فتوضأ وغَسَلَ ساقيه وقَدَميه، ثم أقبلَ على الرَّجل، فقال: ماذا قلتَ؟ فقال: أمَّا الآنَ فقد فعلت فقال أبو ذرٍّ: هذا دواءُ هذا، دواءُ الذُّنوب أن تستغفرَ الله عز وجل [1].هذا وإن كان موقوفًا، فإنَّ إسناده صحيح عن أنس عن أبي ذر، وهذا موضعُه.




আবু যর গিফারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি দাঁড়িয়ে প্রস্রাব করছিলেন। ফলে তাঁর প্রস্রাবের ছিটা তাঁর পায়ের গোছা ও পায়ের উপর পড়ল। তখন এক ব্যক্তি তাঁকে বললেন: আপনার প্রস্রাবের ছিটা আপনার পায়ে ও গোছায় লেগেছে। তিনি তাকে কোন উত্তর দিলেন না, যতক্ষণ না তিনি একদল লোকের বাড়িতে পৌঁছালেন। তিনি তাদের কাছে পবিত্রতার জন্য পানি চাইলেন। তারা তাকে পানি এনে দিলেন। অতঃপর তিনি উযূ করলেন এবং তাঁর গোছা ও পা দু'টি ধৌত করলেন। এরপর তিনি সেই ব্যক্তির দিকে ফিরে জিজ্ঞাসা করলেন: আপনি কী বলেছিলেন? সে বলল: এখন তো আপনি তা করলেন। তখন আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এটাই হলো এর ঔষধ, আর গুনাহের ঔষধ হলো মহান আল্লাহর কাছে ইস্তেগফার (ক্ষমাপ্রার্থনা) করা।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف جدًا من أجل بشار بن الحكم -وهو الضبّي البصري- قال أبو زرعة: منكر الحديث، وقال ابن حبان في "المجروحين": منكر الحديث جدًا، ينفرد عن ثابت بأشياء ليست من حديثه. وقال ابن عدي: منكر الحديث عن ثابت البناني وغيره، ثم قال في آخر ترجمته: وأحاديثه عن ثابت أفرادات، وأرجو أنه لا بأس به!وأخرجه الدولابي في "الكنى" (695) من طريق معلى بن أسد، عن بشار بن الحكم، بهذا الإسناد.وتصحف فيه بشار إلى: يسار.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7800)


7800 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا إبراهيم بن عبد الله، أخبرنا يزيد بن هارون، أخبرنا همام بن يحيى، عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة قال: كان قاصٌّ بالمدينة يُقال له: عبد الرحمن بن أبي عَمْرة، فسمعتُه يقول: سمعتُ أبا هريرة يقول: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إنَّ عبدًا أصابَ ذنبًا، فقال: يا ربِّ، أذنبتُ ذنبًا فاغفِرْ لي، فقال له ربُّه: عَلِمَ عبدي أنَّ له ربًّا يغفِرُ الذنبَ ويأخذُ به، فغفرَ له، ثم مَكَثَ ما شاء اللهُ، ثم أذنب ذنبًا آخر، فقال: يا ربِّ، أذنبتُ ذنبًا فاغفِرْ لي، فقال ربُّه عز وجل: عَلِمَ عبدي أنَّ له ربًّا يغفِرُ الذنب ويأخذُ به، قد غفرتُ لعبدي، فلْيَعْمَلْ ما شاءَ، ثم عاد فأذنبَ ذنبًا، فقال: ربِّ اغفِرْ لي ذنبي، فقال الله تبارك وتعالى: أذنب عبدي ذنبًا فعَلِمَ أنَّ له ربًّا يغفِرُ الذنب ويأخذُ بالذنب، اعمَلْ ما شئتَ قد غفرتُ لك" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি, তিনি বলেছেন: "এক বান্দা একটি গুনাহ করল এবং বলল, হে আমার রব, আমি একটি গুনাহ করে ফেলেছি, সুতরাং আপনি আমাকে ক্ষমা করে দিন। তখন তার রব তাকে বললেন, আমার বান্দা জেনেছে যে তার একজন রব আছেন, যিনি গুনাহ ক্ষমা করেন এবং গুনাহের জন্য ধরেন (শাস্তি দেন)। অতঃপর তিনি তাকে ক্ষমা করে দিলেন। এরপর সে আল্লাহর ইচ্ছামত সময় অবস্থান করল। এরপর সে আরেকটি গুনাহ করে বলল, হে আমার রব, আমি একটি গুনাহ করে ফেলেছি, সুতরাং আপনি আমাকে ক্ষমা করে দিন। তখন তার রব আযযা ওয়া জাল্লা বললেন, আমার বান্দা জেনেছে যে তার একজন রব আছেন, যিনি গুনাহ ক্ষমা করেন এবং গুনাহের জন্য ধরেন। আমি আমার বান্দাকে ক্ষমা করে দিলাম, এখন সে যা ইচ্ছা আমল করুক। এরপর সে পুনরায় ফিরে এসে আরেকটি গুনাহ করল এবং বলল, হে আমার রব, আমার গুনাহ ক্ষমা করে দিন। তখন আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা বললেন, আমার বান্দা একটি গুনাহ করেছে এবং সে জেনেছে যে তার একজন রব আছেন, যিনি গুনাহ ক্ষমা করেন এবং গুনাহের জন্য ধরেন। তুমি যা ইচ্ছা আমল করো, আমি তোমাকে ক্ষমা করে দিয়েছি।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح. إبراهيم بن عبد الله: هو ابن يزيد السعدي.وأخرجه أحمد 13/ (7948)، وابن حبان (622) من طريق يزيد بن هارون بهذا الإسناد.وليس عندهما قوله: "فليعمل ما شاء" في المرة الثانية، وكذا باقي الطرق.وأخرجه أحمد 15/ (9256) و 16/ (10380)، والبخاري (7507)، ومسلم (2758) (30) من طرق عن همام بن يحيي، به فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه أحمد 16/ (10379)، ومسلم (2758) (29)، والنسائي (10180)، وابن حبان (625) من طرق عن حماد بن سلمة، عن إسحاق بن عبد الله، به.قال النووي في "شرح مسلم": لو تكرر الذنب مئة مرة أو ألف مرة أو أكثر، وتاب في كل مرة قُبِلَت توبته، وسقطت ذنوبه، ولو تاب عن الجميع توبة واحدة بعد جميعها صحَّت توبته.قول الله عز وجل للذي تكرر ذنبه: "اعمل ما شئت فقد غفرت لك معناه: ما دمتَ تذنب ثم تتوب غفرتُ لك. وانظر "فتح الباري" 24/ 458 - 461. من طرق عن قتيبة بن سعيد، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7801)


7801 - حدثنا علي بن حَمشاذ العَدْل، حدثنا أبو عمرو أحمد بن المبارك، حدثنا قُتيبة بن سعيد، حدثنا جابر بن مرزوق المكيّ، عن عبد الله بن عبد العزيز بن عبد الله ابن عمر بن الخطّاب، عن أبي طُوَالة، عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن أذنب ذنبًا فعَلِمَ أنَّ له ربًّا إن شاء أن يغفرَه له غفرَه له، وإنْ شاءَ عذَّبَه، كان حقًّا على الله أن يَغْفِرَ له" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো পাপ করে এবং সে জানে যে তার একজন রব আছেন, যিনি চাইলে তাকে ক্ষমা করে দেবেন এবং চাইলে তাকে শাস্তি দেবেন, তার জন্য আল্লাহ তাকে ক্ষমা করে দেওয়া নিজের ওপর হক বা অধিকার করে নিয়েছেন।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف جدًا، ومتنه منكر كما قال الذهبي، جابر بن مرزوق المكي هو الجُدِّي جهّله أبو حاتم، وقال ابن حبان في "المجروحين": يأتي بما لا يشبه حديث الثقات الأثبات، لا يجوز الاحتجاج به. أبو طوالة: هو عبد الله بن عبد الرحمن بن معمر الأنصاري.وأخرجه ابن حبان في ترجمة عبد الله بن عبد العزيز العُمري من "الثقات" 7/ 20، والطبراني في "الأوسط" (1676)، وأبو نعيم في "الحلية" 8/ 286، والبيهقي في "شعب الإيمان" (6696) من طرق عن قتيبة بن سعيد، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7802)


7802 - أخبرني أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي، حدثنا الفضل بن عبد الجبَّار، حدثنا النَّضر بن شُميل بن خَرَشَة بن يزيد، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن سِمَاك بن حرب، عن النُّعمان بن بَشير أنَّه سمعه يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما يسافرُ رجلٌ في أرضٍ تَنُوفةٍ فقال تحتَ شجرة، ومعه راحلتُه عليها زادُه وطعامُه، فاستيقظ وقد أفلتَتْ راحلتُه، فعَلَا شَرَفًا فلم يَرَ شيئًا، ثم عَلَا شَرَفًا فلم يَرَ شيئًا، فالتَفَتَ فإذا هو بها تَجُرُّ خِطامَها، فما هو أشدَّ فَرَحًا بها من الله بتوبةِ عبدِه إذا تابَ إليه" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وشاهدُه حديث البراء بن عازب:




নু'মান ইবনু বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "কোন ব্যক্তি এমন অনুর্বর (জনশূন্য) প্রান্তরে সফর করে, আর সে একটি গাছের নিচে বিশ্রাম নেয়। তার সাথে তার আরোহী পশুটি থাকে, যার উপর তার পাথেয় ও খাবার রয়েছে। অতঃপর সে জাগ্রত হলো এবং দেখল তার আরোহী পশুটি পালিয়ে গেছে। সে একটি উঁচু স্থানে উঠল কিন্তু কিছুই দেখতে পেল না। এরপর সে আরেকটি উঁচু স্থানে উঠল কিন্তু (তাতেও) কিছুই দেখতে পেল না। অতঃপর সে ঘুরে তাকাল আর হঠাৎ দেখল, তার সেই পশুটি তার লাগাম টেনে নিয়ে আসছে। ঐ আরোহী পশুটিকে ফিরে পেয়ে সে যতটা খুশি হয়, তার চেয়েও আল্লাহ তাঁর বান্দার তওবা কবুল করে (বান্দার প্রতি) অধিক খুশি হন, যখন সে তাঁর কাছে তওবা করে।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد لا بأس برجاله، لكن قد اختلف في رفعه ووقفه على حمّاد بن سلمة وعلى شيخه سماك بن حرب، والراجح وقفه.فقد رواه النضر بن شميل عن حماد فرفعه، ورواه بهز بن أسد فقال: قال حماد: أظنه عن النبي صلى الله عليه وسلم، ورواه حسن بن موسى الأشيب وأبو داود الطيالسي وموسى بن داود الضبي ثلاثتهم عن حماد بن سلمة موقوفًا.وأما سماك بن حرب فرواه عنه أبو الأحوص وحاتم بن أبي صغيرة موقوفًا، وخالفهما شريكُ ابن عبد الله النخعي، فرواه عن سماك مرفوعًا، وشريك سيئ الحفظ.وأخرجه الدارمي (2894)، والبزار في "مسنده" (2770) عن النضر بن شميل بهذا الإسناد.قال البزار عقبه: هذا الحديث لا نعلم أحدًا أسنده عن حمّاد بن سلمة عن سماك عن النعمان عن النبي صلى الله عليه وسلم، إلّا النضر بن شميل، ويرويه غيره موقوفًا، ورواه شريك عن سماك عن النعمان عن النبي صلى الله عليه وسلم.وأخرجه أحمد 30/ (18408) عن بهز بن أسد عن حماد بن سلمة به. قال بهز: قال حماد: أظنه عن النبي صلى الله عليه وسلم.وأخرجه أبو داود الطيالسي في "مسنده" (831)، وأخرجه أحمد (18408) عن حسن الأشيب، وإبراهيم الحربي في "غريب الحديث" 3/ 942 عن موسى بن داود الضبي، ثلاثتهم (أبو داود وحسن وموسي) عن حماد، به موقوفًا.وأخرجه أحمد (18423) عن أحمد بن عبد الملك الحراني، عن شريك النخعي، عن سماك. مرفوعًا. وأخرجه هناد في "الزهد" (889) عن أبي الأحوص سلام بن سليم، ومسلم (2745) من طريق أبي يونس حاتم بن أبي صغيرة، كلاهما عن سماك، به موقوفًا. زاد مسلم في روايته: قال سماك: فزعم الشعبي أنَّ النعمان رفع هذا الحديث إلى النبي صلى الله عليه وسلم، وأما أنا فلم أسمعه. وخالفهما شريكٌ النخعي فرواه عن سماك به مرفوعًا، أخرجه أحمد (18423)، وشريك سيئ الحفظ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7803)


7803 - أخبرناه أبو جعفر محمد بن علي الشَّيباني بالكوفة، حدثنا أحمد بن حازم [1] بن أبي غَرَزة، حدثنا عبيد الله بن موسى وأبو نُعيم، قالا: حدثنا عُبيد الله بن إياد بن لَقِيط، حدثنا إياد، عن البَرَاء بن عازب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "كيف تقولون بفَرَح رجلٍ انفلتَتْ راحلتُه تجُرُّ زِمامَها بأرض قَفْرٍ ليس بها طعامٌ ولا شرابٌ، وعليها له طعامٌ وشرابٌ، فطَلَبها حتى شقَّ عليه، ثم مرَّتْ بجذْلِ شجرةٍ فتعلَّق زِمامُها، فوجدَها معلَّقةً به؟ " قلنا: شديدٌ يا رسولَ الله، قال: "أمَا واللهِ، اللهُ أشدُّ فَرَحًا بتوبة عبدِه من الرَّجل براحلتِه" [2].




বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা এমন ব্যক্তির আনন্দকে কেমন মনে করো যার উট তার লাগাম টানতে টানতে কোনো নির্জন প্রান্তরে ছুটে গেল, যেখানে কোনো খাবার বা পানীয় নেই, অথচ তার সেই উটের উপরেই রয়েছে তার খাবার ও পানীয়? সে সেটিকে খুঁজতে লাগল, এমনকি তা তার জন্য খুবই কষ্টকর হয়ে পড়ল। এরপর উটটি একটি গাছের গুঁড়ির পাশ দিয়ে যাচ্ছিল, তখন তার লাগাম সেটির সাথে আটকে গেল, আর সে সেটিকে সেখানে বাঁধা অবস্থায় পেল?" আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, (সে আনন্দ) অত্যন্ত তীব্র। তিনি বললেন: "সাবধান! আল্লাহর কসম, সেই লোকটি তার উট ফিরে পাওয়ার চেয়ে আল্লাহ তাঁর বান্দার তওবায় অধিক আনন্দিত হন।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: قانع. ابن أبي مريم -كما في هذه الرواية- منهم السفيانان.وخالفهم جماعة فرووه عن عبد الكريم الجزري عن زياد بن الجراح، وقد بسط هذه المسألة ابن أبي حاتم في "العلل" (1797) و (1816) وفي "الجرح والتعديل" 3/ 527 - 528، والدارقطني في "العلل" (813)، والمزي في "تهذيب الكمال" 9/ 511 - 514، وابن حجر في "تهذيب التهذيب" 3/ 384 - 385، ورجَّح ابن معين كما في "تاريخ الدوري" (5366)، وعلي بن المديني كما في "موضح الأوهام" للخطيب 1/ 256، وابن أبي حاتم وابن حجر في "التهذيب": أنه زياد بن الجراح. قلنا: وسواء أكان هو ابنَ أبي مريم أم ابنَ الجراح، فمداره على ثقة أو صدوق. وانظر تفصيل ذلك في تحقيقنا على "مسند أحمد".وأخرجه أحمد (6/ (3568)، وابن ماجه (4252) من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (4124) من طريق سفيان الثّوري، عن عبد الكريم الجزري، به.وأخرجه أحمد (4012) من طريق فرات بن سلمان الجزري، عن عبد الكريم الجزري، عن زياد بن الجراح، عن عبد الله بن معقل. فنسبه ابن الجراح، وتابع فراتًا عليه جمع مذكورون في "المسند".وأخرجه أحمد (4014) و (4016) من طريق خصيف بن عبد الرحمن، عن زياد بن أبي مريم، به.وأخرجه ابن حبان (612) و (614) من طريق مالك بن مغول، عن منصور بن المعتمر، عن خيثمة بن عبد الرحمن، عن عبد الله. وهذا إسناد منقطع، خيثمة لم يسمع من ابن مسعود.



[2] إسناده صحيح.وأخرجه أحمد 30/ (18492)، ومسلم (2746) من طرق عن عبيد الله بن إياد، بهذا الإسناد. ابن أبي مريم -كما في هذه الرواية- منهم السفيانان.وخالفهم جماعة فرووه عن عبد الكريم الجزري عن زياد بن الجراح، وقد بسط هذه المسألة ابن أبي حاتم في "العلل" (1797) و (1816) وفي "الجرح والتعديل" 3/ 527 - 528، والدارقطني في "العلل" (813)، والمزي في "تهذيب الكمال" 9/ 511 - 514، وابن حجر في "تهذيب التهذيب" 3/ 384 - 385، ورجَّح ابن معين كما في "تاريخ الدوري" (5366)، وعلي بن المديني كما في "موضح الأوهام" للخطيب 1/ 256، وابن أبي حاتم وابن حجر في "التهذيب": أنه زياد بن الجراح. قلنا: وسواء أكان هو ابنَ أبي مريم أم ابنَ الجراح، فمداره على ثقة أو صدوق. وانظر تفصيل ذلك في تحقيقنا على "مسند أحمد".وأخرجه أحمد (6/ (3568)، وابن ماجه (4252) من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (4124) من طريق سفيان الثّوري، عن عبد الكريم الجزري، به.وأخرجه أحمد (4012) من طريق فرات بن سلمان الجزري، عن عبد الكريم الجزري، عن زياد بن الجراح، عن عبد الله بن معقل. فنسبه ابن الجراح، وتابع فراتًا عليه جمع مذكورون في "المسند".وأخرجه أحمد (4014) و (4016) من طريق خصيف بن عبد الرحمن، عن زياد بن أبي مريم، به.وأخرجه ابن حبان (612) و (614) من طريق مالك بن مغول، عن منصور بن المعتمر، عن خيثمة بن عبد الرحمن، عن عبد الله. وهذا إسناد منقطع، خيثمة لم يسمع من ابن مسعود.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7804)


7804 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن شَيْبان الرَّمْلي، حدثنا سفيان بن عُيينة، عن عبد الكريم الجَزَري، عن زياد بن أبي مريم، عن عبد الله ابن مَعْقِل قال: دخلتُ أنا وأَبي على عبد الله بن مسعود، فقال له أَبي: أسمعتَ النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول: "النَّدمُ توبةً؟ " قال: نعم، أنا سمعتُه يقول: "النَّدم توبةٌ" [1].




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আব্দুল্লাহ ইবনে মা’কিল বলেন: আমি ও আমার বাবা আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম। আমার বাবা তাঁকে জিজ্ঞাসা করলেন: আপনি কি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন যে, “অনুশোচনাই হলো তওবা?” তিনি বললেন: হ্যাঁ, আমি তাঁকে বলতে শুনেছি: “অনুশোচনাই হলো তওবা।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد لا بأس برجاله، زياد بن أبي مريم روى عنه جمع، ووثقه العجلي وابن حبان والدارقطني، فأقلُّ أحواله أن يكون حسن الحديث، لكن اختلف في إسناده على عبد الكريم الجزري، وحاصل الخلاف أنَّ جماعة رووه عن عبد الكريم فقالوا: عن زياد ابن أبي مريم -كما في هذه الرواية- منهم السفيانان.وخالفهم جماعة فرووه عن عبد الكريم الجزري عن زياد بن الجراح، وقد بسط هذه المسألة ابن أبي حاتم في "العلل" (1797) و (1816) وفي "الجرح والتعديل" 3/ 527 - 528، والدارقطني في "العلل" (813)، والمزي في "تهذيب الكمال" 9/ 511 - 514، وابن حجر في "تهذيب التهذيب" 3/ 384 - 385، ورجَّح ابن معين كما في "تاريخ الدوري" (5366)، وعلي بن المديني كما في "موضح الأوهام" للخطيب 1/ 256، وابن أبي حاتم وابن حجر في "التهذيب": أنه زياد بن الجراح. قلنا: وسواء أكان هو ابنَ أبي مريم أم ابنَ الجراح، فمداره على ثقة أو صدوق. وانظر تفصيل ذلك في تحقيقنا على "مسند أحمد".وأخرجه أحمد (6/ (3568)، وابن ماجه (4252) من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (4124) من طريق سفيان الثّوري، عن عبد الكريم الجزري، به.وأخرجه أحمد (4012) من طريق فرات بن سلمان الجزري، عن عبد الكريم الجزري، عن زياد بن الجراح، عن عبد الله بن معقل. فنسبه ابن الجراح، وتابع فراتًا عليه جمع مذكورون في "المسند".وأخرجه أحمد (4014) و (4016) من طريق خصيف بن عبد الرحمن، عن زياد بن أبي مريم، به.وأخرجه ابن حبان (612) و (614) من طريق مالك بن مغول، عن منصور بن المعتمر، عن خيثمة بن عبد الرحمن، عن عبد الله. وهذا إسناد منقطع، خيثمة لم يسمع من ابن مسعود.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7805)


7805 - حدثنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا بِشر بن موسى، حدثنا الحُميدي، حدثنا سفيان قال: سمعتُه من عبد الكريم الجَزَري يقول: أخبَرَناه زيادُ بن أبي مريم -قال: إن كان سعيدُ بن جُبير لَيستحيي أن يُحدِّث بحديثٍ وأنا جالسٌ، زيادٌ يقوله- عن عبد الله بن مَعقِل قال: دخلتُ مع أَبي على عبد الله، فقال أبي: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "النَّدم توبةٌ؟ قال: نعم، أنا سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "النَّدمُ توبةٌ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه بهذه اللفظة، إنما اتَّفقا على حديث الإفك، وقولِ رسول الله صلى الله عليه وسلم لعائشةَ رضي الله عنها: "إنْ كنتِ بريئةً فسيُبَرِّتُكِ اللهُ، وإنْ كنتِ أَلمَمتِ بذنبٍ فاستغفرِي اللهَ وتوبي إليه، فإنَّ العبد إذا اعترف بذنبِه ثم تابَ، تاب اللهُ عليه" [2].




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [আব্দুল্লাহ ইবনু মা’কিল] বলেন: আমি আমার পিতাসহ আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলাম। তখন আমার পিতা জিজ্ঞাসা করলেন: আমি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি যে, “অনুশোচনা (পশ্চাত্তাপ) হলো তওবা”? তিনি (আব্দুল্লাহ) বললেন: হ্যাঁ, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “অনুশোচনা (পশ্চাত্তাপ) হলো তওবা।”

[হাকিমের মন্তব্য:] এই হাদীসের সনদ সহীহ। তবে তাঁরা (বুখারী ও মুসলিম) এই শব্দে এটি সংকলন করেননি। বরং তাঁরা ইফকের (অপবাদের) ঘটনা সংক্রান্ত হাদীসটি বর্ণনা করেছেন, যেখানে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলেছিলেন: “যদি তুমি নির্দোষ হও, তবে আল্লাহ অবশ্যই তোমাকে নির্দোষ প্রমাণ করবেন। আর যদি তুমি কোনো গুনাহ করে থাকো, তবে আল্লাহর কাছে ক্ষমা চাও এবং তাঁর কাছে তওবা করো। কারণ কোনো বান্দা যখন তার গুনাহ স্বীকার করে তওবা করে, তখন আল্লাহ তার তওবা কবুল করেন।।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح كسابقه. سفيان: هو ابن عيينة.وهو في "مسند الحميدي" برقم (105)، وليس فيه ذكر استحياء سعيد من زياد.



[2] أخرجه البخاري (2661) و (4141) و (4690) و (4750)، ومسلم (2770) من حديث عائشة نفسها رضي الله عنها. وأخرجه الخطيب البغدادي في "موضح أوهام الجمع" 1/ 258 من طريق أبي سعد سعيد بن المرزبان البقّال، عن أنس وسنده ضعيف وفيه وهمٌ، فرواية البقال هي من حديث ابن مسعود، وانظر تخريجها عند حديث ابن مسعود في "مسند أحمد" 6/ (3568).وانظر ما قبله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7806)


7806 - أخبرنا الحسين بن الحسن بن أيوب، حدثنا أبو حاتم الرَّازي.وحدثنا أبو النَّضر الفقيه وأبو الحسن العَنَزي، قالا: حدثنا عثمان بن سعيد الدَّارمي، حدثنا عثمان بن صالح السَّهْمي، حدثنا عبد الله بن وهب، عن يحيى بن أيوب، عن حُمَيد الطَّويل، قال: قلتُ لأنس بن مالك: أسمعتَ النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول: "النَّدم توبةٌ"؟ قال: نعم [1]. وهذا حديث على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হুমায়দ আত-তাওয়িল বলেন, আমি আনাস ইবনে মালিককে জিজ্ঞাসা করলাম: আপনি কি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন যে, "অনুশোচনা বা লজ্জিত হওয়াই হলো তওবা"? তিনি বললেন: হ্যাঁ।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل عثمان بن صالح السهمي ويحيى بن أيوب -وهو الغافقي- وقد توبعا. وحميد الطويل قد صرَّح بسماعه من أنس عند غير المصنف، فزالت شبهة تدليسه.وأخرجه ابن حبان (630)، والضياء المقدسي في "المختارة" 6/ (2088) و (2091) من طرق عن عثمان بن صالح السهمي، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار في "مسنده" (6622) عن عمرو بن مالك، والضياء (2090) من طريق خالد ابن عبد السلام الصَّدفي، كلاهما عن عبد الله بن وهب، به. وقال البزار: وهذا الحديث لا نعلم رواه عن حميد عن أنس إلّا يحيى بن أيوب، ولا نعلم يروى عن أنس إلّا من هذا الوجه!وأخرجه ابن سمعون في "الأمالي" (24)، والضياء (2089) من طريق عمرو بن الربيع بن طارق، عن يحيى بن أيوب، به.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 7/ 211 من طريقين عن يحيى بن راشد المازني، عن حميد الطويل، به. وقال: لم يروه عن حميد إلّا يحيى بن أيوب ويحيى بن راشد. قلنا: يحيى بن راشد ضعيف يعتبر به في المتابعات والشواهد.ابن عدي 1/ 200 من طريق مروان بن معاوية، عن حميد الطويل، به. وسنده لا يُفرح به، فيه أحمد بن محمد بن حرب، كذَّبه ابن عدي وابن حبان.وأخرجه ابن عدي أيضًا 1/ 200 من طريق قتادة عن أنس. وفي سنده أيضًا ابن حرب هذا، لذا قال عقب هذين الطريقين: باطلان. وأخرجه الخطيب البغدادي في "موضح أوهام الجمع" 1/ 258 من طريق أبي سعد سعيد بن المرزبان البقّال، عن أنس وسنده ضعيف وفيه وهمٌ، فرواية البقال هي من حديث ابن مسعود، وانظر تخريجها عند حديث ابن مسعود في "مسند أحمد" 6/ (3568).وانظر ما قبله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7807)


7807 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بحر بن نصر بن سابق الخَوْلاني، حدثنا أسد بن موسى، حدثنا أنس بن عِيَاض، عن يحيى بن سعيد، حدثني عبد الله بن دِينار، عن عبد الله بن عمر: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قامَ بعد أن رُحِمَ الأسلميُّ فقال: "اجتَنِبُوا هذه القاذورةَ التي نهى اللهُ عنها، فمَن ألمَّ فليَستتِرْ بسَتْرِ الله، وليَتُبْ إلى الله، فإِنَّه من يُبْدِ لنا صَفْحتَه نُقِمْ عليه كتابَ الله عز وجل" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসলামী ব্যক্তির প্রতি করুণা প্রদর্শনের পর দাঁড়িয়ে বললেন: "তোমরা সেই নোংরা কাজ (ব্যভিচার) থেকে দূরে থাকো যা আল্লাহ নিষেধ করেছেন। সুতরাং, যে কেউ যদি তাতে লিপ্ত হয়ে পড়ে, সে যেন আল্লাহর দেওয়া আবরণে নিজেকে আবৃত রাখে এবং আল্লাহর নিকট তওবা করে। কারণ, যে ব্যক্তি আমাদের সামনে তার চেহারা প্রকাশ করে দেবে, আমরা তার উপর মহান আল্লাহ্‌র কিতাবের বিধান প্রতিষ্ঠা করব।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن اختلف فيه على يحيى بن سعيد -وهو الأنصاري- عن عبد الله بن دينار في وصله وإرساله، والراجح إرساله كما قال الدارقطني في "العلل" (2811). وسيتكرر عند المصنف برقم (8357) عن أبي العباس محمد بن يعقوب عن الربيع بن سليمان عن أسد بن موسى، فذكر مكان بحرٍ الربيعَ! وكلاهما ثقة.وأخرجه الطحاوي في "شرح المشكل" (91) عن نصر بن مرزوق، عن أسد بن موسى، بهذا الإسناد.وأخرجه العقيلي في "الضعفاء" (762) من طريق محمد بن الصلت التَّوَّزي، والبيهقي 8/ 330 من طريق هارون بن موسى، كلاهما عن أبي ضمرة أنس بن عياض، عن يحيى بن سعيد، به.وخالفهم يونس بن عبد الأعلى، فرواه عن أنس بن عياض عن يحيى بن سعيد عن عبد الله بن دينار: أنه بلغه أنَّ رسول الله، فذكره. أخرجه الطحاوي (92).ورواه مرسلًا أيضًا عن يحيى بن سعيد عن عبد الله بن دينار ابنُ جريح وسفيانُ بن عيينة عند عبد الرزاق (13336) و (13342)، والليثُ بن سعد وحمادُ بن زيد فيما قاله الدارقطني في "العلل" (2811).ورواه عن يحيى بن سعيد الأنصاريِّ عبدُ الوهاب بن عبد المجيد الثقفي، واختلف عليه.فرواه ابن المقرئ في "معجمه" (831)، وابن سمعون في "الأمالي" (160)، والبيهقي 8/ 330 من طريق حفص بن عمرو الرَّبالي، عن عبد الوهاب الثقفي، عن يحيى بن سعيد به موصولًا. وخالف الرَّباليَّ الحسينُ بن حسن بن حرب، فرواه عن عبد الوهاب الثقفي عن يحيى بن سعيد عن عباد الله بن دينار: أنه بلغه أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم لما رجم الأسلمي، فذكره. أخرجه العقيلي 2/ 284.ورواه أبو سعيد يحيى بن سليمان الجعفي عند العقيلي (761) عن عبد الرحيم بن سليمان، عن يحيى بن سعيد، عن عبد الله بن دينار؛ فشكّ فيه الجعفي فقال: أراه عن ابن عمر، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكره.وأخرجه ابن وهب في "موطئه" -كما في "التمهيد" 5/ 322 - عن مخرمة بن بكير، عن أبيه، قال: سمعت عبيد الله بن مقسم يقول: سمعت كريبًا مولى ابن عباس يُحدِّث، أو يُحدِّث عنه (يعني: يحدِّث هو أو يحدِّث عن ابن عباس)، فذكر نحوه.وأخرجه بنحوه مالك في "الموطأ" 2/ 825 عن زيد بن أسلم مرسلًا، وعبد الرزاق (13515) عن معمر عن يحيى بن أبي كثير مرسلًا.وله شاهد من حديث أبي هريرة في "الغرائب الملتقطة" لابن حجر (118)، وفي سنده يحيى ابن أبي سليمان، وهو ليِّن الحديث.ويشهد لقصة السَّتر ما قاله النبيُّ صلى الله عليه وسلم لهزَّال: "لو سَتَرتَه (يعني ماعزًا) بثوبك كان خيرًا لك"، سيأتي برقم (8279).قال ابن الأثير في "النهاية": القاذورة: الفعل القبيح، والقول السيئ ومنه الحديث "فمن أصاب من هذه القاذورة شيئًا فليستر بستر الله" أراد به ما فيه حدٌّ كالزنى والشرب.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7808)


7808 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ [حدثنا الفضل بن محمد الشَّعْراني وبشر بن سهل اللَّبّاد، قالا: حدثنا عبد الله بن صالح] [1] حدثنا حَرْملة بن عِمران التُّجِيبي، أنَّ أبا السِّمْط [2] سعيد بن أبي سعيد المَهْري حدّثه عن أبيه، عن عبد الله ابن عمرو: أنَّ معاذ بن جبل أراد سفرًا، فقال: يا رسولَ الله، أَوصِني، قال: "اعبُدِ اللهَ ولا تُشْرِكْ به شيئًا" قال: يا رسولَ الله، زِدْني، قال: "إذا أسأتَ فأحسِنْ" قال: يا رسولَ الله، زِدْني، قال: "استقِمْ ولتُحسِّنَ خُلُقَك" [3].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মু'আয ইবনে জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সফরের ইচ্ছা করলেন। তিনি বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাকে উপদেশ দিন।" তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আল্লাহর ইবাদত করো এবং তাঁর সাথে কাউকে অংশীদার করো না।" তিনি বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আরও কিছু বলুন।" তিনি বললেন, "যখন তুমি কোনো মন্দ কাজ করে ফেলো, তখন ভালো কাজ করো (যা মন্দকে দূর করে দেয়)।" তিনি বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আরও কিছু বলুন।" তিনি বললেন, "তুমি নেক পথে অটল থাকো এবং তোমার চরিত্রকে সুন্দর করো।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] ما بين المعقوفين لم يرد في النسخ، وزدناه من "إتحاف المهرة" (12129)، وانظر الرواية السالفة برقم (180).



[2] تحرَّف في النسخ إلى: السوط، والمثبت من الرواية السالفة، ويقال في كنيته أيضًا: أبو السُّميط، وهي أشهر.



7808 [3] - حسن لغيره، وسلف تخريجه والكلام عليه برقم (180).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7809)


7809 - أخبرنا الحسن بن يعقوب العدل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا زيد بن الحُبَاب، حدثنا علي بن مَسْعَدة الباهلي، عن قَتَادة عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "كلُّ بني آدم خطَّاءٌ، وخيرُ الخطَّائينَ التَّوّابون" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আদম সন্তানের প্রত্যেকেই ভুলকারী, আর ভুলকারীদের মধ্যে উত্তম হলো তওবাকারীরা।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف لتفرُّد علي بن مسعدة به، وهذا الرجل ليس بالقوي، ولا يقبل إلا فيما توبع عليه، وصرَّح ابن عدي بأنَّ أحاديثه ليست محفوظة، وأورد هذا الحديث منها، ونقل ابن قدامة المقدسي في العاشر من "المنتخب" (33) عن أبي عبد الله أحمد بن حنبل أنه قال الحديث: منكر.وأخرجه أحمد 20/ (13049) مطولًا، وابن ماجه (4251)، والترمذي (2499) من طريق زيد ابن الحباب، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: غريب لا نعرفه إلّا من حديث علي بن مسعدة عن قتادة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7810)


7810 - حدثنا أبو بكر محمد بن داود بن سليمان الزَّاهد، حدثنا علي بن الحسين ابن الجُنَيد الرازي، حدثنا محمد بن عيسى، حدثنا سَلَمة بن الفضل، حدثني محمد ابن إسحاق، عن يحيى بن سعيد الأنصاري، عن سعيد بن المسيّب، حدثني عمرو ابن العاص، أنَّه سمع رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "كلُّ ابنِ آدمَ يأتي يومَ القيامة وله ذنبٌ إِلَّا ما كان من يحيى بن زكريا" قال: ثم دلى رسول الله صلى الله عليه وسلم بيده إلى الأرض فأخذ عُوَيدًا صغيرًا، ثم قال: "وذلك أنَّه لم يكُنْ له ما للرجالِ إلَّا مثلُ هذا العُودِ، وبذلك سمَّاه الله سيِّدًا وحَصُورًا ونبيًّا من الصالحين" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "কিয়ামতের দিন প্রত্যেক আদম সন্তান গুনাহসহ উপস্থিত হবে, একমাত্র ইয়াহইয়া ইবনু যাকারিয়া (আঃ) ব্যতীত।" তিনি (আমর) বলেন, এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হাত মাটির দিকে নামিয়ে একটি ছোট কাঠি নিলেন, অতঃপর বললেন, "এর কারণ হলো, পুরুষদের যা (যৌন চাহিদা) থাকে, তা তাঁর মধ্যে এই কাঠিটির মতো সামান্য ছাড়া আর কিছুই ছিল না। এবং এই কারণেই আল্লাহ তাকে 'সাইয়্যেদ' (নেতা), 'হাসূর' (সংযমী), এবং নেককারদের মধ্য থেকে একজন নবী হিসেবে নামকরণ করেছেন।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] خبر مضطرب الإسناد، رجاله لا بأس بهم، لكن اختُلف على يحيى بن سعيد ثم على سعيد ابن المسيب في رفعه ووقفه ووصله وإرساله كما سلف بيانه في الرواية (3451). محمد بن عيسى: هو ابن زياد الدامغاني، وسلمة بن الفضل: هو الأبرش.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7811)


7811 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبَّار، حدثنا يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق، حدثني محمد بن عبد الله بن قيس بن مَخْرَمة، عن الحسن بن محمد بن علي [عن أبيه] [1] عن جدِّه عليِّ بن أبي طالب قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "ما هَمَمْتُ بما كان أهلُ الجاهليّة يَهُمَّون به إِلَّا مَرَّتين مِن الدَّهر، كلاهما يَعصِمُني اللهُ تعالى منهما: قلتُ ليلةً لفتًى كان معي من قُريش في أعلى مكةَ في أغنامٍ لأهلِها تَرْعَى: أَبْصِرْ لي غنمي حتى أسمُرَ هذه الليلةَ بمكةَ كما يَسمُرُ الفِتيانُ، قال: نَعَمْ، فخرجتُ، فلما جئتُ أدنَى دارٍ من دُور مكةَ، سمعتُ غِناءً وصوت دُفوف وزَمِيرًا، فقلتُ: ما هذا؟ قالوا: فلانٌ تزوَّج فلانةَ؛ لرجل من قريش تزوَّج امرأةً، فلَهَوتُ بذلك الغِناء [2] وذلك الصوتِ حتى غَلَبَتْني عَيْني، فنمتُ فما أيقَظَني إلَّا مسُّ الشَّمس، فرجعتُ فسمعتُ مثلَ ذلك، فقيل لي مثلُ ما قيل لي، فلهوتُ بما سمعتُ [حتى] غلبَتْني عيني، فما أيقَظَني إلَّا مَسُّ الشَّمس، ثم رجعتُ إلى صاحبي، فقال: ما فعلتَ؟ فقلتُ: ما فعلتُ شيئًا" قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "فوالله ما هَمَمتُ بعدَها بسوءٍ ممّا يَعمَلُ أهلُ الجاهلية حتى أكرَمَني اللهُ تعالى بنُبوّتِه" [3]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "জাহিলিয়াতের লোকেরা যা নিয়ে মনোনিবেশ করত, আমি জীবনে মাত্র দুইবার এর ইচ্ছা করেছিলাম, আর উভয়বারই আল্লাহ তাআলা আমাকে তা থেকে রক্ষা করেছেন। একবার রাতে আমি মক্কার উচ্চভূমিতে কুরাইশ গোত্রের যে যুবকের সাথে সেখানকার অধিবাসীদের ছাগল চরাচ্ছিলাম, তাকে বললাম: তুমি আমার ছাগলগুলোর প্রতি খেয়াল রাখো, যাতে আমি এই রাত মক্কায় গিয়ে যুবকদের মতো গল্পগুজব করতে পারি। সে বলল: ঠিক আছে। অতঃপর আমি বের হলাম। যখন আমি মক্কার বাড়িগুলোর নিকটতম একটি বাড়ির কাছে পৌঁছলাম, তখন গান, দফ এবং বাঁশির শব্দ শুনতে পেলাম। আমি জিজ্ঞেস করলাম: এটা কীসের শব্দ? তারা বলল: অমুক ব্যক্তি অমুক মহিলাকে বিয়ে করেছে (অর্থাৎ কুরাইশ গোত্রের এক ব্যক্তি এক মহিলাকে বিয়ে করেছে)। আমি সেই গান ও শব্দে মনোনিবেশ করলাম, অবশেষে আমার চোখে ঘুম জেঁকে বসল। আমি ঘুমিয়ে পড়লাম। সূর্যের তাপ ছাড়া অন্য কিছু আমাকে জাগায়নি। পরদিন আমি আবার গেলাম এবং অনুরূপ শব্দ শুনলাম। আমাকে অনুরূপ উত্তর দেওয়া হলো যা পূর্বে দেওয়া হয়েছিল। আমি যা শুনলাম তাতে মনোনিবেশ করলাম, এমনকি আমার চোখে ঘুম জেঁকে বসল। সূর্যের তাপ ছাড়া অন্য কিছু আমাকে জাগায়নি। এরপর আমি আমার সঙ্গীর কাছে ফিরে গেলাম। সে জিজ্ঞেস করল: তুমি কী করেছ? আমি বললাম: আমি কিছুই করতে পারিনি।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: "আল্লাহর কসম! এরপর থেকে জাহিলিয়াতের লোকেরা যে খারাপ কাজ করত, আমি নবুওয়াত দ্বারা আল্লাহ তাআলা আমাকে সম্মানিত করার আগ পর্যন্ত আর কখনো সে বিষয়ে মনোনিবেশ করিনি।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] ما بين المعقوفين سقط من نسخنا الخطية، وأثبتناه من "دلائل النبوة" للبيهقي 2/ 33 حيث رواه عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد، والمتن عنده بنحوه، وهو الموافق لما في مصادر التخريج.



[2] في النسخ: الصوت، والمثبت من "تلخيص الذهبي" وابن حبان.



7811 [3] - إسناده حسن من أجل ابن إسحاق -وهو محمد صاحب السيرة- وشيخه محمد بن عبد الله ابن قيس، وحسَنه الحافظ ابن حجر في "المطالب العالية" (4212)، بينما قال ابن كثير في "البداية والنهاية" 3/ 447: حديث غريب جدًا.وأخرجه ابن حبان (6273) من طريق جرير بن حازم، عن محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد. وانظر تتمة تخريجه فيه.قال في "اللسان": زَمَرَ يَزمِرُ ويَزمُرُ زَمْرًا وزَمِيرًا وزَمَرانًا: غَنَّى فِي القَصَب.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7812)


7812 - أخبرني عبد الله بن الحسين القاضي، حدثنا الحارث بن أبي أسامة، حدثنا رَوْح بن عُبَادة، حدثنا زكريا بن إسحاق، حدثنا عمرو بن دينار، عن عطاء، عن ابن عباس في قول الله عز وجل: {الَّذِينَ يَجْتَنِبُونَ كَبَائِرَ الْإِثْمِ وَالْفَوَاحِشَ إِلَّا اللَّمَمَ} [النجم: 32] قال: هو الرجل يُصِيبُ الفاحشةُ يُلِمُّ بها، ثم يتوبُ منها [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা-এর বাণী: {যারা গুরুতর পাপ এবং অশ্লীল কাজ থেকে বিরত থাকে, সামান্য ত্রুটি (আল-লামাম) ব্যতীত} [সূরা নাজম: ৩২] সম্পর্কে তিনি বলেন: 'আল-লামাম' হলো সেই ব্যক্তি যে অশ্লীল কর্মে লিপ্ত হয়, তাতে জড়িয়ে পড়ে, অতঃপর সে তা থেকে তওবা করে।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح. وهو مكرر (3792)، وانظر ما سلف برقم (181). واللمّة من السرقة ثم يتوب ولا يعود. والحسن لم يسمع من أبي هريرة.وأخرجه الحسين المروزي في زوائده على "الزهد" لابن المبارك (1095)، والطبري 27/ 67 من طرق عن الحسن من قوله. وهو الأشبه.وأخرج البخاري (6243)، ومسلم (2657) عن ابن عباس، قال: ما رأيت شيئًا أشبه باللمم مما قال أبو هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم: "إنَّ الله كتب على ابن آدم حظَّه من الزني، أدرك ذلك لا محالةَ، فزني العين النظر، وزنى اللسان المنطق، والنفسُ تمنَّى وتشتهي، والفرجُ يصدّق ذلك كله ويكذبه".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7813)


7813 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن سِنَان القزَّاز، حدثنا أبو عامر عبد الملك بن عمرو العَقَدي، حدثنا عبد الحميد بن عبد الله بن كَثير المكي، حدثنا سعيد بن ميناء قال: كنتُ عند أبي هريرة، فقلتُ: يا أبا هريرة: {الَّذِينَ يَجْتَنِبُونَ كَبَائِرَ الْإِثْمِ وَالْفَوَاحِشَ … }، فما اللَّمَمُ؟ قال: كلُّ شيءٍ ما لم يَدخُل المِرْوَدُ في المُكْحُلة، فإِذا دَخَل فذلك الزِّنى [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাঈদ ইবনু মীনা বলেন, আমি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ছিলাম। আমি বললাম, হে আবূ হুরায়রা! (আল্লাহ্‌র বাণী) “{যারা কবীরা গুনাহ এবং অশ্লীলতা পরিহার করে...}”— এখানে ‘আল-লামাম’ (ক্ষুদ্র পাপ) কী? তিনি বললেন, (ক্ষুদ্র পাপ) সবকিছুই, যতক্ষণ পর্যন্ত সুরমা লাগানোর শলাকাটি সুরমাদানির ভেতরে প্রবেশ না করে। তবে যখন তা প্রবেশ করে, তখন সেটিই যিনা (ব্যভিচার)।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث جيد، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل محمد بن سنان القزاز، وقد توبع.وأخرجه أبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 2/ 356 - 357 من طريق أبي بشر يحيى بن محمد بن قيس، عن أبي عامر العقدي، بهذا الإسناد.وأخرجه مسدد في "مسنده" كما في "إتحاف الخيرة" (3086)، والطبري في "التفسير" 27/ 66، والخرائطي في "اعتلال القلوب" (122) من طريق عبد الرحمن بن نافع الطائفي، قال: إنَّ أبا هريرة سُئل عن هذه الآية وهو شاهد: {الَّذِينَ يَجْتَنِبُونَ كَبَائِرَ الْإِثْمِ وَالْفَوَاحِشَ إِلَّا اللَّمَمَ} قال: هي النظرة والغمزة والقُبلة والمباشَرة، فإذا مسَّ الختانُ الختانَ فهو الزنى، وقد وجب الغُسل. وسنده حسن في المتابعات والشواهد.وروى الحسن البصري عن أبي هريرة عند الطبري في تفسيره 27/ 66 - 67، والبيهقي في "شعب الإيمان" (6657) و (6658) من طريق يونس بن عبيد، عن الحسن، عن أبي هريرة - عند الطبري: أُراه رفعه، وعند البيهقي: عن الحسن عن النبي صلى الله عليه وسلم، أو عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم في قوله عز وجل: {يَجْتَنِبُونَ كَبَائِرَ الْإِثْمِ وَالْفَوَاحِشَ إِلَّا اللَّمَمَ} قال: اللمّة من الزني، ثم يتوب ولا يعود، واللمّة من السرقة ثم يتوب ولا يعود. والحسن لم يسمع من أبي هريرة.وأخرجه الحسين المروزي في زوائده على "الزهد" لابن المبارك (1095)، والطبري 27/ 67 من طرق عن الحسن من قوله. وهو الأشبه.وأخرج البخاري (6243)، ومسلم (2657) عن ابن عباس، قال: ما رأيت شيئًا أشبه باللمم مما قال أبو هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم: "إنَّ الله كتب على ابن آدم حظَّه من الزني، أدرك ذلك لا محالةَ، فزني العين النظر، وزنى اللسان المنطق، والنفسُ تمنَّى وتشتهي، والفرجُ يصدّق ذلك كله ويكذبه".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7814)


7814 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الرَّبيع بن سليمان، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، أنَّ درَّاجًا حدَّثه عن ابن حُجَيرة [1]، عن أبي هريرة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لو أنكم لا تُخطِئون لأتَى اللهُ بقومٍ يُخطِئون يَغفِرُ لهم" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وشاهدُه حديث عبد الله بن عمرو:




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি তোমরা ভুল না করতে, তবে আল্লাহ এমন এক জাতিকে আনয়ন করতেন যারা ভুল করত এবং তিনি তাদেরকে ক্ষমা করে দিতেন।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ إلى: حجير.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل درّاج أبي السمح. ابن حجيرة: هو عبد الرحمن الخولاني.وأخرجه أحمد 13/ (8082)، ومسلم (2749) من طريق يزيد بن الأصم، عن أبي هريرة، مرفوعًا: "والذي نفسي بيده، لو لم تذنبوا، لذهب الله بكم ولجاء بقوم يذنبون فيستغفرون الله، فيغفر لهم".وأخرجه ضمن حديث مطول أحمد (8043) و (8044)، وابن حبان (7387) من طريق أبي المدلّة مولى عائشة، عن أبي هريرة بنحوه. وهو عند الترمذي (2526)، لكن وقع في سنده خطأ وانقطاع.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7815)


7815 - حدَّثَناه أبو عمرو عثمان بن عبد الله بن السَّمَّاك، حدثنا أبو قِلابة، حدثنا أبو عبَّاد يحيى بن عبَّاد ويحيى بن كثير بن دِرهَم، قالا: حدثنا شُعبة، عن أبي بَلْج يحيى بن أبي سُلَيم، عن عمرو بن ميمون، عن عبد الله بن عمرو [1]، أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال: "لو أنَّ العِبادَ لم يُذنِبوا، لخَلَقَ اللهُ عز وجل خَلقًا يُذنِبون ثم يَغْفِرُ لهم، وهو الغَفُورُ الرَّحيم" [2].




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যদি বান্দারা গুনাহ না করত, তাহলে আল্লাহ্ তা‘আলা এমন এক সৃষ্টি তৈরি করতেন যারা গুনাহ করবে, অতঃপর তিনি তাদেরকে ক্ষমা করে দেবেন, আর তিনিই হলেন ক্ষমাশীল, পরম দয়ালু।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ إلى: عمر.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد لا بأس برجاله، لكن اختلف على شعبة في رفعه ووقفه.فأخرجه مرفوعًا عن شعبةَ يحيى بنُ عباد كما عند المصنّف، ويحيى بنُ كثير عنده وعند البزار (2450)، والطبراني في "الأوسط" (1454)، وشبابة بن سوّار فيما ذكر البزار.وأخرجه موقوفًا عن شعبة عليُّ بنُ الجعد كما في "الجعديات" للبغوي (80)، ومحمد بن جعفر عند البزار (2449). وقال البزار: هذا الحديث لم يسنده محمد بن جعفر، وأسنده يحيى بن كثير وشبابة بن سوار. المعرور بن سويد، به. لم يسق البزار لفظه، وساقه النجاد بنحو رواية المصنّف.وأخرج الشطر الأول منه بنحوه أحمد (21374) من طريق يزيد بن نعيم، عن أبي ذر.أما في باب تحديث النفس بالحسنة، والسيئة، فقد صحّ حديثُ ابن عباس عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فيما يروي عن ربه عز وجل قال: " … من همّ بحسنة فلم يعملها كتبها الله له عنده حسنة كاملة، فإن هو همَّ بها فعملها كتبها الله له عنده عشر حسنات إلى سبع مئة ضعف إلى أضعاف كثيرة، ومن همَّ بسيئة فلم يعملها كتبها الله له عنده حسنة كاملة، فإن هو همّ بها فعملها كتبها الله له سيئة واحدة".أخرجه البخاري (6491)، ومسلم (131).ونحوه من حديث أبي هريرة عند البخاري (7501) مسلم (129)، وحديث أنس عند مسلم (162).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7816)


7816 - حَدَّثَنَا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حَدَّثَنَا إسماعيل بن إسحاق ومحمد بن غالب، قالا: حَدَّثَنَا أبو همَّام محمد بن مُحَبَّب، حَدَّثَنَا إبراهيم بن طَهْمان، عن منصور، عن رِبْعي بن حِراش، عن المَعرُور بن سُويد، عن أبي ذرٍّ قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "يقولُ الله عز وجل: ابنَ آدَمَ، إِنْ دَنَوتَ منِّي شِبرًا دَنوتُ منك ذِراعًا، وإنْ دنوتَ منِّي ذراعًا دنوتُ منك باعًا.ابنَ آدمَ، إِنْ حدَّثتَ نفسَك بحسنةٍ فلم تَعمَلْها كتبتُها لك حسنةً، وإِنْ عَمِلتها كتبتُها لك عَشْرًا، وإِنْ هَمَمتَ بسيئةٍ فحَجَزَك عنها هَيْبتي كتبتُها لك حسنةً، وإِنْ عَمِلتَها كتبتُها سيئةً واحدةً" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: আল্লাহ তাআলা বলেন, হে আদম সন্তান, যদি তুমি আমার দিকে এক বিঘত এগিয়ে আসো, আমি তোমার দিকে এক হাত এগিয়ে যাই। আর যদি তুমি আমার দিকে এক হাত এগিয়ে আসো, আমি তোমার দিকে এক বাহু (দুই হাত পরিমাণ) এগিয়ে যাই। হে আদম সন্তান, যদি তুমি কোনো ভালো কাজ করার ইচ্ছা করো কিন্তু তা না করো, আমি তোমার জন্য একটি নেকি লিখি। আর যদি তুমি তা করো, আমি তোমার জন্য দশটি লিখি। আর যদি তুমি কোনো খারাপ কাজ করার সংকল্প করো, কিন্তু আমার প্রতি ভয়ের কারণে তা থেকে বিরত থাকো, আমি তোমার জন্য একটি নেকি লিখি। আর যদি তুমি তা করো, আমি তোমার জন্য মাত্র একটি গুনাহ লিখি।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] شاذٌّ بهذا اللفظ الذي فيه تحديث النفس من حديث أبي ذر، وهو على ثقة رجاله انفرد به إبراهيم بن طهمان عن منصور - وهو ابن المعتمر - ويقع لإبراهيم أشياء لا يتابع عليها ينفرد بها كما أشار الذهبي في "السير" 7/ 383، وقد روى الحديثَ عن المعرور بن سويدٍ الأعمشُ وعاصمُ بن بهدلة ليس فيه قصة التحديث بالنفس كما سلف عند المصنّف برقم (7797)، وذاك هو المحفوظ في حديث أبي ذر، والله أعلم.وأما حديث ابن طهمان هذا، فقد أخرجه البزار (3990) عن أحمد بن المعلى الأدمي، عن محمد بن محبّب، بهذا الإسناد. ولم يسق لفظه.وأخرجه أيضًا البزار (3989) من طريق محمد بن محبب، وأبو بكر النجّاد في "أماليه" (3) من طريق أبي حذيفة النهدي، كلاهما عن ابن طهمان عن منصور، عن لاحق بن حميد، عن المعرور بن سويد، به. لم يسق البزار لفظه، وساقه النجاد بنحو رواية المصنّف.وأخرج الشطر الأول منه بنحوه أحمد (21374) من طريق يزيد بن نعيم، عن أبي ذر.أما في باب تحديث النفس بالحسنة، والسيئة، فقد صحّ حديثُ ابن عباس عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فيما يروي عن ربه عز وجل قال: " … من همّ بحسنة فلم يعملها كتبها الله له عنده حسنة كاملة، فإن هو همَّ بها فعملها كتبها الله له عنده عشر حسنات إلى سبع مئة ضعف إلى أضعاف كثيرة، ومن همَّ بسيئة فلم يعملها كتبها الله له عنده حسنة كاملة، فإن هو همّ بها فعملها كتبها الله له سيئة واحدة".أخرجه البخاري (6491)، ومسلم (131).ونحوه من حديث أبي هريرة عند البخاري (7501) مسلم (129)، وحديث أنس عند مسلم (162).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7817)


7817 - حَدَّثَنَا إبراهيم بن عِصْمة بن إبراهيم العَدْل، حَدَّثَنَا أبي، حَدَّثَنَا يحيى بن يحيى، أخبرنا جَرير، عن عطاء بن السائب، عن أبي عبد الرحمن، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن ذَكَرَ الله تعالى في نفسِه، ذكرَه اللهُ في نفسه، ومَن ذَكَرَ الله في ملأٍ، ذكرَه اللهُ في ملأٍ هم أكثرُ من المَلأ الذين ذكرَه فيهم وأطيبُ.ومن تقرَّبَ إلى الله شبرًا تقرّب اللهُ منه ذِراعًا، ومن تقرَّب من الله ذِراعًا تقرّب اللهُ منه باعًا، ومن أتى الله مشيًا أتاه هَرْولةً، ومن أتَى اللَّهَ هَرُولَةً أَتاه اللهُ سَعْيًا" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة.وأبو عبد الرحمن هذا: هو عبد الله بن حَبيب السُّلمي.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি আল্লাহ তাআলাকে একাকী (তার মনে) স্মরণ করে, আল্লাহও তাকে একাকী স্মরণ করেন। আর যে ব্যক্তি কোনো মজলিসে (বা জনসমাবেশে) আল্লাহকে স্মরণ করে, আল্লাহও তাকে এমন মজলিসে স্মরণ করেন, যা সেই মজলিস অপেক্ষা বেশি সংখ্যক ও পবিত্র। আর যে ব্যক্তি আল্লাহর দিকে এক বিঘত পরিমাণ অগ্রসর হয়, আল্লাহ তার দিকে এক হাত পরিমাণ অগ্রসর হন। আর যে ব্যক্তি আল্লাহর দিকে এক হাত পরিমাণ অগ্রসর হয়, আল্লাহ তার দিকে এক ‘বা’ (বাহুর বিস্তৃতি) পরিমাণ অগ্রসর হন। আর যে আল্লাহর দিকে হেঁটে অগ্রসর হয়, আল্লাহ তার দিকে হালকা দৌড়িয়ে (ত্বরিত পদক্ষেপে) আসেন। আর যে আল্লাহর দিকে হালকা দৌড়িয়ে (ত্বরিত পদক্ষেপে) আসে, আল্লাহ তার দিকে দ্রুত বেগে আগমন করেন।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن رواية جرير - وهو ابن عبد الحميد - عن عطاء بن السائب بعد الاختلاط، وخالفه حماد بن سلمة فرواه عن عطاء عن الأغر أبي مسلم عن أبي هريرة، وهو الصواب، وصحَّ أيضًا من طرق أخرى عن أبي هريرة كما سيأتي.وأخرجه إسحاق بن راهويه في "مسنده" (233) عن جرير بن عبد الحميد، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (15/ 9254) عن عفّان بن مسلم، وابن حبان (328) مطولًا من طريق هدبة بن خالد، كلاهما عن حمّاد بن سلمة، عن عطاء بن السائب، عن الأغر أبي مسلم، عن أبي هريرة.وأخرجه أحمد (13/ 8650) عن حسن بن موسى الأشيب، عن حماد، به. لكن سمَّى الأغرَّ سلمانَ، وهو وهمٌ، انظر ما علقناه على الحديث (7382) في "مسند أحمد".وأخرجه تامًّا ومختصرًا أحمد (12/ 7422) و (15/ 9351) و (16/ 10224)، والبخاري (7405)، ومسلم (2675) (1) و (2) و (21)، وابن ماجه (3822)، والترمذي (3603)، والنسائي (7683)، وابن حبان (811) و (812) من طريق أبي صالح السمان، وأحمد (15/ 9617) و (16/ 10619)، والبخاري (7537)، ومسلم (2686) (20)، وابن حبان (376) من طريق أنس بن مالك، وأخرجه أحمد (13/ 8193)، ومسلم (2675) (3) من طريق همام بن منبه، وأخرجه أحمد (13/ 8650) من طريق الحسن البصري، و (16/ 10253) من طريق عبد الرحمن ابن أبي عمرة، و (16/ 10498) من طريق موسى بن يسار المدني، وابن حبان (810) من طريق أبي حازم سلمان الأشجعي، سبعتهم عن أبي هريرة. وقال الترمذي: حسن صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7818)


7818 - حَدَّثَنَا أبو الحسين [1] أحمد بن إسحاق العَدْل الصَّيدلاني، حَدَّثَنَا الفضل بن محمد الشَّعْراني، حَدَّثَنَا إسماعيل بن أبي أُويس، حَدَّثَنَا إبراهيم بن سعد، عن صالح بن كَيْسان، عن الأعرج، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لَتدخُلُنَّ الجنَّةَ إِلَّا من أبَى وشَرَدَ على الله كشِرَاد البَعير" [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وقد أخرجه البخاريُّ رحمه الله عن محمد بن سِنان العَوَقي، عن فُليح بن سُليمان، عن هِلال بن علي، عن عطاء بن يسار، عن أبي هريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "كلُّ أمّتي يدخلون الجنَّةَ إِلَّا من أَبَى" قيل: يا رسول الله، ومن يأْبَى؟ قال: "مَن عَصَانِي فقد أَبَى" [3]. وقد رُويَ المتنُ الأول عن أبي أُمامة الباهلي:




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা অবশ্যই জান্নাতে প্রবেশ করবে, তবে যে অস্বীকার করবে এবং উটের পলায়নের মতো আল্লাহ থেকে পলায়ন করবে (সে প্রবেশ করবে না)।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] هكذا وقع مكنًّى هنا، وفي مصنفات البيهقي مكنًّى بأبي الحسن مكبرًا، بينما كنَّاه الذهبي في "تاريخ الإسلام" 7/ 705 أبا بكر.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل إسماعيل بن أبي أويس وقد توبع عند المصنّف فيما سلف برقم (184).



7818 [3] - البخاري في "صحيحه" برقم (7280). ولفظه عنده: "من أطاعني دخل الجنة، ومن عصاني فقد أَبَى".