আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
7919 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حَدَّثَنَا يحيى بن محمد بن يحيى [حَدَّثَنَا مُسدَّد] [1] حَدَّثَنَا يحيى - وهو ابن سعيد - عن زكريا بن أبي زائدة، عن عامر، عن عبد الله بن مُطِيع بن الأسود، عن أبيه قال: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يومَ الفتح يقول: "لا يُقتلَنَّ قرشيٌّ بعد هذا اليوم صَبْرًا إلى يوم القيامة". قال: ولم يُدرِكْ [2] أحدٌ من عُصَاة قريشٍ الإسلامَ غير أَبي، قال: وكان اسمه العاصِ، فسمَّاه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم مُطيعًا [3].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه!
মুতী’ ইবনু আসওয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি মক্কা বিজয়ের দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "আজকের দিনের পর থেকে কিয়ামত পর্যন্ত কোনো কুরাইশীকে যেন আর ‘সবরন’ (বন্দী করে নিষ্ঠুরভাবে) হত্যা করা না হয়।" তিনি (রাবী) বলেন, কুরাইশের অবাধ্যদের মধ্যে আমার পিতা ছাড়া আর কেউ ইসলাম গ্রহণ করেনি। তিনি আরো বলেন, তাঁর (পিতার) নাম ছিল আল-আস, অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর নাম পরিবর্তন করে মুতী’ রেখেছিলেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] سقط من النسخ الخطية، وأثبتناه من "إتحاف المهرة" (16583).
[2] في النسخ الخطية: يترك، وجاء على الصواب في "تلخيص الذهبي". في مسنده" (1493)، وابن قانع في "معجم الصحابة" 3/ 83 من طريق معاذ بن هانئ البهراني، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري في "الأدب المفرد" (824) وفي "تاريخه الكبير" 7/ 252، وابن أبي خيثمة في السفر الثالث من "تاريخه" (474) و (1842)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2766)، وأبو يعلى (6840)، والروياني (1493)، والطبراني في "المعجم الكبير" 19/ (1050)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (6044)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (4859)، والخطيب في "المتفق والمفترق" (877)، والمزي في "تهذيب الكمال" 14/ 392 من طرق عن عبد الله بن الحارث، به. وقال البزار: لا نعلم روى مسلم أبو ريطة إلّا هذا.
7919 [3] - إسناده صحيح. يحيى بن سعيد: هو القطان، وعامر: هو الشعبي.وأخرجه ابن حبان (3718) عن أبي خليفة الفضل بن الحباب، عن مسدد بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (24/ 15409) و (29/ 17867) عن يحيى بن سعيد القطان، به.وأخرجه تامًّا ومختصرًا أحمد (24/ 15407) و (29/ 17868)، ومسلم (1782) من طرق عن زكريا بن أبي زائدة به. واستدراك الحاكم له ذهول منه.وأخرجه أحمد (24/ 15408) و (29/ 17869) من طريق عبد الله بن أبي السفر، عن عامر الشعبي، به. وزاد فيه: "لا تغزى مكة بعد هذا العام أبدًا".وأخرجه مختصرًا أحمد (24/ 15406) و (29/ 17866) من طريق فراس بن يحيى، عن الشعبي قال: قال مطيع بن الأسود، فذكره، ليس فيه عبد الله بن مطيع.وقد روي هذا الحديث عن زكريا بن أبي زائدة عن الشعبي عن الحارث بن مالك فيما سلف برقم (6778)، وتكلمنا عليه هناك.قوله: "عصاة قريش" معناه: ممَّن يُسمَّى العاص. في مسنده" (1493)، وابن قانع في "معجم الصحابة" 3/ 83 من طريق معاذ بن هانئ البهراني، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري في "الأدب المفرد" (824) وفي "تاريخه الكبير" 7/ 252، وابن أبي خيثمة في السفر الثالث من "تاريخه" (474) و (1842)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2766)، وأبو يعلى (6840)، والروياني (1493)، والطبراني في "المعجم الكبير" 19/ (1050)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (6044)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (4859)، والخطيب في "المتفق والمفترق" (877)، والمزي في "تهذيب الكمال" 14/ 392 من طرق عن عبد الله بن الحارث، به. وقال البزار: لا نعلم روى مسلم أبو ريطة إلّا هذا.
7920 - حَدَّثَنَا علي بن حَمْشاذ العدل، حَدَّثَنَا هشام بن علي السَّدوسي، حَدَّثَنَا معاذ بن هانئ، حَدَّثَنَا عبد الله بن الحارث بن أَبْزَى المكي، حدثتني رَيْطة بنت مسلم، عن أبيها: أنه شَهِدَ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم حُنينًا، قال: "ما اسمُك؟ " قال: غُرابٌ، قال: "اسمُك مُسلِم" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
মুসলিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হুনাইনের যুদ্ধে উপস্থিত ছিলেন। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁকে) জিজ্ঞেস করলেন, "তোমার নাম কী?" সে উত্তর দিল, "গুরআব (দাঁড়কাক)।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমার নাম মুসলিম।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده محتمل للتحسين، ريطة - ويقال: رائطة - بنت مسلم راوية الحديث عن أبيها، لم يرو عنها غير ابنها عبد الله بن الحارث، وهو قد روى عنه جمع، وقال فيه أبو حاتم: شيخ لا بأس به.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 8/ 23، والبزار (1995 - كشف الأستار)، والروياني في مسنده" (1493)، وابن قانع في "معجم الصحابة" 3/ 83 من طريق معاذ بن هانئ البهراني، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري في "الأدب المفرد" (824) وفي "تاريخه الكبير" 7/ 252، وابن أبي خيثمة في السفر الثالث من "تاريخه" (474) و (1842)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2766)، وأبو يعلى (6840)، والروياني (1493)، والطبراني في "المعجم الكبير" 19/ (1050)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (6044)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (4859)، والخطيب في "المتفق والمفترق" (877)، والمزي في "تهذيب الكمال" 14/ 392 من طرق عن عبد الله بن الحارث، به. وقال البزار: لا نعلم روى مسلم أبو ريطة إلّا هذا.
7921 - أخبرني عبد الرحمن بن الحسن القاضي، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا شُعبة.وأخبرني أبو عمرو [1] بن مَطَر العَدْل، حدثنا يحيى بن محمد بن البَخْتَري، حدثنا عبيد الله بن معاذ، حدثنا أبي، حدثنا شُعبة، قال: سمعتُ أبا إسحاق يُحدِّث عن خَيْثمةَ: أنَّ جده سمَّى أباه عَزيزًا، فذَكَرَ ذلك للنبي، فسمَّاه عبدَ الرحمن [2]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুর রহমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (খায়সামা সূত্রে বর্ণিত) তাঁর দাদা (পূর্বপুরুষ) তাঁর পিতার নাম আযীয রেখেছিলেন। এরপর তা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উল্লেখ করা হলে তিনি তাঁর নাম রাখলেন আব্দুর রহমান।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: عمر.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات غير عبد الرحمن بن الحسن شيخ المصنف في الإسناد الأول، ففيه ضعف، لكنه متابع، وظاهر الإسناد الإرسال، لكنه جاء موصولًا من رواية خيثمة بن عبد الرحمن عن أبيه عند غير المصنف كما سيأتي.وأخرجه ابن حبان (5828) من طريق سفيان الثوري، عن أبي إسحاق السبيعي، بهذا الإسناد. ورواه الجرّاح أبو وكيع عن أبي إسحاق السبيعي عن خيثمة مرسلًا مرة وموصولًا أخرى بذكر عبد الرحمن أبي خيثمة، فالمرسل رواه عنه حسين بن محمد عند أحمد 29/ (17606)، والموصول رواه عنه ابنه وكيع عند أحمد أيضًا (17604). وزاد في رواية حسين بن محمد: "إِنَّ الأسماء عبد الله وعبد الرحمن والحارث، واقتصر وكيع في روايته على ذكر الزيادة.ورواه يونس بن أبي إسحاق عن أبيه عن خيثمة، واختلف عليه أيضًا، فرواه عنه أبو نعيم عند أحمد (17608) مرسلًا، ورواه عنه وكيع عنده أيضًا (17604) موصولًا بذكر عبد الرحمن أبي خيثمة.
7922 - أخبرنا محمد بن يعقوب الشَّيباني، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا مسدَّد، حدثنا بشر بن المفضّل، حدثنا بشير بن ميمون، عن عمه أسامة بن أَخدري: أنَّ رجلًا من بني شَقِرة يُقال له: أَصرَمُ، كان في النَّفر الذين أتَوُا النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فأتاه بغلامٍ له حَبَشي اشتراه بتلك البلاد، فقال: يا رسولَ الله، إنّي اشتريتُ هذا، فأحببتُ أن تُسمِّيَه وتدعوَ له بالبَرَكة، قال: "ما اسمُك؟ " قال: أصرَمُ، قال: "أنت زُرْعةُ، فما تريدُ؟ " قال: أَسْمِ هذا الغلامَ، قال: "فهو عاصمٌ"، وقَبَضَ كفَّه [1]هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
উসামা ইবনে আখদারী থেকে বর্ণিত, বনি শাক্বিরা গোত্রের আসরাম নামক একজন লোক সেই দলের মধ্যে ছিলেন যারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করেছিলেন। অতঃপর সে তার একটি হাবশী গোলামকে নিয়ে তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিকট আসল, যাকে সে ঐ অঞ্চলে কিনেছিল। সে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমি এই গোলামকে কিনেছি, তাই আমি পছন্দ করি যে আপনি তার নাম রাখুন এবং তার জন্য বরকতের দু'আ করুন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: "তোমার নাম কী?" সে বলল: আসরাম। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি হলে যুরআহ। তুমি কী চাও?" সে বলল: এই গোলামটির নাম রাখুন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে সে হল আসিম।" আর তিনি তাঁর হাত মুষ্টিবদ্ধ করলেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده حسن من أجل بشير بن ميمون.وأخرجه أبو داود (4954) عن مسدد بن مسرهد، بهذا الإسناد مختصرًا.قال الخطّابي: إنما غير اسم الأصرم لما فيه من معنى الصَّرم، وهو القطيعة، يقال: صرمتُ الحبل: إذا قطعتَه، وصرمتُ النخلة: إذا جَدَدتَ ثمرها. وإنما غيَّره لأنَّ فيه إيهام انقطاع الخير والبركة، وزُرْعة مشعرٌ بهما، لأنه من الزراعة، ويحصل بها الخير والبركة.
7923 - أخبرنا أبو بكر بن قُريش، حدثنا الحسن بن سفيان، حدثنا أبو الربيع الزَّهراني، حدثنا أبو قُتَيبة سَلْم بن قُتيبة، حدثنا حَمَل بن بَشير بن أبي حَدْرَد، حدثني، عمِّي، عن أبي حَدْرَد، أن النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال: مَن يَسُوقُ إبلنا هذه؟ " فقام رجلٌ فقال: أنا، فقال: "ما اسمُك؟ " قال: فلان قال: "اجلِسْ"، ثم قام آخرُ فقال: أنا، فقال: "ما اسمُك؟ " قال: فلان، قال: "اجلِسْ"، ثم قام آخرُ فقال: أنا، فقال: "ما اسمُك؟ " قال: ناجيَةُ، قال: "أنت لها فسُقْها" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবু হাদ্দারদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমাদের এই উটগুলো কে চালাবে?" তখন একজন লোক দাঁড়িয়ে বললো: আমি। তিনি বললেন: "তোমার নাম কী?" সে বললো: অমুক। তিনি বললেন: "বসে পড়ো।" এরপর আরেকজন দাঁড়িয়ে বললো: আমি। তিনি বললেন: "তোমার নাম কী?" সে বললো: অমুক। তিনি বললেন: "বসে পড়ো।" এরপর আরেকজন দাঁড়িয়ে বললো: আমি। তিনি বললেন: "তোমার নাম কী?" সে বললো: নাজিয়াহ। তিনি বললেন: "তুমিই এর জন্য উপযুক্ত, সুতরাং তুমিই এগুলো চালাও।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف لجهالة حَمَل بن بشير ولإبهام عمه.وأخرجه البخاري في "الأدب المفرد" (812)، وابن أبي عاصم في الآحاد والمثاني" (2370)، والروياني في مسنده (1479)، والطبراني في "الكبير" 22/ (886) من طريق محمد بن المثنى، عن سلم بن قتيبة بهذا الإسناد. وقرن ابن أبي عاصم بمحمد بن المثنى عقبةَ بن مكرم. ووقع في بعض هذه المصادر تحريفات.
7924 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ حدثنا محمد بن عمرو الحَرَشي، حدثنا يحيى بن يحيى، أخبرنا إبراهيم بن سعد، حدثني أبي، عن أبيه، عن عبد الرحمن بن عوف قال: كان اسمي في الجاهلية عبدَ عَمرٍو، فسمَّاني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عبدَ الرحمن [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه.
আব্দুর রহমান ইবনে আউফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, জাহেলী যুগে আমার নাম ছিল আব্দুল আমর। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার নাম রাখলেন আব্দুর রহমান।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن. وسلف برقم (5419). وأخرجه ابن سعد في الطبقات الكبرى 9/ 25، والدينوري في "المجالسة" (2497)، والطبراني في "الكبير" (22/ (442)، وعبد الغني المصري في "الغوامض والمبهمات" (30)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (6538)، والخطيب في الأسماء المبهمة 5/ 329 - 330، وابن بشكوال في "غوامض الأسماء المبهمة" 2/ 617 من طرق عن معلى بن أسد، بهذا الإسناد. وتحرف معلَّى في "المجالسة" إلى: معاذ!
7925 - حدثنا أبو سعيد أحمد بن يعقوب الثَّقفي، حدثنا أبو مُسلم، حدثنا عمرو بن مرزوق، حدثنا عمران القطان، عن قتادة، عن زُرَارة بن أَوفى، عن سعد بن هشام، عن عائشة: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال الرجل: "ما اسمك؟ " قال: شِهَاب، قال: "أنت هِشَام" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وإذا الرجلُ هشامُ بن عامر [2] الأنصاري:
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এক ব্যক্তিকে বললেন, "তোমার নাম কী?" লোকটি বলল, "শিহাব।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি হিশাম।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده حسن من أجل عمران - وهو ابن داور - القطان أبو مسلم: هو إبراهيم بن عبد الله بن مسلم الكجّي، وسعد بن هشام: هو ابن عامر الأنصاري.وأخرجه أحمد 41/ (24465)، وابن حبان (5823) من طريق أبي داود الطيالسي، عن عمران القطان، بهذا الإسناد.وانظر ما بعده. وأخرجه ابن سعد في الطبقات الكبرى 9/ 25، والدينوري في "المجالسة" (2497)، والطبراني في "الكبير" (22/ (442)، وعبد الغني المصري في "الغوامض والمبهمات" (30)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (6538)، والخطيب في الأسماء المبهمة 5/ 329 - 330، وابن بشكوال في "غوامض الأسماء المبهمة" 2/ 617 من طرق عن معلى بن أسد، بهذا الإسناد. وتحرف معلَّى في "المجالسة" إلى: معاذ!
[2] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: عمرو. وأخرجه ابن سعد في الطبقات الكبرى 9/ 25، والدينوري في "المجالسة" (2497)، والطبراني في "الكبير" (22/ (442)، وعبد الغني المصري في "الغوامض والمبهمات" (30)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (6538)، والخطيب في الأسماء المبهمة 5/ 329 - 330، وابن بشكوال في "غوامض الأسماء المبهمة" 2/ 617 من طرق عن معلى بن أسد، بهذا الإسناد. وتحرف معلَّى في "المجالسة" إلى: معاذ!
7926 - أخبرنا عبد الرحمن بن حَمْدان الجَلَّاب، حدثنا أبو حاتم الرازي، حدثنا المُعلَّى بن أَسدٍ [1] قال: عبد العزيز بن المُختار قال: حدثنا علي بن زيد، عن الحسن، عن هشام بن عامر قال: أتيتُ النبيَّ، صلى الله عليه وسلم، فقال: "ما اسمُك؟ " قلت: شِهَاب، قال: "بل أنت هِشامٌ" [2].
হিশাম ইবনে আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন, “তোমার নাম কী?” আমি বললাম, শিহাব। তিনি বললেন, “না, বরং তুমি হলে হিশাম।”
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: راشد. وأخرجه ابن سعد في الطبقات الكبرى 9/ 25، والدينوري في "المجالسة" (2497)، والطبراني في "الكبير" (22/ (442)، وعبد الغني المصري في "الغوامض والمبهمات" (30)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (6538)، والخطيب في الأسماء المبهمة 5/ 329 - 330، وابن بشكوال في "غوامض الأسماء المبهمة" 2/ 617 من طرق عن معلى بن أسد، بهذا الإسناد. وتحرف معلَّى في "المجالسة" إلى: معاذ!
[2] حديث حسن بما قبله، وهذا إسناد ضعيف، علي بن زيد - وهو ابن جدعان ضعيف، والحسن البصري مدلس، ولم يصرح بسماعه من هشام بن عامر. وأخرجه ابن سعد في الطبقات الكبرى 9/ 25، والدينوري في "المجالسة" (2497)، والطبراني في "الكبير" (22/ (442)، وعبد الغني المصري في "الغوامض والمبهمات" (30)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (6538)، والخطيب في الأسماء المبهمة 5/ 329 - 330، وابن بشكوال في "غوامض الأسماء المبهمة" 2/ 617 من طرق عن معلى بن أسد، بهذا الإسناد. وتحرف معلَّى في "المجالسة" إلى: معاذ!
7927 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن سلمان الفقيه ببغداد، حدثنا هلال بن العلاء الرَّقّي، حدثنا أبي، حدثنا عُبيد الله [1] بن عمرو، عن عبد الله بن محمد بن عَقِيل، عن أبيه، عن علي: أنه سمَّى ابنه الأكبر باسم عمِّه حمزةَ، وسمَّى حُسينًا بعمِّه جعفر، فدعا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عليًا، فقال: "إنِّي قد أُمِرتُ أن أغيِّرَ اسمَ هذَينِ" فقال: الله ورسولُه أعلمُ، فسمَّاهما حَسنًا وحُسينًا [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর বড় ছেলের নাম রেখেছিলেন তাঁর চাচা হামযার নামে। আর হুসাইনকে নাম রেখেছিলেন তাঁর চাচা জাফরের নামে। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ডেকে বললেন: "আমি আদিষ্ট হয়েছি যে এই দু'জনের নাম পরিবর্তন করে দিই।" তিনি (আলী) বললেন: আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভালো জানেন। অতঃপর তিনি (রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)) তাদের দু'জনের নাম রাখলেন হাসান ও হুসাইন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرّف في النسخ إلى: عبد الله.
[2] حديث حسن إن شاء الله، عبد الله بن محمد بن عقيل وإن كان فيه كلام، إلّا أنَّ هذا الحديث يرويه عن أهل بيته، فحريٌّ أن يكون قد حفظه، والله تعالى أعلم.وهذا الحديث أقرب إلى القَبول مما رواه هانئ بن هانئ عن علي بن أبي طالب فيما سلف برقم (4829)، فإنَّ هانئًا هذا تفرّد بالرواية عنه أبو إسحاق السبيعي، وقد جهّله غير واحد من أهل العلم، وقال فيه ابن سعد: منكر الحديث.وأما إسناد المصنف هنا، ففيه العلاء بن هلال الرقي، وهو ضعيف منكر الحديث، وقد خالف في إسناده الرواة، فجعله من حديث عبد الله بن محمد بن عقيل عن أبيه عن علي، والمحفوظ فيه أنه عن ابن عقيل عن محمد بن علي - المعروف بابن الحنفيّة - عن أبيه عليٍّ.فقد أخرجه أحمد في "مسنده" 2/ (1370)، وفي "فضائل الصحابة" (1219)، وأبو يعلى (498)، والطبراني في "الكبير" (2780) من طرق عن عبيد الله بن عمرو، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن محمد بن علي ابن الحنفية، عن أبيه علي.وأخرجه البزار في مسنده (657) من طريق زهير بن محمد، والدولابي في "الذرية الطاهرة" (97) و (144) من طريق عمرو بن ثابت البكري، كلاهما عن ابن عقيل، عن ابن الحنفية، به.
7928 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا النَّضْر بن شُمَيل، حدثنا شُعبة، عن قَتَادة ومنصور وسليمان وحُصَين بن عبد الرحمن، قالوا سمعنا سالمَ بن أبي الجَعْد يحدِّث عن جابر بن عبد الله قال: وُلِدَ للأنصار ولدٌ فأرادوا أن يسمُّوه محمدًا، فأتَوا به رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "أحسنَتِ الأنصارُ، تَسمَّوا باسمي ولا تَكْتَنُوا بكُنْيتي، فإنما بُعِثتُ قاسِمًا أَقسِمُ بينكم" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين وقد اتَّفقا فيه على حديث جَرير عن منصور بغير هذه السِّياقة.وقد جمع بِشرُ بن عمر الزَّهراني وأبو الوليد الطَّيالسي عن شُعبة بين الأربعة كما جمع بينهم النَّضرُ بن شُمَيل:
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আনসারদের ঘরে একটি সন্তান জন্মগ্রহণ করলো। তারা তার নাম ‘মুহাম্মাদ’ রাখতে চাইল। অতঃপর তারা তাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট নিয়ে আসলো। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আনসারগণ উত্তম কাজ করেছে। তোমরা আমার নামে নাম রাখো, কিন্তু আমার উপনাম (কুনিয়াত) ব্যবহার করো না। কারণ আমি তো প্রেরিত হয়েছি বন্টনকারী (কাসিম) হিসেবে, আমি তোমাদের মধ্যে (আল্লাহর রহমত) বন্টন করি।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه مسلم (2133) (7) عن إسحاق بن راهويه وإسحاق بن منصور، عن النضر بن شميل، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 23/ (14963) و (14964)، ومسلم (2133) (7) من طريق محمد بن جعفر، عن شعبة، عن حصين بن عبد الرحمن ومنصور بن المعتمر والأعمش - مفرَّقين - والبخاري (3538) عن محمد بن كثير، عن شعبة، عن منصور وحده، ومسلم (2133) (7) من طريق ابن أبي عَدي، عن شعبة، عن حصين وحده، به.وأخرجه أحمد 22/ (14249) عن هشيم، والبخاري (6187)، ومسلم (2132) (4) من طريق خالد بن عبد الله، ومسلم (2133) (4) من طريق عبثر بن القاسم، ثلاثتهم عن حصين وحده، وأحمد 23/ (14973) من طريق معمر، و (15130) من طريق زياد البكائي، ومسلم (2133) (3) من طريق جرير، ثلاثتهم عن منصور وحده، وأحمد 23/ (14227) و (14363)، والبخاري (3115)، ومسلم (2133) (5) من طرق عن الأعمش وحده، ثلاثتهم (حصين ومنصور الأعمش)، به.وأخرجه أحمد 22/ (14364)، وابن ماجه (3736) من طريق أبي سفيان طلحة بن نافع، عن جابر.وأخرج أحمد 22/ (14357)، وأبو داود (4966)، والترمذي (2842)، وابن حبان (5816) من طريق أبي الزبير، عن جابر مرفوعًا: "من تسمَّى باسمي، فلا يتكنَّى بكُنيتي، ومن تكنّى بكُنيتي، فلا يتسمَّى باسمي". قال الترمذي: حسن غريب من هذا الوجه. قلنا: وأبو الزبير لم يصرِّح بسماعه من جابر، وسياق هذه الرواية مخالف لما رواه سالم بن أبي الجعد وأبو سفيان عن جابر، قال البيهقي في "معرفة السنن": وهذا فيما لم يخرجه مسلم بن الحجاج في "الصحيح" مع كون أبي الزبير من شرطه، ولعله إنما لم يخرجه لمخالفته روايةَ ابن المنكدر وسالم بن أبي الجعد عن جابر، ثم مخالفته رواية أبي هريرة وأنس بن مالك، وروي عن أبي هريرة في معنى ما رواه أبو الزبير، وهو مختلَف فيه، وأحاديث النهي على الإطلاق أكثر وأصح طريقًا. قلنا: يعني البيهقي برواية ابن المنكدر ما رواه البخاري (6186) ومسلم (2133) (7) من طريقه عن جابر قال: وُلد لرجل منا غلام، فسمّاه القاسم، فقلنا: لا نُكنيك أبا القاسم ولا كرامة، فأخبر النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: "سمِّ ابنَك عبد الرحمن".
7929 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب، حدثنا إبراهيم بن عبد الله السَّعدي، حدثنا بِشر بن عمر الزَّهراني.قال [1]: وحدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا أبو الوليد؛ قالا: حدثنا شُعبة، عن سليمان وحُصَين ومنصور وقَتَادة، سمعوا سالمَ بن أبي الجَعْد يحدِّثُ عن جابر بن عبد الله، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم، مثلَه [2].
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] القائل هو أبو عبد الله محمد بن يعقوب الأخرم. وذكر ابن القيم في "زاد المعاد" 2/ 245 - 248: أنَّ الناس اختلفوا في التكنّي بكنيته والتسمِّي باسمه صلى الله عليه وسلم على أربعة أقوال:أحدها: أنه لا يجوز التكنّي بكنيته مطلقًا، سواء أفردها عن اسمه، أو قرنها به، وسواء محياه وبعد مماته، وحُكي ذلك عن الشافعي.القول الثاني: أنَّ النهي إنما هو عن الجمع بين اسمه وكنيته، فإذا أُفرد أحدُهما عن الآخر، فلا بأس.القول الثالث: جواز الجمع بينهما، وهو المنقول عن مالك.القول الرابع: أنَّ التكنّي بأبي القاسم كان ممنوعًا منه في حياة النبي صلى الله عليه وسلم، وهو جائز بعد وفاته.وذكر أدلّة القائلين بكل قول من هذه الأربعة.وقال الإمام البغوي في شرح السنة 12/ 331 - 332 بعد أن أشار إلى آراء أهل العلم في المسألة: والأحاديث في النهي المطلق أصح. وانظر "شرح مسلم" للنووي 14/ 112 - 113.
[2] إسناده صحيح كسابقه. أبو الوليد الطيالسي: هو هشام بن عبد الملك.وأخرجه البخاري (3114) عن أبي الوليد الطيالسي وحده، بهذا الإسناد. ليس معهم حصين بن عبد الرحمن. وذكر ابن القيم في "زاد المعاد" 2/ 245 - 248: أنَّ الناس اختلفوا في التكنّي بكنيته والتسمِّي باسمه صلى الله عليه وسلم على أربعة أقوال:أحدها: أنه لا يجوز التكنّي بكنيته مطلقًا، سواء أفردها عن اسمه، أو قرنها به، وسواء محياه وبعد مماته، وحُكي ذلك عن الشافعي.القول الثاني: أنَّ النهي إنما هو عن الجمع بين اسمه وكنيته، فإذا أُفرد أحدُهما عن الآخر، فلا بأس.القول الثالث: جواز الجمع بينهما، وهو المنقول عن مالك.القول الرابع: أنَّ التكنّي بأبي القاسم كان ممنوعًا منه في حياة النبي صلى الله عليه وسلم، وهو جائز بعد وفاته.وذكر أدلّة القائلين بكل قول من هذه الأربعة.وقال الإمام البغوي في شرح السنة 12/ 331 - 332 بعد أن أشار إلى آراء أهل العلم في المسألة: والأحاديث في النهي المطلق أصح. وانظر "شرح مسلم" للنووي 14/ 112 - 113.
7930 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا أحمد بن محمد بن نصر، حدثنا أبو نُعيم وأبو غسّان قالا: حدثنا فِطْر بن خَليفة، حدثني مُنذر الثَّوري قال: سمعتُ محمد ابن الحنفية يقول: سمعتُ أبي يقول: قلتُ: يا رسول الله، أرأيت إن وُلِدَ لي بعدَك ولد، أُسمِّيه باسمِك، وأُكنِّيه بكُنيتِك؟ قال: "نَعَمْ". قال عليٌّ: فكانت هذه رُخصةً لي [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.ولعلَّ متوهِّمًا يتوهَّم أنَّ الشيخين لم يُخرجا عن فِطر، وليس كذلك، فإنهما قد قَرَنا بينه وبين آخر في إسناد واحد.قد ذكر بعضُ أئمتنا في هذا الموضع بابًا كبيرًا في إباحة دعاء الرجل امرأتَه باسمها خلاف قول العامة: إنه غير جائز. وأورد فيه أخبارًا كثيرة في قول النبي صلى الله عليه وسلم: "يا عائشة" و يا عائشُ" و"يا أمَّ سَلَمة"، وتركتُها [2] لاتفاقِهما على أكثرها.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আপনার পরে আমার যদি কোনো সন্তান জন্ম নেয়, তবে আমি কি তাকে আপনার নামে নাম রাখতে এবং আপনার কুনিয়া (উপনাম) ব্যবহার করতে পারি? তিনি বললেন: "হ্যাঁ।" আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এটি ছিল আমার জন্য বিশেষ অনুমতি।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح أبو نعيم: هو الفضل بن دكين، وأبو غسان هو مالك بن إسماعيل النهدي. وأخرجه أحمد 2/ (730)، وأبو داود (4967)، والترمذي (2843) من طرق عن فطر بن خليفة، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث صحيح. وذكر ابن القيم في "زاد المعاد" 2/ 245 - 248: أنَّ الناس اختلفوا في التكنّي بكنيته والتسمِّي باسمه صلى الله عليه وسلم على أربعة أقوال:أحدها: أنه لا يجوز التكنّي بكنيته مطلقًا، سواء أفردها عن اسمه، أو قرنها به، وسواء محياه وبعد مماته، وحُكي ذلك عن الشافعي.القول الثاني: أنَّ النهي إنما هو عن الجمع بين اسمه وكنيته، فإذا أُفرد أحدُهما عن الآخر، فلا بأس.القول الثالث: جواز الجمع بينهما، وهو المنقول عن مالك.القول الرابع: أنَّ التكنّي بأبي القاسم كان ممنوعًا منه في حياة النبي صلى الله عليه وسلم، وهو جائز بعد وفاته.وذكر أدلّة القائلين بكل قول من هذه الأربعة.وقال الإمام البغوي في شرح السنة 12/ 331 - 332 بعد أن أشار إلى آراء أهل العلم في المسألة: والأحاديث في النهي المطلق أصح. وانظر "شرح مسلم" للنووي 14/ 112 - 113.
[2] في (ز) و (ب): وتركتهما، وسقطت الكلمة من (م)، والصواب ما أثبتنا. عنه عن عروة بن الزبير عن عائشة. وكيفما دار فهو يدور على ثقة. وانظر تفصيل ذلك في تحقيقنا لـ "مسند أحمد" عند الرواية (24619).وأشار الدارقطني في "العلل" إلى أنَّ رواية عبد الله بن وهب عن يحيى بن عبد الله وسعيد بن عبد الرحمن عن هشام بن عروة، فيها بين هشام وعباد عروةُ والد هشام، وليس كما رواه المصنِّف بدون عروة، فالله تعالى أعلم.سعيد بن عبد الرحمن: هو ابن عبد الله بن جميل الجُمحي.وأخرجه أحمد 41 / (24619) من طريق حفص بن غياث عن هشام بن عروة، عن عباد بن حمزة به.وأخرجه أحمد 41/ (24756) و 42 / (25530) و 43 / (26242)، وأبو داود (4970)، وابن حبان (7117) من طرق عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة.وأخرجه أحمد 42 / (25531) و (25780)، وابن ماجه (3739) من طريق وكيع عن هشام بن عروة، عن رجل من ولد الزبير، عن عائشة في رواية ابن ماجه: هشام عن مولى للزبير.
7931 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بحر بن نصر بن سابق الخَوْلاني، حدثنا عبد الله بن وَهْب، حدثنا يحيى بن عبد الله بن سالم وسعيد بن عبد الرحمن، عن هشام بن عُرْوة، عن عبَّاد بن حمزة، عن عائشة أنها قالت: يا رسولَ الله، ألا تُكنيني؟ قال: "اكتَني بابنكِ عبد الله بن الزُّبير". فكانت تُكْنَى أُمّ عبد الله [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আপনি কি আমার জন্য কোনো উপনাম (কুনিয়াত) নির্ধারণ করবেন না?" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি তোমার ছেলে আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবাইরের নামে উপনাম ধারণ করো।" ফলে তাকে উম্মু আব্দুল্লাহ (আব্দুল্লাহর মা) নামে ডাকা হতো।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن اختلف فيه على هشام بن عروة، فرواه عنه جمع كرواية المصنف، وهو ما رجّحه الدارقطني في "العلل" (3821)، ورواه جمع آخر أقلُّ عددًا عنه عن عروة بن الزبير عن عائشة. وكيفما دار فهو يدور على ثقة. وانظر تفصيل ذلك في تحقيقنا لـ "مسند أحمد" عند الرواية (24619).وأشار الدارقطني في "العلل" إلى أنَّ رواية عبد الله بن وهب عن يحيى بن عبد الله وسعيد بن عبد الرحمن عن هشام بن عروة، فيها بين هشام وعباد عروةُ والد هشام، وليس كما رواه المصنِّف بدون عروة، فالله تعالى أعلم.سعيد بن عبد الرحمن: هو ابن عبد الله بن جميل الجُمحي.وأخرجه أحمد 41 / (24619) من طريق حفص بن غياث عن هشام بن عروة، عن عباد بن حمزة به.وأخرجه أحمد 41/ (24756) و 42 / (25530) و 43 / (26242)، وأبو داود (4970)، وابن حبان (7117) من طرق عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة.وأخرجه أحمد 42 / (25531) و (25780)، وابن ماجه (3739) من طريق وكيع عن هشام بن عروة، عن رجل من ولد الزبير، عن عائشة في رواية ابن ماجه: هشام عن مولى للزبير.
7932 - أخبرنا عبد الرحمن بن حَمْدان الجلاب بهمذان، حدثنا هلال بن العلاء الرَّقي، حدثنا أبي، حدثنا عُبيد الله بن عمرو، عن عبد الله بن محمد بن عَقيل، عن حمزة بن صُهيب، عن أبيه، عن عمر بن الخطّاب: أنه قال لصُهيب: إِنَّكَ لَرجلٌ لولا خِصالٌ ثلاثة، قال: وما هنَّ؟ قال: اكتَنيتَ وليس لك ولدٌ، وانتَميتَ إلى العرب وأنت رجلٌ من الرُّوم، وفيك سَرَفٌ في الطَّعام، قال: يا أميرَ المؤمنين، أما قولُك: اكتنيتَ وليس لك ولدٌ، فإنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم كنَّاني أبا يحيى، وأما قولُك: انتميتَ إلى العرب، فإنِّي رجلٌ من النَّمِر بن قاسِطٍ استُبِيتُ من المَوْصل بعد أن كنتُ غلامًا قد عرفتُ أهلي ونَسَبي، وأما قولُك: فيك سَرَفٌ في الطعام، فإنِّي سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إِنَّ خيرَكم مَن أطعمَ الطَّعامَ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
তিনি সুহাইবকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "তুমি একজন উত্তম মানুষ, যদি না তোমার মধ্যে তিনটি স্বভাব না থাকত।" সুহাইব জিজ্ঞেস করলেন: "সেগুলো কী?" তিনি বললেন: "তুমি কুনিয়াত (উপনাম) গ্রহণ করেছ অথচ তোমার কোনো সন্তান নেই; তুমি নিজেকে আরবের সাথে সম্পর্কিত করেছ অথচ তুমি রোমদেশের লোক; এবং তুমি খাদ্যের ব্যাপারে অপব্যয়ী।"
সুহাইব বললেন: "হে আমীরুল মুমিনীন! আপনার যে উক্তি—আমি কুনিয়াত গ্রহণ করেছি অথচ আমার কোনো সন্তান নেই—এ ব্যাপারে বলতে হয়, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে 'আবু ইয়াহইয়া' উপনামে ভূষিত করেছেন। আর আপনার যে উক্তি—আমি নিজেকে আরবের সাথে সম্পর্কিত করেছি—এ ব্যাপারে বলতে হয়, আমি নমির ইবনু কাসিত গোত্রের একজন মানুষ। আমি যখন বালক ছিলাম এবং আমার পরিবার ও বংশ সম্পর্কে অবগত ছিলাম, তখন আমাকে মওসিল (শহর) থেকে বন্দী করা হয়েছিল। আর আপনার যে উক্তি—আমি খাদ্যের ব্যাপারে অপব্যয়ী—এ ব্যাপারে বলতে হয়, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: 'তোমাদের মধ্যে সেই ব্যক্তি উত্তম, যে (অপরকে) খাবার খাওয়ায় (আপ্যায়ন করে)।'"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده فيه لين من أجل عبد الله بن محمد بن عقيل، وقد تفرد بالمرفوع منه في هذا الخبر، وباقيه روي نحوه من وجوه أخرى كما سلف عند الحديث رقم (5806). وأخرجه مختصرًا أحمد 39/ (23929) عن زكريا بن عدي، عن عبيد الله بن عمرو، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (23926) من طريق زهير بن محمد، عن ابن عقيل، عن حمزة بن صهيب: أنَّ صهيبًا كان يكنى أبا يحيى … وذكر نحوه.وأخرجه مختصرًا ابن ماجه (3738) من طريق زهير بن محمد، عن ابن عقيل، عن حمزة: أنَّ عمر قال لصهيب: ما لك تكتنى بأبي يحيى، وليس لك ولد؟ قال: كنّاني رسول الله صلى الله عليه وسلم بأبي يحيى.وفي باب فضل إطعام الطعام عن أبي هريرة وعن عبد الله بن سَلَام انظرهما مع تخريجهما في "مسند أحمد" 13/ (7932) و 39 (23784).
7933 - حدثنا مُكرَم بن أحمد القاضي ببغداد، حدثنا يحيى بن جعفر بن الزِّبْرقان، حدثنا عبد الوهاب بن عطاء، حدثنا أبو المِنْهال عبد الرحمن بن معاوية البَكْراوي، عن عبد العزيز بن أبي بَكْرة، عن أبيه قال: لمّا حاصر النبي صلى الله عليه وسلم الطائف، تدلّيتُ ببكرة، قال: كيف صنعت؟ قلتُ: تدلَّيتُ ببَكْرة، فقال: "أنت أبو بَكْرة" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবূ বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তায়েফ অবরোধ করলেন, তখন আমি একটি দড়ির/চাকার (পুলির) সাহায্যে নিচে নেমে এসেছিলাম। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: তুমি কিভাবে এটি করলে? আমি বললাম: আমি একটি দড়ির সাহায্যে নিচে নেমে এসেছিলাম। তখন তিনি বললেন: "তুমিই আবূ বাকরাহ।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] محتمل للتحسين بطريقيه، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم غير عبد الرحمن بن معاوية البكراوي، فلم أنقف له على ترجمة، لكن روايته هذه عن أهل بيته، وهذا مما يُحتمل.وأخرجه البزار في مسنده (3684)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1562)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 62/ 210 من طريق أبي قتيبة سلم بن قتيبة، عن عبد الرحمن بن معاوية، بهذا الإسناد. وقال البزار: وهذا الحديث لا نحفظه عن أبي بكرة إلّا من هذا الوجه، وأبو المنهال لا نعلم أسند عنه إلّا أبو قتيبة أسند عنه حديثين.وأخرجه ابن السنى في "اليوم والليلة" (407) من طريق علي بن زيد وهو ابن جُدعان - عن عبد الرحمن بن أبي بكرة عن أبيه قال فذكر نحوه. وسنده ضعيف من أجل ابن جدعان، وفي الطريق إليه سفيان بن وكيع وهو ضعيف أيضًا.وأخرج البخاري (4326) بسنده عن أبي عثمان النهدي قال: سمعت سعدًا، وهو أول من رمى بسهم في سبيل الله، وأبا بكرة وكان تَسوَّر حِصنَ الطائف في أناس، فجاء إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقالا … فذكر حديثًا.وقال البلاذري في "أنساب الأشراف" 1/ 490: حدثني بعض آل أبي بكرة أنه تدلَّى من الحصن على بَكْرة.
7934 - أخبرني محمد بن علي الشَّيباني بالكوفة، حدثنا أحمد بن حازم الغِفاري، حدثنا أبو غسّان، حدثنا قيس بن الربيع، عن المِقْدام بن شُريح، عن أبيه [عن جده] [1] قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أيُّ ولدِك أكبرُ؟ " قلتُ: شُريح، قال: "فأنت أبو شُرَيح" [2].تفرَّد به قيس عن المِقدام [3]، وأنا ذاكرٌ بعده حديثًا تفرَّد به مُجالِد بن سعيد، وليسا من شرط هذا الكتاب:
৭৯৩৪ - আমাকে কুফাতে মুহাম্মাদ ইবনু আলী আশ-শাইবানী সংবাদ দিয়েছেন, তিনি বলেন, আহমাদ ইবনু হাযিম আল-গিফারী আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, আবূ গাস্সান আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, কাইস ইবনু আর-রাবী‘ আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, মিকদাম ইবনু শুরাইহ তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর দাদা থেকে বর্ণনা করেছেন।
তাঁর দাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বললেন, “তোমার সন্তানদের মধ্যে কে সবচেয়ে বড়?” আমি বললাম: শুরাইহ। তিনি বললেন, “তাহলে তুমি আবু শুরাইহ।”
মিকদাম থেকে কাইস এককভাবে এটি বর্ণনা করেছেন [3]। আমি এরপরে এমন একটি হাদীসও উল্লেখ করব যা মুজালিদ ইবনু সাঈদ এককভাবে বর্ণনা করেছেন, তবে এই দুটিই এই কিতাবের (শর্তের) অন্তর্ভুক্ত নয়।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] ما بين المعقوفين لم يرد في النسخ الخطية، وأثبتناه من مصادر التخريج، ولا يستقيم المعنى إلّا به. وأخرجه أحمد 1/ (211)، وأبو داود (4957)، وابن ماجه (3731) من طريق أبي عقيل عبد الله بن عقيل، عن مجالد بن سعيد، بهذا الإسناد.
[2] حديث قوي، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل قيس بن الربيع. أبو غسان: هو مالك بن إسماعيل النهدي.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" (8/ 171)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2873)، والمحاملي في "أماليه - رواية ابن مهدي" (109)، والطبراني في "الكبير" 22/ (464) والخطيب "في تاريخ بغداد" 9/ 453 من طرق عن قيس بن الربيع، بهذا الإسناد.وانظر ما سلف برقم (62). وأخرجه أحمد 1/ (211)، وأبو داود (4957)، وابن ماجه (3731) من طريق أبي عقيل عبد الله بن عقيل، عن مجالد بن سعيد، بهذا الإسناد.
7934 [3] - هذا عجيب، فقد أخرجه المصنف نفسه فيما سلف برقم (62) من طريق يزيد بن المقدام عن أبيه المقدام، فكيف تفرَّد به قيسٌ؟! وأخرجه أحمد 1/ (211)، وأبو داود (4957)، وابن ماجه (3731) من طريق أبي عقيل عبد الله بن عقيل، عن مجالد بن سعيد، بهذا الإسناد.
7935 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عَفّان العامري، حدثنا أبو أسامة، عن مُجالِد، عن عامر، عن مسروق قال: [قدمتُ على عمرَ، فقال: ما اسمُك؟ قلت: مسروقٌ، قال] [1]: ابن مَنْ؟ قلتُ: ابن الأجدَع، قال: أنت مسروق بن عبد الرحمن، حدَّثَنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: أَنَّ الأجدعَ شيطانٌ.قال: وكان اسمُه في الديوان مسروقَ بنَ عبد الرحمن [2].
মাসরূক থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন, ‘তোমার নাম কী?’ আমি বললাম, ‘মাসরূক’। তিনি জিজ্ঞেস করলেন, ‘কার পুত্র?’ আমি বললাম, ‘আল-আজদা’ এর পুত্র।’ তখন তিনি (উমর রাঃ) বললেন, ‘তুমি হলে মাসরূক ইবনু আবদুর রহমান। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন যে, ‘আল-আজদা’ শয়তান।’
(রাবী) বলেন: তাঁর নাম দাপ্তরিক নথিপত্রেও (দীওয়ানে) মাসরূক ইবনু আবদুর রহমান হিসাবে লেখা হয়েছিল।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] ما بين المعقوفين لم يرد في النسخ الخطية، وأثبتناه من "تلخيص الذهبي"، وهو الموافق لمصادر التخريج. وأخرجه أحمد 1/ (211)، وأبو داود (4957)، وابن ماجه (3731) من طريق أبي عقيل عبد الله بن عقيل، عن مجالد بن سعيد، بهذا الإسناد.
[2] إسناده ضعيف لضعف مجالد: وهو سعيد الهمداني. وأخرجه أحمد 1/ (211)، وأبو داود (4957)، وابن ماجه (3731) من طريق أبي عقيل عبد الله بن عقيل، عن مجالد بن سعيد، بهذا الإسناد.
7936 - حدثنا أحمد بن يعقوب الثَّقفي، حدثنا أحمد بن يحيى بن إسحاق الحُلْواني، حدثنا عيسى بن أبي حرب الصَّفّار، حدثنا يحيى بن أبي بُكَير، حدثنا عَديُّ بن الفضل، عن إسحاق بن سُوَيد، عن يحيى بن يَعمَر، عن ابن عمر: أَنَّ رجلًا قال: يا رسولَ الله، قال: "يا لبَّيكَ" [1].هذا حديث صحيح، ولم يُخرجاه.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি বলল, ইয়া রাসূলাল্লাহ! তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, লাব্বাইকা।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، عدي بن الفضل متروك، وبه أعلَّه الذهبي في "التلخيص".وأخرجه أبو الشيخ في "أخلاق النبي" (3) من طريق إسحاق بن إسماعيل الطالقاني، عن عدي بن الفضل بهذا الإسناد ووقع فيه غيرُ ما تحريف.وأخرجه أبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" (2709) و (3830)، وابن حبان في "المجروحين" 1/ 221، والطبراني في "الدعاء" (1943)، وابن السني في "اليوم والليلة" (191)، وتمام في "الفوائد" (1629) من طريق جبارة بن المغلّس، عن حماد بن زيد، عن إسحاق بن سويد، بهذا الإسناد. وزاد أبو يعلى في إسناده عمر بن الخطاب. وجبارة متروك.وفي الباب عن محمد بن حاطب عند ابن أبي شيبة 8/ 48، والنسائي (9944)، وفيه أنَّ امرأة نادت النبي صلى الله عليه وسلم فقال: "لبَّيك وسعدَيك". وسنده حسن.
7937 - أخبرنا أبو نصر أحمد بن سهل الفقيه ببُخارَى، حدثنا صالح بن محمد الحافظ، حدثنا شَيبان، حدثنا سليمان بن المغيرة، حدثنا ثابت البُنَاني، عن شعيب بن محمد بن عبد الله بن عمرو، عن عبد الله بن عمرو قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يكرهُ أن يَطَأَ أَحدٌ عَقِبَيْه، ولكن يمينٌ وشِمالٌ [1].
আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অপছন্দ করতেন যে কেউ তাঁর দুই গোড়ালির উপর (অর্থাৎ, ঠিক তাঁর পেছনে লেগে) হাঁটুক, বরং (তিনি পছন্দ করতেন যে তারা) ডানে বা বামে থাকুক।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل شعيب بن محمد. شيبان: هو ابن فرّوخ.وأخرجه أحمد 11/ (6549) و (6562)، وأبو داود (3770)، وابن ماجه (244) من طريق حماد بن سلمة، عن ثابت البناني بهذا الإسناد. وزادا فيه ما رُئي رسول الله صلى الله عليه وسلم يأكل متكئًا قط.وانظر ما بعده، وما سلف برقم (3586).
7938 - وأخبرنا أبو نصر، حدثنا صالح، حدثنا علي بن الحسين الدِّرهمي، حدثنا أُمية بن خالد، حدثنا سليمان بن المغيرة عن ثابت عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو، عن رسول الله، نحوه [1].حديث سليمان بن المغيرة صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু নাসর আমাদের খবর দিয়েছেন, সালেহ আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, আলী ইবনুল হুসাইন আদ-দিরহামি আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, উমাইয়্যা ইবনু খালিদ আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, সুলাইমান ইবনুল মুগীরাহ ছাবিত থেকে, তিনি আমর ইবনু শুআইব থেকে, তিনি তার পিতা থেকে এবং তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু আমর থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। [১]। সুলাইমান ইবনুল মুগীরাহর এই হাদীসটি মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ, তবে তারা (বুখারী ও মুসলিম) এটি বর্ণনা করেননি।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده حسن كسابقه.