হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7959)


7959 - أخبرنا أبو [أحمد] [1] محمد بن إسحاق الصَّفَّار العَدْل، حدثنا أحمد بن نصر، أخبرنا عمرو بن طلحة، القَنَّاد، حدثنا أسباط بن نصر، عن سِمَاك بن حَرْب، عن عِكْرمة، عن ابن عباس قال: جاءت فأرةٌ فأخَذَت تَجُرُّ الفَتِيلة، فذهبت الجاريةُ تَزجُرُها، فقال نبيُّ الله صلى الله عليه وسلم: "دَعِيها"، فجاءت بها فألقَتْها بينَ يدي رسول الله صلى الله عليه وسلم [على الخُمْرة] [2] التي كان قاعدًا عليها، فأحرقَتْ منها موضعَ دِرهَم، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "إذا نمتُم فأطفِئُوا سُرُجَكم، فإنَّ الشيطان يدلُّ مثلَ هذه على هذا فيُحرِقُكم" [3]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একটি ইঁদুর এসে সলতে টানতে শুরু করল। তখন পরিচারিকা তাকে তাড়িয়ে দিতে গেল। তখন আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তাকে থাকতে দাও।" ইঁদুরটি সলতেটি নিয়ে এসে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে, যে চাদরের ওপর তিনি বসেছিলেন, তার ওপর রাখল। ফলে তার (চাদরের) এক দিরহাম পরিমাণ জায়গা পুড়ে গেল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যখন তোমরা ঘুমাবে, তখন তোমাদের প্রদীপগুলো নিভিয়ে দাও। কারণ শয়তান এ (ইঁদুর) জাতীয় প্রাণীকে এর (সলতে) দিকে দিকনির্দেশ করে, ফলে সে তোমাদের পুড়িয়ে দেয়।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] ما بين المعقوفين سقط من النسخ الخطية. وروى البخاري أيضًا (3316) من حديث جابر، وفيه: "أطفئوا المصابيح عند الرقاد، فإنَّ الفُوَيسِقة ربما اجتَّرت الفتيلة، فأحرقت أهل البيت". والفويسقة: الفأرة.



[2] ما بين المعقوفين لم يرد في النسخ الخطية، وأثبتناه من مصادر التخريج. وروى البخاري أيضًا (3316) من حديث جابر، وفيه: "أطفئوا المصابيح عند الرقاد، فإنَّ الفُوَيسِقة ربما اجتَّرت الفتيلة، فأحرقت أهل البيت". والفويسقة: الفأرة.



7959 [3] - حسن لغيره، وهذا إسناد ليِّن، أسباط بن نصر عن سماك عن عكرمة سلسلة ليست بالقوية، قال الساجي: روى أسباط أحاديث لا يتابع عليها عن سماك عمرو بن طلحة: هو ابن حماد بن طلحة. وأخرجه أبو داود (5247) عن سليمان بن عبد الرحمن التمّار، وابن حبان (5519) من طريق أحمد بن آدم، كلاهما عن عمرو بن حماد بن طلحة، بهذا الإسناد.وروى البخاري (6294)، ومسلم (2016) من حديث أبي موسى الأشعري، قال: احترق بيت بالمدينة على أهله من الليل، فحُدِّث بشأنهم النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: "إنَّ هذه النار إنما هي: عدو لكم، فإذا نمتم فأطفئوها عنكم". وروى البخاري أيضًا (3316) من حديث جابر، وفيه: "أطفئوا المصابيح عند الرقاد، فإنَّ الفُوَيسِقة ربما اجتَّرت الفتيلة، فأحرقت أهل البيت". والفويسقة: الفأرة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7960)


7960 - أخبرنا عبد الله بن إسحاق الخُراساني العدل، حدثنا أحمد بن زياد بن مِهْران، حدثنا أبو عامر العَقَدي، حدثنا سليمان بن سفيان المَديني، حدثني بلال بن يحيى بن طلحة بن عبيد الله، عن أبيه، عن جده: أن النبيَّ صلى الله عليه وسلم كان إذا رأى الهِلالَ قال: "اللهمَّ أَهِلَّه علينا باليُمْن والإيمان، والسَّلامةِ والإسلام، ربِّي وربُّك اللهُ" [1].




তালহা ইবনে উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন নতুন চাঁদ দেখতেন, তখন বলতেন: "হে আল্লাহ! এই চাঁদকে আমাদের জন্য কল্যাণ, ঈমান, নিরাপত্তা ও ইসলামের সাথে উদিত করো। আমার রব এবং তোমার রব আল্লাহ।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حسن لغيره، وهذ إسناد ضعيف، سليمان بن سفيان المدني وشيخه بلال بن يحيى ضعيفان. وأخرجه أحمد (1397)، والترمذي (3451) من طريق أبي عامر العقدي، بهذا الإسناد.وقال الترمذي: حسن غريب.وفي الباب عن ابن عمر عند الدارمي (1729)، وابن حبان (888)، وفي سنده عبد الرحمن بن عثمان ضعفه أبو حاتم، وذكره ابن حبان في "ثقاته". وأبوه عثمان روى عنه غير واحد، وقال أبو حاتم: شيخ يكتب حديثه، وذكره ابن حبان في "ثقاته".وعن عثمان بن أبي عاتكة عن شيخ من أشياخهم رفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم، عند ابن السُّني في "عمل اليوم والليلة" (646)، ورواه أبو نعيم في معرفة الصحابة" (2310) فسمى الشيخ زيادًا. وقال زياد عقبه: توالي على هذا الدعاء ستة من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم سمعوه منه. وزياد لم نعرفه.وعن علي قال: إذا رأى أحدكم الهلال فلا يرفع به رأسه، إنما يكفي أن يقول: ربي وربك الله. أخرجه ابن أبي شيبة 3/ 98، ورجاله ثقات غير عبيد بن عمرو - وهو الخارفي قال ابن سعد: كان معروفًا قليل الحديث. في حديث جعفر سوى الحاكم!وأخرجه أحمد 19 / (12365) و 21/ (13820)، ومسلم (898)، وأبو داود (5100)، والنسائي (1850)، وابن حبان (6135) من طرق عن جعفر بن سليمان، بهذا الإسناد. ولم يذكر أحد منهم قوله: "عن ظهره".ورواه أبو كامل فضيل بن حسين الجحدري عن جعفر الضبعي به بلفظ: "حسر عن مَنكِبَيه".أخرجه من طريقه ابن عدي في "الكامل" 2/ 149، والذهبي في "كتاب العرش" (96)، وفي "العلو" (95). وعليه يحمل قوله: "عن ظهره" في رواية الحاكم على كشف المنكبين الشريفين.قال النووي: ومعنى "حديث عهد بربه" أي: بتكوين ربه إياه، ومعناه: أن المطر رحمة وهي قريبة العهد بخلق الله تعالى لها فيتبَرَّك بها.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7961)


7961 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني [1]، حدثنا حَبَّان بن هِلال، حدثنا جعفر بن سليمان، حدثنا ثابت، عن أنس بن مالك: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا أَمطَرتِ السماءُ حَسَرَ ثوبه عن ظهرِه حتى يُصيبَه المطرُ، فقيل له: لِمَ تصنعُ هذا؟ قال: "إنَّه حديثُ عهدٍ بربِّه عز وجل" [2]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন আকাশ থেকে বৃষ্টি বর্ষণ হতো, তখন তিনি তাঁর পিঠ থেকে কাপড় সরিয়ে নিতেন, যাতে তাঁর গায়ে বৃষ্টি লাগে। অতঃপর তাঁকে জিজ্ঞেস করা হলো: আপনি কেন এমন করেন? তিনি বললেন: "এটি (বৃষ্টি) তার রবের সাথে সদ্য পরিচিত (বা আল্লাহর পক্ষ থেকে নতুন আসা রহমত) ।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّفت في النسخة الخطية إلى: الصنعاني. في حديث جعفر سوى الحاكم!وأخرجه أحمد 19 / (12365) و 21/ (13820)، ومسلم (898)، وأبو داود (5100)، والنسائي (1850)، وابن حبان (6135) من طرق عن جعفر بن سليمان، بهذا الإسناد. ولم يذكر أحد منهم قوله: "عن ظهره".ورواه أبو كامل فضيل بن حسين الجحدري عن جعفر الضبعي به بلفظ: "حسر عن مَنكِبَيه".أخرجه من طريقه ابن عدي في "الكامل" 2/ 149، والذهبي في "كتاب العرش" (96)، وفي "العلو" (95). وعليه يحمل قوله: "عن ظهره" في رواية الحاكم على كشف المنكبين الشريفين.قال النووي: ومعنى "حديث عهد بربه" أي: بتكوين ربه إياه، ومعناه: أن المطر رحمة وهي قريبة العهد بخلق الله تعالى لها فيتبَرَّك بها.



[2] إسناده جيد من أجل جعفر بن سليمان - وهو الضُّبعي - إلّا أن قوله: "عن ظهره" لم يذكره في حديث جعفر سوى الحاكم!وأخرجه أحمد 19 / (12365) و 21/ (13820)، ومسلم (898)، وأبو داود (5100)، والنسائي (1850)، وابن حبان (6135) من طرق عن جعفر بن سليمان، بهذا الإسناد. ولم يذكر أحد منهم قوله: "عن ظهره".ورواه أبو كامل فضيل بن حسين الجحدري عن جعفر الضبعي به بلفظ: "حسر عن مَنكِبَيه".أخرجه من طريقه ابن عدي في "الكامل" 2/ 149، والذهبي في "كتاب العرش" (96)، وفي "العلو" (95). وعليه يحمل قوله: "عن ظهره" في رواية الحاكم على كشف المنكبين الشريفين.قال النووي: ومعنى "حديث عهد بربه" أي: بتكوين ربه إياه، ومعناه: أن المطر رحمة وهي قريبة العهد بخلق الله تعالى لها فيتبَرَّك بها.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7962)


7962 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بحر بن نصر، حدثنا بِشر [1] ابن بكر، حدثنا الأوزاعي، حدثني ابن شِهاب، حدثني ثابت الزُّرَقي، أنَّ أبا هريرة قال: أَخَذَتِ الناسَ رِيحٌ بطريق مكة وعمر بن الخطاب حاج، فاشتدَّتْ عليهم، فقال عمر بن الخطاب لمن حولَه ما الريحُ؟ فلم يَرجِعوا إليه شيئًا، فبلغني الذي سأل عنه عمرُ، فاستَحثَثتُ راحلتي حتى أدركتُه، فقلت: يا أميرَ المؤمنين، أُخبرتُ أنَّك سألتَ عن الرِّيح، وإني سمعت رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "الرِّيحُ من رَوْحِ الله تعالى؛ تأتي بالرَّحمة وتأتي بالعذاب، فلا تَسبُّوها، وسَلُوا الله خيرَها، واستَعيذُوا بالله من شرِّها" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একবার মক্কাগামী পথে লোকেরা ঝড়ের কবলে পড়ল। উমার ইবনু খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন হজ্জযাত্রী ছিলেন। ঝড়টি তাদের ওপর তীব্র হয়ে দেখা দিল। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর আশেপাশের লোকদের জিজ্ঞেস করলেন, "এই বাতাস কী?" কিন্তু তারা এর কোনো জবাব দিতে পারল না। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যা জানতে চেয়েছিলেন, তা আমার কাছে পৌঁছল। তাই আমি আমার বাহনকে দ্রুত চালিয়ে তাঁর কাছে পৌঁছলাম এবং বললাম: "হে আমীরুল মু'মিনীন! আমাকে জানানো হয়েছে যে আপনি বাতাস সম্পর্কে জানতে চেয়েছেন। আর আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলতে শুনেছি: "বাতাস হলো মহান আল্লাহর রহমতস্বরূপ (বা স্বস্তিদায়ক)। তা রহমতও নিয়ে আসে এবং আযাবও নিয়ে আসে। সুতরাং তোমরা বাতাসকে গালি দিও না, বরং তোমরা আল্লাহর কাছে এর কল্যাণ কামনা করো এবং এর অনিষ্ট থেকে আল্লাহর আশ্রয় প্রার্থনা করো।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: شريك. وخالف أصحابَ الزهري المذكورين سالم بن عجلان الأفطسُ فأبدل بثابتٍ الزرقي عمرَو بن سليم الزرقي. أخرجه من طريقه النسائي (10700). وفي سنده عمر بن سالم الأفطس وهو مجهول.وخالفهم كذلك عُقيل بن خالد، فرواه عن الزهري عن سعيد بن المسيب عن أبي هريرة. أخرجه من طريقه النسائي (10699). وفي سنده طلق بن السمح جهّله أبو حاتم.قال الدارقطني في "العلل" (1564): والصحيح حديث الزهري عن ثابت بن قيس الزرقي عن أبي هريرة. وانظر حديث أبي بن كعب السالف برقم (3112).



[2] إسناده صحيح.وأخرجه أحمد 12 / (7413) و 15 / (9299) و (9629)، وابن ماجه (3727)، والنسائي (10702)، وابن حبان (1007) و (5732) من طرق عن الأوزاعي بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (13 (7631)، وأبو داود (5097) من طريق معمر بن راشد، وأحمد 16/ (10714) من طريق يونس بن يزيد، والنسائي (10710) من طريق زياد بن سعد، ثلاثتهم عن الزهري، به. وخالف أصحابَ الزهري المذكورين سالم بن عجلان الأفطسُ فأبدل بثابتٍ الزرقي عمرَو بن سليم الزرقي. أخرجه من طريقه النسائي (10700). وفي سنده عمر بن سالم الأفطس وهو مجهول.وخالفهم كذلك عُقيل بن خالد، فرواه عن الزهري عن سعيد بن المسيب عن أبي هريرة. أخرجه من طريقه النسائي (10699). وفي سنده طلق بن السمح جهّله أبو حاتم.قال الدارقطني في "العلل" (1564): والصحيح حديث الزهري عن ثابت بن قيس الزرقي عن أبي هريرة. وانظر حديث أبي بن كعب السالف برقم (3112).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7963)


7963 - أخبرنا إسماعيل بن محمد بن الفضل، حدثنا جدِّي، حدثنا إسماعيل بن أبي أُوَيس، حدثنا المغيرة بن عبد الرحمن، عن يزيد بن أبي عُبيد، عن سَلَمة بن الأكوع - رَفَعَه إن شاء الله -: أنه كان إذا اشتدَّت الريحُ يقول: "اللهمَّ لَقْحًا لا عَقِيمًا" [1].هذا إسناد صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




সালামা ইবনুল আকওয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন বাতাস তীব্র হতে দেখতেন, তখন বলতেন: "হে আল্লাহ! (এই বাতাসকে) ফলদায়ক করুন, বন্ধ্যা করবেন না।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده حسن من أجل المغيرة بن عبد الرحمن: وهو ابن الحارث المخزومي، وإسماعيل بن أبي أويس حسن في المتابعات والشواهد، وقد توبع.وأخرجه ابن حبان (1008) من طريق أحمد بن عبدة، عن المغيرة بن عبد الرحمن، بهذا الإسناد.قوله: "لَقحًا" قال ابن الإمام في "سلاح المؤمن" ص 463: بفتح اللام مع فتح القاف وسكونها، وهى الحاملة للسَّحاب، والعقيم بعكسها.قلنا: وقد وقع في بعض الروايات: لاقحًا، وسميت لاقحًا لأنها تحمل الماء والسحاب، وقيل: الريح اللاقح، أي: ذات الإلقاح انظر "لسان العرب" (القح).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7964)


7964 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا إسحاق بن الحسن الحَرْبي، حدثنا عفّان، حدثنا حمّاد بن سلمة، عن عبد الملك بن عُمير، عن موسى ابن طلحة، عن عائشة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُكثِرُ ذِكرَ خديجةَ، فقلتُ: لقد أخلَفَك الله - وربما قال حماد: أعقبَك الله - من عجوزٍ من عجائز قريشٍ حمراءِ الشِّدقينِ، هَلَكَت في الدَّهر الأول، قالت: فتَمَعَّر وجهُه تمعُّرًا ما كنتُ أراه إلا عند نزول الوحي، وإذا رأى مَخِيلةَ الرَّعد والبرق حتى يَعلَم أرحمةٌ هي أم عذابٌ [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আলোচনা প্রায়শই করতেন। তখন আমি বললাম, 'আল্লাহ আপনাকে কুরাইশের বৃদ্ধাদের মধ্য থেকে এমন এক বৃদ্ধার পরিবর্তে ভালো কাউকে দিয়েছেন, যার গাল লাল ছিল (অর্থাৎ, যিনি বৃদ্ধ বয়সে মারা গেছেন), যিনি প্রথম যুগেই ইন্তেকাল করেছেন।' তিনি (আয়িশা) বলেন, 'তখন তাঁর চেহারা এমনভাবে পরিবর্তিত/বিবর্ণ হয়ে গেল, যা আমি দেখিনি শুধুমাত্র ওহী নাযিলের সময় ছাড়া, অথবা যখন তিনি মেঘে বিদ্যুৎ ও বজ্রের চিহ্ন দেখতেন, যতক্ষণ না তিনি জানতে পারতেন তা রহমত নাকি আযাব।'




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه أحمد 42 / (25171)، وابن حبان (7008) من طريق عفان بن مسلم، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (25171) عن بهز بن أسد، و (25210) عن مؤمل بن إسماعيل، كلاهما عن حماد بن سلمة به.وأخرج البخاري تعليقًا (3281)، ومسلم (2437) من طريق عروة عن عائشة قالت: استأذنت هالةُ بنت خويلد أخت خديجة على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فعرف استئذان خديجة فارتاع لذلك، فقال: "اللهم هالةُ"، قالت فغرتُ، فقلت: ما تذكر من عجوز من عجائز قريش حمراء الشدقين، هلكت في الدهر، قد أبدلك الله خيرًا منها!وأخرج أحمد 41 / (24864) من طريق مسروق عن عائشة، قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا ذكر خديجة أثنى عليها، فأحسن الثناء قالت فغِرتُ يومًا، فقلت ما أكثر ما تذكرها حمراء الشدق، قد أبدلك الله بها خيرًا منها، قال: "ما أبدلني الله خيرًا منها، قد آمنت بي إذ كفر بي الناس، وصدقتني إذ كذبني الناس، وواستني بمالها إذ حرمني الناس، ورزقني الله ولدها إذ حرمني أولادَ النساء"، وفي سنده مجالد بن سعيد وفيه ضعف.وأخرج أحمد 43 / (26387) - واللفظ له - والبخاري (3817)، ومسلم (2435)، وابن ماجه (1997)، والترمذي (2017) و (3875)، والنسائي (8303) و (8305) و (8864) من طريق عروة عن عائشة قالت: ما غِرتُ على امرأة لرسول الله صلى الله عليه وسلم ما غرتُ على خديجة، وذلك لِما كنت أسمع من ذكره إياها. وسلف نحوه عند الحاكم برقم (4915).قولها: "حمراء الشدقين" الشِّدق بكسر المعجمة وبفتحها: جانب الفم.ونقل الحافظ ابن حجر في "الفتح" 11/ 265 عن القرطبي قال: المراد بذلك نِسبتها إلى كِبَر السِّنّ، لأَنَّ مَن دَخَل في سنّ الشيخوخة مع قوّةٍ في بَدَنه يَغلِب على لونه غالبًا الحُمْرة المائلة إلى السُّمرة، كذا قال، والذي يتبادر أنَّ المراد بالشِّدقين ما في باطنِ الفم، فكَنَّت بذلك عن سقوط أسنانها حتَّى لا يبقى داخل فمها إلّا اللحم الأحمر من اللِّثَة وغيرها، وبهذا جَزَمَ النوويّ وغيره."تمعَّر وجهه" أي تغيّر، وأصله قلّة النضارة وعدم إشراق اللون، من قولهم: مكان أمعر، وهو الجدب الذي لا خِصب فيه."مَخِيلة الرعد" المَخيلة: هي السحابة الخليقة بالمطر. قاله ابن الأثير.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7965)


7965 - حدثني أبو بكر بن بالَوَيهِ، حدثنا إسحاق بن الحسن، حدثنا عفّان، حدثنا عبد الواحد بن زياد، حدثنا أبو مَطَر، عن سالم، عن ابن عمر قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إذا سمع الرعدَ والصواعقَ قال: "اللهم لا تَقتُلْنا بغضبِك، ولا تُهلِكُنا بعذابِك، وعافِنا قبلَ ذلك [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন বজ্র ও বিদ্যুৎ চমকানোর শব্দ শুনতেন, তখন তিনি বলতেন: "হে আল্লাহ! আপনি আপনার ক্রোধের দ্বারা যেন আমাদের হত্যা না করেন এবং আপনার শাস্তি দ্বারা যেন আমাদের ধ্বংস না করেন। আর এর আগেই আপনি আমাদের নিরাপত্তা দিন।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف، أبو مطر تفرد بالرواية عنه حجاج بن أرطاة، وذكره ابن حبان في "ثقاته"، وقال الذهبي في "الميزان": لا يدرى من هو، وقال ابن حجر في "التقريب": مجهول، وقد تفرَّد به. وأما ما وقع للدولابي في "الكنى" 3/ 1023 من أنَّ أبا مطر هذا روى عنه مسعر أيضًا، فوهمٌ، فإنَّ أبا مطر الذي روى عنه مسعرٌ آخر هو الجهني الذي يروي عن علي بن أبي طالب كما في "التاريخ الكبير" 9/ 75، و"المعرفة" ليعقوب الفسوي 2/ 659، و"الجرح والتعديل" 9/ 445.وأما أبو مطر الذي يروي عن سالم بن عبد الله، فقد تفرّد بالرواية عنه حجاج، ولذا فرّق بينهما البخاري والذهبي في "المقتنى".وسقط من إسناد الحاكم بين عبد الواحد بن زياد وأبي مطر: حجاج بن أرطاة، فقد رواه أحمد والبيهقي عن عفّان بن مسلم على الصواب، وهو كذلك عند البيهقي 3/ 362 من طريق أبي سهل القطان عن إسحاق بن الحسن الحربي. وتابع عفّانَ على ذكر حجاج جمعٌ ذكرنا تخريجهم في "المسند".وأخرجه أحمد 10/ (5763) عن عفّان بن مسلم، عن عبد الواحد بن زياد، عن حجاج بن أرطاة، عن أبي مطر، بهذا الإسناد.وأخرجه الترمذي (3450)، والنسائي (10698) عن قتيبة بن سعيد، عن عبد الواحد بن زياد، عن الحجاج، عن أبي مطر، به. وقال الترمذي حديث غريب لا نعرفه إلّا من هذا الوجه.وخالف سيّارُ بن حاتم عند النسائي (10697) فرواه أبي مطر به، ليس فيه حجاج. وسيار لَيِّن، فلا يعتدُّ بمخالفته.وأخرجه ابن أبي شيبة 10/ 214 عن وكيع، و 10/ 216 عن أبي نعيم الفضل بن دُكين، كلاهما عن جعفر بن برقان قال: بلغنا أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا سمع الرعد الشديد … فذكره معضلًا.وخالفهما معمر، فرواه في "جامعه" (20006) عن جعفر بن برقان: أنه بلغه عن حذيفة، فذكره معضلًا موقوفًا. وجعفر في حفظه شيء.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7966)


7966 - أخبرنا محمد بن علي الصنعاني بمكة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن أيوب، عن ابن سيرين قال: تعشَّينا مع أبي قتادة فوق ظهر بيتٍ لنا، فانقضَّ نجم فأتبعناه أبصارنا، فنهانا، وقال: لا تُتبعوه أبصاركم، فإنَّا كُنَّا نُنهى عن ذلك [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবূ ক্বাতাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইবনু সীরীন বলেন: আমরা আমাদের একটি ঘরের ছাদে আবূ ক্বাতাদার সাথে রাতের খাবার খাচ্ছিলাম। তখন একটি তারা খসে পড়ল এবং আমরা সেটির দিকে আমাদের দৃষ্টি ফেরালাম। তিনি আমাদের নিষেধ করলেন এবং বললেন: তোমরা সেটির দিকে দৃষ্টি দিও না, কারণ আমাদেরও তা থেকে নিষেধ করা হত।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح. أيوب: هو السختياني، وابن سِيرِين: هو محمد. وهو في "جامع معمر" (20007).وأخرجه أحمد 37 / (22549) من طريق هشام بن حسان، عن محمد بن سِيرِين، به.انقضَّ: سقط بسرعة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7967)


7967 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الربيع بن سليمان، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني أبو هانئ عن عمرو بن مالك الجَنْبي، عن فَضَالة بن عُبيد، عن عُبَادة بن الصامت: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم خرجَ ذاتَ يوم على راحلته وأصحابُه معه بين يديه، فقال معاذُ بن جَبَل: يا نبيَّ الله، ائذَنْ لي في أن أتقدَّمَ إليك على طِيبةِ نفس، قال: "نعم"، فاقتربَ معاذٌ إليه، فسارا جميعًا، فقال معاذ: بأبي أنت يا رسولَ الله، أسألُ الله أن يجعل يومَنا قبلَ يومِك، أرأيتَ إن كان شيءٌ ولا نَرَى شيئًا إن شاء الله تعالى، فأيُّ الأعمال نعملُها بعدَك؟ فصمتَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فقال: "الجهادُ في سبيل الله"، ثم قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "نِعمَ الشيءُ الجهادُ، والذي [1] بالناس أملَكُ من ذلك" [قال] [2]: فالصيامُ والصَّدقةُ؟ قال: "نِعمَ الشيءُ الصيامُ والصَّدقةُ". فذكر معاذٌ كلَّ خير يعمله ابن آدم، كلَّ ذلك رسولُ الله صلى الله عليه وسلم [يقول]: "وعادُ بالنَّاسِ خيرٌ من ذلك" قال: فماذا بأبي أنت وأُمِّي عادُ بالناس [خيرٌ] من ذلك؟ قال: فأشار رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إلى فيه، قال: "الصَّمْتُ إِلَّا من خَيرٍ" قال: وهل نؤاخَذُ بما تكلَّمَتْ به ألسنتُنا؟ قال: فضربَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فَخِذَ معاذ، ثم قال: "يا معاذُ، ثَكِلتْكَ أُمُّك - أو ما شاء الله أن يقول له من ذلك. وهل يَكُبُّ الناس على مَناخِرِهم في جَهَنَّمَ إِلَّا ما نطقَتْ به ألسنتُهم؟! فمن كان يُؤْمِنُ بالله واليوم الآخر فليَقُلْ خيرًا أو لِيسكُتْ عن شرٍّ، قُولُوا خيرًا تَغنَمُوا، واسكتُوا عن شرٍّ تَسلَمُوا" [3].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، والغرضُ في إخراجه في هذا الموضع إباحةُ دعاء المُتعلِّم لعالمه الذي يَقتبِسُ منه أن يجعل الله مَنِيّتَه قبل عالِمِه، فإني قدّمتُ قبل هذا أخبارًا صحيحة في إباحة قول الناس: جعلَني الله فِداك [4].




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম একদিন তাঁর বাহনের উপর চড়ে বের হলেন এবং তাঁর সাহাবীরা তাঁর সামনে তাঁর সাথে ছিলেন। তখন মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর নবী! আপনি যদি খুশি হন তবে আমাকে আপনার দিকে এগিয়ে আসার অনুমতি দিন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ।" তখন মু'আয তাঁর কাছাকাছি এলেন এবং তারা দুজন একসাথে চলতে লাগলেন। মু'আয বললেন: আমার পিতামাতা আপনার জন্য উৎসর্গ হোন, হে আল্লাহর রাসূল! আমি আল্লাহর কাছে প্রার্থনা করি যেন আমাদের মৃত্যু আপনার মৃত্যুর আগে হয়। আপনার পরে যদি (কোনো দুর্ভাগ্যজনক) কিছু ঘটে—যদিও আমরা আল্লাহর ইচ্ছায় এমন কিছু দেখতে চাই না—তবে আপনার পরে আমরা কোন কাজগুলো করব? রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম চুপ থাকলেন, অতঃপর বললেন: "আল্লাহর রাস্তায় জিহাদ।" এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "জিহাদ কতই না উত্তম জিনিস! কিন্তু এমন একটি বিষয় আছে যা মানুষের জন্য এর চাইতেও বেশি কল্যাণকর।" (মু'আয) বললেন: তাহলে কি সিয়াম (রোজা) ও সাদাকা (দান)? তিনি বললেন: "সিয়াম ও সাদাকা কতই না উত্তম জিনিস!" এরপর মু'আয ইবনু জাবাল আদম-সন্তান যে সকল ভালো কাজ করে, তার সবগুলোর উল্লেখ করলেন। প্রতিবারই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলছিলেন: "কিন্তু মানুষের জন্য এর চাইতেও বেশি কল্যাণকর একটি বিষয় আছে।" মু'আয বললেন: আমার পিতামাতা আপনার জন্য উৎসর্গ হোন! সেই জিনিসটি কী, যা মানুষের জন্য এর চাইতেও বেশি কল্যাণকর? বর্ণনাকারী বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর মুখের দিকে ইশারা করলেন এবং বললেন: "কল্যাণ ব্যতীত নীরব থাকা।" মু'আয বললেন: আমাদের জিহ্বা দ্বারা আমরা যা বলি, সে জন্য কি আমরা পাকড়াও হব? বর্ণনাকারী বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মু'আযের উরুতে আঘাত করলেন (বা চাপ দিলেন) এবং বললেন: "হে মু'আয! তোমার মা তোমাকে হারাক! — অথবা আল্লাহ যা ইচ্ছা করলেন তা তাঁকে বললেন। মানুষকে কি তাদের মুখের ভরে জাহান্নামে নিক্ষেপ করা হবে, তাদের জিহ্বা যা উচ্চারণ করেছে তা ছাড়া? সুতরাং যে ব্যক্তি আল্লাহ ও আখিরাতের দিনের প্রতি ঈমান রাখে, সে যেন ভালো কথা বলে অথবা মন্দ বিষয় থেকে নীরব থাকে। তোমরা ভালো কথা বলো, তাহলে লাভবান হবে; আর মন্দ থেকে নীরব থাকো, তাহলে নিরাপদ থাকবে।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] كذا في النسخ الخطية، والذي في "المختارة" للضياء المقدسي من طريق الطبراني: وعاد، ومثله في "مجمع الزوائد"، وهو الجادة. ومعنى قوله: "وعادُ بالناس" أي: وشيء بالناس، على ما يفهم من السياق. فقد جاء في "صحاح الجوهري" و"اللسان" (عود): يقال: ما أدري أيُّ عادَ هو، غير مصروف، أي: أيُّ الناس هو، وفي "اللسان": أيُّ خَلْق هو.



[2] زيادة من "المختارة"، والسياق يقتضيها.



7967 [3] - إسناده صحيح.وأخرجه مختصرًا ومطولًا البخاري في "خلق الأفعال" (293)، والضياء المقدسي في "المختارة" 8/ (405) من طريق أحمد بن صالح المصري، والقضاعي في "مسند الشهاب" (666) من طريق أحمد بن عبد الرحمن بن وهب كلاهما عن عبد الله بن وهب بهذا الإسناد.وسلف نحوه من حديث معاذ بن جبل نفسه برقم (3590). جابرًا عن الرجل يباشر الرجل … فذكره. وانظر ما بعده.ويشهد له حديث ابن عباس الآتي بعد حديث.وحديث أبي سعيد الخدري عند مسلم (338).وحديث أبي هريرة عند أحمد 14/ (8318).وبنحوه عن ابن مسعود عند البخاري (5240).



7967 [4] - انظر الحديثين (7950) و (7951). جابرًا عن الرجل يباشر الرجل … فذكره. وانظر ما بعده.ويشهد له حديث ابن عباس الآتي بعد حديث.وحديث أبي سعيد الخدري عند مسلم (338).وحديث أبي هريرة عند أحمد 14/ (8318).وبنحوه عن ابن مسعود عند البخاري (5240).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7968)


7968 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا السَّري بن خُزيمة، حدثنا سليمان بن داود الهاشمي، حدثنا عبد الرحمن بن أبي الزِّناد، عن موسى بن عُقبة، عن أبي الزُّبير عن جابر قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يَنهَى أن يُباشِرَ الرجلُ الرجلَ في ثوب واحد، والمرأةُ المرأةَ في ثوب واحد [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নিষেধ করতে শুনেছি যে, একজন পুরুষ যেন অন্য পুরুষের সাথে এক কাপড়ের (লেপ বা চাদরের) নিচে শুয়ে না থাকে, আর একজন নারী যেন অন্য নারীর সাথে এক কাপড়ের (লেপ বা চাদরের) নিচে শুয়ে না থাকে।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل عبد الرحمن بن أبي الزناد.وأخرجه أحمد 23/ (15248) عن سليمان بن داود الهاشمي بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (14836) و (15184) من طريقين عن ابن أبي الزناد، به.وأخرجه أحمد أيضًا (14753) و (14754) من طريق ابن لهيعة، عن أبي الزبير قال: سألت جابرًا عن الرجل يباشر الرجل … فذكره. وانظر ما بعده.ويشهد له حديث ابن عباس الآتي بعد حديث.وحديث أبي سعيد الخدري عند مسلم (338).وحديث أبي هريرة عند أحمد 14/ (8318).وبنحوه عن ابن مسعود عند البخاري (5240).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7969)


7969 - أخبرناه أحمد بن يعقوب الثقفي، حدثنا محمد بن عبد الله الحضرمي، حدثنا أحمد بن يونس، حدثنا أبو شهاب، عن ابن أبي ليلى، عن أبي الزبير عن جابر قال: نَهَى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن تُباشِرَ المرأة المرأةَ، والرجلُ الرجلَ [1].قال ابن أبي ليلى: وأنا أرى فيه التَّعزير.محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى من أجلِّ بيت الصحابة من الأنصار ومُفتي وقته بالكوفة، إذا رأى فيه التعزير ففيه قدوة.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোনো নারীকে অন্য কোনো নারীর সাথে এবং কোনো পুরুষকে অন্য কোনো পুরুষের সাথে (অশালীনভাবে) সরাসরি স্পর্শ করতে বা মিলিত হতে নিষেধ করেছেন। [১] ইবনু আবী লায়লা বলেন: আমি মনে করি, এর জন্য তা'যীর (বিচক্ষণতা অনুযায়ী শাস্তি) প্রযোজ্য। মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুর রহমান ইবনু আবী লায়লা ছিলেন আনসার সাহাবীগণের সর্বশ্রেষ্ঠ বংশের অন্তর্ভুক্ত এবং কূফার তাঁর সময়ের মুফতি। যখন তিনি এতে তা’যীর (শাস্তি) প্রযোজ্য মনে করেছেন, তখন এর মধ্যে (আমাদের জন্য) অনুসরণীয় আদর্শ রয়েছে।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل ابن أبي ليلى، واسمه محمد بن عبد الرحمن أحمد بن يونس هو ابن عبد الله بن يونس منسوب لجده، وأبو شهاب: هو عبد ربه بن نافع الحناط.وأخرجه ابن أبي شيبة 4/ 398 عن أحمد بن عبد الله بن يونس، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله. عن سماك بن حرب، عن عكرمة به.وخالف إسرائيلَ حسنُ بن صالح بن حي، فرواه عن سماك عن عكرمة مرسلًا، أخرجه أحمد 5/ (2872).وانظر ما قبله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7970)


7970 - وقد حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا أبو معاوية، عن أبي إسحاق الشَّيباني، عن عكرمة، عن ابن عباس قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "لا يُباشِرِ الرجلُ الرجلَ، ولا المرأةُ المرأةَ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، فقد أجمعا على صحّة هذا الحديث.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কোনো পুরুষ যেন অন্য কোনো পুরুষের সাথে (সরাসরি) মিলিত না হয় এবং কোনো নারীও যেন অন্য কোনো নারীর সাথে (সরাসরি) মিলিত না হয়।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أحمد بن عبد الجبار - وهو العطاردي وقد توبع أبو معاوية: هو محمد بن خازم الضرير، وأبو إسحاق الشيباني: هو سليمان بن أبي سليمان.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (8807)، و "الصغير" (1094)، والآجري في "ذم اللواط" (20) من طريقين عن أسد بن موسى، عن أبي معاوية الضرير، بهذا الإسناد وقال الطبراني: لم يروه عن الشيباني إلّا أبو معاوية، تفرد به أسد بن موسى.وأخرجه أحمد 4/ (2773) و 5 (2871)، وابن حبان (5582) من طريق إسرائيل بن يونس عن سماك بن حرب، عن عكرمة به.وخالف إسرائيلَ حسنُ بن صالح بن حي، فرواه عن سماك عن عكرمة مرسلًا، أخرجه أحمد 5/ (2872).وانظر ما قبله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7971)


7971 - أخبرنا أبو بكر محمد بن عمر الحافظ ابن الجعابي القاضي، حدثنا أبو شعيب عبد الله بن الحسن، حدثنا عبد العزيز بن يحيى، حدثنا محمد بن سلمة، عن محمد بن إسحاق، عن ابن طاووس وعن أيوب السختياني، عن طاووس، عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "اتَّقُوا بيتًا يقال له: الحَمَّام" قالوا: يا رسول الله، إنه يُذهِبُ الدَّرَنَ، وينفعُ المريضَ، قال: فمَن دخله فليستتر" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমরা এমন একটি ঘর থেকে বেঁচে থাকো, যেটিকে হাম্মাম (জনসাধারণের গোসলখানা) বলা হয়।” সাহাবীরা বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! এটি তো ময়লা দূর করে এবং রোগীর উপকার করে। তিনি বললেন: “সুতরাং যে তাতে প্রবেশ করবে, সে যেন অবশ্যই পর্দা অবলম্বন করে।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] رجاله لا بأس بهم، لكن محمد بن إسحاق مدلس، ولم يصرِّح بالسماع، وتابعه ضعيفٌ لا يحتج به. والمحفوظ في هذا الحديث أنه عن طاووس مرسل كما قال أبو حاتم في "العلل" (2209) وغيرُه، ويأتي بيانه. عبد الله بن الحسن: هو ابن أحمد بن أبي شعيب، وعبد العزيز بن يحيى: هو ابن يوسف، ومحمد بن سلمة: هو ابن عبد الله الحرانيون وابن طاووس: هو عبد الله.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (10932) عن أحمد بن علي الأبار - ومن طريقه أبو نعيم في "الطب النبوي" (193)، والضياء المقدسي في "المختارة" 11/ (62) والبيهقي في "شعب الإيمان" (7375) من طريق محمد بن إبراهيم العبدي، كلاهما عن عبد العزيز بن يحيى، بهذا الإسناد. وليس في رواية الطبراني ذكر أيوب السختياني.وأخرجه الحكيم الترمذي في "نوادر الأصول" (754)، والطبراني (10926)، وابن عدي في "الكامل" 7/ 222، وأبو نعيم (194)، والبيهقي (7378) من طريق يحيى بن عثمان التيمي، عن ابن طاووس وحده، عن أبيه، به. ويحيى التيمي ضعيف منكر الحديث.وأخرجه البيهقي (7376) من طريق حماد بن زيد، عن أيوب السختياني، عن ابن طاووس، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم، مرسلًا. قال البيهقي: وهو المحفوظ. يعني المحفوظ عن أيوب إرساله لا وصله.وأخرجه الفاكهي في "أخبار مكة" (1858)، والبيهقي (7377) من طريق سفيان بن عيينة، عن ابن طاووس، عن أبيه مرسلًا. وأخرجه عبد الرزاق (1117)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 7/ 309 من طريق أبي نعيم الفضل ابن دُكين، كلاهما (عبد الرزاق وأبو نعيم) عن سفيان الثوري، عن ابن طاووس، عن أبيه مرسلًا.قال البيهقي: رواه الجمهور عن الثّوري على الإرسال، وكذلك رواه أيوب السختياني وسفيان بن عيينة وروح بن القاسم وغيرهم عن ابن طاووس مرسلًا. وقال أبو حاتم كما في "العلل": إنَّما يروونه عن طاووس عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم مرسلًا.وخالف الجمهورَ يعلى بنُ عبيد، فرواه عن الثَّوري، عن ابن طاووس، عن أبيه، عن ابن عباس موصولًا، أخرجه البزار في مسنده (4888)، وأبو طاهر في "المخلّصيات" (1202) - ومن طريقه الضياء في "المختارة" 11/ (61) - والبيهقي في "السنن" 7/ 309.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7972)


7972 - حدثنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنبَري، حدثنا محمد بن عبد السلام والحسين بن محمد القَبَّاني وإبراهيم بن أبي طالب، قالوا: حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا معاذ بن هشام، حدثني أبي، عن عطاء، عن أبي الزُّبير، عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن كان يُؤْمِنُ بالله واليومِ الآخر فلا يُدخِلْ حَلِيلتَه [1] الحمَّامَ، ومَن كان يُؤْمِنُ بالله واليوم الآخر فلا يَدخُلِ الحمَّامَ إلَّا بمئزَرٍ، ومَن كان يُؤْمِنُ بالله واليوم الآخر فلا يَجلِسْ على مائدةٍ يُدارُ عليها الخمرُ" [2]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি আল্লাহ এবং শেষ দিবসের (আখিরাতের) উপর ঈমান রাখে, সে যেন তার স্ত্রীকে জনসাধারণের গোসলখানায় (হাম্মামে) প্রবেশ না করায়। আর যে ব্যক্তি আল্লাহ এবং শেষ দিবসের (আখিরাতের) উপর ঈমান রাখে, সে যেন ইযার (লুঙ্গি বা লজ্জাস্থান আবৃতকারী বস্ত্র) ছাড়া হাম্মামে প্রবেশ না করে। আর যে ব্যক্তি আল্লাহ এবং শেষ দিবসের (আখিরাতের) উপর ঈমান রাখে, সে যেন এমন দস্তরখানায় না বসে, যেখানে মদ পরিবেশন করা হয়।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في النسخ الخطية: حليله، والمثبت من مصادر التخريج. محمد بن صالح الأنماطي المعروف بكيلجة - عن أبي معمر عبد الله بن عمرو المِنقري، عن عبد الوارث بن سعيد، عن عطاء بن دينار، عن أبي الزبير، به. فسمى عطاءً ابنَ دينار، وعطاء بن دينار هذا مصري لا بأس به.ورواه الحافظ ابن شيرويه النيسابوري كما في "المطالب العالية" لابن حجر (2585) - وغاير في لفظه فقال: "من كان يؤمن بالله واليوم الآخر فلا يَدخلنَّ مع حليلته الحمام" - عن محمد بن يحيى الذهلي، عن أبي معمر، به. إلَّا أنه سمَّى عطاءٌ ابنَ عجلان، وهذا أصحُّ، فإن ابن عجلان بصريٌّ والراوي عنه وهو عبد الوارث - بصري أيضًا، وكذلك هشام الدستوائي الذي في رواية الحاكم.وأخرجه تامًّا ومقطعًا أبو حنيفة في "مسنده" (15)، وأحمد 23/ (14651)، والدارمي (2137)، والبزار (320 - كشف الأستار)، والطبراني في "الأوسط" (688) و (2510)، وأبو طاهر المخلص في "المخلَّصيات" (2206)، والسهمي في "تاريخ جرجان" (275)، وأبو القاسم بن بشران في "أماليه" (189)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 2/ 50، والسلفي في الخامس عشر من "المشيخة البغدادية" (24) من طرق عن أبي الزبير، به.وسلف برقم (588) من طريق زهير بن معاوية عن أبي الزبير، بلفظ: نهى أن يدخل الرجل الماء إلّا بمئزر.وأخرجه الترمذي (2801)، وأبو يعلى (1925)، والطبراني في "الأوسط" (588)، وابن عدي في الكامل 2/ 315 من طريق ليث بن أبي سليم، عن طاووس، عن جابر، به. وليث ضعيف.وقال الترمذي: حسن غريب لا نعرفه من حديث طاووس عن جابر إلَّا من هذا الوجه.وانظر ما قبله، وما سيأتي برقم (7978).ويشهد له حديث عمر عن أحمد 1/ (125).وحديث أبي هريرة عند أحمد 14/ (8275).وحديث عائشة عند أحمد 42 / (25006)، وأبي داود (4009)، وابن ماجه (3749)، والترمذي (2802).وحديث عبد الله بن عمرو عند أبي داود (4011)، وابن ماجه (3748).وحديث أبي أيوب الآتي عند الحاكم برقم (7976).ولا يخلو إسناد واحد منها من مقال، لكنها تصلح في الشواهد.



[2] حديث حسن، وهذا إسناد رجاله ثقات غير عطاء، وقد اختلفوا في نسبته، والراجح أنه عطاء ابن عجلان كما سيأتي، وهو ضعيف منكر الحديث، إلَّا أنه لم ينفرد به، فقد تابعه عليه غير واحد كما سيأتي. ومعنى الحديث قد روي عن غير واحد من الصحابة، فبمجموعها يتحسن الحديث إن شاء الله.وأخرجه تامًّا ومقطَّعًا النسائي في "الكبرى" (6708)، وفي "المجتبى" (401)، والطبراني في "الأوسط" (1694) و (8214)، وأبو الشيخ في "الطبقات" (440)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (5207)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 2/ 50، والجورقاني في "الأباطيل والمناكير" (335) من طرق عن إسحاق بن راهويه، بهذا الإسناد. قال الطبراني: يقال: هذا عطاء بن السائب، والله أعلم، ولم يروه عن عطاء إِلَّا هشام، ولا عن هشام إلَّا معاذ، تفرَّد به إسحاق!وأخرجه قوام السنة في "الترغيب والترهيب" (27) من طريق أبي بكر بن صالح - وهو الحافظ محمد بن صالح الأنماطي المعروف بكيلجة - عن أبي معمر عبد الله بن عمرو المِنقري، عن عبد الوارث بن سعيد، عن عطاء بن دينار، عن أبي الزبير، به. فسمى عطاءً ابنَ دينار، وعطاء بن دينار هذا مصري لا بأس به.ورواه الحافظ ابن شيرويه النيسابوري كما في "المطالب العالية" لابن حجر (2585) - وغاير في لفظه فقال: "من كان يؤمن بالله واليوم الآخر فلا يَدخلنَّ مع حليلته الحمام" - عن محمد بن يحيى الذهلي، عن أبي معمر، به. إلَّا أنه سمَّى عطاءٌ ابنَ عجلان، وهذا أصحُّ، فإن ابن عجلان بصريٌّ والراوي عنه وهو عبد الوارث - بصري أيضًا، وكذلك هشام الدستوائي الذي في رواية الحاكم.وأخرجه تامًّا ومقطعًا أبو حنيفة في "مسنده" (15)، وأحمد 23/ (14651)، والدارمي (2137)، والبزار (320 - كشف الأستار)، والطبراني في "الأوسط" (688) و (2510)، وأبو طاهر المخلص في "المخلَّصيات" (2206)، والسهمي في "تاريخ جرجان" (275)، وأبو القاسم بن بشران في "أماليه" (189)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 2/ 50، والسلفي في الخامس عشر من "المشيخة البغدادية" (24) من طرق عن أبي الزبير، به.وسلف برقم (588) من طريق زهير بن معاوية عن أبي الزبير، بلفظ: نهى أن يدخل الرجل الماء إلّا بمئزر.وأخرجه الترمذي (2801)، وأبو يعلى (1925)، والطبراني في "الأوسط" (588)، وابن عدي في الكامل 2/ 315 من طريق ليث بن أبي سليم، عن طاووس، عن جابر، به. وليث ضعيف.وقال الترمذي: حسن غريب لا نعرفه من حديث طاووس عن جابر إلَّا من هذا الوجه.وانظر ما قبله، وما سيأتي برقم (7978).ويشهد له حديث عمر عن أحمد 1/ (125).وحديث أبي هريرة عند أحمد 14/ (8275).وحديث عائشة عند أحمد 42 / (25006)، وأبي داود (4009)، وابن ماجه (3749)، والترمذي (2802).وحديث عبد الله بن عمرو عند أبي داود (4011)، وابن ماجه (3748).وحديث أبي أيوب الآتي عند الحاكم برقم (7976).ولا يخلو إسناد واحد منها من مقال، لكنها تصلح في الشواهد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7973)


7973 - أخبرنا محمد بن علي الصَّنعاني، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا سفيان الثَّوري، عن منصور، عن سالم بن أبي الجَّعْد، عن أبي المليح قال: دخل نسوة من أهل الشام على عائشة قالت: لعلَّكنَّ من الكُورَة التي تدخُلُ نساؤُها الحمَّامَ، سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "أيما امرأةٍ وَضَعَتْ ثيابَها في غير بيتِ زوجِها، فقد هَتَكَتْ سِتْرَها فيما بينها وبينَ الله عز وجل" [1].وقد رواه شعبةُ عن منصور:




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সিরিয়ার (শামের) কয়েকজন মহিলা তাঁর কাছে আসলে তিনি বললেন: সম্ভবত তোমরা সেই অঞ্চলের (কূরা), যেখানকার মহিলারা হাম্মামখানায় (জনসাধারণের গোসলখানায়) প্রবেশ করে। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে কোনো নারী তার স্বামীর ঘর ব্যতীত অন্য কোথাও (জনসম্মুখে) কাপড় খুলে রাখে, সে তার ও আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার মাঝে থাকা আবরণ (লজ্জা/পর্দা) ছিন্ন করে ফেলল।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح. إسحاق بن إبراهيم: هو الدَّبَري، ومنصور: هو ابن المعتمر.وأخرجه أحمد (42/ 25408) و (25627) عن عبد الرزاق، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن ماجه (3750) من طريق وكيع، عن سفيان الثوري، به.وأخرجه أبو داود (4010) من طريق جرير بن عبد الحميد، عن منصور، عن سالم قال: دخل على عائشة نسوة … فذكره، ليس فيه أبو المليح.وأخرجه كذلك أحمد 40/ (24140) من طريق الأعمش، عن سالم عن عائشة.وأخرجه بنحوه أحمد 43/ (26304) من طريق يزيد بن أبي زياد، عن عطاء بن أبي رباح، قال: أتَينَ نسوة من أهل حمص … فذكره. وابن أبي زياد ضعيف.وانظر ما بعده، وما سيأتي برقمي (7978) و (8788).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7974)


7974 - أخبرناه عبد الرحمن بن الحسن القاضي، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا شعبة، عن منصور، عن سالم بن أبي الجَعْد، عن أبي المَلِيح قال: دخل نِسوةٌ من أهل الشام على عائشة، فقالت: أنتُنَّ اللاتي تَدخُلنَ الحمَّاماتِ؟ قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما من امرأةٍ تَضَعُ ثيابَها في غير بيتِها، إِلَّا هَتَكَتْ السِّترَ فيما بينَها وبينَ الله عز وجل" [1].وقد رَوَتْ أمُّ سَلَمة رضي الله عنها مثل هذا عن رسول الله صلى الله عليه وسلم:




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সিরিয়ার কিছু মহিলা তাঁর নিকট প্রবেশ করলে তিনি (আয়েশা) বললেন, তোমরাই কি সেই সব নারী যারা হাম্মামে (জনসাধারণের গোসলখানায়) প্রবেশ করে থাকো? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে নারী তার নিজের ঘর ব্যতীত অন্য কোথাও তার বস্ত্র খুলে রাখে, সে আল্লাহ আযযা ওয়া জাল-এর সাথে তার মধ্যকার পর্দা (বা লজ্জাশীলতা) ছিন্ন করে ফেলে।" উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে অনুরূপ একটি বর্ণনা করেছেন।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح كسابقه، وهذا إسناد رجاله ثقات غير عبد الرحمن بن الحسن شيخ المصنف، فهو ضعيف، لكنه توبع.وأخرجه أحمد 42 / (25407)، وأبو داود (4010) من طريق محمد بن جعفر، والترمذي (2803) من طريق أبي داود الطيالسي، كلاهما عن شعبة، بهذا الإسناد. وقرن أحمد في روايته بمحمد بن جعفر حجاجَ بن محمد، وهذا الأخير لم يذكر أبا المليح بل قال: عن رجل.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7975)


7975 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا عبد الله بن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن درَّاج أبي السَّمْح، عن السائب: أنَّ نِساءٌ دَخَلْنَ على أم سلمة زوج النبي، فسألتهنَّ: مَن أنتنَّ؟ قُلْنَ: من أهل حمص قالت من أصحاب الحَمَّامات؟ قُلنَ: وبها بأسٌ؟ قالت: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "أيما امرأةٍ نَزَعَتْ ثيابَها في غير بيتِها، خَرَقَ الله تعالى عنها سِتْرَه" [1].




উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কিছু সংখ্যক নারী নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট প্রবেশ করলে তিনি তাদের জিজ্ঞাসা করলেন: তোমরা কারা? তারা বলল: আমরা হিমসের (Hims) অধিবাসী। তিনি বললেন: (তাহলে) তোমরা কি হাম্মামের (জনসাধারণের গোসলখানার) লোক? তারা বলল: এতে কি কোনো দোষ আছে? তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে নারী তার নিজের ঘর ব্যতীত অন্য কোথাও তার পোশাক খুলে ফেলবে, আল্লাহ তাআলা তার থেকে তাঁর পর্দা (আবরু) সরিয়ে নিবেন।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة السائب وهو مولى أم سلمة، فقد تفرد بالرواية عنه درّاج أبو السمح، ودراج ليس بذاك القوي، والمحفوظ في هذه القصة حديث عائشة السابق.وأخرجه أحمد 44 / (26569) من طريق ابن لهيعة عن دراج، به. كما اختلفوا في تعيين يعقوب بن إبراهيم، فعدَّه الحاكم أبا يوسف القاضي صاحبَ أبي حنيفة، ولم يتابعه عليه أحد، وعدَّه عبدُ الله بن وهب - كما في "العلل" لابن أبي حاتم (192) - ويعقوبُ الفسوي عند البيهقي في "شعب الإيمان" (7379) يعقوب بن إبراهيم بن عبد الله بن حنين، وهو مجهول، وذكره ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 9/ 201 باسم يعقوب بن إبراهيم الأنصاري المصري، وذكر أنه روى عن عبد الرحمن بن جبير ومحمد بن ثابت بن شرحبيل، وعنه يحيى بن أيوب، وهو مجهول أيضًا، فهذا قول ثالث.وأما عبد الله بن يزيد الخَطْمي، فهكذا سمّاه الليث، ورجحه ابن أبي حاتم في "العلل"، وهو مختلف في صحبته، بينما سماه عمرو بن الربيع - كما في الرواية التالية عند المصنف - عبدَ الله بن سويد، وهو ما رجَّحه أبو حاتم الرازي كما في "العلل" لابنه. وعبد الله بن سويد اثنان أحدهما حارثي له صحبة، والآخر أنصاري يروي عن عمته أم حميد امرأة أبي حميد الساعدي كما في "الجرح والتعديل 5/ 66، فالله أعلم.وأخرجه تامًّا ومختصرًا إبراهيم الحربي في إكرام الضيف (37)، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" (212) عن علي بن داود القنطري، والطبراني "في الكبير" (3873)، و"الأوسط" (8658)، و"مكارم الأخلاق" له (221) عن مطلب بن شعيب الأزدي، عن أبي صالح عبد الله بن صالح، بهذا الإسناد. وزادوا جميعًا بين الليث ويعقوب يحيى بنَ أيوب.وأخرجه الباغندي في "مسند عمر بن عبد العزيز" (94) من طريق زمعة بن صالح، عن عبد الله بن أبي بكر بن حزم قال: رفع إلى عمر بن عبد العزيز حديثٌ حدث به محمد بن ثابت ابن شرحبيل، فكتب عمر بن عبد العزيز إلى أبي: أن سل محمّد بن ثابت عن حديثه فإنَّه رضًا، فسأله وأنا معه، فأخبرنا محمد بن ثابت، عن عبد الله بن يزيد الخطميّ، عن أبي أيّوب، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: من كان يؤمن بالله واليوم الآخر فليكرم ضيفه، ومن كان يؤمن بالله واليوم الآخر فليكرم جاره، ومن كان يؤمن بالله واليوم الآخر فلا يدخل إلّا بمئزر، ومن كان يؤمن بالله واليوم الآخر من نسائكم فلا تدخل الحمّام"، قال عبد الله بن أبي بكر: فكتب أبي إلى عمر بن عبد العزيز بذلك، فمنع عمر بن عبد العزيز النّساء من الحمّام وزمعةُ بن صالح فيه ضعف، لكنه يصلح في المتابعات والشواهد.ولقصة إكرام الضيف والجار، انظر حديثي أبي شريح وأبي هريرة السالفين برقمي (7483) و (7484).ولقصة دخول الحمّام بمئزر، انظر حديث جابر السالف برقم (7972).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7976)


7976 - أخبرنا أبو بكر محمد بن عبد الله الشافعي، حدثنا محمد بن إسماعيل السُّلَمي، حدثنا أبو صالح، حدثني اللَّيث [عن يحيى بن أيوب] [1] عن يعقوب بن إبراهيم، عن عبد الرحمن بن جُبير، عن محمد بن ثابت بن شُرَحْبيل القُرشي من بني عبد الدار، أنَّ عبد الله بن يزيد الخَطْمي حدَّثه عن أبي أيوب الأنصاري، أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قال: "مَن كان يُؤْمِنُ بالله واليوم الآخر فليُكرِمْ ضيفَه، ومَن كان يُؤْمِنُ بالله واليوم الآخر فليُكرِمْ جارَه [2]، ومَن كان يؤمن بالله واليوم الآخر فلا يَدخُلِ الحمَّامَ إِلَّا بِمِئزَرٍ، ومَن كان يُؤْمِنُ بالله واليوم الآخرِ من نسائِكم فلا تَدخُلِ الحمَّامات" [3]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . فرُفِعَ الحديثُ إلى عمر بن عبد العزيز، فكتب إلى أبي بكر بن محمد بن عمرو [4] ابن حزم: أنْ سَلْ محمدَ بن ثابت عن هذا الحديث واكتُب [5] بما قال. ففَعَلَ، فكتب عمر بن عبد العزيز أنْ تُمنَعَ النساءُ الحمَّاماتِ.هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.ويعقوب بن إبراهيم هذا الذي روى عنه الليث بن سعد: هو أبو يوسف القاضي، وبصحّة ما ذكرتُه:




আবু আইয়ুব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহ ও শেষ দিনের প্রতি ঈমান রাখে, সে যেন তার মেহমানকে সম্মান করে। আর যে ব্যক্তি আল্লাহ ও শেষ দিনের প্রতি ঈমান রাখে, সে যেন তার প্রতিবেশীকে সম্মান করে। আর যে ব্যক্তি আল্লাহ ও শেষ দিনের প্রতি ঈমান রাখে, সে যেন (স্নানাগারে) তহবন্দ (লুঙ্গি বা ইজার) ছাড়া প্রবেশ না করে। আর তোমাদের যে নারী আল্লাহ ও শেষ দিনের প্রতি ঈমান রাখে, সে যেন গোসলখানাসমূহে (জনসাধারণের স্নানাগারে) প্রবেশ না করে।"

অতঃপর এই হাদীসটি উমর ইবনে আব্দুল আযীযের নিকট পেশ করা হলো। তখন তিনি আবূ বকর ইবনে মুহাম্মাদ ইবনে আমর ইবনে হাযমের নিকট লিখলেন যে, আপনি মুহাম্মাদ ইবনে সাবিতকে এই হাদীস সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেন এবং তিনি যা বলেন, তা লিখে পাঠান। তিনি (আবূ বকর) তাই করলেন। অতঃপর উমর ইবনে আব্দুল আযীয (নির্দেশ) লিখে দিলেন যে, নারীদের জন্য (জনসাধারণের) গোসলখানাসমূহ নিষিদ্ধ করা হোক। এই হাদীসের ইসনাদ সহীহ, কিন্তু তারা (বুখারী ও মুসলিম) এটি উদ্ধৃত করেননি।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] ليس في النسخ الخطية، وأثبتناه من مصادر التخريج، فمدار الحديث عليه. كما اختلفوا في تعيين يعقوب بن إبراهيم، فعدَّه الحاكم أبا يوسف القاضي صاحبَ أبي حنيفة، ولم يتابعه عليه أحد، وعدَّه عبدُ الله بن وهب - كما في "العلل" لابن أبي حاتم (192) - ويعقوبُ الفسوي عند البيهقي في "شعب الإيمان" (7379) يعقوب بن إبراهيم بن عبد الله بن حنين، وهو مجهول، وذكره ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 9/ 201 باسم يعقوب بن إبراهيم الأنصاري المصري، وذكر أنه روى عن عبد الرحمن بن جبير ومحمد بن ثابت بن شرحبيل، وعنه يحيى بن أيوب، وهو مجهول أيضًا، فهذا قول ثالث.وأما عبد الله بن يزيد الخَطْمي، فهكذا سمّاه الليث، ورجحه ابن أبي حاتم في "العلل"، وهو مختلف في صحبته، بينما سماه عمرو بن الربيع - كما في الرواية التالية عند المصنف - عبدَ الله بن سويد، وهو ما رجَّحه أبو حاتم الرازي كما في "العلل" لابنه. وعبد الله بن سويد اثنان أحدهما حارثي له صحبة، والآخر أنصاري يروي عن عمته أم حميد امرأة أبي حميد الساعدي كما في "الجرح والتعديل 5/ 66، فالله أعلم.وأخرجه تامًّا ومختصرًا إبراهيم الحربي في إكرام الضيف (37)، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" (212) عن علي بن داود القنطري، والطبراني "في الكبير" (3873)، و"الأوسط" (8658)، و"مكارم الأخلاق" له (221) عن مطلب بن شعيب الأزدي، عن أبي صالح عبد الله بن صالح، بهذا الإسناد. وزادوا جميعًا بين الليث ويعقوب يحيى بنَ أيوب.وأخرجه الباغندي في "مسند عمر بن عبد العزيز" (94) من طريق زمعة بن صالح، عن عبد الله بن أبي بكر بن حزم قال: رفع إلى عمر بن عبد العزيز حديثٌ حدث به محمد بن ثابت ابن شرحبيل، فكتب عمر بن عبد العزيز إلى أبي: أن سل محمّد بن ثابت عن حديثه فإنَّه رضًا، فسأله وأنا معه، فأخبرنا محمد بن ثابت، عن عبد الله بن يزيد الخطميّ، عن أبي أيّوب، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: من كان يؤمن بالله واليوم الآخر فليكرم ضيفه، ومن كان يؤمن بالله واليوم الآخر فليكرم جاره، ومن كان يؤمن بالله واليوم الآخر فلا يدخل إلّا بمئزر، ومن كان يؤمن بالله واليوم الآخر من نسائكم فلا تدخل الحمّام"، قال عبد الله بن أبي بكر: فكتب أبي إلى عمر بن عبد العزيز بذلك، فمنع عمر بن عبد العزيز النّساء من الحمّام وزمعةُ بن صالح فيه ضعف، لكنه يصلح في المتابعات والشواهد.ولقصة إكرام الضيف والجار، انظر حديثي أبي شريح وأبي هريرة السالفين برقمي (7483) و (7484).ولقصة دخول الحمّام بمئزر، انظر حديث جابر السالف برقم (7972).



[2] في (ز) و (ب): ضيفه مرة أخرى. وسقطت الجملة بتمامها من (م) ومن "التلخيص"، والمثبت من مصادر التخريج. كما اختلفوا في تعيين يعقوب بن إبراهيم، فعدَّه الحاكم أبا يوسف القاضي صاحبَ أبي حنيفة، ولم يتابعه عليه أحد، وعدَّه عبدُ الله بن وهب - كما في "العلل" لابن أبي حاتم (192) - ويعقوبُ الفسوي عند البيهقي في "شعب الإيمان" (7379) يعقوب بن إبراهيم بن عبد الله بن حنين، وهو مجهول، وذكره ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 9/ 201 باسم يعقوب بن إبراهيم الأنصاري المصري، وذكر أنه روى عن عبد الرحمن بن جبير ومحمد بن ثابت بن شرحبيل، وعنه يحيى بن أيوب، وهو مجهول أيضًا، فهذا قول ثالث.وأما عبد الله بن يزيد الخَطْمي، فهكذا سمّاه الليث، ورجحه ابن أبي حاتم في "العلل"، وهو مختلف في صحبته، بينما سماه عمرو بن الربيع - كما في الرواية التالية عند المصنف - عبدَ الله بن سويد، وهو ما رجَّحه أبو حاتم الرازي كما في "العلل" لابنه. وعبد الله بن سويد اثنان أحدهما حارثي له صحبة، والآخر أنصاري يروي عن عمته أم حميد امرأة أبي حميد الساعدي كما في "الجرح والتعديل 5/ 66، فالله أعلم.وأخرجه تامًّا ومختصرًا إبراهيم الحربي في إكرام الضيف (37)، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" (212) عن علي بن داود القنطري، والطبراني "في الكبير" (3873)، و"الأوسط" (8658)، و"مكارم الأخلاق" له (221) عن مطلب بن شعيب الأزدي، عن أبي صالح عبد الله بن صالح، بهذا الإسناد. وزادوا جميعًا بين الليث ويعقوب يحيى بنَ أيوب.وأخرجه الباغندي في "مسند عمر بن عبد العزيز" (94) من طريق زمعة بن صالح، عن عبد الله بن أبي بكر بن حزم قال: رفع إلى عمر بن عبد العزيز حديثٌ حدث به محمد بن ثابت ابن شرحبيل، فكتب عمر بن عبد العزيز إلى أبي: أن سل محمّد بن ثابت عن حديثه فإنَّه رضًا، فسأله وأنا معه، فأخبرنا محمد بن ثابت، عن عبد الله بن يزيد الخطميّ، عن أبي أيّوب، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: من كان يؤمن بالله واليوم الآخر فليكرم ضيفه، ومن كان يؤمن بالله واليوم الآخر فليكرم جاره، ومن كان يؤمن بالله واليوم الآخر فلا يدخل إلّا بمئزر، ومن كان يؤمن بالله واليوم الآخر من نسائكم فلا تدخل الحمّام"، قال عبد الله بن أبي بكر: فكتب أبي إلى عمر بن عبد العزيز بذلك، فمنع عمر بن عبد العزيز النّساء من الحمّام وزمعةُ بن صالح فيه ضعف، لكنه يصلح في المتابعات والشواهد.ولقصة إكرام الضيف والجار، انظر حديثي أبي شريح وأبي هريرة السالفين برقمي (7483) و (7484).ولقصة دخول الحمّام بمئزر، انظر حديث جابر السالف برقم (7972).



7976 [3] - حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف فيه غير ما علّة، فأبو صالح - وهو عبد الله بن صالح المصري - ليَّن، واختُلف فيه على يحيى بن أيوب الغافقي، فرواه الليث بن سعد عنه، فزاد في إسناده بين يعقوب بن إبراهيم ومحمد بن ثابت عبد الرحمن بن جبير، ورواه عن يحيى بن أيوب عمرُو بن الربيع فلم يذكر ابن جبير. كما اختلفوا في تعيين يعقوب بن إبراهيم، فعدَّه الحاكم أبا يوسف القاضي صاحبَ أبي حنيفة، ولم يتابعه عليه أحد، وعدَّه عبدُ الله بن وهب - كما في "العلل" لابن أبي حاتم (192) - ويعقوبُ الفسوي عند البيهقي في "شعب الإيمان" (7379) يعقوب بن إبراهيم بن عبد الله بن حنين، وهو مجهول، وذكره ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 9/ 201 باسم يعقوب بن إبراهيم الأنصاري المصري، وذكر أنه روى عن عبد الرحمن بن جبير ومحمد بن ثابت بن شرحبيل، وعنه يحيى بن أيوب، وهو مجهول أيضًا، فهذا قول ثالث.وأما عبد الله بن يزيد الخَطْمي، فهكذا سمّاه الليث، ورجحه ابن أبي حاتم في "العلل"، وهو مختلف في صحبته، بينما سماه عمرو بن الربيع - كما في الرواية التالية عند المصنف - عبدَ الله بن سويد، وهو ما رجَّحه أبو حاتم الرازي كما في "العلل" لابنه. وعبد الله بن سويد اثنان أحدهما حارثي له صحبة، والآخر أنصاري يروي عن عمته أم حميد امرأة أبي حميد الساعدي كما في "الجرح والتعديل 5/ 66، فالله أعلم.وأخرجه تامًّا ومختصرًا إبراهيم الحربي في إكرام الضيف (37)، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" (212) عن علي بن داود القنطري، والطبراني "في الكبير" (3873)، و"الأوسط" (8658)، و"مكارم الأخلاق" له (221) عن مطلب بن شعيب الأزدي، عن أبي صالح عبد الله بن صالح، بهذا الإسناد. وزادوا جميعًا بين الليث ويعقوب يحيى بنَ أيوب.وأخرجه الباغندي في "مسند عمر بن عبد العزيز" (94) من طريق زمعة بن صالح، عن عبد الله بن أبي بكر بن حزم قال: رفع إلى عمر بن عبد العزيز حديثٌ حدث به محمد بن ثابت ابن شرحبيل، فكتب عمر بن عبد العزيز إلى أبي: أن سل محمّد بن ثابت عن حديثه فإنَّه رضًا، فسأله وأنا معه، فأخبرنا محمد بن ثابت، عن عبد الله بن يزيد الخطميّ، عن أبي أيّوب، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: من كان يؤمن بالله واليوم الآخر فليكرم ضيفه، ومن كان يؤمن بالله واليوم الآخر فليكرم جاره، ومن كان يؤمن بالله واليوم الآخر فلا يدخل إلّا بمئزر، ومن كان يؤمن بالله واليوم الآخر من نسائكم فلا تدخل الحمّام"، قال عبد الله بن أبي بكر: فكتب أبي إلى عمر بن عبد العزيز بذلك، فمنع عمر بن عبد العزيز النّساء من الحمّام وزمعةُ بن صالح فيه ضعف، لكنه يصلح في المتابعات والشواهد.ولقصة إكرام الضيف والجار، انظر حديثي أبي شريح وأبي هريرة السالفين برقمي (7483) و (7484).ولقصة دخول الحمّام بمئزر، انظر حديث جابر السالف برقم (7972).



7976 [4] - تحرَّف في النسخ الخطية إلى: عمر.



7976 [5] - في النسخ الخطية: وتكتب، والمثبت من "تلخيص الذهبي".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7977)


7977 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن محمد بن عبد الله البغدادي، حدثنا يحيى بن عثمان بن صالح السَّهْمي، حدثنا عمرو بن الرَّبيع بن طارق، حدثنا يحيى بن أيوب، حدثني أبو يوسف يعقوب بن إبراهيم، عن محمد بن ثابت بن شُرَحْبيل القُرشي، فذكر الحديث [1].




৭৯৭৭ - আমাদেরকে খবর দিয়েছেন আবূ জা'ফর মুহাম্মাদ ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু 'আব্দুল্লাহ আল-বাগদাদী, তিনি বলেছেন, আমাদেরকে হাদীস বর্ণনা করেছেন ইয়াহইয়া ইবনু 'উসমান ইবনু সালিহ আস-সাহমী, তিনি বলেছেন, আমাদেরকে হাদীস বর্ণনা করেছেন 'আমর ইবনু রাবী' ইবনু তারিক, তিনি বলেছেন, আমাদেরকে হাদীস বর্ণনা করেছেন ইয়াহইয়া ইবনু আইয়্যুব, তিনি বলেছেন, আমাকে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ ইউসুফ ইয়াকূব ইবনু ইব্রাহীম, তিনি বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু সাবিত ইবনু শুরাহবীল আল-ক্বুরাশীর সূত্রে। তারপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করেছেন [১]।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حسن لغيره كسابقه.وأخرجه ابن حبان (5597)، والبيهقي في "السنن" 7/ 309، وفي "شعب الإيمان" (7379) من طريق يحيى بن معين، والبيهقي في "الشعب" (7379) من طريق يعقوب بن سفيان الفسوي، كلاهما عن عمرو بن الربيع بن طارق، بهذا الإسناد. وجاء اسم والد عبد الله عندهم: سويد. قال البيهقي في "الشعب" عقبه وعبد الله هذا إن كان الخطمي فاسم أبيه يزيد، ولكن كان في كتابي: ابن سويد عنهما جميعًا. قلنا: لكنه وقع في "سننه": ابن يزيد، على الجادّة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (7978)


7978 - أخبرنا إسماعيل بن محمد بن الفضل بن محمد الشَّعراني، حدثنا جَدِّي، حدثنا سعيد بن أبي مريم، حدثنا نافع بن يزيد، حدثني يحيى بن أبي أُسَيد، عن عُبيد بن أبي سَوِيَّة، أنه سمع سُبَيعة الأسلميّة تقول: دخل على عائشةَ نِسوةٌ من أهل الشام فقالت عائشةُ: ممن أنتنَّ؟ فقلن: من أهل حِمصَ، فقالت: صَواحبُ الحمَّامات؟ فقُلنَ: نعم، قالت عائشةُ: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "الحمَّامُ حرامٌ على نساءِ أُمتي". فقالت امرأةٌ منهنَّ: فلي بناتٌ أمشُطُهنَّ بهذا الشَّراب، قالت: بأي الشَّراب؟ فقالت: الخمر، فقالت عائشة: أفكنتِ طيّبةَ النَّفْسِ أن تمتشطي بدَمِ خِنْزير؟ قالت: لا، قالت: فإنه مِثلُه [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সুবাই'আহ আল-আসলামিয়্যাহ বলেন, সিরিয়া (শাম)-এর কিছু মহিলা তাঁর কাছে প্রবেশ করল। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জিজ্ঞেস করলেন: তোমরা কোথাকার? তারা বলল: আমরা হিমসের অধিবাসী। তিনি বললেন: তোমরা কি সেই মহিলারা, যারা গোসলখানায় (হাম্মাম) যাও? তারা বলল: হ্যাঁ। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "আমার উম্মতের মহিলাদের জন্য হাম্মামে (গোসলখানায়) যাওয়া হারাম।" তখন তাদের মধ্যে একজন মহিলা বলল: আমার কিছু কন্যা আছে, আমি তাদের চুল এই পানীয় দিয়ে আঁচড়াই। তিনি (আয়িশা) জিজ্ঞেস করলেন: কোন পানীয়? সে বলল: মদ (আল-খামর)। তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: শূকরের রক্ত দিয়ে চুল আঁচড়াতে কি তুমি সন্তুষ্ট থাকবে? সে বলল: না। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তবে এটি (খামর) তেমনই।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده حسن من أجل يحيى بن أبي أُسيد وعبيد بن أبي سويَّة، فقد روى عن كل واحدٍ جمعٌ، وذكرهما ابن حبان في "الثقات" إلا أنه سمَّى الثانيَ حميدَ بن سويد.وأخرجه النسائي في "الكنى" كما في "إكمال تهذيب الكمال" لمغلطاي 9/ 92 عن يحيى بن أيوب الخولاني، عن سعيد بن أبي مريم، بهذا الإسناد.وأخرج أحمد 41 / (25006) و 42 / (25085) و (25457)، وأبو داود (4009)، وابن ماجه (3749)، والترمذي (2802) من طرق عن حماد بن سلمة، عن عبد الله بن شداد الأعرج، عن أبي عُذرة، عن عائشة قالت: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الحمَّامات للرجال والنساء، ثم رخّص للرجال في المآزر، ولم يرخّص للنساء. قال الترمذي: هذا حديث لا نعرفه إلا من حديث حماد بن سلمة، وإسناده ليس بذاك القائم. قلنا: أبو عذرة، قال ابن حجر في "الإصابة": ذكره ابن أبي خيثمة في الصحابة، وتبعه مسلم في "الكنى"، وعُدَّ في الأوهام، نعم له إدراكٌ ولا صحبةَ له، قاله البخاري والدُّولابي والحاكم أبو أحمد. وقال في "التقريب": مجهول من الثانية، ووهم من قال له صحبة.وأخرج ابن أبي شيبة 8/ 195 من طريق أبي السَّفر، عن امرأته: أنَّ عائشة سُئلت عن المرأة تمتشط بالعَسَلة فيها الخمر، فنهت عن ذلك أشدَّ النهي. وسنده ضعيف.وأخرج أيضًا 8/ 195 من طريق نافع، عن ابن عمر: أنه بلغه أنَّ نساء يمتشطْنَ بالخمر، فقال: ألقى الله في رؤوسهن الحاصَّة. وسنده صحيح. وأخرجه أحمد 23/ (14981)، وابن حبان (5943) من طريق ابن جريج، عن أبي الزبير، قال: سمعت جابرًا يقول: إنَّ النبي صلى الله عليه وسلم مرَّ بقوم يتعاطَون سيفًا بينهم مسلولًا، فقال: "ألم أزجُرْكم عن هذا؟ ليُغمِدْه، ثم يُناوِلْه أخاه".وأخرجه أحمد (14980) من طريق سليمان بن موسى عن جابر بنحو لفظ سابقه. وإسناده منقطع، فسليمان بن موسى - وهو الأشدق لم يسمع من جابر.وأخرجه أحمد (14742) من طريق ابن لهيعة، عن أبي الزبير عن جابر، عن بنَّة - وقيل: نبيه - الجهني مرفوعًا. فجعله من مسند بنّة، فإن كان ابن لهيعة حفظه - وفي حفظه سوء - فيكون من رواية صحابي عن صحابي، وتكون الرواية الأولى من مرسل الصحابي، وانظر تتمة تخريجه من هذا الطريق في "المسند".قوله "مسلولًا" أي: منزوعًا من غِمده.