হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8019)


8019 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا الحَكَم بن موسى، حدثنا الهيثم بن حُمَيد، عن زيد بن واقد، عن بُسْر بن عُبيد الله، عن ابن عائذ، عن أبي الدَّرداء، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم؛ قال: أفاءَ الله على رسولِه إبلًا ففرَّقها، فقال أبو موسى الأشعريُّ: يا رسولَ الله، أَحْذِني، قال: "لا"، فقال له ثلاثًا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا أفعلُ [1] "، قال: وبقي أربعٌ غُرُّ الذُّرَى فقال: "يا أبا موسى، خُذْهُنَّ" فقال: يا رسولَ الله، إني أستَحْيي [سألتُك] [2] فمنعتَني وحلفتَ، فأشفقتُ أن يكونَ دخلَ على رسول الله صلى الله عليه وسلم وهمٌ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنِّي إذا حلفتُ فرأيتُ أنَّ غيرَ ذلك أفضلُ، كفَّرتُ عن يميني وأَتيتُ الذي هو أفضلُ" [3]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তাঁর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জন্য কিছু উট গনীমত হিসেবে দান করলেন এবং তিনি সেগুলো বণ্টন করে দিলেন। তখন আবু মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'হে আল্লাহর রাসূল! আমাকে কিছু দিন।' তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "না।" তিনি তাকে তিনবার বললেন (অর্থাৎ আবু মূসা তিনবার চাইলেন)। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আমি এটা করব না।" বর্ণনাকারী বলেন: এরপর চারটি উন্নত উট অবশিষ্ট রইল। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হে আবু মূসা! এগুলো নিয়ে নাও।" তিনি (আবু মূসা) বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল! আমি তো লজ্জাবোধ করছি। আমি আপনার কাছে চেয়েছিলাম, তখন আপনি আমাকে দেননি এবং কসম করেছিলেন। তাই আমি শঙ্কিত যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মনে হয়তো কোনো ভুল ধারণা প্রবেশ করেছে।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আমি যখন কসম করি, এরপর যদি দেখি যে এর ব্যতিক্রম করাই উত্তম, তবে আমি আমার কসমের কাফফারা আদায় করে দেই এবং যেটা উত্তম সেটাই করি।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] كذا وقع في نسخ "المستدرك"، بلا قسم فيه، وعند الذين أخرجوا الحديث ذكرُ القسم، وهو الصواب، إذ هو موضع الشاهد من الحديث. وابنُ عائذ: هو أبو إدريس الخَولاني كما جاء مصرَّحًا به في رواية الطبراني، وقد اختلف في اسمه، فقيل: عائذ الله بن عبد الله، ويقال فيه: عيِّذ الله بن إدريس بن عائذ، كما قال الذهبي في "سير النبلاء" 4/ 272.وقد انبهم أمرُه على الحافظ ابن حجر فترجم له في إتحاف المهرة 12/ 609: ابن عائذ عن أبي الدرداء، ولم ينسبه! مع أنَّ البخاري وغيره قد رووا بهذه السلسلة يعني زيد بن واقد عن بسر عن أبي إدريس عن أبي الدرداء - غير ما حديث واعتبره البعض عبد الرحمن بن عائذ كما في "أطراف الغرائب" للمقدسي (4666)، وهذا بعيد، فهذه السلسلة معروفة كما تقدَّم، أضف إلى ذلك أنه لا يعرف رواية له عن أبي الدرداء، ولا يعرف لبسر رواية عن عبد الرحمن بن عائد.وأخرجه أبو عوانة في "صحيحه" (5955) و (5960)، والطبراني في "مسند الشاميين" (1301)، والبيهقي 10/ 52 من طرق عن الحكم بن موسى، بهذا الإسناد. وعند الطبراني: أبو إدريس مكان ابن عائذ.وقد ورد هذا الحديث من حديث أبي موسى الأشعري نفسه عند البخاري (3133)، ومسلم (1649).قوله: "أحْذِني" رباعي، أي: أعطني. وفي لغة حَذَاه، فيكون من الفعل الثلاثي.و"غُرُّ الذُّرى": بيض الأسنمة.



[2] من "تلخيص الذهبي". وابنُ عائذ: هو أبو إدريس الخَولاني كما جاء مصرَّحًا به في رواية الطبراني، وقد اختلف في اسمه، فقيل: عائذ الله بن عبد الله، ويقال فيه: عيِّذ الله بن إدريس بن عائذ، كما قال الذهبي في "سير النبلاء" 4/ 272.وقد انبهم أمرُه على الحافظ ابن حجر فترجم له في إتحاف المهرة 12/ 609: ابن عائذ عن أبي الدرداء، ولم ينسبه! مع أنَّ البخاري وغيره قد رووا بهذه السلسلة يعني زيد بن واقد عن بسر عن أبي إدريس عن أبي الدرداء - غير ما حديث واعتبره البعض عبد الرحمن بن عائذ كما في "أطراف الغرائب" للمقدسي (4666)، وهذا بعيد، فهذه السلسلة معروفة كما تقدَّم، أضف إلى ذلك أنه لا يعرف رواية له عن أبي الدرداء، ولا يعرف لبسر رواية عن عبد الرحمن بن عائد.وأخرجه أبو عوانة في "صحيحه" (5955) و (5960)، والطبراني في "مسند الشاميين" (1301)، والبيهقي 10/ 52 من طرق عن الحكم بن موسى، بهذا الإسناد. وعند الطبراني: أبو إدريس مكان ابن عائذ.وقد ورد هذا الحديث من حديث أبي موسى الأشعري نفسه عند البخاري (3133)، ومسلم (1649).قوله: "أحْذِني" رباعي، أي: أعطني. وفي لغة حَذَاه، فيكون من الفعل الثلاثي.و"غُرُّ الذُّرى": بيض الأسنمة.



8019 [3] - صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل الحكم بن موسى وشيخه الهيثم بن حميد. وابنُ عائذ: هو أبو إدريس الخَولاني كما جاء مصرَّحًا به في رواية الطبراني، وقد اختلف في اسمه، فقيل: عائذ الله بن عبد الله، ويقال فيه: عيِّذ الله بن إدريس بن عائذ، كما قال الذهبي في "سير النبلاء" 4/ 272.وقد انبهم أمرُه على الحافظ ابن حجر فترجم له في إتحاف المهرة 12/ 609: ابن عائذ عن أبي الدرداء، ولم ينسبه! مع أنَّ البخاري وغيره قد رووا بهذه السلسلة يعني زيد بن واقد عن بسر عن أبي إدريس عن أبي الدرداء - غير ما حديث واعتبره البعض عبد الرحمن بن عائذ كما في "أطراف الغرائب" للمقدسي (4666)، وهذا بعيد، فهذه السلسلة معروفة كما تقدَّم، أضف إلى ذلك أنه لا يعرف رواية له عن أبي الدرداء، ولا يعرف لبسر رواية عن عبد الرحمن بن عائد.وأخرجه أبو عوانة في "صحيحه" (5955) و (5960)، والطبراني في "مسند الشاميين" (1301)، والبيهقي 10/ 52 من طرق عن الحكم بن موسى، بهذا الإسناد. وعند الطبراني: أبو إدريس مكان ابن عائذ.وقد ورد هذا الحديث من حديث أبي موسى الأشعري نفسه عند البخاري (3133)، ومسلم (1649).قوله: "أحْذِني" رباعي، أي: أعطني. وفي لغة حَذَاه، فيكون من الفعل الثلاثي.و"غُرُّ الذُّرى": بيض الأسنمة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8020)


8020 - حدثنا أبو الوليد الإمام، حدثنا محمد بن إسحاق ومحمد بن نُعيم، قالا: حدثنا أبو الأشعَث، حدثنا محمد بن عبد الرحمن الطُّفَاوي، حدثنا هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة قالت: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إِذا حَلَفَ على يمين لا يَحنَثُ، حتى أنزل الله تعالى كفّارةَ اليمين، فقال: "لا أحلِفُ على يمينٍ فأرى غيرَها خيرًا منها، إلَّا كَفَّرتُ عن يميني ثم أَتيتُ الذي هو خيرٌ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কোনো বিষয়ে শপথ করতেন, তখন তিনি তা ভঙ্গ করতেন না, যতক্ষণ না আল্লাহ তাআলা শপথ ভঙ্গের কাফফারা নাযিল করেন। এরপর তিনি বললেন: "আমি কোনো শপথ করে যদি দেখি যে তার চেয়ে উত্তম কোনো কাজ আছে, তবে আমি অবশ্যই আমার শপথের কাফফারা আদায় করব এবং তারপর সেই উত্তম কাজটি করব।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات غير محمد بن عبد الرحمن الطفاوي، فهو وإن كان صدوقًا حسن الحديث، إلّا أنَّ له أوهامًا، وهذا الحديث قد خطّأه فيه البخاري خالف الحفاظ فيه، حيث جعله مرفوعًا، والمحفوظ فيه أنه عن أبي بكر الصديق رضي الله عنه موقوف، فقال البخاري كما في "علل الترمذي الكبير" (452 - 453): حديث الطفاوي خطأ، والصحيح عن هشام بن عروة عن أبيه عن عائشة: كان أبو بكر. وبنحوه قال الدارقطني في "العلل" (3506). أبو الأشعث: هو أحمد بن المقدام العجلي.وحديث الطفاوي هذا أخرجه ابن حبان (4353) من طريق محمد بن عبد الأعلى، عن الطفاوي بهذا الإسناد.وأما حديث أبي بكر الموقوف، فأخرجه البخاري (4614) من طريق النضر بن شميل، و (6621) من طريق عبد الله بن المبارك، كلاهما عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة: أنَّ أبا بكر لم يكن يحنث في يمين قط حتى أنزل الله كفارة اليمين، وقال: لا أحلفُ على يمين فرأيت غيرها خيرًا منها، إلّا أتيتُ الذي هو خير وكفَّرت عن يميني.وتابع النضرَ وابنَ المبارك ابن جريج ومعمرٌ ووكيع عند عبد الرزاق (16038)، وابن أبي شيبة (12437 - عوامة).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8021)


8021 - أخبرني إبراهيم بن إسماعيل القارئ، حدثنا عثمان بن سعيد الدَّارِمي، حدثنا يحيى بن صالح الوُحَاظي، حدثنا معاوية بن سلَّام، عن يحيى بن أبي كثير، عن عِكْرمة، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "من استَلَجَّ في أهلِه بيمينٍ، فهو أعظُم إثمًا" [1].هذا حديث صحيح على شرط البخاري.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি তার পরিবারের ব্যাপারে কসমের মাধ্যমে বাড়াবাড়ি করে (বা জেদ ধরে), সে সবচেয়ে বেশি পাপী।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه البخاري (6626)، وابن ماجه (2114 م) من طريقين عن يحيى بن صالح الوحاظي بهذا الإسناد.وقد خالف معمرٌ معاويةَ بنَ سلام، فرواه عن يحيى بن أبي كثير عن عكرمة مرسلًا كما في "مصنف عبد الرزاق" (16037)، ورجَّح روايته أبو حاتم في "العلل" (1330).وانظر ما بعده.قوله "من استلجَّ" قال السندي في حاشيته على "المسند": إذا حلف يمينًا يتعلق بأهله، وهم يتضررون بالإصرار عليه، فاللائق به أن يحنث ويكفر عن يمينه، وأما الثبات على اليمين والإصرار عليه وترك الحنث فهو لَجَاج. وقوله: "أعظم إثمًا" يعني: أعظم إثمًا من الكفارة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8022)


8022 - وقد أخبرَناه أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن همام بن منبه، عن أبي هريرة، أنَّ سول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إذا استَلَجَّ أحدُكم باليمين في أهلِه، فإنَّه آثَمُ عند الله من الكفَّارة التي أُمِرَ بها" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ তার পরিবার-পরিজনের (ক্ষেত্রে কোনো বিষয়ে) কসমের উপর জিদ ধরে থাকে, তখন সে আল্লাহর কাছে ওই কাফফারা অপেক্ষা অধিক পাপী হয়, যা পালনের জন্য তাকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح. وهو في "مسند أحمد" 13 / (7743) و (8208).وأخرجه البخاري (6625) عن إسحاق بن راهويه، ومسلم (1655) عن محمد بن رافع، كلاهما عن عبد الرزاق، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهول منه.وأخرجه ابن ماجه (2114) من طريق محمد بن حميد المعمري، عن معمر، به.وانظر ما قبله. ورواه عنه همام بن يحيى العوذي عن عكرمة عن ابن عباس موصولًا، لكنه زاد في متنه: "ولتُهدِ بدنةً"، عند أحمد 4/ (2134) و (2139) و (2278) و (2834)، والدارمي (2380)، وأبي داود (3296)، وأبي يعلى (2737)، والطحاوي في "شرح المشكل" (2151)، وفي "شرح المعاني" 3/ 131، والطبراني (11828)، والبيهقي 10/ 79. وهذه الزيادة ليست في شيء من الطرق السابقة المذكورة، وهم أكثر عددًا.وتابع همامًا على ذكر البدنة مطرٌ الوراق عن عكرمة عن ابن عباس، عند إبراهيم بن طهمان في "مشيخته" (29)، ومن طريقه رواه أبو داود (3303)، وأبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (714) و (715)، والبيهقي 10/ 79.وخالف عبد العزيز بن مسلم القَسملي إبراهيمَ بن طهمان، فرواه عن مطر الوراق عن عكرمة عن عقبة بن عامر، عند الطحاوي في "شرح المشكل" (2152)، وفي "شرح المعاني" 3/ 131، فأسقط منه ابنَ عباس وجعله من مسند عقبة بن عامر. وهو من هذا الوجه عند أحمد 29 (17793) إِلَّا أَنه وقع في نسخه الخطية مكان مطر: مطرّف، وفي القلب منه شيء، فالحديث معروف من حديث مطر، ومطر ضعيف، إنما يعتبر به في المتابعات والشواهد، ولا يحتج به عند المخالفة، وقد خالفه سفيان الثوري فرواه عن أبيه عن عكرمة عن عقبة بن عامر دون ذكر الهدي، عند أبي داود (3304)، والبيهقي 10/ 79 - 80.وسيأتي عند الحاكم برقم (8025) من طريق كريب عن ابن عباس، وفيه: "إنَّ الله لا يصنع بشقاء أختك شيئًا، لتخرج راكبة ولتكفِّر عن يمينها"، فجعل عليها كفّارة يمين، وسنده ضعيف لسوء حفظ شريك مع مخالفته لكل الروايات لحديث ابن عباس وقال البيهقي 10/ 80: تفرَّد به شريك القاضي.وقد ورد الحديث من مسند عقبة بن عامر نفسه، وليس في الروايات الصحيحة له ذكر البدنة أو الهدي.أخرجه أحمد 28/ (17386)، والبخاري (1866)، ومسلم (1644)، وأبو داود (3299)، والنسائي (4777). قال البخاري في ترجمة عبد الله بن مالك اليحصبي من "تاريخه الكبير" 5/ 204: ولا يصح فيه الهديُ.وورد من طريق ضعيفة عنه، فيها عبيدُ الله بن زحر: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أمرها بصوم ثلاثة أيام! انظر الكلام عليها في "مسند أحمد" (17306).وورد الحديث من مسند أنس بن مالك وليس فيه ذكر الهدي ولا الصوم، أخرجه أحمد 19/ (12038)، والبخاري (1865)، ومسلم (164). وورد من حديث أبي هريرة كذلك بدون ذكرهما، عند أحمد 14 (8859)، ومسلم (1643) وغيرهما.وورد ذكر الهدي في حديث عمران بن حصين الآتي عند المصنف برقم (8040) وفيه: "وإنَّ المُثلة أن ينذر الرجل أن يحج ماشيًا، فمن نذر أن يحج ماشيًا فليهد هديًا وليركب"، وسنده ضعيف.قال الشوكاني: والظاهر أنَّ اختصاص الحديث بالنذر الذي لم يسمَّ، لأنَّ حمل المطلَق على المقيَّد واجب، وأما النذور المسماة إن كانت طاعة، فإن كانت غير مقدورة ففيها كفارة يمين، وإن كانت مقدورة، وجب الوفاء بها، سواء كانت متعلقة بالبدن أو بالمال، وإن كان معصية لم يجز الوفاء بها ولا ينعقد، ولا يلزم فيها الكفارة، وإن كانت مباحة مقدورة، فالظاهر الانعقاد ولزوم الكفارة، لوقوع الأمر بها في أحاديث الباب في قصة الناذرة بالمشي، وإن كانت غير مقدورة، ففيها الكفارة، لعموم: "ومن نذر نذرًا لم يطقه"، هذا خلاصة ما يستفاد من الأحاديث الصحيحة.وانظر "المحلى" لابن حزم 7/ 264.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8023)


8023 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني [1]، حدثنا يَعلَى بن عُبيد، حدثنا أبو سعد البقَّال، عن عِكْرمة، عن ابن عباس قال: جاء رجلٌ إلى النبيِّ صلى الله عليه وسلم فقال: إنَّ أُختي حَلَفَت أن تمشي إلى البيت، وإنه يَشُقُّ عليها المشيُ، قال: "مُرْها فلتَركَبْ إذ لم تستطِعْ أن تمشيَ، فما أَغنى الله أن يَشُقُّ على أُختِك" [2]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন লোক নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: আমার বোন কসম করেছে যে সে হেঁটে বাইতুল্লাহ (কা'বা শরীফ)-এর দিকে যাবে, কিন্তু হেঁটে যাওয়া তার জন্য কষ্টকর। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাকে আদেশ দাও, সে যেন আরোহণ করে যায়, যখন সে হেঁটে যেতে সক্ষম নয়, আল্লাহ চান না যে তোমার বোনের ওপর কষ্ট চাপানো হোক।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرف في النسخ الخطية إلى: الصنعاني. ورواه عنه همام بن يحيى العوذي عن عكرمة عن ابن عباس موصولًا، لكنه زاد في متنه: "ولتُهدِ بدنةً"، عند أحمد 4/ (2134) و (2139) و (2278) و (2834)، والدارمي (2380)، وأبي داود (3296)، وأبي يعلى (2737)، والطحاوي في "شرح المشكل" (2151)، وفي "شرح المعاني" 3/ 131، والطبراني (11828)، والبيهقي 10/ 79. وهذه الزيادة ليست في شيء من الطرق السابقة المذكورة، وهم أكثر عددًا.وتابع همامًا على ذكر البدنة مطرٌ الوراق عن عكرمة عن ابن عباس، عند إبراهيم بن طهمان في "مشيخته" (29)، ومن طريقه رواه أبو داود (3303)، وأبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (714) و (715)، والبيهقي 10/ 79.وخالف عبد العزيز بن مسلم القَسملي إبراهيمَ بن طهمان، فرواه عن مطر الوراق عن عكرمة عن عقبة بن عامر، عند الطحاوي في "شرح المشكل" (2152)، وفي "شرح المعاني" 3/ 131، فأسقط منه ابنَ عباس وجعله من مسند عقبة بن عامر. وهو من هذا الوجه عند أحمد 29 (17793) إِلَّا أَنه وقع في نسخه الخطية مكان مطر: مطرّف، وفي القلب منه شيء، فالحديث معروف من حديث مطر، ومطر ضعيف، إنما يعتبر به في المتابعات والشواهد، ولا يحتج به عند المخالفة، وقد خالفه سفيان الثوري فرواه عن أبيه عن عكرمة عن عقبة بن عامر دون ذكر الهدي، عند أبي داود (3304)، والبيهقي 10/ 79 - 80.وسيأتي عند الحاكم برقم (8025) من طريق كريب عن ابن عباس، وفيه: "إنَّ الله لا يصنع بشقاء أختك شيئًا، لتخرج راكبة ولتكفِّر عن يمينها"، فجعل عليها كفّارة يمين، وسنده ضعيف لسوء حفظ شريك مع مخالفته لكل الروايات لحديث ابن عباس وقال البيهقي 10/ 80: تفرَّد به شريك القاضي.وقد ورد الحديث من مسند عقبة بن عامر نفسه، وليس في الروايات الصحيحة له ذكر البدنة أو الهدي.أخرجه أحمد 28/ (17386)، والبخاري (1866)، ومسلم (1644)، وأبو داود (3299)، والنسائي (4777). قال البخاري في ترجمة عبد الله بن مالك اليحصبي من "تاريخه الكبير" 5/ 204: ولا يصح فيه الهديُ.وورد من طريق ضعيفة عنه، فيها عبيدُ الله بن زحر: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أمرها بصوم ثلاثة أيام! انظر الكلام عليها في "مسند أحمد" (17306).وورد الحديث من مسند أنس بن مالك وليس فيه ذكر الهدي ولا الصوم، أخرجه أحمد 19/ (12038)، والبخاري (1865)، ومسلم (164). وورد من حديث أبي هريرة كذلك بدون ذكرهما، عند أحمد 14 (8859)، ومسلم (1643) وغيرهما.وورد ذكر الهدي في حديث عمران بن حصين الآتي عند المصنف برقم (8040) وفيه: "وإنَّ المُثلة أن ينذر الرجل أن يحج ماشيًا، فمن نذر أن يحج ماشيًا فليهد هديًا وليركب"، وسنده ضعيف.قال الشوكاني: والظاهر أنَّ اختصاص الحديث بالنذر الذي لم يسمَّ، لأنَّ حمل المطلَق على المقيَّد واجب، وأما النذور المسماة إن كانت طاعة، فإن كانت غير مقدورة ففيها كفارة يمين، وإن كانت مقدورة، وجب الوفاء بها، سواء كانت متعلقة بالبدن أو بالمال، وإن كان معصية لم يجز الوفاء بها ولا ينعقد، ولا يلزم فيها الكفارة، وإن كانت مباحة مقدورة، فالظاهر الانعقاد ولزوم الكفارة، لوقوع الأمر بها في أحاديث الباب في قصة الناذرة بالمشي، وإن كانت غير مقدورة، ففيها الكفارة، لعموم: "ومن نذر نذرًا لم يطقه"، هذا خلاصة ما يستفاد من الأحاديث الصحيحة.وانظر "المحلى" لابن حزم 7/ 264.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف من أجل أبي سعد البقال - واسمه سعيد بن المَرْزُبان - وقد توبع.وأخرجه عبد بن حميد (580)، والخطيب في "الأسماء المبهمة" ص 225 من طريق يعلى بن عبيد، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (11949) من طريق خالد الحذاء، والطبراني (11705)، والإسماعيلي في "معجم الشيوخ" (272) من طريق أشعث بن سوار، كلاهما عن عكرمة، به.ورواه قتادة عن عكرمة، واختلف عليه في سنده ومتنه:فرواه عنه هشام الدستوائي عن عكرمة عن ابن عباس بمعناه عند أبي داود (3297)، والطحاوي في "شرح المشكل" (2153)، والطبراني (11829)، والبيهقي 10/ 79.ورواه عنه بمعناه كذلك سعيد بن أبي عروبة عن عكرمة، لكنه أرسله لم يذكر فيه ابن عباس، عند أبي داود (3298)، والبيهقي 10/ 79. ورواه عنه همام بن يحيى العوذي عن عكرمة عن ابن عباس موصولًا، لكنه زاد في متنه: "ولتُهدِ بدنةً"، عند أحمد 4/ (2134) و (2139) و (2278) و (2834)، والدارمي (2380)، وأبي داود (3296)، وأبي يعلى (2737)، والطحاوي في "شرح المشكل" (2151)، وفي "شرح المعاني" 3/ 131، والطبراني (11828)، والبيهقي 10/ 79. وهذه الزيادة ليست في شيء من الطرق السابقة المذكورة، وهم أكثر عددًا.وتابع همامًا على ذكر البدنة مطرٌ الوراق عن عكرمة عن ابن عباس، عند إبراهيم بن طهمان في "مشيخته" (29)، ومن طريقه رواه أبو داود (3303)، وأبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (714) و (715)، والبيهقي 10/ 79.وخالف عبد العزيز بن مسلم القَسملي إبراهيمَ بن طهمان، فرواه عن مطر الوراق عن عكرمة عن عقبة بن عامر، عند الطحاوي في "شرح المشكل" (2152)، وفي "شرح المعاني" 3/ 131، فأسقط منه ابنَ عباس وجعله من مسند عقبة بن عامر. وهو من هذا الوجه عند أحمد 29 (17793) إِلَّا أَنه وقع في نسخه الخطية مكان مطر: مطرّف، وفي القلب منه شيء، فالحديث معروف من حديث مطر، ومطر ضعيف، إنما يعتبر به في المتابعات والشواهد، ولا يحتج به عند المخالفة، وقد خالفه سفيان الثوري فرواه عن أبيه عن عكرمة عن عقبة بن عامر دون ذكر الهدي، عند أبي داود (3304)، والبيهقي 10/ 79 - 80.وسيأتي عند الحاكم برقم (8025) من طريق كريب عن ابن عباس، وفيه: "إنَّ الله لا يصنع بشقاء أختك شيئًا، لتخرج راكبة ولتكفِّر عن يمينها"، فجعل عليها كفّارة يمين، وسنده ضعيف لسوء حفظ شريك مع مخالفته لكل الروايات لحديث ابن عباس وقال البيهقي 10/ 80: تفرَّد به شريك القاضي.وقد ورد الحديث من مسند عقبة بن عامر نفسه، وليس في الروايات الصحيحة له ذكر البدنة أو الهدي.أخرجه أحمد 28/ (17386)، والبخاري (1866)، ومسلم (1644)، وأبو داود (3299)، والنسائي (4777). قال البخاري في ترجمة عبد الله بن مالك اليحصبي من "تاريخه الكبير" 5/ 204: ولا يصح فيه الهديُ.وورد من طريق ضعيفة عنه، فيها عبيدُ الله بن زحر: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أمرها بصوم ثلاثة أيام! انظر الكلام عليها في "مسند أحمد" (17306).وورد الحديث من مسند أنس بن مالك وليس فيه ذكر الهدي ولا الصوم، أخرجه أحمد 19/ (12038)، والبخاري (1865)، ومسلم (164). وورد من حديث أبي هريرة كذلك بدون ذكرهما، عند أحمد 14 (8859)، ومسلم (1643) وغيرهما.وورد ذكر الهدي في حديث عمران بن حصين الآتي عند المصنف برقم (8040) وفيه: "وإنَّ المُثلة أن ينذر الرجل أن يحج ماشيًا، فمن نذر أن يحج ماشيًا فليهد هديًا وليركب"، وسنده ضعيف.قال الشوكاني: والظاهر أنَّ اختصاص الحديث بالنذر الذي لم يسمَّ، لأنَّ حمل المطلَق على المقيَّد واجب، وأما النذور المسماة إن كانت طاعة، فإن كانت غير مقدورة ففيها كفارة يمين، وإن كانت مقدورة، وجب الوفاء بها، سواء كانت متعلقة بالبدن أو بالمال، وإن كان معصية لم يجز الوفاء بها ولا ينعقد، ولا يلزم فيها الكفارة، وإن كانت مباحة مقدورة، فالظاهر الانعقاد ولزوم الكفارة، لوقوع الأمر بها في أحاديث الباب في قصة الناذرة بالمشي، وإن كانت غير مقدورة، ففيها الكفارة، لعموم: "ومن نذر نذرًا لم يطقه"، هذا خلاصة ما يستفاد من الأحاديث الصحيحة.وانظر "المحلى" لابن حزم 7/ 264.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8024)


8024 - أخبرَناه الحسن بن حَليم [1] المروَزي، حدثنا أبو المُوجِّه، حدثنا الحُسين بن حُرَيث، حدثنا الفضل بن موسى، عن شَريك، عن أبي إسحاق في الرجل يَحلِفُ بالمشي فيَعجِزُ فيركبُ، قال: قال ابن عباس: يحُجُّ مِن قابلٍ، فيركبُ ما مَشَي، ويمشي ما رَكِب [2].




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কোনো ব্যক্তি যদি হেঁটে (হজ্জ বা কোনো ইবাদতের উদ্দেশ্যে) যাওয়ার কসম করে কিন্তু দুর্বল হয়ে পড়ে এবং বাহনে আরোহণ করে, তাহলে তিনি (ইবনে আব্বাস) বলেন: সে যেন আগামী বছর পুনরায় হজ্জ করে। অতঃপর সে যতটুকু হেঁটেছিল, ততটুকু সে আরোহণ করবে এবং যতটুকু সে আরোহণ করেছিল, ততটুকু সে হেঁটে যাবে।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرف في النسخ الخطية إلى: حكيم.



[2] خبر صحيح، وأبو إسحاق - وهو عمرو بن عبد الله السبيعي - لم يسمع من ابن عباس، لكن صحَّ هذا الخبر من وجه آخر.فقد أخرجه عبد الرزاق (15865)، وابن أبي شيبة (12551 و 13754 - عوامة)، وأبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (345)، والبيهقي 10/ 81 من طريق إسماعيل بن أبي خالد، والفاكهي في "أخبار مكة" (725) من طريق عاصم بن سليمان الأحول، كلاهما عن عامر الشعبي، عن ابن عباس. وزادوا - إلَّا الفاكهي -: ينحر بدنة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8025)


8025 - قال شَريك: وحدثنا محمد بن عبد الرحمن مولى آل طلحة، عن كُرَيب، عن ابن عباس: أنَّ رجلًا جاء إلى النبيِّ صلى الله عليه وسلم فقال: إنَّ أختي جعلَت عليها المشيَ إلى بيتِ الله، قال: "إنَّ الله تعالى لا يصنعُ بشَقاءِ [1] أختِك شيئًا، قُلْ لها: فلتحُجَّ راكبةً، ولتُكفِّر يمينَها" [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন লোক নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: আমার বোন বাইতুল্লাহ (কা'বা)-এর দিকে হেঁটে যাওয়ার মানত করেছে। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আল্লাহ তাআলা তোমার বোনের কষ্টদায়ক (নিজকে কষ্ট দেওয়ার) মানত দিয়ে কিছু করার প্রয়োজন বোধ করেন না। তাকে বলো: সে যেন সাওয়ার হয়ে (আরোহণ করে) হজ করে এবং তার কসমের কাফফারা দেয়।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في النسخ الخطية: لشقاء، والمثبت من مصادر التخريج. زادوها مرة أخرى فلم ترضَ فقالت عائشة: لقد أقمَأَت وجهَك أن تردَّ عليك الهدية، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الأنتنَّ أهونُ على الله من أن تُقمِئنَني لا أدخل عليكنَّ شهرًا". ثم ذكرت قصة عمر في مراجعته النبي صلى الله عليه وسلم في طلاق زوجاته بنحو حديث ابن عباس عنه المخرّجة عند البخاري (4913) ومسلم (1479).وأخرجه ابن سعد 8/ 190 عن الواقدي، عن محمد بن عبد الله، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة قالت: ذبح رسول الله صلى الله عليه وسلم ذبحًا فأمرني فقسمتُه بين أزواجه، فأرسل إلى زينب بنت جحش بنصيبها فردّته … فذكرته مطولًا بنحو سابقه، والواقدي فيه مَقال.



[2] إسناده ضعيف شريك - وهو ابن عبد الله النخعي - في حفظه سوء.وأخرجه أحمد 5 / (2828) و (2885)، وأبو داود (3295)، وابن حبان (4384) من طرق عن شريك النخعي، بهذا الإسناد. وانظر ما سلف برقم (8023). زادوها مرة أخرى فلم ترضَ فقالت عائشة: لقد أقمَأَت وجهَك أن تردَّ عليك الهدية، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الأنتنَّ أهونُ على الله من أن تُقمِئنَني لا أدخل عليكنَّ شهرًا". ثم ذكرت قصة عمر في مراجعته النبي صلى الله عليه وسلم في طلاق زوجاته بنحو حديث ابن عباس عنه المخرّجة عند البخاري (4913) ومسلم (1479).وأخرجه ابن سعد 8/ 190 عن الواقدي، عن محمد بن عبد الله، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة قالت: ذبح رسول الله صلى الله عليه وسلم ذبحًا فأمرني فقسمتُه بين أزواجه، فأرسل إلى زينب بنت جحش بنصيبها فردّته … فذكرته مطولًا بنحو سابقه، والواقدي فيه مَقال.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8026)


8026 - أخبرنا عبد الله بن جعفر بن دَرَستوَيهِ، حدثنا يعقوب بن سفيان، حدثنا عبد العزيز بن عبد الله الأُوَيسي، حدثنا عبد الرحمن بن أبي الرِّجال، عن أبيه، عن عَمْرة، عن عائشة قالت: أُهدَي لي لحمٌ، فأمرني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن أُهدِيَ منه لزينب، فأهديتُ لها فردَّتْه، فقال: "زِيديها"، فزدتُها، فردَّتْه، فقال: "أقسمتُ عليكِ إِلَّا زِدتِيها" فزدتُها فردَّتْه، فدخلتني غَيْرةٌ، فقلتُ: لقد أهانَتْكَ، فقال: "أنتِ وهي أهونُ على اللهِ من أن يُهِيَنني منكنَّ أحدٌ، أقسمتُ لا أدخلُ عليكنَّ شهرًا"، فغابَ عنا تسعًا وعشرينَ، ثم دخلَ علينا مساءَ الثلاثين، فقالت: كنتَ حلفتَ أن لا تدخلَ شهرًا، فقال: "شهرٌ هكذا، وشهرٌ هكذا، وفرَّق بين كفَّيِه وأمسكَ في الثالثة الإبهامَ [1]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه، وفيه البيانُ أنَّ "أقسمتُ على كذا" يمينٌ وقَسَمٌ.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাকে কিছু গোশত উপহার দেওয়া হয়েছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে আদেশ করলেন যেন আমি তা থেকে যায়নাবকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উপহার দেই। আমি তাঁকে উপহার দিলাম, কিন্তু তিনি তা ফেরত দিলেন। তখন তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাকে আরও দাও।" আমি তাকে আরও দিলাম, কিন্তু তিনি তা ফেরত দিলেন। তিনি বললেন: "আমি তোমাকে কসম দিচ্ছি, তুমি তাকে অবশ্যই আরও দেবে।" আমি তাকে আবারও দিলাম, কিন্তু তিনি তা ফেরত দিলেন। এতে আমার মনে জিদ (ঈর্ষা) সৃষ্টি হলো। আমি বললাম: সে তো আপনাকে অপমান করলো! তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা উভয়েই আল্লাহর কাছে এর চেয়েও নগণ্য যে, তোমাদের কেউ আমাকে অপমান করতে পারে। আমি কসম করলাম, এক মাস তোমাদের কারো কাছে যাব না।" এরপর তিনি আমাদের থেকে উনত্রিশ দিন অনুপস্থিত থাকলেন, তারপর ত্রিশতম দিনের সন্ধ্যায় আমাদের কাছে আসলেন। আমি বললাম: আপনি তো এক মাস প্রবেশ না করার শপথ করেছিলেন। তিনি বললেন: "এক মাস এমন (ইশারা করলেন), এবং এক মাস এমন (ইশারা করলেন), আর (২৯ দিনের মাস বোঝাতে) তৃতীয়বার তিনি উভয় হাতের পাঞ্জার মাঝখানে বুড়ো আঙ্গুলটি চেপে ধরলেন।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن أبي الرجال.وأخرجه أحمد 41 / (24743)، وابن ماجه (2059)، وأبو نعيم في "الحلية" 9/ 40 وغيرهم من طرق عن عبد الرحمن بن أبي الرجال، بهذا الإسناد. وروايتهم مختصرة بقصة حلفه بعدم الدخول على نسائه إلا رواية أبي نعيم فمطولة بنحو رواية الحاكم.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 8/ 190 عن محمد بن عمر الواقدي، عن مالك وعبد الرحمن ابني أبي، الرجال، عن أبيهما، به بنحو رواية الحاكم.وأخرجه ابن سعد 8/ 188 عن الواقدي، عن أبي معشر نجيح، السندي، عن حارثة بن أبي الرجال قال: دخلت مع القاسم بن محمد على عمرة بنت عبد الرحمن فقال القاسم: يا أم محمد في أي شيء هجر رسول الله صلى الله عليه وسلم نساءه؟ فقالت عمرة: أخبرتني عائشة: أنه أُهدي إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم هدية في بيتها، فأرسل إلى كل امرأة من نسائه بنصيبها، وأرسل إلى زينب بنت جحش فلم ترضَ، ثم زادوها مرة أخرى فلم ترضَ فقالت عائشة: لقد أقمَأَت وجهَك أن تردَّ عليك الهدية، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الأنتنَّ أهونُ على الله من أن تُقمِئنَني لا أدخل عليكنَّ شهرًا". ثم ذكرت قصة عمر في مراجعته النبي صلى الله عليه وسلم في طلاق زوجاته بنحو حديث ابن عباس عنه المخرّجة عند البخاري (4913) ومسلم (1479).وأخرجه ابن سعد 8/ 190 عن الواقدي، عن محمد بن عبد الله، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة قالت: ذبح رسول الله صلى الله عليه وسلم ذبحًا فأمرني فقسمتُه بين أزواجه، فأرسل إلى زينب بنت جحش بنصيبها فردّته … فذكرته مطولًا بنحو سابقه، والواقدي فيه مَقال.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8027)


8027 - وحدثنا أبو العبّاس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، أخبرنا عمرو بن الحارث، أن كثير بن فَرْقد حدَّثه، أنَّ نافعًا حدَّثهم، عن عبد الله بن عمر، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "من حَلَفَ على يمينٍ ثم قال: إنْ شاء الله، فإنَّ له ثُنْياهُ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه هكذا.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো শপথ করে এবং (শপথের পরপরই) 'ইনশা আল্লাহ' বলে, তবে তার জন্য তা থেকে সরে আসার সুযোগ থাকে।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح. ابن وهب: هو عبد الله.وأخرجه النسائي (4751) عن يونس بن عبد الأعلى، عن ابن وهب، بهذا الإسناد.ورواه نافع مولى ابن عمر عن ابن عمر واختلف عليه. قال البخاري - كما في "علل الترمذي" (455): أصحاب نافع رووا هذا الحديث عن نافع عن ابن عمر موقوفًا إلّا أيوب، فإنه يرويه عن نافع عن النبي، ويقولون: إنَّ أيوب في آخر أمره أوقفه.وأخرجه أحمد 8 / (4510) و (4581) و 9 / (5093) و (5094) و (5362) و (5363) و 10 / (6087) و (6103) و (6104) و (6414)، وأبو داود (3261) و (3262)، وابن ماجه (2105) و (2106)، والترمذي (1531)، والنسائي (4716) و (4752) و (4753)، وابن حبان (4339) و (4342) من طرق عن أيوب السختياني، وابن حبان (4340)، والبيهقي 10/ 46 من طريق أيوب بن موسى بن عمرو الأموي، كلاهما عن نافع، به مرفوعًا.قال البيهقي: وإنما يعرف هذا الحديث مرفوعًا من حديث أيوب السختياني. فكأنه شكك في طريق أيوب بن موسى.ورواه من أصحاب أيوب معمرُ عنه عن نافع قال: كان ابن عمر يحلف ويقول: والله لا أفعل كذا وكذا إن شاء الله، فيفعله ثم لا يكفِّر. رواه عبد الرزاق (16113)، وتابع معمرًا على وقفه سفيان الثَّوري عنده برقم (16115).قال حماد بن زيد: كان أيوب يرفع هذا الحديث ثم تركه. أخرجه البيهقي 10/ 46.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (3075)، وتمام في "الفوائد" (447)، وأبو نعيم في "الحلية" 6/ 79 من طريق حسان بن عطية، عن نافع، به مرفوعًا. قال الطبراني وأبو نعيم: تفرَّد برفعه عمرو بن هاشم البيروتي. قلنا: وهو ليِّن.ورواه عبيد الله بن عمر العمري عن نافع واختلف عليه، فرواه أبو معاوية محمد بن خازم عنه عن نافع به مرفوعًا عند أبي الشيخ في "طبقات المحدثين بأصبهان" (225)، وعنه أبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 2/ 140.ورواه ابن جريج وعبد الرزاق عن عبيد الله عن نافع به موقوفًا عند عبد الرزاق (16112).وأخرجه مالك في "الموطأ" 2/ 477 عن نافع عن ابن عمر موقوفًا.وأخرجه عبد الرزاق (16111) عن عبد الله بن عمر العمري، والبيهقي 10/ 46 من طريق ابن وهب، عن عبد الله بن عمر ومالك بن أنس وأسامة بن زيد ثلاثتهم عن نافع، عن عبد الله بن عمر، فذكره موقوفًا.وأخرجه ابن عدي 3/ 86، والبيهقي 10/ 47 من طريق موسى بن عقبة، عن نافع به موقوفًا. وفي إسناده داود بن عطاء وهو ضعيف.وأخرج الطحاوي في "شرح المشكل" 5/ 181، والدارقطني (4329)، والبيهقي 10/ 81 من طريق عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن أبيه، عن سالم عن ابن عمر موقوفًا بلفظ: كل استثناء موصول فلا حنث على صاحبه، وإن كان غير موصول فهو حانث.ويشهد له بنحو لفظ المصنف حديثُ أبي هريرة عند أحمد 13/ 8088)، وابن ماجه (2104)، والترمذي (1532) والنسائي (3855)، وابن حبّان (1185). وإسناده صحيح.قوله: "له ثنياه" قال السندي في حاشيته على "المسند": الثُّنيا كالدنيا اسم بمعنى الاستثناء، أي: أنَّ الثنيا تنفعه حيث لا يَحنَث، أتى بالمحلوف عليه أم لا، والله أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8028)


8028 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا الحسن بن علي بن زياد [1]، حدثنا مِنْجاب بن الحارث، حدثنا علي بن مُسهِر، عن الأعمش، عن مجاهد، عن ابن عبّاس قال: إذا حَلَفَ الرجلُ على يمين فله أن يستثنيَ ولو إلى سنةٍ، وإنما نزلت هذه الآية في هذا: {وَاذْكُرْ رَبَّكَ إِذَا نَسِيتَ} [الكهف: 24]، قال: إذا ذكرَ استَثنَى [2]. قال علي بن مسهر: وكان الأعمش يأخذ بهذا.هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কোনো ব্যক্তি যদি কসম করে, তবে তার জন্য এক বছর পর্যন্তও (ইনশাআল্লাহ বলে) শর্তারোপ করার অবকাশ রয়েছে। এই ব্যাপারেই আল্লাহ্‌র এই আয়াতটি নাযিল হয়েছে: "তুমি যখন ভুলে যাও, তখন তোমার প্রতিপালককে স্মরণ করো।" [সূরা আল-কাহফ: ২৪]। তিনি (ইবনে আব্বাস) বলেন: যখন তার স্মরণ হবে, তখনই সে শর্তারোপ করবে (ইনশাআল্লাহ বলবে)। আলী ইবনে মুসহির বলেন: আল-আ’মাশ এই মত অনুসারে আমল করতেন।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في النسخ الخطية: علي عن ابن زياد، وهو خطأ.



[2] إسناده ضعيف، الأعمش - وهو سليمان بن مِهْران - لم يسمعه من مجاهد وهو ابن جبر - إنما سمعه من ليث بن أبي سليم عن مجاهد كما أخبر هو نفسه. وقد ذكرُ غير واحد من أهل العلم كابن المنذر في "الأوسط" 12/ 159 وابن حزم في "المحلى" 8/ 45 أنَّ هذا الرأي منسوب لمجاهد، لذلك نُرى أنَّ ليث بن أبي سليم - وهو ضعيف - وصله بذكر ابن عبّاس، وإنما هو من قول مجاهد، والله تعالى أعلم.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 2292/ 15، وأبو القاسم البغوي في "الجعديات" (814)، والطبراني في "الكبير" (11069)، و "الأوسط" (119)، والبيهقي 10/ 82 من طرق عن الأعمش، بهذا الإسناد. ووقع في هذه الطرق: قيل للأعمش: سمعتَه من مجاهد؟ قال: لا، حدثني به ليث بن أبي سليم.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (11143)، و "الأوسط" (6872)، و"الصغير" (876) من طريق عبد العزيز بن الحُصين، عن عبد الله بن أبي نجيح، عن مجاهد، عن ابن عبّاس، في قول الله: {وَاذْكُرْ رَبَّكَ إِذَا نَسِيتَ} قال: إذا نسيت الاستثناء فاستثن إذا ذكرت. قال: هي لرسول الله صلى الله عليه وسلم خاصة، وليس لأحد منا أن يستثني إلَّا بصلة اليمين.وقال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن ابن أبي نجيح إلَّا عبد العزيز بن الحصين، تفرَّد به الوليد بن مسلم قلنا: وعبد العزيز بن الحصين ضعيف.وأخرج الطبراني في "الكبير" (12817)، و "الأوسط" (930) من طريق سفيان بن حسين، عن يعلى بن مسلم عن جابر بن زيد، عن ابن عباس: {وَلَا تَقُولَنَّ لِشَيْءٍ إِنِّي فَاعِلٌ ذَلِكَ غَدًا (23) إِلَّا أَنْ يَشَاءَ اللَّهُ وَاذْكُرْ رَبَّكَ إِذَا نَسِيتَ} أن تقول: إن شاء الله. وسنده صحيح.قال ابن كثير في "تفسيره": ومعنى قول ابن عبّاس: أنه يستثني ولو بعد سنة أي: إذا نسي أن يقول في حلفه أو كلامه: إن شاء الله، وذكر ولو بعد سنة، فالسُّنة له أن يقول ذلك، ليكون آتيًا بسنّة الاستثناء، حتى ولو كان بعد الحنث قاله ابن جَرِير رحمه الله ونصَّ على ذلك، لا أن يكون ذلك رافعًا لحنث اليمين ومسقطًا للكفارة، وهذا الذي قاله ابن جَرِير رحمه الله هو الصحيح، وهو الأليَق بحمل كلام ابن عبّاس عليه، والله أعلم.ثم قال: ويحتمل في الآية وجه آخر، وهو أن يكون الله عز وجل قد أرشد من نسي الشيء في كلامه إلى ذكرُ الله تعالى؛ لأنَّ النسيان منشؤه من الشيطان، كما قال فتى موسى: {وَمَا أَنْسَانِيهُ إِلَّا الشَّيْطَانُ أَنْ أَذْكُرَهُ}، وذكر الله تعالى يطرد الشيطان، فإذا ذهب الشيطان ذهب النسيان، فذكرُ الله سببٌ للذكر؛ ولهذا قال: {وَاذْكُرْ رَبَّكَ إِذَا نَسِيتَ}.وقال ابن قدامة في "المغني" 13/ 484: يشترط أن يكون الاستثناء متصلًا باليمين، بحيث لا يفصل بينهما كلام أجنبي، ولا يسكت بينهما سكوتًا يمكنه الكلام فيه، فأما السكوت لانقطاع نفسه أو صوته، أو عيّ، أو عارض من عطسة، أو شيء غيرها، فلا يمنع صحة الاستثناء، وثبوت حكمه، وبهذا قال مالك والشافعي والثَّوري وأبو عبيد وإسحاق وأصحاب الرأي، لأنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "من حلف فاستثنى" وهذا يقتضي كونه عَقيبه، ولأنَّ الاستثناء من تمام الكلام، فاعتبر اتصاله به كالشرط وجوابه، وخبر المبتدأ، والاستثناء بإلَّا، ولأنَّ الحالف إذا سكت ثبت حكم يمينه، وانعقدت موجبة لحكمها، وبعد ثبوته لا يمكن دفعه ولا تغييره. وانظر تمام كلامه فيه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8029)


8029 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن عيسى بن السَّكَن الواسطي، حدثنا عمرو [1] بن عَوْن، حدثنا هُشَيم أخبرنا عبد الله بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يَمينُك على ما يُصدِّقُك به صاحبُك" [2].هذا حديث صحيح الإسناد إن شاء الله، فإنّ الشيخين لم يحتجَّا بعبد الله بن أبي صالح، على أنَّ له شاهدًا من حديث عبد الله بن سعيد المَقبُري، وأمرُه يَقرُب من أمر عبد الله بن أبي صالح:




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমার শপথ সে বিষয়ের উপর বর্তাবে, যে বিষয়ে তোমার সঙ্গী তোমাকে বিশ্বাস করে।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: عمر.



[2] إسناده حسن إن شاء الله من أجل عبد الله بن أبي صالح.وأخرجه أبو داود (3255) عن عمرو بن عَوْن، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 12/ (7119)، ومسلم (1653)، وأبو داود (3255)، وابن ماجه (2121)، والترمذي (1354) من طرق عن هشيم بن بشير به وقال الترمذي: حسن غريب.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 7/ 221 من طريق يحيى بن أبي الحجاج، حدثنا عوف - هو ابن أبي جميلة - عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة. وهذا إسناد حسن في المتابعات من أجل يحيى بن أبي الحجاج.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8030)


8030 - أخبرَناه أبو عبد الله محمد بن يعقوب، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا مسدَّد، حدثنا عمرو بن علي، عن عبد الله بن سعيد بن أبي سعيد المَقبُري، عن جدِّه، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يمينُك على ما يُصدِّقُك به صاحبُك" [1].




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমার শপথ সেই বিষয়ের ওপর প্রযোজ্য, যে বিষয়ে তোমার সঙ্গী তোমাকে সত্যবাদী বলে বিশ্বাস করে।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل عبد الله بن سعيد المقبري، فإنه متروك الحديث، ويُغني عنه ما قبله.وأخرجه الطحاوي في "شرح المشكل" (1873) من طريق عمر بن علي بن مقدم، والمزي في ترجمة عبد الله بن أبي صالح من "تهذيب الكمال" 15/ 120 من طريق أبي بكر النهشلي، كلاهما عن عبد الله بن سعيد المقبري، عن جدِّه، به.وأخرجه أحمد 12/ (8378) من طريق عبد الله بن عقيل الثقفي، عن عبد الله بن سعيد، عن أبيه، عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم "يمينك ما يصدقك به صاحبك". فجعله عن أبيه بدل عن جدِّه!









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8031)


8031 - حدثنا أبو العبّاس محمد بن يعقوب، أخبرنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا أبو معاوية، حدثنا بشَّار [1] بن كِدَام السُّلَمي، عن محمد بن زيد، عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الحَلِفُ حِنثٌ أو نَدَمٌ" [2].قال الحاكم: قد كنتُ أحسبُ برهةً من دَهْري أن بشارًا هذا أخو مِسعَر فلم أَقف عليه [3]، وهذا الكلام صحيح من قول ابن عمر.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কসম হয় ভঙ্গ হওয়া নয় অনুশোচনা।"

হাকেম বলেছেন: আমি আমার জীবনের একটা দীর্ঘ সময় ধরে মনে করতাম যে এই বাশ্‌শার (রাবী) মিসআর-এর ভাই, কিন্তু আমি এর প্রমাণ পাইনি। আর এই বক্তব্যটি ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উক্তি হিসেবে সহীহ।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] المثبت من (ك)، وتحرف في بقية النسخ إلى: بسام.



[2] إسناده ضعيف، بشّار بن كدام ليس له حديث مرفوع غير هذا، وقد ضعفه أبو زرعة الرازي، كما أنه خالف الثقةَ عاصمَ بن محمد بن زيد فرفعه بينما رواه عاصم موقوفًا، لكن اختلفوا عليه فروي عنه أنه من قول عبد الله بن عمر كما في الرواية التالية عند المصنِّف، ولم نقف عليها عند غيره، وروي عنه أنه من قول عمر بن الخطاب، وهذا هو الأشهر والأكثر، والله تعالى أعلم.وأخرجه ابن ماجه (2103) عن علي بن محمد الطنافسي، وابن حبان (4356) من طريق علي بن الحسين الواسطي، كلاهما عن أبي معاوية محمد بن خازم بهذا الإسناد.



8031 [3] - انظر في هذا الشأن تعليق الشيخ المعلمي رحمه الله على "التاريخ الكبير" للبخاري 2/ 128 - 129.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8032)


8032 - حدَّثَناه أحمد بن سهل البُخاري، حدثنا سهل بن المتوكِّل، حدثنا إبراهيم بن المنذر، حدثنا أبو ضَمْرة، عن عاصم بن محمد بن زيد بن عبد الله بن عمر بن الخطاب، عن أبيه، عن ابن عمر قال: إنما اليمينُ مَأْثَمةٌ أو مَنْدَمةٌ [1].آخر كتاب الأيمان ‌‌كتاب النذور




ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: শপথ (কসম) হয় গুনাহের কারণ, অথবা অনুশোচনার কারণ।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] رجاله ثقات، لكن اختلف على عاصم بن محمد فيه، فرواه عنه أبو ضمرة وهو أنس بن عياض بن ضمرة - فجعله عن ابن عمر، ولم نقف على هذا الطريق عند غير المصنف، ورواه عنه أبو معاوية الضرير وأحمد بن يونس فجعلاه عن عمر بن الخطاب، قال البخاري: وحديث عُمَر أولي بإرساله.وأخرجه ابن أبي شيبة (12756 - عوامة) عن أبي معاوية محمد بن خازم، والبخاري في "التاريخ الكبير" 2/ 129، ومن طريقه البيهقي 15/ 31 عن أحمد بن يونس، كلاهما عن عاصم بن محمَّد بن زيد قال: سمعتُ أبي يقول: قال عمر بن الخطاب اليمين أئمة أو مَندَمة. قال البخاري: وحديث عمر أولى بإرساله. قلنا: وهذا إسناد رجاله ثقات غير أنَّ محمَّد بن زيد لم يدرك عمر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8033)


8033 - حدثنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا علي بن الحسين بن جُنَيد، حدثنا المُعافَى بن سليمان الحَرَّاني، حدثنا فُلَيح بن سليمان، عن سعيد بن الحارث، أنه سمع عبد الله بن عمرو بن عمر، وسأله رجلٌ من بني كعب يقالُ له: مسعود بن عمرو: يا أبا عبد الرحمن، إنَّ ابني كان بأرضِ فارسَ فيمن كان عند عمر بن عبيد الله، وإنه وقع بالبصرة طاعونٌ شديد، فلما بلغ ذلك نَذَرتُ إن الله جاء بابني أن أمشيَ [1] إلى الكعبة، فجاء مريضًا، فمات، فما ترى؟ فقال ابن عمر: أَوَلَم تُنهَوا عن النَّذر؟ إِنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "النَّدْرُ لا يُقدِّمُ شيئًا ولا يُؤخِّرُه، فإنما يُستخرج به من البخيل"، أُوفِ بنَذركِ [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة.




আব্দুল্লাহ ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কা'ব গোত্রের মাসউদ ইবনু আমর নামক এক ব্যক্তি তাঁকে (ইবনু উমারকে) জিজ্ঞেস করল: হে আবু আব্দুর রহমান! আমার ছেলে পারস্যের ভূমিতে উমার ইবনু উবাইদুল্লাহর কাছে ছিল। আর বসরায় তখন এক কঠিন প্লেগ (মহামারি) দেখা দিল। যখন এই সংবাদ আমার কাছে পৌঁছল, আমি মানত করলাম যে, যদি আল্লাহ আমার ছেলেকে ফিরিয়ে দেন, তবে আমি হেঁটে কা'বাতে যাব। কিন্তু সে অসুস্থ অবস্থায় ফিরে এল এবং মারা গেল। এখন আপনার কী মত? ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমাদের কি মানত করতে নিষেধ করা হয়নি? নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মানত কোনো কিছুকে এগিয়েও দেয় না এবং পিছিয়েও দেয় না। বরং এর মাধ্যমে কৃপণের কাছ থেকে (আল্লাহর পথে কিছু) বের করে নেওয়া হয়।" (তবুও) তুমি তোমার মানত পূর্ণ করো।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] كذا وقع في النسخ الخطية أنَّ السائل قد نذر عن نفسه، والذي في مصادر التخريج التي روتالحديث مطولًا أنَّ السائل إنما نذر عن ابنه، وهو الصواب الذي يؤيده آخر القصة كما سيأتي. من طريق عبد الله بن دينار، عن ابن عمر بنحوه.قال ابن حجر في "فتح الباري" 21/ 203: وهذا الفرع غريب، وهو أن يَنذِر عن غيره فيَلزَمَ الغيرَ الوفاءَ بذلك، ثمَّ إذا تعذَّر لزم الناذر! وقد كنتُ أستشكِلُ ذلك، ثُمَّ ظَهَرَ لي أنَّ الابن أقرَّ بذلك والتزم به، ثمَّ لما مات أمره ابن عمر وسعيدٌ أن يفعل ذلك عن ابنه كما يفعل سائرَ القُرَب عنه، كالصومِ والحج والصدقة، ويُحتمل أن يكون ذلك مختصًّا عندهما بما يقع من الوالد في حق ولده، فينعقدُ لوجوبِ برّ الوالد على الولد، بخلاف الأجنبي.ونقل في "الفتح" 21/ 207 أيضًا عن القُرطبي في "المفهم" حملَ ما ورد في الأحاديث من النَّهي على نذر المجازاة، فقال: هذا النَّهي محَلُّه أن يقول مثلًا: إن شَفَى الله مريضي فعليَّ صدقةُ كذا، ووجه الكراهة أنه لما وَقَفَ فعلَ القُربة المذكور على حصول الغرض المذكور، ظهر أنه لم يَتمحَّض له نيَّة التقرُّب إلى الله تعالى بما صَدَرَ منه، بل سَلَكَ فيها مسلك المعاوضة، ويوضِّحه أنه لو لم يَشفِ مريضَه، لم يتصدَّق بما علَّقه على شفائه، وهذه حالة البخيل؛ فإنَّه لا يخرج من ماله شيئًا إلَّا بعِوَضٍ عاجلٍ يزيد على ما أخرج غالبًا. وهذا المعنى هو المشار إليه في الحديث بقوله: "وإِنَّما يُستخرَج به من البخيل ما لم يكن البخيلُ يخرجه".قال: وقد ينضمُّ إلى هذا اعتقاد جاهلٍ يَظُنّ أن النَّذر يوجب حصول ذلك الغرض، أو أن الله يفعل معه ذلك الغرض لأجلِ ذلك النّذر، وإليهما الإشارةُ بقوله في الحديث أيضًا: "فإنَّ النَّذر لا يَرُدّ من قَدَر الله شيئًا"، والحالة الأولى تُقارِب الكفر، والثانية خطأٌ صريح. قلت: بل تَقرُب من الكفر أيضًا، ثمَّ نَقَلَ القُرطُبيّ عن العلماء حملَ النَّهي الوارد في الخبر على الكراهة، وقال: الذي يظهر لي أنه على التحريم في حقّ مَن يُخافُ عليه ذلك الاعتقادُ الفاسد، فيكون إقدامه على ذلك محرّمًا، والكراهة في حقّ مَن لم يعتقد ذلك. انتهى، وهو تفصيلٌ حسنٌ، ويؤيِّده قصَّة ابن عمر راوي الحديث النَّهي عن النَّذر، فإنها في نذر المجازاة.



[2] إسناده حسن في المتابعات والشواهد من أجل فليح بن سليمان، وقد توبع.وأخرجه الطحاوي في "شرح المشكل" (840) و (841)، والإسماعيلي - كما في "فتح الباري" 21/ 203 - من طرق عن فليح بن سليمان بهذا الإسناد مطولًا. وزادا في آخره: فقلت: يا أبا عبد الرحمن، إنَّما نَذَرتُ أن يمشي ابني، فقال: أوف بنذرِك، قال سعيد بن الحارث: فقلت له: أتعرِفُ سعيد بنَ المسيّب؟ قال: نعم، قلت له: اذهب إليه ثم أخبرني ما قال لك، قال: فأخبرني أنَّه قال له: امشِ عن ابنك قلت يا أبا محمد، وتَرى ذلك مقبولًا؟ قال: نعم، أرأيتَ لو كان على ابنك دَينٌ لا قضاء له فقضيتَه، أكان ذلك مقبولًا؟ قال: نعم، قال: فهذا مثل هذا.وهو عند أحمد 2/ (5994)، والبخاري (6692) من طريق فليح، مختصر بالمرفوع فقط. وأخرجه مطولًا ابن حبان (4378) من طريق زيد بن أبي أنيسة، عن سعيد بن الحارث بنحوه. وأخرج المرفوع منه أحمد 9/ (5275) و (5592)، والبخاري (6608) و (6693)، ومسلم (1639) (2) و (4)، وأبو داود (3287)، وابن ماجه (2122)، والنسائي (4724 - 4726)، وابن حبان (4375) و (4377) من طرق عن عبد الله طرق عن عبد الله بن مرة، عن عبد بن مرة، عن عبد الله بن عمر.وأخرجه إبراهيم بن محمد بن سفيان راوي صحيح مسلم في زوائده على مسلم (1639) (3) من طريق عبد الله بن دينار، عن ابن عمر بنحوه.قال ابن حجر في "فتح الباري" 21/ 203: وهذا الفرع غريب، وهو أن يَنذِر عن غيره فيَلزَمَ الغيرَ الوفاءَ بذلك، ثمَّ إذا تعذَّر لزم الناذر! وقد كنتُ أستشكِلُ ذلك، ثُمَّ ظَهَرَ لي أنَّ الابن أقرَّ بذلك والتزم به، ثمَّ لما مات أمره ابن عمر وسعيدٌ أن يفعل ذلك عن ابنه كما يفعل سائرَ القُرَب عنه، كالصومِ والحج والصدقة، ويُحتمل أن يكون ذلك مختصًّا عندهما بما يقع من الوالد في حق ولده، فينعقدُ لوجوبِ برّ الوالد على الولد، بخلاف الأجنبي.ونقل في "الفتح" 21/ 207 أيضًا عن القُرطبي في "المفهم" حملَ ما ورد في الأحاديث من النَّهي على نذر المجازاة، فقال: هذا النَّهي محَلُّه أن يقول مثلًا: إن شَفَى الله مريضي فعليَّ صدقةُ كذا، ووجه الكراهة أنه لما وَقَفَ فعلَ القُربة المذكور على حصول الغرض المذكور، ظهر أنه لم يَتمحَّض له نيَّة التقرُّب إلى الله تعالى بما صَدَرَ منه، بل سَلَكَ فيها مسلك المعاوضة، ويوضِّحه أنه لو لم يَشفِ مريضَه، لم يتصدَّق بما علَّقه على شفائه، وهذه حالة البخيل؛ فإنَّه لا يخرج من ماله شيئًا إلَّا بعِوَضٍ عاجلٍ يزيد على ما أخرج غالبًا. وهذا المعنى هو المشار إليه في الحديث بقوله: "وإِنَّما يُستخرَج به من البخيل ما لم يكن البخيلُ يخرجه".قال: وقد ينضمُّ إلى هذا اعتقاد جاهلٍ يَظُنّ أن النَّذر يوجب حصول ذلك الغرض، أو أن الله يفعل معه ذلك الغرض لأجلِ ذلك النّذر، وإليهما الإشارةُ بقوله في الحديث أيضًا: "فإنَّ النَّذر لا يَرُدّ من قَدَر الله شيئًا"، والحالة الأولى تُقارِب الكفر، والثانية خطأٌ صريح. قلت: بل تَقرُب من الكفر أيضًا، ثمَّ نَقَلَ القُرطُبيّ عن العلماء حملَ النَّهي الوارد في الخبر على الكراهة، وقال: الذي يظهر لي أنه على التحريم في حقّ مَن يُخافُ عليه ذلك الاعتقادُ الفاسد، فيكون إقدامه على ذلك محرّمًا، والكراهة في حقّ مَن لم يعتقد ذلك. انتهى، وهو تفصيلٌ حسنٌ، ويؤيِّده قصَّة ابن عمر راوي الحديث النَّهي عن النَّذر، فإنها في نذر المجازاة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8034)


8034 - حدثنا علي بن حَمْشاذ العَدْل، حدثنا أبو عمرو أحمد بن المبارك وأبو سعيد محمد بن شاذانَ، قالا: حدثنا قُتيبة بن سعيد، حدثنا إسماعيل بن جعفر، حدثنا عمرو بن أبي عمرو مولى ابن المطَّلِب، عن عبد الرحمن الأعرج، عن أبي هريرة، أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال: "إنَّ النَّذرَ لم [1] يُقرب من ابن آدم شيئًا لم يكن الله تعالى قدَّره له، ولكنّ النَّذِرَ يُوافِقُ القَدَرَ فيُخرجُ بذلك من البخيل ما لم يكنِ البخيلُ يريدُ أن يُخرِجَه" [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة!




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় মানতের কারণে এমন কোনো জিনিস আদম সন্তানের কাছে এগিয়ে আসে না, যা আল্লাহ তাআলা তার জন্য নির্ধারণ করেননি। তবে মানত তাকদীরের সাথে মিলে যায় এবং এর মাধ্যমে কৃপণের কাছ থেকে এমন কিছু বের করা হয়, যা সে দিতে চায়নি।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] كذا في النسخ، وفي مصادر التخريج: لا، وهو الجادّة.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد جيد من أجل عمرو بن أبي عمرو، وقد توبع.وأخرجه مسلم (1640) (7) عن قتيبة بن سعيد بهذا الإسناد. واستدراك الحاكم له ذهول منه. وأخرجه أحمد 14 / (8860)، ومسلم (1640) (7) من طرق عن إسماعيل بن جعفر، به. وأخرجه مسلم (1640) (7) من طريق يعقوب بن عبد الرحمن وعبد العزيز الدراوردي، كلاهما عن عمرو بن أبي عمرو، به. وفي بعض الروايات جاء الحديث قُدسيًا من كلام الله عز وجل.وأخرجه بنحوه أحمد 12/ (7297)، والبخاري (6694)، وأبو داود (3288)، وابن ماجه (2123)، والنسائي (4727) من طريق أبي الزناد، عن عبد الرحمن الأعرج، به.وأخرجه بنحوه أحمد 13/ (8152)، والبخاري (6609) من طريق همام بن منبّه، وأحمد 12 / (208) و (7998) و 15/ (9340) و 16/ (9963)، ومسلم (1640) (5) و (6)، والترمذي (1538)، والنسائي (4728)، وابن حبان (4376) من طريق عبد الرحمن بن يعقوب الحُرقي، كلاهما عن أبي هريرة. وقال الترمذي: حسن صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8035)


8035 - أخبرنا أبو يحيى ابن المقرئ الإمام بمكة، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا مسلم بن إبراهيم وحجَّاج بن مِنْهال، قالا: حدثنا حمّاد بن سَلَمة، عن حبيب المُعلِّم، عن عطاء، عن جابر: أنَّ رجلًا نَذَرَ أن يُصلِّيَ في بيت المَقدِس، فسأل عن ذلك رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "صلِّ هاهنا" يعني في المسجد الحرام، فقال: يا رسولَ الله، إنما نذرتُ أن أُصلِّيَ في بيت المقدس! فقال: "صلِّ هاهنا" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে এক ব্যক্তি বায়তুল মাকদিসে (জেরুজালেম) সালাত (নামাজ) আদায় করার মানত করেছিল। অতঃপর সে এ বিষয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "এখানেই সালাত আদায় কর।" (অর্থাৎ মসজিদুল হারামে।) লোকটি বলল: হে আল্লাহর রাসূল, আমি তো কেবল বায়তুল মাকদিসে সালাত আদায়ের মানত করেছি! তিনি (পুনরায়) বললেন: "এখানেই সালাত আদায় কর।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده قوي من أجل حبيب المعلم. أبو يحيى بن المقرئ: هو محمد بن عبد الله بن محمد بن عبد الله بن يزيد المقرئ، وعطاء: هو ابن أبي رباح.وأخرجه أحمد 23/ (14919)، وأبو داود (3305) من طريقين عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8036)


8036 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الزاهد، حدثنا أحمد بن محمد ابن عيسى القاضي، حدثنا أبو نُعيم وأبو حذيفة، قالا: حدثنا سفيان، عن محمد بن الزُّبير، عن الحسن، عن عمران بن حُصين قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا نذرَ في غضبٍ، وكفَّارتُه كفارة يمين" [1].




ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ক্রোধের সময় কোনো মানত (নযর) নেই, আর তার কাফফারা হলো কসমের কাফফারা।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، محمد بن الزُّبير - وهو الحنظلي البصري - متروك، قال النسائي في "المجتبى": محمد بن الزُّبير ضعيف لا يقوم بمثله حجة، وقد اختلف عليه في هذا الحديث. كما سيذكر المصنف في الروايات التالية، وقال: ومدارُ الحديث الآخر على محمد بن الزبير الحنظلي، وليس يصحُّ. والحسن - وهو البصري - لم يسمع من عمران. سفيان: هو الثَّوري.وأخرجه أحمد 33 / (19985) عن عبد الله بن الوليد والنسائي في "المجتبى" (3847) من طريق عمر بن أبي زيد أبي داود الحفري، كلاهما عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.ولفظه عند أحمد: "لا نذر في معصية الله أو في غضب" وعند النسائي: "لا نذر في معصية ولا غضب".وأخرجه أحمد (19945)، والنسائي أيضًا (3848) من طريق أبي بكر النهشلي، عن محمد بن الزبير عن الحسن به لكن وقع في رواية النسائي بلفظ المعصية، لا الغضب.وأخرجه ضمن قصةٍ أحمد (19856)، والنسائي في "الكبرى" (8709)، وفي "المجتبى" (3849)، وابن حبان (4392) من طريق منصور بن زاذان عن الحسن، عن عمران بن حصين، قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم: "لا نذر لابن آدم فيما لا يملك، ولا في معصية الله". وهو صحيح بهذا اللفظ، وهذا الإسناد أصحُّ، والحسن - وإن لم يسمع من عمران قد توبع كما سيأتي في تخريج الرواية (8039).وأما كفارة النذر كفارة اليمين، فقد ورد عن جمع من الصحابة، انظر حديث عقبة بن عامر في "مسند أحمد" رقم (17301)، وذكرنا شواهده هناك. وأخرجه الطحاوي في "شرح معاني الآثار" 3/ 129 - 130، وفي "شرح مشكل الآثار" (2163)، والطبراني في "الكبير" 18/ (486) من طريق عبد الوهاب بن عطاء الخفاف، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 33/ (19955)، والبزار في "مسنده" (3561)، والطحاوي في "شرح المعان"ي 3/ 129 - 130، وفي "شرح المشكل" (2164) من طرق عن محمد بن الزبير، به. في رواية البزار بلفظ المعصية، ولم يسق الطحاوي لفظه وقال البزار عقبه: هذا الحديث لا تعلمه يروى عن عمران إلَّا من حديث محمد بن الزُّبير، وقد اختلف عن محمد بن الزُّبير، ومحمد بن الزبير إنما ضُعِّف حديثه بهذا الحديث.وأخرجه النسائي في "المجتبى" (3845) من طريق محمد بن إسحاق، عن محمد بن الزبير، عن أبيه، عن رجل من أهل البصرة قال: صحبت، عمران قال سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "النذر نذران: فما كان من نذرٍ في طاعة الله، فذلك الله، وفيه الوفاء، وما كان من نذر في معصية الله فذلك للشيطان، ولا وفاء فيه، ويكفّره ما يكفّر اليمين".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8037)


8037 - أخبرَناه الحسن بن يعقوب العَدْل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا عبد الوهاب بن عطاء، أخبرنا محمد بن الزُّبير الحَنظَلي، عن أبيه، عن رجل، عن عِمران بن حُصَين، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "لا نذرَ في غضبٍ، وكفَّارتُه كفَّارة يمين" [1].




ইমরান ইবনু হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ক্রোধের অবস্থায় কোনো মানত হয় না, আর এর কাফ্ফারা হলো কসমের কাফ্ফারা।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل محمد بن الزُّبير، ووالده الزبير تفرَّد بالرواية عنه ابنه محمد، وفيه أيضًا رجل مبهم. عبد الوهاب بن عطاء: هو الخفّاف. وأخرجه الطحاوي في "شرح معاني الآثار" 3/ 129 - 130، وفي "شرح مشكل الآثار" (2163)، والطبراني في "الكبير" 18/ (486) من طريق عبد الوهاب بن عطاء الخفاف، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 33/ (19955)، والبزار في "مسنده" (3561)، والطحاوي في "شرح المعان"ي 3/ 129 - 130، وفي "شرح المشكل" (2164) من طرق عن محمد بن الزبير، به. في رواية البزار بلفظ المعصية، ولم يسق الطحاوي لفظه وقال البزار عقبه: هذا الحديث لا تعلمه يروى عن عمران إلَّا من حديث محمد بن الزُّبير، وقد اختلف عن محمد بن الزُّبير، ومحمد بن الزبير إنما ضُعِّف حديثه بهذا الحديث.وأخرجه النسائي في "المجتبى" (3845) من طريق محمد بن إسحاق، عن محمد بن الزبير، عن أبيه، عن رجل من أهل البصرة قال: صحبت، عمران قال سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "النذر نذران: فما كان من نذرٍ في طاعة الله، فذلك الله، وفيه الوفاء، وما كان من نذر في معصية الله فذلك للشيطان، ولا وفاء فيه، ويكفّره ما يكفّر اليمين".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8038)


8038 - حدَّثَناه عبد الله بن إسحاق الخُراساني، حدثنا إبراهيم بن الهيثم البَلَدي، حدثنا محمد بن كَثير الحِمصي، حدثنا الأوزاعي، حدثني يحيى، عن محمد بن الزُّبير الحنظلي، عن أبيه، عن عِمران بن حُصين، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "لا نذرَ في غضب، وكفّارتُه كفارةُ يمين" [1].وقد أعضَلَه مَعمرٌ عن يحيى بن أبي كثير:




ইমরান বিন হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "ক্রোধের অবস্থায় কোনো মানত (নযর) নেই। আর এর কাফ্ফারা হলো কসমের কাফ্ফারা।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف جدًّا كسابقه ولم يذكر فيه الرجل المبهم، كما أنَّ الزبير لم يسمع من عمران، قال البيهقي 10/ 70: الزبير لم يسمع من عمران، وأسند عن محمد بن الزُّبير أنَّ أباه لم يسمع من عمران. وقال النسائي في "المجتبى": قيل: إنَّ الزبير لم يسمع من عمران.وأخرجه النسائي في "المجتبى" (3841) من طريق بقية بن الوليد، عن الأوزاعي، بهذا الإسناد.لكن بلفظ: "لا نذر في معصية، وكفارتها كفارة يمين".وأخرجه النسائي (3840) و (3742) و (3843) من طرق عن يحيى بن أبي كثير، به. بلفظ الغضب، إلَّا الرواية الأولى فبلفظ المعصية.وأخرجه النسائي (3844) من طريق حماد بن زيد، عن محمد بن الزبير، به. بلفظ الغضب.