হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8079)


8079 - أخبرنا أبو النَّضر الفقيه وأبو الحسن العَنَزي، قالا: حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا عبد الله بن صالح، حدثنا الليث، حدثني يزيد بن أبي حبيب، أنَّ عُليّ بن رَبَاح أخبره، أنه سمع عمرو بن العاص يقول على المنبر: والله ما رأيتُ قومًا قطُّ أرغبَ فيما كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يزهدُ فيه منكم، تَرغَبون في الدنيا وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يزهدُ فيها، والله ما مرَّ برسولِ الله صلى الله عليه وسلم ثلاثٌ من الدَّهر إلَّا والذي عليه أكثرُ من الذي له [1].هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.




আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মিম্বারে দাঁড়িয়ে বলেন: আল্লাহর কসম! আমি তোমাদের চেয়ে এমন কোনো সম্প্রদায় কখনো দেখিনি, যারা সেইসব বস্তুর প্রতি অধিক আগ্রহী, যা থেকে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিমুখ ছিলেন। তোমরা দুনিয়ার প্রতি আগ্রহী, অথচ আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুনিয়া থেকে বিমুখ ছিলেন। আল্লাহর কসম! সময়ের এমন তিনটি দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর দিয়ে অতিবাহিত হয়নি যখন তাঁর কাছে যা ছিল, তার চেয়ে (মানুষের) পাওনা বেশি ছিল।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل عبد الله بن صالح - وهو المصري، كاتب الليث - وقد توبع.وأخرجه أحمد 29/ (17817) عن يحيى بن إسحاق، عن الليث بن سعد، بهذا الإسناد.وسيأتي مختصرًا برقم (8125) من طريق موسى بن علي عن أبيه علي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8080)


8080 - أخبرنا إسماعيل بن محمد بن الفضل الشَّعراني، حدثنا جدي، حدثنا سعيد بن أبي مريم، حدثنا يحيى بن أيوب، حدثني عبد الله بن جُنَادة المَعَافِرِي، أَنَّ أبا عبد الرحمن الحُبُلي حدَّثه عن عبد الله بن عَمرو، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم قال: "الدُّنيا سِجنُ المؤمن وسَنَتُه، فإذا خرج من الدُّنيا فارقَ السِّجنَ والسَّنَةَ" [1].




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দুনিয়া হলো মু'মিনের জেলখানা এবং তার কষ্টের বছর। যখন সে দুনিয়া থেকে বের হয়ে যায়, তখন সে জেলখানা ও কষ্ট/ক্লেশ ত্যাগ করে।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد محتمل للتحسين عبد الله بن جنادة المعافري روى عنه اثنان وذكره ابن حبان في "الثقات". أبو عبد الرحمن الحبلي هو عبد الله بن يزيد المعافري.وأخرجه أحمد (11/ (6855) من طريق عبد الله بن المبارك، عن يحيى بن أيوب، بهذا الإسناد.وفي الباب عن أبي هريرة عند مسلم (2956)، ولفظه: "الدنيا سجن المؤمن وجنة الكافر".وعن سلمان الفارسي، وقد سلف عند المصنف برقم (6690)، وسنده ضعيف جدًّا.قوله: "سجن المؤمن "قال النووي: معناه أنَّ كل مؤمن مسجون ممنوع في الدنيا من الشهوات المحرمة والمكروهة، مكلَّف بفعل الطاعات الشاقة، فإذا مات استراح من هذا، وانقلب إلى ما أعد الله تعالى له من النعيم الدائم والراحة الخالصة من المنغَّصات.والسَّنَة، بفتح السين وتخفيف النون: الجَدْب والقحط.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8081)


8081 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ، حدثني أبو الفضل أحمد [1] بن الحسين القطَّان، حدثنا محمد بن مُقاتِل المَروَزي، حدثنا يوسف بن عطيّة - وكان من أهل السُّنّة - عن ثابت، عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يكونُ في آخر الزَّمان عُبَّادٌ جُهَّالٌ، وقُرَّاء فَسَقةٌ" [2].




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "শেষ যামানায় মূর্খ ইবাদতকারীগণ এবং পাপাচারী ক্বারীগণ (কুরআন পাঠকগণ) থাকবে।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: محمد، والتصويب من "شعب الإيمان"، وله ترجمة في "تاريخ الإسلام" للذهبي 6/ 671.



[2] إسناده ضعيف جدًّا، يوسف بن عطية - وهو ابن باب الصفّار السعدي مولاهم متروك، وبه أعلَّه الذهبي في التلخيص"، فقال: يوسف هالك.وأخرجه البيهقي في "الشعب" (6555) عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد. وقال عقبه: يوسف بن عطية كثير المناكير.وأخرجه ابن حبان في "المجروحين" 3/ 134 - 135، والآجري في "أخلاق العلماء" ص 87، وابن عدي في "الكامل" 7/ 153، وأبو نعيم في "الحلية" 2/ 331 - 332 من طرق عن يوسف بن عطية به. وقال أبو نعيم عقبه: هذا حديث غريب من حديث ثابت، لم نكتبه إلَّا من حديث يوسف بن عطية، وهو قاض بصري في حديثه نكارة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8082)


8082 - حدثنا أبو العبّاس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عَوف الطائي، حدثنا أبو المغيرة، حدثنا أبو بكر بن أبي مريم، حدثنا ضَمْرة بن حَبيب، عن أبي الدرداء، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إنَّ الله يحبُّ كلَّ قلب حزينٍ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা প্রত্যেক ব্যথিত হৃদয়কে ভালোবাসেন।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف، أبو بكر بن أبي مريم ضعيف، لكنه متابع، وضمرة بن حبيب لم يلق أبا الدرداء، وأعلَّه الذهبي في "التلخيص"، فقال: مع ضعف أبي بكر منقطع. أبو المغيرة: هو عبد القدوس بن الحجاج الخولاني.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (865) عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد. وقرن بالحاكم أبا طاهر الفقيه محمد بن محمد.وأخرجه ابن أبي الدنيا في "الهم والحزن" (2)، وأبو يعلى كما في "المطالب العالية" لابن حجر (3242)، والخرائطي في "اعتلال القلوب" (7)، والطبراني في "مسند الشاميين" (1480)، وابن عدي في "الكامل" 2/ 39، وأبو نعيم في "الحلية" 6/ 90 من طرق عن أبي المغيرة به.وأخرجه القضاعي في "مسند الشهاب" (1075) من طريق عمرو بن بشر بن السرح، عن أبي بكر بن أبي مريم به.وأخرجه البزار في "مسنده" (4150)، والطبراني في "الشاميين" (2012)، والبيهقي في "الشعب" (866) من طريق معاوية بن صالح، عن ضمرة بن حبيب، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8083)


8083 - حدثنا علي بن بُنْدار الزاهد، حدثني أبو بكر محمد بن سليمان بن يوسف السَّلِيطي، حدثنا علي بن سعيد النَّسَوي، حدثنا عبد الصمد بن عبد الوارث، حدثنا هاشم بن سعيد الكوفي، حدثنا زيد بن عبد الله الخَثعَمي، عن أسماء بنت عُميس الخَثْعمية قالت: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "بئسَ العبدُ عبدٌ تخيَّلَ واختال، ونَسِيَ الكبيرَ المُتعال، بئسَ العبدُ عبدٌ سَهَا ولَهَا، ونَسِيَ المَبدأَ والمُنتهى، بئسَ العبدُ عبدٌ بَغَى وعَتَا، ونَسِيَ المقابرَ والبِلَا، بئسَ العبدُ عبدٌ يَخيِلُ الدنيا بالدِّين، بئسَ العبدُ عبدٌ يَختِلُ الدِّينَ بالشُّبُهات، بئس العبدُ عبدٌ يَصُدُّه الرُّعبُ عن الحقّ، بئسَ العبدُ عبدٌ طَمَعُ يقودُه، بئس العبدُ عبدٌ هوًى يُضِلُّه" [1].هذا حديث [2] ليس في إسناده أحدٌ منسوبٌ إلى نوع من الجَرْح، وإذا كانوا هكذا فإنه صحيح، ولم يُخرجاه.




আসমা বিনত উমাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি: “কতই না মন্দ সেই বান্দা যে অহংকার করে ও দাম্ভিকতা দেখায়, আর মহান সর্বোচ্চ সত্তাকে ভুলে যায়। কতই না মন্দ সেই বান্দা যে উদাসীন থাকে ও খেল-তামাশায় মগ্ন হয়, আর তার সূচনা ও শেষকে ভুলে যায়। কতই না মন্দ সেই বান্দা যে সীমালঙ্ঘন করে ও অবাধ্য হয়, আর কবরসমূহ ও পচনশীলতাকে ভুলে যায়। কতই না মন্দ সেই বান্দা যে দীনের বিনিময়ে দুনিয়াকে (প্রাপ্তির) কল্পনা করে। কতই না মন্দ সেই বান্দা যে সন্দেহ দ্বারা দীনকে ধোঁকা দেয়। কতই না মন্দ সেই বান্দা যাকে ভয় সত্য থেকে ফিরিয়ে রাখে। কতই না মন্দ সেই বান্দা যাকে তার লোভ পরিচালিত করে। কতই না মন্দ সেই বান্দা যাকে তার কু-প্রবৃত্তি পথভ্রষ্ট করে।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف بمرّة، هاشم بن سعيد الكوفي ضعيف، وزيد بن عبد الله الخثعمي - كذا سمى المصنِّف أباه، والذي في "تهذيب الكمال": ابن عطية - مجهول، لم يرو عنه سوى هاشم بن سعيد، ومحمد بن سليمان بن يوسف السليطي لا يُعرف حاله، إلَّا أنه متابع، وقال الذهبي في "التلخيص": إسناده مظلم.وأخرجه الترمذي (2448) عن محمد بن يحيى الأزدي، عن عبد الصمد بن عبد الوارث بهذا الإسناد. وزاد فيه: "بئس العبد عبد تجبّر واعتدى، ونسي الجبار "الأعلى. وقال: هذا حديث غريب لا نعرفه إلَّا من هذا الوجه، وليس إسناده بالقوي.وروى نحوه من حديث نعيم بن همّار الغطفاني: ابن عدي في "الكامل" 4/ 110، وابن أبي عاصم في "السنة" (9) مختصرًا، والبيهقي في "الشعب" (7833) ولم يسق لفظه بتمامه. وفي سنده طلحة بن زيد الرقي، وهو متهم، فلا يُفرح به. وأورده ابن أبي حاتم في "العلل" (1838)، ونقل عن أبيه قال: حديث منكر، وطلحة ضعيف الحديث، ويزيد - وهو ابن شريح - لم يدرك نعيم بن همار.



[2] زاد في (ز) و (م): صحيح، وليست في (ك) و (ب).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8084)


8084 - حدثنا أحمد بن سلمان الفقيه ببغداد وعلي بن حَمْشَاذَ العَدْل، قالا: حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا إسماعيل بن أبي أُوَيس، حدثني سليمان ابن بلال، عن يونس، عن ابن شِهاب، عن أبي حُميد [1] أنه سمع أبا هريرة يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لَتُنتَقُنَّ كما يُنتَقَى التمرُ من الجَفْنة، فَلَيَذهبنَّ خِيارُكم، ولَيَبقيَنَّ شراركم، فموتوا إن استطعتُم" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، وأبو حميد: هو الطَّاعِني [3].




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদেরকে অবশ্যই বাছাই করে নেওয়া হবে, যেমন থালা (বা পাত্র) থেকে উত্তম খেজুর বাছাই করে নেওয়া হয়। অতঃপর তোমাদের মধ্যকার শ্রেষ্ঠজনেরা (এক এক করে) চলে যাবে এবং তোমাদের নিকৃষ্টজনেরা অবশিষ্ট থাকবে। অতএব, তোমরা যদি সক্ষম হও, তবে মৃত্যুবরণ করো।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية في هذا الموضع والذي يليه إلى: جميل. وانظر حديث أبي ذر السالف برقم (5553). وانظر أيضًا حديث رويفع بن ثابت الآتي برقم (8541).



[2] صحيح لغيره ما خلا قوله: "فموتوا إن استطعتم"، وهذا إسناد ضعيف، أبو حميد - وهو مولي مسافع - مجهول، وليس هو الطاعني كما توهَّم المصنِّف، فقد أورد البخاريُّ هذا الحديث في ترجمة أبي حميد مولى مسافع كما سيأتي. وأما الطاعني فسماه البخاري في "التاريخ الكبير" 6/ 282 وابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 6/ 192: علي بن عبد الله، وكنَّياه أبا حميدة. وخالفهم الدارقطني في "العلل" (1689): فعدَّه أبا حميد المدني المقعَد عبد الرحمن بن سعد الأعرج. يونس: هو ابن يزيد الأيلي.وأخرجه البخاري في الكنى من "لتاريخ الكبير" 9/ 25 عن إسماعيل بن أبي أُوَيس، بهذا الإسناد.وسيأتي الحديث برقم (8542) من طريق سليمان بن بلال، وبرقم (8543) من طريق طلحة بن يحيى، كلاهما عن يونس بن يزيد الأيلي.وأخرجه البزار (7801)، وابن حبان (6851)، والطبراني في "الأوسط" (4676)، وتمّام في "الفوائد" (1452) و (1453)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 8/ 222 من طريق عبد الحميد بن حبيب بن أبي العشرين وأبو عمرو الداني في "السُّنن الواردة في الفتن" (258) من طريق الوليد بن مسلم، كلاهما عن الأوزاعي، عن الزُّهْري عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة. وعدَّ الدارقطنيُّ هاتين الروايتين وهمًا. ورواية ابن أبي العشرين وقعت عند البخاري في "التاريخ الكبير" 9/ 25 موقوفة على أبي هريرة!ورواه إسماعيل بن عبد الله سماعة بن وعمر بن عبد الواحد عن الأوزاعي، عن يونس بن يزيد، عن الزُّهْري، عن أبي هريرة مرسلًا موقوفًا. قاله الدارقطني في "العلل".وفي الباب عن مرداس الأسلمي مرفوعًا: "يذهب الصالحون، الأول فالأول، ويبقى حُفالة كحفالة الشعير أو التمر، لا يُباليهم الله بالةً". أخرجه البخاري (6434).وعن عبد الله بن عمرو، بلفظ: "يا عبد الله بن عمرو، كيف بك إذا بقيت في حُثالة من الناس بهذا". أخرجه البخاري تعليقًا (480)، ووصله غيره، انظر "مسند أحمد" 11/ (6508).وبنحوه عن أبي هريرة عند ابن حبان (5950). وانظر حديث أبي ذر السالف برقم (5553). وانظر أيضًا حديث رويفع بن ثابت الآتي برقم (8541).



8084 [3] - تحرَّف في النسخ الخطية إلى الطاعي والتصويب من "التاريخ الكبير" للبخاري 6/ 282، ومن "الجرح والتعديل" لابن أبي حاتم 6/ 192. شيء من تمر فقال: "ما هذا؟ " فقلت: ادَّخرناه لشتائنا، فقال: "أما تخاف أن ترى له بخارًا في جهنم".وروي نحو هذا عن أبي هريرة وغيره انظرهم مع تخريجهم في "المطالب العالية" لابن حجر (3169) بتحقيق سعد الشثري، ولا يصح منها شيء.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8085)


8085 - حدثنا أبو علي الحسين بن علي الحافظ، حدثنا أبو عبد الله الحسين بن موسى بن خلف الرَّسْعَني، حدثنا أبو فَرْوة يزيد بن محمد الرُّهَاوي، حدثنا أبي، عن أبيه، عن عطاء بن أبي رَبَاح، عن أبي سعيد الخُدْري، عن بلال قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا بلالُ القَ الله فقيرًا ولا تَلْقَه غنيًّا" قال: قلت: وكيف لي بذلك يا رسولَ الله؟ قال: "إذا رُزِقتَ فلا تَخْبَأَ، وإذا سُئِلتَ فلا تَمنَع" قال: قلت: وكيف لي بذلك يا رسولَ الله؟ قال: "هو ذاكَ وإلَّا فالنارُ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




বেলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “হে বেলাল, আল্লাহর সাথে দরিদ্র অবস্থায় সাক্ষাৎ করো, ধনী অবস্থায় তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করো না।” বেলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! এটা আমার জন্য কীভাবে সম্ভব? তিনি বললেন: “যখন তুমি রিযিকপ্রাপ্ত হবে, তখন তা জমা করে রেখো না, আর যখন তোমার কাছে কিছু চাওয়া হবে, তখন তা নিষেধ করো না (ফিরিয়ে দিও না)।” বেলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! এটা আমার জন্য কীভাবে সম্ভব? তিনি বললেন: “যদি (এইভাবে চলতে পারো), তবে তো ভালো, অন্যথায় আগুন (জাহান্নাম)।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل يزيد بن سنان الرهاوي جد أبي فروة يزيد بن محمد، فهو ضعيف جدًّا صاحب، مناكير، وابنه محمد ضعيف أيضًا. وقال الذهبي في "التلخيص": واهٍ.وأخرجه ابن السُّني في "القناعة" (63) عن الحسين بن موسى الرسعني، وقرن به أبا عروبة الحراني بهذا الإسناد.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 10/ 465، والضياء المقدسي في المنتقى من مسموعات مرو " (609) من طريقين عن محمد بن يزيد الرهاوي، عن أبيه يزيد عن عطاء، عن بلال ليس فيه أبو سعيد الخدري.وأخرجه الخطيب في "تاريخ بغداد" 16/ 563 من طريق طلحة بن زيد الرقي، عن أبي فروة يزيد بن سنان عن عطاء، عن أبي سعيد. ليس فيه بلال وطلحة الرقي متروك متهم بالوضع.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (1021). وعنه أبو نعيم في "الحلية" 1/ 149 - من طريق طلحة بن زيد عن أبي فروة يزيد بن سِنَان، عن أبي المبارك، عن أبي سعيد الخُدْري، عن بلال جعل مكان عطاء أبا المبارك. وأبو المبارك هذا إنما يروي عن عطاء بن أبي رباح عن أبي سعيد، لأنه متأخر، وغالب الظن أنه سقط من رواية الطبراني، وعلى كلٍّ هو مجهول، تفرَّد بالرواية عنه أبو فروة يزيد بن سنان، وهو ضعيف، وطلحة الرقي الذي تحته متهم كما سبق.وأخرج الطبراني (1022) بالإسناد السابق التالف عن بلال قال: دخل علي رسول الله صلى الله عليه وسلم وعندي شيء من تمر فقال: "ما هذا؟ " فقلت: ادَّخرناه لشتائنا، فقال: "أما تخاف أن ترى له بخارًا في جهنم".وروي نحو هذا عن أبي هريرة وغيره انظرهم مع تخريجهم في "المطالب العالية" لابن حجر (3169) بتحقيق سعد الشثري، ولا يصح منها شيء.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8086)


8086 - أخبرني دَعْلَج بن أحمد السِّجْزي ببغداد، حدثنا أحمد بن علي الآبَّار، حدثنا عبد الله بن أبي بكر المُقدَّمي، حدثنا جعفر بن سليمان، عن ثابت، عن أنس: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم دخلَ مكةَ وذَقَنُهُ على رَحْلِهِ مُتخشِّعًا [1]هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কায় প্রবেশকালে তাঁর থুতনি তাঁর বাহনের জিনপোষের উপর ছিল, বিনয়াবনত অবস্থায়।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف عبد الله بن أبي بكر المُقدَّمي وسلف مكررًا برقم (4413). وعبد الله بن رشيد وهو الجُندَيسابوري - لا يُحتجُّ بهما كما قال البيهقي، بينما وثَق الثاني ابن حبان في "الثقات" فقال: مستقيم الحديث، والربيعُ بن بدر متروك.وأخرجه هناد في "الزهد" - كما في "اللآلئ المصنوعة" للسيوطي 2/ 268 - عن قبيصة، عن سفيان الثَّوري، عن أبان - وهو ابن أبي عياش - عن أبي العالية، عن حذيفة؛ أُراه قد رفعه قال: "من أصبح وأكبر همه غير الله فليس من الله في شيء". قلنا: وأبان بن أبي عياش متروك أيضًا.وأخرجه ابن لال في "مكارم الأخلاق" - كما في "اللآلئ المصنوعة" 2/ 268 من طريق الجعفري - وهو محمد بن إسماعيل - عن عبد الله بن سلمة بن أسلم، عن عقبة بن شداد الجمحي، عن حذيفة رفعه من أصبح والدنيا أكبر همّه فليس من الله في شيء". وإسناده مسلسل بالضعفاء؛ محمد الجعفري قال أبو حاتم: منكر الحديث، يتكلمون فيه، وقال أبو نعيم: متروك، كما في "اللسان"، وعبد الله بن سَلَمة ضعَّفه الدارقطني، وقال أبو نعيم: متروك، كما في "الميزان" وتبعه الحافظ في "اللسان"، وجعلاه غير عبد الله بن سلمة الربعي وهما في ظننا واحد، وقال العقيلي في الثاني: منكر الحديث. وشيخه عقبة بن شداد لا يعرف.وأخرج الطبراني في "الأوسط" (7473)، و "الصغير" (907) - وعنه أبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 2/ 252 - عن محمد بن شعيب الأصبهاني، عن أحمد بن إبراهيم الزمعي، عن عبد الله بن أبي جعفر الرازي، عن أبيه، عن الربيع، عن أبي العالية، عن حذيفة مرفوعًا: "من لا يهتم بأمر المسلمين فليس منهم، ومن لا يصبح ويمسي ناصحًا الله ولرسوله ولكتابه ولإمامه ولعامة المسلمين فليس منهم". وقال: لم يروه عن أبي جعفر الرازي إلَّا ابنه، ولا يروى عن حذيفة إلَّا بهذا الإسناد.قلنا: إسناده مسلسل بالجهالة والضعف؛ محمد بن شعيب قال أبو الشيخ: حدّث عن الرازيين بما لم نجده في الرَّي، ولم نكتبه إلَّا عنه. وقال أبو نعيم يروي عن الرازيين غرائب. وكذا قال الذهبي، وقال الهيثمي: لم أعرفه وشيخه أحمد بن إبراهيم الزمعي، قال الذهبي في ترجمة محمد بن شعيب الأصبهاني من "تاريخ الإسلام " 6/ 1029: لا أعرفه. وعبد الله بن أبي جعفر الرازي وأبوه ليسا بالقويَّين والصواب فيه ما أخرجه الإمام أحمد في "الزهد" (178) عن عبد الرحمن بن مهدي عن عبد العزيز بن مسلم عن الربيع بن أنس، عن أبي العالية، عن أبي بن كعب موقوفًا من أصبح وأكبر. همه غير الله عز وجل فليس من الله. وهذا إسناد جيد.وفي الباب عن أبي ذر عند الطبراني في "الأوسط" (471)، وفيه يزيد بن ربيعة الرحبي متروك الحديث.وعن أنس بن مالك، ورد عنه من غير ما طريق كلها شديدة الضعف لا يفرح بها.فرواه أبو إسحاق الخُتَّلي في "المحبة" (38) من طريق أبي عروة البصري - وهو زياد بن ميمون عن أبي عمار - واسمه زياد - عن أنس. وأبو عروة مجهول، وشيخه أبو عمار متهم بالكذب. ورواه أبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 1/ 243 من طريق زياد بن ميمون المذكور، لكنه لم يذكر فيه زيادًا أبا عمار.ورواه ابن عدي في "الكامل" 7/ 67، وأبو طاهر المخلّص في "المخلصيات" (2926)، وأبو نعيم في "الحلية" 3/ 48، والبيهقي في "شعب الإيمان" (10102) من طريق وهب بن راشد، عن فرقد السبخي، عن أنس قال أبو نعيم لم يروه عن أنس غير فرقد، ولا عنه إلَّا وهب بن راشد! ووهب وفرقد غير محتج بحديثهما وتفردهما. وضعَّفه البيهقي أيضًا. قلنا: وهب بن راشد ضعفه شديدٌ، كما يُعلَم من ترجمته في "اللسان"، وقد خولف.فقد رواه عبد الله بن أحمد في "الزهد" (1909)، والحكيم الترمذي في "نوادر الأصول" (1464)، وأبو نعيم في "الحلية" 3/ 45، والبيهقي في "الشعب" (9573) من طرق عن سيار بن حاتم، عن جعفر بن سليمان الضبعي قال: سمعت فرقد السبخي يقول: قرأت في التوراة من أصبح حزينًا على الدنيا أصبح ساخطًا على ربه عز وجل، ومن جالس غنيًا فتضعضع له ذهب ثلثا دينه، ومن أصابه مصيبة فشكاها للناس فإنما يشكو ربه عز وجل وسنده محتمل للتحسين، وهذا هو الصحيح فيه أنه موقوف وليس بمرفوع.ورواه ابن النجار في ذيل تاريخ بغداد - كما في "للآلئ المصنوعة" 2/ 267 - من طريق عبد الله بن زبيد الإيامي، عن أبان عن أنس وأبان - وهو ابن أبي عياش - تقدم أنه متروك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8087)


8087 - حدثنا جعفر بن محمد الخُلْدي، حدثنا الحسن بن علي القطَّان، حدثنا إسماعيل بن عيسى العطَّار، حدثنا إسحاق بن بشر، حدثنا سفيان الثَّوري، عن الأعمش، عن شَقِيق بن سَلَمة عن حُذيفة، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم قال: "مَن أصبحَ والدُّنيا أكبرُ، همِّه، فليس من الله في شيءٍ ومَن لم يتَّقِ الله فليس من الله في شيءٍ، ومن لم يَهتمَّ للمسلمين عامّةً فليس منهم" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি এমন অবস্থায় সকাল করে যে দুনিয়াই তার সবচেয়ে বড় চিন্তা, সে আল্লাহর (কাছে) কোনো কিছুর মধ্যে নেই। আর যে ব্যক্তি আল্লাহকে ভয় করে না (তাকওয়া অবলম্বন করে না), সেও আল্লাহর (কাছে) কোনো কিছুর মধ্যে নেই। আর যে ব্যক্তি সাধারণভাবে মুসলিমদের বিষয়ে চিন্তিত হয় না, সে তাদের অন্তর্ভুক্ত নয়।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده تالف، إسحاق بن بِشْر - وهو أبو حذيفة البخاري - متروك متهم. وبه أعلَّه الذهبي في "التلخيص"، فقال: إسحاق عدمٌ، وأحسب الخبر موضوعًا. وسيأتي من طريق إسحاق بن بشر هذا عند المصنف برقم (8100)، لكن جعله من حديث ابن مسعود.وأخرجه مختصرًا الخطيب في "تاريخ بغداد" 11/ 9 - ومن طريقه ابن الجوزي في "الموضوعات" (1605) - من طريق عبد الله بن أحمد بن الحسين، المروزي، عن إسحاق بن بشر بهذا الإسناد. وقال: ابن الجوزي: هذا حديث لا يصح والمتهم به إسحاق، ثم نقل تكذيبه عن الأئمة.قلنا: لم ينفرد به إسحاق هذا، فقد أخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (10038) من طريق السري بن سهل، عن عبد الله بن رشيد عن الربيع بن بدر، عن أبي العالية، عن حذيفة مرفوعًا بلفظ: "من أصبح وهمُّه غير الله، فليس من الله". وسنده ضعيف جدًّا؛ فإن السري بن سهل وعبد الله بن رشيد وهو الجُندَيسابوري - لا يُحتجُّ بهما كما قال البيهقي، بينما وثَق الثاني ابن حبان في "الثقات" فقال: مستقيم الحديث، والربيعُ بن بدر متروك.وأخرجه هناد في "الزهد" - كما في "اللآلئ المصنوعة" للسيوطي 2/ 268 - عن قبيصة، عن سفيان الثَّوري، عن أبان - وهو ابن أبي عياش - عن أبي العالية، عن حذيفة؛ أُراه قد رفعه قال: "من أصبح وأكبر همه غير الله فليس من الله في شيء". قلنا: وأبان بن أبي عياش متروك أيضًا.وأخرجه ابن لال في "مكارم الأخلاق" - كما في "اللآلئ المصنوعة" 2/ 268 من طريق الجعفري - وهو محمد بن إسماعيل - عن عبد الله بن سلمة بن أسلم، عن عقبة بن شداد الجمحي، عن حذيفة رفعه من أصبح والدنيا أكبر همّه فليس من الله في شيء". وإسناده مسلسل بالضعفاء؛ محمد الجعفري قال أبو حاتم: منكر الحديث، يتكلمون فيه، وقال أبو نعيم: متروك، كما في "اللسان"، وعبد الله بن سَلَمة ضعَّفه الدارقطني، وقال أبو نعيم: متروك، كما في "الميزان" وتبعه الحافظ في "اللسان"، وجعلاه غير عبد الله بن سلمة الربعي وهما في ظننا واحد، وقال العقيلي في الثاني: منكر الحديث. وشيخه عقبة بن شداد لا يعرف.وأخرج الطبراني في "الأوسط" (7473)، و "الصغير" (907) - وعنه أبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 2/ 252 - عن محمد بن شعيب الأصبهاني، عن أحمد بن إبراهيم الزمعي، عن عبد الله بن أبي جعفر الرازي، عن أبيه، عن الربيع، عن أبي العالية، عن حذيفة مرفوعًا: "من لا يهتم بأمر المسلمين فليس منهم، ومن لا يصبح ويمسي ناصحًا الله ولرسوله ولكتابه ولإمامه ولعامة المسلمين فليس منهم". وقال: لم يروه عن أبي جعفر الرازي إلَّا ابنه، ولا يروى عن حذيفة إلَّا بهذا الإسناد.قلنا: إسناده مسلسل بالجهالة والضعف؛ محمد بن شعيب قال أبو الشيخ: حدّث عن الرازيين بما لم نجده في الرَّي، ولم نكتبه إلَّا عنه. وقال أبو نعيم يروي عن الرازيين غرائب. وكذا قال الذهبي، وقال الهيثمي: لم أعرفه وشيخه أحمد بن إبراهيم الزمعي، قال الذهبي في ترجمة محمد بن شعيب الأصبهاني من "تاريخ الإسلام " 6/ 1029: لا أعرفه. وعبد الله بن أبي جعفر الرازي وأبوه ليسا بالقويَّين والصواب فيه ما أخرجه الإمام أحمد في "الزهد" (178) عن عبد الرحمن بن مهدي عن عبد العزيز بن مسلم عن الربيع بن أنس، عن أبي العالية، عن أبي بن كعب موقوفًا من أصبح وأكبر. همه غير الله عز وجل فليس من الله. وهذا إسناد جيد.وفي الباب عن أبي ذر عند الطبراني في "الأوسط" (471)، وفيه يزيد بن ربيعة الرحبي متروك الحديث.وعن أنس بن مالك، ورد عنه من غير ما طريق كلها شديدة الضعف لا يفرح بها.فرواه أبو إسحاق الخُتَّلي في "المحبة" (38) من طريق أبي عروة البصري - وهو زياد بن ميمون عن أبي عمار - واسمه زياد - عن أنس. وأبو عروة مجهول، وشيخه أبو عمار متهم بالكذب. ورواه أبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 1/ 243 من طريق زياد بن ميمون المذكور، لكنه لم يذكر فيه زيادًا أبا عمار.ورواه ابن عدي في "الكامل" 7/ 67، وأبو طاهر المخلّص في "المخلصيات" (2926)، وأبو نعيم في "الحلية" 3/ 48، والبيهقي في "شعب الإيمان" (10102) من طريق وهب بن راشد، عن فرقد السبخي، عن أنس قال أبو نعيم لم يروه عن أنس غير فرقد، ولا عنه إلَّا وهب بن راشد! ووهب وفرقد غير محتج بحديثهما وتفردهما. وضعَّفه البيهقي أيضًا. قلنا: وهب بن راشد ضعفه شديدٌ، كما يُعلَم من ترجمته في "اللسان"، وقد خولف.فقد رواه عبد الله بن أحمد في "الزهد" (1909)، والحكيم الترمذي في "نوادر الأصول" (1464)، وأبو نعيم في "الحلية" 3/ 45، والبيهقي في "الشعب" (9573) من طرق عن سيار بن حاتم، عن جعفر بن سليمان الضبعي قال: سمعت فرقد السبخي يقول: قرأت في التوراة من أصبح حزينًا على الدنيا أصبح ساخطًا على ربه عز وجل، ومن جالس غنيًا فتضعضع له ذهب ثلثا دينه، ومن أصابه مصيبة فشكاها للناس فإنما يشكو ربه عز وجل وسنده محتمل للتحسين، وهذا هو الصحيح فيه أنه موقوف وليس بمرفوع.ورواه ابن النجار في ذيل تاريخ بغداد - كما في "للآلئ المصنوعة" 2/ 267 - من طريق عبد الله بن زبيد الإيامي، عن أبان عن أنس وأبان - وهو ابن أبي عياش - تقدم أنه متروك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8088)


8088 - حدثنا أبو العبّاس محمد بن يعقوب، حدثنا العبّاس بن محمد الدُّوري، حدثنا شَبَابة بن سَوَّار، حدثنا شُعبة، عن أبي إسرائيل، عن جَعْدة الجَشْمي قال: رأيتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم يُشيرُ بيده إلى بطن رجلِ سَمينٍ ويقول: "لو كان هذا في غيرِ هذا كان خيرًا لك" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




জা'দাহ আল-জাশমি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি, তিনি একজন স্থূলকায় (মোটা) ব্যক্তির পেটের দিকে হাত দিয়ে ইশারা করে বলছিলেন: "যদি এই জিনিসটা (স্থূলতা) এর (পেটের) পরিবর্তে অন্য কোনো স্থানে থাকত, তবে তা তোমার জন্য উত্তম হতো।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده فيه لين من أجل أبي إسرائيل - وهو شعيب الجُشمي - كما سلف بيانه برقم (7318). وهو في "تاريخ" عباس الدوري 3/ 46.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (5278) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8089)


8089 - أخبرني إبراهيم بن عِصْمة بن إبراهيم العَدْل، حدثنا أبي، حدثنا يحيى بن يحيى، أخبرنا أبو معاوية عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن أشياخه قال: دخل سعدٌ على سلمان يعودُه، قال: فبَكَى فقال له: سعد ما يُبكيكَ يا أبا عبد الله؟ توفِّي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وهو عنك راضي، وتَرِدُ عليه الحوضَ، وتلقَى أصحابَك، قال: فقال سلمان: أمَا إني لا أبكي جَزَعًا من الموت، ولا حِرصًا على الدنيا، ولكنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم عَهِدَ إلينا عهدًا حيًا وميتًا، قال: "لِتكُنْ بُلْغةُ أحدِكم من الدنيا مثلَ زادِ الراكب"، وحولي هذه الأساودةُ. قال: وإنما حولَه إجَّانةٌ وجَفْنَةٌ ومَطْهَرة، فقال له سعدٌ: يا أبا عبد الله، اعهَدْ إلينا بعهدٍ نأخُذ به بعدَك، قال: فقال: يا سعدُ، اذكُرِ الله عند همِّك إذا هَمَمتَ، وعند يدِك إذا قَسَمتَ، وعند حُكمِك إذا حَكَمتَ [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে দেখতে তাঁর কাছে গেলেন। তিনি (সালমান) কাঁদতে শুরু করলেন। সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন, “হে আবু আব্দুল্লাহ! কী কারণে আপনি কাঁদছেন? রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আপনার প্রতি সন্তুষ্ট থাকা অবস্থায় ইন্তেকাল করেছেন, আপনি তাঁর সাথে হাউযের (কাউসার) কাছে মিলিত হবেন এবং আপনার সঙ্গীদের সাথে সাক্ষাৎ করবেন।”

সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, “আমি মৃত্যুর ভয়ে বা দুনিয়ার প্রতি লালসার কারণে কাঁদছি না। বরং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের কাছে জীবিত ও মৃত অবস্থায় একটি অঙ্গীকার করেছিলেন। তিনি বলেছিলেন: ‘তোমাদের কারো জন্য দুনিয়ার পাথেয় যেন একজন পথিকের পাথেয়র মতো হয়।’ অথচ আমার চারপাশে এই কালো বস্তুগুলো (জিনিসপত্র) রয়েছে।” বর্ণনাকারী বলেন: তাঁর চারপাশে কেবল একটি গামলা, একটি বড় থালা এবং একটি পানির পাত্র ছিল।

তখন সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন, “হে আবু আব্দুল্লাহ! আপনি আমাদের কাছে একটি অঙ্গীকার করুন, যা আমরা আপনার পরে অনুসরণ করব।”

তিনি বললেন, “হে সা'দ! যখন আপনি কোনো বিষয়ে মনস্থির করবেন, তখন আল্লাহকে স্মরণ করবেন; যখন আপনি কিছু ভাগ করে দেবেন, তখন আপনার হাতের মাধ্যমে আল্লাহকে স্মরণ করবেন; এবং যখন আপনি কোনো ফায়সালা করবেন, তখন আপনার ফায়সালার মাধ্যমে আল্লাহকে স্মরণ করবেন।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات لكن الواسطة بين أبي سفيان وهو طلحة بن نافع - وبين صحابيي الحديث مبهمة، لكن قد جاء من غير وجه.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (9910) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو عبيد القاسم بن سلام في "الأموال" (16)، وابن سعد في "الطبقات" 4/ 84، وابن أبي شيبة في "المصنف" 13/ 220، وفي "المسند" (460)، وأحمد في "الزهد" (825)، وهناد في الزهد (566)، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 195 - 196، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 21/ 451 من طريق أبي معاوية به.وأخرجه ابن الأعرابي في "الزهد وصفة الزاهدين" (87)، والبيهقي في "الشعب" (9911)، وابن عساكر 21/ 451 من طريق زائدة بن قدامة، وابن عساكر 21/ 451 - 452 من طريق جرير بن عبد الحميد، كلاهما عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن سعد. ليس فيه المبهم.وأخرجه أبو نعيم 1/ 195 من طريق محمد بن عيسى الدامغاني، عن جرير، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، قال دخل سعد … فذكره، فزاد فيه جابرًا. وقال عقبه كذا: رواه الدامغاني عن جرير عن الأعمش عن أبي سفيان عن جابر. قلنا: يشير إلى وهم الدامغاني في ذلك، فرواية ابن عساكر عن جرير نفسه ليس فيها ذكرُ، جابر، ولا رواية زائدة عن الأعمش.وأخرجه بنحوه أحمد 39 / (23711) من طريق الحسن البصري وابن حبان (706) من طريق عامر بن عبد الله، فذكراه عن سلمان مرسلًا.وورد من طريق سعيد بن المسيب ومورق العجلي كلاهما عن سلمان، انظرهما مع تخريجهما في "مسند أحمد". وذكرنا هناك شواهده.قوله: "حولي هذه الأساودة" قال ابن الأثير: يريد شُخوصًا من متاع عنده، وكل شخص من إنسان أو متاع أو غيره سَوَاد، أو يريد بها الحيات جمع أسود، شبَّهها بها لاستضراره بمكانها.والإجّانة: إناء تُغسل فيه الثِّياب.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8090)


8090 - حدثنا عبد الله بن جعفر بن دَرَستَوَيهِ، حدثنا يعقوب بن سفيان، حدثنا عمرو بن عثمان [1] بن أَوس الواسطي، حدثنا يحيى بن زكريا بن أبي زائدة، عن إسرائيل، عن الرُّكَين بن الرّبيع بن عُمَيلة، عن أبيه، عن ابن مسعود، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم قال: "ما أكثرَ أحدٌ من الرِّبا، إِلَّا كان عاقبةُ أمرِه إلى قُلٍّ" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কেউ সুদের (রিবা) আধিক্য করলে, তার কাজের পরিণতি স্বল্পতার দিকে ধাবিত হয়।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] كذا في النسخ الخطية ابن عثمان وصوابه: ابن عَوْن، وكنيته أبو عثمان. أخرجه ابن أبي الدنيا في "الصمت" (257)، وفي "ذم الغيبة" (121)، وأبو الشيخ في "التوبيخ" (132). وفيه سليمان بن عمرو بن ثابت لم نعرفه.وبنحوه عند الطبري في "صريح السنة" (38)، والطبراني في "الأوسط" (8936)، وأبي الشيخ في "التوبيخ" (128). وجوَّد إسناده المنذري في "الترغيب"، مع أنَّ راويه عن أبي الدرداء اختلفوا في تسميته.قال أبو عبيد: قوله: أشاد، يعني: رفع ذكرَه ونوَّه به وشَهَرَه بالقبيح، وكذلك كلّ شيء رفعتَه فقد أشدتَه، ولا أرى البنيان المَشِيد إلّا من هذا، يقال: أشدت البنيان فهو مُشاد، وشيّدته فهو مشيَّد: إذا رفعتَه وأطلته.



[2] إسناده صحيح. وانظر (2293). أخرجه ابن أبي الدنيا في "الصمت" (257)، وفي "ذم الغيبة" (121)، وأبو الشيخ في "التوبيخ" (132). وفيه سليمان بن عمرو بن ثابت لم نعرفه.وبنحوه عند الطبري في "صريح السنة" (38)، والطبراني في "الأوسط" (8936)، وأبي الشيخ في "التوبيخ" (128). وجوَّد إسناده المنذري في "الترغيب"، مع أنَّ راويه عن أبي الدرداء اختلفوا في تسميته.قال أبو عبيد: قوله: أشاد، يعني: رفع ذكرَه ونوَّه به وشَهَرَه بالقبيح، وكذلك كلّ شيء رفعتَه فقد أشدتَه، ولا أرى البنيان المَشِيد إلّا من هذا، يقال: أشدت البنيان فهو مُشاد، وشيّدته فهو مشيَّد: إذا رفعتَه وأطلته.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8091)


8091 - حدثنا أبو بكر محمد بن عبد الله الشافعي، حدثنا محمد بن أحمد بن بُرْد الأنطاكي، حدثنا محمد بن عيسى بن الطَّبّاع، حدثنا أبو معاوية، حدثنا عبد الله بن ميمون، عن موسى بن مِسكِين، عن أبي ذرٍّ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن أَشادَ [1] على مسلم كلمةً يَشِينُه بها بغير حقٍّ، شانَه [2] اللهُ بها في النار يومَ القيامة" [3]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো মুসলমানের বিরুদ্ধে এমন কোনো কথা উত্থাপন করে, যার মাধ্যমে সে অন্যায়ভাবে তাকে অপদস্থ করে, কিয়ামতের দিন আল্লাহ তাআলা তাকে তার সেই (অপমানকর) কথার কারণে জাহান্নামে অপদস্থ করবেন।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى شان، والتصويب من مصادر التخريج، وعليه شرح أبو عبيد القاسم بن سلام. أخرجه ابن أبي الدنيا في "الصمت" (257)، وفي "ذم الغيبة" (121)، وأبو الشيخ في "التوبيخ" (132). وفيه سليمان بن عمرو بن ثابت لم نعرفه.وبنحوه عند الطبري في "صريح السنة" (38)، والطبراني في "الأوسط" (8936)، وأبي الشيخ في "التوبيخ" (128). وجوَّد إسناده المنذري في "الترغيب"، مع أنَّ راويه عن أبي الدرداء اختلفوا في تسميته.قال أبو عبيد: قوله: أشاد، يعني: رفع ذكرَه ونوَّه به وشَهَرَه بالقبيح، وكذلك كلّ شيء رفعتَه فقد أشدتَه، ولا أرى البنيان المَشِيد إلّا من هذا، يقال: أشدت البنيان فهو مُشاد، وشيّدته فهو مشيَّد: إذا رفعتَه وأطلته.



[2] في النسخ الخطية: أشانه، والمثبت من مصادر التخريج، وهو الوجه. أخرجه ابن أبي الدنيا في "الصمت" (257)، وفي "ذم الغيبة" (121)، وأبو الشيخ في "التوبيخ" (132). وفيه سليمان بن عمرو بن ثابت لم نعرفه.وبنحوه عند الطبري في "صريح السنة" (38)، والطبراني في "الأوسط" (8936)، وأبي الشيخ في "التوبيخ" (128). وجوَّد إسناده المنذري في "الترغيب"، مع أنَّ راويه عن أبي الدرداء اختلفوا في تسميته.قال أبو عبيد: قوله: أشاد، يعني: رفع ذكرَه ونوَّه به وشَهَرَه بالقبيح، وكذلك كلّ شيء رفعتَه فقد أشدتَه، ولا أرى البنيان المَشِيد إلّا من هذا، يقال: أشدت البنيان فهو مُشاد، وشيّدته فهو مشيَّد: إذا رفعتَه وأطلته.



8091 [3] - إسناده ضعيف بمرّة، عبد الله بن ميمون لم نتبيَّنه، ويبعد في ظننا أن يكون القدّاحَ المتروك، فالقداح من طبقة نازلة، وهذا من طبقة عالية، وموسى بن مسكين لم نعرفه، وقال الذهبي في هذا الإسناد في "التلخيص": مظلم.وأخرجه أبو عبيد في "غريب الحديث" 2/ 559، وابن أبي الدنيا في "الصمت" (256)، وفي "ذم الغيبة" (120)، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" (447)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (9211) من طريق أبي معاوية، بهذا الإسناد.وفي الباب عن أبي الدرداء موقّوفًا عليه بلفظ: أيما رجل أشاع على امرئ مسلم كلمة، وهو منها بريء ليَشينَه بها، كان حقًّا على الله أن يعذبه بها يوم القيامة في النار حتى يأتي بنفاذ ما قال. أخرجه ابن أبي الدنيا في "الصمت" (257)، وفي "ذم الغيبة" (121)، وأبو الشيخ في "التوبيخ" (132). وفيه سليمان بن عمرو بن ثابت لم نعرفه.وبنحوه عند الطبري في "صريح السنة" (38)، والطبراني في "الأوسط" (8936)، وأبي الشيخ في "التوبيخ" (128). وجوَّد إسناده المنذري في "الترغيب"، مع أنَّ راويه عن أبي الدرداء اختلفوا في تسميته.قال أبو عبيد: قوله: أشاد، يعني: رفع ذكرَه ونوَّه به وشَهَرَه بالقبيح، وكذلك كلّ شيء رفعتَه فقد أشدتَه، ولا أرى البنيان المَشِيد إلّا من هذا، يقال: أشدت البنيان فهو مُشاد، وشيّدته فهو مشيَّد: إذا رفعتَه وأطلته.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8092)


8092 - أخبرنا أبو أحمد بكر بن محمد الصَّيرَفي بمَرْو، حدثنا عبد الصمد بن الفضل، حدثنا عبد الله بن يزيد المُقرئ، حدثنا حَيْوة، عن بكر بن عمرو، عن عبد الله بن هُبيرة، عن أبي تَميم [1] الجَيْشاني، عن عمر بن الخطاب، أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قال: "لو أنكم توكَّلتُم على الله حقَّ توكُّلِه، لَرزقَكم كما يرزُقُ الطيرَ، تغدو خِماصًا، وتَرُوحُ بِطانًا [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি তোমরা আল্লাহর উপর যথাযথভাবে ভরসা (তাওয়াক্কুল) করতে, তবে তিনি তোমাদের এমনভাবে রিযিক দিতেন, যেমনভাবে তিনি পাখিদের দেন। তারা সকালে খালি পেটে বের হয় এবং সন্ধ্যায় ভরা পেটে ফিরে আসে।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: تميمة. الحسين، والتصويب من "تاريخ نيسابور" للحاكم نفسه كما في "تلخيصه" للخليفة النيسابوري ص 85، ومن "تاريخ الإسلام" للذهبي 7/ 788.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل بكر بن عمرو - وهو المعافري - وقد توبع.حيوة: هو ابن شريح المصري، وأبو تميم الجيشاني هو عبد الله بن مالك بن أبي الأسحم.وأخرجه أحمد 1 / (205)، وابن حبان (730) من طريق أبي عبد الرحمن عبد الله بن يزيد المقرئ، بهذا الإسناد.وأخرجه الترمذي (2344)، والنسائي (11805) من طريق عبد الله بن المبارك، عن حيوة بن شريح، به. وقال الترمذي حديث حسن صحيح، لا نعرفه إلَّا من هذا الوجه.وأخرجه أحمد (370) و (373)، وابن ماجه (4164) من طريق ابن لهيعة، عن عبد الله بن هُبيرة به. الحسين، والتصويب من "تاريخ نيسابور" للحاكم نفسه كما في "تلخيصه" للخليفة النيسابوري ص 85، ومن "تاريخ الإسلام" للذهبي 7/ 788.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8093)


8093 - حدثنا أبو علي الحسن بن الحسين بن محمد [1] القارئ، حدثني خالي محمد بن أشرَسَ السُّلَمي، حدثنا عبد الصمد بن حسّان، حدثنا سفيان الثَّوري، حدثني أبو سَلَمة الخُراساني، عن الربيع بن أنس، عن أبي العاليَة، عن أُبيِّ بن كعب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "بَشِّرْ أُمتي بالسَّنَاءِ والرِّفعة والتمكينِ في البلاد ما لم يَطلُبوا الدُّنيا بعملِ الآخرة [فمن طلبَ الدُّنيا بعملِ الآخرةِ لم يكُنْ له في الآخرة من] [2] نصيبٍ" [3].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার উম্মতকে সুসংবাদ দাও মহিমা, উচ্চ মর্যাদা এবং দেশের মধ্যে কর্তৃত্বের, যতক্ষণ পর্যন্ত না তারা আখেরাতের আমল দ্বারা দুনিয়াকে কামনা করে। সুতরাং, যে ব্যক্তি আখেরাতের আমল দ্বারা দুনিয়াকে কামনা করবে, আখেরাতে তার কোনোই অংশ থাকবে না।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] انقلب اسم الحسن بن الحسين بن محمد في النسخ الخطية إلى: الحسن بن محمد بن الحسين، والتصويب من "تاريخ نيسابور" للحاكم نفسه كما في "تلخيصه" للخليفة النيسابوري ص 85، ومن "تاريخ الإسلام" للذهبي 7/ 788.



[2] ما بين المعقوفين سقط من النسخ الخطية، وأثبتناه من "تلخيص الذهبي" ومن مصادر التخريج.



8093 [3] - حديث قوي، وهذا إسناد ضعيف من أجل محمد بن أشرس السلمي، وقد توبع. وسلف برقم (8059).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8094)


8094 - أخبرنا عبيد الله بن محمد البَلْخي التاجر ببغداد، حدثنا أبو إسماعيل محمد بن إسماعيل، حدثنا أبو صالح، حدثنا معاوية بن صالح، أنَّ عبد الرحمن بن جُبَير بن نُفَير حدَّثه عن أبيه، عن كعب بن عِيَاض قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إنَّ لكلّ أمةٍ فتنةً، وإن فتنةً أُمّتي المالُ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




কাআব ইবনে ইয়ায (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই প্রত্যেক উম্মতের জন্য একটি ফিতনা (পরীক্ষা) রয়েছে। আর আমার উম্মতের ফিতনা হলো সম্পদ।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل أبي صالح: وهو عبد الله بن صالح المصري كاتب الليث، وقد توبع محمد بن إسماعيل: هو ابن يوسف السُّلمي، ومعاوية بن صالح: هو ابن حُدير الحمصي.وأخرجه أحمد 22/ (17471)، والترمذي (2336)، والنسائي (11795)، وابن حبان (3223) من طريق الليث بن سعد، عن معاوية بن صالح بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن صحيح غريب، إنما نعرفه من حديث معاوية بن صالح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8095)


8095 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ العَدْل، حدثنا علي بن الحسين بن الجُنَيد، حدثنا أبو مَعمَر، حدثنا إسماعيل بن جعفر عن عمرو مولى المُطَّلِب، عن المطَّلِب بن حَنْطَب، عن أبي موسى الأشعري، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "مَن أحبَّ دُنياه أضرَّ بآخرتِه، ومَن أحبَّ آخرتَه أضرَّ بدُنياه، فآثِروا ما يَبقَى على ما يَفنَى" [1].هذا حديث صحيح.




আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি তার দুনিয়াকে ভালোবাসে, সে তার আখিরাতের ক্ষতি করে। আর যে ব্যক্তি তার আখিরাতকে ভালোবাসে, সে তার দুনিয়ার ক্ষতি করে। অতএব, তোমরা নশ্বর বস্তুর উপর চিরস্থায়ী বস্তুকে অগ্রাধিকার দাও।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لانقطاعه المطّلب بن عبد الله لم يسمع من أبي موسى الأشعري. أبو معمر: هو إسماعيل بن إبراهيم بن معمر الهُذلي، وإسماعيل بن جعفر: هو ابن أبي كثير الأنصاري، وعمرو مولى المطلب هو عمرو بن أبي عمرو ميسرة.وأخرجه أحمد 32 / (19697) عن سليمان بن داود عن إسماعيل بن جعفر، بهذا الإسناد. وانظر (8050). وسلف بنحوه برقم (6653) من طريق أبي إسحاق السبيعي عن المستورد بن شدّاد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8096)


8096 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا حامد بن محمود المُقرئ، حدثنا عبد الرحمن بن عبد الله بن سعد، حدثنا عمرو بن [أبي] [1] قيس، عن إبراهيم بن مُهاجِر، عن قيس بن أبي حازم، عن المُستورِد قال: كُنَّا عند النبي صلى الله عليه وسلم، فتذاكروا الدُّنيا والآخرةَ، فقال بعضُهم: إنما الدنيا بلاغٌ للآخرة، وفيها العملُ وفيها الصلاةُ وفيها الزَّكاة، وقالت طائفةٌ منهم: الآخرةُ فيها الجنَّةُ، وقالوا ما شاءَ الله، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ما الدُّنيا في الآخرة إِلَّا كما يمشي أحدُكم إلى اليَمِّ فأدخل إصبَعَه فيه، فما خرجَ منه فهي الدُّنيا" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




মুসতাওরিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম। তখন তাঁরা দুনিয়া ও আখিরাত নিয়ে আলোচনা করছিলেন। তাঁদের কেউ কেউ বললেন, দুনিয়া তো কেবল আখিরাতের পুঁজি। এর মধ্যেই আমল, সালাত ও যাকাত রয়েছে। আর তাঁদের অন্য একটি দল বলল, আখিরাতে রয়েছে জান্নাত। তারা আল্লাহ যা চেয়েছেন তাই বলল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আখিরাতের তুলনায় দুনিয়া এমন ছাড়া আর কিছুই নয়, যেমন তোমাদের কেউ সমুদ্রের কাছে গিয়ে তাতে তার আঙ্গুল প্রবেশ করালো। এরপর আঙ্গুলে যা উঠে এলো, সেটাই হলো দুনিয়া।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] سقط من النسخ الخطية. وسلف بنحوه برقم (6653) من طريق أبي إسحاق السبيعي عن المستورد بن شدّاد.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل إبراهيم بن مهاجر، وقد توبع.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (837)، وفي "الزهد" (160)، والطبراني في "الكبير" 20/ (717)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (9976) من طريق محمد بن سعيد بن سابق، عن عمرو بن أبي قيس، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه أحمد 29/ (18008) و (18009) و (18012) و (18014)، ومسلم (2858)، وابن ماجه (4108)، والترمذي (2323)، والنسائي (11797)، وابن حبان (4330) و (6159) من طريق إسماعيل بن أبي خالد، وأحمد (18020) و (18021) من طريق مجالد بن سعيد، كلاهما عن قيس بن أبي حازم به. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح. وسلف بنحوه برقم (6653) من طريق أبي إسحاق السبيعي عن المستورد بن شدّاد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8097)


8097 - أخبرنا عبد الله بن الحسين القاضي بمَرْو، حدثنا الحارث بن أبي أسامة، حدثنا هاشم بن القاسم، حدثنا أبو عَقِيل الثّقفي عبد الله بن عقَيل [عن عبد الله بن يزيد] [1] عن رَبيعة بن يزيد وعطيّة بن قيس، عن عطيّة بن سعد - وكان من أصحابِ رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ الرَّجل لا يكونُ من المتَّقِين حتى يدعَ ما لا بأس به حَذَرًا لِمَا به بأسٌ" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আতিয়্যাহ ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই কোনো ব্যক্তি মুত্তাকীদের অন্তর্ভুক্ত হতে পারবে না, যতক্ষণ না সে মন্দ বা ক্ষতিকর বিষয় থেকে বাঁচার জন্য এমন কিছুও পরিহার করে যাতে কোনো দোষ নেই।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] ما بين المعقوفين لم يرد في النسخ الخطية، وأثبتناه من المصادر التي خرَّجت الحديث. ومن طريقه ابن الجوزي في "العلل المتناهية" (1480). وقال ابن الجوزي عقبه: تفرَّد به القاسم بن بهرام قال ابن حبَّان لا يجوزُ الاحتجاجُ به بحال قلنا: وقال الدارقطني: متروك، وأورده ابن عدي في "الكامل" 7/ 294 مكنّى بأبي همدان، فقال: كذاب. وفي سنده أيضًا من لم نعرفه.



[2] إسناده ضعيف لجهالة عبد الله بن يزيد وهو الدمشقي.وأخرجه ابن ماجه (4215)، والترمذي (2451) من طريقين عن هاشم بن القاسم، بهذا الإسناد.وقال الترمذي: حسن غريب لا نعرفه إلَّا من هذا الوجه. ومن طريقه ابن الجوزي في "العلل المتناهية" (1480). وقال ابن الجوزي عقبه: تفرَّد به القاسم بن بهرام قال ابن حبَّان لا يجوزُ الاحتجاجُ به بحال قلنا: وقال الدارقطني: متروك، وأورده ابن عدي في "الكامل" 7/ 294 مكنّى بأبي همدان، فقال: كذاب. وفي سنده أيضًا من لم نعرفه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8098)


8098 - أخبرنا الحسن بن حَلِيم المروزي، أخبرنا أبو المُوجِّه، أخبرنا عَبْدان، أخبرنا عبد الله، أخبرني يحيى بن أيوب، عن بكر بن عمرو، عن عبد الرحمن بن زياد، عن أبي عبد الرحمن الحُبُلي، عن عبد الله بن عمرو، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم قال: "تخفةُ المؤمنِ الموت" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মুমিনের উপহার হলো মৃত্যু।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف من أجل عبد الرحمن بن زياد - وهو ابن أنعم الإفريقي وبه أعلَّه الذهبي في "التلخيص". أبو الموجِّه: هو محمد بن عمرو الفَزَاري، وعَبْدان: هو عبد الله بن عثمان المروزي، وعبدان لقبه، وعبد الله: هو ابن المبارك.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (9730) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وهو في "الزهد" لابن المبارك (599)، ومن طريقه أخرجه عبد بن حميد (347)، وأبو نعيم في "الحلية" 8/ 185، وأبو القاسم بن بشران في "الأمالي" (1482)، والقضاعي في "مسند الشهاب" (150)، والبيهقي في "الشعب" (9418)، وأبو محمد البغوي في "شرح السنة" (1454). وقال أبو نعيم: غريب من حديث عبد الله بن عمرو، لم يروه عنه إلَّا الحبلي.وفي الباب عن جابر بن عبد الله عند الدارقطني كما في "الغرائب الملتقطة" لابن حجر (2607) ومن طريقه ابن الجوزي في "العلل المتناهية" (1480). وقال ابن الجوزي عقبه: تفرَّد به القاسم بن بهرام قال ابن حبَّان لا يجوزُ الاحتجاجُ به بحال قلنا: وقال الدارقطني: متروك، وأورده ابن عدي في "الكامل" 7/ 294 مكنّى بأبي همدان، فقال: كذاب. وفي سنده أيضًا من لم نعرفه.