হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8139)


8139 - حدثنا أبو أحمد بكر بن محمد بن حَمْدان، حدثنا عبد الصمد بن الفضل، حدثنا مَكيُّ بن إبراهيم، حدثنا عبد الواحد بن زيد، عن عُبَادة بن نُسَيّ قال: دخلتُ على شداد بن أوس في مُصلَّاه وهو يبكي، فقلت: يا أبا عبد الرحمن، ما الذي أبكاك؟ قال: حديثٌ سمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم، قلت: وما هو؟ قال: بينما أنا عندَ رسول الله صلى الله عليه وسلم إذ رأيتُ بوجهِه أمرًا ساءَني، فقلتُ: بأبي وأمِّي يا رسولَ الله، ما الذي أَرى بوجهك؟ قال: "أمرُ أتخوَّفُه على أُمَّتي مِن بعدي" قلت: وما هو؟ قال: "الشَّركُ وشَهوةٌ خفيَّة" قال: قلتُ: يا رسول الله، تُشْرِكُ أمتك من بعدك؟! قال: "يا شَدَّادُ، أَمَا إِنهم لا يَعبُدونَ شمسًا ولا وَثَنًا ولا حجرًا [1]، ولكن يُراؤُون الناسَ بأعمالهم" قلتُ: يا رسولَ الله، الرَّياءُ شِركٌ هو؟ قال: "نعم" قلت: فما الشَّهوة الخفيَّة؟ قال: "يُصبحُ أحدُهم صائمًا فتَعرِضُ له شهوةٌ من شَهَوات الدنيا فيُفطِرُ" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




শদ্দাদ ইবনে আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উবাদাহ ইবনে নুসাই বলেন: আমি শদ্দাদ ইবনে আওসের কাছে তাঁর সালাতের স্থানে প্রবেশ করলাম, তখন তিনি কাঁদছিলেন। আমি বললাম: হে আবূ আবদুর রহমান, কিসে আপনাকে কাঁদাচ্ছে? তিনি বললেন: একটি হাদীস যা আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে শুনেছি। আমি বললাম: সেটি কী? তিনি বললেন: আমি যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম, তখন আমি তাঁর চেহারায় এমন কিছু দেখলাম যা আমাকে বিষণ্ণ করে তুলল। আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার বাবা-মা আপনার জন্য উৎসর্গ হোন! আপনার চেহারায় আমি কী দেখছি? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এমন একটি বিষয় যা আমার পরে আমার উম্মতের জন্য আমি ভয় করি।" আমি বললাম: সেটি কী? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "শিরক এবং গোপন কামনা (শাহওয়াতুল খফিয়্যাহ)।" বর্ণনাকারী বললেন: আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনার পরে কি আপনার উম্মত শিরক করবে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে শদ্দাদ! তারা সূর্য, মূর্তি বা পাথর পূজা করবে না, তবে তারা মানুষের কাছে তাদের আমলের প্রদর্শন করবে (রিয়া করবে)।" আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! রিয়া কি শিরক? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ।" আমি বললাম: গোপন কামনা কী? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাদের মধ্যে কেউ ভোরে রোযা শুরু করে। অতঃপর তার কাছে দুনিয়ার কোনো কামনা উপস্থিত হয়, তখন সে রোযা ভেঙে ফেলে।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في (ب): شمسًا ولا وثنًا ولا قمرًا.



[2] إسناده ضعيف جدًّا، عبد الواحد بن زيد - وهو أبو عبيدة البصري القاصّ - قال البخاري: تركوه، وقال ابن معين ليس بشيء، وقال الفلاس: كان قاصًا متروك الحديث، وقال النسائي: ليس بثقة، وقال ابن عبد البر: أجمعوا على ضعفه، وبه أعلّه الذهبي في "التلخيص" فقال: عبد الواحد متروك. وقد روي بعضُ هذا الخبر موقوفًا، وهو الصحيح كما سيأتي بيانه.وأخرجه أحمد 28/ (17120) عن زيد بن الحباب، عن عبد الواحد بن زياد، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن ماجه (4205) من طريق الحسن بن ذكوان، عن عبادة بن نسي، عن شداد بن أوس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إن أخوف ما أتخوف على أمتي: الإشراك بالله، أما إني لست أقول: يعبدون شمسًا ولا قمرًا ولا وثنًا، ولكن أعمالًا لغير الله، وشهوة خفية". وإسناده ضعيف جدًّا، فيه روَّاد بن الجرَّاح اختلط فتُرك، وشيخه عامر بن عبد الله مجهول، والحسن بن ذكوان فيه ضعف أيضًا.وأخرجه أبو نعيم في "الحلية" 1/ 268 من طريق عطاء بن عجلان، عن خالد بن محمود بن الربيع، عن عبادة بن نسي بنحوه. وعطاء بن عجلان متروك متهم، وخالد بن محمود لم نقف له على ترجمة.وأخرج حسين المروزي في زوائده على "الزهد" لابن المبارك (1114)، والطبري في مسند عمر من "تهذيب الآثار" (1121 - 1123)، وابن زَبْر الرَّبَعي في "وصايا العلماء" ص 72، وأبو نُعيم في "الحلية" 1/ 268، والبيهقي في "شعب الإيمان" (6409) و (6410)، وابن عبد البر في "جامع بيان العلم" (1203) من طريق ابن شِهاب الزهري، والطبري (1124)، وابن بطة في "الإبانة الكبرى" 4/ 167 - 168، وأبو نعيم 1/ 269 من طريق رجاء بن حيوة، كلاهما عن محمود بن الربيع، عن شداد بن أوس قال: يا نعايا العرب، يا نعايا العرب، إني أخاف عليكم - هذه الأمّة - الرّياءَ والشهوةَ الخفية. هذا لفظ رواية الزهري، وسندها صحيح.وأخرج المعافى بن عمران في "الزهد" (200) من طريق شريح بن عبيد الحضرمي، عن شداد بن أوس قال: مما أخاف عليكم شهوة خفية، ونعمة ملهية، وذلك حين تشبعون من العمل، وتجوعون من العلم. ورجاله لا بأس بهم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8140)


8140 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن علي الشَّيباني بالكوفة، حدثنا أحمد بن حازم الغِفاري، حدثنا موسى بن داود الضَّبّي، حدثنا يعقوب بن إبراهيم، عن يحيى بن سعيد، عن أبي مسلم الخَوْلاني، عن عُبيد بن عُمير، عن أبي ذرّ قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم: "القبورُ تذكِّرُ زائريها الآخرةَ، واغسِلِ الموتَى، فإِنَّ مُعالجةَ جسدٍ خاوٍ موعظةٌ بليغةٌ، وصلِّ على الجنائز لعلَّ ذلك أن يَحزُنَك، فإنَّ الحزينَ في ظلِّ الله يومَ القيامة" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বলেছেন: "কবরসমূহ তাদের জিয়ারতকারীদেরকে আখেরাতের কথা স্মরণ করিয়ে দেয়। তোমরা মৃতদেরকে গোসল করাও, কেননা একটি শূন্য দেহকে পরিচালনা করা একটি গভীর উপদেশ। আর তোমরা জানাজার সালাত আদায় করো, সম্ভবত তা তোমাদেরকে শোকাহত করবে। কেননা যে ব্যক্তি শোকাহত (অর্থাৎ আখেরাতের ভয়ে বিষণ্ণ), সে কিয়ামতের দিন আল্লাহর ছায়াতলে থাকবে।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف لانقطاعه، كما قال الذهبي، ومتنه منكر كما قال البيهقي. يحيى بن سعيد لم يدرك أبا مسلم الخولاني، بينهما رجل مبهم كما سبق بيانه برقم (1411).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8141)


8141 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا أحمد بن بشر بن سعد المَرْثَدي، حدثنا يحيى بن مَعِين، حدثنا هشام بن يوسف، حدثنا عبد الله بن بَحِير، قال: سمعت هانئًا مَولى عثمان بن عفّان [يقول: رأيتُ عثمانَ] [1] واقفًا على قبرٍ بكَي حتى يَبُلَّ لحيتَه، فقيل له: تذكرُ الجنَّةَ والنارَ ولا تبكي، وتبكي من هذا؟ قال: إنِّي سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "القبرُ أول منازلِ الآخرة، فإنْ نَجَا منه فما بعدَه أيسرُ منه، وإن لم يَنجُ منه فما بعدَه أشدُّ منه".وسمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "ما رأيتُ منظرًا [2] إِلَّا والقبرُ أفظَعُ منه" [3]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.




উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে (একবার) একটি কবরের পাশে দাঁড়িয়ে কাঁদতে দেখা গেল। তিনি এত কাঁদলেন যে তার দাড়ি ভিজে গেল। তাকে জিজ্ঞাসা করা হলো: আপনি জান্নাত ও জাহান্নামের কথা মনে করেও কাঁদেন না, অথচ (শুধুমাত্র) এর জন্য কাঁদছেন? তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “কবর হলো আখেরাতের প্রথম মনযিল (ধাপ)। যদি কেউ তা থেকে মুক্তি পায়, তবে এরপর যা আসবে তা তার জন্য সহজ হবে। আর যদি কেউ তা থেকে মুক্তি না পায়, তবে এরপর যা আসবে তা হবে এর চেয়েও কঠিন।” এবং আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আরো বলতে শুনেছি: “আমি এমন কোনো দৃশ্য দেখিনি, যা কবরের চেয়েও ভয়াবহ নয়।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] ما بين المعقوفين ليس في النسخ الخطية، وأُثبت على هامش (ك) بخط مغاير. وأثبتناه من "تلخيص المستدرك".



[2] في (ك) و (م): منكرًا.



8141 [3] - إسناده حسن.وأخرجه ابن ماجه (4267)، والترمذي (2308)، وعبد الله بن أحمد في زياداته على "المسند" 1/ (454) من طريق يحيى بن معين، عن هشام بن يوسف، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن غريب، لا نعرفه إلَّا من حديث هشام بن يوسف. وسلف عند المصنف برقم (1389).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8142)


8142 - حدثنا أبو بكر محمد بن جعفر بن يزيد القارئ الأَدَمي ببغداد، حدثنا أبو جعفر أحمد بن عُبيد بن ناصح النَّحْوي، حدثنا محمد بن مصعب القَرْقَساني، حدثني عبد الرحمن بن عمرو الأوزاعي، حدثني مكحول، عن زياد بن جارية، عن حَبيب بن مَسلَمة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم دعا إلى القِصَاص من نفسِه في خَدْشَةٍ خَدَشَهَا أعرابيًا لم يتَعمَّدْه، فأتاه جبريلُ عليه السلام فقال: يا محمَّدُ، إِنَّ الله لم يَبْعَثْكَ جبّارًا ولا متكبِّرًا. فدعا النبي صلى الله عليه وسلم الأعرابيَّ، فقال: "اقتص منِّي"، فقال الأعرابيُّ: قد أحللتُك بأبي أنت وأميِّ، وما كنتُ لأفعلَ ذلك أبدًا ولو أتيتَ على نفسي. فدعا له بخيرٍ [1].قال الحاكم: تفرَّد به أحمدُ بن عبيد عن محمد بن مصعب، ومحمدُ بن مصعب ثقةٌ.




হাবীব ইবনে মাসলামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর নিজের উপর কিসাস (প্রতিশোধ) নেওয়ার আহ্বান জানালেন, একটি আঁচড়ের কারণে যা তিনি অনিচ্ছাকৃতভাবে এক বেদুঈনের গায়ে লাগিয়েছিলেন। অতঃপর তাঁর কাছে জিবরীল (আঃ) এলেন এবং বললেন, ‘হে মুহাম্মাদ, আল্লাহ আপনাকে দাম্ভিক বা অহংকারী রূপে পাঠাননি।’ এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই বেদুঈনকে ডাকলেন এবং বললেন, ‘আমার থেকে কিসাস নাও।’ বেদুঈনটি বলল, ‘আমার পিতা-মাতা আপনার উপর উৎসর্গ হোক! আমি আপনাকে ক্ষমা করে দিলাম। আমি কখনই এমন কাজ করতে পারতাম না, যদিও আপনি আপনার নিজের উপর এই প্রতিশোধ নিতেন।’ অতঃপর তিনি (নবী) তার জন্য কল্যাণের দোয়া করলেন।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف، أحمد بن عبيد بن ناصح، قال الذهبي في "الميزان": روى عن محمد بن مصعب موعظة الأوزاعي للمنصور، وفيها مناكير. قلنا: وحديثنا هذا منها، ومحمد بن مصعب القرقساني ضعيف أيضًا، وبهما أعلّه الذهبي في "التلخيص"، وزياد بن جارية وثقه النسائي وجهّله أبو حاتم.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (7024)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 35/ 213 - 216 من طريق أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد مطولًا ضمن قصة.وأخرجه مطولًا كذلك أبو نعيم في "الحلية" 6/ 137 من طريق أحمد بن يزيد، عن محمد القرقساني، به.وانظر في الاقتصاص حديث أُسيد بن حضير السالف برقم (5344). أخرج الحديث غير المصنف.وفي الباب عن عبد الله بن المغفل عند الترمذي (2350)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (1471)، وإسناده ضعيف.وعن أبي هريرة عند ابن ماجه (2448)، وفيه عبد الله بن سعيد بن أبي سعيد المقبري، وهو متروك.وعن أنس بن مالك عند البزار (3595)، والبيهقي في "الشعب" (1470)، وفي إسناده بكر بن سليم الصواف، وقد تفرد به، وفيه كلام.وعن ابن عباس عند البيهقي في "السنن" 6/ 119، وفي إسناده الحسين بن قيس الرحبي، ولقبه حنش، وهو متروك.وعن أبي سعيد الخُدري عند أحمد 17/ (11379)، وإسناده ضعيف لإرساله. وانظر التعليق عليه هناك.قوله: "تجفافًا" بكسر الفوقية وسكون الجيم، قال صاحب "النهاية في غريب الحديث" 1/ 182: ما يجلَّل به الفرس من سلاح وآلة تَقيهِ الجراح، وفرس مجفَّف: عليه تجفاف، والجمع: التجافيف، والتاء فيه زائدة.قال علي القاري في "مرقاة المفاتيح" 8/ 3287 كنَّى بالتجفاف عن الصبر لأنه يستر الفقر، كما يستر التجفاف البدن عن الضر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8143)


8143 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ العَدْل، حدثنا محمد بن غالب، حدثنا عفّان، حدثنا همَّام، حدثني إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، عن أبيه، عن أبي ذرٍّ: أنه أتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقال: إِنِّي أحبُّكم أهلَ البيت، فقال له النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "اللهِ؟ " قال: آلله، قال: "فأعِدَّ للفقر تِجْفافًا، فإنَّ الفقر أسرعُ إلى من يُحبُّنا من السَّيلِ من أعلى الأكَمَةِ إلى أسفلِها" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং বললেন: "নিশ্চয়ই আমি আপনাদেরকে, অর্থাৎ আহলে বাইতকে ভালোবাসি।" তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "(বলুন,) আল্লাহর কসম?" তিনি বললেন: "আল্লাহর কসম!" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে দারিদ্র্যের জন্য বর্ম (ঢাল) প্রস্তুত রাখো। কারণ, যে ব্যক্তি আমাদের ভালোবাসে, দারিদ্র্য তার দিকে সেই ঢলের চেয়েও দ্রুত ধাবিত হয় যা উচ্চ টিলা বা উঁচু স্থান থেকে নিম্নভূমির দিকে নেমে আসে।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] رجاله ثقات غير أنه لا يعرف لعبد الله بن أبي طلحة رواية عن أبي ذر. ولم نقف على أحد أخرج الحديث غير المصنف.وفي الباب عن عبد الله بن المغفل عند الترمذي (2350)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (1471)، وإسناده ضعيف.وعن أبي هريرة عند ابن ماجه (2448)، وفيه عبد الله بن سعيد بن أبي سعيد المقبري، وهو متروك.وعن أنس بن مالك عند البزار (3595)، والبيهقي في "الشعب" (1470)، وفي إسناده بكر بن سليم الصواف، وقد تفرد به، وفيه كلام.وعن ابن عباس عند البيهقي في "السنن" 6/ 119، وفي إسناده الحسين بن قيس الرحبي، ولقبه حنش، وهو متروك.وعن أبي سعيد الخُدري عند أحمد 17/ (11379)، وإسناده ضعيف لإرساله. وانظر التعليق عليه هناك.قوله: "تجفافًا" بكسر الفوقية وسكون الجيم، قال صاحب "النهاية في غريب الحديث" 1/ 182: ما يجلَّل به الفرس من سلاح وآلة تَقيهِ الجراح، وفرس مجفَّف: عليه تجفاف، والجمع: التجافيف، والتاء فيه زائدة.قال علي القاري في "مرقاة المفاتيح" 8/ 3287 كنَّى بالتجفاف عن الصبر لأنه يستر الفقر، كما يستر التجفاف البدن عن الضر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8144)


8144 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عوف، حدثنا أبو المغيرة، حدثنا سليمان بن سُليم أبو سَلَمة الكِناني، حدثني يحيى بن جابر الطائي، قال: سمعتُ المِقْدام بن مَعْدِي كَرِبَ الكِندي يقول: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "ما مَلأَ آدميٌّ وعاءً شرًا من بَطْنِه حَسْبُ ابن آدمَ ثلاثُ أُكلاتٍ يُقِمَنَ صُلْبَه، فإن كان لا محالةَ، فثُلثٌ طعامٌ، وثُلثٌ شرابٌ، وثُلثٌ لنَفَسِه" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




মিকদাম ইবনু মা'দী কারিব আল-কিন্দি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: কোনো মানুষ তার পেটের চেয়ে খারাপ কোনো পাত্রকে পূর্ণ করেনি। আদম সন্তানের জন্য এমন কয়েকটি লোকমা (গ্রাস) যথেষ্ট যা তার মেরুদণ্ড সোজা রাখে। আর যদি তাকে একান্তই (বেশি) খেতে হয়, তবে এক তৃতীয়াংশ খাদ্য, এক তৃতীয়াংশ পানীয় এবং এক তৃতীয়াংশ নিজের (শ্বাস-প্রশ্বাসের) জন্য রাখবে।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح. محمد بن عوف هو ابن سفيان الطائي، وشيخه أبو المغيرة: هو عبد القدوس بن الحجاج الخولاني.وأخرجه أحمد 28 / (17186) عن أبي المغيرة، بهذا الإسناد.وأخرجه الترمذي (2380)، والنسائي (6738) من طريقين عن أبي سلمة سليمان بن سليم، عن يحيى بن جابر، به. وقرن الترمذي بأبي سلمة حبيب بن صالح، وقال: حسن صحيح.وسلف عند المصنف برقم (7316)









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8145)


8145 - حدثنا أبو بكر محمد بن داود الزاهد، حدثنا الفضل بن الحُبَاب إملاءً من أصله العَتيق، وأنا سألتُه، حدثنا علي بن عبد الله بن جعفر المَدِيني، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا أزهر بن سِنان أبو خالد مولًى لقريش، قال: سمعتُ محمد بن واسع الأزدي، يقول: دخلتُ على بلال بن أبي بُرْدة بن أبي موسى، فقلتُ: يا بلال، إنَّ أباك حدثني عن جدِّك عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال: " [إِنَّ] في جهنَّم واديًا، وفي الوادي بئرٌ يقال لها: هَبْهَبُ [1]، حقٌّ على الله أن يُسكِنَها كلَّ جبّار"، فاتَّقِ لا تَسكُنْها [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.




আবু মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুহাম্মদ ইবনে ওয়াসি' আল-আযদী বলেন: আমি বিলাল ইবনে আবী বুরদাহ ইবনে আবী মূসার কাছে গেলাম এবং বললাম: "হে বিলাল, আপনার পিতা আপনার দাদার সূত্রে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে আমার কাছে বর্ণনা করেছেন যে তিনি বলেছেন: 'নিশ্চয়ই জাহান্নামের মধ্যে একটি উপত্যকা রয়েছে, এবং সেই উপত্যকার মধ্যে একটি কূপ রয়েছে, যার নাম 'হাবহাব'। প্রতিটি অহংকারী ও দাম্ভিক ব্যক্তিকে সেখানে বাসস্থান দেওয়া আল্লাহর জন্য আবশ্যক।' সুতরাং আপনি আল্লাহকে ভয় করুন, যেন আপনি তাতে বসবাস না করেন।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في النسخ رسمت: هب هب، والمثبت من الرواية الآتية عند المصنف (8980)، وهو الموافق لما في مصادر التخريج.



[2] إسناده ضعيف من أجل أزهر بن سنان.وأخرجه ابن أبي شيبة 13/ 165، والدارمي (2858)، وابن أبي الدنيا في "صفة النار" (35) وفي "التواضع والخمول" (225)، ووكيع في "أخبار القضاة" 2/ 25، وأبو يعلى (7249)، والعقيلي في "الضعفاء" (187)، وابن حبان في "المجروحين" 1/ 178، وابن عدي في "الكامل" 1/ 430، وأبو بكر الإسماعيلي في "المعجم" (261)، وأبو نعيم في "الحلية" 2/ 355، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 10/ 517 من طريق يزيد بن هارون، بهذا الإسناد. وقال ابن حبان: هذا متنٌ لا أصل له. وقال أبو نعيم: تفرَّد به أزهر عن محمد.وسيأتي الحديث عند المصنف من طريق يزيد بن هارون برقم (8980).وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (3548)، والبيهقي في "البعث والنشور" (479)، وابن عساكر 14/ 303 من طريق سعيد بن سليمان، عن أزهر بن سنان به. وقال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن محمد بن واسع إلَّا أزهر بن سنان، ولا يروى عن أبي موسى إلَّا بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8146)


8146 - أخبرنا أبو بكر بن أبي نصر المَروَزي، حدثنا محمد بن غالب، حدثنا عمر بن عبد الوهاب الرِّيَاحي، عن الحجَّاج الأسود، عن محمد بن واسع، عن أبي صالح، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أحِبُّوا الفقراءَ وجالِسُوهم، وأحِبَّ العربَ من كلِّ قلبِك، ولْيرُدَّك عن الناس ما تعلمُ من قلبِك" [1].هذا حديث صحيح الإسناد إن كان عمر الرِّياحي سمع من حجّاج الأسود.آخر كتاب الرقاق ‌‌كتاب الفرائضبسم الله الرحمن الرحيم




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা দরিদ্রদের ভালোবাসো এবং তাদের সাথে ওঠাবসা করো; আর আরবদের অন্তর দিয়ে ভালোবাসো, এবং তোমার অন্তর থেকে তুমি যা জানো, তা যেন তোমাকে অন্যদের থেকে ফিরিয়ে রাখে।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف لانقطاعه، فإنَّ بين وفاتَي عمر الرياحي والحجاج الأسود - وهو ابن أبي زياد - ما يقرب من 76 سنة، فيبعد أن يكون عمر الرياحي سمعه منه، وشكُّ الحاكم في سماعه منه في محلِّه. ثم إنَّ متن الحديث فيه نكارة ليس عليه نور النبوّة. ولم نقف على من أخرجه غير المصنف.وفي باب حب العرب انظر ما سلف برقمي (7129) و (7174) و (7175).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8147)


8147 - حدثنا أبو بكر أحمد بن إسحاق، حدثنا بشر بن موسى الأسدي، حدثنا إسماعيل بن أبي أُوَيس، حدثني حفص بن عمر بن أبي العطَّاف مولى بني سَهْم، عن أبي الزِّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة [1]، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا أبا هريرةَ، تَعلَّمُوا الفرائضَ، وعلِّموه، فإنه نصفُ العلم، وإنَّه يُنسَى، وهو أول ما يُنزَعُ من أُمَّتي" [2].




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “হে আবূ হুরায়রা, তোমরা ফারায়েয (উত্তরাধিকার আইন) শিক্ষা করো এবং তা শিক্ষা দাও, কেননা তা হলো জ্ঞানের অর্ধেক, আর নিশ্চয়ই তা ভুলে যাওয়া হবে, এবং এটিই সর্বপ্রথম আমার উম্মত থেকে উঠিয়ে নেওয়া হবে।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] سقط ذكر أبي هريرة من (ز) و (ب).



[2] إسناده ضعيف جدًّا من أجل حفص بن عمر بن أبي العطّاف فهو متروك الحديث، وقال البخاري في "التاريخ الأوسط" 4/ 806: حفص بن عمر بن أبي عطاف المدني منكر الحديث، روى عن أبي الزناد عن الأعرج عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم في تعليم الفرائض، وقال مرةً: عن أبي الزناد عن المقبري عن أبي هريرة، ولا يصح. وقال العقيلي في "الضعفاء" بعدما أخرجه في ترجمة حفص المذكور (353): لا يتابع عليه، لا يعرف إلَّا به. وقال ابن عدي في "الكامل" 3/ 383 بعدما أخرجه في ترجمته أيضًا: حديثه كما ذكره البخاري منكر الحديث. وبه أعلّه الذهبي في "التلخيص" فقال عنه: واهٍ بمرة.وأخرجه ابن ماجه (2719) عن إبراهيم بن المنذر الحزامي عن حفص بن عمر بن أبي العطاف، بهذا الإسناد.وأخرجه الترمذي (2091) من طريق محمد بن القاسم الأسدي، عن الفضل بن دلهم، عن عوف بن أبي جميلة الأعرابي، عن شهر بن حوشب، عن أبي هريرة. وهذا إسناد ضعيف جدًّا، محمد بن القاسم الأسدي متَّهم. هذا وقد اختُلف فيه على عوف بن أبي جميلة كما ستأتي الإشارة إليه في الحديثين الآتيين (8149) و (8150)، ولهذا قال الترمذي: هذا حديث فيه اضطراب.وفي الباب عن أبي بكرة عند الطبراني في "الأوسط" (4075)، وفي سنده ضعيف ومجهول.وعن أبي سعيد الخدري عند الدارقطني في "السنن" (4104)، وسنده ضعيف جدًّا لا يفرح به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8148)


8148 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحر بن نَصر، حدثنا عبد الله ابن وهب، أخبرني عبد الرحمن بن زياد بن أَنعُم المَعَافري، عن عبد الرحمن بن رافع التَّنُوخي، عن عبد الله بن عمرو بن العاص، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "العلمُ ثلاثةٌ، فما سوى ذلك فهو فَضْلٌ: آيةٌ مُحكَمةٌ، أو سُنَّةٌ قائمةٌ، أو فريضةٌ عادلة" [1].




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: জ্ঞান হলো তিন প্রকার, আর এর বাইরে যা কিছু আছে, তা হলো অতিরিক্ত (ঐচ্ছিক): সুপ্রতিষ্ঠিত আয়াত, অথবা প্রতিষ্ঠিত সুন্নাহ, অথবা ন্যায়সঙ্গত ফরয বিধান।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف لضعف عبد الرحمن بن زياد المعافري وعبد الرحمن بن رافع التنوخي وضعفه الذهبي في "التلخيص".وأخرجه أبو داود (2885) عن أحمد بن عمرو بن السرح، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن ماجه (54) من طريق رشدين بن سعد وجعفر بن عون، كلاهما عن عبد الرحمن بن زياد به. ورواه هَوذة بن خليفة كما عند المصنف (8150)، وأبي عمرو الداني في "الفتن" (261)، وابن عبد البر في "بيان فضل العلم" (1029)، والمزي في "تهذيب الكمال" 11/ 378 - 379 عن عوف، عن رجل، عن سليمان بن جابر، عن ابن مسعود.قال الدارقطني في "العلل" (726): والقول قول ابن المبارك ومن تابعه. يعني وجود واسطة بين عوف وسليمان.وشذَّ المثنى بن بكر العطار من بين أصحاب عوف، فرواه عنه قال: حدثنا سليمان الهجري، عن أبي الأحوص، عن ابن مسعود. فزاد فيه أبا الأحوص أخرجه من طريقه أبو يعلى (5028)، والبيهقي في "السنن" 6/ 208، وفي "الشعب" (1548). ورجَّح الدارقطني في "العلل" (2103) رواية الجماعة على روايته، فقال: والمرسل أصح. قلنا: والمثنى بن بكر اختلفوا فيه، فجعله بعضهم مجهولًا، وضعفه بعضهم، وفرّق أبو زرعة بينه وبين الذي يروي عنه المقدمي فجعله حسن الحديث، والله أعلم.وقد صحَّت رواية أبي الأحوص عن ابن مسعود لكن من قوله موقوفًا عليه، وسيأتي ذكرها عند الرواية (8152)، فانظرها.فائدة: حكم المزي في تحفة الأشراف 7/ 31 - 32 على حديث أبي أسامة بالوهم، فتعقّبه ابن حجر في "النكت الظراف" بقوله: قد تابع أبا أسامة عبدُ الله بنُ المبارك، وكفى به حافظًا، وأبو عبيدة الحدادُ وهوذةُ بن خليفة كلهم عن عوف، ووافق شريكًا على إسقاط الواسطة النَّضْرُ بن شميل عن عوف، فوضح أن الاختلاف فيه من عوف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8149)


8149 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبُوبي بمَرُو، حدثنا الفضل بن عبد الجبار، حدثنا النَّضْر بن شُمَيل، أخبرنا عوف بن أبي جَميلة، عن سليمان بن جابر الهَجَري، عن عبد الله بن مسعود قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "تَعلَّمُوا القرآن وعلِّمُوه الناسَ، وتَعلَّمُوا الفرائضَ وعلِّموه الناسَ، فإني امرُؤٌ مقبوضٌ، وإنَّ العلمَ سيُقبَضُ وتظهرُ الفِتنُ، حتى يَختلِفَ الاثنانِ في الفريضة، لا يَجِدانِ من يَقْضي بها" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وله عِلّة عن أبي بكر بن إسحاق عن بشر بن موسى عن هَوْذة بن خَليفة عن عوف:




আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা কুরআন শিক্ষা করো এবং তা মানুষকে শিক্ষা দাও। তোমরা ফারায়েজ (উত্তরাধিকার আইন) শিক্ষা করো এবং তা মানুষকে শিক্ষা দাও। কেননা আমি এমন এক ব্যক্তি, যাকে তুলে নেওয়া হবে (মৃত্যু হবে), এবং নিশ্চয়ই জ্ঞান তুলে নেওয়া হবে (বিলুপ্ত হবে) এবং ফিতনা প্রকাশ পাবে। এমনকি দুজন ব্যক্তি ফারায়েজের (উত্তরাধিকারের) কোনো বিষয়ে মতবিরোধ করলে তারা এমন কাউকে খুঁজে পাবে না যে এর বিচার করতে পারে।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف سليمان بن جابر الهجري مجهول لا يعرف، كما أنه لا يعرف له سماع من ابن مسعود. وقد اختلف فيه على عوف بن أبي جميلة - كما سيأتي - فمرة قال: عن سليمان بن جابر، ومرة قال عن رجل عن سليمان، ومرة قال: بلغني عن سليمان، ومرة قال: عمَّن حدّثه عن سليمان، ومرة قال: عن سليمان عن أبي الأحوص عن ابن مسعود، ولهذا قال الترمذي: هذا حديث فيه اضطراب. قلنا: وكيفما دار الإسناد فمداره على سليمان الهجري.فرواه النَّضرُ بن شميل كما في رواية المصنف هنا، وعند الشاشي في "مسنده" (842)، وعثمانُ بن الهيثم عند الدارمي (227)، وشريكٌ النخعي عند النسائي (6271)، والطبراني في "الأوسط" (5720)، وعمرُو بن حُمران عند الدارقطني (4103)، والواحدي في "الوسيط" (201)، أربعتهم عن عوف، عن سليمان بن جابر، عن ابن مسعود.ورواه ابن المبارك عند النسائي (6272)، وأبو عبيدة الحداد عبدُ الواحد بن واصل عند الطيالسي (403)، كلاهما عن عوف قال: بلغني عن سليمان بن جابر قال: قال ابن مسعود، فذكره.ورواه أبو أسامة حماد بن أسامة عند الترمذي (2091 م)، والشاشي (843)، والبيهقي 6/ 208 عن عوف، عمّن حدّثه عن سليمان بن جابر، عن ابن مسعود. ورواه هَوذة بن خليفة كما عند المصنف (8150)، وأبي عمرو الداني في "الفتن" (261)، وابن عبد البر في "بيان فضل العلم" (1029)، والمزي في "تهذيب الكمال" 11/ 378 - 379 عن عوف، عن رجل، عن سليمان بن جابر، عن ابن مسعود.قال الدارقطني في "العلل" (726): والقول قول ابن المبارك ومن تابعه. يعني وجود واسطة بين عوف وسليمان.وشذَّ المثنى بن بكر العطار من بين أصحاب عوف، فرواه عنه قال: حدثنا سليمان الهجري، عن أبي الأحوص، عن ابن مسعود. فزاد فيه أبا الأحوص أخرجه من طريقه أبو يعلى (5028)، والبيهقي في "السنن" 6/ 208، وفي "الشعب" (1548). ورجَّح الدارقطني في "العلل" (2103) رواية الجماعة على روايته، فقال: والمرسل أصح. قلنا: والمثنى بن بكر اختلفوا فيه، فجعله بعضهم مجهولًا، وضعفه بعضهم، وفرّق أبو زرعة بينه وبين الذي يروي عنه المقدمي فجعله حسن الحديث، والله أعلم.وقد صحَّت رواية أبي الأحوص عن ابن مسعود لكن من قوله موقوفًا عليه، وسيأتي ذكرها عند الرواية (8152)، فانظرها.فائدة: حكم المزي في تحفة الأشراف 7/ 31 - 32 على حديث أبي أسامة بالوهم، فتعقّبه ابن حجر في "النكت الظراف" بقوله: قد تابع أبا أسامة عبدُ الله بنُ المبارك، وكفى به حافظًا، وأبو عبيدة الحدادُ وهوذةُ بن خليفة كلهم عن عوف، ووافق شريكًا على إسقاط الواسطة النَّضْرُ بن شميل عن عوف، فوضح أن الاختلاف فيه من عوف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8150)


8150 - حدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا بِشر بن موسى، أخبرنا هَوْذة بن خَليفة، حدثنا عوف، عن رجل، عن سليمان بن جابر، عن ابن مسعود، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم قال: "تَعلَّموا الفرائضَ وعلِّموه الناس، فإنِّي امْرُؤٌ مقبوضٌ، وإنَّ العلم سيُقبَضُ حتى يختلفَ الاثنانِ في الفريضة، فلا يَجِدانِ أحدًا يَفصِلُ بينهما" [1].قال الحاكم: وإذا اختَلَفا، فالحكمُ للنَّضر بن شُمَيل.




আব্দুল্লাহ ইবন মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমরা ফারায়েজ (উত্তরাধিকার আইন) শিক্ষা করো এবং তা মানুষকে শিক্ষা দাও। কারণ, আমি একজন মানুষ, আমাকে উঠিয়ে নেওয়া হবে (আমি মৃত্যুবরণ করব), এবং জ্ঞানও তুলে নেওয়া হবে (হারিয়ে যাবে)। এমনকি দুজন লোক যখন একটি ফারায়েজের (উত্তরাধিকার বণ্টনের) বিষয়ে মতভেদ করবে, তখন তাদের মধ্যে ফয়সালা করার মতো কাউকে তারা খুঁজে পাবে না।” ইমাম হাকেম বলেন: যদি তারা মতভেদ করত, তবে নযর ইবনু শুমাইলের সিদ্ধান্তই ছিল ফয়সালা।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف كسابقه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8151)


8151 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى الذُّهْلي والحسين بن الفضل البَجَلي، قالا: حدثنا أبو الوليد الطَّيالسي، حدثنا أبو هلال الراسبي، عن قَتَادة، عن سعيد بن المسيّب، قال: كتب عمرُ بن الخطّاب إلى أبي موسى الأشعري: إذا لَهَوتُم فالْهَوا بالرَّمْى، وإذا تحدَّثتُم فتحدَّثُوا بالفرائض [1].هذا وإن كان موقوفًا فإنه صحيح الإسناد، ويؤيِّده قولُه صلى الله عليه وسلم: "اقتَدُوا بِاللَّذِينِ من بعدي أبي بكر وعمرَ" [2].




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আবূ মূসা আল-আশ'আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লিখলেন: তোমরা যখন বিনোদন করো, তখন তীর নিক্ষেপের (তীরন্দাজির) মাধ্যমে বিনোদন করো; আর যখন তোমরা আলাপ-আলোচনা করো, তখন ফারায়েয (উত্তরাধিকার আইন) নিয়ে আলোচনা করো।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ليّن من أجل أبي هلال الراسبي - واسمه محمد بن سليم - ففي روايته عن قتادة اضطراب، وقد روى هذا الخبر البيهقي في "السنن الكبرى" 6/ 209 من طريق وكيع عن أبي هلال عن قتادة قال: كتب عمر إذا لهوتم، فذكره، ليس فيه ذكر سعيد بن المسيب.وأخرج سعيد بن منصور في "السنن" (1)، وابن أبي شيبة 10/ 459 و 11/ 236، والدارمي (2892)، والبيهقي في "السنن" 6/ 209، وفي "شعب الإيمان" (1554)، وفي "المدخل إلى السنن" (376)، وابن عبد البر في "جامع بيان العلم" (1453) و (1921) و (1922) من طرق عن عاصم الأحول عن مورِّق العجلي، عن عمر قال: تَعلَّموا الفرائضَ واللَّحن والسُّنة كما تعلُّمون القرآنَ.ورجاله ثقات، لكن رواية مورق عن عمر مرسلة فيما قاله العلائي في "جامع التحصيل".وأخرج سعيد بن منصور (2)، وابن أبي شيبة 11/ 234، والدارمي (2893)، والبيهقي في "السنن" 6/ 209 من طريق إبراهيم النخعي قال: قال عمر: تعلَّموا الفرائض فإنها من دينكم. ورجاله ثقات لكنه مرسل، إبراهيم لم يدرك عمر. روايته عن أبيه مرسلة، وقد توبع.وأخرجه الطبراني (8743) عن أبي خليفة الفضل بن الحباب، عن محمد بن كثير، عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.وأخرجه الدارمي (2900) عن محمد بن يوسف، والبيهقي 6/ 209، والخطيب في "الفصل للوصل" 2/ 958 من طريق يحيى القطان، كلاهما عن سفيان الثوري، به.وأخرجه البيهقي 6/ 209 من طريق أبي خيثمة زهير بن معاوية، عن أبي إسحاق السبيعي، به.وأخرجه ابن أبي شيبة 11/ 233، والخطيب 2/ 955 و 957 من طريق سفيان الثوري، وسعيد بن منصور (3)، وابن أبي شيبة 11/ 233 من طريق سلام بن سليم أبي الأحوص، وأبو القاسم البغوي في "الجعديات" (2527)، ومن طريقه الخطيب 2/ 958 من طريق أبي خيثمة زهير بن معاوية، والبيهقي 6/ 209 من طريق شعبة، والخطيب 2/ 955 من طريق إسرائيل، خمستهم عن أبي إسحاق، عن أبي الأحوص عوف بن مالك بن نَضلة، عن ابن مسعود. يذكر أبي الأحوص مكان أبي عبيدة. وهذا إسناد صحيح.وقد سأل ابن أبي حاتم أباه في "العلل" (1634) عن رواية أبي إسحاق هذه التي يرويها على الوجهين، فقال: كلاهما صحيح، كان أبو إسحاق واسع الحديث.وأخرجه ابن أبي شيبة 11/ 235، والدارمي (2895)، والطبراني (8926) من طريق القاسم بن عبد الرحمن المسعودي، والدارمي (2898)، والبيهقي 6/ 209 من طريق القاسم بن الوليد الهمداني، كلاهما عن ابن مسعود بنحوه. وكلا السندين منقطع، فالقاسمان لم يدركا ابن مسعود.



[2] حديث صحيح، وقد سلف مسندًا عند المصنف برقم (4501) من حديث حذيفة. روايته عن أبيه مرسلة، وقد توبع.وأخرجه الطبراني (8743) عن أبي خليفة الفضل بن الحباب، عن محمد بن كثير، عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.وأخرجه الدارمي (2900) عن محمد بن يوسف، والبيهقي 6/ 209، والخطيب في "الفصل للوصل" 2/ 958 من طريق يحيى القطان، كلاهما عن سفيان الثوري، به.وأخرجه البيهقي 6/ 209 من طريق أبي خيثمة زهير بن معاوية، عن أبي إسحاق السبيعي، به.وأخرجه ابن أبي شيبة 11/ 233، والخطيب 2/ 955 و 957 من طريق سفيان الثوري، وسعيد بن منصور (3)، وابن أبي شيبة 11/ 233 من طريق سلام بن سليم أبي الأحوص، وأبو القاسم البغوي في "الجعديات" (2527)، ومن طريقه الخطيب 2/ 958 من طريق أبي خيثمة زهير بن معاوية، والبيهقي 6/ 209 من طريق شعبة، والخطيب 2/ 955 من طريق إسرائيل، خمستهم عن أبي إسحاق، عن أبي الأحوص عوف بن مالك بن نَضلة، عن ابن مسعود. يذكر أبي الأحوص مكان أبي عبيدة. وهذا إسناد صحيح.وقد سأل ابن أبي حاتم أباه في "العلل" (1634) عن رواية أبي إسحاق هذه التي يرويها على الوجهين، فقال: كلاهما صحيح، كان أبو إسحاق واسع الحديث.وأخرجه ابن أبي شيبة 11/ 235، والدارمي (2895)، والطبراني (8926) من طريق القاسم بن عبد الرحمن المسعودي، والدارمي (2898)، والبيهقي 6/ 209 من طريق القاسم بن الوليد الهمداني، كلاهما عن ابن مسعود بنحوه. وكلا السندين منقطع، فالقاسمان لم يدركا ابن مسعود.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8152)


8152 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا إبراهيم بن مرزوق، حدثنا وهب بن جَرير، حدثنا شُعْبة، عن أبي إسحاق.وحدثنا أبو العباس المحبوبي، حدثنا أحمد بن سَيَّار، حدثنا محمد بن كَثير، حدثنا سفيان الثَّوري، عن أبي إسحاق، عن أبي عُبيدة، عن عبد الله بن مسعود قال: مَن قرأَ منكم القرآنَ فليتعلَّم الفرائضَ، فإن لقيَه أعرابي قال: يا مُهاجِرُ، أتقرأُ القرآنَ؟ فيقول: نعم، فيقول: وأنا أقرأُ القرآنَ، فيقول الأعرابيُّ: أتَفرِضُ يا مهاجر؟ فإن قال: نعم، قال: زيادهُ خيرٍ، وإن قال: لا، حسبتُه قال: فما فَضلُكَ عليَّ يا مهاجُر؟! [1] قال الحاكم: هذا موقوف صحيح علي شرط الشيخين، شاهدٌ للمرسل الذي قدَّمنا.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি কুরআন পাঠ করে, সে যেন অবশ্যই ফারায়েজ (উত্তরাধিকার আইন) শিখে নেয়। কারণ যদি তার সাথে কোনো বেদুইন (গ্রামীণ আরব) দেখা করে এবং বলে, ‘হে মুহাজির, আপনি কি কুরআন পাঠ করেন?’ সে উত্তর দেয়: ‘হ্যাঁ।’ বেদুইন তখন বলে: ‘আমিও তো কুরআন পড়ি।’ তখন সেই বেদুইন বলবে: ‘হে মুহাজির, আপনি কি ফারায়েজের জ্ঞান রাখেন?’ যদি সে বলে: ‘হ্যাঁ’, তখন বেদুইন বলবে: ‘এটি (আপনার জন্য) অতিরিক্ত কল্যাণ।’ আর যদি সে বলে: ‘না’, (বর্ণনাকারী বলেন) আমি মনে করি তিনি বলেছেন: ‘তাহলে হে মুহাজির, আমার ওপর আপনার শ্রেষ্ঠত্ব কী?’




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد ضعيف لانقطاعه، فإنَّ أبا عبيدة - وهو ابن عبد الله بن مسعود - روايته عن أبيه مرسلة، وقد توبع.وأخرجه الطبراني (8743) عن أبي خليفة الفضل بن الحباب، عن محمد بن كثير، عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.وأخرجه الدارمي (2900) عن محمد بن يوسف، والبيهقي 6/ 209، والخطيب في "الفصل للوصل" 2/ 958 من طريق يحيى القطان، كلاهما عن سفيان الثوري، به.وأخرجه البيهقي 6/ 209 من طريق أبي خيثمة زهير بن معاوية، عن أبي إسحاق السبيعي، به.وأخرجه ابن أبي شيبة 11/ 233، والخطيب 2/ 955 و 957 من طريق سفيان الثوري، وسعيد بن منصور (3)، وابن أبي شيبة 11/ 233 من طريق سلام بن سليم أبي الأحوص، وأبو القاسم البغوي في "الجعديات" (2527)، ومن طريقه الخطيب 2/ 958 من طريق أبي خيثمة زهير بن معاوية، والبيهقي 6/ 209 من طريق شعبة، والخطيب 2/ 955 من طريق إسرائيل، خمستهم عن أبي إسحاق، عن أبي الأحوص عوف بن مالك بن نَضلة، عن ابن مسعود. يذكر أبي الأحوص مكان أبي عبيدة. وهذا إسناد صحيح.وقد سأل ابن أبي حاتم أباه في "العلل" (1634) عن رواية أبي إسحاق هذه التي يرويها على الوجهين، فقال: كلاهما صحيح، كان أبو إسحاق واسع الحديث.وأخرجه ابن أبي شيبة 11/ 235، والدارمي (2895)، والطبراني (8926) من طريق القاسم بن عبد الرحمن المسعودي، والدارمي (2898)، والبيهقي 6/ 209 من طريق القاسم بن الوليد الهمداني، كلاهما عن ابن مسعود بنحوه. وكلا السندين منقطع، فالقاسمان لم يدركا ابن مسعود.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8153)


8153 - أخبرنا أحمد بن سلمان الفقيه، حدثنا هلال بن العلاء الرَّقِّي، حدثنا أبي، حدثنا عبيد الله بن عمرو الرَّقِّي، عن عبد الله بن محمد بن عَقيل، عن جابر قال: جاءتِ امرأةُ سعد [1] بن الرَّبيع، فقالت: يا رسولَ الله، هاتانِ ابنتا سعد بن الرَّبيع، قُتل أبوهما معكَ يومَ أُحدٍ شهيدًا، وإنَّ عمَّهما أخذَ مالَهما فلم يَدَعْ لهما مالًا، قال: فقال: "يَقضِي اللهُ في ذلك"، فنزلت آية الميراث، فأرسَلَ رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى عمِّهما، فقال: "أَعطِ ابنتَيْ سعدٍ الثُّلثينِ وأمَّهما الثُّمنَ، وما بقيَ فهو لك" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সা’দ ইবনুর রাবী’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী এলেন এবং বললেন, “ইয়া রাসূলাল্লাহ! এ দু’জন সা’দ ইবনুর রাবী’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কন্যা। তাদের পিতা ওহুদ যুদ্ধের দিন আপনার সঙ্গে শহীদ হয়েছেন। আর তাদের চাচা তাদের সমস্ত সম্পদ নিয়ে নিয়েছেন এবং তাদের জন্য কোনো সম্পদই অবশিষ্ট রাখেননি।” তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “এ বিষয়ে আল্লাহই ফয়সালা করবেন।” এরপর উত্তরাধিকারের (মীরাসের) আয়াত নাযিল হলো। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের চাচার কাছে লোক পাঠালেন এবং বললেন, “সা’দ-এর দুই কন্যাকে দুই-তৃতীয়াংশ দাও এবং তাদের মাকে দাও এক-অষ্টমাংশ। আর যা অবশিষ্ট থাকে, তা তোমার জন্য।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: سعيد. "جامعه". والعلاء الرقي والد هلال - وإن كان ضعيفًا - متابع.وأخرجه أبو داود (2891) و (2892)، وابن ماجه (2720) من طرق عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن جابر.وسيأتي عند المصنف برقم (8194) من طريق زكريا بن عدي عن عبيد الله بن عمرو الرقّي.



[2] إسناده محتمل للتحسين من أجل عبد الله بن محمد بن عقيل، وصحَّحه الترمذي في "جامعه". والعلاء الرقي والد هلال - وإن كان ضعيفًا - متابع.وأخرجه أبو داود (2891) و (2892)، وابن ماجه (2720) من طرق عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن جابر.وسيأتي عند المصنف برقم (8194) من طريق زكريا بن عدي عن عبيد الله بن عمرو الرقّي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8154)


8154 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْر بن نصر بن سابق الخَوْلاني، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني ابن أبي الزِّناد، عن أبيه، عن خارجةَ بن زيد بن ثابت، عن أبيه، قال: إذا تُوفِّي الرجلُ أو المرأةُ وتركَ ابنةً واحدةً كان لها النِّصفُ، فإن كانتا اثنتين فما فوقَ ذلك كان لهنَّ الثُّلثانِ، وإن كان معَهنَّ ذَكَرٌ فلا فريضةَ لأحدٍ منهم، ويُبدَأُ بأحدٍ إن يَشرَكهنَّ فريضةً، فيُعطَى فريضتَه، فما بقيَ بعد ذلك فهو للولدِ بينهم، للذِّكر مثلُ حظِّ الأُنثيَين، فإن كانتا اثنتَينِ فما فوقَ ذلك من الإناث، كان لهنَّ الثَّلثان [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.قال الحاكم: أقاويلُ زيد بن ثابت حُجَّةٌ عند كافَّة الصحابة:




যায়দ ইবনে সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: যখন কোনো পুরুষ বা মহিলা মারা যায় এবং সে একটি মাত্র কন্যা সন্তান রেখে যায়, তখন সে অর্ধেক অংশ পাবে। আর যদি দু’টি বা তার বেশি কন্যা সন্তান থাকে, তবে তাদের জন্য দুই-তৃতীয়াংশ হবে। আর যদি তাদের সাথে কোনো পুত্র সন্তান থাকে, তবে তাদের কারো জন্যই নির্দিষ্ট অংশ থাকবে না। এবং যদি তাদের সাথে অন্য কোনো অংশীদার (নির্দিষ্ট অংশের অধিকারী) থাকে, তবে প্রথমে তাকে তার নির্দিষ্ট অংশ প্রদান করা হবে। অতঃপর এর পরে যা অবশিষ্ট থাকবে, তা সন্তানদের মধ্যে বণ্টিত হবে। সেখানে পুরুষের অংশ হবে দুই নারীর অংশের সমান। আর যদি দু’টি বা তার বেশি নারী (কন্যা সন্তান) থাকে, তবে তাদের জন্য দুই-তৃতীয়াংশ হবে।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده حسن من أجل ابن أبي الزناد: وهو عبد الرحمن.وأخرجه ضمن خبر الفرائض المطوّل: سعيد بن منصور في "سننه" (5)، وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 6/ 229، وفي معرفة "السنن" (12559) من طريق محمد بن بكار، كلاهما (سعيد بن منصور ومحمد بن بكار) عن عبد الرحمن بن أبي الزناد، بهذا الإسناد. الليثي، والأنصاري: هو محمد بن عبد الله بن المثنّى.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8155)


8155 - فقد أخبرنا أبو عبد الرحمن بن أبي الوَزير التاجر، حدثنا أبو حاتم الرازي، حدثنا الأنصاري، حدثنا محمد بن عمرو، عن أبي سَلَمة: أنَّ ابنَ عباس أخذَ برِكَاب زيد بن ثابت، فقال له: تَنحَّ يا ابن عمِّ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم فقال: إِنَّا هكذا نفعلُ بكُبَرائِنا وعُلمائِنا [1].




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই তিনি যায়দ ইবনে সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর রেকাব (ঘোড়ার পাদানি) ধরেছিলেন। তখন যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন, হে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চাচাতো ভাই, আপনি সরে যান। জবাবে তিনি (ইবনে আব্বাস) বললেন, আমরা আমাদের বড়দের এবং আলেমদের (জ্ঞানীজনদের) সাথে এমনই করে থাকি।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد لا بأس برجاله إلَّا أنه مرسل، فإن أبا سلمة - وهو ابن عبد الرحمن - لم يدرك زيدَ بن ثابت كما سلف بيانه في مكرره برقم (5895). محمد بن عمرو: هو ابن علقمة الليثي، والأنصاري: هو محمد بن عبد الله بن المثنّى.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8156)


8156 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا محمد بن أيوب، أخبرنا موسى بن إسماعيل، حدثنا الرَّبيع بن بَدْر، عن أبيه، عن جدِّه، عن أبي موسى الأشعري، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "الاثنان فما فوقهما جَمَاعَةٌ" [1].




আবূ মূসা আল-আশ'আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “দুইজন বা তার চেয়ে বেশি হলেই তা জামাআত।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، الربيع بن بدر - وهو ابن عمرو بن جراد - متروك، ووالده وجدُّه مجهولان.وأخرجه ابن ماجه (972) عن هشام بن عمار، عن الربيع بن بدر، بهذا الإسناد. وانظر تتمة تخريجه هناك.وفي الباب عن سمرة عند الروياني في "مسنده" (835)، وفي سنده إسماعيل بن مسلم المكي وهو ضعيف ولفظه: "الاثنان فما فوقهما جماعة". وهو بهذا اللفظ - فيما نرى خطأ - والصواب فيه ما جاء في الروايتين عنده (788) و (827) بلفظ: "إذا كنتم اثنين فليقم أحدكما إلى جنب صاحبه، وإذا كنتم ثلاثة فليتقدّمكم أحدكم".وعن عبد الله بن عمرو عند الدارقطني (1088)، وفي سنده عثمان بن عبد الرحمن بن عمر بن سعد بن أبي وقاص، وهو متروك الحديث.وعن الحكم بن عمير الثُّمالي عند ابن سعد 9/ 418، وابن أبي خيثمة في السفر الثاني من "التاريخ الكبير" 1/ 150، وأبي القاسم البغوي في "الصحابة" (482)، وابن عدي 5/ 250، وابن عبد البر في "التمهيد" 14/ 138، وإسناده مسلسل بالضعفاء.وعن أبي أمامة عند الطبراني في "المعجم الأوسط" (6624)، وفي "مسند الشاميين" (877)، وابن عدي في "الكامل" 6/ 315. وفيه مسلمة بن علي الحسني، وهو متروك. وله طريق آخر بلفظ آخر انظره في "مسند أحمد" 36/ (22189)، وسنده ضعيف جدًّا أيضًا.وعن أنس بن مالك عند ابن عدي 3/ 366، والبيهقي 3/ 69، وفيه سعيد بن زَرْبِي ضعيف منكر الحديث.وأخرجه مرسلًا أحمد 36/ (22315) من طريق ثور بن يزيد، عن الوليد بن أبي مالك، رفعه. ورجاله ثقات.وأخرجه مرسلًا أبو داود في "المراسيل" (26) من طريق القاسم أبي عبد الرحمن رفعه. ورجاله ثقات.وأخرجه مرسلًا أيضًا أبو داود في "المراسيل" (26) من طريق مكحول رفعه. ورجاله ثقات أيضًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8157)


8157 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الزاهد الأصبهاني، حدثنا أَسِيد بن عاصم، حدثنا الحسين بن حفص، حدثنا سفيان، عن أبي قيس الأَوْدي، عن هُزَيل بن شُرَحبيل، قال: أتيتُ أبا موسى وسلمان بن رَبِيعة في ابنةٍ، وابنةِ ابنٍ، وأختٍ لأب وأمّ، فقالا: للابنة النِّصفُ، وللأختِ النَّصفُ، وقالا: ائتِ ابنَ مسعود فإنه سيتابعُنا، فأتيتُ ابن مسعود فأخبرتُه بما قالا، فقال ابن مسعود: لقد ضَلَلتُ إذًا وما أنا من المُهتَدِين، ولكني أَقضي بما قَضَى به رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: للابنة النِّصفُ، ولابنة الابنِ السُّدسُ، وما بقيَ فللأخت [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين.




আবদুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। (হুযাইল ইবনে শুরাহবীল বলেন:) আমি আবু মূসা (আশআরি) এবং সালমান ইবনে রাবী'আর কাছে একটি কন্যা, একটি পৌত্রী এবং একজন সহোদর বোনের (মৃত ব্যক্তির সম্পত্তির) অংশ সম্পর্কে জানতে গেলাম। তাঁরা উভয়ে বললেন: কন্যার জন্য অর্ধেক (১/২), আর বোনের জন্য অর্ধেক (১/২)। তাঁরা আরও বললেন: তুমি ইবনে মাসউদের কাছে যাও, কেননা তিনি আমাদের অনুসরণ করবেন (অর্থাৎ একমত হবেন)। আমি তখন ইবনে মাসউদের কাছে গেলাম এবং তাঁদের বক্তব্য সম্পর্কে তাঁকে অবহিত করলাম। ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তাহলে তো আমি পথভ্রষ্ট হয়ে যাব এবং হিদায়াতপ্রাপ্তদের অন্তর্ভুক্ত থাকতে পারব না। তবে আমি সেই ফায়সালা দিচ্ছি যা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দিয়েছেন: কন্যার জন্য অর্ধেক (১/২), পৌত্রীর জন্য এক-ষষ্ঠাংশ (১/৬), আর যা অবশিষ্ট থাকবে তা বোনের জন্য [থাকবে]।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد جيد من أجل الحسين بن حفص، وقد توبع.وأخرجه أحمد 6/ (3691) و 7/ (4195)، والبخاري (6742)، وابن ماجه (2721)، والترمذي (2093)، والنسائي (6294) من طرق عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 7/ (4073) و (4420)، والبخاري (6736)، وأبو داود (2890)، والنسائي (6295) و (6296)، وابن حبان (6034) من طرق عن أبي قيس، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8158)


8158 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْر بن نَصر، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني ابن أبي الزِّناد، عن أبيه، عن خارجة بن زيد بن ثابت، عن أبيه قال: مِيراثُ الإخوة من الأب والأمِّ أنَّهم لا يَرِثُون معَ الولد الذَّكر، ولا معَ ولدِ الابن ولا معَ الأبِ شيئًا [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه، وقد اتَّفقا على غير حديثٍ مثل هذا من فَتَوى زيد بن ثابت رحمه الله.




যায়েদ বিন সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: পিতা ও মাতা উভয়ের দিক থেকে (সহোদর) ভাইদের মীরাস হলো এই যে, তারা কোনো পুরুষ সন্তান, বা সন্তানের পুরুষ সন্তান (নাতি), অথবা পিতার সাথে কোনো কিছুই উত্তরাধিকারসূত্রে পাবে না।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده حسن من أجل ابن أبي الزناد: وهو عبد الرحمن.وأخرجه ضمن خبر الفرائض المطول: سعيد بن منصور في "سننه" (5)، وأخرجه ابن المنذر في "الأوسط" (6847)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 6/ 225 و 232، وفي "معرفة السنن" (12531) و (12532) من طريق محمد بن بكار، كلاهما (سعيد ومحمد) عن عبد الرحمن بن أبي الزناد، بهذا الإسناد.