আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
8159 - أخبرنا أحمد بن كامل القاضي، حدثنا عبد الله بن رَوْح المَدائني، حدثنا شَبَابة بن سَوَّار، حدثنا ابن أبي ذئب، عن شُعْبة مولى ابن عباس، عن ابن عباس: أنه دخل على عثمان بن عفّان فقال: إِنَّ الأَخَوَينِ لا يَرُدَّان الأمَّ عن الثُّلث؛ قال الله عز وجل: {فَإِنْ كَانَ لَهُ إِخْوَةٌ فَلِأُمِّهِ السُّدُسُ} [النساء:11]، فالأخَوانِ بلسانِ قومِك ليسا بإخوة! فقال عثمانُ بن عفّان: لا أستطيعُ أن أردَّ ما كان قَبْلِي ومَضَى في الأمصار، وتوارثَ به الناسُ [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি উসমান বিন আফ্ফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলেন এবং বললেন: নিশ্চয়ই দুইজন ভাই (বা বোন) মাকে এক-তৃতীয়াংশ (১/৩) থেকে কমিয়ে দিতে পারে না। আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল বলেছেন: "কিন্তু যদি তার ভাই-বোন থাকে, তবে তার মায়ের জন্য এক-ষষ্ঠাংশ (১/৬)।" [সূরা নিসা: ১১]। সুতরাং, আপনার কওমের (গোত্রের) ভাষা অনুযায়ী, দুইজন (ভাই/বোন) 'ইখওয়া' (বহুবচন 'ভাই-বোন') নয়! তখন উসমান বিন আফ্ফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি এমন জিনিস প্রত্যাখ্যান করতে পারি না যা আমার পূর্বে ছিল, যা বিভিন্ন জনপদে চালু হয়ে গিয়েছে এবং যার মাধ্যমে লোকেরা উত্তরাধিকার লাভ করে আসছে।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده محتمل للتحسين، شعبة - وهو ابن دينار - مولى ابن عباس اختلفوا فيه، وأعدل الأقوال ما قاله ابن عدي في "الكامل" 4/ 25: ولم أَرَ له حديثًا منكرًا جدًّا فأحكم له بالضعف، وأرجو أنه لا بأس به.قلنا: وقول ابن كثير في "تفسيره": "لو كان هذا صحيحًا عن ابن عباس لذهب إليه أصحابه الأخصّاء به، والمنقول عنهم خلافه" ليس هذا بعلّة، فقد يكون سؤاله هذا لأمير المؤمنين عثمان استشكالًا وَرَدَ عنده، فلما سأل عثمانَ عنه وأعلمه أنه كان عليه مَن قبلَه - وهو أبو بكر أو عمر أو كلاهما - زال عنه الإشكال، ومن ثَمَّ ذهب ابن عباس إلى رأي جماعة المسلمين، ولهذا كان رأي أصحابه موافقًا لما عليه الأمّة، والله أعلم.وأخرجه البيهقي 6/ 227 من طريق إسحاق بن راهويه، عن شبابة بن سوار، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن المنذر في "الأوسط" (6762)، والطبري في "تفسيره" 4/ 278، وابن حزم في "المحلى" 9/ 258 من طريق محمد بن إسماعيل بن أبي فُديك، عن ابن أبي ذئب بنحوه.
8160 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْر بن نصر، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني عبد الرحمن بن أبي الزِّناد، عن أبيه، عن خارجة بن زيد بن ثابت، عن أبيه أنه كان يقول: الإخوةُ في كلام العرب أَخَوانِ [1] فصاعدًا [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
যায়েদ ইবনে ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলতেন: আরবের পরিভাষায় 'আল-ইখওয়াহ' (ভাই-বেরাদর) বলতে দু'জন এবং তদূর্ধ্বকে বোঝায়।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في النسخ الخطية: أخوين، والجادّة.
[2] إسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن أبي الزناد. ولم نقف عليه عند غير المصنف.
8161 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ وأبو يحيى أحمد بن محمد السَّمَرقندي، قالا: حدثنا أبو عبد الله محمد بن نصر الإمام، حدثنا أبو بكر محمد [1] ابن خلَّاد الباهِلي، حدثنا عبد الوهاب بن عبد المجيد، حدثنا خالد الحذَّاء، عن أبي قِلابة، عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أفرَضُ أمَّتي زيدُ بنُ ثابت" [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "আমার উম্মতের মধ্যে যায়েদ ইবনে সাবেত ফারায়েজ (উত্তরাধিকার আইন) সম্পর্কে সবচেয়ে পারদর্শী।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في النسخ الخطية: محمد بن محمد بن خلاد! وأخرجه ابن أبي شيبة 11/ 239 و 241، وابن المنذر في "الأوسط" (6766) من طرق عن الأعمش، عن إبراهيم عن الأسود، عن ابن مسعود. فجعل مكان علقمة الأسودَ: وهو ابن يزيد النخعي.فائدة: هذه المسألة تسمى المسألة العُمرية، حيث أعطى فيها سيدنا عمر الأمَّ ثلثَ باقي التركة، وليس ثلث المال، فصار ثلثُها رُبعًا، فتساوت حصة المرأة والأم. وانظر "المغني" لابن قدامة 9/ 23.
[2] إسناده صحيح.وأخرجه مطولًا ابن ماجه (154)، والترمذي (3791)، والنسائي (8229)، وابن حبان (7131) و (7137) و (7252) من طرق عن عبد الوهاب بن عبد المجيد الثقفي، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن صحيح.وأخرجه أحمد 20/ (12904)، وابن ماجه (155) من طريق سفيان الثوري، وأحمد 21/ (13990)، والنسائي (8185) من طريق وُهيب بن خالد، كلاهما عن خالد الحذاء، به.وأخرجه الترمذي (3790) من طريق معمر، عن قتادة عن أنس. وقال: حديث غريب لا نعرفه من حديث قتادة إلَّا من هذا الوجه، وقد رواه أبو قلابة عن أنس عن النبي صلى الله عليه وسلم نحوه، والمشهور حديث أبي قلابة. وأخرجه ابن أبي شيبة 11/ 239 و 241، وابن المنذر في "الأوسط" (6766) من طرق عن الأعمش، عن إبراهيم عن الأسود، عن ابن مسعود. فجعل مكان علقمة الأسودَ: وهو ابن يزيد النخعي.فائدة: هذه المسألة تسمى المسألة العُمرية، حيث أعطى فيها سيدنا عمر الأمَّ ثلثَ باقي التركة، وليس ثلث المال، فصار ثلثُها رُبعًا، فتساوت حصة المرأة والأم. وانظر "المغني" لابن قدامة 9/ 23.
8162 - أخبرنا عبد الرحمن بن الحسن القاضي، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا شُعْبة، عن منصور، عن إبراهيم، عن عَلقَمة، عن عبد الله قال: أُتِيَ عمرُ في امرأةٍ وأبَوَينِ، فجعل للمرأة الرُّبعَ، وللأمِّ ثُلثَ ما بقيَ [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে একজন স্ত্রী এবং দুইজন পিতামাতা (মাতা ও পিতা) সংশ্লিষ্ট উত্তরাধিকারের বিষয়ে আসা হয়েছিল। তখন তিনি স্ত্রীর জন্য এক-চতুর্থাংশ নির্ধারণ করলেন এবং মায়ের জন্য বাকি সম্পত্তির এক-তৃতীয়াংশ নির্ধারণ করলেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح. منصور: هو ابن المعتمر، وإبراهيم: هو ابن يزيد النخعي.وأخرجه ابن أبي شيبة 11/ 239، وابن المنذر في "الأوسط" (6765)، والبيهقي 6/ 227 من طرق عن شعبة، بهذا الإسناد. وقُرن في رواية البيهقي بمنصور الأعمشُ، وقال البيهقي عقبه: وكذلك رواه سفيان بن عيينة عن منصور، وزاد فيه: وما بقي فللأب. قلنا: ورواية ابن عيينة أخرجها سعيد بن منصور في "سننه" (6)، وابن أبي شيبة 11/ 240 عنه عن منصور، به.وأخرجه عبد الرزاق (19015)، والدارمي (2914) من طريق سفيان الثوري، عن منصور والأعمش، عن إبراهيم، قال: قال ابن مسعود، فذكره. ليس فيه علقمة.وأخرجه كذلك من غير ذكر علقمة: سعيد بن منصور (7)، وابن أبي شيبة 11/ 239، والبيهقي 6/ 228 من طرق عن الأعمش، عن إبراهيم به. وأخرجه ابن أبي شيبة 11/ 239 و 241، وابن المنذر في "الأوسط" (6766) من طرق عن الأعمش، عن إبراهيم عن الأسود، عن ابن مسعود. فجعل مكان علقمة الأسودَ: وهو ابن يزيد النخعي.فائدة: هذه المسألة تسمى المسألة العُمرية، حيث أعطى فيها سيدنا عمر الأمَّ ثلثَ باقي التركة، وليس ثلث المال، فصار ثلثُها رُبعًا، فتساوت حصة المرأة والأم. وانظر "المغني" لابن قدامة 9/ 23.
8163 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا محمد بن أحمد بن النَّضْر، حدثنا معاوية بن عمرو، حدثنا زائدة، عن سفيان، عن أبيه سعيد بن مسروق، عن المسيَّب بن رافع، عن عبد الله بن مسعود قال: ما كان اللهُ تعالى ليَراني أفضِّلُ أُمًّا على جَدٍّ [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহ তাআলা আমাকে এমন অবস্থায় দেখতে চান না যে, আমি (উত্তরাধিকারের ক্ষেত্রে) কোনো দাদাকে বাদ দিয়ে কোনো মাতাকে অগ্রাধিকার দেব।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات لكن المسيب بن رافع لم يسمع ابن مسعود فيما قاله الإمام أحمد وأبو حاتم وأبو زرعة الرازيان، لكن تابعه إبراهيم بن يزيد النخعي عن ابن مسعود، وروايته عن ابن مسعود قويّة، فقد روى ابن سعد في "الطبقات" 8/ 390، والترمذي في "العلل الصغير" (1/ 531 - بشرح ابن رجب) من طريق سليمان الأعمش قال: قلت لإبراهيم النخعي: أسنِدْ لي عن عبد الله بن مسعود، فقال إبراهيم: إذا حدّثتُك عن رجل عن عبد الله فهو الذي سمّيتُ، وإذا قلتُ: قال عبد الله، فهو عن غير واحد عن عبد الله.وأخرجه عبد الرزاق (19019)، وابن أبي شيبة 11/ 241، والدارمي (2916)، وابن المنذر في "الأوسط" (6767) من طرق عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد. لكن بلفظ: "على أب"، وليس "على جَدّ" كما عند الحاكم.وأخرج عبد الرزاق (19068)، وسعيد بن منصور (69)، وابن أبي شيبة 11/ 318، والباغندي في "فرائض سفيان" (26)، والبيهقي 6/ 252 من طريق الأعمش، عن إبراهيم، قال: كان عمر وعبد الله لا يفضّلان أُمًّا على جَدٍّ.
8164 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن علي الصنعاني بمكة حرسها الله تعالى، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا ابن جُرَيج، أخبرني ابن طاووس، عن أبيه، عن ابن عباس: أنَّ عمر بن الخطاب أَوصَى عند الموت، فقال: الكَلالةُ ما قلتُ، قال ابن عباس: وما قلتَ؟ قال: قال: مَن لا ولدَ له [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه، وهو في الأصل مُسنَد، فإنَّ في خطبته: وما راجعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم في شيء ما راجعتُه فيه [2].
ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর মৃত্যুর সময় অসিয়ত করলেন এবং বললেন: ‘আল-কালালা’ হলো সেটাই, যা আমি বলেছিলাম। ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জিজ্ঞেস করলেন: আপনি কী বলেছিলেন? তিনি বললেন: (কালালা হলো) যার কোনো সন্তান নেই।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح. وهو في "مصنف عبد الرزاق" (19187). وسلف برقم (3226). في "العلل" (1639)، فجعلوه من مسند البراء بن عازب. قال البيهقي: هذا هو المشهور. وقال ابن كثير في "تفسيره": وهذا إسناد جيد. قلنا: يشهد لحديث البراء حديث عمر الذي أخرجه مسلم (567).
[2] انظر خطبة عمر رضي الله عنه هذه في "صحيح مسلم" (567) و (1617). في "العلل" (1639)، فجعلوه من مسند البراء بن عازب. قال البيهقي: هذا هو المشهور. وقال ابن كثير في "تفسيره": وهذا إسناد جيد. قلنا: يشهد لحديث البراء حديث عمر الذي أخرجه مسلم (567).
8165 - أخبرنا أبو النَّضر الفقيه، حدثنا أحمد بن نَجْدة، حدثنا يحيى بن عبد الحميد، حدثنا يحيى بن آدم، حدثنا عمّار بن رُزَيق، عن أبي إسحاق، عن أبي سَلَمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة: أنَّ رجلًا قال: يا رسول الله ما الكَلَالة؟ قال: "أما سمعتَ الآيةَ التي نزلت في الصَّيف: {يَسْتَفْتُونَكَ قُلِ اللَّهُ يُفْتِيكُمْ فِي الْكَلَالَةِ} [النساء: 176] والكَلَالةُ من لم يَترُكْ ولدًا ولا والدًا" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি বললো, ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! কালালা (উত্তরাধিকার) কী? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, তুমি কি সেই আয়াত শোনোনি যা গ্রীষ্মকালে নাযিল হয়েছে: "তারা তোমার কাছে বিধান জানতে চায়, তুমি বলো, আল্লাহ তোমাদেরকে 'কালালা' সম্পর্কে বিধান দিচ্ছেন।" [সূরা নিসা: ১৭৬]। আর কালালা হলো সেই ব্যক্তি, যে কোনো সন্তান এবং কোনো পিতাকে (জীবিত) রেখে যায়নি।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف، يحيى بن عبد الحميد - وهو الحِمّاني - ضعيف متهم بسرقة الحديث، وقد خالفه غيرُه فأرسله وأعلّه الذهبي بالحماني في "التلخيص". وأبو إسحاق وهو عمرو بن عبد الله السبيعي - مدلس ولا يُعرف له سماع من أبي سلمة: وهو ابن عبد الرحمن بن عوف. وقد اختلف أيضًا فيه على أبي إسحاق كما سيأتي.وأخرجه أبو داود في "المراسيل" (371) - ومن طريقه البيهقي 6/ 224 - عن حسين بن علي بن الأسود، عن يحيى بن آدم، عن عمار بن رزيق، عن أبي إسحاق، عن أبي سلمة، به مرسلًا.وقال البيهقي عقبه: حديث أبي إسحاق عن أبي سلمة منقطع وليس بمعروف. قلنا: وحسين بن علي بن الأسود ضعيف.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 6/ 44 من طريق زكريا بن أبي زائدة، وابن أبي حاتم - كما في "العلل" (1639) - من طريق يونس بن عمرو السبيعي، كلاهما عن أبي إسحاق، عن أبي سلمة، به مرسلًا، لكن دون تفسير الكلالة. وقال أبو حاتم عن الرواية المرسلة: هي الأشبه.ورواه جمعٌ عن أبي إسحاق عن البراء بن عازب ليس فيه تفسيرُ الكلالة مرفوعًا: أبو بكر بن عياش عند أحمد 30/ (18589)، وأبي داود (2889)، والترمذي (3042)، وحجاجُ بن أرطاة عند أحمد (18607) و (18677) وغيرِه، وأجلحُ بن عبد الله بن حُجيّة فيما ذكره ابن أبي حاتم في "العلل" (1639)، فجعلوه من مسند البراء بن عازب. قال البيهقي: هذا هو المشهور. وقال ابن كثير في "تفسيره": وهذا إسناد جيد. قلنا: يشهد لحديث البراء حديث عمر الذي أخرجه مسلم (567).
8166 - حدثنا عبد الله بن إسحاق الخُراساني العَدْل ببغداد، حدثنا يحيى بن جعفر بن الزِّبْرِقان، حدثنا أبو داود الحَفَري، حدثنا سفيان، عن أبي إسحاق، عن الحارث، عن علي قال: قَضَى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بالدَّين قبلَ الوصيّة، وأنتم تقرؤُونها: {مِنْ بَعْدِ وَصِيَّةٍ يُوصِي بِهَا أَوْ دَيْنٍ} [النساء: 11]، وأنَّ أعيانَ بني الأمِّ يتوارثونَ دونَ بني العَلَّات، والإخوةُ من الأب والأمِّ أقرب من الإخوة من الأب [1].هذا حديث رواه الناس عن أبي إسحاق، والحارث بن عبد الله على الطريق، لذلك لم يُخرج جه الشيخان، وقد صحَّت هذه الفتوى عن زيد بن ثابت:
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ওসিয়তের আগেই ঋণ পরিশোধ করার নির্দেশ দিয়েছেন। অথচ তোমরা পাঠ করে থাকো: "কোনো ওসিয়ত করার পর অথবা ঋণ পরিশোধের পর" [সূরা নিসা: ১১]। আর পূর্ণ ভাই-বোনেরা (যারা মাতা-পিতা উভয় দিক থেকে) বৈমাত্রেয় ভাই-বোনদের (যারা কেবল পিতার দিক থেকে) চেয়ে মীরাস পাবে। এবং পিতা ও মাতা উভয়ের দিক থেকে যারা ভাই, তারা কেবল পিতার দিক থেকে ভাইদের তুলনায় অধিক নিকটবর্তী।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف من أجل الحارث: وهو ابن عبد الله الأعور. أبو داود الحفري: هو عمر بن سعد بن عبيد، وسفيان هو الثوري، وأبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السبيعي.وأخرجه بنحوه أحمد 2/ (1091)، وابن ماجه (2715) من طريق وكيع، والترمذي (2094) من طريق يزيد بن هارون، كلاهما عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.وأخرجه كذلك أحمد (1222)، والترمذي (2094 م) من طريق زكريا بن أبي زائدة، وابن ماجه (2739) من طريق إسرائيل بن يونس، كلاهما عن أبي إسحاق، به.وسيأتي عند المصنف من طريق سفيان بن عيينة عن أبي إسحاق برقم (8193) مختصرًا، ويأتي تخريجه هناك.قال ابن كثير في "تفسيره": أجمع العلماء سلفًا وخلفًا أن الدَّين مقدَّم على الوصية، وذلك عند إمعان النظر يُفهَم من فحوى الآية الكريمة.ونقل السندي عن الدَّميري قوله: قال العلماء أولادُ العَلَّات - بفتح العين المهملة وتشديد اللام -: الإخوة لأب من أمّهات شتّى، وأما الإخوة لأبوين فيقال لهم: أولاد الأعيان، والأخياف من الناس: الذين أمهم واحدة وآباؤهم شتى.
8167 - كما حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحر بن نَصر، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني ابن أبي الزِّناد، عن أبيه، عن خارجة بن زيد بن ثابت، عن أبيه قال: مِيراثُ الإخوة من الأب إذا لم يكن معهم أحدٌ من بني الأمِّ والأب كمِيراثِ الإخوة من الأب والأمِّ سواءٌ، ذَكَرُهم كَذَكَرِهم وإناثُهم كإناثِهم، وإذا اجتمع الإخوةُ من الأب والأمِّ والإخوةُ من الأب، وكان في بني الأب والأمِّ ذَكَرٌ، فلا مِيراثُ معه لأحدٍ من الإخوة من الأب [1].
যায়েদ ইবনে ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: শুধু পিতার দিকের ভাইদের মীরাস, যদি তাদের সাথে (পিতা ও মাতার দিকের) অন্য কেউ না থাকে, তবে তা পিতা ও মাতার দিকের ভাইদের মীরাসের মতোই সমান। তাদের পুরুষ (ভাই) তাদের পুরুষ (ভাইয়ের) মতোই এবং তাদের নারী (বোন) তাদের নারী (বোনের) মতোই (অংশ পাবে)। আর যখন পিতা ও মাতার দিকের ভাইয়েরা এবং শুধু পিতার দিকের ভাইয়েরা একত্রিত হয়, আর পিতা ও মাতার দিকের ভাইদের মধ্যে কোনো পুরুষ (ভাই) থাকে, তবে শুধু পিতার দিকের ভাইদের জন্য আর কোনো মীরাস থাকে না।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده حسن من أجل ابن أبي الزناد: وهو عبد الرحمن.وأخرجه ضمن خبر الفرائض المطول: سعيد بن منصور في "سننه" (5)، وكذا البيهقي في "السنن الكبرى" 6/ 232، وفي "معرفة السنن" (12560) من طريق محمد بن بكار كلاهما (سعيد ومحمد) عن عبد الرحمن بن أبي الزناد، بهذا الإسناد.
8168 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا يزيد بن هارون، حدثنا أبو أُميّة بن يَعلَى الثقفي، عن أبي الزِّناد، عن عمرو بن وُهَيب [1]، عن أبيه، عن زيد بن ثابت في المُشتركة [2] قال: هَبُوا أنَّ أباهم كان حِمارًا ما زادهم الأبُ إلَّا قُربًا، وأَشْرَكَ بينَهم في الثُّلث [3].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وشرحُه بالحديث الذي:
যায়িদ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মুশারাকা (উত্তরাধিকার) সংক্রান্ত মাসআলা প্রসঙ্গে বর্ণিত, তিনি বললেন: তোমরা ধরে নাও যে তাদের পিতা ছিল গাধা। পিতা (উত্তরাধিকার সূত্রে) তাদের জন্য নৈকট্য ছাড়া আর কিছুই বাড়াননি। তিনি তাদের (সহোদর ভাই-বোনদের) এক-তৃতীয়াংশ সম্পত্তিতে অংশীদার করে দিলেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: وهب.
[2] في (ك): المشرَّكة، وكلاهما يقال في اسم هذه المسألة.
8168 [3] - إسناده ضعيف، أبو أمية بن يعلى - واسمه إسماعيل - متروك الحديث، وعمرو بن وهيب لم نقف له على ترجمة، ووالده وهيب: هو مولى زيد بن ثابت وكاتبه، ترجم له البخاري في "التاريخ الكبير" 8/ 176 - 177 وابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 9/ 34 ولم يذكرا فيه جرحًا ولا تعديلًا، وذكره ابن حبان في "ثقاته": 5/ 495، وذكروا في الرواة عنه اثنين. وأسند العقيلي في "الضعفاء" 1/ 257 عن عبد الرحمن بن أبي الزناد لما سُئل عن هذا الخبر، قال: ما أَعرِف عمرو بن وُهيب، وما كان أَبي يحدِّث عن زيد بن ثابت إلّا بأصول الفرائض.وأخرج الخبر البيهقي 6/ 256 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.
8169 - حدَّثَناه الحسين بن الحسن بن أيوب، حدثنا أبو حاتم الرازي، حدثنا محمد بن عِمران بن أبي ليلى، حدثنا أبي، عن ابن أبي ليلى، عن الشَّعْبي، عن عُمرَ وعليٍّ وزيدٍ في أمٍّ وزوجٍ وإخوةٍ لأبٍ وأمٍّ وإخوةٍ لأمٍّ: أنَّ الإخوة من الأبِ والأمِّ شركاءُ للإخوة من الأمِّ في ثُلثِهم، وذلك أنهم قالوا: هم بنو أمٍّ كلُّهم، ولم يَزِدْهم الأبُ إلَّا قربًا، فهم شُركاءُ في الثُّلث [1].
উমর, আলী ও যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মাতা, স্ত্রী, আপন (পিতা-মাতা উভয়ের দিকের) ভাই-বোন এবং বৈমাত্রেয় (শুধু মাতার দিকের) ভাই-বোন সংক্রান্ত মাসআলায় বর্ণিত যে, আপন ভাই-বোনেরা বৈমাত্রেয় ভাই-বোনদের সাথে তাদের প্রাপ্য এক-তৃতীয়াংশে (সম্পদের ১/৩) অংশীদার হবে। কারণ তারা (সাহাবাগণ) বলেছেন: তারা সকলেই একই মায়ের সন্তান। পিতা তাদের (আপন ভাইদের) কেবল অতিরিক্ত নৈকট্যই দান করেছেন (দূরত্ব নয়)। সুতরাং, তারা এক-তৃতীয়াংশে শরীক হবে।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] خبر صحيح إلَّا أن ذكرَ عليٍّ فيه غريب، فالمحفوظ عنه أنه كان لا يُشرِّك مع الإخوة لأمٍّ الإخوةَ الأشقّاء كما سيأتي نقله عن أهل العلم. وهذا إسناد ضعيف، ابن أبي ليلى - واسمه محمد بن عبد الرحمن - سيئ الحفظ، ورواية الشعبي عن هؤلاء الصحابة مرسلة.وأخرجه سعيد بن منصور في "السنن" (23)، والبيهقي في "السنن" 6/ 256 من طريق هشيم، عن ابن أبي ليلى، عن الشعبي: أن عمر وابن مسعود أشركا بينهم. ليس فيه ذكر عليٍّ.وأخرجه البيهقي 6/ 256 من طريق يزيد بن هارون أخبرنا محمد بن سالم، عن الشعبي قال: قال عمر وعبد الله، فذكره. ومحمد بن سالم - وهو الهمداني الكوفي - ضعيف.وأخرجه بنحوه عبد الرزاق (19009)، وسعيد بن منصور (20) و (21)، وابن أبي شيبة 11/ 255 و 256 و 258، والدارمي (2924)، والباغندي في "فرائض الثَّوري" (22)، والبيهقي في "السنن" 6/ 256، وفي "معرفة السنن" (12657) من طريق إبراهيم النخعي، عن عمر وابن مسعود وزيد. وسنده صحيح إلى النخعي. وزاد في رواية سعيد بن منصور (21) وابن أبي شيبة الثانية والثالثة: وكان علي لا يُشرِّك. وقال ابن أبي شيبة: وهذه من ستة أسهُم: للزوج النصف ثلاثة أسهم، وللأم السدس، وللإخوة من الأم الثلث وهو سهمان.وأخرج البيهقي في "السنن" 6/ 255 من طريق سعيد بن المسيب: أنَّ عمر أشرك بين الإخوة من الأب والأم وبين الإخوة من الأم في الثلث. وإسناده إلى سعيد صحيح، وفي سماع سعيد من عمر خلاف.وأخرج نحوه مختصرًا سعيد بن منصور (24) من طريق ابن سِيرِين، والدارمي (2929) من طريق فيروز، كلاهما عن عمر.وأخرج عبد الرزاق (19005)، وسعيد بن منصور (62)، وابن أبي شيبة 11/ 255، والدارمي (671)، والبخاري في "تاريخه الكبير" 2/ 332، ويعقوب الفسوي في "المعرفة والتاريخ" 2/ 223 و 224، والدارقطني (4126)، والبيهقي في "السنن" 6/ 255، وفي المعرفة (12656)، وابن عبد البر في "جامع بيان العلم" (1670)، والخطيب في "الفقيه والمتفقه" (1213) من طريق وهب بن منبه، عن الحكم بن مسعود الثقفي (وقال بعضهم: مسعود بن الحكم)، قال: قضى عمر بن الخطاب في امرأة توفيت وتركت زوجها وأمها، وإخوتها لأمها وإخوتها لأبيها وأمها، فأشرك عمر بين الإخوة للأم والإخوة للأب والأم في الثلث، فقال له رجل: إنك لم تشرك بينهم عام كذا وكذا، فقال عمر: تلك على ما قَضينا يومئذ، وهذه على ما قضينا. قال الذهبي في ترجمة الحكم من "ميزان الاعتدال": هذا إسناد صالح.وأخرج عبد الرزاق (19006) من طريق الزهري أنَّ عمر بن الخطاب قال: إذا لم يبق إلَّا الثلث بين الإخوة من الأب والأم وبين الإخوة من الأم، فهم فيه شركاء، للذكر مثل حظّ الأنثى.وأخرج سعيد بن منصور (27)، والدارمي (2927) من طريق أبي الزناد، قال: كان زيد يُشرِّك بينهم.وأما ما ورد عن علي رضي الله عنه بأنه كان لا يشرِّك:فقد أخرج عبد الرزاق (19010) و (19011)، وسعيد بن منصور (21) و (22) و (26)، وابن أبي شيبة 11/ 258 و 259، والدارمي (2925) و (2926)، وابن المنذر في "الأوسط" (6784) و (6785) و (6787)، والبيهقي 6/ 256 و 257 من طرق عن علي: أنه كان لا يُشرِّك.قال وكيع - كما في رواية ابن أبي شيبة -: ليس أحد من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم إِلَّا اختلفوا عنه في الشركة، إلَّا علي فإنه كان لا يشرّك. وقال البيهقي: هو عن علي رضي الله عنه مشهور.
8170 - أخبرنا أبو يحيى أحمد بن محمد السَّمَر قندي، حدثنا أبو عبد الله محمد بن نصر الإمام، حدثنا يحيى بن يحيى ومحمود بن آدم، قالا: حدثنا سفيان بن عُيَينة، حدثنا مُصعَب بن عبد الله، عن ابن أبي مُلَيكة، عن ابن عباس قال: شيءٌ لا تجدونَه في كتاب الله، ولا في قضاءِ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، وتجدونَه في الناس كلِّهم: للابنة النِّصفُ وللأختِ النِّصفُ [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এমন একটি বিষয় যা তোমরা আল্লাহর কিতাবে পাবে না, আর না পাবে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কোনো সিদ্ধান্তে; কিন্তু তোমরা তা সকল মানুষের মধ্যে দেখতে পাও: (তা হলো) কন্যার জন্য অর্ধেক এবং বোনের জন্য অর্ধেক।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد فيه لِين، مصعب بن عبد الله - هو ابن الزبرقان - ذكره ابن حبان في "الثقات" 7/ 479، وساق له هذا الخبر، ولم يذكر راويًا عنه غير ابن عيينة، وقد توبع.وأخرجه ابن أبي عمر العدني في "مسنده" كما في "المطالب العالية: (1538)، وكذا ابن حزم في "المحلى" 9/ 257 تعليقًا من طريق علي بن المَديني، كلاهما (ابن أبي عمر وابن المديني) عن سفيان بن عيينة، به. وسيأتي مطولًا بسند صحيح برقم (8178).
8171 - وأخبرنا أبو يحيى السَّمَرقندي، حدثنا محمد بن نصر، حدثنا يحيى بن يحيى، حدثنا أبو معاوية، عن الأعمش، عن إبراهيم، عن الأسوَد بن يزيد أنه قال: كان ابن الزُّبير يقول في ابنةٍ وأُختٍ: المالُ للابنة، فقلت: إنَّ معاذًا قَضَى فينا باليمن للابنةِ النِّصفُ، وللأختِ النِّصفُ. قال: فأنت رسولي إلى الوليد بن عُتْبة [1] - وكان قاضيَه على الكوفة - فمُرْهُ فليأخُذْ بذلك [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আসওয়াদ ইবনু ইয়াযীদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ইবনু যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কন্যা ও বোনের অংশ সম্পর্কে বলতেন: সমস্ত সম্পদ কন্যার জন্য। আমি (আসওয়াদ) বললাম: মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইয়ামানে আমাদের মাঝে ফায়সালা দিয়েছিলেন যে, কন্যার জন্য অর্ধেক এবং বোনের জন্য অর্ধেক। তিনি (ইবনু যুবাইর) বললেন: তাহলে তুমি অলীদ ইবনু উতবার কাছে আমার দূত হিসেবে যাও – সে ছিল কুফার উপর তাঁর (ইবনু যুবাইরের) বিচারক – আর তাকে নির্দেশ দাও যেন সে এই অনুযায়ী আমল করে।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] كذا وقع في "المستدرك": الوليد بن عتبة، وهو خطأ، صوابه ما جاء في رواية ابن أبي شيبة (31723 - عوامة) والدارمي (2922): عبد الله بن عتبة، وهو عبد الله بن عتبة بن مسعود الهذلي.وانظر "طبقات ابن سعد" 8/ 241.
[2] إسناده صحيح أبو معاوية: هو محمد بن خازم الضرير، وإبراهيم: هو ابن يزيد النخعي.وأخرجه البخاري (6741) من طريق شعبة عن الأعمش، عن إبراهيم، عن الأسود قال: قضى فينا معاذ بن جبل على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم: النصف للابنة والنصف للأخت. ثم قال سليمان: قضى فينا، ولم يذكر على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم؛ يعني أنَّ الأعمش رواه على الوجهين: مرةً بذكر زمن النبي صلى الله عليه وسلم، ومرةً لم يذكر ذلك.وأخرجه البخاري (6734) من طريق أشعث بن أبي الشعثاء، عن الأسود بن يزيد قال: أتانا معاذ بن جبل باليمن معلمًا وأميرًا، فسألناه عن رجل توفي وترك ابنته وأخته، فأعطى الابنة النصف والأخت النصف.وأخرجه أبو داود (2893) من طريق أبي حسان مسلم بن عبد الله الأعرج، عن الأسود بن يزيد: أنَّ معاذ بن جبل ورَّثَ أختًا وابنةً، جعلَ لكلِّ واحدة منهما النصفَ، وهو باليمن، ونبيُّ الله صلى الله عليه وسلم يومئذٍ حَيٌّ. وسيأتي هذا الطريق عند المصنف برقم (8211) لكن وقع فيه وهمٌ يأتي التنبيه عليه هناك.قال ابن بطال كما في "فتح الباري" 21/ 335 - : أجمعوا على أنَّ الأخوات عَصَبة للبنات فيَرِثن ما فضل عن البنات، فمن لم يخلِّف إلَّا بنتًا وأختا، فللبنت النصف وللأخت النصف الباقي على ما في حديث معاذ، وإن خلّف بنتين وأختًا، فلهما الثلثان وللأخت ما بقي، وإن خلّف بنتًا وأختًا وبنتَ ابنٍ، فللبنت النصف ولبنت الابن تكملة الثلثين وللأخت ما بقي على ما في حديث ابن مسعود؛ يعني الذي عند البخاري برقم (6742).
8172 - أخبرنا أبو عمرو عثمان بن أحمد الدَّقّاق ببغداد، حدثنا أحمد بن حيَّان بن مُلاعِب، حدثنا علي بن عاصم، حدثنا عبد الله بن طاووس، عن أبيه، عن ابن عبّاس قال: قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "أَلحِقُوا المالَ بالفرائض، فما بقيَ فلأَولى رَجُلٍ ذَكَر" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، فإنّ علي بن عاصم صَدُوق، ولم يخرجاه.وقد أرسله سفيان الثَّوري وسفيان بن عُيَينة وابن جُرَيج ومَعمَر بن راشد عن عبد الله بن طاووس.أما حديث الثَّوري:
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সম্পত্তির অংশসমূহকে নির্দিষ্ট ফারায়েয (অংশ) অনুযায়ী দিয়ে দাও। এরপর যা অবশিষ্ট থাকবে, তা নিকটতম পুরুষ ব্যক্তির জন্য।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات من أجل علي بن عاصم. وهو ابن صهيب الواسطي - وبه أعلّه الذهبي في "التخليص"، لكنه قد توبع. واختلف على عبد الله بن طاووس في وصله وإرساله كما أشار المصنف، وروايته المرسلة لا تُعلُّ الموصولة، فالذين رووه عنه موصولًا جمع من الثقات بعضهم مخرَّج في "الصحيحين".وأخرجه أحمد 4/ 2657 و 5/ (2993)، والبخاري (6732) و (6735) و (6737)، ومسلم (1615) (2)، والترمذي (2098)، والنسائي (6297) من طريق وهيب بن خالد، والبخاري (6746)، ومسلم (1615) (3)، وابن حبان (6028) من طريق روح بن القاسم، ومسلم (1615) (4) من طريق يحيى بن أيوب، وابن الجارود في "المنتقى" (955) من طريق المغيرة بن سلمة، والبزار في "مسنده" (4887)، وابن الأعرابي في "المعجم" (962)، والطبراني (10901)، والدارقطني (4072) من طريق زياد بن سعد، والدارقطني (4068) من طريق زَمعة بن صالح، ستتهم عن عبد الله بن طاووس، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن. وقال البزار: هذا الإسناد لا أعلم فيه علة.وأخرجه أبو حنيفة في "مسنده" بشرح علي القاري ص 180، وكذا الدارقطني في "سننه" (4073) من طريق هشام بن حجير، كلاهما (أبو حنيفة وهشام) عن طاووس، عن ابن عباس موصولًا.وأخرجه سعيد بن منصور في "سننه" (289) من طريق هشام بن حجير، به فوقفه علي ابن عباس.قلنا رواية هشام بن حجير التي عند سعيد بن منصور والدارقطني كلاهما من طريق سفيان بن عيينة عنه، ونرى ذلك من ضعف ابن حجير، فإنه ليس بذاك القوي، والله أعلم.قال ابن حجر في "الفتح" 21/ 307: المراد بالفرائض هنا الأنصِباء المقدَّرة في كتاب الله تعالى، وهي النصف ونصفه ونصف نصفه، والثلثان ونصفهما ونصف نصفهما والمراد بأهلها: من يستحقها بنص القرآن.وقوله: "فلأولى رجل" قال الخطابي: معنى "أَولى" هاهنا أقرب، والوَلْيُ: القرب، يريد أقرب العصبة إلى الميت كالأخ والعم، فإنَّ الأخ أقرب من العم، وكالعم وابن العم، فالعم أقرب من ابن العم، وعلى هذا المعنى. ولو كان قوله: "أَولى" بمعنى أحق لبقي الكلامُ مبهمًا، لا يُستفادُ منه بيان الحكم، إذ كان لا يدرى من الأحق ممن ليس بأحق، فعُلم أن معناه: أقرب النسب، على ما فسرناه، والله أعلم.وقال النووي: أجمعوا على أن الذي يبقى بعد الفروض للعصبة يقدَّم الأقرب فالأقرب، فلا يرثُ عاصب بعيد مع عاصب قريب، والعَصَبة: كل ذكر يُدْلي بنفسه بالقرابة ليس بينه وبين الميت أنثى، فمتى انفرد أخذ جميع المال، وإن كان مع ذوي فروض غير مُستغرِقين أخذ ما بقي وإن كان مع مُستغرِقين فلا شيء له.
8173 - فحدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا يحيى بن أبي طالب حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا سفيان الثَّوري [1].وأما حديثُ ابن عُيينة:
৮১৭৩ - অতঃপর আমাদেরকে তা বর্ণনা করেছেন আবুল আব্বাস মুহাম্মাদ ইবনু ইয়াকুব, তিনি বলেন, আমাদেরকে বর্ণনা করেছেন ইয়াহইয়া ইবনু আবি তালিব, তিনি বলেন, আমাদেরকে বর্ণনা করেছেন ইয়াযীদ ইবনু হারূন, তিনি বলেন, আমাদেরকে খবর দিয়েছেন সুফিয়ান আস-সাওরী। আর ইবনু উয়ায়নার হাদীসের ব্যাপারে:
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه الطحاوي في "شرح معاني الآثار" 4/ 390 عن علي بن شيبة، عن يزيد بن هارون، بهذا الإسناد.وأخرجه الباغندي في "فرائض الثَّوري" (4)، والطحاوي 4/ 390 من طريق أبي نعيم، والنسائي (6298) من طريق أبي داود الحفري عمر بن سعد، والطحاوي 4/ 390 من طريق ابن المبارك، ثلاثتهم عن سفيان الثوري به. قال النسائي عقبه: سفيان الثوري أحفظ من وُهيب، ووهيب ثقة مأمون، وكأنَّ حديث الثوري أشبه بالصواب. قلنا: ذكرنا في تخريج الرواية السابقة أنَّ جمعًا من الثقات رووه عن عبد الله بن طاووس موصولًا، ولم ينفرد وهيب بوصله.
8174 - فأخبرَناه أبو يحيى السَّمَرقندي، حدثنا محمد بن نصر، حدثنا يحيى بن يحيى، أخبرنا سفيان بن عُيينة [1]. وأما حديثُ ابن جُرَيج:
৮১৭৪ - অতঃপর আমাদেরকে আবূ ইয়াহইয়া আস-সামারকান্দী খবর দিয়েছেন, তিনি বলেন, আমাদেরকে হাদীস শুনিয়েছেন মুহাম্মাদ ইবনু নাসর, তিনি বলেন, আমাদেরকে হাদীস শুনিয়েছেন ইয়াহইয়া ইবনু ইয়াহইয়া, তিনি বলেন, আমাদেরকে খবর দিয়েছেন সুফিয়ান ইবনু উয়ায়নাহ [১]। আর ইবনু জুরাইজের হাদীস সম্পর্কে...।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه سعيد بن منصور (288) عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد.
8175 - فأخبرَناه أبو يحيى، حدثنا محمد بن نصر، أخبرنا عبد الرزاق، عن ابن جُرَيج [1].وأما حديثُ مَعمَر:
৮১৭৫ - অতঃপর এটি আমাদেরকে জানিয়েছেন আবূ ইয়াহইয়া, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু নাসর, আমাদেরকে জানিয়েছেন 'আব্দুর রাযযাক, ইবনু জুরাইজ [১] থেকে। আর মা'মারের হাদীস হলো:
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه عبد الرزاق (19037) - ومن طريقه البيهقي 6/ 234 - عن ابن جريج قال: قلت لابن طاووس: ترك أباه وأمه وابنته، كيف؟ قال: لابنته النصف، لا يزاد، والسدس للأب، والسدس للأم، ثم السدس الآخر للأب، قلت: فإن ترك أمه وابنته، فلابنته النصف ولأمه الثلث؟ قال: نعم، لا يزاد البنت على النصف، ثم أخبرني عن أبيه أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "ألحقوا المال بالفرائض، فما تركت الفرائضُ من فضل، فلأَدنى رجل ذكر".
8176 - فأخبرَناه أبو العباس السَّيّاري، أخبرنا أبو المُوجِّه، أخبرنا عَبْدان، أخبرنا عبد الله، أخبرنا مَعمَر كلُّهم عن عبد الله بن طاووس، عن أبيه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ألحِقُوا المالَ بالفرائض، فما أبقَتِ الفرائضُ فهو لأَولى رجلٍ ذَكَر" [1].
তাউস থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমরা (বন্টনের সময়) সম্পদকে ফরয অংশসমূহের সাথে যুক্ত করো (অর্থাৎ ফরয অংশধারীদের অংশ দাও)। অতঃপর ফরয অংশ দেওয়ার পর যা অবশিষ্ট থাকে, তা হবে নিকটতম পুরুষ আত্মীয়ের জন্য।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه الطحاوي في "شرح معاني الآثار" 4/ 390 من طريق عبدة بن سليمان، عن عبد الله بن المبارك، بهذا الإسناد.وخالف ابنَ المبارك عبدُ الرزاق عند أحمد 5/ (2860)، ومسلم (1615) (4)، وأبي داود (2898)، وابن ماجه (2740)، والترمذي (2098 م)، وابن حبان (6029)، ومحمدُ بن حميد المَعْمَري عند ابن حبان (6030)، فروياه عن معمر، عن عبد الله بن طاووس، عن أبيه، عن ابن عباس موصولًا.
8177 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق وعلي بن حَمْشاذ العَدْل، قالا: حدثنا بِشر بن موسى، حدثنا الحُمَيدي، حدثنا سفيان.وحدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا الرَّبيع بن سليمان، أخبرنا الشافعي، أخبرنا سفيان.وأخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أبو مسلم، حدثنا القَعْنبي، حدثنا سفيان، عن الزُّهْري، عن قَبيصة بن ذُؤَيب قال: جاءت الجَدَّةُ إلى أبي بكر بعدَ رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: إنَّ لي حقًّا؛ ابن ابنٍ - أو ابن ابنةٍ - لي مات، قال: ما علمتُ لك في الكتاب حقًّا، ولا سمعتُ من رسول الله صلى الله عليه وسلم فيه شيئًا، وسأسألُ، فَشَهِدَ المغيرةُ بن شُعبة: أن رسولَ الله صلى الله عليه وسلم أعطاها السُّدسَ، قال: مَن سَمِعَ ذلك معك؟ فشَهِدَ محمدُ بن مَسْلَمة، فأعطاها أبو بكر السُّدسَ [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ক্বাবীসা ইবনু যুওয়াইব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের (ওফাতের) পর এক দাদী আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে আসলেন। অতঃপর তিনি বললেন, আমার জন্য (মীরাসের) হক্ব রয়েছে; আমার পৌত্র—অথবা তিনি বলেন, আমার দৌহিত্র—মারা গেছে। আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি কিতাবুল্লাহতে তোমার জন্য কোনো হক্ব (অংশ) সম্পর্কে অবগত নই এবং এ বিষয়ে আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে থেকেও কিছু শুনিনি। আমি (অন্যদেরকে) জিজ্ঞাসা করব। তখন মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাক্ষ্য দিলেন যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে (দাদীকে) এক-ষষ্ঠাংশ (১/৬) দিয়েছেন। আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, তোমার সাথে আর কে এ বিষয়ে শুনেছে? তখন মুহাম্মাদ ইবনু মাসলামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও সাক্ষ্য দিলেন। অতঃপর আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে এক-ষষ্ঠাংশ প্রদান করলেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد منقطع، فإن الزهري لم يسمعه من قبيصة بن ذؤيب، كان يُدخل أحيانًا بينه وبين قبيصة رجلًا، لذلك قال النسائي بإثر الرواية (6308): الزهري لم يسمعه من قبيصة، وقال الدارقطني في "العلل" 1/ 248 - 249: الزهري لم يسمعه من قبيصة، وإنما سمعه من عثمان عنه. قلنا: عثمان هذا هو عثمان بن إسحاق بن خرشة، سمّاه الإمامُ مالك كما سيأتي.وعثمان لم يرو عنه غير الزهري، ووثقه ابن معين.وأعلّ بعضُ أهل العلم الحديثَ بالانقطاع بين قبيصة بن ذؤيب وأبي بكر، قال البخاري في "التاريخ الكبير" 6/ 212: عثمان بن إسحاق بن خرشة عن قبيصة بن ذؤيب عن أبي بكر في الجدة، مرسل. وكذا أعله بالانقطاع ابن حزم والمنذري وعبد الحق الإشبيلي وابن القطان الفاسي؛ لأن قبيصة ولد عام الفتح على الأرجح، فلم يسمع من أبي بكر. وقال الحافظ ابن حجر في "التلخيص الحبير": إسناده لثقة رجاله، إلَّا أنَّ صورته مرسل، فإن قبيصة لا يصح له سماع من الصدّيق، ولا يمكن شهوده للقصة.وخالفهم آخرون من أهل العلم، فصححوه؛ كالترمذي وابن حبان والحاكم، وانتقاه ابن الجارود (959)، لأنَّ قبيصة من كبار التابعين، ولأنه ربما سمع القصة من محمد بن مسلمة أو من المغيرة بن شعبة. لذا قال ابن الملقن في "البدر المنير" (7/ 208 - 209: على كل حال هو حجة، لأنه إما مرسل صحابي، أو لأنه يجوز أن يكون سمعه بعد ذلك من المغيرة أو محمد بن مسلمة، وتصحيح الترمذي وابن حبان والحاكم له، وقبلهم الإمام مالك كافٍ، وقد قال ابن المنذر: أجمع أهل العلم على أنَّ للجدة السدس إذا لم تكن أمٌّ، وهذا عاضدٌ له أيضًا.قلنا: والحديث أخرجه سعيد بن منصور في "السنن" (80)، وابن أبي شيبة 11/ 320، وأخرجه أبو يعلى (120) عن عبيد الله بن عمر القواريري، ثلاثتهم (سعيد وابن أبي شيبة والقواريري) عن سفيان بن عيينة، عن الزهري، عن قبيصة. وذكر بعضهم قصة عمر بن الخطاب في آخره. وأخرجه الترمذي (2100) عن محمد بن أبي عمر، عن سفيان بن عيينة قال: حدثنا الزهري، قال مرةً: قال قبيصة، وقال مرةً: عن رجل عن قبيصة بن ذؤيب قال فذكره. وزاد في آخره: ثم جاءت الجدّة الأخرى التي تخالفها إلى عمر. قال سفيان وزادني فيه معمر عن الزهري - ولم أحفظه عن الزهري، ولكن حفظته من معمر - أنَّ عمر قال: إن اجتمعتما فهو لكما، وأيتكما انفردت به فهو لها.وأخرجه النسائي (6311) عن محمد بن عبد الله بن يزيد المقرئ عن سفيان، قال: سمعت الزهري يحدث عن رجل، عن قبيصة بن ذؤيب، فذكره.وأخرجه أحمد 29/ (17978)، والنسائي (6307) من طريق معمر، وابن ماجه (2724)، والنسائي (6310) من طريق يونس بن يزيد، والنسائي (6305) من طريق صالح بن كيسان، و (6306) من طريق الأوزاعي، و (6307) و (6308) من طريق إسحاق بن راشد، و (6309) من طريق شعيب بن أبي حمزة، كلهم عن الزهري، عن قبيصة. ووقع في رواية إسحاق بن راشد: أنَّ الجدة أم الأم أتت أبا بكر. والصواب أنَّ الحديث لم يعيِّن من هي الجدة، وقد روى الزهري الحديث على الشك: أم الأم، أو أم الأب.ووقع في رواية صالح بن كيسان عن الزهري التصريح بإخبار قبيصة للزهري بهذا الحديث، قال النسائي كما "تحفة الأشراف" للمزي 8/ 362: حديث صالح خطأ، لأنه قال: إنَّ قبيصة أخبره، والزهري لم يسمعه من قبيصة.ورواه مالك بن أنس في "الموطأ" 2/ 513، ومن طريقه أحمد (17980)، وأبو داود (2894)، وابن ماجه (2724)، والترمذي (2101)، والنسائي (6312)، وابن حبان (6031) عن الزهري، عن عثمان بن إسحاق بن خرشة، عن قبيصة بن ذؤيب، فذكره. وقال الترمذي: حسن صحيح، وهو أصح من حديث ابن عيينة.قلنا وتابع مالكًا على ذكر عثمان بن إسحاق بين الزهري وقبيصة: أبو أويس عبد الله بن عبد الله بن أويس فيما قاله الدارقطني في "العلل" 1/ 248، وقال: يشبه أن يكون الصواب ما قاله مالك وأبو أويس.وفي الباب عن غير واحد من الصحابة لا يخلو واحد منها من مقال، انظرها في "مسند أحمد" عند الحديث (17978).
8178 - أخبرنا أبو يحيى السَّمَرقندي، حدثنا محمد بن نصر الإمام، حدثنا إسحاق، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن الزُّهْري، عن أبي سَلَمة قال: جاء ابنَ عباس رجلٌ فقال: رجلٌ تُوفِّيَ وترك بنتَه وأختَه لأبيه وأُمَّه، قال: لابنتِه النِّصفَ وليس لأختِه شيءٌ، قال الرجلُ: فإنَّ عمر قَضَى بغير ذلك، جعلَ للابنة النِّصفَ، وللأخت النَّصفَ! قال ابن عباس: أأنتم أعلمُ أم الله؟فلم أدْرِ [1] ما وجهُ هذا حتى لَقِيتُ ابنَ طاووس، فذكرتُ له حديثَ الزُّهْري، فقال: أخبرني أبي، أنه سمع ابنَ عباس يقول: قال الله عز وجل: {إِنِ امْرُؤٌ هَلَكَ لَيْسَ لَهُ وَلَدٌ وَلَهُ أُخْتٌ فَلَهَا نِصْفُ مَا تَرَكَ} [النساء: 176]، قال ابن عباس: فقلتُم أنتم: لها النِّصفُ وإنْ كان له ولدٌ [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তাঁর (ইবনে আব্বাসের) কাছে এসে বলল: এক ব্যক্তি মারা গেছে এবং তার কন্যা ও আপন বোন (পিতা-মাতা উভয়ের দিক থেকে বোন) রেখে গেছে। তিনি (ইবনে আব্বাস) বললেন: কন্যার জন্য অর্ধেক (অংশ), আর তার বোনের জন্য কিছুই নেই। লোকটি বলল: কিন্তু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তো এর ভিন্ন ফায়সালা দিয়েছিলেন। তিনি কন্যার জন্য অর্ধেক এবং বোনের জন্য অর্ধেক অংশ নির্ধারণ করেছিলেন! ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমরা বেশি জানো নাকি আল্লাহ বেশি জানেন? [বর্ণনাকারী বলেন:] আমি বুঝতে পারিনি এর ভিত্তি কী, যতক্ষণ না আমি ইবনে তাউসের সাথে সাক্ষাৎ করলাম। আমি তাকে যুহরীর এই হাদীসটি বললাম। তখন তিনি বললেন: আমার পিতা আমাকে জানিয়েছেন যে তিনি ইবনে আব্বাসকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতে শুনেছেন: আল্লাহ তা'আলা বলেছেন: "যদি এমন কোনো পুরুষ মারা যায় যার কোনো সন্তান নেই, আর তার এক বোন থাকে, তবে তার জন্য সে যা রেখে গেছে তার অর্ধেক।" [সূরা নিসা: ১৭৬] ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: অথচ তোমরা (তোমাদের ফায়সালায়) বলো: তার সন্তান থাকা সত্ত্বেও বোনের জন্য অর্ধেক অংশ রয়েছে।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] القائل: فلم أدر، هو معمر. والطبراني 20/ (465) من طريق هشيم، عن يونس بن عبيد. به وهو كذلك في "سنن سعيد بن منصور" (38) عن هشيم، لكن جعله عن الحسن: أن عمر، فذكره بصورة الإرسال.وخالف وُهيبًا وهُشيمًا شعبةُ عند أبي القاسم البغوي في "الجعديات" (1348)، والطبراني 20/ (464)، والدارقطني (4135)، والبيهقي 6/ 235، ويزيدُ بن زريع عند الطبراني (461)، والبيهقي 6/ 235، فروياه عن يونس بن عبيد، عن الحسن، عن معقل: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أعطى الجدةَ السدس. جعلاه للجدّة. وفي الطريق إلى شعبة محمدُ بن حميد وشيخه إبراهيم بن المختار، وكلاهما ضعيف، وقال البيهقي: تفرد به محمد بن حميد وليس بالقوي، والمحفوظ حديث معقل في الجد. قلنا إن قصد أن محمد بن حميد تفرّد به من حديث شعبة فنعم، وإلا فقد توبع متابعة قاصرة من طريق يزيد بن زريع كما عرفتَ.ورواه عبدُ الأعلى بن عبد الأعلى عند ابن أبي شيبة 10/ 172 و 11/ 291، وأحمد 33/ (20310)، والطبراني (462)، وخالد بن عبد الله عند أبي داود (2897)، وعامرُ بن صالح عند الطبراني (463)، ثلاثتهم عن يونس بن عبيد، عن الحسن: أن عمر بن الخطاب سأل عن فريضة رسول الله صلى الله عليه وسلم في الجدّ، فقام معقل بن يسار المزني، فقال: قضى فيها رسولُ الله، قال: ماذا؟ قال: السدس، قال: مع من؟ قال: لا أدري قال: لا، دريت، فما تغني إذًا. قال البيهقي في "معرفة السنن" 9/ 139: وهذه الرواية أبيَنُ في الانقطاع؛ لأنَّ الحسن لم يشهد سؤال عمر، ويشبه أن يكون الشافعي وقف على ذلك، لذلك قال: لا يثبته أهل الحديث كل الثَّبت.ورواه علي بن زيد بن جدعان، عن الحسن، عن عمران بن حصين: أنَّ عمر بن الخطاب نشد الناس: من سمع النبي صلى الله عليه وسلم قضى في الجد بشيء؟ فقام رجل، فقال: أنا أشهد أنه أعطاه الثلث، قال: مع من؟ قال: لا أدري قال: لا. دريت أخرجه الحميدي (855)، وأحمد 33/ (19994)، والنسائي (6302)، وابن الأعرابي في "معجمه" (1305) من طرق عن سفيان بن عيينة، فجعله من مسند عمران بن حصين، وذكر الثلث مكان السدس. وعلي بن زيد بن جدعان ضعيف، وفي سماع الحسن من عمران بن حصين خلاف، والجمهور على أنه لم يسمع منه.وأخرجه الحميدي (856) قال: حدثنا سفيان، فقال آخر: عن الحسن، عن عمران بن حصين، وقام إليه آخر فقال: أنا أشهد أنه أعطاه السدس، قال: مع من؟ قال: لا أدري قال: لا دريت.وخالف ابنَ جدعان قتادةُ، فرواه عن الحسن عن عمران بن حصين: أنَّ رجلًا أتى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: إنَّ ابن ابني مات، فما لي من ميراثه؟ فقال: "لك السدس" فلما أدبر دعاه، فقال: "لك سدس آخر" فلما أدبر دعاه، فقال: "إنَّ السدس الآخر طُعمة". قال قتادة: فلا يدرون مع أي شيء ورثه. قال قتادة: أقل شيء ورث الجد السدس. أخرجه الطيالسي (3551)، وابن أبي شيبة 11/ 290، وأحمد في "المسند" 33/ (1988) و (19915) - وإسحاق الكوسج في "مسائل أحمد" 8/ 4198 و 4200 وأبو داود (2896)، والترمذي (2099) - وقال: حسن صحيح. والبزار (3551)، والنسائي (6303)، وابن الجارود في "المنتقى" (961)، والروياني في "مسنده" (77)، والطحاوي في "شرح المشكل" (4506)، والطبراني 18/ (295)، والدارقطني (4110)، والبيهقي 6/ 244 وغيرهم من طريق قتادة. وقال الكوسج عقبه: قلت: لأحمد: ما تفسير هذا؟ قال: ما ترى، هو أمر مظلم. وأخرج ابن أبي شيبة 11/ 291، وأحمد (20309)، وابن ماجه (2722)، والنسائي (6299)، والطحاوي (4507)، والطبراني 20/ (536) من طريق عمرو بن ميمون: أنه شهد عمر قال - وقد كان جَمَعَ أصحابَ رسول الله صلى الله عليه وسلم في حياته وصحّته فناشدهم الله -: من سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم ذكر في الجدِّ شيئًا؟ فقام معقل بن يسار فقال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم أُتي بفريضة فيها جدٌّ، فأعطاه ثلثًا أو سدسًا، قال: وما الفريضة؟ قال: لا أدري قال: ما منعك أن تدري؟! وإسناده حسن.وانظر ما سيأتي برقم (8181).وانظر تفصيل القول في هذه المسألة في كتاب "المغني" لابن قدامة 9/ 65 - 81.
[2] إسناده صحيح. إسحاق: هو ابن راهويه. وسلف برقم (3248).وانظر ما سلف برقم (8171)، وما سيأتي برقم (8211). والطبراني 20/ (465) من طريق هشيم، عن يونس بن عبيد. به وهو كذلك في "سنن سعيد بن منصور" (38) عن هشيم، لكن جعله عن الحسن: أن عمر، فذكره بصورة الإرسال.وخالف وُهيبًا وهُشيمًا شعبةُ عند أبي القاسم البغوي في "الجعديات" (1348)، والطبراني 20/ (464)، والدارقطني (4135)، والبيهقي 6/ 235، ويزيدُ بن زريع عند الطبراني (461)، والبيهقي 6/ 235، فروياه عن يونس بن عبيد، عن الحسن، عن معقل: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أعطى الجدةَ السدس. جعلاه للجدّة. وفي الطريق إلى شعبة محمدُ بن حميد وشيخه إبراهيم بن المختار، وكلاهما ضعيف، وقال البيهقي: تفرد به محمد بن حميد وليس بالقوي، والمحفوظ حديث معقل في الجد. قلنا إن قصد أن محمد بن حميد تفرّد به من حديث شعبة فنعم، وإلا فقد توبع متابعة قاصرة من طريق يزيد بن زريع كما عرفتَ.ورواه عبدُ الأعلى بن عبد الأعلى عند ابن أبي شيبة 10/ 172 و 11/ 291، وأحمد 33/ (20310)، والطبراني (462)، وخالد بن عبد الله عند أبي داود (2897)، وعامرُ بن صالح عند الطبراني (463)، ثلاثتهم عن يونس بن عبيد، عن الحسن: أن عمر بن الخطاب سأل عن فريضة رسول الله صلى الله عليه وسلم في الجدّ، فقام معقل بن يسار المزني، فقال: قضى فيها رسولُ الله، قال: ماذا؟ قال: السدس، قال: مع من؟ قال: لا أدري قال: لا، دريت، فما تغني إذًا. قال البيهقي في "معرفة السنن" 9/ 139: وهذه الرواية أبيَنُ في الانقطاع؛ لأنَّ الحسن لم يشهد سؤال عمر، ويشبه أن يكون الشافعي وقف على ذلك، لذلك قال: لا يثبته أهل الحديث كل الثَّبت.ورواه علي بن زيد بن جدعان، عن الحسن، عن عمران بن حصين: أنَّ عمر بن الخطاب نشد الناس: من سمع النبي صلى الله عليه وسلم قضى في الجد بشيء؟ فقام رجل، فقال: أنا أشهد أنه أعطاه الثلث، قال: مع من؟ قال: لا أدري قال: لا. دريت أخرجه الحميدي (855)، وأحمد 33/ (19994)، والنسائي (6302)، وابن الأعرابي في "معجمه" (1305) من طرق عن سفيان بن عيينة، فجعله من مسند عمران بن حصين، وذكر الثلث مكان السدس. وعلي بن زيد بن جدعان ضعيف، وفي سماع الحسن من عمران بن حصين خلاف، والجمهور على أنه لم يسمع منه.وأخرجه الحميدي (856) قال: حدثنا سفيان، فقال آخر: عن الحسن، عن عمران بن حصين، وقام إليه آخر فقال: أنا أشهد أنه أعطاه السدس، قال: مع من؟ قال: لا أدري قال: لا دريت.وخالف ابنَ جدعان قتادةُ، فرواه عن الحسن عن عمران بن حصين: أنَّ رجلًا أتى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: إنَّ ابن ابني مات، فما لي من ميراثه؟ فقال: "لك السدس" فلما أدبر دعاه، فقال: "لك سدس آخر" فلما أدبر دعاه، فقال: "إنَّ السدس الآخر طُعمة". قال قتادة: فلا يدرون مع أي شيء ورثه. قال قتادة: أقل شيء ورث الجد السدس. أخرجه الطيالسي (3551)، وابن أبي شيبة 11/ 290، وأحمد في "المسند" 33/ (1988) و (19915) - وإسحاق الكوسج في "مسائل أحمد" 8/ 4198 و 4200 وأبو داود (2896)، والترمذي (2099) - وقال: حسن صحيح. والبزار (3551)، والنسائي (6303)، وابن الجارود في "المنتقى" (961)، والروياني في "مسنده" (77)، والطحاوي في "شرح المشكل" (4506)، والطبراني 18/ (295)، والدارقطني (4110)، والبيهقي 6/ 244 وغيرهم من طريق قتادة. وقال الكوسج عقبه: قلت: لأحمد: ما تفسير هذا؟ قال: ما ترى، هو أمر مظلم. وأخرج ابن أبي شيبة 11/ 291، وأحمد (20309)، وابن ماجه (2722)، والنسائي (6299)، والطحاوي (4507)، والطبراني 20/ (536) من طريق عمرو بن ميمون: أنه شهد عمر قال - وقد كان جَمَعَ أصحابَ رسول الله صلى الله عليه وسلم في حياته وصحّته فناشدهم الله -: من سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم ذكر في الجدِّ شيئًا؟ فقام معقل بن يسار فقال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم أُتي بفريضة فيها جدٌّ، فأعطاه ثلثًا أو سدسًا، قال: وما الفريضة؟ قال: لا أدري قال: ما منعك أن تدري؟! وإسناده حسن.وانظر ما سيأتي برقم (8181).وانظر تفصيل القول في هذه المسألة في كتاب "المغني" لابن قدامة 9/ 65 - 81.