হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8179)


8179 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب، حدثنا علي بن الحسن الهِلَالي، أخبرنا أبو مَعمَر، حدثنا وُهيب، عن يونس بن عُبيد، عن الحسن، عن مَعقِل بن يسار قال: قال عمر: مَن عندَه في الجدِّ عن رسولِ الله صلى الله عليه وسلم؟ قلت: عندي، قال: ما عندَك؟ قلت: أعطاه السُّدسَ، قال: معَ من؟ قلت: لا أدري، قال: لا دَرَيتَ [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.




মা'কিল ইবন ইয়াসার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে দাদাকে (উত্তরাধিকার সূত্রে অংশ দেওয়ার বিষয়ে) কার কাছে (কোন জ্ঞান) আছে? আমি বললাম, আমার কাছে আছে। তিনি বললেন, আপনার কাছে কী আছে? আমি বললাম, তিনি দাদাকে এক-ষষ্ঠাংশ (সম্পত্তি) দিয়েছেন। তিনি বললেন, কার সাথে (থাকলে এই অংশ দেওয়া হয়)? আমি বললাম, আমি জানি না। তিনি বললেন, তুমি জানলে না!




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] رجاله ثقات، واختلف على الحسن - وهو البصري - فيه، فكان مرةً يرويه عن معقل بن يسار، ومرة عن عمران بن حصين، ومرة عن عمر، والحسن لم يسمع من عمر ولا من عمران، وسمع من معقل عند البخاري، وقال أبو حاتم الرازي: لم يصح للحسن سماع من معقل بن يسار، قلنا: كان الحسن يدلّس، ولم نقف على تصريح له بسماع هذا الحديث من معقل، والله أعلم.أبو معمر: هو عبد الله بن عمرو بن أبي الحجّاج، ووهيب: هو ابن خالد بن عجلان.وأخرجه النسائي (6301)، والبيهقي 6/ 244 من طريق عبد الله بن سوّار العنبري، عن وهيب بن خالد بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (6300)، وأبو الحسن القطان في زوائده على "سنن ابن ماجه" (2723)، والطبراني 20/ (465) من طريق هشيم، عن يونس بن عبيد. به وهو كذلك في "سنن سعيد بن منصور" (38) عن هشيم، لكن جعله عن الحسن: أن عمر، فذكره بصورة الإرسال.وخالف وُهيبًا وهُشيمًا شعبةُ عند أبي القاسم البغوي في "الجعديات" (1348)، والطبراني 20/ (464)، والدارقطني (4135)، والبيهقي 6/ 235، ويزيدُ بن زريع عند الطبراني (461)، والبيهقي 6/ 235، فروياه عن يونس بن عبيد، عن الحسن، عن معقل: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أعطى الجدةَ السدس. جعلاه للجدّة. وفي الطريق إلى شعبة محمدُ بن حميد وشيخه إبراهيم بن المختار، وكلاهما ضعيف، وقال البيهقي: تفرد به محمد بن حميد وليس بالقوي، والمحفوظ حديث معقل في الجد. قلنا إن قصد أن محمد بن حميد تفرّد به من حديث شعبة فنعم، وإلا فقد توبع متابعة قاصرة من طريق يزيد بن زريع كما عرفتَ.ورواه عبدُ الأعلى بن عبد الأعلى عند ابن أبي شيبة 10/ 172 و 11/ 291، وأحمد 33/ (20310)، والطبراني (462)، وخالد بن عبد الله عند أبي داود (2897)، وعامرُ بن صالح عند الطبراني (463)، ثلاثتهم عن يونس بن عبيد، عن الحسن: أن عمر بن الخطاب سأل عن فريضة رسول الله صلى الله عليه وسلم في الجدّ، فقام معقل بن يسار المزني، فقال: قضى فيها رسولُ الله، قال: ماذا؟ قال: السدس، قال: مع من؟ قال: لا أدري قال: لا، دريت، فما تغني إذًا. قال البيهقي في "معرفة السنن" 9/ 139: وهذه الرواية أبيَنُ في الانقطاع؛ لأنَّ الحسن لم يشهد سؤال عمر، ويشبه أن يكون الشافعي وقف على ذلك، لذلك قال: لا يثبته أهل الحديث كل الثَّبت.ورواه علي بن زيد بن جدعان، عن الحسن، عن عمران بن حصين: أنَّ عمر بن الخطاب نشد الناس: من سمع النبي صلى الله عليه وسلم قضى في الجد بشيء؟ فقام رجل، فقال: أنا أشهد أنه أعطاه الثلث، قال: مع من؟ قال: لا أدري قال: لا. دريت أخرجه الحميدي (855)، وأحمد 33/ (19994)، والنسائي (6302)، وابن الأعرابي في "معجمه" (1305) من طرق عن سفيان بن عيينة، فجعله من مسند عمران بن حصين، وذكر الثلث مكان السدس. وعلي بن زيد بن جدعان ضعيف، وفي سماع الحسن من عمران بن حصين خلاف، والجمهور على أنه لم يسمع منه.وأخرجه الحميدي (856) قال: حدثنا سفيان، فقال آخر: عن الحسن، عن عمران بن حصين، وقام إليه آخر فقال: أنا أشهد أنه أعطاه السدس، قال: مع من؟ قال: لا أدري قال: لا دريت.وخالف ابنَ جدعان قتادةُ، فرواه عن الحسن عن عمران بن حصين: أنَّ رجلًا أتى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: إنَّ ابن ابني مات، فما لي من ميراثه؟ فقال: "لك السدس" فلما أدبر دعاه، فقال: "لك سدس آخر" فلما أدبر دعاه، فقال: "إنَّ السدس الآخر طُعمة". قال قتادة: فلا يدرون مع أي شيء ورثه. قال قتادة: أقل شيء ورث الجد السدس. أخرجه الطيالسي (3551)، وابن أبي شيبة 11/ 290، وأحمد في "المسند" 33/ (1988) و (19915) - وإسحاق الكوسج في "مسائل أحمد" 8/ 4198 و 4200 وأبو داود (2896)، والترمذي (2099) - وقال: حسن صحيح. والبزار (3551)، والنسائي (6303)، وابن الجارود في "المنتقى" (961)، والروياني في "مسنده" (77)، والطحاوي في "شرح المشكل" (4506)، والطبراني 18/ (295)، والدارقطني (4110)، والبيهقي 6/ 244 وغيرهم من طريق قتادة. وقال الكوسج عقبه: قلت: لأحمد: ما تفسير هذا؟ قال: ما ترى، هو أمر مظلم. وأخرج ابن أبي شيبة 11/ 291، وأحمد (20309)، وابن ماجه (2722)، والنسائي (6299)، والطحاوي (4507)، والطبراني 20/ (536) من طريق عمرو بن ميمون: أنه شهد عمر قال - وقد كان جَمَعَ أصحابَ رسول الله صلى الله عليه وسلم في حياته وصحّته فناشدهم الله -: من سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم ذكر في الجدِّ شيئًا؟ فقام معقل بن يسار فقال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم أُتي بفريضة فيها جدٌّ، فأعطاه ثلثًا أو سدسًا، قال: وما الفريضة؟ قال: لا أدري قال: ما منعك أن تدري؟! وإسناده حسن.وانظر ما سيأتي برقم (8181).وانظر تفصيل القول في هذه المسألة في كتاب "المغني" لابن قدامة 9/ 65 - 81.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8180)


8180 - وأخبرنا أبو عبد الله، حدثنا علي بن الحسن، حدثنا أبو مَعْمَر، حدثنا وُهَيب، عن أيوب، عن عِكْرمة، عن ابن عباس: أنَّ أبا بكر جعلَه أبًا؛ يعني الجدَّ [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাদাকে (উত্তরাধিকারের ক্ষেত্রে) পিতা হিসাবে গণ্য করতেন।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه بنحوه أحمد 5/ (3385) عن إسماعيل ابن عليّة، والبخاري (6738) من طريق عبد الوارث بن سعيد، كلاهما عن أيوب السختياني، بهذا الإسناد. وانظر تتمة تخريجه وشواهده في "مسند أحمد".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8181)


8181 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحر بن نَصر، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني ابن أبي الزِّناد، عن أبيه، عن خارجة بن زيد بن ثابت، عن أبيه: أنَّ عمر بن الخطّاب لمّا استشارهم في مِيراث الجدِّ والإخوة، قال زيد: وكان رأيي أنَّ الإخوة أَولى بالميراث من الجدِّ، وكان عمر يَرَى يومئذٍ أنَّ الجدَّ أَولى بميراث ابن ابنه من إخوته. قال زيدٌ: فحاورتُ أنا عمرَ، فضربتُ لعمرَ في ذلك مثلًا، وضربَ عليُّ بن أبي طالب وعبدُ الله بن عباس لعمر مثلًا يومَئِذٍ السَّيلَ [1]، يَضْرِبانه ويُصرِّفانه على نحو تصريف زيد [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




যায়দ ইবনে সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন দাদা (পিতামহ) ও ভাইদের মীরাস (উত্তরাধিকার) নিয়ে তাদের সাথে পরামর্শ করলেন, যায়দ বললেন: আমার অভিমত ছিল যে, ভাইয়েরা দাদার (পিতামহের) চেয়ে মীরাসের বেশি হকদার। আর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেদিন মনে করতেন যে, দাদা (পিতামহ) তাঁর নাতির মীরাসের ক্ষেত্রে তার ভাইদের চেয়ে বেশি হকদার। যায়দ বললেন: তখন আমি উমরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে তর্ক করলাম এবং এ ব্যাপারে উমরের কাছে একটি উদাহরণ পেশ করলাম। আর সেই দিন আলী ইবনে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উমরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে 'সাইল' (প্রবাহ বা ঢলের) উদাহরণ পেশ করেছিলেন, যা তারা যায়দের পেশ করা ব্যাখ্যার মতোই উপস্থাপন ও বিশ্লেষণ করেছিলেন।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: السبيل، وجاء على الصواب في "التلخيص". وأخرجه البيهقي 6/ 246 من طريق القاسم بن عبد الله بن المغيرة، عن إسماعيل بن أبي أويس، بهذا الإسناد.وأخرج نحوه عبد الرزاق (19051) و (19052)، والدارمي (655) و (2959) من طرق عن هشام بن عروة، عن أبيه، به.وأخرج ابن أبي شيبة 11/ 320 من طريق الزهري، عن سعيد بن المسيب: أنَّ عمر كتب في أمر الجدّ والكلالة في كتف، ثم طفق يستخير ربه، فلما طعن دعا بالكتف فمحاها، ثم قال: إني كنت كتبت كتابًا في الجد والكلالة، وإني قد رأيت أن أردَّكم على ما كنتم عليه، فلم يدروا ما كان في الكتف.وخبر جعل أبي بكر الصديق رضي الله عنه الجدَّ أبًا تقدم قريبًا برقم (8180).



[2] إسناده حسن من أجل ابن أبي الزناد: وهو عبد الرحمن.وأخرجه بنحوه البيهقي 6/ 247 من طريق أحمد بن عمرو بن السرح، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد ثم قال البيهقي: وزاد فيه غيره عن ابن أبي الزناد عن أبيه عن خارجة بن زيد عن أبيه .... قال زيد: فضربتُ لعمر في ذلك مثلًا، فقلت له: لو أنَّ شجرة تشعّبَ من أصلها غصن ثم تشعّب من ذلك الغصن خُوطانِ (والخُوط: الغصن الناعم)، ذلك الغصنُ يَجمَع ذَينِكَ الخوطين دون الأصل ويغذوهما، ألا ترى يا أمير المؤمنين أن أحد الخُوطين أقربُ إلى أخيه منه إلى الأصل؟ قال زيد: اضرب له أصل الشجرة مثلًا للجدّ، واضرب الغصن الذي تشعب من الأصل مثلًا للأب، واضرب الخُوطين اللذين تشعّبا من الغصن مثلًا للإخوة.وأخرج نحوه الدارقطني (4140)، والبيهقي 6/ 247 من طريق سعيد بن سليمان بن زيد بن ثابت، عن أبيه، عن جده.وانظر "مصنف عبد الرزاق" (19058)، و "سنن البيهقي" 6/ 247 - 248 من طريق الثوري، عن عيسى بن أبي عيسى المدني، عن الشعبي، قال: كان عمر كره الكلام في الجدّ حتى صار جدًّا … فذكر كلامًا طويلًا. وعيسى المدني متروك، والشعبي لم يسمع من عمر. وأخرجه البيهقي 6/ 246 من طريق القاسم بن عبد الله بن المغيرة، عن إسماعيل بن أبي أويس، بهذا الإسناد.وأخرج نحوه عبد الرزاق (19051) و (19052)، والدارمي (655) و (2959) من طرق عن هشام بن عروة، عن أبيه، به.وأخرج ابن أبي شيبة 11/ 320 من طريق الزهري، عن سعيد بن المسيب: أنَّ عمر كتب في أمر الجدّ والكلالة في كتف، ثم طفق يستخير ربه، فلما طعن دعا بالكتف فمحاها، ثم قال: إني كنت كتبت كتابًا في الجد والكلالة، وإني قد رأيت أن أردَّكم على ما كنتم عليه، فلم يدروا ما كان في الكتف.وخبر جعل أبي بكر الصديق رضي الله عنه الجدَّ أبًا تقدم قريبًا برقم (8180).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8182)


8182 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا الحسن بن علي بن زياد، حدثنا إسماعيل بن أبي أويس، حدثنا إسماعيل بن إبراهيم بن عُقْبة، عن عمِّه موسى بن عُقبة، قال: حدثنا عُرْوة بن الزُّبير، أنَّ مروان بن الحَكَم حدَّثه: أنَّ عمر حين طُعِنَ قال: إِنِّي رأيتُ في الجَدِّ رأيًا، فإن رأيتم أن تتّبِعُوه. فقال عثمان: إن نتَّبع رأيك، فهو رُشْدٌ، وإن نتَّبِعْ رأيَ الشيخ قبلَك، فنِعمَ ذو الرأي كان [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.




উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে যখন ছুরিকাঘাত করা হয়েছিল, তখন তিনি বললেন: নিশ্চয় আমি দাদার (মীরাসের অংশ) বিষয়ে একটি মতামত স্থির করেছি। যদি তোমরা মনে করো, তোমরা তা অনুসরণ করতে পারো। তখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যদি আমরা আপনার মত অনুসরণ করি, তবে তা সঠিক পথ হবে। আর যদি আমরা আপনার পূর্ববর্তী শায়খের (আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) মত অনুসরণ করি, তবে তিনি কতই না উত্তম মত পোষণকারী ছিলেন!




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل إسماعيل بن أبي أويس، وقد توبع. وأخرجه البيهقي 6/ 246 من طريق القاسم بن عبد الله بن المغيرة، عن إسماعيل بن أبي أويس، بهذا الإسناد.وأخرج نحوه عبد الرزاق (19051) و (19052)، والدارمي (655) و (2959) من طرق عن هشام بن عروة، عن أبيه، به.وأخرج ابن أبي شيبة 11/ 320 من طريق الزهري، عن سعيد بن المسيب: أنَّ عمر كتب في أمر الجدّ والكلالة في كتف، ثم طفق يستخير ربه، فلما طعن دعا بالكتف فمحاها، ثم قال: إني كنت كتبت كتابًا في الجد والكلالة، وإني قد رأيت أن أردَّكم على ما كنتم عليه، فلم يدروا ما كان في الكتف.وخبر جعل أبي بكر الصديق رضي الله عنه الجدَّ أبًا تقدم قريبًا برقم (8180).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8183)


8183 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثنا أبو كامل الجَحْدري، حدثنا الفُضَيل [1] بن سليمان، حدثنا موسى بن عُقْبة، عن إسحاق بن يحيى بن الوليد بن عُبَادة، عن عُبَادة بن الصامت قال: إِنَّ من قضاءِ رسول الله صلى الله عليه وسلم للجدَّتين من الميراث السُّدسَ بينهما بالسَّوِيّة [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বিচারসমূহের মধ্যে এটিও ছিল যে, দুই দাদী বা নানীর জন্য মীরাসের অংশ হলো এক-ষষ্ঠাংশ, যা তাদের উভয়ের মধ্যে সমানভাবে বণ্টিত হবে।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى الفضل.



[2] إسناده ضعيف، الفضيل بن سليمان - وهو النُّميري - ليِّن الحديث، وإسحاق بن يحيى بن الوليد مجهول الحال، ثم روايته عن جدِّ أبيه عبادة مرسلة. أبو كامل الجحدري: هو فضيل بن حسين بن طلحة.وهو في زوائد عبد الله على "مسند أحمد" 37/ ضمن الحديث (22778).وأخرجه الشاشي في "مسنده" (1199) ضمن حديث الأقضية من طريق الصلت بن مسعود، والبيهقي 6/ 235 من طريق محمد بن أبي بكر، كلاهما عن الفضيل بن سليمان، به.وفي الباب عن أبي بكر وعمر موقوفين عند مالك 2/ 513 و 514، وعبد الرزاق (19084)، وسعيد بن منصور (81)، وابن أبي شيبة 11/ 327، والدارقطني (4132) و (4133)، والبيهقي 6/ 234 و 235.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8184)


8184 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن محمد البغدادي، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا علي بن عبد الله المَدِيني، حدثنا يعقوب بن إبراهيم بن سعد، حدثنا أبي، عن ابن إسحاق، قال: حدثنا [محمد بن] [1] مسلم بن عبد الله بن شِهَاب، عن عُبيد الله بن عبد الله، عن ابن عباس أنه قال: أولُ من أعالَ الفرائضَ عمرُ وايمُ اللهِ، لو قدَّم من قدَّم اللهُ وأخَّر مَن أخَّر الله ما عالَتْ فريضةٌ. فقيل له: وأَيُّها قدَّم الله وأَيُّها أخَّر؟ فقال: كلُّ فريضة لم يُهبِطُها اللهُ عز وجل عن فريضةٍ إلَّا إلى فريضة، فهذا ما قدَّم الله عز وجل، وكلُّ فريضة إذا زالت عن فَرْضِها لم يكن لها إِلَّا ما بقي، فتلك التي أخَّر الله عز وجل كالزوج والزوجة والأمِّ، والذي أَخَّر كالأخَوات والبنات، فإذا اجتمعَ مَن قدَّم الله عز وجل وأخر بُدِئَ بمَن قَدَّم فأُعطِي حقَّه كاملًا، فإن بَقِيَ شيءٌ كان لمن أخَّر، وإن لم يَبْقَ شيءٌ فلا شيءَ له [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: যিনি সর্বপ্রথম ফারায়েযকে ‘আওল’ (উত্তরাধিকারীদের মধ্যে আনুপাতিক হারে অংশ কমিয়ে বন্টন) করলেন, তিনি হলেন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আল্লাহর কসম! আল্লাহ যাদেরকে অগ্রগামী করেছেন, তাদের যদি অগ্রগামী করা হতো এবং আল্লাহ যাদেরকে পিছিয়ে রেখেছেন, তাদের যদি পিছিয়ে রাখা হতো, তবে কোনো ফারায়েয ‘আওল’ হতো না। তখন তাঁকে জিজ্ঞাসা করা হলো: আল্লাহ কাদেরকে অগ্রগামী করেছেন এবং কাদেরকে পিছিয়ে রেখেছেন? তিনি বললেন: যে সমস্ত অংশ (ফারায়েয) থেকে আল্লাহ তা‘আলা কখনোই কাউকে নিম্নতর অংশে নামিয়ে দেননি, বরং শুধু একটি অংশ থেকে অন্য একটি অংশে নামিয়েছেন, এরাই হলো আল্লাহ তা‘আলা যাদেরকে অগ্রগামী করেছেন। আর প্রত্যেক অংশ (ফারায়েয) যা তার নির্দিষ্ট অংশ থেকে সরে গেলে অবশিষ্ট অংশ ছাড়া আর কিছুই থাকে না, এরাই হলো আল্লাহ তা‘আলা যাদেরকে পিছিয়ে রেখেছেন। যেমন—স্বামী, স্ত্রী ও মাতা (এই দলভুক্ত)। আর (অন্যান্য) পিছিয়ে রাখা দল হলো—বোনেরা ও কন্যারা। যখন আল্লাহ যাদেরকে অগ্রগামী করেছেন এবং যাদেরকে পিছিয়ে রেখেছেন, তারা একত্রিত হবে, তখন যাদেরকে অগ্রগামী করা হয়েছে, তাদের থেকে শুরু করা হবে এবং তাদের পূর্ণ হক দেওয়া হবে। যদি কিছু অবশিষ্ট থাকে, তবে তা পিছিয়ে রাখা দল পাবে। আর যদি কিছুই অবশিষ্ট না থাকে, তবে তাদের কিছুই প্রাপ্য হবে না।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] ما بين المعقوفين سقط من النسخ الخطية.



[2] إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق.وأخرجه ابن حزم في "المحلى" 9/ 264 تعليقًا عن إسماعيل بن إسحاق القاضي، بهذا الإسناد، وسياقه أتم.وأخرجه البيهقي 6/ 253 من طريق يونس بن بكير، عن محمد بن إسحاق، به.وأخرج سعيد بن منصور (36) عن سفيان بن عيينة، عن محمد بن إسحاق، به: قال ابن عباس: أترون الذي أحصى رملَ عالِجٍ عددًا جعل في مالٍ نصفًا وثلثًا وربعًا؟ إما هو نصفان، وثلاثة أثلاث، وأربعة أرباع.وأخرج عبد الرزاق (19022) عن معمر، عن الزهري، عن عبيد الله بن عبد الله قال: سمعت ابن عباس يقول: أحصى الله رملَ عالج، ولم يحصِ هذا؟! ما قال في مال ثلثان ونصف. يعني أن الفريضة لا تَعُول. وسنده صحيح.وأخرج سعيد بن منصور (35) من طريق عمرو بن دينار، وابن أبي شيبة 11/ 282 من طريق عطاء بن أبي رباح، كلاهما عن ابن عباس قال: الفرائض لا تَعُول. وسنداه صحيحان.العَوْل: هو زيادة السِّهام على الفريضة، فيدخل النقصانُ على سهام أهل الفروض.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8185)


8185 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو عُتبة أحمد بن الفَرَج، حدثنا بَقيَّة بن الوليد، حدثني أبو سَلَمة الحِمصي سليمان بن سُلَيم [1]، عن عمر [2] ابن رُوبَة، عن عبد الواحد بن عبد الله النَّصْري [3]، عن واثلة بن الأسقَع، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "تَحُوزُ المرأة ثلاثةَ مَوارِيث: عَتيقَها ولَقِيطَها والولدَ الذي لا عَنَت عليه" [4].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ওয়াছিলাহ ইবনুল আসক্বা’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নারী তিন প্রকার উত্তরাধিকারের (মীরাসের) অধিকারী হয়: তার আযাদকৃত গোলাম, তার কুড়িয়ে পাওয়া সন্তান (لقيط) এবং সেই সন্তান যার কারণে তাকে কষ্ট ভোগ করতে হয়নি।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في (ز) و (ب) إلى محمد وفي (ك) و (م) إلى: مسلم.



[2] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: عمرو.



8185 [3] - تحرَّف في النسخ الخطية إلى: عبد العزيز بن عبد الله البصري.



8185 [4] - إسناده ضعيف من أجل عمر بن روبة، فقد قال البخاري: فيه نظر، وقال أبو حاتم صالح الحديث ولا تقوم به الحجة، وساق له ابن عدي في "الكامل" 5/ 50 هذا الحديث من منكراته، وقال: أنكروا عليه أحاديثه عن عبد الواحد النصري. وذكر العقيلي عمر هذا في "ضعفائه"، بينما أورده ابن حبان في "ثقاته". وبقية بن الوليد - مع ضعفه وتدليسه - توبع. وقال البيهقي: في "معرفة السنن" 9/ 153: لم يُثبت البخاري ولا مسلم هذا الحديث لجهالة بعض رواته.وأخرجه أحمد 25 (16011)، والنسائي (6326) و (6387) من طرق عن بقية بن الوليد، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 25/ (16004) و 28 / (16981)، وأبو داود (2906)، وابن ماجه (2742)، والترمذي (2115)، والنسائي (6327) من طرق عن محمد بن حرب الخولاني، عن عمر بن روبة به، وقال الترمذي: حسن غريب لا نعرفه إلَّا من حديث محمد بن حرب على هذا الوجه.وأخرجه سعيد بن منصور في "سننه؟ (479)، وابن أبي شيبة 11/ 408 من طريق إسماعيل بن عياش، عن عمر بن روبة، به موقوفًا.ويشهد للقسم الثالث - وهو أن الملاعنة ترث ابنها - حديث عبد الله بن عمرو عند أبي داود (2908)، وسنده حسن، وانظر التعليق عليه هناك.قال الخطابي في "معالم السنن" 4/ 99: أما اللقيط فإنه في قول عامة الفقهاء حرٌّ، وإذا كان حرًا فلا ولاء عليه لأحد، والميراث إنما يُستحق بنسب أو ولاء، وليس بين اللقيط وملتقطِه واحدٌ منهما، وكان إسحاق بن راهويه يقول: ولاء اللقيط لملتقطِه، ويحتج بحديث واثلة، وهذا الحديث غير ثابت عند أهل النقل، وإذا لم يثبت الحديث لم يلزم القول به، وكان ما ذهب إليه عامة العلماء أَولى. وقال بعضهم: لا يخلو اللقيط من أن يكون حرًا فلا ولاء عليه، أو يكون ابن أَمَة قوم، فليس لملتقطه أن يسترقه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8186)


8186 - أخبرنا أبو عبد الله بن يعقوب الحافظ وأبو يحيى السَّمَرقندي، قالا: حدثنا محمد بن نصر الإمام، حدثنا يحيى بن يحيى، أخبرنا عبَّاد بن العوّام، عن عمر بن عامر عن حمَّاد، عن إبراهيم، عن ابن مسعود: أنه قال في مِيراث ابن الملاعَنة: مِيراثُه كلُّه لأمِّه [1].هذا حديث رواتُه كلُّهم ثِقات، وهو مرسل، وله شاهدٌ:




ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মুলা'আনার সন্তানের উত্তরাধিকার সম্পর্কে বলেন: তার সমুদয় উত্তরাধিকার তার মায়ের প্রাপ্য।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن. ورواية إبراهيم - وهو ابن يزيد النخعي - عن ابن مسعود مقبولة كما بيناه عند الرواية السالفة برقم (8163)، وقد توبع. حماد: هو حماد بن أبي سليمان.وأخرجه ابن أبي شيبة 11/ 336 عن عباد بن العوام، بهذا الإسناد. وزاد: فإن لم يكن له أم فهو لعَصَبته.وأخرجه الدارمي (2998) من طريق سالم بن نوح، عن عمر بن عامر، به بلفظ: ميراثه لأمه، تَعقِل عنه عَصَبةُ أمِّه.وأخرجه ابن أبي شيبة 11/ 336 من طريق الأعمش، والدارمي (2993) من طريق أبي معشر زياد بن كليب التميمي، كلاهما عن إبراهيم النخعي، به.وأخرجه عبد الرزاق (12479)، وابن أبي شيبة 11/ 337، والطبراني في "الكبير" (9662)، والبيهقي 6/ 258 من طريق قتادة، عن ابن مسعود. وقتادة لم يدرك ابن مسعود.وأخرج سعيد بن منصور (120)، وابن أبي شيبة 11/ 348، والدارمي (3145)، وابن المنذر في "الأوسط" (6854)، والبيهقي 6/ 258 من طريق محمد بن سالم، وعبد الرزاق (12482)، وابن أبي شيبة 11/ 339، والدارمي (3004)، وابن المنذر (6853)، والطبراني (9663) من طريق محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى، كلاهما عن الشعبي، عن علي وعبد الله قالا: عَصَبة ابن الملاعَنة أمُّه، ترث ماله أجمع، فإن لم تكن له أم فعَصَبتها عصبتُه. وطريقه الأول فيه محمد بن سالم متفق على ضعفه، وطريقه الثاني فيه ابن أبي ليلى سيئ الحفظ، ورواية الشعبي عن ابن مسعود مرسلة. زُريق، وأنه سأل الناس عن ذلك ولم يسمعه من النبي صلى الله عليه وسلم، فهو مع إبهامه مرسل، والله تعالى أعلم. وعدَّه البيهقي في "سننه" منقطعًا.واختلفوا في عبد الله بن عبيد الذي يروي عنه داود بن أبي هند من هو، فعدّه البخاريُّ وابنُ أبي حاتمٍ الأنصاريَّ، وهذا مجهول، وسمّاه الثوري وحمادٌ: عبدَ الله بن عبيد بن عمير، وفي رواية الثَّوري عند البيهقي نسبه إلى الأنصار، ووقع في رواية ابن جريج: عبد الله يعني ابن عبيد بن عمير، ورجّح الخطيب في "موضح الأوهام": أنَّ عبد الله بن عبيد هذا هو ابن عمير اللَّيثي، وهذا ثقة معروف.وأخرجه أبو طاهر المُخلِّص في "المخلصيات" (2836) عن عبد الله بن محمد البغوي، عن عبد الأعلى بن حماد بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود في "المراسيل" (362) - ومن طريقه البيهقي 6/ 259 - عن موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد بن سلمة به. ولفظه: "ولد الملاعنة عصبتُه عصبةَ أمه"، وقال البيهقي: منقطع.وأخرج عبد الرزاق (12477)، وابن أبي شيبة 10/ 170 و 339/ 11، والدارمي (3002)، والبيهقي 6/ 259، والخطيب في "موضح الأوهام" 1/ 136 و 136 - 137 من طريق سفيان الثوري، عن داود بن أبي هند، عن عبد الله بن عبيد بن عمير، قال: كتبتُ إلي أخ لي في بني زريق: لمن قضي رسول الله صلى الله عليه وسلم بابن الملاعنة؟ فكتب إلي: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قضى به لأمّه، هي بمنزلة أبيه ومنزلة أمّه.وأخرجه عبد الرزاق (12476) عن ابن جريج عن داود عن عبد الله يعني ابن عبيد بن عمير قال: كتبتُ إلى رجل من بني زريق من أهل المدينة يسأل عن ابن الملاعنة من يرثه؟ فكتب إليّ: أنه سأل فاجتمعوا على أن النبي صلى الله عليه وسلم قضى به للأم، وجعلها بمنزلة أبيه وأمه. فدلّت هذه الرواية على أن الرجل الزرقي المبهَم لم يسمعه من النبي صلى الله عليه وسلم، وإنما سأل عن ذلك أهل المدينة.وقد جاء في حديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده: أنَّ صاحب قصة الملاعنة كان زُرقيًا، فيما رواه النسائي (6328) وغيره.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8187)


8187 - أخبرَناه أبو يحيى وحدَه، حدثنا محمد بن نصر، حدثنا عبد الأعلى بن حمّاد، حدثنا حمّاد بن سَلَمة، عن داود بن أبي هِند، عن عبد الله بن عُبيد بن عُمير، عن رجل من أهل الشام: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال في ولد المُلاعَنة: "عَصَبَتْه أُمُّه" [1].




আব্দুল্লাহ ইবনে উবাইদ ইবনে উমাইর থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুলাআনার (লা'আনকারী দম্পতির) সন্তানের সম্পর্কে বলেছেন: “তার মা-ই হবে তার আসাবাহ (বৈধ উত্তরাধিকারী)।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف لإبهام الراوي له عن النبي صلى الله عليه وسلم، وسيأتي في بعض الروايات منسوبًا لبني زُريق، وأنه سأل الناس عن ذلك ولم يسمعه من النبي صلى الله عليه وسلم، فهو مع إبهامه مرسل، والله تعالى أعلم. وعدَّه البيهقي في "سننه" منقطعًا.واختلفوا في عبد الله بن عبيد الذي يروي عنه داود بن أبي هند من هو، فعدّه البخاريُّ وابنُ أبي حاتمٍ الأنصاريَّ، وهذا مجهول، وسمّاه الثوري وحمادٌ: عبدَ الله بن عبيد بن عمير، وفي رواية الثَّوري عند البيهقي نسبه إلى الأنصار، ووقع في رواية ابن جريج: عبد الله يعني ابن عبيد بن عمير، ورجّح الخطيب في "موضح الأوهام": أنَّ عبد الله بن عبيد هذا هو ابن عمير اللَّيثي، وهذا ثقة معروف.وأخرجه أبو طاهر المُخلِّص في "المخلصيات" (2836) عن عبد الله بن محمد البغوي، عن عبد الأعلى بن حماد بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود في "المراسيل" (362) - ومن طريقه البيهقي 6/ 259 - عن موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد بن سلمة به. ولفظه: "ولد الملاعنة عصبتُه عصبةَ أمه"، وقال البيهقي: منقطع.وأخرج عبد الرزاق (12477)، وابن أبي شيبة 10/ 170 و 339/ 11، والدارمي (3002)، والبيهقي 6/ 259، والخطيب في "موضح الأوهام" 1/ 136 و 136 - 137 من طريق سفيان الثوري، عن داود بن أبي هند، عن عبد الله بن عبيد بن عمير، قال: كتبتُ إلي أخ لي في بني زريق: لمن قضي رسول الله صلى الله عليه وسلم بابن الملاعنة؟ فكتب إلي: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قضى به لأمّه، هي بمنزلة أبيه ومنزلة أمّه.وأخرجه عبد الرزاق (12476) عن ابن جريج عن داود عن عبد الله يعني ابن عبيد بن عمير قال: كتبتُ إلى رجل من بني زريق من أهل المدينة يسأل عن ابن الملاعنة من يرثه؟ فكتب إليّ: أنه سأل فاجتمعوا على أن النبي صلى الله عليه وسلم قضى به للأم، وجعلها بمنزلة أبيه وأمه. فدلّت هذه الرواية على أن الرجل الزرقي المبهَم لم يسمعه من النبي صلى الله عليه وسلم، وإنما سأل عن ذلك أهل المدينة.وقد جاء في حديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده: أنَّ صاحب قصة الملاعنة كان زُرقيًا، فيما رواه النسائي (6328) وغيره.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8188)


8188 - وأخبرنا أبو يحيى، حدثنا محمد بن نصر، حدثنا محمد بن إسحاق، حدثنا يحيى بن أبي بُكير، عن إبراهيم بن طَهْمان عن سِمَاك، عن عِكرمة، عن ابن عباس قال: اختُصِمَ إلى علي بن أبي طالب في ولد مُلاعَنِة، فأعطَى ميراثَه أُمَّه، وجعلها عَصَبَتَه [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، ومحمد بن إسحاق هذا: هو الصَّغَاني بلا شكٍّ فيه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মুলাআনার (লিআনকৃত) সন্তানের বিষয়ে আলী ইবনে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে একটি মামলা পেশ করা হয়েছিল। তখন তিনি সেই সন্তানের উত্তরাধিকার তার মাকে প্রদান করলেন এবং তার মাকেই তার আসাবা (অবশিষ্ট উত্তরাধিকারী) বানালেন।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده حسن من أجل سماك، وهو - وإن كان في بعض رواياته عن عكرمة اضطراب - متابع. وأخرجه الدارمي (3011) عن محمد بن العلاء، والبيهقي 6/ 258 من طريق أبي الأزهر أحمد بن الأزهر، كلاهما عن يحيى بن أبي بكير، بهذا الإسناد.وسيأتي عند المصنف برقم (8214) من طريق عبد الرحمن بن مهدي عن إبراهيم بن طهمان.وأخرج عبد الرزاق (12481) عن الحسن بن عمارة، عن الحكم بن عُتيبة، عن يحيى بن الجزار، عن علي، قال: عصبة ابن الملاعنة عصبة أمّه. وابن عمارة متروك الحديث.وأخرج عبد الرزاق (12482)، وابن أبي شيبة 11/ 339، والدارمي (3004)، وابن المنذر (6853)، والطبراني (9663) من طريق محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن الشعبي، عن علي وعبد الله قالا: عصبة ابن الملاعنة عصبة أمه. وابن أبي ليلى يعتبر به في الشواهد والمتابعات.وأخرج سعيد بن منصور (120)، وابن أبي شيبة 11/ 348، والدارمي (3145)، وابن المنذر في "الأوسط" (6854)، والبيهقي 6/ 258 من طريق محمد بن سالم، عن الشعبي، عن علي وعبد الله، قالا: عصبة ابن الملاعنة أمُّه، ترث ماله أجمع، فإن لم تكن له أم فعصبتها عصبتُه. ومحمد بن سالم متفق على ضعفه. وقد سلف خبر عبد الله بن مسعود قبل حديث.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8189)


8189 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب عَوْدًا على بَدْءٍ، حدثنا الرَّبيع بن سليمان، حدثنا الشافعي، أخبرنا محمد بن الحسن عن أبي يوسف، عن عبد الله بن دينار عن ابن عمر، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "الوَلاءُ لُحْمَةٌ كلُّحْمةِ النَّسَب، لا يُباع ولا يُوهَبُ" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ওয়ালা (মুক্তিদানের ফলে সৃষ্ট সম্পর্ক) হলো বংশের সম্পর্কের মতো একটি সম্পর্ক, যা বিক্রি করা যায় না এবং দানও করা যায় না।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح من غير ذكر لُحمة النسب، وهذا إسناد لا بأس برواته، لكن سقط منه ذكر عبيد الله بن عمر بين أبي يوسف - وهو يعقوب بن إبراهيم بن حبيب الأنصاري القاضي صاحب أبي حنيفة - وبين عبد الله بن دينار، وقد رواه محمد بن الحسن في كتاب "الولاء" على الصواب بذكر عبيد الله بن عمر، وأبو يوسف لم يسمع من ابن دينار شيئًا فيما قاله الدارقطني في "الغرائب" كما في "أطرافه" لابن طاهر 3/ 387.وقال الدارقطني في "العلل" 13/ 63: والمحفوظ عن عبد الله بن دينار عن ابن عمر: أَن النَّبي صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع الولاء وعن هبته. وقال البيهقي في "بيان خطأ من أخطأ على الشافعي" ص 293: رواية الجماعة عن عبيد الله بن عمر عن عبد الله بن دينار عن ابن عمر عن النبي صلى الله عليه وسلم: أنه نهى عن بيع الولاء وعن هبته وكذلك رواه مالك والثوري وشعبة وسفيان بن عيينة وسليمان بن بلال والضحاك بن عثمان وإسماعيل بن جعفر وغيرهم عن عبد الله بن دينار.قلنا: ورواية الشافعي التي عند المصنف في "الأم" له 5/ 268، ومن طريق الشافعي أخرجه ابن المنذر في "الأوسط" (6945)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 10/ 292، وفي "معرفة السنن" (20494)، وفي "بيان خطأ من أخطأ على الشافعي" ص 291 - 292. وقال البيهقي عقبه في "المعرفة": كذا رواه الشافعي عن محمد بن الحسن الفقيه عن أبي يوسف القاضي، وكأنه رواه محمدُ بن الحسن للشافعي من حفظه، فنزل عن ذكر عبيد الله بن عمر في إسناده. وقد رواه محمد بن الحسن في كتاب "الولاء" عن أبي يوسف، عن عبيد الله بن عمر، عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم باللفظ الذي رواه الشافعي عنه، وهذا اللفظ بهذا الإسناد غير محفوظ، ورواية الجماعة عن عبد الله بن دينار عن ابن عمر: أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع الولاء وعن هبته.وأخرجه ابن حبان (4950) عن أبي يعلى عن بشر بن الوليد، عن يعقوب بن إبراهيم، عن عبيد الله بن عمر، عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الولاء لحمة كلحمة النسب، لا يباع ولا يوهب". فذكر فيه عبيد الله بن عمر، وبشر بن الوليد مختلف فيه كما في ترجمته من "اللسان" لابن حجر.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 6/ 8 من طريق غسان بن عبيد، عن شعبة، عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "الولاء لحمة كالنسب لا يباع ولا يوهب". وغسان بين عبيد مختلف فيه أيضًا، وقد تفرد من بين أصحاب شعبة بذكره بهذا اللفظ، والمحفوظ عن شعبة أنه كرواية الجماعة عن ابن دينار، أخرج روايته أحمد 9/ (5496) و 10/ (5850)، والبخاري (2535)، ومسلم (1506)، وأبو داود (2919)، وابن ماجه (2747)، والترمذي (1236)، والنسائي (6210) و (6381)، وابن حبان (4948) وغيرهم من طرق عنه.وأخرجه البيهقي في "السنن" 10/ 293 من طريق الطبراني، عن يحيى بن عبد الباقي الأذني، عن أبي عمير بن النحاس - وهو عيسى بن محمد بن إسحاق - عن ضمرة، عن سفيان، عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "الولاء لحمة كلحمة النسب، لا يباع ولا يوهب". وقال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن سفيان إلَّا ضمرة. قلنا: ضمرة هو ابن ربيعة الفلسطيني، وهو ثقة، لكن قال البيهقي: قد رواه إبراهيم بن محمد بن يوسف الفريابي (وقد سلفت هذه الرواية عند المصنف برقم: 2887 م) عن ضمرة كما رواه الجماعة: نهى عن بيع الولاء وعن هبته، فكأن الخطأ وقع من غيره، والله أعلم. قلنا فيكون الخلاف في لفظه بين عيسى أبي عمير وبين إبراهيم بن محمد الفريابي وهو صدوق حسن الحديث، وروايته أَولى بالقبول لكونها موافقة لرواية الجماعة، لذلك وهَّم البيهقي في "بيان الخطأ" ص 294 رواية أبي عمير وقال: قد أجمع أصحاب الثوري على خلافه.وقد ذكر له الدارقطني في "العلل" 13/ 63 طريقًا آخر عن الثوري، فقال: رواه أَبو إسماعيل محمد بن إسماعيل الفارسي عن الثوري فقال: عن عبد الله بن دينار عن ابن عمر: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الولاء لحمة كالنسب، لا يباع ولا يوهب"، ولم يروه عن الثوري بهذا اللفظ غيره، والمحفوظ: نهى عن بيع الولاء وعن هبته. قلنا: قال ابن حبان عن الفارسي: يُغرِب.ورواية الجماعة عن عبد الله بن دينار عن ابن عمر على الوجه أخرجها البخاري (6756) ومسلم (1506)، وانظر تتمة تخريجها في "مسند أحمد" 8/ (4560).وانظر ما بعده.وفي الباب عن عبد الله بن أبي أوفى عند أبي نعيم في "معرفة الصحابة" (4013)، وفي "تاريخ أصبهان" 2/ 8، ومن طريقه الخطيب في "تاريخ بغداد" 13/ 526، وفي سنده يحيى بن هاشم السمسار، وهو متروك متهم بالكذب. وتابعه عبيد بن القاسم عند الطبري في "تهذيب الآثار" كما في "البدر المنير" 9/ 717، وابن عدي في ترجمة عبيد بن القاسم الأسدي من "الكامل" 5/ 349، وهو أيضًا متروك متهم. وتحرَّف عبيد بن القاسم إلى عبثر بن القاسم على ابن الملقن في "البدر المنير"، فصحّحه لذلك!وعن أبي هريرة عند ابن عدي في "الكامل" 7/ 189 من طريق يحيى بن أبي أُنيسة، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة مرفوعًا. وقال عقبه: هذا ليس بمحفوظ عن الزهري. قلنا: يحيى بن أبي أنيسة قال الذهبي: تالف.وعن الحسن البصري، لكن اختلف عليه في رفعه ووقفه فأخرجه مرفوعًا عنه البيهقي 6/ 240، و 10/ 292. وأخرجه موقوفًا عنه عبد الرزاق (16147)، وابن أبي شيبة 6/ 123 و 11/ 419، والدارمي (3204). والموقوف أصحُّ. ومراسيل الحسن وهَّنها العلماء، انظر "طبقات ابن سعد" 9/ 158، و"سنن الدارقطني" 1/ 314، و "الكفاية" للخطيب ص 386، لذلك قال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 21/ 146: كانوا لا يعتمدون مراسيلَ الحسن، لأنَّه كان يأخذ عن كلِّ أحد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8190)


8190 - وقد حدَّثَناه عبد الرحمن بن حَمْدان، حدثنا أبو حاتم الرازي، حدثنا محمد بن مِهْران، حدثنا يحيى بن سُلَيم الطائفي [1]، عن إسماعيل بن أُميّة، عن نافع، عن ابن عمر، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم قال: "الولاء لُحْمةٌ من النَّسَب، لا يُباعُ ولا يُوهَب" [2]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ওয়ালা (মুক্তিদানের মাধ্যমে সৃষ্ট অভিভাবকত্ব) বংশগত সম্পর্কের মতো একটি সম্পর্ক, যা বিক্রি করা যায় না এবং দানও করা যায় না।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] وقع في النسخ الخطية: محمد بن مسلم، وهو في ظننا تحريف قديم تتابع عليه النساخ، فإنَّ إسماعيل بن أمية لا يروي عنه إلَّا يحيى بن سليم الطائفي، ولا يعرف هذا الخبر من هذا الطريق إلَّا من رواية يحيى هذا، وقد وهم فيه كما سيأتي.



[2] إسناده ضعيف لاضطراب يحيى بن سليم فيه، فقد اختلف عليه في إسناده ومتنه كما سيأتي.قال الدارقطني في "العلل" 13/ 63: رواه يحيى بن سليم الطائفي عن إسماعيل بن أمية عن نافع عن ابن عمر: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنما الولاء لحمة من النسب، لا يباع ولا يوهب"، حدث به محمد بن زياد الزيادي عن يحيى بن سليم الطائفي كذلك، ووهم في قوله: عن إسماعيل بن أمية. قلنا: طريق الزيادي عن يحيى بن سليم أخرجها الطبراني في "الأوسط" (1318)، والبيهقي 1/ 293.ثم قال الدارقطني: وخالفه يعقوب بن كاسب فرواه عن يحيى بن سليم، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر، وهذا أشبه عن يحيى بن سليم. قلنا: وطريق يعقوب بن حميد بن كاسب عن يحيى بن سليم أخرجها البيهقي 10/ 293، والرافعي في "التدوين في أخبار قزوين" 2/ 130. وقال البيهقي عقبه: هذا وهم من يحيى بن سليم أو ممّن دونه في الإسناد والمتن جميعًا، فإن الحفاظ إنما رووه عن عبيد الله بن عمر عن عبد الله بن دينار عن ابن عمر عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه نهى عن بيع الولاء وعن هبته.وجاء في "العلل" لابن أبي حاتم: (1645): سئل أبو زرعة عن حديث يعقوب بن حميد بن كاسب عن يحيى بن سليم الطائفي عن عبيد الله بن عمر عن نافع عن ابن عمر: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "الولاء لحمة كلحمة النسب، لا يباع ولا يوهب"، قال أبو زرعة: الصحيح: عبيد الله عن عبد الله بن دينار عن ابن عمر عن النبي صلى الله عليه وسلم: أنه نهى عن بيع الولاء وعن هبته.وأخرجه ابن ماجه (2747)، والترمذي في "العلل الكبير" (318) عن محمد بن عبد الملك بن أبي الشوارب، عن يحيى بن سليم، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر، قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن بيع الولاء وعن هبته. قال الترمذي عقبه: والصحيح عن عبد الله بن دينار، وعبد الله بن دينار قد تفرَّد بهذا الحديث عن ابن عمر، ويحيى بن سليم أخطأ في حديثه. وقال البيهقي 10/ 293: وقد رواه محمد بن عبد الملك بن أبي الشوارب عن يحيى بن سليم على الوهم في إسناده دون متنه.قلنا: لم ينفرد يحيى بن سليم بمتنه على اللفظ الأول، فقد تابعه سفيان الثوري عن عبيد الله ابن عمر، أخرجه ابن جميع الصيداوي في "معجم الشيوخ" ص 311 - 312 عن عبد الرحمن بن أحمد بن مليك، عن محمد بن إسحاق، عن زياد بن أيوب، عن جرير ويحيى القطان، عن الثوري، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "الولاء لحمة كلحمة النسب". لكن عبد الرحمن بن أحمد بن مليك لم نقف له على ترجمة، وهو غريب بهذا اللفظ عن سفيان الثوري، والمحفوظ ما رواه أصحاب سفيان (كأبي نعيم وعبد الله بن نمير ووكيع وعبد الرحمن بن مهدي) عنه عن عبد الله بن دينار عن ابن عمر بلفظ: نهى النبي صلى الله عليه وسلم عن بيع الولاء وعن هبته. أخرجه كذلك البخاري (6756)، ومسلم (1506)، وابن ماجه (2747)، والترمذي (1236)، والنسائي (6383)، وابن حبان (4949) وغيرهم.وأخرجه ابن عدي في ترجمة الحسن بن أبي الحسن المؤذن من "الكامل" 2/ 332 - ومن طريقه الخطيب في "موضح الأوهام" 2/ 30 - من طريق عَبد الله بن عمر، عن نافع، عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر مرفوعًا بلفظ: "إنما الولاء نسب، لا يصلح بيعه ولا شراؤه". وقال ابن عدي عقبَه: قوله: "عن نافع عن عبد الله" لا أدري وهم فيه أو تعمّد، فأراد يقلب الإسناد، وإِنما أراد يقول: عن نافع وعبد الله بن دينار؟ وقال ابن عدي عن الحسن المؤذن: منكر الحديث عن الثقات ويقلب الأسانيد. وعبد الله بن عمر وهو العمري ليّن الحديث أيضًا.وأخرجه ابن عدي 4/ 165 من طريق عبد الله بن نافع، عن أبيه، أنَّ ابن عمر كان يقول: إنما الولاء نسب، لا يصلح بيع الولاء ولا هبته، وقد قضي رسول الله صلى الله عليه وسلم أن الولاء لمن أعتق. فوقفه، وعبد الله بن نافع ضعيف.وأما من رواه من طريق نافع عن ابن عمر بلفظ رواية الجماعة:فأخرجه أبو عوانة (4807)، والخطيب البغدادي في "تاريخه" 6/ 306، وفي "الفصل للوصل" 1/ 579 من طريق سعيد بن يحيى بن سعيد، الأموي، عن أبيه، عبيد الله بن عمر، عن نافع وعبد الله بن دينار، عن ابن عمر، قال نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن بيع الولاء وعن هبته وقرن بنافع عبدَ الله بن دينار، ورجاله ثقات، وسئل أبو حاتم الرازي كما في "العلل" (1107) عن رواية سعيد الأموي هذه، فقال: أخذه نافع عن عبد الله بن دينار. وقال الدارقطني كما في "أطراف الغرائب" 3/ 465: لا نعلم رواه عن يحيى الأموي عن عبيد الله عن نافع وعبد الله بن دينار غير ابنه سعيد، ورواه علي بن عاصم عن عبيد الله بن عمر عنهما أيضًا، وتفرد به عنه أحمد بن عبيد بن ناصح. قلنا: وعلي بن عاصم وأحمد بن عبيد كلاهما ضعيف.وأخرجه كذلك أبو عوانة (4809) من طريق أبي ضمرة أنس بن عياض، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع وعبد الله بن دينار، عن ابن عمر أنه نهى عن بيع الولاء، وعن هبته، لكنه لم يرفعه، ورجاله في الجملة ثقات إن كان محمد بن أبان راويه عن أبي ضمرة هو القرشي، وإلَّا لم نعرفه، لكن قال ابن أبي حاتم الرازي في "العلل" (1130): سألت أبي وأبا زرعة عن حديث رواه أنس بن عياض، فذكر هذا الحديثَ، فقالا: هذا خطأ؛ وهم فيه أبو ضمرة، الناس يقولون: عبيد الله عن عبد الله بن دينار عن ابن عمر عن النبي صلى الله عليه وسلم، ويروون عن نافع عن ابن عمر موقوفًا: الولاء لحمة؛ وهذا هو الصحيح.وأخرجه الخطيب في تاريخه 5/ 478 من طريق عبد الرحمن بن مغراء، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن بيع الولاء وعن هبته وسنده ضعيف بمرة.وقد أخرج الخطيب هذا الحديث في "الفصل للوصل" 1/ 583 من طريق يحيى القطان، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر. وفي الطريق إليه بين ضعيف ومجهول.وأخرجه أيضًا 1/ 584 من طريق قبيصة بن عقبة، عن سفيان الثَّوري، عن عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر. وفي رواية قبيصة عن سفيان كلام، وقد سبقت الإشارة قريبًا إلى أنَّ أصحاب الثوري رووه عنه عن عبد الله بن دينار عن ابن عمر، وليس من طريق نافع عن ابن عمر.وتابع نصرُ بن مزاحم قبيصةَ عن الثوري عند الخطيب أيضًا 1/ 584 و 584 - 585، لكن نصر متروك متهم بالكذب، فلا يفرح بمتابعته. قال الخطيب في "الفصل للوصل" 1/ 580: رواية عبيد الله عن عبد الله بن دينار فهي المحفوظة، وأما روايته إياه عن نافع فهي غريبة جدًّا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8191)


8191 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق وعبد الله بن محمد بن موسى العَدْل قالا: حدثنا محمد بن أيوب، أخبرنا عمرو بن حُصَين العُقَيلي، حدثنا مُعتمِر بن سليمان، حدثنا سَلْم بن أبي الذَّيّال، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا مُساعاةَ في الإسلام، مَن ساعَي [1] في الجاهلية فقد أَلحَقتُهُ بعَصَبَتِه، ومن ادَّعى ولدًا من غير رِشْدةٍ لم يَرِثْ ولم يُورَثُ" [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وشاهدُه:




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইসলামে (অবৈধ সম্পর্কের মাধ্যমে) বংশের দাবি নেই। যে জাহিলিয়াতের যুগে (এরূপ) অবৈধ সম্পর্ক করেছে, আমি তার (ফলস্বরূপ জন্ম নেওয়া সন্তানকে) তার গোত্রীয় স্বজনদের সাথে যুক্ত করে দিয়েছি। আর যে ব্যক্তি বৈধ সম্পর্ক ছাড়া কোনো সন্তানের দাবি করে, সে উত্তরাধিকারী হবে না এবং তারও উত্তরাধিকারী হওয়া যাবে না।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تصحّف في النسخ الخطية إلى: لا مشاغاة … من شغي. وأخرجه أحمد في المسند 5/ (3416)، وكذا أبو داود (2264) عن يعقوب بن إبراهيم، كلاهما (أحمد ويعقوب) من طريق معتمر، عن سلم، عن بعض أصحابه، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فزادا فيه بين سلم وسعيد مبهمًا.وانظر ما بعده.قوله: "لا مساعاة"، قال الخطابي في "معالم السنن" 3/ 273: المساعاة: الزنى، وكان الأصمعي يجعل المساعاة في الإماء دون الحرائر، وذلك لأنهن يَسعَين لمواليهن، فيكتسبن لهم بضرائب كانت عليهن، فأبطل صلى الله عليه وسلم المساعاة في الإسلام، ولم يُلحق النسب لها، وعفا عما كان منها في الجاهلية، وألحق النسبَ به.وذكر ابن الأثير في "النهاية" نحو ذلك، وزاد يقال: ساعتِ الأَمَة: إذا فجرت، وساعاها فلان: إذا فجر بها، وهي مفاعَلة من السعي، كأن كل واحد منهما يسعى لصاحبه في حصول غرضه.وقوله: "من غير رِشدة" قال الخطابي وابن الأثير: يقال: هذا ولدُ رِشدةٍ: إذا كان لنكاح صحيح، كما يقال في ضدِّه: ولدُ زِنية، بكسر الراء والزاي وفتحهما لغتان.



[2] إسناده ضعيف جدًّا من أجل عمرو بن حصين العقيلي، قال أبو حاتم الرازي: ذاهب الحديث ليس بشيء، وقال أبو زرعة: ليس هو في موضع يحدث عنه هو واهي الحديث. وبه أعلَّه الذهبي في "التلخيص"، فقال: لعله موضوع! فإنَّ ابن الحصين تركوه. قلنا: وقد أسقط من إسناده مبهَمًا بين سلم وسعيد بن جبير كما جاء في رواية الثقات عن معتمر بن سليمان، فتبقى فيه علّة الإبهام والجهالة. وأخرجه أحمد في المسند 5/ (3416)، وكذا أبو داود (2264) عن يعقوب بن إبراهيم، كلاهما (أحمد ويعقوب) من طريق معتمر، عن سلم، عن بعض أصحابه، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فزادا فيه بين سلم وسعيد مبهمًا.وانظر ما بعده.قوله: "لا مساعاة"، قال الخطابي في "معالم السنن" 3/ 273: المساعاة: الزنى، وكان الأصمعي يجعل المساعاة في الإماء دون الحرائر، وذلك لأنهن يَسعَين لمواليهن، فيكتسبن لهم بضرائب كانت عليهن، فأبطل صلى الله عليه وسلم المساعاة في الإسلام، ولم يُلحق النسب لها، وعفا عما كان منها في الجاهلية، وألحق النسبَ به.وذكر ابن الأثير في "النهاية" نحو ذلك، وزاد يقال: ساعتِ الأَمَة: إذا فجرت، وساعاها فلان: إذا فجر بها، وهي مفاعَلة من السعي، كأن كل واحد منهما يسعى لصاحبه في حصول غرضه.وقوله: "من غير رِشدة" قال الخطابي وابن الأثير: يقال: هذا ولدُ رِشدةٍ: إذا كان لنكاح صحيح، كما يقال في ضدِّه: ولدُ زِنية، بكسر الراء والزاي وفتحهما لغتان.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8192)


8192 - ما أخبرَناه أبو عبد الله الصَّفَّار، حدثنا محمد بن إسماعيل السُّلَمي، حدثنا محمد بن بكَّار بن بلال، حدثنا محمد بن راشد عن سليمان بن موسى، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدِّه، أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم: قال: "مَن ادَّعى ولدًا من أَمَةٍ لا يَملِكُها، أو من حرَّةٍ عاهَرَ بها، فإنه لا يَلْحَقُ به ولا يَرِثُ، وهو ولدُ زِنًى لأهل أُمِّه مَن كانوا" [1].




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী কারীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি এমন দাসীর সন্তানকে নিজের সন্তান বলে দাবি করে যার সে মালিক নয়, অথবা এমন স্বাধীন নারীর সন্তানকে দাবি করে যার সাথে সে ব্যভিচার করেছে, তবে সেই সন্তানের বংশগত সম্পর্ক তার সাথে স্থাপিত হবে না এবং সে তার উত্তরাধিকারীও হবে না। সে হলো ব্যভিচারের সন্তান, সে তার মায়ের পরিবারের অন্তর্ভুক্ত হবে, তারা যে-ই হোক না কেন।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده حسن، وقد اختلف على عمرو بن شعيب في وصله وإرساله، والوصل أرجح.وأخرجه مطولًا ابن ماجه (2746) عن محمد بن يحيى، عن محمد بن بكار، بهذا الإسناد.وأخرجه كذلك أحمد 11/ (6699) و (7042)، وأبو داود (2265) و (2266) من طرق عن محمد بن راشد، به.وأخرجه ابن ماجه (2745) من طريق المثنى بن الصباح، والترمذي (2113) من طريق ابن لهيعة، كلاهما عن عمرو بن شعيب، به. والمثنى ضعيف، وابن لهيعة لم يسمع من عمرو بن شعيب فيما قاله أبو حاتم الرازي. وأخرجه مطولًا ومختصرًا عبد الرزاق (13851) و (19138)، وابن أبي شيبة 11/ 364 من طريق ابن جريج، وعبد الرزاق (13852) عن سفيان بن عيينة، عن يعقوب بن عطاء، كلاهما عن عمرو بن شعيب، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا. ويعقوب بن عطاء ضعيف.ورواه عبد الجبار بن العلاء عند الخطيب في "تاريخه" 6/ 159 عن سفيان بن عيينة، عن يعقوب بن عطاء، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، به موصولًا!وفي الباب عن ابن عمر في حديث طويل عند ابن حبان (5996)، وفيه: "فمن عَهَر بامرأة لا يملكها، أو بامرأة قوم آخرين فولدت فليس بولده، لا يرث ولا يورث". وإسناده حسن.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8193)


8193 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق وعلي بن حَمْشاذ، قالا: حدثنا بشر بن موسى، حدثنا الحُمَيدي، حدثنا سفيان، حدثنا أبو إسحاق، عن الحارث، عن علي، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إن أعيانَ بني الأمِّ يتوارثونَ دونَ بنى العَلَّات" [1].




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “নিশ্চয়ই পূর্ণ সহোদর ভাইয়েরা (যারা একই মায়ের সন্তান) কেবল বৈমাত্রেয় ভাইদের (যারা কেবল পিতার মাধ্যমে সম্পর্কিত) ব্যতীত উত্তরাধিকারী হয়।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف من أجل الحارث: وهو ابن عبد الله الأعور. سفيان: هو ابن عيينة، وأبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السبيعي.وهو في "مسند الحميدي" (55).وأخرجه أحمد 2/ (595)، والترمذي (2095) و (2122) من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: هذا حديث لا نعرفه إلَّا من حديث أبي إسحاق عن الحارث عن علي، وقد تكلّم بعض أهل العلم في الحارث، والعمل على هذا الحديث عند عامة أهل العلم.وسلف مطولًا برقم (8166). وأخرجه أحمد 23 / (14798)، والترمذي (2092) من طريق زكريا بن عدي، بهذا الإسناد.وقال الترمذي: حديث حسن صحيح، لا نعرفه إلَّا من حديث عبد الله بن محمد بن عقيل.وسلف برقم (8153).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8194)


8194 - حدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا موسى بن الحسن بن عبَّاد، حدثنا زكريا بن عَديّ، حدثنا عُبيد الله بن عمرو، عن عبد الله بن محمد بن عَقِيل، عن جابر بن عبد الله قال: جاءت امرأةُ سعد بن الرَّبيع فقالت: يا رسولَ الله، هاتانِ ابنتا سعد بن الرَّبيع، قُتل أبوهما معكَ يومَ أُحدٍ شهيدًا، وإنَّ عمَّهما أخذَ مالَهما فلم يَدَعْ لهما مالًا، فقال: "يَقضِي اللهُ في ذلك" قال: فنزلت آيةُ الميراث، فأرسلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إلى عمِّهما، فقال: "أعطِ ابنتَيْ سعدٍ الثُّلثَينِ، وأُمَّهما الثّمنَ، وما بقيَ فهو لك" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সা’দ ইবনু রাবী‘-এর স্ত্রী এসে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! এই দুইজন হলো সা’দ ইবনু রাবী‘-এর কন্যা। তাদের পিতা আপনার সঙ্গে উহুদের দিন শহীদ হয়েছেন। কিন্তু তাদের চাচা তাদের সকল সম্পদ নিয়ে নিয়েছেন এবং তাদের জন্য কিছুই অবশিষ্ট রাখেননি। তিনি (নবী) বললেন: আল্লাহ্‌ এ ব্যাপারে ফায়সালা করবেন। বর্ণনাকারী বলেন, এরপর মীরাসের (উত্তরাধিকারের) আয়াত নাযিল হলো। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের চাচার কাছে লোক পাঠালেন এবং বললেন: তুমি সা’দ-এর দুই কন্যাকে দুই-তৃতীয়াংশ এবং তাদের মাকে আট ভাগের এক ভাগ দাও। যা অবশিষ্ট থাকে, তা তোমার।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده محتمل للتحسين من أجل عبد الله بن محمد بن عقيل. وأخرجه أحمد 23 / (14798)، والترمذي (2092) من طريق زكريا بن عدي، بهذا الإسناد.وقال الترمذي: حديث حسن صحيح، لا نعرفه إلَّا من حديث عبد الله بن محمد بن عقيل.وسلف برقم (8153).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8195)


8195 - حدثنا أبو بكر أحمد بن إسحاق بن أيوب الإمام، أخبرنا محمد بن غالب، حدثنا زكريا بن يحيى، حدثنا عبد الله بن جعفر، حدثنا عبد الله بن دينار، عن ابن عمر قال: أقبَلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم على حمار، فلقيَه رجلٌ فقال: يا رسولَ الله، رجلٌ ترك عمَّتَه وخالتَه لا وارثَ له غيرُهما"، قال فرفع رأسَه إلى السماء، فقال: "اللهمَّ رجلٌ تركَ عمَّتَه وخالتَه لا وارثَ له غيرهما" ثم قال: "أين السائلُ؟ " قال: ها أنا ذا، قال: "لا ميراث لهما" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، فإنَّ عبد الله بن جعفر المَدِيني وإِن شَهِدَ عليه ابنُه بسُوءِ الحِفْظ، فليس ممن يُترَكُ حديثُه.وله شاهدٌ:




আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি গাধার পিঠে আরোহণ করে আসছিলেন। তখন এক ব্যক্তি তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! এক ব্যক্তি তার ফুফু ও খালাকে রেখে মারা গেছে। এই দুইজন ছাড়া তার আর কোনো ওয়ারিশ নেই। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন আকাশের দিকে মাথা তুলে বললেন: "হে আল্লাহ! এক ব্যক্তি তার ফুফু ও খালাকে রেখে মারা গেছে, তারা ছাড়া তার আর কোনো ওয়ারিশ নেই।" এরপর তিনি বললেন: "প্রশ্নকারী কোথায়?" লোকটি বলল: এই যে আমি। তিনি বললেন: "তাদের জন্য কোনো মীরাস (উত্তরাধিকার) নেই।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف من أجل عبد الله بن جعفر: وهو ابن نجيح المَديني. وبه أعلّه الذهبي في "التلخيص"، فقال: ولا احتجَّ به أحد.ولم نقف على من أخرجه غير المصنف. وانظر ما بعده. "الجوهر النقي" 6/ 213، وقال ابن الملقن في "البدر المنير" 7/ 202: لا أعرف حاله. قلنا: وقد رواه غير واحد من الثقات عن محمد بن عمرو فلم يذكروا فيه الحارث، إنما أرسلوه عن شريك بن أبي نمر عن النبي صلى الله عليه وسلم، وأعلَّه الذهبي في "التلخيص" بالشاذكوني وبالإرسال.وأخرجه مرسلًا ابن أبي شيبة 11/ 263، وهشام بن عمار في "حديثه" (142)، والدارقطني (4100) و (4160) من طرق عن محمد بن عمرو، عن شريك بن عبد الله بن أبي نمر قال: سُئل النبي صلى الله عليه وسلم، فذكره.قال الدارقطني: وكذلك رواه عبد الوهاب الثقفي وغيره عن محمد بن عمرو، ورواه مسعدة بن اليسع عن محمد بن عمرو عن أبي سلمة عن أبي هريرة، ووهم فيه والأول أصحُّ.قلنا: ومسعدة بن اليسع تالف متهم، وقد أخرج حديث أبي هريرة الدارقطنيُّ في "سننه" (4159)، وقال عقبه: لم يسنده غير مسعدة عن محمد بن عمرو، وهو ضعيف والصواب مرسل.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8196)


8196 - كما حدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن أحمد بن هارون العُوْدي، حدثنا سليمان بن داود الشَّاذَكُوني، حدثنا إسماعيل بن إبراهيم، حدثنا محمد بن عمرو بن عَلقَمة، عن شَريك بن أبي نَمِرٍ، أنَّ الحارث بن عبدٍ [1] أخبره: أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم سُئِلَ عن ميراث العمَّة والخالة، فسكتَ، فنزل عليه جبريلُ عليه السلام فقال: "حدَّثني جبريلُ أن لا ميراثَ لهما" [2].




আল-হারিথ ইবনে আব্দ থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ফুফু ও খালার উত্তরাধিকার (মীরাস) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হয়েছিল। তখন তিনি নীরব রইলেন। অতঃপর তাঁর কাছে জিবরীল (আঃ) অবতরণ করলেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "জিবরীল আমাকে জানিয়েছেন যে, তাদের (ফুফু ও খালার) জন্য কোনো উত্তরাধিকার নেই।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في (ك): عبدة. "الجوهر النقي" 6/ 213، وقال ابن الملقن في "البدر المنير" 7/ 202: لا أعرف حاله. قلنا: وقد رواه غير واحد من الثقات عن محمد بن عمرو فلم يذكروا فيه الحارث، إنما أرسلوه عن شريك بن أبي نمر عن النبي صلى الله عليه وسلم، وأعلَّه الذهبي في "التلخيص" بالشاذكوني وبالإرسال.وأخرجه مرسلًا ابن أبي شيبة 11/ 263، وهشام بن عمار في "حديثه" (142)، والدارقطني (4100) و (4160) من طرق عن محمد بن عمرو، عن شريك بن عبد الله بن أبي نمر قال: سُئل النبي صلى الله عليه وسلم، فذكره.قال الدارقطني: وكذلك رواه عبد الوهاب الثقفي وغيره عن محمد بن عمرو، ورواه مسعدة بن اليسع عن محمد بن عمرو عن أبي سلمة عن أبي هريرة، ووهم فيه والأول أصحُّ.قلنا: ومسعدة بن اليسع تالف متهم، وقد أخرج حديث أبي هريرة الدارقطنيُّ في "سننه" (4159)، وقال عقبه: لم يسنده غير مسعدة عن محمد بن عمرو، وهو ضعيف والصواب مرسل.



[2] إسناده ضعيف جدًّا، سليمان بن داود الشاذكوني متروك متهم، وتفرَّد فيه بذكر الحارث بن عبد، والحارث هذا مجهول لا يعرف في غير هذا الحديث عند الحاكم كما قال ابن التركماني في "الجوهر النقي" 6/ 213، وقال ابن الملقن في "البدر المنير" 7/ 202: لا أعرف حاله. قلنا: وقد رواه غير واحد من الثقات عن محمد بن عمرو فلم يذكروا فيه الحارث، إنما أرسلوه عن شريك بن أبي نمر عن النبي صلى الله عليه وسلم، وأعلَّه الذهبي في "التلخيص" بالشاذكوني وبالإرسال.وأخرجه مرسلًا ابن أبي شيبة 11/ 263، وهشام بن عمار في "حديثه" (142)، والدارقطني (4100) و (4160) من طرق عن محمد بن عمرو، عن شريك بن عبد الله بن أبي نمر قال: سُئل النبي صلى الله عليه وسلم، فذكره.قال الدارقطني: وكذلك رواه عبد الوهاب الثقفي وغيره عن محمد بن عمرو، ورواه مسعدة بن اليسع عن محمد بن عمرو عن أبي سلمة عن أبي هريرة، ووهم فيه والأول أصحُّ.قلنا: ومسعدة بن اليسع تالف متهم، وقد أخرج حديث أبي هريرة الدارقطنيُّ في "سننه" (4159)، وقال عقبه: لم يسنده غير مسعدة عن محمد بن عمرو، وهو ضعيف والصواب مرسل.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8197)


8197 - أخبرَناه أبو بكر بن أبي دارِم الحافظ بالكوفة، حدثنا أحمد بن موسى بن إسحاق التَّميمي، حدثنا أبو نُعيم ضِرارُ بن صُرَد، عن عبد العزيز بن محمد، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يَسَار، عن أبي سعيد الخُدْرِي: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم رَكِبَ إلى قُباءٍ وعلى الحمار إكَافٌ، فقال: "أَستَخيرُ الله تعالى في ميراث العمَّةِ والخالة"، فأوحى الله تعالى إليه: أنْ لا ميراثَ لهما [1]. فقد صحَّ حديث عبد الله بن جعفر بهذه الشواهد، ولم يُخرجاه.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুবায় গেলেন এবং গাধার উপর একটি পালান (ইকাফ) ছিল। তখন তিনি বললেন: 'আমি আল্লাহ তা'আলার নিকট ফুফু ও খালার মীরাস (উত্তরাধিকার) সম্পর্কে ইস্তিখারা (পরামর্শ) করছি।' অতঃপর আল্লাহ তা'আলা তাঁর কাছে ওহী পাঠালেন যে, তাদের দুজনের জন্য কোনো মীরাস নেই। এই শাহিদসমূহের (সমর্থক বর্ণনা) মাধ্যমে আব্দুল্লাহ ইবনু জাফরের হাদীস সহীহ হয়েছে, কিন্তু তারা (বুখারী ও মুসলিম) তা বর্ণনা করেননি।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل ضرار بن صرد، وبه أعلّه الذهبي في "التلخيص"، فقال: هو هالك. قلنا: وقد توبع، لكن اختلف فيه على زيد بن أسلم في وصله وإرساله، فهو ضعيف لاضطراب إسناده.وأخرجه الطبراني في "المعجم الصغير" (927) - وعنه أبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 2/ 265 - من طريق محمد بن الحارث المخزومي المدني، عن أبي مصعب الزهري، عن عبد العزيز الدراوردي، عن صفوان بن سليم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد الخدري، به. فجعل مكان زيد بن أسلم صفوان بن سليم، وقال الطبراني عقبه: لم يروه عن صفوان إلَّا الدراوردي، ولا عنه إلَّا أبو مصعب تفرد به محمد بن الحارث، ولا أعلم أحدًا ذكره إلَّا بخير.وقد رواه جمع من الثقات لم يذكروا فيه أبا سعيد الخدري:أخرجه كذلك الشافعي كما في "معرفة السنن والآثار" للبيهقي (12745)، وأخرجه سعيد بن منصور في "سننه" (163)، وأبو داود في "المراسيل" (361) - ومن طريقه البيهقي في "السنن الكبرى" 6/ 212 - 213 - عن عبد الله بن مسلمة، والدارقطني (4156)، والبيهقي في "معرفة السنن والآثار" (12746) من طريق أبي الجماهر محمد بن عثمان التنوخي، أربعتهم "الشافعي وسعيد وعبد الله وأبو الجماهر) عن عبد العزيز بن محمد الدراوردي، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار به مرسلًا. لم يذكروا أبا سعيد الخدري.وأخرجه كذلك الطحاوي في "معاني الآثار" 4/ 395 من طريق هشام بن سعد، والطحاوي 4/ 396، والبيهقي 6/ 212 من طريق محمد بن مطرف، والطحاوي 4/ 396، والبيهقي 6/ 212 من طريق محمد بن عبد الرحمن بن مجبّر، ثلاثتهم عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، به مرسلًا. ليس فيه أبو سعيد.وأخرجه عبد الرزاق (19109) عن معمر، وابن أبي شيبة 11/ 262، والطحاوي 4/ 395، والدارقطني 4157) من طريق هشام بن سعد، والطحاوي 3954، والدارقطني (4157) من طريق حفص بن ميسرة وعبد الرحمن بن زيد، أربعتهم عن زيد بن أسلم به معضلًا. ليس فيه ذكر عطاء بن يسار ولا أبو سعيد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8198)


8198 - أخبرنا الحسين بن الحسن بن أيوب، أخبرنا علي بن عبد العزيز، حدثنا أبو عُبيد، حدثني سعيد بن عُفَير، حدثني عُلْوان بن داود [عن حُميد بن عبد الرحمن بن حُميد بن عبد الرحمن بن عَوف] [1] عن صالح بن كَيْسان، عن حُميد بن عبد الرحمن بن عَوف، عن أبيه قال: دخلتُ على أبي بكر الصِّدِّيق في مرضِه الذي ماتَ فيه أعودُه، فسمعتُه يقول: وَدِدتُ أني سألتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم عن ميراثِ العمَّة والخالة، فإنَّ في نفسي منها حاجةً [2].




আব্দুর রহমান বিন আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আবু বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সেই অসুস্থতার সময় তাঁর সাথে দেখা করতে গেলাম, যে অসুখে তিনি ইন্তেকাল করেন। আমি তাঁকে বলতে শুনলাম: আমি আফসোস করি যে আমি যদি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ফুফু ও খালাদের মীরাস (উত্তরাধিকার) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করতে পারতাম। কারণ এ বিষয়ে আমার মনে একটি জিজ্ঞাসা (বা অপূর্ণতা) রয়ে গেছে।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] ما بين المعقوفين سقط من النسخ الخطية، واستدركناه من كتاب "الأموال" لأبي عبيد القاسم بن سلّام، فرواية المصنف من طريقه، ومن مصادر التخريج. والخبر في "الأموال" لأبي عبيد القاسم بن سلام (353)، لكن بلفظ: "ميراث العمة وابنة الأخ"، وكذا عند كل من أخرجه فيما سيأتي إلَّا العقيلي، فوقع فيه تحريف.وأخرجه مطولًا العقيلي في "الضعفاء" 3/ 316 - 318 عن يحيى بن أيوب العلّاف، والطبراني في "الكبير" (43) عن أبي الزنباع روح بن الفرج المصري، كلاهما عن سعيد بن كثير بن عفير، عن علوان بن داود عن حميد بن عبد الرحمن بن حميد، عن صالح بن كيسان، بهذا الإسناد لفظ العقيلي: "ميراث العمة وبنت الأخت"!وخالف الليثُ بن سعد سعيدَ بن عفير، فرواه عن علوان، عن صالح بن كيسان، عن حميد بن عبد الرحمن بن عوف، به. لم يذكر فيه بين علوان وبين صالح بن كيسان حميدَ بن عبد الرحمن الحفيد. أخرجه من طريق الليث حميدُ بن زنجويه في "الأموال" (467)، والطبري في "تاريخه" 3/ 29 - 431، والعقيلي 3/ 318.



[2] إسناده ضعيف، علوان بن داود، ويقال: ابن صالح البجلي، قال البخاري وأبو سعيد بن يونس: منكر الحديث، وقال العقيلي بعدما أخرج حديثه هذا مطولًا: لا يتابع على حديثه، ولا يعرف إلَّا به، وتساهل ابن حبان فذكره في "ثقاته"! وبعلوان هذا أعلّ الذهبي الحديث في "التلخيص"، وحميد بن عبد الرحمن بن حميد مجهول الحال. سعيد بن عفير: هو سعيد بن كثير بن عفير بن مسلم المصري. والخبر في "الأموال" لأبي عبيد القاسم بن سلام (353)، لكن بلفظ: "ميراث العمة وابنة الأخ"، وكذا عند كل من أخرجه فيما سيأتي إلَّا العقيلي، فوقع فيه تحريف.وأخرجه مطولًا العقيلي في "الضعفاء" 3/ 316 - 318 عن يحيى بن أيوب العلّاف، والطبراني في "الكبير" (43) عن أبي الزنباع روح بن الفرج المصري، كلاهما عن سعيد بن كثير بن عفير، عن علوان بن داود عن حميد بن عبد الرحمن بن حميد، عن صالح بن كيسان، بهذا الإسناد لفظ العقيلي: "ميراث العمة وبنت الأخت"!وخالف الليثُ بن سعد سعيدَ بن عفير، فرواه عن علوان، عن صالح بن كيسان، عن حميد بن عبد الرحمن بن عوف، به. لم يذكر فيه بين علوان وبين صالح بن كيسان حميدَ بن عبد الرحمن الحفيد. أخرجه من طريق الليث حميدُ بن زنجويه في "الأموال" (467)، والطبري في "تاريخه" 3/ 29 - 431، والعقيلي 3/ 318.