হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8239)


8239 - حدثنا أحمد بن كامل بن خلف القاضي، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى القاضي، حدثنا أبو حذيفة [1]، حدثنا إبراهيم بن طَهْمان عن عبد العزيز بن رُفيع، عن عُبيد بن عُمير، عن عائشة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لا يَحِلُّ دمُ امريءٍ من أهلِ القِبْلة إلَّا بإحدى ثلاث: قَتَلَ فيُقتَل، والثيِّبُ الزاني، والمُفارِقُ للجماعة" أو قال: "الخارجُ من الجماعة" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কিবলার অনুসারী (মুসলিম) কোনো মানুষের রক্তপাত (হত্যা) হালাল নয়, তবে তিনটি কারণের মধ্যে যেকোনো একটির ভিত্তিতে (তা বৈধ): যে হত্যা করে, ফলে তাকে হত্যা করা হবে (কিসাস); আর বিবাহিত যেনাকারী; এবং যে জামাআত (মুসলিম সমাজ) থেকে বিচ্ছিন্ন হয়ে যায়।" অথবা তিনি বলেছেন: "যে জামাআত থেকে বেরিয়ে যায়।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: خليفة، وجاء على الصواب في "إتحاف المهرة" (21951).وأبو حذيفة: هو موسى بن مسعود النهدي. ينفى من الأرض". قلنا: وهذا هو المحفوظ في رواية ابن طهمان، مع أنها شاذّة مخالفة لما رواه الناس عن عائشة، وسيأتي بيان ذلك برقم (8294).



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد لا بأس برجاله، لكن اختلف على إبراهيم بن طهمان فيه، فروي عنه عن عبد العزيز بن رفيع عن عبيد بن عمير عن عائشة، وروي عنه عن منصور بن المعتمر عن إبراهيم النخعي عن أبي معمر عن مسروق عن عائشة رفعه مرةً، ووقفه مرةً. وقد ساق المصنف هذه الطرق تباعًا، وسيأتي تخريجها في مواضعها. وكيفما دار فمداره على ثقة، ولا سيّما أنَّ إبراهيم بن طهمان متابع فيه. وسلف الحديث قريبًا من طريق آخر عن عائشة مرفوعًا برقم (8237)، وذكرنا هناك في تخريجه طريقًا ثالثًا له صحيحًا.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (3760) عن علي بن عبد العزيز، عن أبي حذيفة، بهذا الإسناد.وعنده مكان قوله: "المفارق للجماعة": ورجل خرج محاربًا الله ولرسوله فيُقتل ويصلب، أو ينفى من الأرض". قلنا: وهذا هو المحفوظ في رواية ابن طهمان، مع أنها شاذّة مخالفة لما رواه الناس عن عائشة، وسيأتي بيان ذلك برقم (8294).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8240)


8240 - وقد أخبرَناه محمد بن محمد بن عبد الله [1]، حدثنا مَحْمِش [2] بن عِصام، حدثنا حفص بن عبد الله.وحدثنا أبو الحسن محمد بن الحسين بن داود العلَوَي، حدثنا أحمد بن محمد بن الحسن الحافظ، حدثنا أحمد بن حفص، حدثني أبي، حدثنا إبراهيم بن طَهْمان، عن منصور بن المُعتمِر، عن إبراهيم، عن أبي مَعْمَر، عن مسروق، عن عائشة أمِّ المؤمنين أنها قالت: لا يَحِلُّ دمُ أحدٍ من أهل القبلة إلَّا بإحدى ثلاث: رجلٌ قَتَلَ فيُقتَلُ به، والثيِّبُ الزاني، والمُفارِقُ للجماعة [3].




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কিবলামুখী (মুসলিম) ব্যক্তির রক্ত তিনটি কারণ ছাড়া হালাল (বৈধ) নয়: যে ব্যক্তি হত্যা করেছে, ফলে তাকে কিসাসস্বরূপ হত্যা করা হবে; বিবাহিত যেনাকারী (ব্যভিচারী), এবং যে ব্যক্তি জামাআত (মুসলিম সমাজ/ধর্ম) থেকে বিচ্ছিন্ন হয়ে যায়।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: محمد بن عبد الله بن محمد، مقلوبًا. وهو محمد بن محمد بن عبد الله الشَّعِيري. وأخرجه الدارقطني في "السنن" (3094)، وفي "العلل" 5/ 255 من طريق عبد الرحمن بن مهدي، عن إبراهيم بن طهمان، بهذا الإسناد.



[2] تحَرّف في النسخ إلى: محمد. وأخرجه الدارقطني في "السنن" (3094)، وفي "العلل" 5/ 255 من طريق عبد الرحمن بن مهدي، عن إبراهيم بن طهمان، بهذا الإسناد.



8240 [3] - صحيح مرفوعًا، وهذا إسناد لا بأس برجاله إبراهيم: هو ابن يزيد النخعي، وأبو معمر: هو عبد الله بن سخبرة.وأخرجه الدارقطني في "السنن" (3095)، وفي "العلل" 5/ 255 من طريق أبي عامر عبد الملك بن عمرو العقدي، عن إبراهيم بن طهمان بهذا الإسناد.وتابع إبراهيمَ بنَ طهمان جريرُ بن عبد الحميد، فرواه عن منصور به موقوفًا عند ابن أبي شيبة 414/ 9، والدارقطني (3096) من طريقين عن جرير به.وانظر ما قبله وما بعده. وأخرجه الدارقطني في "السنن" (3094)، وفي "العلل" 5/ 255 من طريق عبد الرحمن بن مهدي، عن إبراهيم بن طهمان، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8241)


8241 - حدثنا أحمد بن كامل القاضي، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى القاضي، حدثنا أبو حُذيفة، حدثنا إبراهيم بن طَهْمان عن منصور، عن إبراهيم، عن أبي مَعمَر، عن مسروق، عن عائشة، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم، مثلَه [1].




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে অনুরূপ (পূর্বে বর্ণিত) হাদীস বর্ণনা করেছেন।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد لا بأس برجاله، سبق الكلام عليه في الرواية السالفة برقم (8239). وأخرجه الدارقطني في "السنن" (3094)، وفي "العلل" 5/ 255 من طريق عبد الرحمن بن مهدي، عن إبراهيم بن طهمان، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8242)


8242 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا محمد بن عيسى بن السَّكَن بواسط، حدثنا أبو منصور الحارث بن منصور، حدثنا إسرائيل، حدثنا عثمان الشَّحَّام، عن عكرمة، عن عبد الله بن عباس قال: كانت أُمُّ ولدِ لرجل كان له منها ابنانِ مثل اللُّؤلؤتين، وكانت تَشتِمُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم فينهاها ولا تنتهي، ويزجُرُها ولا تنزجِرُ، فلما كان ذاتُ ليلةٍ ذكرتِ النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فما صَبَرَ أن قام إلى مِغوَلٍ فَوَضَعَها في بطنها، ثم اتَّكأ عليها حتى أنقَذَها، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أَشْهَدُ أَنَّ دَمَها هَدْرٌ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তির একজন উম্মে ওয়ালাদ (দাসী, যার গর্ভে তার সন্তান আছে) ছিল। তার গর্ভে সেই ব্যক্তির মুক্তোর মতো সুন্দর দুটি পুত্র সন্তান ছিল। সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে গালি দিত। লোকটি তাকে বারণ করত, কিন্তু সে বিরত হতো না। সে তাকে ধমকাত, কিন্তু সে ধমক মানত না। অতঃপর এক রাতে সে যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নাম উল্লেখ করে (পুনরায়) গালি দিল, তখন লোকটি আর ধৈর্য ধারণ করতে পারল না। সে একটি ছোট তলোয়ার (খঞ্জর) নিয়ে তার পেটে ঢুকিয়ে দিল এবং তার ওপর ভর দিয়ে চাপ দিল, যতক্ষণ না সে মারা গেল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি, তার রক্ত বৃথা (অর্থাৎ তার হত্যার কোনো প্রতিশোধ বা দিয়াত নেই)।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث قوي، وهذا إسناد حسن في المتابعات من أجل الحارث بن منصور، وقد توبع. إسرائيل: هو ابن يونس السبيعي.وأخرجه أبو داود (4361)، والنسائي (3519) من طريق إسماعيل بن جعفر، عن إسرائيل، بهذا الإسناد.وفي الباب عن عليّ عند أبي داود (4362).قوله: "المغول" قال ابن الأثير في "النهاية": بالكسر: شبهُ سيف قصير، يشتمل به الرجلُ تحت ثيابه فيغطيه. وقيل: هو حديدة دقيقة لها حدٌّ ماض وقفًا.وقوله: "هدر" قال الجوهري في "الصحاح": ذهب دمُ فلان هَدْرًا وهَدَرًا بالتحريك، أي: باطلًا ليس فيه قَوَدٌ ولا عَقْلٌ.قال الخطابي في "معالم السنن" 3/ 295: وفيه بيان أن سابَّ النبي صلى الله عليه وسلم مقتول، وذلك أنَّ السبّ منها لرسول الله صلى الله عليه وسلم ارتدادٌ عن الدين، ولا أعلم أحدًا من المسلمين اختلف في وجوب قتله، ولكن إذا كان السابُّ ذميًا فقد اختلفوا فيه، فقال مالك بن أنس: من شتم النبي صلى الله عليه وسلم من اليهود والنصارى قُتل إلَّا أن يُسلِم، وكذلك قال أحمد بن حنبل، وقال الشافعي: يُقتل الذِّمِّي إذا سبَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم وتبرأ منه الذمة، واحتجَّ في ذلك بخبر كعب بن الأشرف، وحُكي عن أبي حنيفة أنه قال: لا يُقتل الذميُّ بشتم النبي صلى الله عليه وسلم، ما هم عليه من الشرك أعظم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8243)


8243 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار العُطَاردي، حدثنا أبو معاوية، حدثنا الأعمش، عن عمرو بن مُرَّة، عن سالم بن أبي الجعد، عن أبي بَرْزَةَ قال: تَغيَّظَ أبو بكر على رجلٍ، فقلت: مَن هو يا خليفةَ رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: لِمَ؟ قلتُ: لأضربَ عُنقَه إن أمرتني بذلك، قال: فقال أبو بكر: أوَكنتَ فاعلًا؟ قلت: نعم، قال: فوالله لأَذهَبَ عِظَمُ كلمتي التي قلتُ غضبَه، ثم قال: ما كانت لأحدٍ [1] بعد محمَّدٍ صلى الله عليه وسلم [2]. صحيح الإسناد على شرط الشيخين ولم يُخرجاه.




আবূ বَرْযাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একজন লোকের উপর রাগান্বিত হলেন। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূলের খলীফা (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! সে কে? তিনি (আবূ বাকর) বললেন, কেন? আমি বললাম, আপনি যদি আমাকে নির্দেশ দেন তবে আমি তার গর্দান উড়িয়ে দেব। আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, তুমি কি সত্যিই তা করতে? আমি বললাম, হ্যাঁ। তিনি বললেন, আল্লাহর শপথ! তুমি যে কঠোর কথাটি বললে তার গুরুত্ব আমার রাগ দূর করে দিল। এরপর তিনি বললেন, মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরে এই অধিকার আর কারও জন্য নেই।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في النسخ الخطية: ثم قل: "ما كنت لأجد"، والمثبت من "تلخيص المستدرك" ومن مصادر التخريج. يزيد بن زريع، عن يونس، عن حميد بن هلال، عن عبد الله بن مطرف بن الشخير، عن أبي برزة. فوصله يونس بذكر عبد الله بن مطرف بين حميد وأبي برزة. وقال النسائي عقبه: هذا أحسن هذه الأحاديث وأجودها. وكذلك صحَّح هذا الطريق أبو زرعة وأبو حاتم كما في "العلل" لابن أبي حاتم (1343) و (1347). وقال البزار: وهذا الحديث لا نعلمه يروى إلا عن أبي برزة عن أبي بكر، وله عن أبي برزة طرق كثيرة، وهذا الطريق من أحسن طريق يروى عن أبي برزة.لكن يعكَّر على رواية يزيدَ بن زريع مخالفةُ حماد بن سلمة له، فقد رواه فيما ذكر ابن أبي حاتم في "العلل" (1343) - عن يونس بن عبيد، عن حميد بن هلال، عن أبي برزة. فأسقط الوساطة، فصار كما رواه عمرو بن مرة عن حميد عن أبي برزة في رواية شعبة المذكورة آنفًا. ووقعت رواية حماد بن سلمة في "سنن أبي داود" (4363): عن يونس عن حميد عن النبي صلى الله عليه وسلم!وكذلك لم يذكر الوساطةَ كحماد وشعبة سليمانُ بنُ المغيرة - فيما رواه ابن أبي عاصم ص 118 - عن هدبة بن خالد عنه، عن حميد بن هلال، عن أبي برزة. فهؤلاء ثلاثة حفاظ كبار، لا نُرى رواية يزيد بن زريع ترجح عليهم، والله أعلم.وانظر ما بعده.



[2] خبر صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات لكن اختلف فيه على عمرو بن مرة كما سيأتي.أبو معاوية: هو محمد بن خازم الضرير، وأبو برزة: اسمه نضلة بن عبيد.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الديات" ص 118، والمروزي في "مسند أبي بكر" (68)، والنسائي (3521)، والطحاوي في "شرح المشكل" 12/ 407 - 408 من طريق أبي معاوية، بهذا الإسناد.وتابع أبا معاوية أيضًا على هذا الإسناد محمدُ بن فضيل فيما ذكر البخاري في "التاريخ" 5/ 196، ومحمدُ بن أنس فيما ذكر ابن أبي حاتم في "العلل" (1347). وقال البخاري: لا يصح فيه سالم.وخالف أبا معاوية ومحمدَ بن أنس جمعٌ: يعلى بن عبيد عند الحميدي (6)، والنسائي (3522)، وابن أبي عاصم ص 118، وأبو عوانة الوضاح اليشكري عند النسائي (3523)، وعبدُ الله بن نمير عند ابن أبي عاصم ص 118، وحفص بن غياث وعبد الواحد بن زياد عند الطحاوي 12/ 408 و 408 - 409، فرووه عن سليمان الأعمش، عن عمرو بن مرة، عن أبي البختري، عن أبي برزة. فجعلوا مكان سالم بن أبي الجعد أبا البختري سعيد بن فيروز. وهذا هو المحفوظ في رواية الأعمش عن عمرو بن مرة، فقد قال أبو زرعة كما في "العلل" (1347): الصحيح من حديث الأعمش عن عمرو بن مرة عن أبي البختري. وقال النسائي: وهذا أَولى بالصواب. وقول البخاري في "التاريخ": لا يصح فيه سالم وأبو البختري؛ يعني أنَّ الحديث لا يصح من طريقهما عن أبي برزة.وخالف الأعمشَ زيد بن أبي أنيسة عند ابن أبي عاصم ص 118، والنسائي (3524)، فرواه عن عمرو بن مرة، عن أبي نضرة، عن أبي برزة. قال النسائي عقبه: هذا خطأ، والصواب أبو نصر.ثم أخرجه النسائي (3525)، والمروزي (67) من طريق شعبة، عن عمرو بن مرة، عن أبي نصر، عن أبي برزة. في رواية المروزي سمى أبا نصر حميد بن هلال، وقال النسائي: أبو نصر هو حميد بن هلال، ورواه عنه يونس بن عبيد فأسنده.وطريق يونس بن عبيد هذا أخرجه أحمد 1/ (61)، وأبو داود (4363)، وابن أبي عاصم ص 118، والبزار في "مسنده" (49) و 1/ 197، والنسائي (3526)، وأبو يعلى (79) من طريق يزيد بن زريع، عن يونس، عن حميد بن هلال، عن عبد الله بن مطرف بن الشخير، عن أبي برزة. فوصله يونس بذكر عبد الله بن مطرف بين حميد وأبي برزة. وقال النسائي عقبه: هذا أحسن هذه الأحاديث وأجودها. وكذلك صحَّح هذا الطريق أبو زرعة وأبو حاتم كما في "العلل" لابن أبي حاتم (1343) و (1347). وقال البزار: وهذا الحديث لا نعلمه يروى إلا عن أبي برزة عن أبي بكر، وله عن أبي برزة طرق كثيرة، وهذا الطريق من أحسن طريق يروى عن أبي برزة.لكن يعكَّر على رواية يزيدَ بن زريع مخالفةُ حماد بن سلمة له، فقد رواه فيما ذكر ابن أبي حاتم في "العلل" (1343) - عن يونس بن عبيد، عن حميد بن هلال، عن أبي برزة. فأسقط الوساطة، فصار كما رواه عمرو بن مرة عن حميد عن أبي برزة في رواية شعبة المذكورة آنفًا. ووقعت رواية حماد بن سلمة في "سنن أبي داود" (4363): عن يونس عن حميد عن النبي صلى الله عليه وسلم!وكذلك لم يذكر الوساطةَ كحماد وشعبة سليمانُ بنُ المغيرة - فيما رواه ابن أبي عاصم ص 118 - عن هدبة بن خالد عنه، عن حميد بن هلال، عن أبي برزة. فهؤلاء ثلاثة حفاظ كبار، لا نُرى رواية يزيد بن زريع ترجح عليهم، والله أعلم.وانظر ما بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8244)


8244 - أخبرَناه محمد بن الحسن النَّصْراباذي، حدثنا يحيى بن محمد الحِنَّائي، حدثنا عبيد الله بن معاذ، أبي، حدثنا شُعْبة، عن تَوْبَةَ العَنْبري، قال: سمعتُ أبا السَّوّار عبد الله بن قُدامة بن عَنَزةَ القاضي يُحدِّث عن أبي بَرْزة الأسلمي قال: أغلَظَ رجلٌ لأبي بكر الصديق فقلتُ: يا خليفةَ رسول الله، ألا أقتلُه؟ فقال: ليسَ هذا إَّلا لمن شَتَمَ النبيَّ صلى الله عليه وسلم [1].




আবূ বারযাহ আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি আবূ বাকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর প্রতি কঠোর বাক্য প্রয়োগ করল (বা তাঁকে গালি দিল)। আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ-এর খলীফা! আমি কি তাকে হত্যা করব না? তিনি বললেন, এই (হত্যার) বিধান কেবল ওই ব্যক্তির জন্য প্রযোজ্য, যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে গালি দেয়।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات غير عبد الله بن قدامة، فقد تفرَّد بالرواية عنه توبة العنبري، ولم يرو هو عن غير أبي برزة نضلة بن عبيد، ولم نقف لعبد الله بن قدامة على حديث غير هذا، ومع ذلك وثّقه النسائي فيما نقله عنه المزّي.وأخرجه النسائي (3520) عن عمرو بن علي، عن معاذ بن معاذ العنبري، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 1/ (54) عن محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8245)


8245 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الرَّبيع بن سليمان، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني سليمان بن بلال، عن عمرو مولى المُطَّلب، عن عكرمة، عن ابن عباس، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "مَن وَجَدتُموه يعملُ عملَ قوم لوطٍ، فاقتلوا الفاعلَ والمفعولَ به" [1]. قال سليمان بن بلال: سمعتُ يحيى بن سَعيد وربيعةَ يقولان: مَن عَمِلَ عملَ قوم لُوطٍ فعليه الرجمُ، أَحْصَنَ أو لم يُحصَنُ.هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.وله شاهد:




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা যদি কাউকে লূত জাতির কাজ করতে দেখ, তাহলে যে কাজ করে (কর্তা) এবং যার ওপর করা হয় (ভোক্তা), উভয়কেই হত্যা করো।" সুলায়মান ইবনু বিলাল বলেন: আমি ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ ও রাবী‘আহকে বলতে শুনেছি: যে ব্যক্তি লূত জাতির কাজ করবে, তার উপর রজম (পাথর নিক্ষেপে মৃত্যুদণ্ড) ওয়াজিব, সে বিবাহিত হোক বা অবিবাহিত হোক। এই হাদীসের সনদ সহীহ, কিন্তু তারা (বুখারী ও মুসলিম) এটি উদ্ধৃত করেননি। এর একটি সমর্থক বর্ণনা রয়েছে।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] ضعيف مرفوعًا، قوي موقوفًا، عمرو مولى المطلب وإن كان صدوقًا لكن أحاديثه عن عكرمة كلُّها مضطربة كما قال الإمام أحمد، فيما نقله عنه ابن رجب في "شرح العلل" 2/ 798.وقد اضطرب في لفظ هذا الحديث، فرواه مرةً بلفظ القتل، ومرةً بلفظ الرجم، ومرة بلفظ اللعن، ورواه غيره - كما سيأتي - فوقفه على ابن عباس، وهو الصواب. وقد أنكر العلماءُ روايتَه عن عكرمة عامةً، وهذا الحديثَ خاصةً، فقال ابن معين كما في "كامل ابن عدي" 5/ 116: عمرو بن أبي عمرو ثقة، يُنكر عليه حديث عكرمة عن ابن عباس أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "اقتلوا الفاعل والمفعول فيه". وقال البخاري كما في "علل الترمذي" ص 236: صدوق، ولكن روى عن عكرمة مناكير، ولم يذكر في شيء من ذلك سمع من عكرمة. وقال العجلي: أنكروا عليه حديث البهيمة (وهو قسم من هذا الحديث، وسيأتي بعد حديث). وقال أبو داود: حديث عاصم (يعني: ليس على الذي يأتي البهيمة حدٌّ، الآتي عند المصنف برقم 8249) يُضعَّف حديث عمرو بن أبي عمرو. ونقل ابن قدامة في "المغني" 12/ 352 أنَّ الإمام أحمد لا يُثبت حديث عمرو بن أبي عمرو.وسيأتي عند المصنف برقم (8250) بلفظ اللعن بدل القتل، وهذا من اضطراب عمرو فيه.وأخرجه البيهقي 8/ 231 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقرن به أبا بكر القاضي.وأخرجه ابن الجارود في "المنتقى" (820) عن الربيع بن سليمان، به.وأخرجه الآجري في ذم "اللواط" (26) من طريق محمد بن داود بن رزق، عن ابن وهب، به.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (11527) من طريق عبد العزيز بن يحيى المدني، حدثنا سليمان بن بلال، عن حسين بن عبد الله، عن عكرمة به، فجعل مكان عمرو بن أبي عمرو حسينَ بن عبد الله بن عبيد الله بن عباس، وعبد العزيز المدني متروك متهم، وحسين ضعيف، فلا يفرح به.أحمد 4/ (2732)، وأبو داود (4462)، وابن ماجه (2561)، والترمذي (1456) من طريق عبد العزيز بن محمد الدراوردي، عن عمرو بن أبي عمرو، به.وأخرجه موقوفًا أبو داود (4463) من طريق عبد الرزاق، والنسائي (7298) من طريق محمد بن ربيعة، كلاهما عن ابن جريج قال: أخبرني ابن خثيم - وهو عبد الله بن عثمان - قال: سمعت سعيد بن جبير ومجاهدًا يحدثان عن ابن عباس في البكر يوجد على اللُّوطية، قال: يُرجَم.وإسناده قوي. وعند النسائي مكان مجاهدٍ عكرمةُ، وهو وهم، فقد جاء على الصواب عند الدارقطني في "سننه" (3235)، ورواه أيضًا كرواية عبد الرزاق محمدُ بن بكر عند ابن أبي شيبة 9/ 530، وروحُ بن عبادة عند ابن المنذر في "الأوسط" (9650)، كلاهما عن ابن جريج على الصواب.وروى ابن معين في "التاريخ" (4639 - رواية الدوري)، وابن أبي شيبة 9/ 529، وابن أبي الدنيا في ذم "الملاهي" (125)، والآجري في ذم "اللواط" (30)، والبيهقي 8/ 232 من طريق أبي نضرة قال: سئل ابن عباس: ما حدُّ اللوطي؟ قال: يُنظَر أعلى بناء في القرية فيُرمى به منكَّسًا، ثم يُتبَع بالحجارة. ورجاله ثقات، فلو كان فيه عند ابن عباس حكمٌ مرفوع إلى النبي صلى الله عليه وسلم، ما تعدّاه إلى رأيه، والله تعالى أعلم.قال الترمذي في "جامعه": اختلف أهل العلم في حد اللوطي، فرأى بعضهم: أنَّ عليه الرجم أحصن أو لم يُحصن، وهذا قول مالك والشافعي وأحمد وإسحاق.وقال بعض أهل العلم من فقهاء التابعين منهم: الحسن البصري وإبراهيم النخعي وعطاء بن أبي رباح وغيرهم، قالوا: حدُّ اللوطي حدُّ الزاني، وهو قول الثّوري وأهل الكوفة.قال الخطابي: رتّب الفقهاء القتل المأمور به (يعني في اللوطة) على معاني ما جاء فيه في أحكام الشريعة، فقالوا: يقتل بالحجارة رجمًا إن كان محصنًا، ويُجلد مئة إن كان بكرًا، ولا يُقتل. وإلى هذا ذهب سعيد بن المسيب وعطاء بن أبي رباح والنخعي والحسن وقتادة، وهو أظهر قولَي الشافعي، وحُكي ذلك أيضًا عن أبي يوسف ومحمد وقال الأوزاعي: حكمُه حكمُ الزاني، وقال مالك بن أنس وإسحاق بن راهويه: يُرجم إن أَحصن أولم يُحصن، روي ذلك عن الشعبي، وقال أبو حنيفة: يُعزّر ولا يُحدّ، وذلك أنَّ هذا الفعل ليس عندهم بزني.والظاهرية يذهبون في ذلك مذهب أبي حنيفة، يعني في تعزير من فَعَل هذا الفعل كقول أبي حنيفة.كما في "المحلى" 11/ 382 لابن حزم.وانظر "المغني" لابن قدامة 12/ 348 - 349.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8246)


8246 - حدثنا أحمد بن سهل الفقيه ببُخارى، أخبرنا أبو عِصمةَ سهل بن المُتوكِّل، حدثنا القَعْنَبي، حدثنا عبد الرحمن بن عبد الله بن عمر بن حفص بن عاصم بن عمر بن الخطّاب، عن سُهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن عَمِلَ عمل قوم لوطٍ، فارجُموا الفاعلَ والمفعولَ به" [1].




আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি লূত কওমের অনুরূপ কাজ (সমকামিতা) করে, তোমরা কর্তা ও যার সাথে করা হয়েছে (উভয়কেই) পাথর মেরে হত্যা করো।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، عبد الرحمن بن عبد الله العمري متروك، وقد توبع بما لا تقوم به الحجة، وبه أعلّه الذهبي في "التلخيص"، فقال: عبد الرحمن ساقط.وأخرجه الخرائطي في "مساوئ الأخلاق" (417)، والآجري في "ذم اللواط" (28) و (31) من طريق يعقوب بن محمد الزهري، عن عبد الرحمن بن عبد الله بن عمر، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن ماجه (2562) من طريق عاصم بن عمر بن حفص العمري، وابن حزم في "المحلى" 11/ 383 من طريق القاسم بن عبد الله بن عمر العمري، كلاهما عن سهيل بن أبي صالح، به.ورواية القاسم بلفظ القتل لا الرجم وعاصم بن عمر العمري متفق على ضعفه، والقاسم بن عبد الله تالف، واتهمه الإمام أحمد. وقد أشار الترمذي في "جامعه" بإثر الحديث (1456) إلى حديث عاصم، فقال: هذا حديث في إسناده مقال، ولا نعلم أحدًا رواه عن سهيل بن أبي صالح غير عاصم بن عمر العمري! وعاصم بن عمر يضعف في الحديث من قبل حفظه. وقال ابن حزم: وأما حديث أبي هريرة، فانفرد به القاسمُ بن عبد الله بن عمر بن حفص! وهو مطَّرَح في غاية السقوط.ووقع إسناد لهذا الحديث عند ابن حزم 11/ 384: عبيد الله بن رافع، عن عاصم بن عبيد الله، عن سهيل بن أبي صالح. ونرى أنه تحرَّف عن عبد الله بن نافع عن عاصم بن عمر، خاصة أنه من رواية يونس بن عبد الأعلى عن عبد الله بن نافع، وهو شيخ ابن ماجه فيه. سمعتُ من رسول الله صلى الله عليه وسلم في ذلك شيئًا، ولكن أرى رسول صلى الله عليه وسلم كره أن يؤكل من لحمها أو ينتفع بها وقد عُمل بها ذلك العمل. وقال أبو داود عقبه: ليس هذا بالقوي. وقال الترمذي: هذا حديث لا نعرفه إلَّا من حديث عمرو بن أبي عمرو عن عكرمة عن ابن عباس عن النبي صلى الله عليه وسلم. وقال البخاري كما في "علل الترمذي" ص 236: لا أقول بحديث عمرو بن أبي عمرو: أنه من وقع على بهيمة أنه يقتل.وفي باب قتل مُواقِع البهيمة عن أبي هريرة عند أبي يعلى (5987)، وعنه ابن عدي في "الكامل" 1/ 32 وإسناده ضعيف، فيه عبد الغفار بن عبد الله بن الزبير، لم يوثقه غير ابن حبان، وقد قال أبو يعلى بإثره: ثم بلغني أنه رجع عنه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8247)


8247 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الزاهد، حدثنا محمد بن مَسلَمة، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا عبد الله بن جعفر المَخْرَمي، عن عمرو بن أبي عمرو، عن عكرمة، عن ابن عباس، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم قال: "مَن وَجَدتُّموه يعملُ عملَ قوم لوطٍ فاقتلوا الفاعلَ والمفعولَ به، ومَن وَجَدتُموه يأتي بَهيمةً فاقتلوه واقتلوا البهيمةَ معه" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وللزِّيادة في ذكر البَهيمة شاهد:




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা যাকে কওমে লূতের (লূত (আঃ)-এর জাতির) মতো কাজ করতে দেখবে, তোমরা কর্তা (সক্রিয় ব্যক্তি) এবং যার উপর করা হয়েছে (নিষ্ক্রিয় ব্যক্তি) উভয়কেই হত্যা করো। আর তোমরা যাকে কোনো পশুর সাথে কুকর্ম করতে দেখবে, তোমরা তাকে হত্যা করো এবং পশুটিকেও তার সাথে হত্যা করো।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] ضعيف مرفوعًا، والصحيح وقفه كما سبق بيانه عند الرواية السالفة برقم (8245).وأخرجه الطبري في مسند ابن عباس من "تهذيب الآثار" 1/ 554 عن مجاهد بن موسى، عن يزيد بن هارون بهذا الإسناد.وأخرج شطره الثاني أحمد 4 / (2420) من طريق سليمان بن بلال، وأبو داود (4464)، والترمذي (1455)، والنسائي (7300) من طريق عبد العزيز بن محمد الدراوردي، كلاهما عن عمرو بن أبي عمرو، بهذا الإسناد. وزاد الدراوردي في روايته: قيل لابن عباس: ما شأن البهيمة؟ قال: ما سمعتُ من رسول الله صلى الله عليه وسلم في ذلك شيئًا، ولكن أرى رسول صلى الله عليه وسلم كره أن يؤكل من لحمها أو ينتفع بها وقد عُمل بها ذلك العمل. وقال أبو داود عقبه: ليس هذا بالقوي. وقال الترمذي: هذا حديث لا نعرفه إلَّا من حديث عمرو بن أبي عمرو عن عكرمة عن ابن عباس عن النبي صلى الله عليه وسلم. وقال البخاري كما في "علل الترمذي" ص 236: لا أقول بحديث عمرو بن أبي عمرو: أنه من وقع على بهيمة أنه يقتل.وفي باب قتل مُواقِع البهيمة عن أبي هريرة عند أبي يعلى (5987)، وعنه ابن عدي في "الكامل" 1/ 32 وإسناده ضعيف، فيه عبد الغفار بن عبد الله بن الزبير، لم يوثقه غير ابن حبان، وقد قال أبو يعلى بإثره: ثم بلغني أنه رجع عنه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8248)


8248 - أخبرَناه الحسن بن يعقوب العَدْل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا عبد الوهاب بن عطاء، أخبرني عبَّاد بن منصور، عن عِكْرمة، عن ابن عباس ذَكَرَ النبيَّ صلى الله عليه وسلم أنه قال في الذي يأتي البهيمةَ: "اقتلوا الفاعلَ والمفعولَ به" [1].




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি উল্লেখ করেন যে, যে ব্যক্তি কোনো পশুর সাথে সঙ্গম করে, তার ব্যাপারে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "তোমরা ফاعل (কর্মকর্তা) এবং মাফউল (যার সাথে করা হলো) উভয়কে হত্যা করো।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف لضعف عباد بن منصور، وقد اضطرب فيه، فكان يرفعه مرةً، ويوقفه مرةً، وهو مدلّس أيضًا، قال أبو حاتم الرازي كما في "الجرح والتعديل" 6/ 86: نرى أنه أخذ هذه الأحاديث عن إبراهيم بن أبي يحيى عن داود بن حصين عن عكرمة عن ابن عباس. قلنا: يعني أنه كان يدلسها بإسقاط رجلين: إبراهيم بن أبي يحيى وهو متروك الحديث، وداود بن حصين وهو ضعيف في روايته عن عكرمة.وأخرجه البيهقي 8/ 233 من طريق محمد بن يعقوب، عن يحيى بن أبي طالب، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري في مسند ابن عباس من "تهذيب الآثار" 1/ 550 من طريق عون بن عمارة، والبيهقي 8/ 232 من طريق عبد الله بن بكر السهمي، كلاهما عن عباد بن منصور به، وزادا فيه: "والفاعل والمفعول به في اللوطية، واقتلوا كل مُواقِع ذات محرم"وأخرجه أحمد 4 / (2733) عن عبد الوهاب بن عطاء، به موقوفًا على ابن عباس.وأخرجه موقوفًا أيضًا الطبري 1/ 551 من طريق يزيد بن هارون، عن عباد بن منصور، عن الحكم، عن ابن عباس موقوفًا. وتحرَّف عكرمة فيه إلى الحكم. وجاء على الصواب عند ابن أبي شيبة 10/ 104 بجزء آخر من الحديث. وأخرجه ابن أبي شيبة 10/ 8، والطحاوي في "شرح المشكل" (3831)، والطبراني في "الكبير" (11568)، والدارقطني (3236)، والبيهقي 8/ 324 من طريق إبراهيم بن إسماعيل بن أبي حبيبة، عن داود بن حصين، عن عكرمة به. وزاد الطبراني والدارقطني والبيهقي: قتل من يأتي ذات المحرم. وإسناده ضعيف، سيأتي الكلام عليه برقم (8253) حيث سيورد المصنف طرفًا آخرَ منه من طريق إبراهيم بن إسماعيل بن أبي حبيبة هذا، ويأتي تخريجه هناك.وأما طريق إبراهيم بن أبي يحيى الأسلمي التي أشار إليها أبو حاتم الرازي، فقد أخرجها عبد الرزاق (13492)، وكذا الطبراني في "الكبير" (11569)، وابن عدي في "الكامل" 1/ 222، ومن طريقه البيهقي 8/ 232 من طريق ابن جريج، كلاهما (عبد الرزاق وابن جريج) عن إبراهيم الأسلمي، عن داود بن حصين به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8249)


8249 - فحدَّثنا أبو الوليد، حدثنا محمد بن إسحاق، حدثنا محمد بن عيسى، حدثنا أبو بكر بن عيّاش عن عاصم، عن أبي رَزِين، عن ابن عباس قال: مَن أتى بهيمةً فليس عليه حدٌّ [1].




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন, যে ব্যক্তি কোনো পশুর সাথে সহবাস করে, তার উপর কোনো হদ (নির্দিষ্ট দণ্ড) নেই।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] رجاله لا بأس بهم، لكن لما سُئل البخاري كما في "العلل الكبير" للترمذي عن سماع أبي رزين - واسمه مسعود بن مالك - من ابن عباس قال: قد أدركه، وروى عن أبي يحيى عن ابن عباس.قلنا: يعني أنه لم يجزم بسماعه منه، لأن بينهما أبا يحيى واسمه مِصدع، ويعرف بالمعرقب، ومصدع هذا قال عمار الدهني: كان عالمًا بابن عباس، وقال العجلي: ثقة. وقال ابن حبان في "المجروحين": كان ممّن يخالف الأثبات في الروايات، وينفرد عن الثقات بألفاظ الزيادات ممّا يوجب ترك ما انفرد منها، والاعتبار بما وافقهم فيها. وعدَّه ابن حجر في "التقريب" مقبولًا يعني عند المتابعة.محمد بن إسحاق: هو ابن خُزَيمة، ومحمد بن عيسى هو ابن زياد الدامغاني، عاصم: هو ابن بهدلة.وأخرجه أبو داود (4465) عن أحمد بن يونس، عن شريك وأبي الأحوص وأبي بكر بن عياش، عن عاصم بن بهدلة، بهذا الإسناد. وقال عقبه: حديث عاصم يضعَّفُ حديث عمرو بن أبي عمرو. يعني السالف قبل حديث.وأخرجه الترمذي في "الجامع" بإثر (1455)، وفي "العلل الكبير" (428) من طريق سفيان الثوري، والنسائي (7301) من طريق أبي حنيفة النعمان، كلاهما عن عاصم، به.وقال الترمذي: وهذا أصحُّ من الحديث الأول (يعني حديث عمرو بن أبي عمرو) والعمل على هذا عند أهل العلم، وهو قول أحمد وإسحاق. وقال النسائي: هذا غير معروف والأول هو المحفوظ. يعني الحديث الذي رواه عمرو بن أبي عمرو بذكر اللَّعن لا القتل، وهو السالف عند النسائي برقم (7299)، والتالي عند الحاكم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8250)


8250 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا أبو المثنَّى العَنْبري، حدثنا عبد الله بن مسلمة، حدثنا زُهير، عن عمرو بن أبي عمرو، عن عِكْرمة، عن ابن عباس، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لَعَنَ الله مَن ذبحَ لغير الله، لَعَنَ الله مَن غيّر تُخومَ الأرض، لَعَنَ الله من كَمَّهَ الأعمى عن السبيل، لَعَنَ الله مَن سبّ والده، لَعَنَ الله مَن تولَّى غيرَ مَوالِيه لَعَنَ الله مَن عَمِلَ عملَ قومِ لوطٍ" [1].




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আল্লাহ তাকে অভিশাপ দেন, যে আল্লাহ ব্যতীত অন্যের নামে যবেহ করে। আল্লাহ তাকে অভিশাপ দেন, যে জমির সীমানা পরিবর্তন করে। আল্লাহ তাকে অভিশাপ দেন, যে অন্ধকে পথ থেকে ফিরিয়ে দেয় (বা তাকে পথভ্রষ্ট করে)। আল্লাহ তাকে অভিশাপ দেন, যে তার পিতাকে গালি দেয়। আল্লাহ তাকে অভিশাপ দেন, যে আপন মনিব/পৃষ্ঠপোষক ব্যতীত অন্য কারো সাথে সম্পর্ক স্থাপন করে। আল্লাহ তাকে অভিশাপ দেন, যে লূত জাতির মতো কাজ করে।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لاضطرابه كما سلف بيانه برقم (8245). أبو المثنّى العنبري: هو معاذ بن المثنى بن معاذ.وأخرجه أحمد 5 / (2816) عن عبد الرحمن بن مهدي، وابن حبان (4417) من طريق عبد الملك بن عمرو، كلاهما عن زهير بن محمد بهذا الإسناد.وأخرج أحمد (3037)، وابن ماجه (2609)، وابن حبان (417) من طريق عبد الله بن عثمان بن خثيم، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، أنه سمعه يقول: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "من ادَّعى إلى غير أبيه، أو تولَّى غير مواليه، فعليه لعنة الله والملائكة والناس أجمعين". وسنده قوي.وأخرج أحمد (2921) من طريق عبد الحميد بن بَهرام، عن شَهر بن حوشب قال: قال ابن عباس: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أيما رجل ادعى إلى غير والده، أو تولى غير مواليه الذين أعتقوه، فإنّ عليه لعنة الله والملائكة والناس أجمعين إلى يوم القيامة، لا يُقبل منه صرف ولا عدل".وإسناده حسن في المتابعات والشواهد.وفي الباب عن عليّ عند البخاري (1870)، ومسلم (1370) و (1978)، لكن ليس فيه ذكر لعن من عمل عمل قوم لوط، ولم نقف له على شاهد، إلَّا حديث أبي هريرة السالف برقم (8246)، لكن بلفظ الرجم لا اللعن، ولا يصحُّ.وانظر حديث عائشة السالف برقم (8222).قوله: "كمَّه الأعمى" بفتح الكاف وتشديد الميم، أي: أضلَّه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8251)


8251 - قال: وحدثنا عبد الله بن مَسلَمة، حدثنا عبد العزيز بن محمد، عن عمرو ابن أبي عمرو، عن عِكْرمة، عن ابن عباس، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم، وزاد فيه: "لَعَنَ اللهُ مَن وَقَعَ على بهيمةٍ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আল্লাহ সেই ব্যক্তিকে অভিশাপ (লা'নত) করুন, যে কোনো জন্তুর (চতুষ্পদ প্রাণী/গৃহপালিত পশুর) সাথে সংগম করে।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] صحيح لغيره غير لعن فاعلَيِ اللواط ومواقع البهيمة، وهذا إسناد ضعيف لاضطرابه كما سلف بيانه برقم (8245).وأخرجه مقطعًا النسائي (7297) و (7299) عن قتيبة بن سعيد، عن عبد العزيز الدراوردي، بهذا الإسناد.وأخرجه تامًّا أحمد 3/ (1875) و 5 / (2913) و (2914) و (2915) من طرق عن عمرو بن أبي عمرو، به. إلَّا محرر بن هارون! قلنا: ومحرر متروك الحديث.ويشهد له حديث ابن عباس السابق، وشاهده الذي ذكرناه هناك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8252)


8252 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو عُتْبة أحمد بن الفَرَج، حدثنا ابن أبي فُدَيك، حدثنا هارون بن هارون التَّيمي، عن الأعرج، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لَعَنَ الله سبعةً من خلقِه"، فرَدَّ [1] رسول الله صلى الله عليه وسلم على كلِّ واحدٍ ثلاثَ مرات، ثم قال: "ملعونٌ ملعونٌ ملعونٌ مَنْ عَمِلَ عملَ قومِ لوطٍ، ملعونٌ مَن جمعَ بين المرأةِ وابنتِها، ملعونٌ مَن سَبَّ شيئًا من والديه، ملعونٌ من أتى شيئًا من البهائم، ملعونٌ من غيَّرَ حدودَ الأرض، ملعونٌ مَن ذَبَحَ لغير الله، ملعونٌ مَن تولَّى غيرَ موالِيه" [2].




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তাঁর সৃষ্টির সাতজনকে লা'নত (অভিসম্পাত) করেছেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের প্রত্যেকের উপর তিনবার করে তা পুনরাবৃত্তি করলেন। অতঃপর তিনি বললেন: অভিশপ্ত, অভিশপ্ত, অভিশপ্ত সে ব্যক্তি যে লূতের সম্প্রদায়ের কাজ করে। অভিশপ্ত সে ব্যক্তি যে কোনো নারী ও তার কন্যার সাথে (একত্রে) মিলিত হয়। অভিশপ্ত সে ব্যক্তি যে তার পিতা-মাতার কোনো একজনকে গালি দেয়। অভিশপ্ত সে ব্যক্তি যে কোনো চতুষ্পদ জন্তুর সাথে (যৌনকর্মে) লিপ্ত হয়। অভিশপ্ত সে ব্যক্তি যে জমির সীমানা পরিবর্তন করে। অভিশপ্ত সে ব্যক্তি যে আল্লাহ ব্যতীত অন্য কারো নামে যবেহ করে। অভিশপ্ত সে ব্যক্তি যে নিজের মাওলা (মুক্তিদাতা) ব্যতীত অন্য কাউকে মাওলা হিসেবে গ্রহণ করে।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في مصادر التخريج: فردد، وهو الوجه. إلَّا محرر بن هارون! قلنا: ومحرر متروك الحديث.ويشهد له حديث ابن عباس السابق، وشاهده الذي ذكرناه هناك.



[2] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف، هارون بن هارون متفق على ضعفه، وبه أعلَّه الذهبي في "التلخيص"، وأحمد بن الفرج ليس بذاك القوي، لكنه توبع. ابن أبي فديك: هو محمد بن إسماعيل بن مسلم.وأخرجه ابن عدي في الكامل 10/ 372 (طبعة ابن رشد) من طريق دحيم عبد الرحمن بن إبراهيم، عن هارون التيمي، بهذا الإسناد.وأخرجه الخرائطي في "مساوئ الأخلاق" (438)، والطبراني في "الأوسط" (8497)، وابن عدي في الكامل 6/ 442، والبيهقي في "شعب الإيمان" (5089) من طريق محرّر (ويقال: محرز بالزاي) ابن هارون. وهو أخو هارون بن هارون - عن الأعرج به. وقال الطبراني: لم يروه عن الأعرج إلَّا محرر بن هارون! قلنا: ومحرر متروك الحديث.ويشهد له حديث ابن عباس السابق، وشاهده الذي ذكرناه هناك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8253)


8253 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا عُبيد بن شَريك، حدثنا ابن أبي مريم، حدثنا إبراهيم بن إسماعيل بن أبي حَبيبة، حدثني داود بن الحُصَين، عن عِكْرمة، عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن وَقَعَ عَلَى ذَاتِ مَحرَمٍ فَاقْتُلُوه" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো মাহরামের সাথে (অবৈধ) মিলিত হয়, তবে তোমরা তাকে হত্যা করো।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف، إبراهيم بن إسماعيل بن أبي حبيبة ضعيف، وداود بن الحصين ثقة إلَّا في روايته عن عكرمة، قال علي بن المديني: ما روى عن عكرمة فمنكر الحديث، وقال أيضًا فيما نقله عنه العقيلي في "الضعفاء": مرسل الشعبي وسعيد بن المسيب أحبُّ إلي من داود بن الحصين عن عكرمة عن ابن عباس. وقال أبو داود: أحاديثه عن عكرمة مناكير. وضعَّف الذهبيُّ الحديث في "التلخيص".عبيد بن شريك: هو عبيد بن عبد الواحد بن شريك، وابن أبي مريم: هو سعيد بن الحكم بن محمد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (11565)، و "الأوسط" (9350)، والبيهقي 5/ 210 من طرق عن سعيد بن أبي مريم، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 4/ (2727) عن أبي القاسم بن أبي الزناد وابن ماجه (2564)، والترمذي (1462)، والطحاوي في "شرح المشكل" (3832)، والدارقطني (3236)، والبيهقي 8/ 232 من طريق محمد بن إسماعيل بن أبي فديك، كلاهما عن إبراهيم بن إسماعيل بن أبي حبيبة، به.وزاد أحمد فيه: "اقتلوا الفاعل والمفعول به في عمل قوم لوط، والبهيمة والواقع على البهيمة"، وزاد ابن ماجه والدارقطني والبيهقي قتل مواقع البهيمة والبهيمة. وقال الترمذي: هذا حديث لا نعرفه إلَّا من هذا الوجه، وإبراهيم بن إسماعيل يضعف في الحديث.وأخرجه الطبري في مسند ابن عباس من تهذيب الآثار 1/ 555 - 556 من طريق عبيد الله بن موسى، عن إبراهيم بن إسماعيل بن مجمع الأنصاري، عن داود بن حصين، عن عكرمة، عن ابن عباس، مرفوعًا: "اقتلوا الفاعل والمفعول في اللوطية، ومن وقع على ذات محرم فاقتلوه".فجعل مكان إبراهيم بن إسماعيل بن حبيبة: إبراهيم بن إسماعيل بن مجمّع! وعقَّب محققه الأستاذ محمود شاكر رحمه الله على هذه الرواية، فقال: أنا في شك من ذكر إبراهيم بن إسماعيل بن مجمع في هذا الإسناد، أخشى أن يكون وهمًا وقع فيه أبو جعفر نفسه (يعني الطبري)، لاشتباه الاسمين، وتماثلهما في الضعف، وفي نسبة الأنصاري والمدني. قلنا وهو كما قال، فقد أخرجه من الطريق ذاتها ابن أبي شيبة 10/ 8 فلم يقل في نسبته: ابن مجمع. وأخرجه الطبري في مسند ابن عباس من "تهذيب الآثار" 1/ 550 من طريق عون بن عمارة، والبيهقي 8/ 232 من طريق عبد الله بن بكر السهمي، كلاهما عن عباد بن منصور، به وزادا فيه: "اقتلوا مواقع البهيمة والبهيمةَ، والفاعلَ والمفعولَ به في اللوطية".وأخرجه عبد الرزاق (13492)، وكذا الطبراني في "الكبير" (11569) من طريق ابن جريج، كلاهما (عبد الرزاق وابن جريج) عن إبراهيم بن أبي يحيى الأسلمي، عن داود بن حصين، به.وإبراهيم الأسلمي متروك.وأخرجه موقوفًا ابن أبي شيبة 10/ 104 من طريق عباد بن منصور، عن عكرمة، عن ابن عباس قال: اقتلوا كل من أتى ذات محرم. وإسناده ضعيف، سلف الكلام عليه عند الرواية (8248).قال الترمذي: والعمل على هذا عند أصحابنا، قالوا من أتى ذات محرم وهو يعلم فعليه القتل، وقال أحمد: من تزوج أمه قتل، وقال إسحاق: من وقع على ذات محرم قتل.وانظر أقوال الفقهاء في "شرح معاني الآثار" للطحاوي 3/ 148 - 151، و "المغني" لابن قدامة 12/ 341 - 343، و "شرح السنة" 7/ 304 - 306.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8254)


8254 - أخبرنا علي بن محمد بن عُقْبة الشَّيباني بالكوفة، حدثنا محمد بن علي بن عفّان العامري، حدثنا أسباط بن محمد القرشي، حدثنا مُطرِّف بن طَريف الحارثي، حدثنا أبو الجَهْم، عن البراء بن عازب قال: إنِّي لأطُوفُ على إبلٍ لي ضلَّت، فأنا أجُولُ في أبياتٍ، فإذا أنا برَكْب وفوارسَ، فجعل أهلُ الماء يَلُوذونَ بمَنزلي [1]، إذ أطافوا بفنائي واستَخرَجوا منه رجلًا، فما كلَّموه ولا سألوه عن شيء حتى ضربوا عُنقَه، فلما ذهبوا سألتُ عنه فقالوا: عَرَّسَ بامرأةِ أبيه [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.وشاهدُه حديث يزيد بن البراء بن عازب الذي:




বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার হারিয়ে যাওয়া উটগুলোর সন্ধানে ঘোরাফেরা করছিলাম। আমি বিভিন্ন বাড়িতে ঘুরছিলাম। হঠাৎ আমি কিছু আরোহী এবং অশ্বারোহী দেখতে পেলাম। সেখানকার লোকেরা আমার বাড়িতে আশ্রয় নিতে শুরু করল। যখন তারা (আরোহীরা) আমার উঠোন ঘিরে ফেলল এবং সেখান থেকে একজন লোককে বের করে আনল। তারা তাকে কোনো কথা জিজ্ঞেস করেনি বা কোনো প্রশ্ন করেনি, বরং সরাসরি তার গর্দান (ঘাড়) কেটে দিল। তারা চলে যাওয়ার পর আমি (লোকটি সম্পর্কে) জিজ্ঞেস করলে তারা বলল: ‘সে তার পিতার স্ত্রীকে বিয়ে করেছিল/ভোগ করেছিল (অর্থাৎ সৎ মাকে বিয়ে করেছিল)।’




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] في (ك) و (م): بمنزلتي.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أبي الجهم، واسمه سليمان بن الجهم، وهو مولى البراء بن عازب. وقد سلف برقم (2813).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8255)


8255 - حدَّثَناه أبو بكر أحمد بن سلمان الفقيه ببغداد، حدثنا هلال بن العلاء الرَّقي، حدثنا عبد الله بن جعفر الرَّقّي، حدثنا عبيد الله بن عمرو، عن زيد بن أبي أُنيسة، عن عدي بن ثابت، عن يزيد بن البراء، عن أبيه قال: لقيتُ عمّي ومعه الراية، فقلتُ: أين تريدُ؟ قال: بَعَثَني النبي صلى الله عليه وسلم إلى رجل نكحَ امرأةَ أبيه، فأمرني أن أضربَ عُنقَه وآخذَ مالَه [1].




বারা ইবন আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার চাচার সাথে সাক্ষাৎ করলাম, তাঁর সাথে একটি পতাকা (রায়া) ছিল। আমি জিজ্ঞেস করলাম, "আপনি কোথায় যেতে চান?" তিনি বললেন, "নবী কারীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে এমন এক ব্যক্তির কাছে পাঠিয়েছেন, যে তার পিতার স্ত্রীকে বিবাহ করেছে। তিনি আমাকে নির্দেশ দিয়েছেন যে আমি যেন তার গর্দান উড়িয়ে দেই (তাকে হত্যা করি) এবং তার সম্পদ বাজেয়াপ্ত করি।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن، هلال بن العلاء ويزيد بن البراء صدوقان حسنا الحديث، وهلال قد توبع. وقد تقدم الكلام عليه مفصلًا عند الرواية (2811).وأخرجه النسائي (5465) عن عمرو بن منصور، عن عبد الله بن جعفر الرقي، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود (4457) عن عمرو بن قسيط الرقي، عن عبيد الله بن عمرو الرقي، به. صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف من أجل أبي واقد: وهو صالح بن محمد بن زائدة الليثي.وهيب: هو ابن خالد بن عجلان.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (5023) من طريق محمد بن علي الوراق، عن معلى بن أسد، عن وهيب بن خالد، عن أبي واقد، عن إسحاق مولى زائدة ومحمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، عن أبي هريرة.وأخرجه ابن أبي الدنيا في "الصمت" (688) من طريق أحمد بن إسحاق الحضرمي، عن وهيب بن خالد، عن أبي واقد الليثي، حدثني إسحاق مولى زائدة، عن أبي هريرة.وسيورده المصنفُ من طريق آخر عن أبي هريرة في الرواية التالية.وسيورد نحوه من حديث أبي موسى الأشعري برقم (8262) و (8263)، ومن حديث سهل بن سعد برقم (8264).وانظر ما سلف برقم (8117).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8256)


8256 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عبد الوهاب، حدثنا عمرو بن عاصم الكِلَابي، حدثنا همَّام عن القاسم بن عبد الواحد، عن عبد الله بن محمد بن عَقِيل، عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ أَخَوَفَ ما أَخافُ على أمّتي عملُ قومِ لوطٍ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আমি আমার উম্মতের জন্য যে বিষয়টি সবচেয়ে বেশি ভয় পাই, তা হলো লূত জাতির কর্ম।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف، القاسم بن عبد الواحد وعبد الله بن محمد بن عقيل إنما يقبل حديثهما عند المتابعة، ولم نقف لهما على متابع محمد بن عبد الوهاب: هو ابن حبيب العبدي.وأخرجه أحمد 23/ (15093)، والترمذي (1457) من طريق يزيد بن هارون عن همّام بن يحيى، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن غريب، إنما نعرفه من هذا الوجه عن عبد الله بن محمد بن عقيل بن أبي طالب عن جابر.وأخرجه ابن ماجه (2563) من طريق عبد الوارث بن سعيد، عن القاسم بن عبد الواحد، به.وله شاهد لا يفرح به من حديث ابن عباس عند ابن عدي في "الكامل" 2/ 173، وإسناده واهٍ، فيه الجارود بن يزيد، وهو متهم بالكذب. صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف من أجل أبي واقد: وهو صالح بن محمد بن زائدة الليثي.وهيب: هو ابن خالد بن عجلان.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (5023) من طريق محمد بن علي الوراق، عن معلى بن أسد، عن وهيب بن خالد، عن أبي واقد، عن إسحاق مولى زائدة ومحمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، عن أبي هريرة.وأخرجه ابن أبي الدنيا في "الصمت" (688) من طريق أحمد بن إسحاق الحضرمي، عن وهيب بن خالد، عن أبي واقد الليثي، حدثني إسحاق مولى زائدة، عن أبي هريرة.وسيورده المصنفُ من طريق آخر عن أبي هريرة في الرواية التالية.وسيورد نحوه من حديث أبي موسى الأشعري برقم (8262) و (8263)، ومن حديث سهل بن سعد برقم (8264).وانظر ما سلف برقم (8117).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8257)


8257 - حدثنا إبراهيم بن عِصْمة بن إبراهيم العَدْل، حدثنا السَّرِيُّ بن خُزَيمة، حدثنا مُعلَّى بن أسد، حدثنا وُهَيب، عن أبي واقد، عن إسحاق مولى زائدة [و] عن [1] محمد بن عبد الرحمن بن ثَوْبان، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "مَن حَفِظَ ما بين لحييه، وما بين رجليه دخل الجنَّةَ" (1).هذا حديث صحيح الإسناد، وأبو واقدٍ هذا اسمه صالح بن محمد بن زائدة، ولم يُخرجاه.وشاهدُه حديث محمد بن عَجْلان الذي:




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি তার দুই চোয়ালের মধ্যবর্তী অঙ্গ (জিহ্বা) এবং তার দুই পায়ের মধ্যবর্তী অঙ্গ (লজ্জাস্থান) সংরক্ষণ করে (বা নিয়ন্ত্রণ করে), সে জান্নাতে প্রবেশ করবে।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] الواو زيادة من "شعب الإيمان" للبيهقي، وهو الصواب، فإسحاق وابن ثوبان كلاهما يروي عن أبي هريرة. صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف من أجل أبي واقد: وهو صالح بن محمد بن زائدة الليثي.وهيب: هو ابن خالد بن عجلان.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (5023) من طريق محمد بن علي الوراق، عن معلى بن أسد، عن وهيب بن خالد، عن أبي واقد، عن إسحاق مولى زائدة ومحمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، عن أبي هريرة.وأخرجه ابن أبي الدنيا في "الصمت" (688) من طريق أحمد بن إسحاق الحضرمي، عن وهيب بن خالد، عن أبي واقد الليثي، حدثني إسحاق مولى زائدة، عن أبي هريرة.وسيورده المصنفُ من طريق آخر عن أبي هريرة في الرواية التالية.وسيورد نحوه من حديث أبي موسى الأشعري برقم (8262) و (8263)، ومن حديث سهل بن سعد برقم (8264).وانظر ما سلف برقم (8117).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8258)


8258 - حدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا الحسن بن علي بن زياد، حدثنا إبراهيم بن موسى، حدثنا أبو خالد الأحمر، عن ابن عَجْلان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن وَقَاهُ الله شرَّ ما بين لَحْيَيه وما بين رجليه، دخل الجنَّةَ" [1].




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যাকে আল্লাহ তার দুই চোয়ালের মধ্যবর্তী বস্তুর (জিহ্বার) অনিষ্ট থেকে এবং তার দুই পায়ের মধ্যবর্তী বস্তুর (লজ্জাস্থানের) অনিষ্ট থেকে রক্ষা করেন, সে জান্নাতে প্রবেশ করবে।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد لا بأس برجاله، لكن اختلف في إسناده علي محمد بن عجلان كما سيأتي. أبو خالد الأحمر: هو سليمان بن حيان، وأبو حازم: هو سلمان الأشجعي.وأخرجه الترمذي (2409) عن أبي سعيد الأشج عبد الله بن سعيد، وابن حبان (5703) من طريق أبي كريب محمد بن العلاء، كلاهما عن أبي خالد الأحمر، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن غريب.وتابع أبا خالد الأحمر خالدُ بن الحارث البصري - وهو ثقة - فرواه عن ابن عجلان به، عند ابن عبد البر في "التمهيد" 5/ 63 - 64. وخالفهما سعيد بن أبي أيوب كما في "العلل" للدارقطني 8/ 238، فرواه عن ابن عجلان عن أبي حازم عن أبي صالح عن أبي هريرة. فزاد بين أبي حازم وأبي هريرة أبا صالح. وسعيد ثقة أيضًا.ورجَّح البخاري كما في "العلل الكبير" للترمذي (614) رواية أبي خالد الأحمر. فقال: هو حديث أبي خالد.ورواه القاسمُ بن عبد الله العمري عند تمام في "فوائده" (950) عن ابن عجلان، عن أبيه، عن القعقاع، عن أبي صالح، عن أبي هريرة. والقاسم بن عبد الله متروك متهم بالكذب.