হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8299)


8299 - فحدثنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنبَري، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا بُندارٌ، حدثنا معاذ بن هشام، حدثني أبي، عن قَتَادة، عن الحسن، عن سَمُرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن أَخْصَى عبدَه أَخْصَيْناه" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি তার গোলামকে খাসী করবে, আমরা তাকে খাসী করে দেব।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف، وقد سلف الكلام عليه برقم (8297).وأخرجه مجموعًا مع ذلك الحديث: النسائي (6930) عن محمد بن بشار بندار، بهذا الإسناد. وأخرجه مجموعًا كذلك أبو داود (4516)، والنسائي (6930) عن محمد بن المثنى، عن معاذ بن هشام، به.وأخرجه كذلك النسائي (6912) من طريق أبي داود الطيالسي، عن هشام الدستوائي، به. وأشار البزار في "مسنده" 10/ 405 إلى تفرد الدستوائي بزيادة الإخصاء عن قتادة من بين أصحابه.وأخرجه أحمد 33/ (20198) عن يزيد بن هارون، عن أبي أمية شيخ له قال: حدثنا الحسن، عن سمرة، قال: "ومن خصى عبده خصيناه". وأبو أُمية شيخ مجهول لم نتبيّنه.وفي الباب عن عليّ عند ابن أبي حاتم في "العلل" (1381)، وسنده ضعيف، وقال أبو حاتم: حديث منكر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8300)


8300 - أخبرنا أبو النَّضر محمد بن محمد الفقيه وأبو إسحاق إبراهيم بن إسماعيل القارئ، قالا: حدثنا عثمان بن سعيد الدارِمي، حدثنا عبد الله بن صالح، حدثني الليث بن سعد، عن عمر بن عيسى القُرشي ثم الأَسَدي، عن ابن جريج، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عبّاس قال: جاءت جاريةٌ إلى عمر بن الخطاب فقالت: إنَّ سيِّدي اتَّهَمني فأقعَدَني على النار حتى احترقَ فَرْجي. فقال عمر: هل رأَى ذلك عليكِ؟ قالت: لا، قال: فاعتَرفتِ له بشيء؟ قالت: لا، قال عمر: عليَّ به، فلما رأى عمرُ الرجلَ، قال: أتعذِّبُ بعذابِ الله؟! قال: يا أمير المؤمنين، اتَّهمتُها في نفسِها، قال: رأيتَ ذلك عليها؟ قال الرجل: لا، قال: فاعتَرفَتْ لك بذلك؟ قال: لا، قال: والذي نفسي بيده لو لم أسمَعْ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "لا يُقادُ مملوكٌ مِن مالِكِه، ولا ولدٌ من والدِه"، لأقَدْتُها منكَ، فبرَّزَه وضربَه مئةَ سوطٍ، ثم قال: اذهبي فأنتِ حُرَّة لوجه الله، وأنتِ مولاةُ الله ورسوله [1].قال أبو صالح: قال الليث: هذا معمولٌ به. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وله شاهدانِ:




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একটি দাসী উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে বলল: আমার মনিব আমাকে অপবাদ দিয়েছে, ফলে সে আমাকে আগুনের ওপর বসিয়ে রেখেছিল, যার কারণে আমার লজ্জাস্থান পুড়ে গেছে। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সে কি তোমার ওপর তা ঘটতে দেখেছে? সে বলল: না। তিনি বললেন: তুমি কি তার কাছে কোনো কিছু স্বীকার করেছিলে? সে বলল: না। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: লোকটিকে আমার কাছে নিয়ে এসো। যখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লোকটিকে দেখলেন, তিনি বললেন: তুমি কি আল্লাহর আযাব দিয়ে শাস্তি দিচ্ছো?! সে বলল: হে আমীরুল মু'মিনীন, আমি তাকে ব্যভিচারের অপবাদ দিয়েছি। তিনি (উমর) বললেন: তুমি কি তা তার ওপর ঘটতে দেখেছো? লোকটি বলল: না। তিনি বললেন: সে কি তোমার কাছে তা স্বীকার করেছিল? সে বলল: না। তিনি বললেন: যাঁর হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! যদি আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে না শুনতাম: "কোনো মালিকের কাছ থেকে তার গোলামকে কিসাস নেওয়া যাবে না এবং কোনো পিতার কাছ থেকে তার সন্তানকে কিসাস নেওয়া যাবে না", তাহলে আমি অবশ্যই তোমার কাছ থেকে তার জন্য কিসাস গ্রহণ করতাম। অতঃপর তিনি তাকে প্রকাশ্যে উপস্থিত করে একশোটি চাবুক মারলেন। এরপর বললেন: যাও, তুমি আল্লাহর সন্তুষ্টির উদ্দেশ্যে মুক্ত। আর তুমি আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের মুক্তদাসী।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حسن بطرقه وشواهده، وهذا إسناد ضعيف بمرّة من أجل عمر بن عيسى القرشي، وتقدم الكلام عليه عند مكرره السالف برقم (2892).ولشطره الثاني انظر حديث ابن عباس الآتي برقم (8303).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8301)


8301 - أخبرَناه أبو جعفر بن دُحَيم، حدثنا أحمد بن حازم بن أبي غَرَزة، حدثنا مالك بن إسماعيل، حدثنا أبو شِهاب عبدُ ربِّه بن نافع عن حمزة الجَزَري، عن عمرو بن دينار، عن ابن عمر، عن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن مَثَّل بعبدِه فهو حُرٌّ، وهو مولى اللهِ ورسولِه" [1].




উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি তার দাসের অঙ্গ বিকৃত করে, সে মুক্ত (স্বাধীন) হয়ে যায়, আর সে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের মাওলা (মুক্তকৃত দাস)।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده تالف، حمزة الجزري - وهو حمزة بن أبي حمزة الجعفي النَّصيبي - متهم بالوضع، وبه أعلَّه الذهبي في "التلخيص".وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 2/ 377 من طريق عاصم بن يوسف، عن عبد ربه بن نافع به.وأخرج عبد الرزاق (17929) عن الثوري، عن يونس بن عبيد، عن الحسن: أَنَّ رجلًا كَوَى غلامًا له بالنار، فأعتقه عمر. ورجاله ثقات لكن رواية الحسن عن عمر منقطعة.ويغني عنه ما رواه أحمد 11/ (6710) من طريق عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده عبد الله بن عمرو: أَنَّ زِنباعًا أبا رَوْح وجد غلامًا له مع جارية له، فجَدَعَ أنفَه وجبَّه، فأتى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: "مَن فعل هذا بك؟ " قال: زنباع، فدعاه النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: "ما حَمَلَك على هذا؟ " فقال: كان من أمره كذا وكذا، فقال النبي صلى الله عليه وسلم للعبد: "اذهبْ فأنت حرٌّ". وهو حديث حسن كما هو مبين في "المسند"، وانظر هناك شواهدَ له. والترمذي (1542)، والنسائي (4994) من طرق عن حصين بن عبد الرحمن، بهذا الإسناد.وقال الترمذي: حسن صحيح.وأخرجه أحمد 24/ (15705) و 39 / (23740)، ومسلم (1658) (31)، وأبو داود (5167)، والنسائي (4992) من طريق معاوية بن سويد قال: لطمتُ مولى لنا فهربتُ، ثم جئت قبيل الظهر، فصلَّيت خلف أَبي، فدعاه ودعاني، ثم قال: امتثِلْ منه، فعفا، ثم قال: كنا بني مقرِّن على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم ليس لنا إلا خادم واحدة، فلَطَمَها أحدنا، فبلغ ذلك النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: "أعتِقوها" قالوا: ليس لهم خادم غيرها، قال: "فليستخدِموها، فإذا استَغنَوا عنها فليُخلوا سبيلها".وأخرجه أحمد 24/ (15703)، ومسلم (1658) (33)، والنسائي (4993) من طريق أبي شعبة العراقي، عن سويد بن مقرِّن، أنَّ جارية له لطمها إنسان، فقال له سويد: أما علمتَ أنَّ الصورة محرّمة، فقال: لقد رأيتني وإني لسابع إخوة لي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، وما لنا خادم غير واحد، فعمد أحدنا فلطمه، فأمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم أن نعتقه.وأخرجه النسائي (4990) من طريق أبي عوانة، عن مطرف عن الشعبي، عن معاوية بن سويد، فذكره مرسلًا.وخالف أسباطُ بن محمد أبا معاوية في إسناده فرواه عند النسائي أيضًا (4991) عن مطرف، عن أبي السفر، عن معاوية بن سويد، فذكره مرسلًا.وفي الباب عند مسلم (1657) وغيره عن ابن عمر مرفوعًا: "من لطم مملوكه، أو ضربه، فكفّارته أن يُعتقه".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8302)


8302 - وأخبرنا أبو جعفر بن دُحَيم، حدثنا أحمد بن حازم، حدثنا عاصم بن يوسف اليَربُوعي، حدثنا عبثر بن القاسم، حدثنا حُصَين، عن هِلال بن يِسَاف، قال: كُنَّا نزولًا في دار سُوَيد بن مُقرِّن ومعنا شيخ حَديدٌ جاهلٌ، فلا أدري ما قالت وَليدةُ سُوَيد فلَطَمَها، فغضب من ذلك غضبًا ما غَضِبَ مثلَه قَطُّ، قال: عَجَزَ عليك إِلَّا حُرُّ وجهِها؟ لقد رأيتُني سابعَ سبعةٍ من بني مُقرِّن ما لنا إلَّا خادمٌ واحدٌ، فَلَطَمَها أصغرُنا، فأمرَنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن نُعتِقَها [1].




সুওয়াইদ ইবনে মুকাররিন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হিলাল ইবনে ইয়াসাফ বলেন: আমরা সুওয়াইদ ইবনে মুকাররিনের ঘরে অবস্থান করছিলাম। আমাদের সাথে একজন রুক্ষ ও অজ্ঞ বৃদ্ধ লোক ছিল। সুওয়াইদের এক দাসী কী বলেছিল, আমি জানি না, কিন্তু লোকটি তাকে চপেটাঘাত করল। এতে সুওয়াইদ এমন রেগে গেলেন যে তিনি এর আগে এমন রাগ কখনও করেননি। তিনি বললেন, তোমার কি শুধু তার মুখ ছাড়া অন্য কোথাও মারার ক্ষমতা ছিল না? (তিনি আরও বললেন,) আমার মনে আছে, আমি বনু মুকাররিনের সাত ভাইয়ের মধ্যে সপ্তম ছিলাম। আমাদের কেবল একজনই সেবক ছিল। আমাদের মধ্যে সবচেয়ে ছোটজন তাকে চপেটাঘাত করেছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে নির্দেশ দিলেন যেন আমরা তাকে মুক্ত করে দিই।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح. حصين: هو ابن عبد الرحمن السلمي.وأخرجه أحمد 39/ (23741) و (23742)، ومسلم (1658) (32)، وأبو داود (5166)، والترمذي (1542)، والنسائي (4994) من طرق عن حصين بن عبد الرحمن، بهذا الإسناد.وقال الترمذي: حسن صحيح.وأخرجه أحمد 24/ (15705) و 39 / (23740)، ومسلم (1658) (31)، وأبو داود (5167)، والنسائي (4992) من طريق معاوية بن سويد قال: لطمتُ مولى لنا فهربتُ، ثم جئت قبيل الظهر، فصلَّيت خلف أَبي، فدعاه ودعاني، ثم قال: امتثِلْ منه، فعفا، ثم قال: كنا بني مقرِّن على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم ليس لنا إلا خادم واحدة، فلَطَمَها أحدنا، فبلغ ذلك النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: "أعتِقوها" قالوا: ليس لهم خادم غيرها، قال: "فليستخدِموها، فإذا استَغنَوا عنها فليُخلوا سبيلها".وأخرجه أحمد 24/ (15703)، ومسلم (1658) (33)، والنسائي (4993) من طريق أبي شعبة العراقي، عن سويد بن مقرِّن، أنَّ جارية له لطمها إنسان، فقال له سويد: أما علمتَ أنَّ الصورة محرّمة، فقال: لقد رأيتني وإني لسابع إخوة لي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، وما لنا خادم غير واحد، فعمد أحدنا فلطمه، فأمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم أن نعتقه.وأخرجه النسائي (4990) من طريق أبي عوانة، عن مطرف عن الشعبي، عن معاوية بن سويد، فذكره مرسلًا.وخالف أسباطُ بن محمد أبا معاوية في إسناده فرواه عند النسائي أيضًا (4991) عن مطرف، عن أبي السفر، عن معاوية بن سويد، فذكره مرسلًا.وفي الباب عند مسلم (1657) وغيره عن ابن عمر مرفوعًا: "من لطم مملوكه، أو ضربه، فكفّارته أن يُعتقه".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8303)


8303 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا عُبيد بن شَريك، حدثنا أبو الجُماهِر محمد بن عثمان، حدثنا سعيد بن بَشِير، حدثنا عمرو بن دينار، عن طاووس، عن ابن عبّاس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا يُقاد والدٌ بولدِه، ولا تُقامُ الحدودَ في المساجد" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সন্তানের বদলে পিতাকে কিসাস (হত্যার বিনিময়ে হত্যা) করা হবে না এবং মসজিদে হদ্দ (নির্ধারিত শাস্তি) কার্যকর করা হবে না।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حسن بطرقه وشواهده، وهذا إسناد ضعيف من أجل سعيد بن بشير، وقد توبع. وقال ابن عبد البر في "التمهيد" 23/ (437) عن حديث النهي عن قَوَد الوالد بالولد: حديث مشهور عند أهل العلم بالحجاز والعراق مستفيض عندهم، يُستغنَي بشهرته وقَبوله والعمل به عن الإسناد فيه، حتى يكاد أن يكون الإسناد في مثله لشهرته تكلفًا.قلنا: ولم نقف عليه من طريق أبي الجماهر، وخالفه أبو المغيرة عبد القدوس بن الحجاج، فرواه عن سعيد بن بشير عن قتادة عن عمرو بن دينار به عند البزار في "مسنده" (4834) - ومن طريقه ابن حزم في "المحلى" 11/ 123 - وابن خُزَيمة في "فوائد الفوائد" (7)، والدارقطني (3279)، فزاد في إسناده قتادةَ بين سعيد بن بشير وعمرو بن دينار. وكلٌّ من أبي الجماهر وأبي المغيرة ثقة، فالوهم من سعيد بن بشير نفسه، ويحتمل أن يكون رواه عن قتادة ثم سمعه من عمرو بن دينار، فقد روى سعيدٌ عن كليهما، والله أعلم.وتابعه إسماعيل بن مسلم المكي عن عمرو بن دينار به. أخرجه ابن ماجه (2599) و (2661)، والترمذي (1401). وإسماعيل هذا ضعيف، وقال الترمذي: حديث لا نعرفه بهذا الإسناد مرفوعًا إلَّا من حديث إسماعيل بن مسلم! وإسماعيلُ بن مسلم المكي قد تكلَّم فيه بعض أهل العلم من قبل حفظه.وتابعهما عبيدُ الله بن الحسن العنبري عن عمرو بن دينار به. أخرجه الدارقطني (3279)، والبيهقي 8/ 39 من طريق أبي حفص التمار عمر بن عامر السعدي عنه. والتمار ترجمه الذهبي في "الميزان"، وقال: روى حديثًا باطلًا.وخالفهم يحيى بن العلاء البجلي ومحمد بن مسلم الطائفي عند عبد الرزاق (1710)، فروياه عن عمرو بن دينار، عن طاووس مرسلًا قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا تقام الحدود في المساجد".ويحيى البجلي تالف فلا يفرح به، لكن متابعه محمد الطائفي صدوق حسن الحديث.وأخرجه مقطوعًا عبد الرزاق (1708) عن ابن جريج قال: قال لي عمرو بن دينار: سمعنا أنه يُنهى أن يضرب في المسجد.وأخرجه عبد الرزاق (1709) عمّن أخبره أنه سمع عمرو بن دينار يحدّث عن نافع بن جبير بن مطعم قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن تُنشد الأشعار، وأن تستقاد الجِراحات، وأن تقام الحدود في المسجد. فغيّر هذا المبهم في إسناده وأرسله.ويشهد للنهي عن قتل الوالد بولده حديثُ عمر بن الخطاب السالف برقم (8300).وفي باب النهي عن إقامة الحدود في المساجد عن حَكيم بن حزام سيأتي برقم (8337)، وإسناده ضعيف، وله شواهد ذُكرت في "مسند أحمد" 24/ (15579)، وكلها متكلَّم فيها، وبمجموعها حسَّنه بعض أهل العلم.وله إسناد صحيح من فعل عمر رضي الله عنه، أخرجه عبد الرزاق (1706)، وابن أبي شيبة 10/ 42 من طريق سفيان الثوري، عن قيس بن مسلم، عن طارق بن شهاب قال: أُتي عمرُ برجل في شيء، فقال: أخرِجاه من المسجد فاضرباه.وأخرج ابن أبي شيبة 10/ 42 عن أبي خالد الأحمر، عن أشعث بن سوّار، عن فضيل بن زيد الرَّقاشي، عن عبد الله بن مغفل: أنَّ رجلًا جاء إلى علي فسارَّه، فقال: يا قنبر، أخرِجه من المسجد، فأقم عليه الحدَّ. وسنده حسن في المتابعات والشواهد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8304)


8304 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا عبد الله بن أحمد بن حنبل ومحمد بن أيوب وأبو جعفر الحَضرَمي، قالوا: أخبرنا أبو كُرَيب، حدثنا عبد الله بن إدريس، عن عُبيد الله بن عمر، عن ابن عمر: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم ضَرَبَ وغَرَّبَ [وأنَّ أبا بكر ضَرَبَ وغَرَّبَ] [1] وأنَّ عمرَ ضَرَبَ وغَرَّبَ [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বেত্রাঘাত করেছেন ও নির্বাসিত করেছেন, আর আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও বেত্রাঘাত করেছেন ও নির্বাসিত করেছেন, এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও বেত্রাঘাত করেছেন ও নির্বাসিত করেছেন।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] ما بين المعقوفين لم يرد في النسخ الخطية، وأثبتناه من "التلخيص" ومن مصادر التخريج. عبد الرحمن بن الحارث - والسري بن عاصم وأبي ميسرة الهمذاني.وكأنَّ الدارقطني لم يعتبر بمن رواه غير أبي كريب، فقال فيما رواه عنه الخطيب في "تاريخ بغداد" 13/ 558 - بعدما أخرجه من طريق أبي كريب - قال: لم يسنده أحد من الثقات غير أبي كريب، ووقفه أبو سعيد الأشج وغيره.وأما من رواه موقوفًا من فعل أبي بكر وعمر، فهما: أبو سعيد الأشج في "حديثه" (106)، وعنه الترمذي في "جامعه" بإثر (1438)، ومحمد بن عبد الله بن نمير فيما قاله الدارقطني في "العلل"، كلاهما (الأشج وابن نمير) عن عبد الله بن إدريس، به - ليس فيه ذكر النبي صلى الله عليه وسلم.



[2] صحيح موقوفًا، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن اختلف على عبد الله بن إدريس في رفعه ووقفه كما سيأتي، ورواه أصحاب عبيد الله بن عمر فوقفوه، وتابع عبيدَ الله بن عمر على وقفه أيضًا محمد بن إسحاق قاله الترمذي في "العلل الكبير" (413)، فرفعه خطأ كما قال أبو حاتم في "العلل" لابنه (1382)، وصوّب وقفه الدارقطني في "العلل" (2752)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 16/ 282.أما الذين رووه مرفوعًا عن عبد الله بن إدريس، فهم: أبو كريب محمد بن العلاء عند الترمذي في "جامعه" (1438) - وقال: غريب - وفي "العلل الكبير" (413)، والنسائي (7302)، ويحيى بن أكثَم عند الترمذي في "جامعه" (1438) وفي "العلل الكبير" (413)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 16/ 282، ومسروقُ بن المَرزُبان فيما قاله الدارقطني في "العلل" (2752)، وأبو ميسرة أحمد بن عَبد الله عند ابن عدي في "الكامل" 1/ 176، وجحدر بن الحارث عند ابن عدي أيضًا 4/ 320. قال الترمذي: حديث ابن عمر حديث غريب، رواه غير واحد عن عبد الله بن إدريس فرفعوه، وروى بعضهم عن عبد الله بن إدريس هذا الحديث موقوفًا، وهكذا روي هذا الحديث من غير رواية ابن إدريس عن عبيد الله بن عمر نحو هذا، وهكذا رواه محمد بن إسحاق عن نافع عن ابن عمر موقوفًا. ونقل الخطيب عن أبي بكر الميانجي قوله: وهذا الحديث إنما هو معروف عن أبي كريب، وإنه المنفرد به. ثم نقل الخطيب مضمون كلام الدارقطني.قلنا: أما محمد بن العلاء، فثقة حافظ من رجال الشيخين.وأما مسروق بن المرزبان، فقال أبو حاتم: ليس بقوي، يكتب حديثه، وقال صالح جزرة: صدوق.وأما يحيى بن أكثم فقد تكلموا فيه، قال أبو حاتم فيه نَظَر، وقال ابن معين: كان يكذب، وقال أبو عاصم النبيل: يحيى بن أكثم كذاب (تحرَّفت في "تهذيب الكمال" إلى: كتاب)، وقال ابن الجنيد: كان يسرق الحديث، وقال الذهبي في "تاريخ الإسلام" ضعفوه في الحديث.وأما أبو ميسرة، فقال ابن عدي: حدّث عن الثقات بالمناكير، ويحدث عمن لا يُعرف، ويسرق حديث الناس. ثم قال: سرق هذا الحديثَ جماعةٌ من الضعفاء مثل جحدر الكفرتوثي - واسمه عبد الرحمن بن الحارث - والسري بن عاصم وأبي ميسرة الهمذاني.وكأنَّ الدارقطني لم يعتبر بمن رواه غير أبي كريب، فقال فيما رواه عنه الخطيب في "تاريخ بغداد" 13/ 558 - بعدما أخرجه من طريق أبي كريب - قال: لم يسنده أحد من الثقات غير أبي كريب، ووقفه أبو سعيد الأشج وغيره.وأما من رواه موقوفًا من فعل أبي بكر وعمر، فهما: أبو سعيد الأشج في "حديثه" (106)، وعنه الترمذي في "جامعه" بإثر (1438)، ومحمد بن عبد الله بن نمير فيما قاله الدارقطني في "العلل"، كلاهما (الأشج وابن نمير) عن عبد الله بن إدريس، به - ليس فيه ذكر النبي صلى الله عليه وسلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8305)


8305 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيِه، حدَّثنا محمد بن أحمد بن النَّضر الأزدي، حدَّثنا معاوية بن عمرو، حدَّثنا زائدة، عن السُّدّي، عن سعد بن عُبيدة، عن أبي عبد الرحمن السُّلَمي، قال: خَطَبَ عليٌّ فقال: يا أيها الناس، أقِيمُوا الحدود على أرقَّائِكم، مَن أحصَنَ منهنَّ ومَن لم يُحصَنْ، فإنَّ أُمَةً لرسول الله صلى الله عليه وسلم زَنَتْ، فأمرني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن أجلِدَها، فأتيتُها فإذا هي حديث عهدٍ بنِفَاس، فخشيتُ إن أنا جلدتُها أن أقتلَها وأن تموت، فأتيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكرتُ ذلك له، فقال: "أحسَنتَ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه!




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি খুতবা দিলেন এবং বললেন: হে লোকসকল, তোমাদের দাস-দাসীদের ওপর তোমরা হদ (দণ্ড) প্রতিষ্ঠা করো, তাদের মধ্যে যারা বিবাহিতা হোক বা অবিবাহিতা হোক। কেননা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একজন দাসী ব্যভিচার (যিনা) করেছিল, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তাকে বেত্রাঘাত করার আদেশ দিলেন। আমি তার কাছে গেলাম এবং দেখলাম যে সে সদ্য সন্তান প্রসব করেছে (নিফাস অবস্থায় আছে), আমি আশঙ্কা করলাম যে যদি আমি তাকে বেত্রাঘাত করি, তবে সে মারা যাবে। তাই আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে তাঁকে বিষয়টি জানালাম। তিনি বললেন: "তুমি ভালো করেছো।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح. زائدة: هو ابن قدامة، والسدي: هو إسماعيل بن عبد الرحمن بن أبي كريمة، وأبو عبد الرحمن السلمي: هو عبد الله بن حبيب بن ربيعة.وأخرجه أحمد 2/ (1341)، ومسلم (1705)، والترمذي (1441) من طريق أبي داود سليمان بن داود الطيالسي، عن زائدة بن قدامة، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه مسلم (1705) من طريق إسرائيل بن يونس، عن السدي، به. ولم يذكر: من أحصن منهم ومن لم يحصن، وزاد في الحديث: "اتركها حتى تماثل".وأخرجه أحمد (679) و (736) (1231)، وأبو داود (4473)، والنسائي (7201) و (7227) و (7228) و (7229) من طريق عبد الأعلى بن عامر الثعلبي، عن أبي جميلة الطهوي ميسرة بن يعقوب، عن علي: أن جارية للنبي صلى الله عليه وسلم نَفسَت من الزنى، فأرسلني النبي صلى الله عليه وسلم لأقيم عليها الحدَّ، فوجدتها في الدم لم يجف عنها، فرجعت إلى النبي صلى الله عليه وسلم فأخبرته، فقال لي: "إذا جفَّ الدم عنها فاجلدها الحدَّ" ثم قال: "أقيموا الحدود على ما ملكت أيمانكم، اللفظ لأحمد (1231)، وعند بعضهم مختصر. وعبد الأعلى الثعلبي ضعيف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8306)


8306 - حدَّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدَّثنا الربيع بن سليمان، حدَّثنا عبد الله بن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن بُكَير بن عبد الله بن الأشج، حدَّثه قال: بَيْنا أنا جالسٌ عند سليمان بن يسار إذ دخل عبدُ الرحمن بن جابر فحدَّث سليمانُ بن يسار، فقال: حدثني عبدُ الرحمن بن جابر، أنَّ أباه حدَّثه، أنه سمع أبا بُرْدة الأنصاريِّ يقول: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "لا يُجلَدُ فوقَ عَشَرَةِ أسواطٍ إِلَّا في حدٍّ من حدودِ الله تعالى" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবু বুরদাহ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি, আল্লাহ তাআলার নির্ধারিত কোনো 'হদ্দ' (শাস্তি) ব্যতীত অন্য কোনো বিষয়ে দশটির বেশি চাবুকের আঘাত করা যাবে না।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح، إلا أنه اختلف في إسناده على بكير بن عبد الله كما قال الدارقطني في "العلل" (952).فرواه عمرو بن الحارث - كما عند المصنف هنا - عن بكير، عن سليمان بن يسار، عن عبد الرحمن بن جابر، عن أبيه، عن أبي بردة. أخرجه كذلك أحمد 27/ (16487) و (16488)، والبخاري (6850)، ومسلم (1708)، وأبو داود (4492)، وابن حبان (4453)، كلهم من طريق عبد الله بن وهب، عن عمرو، به. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وتابع عمرًا عليه أسامةُ بن زيد عند ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1924)، والبزار في "مسنده" (3796)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (2445).وخالفهما الليث وسعيد بن أبي أيوب، فروياه عن يزيد بن أبي حبيب، عن بكير، عن سليمان بن يسار، عن عبد الرحمن بن جابر، عن أبي بردة، فلم يذكرا فيه جابرًا والد عبد الرحمن.أما رواية الليث بن سعد، فأخرجها أحمد 25/ (15832) و 27/ (16486)، والبخاري (6848)، وأبو داود (4491)، وابن ماجه (2601)، والترمذي (1463)، والنسائي (7290).وأخرجه أحمد 25/ (15835) عن أبي سلمة الخزاعي، عن الليث، عن بكير بن عبد الله، عن سليمان بن يسار، عن عبد الرحمن بن جابر، عن أبي بردة بن نيار، فذكره. وكان ليث حدثناه ببغداد عن يزيد بن أبي حبيب عن بكير عن سليمان، فلما كنا بمصر قال: أخبرناه بكير بن عبد الله بن الأشج.وأما رواية سعيد بن أبي أيوب، فأخرجها أحمد 27/ (16491)، والنسائي (7289)، وابن حبان (4452)، والحاكم فيما سيأتي برقم (8351).وخالف كلا من سعيد بن أبي أيوب والليثِ زيدُ بن أبي أُنيسة عند النسائي (7291)، فرواه عن يزيد بن أبي حبيب، عن بكير بن عبد الله قال: بينما أنا عند سليمان، إذ جاء عبد الرحمن بن جابر، فحدَّث سليمان، ثم أقبل عليهم سليمانُ فقال: حدثني عبد الرحمن بن جابر، أنَّ أباه حدثه أنه سمع أبا بردة، فذكره. كرواية عمرو بن الحارث.ورواه ابن لهيعة عن بكير بن عبد الله كروايتي الليث وسعيد بن أبي أيوب، أخرجه أحمد 25/ (15834)، ليس فيه جابر.وأخرجه البخاري (6849)، والنسائي (7292) من طريق فضيل بن سليمان، عن مسلم بن أبي مريم، عن عبد الرحمن بن جابر، عمَّن سمع النبي صلى الله عليه وسلم قال، فذكره.قال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 21/ 656: ذكر الدارقطني في "العلل" (952) الاختلاف فيه ثم قال: القول قول الليث ومن تابعه، وخالف ذلك في كتاب "التتبع" (92) فقال: القول قول عمرو بن الحارث وقد تابعه أسامة بن زيد.قلنا: كلام الدارقطني في "التتبع" يوافق كلام أبي حاتم، فقد ذكر ابنه في "العلل" (1356): قلت لأبي: أيهما أصح؟ قال: حديث عمرو بن الحارث، لأنَّ نفسين قد اتَّفقا على أبي بردة بن نيار، قصَّر أحدهما [في] ذكر جابر، وحفظ الآخر جابرًا.ثم قال الحافظ ابن حجر: ولم يقدح هذا الاختلاف عند الشيخين في صحة الحديث، فإنه كيفما دار يدور على ثقة، ويحتمل أن يكون عبد الرحمن وقع له فيه ما وقع لبكير بن الأشج في تحديث عبد الرحمن بن جابر لسليمان بحضرة بكير، ثم تحديث سليمان بكيرًا به عن عبد الرحمن، أو أنَّ عبد الرحمن سمع أبا بردة لما حدث به أباه وثبته فيه أبوه، فحدث به تارةً بواسطة أبيه وتارةً بغير واسطة.وادعى الأصيلي أن الحديث مضطرب فلا يحتج به لاضطرابه، وتُعقِّب بأنَّ عبد الرحمن ثقة وقد صرح بسماعه، وإبهام الصحابي لا يضرُّ، وقد اتفق الشيخان على تصحيحه وهما العُمدة في التصحيح، وقد وجدتُ له شاهدًا بسند قوي لكنه مرسل، أخرجه الحارث بن أبي أسامة من رواية عبد الله بن أبي بكر بن الحارث بن هشام رفعه: "لا يحلُّ أن يُجلد فوق عشرة أسواط إلَّا في حد"، وله شاهد آخر عن أبي هريرة عند ابن ماجه (2602) ستأتي الإشارة إليه. قلنا: لكن فيه عباد بن كثير الثقفي، وهو متروك الحديث.وانظر اختلاف أهل العلم في المقدار الذي يجوز أن يعزَّر به من وجب عليه التعزير في "الأوسط" لابن المنذر 12/ 485.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8307)


8307 - أخبرني أبو بكر بن أبي دارِم الحافظ بالكوفة، حدَّثنا أحمد بن موسى التَّميمي، حدَّثنا مِنْجاب بن الحارث، حدَّثنا عبد الملك بن هارون بن عَنترة، عن أبيه، عن جدِّه، عن عمرو بن العاص: أنه زار عمَّةً له، فدعت له بطعام، فأبطأَتِ الجاريةُ فقالت: ألا تَستعجِلي يا زانيةُ! فقال عمرو: سبحان الله، لقد قلتِ أمرًا عظيمًا، هل اطَّلَعتِ منها على زِنًى؟ قالت: لا والله، فقال عمرو: إني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "أيُّما عبدٍ أو امرأةٍ قال أو قالت لوليدِتها: يا زانيةُ، ولم تطَّلِعُ منها على زناءٍ، جلدَتْها وَليدتُها يومَ القيامة، لأنه لا حدَّ لهنَّ في الدنيا" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، إنما اتفقا في هذا الباب على حديث عبد الرحمن بن أبي نُعْم [2]، عن أبي هريرة: "مَن قَذَفَ مملوكَه بالزِّنى، أُقيم عليه الحدُّ يومَ القيامة" [3].




আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর এক ফুফুর কাছে গেলেন। তিনি তাঁর জন্য খাবার আনতে বললেন, কিন্তু দাসীটি দেরি করল। তখন তিনি (ফুফু) বললেন: ওহে ব্যভিচারিণী! তাড়াতাড়ি কর না কেন? আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সুবহানাল্লাহ! আপনি তো এক জঘন্য কথা বলে ফেললেন! আপনি কি তাকে ব্যভিচার করতে দেখেছেন? তিনি বললেন: আল্লাহর শপথ, না। তখন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে কোনো পুরুষ বা নারী তার দাস বা দাসীকে ‘ওহে ব্যভিচারিণী’ বলে গালি দেয়, অথচ সে (অভিযোগকারী) তার মধ্যে কোনো ব্যভিচার দেখতে পায়নি, কিয়ামতের দিন সেই দাস/দাসী তাকে কশাঘাত করবে। কারণ দুনিয়াতে তাদের জন্য (কদফের) কোনো হদ্দ (শাস্তি) নেই।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده تالف، ابن أبي دارم - واسمه أحمد بن محمَّد بن السَّري - ضعفه المصنِّف، وعبدُ الملك بن هارون بن عنترة متهم بالكذب، كذَّبه ابن معين والجُوزجاني وابن حبان، وقال أبو حاتم: متروك، ذاهب الحديث. وبه أعلَّه الذهبي في "التلخيص"، فقال: عبد الملك متروك باتفاق، حتى قيل فيه: دجال.قلنا: والعجب من الحاكم كيف صحَّح إسناده هنا مع أنه قال عنه: ذاهب الحديث جدًّا، فيما رواه السجزي عنه في "سؤالاته" (256)، وقال أيضًا في "المدخل" (129): روى عن أبيه أحاديث موضوعة.ولم نقف على هذا الخبر مخرَّجًا عند غير المصنف. بذكر عبد الرحمن بن إسحاق بن عبد الله الملقَّب بعباد بينه وبين أبي حازم: واسمه سلمة بن دينار المدني. وقد توبع الزنجي في حديث هذا.وأخرجه الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (4941) عن الربيع بن سليمان المرادي ونصر بن مرزوق، كلاهما عن أسد بن موسى، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (606) من طريق عبد الصمد بن النعمان، عن مسلم الزنجي، به.وخالفهما جمع من الرواة، فرووه بذكر عباد بن إسحاق بين مسلم الزنجي وأبي حازم، أخرجه كذلك أحمد 37/ (22875) عن حسين بن محمد، والروياني في "مسنده" (1051)، والطحاوي (4942)، والطبراني في "الكبير" (5767)، وابن عدي في "الكامل" 4/ 303 و 6/ 309، والدارقطني (3155)، والبيهقي 8/ 251 من طريق هشام بن عمار، والدارقطني (3155) من طريق يونس بن محمد، والدارقطني (3155)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 5/ 197 من طريق أبي علي أحمد بن الحكم، أربعتهم عن مسلم بن خالد الزنجي، عن عبد الرحمن بن إسحاق المعروف بعبَّاد، عن أبي حازم، عن سهل بن سعد. ولفظ رواية الطحاوي: أن امرأة أتت النبي صلى الله عليه وسلم، فقالت: زنى بي فلان، فبعث النبي صلى الله عليه وسلم إلى فلان، فسأله فأنكر، فرجم المرأة. وهي خطأ، ووقع في رواية هشام بن عمار وأحمد بن الحكم مكان "فحدَّه": فرجمه! ولم يسق الدارقطني لفظ رواية يونس، ورواية الجماعة عن الزنجي أولى، ولا سيما أنها توافق رواية عبد السلام بن حفص، ولفظها: فجلده الحدَّ، التي أخرجها أبو داود (4437) و (4466)، والطبراني (5924) من طريق عثمان بن أبي شيبة، عن طلق بن غنام، عن عبد السلام بن حفص، عن أبي حازم، به. وهذا إسناد قوي.والرجل الأسلمي هذا: هو ماعز بن مالك الأسلمي، وقد سلفت قصتُه عن غير واحد من الصحابة، انظر الأحاديث السالفة بالأرقام (8275 - 8281).وفي باب حدّ المعترف وترك الآخر إذا لم يعترف، عن أبي هريرة وزيد بن خالد عند البخاري (2695)، ومسلم. (1697).



[2] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: نعيم إلَّا (ك)، والمثبت منها. بذكر عبد الرحمن بن إسحاق بن عبد الله الملقَّب بعباد بينه وبين أبي حازم: واسمه سلمة بن دينار المدني. وقد توبع الزنجي في حديث هذا.وأخرجه الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (4941) عن الربيع بن سليمان المرادي ونصر بن مرزوق، كلاهما عن أسد بن موسى، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (606) من طريق عبد الصمد بن النعمان، عن مسلم الزنجي، به.وخالفهما جمع من الرواة، فرووه بذكر عباد بن إسحاق بين مسلم الزنجي وأبي حازم، أخرجه كذلك أحمد 37/ (22875) عن حسين بن محمد، والروياني في "مسنده" (1051)، والطحاوي (4942)، والطبراني في "الكبير" (5767)، وابن عدي في "الكامل" 4/ 303 و 6/ 309، والدارقطني (3155)، والبيهقي 8/ 251 من طريق هشام بن عمار، والدارقطني (3155) من طريق يونس بن محمد، والدارقطني (3155)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 5/ 197 من طريق أبي علي أحمد بن الحكم، أربعتهم عن مسلم بن خالد الزنجي، عن عبد الرحمن بن إسحاق المعروف بعبَّاد، عن أبي حازم، عن سهل بن سعد. ولفظ رواية الطحاوي: أن امرأة أتت النبي صلى الله عليه وسلم، فقالت: زنى بي فلان، فبعث النبي صلى الله عليه وسلم إلى فلان، فسأله فأنكر، فرجم المرأة. وهي خطأ، ووقع في رواية هشام بن عمار وأحمد بن الحكم مكان "فحدَّه": فرجمه! ولم يسق الدارقطني لفظ رواية يونس، ورواية الجماعة عن الزنجي أولى، ولا سيما أنها توافق رواية عبد السلام بن حفص، ولفظها: فجلده الحدَّ، التي أخرجها أبو داود (4437) و (4466)، والطبراني (5924) من طريق عثمان بن أبي شيبة، عن طلق بن غنام، عن عبد السلام بن حفص، عن أبي حازم، به. وهذا إسناد قوي.والرجل الأسلمي هذا: هو ماعز بن مالك الأسلمي، وقد سلفت قصتُه عن غير واحد من الصحابة، انظر الأحاديث السالفة بالأرقام (8275 - 8281).وفي باب حدّ المعترف وترك الآخر إذا لم يعترف، عن أبي هريرة وزيد بن خالد عند البخاري (2695)، ومسلم. (1697).



8307 [3] - هو مرفوع إلى النبي صلى الله عليه وسلم، وهو بنحوه عند البخاري برقم (6858)، ومسلم برقم (1660). بذكر عبد الرحمن بن إسحاق بن عبد الله الملقَّب بعباد بينه وبين أبي حازم: واسمه سلمة بن دينار المدني. وقد توبع الزنجي في حديث هذا.وأخرجه الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (4941) عن الربيع بن سليمان المرادي ونصر بن مرزوق، كلاهما عن أسد بن موسى، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (606) من طريق عبد الصمد بن النعمان، عن مسلم الزنجي، به.وخالفهما جمع من الرواة، فرووه بذكر عباد بن إسحاق بين مسلم الزنجي وأبي حازم، أخرجه كذلك أحمد 37/ (22875) عن حسين بن محمد، والروياني في "مسنده" (1051)، والطحاوي (4942)، والطبراني في "الكبير" (5767)، وابن عدي في "الكامل" 4/ 303 و 6/ 309، والدارقطني (3155)، والبيهقي 8/ 251 من طريق هشام بن عمار، والدارقطني (3155) من طريق يونس بن محمد، والدارقطني (3155)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 5/ 197 من طريق أبي علي أحمد بن الحكم، أربعتهم عن مسلم بن خالد الزنجي، عن عبد الرحمن بن إسحاق المعروف بعبَّاد، عن أبي حازم، عن سهل بن سعد. ولفظ رواية الطحاوي: أن امرأة أتت النبي صلى الله عليه وسلم، فقالت: زنى بي فلان، فبعث النبي صلى الله عليه وسلم إلى فلان، فسأله فأنكر، فرجم المرأة. وهي خطأ، ووقع في رواية هشام بن عمار وأحمد بن الحكم مكان "فحدَّه": فرجمه! ولم يسق الدارقطني لفظ رواية يونس، ورواية الجماعة عن الزنجي أولى، ولا سيما أنها توافق رواية عبد السلام بن حفص، ولفظها: فجلده الحدَّ، التي أخرجها أبو داود (4437) و (4466)، والطبراني (5924) من طريق عثمان بن أبي شيبة، عن طلق بن غنام، عن عبد السلام بن حفص، عن أبي حازم، به. وهذا إسناد قوي.والرجل الأسلمي هذا: هو ماعز بن مالك الأسلمي، وقد سلفت قصتُه عن غير واحد من الصحابة، انظر الأحاديث السالفة بالأرقام (8275 - 8281).وفي باب حدّ المعترف وترك الآخر إذا لم يعترف، عن أبي هريرة وزيد بن خالد عند البخاري (2695)، ومسلم. (1697).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8308)


8308 - حدَّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدَّثنا الرَّبيع بن سليمان، حدَّثنا أسَد بن موسى، حدَّثنا مسلم بن خالد، حدَّثنا أبو حازم، حدثني سهل بن سعد صاحبُ رسول الله صلى الله عليه وسلم: أنَّ رجلًا من أسلم جاء النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فقال: إنه زَنَى بامرأة، سمَّاها وأنكَرَت، فحَدَّه وتركَها [1]. هذا إسناد صحيح، ولم يُخرجاه.وشاهدُه:




সাহল ইবনু সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আসলাম গোত্রের একজন লোক নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, "আমি এক মহিলার সাথে যেনা (ব্যভিচার) করেছি।" সে মহিলার নামও উল্লেখ করল। কিন্তু মহিলাটি তা অস্বীকার করল। অতঃপর তিনি (নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকটির উপর হদ্দ (নির্ধারিত দণ্ড) কার্যকর করলেন এবং মহিলাটিকে ছেড়ে দিলেন।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث قوي، وهذا إسناد ضعيف من أجل مسلم بن خالد - وهو الزَّنجي - وكان أيضًا يرويه بذكر عبد الرحمن بن إسحاق بن عبد الله الملقَّب بعباد بينه وبين أبي حازم: واسمه سلمة بن دينار المدني. وقد توبع الزنجي في حديث هذا.وأخرجه الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (4941) عن الربيع بن سليمان المرادي ونصر بن مرزوق، كلاهما عن أسد بن موسى، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (606) من طريق عبد الصمد بن النعمان، عن مسلم الزنجي، به.وخالفهما جمع من الرواة، فرووه بذكر عباد بن إسحاق بين مسلم الزنجي وأبي حازم، أخرجه كذلك أحمد 37/ (22875) عن حسين بن محمد، والروياني في "مسنده" (1051)، والطحاوي (4942)، والطبراني في "الكبير" (5767)، وابن عدي في "الكامل" 4/ 303 و 6/ 309، والدارقطني (3155)، والبيهقي 8/ 251 من طريق هشام بن عمار، والدارقطني (3155) من طريق يونس بن محمد، والدارقطني (3155)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 5/ 197 من طريق أبي علي أحمد بن الحكم، أربعتهم عن مسلم بن خالد الزنجي، عن عبد الرحمن بن إسحاق المعروف بعبَّاد، عن أبي حازم، عن سهل بن سعد. ولفظ رواية الطحاوي: أن امرأة أتت النبي صلى الله عليه وسلم، فقالت: زنى بي فلان، فبعث النبي صلى الله عليه وسلم إلى فلان، فسأله فأنكر، فرجم المرأة. وهي خطأ، ووقع في رواية هشام بن عمار وأحمد بن الحكم مكان "فحدَّه": فرجمه! ولم يسق الدارقطني لفظ رواية يونس، ورواية الجماعة عن الزنجي أولى، ولا سيما أنها توافق رواية عبد السلام بن حفص، ولفظها: فجلده الحدَّ، التي أخرجها أبو داود (4437) و (4466)، والطبراني (5924) من طريق عثمان بن أبي شيبة، عن طلق بن غنام، عن عبد السلام بن حفص، عن أبي حازم، به. وهذا إسناد قوي.والرجل الأسلمي هذا: هو ماعز بن مالك الأسلمي، وقد سلفت قصتُه عن غير واحد من الصحابة، انظر الأحاديث السالفة بالأرقام (8275 - 8281).وفي باب حدّ المعترف وترك الآخر إذا لم يعترف، عن أبي هريرة وزيد بن خالد عند البخاري (2695)، ومسلم. (1697).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8309)


8309 - ما حدَّثَناه محمد بن صالح بن هانئ، حدَّثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدَّثنا موسى بن هارون البُنِّي [1]، حدَّثنا هشام بن يوسف، حدَّثنا القاسم بن فيَّاض الأَبْناوي [2]، عن خلَّاد بن عبد الرحمن، عن سعيد بن المسيب، عن ابن عباس: أنَّ رجلًا من بني بكر بن ليث أتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فأقرَّ أنه زَنَى بامرأةٍ أربع مرارٍ، فَجُلِد مئةً، وكان بكرًا، ثم سأله البيِّنةَ على المرأة، فقالت المرأةُ: كذَبَ والله يا رسول الله، فجلدَه حدَّ الفِرْية ثمانين [3].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, বানু বকর ইবনে লাইছের গোত্রের একজন লোক নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং চারবার স্বীকার করল যে সে এক মহিলার সাথে ব্যভিচার করেছে। তাকে একশ বেত্রাঘাত করা হলো, কারণ সে ছিল কুমার (অবিবাহিত)। এরপর তিনি তাকে মহিলার বিরুদ্ধে প্রমাণ পেশ করতে বললেন, তখন মহিলাটি বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ, আল্লাহর কসম, সে মিথ্যা বলেছে। অতঃপর তিনি তাকে অপবাদের (মিথ্যা দোষারোপের) শাস্তি হিসেবে আশি বেত্রাঘাত করলেন।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تصحف في النسخ الخطية إلى: البتي. وهو موسى بن هارون بن بشير القيسي البردي، يعرف بالبنّي، قال ابن الأثير في "اللباب" 1/ 182: البُنّي بضم الباء الموحدة وفي آخرها النون المشددة، هذه النسبة إلى البُن، وهو شيء من الكواميخ (أشياء يؤتدم بها كالصلصة والمخللات، واحدها: كامخ) والمشهور بهذه النسبة أبو هارون موسى بن زياد البُنّي الكوفي.



[2] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: الأنباري. وأما رواية أيوب - وهو السَّختياني - فاختلف عليه في وصلها وإرسالها، فأخرجها عنه موصولة بذكر ابن عباس جرير بن حازم عند الحاكم فيما سلف برقم (2849)، وذكرنا هناك تخريجها، وحماد بن زيد عند النسائي (8169)، ولم يسقه النسائي بتمامه.وأخرجها عنه عن عكرمة مرسلةً معمرٌ عند عبد الرزاق (12444)، وإسماعيلُ ابن عليّة عند الطبري في "تفسيره" 18/ 81.وأخرج الحديث مطولًا أيضًا أحمد 5/ (3106) و (3360) و (3449)، والبخاري (5310) و (5316) و (6856)، ومسلم (1497)، والنسائي (5635) و (7295) من طريق القاسم بن محمد، عن ابن عباس.



8309 [3] - إسناده ضعيف بمرّة من أجل القاسم بن فياض الأبناوي، وقال النسائي عن حديثه هذا: منكر، وبه أعله الذهبي في "التلخيص".وأخرجه أبو داود (4467) عن محمد بن يحيى بن فارس، والنسائي (7308) عن محمد بن عبد الرحيم، كلاهما عن موسى بن هارون البردي، بهذا الإسناد. وقال النسائي عقبه: حديث منكر.وانظر في فقه هذه المسألة "التمهيد" لابن عبد البر 9/ 91، و "مختصر اختلاف العلماء" للجصاص المسألة رقم (1415). وأما رواية أيوب - وهو السَّختياني - فاختلف عليه في وصلها وإرسالها، فأخرجها عنه موصولة بذكر ابن عباس جرير بن حازم عند الحاكم فيما سلف برقم (2849)، وذكرنا هناك تخريجها، وحماد بن زيد عند النسائي (8169)، ولم يسقه النسائي بتمامه.وأخرجها عنه عن عكرمة مرسلةً معمرٌ عند عبد الرزاق (12444)، وإسماعيلُ ابن عليّة عند الطبري في "تفسيره" 18/ 81.وأخرج الحديث مطولًا أيضًا أحمد 5/ (3106) و (3360) و (3449)، والبخاري (5310) و (5316) و (6856)، ومسلم (1497)، والنسائي (5635) و (7295) من طريق القاسم بن محمد، عن ابن عباس.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8310)


8310 - أخبرنا عبد الرحمن بن حَمْدان الجَلَّاب بهَمَذان، حدَّثنا أبو حاتم الرازي، حدَّثنا سعيدٌ بن الرَّبيع، حدَّثنا هشام بن حسّان، عن عِكْرمة، عن ابن عباس: أنَّ هلال بن أُميّة قَذَفَ امرأته عند النبيِّ صلى الله عليه وسلم بشَريك بن سَحْماء، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "البيِّنةُ أو حَدٌّ في ظَهرِك" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হিলাল ইবনু উমাইয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট তার স্ত্রীকে শারীক ইবনু সাহমা-এর সাথে (ব্যভিচারের) অপবাদ দিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “হয় প্রমাণ পেশ করো, নতুবা তোমার পিঠে (অপবাদের) শাস্তি কার্যকর করা হবে।”




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه البخاري (2671) و (4747)، وأبو داود (2254)، وابن ماجه (2067)، والترمذي (3179) من طريق محمد بن إبراهيم بن أبي عدي، عن هشام بن حسان، بهذا الإسناد مطولًا.وقال الترمذي: حديث حسن غريب، وهكذا روى عباد بن منصور هذا الحديث عن عكرمة عن ابن عباس عن النبي صلى الله عليه وسلم، ورواه أيوب عن عكرمة مرسلًا، ولم يذكر فيه ابن عباس.قلنا: رواية عباد بن منصور عن عكرمة، أخرجها مطولة من طريقه أحمد 4/ (2131)، وأبو داود (2256). وأما رواية أيوب - وهو السَّختياني - فاختلف عليه في وصلها وإرسالها، فأخرجها عنه موصولة بذكر ابن عباس جرير بن حازم عند الحاكم فيما سلف برقم (2849)، وذكرنا هناك تخريجها، وحماد بن زيد عند النسائي (8169)، ولم يسقه النسائي بتمامه.وأخرجها عنه عن عكرمة مرسلةً معمرٌ عند عبد الرزاق (12444)، وإسماعيلُ ابن عليّة عند الطبري في "تفسيره" 18/ 81.وأخرج الحديث مطولًا أيضًا أحمد 5/ (3106) و (3360) و (3449)، والبخاري (5310) و (5316) و (6856)، ومسلم (1497)، والنسائي (5635) و (7295) من طريق القاسم بن محمد، عن ابن عباس.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8311)


8311 - حدَّثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أبو المثنَّى، حدَّثنا القعنبي، حدَّثنا ابن أبي ذئب، عن خالِه الحارث بن عبد الرحمن، عن أبي سَلَمة، عن أبي هريرة: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال في الخمر: "إن شَرِبَها فاجلِدُوه، فإن عادَ فاجلِدُوه، فإن عادَ في الرابعة فاقتلُوه" [1].هذا حديث صحيح الإسناد على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وفي الباب عن جَرير بن عبد الله البَجَلي وعبد الله بن عمر وأبي هريرة ومعاوية بن أبي سفيان والشَّريد بن سُوَيد وعبد الله بن عمرو وشُرَحبيل بن أوس ونَفَرٍ [2] . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . من الصحابة رضي الله عنهم.أما حديثُ جَرير بن عبد الله:




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদ সম্পর্কে বলেছেন: "যদি সে তা পান করে, তবে তাকে বেত্রাঘাত করো। যদি সে আবার পান করে, তবে তাকে বেত্রাঘাত করো। যদি সে চতুর্থবার পান করে, তবে তাকে হত্যা করো।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد جيد من أجل الحارث بن عبد الرحمن، وقد توبع. أبو المثنى: هو معاذ بن المثنى العنبري، والقعنبي: هو عبد الله بن مَسلمة، وابن أبي ذئب: هو محمد بن عبد الرحمن بن المغيرة بن الحارث القرشي العامري.وأخرجه أحمد 13/ (7911) و 16/ (10547)، وأبو داود (4484) من طريق يزيد بن هارون، وابن ماجه (2572)، والنسائي (5152)، وابن حبان (4447) من طريق شبابة بن سوار، كلاهما عن ابن أبي ذئب، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 16/ (10729) من طريق عمر بن أبي سلمة، عن أبيه، به. بلفظ: "إذا شرب الخمر فاجلدوه، فإن عاد فاجلدوه" فقال في الرابعة: "فاقتلوه". وعمر بن أبي سلمة حديثه حسن في المتابعات والشواهد.وسيورده المصنف من طريق أبي صالح عن أبي هريرة برقمي (8314) و (8315). سيأتي عنده مقرونًا بابن عمر برقم (8321)، وفاته هنا أن يشير إلى حديث جابر بن عبد الله الآتي بعد حديث النفر المذكور.قلنا: وقتل شارب الخمر في الرابعة منسوخ، قال الترمذي: وإنما كان هذا في أول الأمر، ثم نسخ بعدُ، هكذا روى محمد بن إسحاق، عن محمد بن المنكدر، عن جابر بن عبد الله، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "من شرب الخمر فاجلدوه، فإن عاد في الرابعة فاقتلوه"، قال: ثم أُتي النبي صلى الله عليه وسلم بعد ذلك برجل قد شرب الخمر في الرابعة فضربه ولم يقتله. [سيأتي عند الحاكم برقم (8322)].ثم قال الترمذي: وكذلك روى الزهري عن قبيصة بن ذؤيب عن النبي صلى الله عليه وسلم نحو هذا، فرُفع القتل وكانت رخصة. [أخرجه أبو داود برقم (4485) ورجاله ثقات].ثم قال: والعمل على هذا الحديث عند عامة أهل العلم، لا نعلم بينهم اختلافًا في ذلك في القديم والحديث، ومما يقوّي هذا ما روي عن النبي صلى الله عليه وسلم من أوجه كثيرة أنه قال: "لا يحلُّ دم امرئ مسلم يشهد أن لا إله إلَّا الله وأني رسول الله إلَّا بإحدى ثلاث: النَّفس بالنفس، والثيب الزاني، والتارك لدينه" [متفق عليه].قلنا: ومما ورد من الآثار يؤيد ذلك ما رواه البخاري (6780) وغيره من حديث عمر بن الخطاب: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم جلد رجلًا يقال له: عبد الله في الشراب فأُتي به يومًا فجُلد، فقال رجلٌ من القوم: اللهم العنه، ما أكثر ما يؤتى به! فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "لا تلعنوه، فوالله - ما علمتُ - إنه يحب الله ورسوله".قال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 21/ 447: فيه ما يدل على نسخ الأمر الوارد بقتل شارب الخمر إذا تكرّر منه، فقد ذكر ابن عبد البر أنه أُتي به أكثر من خمسين مرة.قلنا: وقد حكى الاتفاق على ترك قتل من تكرَّر منه شرب الخمر أكثر من ثلاث مرار: الإمامُ الشافعي في "الأم" 7/ 365 حيث قال: والقتل منسوخ بهذا الحديث [يعني حديث قبيصة بن ذؤيب] وغيره، وهذا مما لا اختلاف فيه بين أحد من أهل العلم علمته.ومثله نقل ابن المنذر في "الأوسط" 13/ 16 عن أهل العلم، فقال: قد كان هذا من سنّة رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم أُزيل القتل عن الشارب في المرة الرابعة بالأخبار الثابتة عن نبي الله صلى الله عليه وسلم وبإجماع عوام أهل العلم من أهل الحجاز وأهل العراق وأهل الشام، وكل من نحفظ قوله من أهل العلم عليه، إلا من شذَّ ممن لا يُعَدُّ خلافًا. ثم قال: ومن حُجّة من يقول بهذا القول، بأنَّ من المحال أن يقول رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا يحل دم امرئ مسلم إلا بإحدى ثلاث" ويُحله بخصلة رابعة، ومحال أن يكون قول رسول الله صلى الله عليه وسلم منتقضًا، وإن ادعى مدع أن أحد الخبرين قبل الآخر فدم المؤمن محظور باتفاقهم، وغير جائز أن يباح إلا باتفاق مثله.



[2] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: وهو، والصواب ما أثبتنا، وحديث النفر من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم سيأتي عنده مقرونًا بابن عمر برقم (8321)، وفاته هنا أن يشير إلى حديث جابر بن عبد الله الآتي بعد حديث النفر المذكور.قلنا: وقتل شارب الخمر في الرابعة منسوخ، قال الترمذي: وإنما كان هذا في أول الأمر، ثم نسخ بعدُ، هكذا روى محمد بن إسحاق، عن محمد بن المنكدر، عن جابر بن عبد الله، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "من شرب الخمر فاجلدوه، فإن عاد في الرابعة فاقتلوه"، قال: ثم أُتي النبي صلى الله عليه وسلم بعد ذلك برجل قد شرب الخمر في الرابعة فضربه ولم يقتله. [سيأتي عند الحاكم برقم (8322)].ثم قال الترمذي: وكذلك روى الزهري عن قبيصة بن ذؤيب عن النبي صلى الله عليه وسلم نحو هذا، فرُفع القتل وكانت رخصة. [أخرجه أبو داود برقم (4485) ورجاله ثقات].ثم قال: والعمل على هذا الحديث عند عامة أهل العلم، لا نعلم بينهم اختلافًا في ذلك في القديم والحديث، ومما يقوّي هذا ما روي عن النبي صلى الله عليه وسلم من أوجه كثيرة أنه قال: "لا يحلُّ دم امرئ مسلم يشهد أن لا إله إلَّا الله وأني رسول الله إلَّا بإحدى ثلاث: النَّفس بالنفس، والثيب الزاني، والتارك لدينه" [متفق عليه].قلنا: ومما ورد من الآثار يؤيد ذلك ما رواه البخاري (6780) وغيره من حديث عمر بن الخطاب: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم جلد رجلًا يقال له: عبد الله في الشراب فأُتي به يومًا فجُلد، فقال رجلٌ من القوم: اللهم العنه، ما أكثر ما يؤتى به! فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "لا تلعنوه، فوالله - ما علمتُ - إنه يحب الله ورسوله".قال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 21/ 447: فيه ما يدل على نسخ الأمر الوارد بقتل شارب الخمر إذا تكرّر منه، فقد ذكر ابن عبد البر أنه أُتي به أكثر من خمسين مرة.قلنا: وقد حكى الاتفاق على ترك قتل من تكرَّر منه شرب الخمر أكثر من ثلاث مرار: الإمامُ الشافعي في "الأم" 7/ 365 حيث قال: والقتل منسوخ بهذا الحديث [يعني حديث قبيصة بن ذؤيب] وغيره، وهذا مما لا اختلاف فيه بين أحد من أهل العلم علمته.ومثله نقل ابن المنذر في "الأوسط" 13/ 16 عن أهل العلم، فقال: قد كان هذا من سنّة رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم أُزيل القتل عن الشارب في المرة الرابعة بالأخبار الثابتة عن نبي الله صلى الله عليه وسلم وبإجماع عوام أهل العلم من أهل الحجاز وأهل العراق وأهل الشام، وكل من نحفظ قوله من أهل العلم عليه، إلا من شذَّ ممن لا يُعَدُّ خلافًا. ثم قال: ومن حُجّة من يقول بهذا القول، بأنَّ من المحال أن يقول رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا يحل دم امرئ مسلم إلا بإحدى ثلاث" ويُحله بخصلة رابعة، ومحال أن يكون قول رسول الله صلى الله عليه وسلم منتقضًا، وإن ادعى مدع أن أحد الخبرين قبل الآخر فدم المؤمن محظور باتفاقهم، وغير جائز أن يباح إلا باتفاق مثله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8312)


8312 - فأخبرناه بكر بن محمد الصَّيرَفي بمَرُو، حدَّثنا عبد الصمد بن الفضل، حدَّثنا مكِّيُّ بن إبراهيم، حدَّثنا داود بن يزيد، عن سِمَاك بن حَرْب، عن خالد بن جَرير [1] عن جَرِير قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنْ شَرِبَ الخمرَ فاجلِدُوه، فإن عادَ فاجلِدُوه، فإن عادَ فاجلِدُوه، فإن عادَ في الرابعة فاقتُلُوه" [2].وأما حديثُ عبد الله بن عمر رضي الله عنهما:




জারীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি কেউ মদ পান করে, তবে তাকে বেত্রাঘাত করো। যদি সে আবারও করে, তবে তাকে বেত্রাঘাত করো। যদি সে আবারও করে, তবে তাকে বেত্রাঘাত করো। আর যদি সে চতুর্থবারেও করে, তবে তাকে হত্যা করো।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: حزم.



[2] إسناده ضعيف من أجل داود بن يزيد - وهو الأودي - وقد أسقط الوساطة بين سماك وخالد، وهي محمد بن حرب أخو سماك، ومحمد هذا تفرَّد بالرواية عنه أخوه سماك، وروى له مسلم بعض حديثٍ، ووثقه النسائي، وذكره ابن حبان في "ثقاته". وانظر "العلل" للدارقطني (3330).وخالد بن جرير روى عنه سماك بن حرب، ومنهم من يدخل بينه وبين سماك أخا سماك كما قال ابن أبي حاتم، ولم يذكر هو والبخاري فيه تعديلًا ولا جرحًا، وذكره ابن حبان في "ثقاته".وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 3/ 142، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" 3/ 159، والطبراني في "الكبير" (2398)، والخطيب في "المتفق والمفترق" (534) من طريق مكي بن إبراهيم، والطبراني في "الكبير" (2397) من طريق الصباح بن محارب، كلاهما عن داود بن يزيد الأودي، بهذا الإسناد.وخالف داودَ إبراهيم بن طهمان في "مشيخته" (14) - ومن طريقه الدارقطني في "العلل" (3330)، وابن شاهين في "ناسخ الحديث" (526) - فرواه عن سماك عن أخيه محمَّد بن حرب عن ابن جرير عن أبيه. وقال الدارقطني: وهو الصحيح.وقال ابن شاهين عقبه: هذا حديث غريب، لا أعلم أنّ سماكًا حدّث عن أخيه إلَّا هذا، وابن جرير هذا اسمه خالد بن جرير.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8313)


8313 - فحدَّثَناه إبراهيم بن عِصْمة بن إبراهيم، حدَّثنا أبي، حدَّثنا يحيى بن يحيى، أخبرنا جَرير، عن مُغِيرة، عن عبد الرحمن بن أبي نُعْم، عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن شَرِبَ الخمرَ فاجلِدُوه، فإن شَرِبَ فاجلِدُوه [فإن شَرِبَ فاجلِدُوه] [1] فإن شَرِبَ فاقتُلُوه" [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وأما حديثُ أبي هريرة رضي الله عنه:




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "যে ব্যক্তি মদ পান করবে, তাকে বেত্রাঘাত করো। যদি সে আবার পান করে, তবে তাকে বেত্রাঘাত করো। যদি সে (তৃতীয়বার) পান করে, তবে তাকে বেত্রাঘাত করো। অতঃপর যদি সে (চতুর্থবার) পান করে, তবে তাকে হত্যা করো।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] ما بين المعقوفين أثبتناه من الرواية الآتية برقم (8321)، ومن مصادر التخريج. ومعاوية جميعًا، فرواه على الوجهين، ولا سيما أنَّ سهيل بن أبي صالح يحفظ حديث أبيه، وكان مكتوبًا عنده، وعلى كلٍّ هذا من الخلاف الذي لا يضرُّ، فكلاهما صحابي جليل.سعيد: هو ابن أبي عروبة، ورواية عبد الوهاب عنه قبل الاختلاط، ولم نقف عليه من طريق سعيد بن أبي عروبة عند غير المصنف.وتابع سعيدًا عليه معمرٌ في الرواية التالية عند المصنف، وابنُ جريج فيما ذكر الترمذي في "جامعه" بإثر (1444).ورواه أحمد بن عبد الجبار العطاردي، عن أبي بكر بن عياش، عن عاصم بن بهدلة، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، عند أبي البختري في "مجموع مصنفاته" (321)، وابن شاذان في "الأول من حديثه" (75)، وقاضي المارستان في "المشيخة الكبرى" (150)، فوهم فيه العطارديُّ إذ جعله من حديث أبي هريرة، كما قال الدارقطني في "العلل" (1222).والمحفوظ في رواية أبي بكر بن عياش ما رواه أصحابه: أبو كريب محمد بن العلاء عند الترمذي (1444)، وعثمان بن أبي شيبة عند أبي يعلى (7363)، وأبو هشام محمد بن يزيد بن رفاعة عند أبي الفضل الزهري في "حديثه" (156)، وأبي طاهر المخلص في "المخلصيات" (1353)، ومسلم بن سلام مولى بني هاشم فيما ذكر الدارقطني في "العلل"، أربعتهم عنه، عن عاصم، عن أبي صالح، عن معاوية بن أبي سفيان. وكذلك رواه أصحاب عاصم بن بهدلة عنه أيضًا، وسيأتي تخريج رواية أصحاب عاصم عنه عند حديث معاوية التالي.تنبيه: روي ابن حبان في "صحيحه" (4445) هذا الحديث عن أبي يعلى نفسه، فجعله من حديث أبي سعيد بدل معاوية. وتابع أبا يعلى عليه عن عثمان بن أبي شيبة أيضًا عبد الله بن محمد البغوي عند ابن شاهين في "ناسخ الحديث ومنسوخه" (527)، فيكون ما عند ابن حبان وهمًا، والله أعلم.



[2] إسناده صحيح. جرير: هو ابن عبد الحميد، ومغيرة: هو ابن مِقسَم.وأخرجه النسائي (5151) و (5281) عن إسحاق بن إبراهيم، عن جرير بن عبد الحميد، بهذا الإسناد. وقرن مع ابن عمر فيه نفرًا، وهو كذلك في رواية الحاكم الآتية برقم (8321) من طريق يحيى بن المغيرة السعدي عن جرير.ووقع في رواية النسائي الثانية مكان عبد الرحمن بن أبي نعم: عبد الرحمن بن إبراهيم، قال الحافظ ابن حجر في "النكت الظراف" 5/ 477: هكذا قرأته بخط المزي في لحق "الأطراف"، وفي الهامش بخط الحسيني: لم يذكر - يعني المزي - عبد الرحمن بن إبراهيم هذا في "التهذيب"، ولعله عبد الرحمن بن أبي نعم.وأخرجه أحمد 10/ (6197)، وأبو داود (4483) من طريق حميد بن يزيد أبي الخطاب، عن نافع، عن ابن عمر. لكنه شكّ في القتل، الرابعة أو الخامسة. وفي رواية أبي داود قال: وأحسبه قال في الخامسة: "إن شربها فاقتلوه". وحميد بن يزيد لم يرو عنه غير حماد بن سلمة، وقال الذهبي في "الميزان": لا يدرى من هو. ومعاوية جميعًا، فرواه على الوجهين، ولا سيما أنَّ سهيل بن أبي صالح يحفظ حديث أبيه، وكان مكتوبًا عنده، وعلى كلٍّ هذا من الخلاف الذي لا يضرُّ، فكلاهما صحابي جليل.سعيد: هو ابن أبي عروبة، ورواية عبد الوهاب عنه قبل الاختلاط، ولم نقف عليه من طريق سعيد بن أبي عروبة عند غير المصنف.وتابع سعيدًا عليه معمرٌ في الرواية التالية عند المصنف، وابنُ جريج فيما ذكر الترمذي في "جامعه" بإثر (1444).ورواه أحمد بن عبد الجبار العطاردي، عن أبي بكر بن عياش، عن عاصم بن بهدلة، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، عند أبي البختري في "مجموع مصنفاته" (321)، وابن شاذان في "الأول من حديثه" (75)، وقاضي المارستان في "المشيخة الكبرى" (150)، فوهم فيه العطارديُّ إذ جعله من حديث أبي هريرة، كما قال الدارقطني في "العلل" (1222).والمحفوظ في رواية أبي بكر بن عياش ما رواه أصحابه: أبو كريب محمد بن العلاء عند الترمذي (1444)، وعثمان بن أبي شيبة عند أبي يعلى (7363)، وأبو هشام محمد بن يزيد بن رفاعة عند أبي الفضل الزهري في "حديثه" (156)، وأبي طاهر المخلص في "المخلصيات" (1353)، ومسلم بن سلام مولى بني هاشم فيما ذكر الدارقطني في "العلل"، أربعتهم عنه، عن عاصم، عن أبي صالح، عن معاوية بن أبي سفيان. وكذلك رواه أصحاب عاصم بن بهدلة عنه أيضًا، وسيأتي تخريج رواية أصحاب عاصم عنه عند حديث معاوية التالي.تنبيه: روي ابن حبان في "صحيحه" (4445) هذا الحديث عن أبي يعلى نفسه، فجعله من حديث أبي سعيد بدل معاوية. وتابع أبا يعلى عليه عن عثمان بن أبي شيبة أيضًا عبد الله بن محمد البغوي عند ابن شاهين في "ناسخ الحديث ومنسوخه" (527)، فيكون ما عند ابن حبان وهمًا، والله أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8314)


8314 - فحدَّثَناه الحسن بن يعقوب العَدْل، حدَّثنا يحيى بن أبي طالب، حدَّثنا عبد الوهاب بن عطاء، أخبرنا سعيد، عن سُهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال: "مَن شَرِبَ الخمرَ فاجلِدُوه، ثم إذا شَرِبَ فاجلِدُوه، ثم إذا شَرِبَ في الرابعة فاقتُلُوه" [1]. وهذا الإسناد صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি মদ পান করবে, তাকে বেত্রাঘাত করো। এরপর যদি সে পান করে, তাকে বেত্রাঘাত করো। এরপর যদি সে চতুর্থবার পান করে, তবে তাকে হত্যা করো।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي، رجاله لا بأس بهم، لكن اختلف على أبي صالح - وهو ذكوان السمّان - فيه، فرواه عنه ابنه سهيل، فجعله من حديث أبي هريرة كما في هذه الرواية والتي تليها، ورواه عاصم بن بهدلة عن أبي صالح عن معاوية في الرواية الآتية برقم (8316)، قال البخاري فيما نقله الترمذي عنه في "جامعه" بإثر (1444): حديث أبي صالح عن معاوية عن النبي صلى الله عليه وسلم في هذا أصحُّ من حديث أبي صالح عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم. وتبعه الترمذي في "العلل الكبير" ص 232 فقال: حديث معاوية أشبه وأصحُّ. قلنا: ويحتمل أن أبا صالح سمعه من أبي هريرة ومعاوية جميعًا، فرواه على الوجهين، ولا سيما أنَّ سهيل بن أبي صالح يحفظ حديث أبيه، وكان مكتوبًا عنده، وعلى كلٍّ هذا من الخلاف الذي لا يضرُّ، فكلاهما صحابي جليل.سعيد: هو ابن أبي عروبة، ورواية عبد الوهاب عنه قبل الاختلاط، ولم نقف عليه من طريق سعيد بن أبي عروبة عند غير المصنف.وتابع سعيدًا عليه معمرٌ في الرواية التالية عند المصنف، وابنُ جريج فيما ذكر الترمذي في "جامعه" بإثر (1444).ورواه أحمد بن عبد الجبار العطاردي، عن أبي بكر بن عياش، عن عاصم بن بهدلة، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، عند أبي البختري في "مجموع مصنفاته" (321)، وابن شاذان في "الأول من حديثه" (75)، وقاضي المارستان في "المشيخة الكبرى" (150)، فوهم فيه العطارديُّ إذ جعله من حديث أبي هريرة، كما قال الدارقطني في "العلل" (1222).والمحفوظ في رواية أبي بكر بن عياش ما رواه أصحابه: أبو كريب محمد بن العلاء عند الترمذي (1444)، وعثمان بن أبي شيبة عند أبي يعلى (7363)، وأبو هشام محمد بن يزيد بن رفاعة عند أبي الفضل الزهري في "حديثه" (156)، وأبي طاهر المخلص في "المخلصيات" (1353)، ومسلم بن سلام مولى بني هاشم فيما ذكر الدارقطني في "العلل"، أربعتهم عنه، عن عاصم، عن أبي صالح، عن معاوية بن أبي سفيان. وكذلك رواه أصحاب عاصم بن بهدلة عنه أيضًا، وسيأتي تخريج رواية أصحاب عاصم عنه عند حديث معاوية التالي.تنبيه: روي ابن حبان في "صحيحه" (4445) هذا الحديث عن أبي يعلى نفسه، فجعله من حديث أبي سعيد بدل معاوية. وتابع أبا يعلى عليه عن عثمان بن أبي شيبة أيضًا عبد الله بن محمد البغوي عند ابن شاهين في "ناسخ الحديث ومنسوخه" (527)، فيكون ما عند ابن حبان وهمًا، والله أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8315)


8315 - فحدَّثَناه أبو زكريا العَنْبري، حدَّثنا أبو عبد الله البُوشَنْجي، حدَّثنا أحمد بن حنبل، حدَّثنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، أن النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال: "مَن شَرِبَ الخمرَ فاجلِدُوه، ثم إذا شَرِبَ فاجلِدُوه، ثم إذا شَرِبَ فاجلِدُوه، ثم إذا شَرِبَ في الرابعة فاقتُلُوه" [1]. قال مَعمَر: فَحَدَّثَتُ به محمد بن المُنكدِر فقال: قد تُرِكَ ذلك بعدُ، أُتِيَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم بابن النُّعَيمان فجلدَه، ثم أُتِي به فجلدَه، ثم أُتِيَ به فجلدَه، ثم أُتِي به في الرابعة فجلدَه، ولم يَزِدْ على ذلك [2].فأما حديثُ معاوية:




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি মদ পান করবে, তাকে বেত্রাঘাত করো। এরপর যদি সে আবার পান করে, তাকে বেত্রাঘাত করো। এরপর যদি সে আবার পান করে, তাকে বেত্রাঘাত করো। এরপর যদি সে চতুর্থবার পান করে, তবে তাকে হত্যা করো।" মা'মার বলেন: আমি এই (হাদীস) সম্পর্কে মুহাম্মাদ ইবনু মুনকাদির-এর কাছে আলোচনা করলে তিনি বললেন: (হত্যার বিধান) এরপর প্রত্যাহার করা হয়েছে। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ইবনু নু'আইমানকে আনা হলো এবং তিনি তাকে বেত্রাঘাত করলেন। এরপর তাঁকে আবার আনা হলো এবং তিনি তাকে বেত্রাঘাত করলেন। এরপর তাঁকে (তৃতীয়বার) আনা হলো এবং তিনি তাকে বেত্রাঘাত করলেন। এরপর চতুর্থবার তাঁকে আনা হলো এবং তিনি তাকে বেত্রাঘাত করলেন, কিন্তু এর অতিরিক্ত আর কিছুই করলেন না।




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح على اختلاف وقع في صحابيه كما بيناه في الرواية السابقة. أبو عبد الله البوشنجي: هو محمد بن إبراهيم بن سعيد العبدري.وهو في "مصنف عبد الرزاق" (13549) و (17081)، ومن طريقه أخرجه أحمد 13/ (7762)، والنسائي (5277). وتابع معمرًا عليه ابن جريج فيما ذكر الترمذي في "جامعه" بإثر (1444).



[2] رواية محمد بن المنكدر عن النبي صلى الله عليه وسلم هنا مرسلة، ووصلها محمد بن إسحاق عن ابن المنكدر عن جابر بن عبد الله عند المصنف برقم (8322)، وإسنادها ضعيف، يأتي الكلام عليها هناك.ولقصة النُّعيمان انظر حديث عُقبة بن الحارث الآتي برقم (8324). القاص، عن عبد الرحمن بن عبدٍ الجَدَلي، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8316)


8316 - فحدَّثَناه الحسن بن يعقوب العَدْل، حدَّثنا يحيى بن أبي طالب، حدَّثنا عبد الوهاب بن عطاء، أخبرنا سعيد، عن [1] عاصم بن بَهْدلة، عن ذَكْوان أبي صالح - وأثنى عليه خيرًا - عن معاوية، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم قال: "إن شَرِبُوا الخمر فاجلِدُوهم، ثم إن شَرِبُوا فاجلِدُوهم، ثم إن شَرِبُوا فَاجلِدُوهم، ثم إن شَرِبُوا الرابعةَ فاقتلوهم [2] " [3]. وأما حديثُ الشَّريد بن سُوَيد:




মুয়াবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যদি তারা মদ পান করে, তবে তাদের বেত্রাঘাত করো। এরপর যদি তারা (আবার) পান করে, তবে তাদের বেত্রাঘাত করো। এরপর যদি তারা (আবার) পান করে, তবে তাদের বেত্রাঘাত করো। এরপর যদি তারা চতুর্থবার পান করে, তবে তাদের হত্যা করো।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: بن. القاص، عن عبد الرحمن بن عبدٍ الجَدَلي، به.



[2] المثبت من (ك)، وفي بقية النسخ الخطية: فاقتلوه. القاص، عن عبد الرحمن بن عبدٍ الجَدَلي، به.



8316 [3] - حديث صحيح، وهذا إسناد حسن. واختلف على أبي صالح. وهو ذكوان السمان - في تسمية صحابيه، سبق التنبيه عليه عند الرواية (8314).وأخرجه ابن ماجه (2573)، وابن حبان (4446) من طريق شعيب بن إسحاق، عن سعيد بن أبي عروبة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 28/ (16859) و (16869) و (16926)، وأبو داود (4482)، والترمذي (1444)، والنسائي (5278) من طرق عن عاصم بن بهدلة، به.وأخرجه أحمد (16847) و (16888)، والنسائي (5279) و (5280) من طريق معبد بن خالد القاص، عن عبد الرحمن بن عبدٍ الجَدَلي، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8317)


8317 - فحدَّثَناه أبو عبد الله الصَّفَّار، حدَّثنا محمد بن مَسْلَمة، حدَّثنا يزيد بن هارون، أخبرنا محمد بن إسحاق، عن الزُّهْري، عن عمرو بن الشَّريد، عن أبيه، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم قال: "إذا شَرِبَ أحدُكم الخمرَ فاجلِدُوه، ثم إن عادَ فاجلدُوه، فإن عادَ فاجلدوه، فإن عادَ الرابعةَ فاقتُلوه" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وأما حديثُ عبد الله بن عمرو:




শারীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ যখন মদ পান করে, তখন তাকে বেত্রাঘাত করো। এরপর সে যদি আবার পান করে, তাকে বেত্রাঘাত করো। অতঃপর সে যদি (তৃতীয়বার) আবার পান করে, তাকে বেত্রাঘাত করো। অতঃপর সে যদি চতুর্থবারও পান করে, তবে তাকে হত্যা করো।"




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف، تفرد محمد بن مسلمة - وهو ابن الوليد أبو جعفر الواسطي الطيالسي - بذكر الزهري فيه بين محمد بن إسحاق وعمرو بن الشريد، ومحمد هذا قال الخطيب في "تاريخ بغداد" 4/ 490: في حديثه مناكير بأسانيد واضحة، إلَّا أنَّ الحاكم ذكر أنه سمع الدارقطني يقول: لا بأس به. ثم قال الخطيب: رأيت هبة الله بن الحسن الطبري (وهو أبو القاسم اللالكائي) يضعفه، وسمعت الحسن بن محمد الخلال يقول: ضعيف جدًّا.وقال الحافظ ابن حجر في "موافقة الخُبْر الخَبَر" 2/ 258: وهو خطأ من الراوي عن يزيد بن هارون، وهو محمد بن مسلمة الواسطي، وهو ضعيف جدًّا.قلنا: والمحفوظ أنَّ بينهما عبد الله بن عتبة بن عروة بن مسعود الثقفي كما عند النسائي أو عبد الله بن أبي عاصم بن عروة بن مسعود الثقفي كما عند أحمد، وأورد المزي حديثه هذا في "تحفة الأشراف" (4845)، لكنه لم يترجم له في "التهذيب"، وذكره في الرواة عن عمرو بن الشريد، لكنه لم يرقم له برقم النسائي، ولا استدركه الحافظ في "تهذيبه" ولا "تقريبه" ولا في "التعجيل" إذ روى له أحمد هذا الحديث، ولم نقف له على ترجمة في كتب التراجم، ووقع اسمه في "النكت الظراف": عبد الله بن عطية بن عمرو الثقفي، ولم نقف له على ترجمة أيضًا.وفي هذه الطبقة عبد الملك بن أبي عاصم بن عُروة الثقفي، حجازي، يروي عن سعيد بن المسيب، روى عنه سعيد بن السائب، ترجم له البخاري وابن أبي حاتم، ولم يذكرا فيه تعديلًا ولا جرحًا، وأورده ابن حبان في "ثقاته" 7/ 104، فإما أنه أخو عبد الله، أو في تسميته عبد الله وهمٌ، والله تعالى أعلم.وأخرجه أحمد 32/ (19460) من طريق إبراهيم بن سعد، والنسائي (5282) من طريق يزيد بن زريع، كلاهما عن محمد بن إسحاق، حدَّثنا عبد الله بن عتبة بن عروة بن مسعود الثقفي، عن عمرو بن الشريد، فذكره.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8318)


8318 - فحدَّثَناه أبو زكريا يحيى بن محمد العَنْبري، حدَّثنا محمد بن عبد السلام، حدَّثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا معاذ بن هشام، حدثني أبي، عن قَتادةَ، عن شَهْر بن حَوْشَب، عن عبد الله بن عمرو: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال في الخمر: "إذا شَرِبُوها فاجلِدُوهم، ثم إن شَرِبُوها فاجلِدُوهم، ثم إذا شَرِبُوها فاجلِدُوهم، ثم إذا شَرِبُوها فاقتُلوهم عند الرابعة" [1].وأما حديثُ شُرَحبيل بن أوس:




আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদ (পান করা) সম্পর্কে বলেছেন: "যখন তারা তা পান করে, তখন তাদের বেত্রাঘাত করো। এরপর যদি তারা তা পান করে, তবে তাদের বেত্রাঘাত করো। এরপর যখন তারা তা পান করে, তখন তাদের বেত্রাঘাত করো। এরপর যদি তারা চতুর্থবার তা পান করে, তবে তাদের হত্যা করো।" [১] আর শুরাহবীল ইবনে আওসের হাদীস প্রসঙ্গে:




تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده حسن في المتابعات والشواهد من أجل شهر بن حوشب. محمد بن عبد السلام: هو ابن بشار النيسابوري، وهشام والد معاذ: هو الدستوائي.وأخرجه أحمد 11/ (6553) عن معاذ بن هشام، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد أيضًا (6553) و (7003) من طريق همام بن يحيى، عن قَتادةَ به.وأخرجه أحمد (6791) و (6974) من طريق الحسن البصري قال: والله لقد زعموا أن عبد الله بن عمرو شهد بها على رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال، فذكره. والحسن لم يسمع من عبد الله بن عمرو، قاله علي بن المديني كما في "المراسيل" لابن أبي حاتم. وأخرجه أحمد 38/ (23130) عن محمد بن جعفر، بهذا الإسناد.