আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
8319 - أخبرني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدَّثنا محمد بن غالب، حدَّثنا خلف بن سالم وعبد الله بن عمرو العِراقي، قالا: حدَّثنا محمد بن جعفر غُنْدَر، حدَّثنا شُعْبة، عن [1] أبي بشر، قال: سمعتُ يزيد بن أبي كبشة يَخطُب بالشام، قال: سمعتُ رجلًا من أصحاب النبيِّ صلى الله عليه وسلم يُحدِّث عبد الملك بن مروان في الخمر: أَنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال في الخمر: "إن شَرِبَها فاجلِدُوه، فإن عادَ فاجلِدُوه، ثم إن عادَ فاجلِدُوه، ثم إن عادَ في الرابعة فاقتُلوه" [2]. فسمعتُ أبا عليٍّ الحافظ يُحدِّثنا بهذا الحديث، فقال في آخره: هذا الصحابي من أهل الشام هو شُرَحبيل بن أوس [3].
শুরাহবীল ইবন আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদ (খমর) সম্পর্কে বলেছেন: "যদি সে তা পান করে, তবে তাকে বেত্রাঘাত করো। যদি সে আবার পান করে, তবে তাকে বেত্রাঘাত করো। অতঃপর যদি সে আবার পান করে, তবে তাকে বেত্রাঘাত করো। অতঃপর যদি সে চতুর্থবার পান করে, তবে তাকে হত্যা করো।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: بن. وأخرجه أحمد 38/ (23130) عن محمد بن جعفر، بهذا الإسناد.
[2] إسناده حسن من أجل يزيد بن أبي كبشة، فقد روى عنه جمع، وذكره ابن حبان في "الثقات".وعبد الله بن عمرو العراقي لم نتبينه، وهو متابَع. وأبو بشر: هو جعفر بن إياس أبي وحشية. وأخرجه أحمد 38/ (23130) عن محمد بن جعفر، بهذا الإسناد.
8319 [3] - قال الحافظ ابن حجر في "موافقة الخُبْر الخَبَر" 2/ 259: كذا قال، ولم يذكر لذلك مستندًا، والذي يظهر أنه غيره، والعلمُ عند الله. قلنا: وحديث شرحبيل هو التالي.
8320 - فحدَّثنا بصحة ما ذكره أبو عليٍّ: عبدُ الله بن إسحاق الخُراساني، حدَّثنا محمد بن أحمد بن بُرْد الأنطاكي، حدَّثنا الحَكَم بن نافع البَهْراني، حدَّثنا حَريز بن عثمان، عن أبي الحسن نِمْران بن مِخمَر [1]، عن شُرَحبيل بن أوس - وكان من أصحاب النبيِّ صلى الله عليه وسلم عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم قال: "إذا شَرِبَ الخمرَ فاجلِدُوه، ثم إن شَرِبَ فاجلِدُوه، ثم إن شَرِبَ فاجلِدُوه، ثم إن شَربَ الرابعة فاقتُلوه" [2].وأما حديثُ النَّفَر من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم:
শুরহাবিল ইবন আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যখন কেউ মদ পান করে, তখন তাকে বেত্রাঘাত করো। এরপর যদি সে আবার পান করে, তবে তাকে বেত্রাঘাত করো। এরপর যদি সে (তৃতীয়বার) পান করে, তবে তাকে বেত্রাঘাত করো। এরপর যদি সে চতুর্থবার পান করে, তবে তাকে হত্যা করো।”
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: محمد.
[2] إسناده محتمل للتحسين من أجل نمران بن مخمر، فقد روى عنه اثنان، وذكره ابن حبان في "ثقاته" 7/ 545،، ونقل البخاري في "تاريخه" 8/ 120 عن محمد بن الوليد الزبيدي تصريحه بالسماع من صحابيه الذي قيل في اسمه: شرحبيل بن أوس، وقيل أيضًا: أوس بن شرحبيل. حريز: هو ابن عثمان الحجبي.وأخرجه أحمد 29/ (18053) عن علي بن عياش وعصام بن خالد، عن حريز بن عثمان، بهذا الإسناد.
8321 - فأخبرني عبد الله بن محمد الكَعْبي [1]، حدَّثنا محمد بن أيوب، حدَّثنا يحيى بن المغيرة السَّعْدي، حدَّثنا جَرير، عن المغيرة، عن عبد الرحمن بن أبي نُعْم، عن ابن عُمر ونَفَرٍ من أصحاب النبيِّ صلى الله عليه وسلم قالوا: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن شَرِبَ الخمرَ فاجلِدُوه، فإن شَرِبَ فاجلِدُوه، فإن شَرِبَ فاجلِدُوه، ثم إن شَرِبَ الرابعةَ فاقتُلوه" [2].
আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একদল সাহাবী থেকে বর্ণিত, তাঁরা বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি মদ পান করবে, তাকে বেত্রাঘাত করো। যদি সে আবার পান করে, তাকে বেত্রাঘাত করো। যদি সে আবার পান করে, তাকে বেত্রাঘাত করো। অতঃপর, যদি সে চতুর্থবার পান করে, তবে তাকে হত্যা করো।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في (ز) و (ك) إلى: الكتبي، والمثبت من (م).
[2] إسناده صحيح. محمد بن أيوب: هو ابن الضُّريس، وجرير هو ابن عبد الحميد، والمغيرة: هو ابن مِقسم. وسلف برقم (8313).
8322 - أخبرني الحسين بن علي التَّميمي، حدَّثنا محمد بن إسحاق الإمامُ، حدَّثنا محمد بن موسى الحَرَشي، حدَّثنا زياد بن عبد الله، حدَّثنا محمد بن إسحاق، عن محمد بن المُنكدر، عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن شَرِبَ الخمرَ فاجلِدُوه، فإن عادَ فاجلِدُوه، فإن عادَ فاجلِدُوه، فإن عادَ الرابعة فاقتُلوه". قال: فضرب رسول الله صلى الله عليه وسلم النُّعَيمانَ أربعَ مراتٍ [1].
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি মদ পান করবে, তাকে বেত্রাঘাত করো। যদি সে আবার করে, তাকে বেত্রাঘাত করো। যদি সে আবার করে, তাকে বেত্রাঘাত করো। যদি সে চতুর্থবার করে, তবে তাকে হত্যা করো।" তিনি বললেন: অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নু’আইমানকে চারবার বেত্রাঘাত করেছিলেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] رجاله لا بأس بهم، لكن محمد بن إسحاق مدلس، ولم يصرِّح بسماعه من محمد بن المنكدر، وشكك البخاري في "تاريخه" 1/ 244 بسماعه منه، فقال: وقال بعضهم: محمد بن إسحاق لم يسمع من ابن المنكدر. ثم قال: وهذا حديث لم يتابَع عليه. قلنا: قد خالفه أيضًا من هو أوثق منه فأرسلوه.وأخرجه البزار (5965)، والنسائي (5284)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 8/ 314، وفي "معرفة السنن والآثار" (17394) من طريق محمد بن موسى الحرشي، بهذا الإسناد. وزادوا: فرأى المسلمون أن الحدَّ قد وقع، وأن القتل قد رُفع.وأخرجه بنحوه البخاري في "التاريخ الكبير" 1/ 244، والعقيلي في "الضعفاء" (1658) من طريق محمد بن المعلى الإيامي، والنسائي (5283)، والطحاوي في "شرح المعاني" 3/ 161 من طريق شريك النخعي، كلاهما عن ابن إسحاق به.وخالفهم الحسن بن صالح بن حي عند الخطيب في "الأسماء المبهمة" ص 307، فرواه عن ابن إسحاق، عن عبد الملك بن أبي بكر، عن ابن المنكدر، به. فزاد فيه عبد الملك بن أبي بكر بين ابن إسحاق وابن المنكدر، وهذا الإسناد لا يفرح به، في الطريق إلى ابن إسحاق أحمدُ بن محمد بن السري التميمي متهم بالكذب، وكذلك لم يصرح ابن إسحاق فيه بالسماع من عبد الملك.وخالف ابنَ إسحاق معمرٌ فيما سلف بإثر (8315)، وعمرُو بن الحارث المصري عند الطحاوي 3/ 161، وابنُ جُريج فيما ذكر الترمذي في "جامعه" بإثر (1444)، فرووه عن ابن المنكدر مرسلًا، ليس فيه جابر. وإسناد طريقي معمر وعمرو بن الحارث صحيح إلى ابن المنكدر.وأخرجه بنحوه عبد الرزاق (13552) و (17082)، وابن سعد في "الطبقات" 3/ 458 من طريق معمر، عن زيد بن أسلم مرسلًا قال: أُتي بابن النعيمان إلى النبي صلى الله عليه وسلم مرارًا، أكثر من أربع، فجلده في كل ذلك، فقال رجل عند النبي صلى الله عليه وسلم: اللهم العنه، ما أكثرَ ما يشرب، وما أكثرَ ما يجلد، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "لا تلعنه، فإنه يحب الله ورسوله".
8323 - أخبرنا محمد بن أحمد بن تَمِيم القَنْطري بها، حدَّثنا أبو قِلابة، حدَّثنا أبو عاصم، حدَّثنا ابن جُرَيج، أخبرني محمد بن علي بن رُكانة، أخبرني عِكْرمة، عن ابن عباس: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يَقِتْ في الخمرِ حدًّا.قال ابن عباس: شَرِبَ رجلٌ فَسَكِرَ، فلُقِي يَمِيلُ في الفجِّ، فانطلقنا به إلى النبيِّ صلى الله عليه وسلم، فلمَّا حاذَى بدار العبّاس انفلَتَ فدخلَ على العباس فالتَزَمَه، فذُكِرَ ذلك للنبيِّ صلى الله عليه وسلم فضَحِكَ، وقال: "أفعَلَها؟ " ولم يأمُرْ فيه بشيءٍ [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদের জন্য কোনো নির্দিষ্ট শাস্তি (হদ) নির্ধারণ করেননি। ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এক ব্যক্তি মদ পান করে নেশাগ্রস্ত হয়ে পড়ল। অতঃপর তাকে রাস্তার সংকীর্ণ পথে টলতে থাকা অবস্থায় পাওয়া গেল। আমরা তাকে নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম। যখন সে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘরের কাছাকাছি পৌঁছাল, তখন সে পালিয়ে গেল এবং আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করে তাঁকে জড়িয়ে ধরল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এ কথা উল্লেখ করা হলে তিনি হাসলেন এবং বললেন: "সে কি এমনটি করেছে?" তিনি তার ব্যাপারে কোনো নির্দেশ দেননি।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده ضعيف، محمَّد بن علي بن ركانة - وهو ابن علي بن يزيد بن ركانة - مجهول الحال، وباقي رجاله لا بأس بهم، وقد قوّى هذا الإسناد الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 21/ 434.أبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد، وابن جريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز.وأخرجه أبو داود (4476)، والنسائي (5271) من طريقين عن أبي عاصم النبيل، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 5/ (2963)، والنسائي (5272) من طريق روح، عن ابن جريجٍ، به.ويشهد لمعنى حديث ابن عباس في عدم تحديد عدد الجلدات على عهد النبي صلى الله عليه وسلم ما رواه البخاري (6778) ومسلم (1707) من طريق عمير بن سعيد قال: سمعت علي بن أبي طالب قال: ما كنت لأقيمَ حدًا على أحد فيموت فأجد في نفسي، إلَّا صاحب الخمر، فإنه لو مات وديته، وذلك أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يسنه. وانظر "فتح الباري" 21/ 425.وما سيأتي من حديث السائب بن يزيد برقم (8326)، وحديث عبد الرحمن بن أزهر برقم (8329)، وحديث ابن عباس نفسه الآتي برقم (8331).وأخرج مسلم (1706) وغيره من حديث أنس: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أتي برجل قد شرب الخمر، فجلده بجريدتين نحو أربعين. وفي رواية أخرى عند مسلم (1706): أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان يضرب بالنعال والجريد أربعين.وأخرج مسلم (1707) من حديث علي … وفيه: فقال (يعني عثمان بن عفان): يا عبد الله بن جعفر قم فاجلده، فجلده وعلي يعد حتى بلغ أربعين، فقال: أمِسك، ثم قال: جلد النبي صلى الله عليه وسلم أربعين، وجلد أبو بكر أربعين، وعمر ثمانين، وكلٌّ سنة، وهذا أحب إلي.وانظر "فتح الباري" للحافظ ابن حجر 21/ 433 - 435.
8324 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الشَّيباني، حدَّثنا يحيى بن محمد بن يحيى الذُّهْلي، حدَّثنا مُسدَّد، حدَّثنا عبد الوهاب، حدَّثنا أيوب، عن عبد الله بن أبي مُلَيكة، عن عُقْبة بن الحارث قال: جِيءَ بالنُّعَيمان - أو بابن النُّعْيمان - شاربًا، فأَمَرَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم مَن كان في البيت أن يَضرِبَه، قال: وكنتُ أنا فيمن ضربَه، فضَرَبناه بالنِّعال والجَريد [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وقد تابع عبدُ الوارث بن سعيد عبدَ الوهاب الثقفي على وَصْله بذكر عُقبة بن الحارث:
উক্ববাহ ইবনুল হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নুআইমানকে—অথবা ইবনু নুআইমানকে—পানকারী অবস্থায় (নেশাগ্রস্ত) নিয়ে আসা হলো। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘরের মধ্যে উপস্থিত লোকদের তাকে প্রহার করার নির্দেশ দিলেন। তিনি বলেন, আমি তাদের মধ্যে ছিলাম যারা তাকে প্রহার করেছিল। সুতরাং আমরা তাকে জুতা ও খেজুর ডাল দিয়ে প্রহার করলাম।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح. عبد الوهاب: هو ابن عبد المجيد الثقفي، وأيوب: هو السختياني.وأخرجه البخاري (2316) و (6774) من طريقين عن عبد الوهاب بن عبد المجيد، بهذا الإسناد.فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه أحمد 26/ (16155)، والبخاري (6775)، والنسائي (5276) من طريق وهيب بن خالد، عن أيوب السختياني، به.وانظر ما بعده.والنُّعيمان، قال الحافظ في "فتح الباري" 7/ 408: هو النعيمانُ بن عَمْرو بن رفاعة بن الحارث بن سواد بن مالك بن غَنْم بن مالك بن النَّجار الأنصاري، ممَّن شَهِدَ بدرًا، وكان مزاحًا.
8325 - حدَّثَناه أبو سعيد أحمد بن يعقوب الثَّقفي، حدَّثنا يوسف بن يعقوب القاضي، حدَّثنا محمد بن أبي بكر، حدَّثنا عبد الوارث، حدَّثنا أيوب، عن ابن أبي مُلَيكة، قال: أخبرني عُقبة بن الحارث قال: جِيء بالنُّعيمان، فأمرَ رسول الله صلى الله عليه وسلم مَن في البيت، فَضَرَبُوه بالأيدي والنِّعال، وكنت فيمن ضَرَبَه [1].
উকবাহ ইবনুল হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নু'আইমানকে (নবীর কাছে) নিয়ে আসা হয়েছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘরে উপস্থিত লোকদের আদেশ দিলেন। ফলে তারা হাত ও জুতা দ্বারা তাকে প্রহার করল। আর আমি তাদের মধ্যে ছিলাম যারা তাকে প্রহার করেছিল।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح. محمد بن أبي بكر: هو ابن علي بن عطاء المقدَّمي، وعبد الوارث: هو ابن سعيد بن ذكوان.وأخرجه أحمد 26/ (16150) و 32/ (19425) عن عبد الصمد بن عبد الوارث، عن أبيه، بهذا الإسناد.
8326 - أخبرنا أبو أحمد بكر بن محمد بن حَمْدان الصَّيرَفي بمَرْو، حدَّثنا عبد الصمد بن الفضل البَلْخي، حدَّثنا مَكِّيُّ بن إبراهيم، حدَّثنا الجُعَيد [1] بن عبد الرحمن، عن يزيد بن خُصَيفة، عن السائب بن يزيد قال: كان يُؤتَى بالشارب في عهد رسولِ الله صلى الله عليه وسلم وفي إمرة أبي بكر وصَدْرًا من إمرة عمر، فنقوم إليه فنضربُه بأيدينا ونعالِنا وأرديَتِنا حتى كان صَدْرًا من إمارة عمر، فجَلَدَ فيها أربعينَ، حتى إذا عاثُوا فيها وفَسَقُوا جَلَدَ فيها ثمانينَ [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين.
সায়িব ইবনু ইয়াযীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর যুগে, আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফাতকালে এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফাতের প্রথম দিকে যখন কোনো মদপায়ীকে নিয়ে আসা হতো, তখন আমরা তার কাছে যেতাম এবং তাকে আমাদের হাত, জুতো ও চাদর দিয়ে প্রহার করতাম। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফাতের প্রথম দিকে তিনি এই অপরাধে চল্লিশ ঘা বেত্রাঘাত শুরু করলেন। এরপর যখন মানুষ বাড়াবাড়ি শুরু করলো এবং পাপাচারে লিপ্ত হলো, তখন তিনি আশি ঘা বেত্রাঘাত করলেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ إلى: الجعيدي.
[2] إسناده صحيح، الجعيد - ويقال: الجعد - بن عبد الرحمن: هو ابن أوس الكندي، سمع هذا الحديث من السائب مباشرة، ومرة بواسطة يزيد بن خصيفة.وقال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 21/ 426: فعلى هذا فإدخال يزيد بن خصيفة بينهما إما من المزيد في متصل الأسانيد، وإما أن يكون الجعيد سمعه من السائب، وثَبَّتَه فيه يزيد، ثم ظهر لي السبب في ذلك، وهو أنَّ رواية الجعيد المذكورة عن السائب مختصرة، فكأنه سمع الحديث تامًّا من يزيد عن السائب، فحدَّث بما سمعه من السائب عنه من غير ذكر يزيد، وحدث أيضًا بالتامِّ، فذكر الواسطة.وأخرجه أحمد 24/ (15719)، والبخاري (6779)، والنسائي (5261) من طرق عن مكي بن إبراهيم، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (5259) من طريق حاتم بن إسماعيل، و (5260) من طريق المغيرة بن عبد الرحمن، كلاهما عن الجعيد بن عبد الرحمن، قال: سمعت السائب، فذكره. ليس فيه يزيد بن خصيفة، وصرح الجعيد فيه بالسماع من السائب، وكان الجعيد قد لقي السائب، فقد روى البخاري (3540) أنَّ الجعيد قال: رأيت السائب بن يزيد ابن أربع وتسعين جَلْدًا معتدلًا.
8327 - أخبرني عبد الله بن الحسين القاضي بمَرْو، حدَّثنا الحارث بن أبي أسامة، حدَّثنا يزيد بن هارون، أخبرنا محمد بن عمرو، عن أبي سَلَمة ويحيى بن عبد الرحمن بن حاطب، عن عبد الرحمن بن أزهَرَ قال: أُتي النبيُّ صلى الله عليه وسلم بشاربٍ فقال: "قوموا إليه فاضربُوه"، فقاموا إليه فخَفَقُوه بنعالِهم [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল রহমান ইবনে আযহার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একজন মদ্যপায়ীকে আনা হলো, তখন তিনি বললেন: "তোমরা তার দিকে দাঁড়াও এবং তাকে প্রহার করো।" অতঃপর তারা তার দিকে দাঁড়ালো এবং তাদের জুতা দিয়ে তাকে প্রহার করলো।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن عمرو - وهو ابن علقمة الليثي - وقد توبع.وأخرجه البزار في "مسنده" (3455) من طريق عبد الأعلى بن عبد الأعلى، عن محمد بن عمرو، بهذا الإسناد مطولًا بلفظ: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أتي بشارب فأمر به أن يضرب، فضربوه بما كان في أيديهم، فلما كان في عهد أبي بكر، أتي بشارب فسأل عن ضربه فتوخينا الضرب الذي ضربناه على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم للشارب، فتوخيناه أربعين، فضربه أربعين ثم ضرب عمر ثمانين.وأخرجه الترمذي في "العلل الكبير" (416) من طريق يحيى بن سعيد الأموي، والنسائي (5265) من طريق أزهر بن سعد، والنسائي (5267) من طريق معتمر بن سليمان، والبغوي في "معجم الصحابة" (1889)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" 3/ 156، والدارقطني (3324) من طريق محمد بن بشر العبدي، والبغوي (1889) من طريق أبي أسامة حماد بن أسامة، أربعتهم عن محمد بن عمرو، بهذا الإسناد. وقرن النسائيُّ في روايته الثانية بأبي سلمة محمدَ بنَ إبراهيم التيمي، وكذا البغوي والطحاوي والدارقطني وزادوا معه الزهريَّ.وقال الترمذي: سألت محمدًا عن هذا الحديث، فقال: اختلفوا في هذا الحديث، وحديث عبد الرحمن بن أزهر ما أُراه محفوظًا. قلنا: له طريق آخر سيأتي عند المصنف برقم (8329) من طريق الزهري عن عبد الرحمن بن أزهر مطولًا، وفيه أنَّ عبد الرحمن بن أزهر شهد الحادثة في غزوة حنين. وقال البزار: وحديث أبي سلمة ويحيى بن عبد الرحمن بن حاطب عن عبد الرحمن بن أزهر، إنما ذكرناه لأنَّ أبا سلمة ويحيى بن عبد الرحمن لم يحدِّثا عن عبد الرحمن بن أزهر بغير هذا الحديث، ولا نعلم يُروى لعبد الرحمن بن أزهر إسناد أحسن اتصالًا من هذا الإسناد، وإن كان الزهري قد لقيَه.وأخرجه النسائي (5266) من طريق محمد بن عبد الله الأنصاري، عن محمد بن عمرو، عن محمد بن إبراهيم التيمي، عن عبد الرحمن بن أزهر، به.وأخرجه الطحاوي 3/ 156 من طريق نافع بن يزيد الكلاعي وأنس بن عياض، عن يزيد بن عبد الله بن الهاد، عن محمد بن إبراهيم بن الحارث التيمي، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة.
8328 - حدَّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدَّثنا إبراهيم بن مرزوق، حدَّثنا وهب بن جَرير، حدَّثنا شُعْبة، عن أبي التَّيّاح، عن أبي الوَدَّاك، عن أبي سعيد الخُدْري قال: لا أشربُ نبيذَ الجرِّ بعد إذ أتي النبيُّ صلى الله عليه وسلم بنَشْوانَ، فقال: يا رسولَ الله، ما شربتُ خمرًا، لكني شربتُ نبيذَ زبيبٍ وتمرٍ في دُبَّاء، فأُمر به فبُهِزَ بالأيدي، وخُفِقَ بالنِّعال، ونَهَى عن الزَّبيب والتمر وعن الدُّبَّاء [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মাটির পাত্রের নবীজ আর পান করি না। কারণ একবার মাতাল অবস্থায় এক ব্যক্তিকে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আনা হয়েছিল। সে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমি মদ পান করিনি, তবে আমি লাউয়ের খোল (দুব্বা)-এর মধ্যে রাখা কিসমিস ও খেজুরের তৈরি নবীজ পান করেছিলাম। অতঃপর তাঁর নির্দেশে তাকে হাত দ্বারা প্রহার করা হয় এবং জুতা দ্বারা আঘাত করা হয়। আর তিনি কিসমিস, খেজুর এবং লাউয়ের খোল ব্যবহার করতে নিষেধ করেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح. أبو التياح: هو يزيد بن حميد الضُّبعي وأبو الوداك: هو جَبْر بن نوف الهمداني البكالي.وأخرجه أحمد 17/ (11297) و 18/ (11418)، والنسائي (5273) من طرق عن شعبة، بهذا الإسناد.وأخرج شطره الثاني في النهي عن الزبيب والتمر وعن الدباء، أحمد 17/ (10991) و (11065) و 18/ (11464) و (11544) و (11682) و (11849)، ومسلم (18) (26) و (27) و (28)، و (1987) (20) و (21) و (1996) (44)، والترمذي (1877)، والنسائي (6773)، وابن حبان (4541) و (5378) من طريق أبي نضرة المنذر بن مالك، وأحمد 18/ (11854)، ومسلم (1987) (22) و (23) و (1966) (45)، وابن ماجه (3403)، والنسائي (5059) و (5060) و (5062) و (5123) و (6780) من طريق أبي المتوكل الناجي، وأحمد 1/ (185) و 18/ (11598)، والنسائي (5043) و (6768) من طريق مالك بن الحارث، وأحمد (11559)، والنسائي (5040) و (6766) من طريق أبي أرطاة، وأحمد (11851) و (11852) من طريق الحسن البصري، كلهم عن أبي سعيد الخدري.وانظر لشطره الثاني حديث جابر السالف برقم (7404).والبَهْز: الدَّفع العنيف.والدُّبّاء، قال ابن الأثير في "النهاية": الدباء: القرع، واحدها دُبّاءة، كانوا ينتبذون فيها فتسرع الشدةُ في الشراب. وتحريم الانتباذ في هذه الظروف كان في صدر الإسلام ثم نسخ، قلنا: انظر تعليقنا على ذلك في "مسند أحمد" 3/ (2020) عند حديث أبي جمرة الضبعي عن ابن عباس.
8329 - حدَّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدَّثنا بكَّار بن قُتَيبة القاضي، حدَّثنا صفوان بن عيسى القاضي، أخبرنا أسامة بن زيد، عن الزُّهْري، قال: حدثني عبد الرحمن بن أزهَرَ قال: رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يومَ حُنين وهو يتخلَّلُ الناس، يسألُ عن منزل خالدِ بن الوليد، فأُتِيَ بسكرانَ، فأَمر رسولُ الله صلى الله عليه وسلم مَن كان عندَه أَن يَضربوه بما كان في أيديهم. قال: وحَثَا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم الترابَ في وجهه.قال: ثم أُتِيَ أبو بكر بسكرانَ، قال: فتوخَّى الذين كان مِن ضربهم يومَئِذٍ، فَضَرَبَ أربعينَ، وضَرَبَ عمرُ أربعين [1].
আব্দুর রহমান ইবনে আযহার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি হুনায়নের যুদ্ধের দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি। তিনি লোকেদের ভিড়ে চলাফেরা করছিলেন এবং খালিদ ইবনে ওয়ালীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বাসস্থানের খোঁজ করছিলেন। তখন তাঁর কাছে এক মাতালকে আনা হলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর আশেপাশে যারা ছিল, তাদের আদেশ দিলেন, তাদের হাতে যা কিছু ছিল তা দিয়েই যেন তাকে প্রহার করে। তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার মুখে মাটি নিক্ষেপ করলেন। তিনি বলেন: এরপর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এক মাতালকে আনা হলো। তখন তিনি ঐ দিনের প্রহারকারীদের অনুসরণ করলেন এবং তাকে চল্লিশটি আঘাত করলেন। আর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)ও চল্লিশটি আঘাত করলেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] حديث حسن، وهذا إسناد منقطع، فالزهري لم يسمع هذا الحديث من عبد الرحمن بن الأزهر، بينهما عبدُ الله بن عبد الرحمن بن الأزهر، وقد روى عنه غير واحد، وذكره ابن حبان في "الثقات"، فمثلُه حسن الحديث إن شاء الله، فهو تابعي ويروي الخبر عن أبيه أيضًا. ورواية أسامة بن زيد التي فيها تصريح الزهري بسماعه له من عبد الرحمن بن أزهر وهَّمها بعضُ أهل العلم كما سيأتي، ورواها غيرُه فلم يذكروا سماعًا.وأخرجه أحمد 31/ (19089)، والنسائي (5262) من طريق صفوان بن عيسى، بهذا الإسناد مختصرًا.وأخرجه تامًّا ومختصرًا أحمد 27/ (16809) و 31/ (19079) و (19080) و (19090)، وأبو داود (4487) و (4489) من طرق عن أسامة بن زيد، به.وأخرجه الشافعي في "الأم" 7/ 447 من طريق معمر، وأحمد 31/ (19082)، والنسائي (5263) من طريق صالح بن كيسان، كلاهما عن الزهري، به.وأصل الحديث من رواية معمر عند أحمد 27/ (16811) و 31/ (19081) و (19088)، وابن حبان (7090)، دون قصة الشارب وضربه.وخالفهم عُقيل بن خالد عند أبي داود (4488)، والنسائي (5264)، فرواه عن الزهري، عن عبد الله بن عبد الرحمن بن أزهر، عن أبيه. قال أبو داود عقبه: أدخل عقيل بن خالد بين الزهري وبين ابن الأزهر - في هذا الحديث - عبد الله بن عبد الرحمن بن الأزهر عن أبيه. وقال النسائي: وهذا أولى بالصواب من الذي قبله.وقال أبو حاتم وأبو زرعة الرازيان - كما في "علل ابن أبي حاتم" (1344) -: لم يسمع الزهري هذا الحديثَ من عبد الرحمن بن أزهر، يدخل بينهما عبد الله بن عبد الرحمن بن أزهر، قلت لهما: من يدخل بينهما ابن عبد الرحمن بن أزهر؟ قالا: عقيل بن خالد.وسلف الحديث برقم (8327) من طريق أبي سلمة ويحيى بن عبد الرحمن بن حاطب كلاهما عن عبد الرحمن بن أزهر، وإسناده حسن.
8330 - قال الزُّهْري هذا: فحدَّثني حُمَيد بن عبد الرحمن عن وَبَرة الكَلْبي قال: أرسَلَني خالدُ بن الوليد إلى عمر، فأتيتُه وهو في المسجد معه عثمانُ بن عفان وعليٌّ وعبدُ الرحمن بن عوف وطلحةُ والزُّبيرُ متَّكئون معه في المسجد، فقلت: إنَّ خالد بن الوليد أرسَلَني إليك، وهو يقرأ عليك السلامَ، ويقول: إنَّ الناس قد انهمَكُوا [1] في الخمر، وتَحاقَرُوا العقوبة. فقال عمر: هم هؤلاء عندك فسَلْهم، فقال عليٌّ: نَراه إذا سَكِرَ هَذَى، وإذا هَذَى افترى، وعلى المفتري ثمانونَ. فقال عمرُ: أبلِغْ صاحبَك ما قال. فجَلَدَ خالدٌ ثمانينَ، وجَلَدَ عمرُ ثمانينَ، فكان عمرُ إذا أُتِيَ بالرجل القوي المُنهمِك في الشُّرْب جَلَدَه ثمانينَ، وإذا أُتِي بالرجل الضعيف الذي كانت منه الزَّلّة جَلَدَه أربعين، ثم جَلَدَ عثمانُ ثمانين وأربعينَ [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ওবারাহ আল-কালবি থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: খালিদ ইবনুল ওয়ালীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পাঠালেন। আমি তাঁর কাছে গেলাম। তিনি তখন মসজিদে উসমান ইবন আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), আব্দুর রহমান ইবন আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে হেলান দিয়ে মসজিদে উপবিষ্ট ছিলেন। আমি বললাম: খালিদ ইবনুল ওয়ালীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে আপনার কাছে পাঠিয়েছেন, তিনি আপনাকে সালাম জানিয়েছেন এবং বলছেন যে, লোকেরা মদের প্রতি গভীরভাবে আসক্ত হয়ে পড়েছে এবং তারা শাস্তিকে তুচ্ছ জ্ঞান করছে। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এই লোকেরা আপনার কাছেই আছেন, আপনি তাদের জিজ্ঞেস করুন। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমরা দেখি যে যখন সে (মদপানকারী) মাতাল হয়, তখন সে প্রলাপ বকে। আর যখন সে প্রলাপ বকে, তখন সে মিথ্যা অপবাদ দেয় (ইফতিরা)। আর মিথ্যা অপবাদকারীর শাস্তি হল আশি ঘা। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনার সাথীকে (খালিদকে) বলুন তিনি (আলী) কী বলেছেন। অতঃপর খালিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আশি ঘা বেত্রাঘাত করলেন, আর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও আশি ঘা বেত্রাঘাত করলেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে যখন কোনো শক্তিশালী লোককে আনা হতো, যে মদ্যপানে গভীরভাবে আসক্ত ছিল, তখন তিনি তাকে আশি ঘা বেত্রাঘাত করতেন। আর যখন কোনো দুর্বল লোককে আনা হতো যার দ্বারা ভুলত্রুটি হয়ে গিয়েছিল, তখন তিনি তাকে চল্লিশ ঘা বেত্রাঘাত করতেন। এরপর উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)ও আশি ও চল্লিশ উভয় প্রকার বেত্রাঘাত করেছেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في (ز) و (ك) و (ب) إلى: اتهموك، والمثبت من (م) وهو الصواب.
[2] إسناده ضعيف، وَبَرة الكلبي مجهول، قال الحافظ ابن حجر في "لسان الميزان" 8/ 373 قال ابن حزم في "الإيصال": مجهول. ثم ذكر ابن حجر أنه ترجم له في "تهذيب التهذيب" لأنه وقعت له رواية عند النسائي في "الكبرى" لهذا الحديث الذي ذكره ابن حزم. ولم نجد له ترجمة فيه! ولم نجد ذكرًا لوبرة الكلبي في "سننه"، وإنما ذكر النسائيُّ وَبَرة بن عبد الرحمن الحارثي، وهو غير الكلبي.وأخرجه الدارقطني (3321) - ومن طريقه البيهقي 8/ 320 - من طريق يعقوب بن إبراهيم الدَّورقي، عن صفوان بن عيسى، بهذا الإسناد. وقال فيه ابن وَبَرة، وكذا ترجم له ابن حجر في "إتحاف المهرة" 12/ 420.وأخرجه الطحاوي في "شرح معاني الآثار" 3/ 153 من طريق عبد الله بن وهب وروح بن عبادة، عن أسامة بن زيد به. وعنده: وَبَرة.وفي "صحيح مسلم" (1706) من حديث أنس: أنَّ الذي أشار على عمر بالأربعين هو عبد الرحمن بن عوف، ولفظه: أن النبي صلى الله عليه وسلم جلد في الخمر بالجريد والنعال، ثم جلد أبو بكر أربعين، فلما كان عمر، ودنا الناس من الريف والقرى، قال: ما ترون في جلد الخمر؟ فقال عبد الرحمن بن عوف: أرى أن تجعلها كأخفّ الحدود، قال: فجلد عمر ثمانين.وانظر ما بعده.
8331 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن محمد بن عبد الله البغدادي، حدَّثنا يحيى بن عثمان بن صالح، حدَّثنا سعيدٌ بن كثير بن عُفَير، حدَّثنا يحيى بن فُليح أبو المغيرة الخُزاعي، حدَّثنا ثَوْر بن زيد الدِّيلي، عن عِكْرمة، عن ابن عباس قال: إِنَّ الشُّرَّاب كانوا يُضرَبون على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم بالأيدي والنِّعالِ والعِصيِّ حتى تُوفِّيَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، وكانوا في خلافة أبي بكر أكثرَ منهم في عهدِ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال أبو بكر: لو فَرَضْنا لهم حدًا، فتَوخَّى نحوًا ممّا كانوا يُضرَبون في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، فكان أبو بكر يَجلِدُهم أربعين حتى تُوفَّى، ثم قام من بعدِه عمرُ، فجلدَهم كذلك أربعينَ حتى أُتِيَ برجلٍ من المهاجرين الأوَّلين وقد كان شَرِبَ، فَأَمَرَ بهِ أَن يُجلَد، فقال: لِمَ تَجلِدُني؟ بيني وبينَك كتابُ الله! فقال عمر: في أيِّ كتاب الله تَجِدُ أني لا أجلِدُك؟ فقال: إِنَّ الله تعالى يقول في كتابه: {لَيْسَ عَلَى الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ جُنَاحٌ فِيمَا طَعِمُوا} الآية [المائدة: 93]، فأنا من الذين آمنوا وعملوا الصالحات، ثم اتَّقَوا وآمنوا، ثم اتَّقَوا وأحسَنُوا؛ شهدتُ معَ رسول الله صلى الله عليه وسلم بدرًا والحُديبيَةَ والخندقَ والمشاهدَ.فقال عمر: ألا تَردُّون عليه ما يقول؟ فقال ابن عباس: إِنَّ هؤلاء الآياتِ أُنزلت عُذرًا للماضِينَ، وَحُجّةً على الباقين، فعَذَرَ الماضين، فإنهم لَقُوا الله قبلَ أن تُحرَّمَ عليهم الخمرُ، وهي حُجَّةٌ على الباقين [1] لأنَّ الله عز وجل يقول: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِنَّمَا الْخَمْرُ وَالْمَيْسِرُ وَالْأَنْصَابُ وَالْأَزْلَامُ رِجْسٌ مِنْ عَمَلِ الشَّيْطَانِ} [المائدة: 90]، ثم قرأ حتى أنفَدَ الآية الأخرى، ومَن كان من الذين آمنوا وعَمِلوا الصالحاتِ ثم اتَّقَوا وآمنوا ثم اتَّقَوا وأحسَنوا، فإنَّ الله عز وجل قد نَهَى أن يُشرَبَ الخمرُ، فقال عمرُ: صدقتَ، فماذا ترونَ؟ فقال عليٌّ: نَرَى أنه إذا شَرِبَ سَكِرَ، وإذا سَكِرَ هَذَى، وإذا هَذَى افترى، وعلى المُفتري ثمانونَ جلدةً، فأمَرَ عمرُ فَجُلِدَ ثمانينَ [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে মদ্যপায়ীদেরকে হাত, জুতা ও লাঠি দ্বারা প্রহার করা হতো, যতক্ষণ না রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইন্তেকাল করেন। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতের সময় তাদের সংখ্যা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগের চেয়ে বেড়ে যায়। তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ‘যদি আমরা তাদের জন্য একটি নির্দিষ্ট শাস্তি (হদ) নির্ধারণ করি!’ এরপর তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে যেমন প্রহার করা হতো, সেটির কাছাকাছি পরিমাণ নির্দিষ্ট করলেন। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তেকাল করা পর্যন্ত তিনি তাদেরকে চল্লিশটি করে বেত্রাঘাত করতেন।
এরপর তাঁর পরে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ক্ষমতায় এলেন এবং তিনিও চল্লিশটি করে বেত্রাঘাত করতেন। অবশেষে প্রাথমিক মুহাজিরগণের মধ্য থেকে একজন লোককে আনা হলো, যে মদ পান করেছিল। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বেত্রাঘাত করার নির্দেশ দিলেন। লোকটি বলল: ‘আপনি আমাকে কেন বেত্রাঘাত করবেন? আমার আর আপনার মাঝে আল্লাহর কিতাব (ফয়সালাকারী হিসেবে) রয়েছে!’ উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ‘আল্লাহর কোন কিতাবে তুমি পাও যে আমি তোমাকে বেত্রাঘাত করব না?’ লোকটি বলল: ‘আল্লাহ তাআলা তাঁর কিতাবে বলেন: {যারা ঈমান এনেছে এবং সৎকাজ করেছে, তারা যা খেয়েছে (পান করেছে), তাতে তাদের কোনো অপরাধ নেই} [আল-মায়িদাহ: ৯৩]। আমি তো তাদেরই অন্তর্ভুক্ত যারা ঈমান এনেছে ও সৎকাজ করেছে, এরপর তাকওয়া অবলম্বন করেছে ও ঈমান এনেছে, এরপর তাকওয়া অবলম্বন করেছে ও ইহসান করেছে। আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে বদর, হুদায়বিয়াহ, খন্দক ও অন্যান্য যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছি।
তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ‘তোমরা কি এর জবাব দেবে না?’ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ‘নিশ্চয়ই এই আয়াতগুলো নাজিল হয়েছিল যারা (মদ হারাম হওয়ার আগে) মারা গেছেন, তাদের জন্য ওজর হিসেবে এবং যারা অবশিষ্ট আছে, তাদের বিরুদ্ধে প্রমাণ হিসেবে। তিনি (আল্লাহ) পূর্ববর্তীদেরকে ছাড় দিয়েছেন, কারণ মদ হারাম হওয়ার আগেই তারা আল্লাহর সাথে মিলিত হয়েছেন (মৃত্যুবরণ করেছেন)। আর এই আয়াত অবশিষ্টদের বিরুদ্ধে প্রমাণস্বরূপ। কারণ আল্লাহ আযযা ওয়া জাল বলেন: {হে মুমিনগণ! নিশ্চয়ই মদ, জুয়া, পূজার বেদি ও ভাগ্য নির্ণায়ক তীর ঘৃণ্য বস্তু—শয়তানের কাজ} [আল-মায়িদাহ: ৯০]। এরপর তিনি (ইবনু আব্বাস) অন্য আয়াত শেষ করা পর্যন্ত তেলাওয়াত করলেন। আর যারা ঈমান এনেছে ও সৎকাজ করেছে, এরপর তাকওয়া অবলম্বন করেছে ও ঈমান এনেছে, এরপর তাকওয়া অবলম্বন করেছে ও ইহসান করেছে, তাদের জন্য আল্লাহ আযযা ওয়া জাল মদ পান করতে নিষেধ করেছেন।
উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ‘তুমি সত্য বলেছ। এখন তোমরা কী মত দাও?’ তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ‘আমরা মনে করি, যে মদ পান করে, সে মাতাল হয়। আর যে মাতাল হয়, সে প্রলাপ বকে। আর যে প্রলাপ বকে, সে অপবাদ দেয়। আর অপবাদকারীর শাস্তি হলো আশিটি বেত্রাঘাত। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নির্দেশ দিলেন, ফলে তাকে আশিটি বেত্রাঘাত করা হলো।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] من قوله: "فعذر الماضين" إلى هنا، سقط من (ز). وترجم له في "اللسان"، فقال: قال ابن حزم: مجهول، وقال مرة: ليس بالقوي، وحديثه في "الكبرى" للنسائي وأغفله (يعني المزي) في "التهذيب". قلنا: وقد خولف في وصله كما سيأتي.وأخرجه النسائي (5269) عن محمد بن عبد الله بن عبد الرحيم بن البرقي، عن سعيد بن كثير بن عُفير، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (5270) من طريق سعيد بن أبي مريم، عن يحيى بن فليح، به. وسمى الرجل المهاجري قُدامةَ بن مظعون.وخالف معمرٌ يحيى بنَ فليح عند عبد الرزاق (13542)، فرواه عن أيوب السختياني، عن عكرمة مرسلًا: أنَّ عمر بن الخطاب شاور الناس في جلد الخمر، وقال: إنَّ الناس قد شربوها واجترؤوا عليها! فقال له علي: إنَّ السكران إذا سكر هذى، وإذا هذى افترى، فاجعله حدَّ الفِرْية، فجعله عمر حدَّ الفِرية ثمانينَ. ورجاله ثقات.وخالفهما مالك بن أنس، فرواه في "الموطأ" 2/ 842 عن ثور بن زيد: أنَّ عمر، فذكره معضلًا.وقد صحَّت قصة جلد عمر لقُدامة بغير هذا السياق، أخرجها عبد الرزاق (17076) عن معمر، عن الزهري قال: أخبرني عبد الله بن عامر بن ربيعة - وكان أبوه شهد بدرًا -: أن عمر بن الخطاب استعمل قدامة بن مظعون على البحرين … وذكر قصة. وسلف أول هذا الخبر عند الحاكم برقم (5719).وانظر ما قبله، وما سلف برقمي (7405) و (7411).
[2] إسناده ضعيف، يحيى بن فليح مع أنه من رجال النسائي لم يترجم له المزيُّ ولا ابن حجر، وترجم له في "اللسان"، فقال: قال ابن حزم: مجهول، وقال مرة: ليس بالقوي، وحديثه في "الكبرى" للنسائي وأغفله (يعني المزي) في "التهذيب". قلنا: وقد خولف في وصله كما سيأتي.وأخرجه النسائي (5269) عن محمد بن عبد الله بن عبد الرحيم بن البرقي، عن سعيد بن كثير بن عُفير، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (5270) من طريق سعيد بن أبي مريم، عن يحيى بن فليح، به. وسمى الرجل المهاجري قُدامةَ بن مظعون.وخالف معمرٌ يحيى بنَ فليح عند عبد الرزاق (13542)، فرواه عن أيوب السختياني، عن عكرمة مرسلًا: أنَّ عمر بن الخطاب شاور الناس في جلد الخمر، وقال: إنَّ الناس قد شربوها واجترؤوا عليها! فقال له علي: إنَّ السكران إذا سكر هذى، وإذا هذى افترى، فاجعله حدَّ الفِرْية، فجعله عمر حدَّ الفِرية ثمانينَ. ورجاله ثقات.وخالفهما مالك بن أنس، فرواه في "الموطأ" 2/ 842 عن ثور بن زيد: أنَّ عمر، فذكره معضلًا.وقد صحَّت قصة جلد عمر لقُدامة بغير هذا السياق، أخرجها عبد الرزاق (17076) عن معمر، عن الزهري قال: أخبرني عبد الله بن عامر بن ربيعة - وكان أبوه شهد بدرًا -: أن عمر بن الخطاب استعمل قدامة بن مظعون على البحرين … وذكر قصة. وسلف أول هذا الخبر عند الحاكم برقم (5719).وانظر ما قبله، وما سلف برقمي (7405) و (7411).
8332 - حدَّثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدَّثنا الحسين بن الفضل البَجَلي، حدَّثنا عفان بن مسلم، حدَّثنا حماد بن سَلَمة، عن يونس بن عُبيد، عن الحسن، عن عبد الله بن مُغفَّل: أنَّ امرأةً كانت بَغيًّا في الجاهلية مرَّ بها رجلٌ فَبَسَطَ يده إليها ولاعَبَها، فقالت: مَهُ، إِنَّ الله تعالى ذهب بالشِّرك وجاءَ بالإسلام، فتركها وولَّى، فجعل يلتفتُ يَنظُرُ إليها حتى أصابَ وجهُه الحائط، قال: فأتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم فذَكَرَ ذلك له، فقال: "أنت عبدٌ أرادَ الله بك خيرًا، إنَّ الله إذا أراد بعبدٍ خيرًا عَجَّلَ له عقوبةَ ذنبِه، وإذا أراد بعيدٍ شرًّا أمسَكَ عليه العقوبةَ بذنبِه حتى يُوافِيَ به يومَ القيامة كأنه عَيْرٌ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে মুগাফফাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জাহেলিয়াতের যুগে একজন নারী ছিল যে ব্যভিচার করত। একজন লোক তার পাশ দিয়ে যাচ্ছিল এবং তার দিকে হাত বাড়ালো ও তার সাথে খেল-তামাশা করতে চাইল। তখন সেই নারী বলল: "থামো! নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা শিরককে দূর করেছেন এবং ইসলাম নিয়ে এসেছেন।" লোকটি তখন তাকে ছেড়ে চলে গেল এবং বারবার পেছন ফিরে তাকাতে লাগল, এমনকি তার মুখ দেয়ালে আঘাত করল। লোকটি এরপর নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে ঘটনাটি বলল। রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি এমন এক বান্দা, যার জন্য আল্লাহ কল্যাণ চেয়েছেন। নিশ্চয় আল্লাহ যখন কোনো বান্দার জন্য মঙ্গল চান, তখন তার গুনাহের শাস্তি দ্রুত দিয়ে দেন। আর যখন আল্লাহ কোনো বান্দার জন্য অকল্যাণ চান, তখন তার গুনাহের শাস্তি থামিয়ে রাখেন, যেন সে কিয়ামতের দিন তার সাথে একটি বুনো গাধার (মতো বোঝা বহনকারী) রূপে দেখা করে।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح. وسلف برقم (1307).قوله: "كأنه عَير"، أي: كأنَّ ذنوبه مثل عير، وهو جبل بالمدينة المنورة.
8333 - حدَّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدَّثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدَّثنا الأسود بن عامر شاذانُ، حدَّثنا هُرَيم [1] بن سفيان البَجَلي، عن بَيَان بن بِشر، عن قيس بن أبي حازم، عن أبي شَهْم، قال: كنتُ بالمدينة، فمرَّتْ بي جاريةٌ فأخذتُ بكَشحِها، ثم أتيتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم وهو يبايعُ الناسَ، فقال لي: "ألستَ صاحبَ الجَبْذةِ بالأمسِ؟ " قلت: لا أعودُ يا رسولَ الله، فبايَعَني [2].هذا حديث صحيح الإسناد على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আবূ শাহ্ম থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি মদীনায় ছিলাম। তখন আমার পাশ দিয়ে একজন যুবতী যাচ্ছিল। আমি তার কোমরের অংশ ধরেছিলাম। এরপর আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম, যখন তিনি লোকদের থেকে বাইয়াত গ্রহণ করছিলেন। তখন তিনি আমাকে জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কি গতকালের সেই আকর্ষণকারী ব্যক্তি নও?" আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমি আর এমন করব না। অতঃপর তিনি আমার বাইয়াত গ্রহণ করলেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في (ز) و (م) و (ب) إلى: إبراهيم، وفي (ك) إلى: هيم.
[2] إسناده صحيح.وأخرجه أحمد 37/ (22511)، والنسائي (7288) من طريق أسود بن عامر، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (22512) من طريق يزيد بن عطاء، عن بيان بن بشر، به.
8334 - حدَّثنا علي بن محمد بن [1] عُقبة الشَّيباني بالكوفة، حدَّثنا محمد بن علي بن عفّان العامري، حدَّثنا أسباط بن محمد القُرشي، حدَّثنا الأعمش، عن زيد بن وهب، قال: أتى رجلٌ عبدَ الله بنَ مسعود، فقال: لك في الوليد بن عُقْبة ولحيتُه تَقطُر خمرًا؟ فقال: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم نهانا عن التجسُّس، إن يَظْهَرْ لنا نأخُذْه [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবদুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তাঁর কাছে এসে বলল: ওয়ালীদ ইবনে উকবার বিষয়ে আপনার কী মত, অথচ তার দাড়ি থেকে মদ টপকে পড়ছে? তিনি বললেন: নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে গোয়েন্দাগিরি (তাজাসসুস) করতে নিষেধ করেছেন। যদি তা আমাদের কাছে প্রকাশ হয়ে যায়, তবে আমরা তাকে পাকড়াও করব।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: عن.
[2] إسناده صحيح.وأخرجه أبو داود (4890) من طريق أبي معاوية الضرير، عن الأعمش، بهذا الإسناد.
8335 - أخبرني أبو عبد الله محمد بن علي الصَّنعاني بمكة حَرَسَها الله، حدَّثنا إسحاق بن إبراهيم الدَّبَري، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن الزُّهْري، عن زُرَارة بن مصعب بن عبد الرحمن بن عَوف، عن المِسوَر بن مَخْرَمة، عن عبد الرحمن ابن عوف: أنه حَرَسَ ليلةً مع عمر بن الخطاب بالمدينة، فبينما هم يَمْشُونَ شَبَّ لهم سراجٌ في بيتٍ، فانطلقوا يؤمُّونه حتى إذا دَنَوا منه، إذا بابٌ مُجَافٌ على قوم لهم فيه أصواتٌ مرتفِعة، فقال عمرُ وأخذ بيد عبد الرحمن: أتدري بيتُ مَن هذا؟ قال: لا، قال: هذا بيتُ ربيعةَ بن أُمية بن خَلَفَ، وهم الآن شَرْبٌ، فما تَرَى؟ فقال عبدُ الرحمن: أرى أنَّا قد أتينا ما نَهَى الله عنه؛ نهانا اللهُ عز وجل فقال: {وَلَا تَجَسَّسُوا} [الحجرات: 12]، فقد تجسَّسُنا، فانصَرَفَ عمرُ عنهم وتَرَكَهم [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবদুর রহমান ইবনে আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এক রাতে মদিনায় উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে পাহারা দিচ্ছিলেন। তারা হাঁটছিলেন, এমন সময় তারা একটি ঘরে আলো জ্বলতে দেখলেন। তারা সেই দিকে গেলেন। যখন তারা বাড়ির কাছাকাছি পৌঁছলেন, তারা দেখলেন একটি দরজা বন্ধ করা এবং ভেতরে কিছু লোক উচ্চস্বরে কথা বলছে। তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবদুর রহমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাত ধরে বললেন, তুমি কি জানো এটা কার বাড়ি? তিনি বললেন, না। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, এটা রাবী'আহ ইবনে উমাইয়াহ ইবনে খালাফের বাড়ি, আর তারা এখন মদ্যপান করছে। এখন তোমার কী মনে হয়? আবদুর রহমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমার মনে হয় আমরা এমন কাজ করেছি যা আল্লাহ নিষেধ করেছেন। আল্লাহ তাআলা আমাদেরকে নিষেধ করে বলেছেন: {তোমরা গোয়েন্দাগিরি করো না} [সূরা হুজুরাত: ১২]। আর আমরা তো গোয়েন্দাগিরি করে ফেলেছি। অতঃপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের থেকে ফিরে গেলেন এবং তাদের ছেড়ে দিলেন।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح.وهو في "مصنف عبد الرزاق" (18943)، ومن طريقه أخرجه الخرائطي في "مكارم الأخلاق" (491) و (514)، والبيهقي 8/ 333.وأخرجه إبراهيم بن طهمان في "مشيخته" (6)، والخرائطي (491)، والطبراني في "مسند الشاميين" (1806) من طرق عن الزهري، به. وغاير ابن طهمان في لفظه.قوله: "شَرْبُ" بالفتح، جمع شاربٍ، كصاحِبٍ وصَحْبٍ. ابن نفير ومن معه عمرَو بن الأسود. وعمرو هذا تابعي.وأخرجه وأخرجه الطبراني في "الكبير" 17/ (302) عن يحيى بن صالح، عن محمد بن عبد العزيز، عن إسماعيل بن عياش، عن ضمضم، عن شريح، عن كثير بن مرة، عن عتبة بن عبد وأبي أمامة. فجعل بين شريح وصحابيَّيه عتبة بن عبدٍ وأبي أمامة كثيرَ بنَ مرة، فخالف جمهور الرواة عن إسماعيل، كما سيأتي.وأخرجه أبو داود (4889) - ومن طريقه البيهقي 8/ 333، وابن عبد البر في "التمهيد" 18/ 24 - عن سعيد بن عمرو الحضرمي، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2449) و (2834) عن عبد الوهاب بن نجدة الحَوطي، وبرقم (2835) عن عبد الوهاب بن الضحاك، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2832)، وفي "السنة" (1073)، والطبراني في "الكبير" (7515) من طريق محمد بن إسماعيل بن عياش، والطحاوي في "شرح المشكل" (88) من طريق سعيد بن سليمان الواسطي، وبرقم (89) من طريق إبراهيم بن العلاء بن زبريق، والطبراني في "الكبير" (7516)، وفي "مسند الشاميين" (1660) من طريق هشام بن عمار، وفي "الكبير" 20/ (651)، وفي "الأوسط" (7960) من طريق محمد بن المبارك الصوري، ثمانيتهم عن إسماعيل بن عياش، به عن جبير وكثير والمقدام وأبي أمامة وغيرهم.ووقع في رواية ابن أبي عاصم وحده التي من طريق محمد بن إسماعيل زيادة في أول الحديث: "إنه سيكون بعدي أمراء، فأدُّوا إليهم طاعتهم، فإن الأمير مثل المِجنَّ يُتَّقى به، فإن أصلحوا وأمروكم بخير فلهم ولكم، وإن أساؤوا وأمروكم به فعليهم ولا عليكم، وأنتم منه براء". وقال أبو حاتم الرازي كما في "العلل" (2761): حديث منكر جدًّا.وخالف جمهور أصحاب إسماعيل بن عياش بقيّةُ بن الوليد عند أحمد 39/ (23815)، والطبراني في "الكبير" 20/ (607)، فرواه عن إسماعيل بن عياش، عن ضمضم بن زرعة، عن شريح بن عبيد، عن جبير بن نفير وعمرو بن الأسود، عن المقداد بن الأسود وأبي أمامة. وبقيةُ ليس بذاك القوي.وفي الباب عن معاوية عند أبي داود (4888)، وصححه ابن حبان (5760).
8336 - حدَّثنا أبو إسحاق [1] إبراهيم بن فِراس الفقيه المالكي بمكة حرسها الله تعالى، حدَّثنا بكر بن سهل الدِّمياطي، حدَّثنا محمد بن عبد العزيز الرَّمْلي، حدَّثنا إسماعيل بن عياش، حدَّثنا ضَمْضَم بن زُرعة، عن شُريح بن عُبيد، عن جُبير بن نُفير وكَثير بن مُرَّة والمِقْدام بن مَعْدِي كَرِبَ وأبي أُمامة الباهلي، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم قال: "إِنَّ الأميرَ إذا ابتَغَى الرِّيبةَ في الناس أفسَدَهم" [2].
আবু উমামা আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই শাসক যখন জনগণের মধ্যে সন্দেহ (বা খুঁত) খুঁজে বেড়ায়, তখন সে তাদের নষ্ট করে দেয় (বা: তাদের দুর্নীতিগ্রস্ত করে তোলে)।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] أقحم في النسخ بين أبي إسحاق وإبراهيم: بن. ابن نفير ومن معه عمرَو بن الأسود. وعمرو هذا تابعي.وأخرجه وأخرجه الطبراني في "الكبير" 17/ (302) عن يحيى بن صالح، عن محمد بن عبد العزيز، عن إسماعيل بن عياش، عن ضمضم، عن شريح، عن كثير بن مرة، عن عتبة بن عبد وأبي أمامة. فجعل بين شريح وصحابيَّيه عتبة بن عبدٍ وأبي أمامة كثيرَ بنَ مرة، فخالف جمهور الرواة عن إسماعيل، كما سيأتي.وأخرجه أبو داود (4889) - ومن طريقه البيهقي 8/ 333، وابن عبد البر في "التمهيد" 18/ 24 - عن سعيد بن عمرو الحضرمي، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2449) و (2834) عن عبد الوهاب بن نجدة الحَوطي، وبرقم (2835) عن عبد الوهاب بن الضحاك، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2832)، وفي "السنة" (1073)، والطبراني في "الكبير" (7515) من طريق محمد بن إسماعيل بن عياش، والطحاوي في "شرح المشكل" (88) من طريق سعيد بن سليمان الواسطي، وبرقم (89) من طريق إبراهيم بن العلاء بن زبريق، والطبراني في "الكبير" (7516)، وفي "مسند الشاميين" (1660) من طريق هشام بن عمار، وفي "الكبير" 20/ (651)، وفي "الأوسط" (7960) من طريق محمد بن المبارك الصوري، ثمانيتهم عن إسماعيل بن عياش، به عن جبير وكثير والمقدام وأبي أمامة وغيرهم.ووقع في رواية ابن أبي عاصم وحده التي من طريق محمد بن إسماعيل زيادة في أول الحديث: "إنه سيكون بعدي أمراء، فأدُّوا إليهم طاعتهم، فإن الأمير مثل المِجنَّ يُتَّقى به، فإن أصلحوا وأمروكم بخير فلهم ولكم، وإن أساؤوا وأمروكم به فعليهم ولا عليكم، وأنتم منه براء". وقال أبو حاتم الرازي كما في "العلل" (2761): حديث منكر جدًّا.وخالف جمهور أصحاب إسماعيل بن عياش بقيّةُ بن الوليد عند أحمد 39/ (23815)، والطبراني في "الكبير" 20/ (607)، فرواه عن إسماعيل بن عياش، عن ضمضم بن زرعة، عن شريح بن عبيد، عن جبير بن نفير وعمرو بن الأسود، عن المقداد بن الأسود وأبي أمامة. وبقيةُ ليس بذاك القوي.وفي الباب عن معاوية عند أبي داود (4888)، وصححه ابن حبان (5760).
[2] حديث حسن، وهذا إسناد ضعيف، بكر بن سهل ومحمد بن عبد العزيز الرملي - وهو العمري الواسطي - فيهما ضعف، لكنهما متابعان، وشريح بن عبيد الحضرمي لم يدرك أبا أمامة ولا الحارث بن الحارث ولا المقدام، قاله أبو حاتم الرازي. وقد اختلف في إسناده على إسماعيل بن عياش، كما سيأتي.وأخرجه الطحاوي في "شرح المشكل" (89) عن إبراهيم بن أبي داود، عن محمد بن عبد العزيز الواسطي، بهذا الإسناد. وقرن بمحمد بن عبد العزيز إبراهيمَ بنَ العلاء بن زبريق، وزاد مع جبير ابن نفير ومن معه عمرَو بن الأسود. وعمرو هذا تابعي.وأخرجه وأخرجه الطبراني في "الكبير" 17/ (302) عن يحيى بن صالح، عن محمد بن عبد العزيز، عن إسماعيل بن عياش، عن ضمضم، عن شريح، عن كثير بن مرة، عن عتبة بن عبد وأبي أمامة. فجعل بين شريح وصحابيَّيه عتبة بن عبدٍ وأبي أمامة كثيرَ بنَ مرة، فخالف جمهور الرواة عن إسماعيل، كما سيأتي.وأخرجه أبو داود (4889) - ومن طريقه البيهقي 8/ 333، وابن عبد البر في "التمهيد" 18/ 24 - عن سعيد بن عمرو الحضرمي، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2449) و (2834) عن عبد الوهاب بن نجدة الحَوطي، وبرقم (2835) عن عبد الوهاب بن الضحاك، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2832)، وفي "السنة" (1073)، والطبراني في "الكبير" (7515) من طريق محمد بن إسماعيل بن عياش، والطحاوي في "شرح المشكل" (88) من طريق سعيد بن سليمان الواسطي، وبرقم (89) من طريق إبراهيم بن العلاء بن زبريق، والطبراني في "الكبير" (7516)، وفي "مسند الشاميين" (1660) من طريق هشام بن عمار، وفي "الكبير" 20/ (651)، وفي "الأوسط" (7960) من طريق محمد بن المبارك الصوري، ثمانيتهم عن إسماعيل بن عياش، به عن جبير وكثير والمقدام وأبي أمامة وغيرهم.ووقع في رواية ابن أبي عاصم وحده التي من طريق محمد بن إسماعيل زيادة في أول الحديث: "إنه سيكون بعدي أمراء، فأدُّوا إليهم طاعتهم، فإن الأمير مثل المِجنَّ يُتَّقى به، فإن أصلحوا وأمروكم بخير فلهم ولكم، وإن أساؤوا وأمروكم به فعليهم ولا عليكم، وأنتم منه براء". وقال أبو حاتم الرازي كما في "العلل" (2761): حديث منكر جدًّا.وخالف جمهور أصحاب إسماعيل بن عياش بقيّةُ بن الوليد عند أحمد 39/ (23815)، والطبراني في "الكبير" 20/ (607)، فرواه عن إسماعيل بن عياش، عن ضمضم بن زرعة، عن شريح بن عبيد، عن جبير بن نفير وعمرو بن الأسود، عن المقداد بن الأسود وأبي أمامة. وبقيةُ ليس بذاك القوي.وفي الباب عن معاوية عند أبي داود (4888)، وصححه ابن حبان (5760).
8337 - أخبرني الحسين بن علي التَّميمي، حدَّثنا محمد بن إسحاق الإمام، حدَّثنا أحمد بن عَبْدة، أخبرنا زُهير بن هُنَيد [1]، عن محمد بن عبد الله النَّصْري، عن زُفَر بن وَثِيمة، عن حَكيم بن حِزام، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لا تَناشَدوا الأشعارَ في المساجد، ولا تُقامُ الحدودُ فيها" [2].
হাকিম ইবনে হিযাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা মাসজিদসমূহে (কবিতা পাঠের মাধ্যমে) একে অপরের সাথে প্রতিযোগিতা করো না এবং সেখানে হদ্দ (আইনগত শাস্তি) কার্যকর করো না।"
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: هنيدة.
[2] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لانقطاعه، زفر بن وثيمة لم يلق حكيمَ بن حزام، وزهير بن هنيد روى عنه جمع، وذكره ابن حبان في "ثقاته"، وقد توبع.وأخرجه أبو داود (4490) من طريق صدقة بن خالد، عن محمد بن عبد الله الشعيثي النصري، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 24/ (15580) عن حجاج بن محمد، عن محمد الشعيثي، به موقوفًا.وأخرجه أحمد (15579) من طريق وكيع، عن محمد الشعيثي، عن العباس بن عبد الرحمن المدني، عن حكيم مرفوعًا.ويشهد لشطره الأول حديث عبد الله بن عمرو عند أبي داود (1079)، وابن ماجه (749) و (766)، والترمذي (322)، والنسائي (796) و (9930)، وإسناده حسن.ولشطره الثاني حديث ابن عباس السالف برقم (8303)، وذكرنا شواهده هناك.قال البيهقي في "السنن الكبرى" 2/ 448: نحن لا نرى بإنشاد مثل ما كان يقول حسان في الذب عن الإسلام وأهله بأسًا لا في المسجد ولا في غيره، والحديث الأول (يعني هذا الحديث) ورد في تناشد أشعار الجاهلية وغيرها مما لا يليق بالمسجد، وبالله التوفيق. عن عثمان بن أبي الوليد مولى الأخنسيين، عن عروة بن الزبير، قال: كانت عائشة تحدث عن النبي صلى الله عليه وسلم يقول: "لا تقطع اليد إلا في المجن، أو ثَمنِه". وزاد في الرواية الثانية: زعم أن عروة قال: المجنّ أربعة دراهم.وأخرج النسائي (7378) من طريق محمد بن عبد الرحمن بن أبي الرجال، عن عمرة، عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "تقطع يد السارق في ثمن المجن"، وثمن المجن ربع دينار.وأخرج النسائي (7382) من طريق سليمان بن يسار، عن عمرة بنت عبد الرحمن أنها سمعت عائشة تقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا تقطع يد السارق فيما دون المجن" قيل لعائشة: ما ثمن المجن؟ قالت: ربع دينار.وأخرج البخاري (6790)، ومسلم (1684) (2)، وأبو داود (4384)، والنسائي (7364)، وابن حبان (4455) و (4460) من طريق يونس بن يزيد، عن ابن شهاب، عن عروة وعمرة، عن عائشة عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لا تقطع يد السارق إلا في ربع دينار فصاعدًا"، ليس فيه ذكر المجن.والحَجَفة: تكون من خشب أو من عظم، وتُغلَّف بالجلد، والتُّرس كالحَجَفة إلَّا أنه يطابَق فيه بين جِلدَين.
8338 - أخبرني علي بن عيسى الحِيري، حدَّثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدَّثنا أبو كُرَيب، حدَّثنا حُميد بن عبد الرحمن الرُّؤَاسي، حدَّثنا هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة قالت: إنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم لم يَقطَعْ في أقلَّ من ثَمَن مِجَنٍّ؛ حَجَفَةٍ أو تُرسٍ، وكلاهما يومَئِذٍ ذو ثَمنٍ [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঢালের মূল্যের চেয়ে কম কিছুর জন্য (চোরের হাত) কাটেননি। (তা ছোট ঢাল হোক বা বড় ঢাল) আর সে সময় এ দুটোরই মূল্য ছিল।
تحقيق الشيخ د. سعيد اللحام:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه البخاري (6792 م) عن عثمان بن أبي شيبة، ومسلم (1685) عن محمد بن عبد الله بن نمير، كلاهما عن حميد الرؤاسي، بهذا الإسناد. واستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه البخاري (6792) و (6793) و (6794)، ومسلم (1685)، والنسائي (7387) من طرق عن هشام بن عروة، به.وأخرج النسائي (7362) من طريق يونس، عن ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لا تقطع اليد إلا في ثمن المجن ثلث دينار، أو نصف دينار، فصاعدًا".وأخرج النسائي (7384) و (7385) من طريق مخرمة بن بكير بن عبد الله بن الأشج، عن أبيه، عن عثمان بن أبي الوليد مولى الأخنسيين، عن عروة بن الزبير، قال: كانت عائشة تحدث عن النبي صلى الله عليه وسلم يقول: "لا تقطع اليد إلا في المجن، أو ثَمنِه". وزاد في الرواية الثانية: زعم أن عروة قال: المجنّ أربعة دراهم.وأخرج النسائي (7378) من طريق محمد بن عبد الرحمن بن أبي الرجال، عن عمرة، عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "تقطع يد السارق في ثمن المجن"، وثمن المجن ربع دينار.وأخرج النسائي (7382) من طريق سليمان بن يسار، عن عمرة بنت عبد الرحمن أنها سمعت عائشة تقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا تقطع يد السارق فيما دون المجن" قيل لعائشة: ما ثمن المجن؟ قالت: ربع دينار.وأخرج البخاري (6790)، ومسلم (1684) (2)، وأبو داود (4384)، والنسائي (7364)، وابن حبان (4455) و (4460) من طريق يونس بن يزيد، عن ابن شهاب، عن عروة وعمرة، عن عائشة عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لا تقطع يد السارق إلا في ربع دينار فصاعدًا"، ليس فيه ذكر المجن.والحَجَفة: تكون من خشب أو من عظم، وتُغلَّف بالجلد، والتُّرس كالحَجَفة إلَّا أنه يطابَق فيه بين جِلدَين.