হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8479)


8479 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ، حَدَّثَنَا السَّرِي بن خُزيمة والفَضْل بن محمد قالا: حَدَّثَنَا إسماعيل بن أبي أُويس، حَدَّثَنَا إبراهيم بن إسماعيل بن أبي حَبيبة، عن داود بن الحُصين، عن عِكْرمة، عن ابن عباس: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُعلِّمهم من الأوجاع ولمن يَحمَى [1] أن يقول: "باسم الله الكبير، نعوذُ بالله العظيم من شرِّ عِرْق نَعَّار، ومن شرِّ حرِّ النار" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অসুস্থতা এবং জ্বরাক্রান্ত ব্যক্তির জন্য তাদেরকে এই দু'আ শিক্ষা দিতেন যে, তারা যেন বলে: "আল্লাহুল কাবীরের (মহান আল্লাহর) নামে (শুরু করছি)। আমরা আল্লাহুল আযীমের (মহাপ্রতাপশালী আল্লাহর) নিকট আশ্রয় প্রার্থনা করি উত্তেজনামূলক শিরা-উপশিরার অনিষ্ট থেকে এবং জাহান্নামের আগুনের উত্তাপের অনিষ্ট থেকে।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] أي: تصيبه الحُمَّى.



[2] إسناده ضعيف لضعف إبراهيم بن أبي حبيبة، وإسماعيل بن أبي أُويس - وإن كان فيه لِين - قد توبع.فقد أخرجه أحمد 4 / (2729)، وابن ماجه (3526)، والترمذي (2075) من طرق عن إبراهيم بن إسماعيل بن أبي حبيبة، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: هذا حديث غريب لا نعرفه، إلّا من حديث إبراهيم بن إسماعيل بن أبي حبيبة، وإبراهيم يضعَّف في الحديث.والعرق النعّار: الذي يفور منه الدم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8480)


8480 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الشَّيباني، حَدَّثَنَا يحيى بن محمد بن يحيى الذُّهلي، حَدَّثَنَا مُسدَّد، حَدَّثَنَا يحيى بن سعيد، عن سفيان.وأخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الزاهد، حَدَّثَنَا أحمد بن محمد بن عيسى، حَدَّثَنَا محمد بن كَثير وأبو حُذَيفة قالا: حَدَّثَنَا سفيان عن محمد بن المُنكَدِر، عن أبي بكر بن سليمان بن أبي حَثْمة، عن حَفْصة: أنَّ امرأةً من قريش يقال لها: الشِّفاء، كانت تَرقِي من النَّمْلة، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: "علِّمِيها حفصةَ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কুরাইশ বংশের একজন মহিলা ছিলেন, যাঁর নাম শিফা। তিনি 'নামলা' (এক প্রকার চর্মরোগ) এর জন্য ঝাড়ফুঁক (রুকইয়াহ) করতেন। তখন নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তুমি এটা হাফসাকে শিখিয়ে দাও।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] رجاله في الجملة ثقات، وقد اختُلف في وصله وإرساله كما سلف بيانه عند الحديث (7062)، والراجح إرساله. سفيان: هو الثوري، وأبو حذيفة: هو موسى بن مسعود النهدي، والشِّفاء: هي بنت عبد الله القرشية، وهي جدَّة أبي بكر بن أبي حثمة.وأخرجه أحمد 44 / (26449) و (26450)، والنسائي (7500) من طريقين عن سفيان، بهذا الإسناد.وسلف برقم (7062) من طريق إسماعيل بن محمد بن سعد بن أبي وقاص عن أبي بكر بن سليمان بن أبي حثمة: أنَّ رجلًا من الأنصار خرجت به نملة، فذكره مرسلًا.والنملة: قروح تخرج بالجنب. وأحاديث ابن وهب عن ابن لهيعة من صحيح حديثه، والظاهر أنّ البخاري رحمه الله رجَّح هذه الرواية في حديث عُقيل فذكرها معلَّقة في "صحيحه" بإثر حديث الزبيدي (5739).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8481)


8481 - حَدَّثَنَا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا أحمد بن إبراهيم بن مِلْحان، حَدَّثَنَا يحيى بن بُكَير، حَدَّثَنَا اللَّيث، عن عُقيل، عن ابن شِهاب قال: أخبرني عُرْوةُ، عن عائشة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم رأَى في بيت أم سَلَمة زوجِ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم جاريةً بوجهها سَفْعةٌ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "بها نَظْرةٌ، فاستَرْقُوا لها" [1]. هذا حديث صحيح [2] على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘরে একটি দাসী দেখলেন, যার চেহারায় লালিমাযুক্ত কালচে ভাব ছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাকে 'নযর' (খারাপ দৃষ্টি) লেগেছে। তোমরা তার জন্য ঝাড়ফুঁক (রুকইয়াহ) করাও।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، رجاله ثقات عن آخرهم، إلَّا أنَّ المحفوظ فيه: عروة عن زينب بنت أبي سلمة عن أم سلمة، كما رواه محمد بن الوليد الزبيدي عن الزهري فيما سلف عند المصنّف برقم (7676)، والزبيدي أضبط أصحاب الزهري فيه، وذلك أنه كان رجلًا يلازمه كثيرًا حضرًا وسفرًا.وأما عُقيل - وهو ابن خالد الأيلي - فقد اختُلف عليه فيه، فرواه عنه الليث بن سعد علي النحو الذي خرَّجه المصنّف هنا، موصولًا من رواية عروة عن عائشة، ووهَّم هذه الروايةَ الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 17/ 556.ورواه عبد الله بن وهب، عن عبد الله بن لهيعة، عن عقيل، عن الزهري، عن عروة: أنَّ جارية دخلت على رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو في بيت أم سلمة … فذكره مرسلًا. هكذا أخرجه ابن حجر في "تغليق التعليق" 5/ 47 - 48 من جزء من "فوائد أبي الفضل بن طاهر" بسنده إلى ابن وهب. وأحاديث ابن وهب عن ابن لهيعة من صحيح حديثه، والظاهر أنّ البخاري رحمه الله رجَّح هذه الرواية في حديث عُقيل فذكرها معلَّقة في "صحيحه" بإثر حديث الزبيدي (5739).



[2] لفظ "صحيح" من (ب)، ولم يرد في بقية النسخ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8482)


8482 - أخبرنا علي بن محمد بن عُقْبة الشَّيباني بالكوفة، حَدَّثَنَا إبراهيم بن إسحاق الزُّهري، حَدَّثَنَا مُحاضِر بن المُورِّع، حَدَّثَنَا الأعمش، عن أبي سفيان [1]، عن جابر بن عبد الله قال: جاء رجلٌ من الأنصار يقال له: عَمرو بن حَزْم، وكان يَرقِي من الحيّة، فقال: يا رسول الله، إنك نهيتَ عن الرُّقى وأنا أَرقي من الحيَّة، قال: "قُصَّها عليَّ"، فقصَّها، فقال: "لا بأسَ بهذه، هذه مَواثيقُ".قال: وجاء خالي من الأنصار، وكان يَرقي من العقرب، فقال: يا رسول الله، إنك نهيتَ عن الرُّقى، وأنا أَرقي من العقرب، قال: "مَن استطاع أن يَنفَعَ أخاه فليَفعَلْ" [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আনসারদের মধ্য থেকে আমর ইবনে হাযম নামক এক ব্যক্তি এলেন, যিনি সাপের (বিষের জন্য) ঝাড়ফুঁক করতেন। তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি ঝাড়ফুঁক করতে নিষেধ করেছেন, অথচ আমি সাপের (বিষের জন্য) ঝাড়ফুঁক করি। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমার কাছে তা পড়ে শোনাও।" তিনি পড়ে শোনালেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এতে কোনো দোষ নেই। এগুলো হলো (আল্লাহর সাথে) অঙ্গীকার (বা প্রতিশ্রুতি)।" তিনি (জাবির) বলেন: এরপর আমার মামা এলেন, যিনি আনসারদের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন এবং বিচ্ছুর (কামড়ের জন্য) ঝাড়ফুঁক করতেন। তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি ঝাড়ফুঁক করতে নিষেধ করেছেন, অথচ আমি বিচ্ছুর (জন্য) ঝাড়ফুঁক করি। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমাদের মধ্যে যে কেউ তার ভাইকে উপকার করতে সক্ষম, সে যেন তা করে।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرّف في نسخنا الخطية إلى: أبي السفر، والتصويب من "تلخيص الذهبي"، ومصادر التخريج ومنها "المنتخب من مسند عبد بن حميد" (1026) حيث رواه عن محاضرٍ نفسه، فسمي شيخ الأعمش أبا سفيان. وأما أبو السفر فإنه سعيد بن يحمد الهمداني، وهو ثقة من شيوخ الأعمش، إلا أنه لا تعرف له رواية عن جابر بن عبد الله.



[2] حديث قوي، وهذا إسناد حسن من أجل محاضر بن المورِّع، وقد توبع، وأبو سفيان - وهو طلحة بن نافع - لا بأس به قوي الحديث، وباقي رجاله ثقات.وأخرجه مختصرًا أحمد 22 / (14231) و (14382)، ومسلم (2199) (62 - 63)، وابن ماجه (3515)، وابن حبان (6091) و (6097) من طرق عن الأعمش، عن أبي سفيان، به. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه، فالحديث بنحوه بشطريه عند مسلم.وأخرجه بنحوه أحمد 22 / (14584) و 23 / (15100) و (15102) و (15235)، ومسلم (2198) (60 - 61)، والنسائي (7498)، وابن حبان (532) و (6102) من طريق أبي الزبير، عن جابر بن عبد الله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8483)


8483 - حَدَّثَنَا أبو بكر أحمد بن سلمان الفقيه ببغداد حَدَّثَنَا أحمد بن زهير ابن حَرْب، حَدَّثَنَا موسى بن إسماعيل، حَدَّثَنَا حمّاد بن سَلَمة، حَدَّثَنَا عاصم بن بَهْدلة، عن زِرّ بن حُبَيش، عن ابن مسعود قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "عُرِضَت عليَّ الأممُ بالمَوسِم، فرأيت جَمْعَهم، فأعجَبَني كَثرتُهم وهيئتُهم قد مَلَؤوا السهلَ والجبلَ، فقيل: أيْ محمدُ، رضيتَ؟ فأقول: نعم أيْ ربِّ، فقال: إنَّ لك مع هؤلاء سبعين ألفًا يدخلون الجنَّة بغير حسابٍ، وهم الذين لا يَسْتَرقُون ولا يَكتَوُون وعلى ربِّهم يتوكَّلون"، فقام عُكَّاشة بن مِحصَن فقال: يا رسولَ الله، ادعُ الله أن يجعلَني منهم، فدعا له، فقام رجلٌ آخرُ، فقال: يا رسول الله، ادعُ الله أن يجعلَني منهم، فقال: "سَبَقَك إليها عُكّاشةُ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد من أوجهٍ، ولم يُخرجاه. وليس فيه نهيٌ عن الرُّقَى، لم يُؤثَر [2] التوكلُ عليه، والدليل على ذلك:




ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার সামনে মওসুমের (সমাবেশের) উম্মতদেরকে পেশ করা হলো। আমি তাদের বিরাট জনসমাবেশ দেখলাম। তাদের বিপুল সংখ্যা এবং তাদের সামগ্রিক অবস্থা আমাকে মুগ্ধ করল, কেননা তারা সমতল ভূমি ও পাহাড় পরিপূর্ণ করে ফেলেছিল। তখন বলা হলো: 'হে মুহাম্মাদ, আপনি কি সন্তুষ্ট?' আমি বললাম: 'হ্যাঁ, হে আমার রব।' তখন বলা হলো: 'নিশ্চয়ই এদের সাথে আপনার জন্য সত্তর হাজার লোক রয়েছে, যারা কোনো হিসাব ছাড়াই জান্নাতে প্রবেশ করবে। আর তারা হলো সেই লোকেরা, যারা ঝাড়ফুঁক করায় না, আগুনে পুড়িয়ে চিকিৎসা (দাগানো) গ্রহণ করে না এবং তারা তাদের রবের ওপরই ভরসা রাখে'।" তখন উক্বাশাহ ইবনে মিহসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়িয়ে বললেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি আল্লাহর কাছে দুআ করুন, যেন তিনি আমাকে তাদের অন্তর্ভুক্ত করেন।" রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর জন্য দুআ করলেন। এরপর অন্য আরেকজন লোক দাঁড়িয়ে বললেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি আল্লাহর কাছে দুআ করুন, যেন তিনি আমাকেও তাদের অন্তর্ভুক্ত করেন।" তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "উক্বাশাহ এই বিষয়ে তোমার চেয়ে এগিয়ে গেছে (বা অগ্রাধিকার পেয়ে গেছে)।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل عاصم بن بهدلة.وأخرجه أحمد 6/ (3819) و 7/ (4339)، وابن حبان (6084) من طرق عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه مختصرًا أحمد 7/ (3964) من طريق همام العوذي، عن عاصم، به.وسيأتي ضمن حديث مطوَّل برقم (8936) من طريق عمران بن حصين عن عبد الله بن مسعود، وإسناده صحيح.وله شاهد من حديث ابن عباس عند البخاري (5705) ومسلم (220).وآخر من حديث عمران بن حصين عند مسلم (218).وثالث من حديث أبي هريرة عند مسلم أيضًا (216).



[2] هكذا في نسخنا الخطية: لم يؤثر، والمعنى فيه غامض، و"لم" يمكن أن تقرأ في (م): ثم، ولعلَّ المعنى عندها: ثم إنه يُؤثَر التوكل على طلب الرقية، والله تعالى أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8484)


8484 - ما حدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق وعلي بن حَمْشاذَ؛ قال أبو بكر: أخبرنا، وقال علي: حَدَّثَنَا بِشْر بن موسى، حَدَّثَنَا الحُميدي، عن سفيان، حَدَّثَنَا ابن أبي نَجِيح، عن مجاهد، عن العَقّار بن المغيرة بن شُعْبة، عن أبيه، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لم يَتوكَّلْ مَن استَرقَى أو اكتَوَى" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




মুগীরাহ ইবনে শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, "যে ব্যক্তি ঝাড়-ফুঁক (রুকইয়াহ) করালো অথবা লোহা গরম করে সেঁক (দাগানো চিকিৎসা বা কাওয়াত) গ্রহণ করলো, সে (আল্লাহর উপর) তাওয়াক্কুল (ভরসা) করেনি।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن من أجل العقّار بن المغيرة، فقد روى عنه جمع ولم يؤثر توثيقه عن غير العجلي وابن حبان. سفيان: هو ابن عيينة.وأخرجه أحمد 30 / (18200) عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (18180) و (18217) و (18221)، وابن ماجه (3489)، والترمذي (2055)، والنسائي (7561)، وابن حبان (6087) من طريقين عن مجاهد، به. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح. وأخرجه بنحوه مسلم (2709)، والنسائي (10346 - 10348)، وابن حبان (1020) من طريقين عن أبي صالح السمّان، به.وقد اختُلف فيه على سهيل بن أبي صالح كما هو مبيَّن في تعليقنا على "مسند أحمد" و "سنن أبي داود" (3898)، فارجع إليهما.وأخرجه أبو داود (3899)، والنسائي (10359 - 10360) من طريق طارق بن مخاشن، عن أبي هريرة.قوله: "أعوذ بكلمات الله التامات"، قال النووي في "شرح مسلم": قيل: معناه الكاملات التي لا يدخلها نقص ولا عيب، وقيل: النافعة الشافية، وقيل: المراد بالكلمات هنا القرآن، والله أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8485)


8485 - حَدَّثَنَا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن أيوب، أخبرنا شَيْبان الأُبُلِّي، حَدَّثَنَا جَرير بن حازم، عن سُهَيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال: "مَن قال حين يُمسي: أعوذُ بكلماتِ الله التامّاتِ من شرّ ما خَلَقَ، ثلاثَ مرات، لم تَضرَّه حيّةٌ تلك الليلةَ".قال: وكان إذا لُدِغَ من أهله إنسانٌ قال [1]: ما قال الكلماتِ؟! [2] هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি সন্ধ্যায় তিনবার 'আঊযু বিকালিমা-তিল্লা-হিত্তা-ম্ম-তি মিন শাররি মা খালাক' (আমি আল্লাহ্‌র পরিপূর্ণ বাণীসমূহের মাধ্যমে তাঁর সৃষ্টিকুলের অনিষ্ট থেকে আশ্রয় চাই) বলে, সেই রাতে কোনো সাপ তাকে ক্ষতি করবে না।” বর্ণনাকারী বলেন: তাঁর পরিবারের কেউ সাপের দংশনের শিকার হলে তিনি জিজ্ঞেস করতেন: "সে কি এই কালেমাগুলো পাঠ করেনি?!"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] فاعل "قال" هو أبو هريرة فيما يغلب على ظننا كما يفهم من رواية عبيد الله بن عمر بن سهيل عند ابن حبان (1036). وأخرجه بنحوه مسلم (2709)، والنسائي (10346 - 10348)، وابن حبان (1020) من طريقين عن أبي صالح السمّان، به.وقد اختُلف فيه على سهيل بن أبي صالح كما هو مبيَّن في تعليقنا على "مسند أحمد" و "سنن أبي داود" (3898)، فارجع إليهما.وأخرجه أبو داود (3899)، والنسائي (10359 - 10360) من طريق طارق بن مخاشن، عن أبي هريرة.قوله: "أعوذ بكلمات الله التامات"، قال النووي في "شرح مسلم": قيل: معناه الكاملات التي لا يدخلها نقص ولا عيب، وقيل: النافعة الشافية، وقيل: المراد بالكلمات هنا القرآن، والله أعلم.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل شيبان الأُبلي: وهو شيبان بن فرُّوخ.وأخرجه ابن حبان (1022) عن أحمد بن محمد بن الحسين، عن شيبان بن أبي شيبة - وهو ابن فرّوخ - بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه أحمد 13/ (7898) و 14 / (8880)، وابن ماجه (3518)، والترمذي (3604 م)، والنسائي (10349) و (10350 - 10353)، وابن حبان (1021) و (1036) من طرق عن سهيل بن أبي صالح، به - ورواية هشام بن حسان من بين هؤلاء الرواة عن سهيل أقربها إلى رواية جرير بن حازم إلّا أنه قال فيه: "لم تضرّه حُمَة" بالحاء والميم، وهو السّم، ويطلق كثيرًا على إبرة العقرب للمجاورة، لأن السم يخرج منها. وهذا هو المحفوظ في الرواية، أنها بالحاء والميم، وليس بالحاء والياء كما وقع في رواية جرير، فإنَّ حديث أبي هريرة بطرقه ذُكر فيه: أنَّ رجلًا من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لدغته عقرب، فذكرُ الحُمَة فيه أقرب. وأكثر رواة هذا الحديث لم يذكروا فيه عددًا لقول هذا الدعاء. وأخرجه بنحوه مسلم (2709)، والنسائي (10346 - 10348)، وابن حبان (1020) من طريقين عن أبي صالح السمّان، به.وقد اختُلف فيه على سهيل بن أبي صالح كما هو مبيَّن في تعليقنا على "مسند أحمد" و "سنن أبي داود" (3898)، فارجع إليهما.وأخرجه أبو داود (3899)، والنسائي (10359 - 10360) من طريق طارق بن مخاشن، عن أبي هريرة.قوله: "أعوذ بكلمات الله التامات"، قال النووي في "شرح مسلم": قيل: معناه الكاملات التي لا يدخلها نقص ولا عيب، وقيل: النافعة الشافية، وقيل: المراد بالكلمات هنا القرآن، والله أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8486)


8486 - حَدَّثَنَا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الشَّيباني، حَدَّثَنَا يحيى بن محمد بن يحيى، حَدَّثَنَا مُسدَّد، حَدَّثَنَا مُلازِم بن عمرو.وحدثنا أحمد بن إسحاق الفقيه وأحمد بن جعفر القَطِيعي، قالا: حَدَّثَنَا عبد الله بن أحمد بن حَنبَل، حدثني أَبي، حَدَّثَنَا عليّ بن المَدِيني، حَدَّثَنَا مُلازِم بن عمرو، حَدَّثَنَا عبد الله بن بَدْر، عن قيس بن طَلْق، عن أبيه: أنه لَدغَتْه عقربٌ عند النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فرَقَاه النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ومَسحَ بيدِه [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




তালক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে (তালককে) নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে একটি বিচ্ছু দংশন করেছিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে ঝাড়-ফুঁক করলেন এবং নিজের হাত দিয়ে (দংশিত স্থানটি) মুছে দিলেন।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن من أجل قيس بن طلق. وهو في "مسند أحمد" 26/ (16298).وأخرجه ابن حبان (6093) من طريق محمد بن عبد الملك بن أبي الشوارب، عن ملازم بن عمرو، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8487)


8487 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا الحسن بن علي بن عفَّان العامِرِي، حَدَّثَنَا عبد الله بن نُمير، حَدَّثَنَا أبو خالد يزيدُ بن عبد الرحمن الدّالانيّ.وحدثنا عبد الرحمن بن الحسن القاضي، حَدَّثَنَا إبراهيم بن الحسين، حَدَّثَنَا آدم بن أبي إياس، حَدَّثَنَا شُعبة، عن يزيد بن أبي خالد، عن المِنْهال بن عمرو، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عباس، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال: "مَن عاد مريضًا لم يَحضُرْه أجلُه، فقال عنده سبعَ مرات: أسألُ الله العظيم، ربَّ العرشِ العظيم، أن يَشفِيَك، إلَّا عافاهُ اللهُ من ذلك المرض" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بعد أن اتَّفقا على حديث المِنهال بن عمرو بإسناده: كان يُعوِّذ الحسنَ والحسينَ [2].




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো রোগীকে দেখতে গেল, যার মৃত্যুর সময় এখনও উপস্থিত হয়নি, এবং তার কাছে সাত বার বলল: 'আমি মহান আল্লাহর কাছে প্রার্থনা করি, যিনি মহান আরশের রব, যেন তিনি তোমাকে আরোগ্য দান করেন' (أسألُ الله العظيم، ربَّ العرشِ العظيم، أن يَشفِيَك), আল্লাহ অবশ্যই তাকে সেই রোগ থেকে আরোগ্য দান করেন।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده جيد من أجل يزيد الدالاني، وقد سلف الحديث من طريقه برقم (1284)، وعبد الرحمن بن الحسن القاضي - وإن كان فيه ضعف - متابع.



[2] أخرجه البخاري برقم (3371) من طريق المنهال، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس قال: كان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يعوِّذ الحسن والحسين ويقول: "إنَّ أباكما كان يعوِّذ بها إسماعيل وإسحاق: أعوذ بكلمات الله التامّة، من كل شيطان وهامّة، ومن كل عين لامّة".ولم يخرجه مسلم، والمنهال ليس من رجاله في "الصحيح".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8488)


8488 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبُوبي، حَدَّثَنَا سعيد بن مسعود، حَدَّثَنَا عبيد الله بن موسى، أخبرنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن أبي الأَحوص، عن عبد الله: أنَّ ثلاثةَ نَفرٍ أَتَوا النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فقالوا: إنَّ صاحبًا لنا مريضٌ فوُصِفَ له الكيُّ، فنَكْويهِ؟ فَسَكَت، ثم عادوا فسَكَت، ثم قال في الثالثة: "اكوُوه إنْ شئتُم، وإن شئتُم فارْضِفُوه" [1].هذا حديث صحيح الإسناد على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিন ব্যক্তি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করে বললেন: আমাদের এক সাথী অসুস্থ। তার জন্য সেঁক বা দাহ করার (চিকিৎসা) ব্যবস্থা করার কথা বলা হয়েছে। আমরা কি তাকে সেঁক দেব? তিনি নীরব রইলেন। এরপর তারা (প্রশ্নটি) পুনরায় করলো, তখনও তিনি নীরব রইলেন। তৃতীয়বার তিনি বললেন: "তোমরা যদি চাও, তবে তাকে সেঁক দাও (দাহ করো), আর যদি চাও, তবে উষ্ণ কিছু দিয়ে তাপে দাও।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح على اختصار في رواية المصنّف كما بيَّنّاه عند الرواية السالفة برقم (7682). أبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السَّبيعي، وإسرائيل حفيده، وأبو الأحوص: هو عوف بن مالك الجشمي، وعبد الله: هو ابن مسعود.وأخرجه أحمد 6/ (3701) عن وكيع، عن إسرائيل بن يونس، بهذا الإسناد - بلفظ: "اكووه وارضفوه رضفًا".وسلف من طريق سفيان الثوري عن أبي إسحاق برقم (7682).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8489)


8489 - حَدَّثَنَا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حَدَّثَنَا إسماعيل بن إسحاق القاضي وعليّ بن عبد العزيز البَغَوي، حَدَّثَنَا حجَّاج بن مِنْهال، حَدَّثَنَا حمّاد بن سَلَمة، حَدَّثَنَا أبو التّيّاح، عن مُطرِّف، عن عِمْران بن حُصين قال: نَهَى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عن الكَيِّ، فاكتَوَينا، فما أفلَحْنا ولا أنجَحْنا [1].هذا حديث صحيح الإسناد على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উত্তপ্ত লোহা দিয়ে ছেঁকা দেওয়া (দগ্ধ করে চিকিৎসা করা) থেকে নিষেধ করেছেন। কিন্তু আমরা তা প্রয়োগ করেছিলাম, ফলে আমরা না সফল হয়েছিলাম আর না কল্যাণ লাভ করেছিলাম।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. أبو التياح: هو يزيد بن حميد الضُّبعي، ومطرف: هو ابن عبد الله بن الشِّخّير.وأخرجه أحمد 33 / (2000) عن عبد الصمد بن عبد الوارث وعفان بن مسلم، عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد أيضًا (19989) عن عفان، وأبو داود (3865) من طريق موسى بن إسماعيل، كلاهما عن حماد بن سلمة، عن ثابت، عن مطرف، به. فجعله من حديث ثابت البُناني عن مطرِّف، وثابت وأبو التياح كلاهما ثقة معروف، ولعله عند حماد بن سلمة عنهما جميعًا، والله أعلم.وتابع حمادَ بن سلمة على روايته عن ثابت: حمادُ بنُ زيد عند ابن سعد في "الطبقات" 5/ 193.وسلف الحديث عند المصنّف برقم (7681) من طريق الحسن البصري عن عمران.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8490)


8490 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، أخبرنا محمد بن أحمد بن النَّضْر الأزْدي، حَدَّثَنَا معاوية بن عمرو، حَدَّثَنَا أبو إسحاق الفَزَاري، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر قال: رُمِي أُبيُّ بنُ كَعْب في أَكحَلِهِ، فَبَعَثَ إِليه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم طبيبًا فكَوَاه [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আকহাল (শিরা)-তে আঘাত লেগেছিল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর নিকট একজন চিকিৎসক পাঠালেন। তখন তিনি (চিকিৎসক) সেখানে গরম লোহা দ্বারা দাগ দিলেন (অস্ত্রোপচার করলেন)।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده قوي من أجل أبي سفيان طلحة بن نافع. أبو إسحاق الفزاري: هو إبراهيم بن محمد بن الحارث، والأعمش: هو سليمان بن مهران.وقد سلف الحديث برقم (7684) من طريقين آخرين عن الأعمش. وهو عند مسلم في "صحيحه"، فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8491)


8491 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حَدَّثَنَا يحيى بن محمد بن يحيى حَدَّثَنَا مسدَّد.وحدثنا علي بن حَمْشاذَ، حَدَّثَنَا أبو المثنَّى، حَدَّثَنَا محمد بن المِنْهال؛ قالا: حَدَّثَنَا يزيد بن زُرَيع، حَدَّثَنَا مَعمَر، عن الزُّهْري، عن أنس بن مالك: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كَوَى أسعدَ بن زُرَارة من الشَّوكة [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আস'আদ ইবনে যুরারাকে শুওকা (রোগ/বেদনা) জনিত কারণে ছেঁকা (দাগ) দিয়েছিলেন।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح لكن من رواية الزهري عن أبي أمامة بن سهل بن حُنيف كما تقدَّم تقريره عند الرواية السالف برقم (4920). وروى معناه البخاري في "صحيحه" (5719) موصولًا و (5721) معلَّقًا، من حديث أيوب السختياني، عن أبي قلابة، عن أنس.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8492)


8492 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ، حَدَّثَنَا السَّرِيّ بن خُزيمة ومحمد بن عمرو الحَرَشي، قالا: حَدَّثَنَا أحمد بن يونس، حَدَّثَنَا زهير، حَدَّثَنَا أبو الزُّبير، عن جابر قال: رُمِيَ سعدُ بنُ معاذ في أَكحَلِه، فحَسَمَه النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بيده بمِشقَص، قال: ثم وَرِمَت فَحَسَمَه الثانيةَ [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه!




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সা'দ ইবনু মু'আযের আকহল রগে (প্রধান শিরায়) তীর আঘাত করেছিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হাত দিয়ে একটি ধারালো অস্ত্র (মিশকাস) দ্বারা তা দগ্ধ করে দেন (রক্ত বন্ধ করার জন্য)। রাবী বলেন, এরপর তা ফুলে গেলে তিনি দ্বিতীয়বার তা দগ্ধ করেন।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. أحمد بن يونس: هو أحمد بن عبد الله بن يونس، نُسب إلى جدِّه، وزهير: هو ابن معاوية أبو خيثمة، وأبو الزبير: هو محمد بن مسلم بن تَدرُس المكي.وأخرجه مسلم (2208) عن أحمد بن يونس، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه أحمد 22/ (14343) و 23 / (15144)، ومسلم أيضًا (2208) من طرق عن زهير بن معاوية، به.وأخرجه أحمد 23/ (14773) و (14905)، وأبو داود (3866)، وابن ماجه (3494)، والترمذي (1582)، والنسائي (8626)، وابن حبان (4784) و (6083) من طرق عن أبي الزبير، به - وبعضهم يزيد فيه على بعض.الأكحَل: وريدٌ في وسط الذراع.فحسمه: كواه ليقطع الدم عنه.والمِشقَص: سَهْم ذو نصل عريض. وروى معناه البخاري في "صحيحه" (5719) موصولًا و (5721) معلَّقًا، من حديث أيوب السختياني، عن أبي قلابة، عن أنس.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8493)


8493 - أخبرني أحمد بن يعقوب الثَّقفي، حَدَّثَنَا يوسف بن يعقوب القاضي، حَدَّثَنَا عمرو بن مرزوق، حَدَّثَنَا عِمران القَطَّان، عن قَتَادة عن أنس بن مالك قال: كَوَاني أبو طَلْحة ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم بين أظهُرِنا، فما نُهِيتُ عنه [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবূ তালহা আমাকে ছেঁকা (দাগ) দিয়েছিলেন, অথচ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের মাঝে উপস্থিত ছিলেন, কিন্তু আমাকে তা থেকে বারণ করা হয়নি।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل عمران - وهو ابن داوَر القطان - وهو متابع.وأخرجه أحمد 19 / (12416) عن سليمان بن داود الطيالسي، عن عمران القطان، بهذا الإسناد. وروى معناه البخاري في "صحيحه" (5719) موصولًا و (5721) معلَّقًا، من حديث أيوب السختياني، عن أبي قلابة، عن أنس.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8494)


8494 - أخبرني أبو عمرو إسماعيل بن نُجَيد السُّلمي وأبو سعيد أحمد بن يعقوب الثقفي، قالا: أخبرنا أبو مسلم، حَدَّثَنَا أبو عاصم، عن حَيْوة بن شُريح، عن خالد بن عُبيد، عن مِشرَح بن هاعان، عن عُقْبة بن عامر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "من عَلَّق وَدَعةً، فلا وَدَعَ اللهُ له، ومن عَلَّق تميمةٌ، فلا تمَّمَ اللهُ له" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




উকবা ইবনে আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি ঝিনুক (বা কড়ি/সামুদ্রিক শামুক) ঝুলালো, আল্লাহ যেন তাকে নিরাপত্তা না দেন। আর যে ব্যক্তি তাবিজ ঝুলালো, আল্লাহ যেন তার উদ্দেশ্য সফল না করেন।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف، وسلف الكلام عليه برقم (7581). أبو مسلم: هو إبراهيم بن عبد الله الكشّي، وأبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد النبيل. وقد خولف محمد بن سلمة هذا في إسناد الحديث، فقد رواه أبو معاوية عند أحمد 6/ (3615) وأبي داود (3883)، وعبدُ الله بن بشر عند ابن ماجه (3530)، كلاهما عن الأعمش، عن عمرو بن مرّة، عن يحيى بن الجزار، عن ابن أخي زينب - وقال ابن بشر: ابن أخت زينب - عن زينب. وابن أخي زينب هذا أو ابن أختها مجهول لا يُعرف.وأخرجه ابن حبان (6090) من طريق فضيل بن عمرو، عن يحيى بن الجزار: قال دخل عبد الله … فذكره مرسلًا.وانظر ما سلف برقم (7694) و (7695).والتَّوَلة، قال ابن الأثير في "النهاية": ما يحبِّب المرأةَ إلى زوجها من السِّحر وغيره، جعله من الشرك لاعتقادهم أنَّ ذلك يؤثر ويفعل خلافَ ما قدّره الله تعالى.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8495)


8495 - حَدَّثَنَا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا عبد الله بن الحسن بن أحمد، حَدَّثَنَا جدِّي أحمد بن أبي شعيب، حَدَّثَنَا موسى بن أعْيَن، عن محمد بن سَلَمة الكوفي، عن الأعمش، عن عمرو بن مُرَّة، عن يحيى بن الجزَّار، عن عبد الله بن عُتبة بن مسعود، عن زينب امرأة عبد الله: أنها أصابها حُمْرةٌ في وجهها، فدخلت عليها عجوزٌ فرَقَتْها في خَيْط فعلَّقته عليها، فدخل ابنُ مسعود فرآه عليها، فقال: ما هذا؟ فقالت: استَرقَيتُ من الحُمْرة، فمدَّ يده فقَطَعها، ثم قال: إِنَّ آلَ عبد الله لأغنياءُ عن الشِّرك، قالت: ثم قال: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم حَدَّثَنَا: "أَنَّ الرُّقَى والتَّمائمَ والتِّوَلَةَ شِرْك".قالت: قلت: ما التِّولةُ؟ قال: التِّوَلَةُ هو التهيُّج الذي يُهيِّج الرجال [1]. هذا حديث صحيح الإسناد على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর স্ত্রী যাইনাবের মুখে লালচে দাগ দেখা দিয়েছিল। তখন তার কাছে এক বৃদ্ধা মহিলা এসে একটি সুতার উপর ফুঁ দিয়ে তাকে তা পরিয়ে দেয়। আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঘরে প্রবেশ করলেন এবং তা তার (যাইনাবের) উপর দেখে বললেন, এটা কী? তিনি (যাইনাব) বললেন, আমি এই লালচে দাগের জন্য ঝাড়ফুঁক করিয়েছি। অতঃপর তিনি হাত বাড়িয়ে তা ছিঁড়ে ফেললেন। এরপর তিনি বললেন: নিশ্চয়ই আব্দুল্লাহর পরিবারের লোকেরা শির্‌ক থেকে মুক্ত। তিনি (যাইনাব) বলেন, এরপর তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন যে, “নিশ্চয়ই ঝাড়ফুঁক (রুক‌ইয়া), তাবিজ (তামা‌ইম) এবং তিউয়ালাহ হলো শির্‌ক।” তিনি (যাইনাব) বলেন, আমি বললাম: তিউয়ালাহ কী? তিনি বললেন: তিউয়ালাহ হলো সেই উদ্দীপক যা পুরুষদের (নারীদের প্রতি) উত্তেজিত করে।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح موقوفًا كله على عبد الله بن مسعود كما سلف بيانه عند الحديث (7695)، وهذا إسناد ضعيف بمرّةٍ من أجل محمد بن سلمة الكوفي، فقد سأل ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 7/ 276 عنه أباه فقال: هو شيخ لا أعرفه وحديثه ليس بمنكر؛ ولعله يشير إلى هذا الحديث، وذكره ابن حبان في "المجروحين" 2/ 266 وقال: شيخ يروي عن الأعمش ما ليس من حديثه، لا تحلُّ الرواية عنه لا على سبيل الاعتبار ولا الاحتجاج به بحال. وقد خولف محمد بن سلمة هذا في إسناد الحديث، فقد رواه أبو معاوية عند أحمد 6/ (3615) وأبي داود (3883)، وعبدُ الله بن بشر عند ابن ماجه (3530)، كلاهما عن الأعمش، عن عمرو بن مرّة، عن يحيى بن الجزار، عن ابن أخي زينب - وقال ابن بشر: ابن أخت زينب - عن زينب. وابن أخي زينب هذا أو ابن أختها مجهول لا يُعرف.وأخرجه ابن حبان (6090) من طريق فضيل بن عمرو، عن يحيى بن الجزار: قال دخل عبد الله … فذكره مرسلًا.وانظر ما سلف برقم (7694) و (7695).والتَّوَلة، قال ابن الأثير في "النهاية": ما يحبِّب المرأةَ إلى زوجها من السِّحر وغيره، جعله من الشرك لاعتقادهم أنَّ ذلك يؤثر ويفعل خلافَ ما قدّره الله تعالى.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8496)


8496 - أخبرني الحسن بن حَليم [1] المروَزي، أخبرنا أبو المُوجِّه، أخبرنا عَبْدان، أخبرنا عبد الله، أخبرني طلحة بن أبي سعيد، عن بُكير بن عبد الله بن الأشجّ، عن القاسم بن محمد، عن عائشة أنها قالت: التمائمُ ما عُلِّق قبل نزول البلاء، وما عُلِّق بعد نزول البلاء فليس بتَمِيمة [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তামা'ইম (কবজ বা তাবিজ) হলো সেটাই, যা বিপদ আসার আগে ঝোলানো হয়। আর যা বিপদ আসার পরে ঝোলানো হয়, তা তামা'ইম নয়।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: حكيم. شعيب، وأبو رجاء: اختلف في تسميته، فذكر المصنّف لاحقًا أنه مطر الورَّاق، وذكر البزار في "مسنده" أنه محمد بن سيف، وهو الذي اعتمده الحافظ المزي في "تهذيبه" 25/ 355، و الأول صدوق يخطئ، والثاني ثقة.وأخرجه البزار (6709)، وأبو نعيم في "الحلية" 7/ 165 من طريق أبي موسى الحسن بن أبي شعيب، بهذا الإسناد.ورواه مرسلًا عن شعبةَ غندرٌ محمد بن جعفر كما ذكر أبو نعيم في "الحلية"، وسفيان بن عيينة وأبو أسامة حماد بن أسامة عند ابن أبي شيبة في "مصنفه" 8/ 29، وعلي بن الجعد عند أبي داود في "المراسيل" (453)، وهو المحفوظ.وذكر ابن أبي حاتم في "علل الحديث" (2393) أنه سأل أباه عن حديث مسكين بن بكير عن شعبة موصولًا، فخطّأه وقال: هذا من كلام الحسن وقِيلِهِ.ويشهد له حديث جابر بن عبد الله عند أحمد 22/ (14135) وأبي داود (3868)، وإسناده صحيح.والنُّشْرة، قال الخطّابي: ضربٌ من الرُّقية والعلاج يُعالَج به من كان يُظَن به مسّ الجن، وسُميت نشرةً لأنَّهُ يُنشَر بها عنه؛ أي: يُحَلُّ عنه ما خامَرَه من الداء. وانظر بقية الشرح عليه في تحقيقنا لـ "سنن أبي داود".



[2] إسناده صحيح. وقد سلف برقم (7696). شعيب، وأبو رجاء: اختلف في تسميته، فذكر المصنّف لاحقًا أنه مطر الورَّاق، وذكر البزار في "مسنده" أنه محمد بن سيف، وهو الذي اعتمده الحافظ المزي في "تهذيبه" 25/ 355، و الأول صدوق يخطئ، والثاني ثقة.وأخرجه البزار (6709)، وأبو نعيم في "الحلية" 7/ 165 من طريق أبي موسى الحسن بن أبي شعيب، بهذا الإسناد.ورواه مرسلًا عن شعبةَ غندرٌ محمد بن جعفر كما ذكر أبو نعيم في "الحلية"، وسفيان بن عيينة وأبو أسامة حماد بن أسامة عند ابن أبي شيبة في "مصنفه" 8/ 29، وعلي بن الجعد عند أبي داود في "المراسيل" (453)، وهو المحفوظ.وذكر ابن أبي حاتم في "علل الحديث" (2393) أنه سأل أباه عن حديث مسكين بن بكير عن شعبة موصولًا، فخطّأه وقال: هذا من كلام الحسن وقِيلِهِ.ويشهد له حديث جابر بن عبد الله عند أحمد 22/ (14135) وأبي داود (3868)، وإسناده صحيح.والنُّشْرة، قال الخطّابي: ضربٌ من الرُّقية والعلاج يُعالَج به من كان يُظَن به مسّ الجن، وسُميت نشرةً لأنَّهُ يُنشَر بها عنه؛ أي: يُحَلُّ عنه ما خامَرَه من الداء. وانظر بقية الشرح عليه في تحقيقنا لـ "سنن أبي داود".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8497)


8497 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حَدَّثَنَا محمد بن غالب، حَدَّثَنَا أبو مسلم بن أبي شعيب الحرَّاني، حَدَّثَنَا مِسكِين بن بُكير، عن شُعبة، عن أبي رَجَاء، عن الحسن، قال: سألتُ أنس بن مالك عن النُّشْرة، فقال: ذَكَروا عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أَنَّها من عمل الشيطان [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ‌‌كتاب الفتنبسم الله الرحمن الرحيم




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। [আল-হাসান বলেন:] আমি আনাস ইবনু মালিককে ‘নুশরাহ’ (যাদু বা মন্ত্রের মাধ্যমে ঝাড়ফুঁক/চিকিৎসা) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: তারা নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে উল্লেখ করেন যে, তা শয়তানের কাজ।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح لغيره، مسكين بن بكير صدوق إلّا أنه كان يخطئ في حديث شعبة كما قال الإمام أحمد، وقد خالفه أصحاب شعبة في هذا الحديث فجعلوه عن الحسن - وهو البصري - مرسلًا ليس فيه أنس بن مالك كما سيأتي، وهو المحفوظ.محمد بن غالب: هو تمتام الحافظ، وأبو مسلم بن أبي شعيب: هو الحسن بن أحمد بن أبي شعيب، وأبو رجاء: اختلف في تسميته، فذكر المصنّف لاحقًا أنه مطر الورَّاق، وذكر البزار في "مسنده" أنه محمد بن سيف، وهو الذي اعتمده الحافظ المزي في "تهذيبه" 25/ 355، و الأول صدوق يخطئ، والثاني ثقة.وأخرجه البزار (6709)، وأبو نعيم في "الحلية" 7/ 165 من طريق أبي موسى الحسن بن أبي شعيب، بهذا الإسناد.ورواه مرسلًا عن شعبةَ غندرٌ محمد بن جعفر كما ذكر أبو نعيم في "الحلية"، وسفيان بن عيينة وأبو أسامة حماد بن أسامة عند ابن أبي شيبة في "مصنفه" 8/ 29، وعلي بن الجعد عند أبي داود في "المراسيل" (453)، وهو المحفوظ.وذكر ابن أبي حاتم في "علل الحديث" (2393) أنه سأل أباه عن حديث مسكين بن بكير عن شعبة موصولًا، فخطّأه وقال: هذا من كلام الحسن وقِيلِهِ.ويشهد له حديث جابر بن عبد الله عند أحمد 22/ (14135) وأبي داود (3868)، وإسناده صحيح.والنُّشْرة، قال الخطّابي: ضربٌ من الرُّقية والعلاج يُعالَج به من كان يُظَن به مسّ الجن، وسُميت نشرةً لأنَّهُ يُنشَر بها عنه؛ أي: يُحَلُّ عنه ما خامَرَه من الداء. وانظر بقية الشرح عليه في تحقيقنا لـ "سنن أبي داود".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8498)


8498 - حَدَّثَنَا أبو بكر أحمد بن كامل بن خلف القاضي ببغداد، حَدَّثَنَا أبو إسماعيل محمد بن إسماعيل السُّلمي، حَدَّثَنَا سليمان بن عبد الرحمن [1] الدِّمشقي، حَدَّثَنَا الوليد بن مسلم، حَدَّثَنَا يزيد بن سعيد بن ذي عَصْوان، عن يزيد بن عطاء، عن معاذ بن سعد السَّكْسَكي، عن جُنادة بن أبي أُميّة، عن عُبادة بن الصّامت قال: بينما نحن مع رسول الله صلى الله عليه وسلم وقوفٌ إذ أقبلَ رجل فقال: يا رسولَ الله، ما مُدَّهُ رَخاءِ أمّتك؟ قال: فسكتَ عنه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حتَّى سأله ثلاثَ مرات، ثم وَلَّى الرَّجلُ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "عليّ بالرجل" فنُوديَ، فأقبل الرجل، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لقد سألتَني عن شيءٍ ما سألَني عنه أحدٌ من أمَّتي، رَخَاءُ أمَّتي مئة سنة، مدَّةُ رَخاءِ أُمَّتي مئةُ سنة، مدَّةُ رخاءِ أمَّتي مئةُ سنة"، قال: فقال: يا رسول الله، فهل لتلك من أَمَارةٍ أو آيةٍ أو علامة؟ قال: "نَعَم، القَذْفُ والخَسْفُ والرَّجُفُ، وإرسالُ الشياطينِ المُلجَمةِ عن الناس" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাথে দাঁড়িয়ে ছিলাম, তখন এক ব্যক্তি এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনার উম্মতের সমৃদ্ধি বা সুখের সময়কাল কত? বর্ণনাকারী বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তার সম্পর্কে নীরব রইলেন, যতক্ষণ না সে তাঁকে তিনবার জিজ্ঞাসা করল। এরপর লোকটি চলে গেল। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: “লোকটিকে আমার কাছে নিয়ে এসো।” তাকে ডাকা হলো, অতঃপর লোকটি ফিরে এলো। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে বললেন: “তুমি আমাকে এমন একটি বিষয় সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছো যা আমার উম্মতের আর কেউ জিজ্ঞাসা করেনি। আমার উম্মতের সমৃদ্ধির সময়কাল হলো একশত বছর। আমার উম্মতের সমৃদ্ধির সময়কাল একশত বছর। আমার উম্মতের সমৃদ্ধির সময়কাল একশত বছর।” লোকটি বলল: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! এর কি কোনো আলামত, নিদর্শন বা চিহ্ন রয়েছে? তিনি বললেন: “হ্যাঁ, (আকাশ থেকে) পাথর নিক্ষেপ (আল-কাযফ), ভূমিধস বা ধ্বস (আল-খাসফ), ভূমিকম্প (আর-রাজ্ফ) এবং মানুষের কাছ থেকে শৃঙ্খলিত শয়তানদের ছেড়ে দেওয়া।”




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في (ز) و (ب) إلى: عبد الله، والتصويب من (ك) و (م).



[2] إسناده ضعيف لجهالة معاذ بن سعد السكسكي، فقد انفرد بالرواية عنه يزيد بن عطاء أبو عطاء السكسكي، ويزيد هذا ليس بذاك المعروف أيضًا، فقد روى عنه اثنان وذكره ابن حبان في "ثقاته" كما ذكر فيه معاذًا السكسكي أيضًا، ويزيد بن سعيد بن ذي عصوان ذكره ابن حبان في الثقات أيضًا وقال: ربما أخطأ. وتعقب الذهبي في تلخيص المستدرك" تصحيح الحاكم للإسناد وقال: إسناده مظلم.وأخرجه أحمد 37 / (22770) من طريق إسماعيل بن عياش، عن يزيد بن سعيد، بهذا الإسناد.